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हिन्दुओं की जाति प्रथा

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हिन्दुओं की जाति प्रथा

सिडनी लो ने अपनी पुस्तक ए विजन ऑफ इण्डिया में लिखा है कि हिन्दुओं की जाति प्रथा अर्थात् जाति-संगठन वस्तुतः उनका क्लब, उनका व्यावसायिक संघ और उनका हितकारी तथा मानव-प्रेमी समाज है। हिन्दुओं की जाति-प्रथा के कारण भारत में कोई दरिद्रालय अथवा सुधारालय नहीं है, उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं है।

प्राचीन भारतीय आर्य ही, सिन्धु नदी के क्षेत्र में रहने के कारण हिन्दू कहलाए। आगे चलकर वे ही भारतीय समाज का मुख्य हिस्सा बने। आर्य-क्षत्रियों ने देश के विभिन्न भागों में छोटे-बड़े राज्यों का निर्माण किया। इसलिए आर्य संस्कृति का ही पूरे देश में न्यूनाधिक प्रचार हो गया। इसी को हिन्दू संस्कृति कहा गया। भारत की अनार्य संस्कृतियाँ भी इसी संस्कृति में समाती चली गईं। जाति-प्रथा, हिन्दू संस्कृति की प्रमुख सामाजिक व्यवस्था थी जिसका विकास आर्यों की प्राचीन वर्ण-व्यवस्था से हुआ और जो अब तक चली आ रही है।

हिन्दुओं की जाति प्रथा

जाति से तात्पर्य

‘जाति’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘जन’ धातु से मानी गई है जिसका अर्थ ‘जन्म’ से लिया जाता है। इसका सम्बन्ध ‘प्रजातीय’ अथवा ‘जन्मगत’ व्यवस्था से है। आधुनिक समाज-शास्त्रियों ने भारतीय समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था को अनेक प्रकार से परिभाषित करने का प्रयास किया है।

समाजशास्त्रियों के अनुसार भारतीय जाति-व्यवस्था सामाजिक संगठन का सामान्य रूप है जो हिन्दू समाज को समूहों में विभक्त करता है, जिसके स्तर और आचरण में सम्यक् अंतर है। इसे विकसित होने में सैंकड़ों वर्ष लगे हैं तथा इसमें काल-परिवर्तन के साथ अनेक परिवर्तन होते रहे हैं। आज भारत के हिन्दू समाज में तीन हजार से भी अधिक जातियाँ और उपजातियाँ अस्तित्व में हैं।

कुछ समाजशास्त्रियों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि भारतीय जाति-प्रथा कुटुम्बों अथवा कुटुम्बों के समूहों का समवेत रूप है जो साधारण नाम के साथ एक काल्पनिक पूर्वज, कुलदेवता या एक सामान्य वंश परम्परा से सम्बन्ध रखती है। भारतीय जाति-प्रथा के उद्भव के सम्बन्ध में किसी काल्पनिक पूर्वज या कुलदेवता के होने की बात सही नहीं है क्योंकि किसी पूर्वज या कुलदेवता का सम्बन्ध किसी जाति के गौत्र-विशेष से होता हे न कि सम्पूर्ण जाति से। जाति-प्रथा के उद्गम का आधार व्यवसाय है न कि पूर्वज या देवता।

इतिहासकार स्मिथ के अनुसार- ‘जाति उन परिवारों का एक समूह है जो धार्मिक क्रियाविधि की विशुद्धता, खान-पान और वैवाहिक-सम्बन्ध की पवित्रता के विशिष्ट नियमों का पालन करने के लिए परस्पर संगठित है।’

हर्बर्ट रिजले के अनुसार- ‘जाति परिवारों के संगठन या समूह को कहते हैं। उस समूह के सदस्यों का एक ही नाम होता है जो किसी ईश्वरीय या महान् मानवीय अस्तित्त्व से सम्बन्धित होता है, उनका एक ही व्यवसाय होता है और योग्य व्यक्तियों के विचारानुसार वे एक संयुक्त समुदाय हैं।’

आर. एन. मुकर्जी के अनुसार- ‘जाति जन्म पर आधारित सामाजिक संस्कार और वर्ग-विभाजन की वह गतिशील व्यवस्था है जो आवागमन, खान-पान, विवाह, व्यवसाय और सामाजिक सहवास के सम्बन्ध में अपने सदस्यों पर नियम या प्रतिबन्ध लागू करती है।’

डॉ. शाम शास्त्री के अनुसार- ‘आहार और विवाह सम्बन्धी सामाजिक पृथकत्व को ही जाति कहते हैं।’

हिन्दुओं की जाति प्रथा का आरम्भ

ऋग्वैदिक-काल से ही चार प्रधान श्रेणियों के अतिरिक्त अनेक व्यवसायपरक जातियाँ उत्पन्न होने लगी थीं। ऋग्वेद में चर्मग्न, चर्मकार, कापरी, लोहार-तष्टा, बढ़ई-वप्ता, नापित भिषक-वैद्य आदि कार्य करने वाले लोगों का उल्लेख है। ये लोग ही आगे चलकर व्यावसायिक समूहों में संगठित हो गए और उनकी जातियाँ निश्चित होने लगीं।

उत्तरवैदिक-काल में अनेक प्रकार के व्यवसाय और शिल्प होने लगे। इस काल तक रथकार (रथों का निर्माण करने वलो), सूत (सारथि), वाय (जुलाहा), स्वर्णकार, कर्मार (लोहार), तक्ष, क्षातृ, कुलाल (कुम्हार), ईषुकृत, धवकृत, मृगयु (शिकारी), रज्जुसर्ग, वय, मणिकार, सुराकार, विदलकार, कंटककार, निषद, श्वनि (श्वान-रक्षक), तच्चक (बढ़ई) आदि अनेक व्यवसाय प्रधान वर्गों का उल्लेख हुआ है।

इस काल में सूत को उच्च पद प्राप्त था। इस काल में लोहार को इतना आदर प्राप्त था कि उसे मनीषी शिल्पकार कहा जाता था। रथकार को अग्निहोत्र करने का अधिकार था।

दसवीं-ग्यारहवीं सदी ईस्वी में भारत आए अरबी लेखक अलबरूनी ने हिन्दुओं के चार वर्णों के बारे में लिखा है, जिससे अनुमान होता है कि इस काल तक वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी किंतु विभिन्न वर्णों के भीतर जातियाँ, धीरे-धीरे स्थूल रूप लेती जा रही थीं। इस काल तक वैश्य और शूद्र का वर्गीकरण भी उत्तर-वैदिक काल की तरह पुनः स्पष्ट हो गया था। कृषकों एवं पशुपालकों को वैश्य मान लिया गया था तथा विभिन्न शिल्पकर्म में संलग्न वर्ग, शूद्र वर्ण की जातियों में समाहित हो रहे थे।

बारहवीं शताब्दी के आते-आते भारत में अनेक जातियाँ बन गईं जो व्यवसाय के साथ-साथ आचार-विचार में भी एक दूसरे से अलग थीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य जैसी उच्च जातियां, निम्न-व्यवसाय अपनाने वाली जातियों से प्रायः अलग रहती थीं।

यदि इन तीन उच्च जातियों के सदस्य किसी बढ़ई, लोहार, सुनार गन्ने के रस या अन्य द्रव पदार्थ के व्यापारी, तेली बुनकर, रंगरेज, बेत का कार्य करने वाले या धोबी से भोजन ग्रहण करते हैं तो उन्हें प्रायश्चित स्वरूप तप करना पड़ता था। अंगिरा के अनुसार धोबी, चमार, मछुए या बेत का कार्य करने वाले का स्पर्श नहीं करना चाहिए।

हिन्दुओं की जाति प्रथा की विशेषताएँ

भारतीय समाज में प्रचलित जाति-प्रथा की कुछ निश्चित विशेषताएँ हैं-

(1.) यह जन्म पर आधारित है अर्थात् बालक जिस जाति के सदस्य के घर में जन्म लेगा उसकी जाति भी वही होगी।

(2.) वैवाहिक सम्बन्ध अपनी जाति में ही किए जाते हैं। इस नियम का उल्लघंन करने पर भारी अर्थ-दण्ड देना पड़ता है और कभी-कभी जाति से भी बहिष्कृत कर दिया जाता है। वर्तमान समय में यह बन्धन शिथिल हो गया है।

(3.) प्राचीन काल में प्रत्येक जाति का प्रायः पैतृक व्यवसाय होता था, किन्तु आधुनिक काल में इस विशेषता का लोप हो गया है।

(4.) जाति-व्यवस्था में खान-पान पर कठोर नियन्त्रण होता है। प्रत्येक जाति का कुछ दूसरी जातियों के साथ खान-पान का व्यवहार नहीं होता है।

(5.) सामाजिक रीति-रिवाजों तथा त्यौहारों के अवसर पर जातीय नियमों का पालन करना पड़ता है।

(6.) इस व्यवस्था में बहुत सी जातियाँ उच्च-स्तर की मानी जाती हैं तथा कुछ निम्न-स्तर की। निम्न-स्तर की जातियों के साथ उच्च-स्तर की जातियों का व्यवहार एक-समान नहीं होता।

वर्ण व्यवस्था और हिन्दुओं की जाति प्रथा में अन्तर

वर्ण व्यवस्था एवं जाति-व्यवस्था आर्यों की सामाजिक व्यवस्था के दो रूप हैं। इन दोनों व्यवस्थाओं में मूलभूत समानता होते हुए भी अनेक अन्तर हैं-

(1.) वर्ण-व्यवस्था का प्रारम्भ ऋग्वैदिक एवं उत्तरवैदिक-काल में हुआ था जबकि जाति-व्यवस्था उसके बहुत बाद उत्पन्न हुई।

(2.) वर्ण का प्रारम्भिक सम्बन्ध मनुष्य की त्वचा के रंग से था किंतु बाद में उसका आधार कर्म से हो गया। जाति का सम्बन्ध किसी निश्चित व्यवसाय में संलग्न समुदाय में जन्म लेने से था।

(3.) वर्ण व्यवस्था सहज स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हुई थी किंतु जाति व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था का ही जटिल रूप है।

(4.) वर्ण का सम्बन्ध राजनीतिक और सामाजिक स्थिति से था परन्तु जाति का सम्बन्ध परम्परागत व्यवसाय और विशिष्ट सामाजिक रीति-रिवाजों से था।

(5.) एक ही वर्ण में एक व्यवसाय और भिन्न-भिन्न व्यवसाय करने वाले लोग सम्मिलित थे परन्तु एक जाति में एक ही व्यवसाय करने वाले लोग होते थे।

(6.) वर्ण-व्यवस्था मूलतः कर्म पर आधारित थी, जबकि जाति-व्यवस्था जन्म पर आधारित थी।

(7.) वर्ण-व्यवस्था में विभिन्न वर्णों एवं समुदायों के बीच, खान-पान और सहभोज, विवाह सम्बन्ध आदि आचरण प्रचलित थे परन्तु विभिन्न जातियों में ऐसी प्रथाएं वर्जित थीं।

(8.) वर्ण-व्यवस्था में अस्पृश्यता का प्राधान्य नहीं था परन्तु जाति-व्यवस्था में छुआछूत का भेदभाव अपने चरम पर था।

(9.) वर्ण-व्यवस्था में रक्त की शुद्धता पर कम बल दिया जाता था परन्तु जाति-व्यवस्था में रक्त की शुद्धता एवं धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों की विशिष्टता पर अधिक जोर दिया जाता था।

(10.) वर्ण-व्यवस्था परिवर्तनशील थी अर्थात् कोई भी व्यक्ति दूसरे वर्ण की योग्यता को अपनाकर उस वर्ण को अपना सकता था परन्तु जाति-व्यवस्था में जाति-परिवर्तन सम्भव नहीं होता है।

हिन्दुओं की जाति प्रथा की उत्पत्ति

जाति-प्रथा की उत्पत्ति, वर्ण व्यवस्था का ही विकसित और जटिल रूप है।  जाति-प्रथा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित किए गए हैं-

(1.) विराट पुरुष से वर्ण-उत्पत्ति का सिद्धान्त

ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के अनुसार ब्राह्मणों की उत्पत्ति विराट पुरुष (ब्रह्म) के मुख से, क्षत्रियों की उत्पत्ति विराट पुरुष की भुजाओं से, वैश्यों की उत्पत्ति विराट पुरुष की जंघाओं से तथा शूद्रों की उत्पत्ति विराट पुरुष के चरणों से हुई।

इस प्रकार वर्णों की उत्पत्ति में ईश्वरीय तत्त्व और देव-आज्ञा की अवधारणा बनाई गई ताकि जनसाधारण वर्ण-व्यवस्था के प्रति आस्था बनाए रखे। जिस प्रकार वर्ण-विभाजन को ईश्वरीय माना गया, उसी प्रकार जाति-व्यवस्था को भी देव-निर्मित समझा गया।

(2.) कुल देवता से उत्पत्ति का सिद्धान्त

होकाट के अनुसार प्राचीन काल में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि समझा जाता था और उसे अनेक धार्मिक कृत्य करने पड़ते थे। अतः राजा ने विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न लोगों को नियुक्त किया और उन्हें पद तथा प्रतिष्ठा प्रदान की। इन लोगों के बन्धु-बान्धव एक समूह में संगठित होते गए।

सेनार्ट की मान्यता है कि लोग अलग-अलग कुलदेवता की पूजा करते थे और उनके वंशज अपने आपको उसी कुलदेवता की सन्तान समझने लगे। एक देवता को मानने वाले ने दूसरे देवता को मानने वालों के साथ खान-पान तथा वैवाहिक सम्बन्धों आदि के मामलों में प्रतिबन्ध लगाने आरम्भ  कर दिए। इस प्रकार भिन्न-भिन्न समूहों का निर्माण हुआ जो आगे चलकर जातियों में बदल गए।

(3.) राजनीतिक नियंत्रण का सिद्धान्त

प्रसिद्ध समाजशास्त्री अबेडुबायस की मान्यता है कि ब्राह्मणों ने अपने लाभ तथा अपनी प्रभुता को बनाए रखने के लिए एक चतुर राजनीतक योजना बनाई। उन्होंने धार्मिक कृत्यों के सम्पादन का एकाधिकार अपने पास रखकर समाज के अन्य लोगों को अपने नियंत्रण में कर लिया, जाति-प्रथा इसी योजना का परिणाम थी।

(4.) रक्त की शुद्धता का सिद्धान्त

आर्यों की सभ्यता के प्रारम्भ में किसी प्रकार की सामाजिक एवं व्यावसायिक संरचना नहीं थी। समस्त आर्य समान रूप से एक ही समुदाय में रहते थे। भारत में आने पर उन्होंने भारत के मूल निवासियों को परास्त किया। आर्यों ने अपने रक्त की शुद्धता को बनाए रखने के लिए उन्हें अपने से निम्न सामाजिक स्तर प्रदान किया।

इस प्रकार रक्त की शुद्धता के आधार पर दो वर्ण बन गए- एक आर्य और दूसरे अनार्य (दस्यु)। रक्त की शुद्धता के विचार ने ही आर्यों को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र वर्णों में विभक्त कर दिया। कालांतर में प्रत्येक वर्ण में आवश्यकतानुसार छोटे-छोटे व्यावसायिक समूह बनने लगे। प्रत्येक समूह के लोगों ने अपने रक्त की शुद्धता बनाए रखने के लिए भिन्न व्यवसाय के लोगों से वैवाहिक और खान-पान के सम्बन्ध अलग कर लिए और जाति-व्यवस्था अस्तित्व में आई।

(5.) आर्थिक सिद्धान्त

समाज-शास्त्री वैजित इवेटसन की मान्यता है कि जाति-प्रथा की उत्पत्ति आर्थिक हितों की सुरक्षा का परिणाम थी। सभ्यता के विकास के साथ-साथ नये-नए व्यवसाय भी फैलने लगे और धीरे-धीरे ये व्यवसाय आर्थिक संघों में संगठित हो गए। कालान्तर में अपने-अपने व्यवसाय के हितों की रक्षा करने के लिए व्यवसाय को वंश-परम्परा में बदल दिया गया।

इसी से जाति-प्रथा की उत्पत्ति हुई। प्रोफेसर नेसफील्ड का मत है कि जातीय भिन्नताएँ उद्योग-धन्धों की भिन्नता के कारण हैं। जे. एस. मिल की मान्यता है कि व्यवसायों की ऊँच-नीच की भावना से जाति-प्रथा में ऊँच-नीच की भावना आ गई। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि जाति-प्रथा का निर्माण श्रम-विभाजन के आधार पर हुआ जैसे- पुरोहिताई, लुहारी, सुनारी, बढ़ईगिरी, बुनकरी आदि।

(6.) भौगोलिक सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक क्लिब्रेट की मान्यता है कि विभिन्न स्थानों पर बस जाने के कारण एक स्थान पर बसे समूह के खान-पान, रीति-रिवाज तथा अन्य बातों में दूसरे स्थान पर बसे समूह से भिन्नता आ गई। इस भिन्नता ने जाति-प्रथा को जन्म दिया।

इस प्रकार भारतीय जाति-प्रथा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित किए गए हैं परन्तु इनमें से कोई भी सिद्धांत पूर्ण नहीं है। भारतीय जाति-व्यवस्था का विकास क्रमशः हुआ है और यह भौगोलिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक कारणों का मिश्रित परिणाम है।

हिन्दुओं की जाति प्रथा का विकास

वर्ण-व्यवस्था का स्थान लेने वाली जाति-व्यवस्था धीरे-धीरे अत्यधिक जटिल होती चली गई। विभिन्न वर्णों के अंतर्गत अनेक जातियाँ बन गईं और ये जातियाँ भी उपजातियों में विभाजित हो गईं। प्रत्येक जाति का एक विशेष व्यवसाय था और उस व्यवसाय पर उसी जाति का एकाधिकार हो गया। अब जन्म से ही मनुष्य की जाति निश्चित थी और इसमें परिवर्तन नहीं हो सकता था। जातियों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ जाति-प्रथा में संकीर्णता और अपरिवर्तनशीलता भी बढ़ी। जाति-प्रथा के विकास में कई कारकों ने भूमिका निभाई-

(1.) पुरोहितों की भूमिका

वर्ण-व्यवस्था को ‘कर्म’ के स्थान पर ‘जन्म’ आधारित बनाने में पुरोहितों (ब्राह्मणों) की बड़ी भूमिका थी। उन्होंने वर्णों को ईश्वरीय-रचना घोषित किया। इस व्यवस्था में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और प्रमुखता की मजबूती से स्थापना की गई थी। ब्राह्मण सूत्रकारों ने धर्मशास्त्रों की रचना की तथा व्यवस्था दी कि जो व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण नहीं है, वह पुरोहित का कार्य नहीं कर सकेगा।

‘गौतम धर्म सूत्र’ के रचनाकार गौतम ने व्यवस्था दी कि ब्राह्मण को ब्राह्मण या क्षत्रिय के यहाँ भोजन ग्रहण करना चाहिए। विशेष परिस्थितियों में वह वैश्य के घर भी भोजन ग्रहण कर सकता है किन्तु साधारणतः नहीं। इससे स्पष्ट है कि सहभोज और खान-पान की प्रथा परस्पर वर्गों या समूहों में निषिद्ध की जा रही थी।

ब्राह्मणों ने समाज पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए धर्मशास्त्रों में नवीन सिद्धान्त, निषेध, नियम आदि का निर्माण किया। ब्राह्मणों के भोजन की शुद्धता सम्बन्धी नियमों ने विभिन्न जातियों और वर्गों के पारस्परिक सहभोज को पूरी तरह समाप्त कर दिया। फलस्वरूप लोग छोटे-छोटे समुदायों में बँटने लगे और विभिन्न जातियों में परिवर्तित हो गए।

(2.) नवीन व्यवसायों की भूमिका

आर्यों की आर्थिक-समृद्धि के साथ-साथ, नवीन व्यवसायों का विकास हुआ जिन्हें अपनाने वालों की पृथक्-पृथक् जातियाँ तथा उपजातियाँ बनने लगीं। व्यापारियों तथा शिल्पकारों ने अपने आपको विभिन्न श्रेणियों, संघों तथा समुदायों में विभक्त कर लिया जो कालान्तर में उनकी जातियाँ तथा उपजातियाँ बन गईं। इस प्रकार व्यवसायों की भिन्नता एवं विशेषता ने जाति-प्रथा के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(3.) विदेशी आक्रांताओं की भूमिका

ईसा के पूर्व तथा बाद की प्रारम्भिक सदियों में यूनानी, शक, कुषाण, हूण, पह्लव तथा पार्थियन आदि विदेशी आक्रांता भारत में अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित करने में सफल हो गए। वे भारत के विभिन्न हिस्सों में बस गए। इन विदेशी लोगों ने स्थानीय रीति-रिवाजों और व्यवसायों को अपना लिया।

भारतीय संस्कृति ने उन्हें भी व्यवसाय के आधार पर हिन्दू समाज में सम्मिलित कर लिया। इन लोगों ने भी अपने-अपने व्यवसायों के आधार पर अपनी नवीन जातियाँ बना लीं। ‘गुर्जर’ जाति का उद्भव खिजरों से माना जाता है जो कि विदेशी आक्रांता के रूप में भारत में आए थे। आज भी कुछ लोग अपनी जाति ‘हूण’ लिखते हैं।

(4.) आर्य जाति का विभिन्न क्षेत्रों में जाकर बसना

आर्य प्रजा के प्रसार के साथ-साथ आर्यों के विभिन्न समूह भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैल गए। इन समूहों ने स्थानीय प्रथाओं एवं रीति-रिवाजों को अपना कर अपनी सामाजिक प्रथाओं और आचार-विचार के भिन्न नियम बना लिए। इस कारण उनमें और उनके सजातीय बन्धुओं में अंतर दिखाई देने लगा।

ये अंतर समय के साथ  अधिक दृढ़ होते चले गए तथा उनमें समस्त प्रकार के सामाजिक सम्पर्क और व्यवहार विलुप्त हो गए। परिणामस्वरूप नवीन जातियों का निर्माण होता चला गया। उदाहरण के लिए ब्राह्मण जाति के विभिन्न क्षेत्रों में बसे ब्राह्मण समूह अपने आपको पृथक् जाति के समझने लगे। इस प्रकार ब्राह्मण वर्ण में ही गोरवाल ब्राह्मण, पालीवाल ब्राह्मण, श्रीमाली ब्राह्मण, पुष्करणा ब्राह्मण, आदिगौड़ ब्राह्मण, गुर्जर-गौड़ ब्राह्मण, गौड़ ब्राह्मण आदि सैंकड़ों जातियां-उपजातियाँ बन गईं।

(5.) रीति-रिवाजों में परिवर्तन एवं जाति बहिष्कार

अनेक बार स्थानीय प्रभाव के कारण अथवा अन्य परिस्थितियों के कारण किसी-किसी जाति के रीति-रिवाज में परिवर्तन करने लगे परन्तु उस जाति के बहुत से लोगों को रीति-रिवाजों में परिवर्तन पसन्द नहीं आए।

अतः वे अपने को उनसे अलग करके अपनी नई जाति बना लेते थे। कभी-कभी जाति के रीति-रिवाजों, प्रथाओं तथा अनुशासन का उल्लंघन करने वाले परिवारों अथवा समूहों को जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था। ऐसे लोग भी आपस में खान-पान एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके नवीन जाति के रूप में संगठित हो जाते थे।

(6.) जैन एवं बौद्ध धर्मों की भूमिका

यद्यपि जैन एवं बौद्ध दोनों ही धर्मों में ब्राह्मणों की बनाई वर्ण-आश्रम व्यवस्था को नकारा गया था किंतु इन दोनों धर्मों में धार्मिक रीतियों के आधार पर नई जातियों ने जन्म लिया। पहले अधिकांश जातियों में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के लोग थे किंतु अहिंसा के प्रभाव से बहुत-सी जातियों के शाकाहारियों ने मांसाहारियों से अलग होकर अपनी पृथक् जातियाँ बना लीं।

(6.) नवीन धार्मिक सम्प्रदायों की भूमिका

उत्तरवैदिक-काल से लेकर मध्ययुग में विकसित होने वाले नवीन धार्मिक सम्प्रदायों के अनुयाइयों ने भी पृथक् जातियों का रूप ले लिया, जैसे कि लिंगायत, कबीर-पन्थी, रामदासी, दादूपन्थी, रामस्नेही इत्यादि।

(7.) दार्शनिक मान्यताओं की भूमिका

भारतीय दर्शन की, भाग्यवाद, कर्मवाद और पुनर्जन्मवाद की विचारधारा ने भी जाति-प्रथा को ठोस बनाने में अपना योगदान दिया। किसी जाति विशेष में जन्म लेने को भाग्य के साथ जोड़ दिया गया। धर्मशास्त्रों के रचयिताओं, व्याख्याकारों और टीकाकारों ने जाति-प्रथा को पुष्ट करने का प्रयत्न किया।

(8.) अन्य कारकों की भूमिका

आर्य राजाओं ने ब्राह्मणों की बनाई हुई व्यवस्थाओं को स्वीकार करके जाति-व्यवस्था को स्थाई बनाने में योगदान दिया। सैंकड़ों वर्षों से अस्तित्त्व में रहने के कारण जाति-प्रथा की जड़ें इतनी गहरी हो गईं कि इस व्यवस्था को बदलना अथवा त्यागना सम्भव नहीं रहा। भारत में इस्लाम के प्रवेश के बाद मुस्लिम आक्रान्ताओं ने हिन्दुओं को बल-पूर्वक मुसलमान बनाना आरम्भ किया।

इस पर हिन्दुओं ने स्वयं को जाति की मजबूत दीवारों में सुरक्षित बनाने का प्रयास किया। इस कारण जाति-व्यवस्था और भी अधिक जटिल व कठोर हो गयी। प्रत्येक जाति ने अपने अस्तित्त्व को बनाए रखने के लिए अपने चारों ओर रीति-रिवाजों और परम्पराओं का मजबूत परकोटा बना लिया जिसे लांघकर न तो कोई बाहर जा सकता था और न भीतर आ सकता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें

हिन्दुओं की जाति प्रथा

जाति प्रथा के गुणदोष

चाण्डाल एवं कायस्थ

जाति प्रथा के गुणदोष

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जाति प्रथा के गुणदोष

जाति प्रथा के गुणदोष भारतीय सामाजिक व्यवस्था के कारण उत्पन्न हुए। चूंकि जाति प्रथा का उदय वर्ण व्यवस्था के विस्तार से हुआ, इसलिए जाति व्यवस्था भी मूलतः श्रम-विभाजन पर आधारति है।

भारतीय जाति प्रथा के गुणदोष पर विचार करने से पहले हमें भारतीय समाज की जटिलताओं एवं पूर्ववर्ती वर्ण-व्यवस्था को समझना होगा।

जाति प्रथा के गुण

भारतीय जाति प्रथा के निम्नलिखित गुणों का उल्लेख किया जा सकता है-

(1.) सह-अस्तित्त्व की भावना

जाति-व्यवस्था ने भारतीय प्रजा को सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीना सिखाया। प्रत्येक जाति केवल एक काम करने में दक्ष थी जबकि उसे अन्य जातियों द्वारा उत्पादित किए जा रहे उत्पादों की भी आवश्यकता थी। इस प्रकार सभी जातियाँ एक दूसरे की पूरक बन गईं और उनमें सह-अस्तित्व की भावना विकसित हुई।

(2.) व्यावसायिक दक्षता

जाति-व्यवस्था का निर्माण व्यवसाय विशेष के आधार पर हुआ था। इस कारण प्रत्येक जाति का एक वंशानुगत व्यवसाय था। अतः वंशानुगत परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल प्रदान किया। इस प्रकार समाज में पीढ़ी दर पीढ़ी व्यावसायिक दक्षता विकसित हुई और विभिन्न शिल्पकलाओं को न केवल पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा जा सका अपितु उनका विकास भी सम्भव हो सका।

(3.) प्रतिस्पर्द्धा का अभाव

जाति-व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक जाति का व्यवसाय और उद्योग अलग-अलग थे। व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा नहीं होने के कारण समाज में उत्पन्न होने वाले संघर्ष, ईर्ष्या, घृणा एवं द्वेष आदि दुर्गुणों का प्रवेश नहीं हुआ। इससे सामाजिक जीवन में शान्ति बनी रही। राज्यशक्ति के क्षीण होने की अवस्था में जाति-व्यवस्था ने राजनैतिक संगठन की इकाई के रूप में कार्य किया तथा समाज को दृढ़ता प्रदान की।

(4.) रक्त, वंश और वर्ण की शुद्धता

प्रत्येक जाति के खान-पान, आचार-विचार वैवाहिक सम्बन्ध और सम्पर्क के नियम निश्चित थे। अन्तर्जातीय-विवाह और विभिन्न जातियों में ऊँच-नीच की भावनाओं के कारण परस्पर सहभोज निषिद्ध थे। विवाह अपनी ही जाति में होते थे। इन नियमों को उल्लघंन करने वालों को जाति से बहिष्कृत किया जाता था। इस भय से समाज अपनी जातीय-नियमों के अनुशासन में रहता था जिससे रक्त, वंश और वर्ण की शुद्धता बनी रही और शारीरिक एवं मानसिक गुणों को सुरक्षित रखा जा सका तथा आर्यों को अवंाछनीय विदेशी रक्त के अपमश्रण से बचाया जा सका।

(5.) हिन्दू संस्कृति एवं धर्म की रक्षा

जाति-प्रथा ने लोगों में रूढ़ियाँ, पृथकत्व की भावना और वर्ग-अभिमान को उत्पन्न किया जिससे जातीय नियमों, निषेधों और दण्ड-विधान में कठोरता आ गयी। इस कठोरता ने विदेशी संस्कृतियों  के अतिक्रमण एवं हस्तक्षेप के विरुद्ध किलेबन्दी का काम किया। इसने हिन्दू समाज को इस्लाम के राजनीतिक एवं धार्मिक आघातों को सहन करने की शक्ति प्रदान की।

जब देश राजनैतिक विप्लव, जातीय संघर्ष एवं अराजकता के युग से गुजर रहा था, तब जाति-प्रथा ने हिन्दू-धर्म और संस्कृति की रक्षा की। जाति-प्रथा से जुड़े हुए रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं की सुदृढ़ किलेबन्दी ने इस्लामी रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं को हिन्दू समाज के भीतर नहीं घुसने दिया। आक्रांता मुसलमानों से परास्त हो जाने के बावजूद अधिकांश हिन्दुओं ने अपने प्राणों का बलिदान देकर भी अपने धर्म की रक्षा की। इसका श्रेय भारतीय धार्मिक आदर्श एवं जाति-व्यवस्था को सम्मिलित रूप से जाता है।

(6) अन्य गुण

जाति-प्रथा ने हिन्दू-धर्म को अपनी श्रेणियों के विस्तार के लिए मार्ग सुलभ कराया तथा विदेशी तत्त्वों के हिन्दू समाज में एकीकरण का काम किया। यह विदेशियों की इच्छा और रुचि पर निर्भर था कि वे हिन्दू-धर्म को स्वीकार करके अपनी नवीन जातियों का निर्माण कर लें और अपनी परम्पराओं एवं संस्कृति के मूल तत्त्वों को बनाए रखें। जाति-प्रथा की इस व्यावहारिक दृष्टि के कारण विदेशी आक्रमणकारियों के समूह शनैः-शनैः हिन्दू समाज में घुल-मिल गए।

जाति-प्रथा ने बन्धुत्व भावना को बढ़ाया तथा एक जाति के सदस्यों में एकता एवं दृढ़ता स्थापित की। संकट और बेकारी के समय जाति के सदस्य, स्वजातीय बन्धुओं की सहायता करते थे। जाति-प्रथा ने स्वार्थ-त्याग, प्रेम और लोक-सेवा के नागरिक गुणों को भी प्रोत्साहित किया। अनेक सम्पन्न लोग अपनी जाति के लोगों के लिए चिकित्सालय, धर्मशालाएँ, मन्दिर, पाठशालाएँ आदि बनवाते थे।

इससे जाति के लोगों को कम व्यय में जीवन-यापन करने की सुविधा उपलब्ध हुई। जाति-व्यवस्था ने सामुदायिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास किया। इस प्रकार भारतीय जाति-व्यवस्था कई प्रकार से उपयोगी सामुदायिक संस्था के रूप में सफल रही।

जाति प्रथा के दोष

अनेक गुणों के साथ-साथ जाति-व्यवस्था में अनेक दोष भी थे-

(1.) संकीर्णता की भावना

जाति-प्रथा ने हिन्दू समाज को सैकड़ों वंश-परम्परागत जातियों और उपजातियों में विभाजित कर दिया जिसने पृथकत्व की भावना प्रज्वलित की और जन-साधारण की सोच को जाति के दायरे में संकुचित कर दिया। इससे समाज की एकता, संगठन-शक्ति और सहकारिता की भावना को हानि पहुँची। लोगों ने अपनी जाति की उन्नति के बारे में तो सोचा किंतु देश और समाज की उन्नति पर विचार करना बंद कर दिया।

(2.) पारस्परिक फूट

विभिन्न जातियों एवं उपजातियों में एक दूसरे को नीचा समझने की प्रवृत्ति थी। विभिन्न जातियों के ईर्ष्या, द्वेष और संघर्ष ने समाज को प्रतिद्वन्द्वी समुदायों में विभक्त कर दिया और वे विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध संगठित होकर नहीं लड़ सके। इससे राष्ट्रीयता का विकास रुक गया और भारतीयों की राजनैतिक एकता खतरे में पड़ गई।

(3.) युद्ध का दायित्व जाति विशेष पर

जाति-व्यवस्था के कारण देश की रक्षा के लिए युद्ध करने एवं दस्युओं आदि से समाज की रक्षा करने का दायित्व क्षत्रिय जाति पर हो गया। दूसरी जातियों को अस्त्र-शस्त्र संचालन तथा युद्ध-कौशल से वंचित कर दिया गया। इस कारण विदेशी आक्रमणों के समय क्षत्रियों ने अकेले ही उनका सामना किया और वे परास्त हो गए।

इसी प्रकार मुसलमानों के आक्रमण के समय राजपूतों ने अकेले ही उनका सामना किया। प्राचीन क्षत्रियों एवं उनके बाद अस्तित्व में आए राजपूतों में भी परस्पर ऊँच-नीच एवं कुल की श्रेष्ठता का अभिमान चरम पर था। इसलिए वे संगठित होकर नहीं लड़ सके और एक-एक करके परास्त हो गए।

(4.) दक्षता एवं कार्यकुशलता में कमी

आर्थिक क्षेत्र में जाति-प्रथा के बंधन श्रम की दक्षता और व्यवसाय-कौशल को हानि पहुँचाते हैं। क्योंकि व्यक्ति को व्यवसाय विशेष में रुचि एवं योग्यता न होने पर भी अपनी ही जाति का परम्परागत व्यवसाय अपनाना पड़ता है। इस कारण प्रतिभा को अपनी रुचि का क्षेत्र चुनने का अवसर नहीं मिलता। इससे आर्थिक एवं बौद्धिक प्रगति रुक जाती है।

(5.) बड़े औद्योगिक एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से दूरी

जाति-प्रथा की संकीर्णता के कारण ही देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना से पहले किसी बड़े औद्योगिक एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठान की स्थापना नहीं हो सकी क्योंकि लोग छोटे-छोटे समूहों में एवं कुटीर उद्योगों के रूप में कार्य करने के ही अभ्यस्त थे।

(6.) व्यक्ति-स्वातंत्र्य को क्षति

जाति-व्यवस्था के अन्तर्गत कोई व्यक्ति अपनी जाति का व्यवसाय त्याग कर अन्य व्यवसाय नहीं अपना सकता था और न अपनी जाति छोड़कर दूसरी जाति ग्रहण कर सकता था। इससे व्यक्ति स्वातंत्र्य की हानि होती है और नैसर्गिक प्रतिभा कुंद होती है।

(7.) अस्पृश्यता एवं असहिष्णुता का विस्तार

जाति-प्रथा ने एक दूसरे को नीचा समझने की प्रवृत्ति को उसके चरम पर पहुँचा दिया। इस कारण जातीय कुएं, जातीय तालाब, जातीय धर्मशालाएं का ही उपयोग करने का अधिकार रह गया। उनमें सामुदायिकता की सहज भावना का विकास नहीं हुआ। लोग एक दूसरे के प्रति असहिष्णु हो गए और शक्तिशाली समुदाय, अपने से कमजोर समुदाय पर अत्याचार करने लगे।

जाति-प्रथा के सम्बन्ध में विद्वानों के विचार

भारतीय जाति प्रथा विश्वभर के विद्वानों के लिए कौतूहल एवं अध्ययन का विषय रही है। अनेक पश्चिमी विद्वानों ने भारतीय जाति-प्रथा का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से अध्ययन किया है एवं इसके सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किए हैं।

सिडनी लो नामक यूरोपीय समाजशास्त्री ने लिखा है- ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि शताब्दियों तक राजनैतिक आघातों और प्राकृतिक विभीषिकाओं के विरुद्ध, भारतीय जाति प्रथा ने मूलभूत स्थायित्व और सन्तोष के द्वारा भारतीस समाज को बांधे रखने में मुख्य योगदान दिया है।’

सर हेनरी कॉटन ने लिखा है- ‘हिन्दू समाज में ढूंढी जा सकने वाली कठिनाइयों एवं सममस्याओं का कारण रूप होने की बजाए जाति-प्रथा ने अतीत में महत्वपूर्ण सेवा की है और वर्तमान में भी व्यवस्था तथा एक जुटता बनाए रखी है।’

निष्कर्ष

उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि जाति-प्रथा का उद्भव प्राचीन वर्ण-व्यवस्था का ही विस्तार था जिसका प्रमुख आधार व्यावसायिक वंश-परम्परा था। कुछ विदेशी आक्रांता, अनार्य वर्ग, वर्णसंकर वर्ग आदि समुदाय, आर्यों के चार-वर्णों से बाहर थे किंतु वे जाति व्यवस्था में अलग-अलग जातियों के रूप में स्थान पा गए।

जाति-व्यवस्था के कारण भारतीय समाज को कुछ बड़े लाभ हुए तो कुछ बड़ी हानियाँ भी झेलनी पड़ीं। एक ओर तो जाति-प्रथा ने भारतीय समाज को व्यावसायिक कौशल बढ़ाने में सहायता दी, विदेशी जातियों को अलग जाति के रूप में भारतीय समाज में समाहित होने का अवसर दिया तथा इस्लाम के विरुद्ध अपने धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ता प्रदान की किंतु दूसरी ओर जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज को एक ही देश के भीतर छोटे-छोटे देशों में विभक्त कर दिया जिनमें सहजीवन की भावना कम और प्रतिद्वंद्विता की भावना अधिक थी।

यदि देश पर चढ़कर आए शत्रुओं के विरुद्ध समस्त भारतीय समाज संगठित होकर लड़ता तो देश को दीर्घकाल तक पराधीनता नहीं झेलनी पड़ती।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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चाण्डाल एवं कायस्थ जातियों का जातिप्रथा में स्थान

चाण्डाल एवं कायस्थ जातियों का जाति प्रथा में स्थान

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प्राचीन चाण्डाल जाति का काल्पनिक चित्र

चाण्डाल एवं कायस्थ जातियाँ भारतीय जाति प्रथा में तो स्थान रखती हैं किंतु वैदिक आर्य व्यवस्था में इन दोनों जातियों का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इससे स्पष्ट है कि ये दोनों जातियाँ वैदिक काल के बाद में अस्तित्व में आईं।

भारतीय इतिहास में चाण्डाल जाति

मनुस्मृति तथा धर्मसूत्रों के अनुसार चाण्डाल जाति की उत्पत्ति शूद्र पुरुष और ब्राह्मण स्त्री से हुई थी। महाभारत में इसे नापित पुरुष और ब्राह्मण स्त्री की संतान माना गया है। इसे अत्यधिक हीन तथा महापातकी जाति के अंतर्गत रखा गया है। गौतम के अनुसार ये कुत्ते और कौए की कोटि के थे। आपस्तम्ब की दृष्टि में चाण्डाल को स्पर्श करना, उसे दखेना और उससे बोलना भी पाप था जिसके लिए प्रायश्चित का विधान किया गया था।

छांदोग्य उपनिषद के अनुसार उसकी स्थिति श्वान और शूकर जैसी थी। माना जाता था कि पूर्वजन्म में असत् कर्म करने के कारण चाण्डाल योनि मिलती थी। बौद्ध काल में भी चाण्डालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था। बौद्ध-जातकों से चाण्डालों की हीन एवं दयनीय अवस्था का ज्ञान होता है। मातंग जातक से ज्ञात होता है कि एक चाण्डाल जब नगर में प्रवेश कर रहा था तब एक श्रेष्ठि-दुहिता की दृष्टि उस पर पड़ गई। लड़की ने कहा कि ओह! मैंने तो अशुभ दर्शन कर लिया। इसके बाद अनेक लोगों ने उस चाण्डाल को खूब मारा।

मनु ने लिखा है- ‘चाण्डाल और श्वपच को गांव के बाहर निवास करना चाहिए तथा कुत्ते और गधे उसकी सम्पत्ति होनी चाहिए।’

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
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कफन उसका वस्त्र था। वह फूटे बर्तन में भोजन करता था, उसका अलंकार लोहे का होता था और वह सर्वदा घूमा करता था। उसे रात्रि के समय गांव और नगर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। वह दिन में राजाज्ञा का विशेष चिह्न धारण करके गांव में घूम सकता था और बान्धव रहित शव को शमशान ले जा सकता था। प्राणदण्ड पाए हुए व्यक्ति का वध करता और उसका वस्त्र, शैया, और आभूषण आदि ग्रहण करता था। पुराणों में भी उसे कुत्ते और पक्षियों की श्रेणी में रखा गया है। श्राद्ध के अन्न पर उसकी दृष्टि पड़ जाने से देवता और पितृगण अपना भाग त्याग देते थे। वह अधम और पातकी था। जो व्यक्ति जानबूझकर चाण्डाल-स्त्री का संग करता था, उसके साथ भोजन करता था या प्रतिग्रह स्वीकार करता था, वह उसी श्रेणी का हो जाता था। चीनी यात्री फाह्यिान (पांचवीं शताब्दी ईस्वी) ने लिखा है कि जब कभी चाण्डाल बाजार में प्रवेश करता था तब वह लकड़ियां बजाता चलता था जिससे लोग लकड़ियों की आवाज सुनकर हट जाएं और उसके स्पर्श से अशुद्ध न हों। वह बहेलिए और मछली मारने का धंधा अपना सकता था। हर्ष के काल में भारत आने वाले चीनी यात्री ह्वेनत्सांग (सातवीं शताब्दी ईस्वी) ने लिखा है कि वह पशुओं को मारकर उनका मांस बेचता था। बधिक का कार्य करता था, विष्ठा आदि उठाता था और नगर के बाहर रहता था।

उसके घर पर विशेष चिह्न बने होते थे। बाण (सातवीं शताब्दी ईस्वी) ने अपनी पुस्तक कादम्बरी में उसे स्पर्श-वर्जित कहा है। तथा बांस की छड़ी बजाकर अपने आने की सूचना देने वाला निर्दिष्ट किया है। अल्बरूनी (दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी) ने लिखा है कि उसका मुख्य कार्य गांव की सफाई करना था।

अनेक अरब लेखकों ने लिखा है कि वह स्थान-स्थान पर खेल-तमाशे करके जीविकोपार्जन करता था। उसका वर्ग खिलाड़ी और कलावन्त का था। जैन आचार्य हेमचंद्र (बारहवीं शताब्दी ईस्वी) ने लिखा है कि चाण्डाल लकड़ी की आवाज करते हुए चलते थे ताकि उच्च वर्ण के लोग उसे छूने से बच जाएं। कल्हण (बारहवीं शताब्दी ईस्वी) ने भी चाण्डाल की हीन स्थिति का वर्णन किया है।

भारतीय इतिहास में कायस्थ जाति

कायस्थ जाति का उल्लेख भारतीय आर्य वर्ण-व्यवस्था में नहीं मिलता। उनका विकास अलग वर्ग और जाति के रूप में हुआ। प्राचीन भारत में कायस्थों की स्थिति के बारे में अलग-अलग बातें मिलती हैं। कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवलक्य ने किया है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने कायस्थों को चोर-डाकुओं से अधिक खतरनाक बताया है तथा राजा को आदेश दिया है कि वह कायस्थों से अपनी प्रजा की रक्षा करे। 

महर्षि उषनस एवं महर्षि व्यास ने अपनी स्मृतियों में कायस्थों का उल्लेख शूद्र जाति के रूप में उल्लिखित किया है। औशनस स्मृति के अनुसार ‘कायस्थ’ शब्द का निर्माण ‘काल’, ‘यम’ और ‘स्थपति’ के प्रारम्भिक अक्षरों को मिलाकर हुआ है। कायस्थ जाति के सम्बन्ध में गुप्तकालीन अभिलेखीय प्रमाण भी मिलता है। गुप्तकालीन अभिलेख में उन्हें ‘प्रथम कायस्थ’ एवं ‘ज्येष्ठ कायस्थ’ कहा गया है।

सहेत-महेत के गाहड़वाल अभिलेख में कायस्थ शब्द का उल्लेख ‘लेखक’ के रूप में हुआ है जबकि चन्देल, चेदि, चाहमान आदि अभिलेखों में उन्हें कायस्थ जाति एवं कायस्थ वंश कहा है।

अतः अनुमान होता है कि कायस्थ, गुप्त काल तक भारतीय समाज में चारों वर्णों से अलग, एक वर्ग के रूप रह रहे थे और नौवीं शताब्दी आते-आते वे एक जाति में बदल गए। उनका प्रधान कर्म लेखन कार्य करना था। वे लेखाकरण, गणना, आय-व्यय और भूमि-कर के भी अधिकारी होते थे। हरिषेण (दसवीं शताब्दी ईस्वी) ने उनके लिए लेखक एवं कायस्थ दोनों शब्दों का प्रयोग किया है।

श्री हर्ष ने उनकी उत्पत्ति यम के लिपिक चित्रगुप्त से मानी है। ग्वारहवीं सदी के एक अभिलेख में कायस्थ वंश को बहुत पुराना माना गया है तथा उनका उद्भव कुश और उनका पिता काश्यप विवृत है। एक अभिलेख में उनका सम्बन्ध क्षत्रियों से बताया गया है जिसके अनुसार जब परशुराम ने इन निर्भीक क्षत्रियों को समाज से निकाल दिया तब वे ‘कायस्थ’ कहे गए।

कायस्थ अपना उपनाम ‘पंचोली’ भी लिखते हैं जिसका संकेत ‘पांचवे वर्ण’ की ओर प्रतीत होता है। ‘कायस्थ’ और ‘पंचोली’ दोनों ही शब्द इन लोगों के समाज रूपी ‘काया में स्थित होने’ एवं समाज के ‘पांचवे चोले’ में स्थित होने की ओर भी संकेत करते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मनुस्मृति के रचना काल, छांदोग्य आदि उपनिषदों के रचना काल में फाह्यान आदि चीनी यात्रियों के काल में चाण्डाल एवं कायस्थ जातियों का उल्लेख भारतीय समाज में मिलता है किंतु वैदिक काल में इन जातियों का कोई उल्लेख नहीं हुआ है।

इसका मुख्य कारण यह है कि वैदिक काल में श्रम विभाजन के आधार पर जिस वर्ण व्यवस्था का उदय हुआ था, उस काल में चाण्डाल कर्म तथा कायस्थ जातियों द्वारा किए जाने वाले कर्म की आवश्यकता ही नहीं थी। इसलिए वैदिक वर्ण व्यवस्था में चाण्डाल एवं कायस्थ जातियों का उल्लेख नहीं है।

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चाण्डाल एवं कायस्थ जातियों का जाति प्रथा में स्थान

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्राचीन विवाह प्रणालियाँ

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प्राचीन विवाह प्रणालियाँ

प्राचीन विवाह प्रणालियाँ कई प्रकार की थीं और पूरे भारत में प्रचलित थीं। इनमें से कुछ विवाह प्रणालियों को श्रेयस्कर तो कुछ प्रणालियों को बुरा माना जाता था।

प्राचीन विवाह प्रणालियाँ

स्त्री-पुरुष के यौन सम्बन्धों को अनुशासन में बांधने तथा मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की उपलब्धि कराने के लिए उसे सुव्यवस्थित गृहस्थ जीवन प्रदान करने के उद्देश्य से स्त्री-पुरुष के विवाह की परम्परा आरम्भ हुई। वैदिक-काल से लेकर सूत्रकाल तक भारत में कई प्रकार की प्राचीन विवाह प्रणालियाँ प्रचलन में आईं जिनमें से आठ प्रणालियों को प्रमुख माना गया और इन्हें ‘अष्ट-प्रणाली’ कहा गया। विवाह की ये आठ प्रणालियाँ इस प्रकार से हैं-

(1.) ब्रह्म विवाह

इस प्रणाली के अन्तर्गत कन्या के विवाह का उत्तरदायित्व उसके पिता अथवा अभिभावक पर था। वह अपनी कन्या के लिए सुयोग्य वर खोजकर, विधि-विधान पूर्वक अपनी कन्या का विवाह उस सुयोग्य वर से करता था। इस विवाह में वर अथवा वधू पक्ष की ओर से कोई वस्तु नहीं ली जाती थी। इस विवाह को समस्त प्रकार की विवाह प्रणालियों में श्रेष्ठ माना जाता था तथा इसे ब्रह्म विवाह कहा जाता था।

(2.) प्रजापत्य विवाह

यह विवाह प्रणाली ब्राह्म विवाह के ही अनुरूप है, केवल नाम का अन्तर है। इस विवाह का उद्देश्य प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति करना है। इसमें कन्या का पिता वर की पूजा करके विधिपूर्वक अपनी कन्या का दान करता है और दोनों को गृहस्थ-जीवन बिताने का उपदेश देते हुए कहता है- ‘तुम दोनों (पति-पत्नी) साथ रहकर धर्माचरण करो।’ इस प्रकार के विवाह में भी किसी प्रकार का लेन-देन नहीं होता।

(3.) दैव विवाह

कभी-कभी यज्ञ कराने वाले पुरोहित के गुणों व योग्यता से प्रभावित होकर यजमान उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर देता था। चूँकि वर दैव कार्य (यज्ञ) करता था अतः विवाह की इस प्रणाली को दैव विवाह कहा जाता था। वैदिक यज्ञों की परम्परा लुप्त हो जाने के साथ ही इस इस प्रकार के विवाह बंद हो गए।

(4.) आर्ष विवाह

इस विवाह प्रणाली में कन्या का पिता वर पक्ष से एक गाय और एक बैल लेकर अपनी कन्या का विवाह करता था। इस प्रकार प्राप्त गाय-बैल का प्रयोग याज्ञिक कर्मों में किया जाता था। इसी से इसका नाम ‘आर्ष विवाह’ पड़ा।

(5.) गान्धर्व विवाह

इस प्रकार के विवाह को ‘प्रेम विवाह’ या ‘प्रणय विवाह’ कह सकते हैं। इस प्रणाली में लड़के और लड़की में विवाह के पूर्व ही प्रेम हो जाता है और वे एक-दूसरे को पति-पत्नी स्वीकार कर लेते हैं। इसमें माता-पिता की सहमति का कोई महत्त्व नहीं होता। दुष्यन्त एवं शकुन्तला का विवाह इसका उदाहरण है। यह विवाह-प्रणाली वर-वधू की वयस्क अवस्था का भी संकेत करती है। आपस्तम्ब और वशिष्ठ आदि ऋषियों ने इस प्रणाली को अधर्म्य माना है।

(6.) आसुर विवाह

इस विवाह-प्रणाली में कन्या का विक्रय होता है। कन्या का पिता विवाह के पूर्व, वर-पक्ष से अपनी कन्या का मूल्य माँगता है और मूल्य मिल जाने के बाद ही अपनी कन्या का विवाह करता है। इस विवाह प्रणाली का घोर विरोध किया गया। बोधायन ने लिखा है- ‘कन्या को बेचने वाला पिता घोर नर्क में जाता है और क्रीत-पत्नी धर्म- विवाहिता नहीं हो सकती। वह एक दासी के समान होती है।’

(7.) राक्षस विवाह

कन्या की इच्छा के विरुद्ध कन्या के पिता तथा सम्बन्धियों को पराजित कर या मारकर कन्या का अपहरण करके उसके साथ विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है। क्षत्रियों में यह विवाह प्रणाली अधिक लोकप्रिय थी परन्तु सूत्रकारों ने इस विवाह-प्रणाली का निषेध किया है।

(8.) पैशाच विवाह

विवाह की आठ प्रणालियों में सबसे निम्न कोटि की प्रणाली पैशाच विवाह है। जब कोई व्यक्ति किसी सोती हुई, बेहोश, पागल अथवा उन्मत्त कन्या के साथ छलपूर्वक अथवा जागृत अवस्था में कन्या के साथ बलपूर्वक समागम करता था तो उस व्यक्ति को उस कन्या के साथ विवाह करने के लिए विवश किया जाता था। इसी कारण इसे पैशाच विवाह कहा जाता था।

विवाह-सम्बन्ध में कुल-गौत्र का विचार

प्राचीन विवाह प्रणालियाँ कुल-गोत्र को अत्यंत महत्च देती थीं। प्राचीन हिन्दू-धर्मग्रन्थों में माता-पिता के गौत्र, प्रवर एवं रक्त-सम्बन्ध के भीतर विवाह करना निषेध माना गया है। गौत्र और प्रवर उस पूर्वज ऋषि के नाम होते हैं जिससे किसी समुदाय विशेष की उत्पत्ति मानी गई है। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सहित विभिन्न जातियाँ स्वयं को किसी प्राचीन ऋषि यथा- भरद्वाज, वशिष्ठ, शाण्डिल्य आदि की संतान मानती है।

अतः एक ही पूर्वज (गौत्र एवं प्रवर) की सन्तान पारस्परिक विवाह सूत्र में नहीं बाँधी जा सकतीं। सपिण्ड के भीतर भी विवाह का निषेध माना गया है। सपिण्ड से अभिप्राय माता और पिता के रक्त-सम्बन्ध से है। वर्तमान समय में सामान्यतः चार कुलों- दादा, दादी, नाना एवं नानी के गौत्र को टालकर विवाह किया जाता है।

अन्तर्जातीय विवाह

यद्यपि समाज में अपने वर्ण अथवा अपनी जाति में विवाह करना ही उचित माना जाता है तथापि प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक अन्तर्जातीय-विवाह भी प्रचलन में रहे हैं। अन्तर्जातीय-विवाह दो प्रकार के होते थे- अनुलोम और प्रतिलोम। प्राचीन विवाह प्रणालियाँ अनुलोम विवाह को तो मान्यता देती थीं किंतु प्रतिलोम विवाह का विरोध करती थीं।

अनुलोम विवाह वे होते थे जिनमें पुरुष अपने से नीचे के वर्ण की कन्या के साथ विवाह करता था, जैसे ब्राह्मण पुरुष का क्षत्रिय अथवा वैश्य कन्या के साथ विवाह और क्षत्रिय पुरुष का वैश्य कन्या के साथ विवाह। प्रतिलोम विवाह वे होते थे जिसमें कोई पुरुष अपने से ऊँचे वर्ण की कन्या से विवाह करता था, जैसे क्षत्रिय पुरुष और ब्राह्मण कन्या अथवा वैश्य पुरुष और क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण कन्या। धर्म शास्त्रों ने अनुलोम विवाह को मान्यता दी जबकि प्रतिलोम विवाह को धर्म-विरुद्ध एवं उससे उत्पन्न संतान को अवैध माना।

नियोग प्रथा

भारतीय समाज में नियोग-प्रथा अति प्राचीन काल से प्रचलन में रही है। इस प्रथा में कोई भी स्त्री निःसंतान अवस्था में अपने पति की मृत्यु होने पर अथवा पति के नपुसंक या रोगी होने पर अपने देवर या अन्य सगोत्र, सजातीय पुरुष के साथ समागम करके (नियोग स्थापित करके) पुत्र उत्पन्न कर सकती थी। इस प्रकार से उत्पन्न पुत्र को स्मृतियों ने ‘क्षेत्रज पुत्र’ कहा है। इस प्रकार से प्राप्त पुत्र को तत्कालीन समाज में पूर्ण मान्यता थी।

विवाह-विच्छेद

हिन्दू-धर्मग्रन्थों के अनुसार विवाह जन्म-जन्म का सम्बन्ध है इसलिए इसका विच्छेद नहीं हो सकता। मनुस्मृति में कहा गया है कि पति तथा पत्नी को धर्म, अर्थ और काम के विषय में एक-दूसरे के प्रति सच्चा और निष्ठावान रहना चाहिए तथा सदैव यही प्रयत्न करना चाहिए कि वे कभी भी अलग न हो सकें, पति-पत्नी की पारस्परिक निष्ठा जीवन-पर्यन्त चलती रहे, यही पति और पत्नी का परम धर्म है।

मनु ने वैवाहिक सम्बन्ध को एक पवित्र ओर कभी न भंग होने वाला संस्कार माना है तथा स्त्री के पुनर्विवाह का निषेध किया है। नारद मुनि और पाराशर मुनि विशेष परिस्थितियों में विवाह-विच्छेद की स्वीकृति देते हैं। कौटिल्य के अनुसार- ब्राह्म, प्रजापत्य, आर्ष तथा देव विवाहों का विच्छेद नहीं हो सकता किन्तु गान्धर्व, आसुर, राक्षस तथा पैशाच विवाहों में परस्पर द्वेष उत्पन्न हो जाने पर एक दूसरे की सहमति से विवाह विच्छेद हो सकता है।

प्राचीन हिन्दू समाज में पुरुषों का एकाधिकार बढ़ते जाने से स्त्री के लिए विवाह-विच्छेद के नियम भी कठोर हो गए। उच्च समझी जाने वाली जातियों में विवाह-विच्छेद को निकृष्ट कार्य माना जाता था। स्त्री के लिए पति परमेश्वर स्वरूप था जिसकी सेवा करना और आज्ञा पालन करना स्त्री का परम धर्म था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारतीय परिवार प्रणाली

प्राचीन विवाह प्रणालियाँ

भारत में पारिवारिक जीवन

भारतीय परिवार की विशेषताएँ

भारतीय परिवार के कर्त्तव्य

संयुक्त परिवार प्रणाली

भारत में परिवारिक जीवन

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भारतीय समाज एवं संस्कृति को समझने के लिए आवश्यक है कि भारत में परिवारिक जीवन को समझा जाए। इसे समझे बिना भारतीय समाज एवं संस्कृति तथा जीवन मूल्यों को समझना असंभव है।

भारतीय सामाजिक संगठन का इतिहास पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। जब विश्व के अधिकांश देश सभ्यता के उषाकाल में थे, तभी भारतीय समाज सुव्यवस्थित रूप धारण कर चुका था। आर्य ऋषियों ने भारतीय समाज के संगठन के लिए जिन संस्थाओं का निर्माण किया, ‘परिवार’ अथवा ‘कुटुम्ब’ उनमें सबसे प्राचीन था। आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में परिवार का संगठित स्वरूप दिखाई देता है।

वैदिक यज्ञ-अनुष्ठान, षोडष संस्कार, राजन्य व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, विवाह, यौन सम्बन्ध, कुल, गौत्र एवं वंश परम्परा आदि समस्त संस्थाओं एवं परम्पराओं का आधार परिवार ही था। पश्चिमी संस्कृतियों में समाज की सबसे छोटी इकाई ‘व्यक्ति’ है किंतु भारतीय संस्कृति में ‘परिवार’ को समाज की सबसे छोटी इकाई माना गया।

भारतीय समाज में परिवार-रहित व्यक्ति का सहजता से जीवन-यापन करना कठिन है। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि भारतीय समाज का गठन परिवारों से हुआ है न कि व्यक्तियों से।

परिवार की रचना में थोड़ा सा परिवर्तन, सामाजिक संरचना में बड़ा परिवर्तन कर देता है। भारतीय परिवारों की संरचना पश्चिमी सभ्यताओं में प्रचलित परिवारों से भिन्न है। भारत में परविार का आशय ‘संयुक्त परिवार’ से है। ‘परिवार’ समस्त सभ्यताओं की सार्वभौम संस्था है किन्तु ‘संयुक्त परिवार’ की संस्था केवल भारत में ही देखने को मिलती है।

पश्चिम के व्यक्तिवादी समाज में संयुक्त परिवार एक दुर्लभ संगठन है। परिवार का आधार ‘सुनिश्चित यौन-सम्बन्ध’ है जो संतान उत्पन्न करने से लेकर उसके पालन-पोषण, रोजगार की व्यवस्था एवं कुटुम्ब के वृद्ध एवं रुग्ण सदस्यों की समुचित देखभारत करने तक विस्तृत है।

परिवार के सदस्यों के मध्य भावनात्मक आबद्धता के कारण परस्पर सहयोग, गृहस्थ-धर्म के उत्तरदायित्व एवं कर्त्तव्यबोध जैसे विचारों का निर्माण होता है।

परिवार की परिभाषा

अनेक समाजशास्त्रियों ने परिवार की अलग-अलग परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। प्रसिद्ध विद्वान् मैकाइवर और पेज के अनुसार- ‘परिवार पर्याप्त निश्चित यौन-सम्बन्धों द्वारा परिभाषित एक ऐसा समूह है जो बच्चों के जनन एवं पालन-पोषण की व्यवस्था करता है।’

इस परिभाषा के अनुसार परिवार यौन-सम्बन्धों पर आश्रित एक जैविक समुदाय भर है जिसका मुख्य कर्त्तव्य सन्तानोत्पति करना एवं उसका लालन-पालन करना है किन्तु परिवार इन लक्षणों के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ होता है।

बर्जेस और लॉक के अनुसार- ‘परिवार संस्था के रूप में एक प्रक्रिया है, जो समाज की संरचना में सहयुक्त है। परिवार व्यक्तियों का समूह है जो विवाह, रक्त या गोद लेने के सम्बन्धों से संगठित होता है। इसमें एक छोटी गृहस्थी का निर्माण होता है जिसमें पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री और भाई-बहिन एक दूसरे से अन्तःक्रियाएँ करते तथा एक सामान्य संस्कृति का निर्माण और देख-रेख करते हैं।’

पश्चिमी समाजशास्त्री डेविस के अनुसार- ‘परिवार ऐसे व्यक्तियों का समूह है, जिसके एक-दूसरे से सम्बन्ध, सगोत्रता पर आधारित होते हैं ओर इस प्रकार एक-दूसरे से रक्त-सम्बन्ध होते हैं।’

डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो एक ही छत के नीचे रहते हैं, जो रक्त-सम्बन्धी सूत्रों से सम्बद्ध रहते हैं और स्थान, हित तथा पारस्परिक कृतज्ञता के आधार पर समान होने की भावना रखते हैं।’

प्रसिद्ध विद्वान् केलर के अनुसार- ‘यह मनुष्यों का एक वर्ग है, जो जीवन-यापन तथा मानव जाति को सहकारिता के आधार पर स्थिर रखने का प्रयत्न करता है।’

उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि ‘परिवार’ का मुख्य आधार ‘विवाह’ है तथा यौन-सम्बन्धों द्वारा सन्तान उत्पन्न करने से लेकर उसके लालन-पालन, भरण-पोषण और सेवा-सुश्रुषा तक विस्तृत है। परिवार में पति-पत्नी, उसकी सन्तानें व भाई-बहिन रहते हैं जिनकी पृथक् वंश-परम्परा होती है। परिवार समाज का लघु रूप है और समाज, परिवार का विराट रूप है। चूँकि परिवार समाज की मूलभूत इकाई है, अतः मानव-समाज का इतिहास परिवार से ही आरम्भ होता है। परिवार के सहारे ही अन्य संस्थाओं और समितियों का जन्म सम्भव हो पाया है।

परिवार की उत्पत्ति

परिवार की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, इसके सम्बन्ध में भी अनेक मत एवं विचार प्रकट किए गए हैं। कुछ समाजशास्त्रियों का विचार है कि मानव सभ्यता के प्रारम्भ में ‘पितृसत्तात्मक’ परिवार की उत्पत्ति हुई होगी जबकि कुछ अन्य विद्वानों की मान्यता है कि पहले ‘मातृसत्तात्मक’ परिवार विकसित हुए होंगे क्योंकि प्रारम्भिक काल में यौन सम्बन्धों की सुनिश्चतता अर्थात् विवाह जैसी संस्था का विचार नहीं पनप सका होगा।

भारत में मानव द्वारा कृषि आरम्भ किए जाने के बाद ‘मातृसत्तात्मक परिवार’ का महत्त्व घट गया और ‘पितृसत्तात्मक परिवार’ की प्रथा मजबूत होने लगी। ऋग्वैदिक-काल एवं उत्तरवैदिक-काल में भी संयुक्त-परिवार-प्रथा प्रचलित थी। परिवार का वयोवृद्ध व्यक्ति, परिवार का मुखिया होता था तथा परिवार के समस्त सदस्य उसके आदेशों का पालन करते थे। बौद्ध-काल में भी परिवार संयुक्त होते थे। अनेक जातक कथाओं में ऐसे परिवारों का उल्लेख मिलता है जो अपने सदस्यों के सहयोग और सहायता से चलते थे।

एकल अथवा पृथक् परिवार

 उत्तरवैदिक-काल में संयुक्त-परिवार के विघटन का आभास होने लगता है किंतु आर्यों में मुख्यतः संयुक्त-परिवार परम्परा ही प्रचलित रही। स्मृतिकारों ने भी संयुक्त परिवारों का वर्णन किया है परन्तु इस युग में ‘एकल अथवा पृथक् परिवार’ का समर्थन भी आरम्भ हो गया था। मनु के अनुसार परिवार का विभाजन धर्मानुकूल है किंतु सम्पत्ति का बँटवारा पिता की मृत्यु के बाद ही किया जाना चाहिए।

पितृ-सत्तात्मक आर्य-परिवार

भारतीय आर्यों में पितृमूलक तथा भारत की अनार्य सभ्यताओं में मातृमूलक परिवार व्यवस्था थी। आर्य-परिवार में पति-पत्नी, पुत्र-पौत्र, प्रपौत्र, पुत्र-वधुएँ, पौत्र वधुएं, प्रपौत्र वधुएँ, अविवाहित पुत्रियाँ, अविवाहित बहिनें, अविवाहित पौत्रियाँ, अविवाहित प्रपौत्रियाँ आदि रहते थे। ये सब लोग एक ही स्थान पर और प्रायः एक ही भवन में रहते थे।

एक साथ भोजन करते थे और और एक ही धर्म तथा इष्टदेव की उपासना करते थे। परिवार का वयोवृद्ध पुरुष परिवार का मुखिया होता था। परिवार का मुखिया, परिवार के समस्त सदस्यों के आचरण को अनुशासित करता था और उनकी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करता था। परिवार का मुखिया ही समाज में अपने परिवार का प्रतिनिधित्व करता था।

परिवार के समस्त सदस्य, मुखिया के अनुशासन में रहते थे तथा उसके मार्ग-र्दशन में कार्य करते थे। वैदिक युग से लेकर आज तक भारतीय परिवार के मुखिया के अधिकारों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है।

मातृ-सत्तात्मक अनार्य-परिवार

भारत की अनार्य सभ्यताओं में मुख्यतः मातृमूलक परिवार व्यवस्था थी। सिन्धु सभ्यता के अवशेषों के आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि सिन्धु-वासियों में मातृसत्तात्मक परिवार-प्रथा रही होगी। आज भी दक्षिण भारत की नैय्यर, कादर, इरूला, पुलयन आदि जातियों में तथा आसाम की गोरो और खासी जातियों में मातृसत्तात्मक परिवार ही पाए जाते हैं। उपर्युक्त अपवादों को छोड़़कर शेष भारत में पितृसत्तात्मक परिवारों का अस्तित्त्व है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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भारतीय परिवार की विशेषताएँ

भारतीय परिवार के कर्त्तव्य

संयुक्त परिवार प्रणाली

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भारतीय परिवार की विशेषताएँ

संसार में प्रत्येक समाज एवं संस्कृति में परिवार को महत्व दिया गया है किंतु भारतीय परिवार की विशेषताएँ अन्य संस्कृतियों के परिवारों से अलग हैं।

भारतीय परिवार एक गतिशील संस्था है। समय-समय पर इसका स्वरूप बदलता रहा है। फिर भी भारतीय परिवार के संगठन का आधार ठोस है तथा इसकी मूलभूत विशेषताएँ आज भी देखी जा सकती हैं।

भारतीय परिवार की विशेषताएँ

भारतीय परिवार की मूलभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1.) विवाह संस्कार

भारतीय परिवार की विशेषताएँ विवाह संस्कार से ही दिखाई देने लगती हैं। भारत में विवाह के बिना परिवार की कल्पना नहीं की जा सकती। आदि काल से ही आर्यों ने विवाह के नियम  बनाए जिनमें समय के साथ वर्ण-व्यवस्था एवं बाद में जाति-प्रथा का अंकुश कठोर होता चला गया। कुल के साथ-साथ गौत्र सम्बन्धी नियम भी परम्परागत भारतीय परिवारों पर कड़ाई से लागू होते हैं जिनमें दादा के गौत्र के साथ-साथ नाना, नानी एवं दादी के गौत्रों को टालना अनिवार्य था।

(2.) जन्म-जन्म का बंधन

भारतीय परिवार के मजबूत गठन के पीछे विवाह-सम्बन्धों के जन्म-जन्मांतर अथवा सात जन्मों तक चलने की धारणा थी। एक बार विवाह होने के बाद स्त्री उस परिवार को छोड़ती नहीं थी। भारतीय परिवारों में यह सर्वप्रचलित धारणा रही है कि स्त्री डोली में बैठकर ससुराल आती है, उसके बाद उसकी अर्थी ही उस घर से उठती है क्योंकि इस परिवार से उसका सम्बन्ध केवल इस जन्म तक सीमित नहीं है, अपितु सात जन्मों के लिए है।

ऋग्वेद की एक ऋचा में पुरोहित विवाह के अवसर पर वधू को आशीर्वाद देता हुआ कहता है- ‘तुम यहीं इसी घर में रहो, वियुक्त मत होओ, अपने घर में पुत्रों और पौत्रों के साथ खेलते और आनन्द मनाते हुए समस्त आयु का उपभोग करो।’

(3.) संयुक्त परिवार प्रथा

भारतीय परिवार की विशेषताएँ संयुक्त परिवार की विशेषताओं से युक्त हैं। संयुक्त परिवार प्रथा की स्थापना वैदिक-काल में हुई। यह प्रथा भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता है। संयुक्त परिवार में माता-पिता और बच्चों के साथ-साथ तीन-चार पीढ़ियों के सदस्य एक ही आवास  या आवासीय परिसर में रहते थे। इस प्रथा का उद्देश्य परिवार के समस्त सदस्यों की सर्वतोन्मुखी उन्नति हेतु साधन एवं सुविधाएं उपलब्ध करना और सामाजिक सुरक्षा हेतु सहयोग प्रदान करना था।

(4.) प्रेम एवं सौहार्द

भारतीय परिवार की विशेषताएँ प्रेम एवं सौहार्द से युक्त परिवार का निर्माण करती हैं। भारतीय परिवार में प्रेम एवं सौहार्द का तत्व प्रमुखता से पाया जाता है। परिवार में विभिन्न आयु के सदस्य मिल-जुल कर रहते हैं और सुख-दुःख में एक दूसरे का हाथ बँटाते हैं। वैदिक साहित्य में प्रार्थना की गई है- ‘हम समस्त परिवार के सदस्य एक दूसरे के प्रति सहृदयता तथा शुद्ध विचार रखें और एक दूसरे से प्रेम करें जैसे गाय अपने बछड़े से प्रेम करती है। पुत्र माता-पिता के प्रति, पत्नी पति के प्रति, भाई भाई के प्रति और बहिन बहिन के प्रति मधुर एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार करे। हम एकमति और सत्कर्म युक्त होकर परस्पर मधुर भाषण करें।’

इसी भावना के कारण विवाह के उपरान्त पुत्र अपने पिता के परिवार से अलग नहीं होता था अपितु अपने पिता अथवा पितामह के परिवार में रहता था।

(5.) पुत्रियों से प्रेम

विवाह के बाद पुत्री को अपने ससुराल में जाकर रहना होता है किंतु भारतीय परिवार पुत्रियों के विवाह के बाद उन्हें विस्मृत नहीं  करते हैं, अपितु विभिन्न तीज-त्यौहारों एवं पारिवारिक उत्सवों के आयोजनों में उन्हें प्रेम एवं सम्मान के साथ आमन्त्रित करते हैं। पुत्री को पुनः उसके ससुराल लौटते समय वस्त्र, मिठान्न एवं उपहार देते हैं। इसी प्रकार पुत्री के ससुराल में होने वाले पारिवारिक उत्सवों तथा तीज-त्यौहारों पर उपहार आदि भेजते हैं।

(6.) नारी का सम्मान

नारी को सम्मान देना, भारतीय परिवार की प्रमुख विशेषता है। वैदिक ग्रंथों में गृहस्थ-सुख एवं सन्तान प्राप्ति के लिए पत्नी की आवश्यकता बतायी गई है। ऋग्वेद में कहा गया है कि पत्नी के बिना गृहस्थी संभव नहीं है, पत्नी ही गृहस्थी है। जहाँ स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, वहाँ सब काम निष्फल होते हैं।

केवल अपने परिवार की ही नहीं अपितु गांव के किसी भी परिवार की बहन-बेटी और बहू पूरे गांव की बहन-बेटी और बहू समझी जाती थी। इस भावना से भी परिवार रूपी संस्था को मजबूती मिलती थी। ऋग्वेद की एक ऋचा में पुरोहित वधू को आशीर्वाद देता हुआ कहता है- ‘तू सास, ससुर, ननद और देवर पर शासन करने वाली रानी बने।’

(7.) धर्माचरण और कर्त्तव्य-परायणता

धर्माचरण और कर्त्तव्य परायणता भारतीय परिवार की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। परम्परागत रूप से परिवार के समस्त कार्य शास्त्रविहित विधि से निर्धारित हैं। परिवार के प्रत्येक सदस्य का राज्य, समाज, पड़ौसी तथा परिवार के प्रति कर्त्तव्य; माता-पिता तथा वयोवृद्धों के प्रति कर्त्तव्य; गुरु, ब्राह्मण, सन्यासी एवं कन्याओं के प्रति कर्त्तव्य; मृतक व्यक्तियों अर्थात् पितरों के प्रति कर्त्तव्य; गौ एवं पशु-पक्षियों के प्रति कर्त्तव्य, भिखारियों, कुष्ठ रोगियों एवं क्षुधाग्रस्त व्यक्तियों के प्रति कर्त्तव्य निर्धारित हैं।

विभिन्न धर्मग्रन्थों में इन कर्त्तव्यों का विस्तार से उल्लेख किया गया है। परिवार में अपने से बड़ों की आज्ञा का पालन करना भी धर्माचरण एवं कर्त्तव्य-परायणता माना जाता है। इस प्रकार भारतीय परिवार भौतिक सुख-साधनों की उपलब्ध करवाने वाली व्यवस्था मात्र नहीं है अपितु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषाथों को सिद्ध करने का साधन है।

(8.) सोलह संस्कार

भारतीय परिवार बालक के जन्म के पहले से लेकर मृत्यु के बाद तक सोलह प्रकार के संस्कार-कर्मों से बंधा हुआ है। गृहस्थों के लिए आत्म-कल्याण के निमित्त व्रत-उपवास और त्यौहारों का विशद विधान है। एक गृहस्थ के लिए आवश्यक संस्कार-कर्मों की विस्तृत रूपरेखा अनेक उत्तर-वैदिक ग्रन्थों में दी गई है।

 ‘मनु स्मृति’ और ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ में संस्कारों एवं विधि-विधानों का विस्तृत वर्णन किया गया है। परिवार के समस्त सदस्यों को इन संस्कारों की परिधि में रहकर धर्मानुकूल आचरण करना होता है।

(9.) अतिथि-सत्कार

भारतीय परिवारों में अतिथि-सत्कार ‘शिष्टाचार’ मात्र न मानकर ‘धर्म’ माना जाता है। अतिथि को देवता के समकक्ष आदर दिया जाता है। अतिथि का आदर-सत्कार करना तथा उसे भोजन एवं आवास देना प्रत्येक गृहस्थ का कर्त्तव्य माना जाता है।

मनुस्मृति के अनुसार- ‘जो गृहस्थ देवता, अतिथि, भृत्य, माता-पिता का संरक्षण नहीं करता, वह श्वांस लेते हुए भी निष्प्राण है।’ यदि कभी कोई शत्रु या विरोधी भी अतिथि बनकर घर आता है, परिवार के सभी सदस्य उसे आदर देते हैं। इसी कारण भारतीय समाज में ‘घर आया, माँ-जाया बराबर’ (अतिथि सहोदर के समान है) जैसी कहावतें प्रचलित हैं।

(10.) एक विवाह का आदर्श

यद्यपि भारत में बहु-विवाही परिवारों का अस्तित्त्व रहा है तथापि सामान्यतः एक-विवाही परिवार ही आदर्श माना जाता है जिसका आशय एक पुरुष एक ही स्त्री से और एक स्त्री एक ही पुरुष से विवाह करती है।

पश्चिमी समाजशास्त्री मेलिनोवस्की ने लिखा है- ‘एक-विवाह ही विवाह का सच्चा स्वरूप था, है और रहेगा।’ विवाह के सम्बन्ध में प्रचलित यह मान्यता परिवार के सदस्यों में अन्य सभी सम्बन्धों के प्रति सहयोग एवं उत्तरदायित्व की भावना को जन्म देती है।

इस प्रकार भारतीय परिवार परम्परागत रूप से प्रेम तथा सौहार्द्र पर आधारित होता था जिसमें एक दूसरे के लिए उत्सर्ग करने की भावना प्रमुख थी।

पारिवारिक सम्पत्ति एवं उत्तराधिकार

भारतीय आर्य-परिवारों में सम्पत्ति के अधिकार एवं विभाजन के सम्बन्ध में कुछ निश्चित नियम थे जिनका निर्वहन पीढ़ी दर पीढ़ी स्वतः होता था।

परिवार के मुखिया के अधिकार

परिवार की सम्पत्ति का स्वामी घर का मुखिया अर्थात् दादा या पिता होता था और सामान्यतः दादा या पिता की मृत्यु के बाद ही उसके पुत्र-पौत्रों में सम्पत्ति का बँटवारा होता था। मनुस्मृति में पुत्र, स्त्री और दास की सम्पत्ति का स्वामी परिवार के मुखिया को माना गया है। विद्वान पिता अपने पुत्रों की शिक्षा स्वयं करता था, इसलिए उस युग मे पिता को पोषक एवं शिक्षक दोनों माना जाता था।

पुत्र पर पिता का अधिकार अबाध होता था। पुत्र का वह जैसा चाहता था, उपयोग करता था। वह उसे बेच सकता था, दान कर सकता था और दण्डित कर सकता था। ऋग्वेद में आए एक उल्लेख के अनुसार ऋज्राश्व नामक एक पुत्र ने एक भेड़िये को 100 भेड़ें खिला दीं। इस अपराध के लिए ऋज्राश्व के पिता ने ऋज्राश्व की आंखें निकाल लीं। नचिकेता अपने पिता वाजश्रवा द्वारा यमराज को दान कर दिया गया।

परिवार में माता का स्थान

परिवार में माता को उच्च एवं प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था। वेदों में माता का अभिनन्दन किया गया है। भगवान् के पूजन में भगवान को पिता के साथ-साथ माता भी कहा गया है। जब ब्रह्मचारी शिक्षा समाप्त करता था तब आचार्य उसे शिक्षा देता था कि वह देवता की तरह माता का सम्मान करे। रामायण में कौशल्या तथा महाभारत में कुंती एवं गांधारी के रूप में उस काल की माताओं की गरिमा का अनुमान किया जा सकता है।

महाभारत में कहा गया है कि आचार्य दस श्रोत्रियों से बढ़कर है, पिता दस उपाध्यायों से बढ़कर है और माता की महत्ता दस पिताओं से भी अधिक है। वह अकेली ही अपने गौरव द्वारा सारी पृथ्वी को तिरस्कृत कर देती है। अतः माता के समान दूसरा गुरु नहीं है।

वसिष्ठ धर्मसूत्र के अनुसार- ‘दस उपाध्यायों से अधिक गौरव आचार्य का है, सौ आचार्यों से अधिक पिता का और एक हजार पिताओं से अधिक माता का।’

गौतम-धर्मसूत्र में माता को श्रेष्ठ-गुरु कहा गया है। अतः माता का भरण-पोषण करना पुत्र का परम कर्त्तव्य माना गया। कुछ स्मृतियों में माता को पिता से भी अधिक उच्च स्थान दिया गया है और वह पिता से एक सहस्र गुना श्रद्धेय बताई गयी है किन्तु व्यावहारिक रूप से मुखिया के बाद उसकी पत्नी का स्थान होता था।

सामूहिक सम्पत्ति

परिवार की सम्पत्ति, किसी भी सदस्य की व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं मानी जाती थी अपितु परिवार के समस्त सदस्यों की सामूहिक सम्पत्ति मानी जाती थी। उत्तरवैदिक-काल में सम्पत्ति के अन्तर्गत पशु, भूमि एवं आभूषणों को सम्मिलित किया जाता था।

स्त्री-धन

स्त्री को विवाह के समय दहेज या उपहार के रूप में प्राप्त धन, उस स्त्री की व्यक्तिगत सम्पत्ति होता था और उसे ‘स्त्री-धन’ कहा जाता था। सैद्धांतिक रूप से वह स्त्री इस धन का स्वतंत्रता पूर्वक उपयोग कर सकती थी किंतु व्यावहारिक रूप में वह धन भी पूरे परिवार के ही काम आता था।

परिवार की सम्पत्ति का बँटवारा

याज्ञवल्क्य स्मृति (ई.100 से ई.300 के बीच रचित) की टीका मिताक्षरा (ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी) की मान्यता है कि पिता के जीवित रहते हुए भी पुत्र सम्पत्ति का बँटवारा करा सकते हैं क्योंकि उनका पारिवारिक सम्पत्ति में अधिकार होता है।

यदि पिता के जीवित रहते सम्पत्ति का बँटवारा होता था, तब समस्त पुत्रों को सम्पत्ति में समान हिस्सा मिलता था किन्तु पिता की मृत्यु के बाद बँटवारा होने पर ज्येष्ठ पुत्र को सम्पत्ति का बीसवाँ भाग अतिरिक्त अंश के रूप में मिलता था जिसे ‘ज्येष्ठांश’ कहते थे। ऐसी स्थिति में ज्येष्ठ पुत्र को छोटे भाइयों के प्रति परिवार के सामूहिक कर्त्तव्यों का पालन करना होता था।

पैतृक सम्पत्ति पर बारह प्रकार के पुत्रों का अधिकार

भारतीय-शास्त्र उत्तराधिकारी के सम्बन्ध में बारह प्रकार के पुत्रों तथा सम्पत्ति पर उनके दावों का उल्लेख करते हैं। इन बारह प्रकार के पुत्रों में दत्तक पुत्र भी शामिल है। विवाहित पत्नी से उत्पन्न वयस्क पुत्र स्वाभाविक उत्तराधिकारी होते थे। चौथी पीढ़ी तक के रक्त-सम्बन्धी उत्तराधिकारी माने जाते थे।

परिवार की सम्पत्ति पर स्त्री एवं पुत्री का अधिकार

सामान्यतः स्त्री को उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त नहीं था किन्तु याज्ञवल्क्य स्मृति तथा उसके टीकाकार विज्ञानेश्वर ने उत्तराधिकारियों की सूची में पुत्र के बाद स्त्री और कन्या का भी उल्लेख किया है। पिता की मृत्यु के बाद अविवाहित कन्या अपने भाइयों की तरह सम्पत्ति में समान हिस्सा प्राप्त कर सकती थी।

पिता के पुत्रहीन होने पर वह अपनी पुत्री को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर सकता था। मनुस्मृति के अनुसार इस प्रकार की पुत्री के पुत्र को अपने नाना की सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त है किन्तु यदि अविवाहित कन्या जीवित है तो पुत्री के पुत्र को अपने नाना की सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त नहीं होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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भारतीय परिवार के कर्त्तव्य

विश्व की प्रत्येक संस्कृति में परिवार के प्रमुख कर्त्तव्यों में बच्चों का लालन-पालन, वृद्धों की सेवा, बीमारों की सुश्रुषा तथा प्रत्येक सदस्य को संरक्षण एवं सहारा देना शामिल होता है किंतु भारतीय परिवार कुछ विशिष्ट कार्यों को भी सम्पादित करता है। तीन ऋणों से उऋण होना, पंच महायज्ञ करना तथा सोलह संस्कारों को सम्पादित करना प्रत्येक भारतीय परविार के प्रमुख कर्त्तव्य थे।

तीन ऋणों से उऋण होना

भारतीय ऋषियों का मानना था कि प्रत्येक मनुष्य देवताओं, ऋषियों, माता-पिता, अतिथियों और समाज के अन्य व्यक्तियों एवं प्राणियों से कुछ न कुछ सेवा, वस्तु, ज्ञान, आशीर्वाद एवं अनुग्रह प्राप्त करता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य पर तीन ऋण होते हैं- (1.) देव ऋण, (2.) ऋषि ऋण, (3.) पितृ ऋण। प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह धर्मानुकूल आचरण करके तथा अपने कर्त्तव्यों का पालन करके इन तीनों ऋणों से उऋण होने का प्रयत्न करे।

(1.) देव ऋण: मनुष्य को जीवन-यापन करने के लिए जल, भूमि, वायु आदि साधनों की आवश्यकता होती है। ये समस्त साधन दैवीय-शक्तियों द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं। इसलिए हमें ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिससे जल, भूमि या वायु को हानि पहुँचे। प्राकृतिक साधनों के संरक्षण के लिए वृक्ष लगाना, जलाशयों को साफ करवाना, उनमें से मिट्टी निकलवाना, पशु-पक्षियों के प्रति हिंसा नहीं करना, उनके दाने-पानी की व्यवस्था करना आदि कार्य देव-ऋण से उऋण करने में सहायक होते हैं।

(2.) ऋषि ऋण: मनुष्य समाज के विभिन्न व्यक्तियों से ज्ञान प्राप्त करता है। इस ज्ञान के सहारे वह अपना जीवन-यापन करता है, इस कारण मनुष्य पर समाज का ऋण होता है। इसे ऋषि ऋण कहते हैं। इस ऋण से उऋण होने के लिए लिए मनुष्य को समाज के लोगों में ज्ञान बांटना चाहिए तथा विद्यार्थियों के लिए विद्यालय खोलने, निःशुल्क पुस्तकें उपलब्ध कराने तथा स्कॉलरशिप बांटने जैसी व्यवस्थाएं करनी चाहिए।

(3.) पितृ ऋण: मनुष्य का पालन-पोषण उसके माता-पिता अथवा परिवार के सदस्य करते हैं तथा उसे समुचित शिक्षा दिलवाकर जीविकोपार्जन के योग्य बनाते हैं। इस कारण प्रत्येक मनुष्य पर अपने परिवार की देख-भाल करने तथा अपनी संतान के लालन-पालन की जिम्मेदारी होती है। इसे पितृ ऋण कहते हैं। इस ऋण से उपकृत होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह विवाह करके गृहस्थी बसाए तथा अपने परिवार की समुचित देखभाल करे।

(4.) गौण ऋण: इन तीन प्रमुख ऋणों के अतिरिक्त दो गौण ऋण और होते हैं- अतिथि ऋण और भूत ऋण। इन दोनों से भी हमें समय-समय पर कुछ न कुछ ज्ञान एवं सहयोग मिलता रहता है। धर्मशास्त्रों में इन पाँचों ऋणों से उऋण होने के लिए पंच-महायज्ञों का विधान रख गया है।

पंच-महायज्ञ

हिन्दू-धर्मशास्त्रों ने प्रत्येक परिवार के लिए पंच-महायज्ञों का विधान निर्धारित किया है-

(1.) ब्रह्म यज्ञ: इस यज्ञ के माध्यम से मनुष्य अपने प्राचीन ऋषियों के प्रति सम्मान व्यक्त करता था। इसलिए इसे ‘ऋषि यज्ञ’ भी कहा जाता है। प्राचीन ऋषियों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का सर्वोत्तम ढंग विद्याध्ययन करना माना गया। इस कारण आर्यों ने स्वाध्याय करने का नियम बनाया।

(2.) देव यज्ञ: इसे देवताओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किया जाता था। प्रत्येक व्यक्ति को प्रातःकाल और सायं काल में अग्नि, इन्द्र, प्रजापति, सोम, पृथ्वी आदि देवी-देवताओं के मंत्रों के साथ ‘स्वाहा’ कहकर अग्नि में घी, दूध, दही आदि हविष्य की आहुतियाँ देने का विधान किया गया।

(3.) भूत यज्ञ: इस यज्ञ के अन्तर्गत सृष्टि के समस्त तत्त्वों की संतुष्टि के लिए पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, प्रजापति एवं विश्वदेव आदि को भोजन की बलि दी जाती है और कौआ, गाय, चींटी एवं श्वान आदि पशु-पक्षियों को भोजन डालकर तुष्ट किया जाता है।

(4.) पितृ यज्ञ: इस यज्ञ में पितरों के लिए तर्पण, बलि-हरण अथवा श्राद्ध का आयोजन होता है। पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर भोजन एवं जल फेंका जाता है।

(5.) मनुष्य यज्ञ: मनुष्य मात्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का प्रदर्शन करने के लिए अतिथि-सत्कार की अनिवार्यता स्थापित की गई। इस यज्ञ के अंतर्गत स्वयं भोजन करने से पहले अतिथि को भोजन कराया जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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संयुक्त परिवार प्रणाली

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संयुक्त परिवार प्रणाली

संयुक्त परिवार प्रणाली भारतीय जीवन शैली की सबसे बड़ी विशेषता है। गृह्यसूत्रों में बड़े परिवारों का उल्लेख किया गया है। बौद्ध युग में भी परिवार बड़े हुआ करते थे। अनेक जातकों में ऐसे परिवारों का उल्लेख हुआ है जो अपने सदस्यों के सहयोग एवं सहायता से चलते थे। ऐसे कुटुम्बों का भी उल्लेख हुआ है जिनके सदस्य अपनी इच्छा के अनुसार पिता आदि को दुःखी छोड़कर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए और उन्होंने सम्पत्ति में अपना अधिकार स्वयं ही अवरुद्ध कर लिया। स्त्रियाँ भी बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर अपने परिवारों से दूर, किसी बौद्ध विहार अथवा संघाराम में जाकर रहने लगती थीं।

संयुक्त परिवार प्रणाली के आधार-तत्त्व

संयुक्त परिवार के दो आधार माने गए हैं- (1.) सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्ध। (2) परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का पालन। अर्थात् परिवार के सदस्यों के परस्पर सम्बन्ध मधुर होने चाहिए एवं प्रत्येक सदस्य को परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार से दूर रहकर धनोपार्जन करता है और उसकी सम्पत्ति एवं निवास स्थान अलग हैं परन्तु यदि वह अपने परिवार के प्रति उन कर्त्तव्यों का पालन करता है जो एक संयुक्त परिवार के सदस्य के लिए आवश्यक होते हैं, तो दूर रह रहा परिवार एकल नहीं माना जाता।

संयुक्त परिवार प्रणाली में गृह-स्वामी के अधिकार

प्राचीन और मध्य काल में व्यक्ति की संतान एवं सम्पत्ति की सुरक्षा करने और आजीविका के साधन एवं कौशल प्राप्त करने के लिए संयुक्त परिवार का होना आवश्यक था। परिवार का सबसे वृद्ध पुरुष संयुक्त परिवार का मुखिया होता था। उसे गृहस्वामी कहते थे। वह परिवार के सदस्यों को अनुशासन में रखता था, उन्हें धर्माचरण पर चलने का मार्ग दिखाता था, परिवार के सदस्यों की सुरक्षा करता था और उनकी उदर-पूर्ति की व्यवस्था करता था।

वह परिवार में होने वाले मांगलिक कार्यों, याज्ञिक अनुष्ठानों, एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थिर करने सम्बन्धी निर्णय लेता था तथा उचित समय आने पर परिवार एवं सम्पत्ति का विभाजन भी करता था। साधारणतः परिवार के अन्य सदस्यों को गृहस्वामी की आज्ञाओं और निर्णयों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होता था।

संयुक्त परिवार के स्वरूप को ठीक से समझ न पाने के कारण पाश्चात्य लेखकों ने संयुक्त परिवार के मुखिया को स्वेच्छाचारी बताया है परन्तु यह सत्य नहीं है। यद्यपि परिवार के मुखिया के अधिकार बहुत व्यापक होते थे, तथापि वह परिवार के अन्य सदस्यों की भावनाओं एवं उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखता था और महत्त्वपूर्ण निर्यय लेने से पहले उनसे  विचार-विमर्श करता था।

संयुक्त परिवार में सदस्यों के अधिकार

संयुक्त परिवार के समस्त सदस्य एक ही भवन अथवा भवन-परिसर में एक साथ रहते थे। परिवार के समस्त सदस्यों का भोजन एक ही रसोईघर में बनता था। परिवार की सम्पत्ति में समस्त पुरुष सदस्यों का समान अधिकार होता था। परिवार के कई सदस्य धन अर्जित करते थे परन्तु उन सब की आय अलग-अलग न होकर परिवार की संयुक्त निधि होती थी जिससे पूरे परिवार का व्यय चलता था। इस दृष्टि से संयुक्त परिवार एक आर्थिक इकाई था। संयुक्त परिवार धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र था। देव-पूजन एवं धार्मिक अनुष्ठान में परिवार के समस्त स्त्री एवं पुरुष सदस्य भाग लेते थे।

संयुक्त परिवार में पुत्र का महत्त्व

संयुक्त परिवार में पुत्र का महत्त्व अत्यधिक था। समाज में धारणा प्रचलित थी कि आत्मा ही पुत्र के रूप में जन्म लेती है। (आत्मा वै जायते पुत्रः)। इस प्रकार पुत्र के रूप में मनुष्य अमरत्व एवं निरंतरता को प्राप्त करता है। पुत्र उत्पन्न करना ही विवाह का मुख्य उद्देश्य था। पुत्र उत्पन्न होने पर पिता ‘पितृ ऋण’ से मुक्त हो जाता था। पुत्रों में भी ज्येष्ठ पुत्र का स्थान अन्य पुत्रों की अपेक्षा विशिष्ट था। श्राद्ध में ज्येष्ठ पुत्र ही पिण्ड और तर्पण देने का अधिकारी होता है। पिता की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र का कर्त्तव्य था कि वह अपने छोटे भाईयों का पुत्र के समान पालन करे। 

संयुक्त परिवार प्रणाली का विभाजन

हिन्दू-धर्मशास्त्र परिवार के विभाजन को उचित नहीं मानते। मनु ने लिखा है कि परिवार के सदस्यों को परिवार छोड़़ने पर पाप लगता है। पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उसकी सम्पत्ति को बराबर बांट सकते हैं किंतु उचित यह है कि छोटे भाई अपने बड़े भाई के साथ वैसे ही रहें जैसे पिता के साथ रहते थे। नारद स्मृति में क्रोधी, विषयी और शास्त्र-विरुद्ध आचरण करने वाले पिता से सम्पत्ति बंटवाने का निर्देश दिया है।

पूर्व-मध्य-युग में सम्पत्ति के विभाजन को लेकर दो विचारधाराओं का विकास हुआ। इनमें से पहली थी विज्ञानेश्वर द्वारा प्रतिपादित मिताक्षरा और दूसरी थी जीमूतिवाहन द्वारा प्रवर्तित दायभाग। प्रथम विचारधारा के अनुसार पुत्र के उत्पन्न होते ही सम्पत्ति में उसका अधिकार हो जाता था। दूसरे विचार के अनुसार पिता की मृत्यु के बाद पुत्र का सम्पत्ति पर अधिकार सृजित होता था। इस काल में संयुक्त परिवार की साझी सम्पत्ति पर गृहस्वामी का अधिकार होता था और संयुक्त परिवार के किसी सदस्य द्वारा अर्जित सम्पत्ति पर केवल उसी सदस्य का अधिकार होता था।

संयुक्त परिवार प्रणाली से लाभ

(1.) सामाजिक सुरक्षा कवच

संयुक्त परिवार, परिवार के प्रत्येक सदस्य का सुरक्षा कवच है। संकट के समय में वह परिवार के सदस्यों की सहायता प्राप्त करता है तथा किसी भी विपत्ति का सामना कर सकता है जबकि एकल-परिवार के सदस्यों में विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है।

(2.) सामाजिक सम्मान की गारण्टी

संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य की योग्यता और अनुभव अलग-अलग होता है जिसका लाभ परिवार के प्रत्येक सदस्य को मिलता है। इससे परिवार के सदस्यों को समाज में प्रतिष्ठा एवं सम्मान प्राप्त होता है। समाज के बुरे व्यक्ति उस परिवार पर अपवाद आरोपित करने, झगड़ा खड़ा करने अथवा कीचड़ उछालने का दुःसाहस नहीं कर पाते।

(3.) कम व्यय में जीवन-यापन

 परिवार के समस्त सदस्यों के एक साथ रहने के कारण कम व्यय में अधिक साधन जुटा लिए जाते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग से संसाधन जुटाने की आवश्यकता नहीं रहती। इस कारण कम व्यय में अधिक लोगों का जीवन-यापन संभव हो जाता है।

(4.) सहकारी एवं सहयोगी संस्था

संयुक्त परिवार में बच्चों का लालन-पालन घर की सभी महिलाएं मिलकर करती हैं। इसी प्रकार प्रत्येक सदस्य अपना-अपना कार्य तय कर लेता है। इस कारण परिवार एक सहकारी संस्था बन जाता है। परिवार के समस्त सदस्य एक-दूसरे के साथ सहयोग करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं।

जवाहरलाल नेहरू के अनुसार संयुक्त पारिवार व्यवस्था परिवार के सदस्यों के लिए बीमा-कवच का काम करती है और इसमें मानसिक तथा शारीरिक दृष्टि से निर्बल लोगों के लिए भी सभी सुरक्षाएं उपलब्ध रहती हैं। रोगी की सेवा-सुश्रुषा भी संयुक्त परिवार में अधिक अच्छी होती है।

(5.) जीवनयापन के साधन के रूप में

कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग एवं व्यापार आदि गतिविधियों में एक से अधिक व्यक्तियों के नियोजन की आवश्यकता होती है। संयुक्त परिवार प्रणाली में यह श्रम-शक्ति परिवार के भीतर ही उपलब्ध हो जाती है। पूरी तरह विश्वसनीय एवं अपने पैतृक व्यवसाय में दक्ष होने के कारण यह मानव-शक्ति अनुचरों की अपेक्षा अधिक अच्छे परिणाम देती है।

(6.) व्यक्तिगत उन्नति के लिए समान अवसर एवं सुविधाएँ

संयुक्त परिवार में समस्त सदस्यों को व्यक्तिगत उन्नति के लिए समान सुविधाएं प्राप्त होती हैं। परिवार के प्रत्येक सदस्य के कौशल एवं दक्षता का लाभ कमजोर सदस्य को भी समान रूप से प्राप्त होता है। इससे कमजोर सदस्य को भी व्यक्तिगत उन्नति के अधिक अवसर प्राप्त हो जाते हैं।

(7.) बच्चों का व्यक्तित्व विकास

संयुक्त परिवार में सभी भाइयों के बच्चों को घर के वृद्ध सदस्यों से मार्गदर्शन एवं संस्कार सहज रूप से प्राप्त होते हैं। संयुक्त परिवार में रहते हुए बच्चे में तेरा-मेरा जैसे संकीर्ण विचारों का प्रादुर्भाव नहीं होता और उनमें मिल-बांटकर खाने एवं रहने की प्रवृत्ति का विकास होता है।

(8.) अधिकार और कर्त्तव्य का समन्वय

संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य को अपने से बड़ों का आदर करना तथा उनकी आज्ञा का पालन करना होता है तथा अपने से छोटे एवं कमजोर सदस्य को सहायता एवं संरक्षण देना होता है। इससे उन्हें अधिकार एवं कर्त्तव्य के बीच संतुलन स्थापित करना आ जाता है।

(9.) आनंद का सृजन

संयुक्त परिवार में सभी सदस्य मिलजुल कर रहते हैं, तीज-त्यौहार एवं पारिवारिक उत्सव मनाते हैं। परस्पर चलने वाले संवादों एवं हास-परिहास के कारण उन्हें एकाकीपन तथा नीरसता नहीं झेलनी पड़ती अपितु परिवार के सदस्यों में प्रेम बढ़ता है और आनंददायी वातावरण सृजित होता है।

परिवार के छोटे-छोटे बच्चों की किलकारियों एवं बाल-सुलभ चेष्टाओं के कारण प्रत्येक सदस्य को आनंद का अनुभव होता है। भाई-बहिन का प्रेम, माँ का वात्सल्य, देवर-भाभी का हास-परिहास, दादा-दादी एवं नाना-नानी के पोते-पोती या दौहित्र आदि के साथ मनोविनोद के प्रसंग केवल संयुक्त परिवार में ही संभव हैं।

(10.) समाज सेवा की प्रेरणा

संयुक्त परिवार के सदस्यों में दूसरे मानवों के प्रति सम्मान, मैत्री एवं करुणा के भाव अधिक होते हैं। इसलिए वे देश एवं समाज के लिए जिम्मेदार नागरिक सिद्ध होते हैं। संयुक्त परिवार में रहने से व्यक्ति का नैतिक स्तर ऊँचा रहता है। वे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज सेवा जैसे कार्य भी करते हैं।

(11.) कृषि-भूमि का संरक्षण

संयुक्त परिवार के कारण कृषि-भूमि के विभाजन की गति मंद होती है। जबकि एकल परिवार प्रथा में  कृषि-भूमि का विभाजन तेजी से होता है।

संयुक्त परिवार प्रणाली की दुर्बलताएँ एवं हानियाँ

संयुक्त परिवार प्रणाली में अनेक गुण होते हुए भी कुछ दोष भी निहित हैं जिनके कारण तथा देश एवं समाज की बदली हुई परिस्थितियों के कारण संयुक्त परिवार प्रणाली लुप्त होने के कगार पर है।

(1.) जिम्मेदारियों के प्रति उपेक्षा भाव

संयुक्त परिवार में कुछ लोगों को बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है तो कुछ लोग बिना कुछ किए ही समस्त सुविधाओं का उपभोग करते हैं। ऐसी स्थिति में काम से बचने की प्रवृत्ति वाले सदस्य मानते हैं कि बाकी लोग काम कर रहे हैं, इसलिए मैं न करूं तो क्या हानि है! जबकि काम करने वाले सदस्य सोचते हैं कि जब दूसरा सदस्य काम नहीं कर रहा तो मैं ही क्यों करूं! इस प्रवृत्ति के कारण परिवार में बिखराव उत्पन्न होने लगता है।

(2.) परस्पर झगड़ों का कारक

संयुक्त परिवार में विभिन्न प्रवृत्तियों के सदस्यों को एक साथ रहना होता है, जिनमें बहुधा सामंजस्य का अभाव होता है। परिवार में आने वाली बहुएँ भिन्न पारिवारिक परिवेश से आती हैं और प्रायः ससुराल के नए वातावरण में स्वयं को असुरक्षित अनुभव करती हैं। इस कारण सास-बहू, ननद-भौजाई, देवरानी-जेठानी में व्यक्तित्व का टकराव होता है। ये झगड़े पुरुष सदस्यों में भी आरम्भ हो जाते हैं और प्रायः इतने बढ़ जाते हैं कि परिवार टूटकर बिखर जाते हैं।

(3.) स्त्रियों की स्वतंत्रता का हनन

संयुक्त परिवार में स्त्रियों की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा दूसरे सदस्यों की उपस्थिति के कारण अपने पति एवं बच्चों के साथ वार्तालाप करने, अपनी रुचि का भोजन बनाने, इच्छानुसार वस्त्र पहनने एवं स्वतंत्रता पूर्वक घर से बाहर जाने के अवसर नहीं मिल पाते। उसे घर के बड़े सदस्यों से पर्दा करना पड़ता है और स्वयं को दाब-ढंक कर रखना पड़ता है।

बोलते समय भी अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। कई बार उसे अपने पति की कम आय अथवा पीहर वालों की कमजोर आर्थिक स्थिति को लेकर व्यंग्य एवं ताने भी सुनने पड़ते हैं। यदि पति बेरोजगार है तो पत्नी को नौकरानी की तरह काम करना पड़ता है। इससे उस स्त्री तथा उसके बच्चों के मनोविज्ञान पर बुरा असर पड़ता है।

(4.) व्यक्तित्व विकास में बाधक

संयुक्त परिवार में रहने के कारण व्यक्ति न तो अपनी इच्छानुसार खा सकता है और न पहन सकता है। वह अपनी इच्छित वस्तु खरीदकर भी नहीं ला सकता। उसे अपनी पत्नी और बच्चों की इच्छाओं को पूरा करने से पहले दूसरे सदस्यों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना पड़ता है। इस कारण परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी अभिलाषाओं पर अंकुश लगाना पड़ता है।

संयुक्त परिवार के विघटन के कारण

(1.) आर्य संस्कृति का मुख्य आधार ‘परिवार’ था जबकि पाश्चात्य संस्कृति व्यक्ति-स्वातंत्र्य में विश्वास करती है। जब देश में पाश्चात्य विचारों का प्रवेश हुआ तो भारतीयों ने भी ‘व्यक्तिवाद’ को अपना लिया। कुटीर उद्योगों के विनाश, औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण जैसी प्रवृत्तियों ने लोगों को काम-धंधे की तलाश में बड़ी संख्या में गांव छोड़कर शहरों की ओर जाना पड़ा।

(2.) संयुक्त परिवार के सदस्यों के सरकारी नौकरियों एवं बड़ी-बड़ी कम्पनियों में दूर पदस्थापन होने से भी संयुक्त परिवार बिखर गए और लोग अपने बीवी-बच्चों एवं शहरी सुख-सुविधाओं के बीच रहने के अभ्यस्त हो गए।

(3.)  पुरानी पीढ़ी के लोग पुरातन परम्पराओं के पक्षधर होते हैं तथा परिवार का संचालन उसी पद्धति पर करना चाहते हैं जबकि नई पीढ़ी के लोगों की मान्यताओं में तेजी से बदलाव आने के कारण वे पुरानी पीढ़ी की बातों से सहमत नहीं होते। इस कारण भी संयुक्त परिवारों का तेजी से विघटन हुआ।

(4.) परम्परागत परिवार में सास अपनी बहू को अपने अनुशासन में रखना चाहती है किंतु बहू सास को व्यर्थ का बोझ समझकर उससे दूर रहना चाहती है। सास चाहती है कि बहू पर्दा करे, घर की चारदीवारी से बाहर न निकले, सुबह उठकर सास-ससुर के पैर छुए, सास-ससुर की उपस्थिति में अपने पति से बातचीत न करे और जो कुछ सास कहे, उसे चुपचाप स्वीकार कर ले परन्तु पढ़ी-लिखी बहू पुरातनपंथी सास की बातों को दकियानूसी मानती है। इस कारण भी संयुक्त परिवार तेजी से टूटते चले गए।

(5.) बढ़ती हुई आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के कारण अब परिवार का व्यय एक सदस्य की कमाई से नहीं चलता। अतः औरतें भी नौकरी करना चाहती हैं। ऐसे लोगों के लिए संयुक्त परिवार में रहना कठिन हो जाता है। जब घर की कुछ औरतें नौकरी करती हैं और कुछ नहीं करतीं तो उनमें बराबरी के अधिकार को लेकर संघर्ष आरम्भ हो जाता है। कमाने वाली औरतें अपने धन पर अपना अधिकार समझती हैं जबकि न कमाने वाली औरतें और पुरुष सदस्य औरत की कमाई पर पूरे परिवार का अधिकार समझते हैं। इससे घर का वातावरण प्रेम-युक्त नहीं रह पाता।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि व्यक्ति-स्वातंत्र्य के इस युग में न तो नई पीढ़ी ही पुरानी पीढ़ी के नियंत्रण में रहना चाहती है और न पढ़ी-लिखी नारी ही संयुक्त परिवार के दायित्वों का निर्वहन करना चाहती है। इस कारण संयुक्त परिवार की परम्परा लगभग लुप्त हो गई है, विशेषकर नगरीय क्षेत्रों में।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारतीय परिवार प्रणाली

प्राचीन विवाह प्रणालियाँ

भारत में पारिवारिक जीवन

भारतीय परिवार की विशेषताएँ

भारतीय परिवार के कर्त्तव्य

संयुक्त परिवार प्रणाली

वैदिक काल में नारी की स्थिति

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वैदिक काल में नारी

वैदिक काल में नारी की स्थिति पुरुष के बराबर थी। उसे भोग की वस्तु न समझ कर परिवार की वृद्धि करने वाली, परिवार को पालने वाली तथा धर्म में साथ निभाने वाली माना जाता था। नारी की उपस्थिति के बिना कोई भी धार्मिक अनुष्ठान यथा धर्म-कर्म, दान-पुण्य, पितृशांति आदि कर्म सम्पन्न नहीं हो सकते थे।

फ्रांसीसी विद्वान चार्ल्स फोरियर ने लिखा है- किसी राष्ट्र की सही स्थिति का अनुमान उस राष्ट्र में नारी की परिस्थिति से लगाया जा सकता है।

प्राचीन आर्यों ने पितृसत्तात्मक परिवार प्रणाली की स्थापना की थी जिसमें स्त्रियों के लिए समुचित सम्मान एवं प्रतिष्ठा की व्यवस्था की गई थी। परिवार एवं समाज दोनों में ही स्त्री की विशेष भूमिका थी। वह कन्या, पत्नी तथा माँ के रूप में आर्य संस्कृति का आधार थी।

आर्य जन-जीवन में पितृसत्तात्मक परिवार प्रणाली होने के उपरान्त भी स्त्रियों को घर, परिवार एवं समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त थी। वह देवताओं के समान श्रद्धा की पात्र थी।

ऋग्-वैदिक काल में नारी की स्थिति

सामाजिक स्थिति

ऋग्वैदिक-काल (ई.पू.4000 से ईपू.3000) में परिवार का कोई भी आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक कार्य नारी के बिना सम्पन्न नहीं हो सकता था। नारी के बिना पुरुष को अपूर्ण समझा गया। जब तक पुरुष विवाहोपरान्त भार्या की प्राप्ति नहीं कर लेता था तब तक वह याज्ञिक अनुष्ठानों को सम्पन्न नहीं कर सकता था। समाज का संचालन संतान से होता है और संतान की प्राप्ति स्त्री तथा पुरुष दोनों के होने पर ही संभव थी। इसीलिए स्त्री को पुरुष की ‘अर्द्धागिनी’ कहा गया।

ऋग्वेद में ऐसे अनेक साक्ष्य मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि बौद्धिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक जीवन में स्त्रियों को पुरुषों के समान ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी। धार्मिक कृत्यों, सामाजिक उत्सवों तथा समारोहों में वे पुरुषों के साथ आसन ग्रहण करती थीं।

वैदिक यज्ञों से लेकर वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था का आधार नारी ही थी। पंच-महायज्ञों का आधार भी नारी ही थी। श्राद्ध, बलि, हविष्य आदि का आधार भी नारी ही थी। उसे ‘श्री’ और ‘लक्ष्मी’ कहा गया जो घर में सुख एवं समृद्धि की सृष्टि करती थी। ऋग्वेद में एक भी उल्लेख नहीं मिलता है जिसमें नारी की स्थिति पुरुष की अपेक्षा हेय या कम महत्वपूर्ण प्रतीत होती हो या वह पुरुष के अधीनस्थ स्थिति में हो।

ऋग्वैदिक-काल में पर्दा प्रथा का कोई उल्लेख नहीं है। वे स्वतंत्रतापूर्वक घर से बाहर जा सकती थीं। आर्यों के प्रारम्भिक समाज में नारी जितनी स्वतन्त्र और मुक्त थी, उतनी बाद के किसी काल में नहीं रही। ऋग्वैदिक-काल में नारी हर तरह से पुरुषों के समकक्ष थी। वह सामाजिक और धार्मिक उत्सवों में बिना किसी प्रतिबन्ध के हिस्सा लेती थी। उस काल की नारी पुरुषों के साथ यज्ञ, सभा, समिति एवं गोष्ठी में सम्मिलित होती थी। अकेला पुरुष यज्ञ के अयोग्य था।

पत्नी के रूप में वह परिवार की स्वामिनी होती थी। उसके लिए गृहणी, गृहस्वामिनी तथा सहधर्मिणी जैसे आदरसूचक सम्बोधन किए जाते थे। ऋग्वैदिक-काल में पुत्री का जन्म चिन्ता का विषय नहीं माना जाता था। कन्याओं की शिक्षा दिलवाई जाती थी। पुत्रों की भांति पुत्रियों का भी उपनयन संस्कार होता था और वे भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करती हुई पढ़ती थीं। कन्याओं को गृहस्थ जीवन के लिए आवश्यक कार्यों की शिक्षा दी जाती थी।

वैदिक युग में विश्ववारा, घोषा, अपाला, लोपामुद्रा, सिकता, निवावरी, गार्गी, मैत्रेयी आदि स्त्रियों ने ऋषियों का पद प्राप्त किया। उन्होंने वेद-मन्त्रों की रचना की और पुरुषों की ही भांति शास्त्रार्थों एवं सभा-गोष्ठियों में भाग लिया। उस युग में पर्दा-प्रथा और सती-प्रथा का प्रचलन नहीं था। कन्याएं अपनी इच्छा से अपने पति के चयन कर सकती थीं। समाज में एक-पत्नी प्रथा प्रचलित थी।

उस युग में विधवा-विवाह के भी उदाहरण मिलते हैं, यद्यपि यह सामान्य नियम नहीं था। विधवा स्त्री को नियोग-प्रथा द्वारा पुत्र प्राप्ति का अधिकार था। कुछ विशेष मामलों में पति की जीवितावस्था में भी पति की सहमति से स्त्री को नियोग-प्रथा के द्वारा पुत्र उत्पन्न करने का अधिकार था।

ऋग्वेद की एक ऋचा में कहा गया है- हे कुल-वधू तुम यहीं इसी घर में रहो, वियुक्त मत होओ, अपने घर में पुत्रों और पौत्रों के साथ खेलते और आनन्द मनाते हुए समस्त आयु का उपभोग करो। इस ऋचा से ज्ञात होता है कि वैदिक समाज में कुलवधू स्वरूपा नारी का कितना उच्च स्थान था और समाज में उसका कितना अधिक महत्व था।

नारी की शिक्षा

ऋग्वैदिक-काल में नारी स्वतन्त्रतापूर्वक शिक्षा ग्रहण करती थी। इस काल में स्त्रियाँ सभा एवं गोष्ठियों में ऋग्वेद की ऋचाओं का गायन किया करती थीं। ऋग्वेद में उल्लिखित है कि कतिपय विदुषी स्त्रियों ने ऋग्वेद ऋचाओं का प्रणयन किया। उस युग में बौद्धिक योगदान करने वाली बीस स्त्रियों के नाम मिलते हैं- रोमशा, अपाला, उर्वशी, विश्वधारा, सिकता, निबाबरी, घोषा, लोपामुदा आदि।

उपनयन संस्कार

ऋग्वैदिक-काल में पुत्र की तरह पुत्री का भी विद्यारम्भ से पूर्व उपनयन संस्कार किया जाता था तथा वह भी ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई वेदों का अध्ययन करती थी। यह व्यवस्था कुछ शिथिलता के साथ स्मृतिकाल तक चलती रही। वैदिक युग में छात्राओं के दो वर्ग थे- (1.) सद्योवधू और (2.) ब्रह्मवादिनी। सद्योवधू वे छात्राएँ थीं जो विवाह के पूर्व तक वेद मंत्रों और याज्ञिक प्रार्थनाओं का ज्ञान प्राप्त करती थीं।

ब्रह्मवादिनी वे थीं जो अपना सम्पूर्ण जीवन वेदों की शिक्षा प्राप्त करने में लगाती थीं। ऋषि कुशध्वज की कन्या वेदवती ऐसी ही ब्रह्मवादिनी स्त्री थी। उस युग मे सह-शिक्षा का भी प्रचलन था। वाल्मीकि आश्रम में आत्रेयी और लव-कुश ने साथ-साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सह-शिक्षा का उदाहरण महाभारत में भी मिलता है जब अम्बा और शैखवत्य एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। अनेक स्त्रियाँ शिक्षिका बनकर अध्यापिकाओं का जीवन व्यतीत करती थीं। ऐसी स्त्रियाँ उपाध्याया कहलाती थीं।

विवाह संस्कार

आर्य संस्कृति में विवाह को अनिवार्य धार्मिक संस्कार माना गया। इसका मुख्य उद्देश्य उन विभिन्न पुरुषार्थों को पूरा करना था जिनकी प्राप्ति में पुरुष को पत्नी के सहयोग की आवश्यकता होती थी। पुरुष और स्त्री के गृहस्थ जीवन का प्रारम्भ विवाह से ही माना गया। चूँकि कोई भी धार्मिक संकल्प पत्नी के बिना सम्भव नहीं था, इसीलिए उसे ‘धर्मपत्नी’ अथवा ‘सहधर्मिणी’ कहा गया है। वैदिक-काल में स्त्री का विवाह यौवन प्राप्ति के बाद किया जाता था किंतु समय के साथ स्त्री की आयु में परिवर्तन आता गया।

नारी की आर्थिक स्थिति

वैदिक काल में कुछ ऐसे उल्लेख हैं जो सम्पत्ति में स्त्री के अधिकार को स्वीकार नहीं करते किंतु ये अपवाद स्वरूप हैं। सम्पत्ति में उसका भाग होता था। वह पुत्र से किसी प्रकार भी कम नहीं समझी जाती थी। दत्तक पुत्र से पुत्री श्रेष्ठ थी। पुत्र के न रहने पर वह उत्तराधिकारी मानी जाती थी। चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक समाज में यह व्यवस्था चलती रही।

नारी की राजनीतिक स्थिति

ऋग्वेद साहित चारों वेदों में किसी महिला साम्राज्ञी का उल्लेख नहीं हुआ है। वैदिक-काल में किसी भी युद्ध में नारी के भाग लेने की चर्चा एक भी स्थान पर नहीं की गई है।

उत्तर वैदिककाल में नारी की स्थिति

यजुर्वेद एवं सामवेद के रचना काल में नारी की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया था। चूंकि अथर्ववेद की रचना बहुत बाद में हुई थी, इसलिए अथर्ववेद के रचनाकाल में नारी की स्थिति में कुछ परिवर्तन देखने को मिलता है।

अथर्ववेद (ई.पू.1500-ई.पू.1000) में पुत्री के जन्म पर खिन्नता का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार एतरेय ब्राह्मण में एक स्थान पर पुत्री के लिए ‘कृपण’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इस काल में यद्यपि पुत्री का जन्म प्रसन्नता का द्योतक नहीं था तथापि उसके पालन-पोषण एवं शिक्षा की उपेक्षा नहीं की जाती थी। वे समाजिक व्यवस्था का आदरणीय अंग थीं।

उत्तरवैदिक-काल में कन्या का जन्म कष्ट का कारण माना जाने लगा और स्त्रियों के संस्कारों के समय वेद मन्त्रों का उच्चारण बन्द कर दिया गया। स्त्री-पुरुष की समानता का भाव कम हो गया परन्तु परिवार में स्त्रियों का महत्त्व पहले की तरह बना रहा। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार मनुष्य स्वयं पूर्ण नहीं है, विवाह के बाद पत्नी उसे पूर्ण बनाती है।

सूत्रग्रंथों के रचयिताओं यथा बोधायन, वशिष्ठ और गौतम आदि ने स्त्री को पुरुष के अधीन माना। फिर भी परिवारों में उसकी मर्यादा बनी रही। महाभारत में नारी को धर्म, अर्थ और काम का सूत्र माना गया है और उसे पुरुष की अर्द्धांगिनी कहा गया है। मनुस्मृति में लिखा है- ‘जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता रमण करते हैं। जिस कुल में नारी का अपमान होता है, वह कुल नष्ट हो जाता है।’

आर्य धर्मशास्त्रों ने नारी को विद्या, शील, ममता, यश और सम्पत्ति की स्वामिनी समझा। उसे यह स्थिति सहज एवं स्वाभाविक रूप से मिली थी किंतु समय के साथ सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव आता गया और नारी पर बंधन एवं वर्जनाएं लागू होने लगीं। एक समय ऐसा भी आया जब नारी ने पुरुषों के साथ बराबरी का अधिकार पूर्णतः खो दिया एवं वह पुरुष की अनुगामिनी बनकर रह गई।

समय के साथ स्त्रियों की स्वतंत्रता पर और अधिक नियंत्रण लगा दिए गए। उनके लिए शिक्षा को अनावश्यक समझा गया। मनु आदि स्मृतिकारों ने स्त्रियों के उपनयन संस्कार का निषेध कर दिया। इससे स्त्रियों के लिए शिक्षा का द्वार बन्द हो गया। मनु-स्मृति में बाल-विवाह का समर्थन किया गया है।

याज्ञवल्क्य स्मृति एवं नारद स्मृति के अनुसार कन्या का विवाह रजस्वला होने से पूर्व हो जाना चाहिए। कन्या अपने पिता के घर में राजस्वला नहीं होनी चाहिए। इस काल में नियोग-प्रथा एवं विधवा-विवाह का भी निषेध कर दिया गया। स्त्री को सम्पत्ति रखने या उसका क्रय करने का अधिकार भी नहीं रहा।

स्त्रियों पर कठोर नियंत्रण होने के उपरांत भी उत्तरवैदिक युग में नारी भोग की वस्तु नहीं समझी गई। इस काल में भी वह, पहले की ही तरह समाज और परिवार के अस्तित्व एवं उन्नति का आधार मानी जाती थी।

उपरोक्त उद्धरणों से सिद्ध होता है कि भले ही नारी के सम्बन्ध में वैदिक एवं उत्तरवैदिक समाज का चिंतन आज के समाज के चिंतन से अलग था किंतु वैदिक काल में नारी की स्थिति पूरी तरह संतोषप्रद थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारतीय नारी की युग-युगीन स्थिति

वैदिक काल में नारी की स्थिति

महाकाव्य काल में नारी की स्थिति

स्मृति काल में नारी की स्थिति

पौराणिक काल में नारी की स्थिति

पूर्वमध्यकाल में नारी की स्थिति

मध्य काल में नारी की स्थिति

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति

आधुनिक काल में नारी की स्थिति

महाकाव्य काल में नारी की स्थिति

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महाकाव्य काल में नारी की स्थिति

वैदिक काल में नारी की स्थिति की अपेक्षा महाकाव्य काल में नारी की स्थिति में कुछ परिवर्तन आ गया था। अब उन्हें पुरुष के संरक्षण में रहने के लिए कहा जाने लगा।

ईस्वी पूर्व 800 से ईस्वी पूर्व 600 तक के कालखण्ड को महाकाव्य काल कहा जाता है। इस कालखण्ड में रामरायण तथा महाभारत नामक दो महाकाव्यों की रचना हुई जिनका भारतीय संस्कृति पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा।

महाकाव्य काल में स्त्रियाँ वैदिक काल में नारी की भांति अब भी आदर की पात्र थीं तथा उन पर अधिक प्रतिबन्ध नहीं थे। स्त्रियाँ सामाजिक उत्सवों और धार्मिक पर्वों में सम्मिलित हुआ करती थीं। रामायण में सीता का वनों में विचरण तथा महाभारत में द्रौपदी का पतियों के साथ वनों में भ्रमण उनकी सामाजिक स्थिति को व्यक्त करता है।

सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। उनके प्रति समाज में आदर की भावना थी। रामायण में भी सीता के लिए आदर और सम्मान की बातें कही गई हैं। अकेला पुरुष यज्ञ सम्पादित नहीं कर सकता था। नारी का यह स्थान रामायण के रचनाकाल तक बना रहा जिसमें सीता के न होने पर राम को अश्वमेध यज्ञ में अपनी पत्नी सीता की स्वर्ण-प्रतिमा रखनी पड़ी थी।

महाभारत में भीष्म पितामह का कथन है कि स्त्री को सर्वदा पूज्य मानकर उससे स्नेह का व्यवहार करना चाहिए। जहाँ स्त्रियों का आदर होता है वहाँ देवताओं का निवास होता है। नारी की अनुपस्थिति में समस्त कार्य अपवित्र हो जाते हैं। एक अन्य स्थान पर भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि स्त्रियाँ स्वभावतः अपनी लिप्सा को दबा नहीं पातीं, इसलिए उन्हें किसी पुरुष के संरक्षण में रहना चाहिए।

महाकाव्य काल में नारी के अधिकार एवं प्रतिबंध

विवाह संस्कार

महाकाव्यों के काल में स्वयंवर प्रथा प्रचलित थी जो उस युग में होने वाले युवा-विवाहों की द्योतक है। इस काल में मान्यता थी कि युवा होने पर कन्या का विवाह नहीं किया जाता है तो कन्या का पिता नर्कगामी होता है और वह कन्या स्वयं अपना वर चुन लेने के लिए स्वतन्त्र होती है। युवती कन्या को अपने घर में रखना निन्दनीय माना जाता था।

विवाह के प्रकार

वैदिक-काल से लेकर सूत्रकाल तक भारत में आठ प्रकार की विवाह प्रणालियाँ प्रचलन में आईं। धर्मशास्त्रकारों ने ब्रह्मविवाह, देवविवाह, आर्षविवाह, प्रजापत्य विवाह, गान्धर्व विवाह, आसुर विवाह, राक्षस विवाह और पैशाच विवाह नामक आठ प्राकर के विवाह बताए हैं।

इनमें से प्रारम्भिक चार प्रकार के विवाह सम्मानित एवं स्वीकृत थे और अन्तिम चार निन्दनीय माने जाते थे। इन समस्त प्रकार के विवाहों का स्वरूप समय और परिस्थिातियों के अनुसार बदलता गया। यद्यपि अपने वर्ण में विवाह करना ही श्रेष्ठ माना जाता था तथापि वर्ण से बाहर भी विवाह प्रचलित थे।

बहु-विवाह की प्रथा

महाकाव्य काल में बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। राजा दशरथ की तीन रानियां थीं जबकि द्रौपदी ने पांच पुरुषों से विवाह किया था। एक पुरुष के साथ अनेक स्त्रियों के विवाह सामान्य प्रचलन था किंतु एक स्त्री का कई पुरुषों के साथ विवाह अपवाद रूप में ही मिलता है।

पर्दा प्रथा

वाल्मीकि ने रामायण में लिखा है कि जो सीता आकाशचारी भूतों के द्वारा भी नहीं देखी गई थीं, आज उसे राजपथ पर खड़े लोग वन जाते हुए देख रहे हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि भले ही सीता पर्दा नहीं करती हों किंतु  रामायण के रचनाकाल में स्त्रियां पर्दे में रहने लगी थीं। महाभारत में दुर्योधन की पत्नियों के लिए ‘असूर्यंपश्या’ शब्द आया है जिसका अर्थ है कि वे पर्दे में रहती थीं तथा उन्होंने कभी पर्दे से बाहर निकलकर सूर्य भी नहीं देखा था।

सती-प्रथा

रामायण में सती शब्द का प्रयोग हुआ है किंतु पति के निधन पर सती होना अनिवार्य नहीं था। राजा दशरथ की मृत्यु होने पर एक भी रानी सती नहीं हुई थी। बाली की मृत्यु पर तारा ने सुग्रीव से विवाह कर लिया था। रावण के मरने पर मंदोदरी ने विभीषण से विवाह किया था किंतु मेघनाद के मरने पर सुलोचना सती हुई थी। महाभारत में उल्लेख है कि महारानी माद्री महाराज पाण्डु के साथ सती हुई थी किंतु बड़ी रानी कुंती सती नहीं हुई थी।

श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की चिता पर वसुदेव की चार रानियाँ- देवकी, भद्रा, रोहिणी एवं मंदिरा सती होने के लिए आरोहण करती हैं। इसी प्रकार कृष्ण के परलोकगमन का समाचार हस्तिनापुर पहुँचने पर उनकी आठ पटरानियों में से पांच- रुक्मणि, गांधारी, सह्या, हैमावती तथा जाम्बवती पति की देह के बिना ही चितारोहण करती हैं।

विधवा-विवाह पर प्रतिबन्ध

वैदिक-काल में विधवा-विवाह पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। धर्मशास्त्रों ने नियोग-प्रथा को भी मान्यता दी थी किंतु बौद्ध युग के बाद के व्यवस्थाकारों ने विधवा-विवाह एवं नियोग-प्रथा का निषेध कर दिया। विधवा-स्त्री के लिए कठोर संयम का जीवन आदर्श माना गया।

विवाह विच्छेद का निषेध

वैदिक युग में स्त्री अपने पति को छोड़ सकती थी। यह स्थिति धर्मसूत्र ग्रंथों के रचनाकाल तक बनी रही। धर्मसूत्रों ने जाति-भ्रष्ट और नपुंसक पति को त्याग देने के लिए कहा है। बौद्ध साहित्य में विवाह-विच्छेद के अनेक उदाहरण मिलते हैं किंतु नारद आदि हिन्दू शास्त्रकारों ने पति या पत्नी को विवाह-विच्छेद का अधिकार नहीं दिया है। कुछ विशेष परिस्थितियों में ही स्त्री अपने पति को त्याग सकती थी। यदि एक स्त्री के होते हुए पति किसी दूसरी स्त्री से विवाह कर लेता तो स्त्री अपने पति को छोड़ सकती थी।

ऐसी स्थिति में पति को पहली पत्नी के भरण-पोषण की समुचित व्यवस्था करनी पड़ती थी। मध्य-युग में भी स्त्रियों को अपना पति त्यागने के अधिकार थे किंतु एकाकी स्त्रियों के लिए जीवन निर्वाह करना अत्यन्त दुष्कर और कष्टसाध्य था। स्त्रियों को समानता का अधिकार नहीं था। जो स्त्रियाँ विवाह-विच्छेद का अनुसरण करती थीं, समाज उन्हें हेय समझता था। मनु ने व्यवस्था दी कि यदि स्त्री का पति दुश्चरित्र, परस्त्री-गामी एवं अवगुणी ही क्यों न हो, पत्नी को उसकी सेवा करनी चाहिए। पति-पत्नी का सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तर के लिए माना गया।

सम्पत्ति का अधिकार

भारतीय संस्कृति में महिला के सम्पत्ति विषयक अधिकारों पर आरम्भ से ही चिंतन किया गया किंतु उसे सामान्यतः सम्पत्ति की अधिकारिणी नहीं माना गया। महाभारत में लिखा है कि पुत्री को पूरी नहीं तो आधी सम्पत्ति अवश्य मिलनी चाहिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय नारी की युग-युगीन स्थिति

वैदिक काल में नारी की स्थिति

महाकाव्य काल में नारी की स्थिति

स्मृति काल में नारी की स्थिति

पौराणिक काल में नारी की स्थिति

पूर्वमध्यकाल में नारी की स्थिति

मध्य काल में नारी की स्थिति

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति

आधुनिक काल में नारी की स्थिति

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क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
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हरम बेगम का कपट जाल (69)

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बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...