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स्मृति काल में नारी की स्थिति

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स्मृति काल में नारी की स्थिति

स्मृति काल में नारी की स्थिति से आशय स्मृति ग्रंथों के रचना काल में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति से है। श्रुति अर्थात् (वेद, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद्) के बाद स्मृति ग्रंथ आते हैं।

माना जाता है कि स्मृतियों की रचना ईस्वी पूर्व 1000 से ईस्वी पूर्व 500 के बीच के कालखण्ड में हुई। स्मृतियाँ बहुत सी हैं- मनु स्मृति, याज्ञवलक्य स्मृति, बृहस्पति स्मृति, गौतम स्मृति तथा आपस्तम्ब स्मृतियाँ आदि। स्मृतियों में सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन के लिए नियम बताए गए हैं। इन नियमों से अनुमान होता है कि स्मृति काल में नारी की स्थिति वैदिक काल की अपेक्षा बहुत अलग थी।

स्मृति काल में नारी

गृह्यसूत्रों (ई.पू.600-ई.पू.400) और स्मृतियों (ई.पू.200-ई.300) के रचना-काल में नारी को किसी न किसी पुरुष के आश्रय में रहना अनिवार्य माना गया। पुत्री को पिता के, पत्नी को पति के और विधवा माता को पुत्र के संरक्षण में रहने की व्यवस्था अनिवार्य की गई। इसीलिए उत्तरवैदिक तथा उसके परवर्ती काल में पुत्र की तुलना में पुत्री का स्थान निम्न माना जाने लगा तथा स्त्री की दशा पतनोन्मुख हो गई।

स्त्री के साथ भोजन करने वाले पुरुष को गर्हित आचरण करने वाला कहा गया तथा उस स्त्री की प्रशंसा की गई जो अप्रतिवादिनी (प्रतिवाद न करने वाली) थी। उसका स्वतन्त्र अस्तित्त्व समाप्त हो गया तथा उसके शरीर पर पति का अधिकार मान लिया गया। मनु ने उसे पुरुष के संरक्षण में रहने के लिए निर्देशित किया। जब तक कन्या रहे वह पिता के संरक्षण में रहे, विवाह हो जाने पर भर्ता (पति) का संरक्षण रहे और जब वह स्थविर (वृद्धावस्था) हो तब उस पर पुत्र का संरक्षण रहे।

यज्ञों में नारी की उपस्थिति

ऋग्वैदिक-काल की तरह उत्तरवैदिक-काल एवं सूत्रकाल में भी स्त्रियाँ यज्ञ करती थीं। इस काल में सुलभा, गार्गी, मैत्रेयी आदि विदुषी स्त्रियां भी थीं जिनकी प्रतिष्ठा वैदिक ऋषियों के समान थी। विदेह के राजा जनक द्वारा यज्ञ के अवसर पर आयोजित शास्त्रार्थ में गार्गी ने अद्भुत प्रतिभा और तर्कशक्ति के आधार पर याज्ञवल्क्य ऋषि से शास्त्रार्थ किया। इन साक्ष्यों से विदित होता है कि ऋग्वैदिक-काल से सूत्रकाल तक स्त्रियों की शिक्षा का समुचित प्रबन्ध था। उस काल की नारी विविध ललित कलाओं में पारंगत थी। उस युग की स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य का पालन करती थीं तथा उनका उपनयन संस्कार भी होता था।

नारी की स्थिति में गिरावट

जैसे-जैसे समाज की संरचना क्लिष्ट होती गई, वैसे-वैसे नारी की स्थिति में परिवर्तन आता गया और उसके अधिकार सीमित होते गए। जब आर्यों का सम्पर्क पूर्व के अनार्य लोगों से हुआ तो आर्यों एवं अनार्यों के बीच विवाह सम्बन्ध होने लगे। अतः समाज में अनार्य स्त्रियाँ भी प्रवेश पा गईं।

इन स्त्रियों का वैदिक वाड्मय और आचार-विचार से कोई परिचय नहीं होता था, वे वैदिक मंत्रों का भ्रष्ट उच्चारण करती थी जिसके कारण यज्ञ के भंग हो जाने का भय उत्पन्न हो गया। अतः वैदिक साहित्य को शुद्ध बनाए रखने एवं यज्ञों को निर्विघ्न सम्पन्न करने के लिए स्त्रियों को यज्ञों से अलग रखने के नियम बने।

स्त्री का उपनयन संस्कार

स्मृतिकाल में (ई.पू.200-ई.300) में स्त्री का उपनयन संस्कार स्वतंत्र रूप से समाप्त हो गया किंतु द्विज होने के प्रतीक के रूप में विवाह के अवसर पर स्त्री का भी उपनयन संस्कार अवश्य किया जाता था। यद्यपि स्मृतिकार मनु (ई.पू. दूसरी सदी) ने कन्या के लिए उपनयन संस्कार का विधान किया है तथापि मनु  का कथन है कि पति ही कन्या का आचार्य, विवाह ही उसका उपनयन संस्कार, पति की सेवा ही उसका आश्रम और गृहस्थी के कार्य ही दैनिक धार्मिक अनुष्ठान थे।

स्मृतिकारों ने व्यवस्था दी कि बालिकाओं के उपनयन में वैदिक मंत्र नहीं पढ़ने चाहिए। कालान्तर में उन्हें वेदों के पठन-पाठन और यज्ञ करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। शिक्षण-संस्थाओं और गुरुकुलों में जाकर ज्ञान प्राप्त करना कन्या के लिए अतीत की बात हो गई। वह केवल माता-पिता, भाई, बन्धु आदि से अपने घर पर ही शिक्षा प्राप्त करती थी।

विवाह हेतु कन्या की योग्यता

स्मृति काल में विवाह के लिए कन्या की शारीरिक, बौद्धिक एवं आचरण सम्बन्धी योग्यताओं पर भी विचार किया जाता था। शुंगकाल में रची गई मनुस्मृति (ई.पू.200) में कुछ कन्याओं का उल्लेख किया गया है जिनसे विवाह नहीं किया जाना चाहिए। अति सांवली, भूरे वर्ण वाली, पांडुवर्णी, नित्य रोगिणी, वाचाल, भूरी आँखों वाली, अपवित्र, दुष्ट स्वभाव वाली, कटुभाषिणी, मूँछयुक्त, पुरुष के समान आकार वाली, गोल नेत्र वाली, जिसकी जांघों पर बाल हों, जिसके गालों में हँसते-हँसते गड्ढे पड़ते हों और जिसके दाँत निकले हुए हों, ऐसी कन्याएं विवाह के लिए वर्जित की गई हैं।

याज्ञवलक्य स्मृति (ई.100 से ई.300 के बीच रचित) पर ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में लिखी गई विज्ञानेश्वर की टीका ‘मिताक्षरा’ के नाम से जानी जाती है। मिताक्षरा में कन्या में तीन गुणों का होना आवश्यक माना गया है- (1.) कन्या यवीयसी हो अर्थात् आयु में वर से कम हो, (2.) कन्या अनन्यपूर्विका हो अर्थात् जिसने पहले से किसी अन्य पुरुष के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित न किया हो और (3.) कन्या स्त्री अर्थात् माँ बनने के योग्य हो।

बाल-विवाह का प्रचलन

गृह्यसूत्रों ने विवाह विधि में त्रिरात्र-यज्ञ का विधान किया था। विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद पतिगृह में वधू के आ जाने पर भी वर-वधू को यह त्रिरात्र व्रत पालन करना होता था। इसमें वर-वधू लवण एवं क्षार युक्त भोजन नहीं करते थे, भूमि पर शयन करते थे। वे केवल दुग्धपान करते थे और सहवास से दूर रहकर पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते थे।

 त्रिरात्र व्रत के विधान से संकेत मिलता है कि इस काल में विवाह युवावस्था में होते थे। इस काल में कन्याओं के विवाह की आयु कम होने लगी थी। सूत्रग्रंथों एवं बाद के धर्मशास्त्रों के अनुसार कन्या का विवाह ‘रजस्वला’ की अवस्था से पूर्व कर दिया जाना चाहिए था। धर्मसूत्रकारों और स्मृतिकारों ने कन्या का विवाह 8 से 12 वर्ष की आयु में करने का विधान किया।

गौतम और पाराशर ने बारह वर्ष की आयु में रजोदर्शन होने पर तुरन्त कन्यादान का विधान किया। कतिपय गृह्यसूत्रों ने विवाह-योग्य कन्या का एक लक्षण ‘नग्निका’ बताया है। टीकाकारों ने इस शब्द की व्याख्या करते हुए विवाह योग्य कन्या की आयु 8 से 10 वर्ष बताई है।

विवाह में धन का महत्त्व

विवाह में धन का महत्त्व बढ़ने लगा था। आसुर-विवाह में कन्या के माता-पिता वर-पक्ष से धन लेते थे। ब्राह्म एवं दैव विवाह में कन्या का पिता अपनी पुत्री को भलीभांति अलंकृत करके उसका विवाह करता था।

नारी के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार

सूत्रकाल में भाई के न रहने पर भी स्त्री के उत्तराधिकार को स्वीकार नहीं किया गया। आपस्तम्ब ने व्यवस्था दी कि पुत्र के न होने पर पुत्री को उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार नहीं किया जाए अपतिु अपनी सम्पत्ति को धर्म के कार्य में व्यय किया जाए। उसने यह भी लिखा है कि यदि उत्तराधिकारी चुनना ही है तो पुत्र के अभाव में सपिंड बालक या शिष्य को उत्तराधिकारी बनाया जाए।

जब वह भी न हो तब पुत्री उत्तराधिकारी हो सकती है। वशिष्ठ, गौतम एवं मनु ने भी उत्तराधिकारी के रूप में पुत्री की नाम कहीं नहीं लिखा है। कौटिल्य ने पुत्र के न होने पर पुत्री को उत्तराधिकारिणी घोषित किया है, चाहे उसे कम ही हिस्सा क्यों न मिले।

स्मृतिकाल तक आते-आते कुछ व्यवस्थाकारों ने यह व्यवस्था स्वीकार कर ली कि यदि विधवा-स्त्री पुनर्विवाह नहीं करती है अथवा नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न नहीं करती है तो उस विधवा को मृत-पति की सम्पत्ति में हिस्सा पाने का अधिकार होगा। मनु ने स्त्री-धन का विस्तृत वर्णन किया है।

मनु के अनुसार स्त्री के छः प्रकार के धन हैं- (1.) माता द्वारा प्रदत्त धन, (2.) पिता द्वारा प्रदत्त धन, (3.) भाई द्वारा प्रदत्त धन, (4.) पति द्वारा प्रदत्त उपहार, (5.) विवाह के समय प्राप्त उपहार, (6.) विवाहोपरान्त पतिगृह से प्राप्त उपहार। इन उपहारों के साथ-साथ वधू शुल्क तथा पति द्वारा द्वितीय विवाह के अवसर पर प्रथम स्त्री को दिया गया धन भी स्त्री-धन में गिना जाता था जिसे पुरुष को नहीं लेना चाहिए। किन्तु स्त्री सम्पत्ति की स्वामिनी होने पर भी उसे पति की आज्ञा के बिना व्यय नहीं कर सकती थी।

याज्ञवलक्य ने पुत्री के हित में विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि पुत्र और विधवा के अभाव में पुत्री ही उत्तराधिकारी है। कन्या के पुत्र को हिस्से का चौथाई पाने की संस्तुति अनेक शास्त्रकारों ने की है। कात्यायन तथा भोज आदि धर्मशास्त्रकारों ने पुत्री के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकारों को मान्यता नहीं दी है। विष्णु और नारद ने कन्या के हिस्से का तो समर्थन किया है किंतु अपने हिस्से को ले जाने का अनुमोदन नहीं किया है। नारद का अभिमत है कि कन्या उतना ही हिस्सा प्राप्त करे जितना उसके अविवाहित रहने तक व्यय होता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय नारी की युग-युगीन स्थिति

वैदिक काल में नारी की स्थिति

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पौराणिक काल में नारी की स्थिति

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पौराणिक काल में नारी की स्थिति

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पौराणिक काल में नारी की स्थिति

पौराणिक काल में नारी की स्थिति वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल के समान ही अत्यंत संतोषजनक थी। पौराणिक काल में नारी अपने विवाह आदि के सम्बन्ध में निर्णय स्वयं ले सकती थी। उसे पर्दा नहीं करना पड़ता था।

पौराणिक काल

पौराणिक काल उस कालखण्ड को कहते हैं जिसमें पुराणों की रचना हुई। पुराणों में धर्म एवं अध्यात्म के साथ-साथ इतिहास एवं काल्पनिक कथाओं का समावेश हुआ है। पौराणिक काल कब आरम्भ हुआ और कब तक चलता रहा, इसके सम्बन्ध में इतिहासकार एक मत नहीं हैं।

पुराणों में वैदिक देवी-देवताओं का मानवीकरण किया गया है तथा रामायण एवं महाभारत कालीन राजाओं तथा योद्धाओं का दैवीकरण किया गया है। इस कारण बहुत से लोग पुराणों को वैदिक काल से लेकर महाकाव्य काल में रचा हुआ मान लेते हैं किंतु यह धारणा सही नहीं है।

बहुत से इतिहासकारों के अनुसार पौराणिक काल ईस्वी 300 से ईस्वी 600 तक चला। यदि हम भारतीय इतिहास के इसी कालखण्ड को पौराणिक काल स्वीकार करते हैं तो यह सम्पूर्ण कालखण्ड गुप्त साम्राज्य का कालखण्ड है। इस काल में गुप्त सम्राट मगध को राजधानी बनाकर भारत के विशाल क्षेत्र पर शासन कर रहे थे।

पौराणिक काल को गुप्त काल तक सीमित करना उचित नहीं है। पुराणों की रचना गुप्त शासकों के बाद भी होती रही। अतः हर्ष के शासनकाल को भी पौराणिक काल में समाहित करना चाहिए।

गुप्तकाल में नारी की स्थिति

भारतीय इतिहास में गुप्त काल धार्मिक पुनरुत्थान का काल है जिसमें वैदिक धर्म को भागवत् धर्म के रूप में प्रस्तुत किया गया तथा जन-सामान्य को रिझाने के लिए पौराणिक कथाओं की रचना की गई।

पौराणिक काल में नारी की शिक्षा

गुप्तकाल ई.275 से ई.550 तक विस्तृत था। विभिन्न पुराणों से ज्ञात होता है कि पौराणिक काल में नारी की स्थिति बहुत अच्छी थी। उन्हें वैदिक काल, स्मृतिकाल, सूत्रकाल, महाकाव्यकाल आदि प्राचीन कालों की ही तरह शिक्षा पाने का पूरा अधिकार था। पौराणिक काल में नारी शिक्षा के दो रूप थे- (1.) आध्यात्मिक और (2.) व्यावहारिक। आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करने वाली कन्याएँ ब्रह्मवादिनी होती थीं।

इस काल के साहित्य में वृहस्पति-भगिनी, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, मेना, धारिणी, संनति एवं शतरूपा आदि ब्रह्मवादिनी कन्याओं का उल्लेख हुआ है। ऐसी कन्याओं का उल्लेख भी मिलता है जिन्होंने अपनी तपश्चर्या से अभीष्ट की प्राप्ति की थी। उमा, पीवरी, धर्मव्रता आदि कन्याओं ने तपस्या के बल पर अपनी इच्छानुसार वर प्राप्त किया था।

व्यावहारिक शिक्षा ग्रहण करने वाली ऐसी कन्याओं का सन्दर्भ मिलता है जिन्होंने अपनी तपस्या के बल पर मनोनुकूल वर प्राप्त किया था। घर-गृहस्थी में रहने वाली कन्याएँ गृहस्थी के कार्यों में निपुण होती थीं। पूर्व-वैदिक-युगीन अपाला अपने पिता के कृषि कार्य में सहयोग प्रदान करती थी। उस युग की अधिकांश कन्याएँ गाय दुहना जानती थीं, इसलिए कन्याओं को ‘दुहिता’ कहा जाता था। वे सूत कातना, बुनना और वस्त्र सिलना जानती थीं एवं ललित कलाओं में निपुण होती थीं।

पौराणिक काल में नारी का विवाह

गुप्तकाल तक आते-आते भी कन्या के विवाह की स्थिति पूर्ववत् रही किंतु इस काल में गान्धर्व-विवाह (समाज से छिपकर किये गए प्रेम विवाह) के उल्लेख मिलते हैं जो युवती होने पर स्त्री के विवाह के द्योतक हैं।

हर्ष के काल में नारी की स्थिति

थानेश्वर के राजा हर्ष वर्द्धन का शासनकाल ई.606 से ई.647 तक रहा। हर्षकालीन ग्रंथों से अनुमान होता है कि हर्ष-काल तक आते-आते सामान्य परिवारों में नारी शिक्षा का प्रसार लगभग अवरुद्ध हो गया था किंतु समाज के अभिजात्य वर्ग की कन्याओं के लिए शिक्षा के द्वार इस काल में भी पूरी तरह खुले हुए थे। वे प्राकृत और संस्कृत काव्य, संगीत, नृत्य, वाद्य एवं चित्रकला में प्रवीण होती थीं।

हर्षकालीन कवि बाण ने ‘हर्षचरित्’ में लिखा है- ‘राज्यश्री नृत्य-गीत आदि में विदग्ध सखियों के बीच सकल कलाओं का प्रतिदिन अधिकाधिक परिचय प्राप्त करती हुई शनैःशनैः बढ़ रही थी।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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पूर्वमध्यकाल में नारी की स्थिति

पूर्वमध्यकाल में नारी की स्थिति से आशय गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद के भारत में नारी की स्थिति से है। इस काल में नारी की स्थिति वैदिक काल, महाकाव्यकाल, स्मृतिकाल तथा गुप्तकाल की नारी से बिल्कुल अलग थी।

भारत के इतिहास में हर्ष की मृत्यु अर्थात् ई.648 से लेकर मुसलमानों के भारत में शासन की स्थापना होने तक अर्थात् 1196 तक के काल को पूर्व मध्यकाल कहते हैं। इसे राजपूत काल भी कहा जाता है। बहुत से इतिहासकार ई.600 से ई.1300 तक के काल को पूर्वमध्यकाल मानते हैं।

हर्ष की मृत्यु के साथ ही भारतीय इतिहास में प्राचीन काल की समाप्ति होती है एवं मध्य-काल का आरम्भ होता है तथा भारतीय राजनीति के पटल से  प्राचीन क्षत्रिय लुप्त हो जाते हैं एवं राजपूत-युग आरम्भ होता है। इस कारण सातवीं शताब्दी ईस्वी से बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक के काल को भारतीय इतिहास में पूर्व-मध्य-काल एवं राजपूत-काल कहा जाता है।

इस काल तक आते-आते स्त्री के बहुत से अधिकार सीमित कर दिए गए और स्त्री को अनेक बन्धनों से बाँध दिया गया। विज्ञानेश्वर ने शंख का उद्धरण देकर टिप्पणी की कि वह बिना किसी से कहे और बिना चादर ओढ़े घर से बाहर न जाए, शीघ्रतापूर्वक न चले, बनिये, सन्यासी, वृद्ध वैद्य के अतिरिक्त किसी पर पुरुष से बात न करे, अपनी नाभि खुली न रखे, एड़ी तक वस्त्र पहने, अपने स्तनों पर से कपड़ा न हटाए, मुँह ढके बिना न हँसे, पति या सम्बन्धियों से घृणा न करे।

वह धूर्त, वेश्या, अभिसारिणी, सन्यासिनी, भाग्य बताने वाली, जादू-टोना या गुप्त विधियाँ करने वाली दुःशील स्त्रियों के साथ न रहे। इनकी संगति से कुलीन स्त्रियों का चरित्र भ्रष्ट हो जाता है। इस प्रकार स्त्री पर अनेक नियन्त्रण लग गए तथा वह सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक रूप से पुरुष के अधीन हो गई।

पूर्वमध्यकाल में नारी की शिक्षा

इस युग में अनेक प्रज्ञा-सम्पन्न स्त्रियाँ र्हुईं जिन्होंने काव्य, साहित्य एवं ललित कलाओं में विपुल योगदान किया। नौवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में मंडन मिश्र और शंकर के बीच हुए शास्त्रार्थ की निर्णायिका मंडन मिश्र की पत्नी ‘भारती’ थी, वह तर्क, मीमांसा, वेदान्त, साहित्य एवं शास्त्रार्थ विद्या में पारंगत थी।

नौवीं शताब्दी ईस्वी के अंत में कवि राजशेखर की पत्नी ‘अवन्ति सुन्दरी’ उत्कृष्ट कवयित्री और टीकाकार थी। इस युग में ऐसी स्त्रियाँ भी हुईं जो शासन-व्यवस्था और राज्य-प्रबन्ध में दक्ष होती थीं तथा शासक अथवा अभिभावक के अभाव में स्वयं शासन करती थीं।

पूर्वमध्यकाल में विवाह

पूर्व-मध्य कालीन समाज में अल्प-वय-विवाह का प्रचलन जोर पकड़ चुका था। इसका प्रमुख कारण भारत पर होने वाले विदेशी आक्रमण थे, विशेषकर इस्लाम के आक्रमण। विदेशियों ने भारतीय स्त्रियों से विवाह करने आरम्भ किए। धर्मशास्त्रकारों ने आर्य-रक्त की शुद्धता बनाए रखने तथा स्त्रियों के कौमार्य की रक्षा के उद्देश्य से बाल-विवाह का प्रावधान किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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मध्य काल में नारी की स्थिति

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मध्यकाल में नारी की स्थिति

मध्य काल में नारी की स्थिति प्राचीन काल की अपेक्षा बहुत अधिक खराब हो गई। इसका सबसे बड़ा कारण भारत में इस्लाम का शासन स्थापित हो जाना था। विदेशी आक्रांताओं के भय से नारी के लिए सार्वजनिक स्थलों पर जाना पुरुष-संरक्षण के बिना असंभव हो गया।

भारत के इतिहास में मध्य-काल विदेशी आक्रांताओं के भीषण आक्रमणों का काल है। इस काल में स्त्रियों की स्थिति में अत्यधिक गिरावट आई। संयुक्त परिवार में पुत्रियों को शिक्षा एवं सम्पत्ति के अधिकारों से वंचित कर दिया गया। वे परायी धरोहर समझी जाने लगीं। स्त्रियों का प्रमुख कार्य परिवार के सदस्यों की सेवा करने तक सीमित हो गया। मध्य-काल में नारी भोग की वस्तु समझी जाने लगी।

विदेशी आक्रांताओं के हाथों में पड़ने से बचने के लिए समाज में सती-प्रथा, जौहर, बाल-विवाह जैसी प्रथाओं को बढ़ावा मिला तथा कन्या-वध जैसी नई कुप्रथाओं ने जन्म लिया।

शिक्षा एवं सम्पत्ति के अधिकारों से पूर्णतः वंचित होने के कारण मध्य-काल में स्त्रियों की दशा इतनी गिर गई कि उसने पुरुष प्रधान समान के समस्त अंकुश चुपचाप स्वीकार कर लिए। परिवार की बड़ी-बूढ़ी अशिक्षित स्त्रियां स्वयं को धर्म की रक्षक समझकर अपनी ही विधवा बहुओं की शत्रु बन गईं।

जिस स्त्री के पेट से पुत्र का जन्म नहीं होता था, उसे भी परिवार की अन्य महिलाओं की प्रताड़ना सहन करनी पड़ती थी। घर की वृद्धाएं अपने पुत्रों को पुत्र प्राप्ति हेतु दूसरा विवाह करने के लिए उकसाती थीं।

पर्दा प्रथा, सती-प्रथा, बाल-विवाह, बहु-विवाह आदि कुरीतियों के पनप जाने के कारण इस युग के परिवारों में स्त्रियों का वह सम्मान नहीं रहा जो उसे वैदिक एवं उत्तरवैदिक-काल में प्राप्त था। अनमेल-विवाह के कारण बहुत सी स्त्रियों का जीवन नर्क बन गया क्योंकि वे प्रायः बहुत कम आयु में विधवा होकर अभिशप्त जीवन जीती थीं।

मध्य काल में नारी की स्थिति

भारत पर इस्लाम के आक्रमण ई.712 से आरम्भ हो गए थे किंतु ई.1192 तक इस्लामी आक्रांता सिन्ध एवं पंजाब के कुछ हिस्सों पर ही अपना शासन स्थापित कर पाए थे। ई.1192 में पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) की पराजय के बाद उत्तरी भारत के बहुत बड़े हिस्से पर इस्लामी शासन की स्थापना हो गई जो समय के साथ विस्तृत होती चली गई।

इस्लामी आक्रांता अपने साथ बलपूर्वक इस्लाम के विस्तार का उद्देश्य लेकर आए थे। भारतीय समाज को इस आंधी का सामना करने के लिए जो तैयारी करनी चाहिए थी, भारतीय समाज वह तैयारी नहीं कर सका। इस कारण हिन्दू समाज को सामाजिक वर्जनाओं की दीवारों में बंद किया गया ताकि हिन्दू जाति अपने धर्म एवं रक्त की शुद्धता को बचाए रख सके और वह आक्रांताओं के हाथों में न पड़ सके। इन वर्जनाओं के कारण मध्य काल में नारी की स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ा। उसकी स्वतंत्रताए शिक्षा और सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार सभी कुछ खतरे में पड़ गए।

पर्दा-प्रथा

मुस्लिम महिलाओं को अरब और तुर्किस्तान में हिजाब एवं बुर्के में रहना अनिवार्य था। भारत में भी मुस्लिम आक्रांताओं ने महिलाओं के लिए पर्दा अनिवार्य किया। एक ओर तो वे महिलाएं जो इस्लाम स्वीकार कर लेती थीं, हिजाब और बुर्के में बंद हो जाती थीं और दूसरी ओर हिन्दू महिलाएं भी यदि घर से बाहर निकलतीं तो अपने मुंह पर पर्दा डालती थीं और अपना शरीर चद्दर से अच्छी तरह ढंकती थीं ताकि किसी पुरुष की दृष्टि उसके मुंह एवं शरीर पर न पड़े। इस प्रकार मध्य काल में नारी पर्दे में बंद कर दी गई।

मुगल बादशाह अकबर ने भी स्त्री के सम्बन्ध में कठोर आदेश जारी किए- ‘यदि कोई नौजवान युवती गलियों एवं बाजारों में बगैर घूँघट के दिखाई दे या जान-बूझकर उसने पर्दे को तोड़ा है तो उसे वेश्यालय में ले जाया जाए और उसी पेशे को अपनाने दिया जाय।’

16वीं सदी के यात्री बरबोसा ने बंगाल की औरतों में पर्दा-प्रथा के प्रचलन का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘अमीर और शाही परिवारों में पुरुषों और औरतों के बीच संदेशवाहक का काम करने के लिए हिंजड़े रखे जाते थे। पर्दा-प्रथा के कारण, बीमार औरतों के इलाज के लिए भी मर्द चिकित्सक को शाही हरम एवं अमीरों के जनाने में प्रवेश नहीं दिया जाता था। औरतें अपने घरों से बहुत कम बाहर निकलती थीं। घर से बाहर निकलना अनिवार्य होने पर वे बांदियों तथा हिंजड़ों से घिरी हुई रहती थीं और पूरी तरह ढंकी हुई पालकी में बन्द होकर जाती थीं।’

यदि कोई मुसलमान महिला किसी कारण-वश थोड़े से समय के लिए भी पर्दा हटा लेती थी तो उसे भंयकर परिणाम भोगना पड़ता था। काबुल के गवर्नर अमीर खाँ ने अपनी औरत को केवल इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि वह हाथी के पागल हो जाने पर जान बचाने के लिए नीचे कूदते समय वह बेपर्दा हो गई थी।

किसी भी मुसलमान महिला को अपने पति की उपस्थिति में ही अपने अन्य पुरुष सम्बन्धी से बात करने की अनुमति थी। हिन्दू स्त्रियाँ अपने सम्बन्धियों से स्वतंत्रता पूर्वक बात करती थीं। इस काल में राजपूत औरतें युद्ध कला की शिक्षा ग्रहण करती थीं और प्रायः शिकार तथा अन्य अभियानों में भाग लेने के लिए महलों से बाहर निकला करती थीं। फिर भी समय के साथ राजपूत महिलाओं में भी पर्दा-प्रथा का बंधन कठोर होता चला गया।

बेटी का जन्म

मध्य काल में नारी की स्थिति उसके जन्म से ही खराब हो गई। मध्य-कालीन भारतीय परिवारों में बेटी का पैदा होना अशुभ समझा जाता था। टॉड ने लिखा है कि राजपूत कहते थे- ‘बेटी जन्म का दिन मेरे लिए अभिशाप स्वरूप है।’ परिवार में लड़की का लड़कों के समान आदर नहीं होता था। यह अन्तर शाही घरानों में भी व्याप्त था।

यदि किसी स्त्री के लगातार बेटियाँ होती थीं तो प्रायः ऐसी स्त्री को पति द्वारा छोड़ दिया जाता था। शाही परिवार में लड़की के जन्म पर केवल हरम में ही बेगम खुशी मनाती थी, जबकि पुत्र का जन्म पर होने वाले सामारोह में समस्त दरबारियों को शामिल किया जाता था।

जब मुस्लिम बादशाह एवं अमीर बलपूर्वक क्षत्रिय कन्याओं से विवाह करने लगे और ‘बेटी का बाप’ होना नीची दृष्टि से देखा जाने लगा तो राजपूत अपनी कन्याओं का वध करने लगे। कन्या-वध की प्रथा राजपूतों सहित कुछ अन्य योद्धा जातियों तक ही सीमित थी।

सामान्य परिवारों में लड़की पैदा होने की सूचना दाई इन शब्दों में देती थी- ‘थारे भाटो जलमियो है।’ अर्थात् तेरे घर में पत्थर ने जन्म लिया है। पुत्री के जन्म पर लोहे का तवा बजाया जाता था जबकि पुत्र के जन्म पर कांसे की थाली बजाकर पड़ौसियों को सूचित किया जाता था कि इस घर में पुत्र का जन्म हुआ है। लोहे का तवा घर की जिम्मेदारियों का सूचक था और इससे अशुभ ध्वनि उत्पन्न होती थी जबकि कांसे की थाली का शब्द घर के भोजन पर अधिकार का सूचक था और कांसे की थाली से मंगल-ध्वनि निकलती थी।

बाल-विवाह

भारत में बाल-विवाह का प्रचलन स्मृतिकाल से आरम्भ हो गया था किंतु मध्य-काल की राजनीतिक परिस्थितियों ने बाल-विवाह को अनिवार्य कर दिया। पुत्री को जन्म के बाद छः से आठ वर्षों से अधिक आयु तक अपने माता-पिता के घर रहना वर्जित माना जाता था। 16वीं सदी के बंगाली कवि मुकंदराय के अनुसार जो पिता अपनी पुत्री का नौ वर्ष की आयु में विवाह कर देता था, वह भाग्यवान तथा ईश्वर का कृपापात्र समझा जाता था।

कम आयु होने के कारण दूल्हा-दुल्हन अपना मन पसन्द जीवन साथी नहीं चुन पाते थे। वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष से दहेज की माँग की जाती थी। प्रायः माता-पिता वर-वधू की श्रेष्ठता पर विचार किए बिना ही, अच्छे दहेज के लालच में विवाह कर देते थे।

कई बार वधू पक्ष अधिक धन देकर अपनी बड़ी आयु की कन्या का विवाह कम आयु के दूल्हे से कर देता था। यह बुराई इतनी बढ़ गई थी कि अकबर को यह आदेश देना पड़ा कि स्त्री की आयु पति से बारह वर्ष अधिक हो तो उस विवाह को अमान्य कर दिया जोयगा। कुछ विशेष जातियों तथा क्षेत्रों में वर पक्ष, वधू पक्ष को धन देता था। कई बार वर पक्ष अधिक धन देकर कम आयु की रूपवती कन्या का विवाह प्रौढ़ एवं वृद्ध वर से करवा लेते थे।

मध्य-काल में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें राजपूत लड़कियों ने अपने विवाह की शर्तें स्वयं निर्धारित कीं। राव सुरताण की पुत्री ताराबाई ने शर्त रखी कि वह उसी नवयुवक से विवाह करेगी जो उसके पिता के राज्य को पठानों से मुक्त करा देगा। पृथ्वीराज के भाई जयमल ने यह शर्त स्वीकार करके ताराबाई से विवाह किया।

मोहिल सरदार की सुन्दर कन्या कर्मदेवी ने मंडोर के राव के उत्तराधिकारी से अपनी सगाई अस्वीकार करके पूगल के राजकुमार साधु की वधू बनना स्वीकार किया। जब औरंगजेब ने रूपनगढ़ की राजकुमारी चारुमति के लिए डोला भिजवाया तो चारुमति ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह को निमंत्रण भेजा कि वह चारुमति से विवाह करके चारुमति के धर्म की रक्षा करे। अतः स्पष्ट है कि क्षत्रिय राजपरिवारों में कन्याएं वयस्क होने पर विवाह करती थीं।

एक-पत्नी-प्रथा

यद्यपि वैदिक-काल में राजाओं तथा धनी लोगों में बहुपत्नी प्रथा प्रचलित थी किन्तु मध्य-काल में इस प्रथा का अत्यधिक विस्तार हो गया। बहुपत्नी प्रथा ने स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को और अधिक गिरा दिया।

मध्य-काल में हिन्दू तथा मुस्लिम समाज के निम्न वर्गों में एक पत्नी का प्रचलन था। अकबर के इबादतखाना में उलेमाओं ने व्यवस्था दी कि मुसलमान ‘निकाह’ के द्वारा चार तथा ‘मूता’ के द्वारा कितने भी विवाह कर सकता था। अकबर ने आदेश जारी किया कि कोई भी साधारण व्यक्ति एक स्त्री से अधिक नहीं रख सकता तथा पहली स्त्री के बांझ साबित होने पर ही दूसरी पत्नी रखने की अनुमति दी जा सकती थी।

बहु-विवाह की सुविधा केवल धनी मुसलमानों को प्राप्त थी जो प्रायः तीन-चार पत्नियां रखते थे। हिन्दुओं में राजा एवं धनी वर्ग को छोड़कर एक-पत्नी प्रथा प्रचलित थी। कुछ विशेष मामलों में और पहली स्त्री बांझ होने पर ब्राह्मणों की स्वीकृति लेकर दूसरा विवाह कर सकते थे।

ससुराल में स्त्री की स्थिति

पुत्री के विवाह का निर्णय माता-पिता द्वारा या परिवार के किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा लिया जाता था। विवाह का निर्णय करने में लड़की की इच्छा महत्त्व नहीं रखती थी। विवाह के बाद लड़की अपनी सास के नियंत्रण में रहती थी। यदि कोई कन्या अपनी सास की उम्मीदों के अनुरूप नहीं बन पाती थी तो मुसलमान परिवार उसे तलाक दे देता था।

हिन्दू परिवार में भी अवज्ञाकारी वधू को अच्छा नहीं समझा जाता था। यदि घर की बड़ी बहू अपनी सास से अलग रहती थी तो भी पारिवारिक मामलों में उसकी बात का महत्त्व होता था। श्वसुरगृह में नववधू का जीवन ‘मर्यादित आश्रित’ की भांति होता था। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके जहाँगीरी’ में लिखा है- ‘हिन्दुओं में मान्यता है कि कोई शुभकार्य स्त्री की उपस्थिति या सहयोग के बिना पूर्ण नहीं हो सकता, क्योंकि वह पुरुष की अर्धागिनीं समझी जाती है।’

पति-पत्नी एक-दूसरे का कहना मानते थे। यद्यपि पति का मत ही सर्वोपरि होता था तथापि उच्च-परिवारों की स्त्रियाँ विशेषतः राजपूतनियाँ अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करती थीं। यदि पति उपहास में भी किसी दूसरी स्त्री के सौन्दर्य की प्रशंसा करता था तो पत्नी रुष्ट हो जाती थी और दाम्पत्य जीवन कटु हो जाता था।

विधवा की स्थिति

मध्य काल में नारी की खराब स्थिति का सबसे बुरा प्रभाव विधवा स्त्री पर पड़ा। विवाह-विच्छेद एवं पुनर्विवाह मुसलमानों में साधारण बात थी किंतु हिन्दुओं में यह वर्जित था। मध्य-कालीन हिन्दू समाज में विधवा-विवाह पूर्णतः निषिद्ध था किंतु कुछ निम्न जातियां इसका अपवाद थीं। उच्च वर्ग में सती-प्रथा प्रचलित थी किंतु राजपूतों में यह प्रथा अधिक अनिवार्यता से लागू थी। जिस राजपूत लड़की की केवल सगाई होती थी वह भी अपने भावी पति की मृत्यु होने पर सती हो जाती थी।

जो विधवाएँ सती नहीं होती थीं, समाज द्वारा तिरस्कृत दृष्टि से देखी जाती थीं। उन्हें रंगीन वस्त्र, शृंगार, आभूषण, अच्छे भोजन, नरम बिस्तर, सार्वजनिक स्थलों पर उपस्थिति, मांगलिक कर्म आदि से वंचित करके रूखा-सूखा एवं मसाले रहित भोजन दिया जाता था। वे धरती पर सोती थीं तथा प्रायः अपना जीवन दासी के समान व्यतीत करती थीं। उनका दर्शन अलमंगलकारी माना जाता था।

स्त्री को विधवा होते ही अपने बाल कटवाने पड़ते थे ताकि उसकी सुन्दरता समाप्त हो जाए। उसे संन्यासी की तरह संयमपूर्वक रहना पड़ता था। उसके लिए मसाले वाला भोजन करना वर्जित हो गया क्योंकि इससे मन में कामेच्छा एवं बुरे विचार उत्पन्न होते हैं। वह रंगीन एवं अच्छे वस्त्र धारण नहीं कर सकती थी तथा किसी विवाहादि उत्सव में भाग नहीं ले सकती थी। परिवार में विधवा के रहने का स्थान भी अलग रखा जाने लगा।

सती-प्रथा

मध्य काल में नारी सती प्रथा की लपटों में घिर गई। इस प्रथा का शिकार केवल हिन्दू स्त्री हुई। मुहम्मद बिन तुगलक प्रथम मध्य-कालीन मुस्लिम शासक था जिसने बल-पूर्वक की जाने वाली सती-प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाया। उसके शासन में किसी विधवा को सती होने के पूर्व शाही आज्ञा प्राप्त करनी होती थी। सीदी अली रईस हुमायूँ के शासन काल में भारत आया था, वह ई.1553-1556 तक भारत में रहा। उसने लिखा है कि सुल्तान के अफसर यह देखने के लिए तत्परता से उपस्थित रहते थे कि किसी विधवा को उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं जलाया जाए।

अकबर ने भी बलपर्वूक सती किए जाने पर रोक लगा रखी थी। स्वयं अकबर ने कई बार हस्तक्षेप करके विधवाओं को जबरन जलाये जाने से बचाया। उसने आम्बेर नरेश भगवानदास की भांजी (जयमल की विधवा) की रक्षा की तथा उसके पुत्र को, जो उसे सती होने पर विवश कर रहा था, जेल में डाल दिया।

सोलहवीं एवं सत्रहवीं सदी के यूरोपियन यात्रियों डेलावेल, प्लेसार्ट तथा टवर्नियर ने भी उल्लेख किए हैं कि किसी विधवा को जलाये जाने के लिए गवर्नर से अनुमति लेनी अनिवार्य थी। जहाँगीर और शाहजहाँ ने भी अकबरकालीन व्यवस्था को बनाए रखा। औरंगजेब ने आदेश जारी करके सती-प्रथा को निषिद्ध कर दिया किन्तु इन आदेशों का प्रजा पर कोई असर नहीं हुआ और सती-प्रथा पहले की ही भाँति चलती रही।

माता के रूप में नारी की स्थिति

मध्य-काल में माता के रूप में नारी की स्थिति सम्मान-जनक थी। राजपूतों में माता के प्रति सम्मान की भावना बहुत प्रबल थी। मेवाड़ का महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) भोजन करने से पहले माता के दर्शन करता था। जब अकबर ने चितौड़ पर चढ़ाई की, तब फत्ता सिसोदिया ने अपनी माता से आज्ञा लेकर केसरिया बाना पहना और शत्रु से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। कई मुगल बादशाह माता की अगवानी करने थोड़ी दूर तक पैदल जाते थे। बादशाह अपने जन्मदिन पर शहजादों और दरबारियों के साथ माता से आशीर्वाद लेने जाता था।

मध्य काल में नारी की आर्थिक स्थिति

मध्य काल में नारी की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। हिन्दू महिला को अपने पीहर एवं ससुराल दोनों ही स्थानों से सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार प्राप्त नहीं थे। महिला को विवाह के अवसर पर दहेज में प्राप्त आभूषणों, बर्तनों एवं कपड़ों को स्त्री-धन माना जाता था। विधवा होने पर या परित्यक्ता होने पर स्त्री-धन के अतिरिक्त उसे कोई सम्पत्ति नहीं दी जाती थी।

ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैष्य परिवारों में स्त्री, धनार्जन की किसी भी गतिविधि में सम्मलित नहीं थी किंतु किसान और मजदूर वर्ग की स्त्रियाँ इस परमपरा की अपवाद थीं जो कृषि, पशु-पालन, मजदूरी, बुनाई, कढ़ाई, सिलाई आदि कामों में घर से बाहर जाकर भी पुरुषों के साथ काम करती थीं।

मुस्लिम-स्त्री को उत्तराधिकार के रूप में अपने पिता की सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त होता था। उसका यह अधिकार विवाह के बाद भी बना रहता था। विवाह के अवसर पर मुस्लिम-स्त्री के लिए मेहर की व्यवस्था थी। मध्य-काल में बंगाल में निराश्रित मुस्लिम महिलाओं ने नृत्य और गायन को अपना व्यवसाय बना लिया था।

मध्य-काल में विदुषी महिलाएँ

यद्यपि मध्य काल में नारी की स्थिति हर ओर से खराब थी किंतु समाज के उच्च वर्ग में महिला को कई अधिकार प्राप्त थे। ‘रघुनाथ अभ्युदय’ में ‘मधुरवाणी’ की लेखिका तथा ‘आन्ध्र रामायण’ की अनुवादक रामभदबा, ‘काव्य वरदंबिका परिणयम्’ की लेखिका तिरूमलंबा और ‘मारिची परिणयम्’ नामक प्रेम काव्य की लेखिका मोइनांगी मध्य-काल की प्रसिद्ध संस्कृत कवयित्रियाँ हैं। मध्य काल में नारी का, विशेषकर हिन्दू नारी का कोई स्थान नहीं था।मीरांबाई, देवलरानी, रूपमती, चारुमती आदि भी उस काल की विदुषी महिलाएं थीं।

इनकी साहित्यिक रचनाएं बड़ी संख्या में प्राप्त होती हैं। महाराष्ट्र की अकाबाई, केनाबाई और मुक्तिबाई तथा बंगाल की माधवबाई का नाम भी मध्य-कालीन भक्ति साहित्य में सर्वोपरि है। मुस्लिम महिलाओं में ‘हुमायूँनामा’ की लेखिका गुलबदन बेगम और ‘शिबिया तथा मुनिसाल अरवा की जीवनी’ की लेखिका जहाँनारा प्रमुख हैं। सलीमा सुल्ताना, नूरजहाँ, सितिउन्निसा (जहाँनारा की अध्यापिका) और जेबुन्निसा (औरंगजेब की बेटी) भी मध्य-कालीन मुस्लिम समुदाय की प्रबुद्ध महिलाएं थीं तथा उस काल की प्रसिद्ध कवयित्रियाँ थी।

मध्य-कालीन राजनीति में महिलाएँ

मध्य काल में नारी का, विशेषकर हिन्दू नारी का कोई विशेष स्थान नहीं था। किसी राजा का निधन हो जाने पर उसका पुत्र अथवा उसके कुल का निकटतम रक्त-सम्बन्धी पुरुष ही राज्य का उत्तराधिकारी होता था। स्वर्गीय राजा के उत्तराधिकारी के अल्पवय होने की अवस्था में उस अल्पवय राजा की माता या दादी, नए राजा की ओर से राज्यकार्य चलाती थी।

मेवाड़ के महाराणा विक्रमादित्य के अयोग्य शासक होने के कारण राजमाता कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता प्राप्त करने की चेष्टा की किंतु जब हुमायूं ने मेवाड़ की सहायता नहीं की तो कर्मवती ने पूर्व में मेवाड़ द्वारा मालवा के शासक महमूद खिलजी से छीने गए मालवा के समस्त जिले तथा सोना-चांदी देकर बहादुरशाह से संधि की। गोंडवाना की रानी दुर्गावती इस काल की प्रसिद्ध रानी हुई है जिसने अपने पति की मृत्यु के बाद अकबर से युद्ध जारी रखा और युद्धक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुई।

मराठा शासक राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी रानी ताराबाई (ई.1700-1707) ने मराठा राज्य का शासन संचालित किया। उसने औरंगजेब की सेनाओं से सफलतापूर्वक मोर्चा लिया। मराठा सूबेदार मल्हारराव होलकर की पुत्रवधू महारानी अहिल्याबाई (ई.1925-95) धर्म-पूर्वक शासन करने के लिए प्रसिद्ध हुईं। उन्होंने प्रजा की भलाई के लिए बहुत से कार्य किए।

मध्य काल की मुस्लिम महिला शासकों में दिल्ली की शासक रजिया सुल्ताना और अहमदनगर के अल्पवय शासक की संरक्षक चाँद बीबी का नाम उल्लेखनीय है। मकदुम-ओ-जहान ने बहमनी परिवार के निजामशाह की ओर से दक्कन का शासन सँभाला। अली मरदान की बेटी साहिबजी ने अपने पति की मृत्यु के बाद काबुल पर शासन किया। जहाँगीर के शासनकाल में उसकी बेगम नूरजहाँ ही समस्त शासकीय निर्णय लेती थी तथा बादशाह की मुहर भी नूरजहाँ के पास रहती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय नारी की युग-युगीन स्थिति

वैदिक काल में नारी की स्थिति

महाकाव्य काल में नारी की स्थिति

स्मृति काल में नारी की स्थिति

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ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति

आधुनिक काल में नारी की स्थिति

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति

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ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति में परिवर्तन अंग्रेजी शिक्षा, अंग्रेजी कानूनों एवं हिन्दू समाज सुधारकों के प्रयासों से आया। परम्परा के नाम पर नारी पर होने वाले अत्याचारों को दूर करने में बहुत लम्बा समय लगा।

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति में सुधार

अंग्रेजी शिक्षा का योगदान

अंग्रेजी शिक्षा के कारण तथा अंग्रेजी औरतों के रहन-सहन के कारण भारतीय लोगों के मन में नए विचारों का उदय हुआ। शिक्षित भारतीयों ने पर्दा-प्रथा को निरर्थक समझकर उसका विरोध किया। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों के प्रयत्नों का ही परिणाम था कि हजारों स्त्रियों ने पर्दा त्यागकर राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया।

थियोसोफिकल सोसायटी और दकन एजुकेशन सोसाइटी ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया। समाज के शिक्षित वर्ग ने स्त्री-शिक्षा के कार्यक्रम को पूर्ण सहयोग दिया तथा अपनी बालिकाओं को स्कूल भेजने में उत्सुकता दिखाई। अनेक स्थानों पर प्रातःकालीन निःशुल्क शिक्षण-संस्थाओं का प्रबन्ध किया गया।

ई.1854 में चार्ल्स वुड के शिक्षा सम्बन्धी सुझावों में स्त्री-शिक्षा के सम्बन्ध में भी परामर्श दिया गया था। यद्यपि ब्रिटिश सरकार स्त्री-शिक्षा के प्रति उदासीन रही, फिर भी 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में लड़कियों की शिक्षण-संस्थाओं में वृद्धि होने लगी। ई.1882 में हण्टर आयोग ने बालिकाओं की शिक्षा के लिए स्थानीय संस्थाओं को अनुदान दिया।

ब्रिटिश सरकार द्वारा सुधार

18वीं और 19वीं शताब्दी के बीच अंग्रेज अधिकारियों ने सती-प्रथा, बाल-विवाह, कन्या वध, दास-प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए अनेक कानून बनाए। उन्होंने विधवा-पुनर्विवाह को वैध घोषित किया। विलियम बैंटिक के समय समाज सुधार पर विशेष जोर दिया गया। जनवरी 1832 में विलियम बैंटिक ने अजमेर दरबार के दौरान राजपूताने के राजाओं एवं ब्रिटिश अधिकारियों को नयी सामाजिक नीति अपनाने के लिये प्रेरित किया।

इस तरह के आयोजन उस समय देश के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में आयोजित किए गए। ई.1857 की क्रांति के बाद समाज सुधार कानूनों को लागू करने में ढील दी गई क्योंकि ई.1858 में महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की थी कि सरकार भारतीय जनता के धार्मिक एवं सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी।

सती-प्रथा का निषेध

ब्रिटिश सरकार ने ई.1813 और ई.1817 में सती-प्रथा रोकने के लिए आदेश प्रसारित किए तथा अंग्रेज अधिकारियों को अधिकार दिए कि अवयस्क या गर्भवती स्त्री को सती होने से रोका जा सकता है और सती होने के लिए जोर-जबर्दस्ती किए जाने पर भी स्त्री को सती होने से रोका जा सकता है। ये आज्ञा-पत्र केवल शासकीय आदेश थे, कानून नहीं थे। इस कारण सती-प्रथा को रोकने में प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुए।

बंगाल में राजा राममोहनराय के नेतृत्व में भारतीयों का एक प्रगतिशील समूह सती-प्रथा को समाप्त करने हेतु आन्दोलन कर रहा था। इसलिए गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने 4 दिसम्बर 1829 को एक सरकारी आज्ञा द्वारा सती-प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर दिया। ई.1830 में बम्बई एवं मद्रास में भी यह कानून लागू कर दिया गया जिसके अनुसार सती होना निषिद्ध कर दिया गया एवं सती होने में किसी प्रकार की सहायता देना दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया गया।

रूढ़िवादी तत्वों ने इस कानून का जबरदस्त विरोध किया किंतु राजाराममोहन राय के प्रयत्नों से यह कानून समाप्त नहीं हुआ। कुछ वर्षों में यह कानून देशी राज्यों में भी लागू हो गया। 26 अप्रेल 1846 को जयपुर संरक्षक परिषद ने जयपुर राज्य में सती-प्रथा को दण्डनीय अपराध घोषित किया। ई.1856 के अंत तक मेवाड़ को छोड़कर राजस्थान के सभी राज्यों में इस बुराई को पूर्णतः समाप्त कर दिया गया। ई.1861 तक लगभग सारे भारत में सती-प्रथा पर रोक लगा दी गई जिससे सती होने की घटनाएं कम होती चली गईं। वर्तमान समय में यह प्रथा पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है। 

बाल-विवाह पर प्रतिबन्ध

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति सुधारने के लिए बाल-विवाह पर रोक लगाना एक बहुत बड़ा कदम था। हालांकि अंग्रेजी राज में इस लक्ष्य को पूर्णतः प्राप्त नहीं किया जा सका।

बाल-विवाह पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए ई.1860 में भारतीय दण्ड विधान में लड़की के लिए दाम्पत्य सहवास की न्यूनतम आयु 10 वर्ष निश्चित की गई परन्तु इस आयु की लड़कियों से सहवास के भीषण परिणामों को देखते हुए इस आयु को बढ़ाने की मांग की जाने लगी। सरकार का विचार था कि शिक्षा के द्वारा समाज में स्वतः जाग्रति आएगी और बाल-विवाह स्वयं समाप्त हो जाएगा।

इस पर बहरामजी मलबारी इंग्लैण्ड गए और वहाँ के समाचार पत्रों में अपने लेखों एवं भाषणों से सरकार का ध्यान आकर्षित किया। समाज सुधारक के. टी. तैलंग ने कहा कि कन्या के सहवास की आयु निर्धारित करने में सुधार की आवश्यकता अधिक है न कि विवाह की आयु निश्चित करने की। मलबारी के एक मित्र दयाराम गिदूमल ने सुझााव दिया कि दाम्पत्य सहवास की आयु 10 वर्ष से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी जाय।

जब सरकार सहवास के लिए न्यूनतम आयु पर विचार कर रही थी, तब सरकार के विरोधी सक्रिय हो उठे। उन्होंने सरकार द्वारा हिन्दू विवाह प्रथाओं को सुधारना राष्ट्रीय गौरव के लिए अपमानजनक कहा। लोकमान्य तिलक ने बम्बई प्रेसीडेन्सी में कहा कि विवाह की आयु पर नियंत्रण हो किंतु इसके लिए कानून की नहीं अपितु शिक्षा की आवश्यकता है।

रानाडे कानून द्वारा विवाह की आयु निर्धारित करने के पक्ष में थे। महादेव रानाडे दाम्पत्य सहवास की आयु 14 वर्ष करने के पक्ष में थे। उन्हीं दिनों एक ग्यारह वर्षीय बालिका फूलमणी दासी के साथ उसके पति ने ऐसा पाशविक सहवास किया कि उसकी मृत्यु हो गई। फूलमणी के पति पर हत्या का मुकदमा सलाया गया किन्तु वह ई.1860 के कानून का सहारा लेकर छूट गया जिसमें दाम्पत्य सहवास की आयु 10 वर्ष निश्चित की गई थी।

इस घटना ने सरकार को सहवास की न्यूनतम आयु का पुनर्निर्धारण करने के लिए विवश कर दिया। 19 मार्च 1821 को सरकार ने सहवास-वय विधेयक पारित कर दिया जिसके अनुसार लड़कियों के लिए सहवास-वय न्यूनतम 12 वर्ष निर्धारित की गई।

लोकमान्य तिलक ने इस कानून का विरोध किया, क्योंकि सहवास-वय का निर्धारण सरकार द्वारा किया गया था। तिलक का कहना था कि इस प्रकार के प्रतिबन्ध स्वयं समाज द्वारा लगाए जाएं तथा विदेशी सरकार भारतीयों के सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप न करे। बिल पर वाद-विवाद के बाद जन-सामान्य इसे भूल गया तथा बाल-विवाह पहले की तरह होने लगे।

कन्या-वध पर रोक

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति में सुधार लाने हेतु कन्या-वध पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया। हालांकि अंग्रेजी राज में इस लक्ष्य को भी पूर्णतः प्राप्त नहीं किया जा सका।

मध्य-कालीन समाज में राजपूतों और जाटों सहित कुछ जातियों में कन्या-वध की प्रथा प्रचलित थी। यह कुप्रथा विशेषतः राजपूतों के साथ जुड़ी हुई थी किंतु जहाजपुर के मीणों, मेरों और भरतपुर के मेवों तथा जाटों में भी इस प्रथा का प्रचलन था। जिन जातियों में यह प्रथा प्रचलित थी, उन जातियों के शासक परिवारों एवं सामंत परिवारों में यह प्रथा प्रचलित नहीं थी।  इस अमानवीय कुप्रथा का पता अंग्रेज अधिकारियों को सर्वप्रथम ई.1789 में लगा।

ई.1795 तथा ई.1804 के कानूनों में ब्रिटिश प्रदेशों में कन्या-वध, हत्या का अपराध घोषित किया गया किंतु यह कुरीति निर्बाध रूप से चलती रही। ब्रिटिश अधिकारियों ने लोगों पर दबाव डालकर इस क्रूर कार्य को रोकने का प्रयास किया। जॉन लुडलो, जॉन सदरलैंण्ड, विलकिंसन आदि अंग्रेज अधिकारियों के प्रयत्नों के फलस्वरूप राजपूताना के राज्यों में भी ई.1831 के आसपास कन्या-वध को गैर कानूनी घोषित किया गया।

ई.1834 में कोटा एवं मेवाड़ राज्य ने कन्या-वध को प्रतिबंधित किया। ई.1837 में बीकानेर राज्य में एवं ई.1839 में जोधपुर राज्य में इस प्रथा को रोकने के लिए कुछ नियम बने।

ई.1844 में राजपूताना के ए.जी.जी. सदरलैण्ड, जयपुर में पॉलिटिकल एजेण्ट लुडलो तथा नीमच के पॉलिटिकल एजेण्ट रॉबिन्सन के संयुक्त प्रयासों के परिणाम स्वरूप राजस्थान के सभी राज्यों में कन्यावध को गैर-कानूनी घोषित किया गया। इस काल में कन्यावध का कारण दहेज प्रथा नहीं अपितु त्याग-प्रथा थी।

कन्या के पिता को अपनी कन्या का विवाह करवाने के लिए चारण तथा भाटों को बड़ी रकम समर्पित करनी होती थी जिसे त्याग कहते थे। इस त्याग की राशि से बचने के लिए राजपूत अपनी कन्याओं को मार डालते थे। ई.1843 में अंग्रेजों ने राजपूताने के राज्यों में यह आज्ञा प्रचारित करवाई कि जिस जागीरदार राजपूत की वार्षिक आय 1000 रुपये या उससे अधिक होगी वह अपनी कन्या के विवाह पर त्याग के रूप में चारण को 25 रुपये तथा भाट को 9 रुपये देगा।

भोमिये राजपूत, चारण को 10 रुपये तथा भाट को 5 रुपये देंगे। सामान्य राजपूत चारण को 5 रुपये तथा भाट को 4 रुपये देंगे। इस आदेश को पत्थरों पर खुदवाकर राज्यों की परगना कचहरियों के समक्ष प्रदर्शित किया गया। ई.1877 में हितैषिणी सभा उदयपुर ने तय किया कि केवल वही राजपूत त्याग की रकम देंगे जिनकी वार्षिक आय 500 रुपये से अधिक हो। यह रकम उस राजपूत की वार्षिक आय की 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।

पुत्र तथा पुत्री के विवाह के उपलक्ष्य में कोई भी राजपूत अपनी वार्षिक आय का 25 प्रतिशत तक व्यय कर सकता है। मेवाड़ राज्य में बाहर से आए चारणों को त्याग नहीं दिया जाएगा। ब्राह्मणों एवं महाजनों को भी सूचित किया गया कि वे भी अपनी पुत्री के विवाह में अपनी वार्षिक आय का अधिकतम 25 प्रतिशत ही व्यय करें।

19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिश प्रदेशों में कन्या-वध की कुप्रथा कम हुई किंतु राजपूताना की रियासतों में निर्बाध रूप से चलती रही। ई.1870 में एक कानून पारित करके प्रत्येक बच्चे के जन्म का पंजीकरण करवाना अनिवार्य किया गया। उन क्षेत्रों में जहाँ कन्या-वध अधिक प्रचलित था, समय-समय पर कन्याओं की गणना करके पता लगाया जाता था कि वहाँ अब भी कन्या-वध तो नहीं किया जा रहा है फिर भी 19वीं सदी में अकेले जोधपुर राज्य में कन्या-वध की प्रतिवर्ष 300-400 घटनाएं होती थीं।

विधवा-पुनर्विवाह

भारतीय संस्कृति में विधवा विवाह को हेय दृष्टि से देखा जाता था। इस कारण कम आयु में विधवा हो जाने वाली स्त्रियों को नारकीय जीवन जीना पड़ता था। ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति में सुधार लाने हेतु विधवा विवाह को प्रोत्साहन दिया गया।

विधवा-पुनर्विवाह की मांग 16वीं सदी से हो रही थी जब बंगाल के रघुनन्दन भट्टाचार्य ने अपनी विधवा-पुत्री का पुनर्विवाह करने का असफल प्रयास किया था। 18वीं शताब्दी में विक्रमपुर निवासी राजा राजवल्ल्भ ने अपने नवयुवती विधवा कन्या का पुनर्विवाह करने का प्रयास किया किन्तु वे सफल नहीं हुए। 19वीं शताब्दी में विधवा-पुनर्विवाह आन्दोलन ने जोर पकड़ा।

14 मार्च 1835 के ‘समाचार दर्पण’ में कुलीन ब्राह्मण परिवारों की कुछ अविवाहित कन्याओं ने अपने लेखों द्वारा समाज में विधवा स्त्रियों की दुःखद स्थिति का वर्णन करते हुए विधवा-पुनर्विवाह का समर्थन किया और आशा प्रकट की कि ब्रिटिश सरकार इस दिशा में सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाएगी। बम्बई के कुछ समाचार पत्र भी विधवा-पुनर्विवाह का प्रचार कर रहे थे।

बंगाल के महान् समाज सुधारक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने, रूढ़िवादियों के कट्टर विरोध के बावजूद इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया। जनवरी 1854 में उन्होंने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने प्रमाणों के द्वारा सिद्ध किया कि विधवा-पुनर्विवाह शास्त्र सम्मत है। उनके विरोध में रूढ़िवादी पंडितों ने पुस्तकें लिखीं किंतु वे विद्यासागर को विचलित नहीं कर सके।

विद्यासागर ने 984 व्यक्तियों के हस्ताक्षरों से एक प्रार्थना पत्र सरकार के पास भेजा जिसमें विधवा-पुनर्विवाह को वैध घोषित करने की मांग की गई। बंगाल के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी ऐसे ही प्रार्थना पत्र सरकार के पास भेजे। दूसरी ओर रूढ़िवादी पंडितों ने भी हजारों व्यक्तियों के हस्ताक्षरयुक्त प्रार्थना पत्र भिजवाए कि विधवा-पुनर्विवाह शास्त्रसम्मत नहीं है किंतु विद्यासागर व अन्य सुधारकों के प्रयत्नों से सरकार ने 26 जुलाई 1856 को विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित कर दिया।

इस कानून के द्वारा विधवा-पुनर्विवाह को वैध घोषित कर दिया। विद्यासागर ने इस कानून के पारित होने के तीन माह के अन्दर विधवा-विवाह सम्पन्न कराया। इसके बाद कई विधवा-विवाह सम्पन्न हुए। विष्णुशास्त्री ने बम्बई में ‘विधवा सहायक सभा’ के माध्यम से विधवा-पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया। इस पर भी हिन्दू समाज में विधवा-पुनर्विवाह बहुत कम हुए क्योंकि विधवा स्त्री, पुनर्विवाह करने पर अपने पूर्व-पति की सम्पत्ति में अपना अधिकार खो देती थी।

डाकन-प्रथा पर रोक

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति में सुधार लाने हेतु डाकन.प्रथा पर रोक लगाई गई। हालांकि अंग्रेजी राज में इस लक्ष्य को पूर्णतः प्राप्त नहीं किया जा सका।

भारत की अनेक जातियों में, विशेषकर  आदिवासी एवं जनजातियों में यह अमानवीय प्रथा प्रचलित थी। भारत सरकार ने अंग्रेज अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे स्थानीय शासकों पर दबाव डालकर इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित करवायें। चूँकि राजपूताना के आदिवासी क्षेत्रों में इस प्रथा का अधिक प्रचलन था, अतः राजपूताना के राज्यों, विशेषकर मेवाड़ और कोटा के शासकों पर दबाव डाला गया। 19वीं सदी के मध्य में सर्वप्रथम कोटा राज्य ने इस प्रथा को गैर-कानूनी एवं दण्डनीय अपराध घोषित किया।

अक्टूबर 1853 तक ए.जी.जी. के निर्देश पर महाराणा मेवाड़ को छोड़कर सभी शासकों ने डाकन-प्रथा को गैरकानूनी करार देकर असहाय की सहायता के लिये प्रेरित किया।

मेवाड़ का महाराणा स्वयं डाकन-प्रथा में विश्वास करता था फिर भी अंग्रेजों के दबाव से मेवाड़ में डाकन-प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया तथा कानून का उल्लंघन करने वालों को छः मास के कारावास का प्रावधान किया। फिर भी मेवाड़ में यह कुप्रथा समाप्त नहीं हुई। निर्दोष विधवाओं एवं वृद्धाओं को अपने रास्ते से हटाने के लिए उन्हें धड़ल्ले से डाकन घोषित किया जाता रहा और उनकी हत्याएं होती रहीं, सरकार उन हत्यारों को दण्डित भी करती रही।

19वीं शताब्दी के अन्त में मेवाड़ के रेजीडेन्ट कर्नल वाल्टर ने इस कुप्रथा से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और आदिवासियों के मुखियाओं को सौगन्ध दिलवाई कि वे किसी स्त्री के डाकन होने का संदेह होने पर उसकी हत्या नहीं करेंगे अपितु वे इसकी शिकायत सरकार से करेंगे और सरकार ही उस डाकन को दण्डित करेगी। इस सौगन्ध को भंग करने वालों को सरकार दण्डित करेगी।

मगरापाल के आदिवासी प्रतिनिधियों ने रिखबदेव में वाल्टर को डाकन-प्रथा पर रोक लगाने की सहमति प्रदान की तथा भविष्य में इस अपराध में संलिप्त अपराधियों को स्वयं पकड़कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का भी वचन दिया। इस प्रकार की कार्यवाही अन्य स्थानों पर भी की गई। समय के साथ यह कुप्रथा कमजोर पड़ गई। वर्तमान समय में यह पूरी तरह समाप्त हो गई है।

दासी-प्रथा पर रोक

देशी राजा, सामन्त तथा अन्य धनी लोग निर्धन लड़कियों को खरीद कर अपनी बेटियों की शादी में दासियों के रूप में दहेज के साथ भेजते थे। घरेलू दास-दासी अमीर लोगों के घरों में वंशानुगत सेवक के रूप में कार्य करते थे। इन्हें गोला, गोली, दावड़ी, वड़ारन, दरोगा, चाकर हजूरिया, दास, खानजादा, चेला आदि नामों से सम्बोधित किया जाता था। इनका जीवन बड़ा कठिन होता था।

उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी स्वामी तथा उसके परिवार की सेवा करनी पड़ती थी तथा स्वामी की लड़कियों के दहेज में जाना होता था। इस सब के बदले में उन्हें साधारण भोजन एवं वस्त्र प्राप्त होते थे। राजमहलों, सामन्तों की हवेलियों तथा सम्पन्न लोगों के यहाँ दासियों का दैहिक शोषण किया जाता था। ई.1833 के चार्टर एक्ट द्वारा ब्रिटिश भारत में दास-दासी प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया किंतु देशी राज्यों में यह प्रथा चलती रही।

ब्रिटिश अधिकारियों के दबाव देने पर ई.1839 में जयपुर राज्य की संरक्षक परिषद के अध्यक्ष जो कि ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट भी था, ने जयपुर राज्य में दास-व्यापार को प्रतिबंधित किया तथा दासों के गोला-गोली जैसे अपमानजनक सम्बोधनों पर रोक लगाई।

1 दिसम्बर 1840 को जोधपुर राज्य में भी दास व्यापार को प्रतिबंधित किया गया। राजपूताने के समस्त शासक ई.1848 में इस बुराई को समाप्त करने के लिए सहमत हो गए किंतु अधिकांश देशी राज्यों ने इस कुप्रथा पर ई.1862-63 तक रोक नहीं लगाई।

उन्नीसवीं सदी के अंत में पुष्कर में गौरीशंकर ओझा के सभापतित्व में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें गोला कहे जाने वाले समुदाय के लगभग 200 व्यक्ति उपस्थित हुए। सम्मेलन में उपस्थित लोगों में अपने स्वामियों का इतना अधिक भय था कि उन्होंने इस सम्मेलन में केवल एक ही प्रस्ताव पारित किया कि उन्हें गोला न कहकर रावणा-राजपूत कहा जाए।

अंग्रेज अधिकारी दास-प्रथा को समाप्त करने में विशेष सफलता अर्जित नहीं कर पाए क्योंकि राजपूताना के शासक एवं सामंत हर हाल में इस प्रथा को बनाए रखना चाहते थे। ई.1916 में जोधपुर राज्य की ओर से एक अधिसूचना जारी की गई कि घरेलू दासों के स्वामी उन्हें खाना, कपड़ा और विवाह, जन्म तथा मृत्यु का व्यय प्रदान करते हैं, इसलिए स्वामियों को दासों से काम लेने तथा अपनी पुत्रियों की शादी में दासों की पुत्रियों को दहेज में देने का पूरा अधिकार है।

ई.1921 की जनगणना के अनुसार राजपूताने में घरेलू दास-दासियों की संख्या 1,60,755 थी। इनमें से आधे दास ऐसे थे जिनका जन्म अपने मालिक के घर में हुआ था। अंत में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते ई.1926 में जोधपुर राज्य ने दास-प्रथा पर रोक लगाई किंतु यह प्रथा देश के आजाद होने तक अघोषित रूप से चलती रही।

लड़के-लड़कियों के क्रय-विक्रय पर रोक

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति में सुधार लाने हेतु लड़के-लड़कियों के क्रय-विक्रय पर रोक लगाई गई। हालांकि अंग्रेजी राज में इस लक्ष्य को भी पूर्णतः प्राप्त नहीं किया जा सका।

राजपूत रियासतों सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बच्चों के क्रय-विक्रय की कुप्रथा प्रचलित थी। राजपूताने में बंजारा जाति अनाज तथा नमक के साथ-साथ बच्चों को खरीदने एवं बेचने का काम करती थी। राजपूताने में बच्चों को खरीदने वाले लोगों की संख्या काफी थी। कुछ लोग इन बच्चों को दास-दासी के रूप में अपनी कन्या के दहेज में दिया करते थे।

कुछ जोगी-जोगड़े अपने चेलों की संख्या बढ़ाने के लिए बच्चे खरीदते थे। कुछ लोग वेश्यावृत्ति करवाने के लिए लड़कियों को खरीदते थे। कुछ सम्पन्न सामंत इन्हें अपनी रखैल के रूप में रखते थे। एक बार मेवाड़ राज्य के भैरजी नामक आदमी ने ब्रिटिश प्रशासित क्षेत्र से 54 रुपये में 11 वर्ष की लड़की खरीदी। जब अंग्रेजों को उसका पता लगा तो उन्होंने महाराणा को लिखा कि वह भैरजी से लड़की छुड़वा कर वापिस उसके घर वालों को सौंपे।

इस पर महाराणा ने जवाब दिया कि भैरजी ने कोई गलत काम नहीं किया है। राज्य में यह प्रथा प्रचलित है। ई.1838 में कोटा के रामचंद्र ने अपना पुत्र 15 रुपये में बेचा। बच्चों के बेचने से जो रकम प्राप्त होती थी उसका 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य कोष में कर के रूप में जमा करवाया जाता था। रामचंद्र ने 6 रुपये राजकोष में जमा करवाए। अंग्रेजों को इस घृणित कार्य का पता चल गया। उन्होंने इस प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया।

राजपूताना की अधिकांश रियासतों ने ई.1847 में लड़के-लड़कियों के क्रय-विक्रय को असंवैधानिक घोषित किया। जयपुर संरक्षण परिषद ने 5 फरवरी 1847 को जयपुर राज्य में नागाओं, दादूपंथियों, सादों इत्यादि द्वारा चेला बनाने के लिये की जाने वाली बच्चों की खरीद को असंवैधानिक घोषित किया। कोटा राज्य में ई.1862 तक बच्चों को खरीदना-बेचना जारी रहा। धीरे-धीरे इस प्रथा पर पूर्णतः रोक लग गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय नारी की युग-युगीन स्थिति

वैदिक काल में नारी की स्थिति

महाकाव्य काल में नारी की स्थिति

स्मृति काल में नारी की स्थिति

पौराणिक काल में नारी की स्थिति

पूर्वमध्यकाल में नारी की स्थिति

मध्य काल में नारी की स्थिति

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति

आधुनिक काल में नारी की स्थिति

आधुनिक काल में नारी की स्थिति

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आधुनिक काल में नारी

यह सामान्य प्रचलित धारणा है कि आधुनिक काल में नारी की स्थिति पहले के समस्त कालों की अपेक्षा बहुत अच्छी है किंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। नारी की जितनी अच्छी स्थिति वैदिक काल में थी, उतनी अच्छी स्थिति आधुनिक काल में नहीं है।

भारतीय इतिहास में आधुनिक काल का आशय मुगल शासन की समाप्ति होकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनारम्भ से लेकर वर्तमान समय से है। अंग्रेजों ने देशी शासकों को परास्त करके देश में दो प्रकार की शासन व्यवस्थाएं स्थापित कीं। पहली व्यवस्था में अंग्रेजों ने अपने द्वारा विजित क्षेत्रों को ब्रिटिश भारत कहा। देश के इस हिस्से पर अंग्रेजों के बनाए कानून लागू होते थे।

दूसरे हिस्से को रियासती भारत कहा जाता था। इस हिस्से में छोटे-छोटे राज्य थे जिनमें राजाओं एवं नवाबों का शासन था। इन राज्यों को अधीनस्थ संधियों के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता के अधीन लाया गया जिनमें पॉलिटिकल एजेंटों के माध्यम से अंग्रेजी कानून लागू करवाए जाते थे।

अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय समाज में नारी का जीवन अत्यंत कठिन था। समाज में दहेज-प्रथा का प्रचलन था। विधवाओं का जीवन अंधकारमय था। पुरुषों में बहु-विवाह प्रचलित था तथा एक पत्नी की मृत्यु होने पर उसे दूसरा विवाह करने की छूट थी किंतु स्त्रियाँ पुनर्विवाह नहीं कर सकती थीं।

अंग्रेजों ने भारत में परम्परागत रूप से चली आ रही कुप्रथाओं यथा, सती-प्रथा, बाल-विवाह प्रथा, पर्दा-प्रथा, कन्या-वध, अनमेल-विवाह प्रथा, दहेज प्रथा, देवदासी प्रथा, चेला बनाने की प्रथा, दास-प्रथा, बच्चों के बेचने की प्रथा आदि अनेक सामाजिक कुरीतियों को रोकने के लिए कानून बनाए।

आधुनिक काल में नारी की स्थिति

सती-प्रथा

भारत में सती-प्रथा के उल्लेख महाभारत काल से मिलने लगते हैं। अधिकांश स्मृतियों में पतिव्रता स्त्री के लिए सती होना ही स्वर्गीय मार्ग बताया गया। संभवतः सती-प्रथा के आरम्भ में स्त्रियाँ धार्मिक भावना से प्रेरित होकर स्वेच्छा से सती हो जाया करती थीं। सती हो चुकी स्त्री को समाज में देवी माना जाता था। फिर भी प्राचीनकाल में सती होना अनिवार्य नहीं था।

राजा दशरथ की मृत्यु पर कोई भी रानी सती नहीं हुई थी। राजा पाण्डु के निधन के बाद केवल छोटी रानी माद्री सती हुई थी किंतु बड़ी रानी कुंती सती नहीं हुई। मध्य-काल आते-आते समाज में यह धारणा प्रचलित हो गई कि विधवा होने पर स्त्रियाँ सच्चरित्र नहीं रह पाएंगी। इसलिए कुल की मर्यादा बचाने के उद्देश्य से उसे सती होने पर विवश किया जाता था।

सती होने की इच्छुक न होने पर भी उसे चिता के साथ बाँध दिया जाता था और जब वह जलती हुई चिता से भागने का प्रयत्न करती तो परिवार के लोग उसे बाँस से पीटते हुए चिता की ओर धकेल देते थे। स्त्री का क्रन्दन किसी को सुनाई न पड़े, इसके लिए जोर-जोर से ढोल बजाए जाते थे। कुछ मध्ययुगीन शासकों ने इस कुप्रथा को समाप्त करने के प्रयत्न किए किन्तु यह कुप्रथा चलती रही।

18वीं सदी के उत्तरार्द्ध तथा 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में बंगाल, राजस्थान, पंजाब आदि राज्यों में बड़ी संख्या में स्त्रियाँ सती होती थीं। इस प्रकार आधुनिक काल में भी नारियों को बड़ी संख्या में सती होने पर विवश किया गया।

कन्या-वध

भारत में प्राचीन काल से कन्या का जन्म अच्छा नहीं माना जाता था। पातंजलि ने भाष्य में लिखा है- ‘पुत्र प्रकाश के समान है और पुत्री संकट का स्रोत है।’ राजपूत परिवारों में कन्या का पैदा होना अच्छा नहीं मानते थे। कन्या के विवाह पर वर-पक्ष को दहेज देना पड़ता था। कन्या के विवाह के अवसर पर चारण, ढोली एवं भाट कन्या के पिता से ‘त्याग’ एवं ‘नेग’ के रूप में बड़ी राशि की मांग करते थे।

त्याग एवं नेग नहीं देने पर कन्या के पिता को समाज में नीचा देखना पड़ता था। इन अप्रिय परिस्थितियों से बचने के लिए अधिकांश कन्याओं को जन्मते ही मार दिया जाता था। आधुनिक युग के प्रारम्भ में यह कुप्रथा जोरों पर थी। कन्या के जन्म लेते ही उसे अफीम देकर या गला दबाकर या माता के स्तन पर विष लगाकर मार देते थे। 18वीं सदी के अन्त तक इस प्रथा पर स्वैच्छिक रोक लगनी आरम्भ हो गई।

डाकन-प्रथा

मध्ययुग में विश्व के अनेक देशों में यह विश्वास था कि कुछ स्त्रियाँ चुड़ैल अथवा डाकन होती हैं जो बच्चों और रूपवती नव-विवाहिताओं को खा जाती हैं। वे शमशान में गाढ़े गए बच्चों का कलेजा निकाल कर खाती हैं। मृत बच्चा न मिलने पर डाकन रात के समय किसी जीवित बच्चे का कलेजा खा जाती है जिससे बच्चा मर जाता है। इस अन्धविश्वास को झाड़-फूंक करने वाले ओझाओं और तात्रिकों ने अधिक दृढ़ बनाया।

झाड़-फूँक करने वाला ओझा, तांत्रिक या भोपा जब किसी स्त्री के डाकन होने की पुष्टि कर देता था तब उस स्त्री को जलाकर या सिर काटकर या पीट-पीट कर मार डाला जाता था। ताकि डाकन किसी को कष्ट नहीं पहुँचा सके। 17वीं, 18वीं और 19वीं शताब्दी में तो लोगों में यह विश्वास अत्यधिक दृढ़ था। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली अनेक जातियों, विशेषकर भील, मीणा तथा कुछ अन्य आदिवासी जातियों में यह अन्धविश्वास अधिक व्याप्त था। कई बार तो डाकन घोषित स्त्री के परिवार और उसके पति की सहमति से उस स्त्री को जीवित जला दिया जाता था। गांव वाले या उस स्त्री के परिवार वाले इस कुकृत्य का विरोध नहीं करते थे।

बाल-विवाह

वैदिक-काल में कन्या का विवाह, उसके विवाह योग्य होने पर ही किया जाता था किंतु सूत्रकाल तक आते-आते कन्याओं के विवाह की आयु में कमी होने लगी तथा पूर्वमध्य-काल तक समाज में बाल-विवाह ने कुरीति का रूप ले लिया। मुसलमानों के बार-बार आक्रमणों के कारण, लड़कियों के सतीत्व की रक्षा के लिए बाल-विवाह को अच्छा समझा गया किंतु इससे लड़कियों के शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक और व्यक्तित्त्व विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया।

बाल-विवाह के कारण बाल-विधवाओं की समस्या उत्पन्न हो गयी। बहुत सी लड़कियां खेलने-कूदने की उम्र में ही विधवा हो जाती थीं। अक्षय तृतीया को घर की कई कन्याओं का एक साथ विवाह कर दिया जाता था। कुछ कन्याओं को तो थाली में बिठाकर ब्याहा जाता था। बाल-विवाह के कारण छोटी आयु में लड़की माँ बनती थी। आधुनिक समय में कानून के बल पर इस कुप्रथा को समाप्त किया गया है किंतु समाज में यह कुप्रथा अब भी चोरी-छिपे विद्यमान है।

पर्दा-प्रथा

वैदिक संस्कृति में पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं था। भारत पर मुस्लिम आक्रमण आरम्भ होने से पूर्व स्त्रियां बिना परदे के स्वतन्त्रता पूर्वक आ-जा सकती थीं किंतु आक्रान्ता सैनिक सुन्दर कन्याओं का अपहरण करके उनसे बलात् निकाह करने लगे। इस कारण हिन्दू समाज ने बाल-विवाह एवं पर्दा-प्रथा का सहारा लिया। धीरे-धीरे इस कुप्रथा ने हिन्दू समाज में अनिवार्य नैतिक-प्रथा का रूप ले लिया।

स्त्री को घर के भीतर भी घर के पुरुषों एवं से यहाँ तक कि अपनी सास आदि महिलाओं से भी पर्दा करना पड़ता था। उसका घर से निकलना और शिक्षा ग्रहण करना भी बंद हो गया। मुसलमानों में स्त्रियों के लिए बुर्का एवं हिजाब पहनना अनिवार्य था। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में समाज-सुधारकों ने पर्दा-प्रथा के विरुद्ध आवाज उठानी आरम्भ की किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में यह कुप्रथा आज भी अनिवार्य नैतिक-परम्परा बनी हुई है।

दास-प्रथा

प्राचीन एवं मध्य-कालीन भारतीय समाज में दासी-प्रथा का प्रचलन जोरों पर था। इसके लिए लड़कियों की खरीद-फरोख्त होती थी। राजपूत लोग अपनी पुत्री के विवाह में दहेज के साथ दासियां देने के लिए लड़कियों को खरीदते थे। कुछ सामन्त या सम्पन्न लोग लड़कियों को अपनी रखैल बनाने के लिए खरीदते थे।

किसी लड़की के साथ दहेज में जाने वाली दासी को सामान्यतः उस घर के पुरुषों की भोग्या बनकर रहना पड़ता था। इस प्रकार 19वीं सदी के मध्य तक भारतीय नारी की स्थिति अत्यंत खराब थी परन्तु 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अनेक भारतीय एवं अंग्रेज समाज सुधारकों के प्रयासों से सरकार ने इन कुप्रथाओं के विरुद्ध कानून बनाकर इन पर रोक लगाने का प्रयास किया।

नारी की स्थिति सुधारने में समाज-सुधारकों का योगदान

पश्चिम का समाज व्यक्तिवादी समाज है जिसमें स्त्री और पुरुष को बराबरी के अधिकार है। वहाँ स्त्री अपने विवाह, संतानोत्पत्ति एवं विवाह-विच्छेद जैसे निर्णय स्वयं लेती आई है। अंग्रेजों के शासनकाल में जब भारतीय लोग भ्रमण, पर्यटन, व्यवसाय एवं शिक्षा आदि उद्देश्यों से इंग्लैण्ड आदि देशों में जाने लगे तो उन्हें अपने देश की नारी की खराब स्थिति पर सोचने का अवसर मिला। बहुत से अंग्रेज अधिकारियों ने भी भारतीय समाज में स्त्री की दुर्दशा को करुणा की दृष्टि से देखा और उसकी दुर्दशा को दूर करने का प्रयास किया।

ईसाई मिशनरियों का योगदान

भारत में आई अनेक ईसाई मिशनरियों ने भारतीयों में प्रचारित किया कि पर्दा करना अनिवार्य नहीं है, स्त्रियों को पर्दा त्यागकर शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार ने भारतीयों में भी आधुनिक सोच एवं व्यक्तिवादी जीवन शैली का विकास किया। अनेक ईसाई समाज सुधारकों ने भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं लिखकर भारतीयों का ध्यान सामाजिक कुरीतियों की ओर खींचा। ईसाई पादरियों ने सती-प्रथा एवं बाल-विवाह की कड़ी भर्त्सना की।

बंगाल में समाज सुधार कार्यक्रम

राज राममोहनराय ने ब्रह्मसमाज के माध्यम से नारी सुधार का कार्यक्रम चलाया। बम्बई के प्रार्थना समाज और लाहौर के देव समाज ने भी भारतीय नारियों की स्थिति सुधारने के लिए आन्दोलन चलाए। जिनके परिणाम स्वरूप गवर्नर-जनरल विलियम बैटिक ने ई.1829 में सती-प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया। राजा राममोहनराय ने बहु-विवाह का भी विरोध किया।

उन्होंने स्त्रियों के सामाजिक, कानूनी और सम्पत्ति के अधिकारों पर जोर दिया। वे स्त्री-शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। बंगाल के समाज सुधारक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने कहा कि सती-प्रथा के बन्द होने से स्त्रियों की यातना का अन्त नहीं हुआ है। इसलिए उन्होंने विधवा-विवाह का प्रबल समर्थन किया। विद्यासागर के अथक प्रयत्न से ही ई.1856 में विधवा-पुनर्विवाह अधिनियम स्वीकृत हुआ।

विद्यासागर ने ई.1849 में कलकत्ता में एक कन्या विद्यालय की स्थापना की जो आगे चलकर बैथ्यून गर्ल्स कॉलेज के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विद्यासागर ने अपनी सारी सम्पत्ति इस कॉलेज को दान कर दी।

आर्य समाज का योगदान

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वैदिक धर्म और संस्कृति की पुनर्स्थापना के उद्देश्य से स्त्री-शिक्षा पर विशेष जोर दिया तथा कन्याओं की शिक्षा के लिए गुरु-कुलों की स्थापना की। स्वामीजी ने बाल-विवाह का विरोध किया और कहा कि कन्याओं के लिए 16 से 24 वर्ष की आयु विवाह के लिए उपयुक्त है। वैदिक-काल के सामाजिक ढांचे के आधार पर उन्होंने स्त्रियों को समाज में उच्च एवं प्रतिष्ठित स्थान दिलाने का प्रयास किया।

महाराष्ट्र में समाज सुधार

महाराष्ट्र में स्त्री-शिक्षा का प्रथम बिगुल महात्मा ज्योतिराव फूले ने बजाया। उन्होंने ‘महिला शिक्षा समिति’ की स्थापना की तथा ई.1848 में अतिशूद्र लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला। ब्राह्मणों के तीव्र विरोध के कारण उन्हें इस स्कूल के लिए अध्यापक नहीं मिला। अतः ज्योतिबा ने अपनी पत्नी सावित्री बाई को, जिसे ज्योतिबा ने घर पर पढ़ाया था, स्कूल में पढ़ाने भेजा। रूढ़िवादियों ने सावित्री बाई पर कीचड़ और पत्थर फेंके किंतु वे सावित्री बाई को अपने मार्ग से नहीं हटा सके। ज्योतिबा विधवा-विवाह के प्रबल समर्थक थे। उनके प्रोत्साहन पर पूना में एक शैणवी जाति की विधवा स्त्री का विवाह हुआ।

ज्योतिबा ने एक ऐसा अनाथालय स्थापित किया जहाँ गर्भवती हिन्दू विधवाएं गुप्त रूप से अपना अपना प्रसव करा सकती थीं और अपने बच्चे को अनाथालय में रख सकती थीं। ज्योतिबा के मित्र विष्णु शास्त्री ने भी विधवा-विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए एक संस्था स्थापित की। इस संस्था ने विधवा-विवाह का प्रचार किया तथा अनेक विधवाओं के विवाह कराए।

ई.1873 में ज्योतिबा ने अपने कुछ प्रशंसकों के सहयोग से ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना की। ज्योतिबा प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने दलित जाति की स्त्रियों के उत्थान का प्रयत्न किया। महादेव रानाडे ने भी महाराष्ट्र में नारी-सुधार कार्यक्रम चलाया। उन्होंने कन्या विवाह की न्यूनतम आयु 12 वर्ष बताई किंतु वे यौन-सम्बन्धों के लिए स्त्री की न्यूनतम आयु 16 वर्ष उपयुक्त मानते थे। रानाडे ने विधवा-विवाह का समर्थन किया तथा ई.1861 में स्थापित विधवा-पुनर्विवाह संस्था के सक्रिय कार्यकर्त्ता बने। उन्होंने नारी शिक्षा का समर्थन किया तथा ई.1884 में एक कन्या विद्यालय की स्थापना की।

रानाडे ने ई.1887 में इण्डियन नेशनल सोशल कान्फ्रेंस की स्थापना की, जिसके कार्यकर्ता मदिरा-त्याग, दहेज का विरोध, विधवा-विवाह का समर्थन, स्त्री-शिक्षा का प्रचार, बाल-विवाह पर प्रतिबन्ध आदि की शपथ लेते थे।

गुजरात में समाज सुधार कार्यक्रम

गुजराती समाज सुधारक बहरामजी मलबारी ने बाल-विवाह का विरोध किया तथा विधवा-पुनर्विवाह का समर्थन किया। उन्होंने ई.1885 में बम्बई में ‘सेवा-सदन’ नामक संस्था की स्थापना की जो स्त्री-समस्याओं को हल करने का प्रयास करती थी। गुजरात के ही एक अन्य समाज सुधारक दुर्गादास मेहता ने अपना ध्यान विधवा-समस्या पर केन्द्रित किया।

उन्होंने ई.1844 में ‘मानव धर्म सभा’ की स्थापना की। इस सभा में जातिभेद का खण्डन, विधवाओं के पुनर्विवाह की आवश्यकता, मूर्ति-पूजा का विरोध एवं अन्धविश्वासों के खण्डन आदि विषयों पर भाषण आयोजित कराए जाते थे। गुजरात की समाज-सुधार गतिविधियों में नर्मदा शंकर का विशिष्ट स्थान है। वे स्त्री-शिक्षा और विधवा-पुनर्विवाह के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने ‘विधवा-विवाह’ नामक संस्था में सक्रिय सहयोग दिया।

गुजरात के दलपतराम ने भी बाल-विवाह एवं अनिवार्य वैधव्य जीवन का विरोध किया। वे अहमदाबाद की ‘गुजरात वार्नाक्यूलर सोसायटी’ नामक सुधारवादी संस्था के प्रमुख कार्यकर्ता थे। उन्होंने अपने साहित्य द्वारा समाज में नवीन विचारों का प्रसार किया। करसनदास मूलजी गुजरात के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने प्रथम विधवा-विवाह सम्पन्न कराया। लालशंकर उमियाशंकर ने भी बाल-विवाह का विरोध किया।

बड़ौदा के शासक सयाजीराव गायकवाड़ ने नारी-सुधार की दिशा में सख्त कदम उठाए। उसने बड़ौदा राज्य में, विवाह के लिए न्यूनतम आयु का निर्धारण, तलाक की पूर्व-स्वीकृति तथा एक-पत्नीत्व को अनिवार्य घाषित करने वाले कानून ब्रिटिश शासन के कानूनों से भी बहुत पहले लागू कर दिए थे।

स्वतंत्र भारत में नारी की वास्तविक स्थिति

आधुनिक काल में नारी की स्थिति में स्वतंत्रता के बाद बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। अब स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह पढ़-लिखकर नौकरियाँ कर रही हैं। इस कारण वे शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बन गई हैं। अब वे अपने विवाह के सम्बन्ध में भी स्वयं निर्णय ले रही हैं।

अब वे एकल परिवारों में रहती हैं तथा ससुराल के बंधनों से लगभग पूरी तरह मुक्त हो गई हैं। विधवा होने पर या पति द्वारा छोड़ दिए जाने पर अब उन्हें अपनी इच्छा से दूसरा विवाह करने की स्वतंत्रता है। अब उस पर अधिक बच्चे पैदा करने तथा परिवार के बहुत सारे बच्चों को पालने का बोझ भी नहीं उठाना पड़ता।

इतना सब होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि आधुनिक काल में नारी की स्थिति बहुत सुखद है। आज की पढ़ी-लिखी नारी गृहस्थी और नौकरी की दोहरी चक्की में पिस रही है। नौकरी पर पहुंचने के लिए उसे प्रतिदिन घण्टों बसों और ट्रेनों की यात्रा करनी पड़ती है जिससे उसके स्वास्थय पर बुरा प्रभाव पड़ा है।

आर्थिक रूप से स्वावलम्बी होने के कारण अब उनमें परिवार के प्रति समर्पण और स्नेह की भावना पहले जैसी नहीं रह गई हैं। बहुत से पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर नारियों हत्या जैसे अपराधों में लिप्त पाई गई हैं। यहाँ तक कि वे अपने पति तक की हत्या कर देती हैं ताकि वे अपनी पसंद के पुरुष के साथ रह सकें। लिव इन रिलेशन के प्रचलन ने भी नारी जीवन की जटिलताओं को बढ़ा दिया है।

बहुत सी शिक्षित महिलाएं अपने मानसिक तनावों से छुटकारा पाने के लिए नशे की दवाओं, शराब एवं सिगरेट का सेवन करती हैं, इन बातों से भी उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यदि इतिहास के समस्त कालखण्डों पर समग्र रूप से दृष्टि पात किया जाए तो नारी की स्थिति वैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक बहुत अच्छी थी। मध्य काल में नारी की स्थिति सबसे बुरी थी। आधुनिक काल में नारी की स्थिति स्वावलम्बी होते हुए भी सुखी नहीं है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय नारी की युग-युगीन स्थिति

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पौराणिक काल में नारी की स्थिति

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आधुनिक काल में नारी की स्थिति

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संस्कार

ब्रह्मसूत्र भाष्य में कहा गया है कि व्यक्ति में गुणों का आरोपण करने के लिए जो कर्म किया जाता हैं, उसे संस्कार कहते हैं। भारतीय संस्कृति का ताना बना संस्कारों से ही बुना गया है।

भारतीय समाज में ‘संस्कारों’ की अत्यधिक महत्ता है किंतु वेदों में इस शब्द का एक बार भी उल्लेख नहीं हुआ है। यह व्यवस्था संभवतः उपनिषद-काल में अस्तित्व में आई। ‘संस्कार’ शब्द की उत्पत्ति ‘कृ’ धातु में ‘सम्’ उपसर्ग लगाने से हुई है। इसका शाब्दिक अर्थ ‘भली प्रकार किया गया’ होता है।

उपनिषदों में ‘संस्कारोति’ शब्द का प्रयोग हुआ है, वहाँ इस शब्द का आशय ‘चमकाना’ से है। जैमिनी के सूत्रों में इस शब्द का अनेक बार प्रयोग हुआ है। जैमिनी सूत्र की शबर टीका में कहा गया है कि संस्कार वह है जिसके हो जाने पर पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के योग्य हो जाता है। कालांतर में शबर टीका का अर्थ ही संस्कारों की अवधारणा के रूप में विकसित हुआ। संस्कारों को करने से दो प्रकार की योग्यता उत्पन्न होती थी- (1.) व्यक्ति वेदाध्ययन या गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के योग्य हो जाता था। (2.) पुरुष में वीर्य तथा स्त्री में गर्भ आदि दोषों का परिहरण हो जाता था। स्मृतिकाल में संस्कारों की अनिवार्यता इतनी बढ़ी कि उपनयन संस्कार होने से ही द्विजत्व सिद्ध होने लगा- ‘संस्कारात् द्विज उच्चयते।’ वेदों में यद्यपि संस्कारों का उल्लेख संस्कारों का उल्लेख नहीं हुआ है तथापि ऋग्वेद में गर्भाधान, विवाह तथा अन्त्येष्टि के मन्त्र प्राप्त होते हैं। अथर्ववेद में इन सूक्तों का विस्तार प्राप्त होता है। ऋग्वेद एवं अथर्ववेद के इन मन्त्रों ने ही आगे चलकर ‘संस्कार’ रूपी व्यवस्था को जन्म दिया होगा। वेदों की व्याख्या ब्राह्मण ग्रंथों में की गई है। इन ग्रंथों में संस्कार शब्द का विवेचन नहीं किया गया है किंतु ‘उपनयन’ से जुड़ी हुई विभिन्न विधियों का वर्णन किया गया है। सूत्र साहित्य में विभिन्न प्रकार के संस्कारों का विवेचन भी किया गया है।

गृह्य सूत्रों में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक किए जाने वाले विविध संस्कारों का विस्तृत वर्णन है। इन सूत्रों में संस्कारों का वर्णन प्रायः विवाह संस्कार से आरम्भ हुआ है। कुछ गृह्यसूत्रों में अन्त्येष्टि संस्कार का वर्णन संस्कारों के साथ न करके, परिशिष्ट में दिया गया है।

समस्त गृह्यसूत्रों में संस्कारों का स्वरूप मूलतः एक जैसा है किंतु इन सूत्रों का सम्बन्ध अलग-अलग वेदों से होने के कारण उनके स्वरूप में कुछ भेद किया गया है। धर्मसूत्रों में संस्कारों की विधि का अत्यल्प वर्णन किया गया है किंतु संस्कारों की सामाजिक उपयोगिता को विस्तार से लिखा गया है। स्मृतिग्रंथों में संस्कारों का वर्णन आचार के रूप में किया गया है।

स्मृतिकारों ने उपनयन एवं विवाह नामक संस्कारों का विस्तार से वर्णन किया है। क्योंकि इन्हीं दो संस्कारों के उपरांत व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम में एवं गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। विभिन्न पुराणों में भी संस्कारों का महत्व भलीभांति प्रतिपादित किया गया है। रामायण एवं महाभारत में विभिन्न संस्कारों के बारे में यथा-स्थान लिखा गया है किंतु महाभारत में इनका विवेचन अधिक विस्तार से किया गया है।

संस्कारों का सम्बन्ध ऊपरी रूप से भले ही व्यक्ति के साथ संयुक्त दिखाई देता है किंतु वास्तव में इसका सम्बन्ध पूरे मानव समाज के हित से होता है। इन संस्कारों के माध्यम से मनुष्य को परिवार में, परिवार को समाज में तथा समाज को राष्ट्र रूपी व्यवस्था में बांधने का प्रयास किया गया था। इसलिए कहा गया कि ‘जो माता-पिता अपनी संतानों का संस्कार नहीं करते वे जनक तो हैं किंतु पशु के समान हैं।’ मनु के अनुसार संस्कार शरीर को शुद्ध करके उसे आत्मा के रहने का उपयुक्त स्थान बनाते हैं।

विविध ग्रंथों में संस्कारों के साथ उनका प्रयोजन भी स्पष्ट किया गया है। मानव के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास ही इन संस्कारों का प्रमुख प्रयोजन है। मनु के अनुसार गर्भाधान तथा अन्य संस्कारों से शरीर शुद्ध होता है तथा इहलोक एवं परलोक में भी मनुष्य को पाप से मुक्ति मिलती है। विशिष्ट संस्कारों के करने से मनुष्य के जन्मगत दोष नष्ट हो जाते हैं। शंकर ने भी वेदान्तसूत्र के भाष्य में यह मत प्रकट किया है।

जीवन के प्रगति मार्ग में ये संस्कार सुंदर सोपान हैं जो मनुष्य के विचारों तथा प्रवृत्तियों का शोधन करते हुए उसे निरंतर ऊंचा उठाते जाते हैं। बाल्यावस्था के संस्कारों का विशेष महत्व है। सूत्रग्रंथों के अनुसार विभिन्न संस्कार-क्रियाओं से शुद्ध हुआ व्यक्ति ही ब्रह्म-प्राप्ति के योग्य हो पाता है। मेधातिथि के अनुसार शुद्ध शरीर में ही शुद्ध आत्मा निवास करती है। वीरमित्रोदय संस्कार प्रकाश ने हारीत के वचनों को उद्धृत करते हुए लिखा है कि ब्राह्म संस्कार सम्पन्न व्यक्ति ऋषि-पद को प्राप्त कर लेता है तथा दैव- संस्कार सम्पन्न व्यक्ति देवत्व प्राप्त कर लेता है।

स्त्रियों के लिए भी संस्कारों का प्रतिपादन किया गया किंतु सूत्रकाल में यह भी व्यवस्था दी गई कि स्त्री के संस्कारों के समय वेदमंत्रों का उच्चारण नहीं करना चाहिए। केवल विवाह के समय पुरुष के साथ स्त्री का भी वैदिक मंत्रों से संस्कार किया जाता है।

संस्कारों की संख्या

गौतम धर्मसूत्र में चालीस संस्कारों का उल्लेख है जिनमें पाकयज्ञ, हविर्यज्ञ, सोमयज्ञ तथा देवव्रत आदि अनुष्ठान भी सम्मिलित हैं। मनुस्मृति तथा याज्ञवलक्य स्मृति में संस्कारों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है किंतु गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक के संस्कारों का पूर्ण विधान लिखा गया है। परवर्ती काल में संस्कारों की संख्या घटकर 16 रह गई थी।

आधुनिक काल में ऋषि दयानंद ने भी 16 संस्कारों का समर्थन किया है किंतु वर्णन 17 संस्कारों का किया है- गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, समवर्तन, विवाह, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ, सन्यास तथा अन्त्येष्टि।

डॉ. राजबली पाण्डेय ने समस्त संस्कारों को पांच भागों में बांटा है- (1.) जन्मपूर्व-संस्कार, (2.) शिशु-संस्कार, (3.) शिक्षा-संस्कार, (4.) विवाह-संस्कार (5.) अन्त्येष्टि। इनके कर्त्ता भी अलग-अलग हैं। जन्म-पूर्व एवं शिशु अवस्था के संस्कार माता-पिता करते हैं, शिक्षा सम्बन्धी संस्कार आचार्य करते हैं, विवाह संस्कार परिवार एवं समाज करता है, वानप्रस्थ-ग्रहण तथा सन्यास-ग्रहण संस्कार मनुष्य स्वयं करता है जबकि अन्त्येष्टि संस्कार पुत्र-पौत्र आदि करते हैं।

सोलह संस्कारों की अवधारणा

सोलह संस्कारों का पालन करना प्रत्येक भारतीय परिवार का कर्त्तव्य माना गया है। मनुष्य का जीवन माँ के गर्भ में आने से आरम्भ होता है और यदि मोक्ष नहीं हो तो मृत्यु के उपरांत भी प्रेत रूप में विद्यमान रहता है। अतः मनुष्य शरीर को स्वस्थ तथा दीर्घायु बनाने और मन को शुद्ध एवं ज्ञानवान बनाने के लिए गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक तक सोलह संस्कारों की व्यवस्था की गयी है।

संस्कारों का विधान स्त्री और पुरुष दोनों के लिए किया गया है। स्त्रियों के संस्कार (विवाह को छोड़कर) मन्त्रहीन होते हैं। संस्कार प्रमुखतः द्विज जातियों के लिए थे किंतु शूद्रों के लिए भी कुछ संस्कार निर्धारित किए गए। इनकी क्रियाएँ भी मंत्रहीन होती थीं। हिन्दू समाज में निम्नलिखित सोलह संस्कार अनिवार्य माने गए हैं-

(1.) गर्भाधान संस्कार

यह प्रथम संस्कार है। गौतम और बोधायन आदि व्यवस्थाकारों ने संतानोत्पत्ति के इच्छुक दम्पति के लिए गर्भाधान के पूर्व उचित काल में आवश्यक धार्मिक कर्मों को सम्पन्न करने का निर्देश किया है। इसे निषेक (गर्भाधान) तथा चतुर्थीकर्म भी कहा गया है किंतु वैशानख ने निषेक तथा गर्भाधान को भिन्न-भिन्न माना है। गर्भाधानसंस्कार में माता के गर्भ में बीजरूप से शिशु स्थापित किया जाता है। विवाह के पश्चात् स्त्री के प्रथम ऋतुदर्शन के बाद चौथे दिन गर्भाधान संस्कार का समय कहा गया है। मनु के अनुसार संतान के इच्छुक दम्पत्ति को ऋतुदर्शन के चार दिन, अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या एवं पूर्णमासी को छोड़कर यह संस्कार सम्पन्न कराना चाहिए।

(2.) पुसंवन संस्कार

पुसंवनसंस्कार का उल्लेख समस्त गृह्यसूत्रों में है। गर्भ में स्थित शिशु को पुत्र का रूप देने के लिए यह संस्कार किया जाता है अर्थात् इस संस्कार का उद्देश्य पुत्र-प्राप्ति है। कुछ व्यवस्थाकारों के अनुसार यह संस्कार, गर्भाधान के दूसरे या तीसरे मास में करना चाहिए, जबकि कुछ व्यवस्थाकारों के अनुसार यह संस्कार, गर्भाधान के क्रमशः तीसरे, पाँचवे और छठवें मास में किया जाना चाहिए।

 इस संस्कार में देवी की स्तुति की जाती थी एवं उनसे पुत्र-प्राप्ति की याचना की जाती थी। स्त्री की गोद में जल से भरा हुआ पात्र रखा जाता था तथा स्त्री उसे अपने उदर से स्पर्श कराती थी। पुत्रोत्पत्ति तथा गर्भ-रक्षा के लिए आयुर्वेदिक औषधियों का भी प्रयोग किया जाता था।

(3.) सीमन्तोन्नयन संस्कार

सीमन्तोन्नयनसंस्कार का उद्देश्य गर्भवती स्त्री को अमंगलकारी शक्तियों से बचाना था। यह संस्कार गर्भाधान के तीसरे और आठवें मास के बीच किया जाता था। इस संस्कार-कर्म में पति पीछे से पत्नी के गले में उदुम्बर की टहनी बाँधता था और पहले दर्भ के अंकुर से और बाद में वीरतर की लकड़ी के टुकड़े से पत्नी के केश सँवारकर मांग (सीमान्त) निकालता था।

इसका उद्देश्य यह था कि पत्नी उर्वरा हो और उसके गर्भ से उत्पन्न होने वाला बालक वीर हो। सीमन्तोन्नयन के अवसर पर परिवार में उत्सव मनाया जाता था तथा नृत्य एवं गायन आदि का आयोजन होता था।

(4.) जातकर्मसंस्कार

बृहदारण्यक उपनिषद् एवं गृह्यसूत्रों में इस संस्कार का विस्तृत वर्णन है। यह संस्कार पुत्र उत्पन्न होने के तुरन्त बाद एवं नाभिच्छेदन से पूर्व अथवा पुत्र-जन्म के दस दिन के भीतर किया जाता था। पुत्र जन्म पर देवताओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिए बारह अलग-अलग पात्रों में पकी हुई रोटी (पुरोडाश) अर्पित की जाती थी।

जमे हुए दूध (दही) और घी की हवि से हवन किया जाता था।  इस अवसर पर पिता नान्दीपाठ एवं श्राद्ध आदि का विधान करते हुए अपने बालक पर तीन बार साँस छोड़ता था और सोने के बर्तन या चम्मच से मक्खन, शहद और दही उसकी जीभ पर लगाता था। इसके बाद बालक का नाभिच्छेदन किया जाता था और उसे नहला कर स्वच्छ किया जाता था। तदनन्तर पिता सरस्वती की प्रार्थना करते हुए, शिशु को उसकी माता के स्तनों के पास रखता था।

(5.) नामकरणसंस्कार

जन्म के दसवें अथवा बारहवें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। इस अवसर पर गृह-शुद्धि के लिए हवन एवं भोज आदि का आयोजन होता है। मनु ने व्यवस्था दी कि ब्राह्मण का नाम मांगल्य पूर्ण, क्षत्रिय का बलयुक्त, वैष्य का नाम धन वाचक तथा शूद्र का नाम जुगुप्सित होना चाहिए। कन्या का नाम सरलता पूर्वक उच्चारण करने योग्य, मंगलसूचक, दीर्घ स्वर से अंत होने वाला तथा आशीर्वादात्मक होना चाहिए।

(6.) निष्क्रमण संस्कार

जन्म के चौथे मास में बालक को पहली बार घर से बाहर निकालने की क्रिया को निष्क्रमण संस्कार कहते हैं। इसमें बालक को घर से बाहर लाकर दिन में सूर्य और रात्रि में चन्द्र के दर्शन कराए जाते हैं। सूर्य तथा चन्द्र के दर्शन से बालक के विकास पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

(7.) अन्नप्राशनसंस्कार

यह संस्कार बालक के जन्म के छठे मास में किया जाता है। इस संस्कार में बालक को पहली बार दही, भात, मधु, घी आदि चखाया जाता है।

(8.) चूड़ाकर्मसंस्कार

यह संस्कार शिशु के जन्म के पहले या तीसरे वर्ष में सम्पादित किया जाता है। इसे चौल अथवा केशोच्छेदन संस्कार भी कहते हैं। इस संस्कार में शिशु के सिर के बाल पहली बार मुण्डवाये जाते हैं और सिर पर केवल चूड़ा (चोटी) छोड़ी जाती है। शिखा (चोटी) रखने का प्रारम्भ इसी संस्कार से होता है।

(9.) कर्ण-छेदनसंस्कार

यह संस्कार शिशु-जन्म के तीसरे या पाँचवें वर्ष में किया जाता है। इस संस्कार में शिशु का कर्ण-छेदन किया जाता है। शिशु को स्नान कराकर वस्त्र पहनाये जाते है और फिर वैद्य या कुशल व्यक्ति द्वारा पहले दाहिने कान का और फिर बाएं कान का छेदन होता है। शिशु को रोगों से बचाने तथा कानों में आभूषण पहनाने के लिए यह संस्कार किया जाता है।

(10.) विद्यारम्भसंस्कार

इस संस्कार द्वारा शिशु को अक्षर-ज्ञान कराया जाता है। बालक स्नानादि से निवृत होकर देवताओं की स्तुति के साथ गुरु के सामने बैठकर अक्षरों को पढ़ता है।

(11.) उपनयनसंस्कार

‘उप’ का अर्थ है ‘समीप’ तथा ‘नयन’ का अर्थ है ‘ले जाना’। अर्थात् उपनयन वह संस्कार है जिसके द्वारा बालक को शिक्षा के लिए गुरु के समीप ले जाया जाता है। आचार्य द्वारा शिष्य को ब्रह्म-विद्या देने के लिए स्वीकार किया जाता था। ब्रह्मचर्याश्रम इसी संस्कार से आरम्भ होता था।

इसे ‘यज्ञोपवीत’ प्रदान करना भी कहते थे क्योंकि इसी संस्कार से ब्रह्मचारी यज्ञोपवीत धारण करता था। शूद्रों को छोड़कर शेष तीनों वर्णों को उपनयन का अधिकार था। बालक को जाति के आनुसार आठवें, ग्यारहवें या बारहवें वर्ष में गुरु के पास भेजा जाता था। बालक धोती और उत्तरीय पहनकर, सिर का मुण्डन करवा कर, मेखला और दण्ड धारण करके आश्रम-जीवन का व्रत लेता था।

सूत्र साहित्य के अनुसार स्त्रियों को भी उपनयन एवं वेदाध्ययन का अधिकार था किन्तु बाद में जब कन्याओं के विवाह कम उम्र में होने लगे, तब उनकी शिक्षा बन्द हो गई और उपनयन केवल विवाह के समय धार्मिक विधान के रूप में होने लगे। मनु के अनुसार कन्याओं का उपनयन बिना पढे़ ही किया जाना चाहिए।

तीनों वर्णों के लिए उपनयन की आयु अलग-अलग है। मनु ब्राह्मण का पाँचवे वर्ष में, क्षत्रिय का छठे वर्ष में तथा वैश्य का आठवें वर्ष में उपनयन करने का निर्देश देते हैं। कुछ व्यवस्थाकारों के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पुत्रों का क्रमशः सोलह, बाईस व चौबीस वर्ष की आयु तक यज्ञोपवीत संस्कार अवश्य हो जाना चाहिए, अन्यथा वे घोर पाप के भागी होते हैं।

उपनयनसंस्कार में विद्यार्थी जब गुरु के समीप जाकर बैठता था तब गुरु हवन करता था और फिर विद्यार्थी के वस्त्र एवं हाथों को अपने हाथ में लेकर उसे गायत्री मन्त्र की दीक्षा देता था। इसके बाद आचार्य उसे ब्रह्मचर्याश्रम की अन्य बातें बतलाता था। वह कहता था- ‘तुम ब्रह्मचारी हो, जल का पान करो, काम करो, दिन में शयन मत करो, आचार्य के नियंत्रण में वेदों का अध्ययन करो।’

इस संस्कार के सम्पन्न होने पर विद्यार्थी ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके गुरु से वेद तथा अन्य शास्त्रों का अध्ययन आरम्भ करता था। इस संस्कार के किए बिना किसी भी विद्यार्थी को वेद पढ़ने अथवा गायत्री मन्त्र के उच्चारण का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता था। उपनयन संस्कार के बाद आचार्य अपने शिष्य का आध्यात्मिक पिता और गायत्री उसकी माता बन जाती थी। इस संस्कार को दूसरा जन्म भी कहा जाता था, क्योंकि इस संस्कार के बाद उसका सम्पर्क विद्वानों तथा गुणीजन से होता था और वह ‘द्विज’ कहलाता था।

(12.) वेदारम्भसंस्कार

वैदिक युग के प्रारम्भिक काल में उपनयनसंस्कार के साथ ही वेदों का अध्ययन आरम्भ होता था। अतः वेदारम्भ संस्कार की आवश्यकता नहीं थी किन्तु जब संस्कृत बोलचाल की भाषा न रही, तब उपनयन संस्कार के बाद लगभग एक वर्ष तक संस्कृत का अध्ययन कराया जाता था और उसके बाद वेदाध्ययन आरम्भ होता था। वेदों के पठन-पाठन का अधिकार मिलने के पूर्व विद्यार्थी को वेदारम्भ संस्कार सम्पन्न करना पड़ता था।

(13.) केशान्त अथवा गोदानसंस्कार

इस संस्कार के अन्तर्गत ब्रह्मचारी को अपने बाल कटवाने पड़ते थे।  इस अवसर पर ब्रह्मचारी का परिवार आचार्य को गौ-दान देता था। इसलिए इस संस्कार को गोदान संस्कार भी कहते थे। सामान्यतः यह संस्कार सोलह वर्ष की आयु में सम्पन्न किया जाता था।

(14.) समावर्तनसंस्कार

ब्रह्मचर्याश्रम का प्रारम्भ उपनयनसंस्कार से और अंत समावर्तन संस्कार से होता था। सूत्रकारों के अनुसार अध्ययन समाप्ति के पश्चात् ब्रह्मचारी को अपने आचार्य को गुरु-दक्षिणा देकर उसका आशीर्वाद ग्रहण करना चाहिए तथा स्नान करना चाहिए। इस स्नान के कारण ही ब्रह्मचारी को ‘स्नातक’ कहा जाता था। इसके बाद विद्यार्थी अपने घर लौट आता था।

(15.) विवाह संस्कार

विवाहसंस्कार के बाद ब्रह्मचारी, गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। इस संस्कार में कन्या का पिता वस्त्र एवं आभूषणों से अलंकृत अपनी कन्या का, उसके योग्य गुणवान वर को, यज्ञ-की अग्नि के समक्ष दान करता है। विवाहसंस्कार में ‘पाणिग्रहण’ (वर द्वारा वधू का हाथ थामना), ‘लाजाहोम’ (अग्नि में धान की खीलों की आहुति देना), ‘सप्तपदी’ (वर-वधू का अग्नि के चारों ओर सात परिक्रमा करना), ‘ध्रुव दर्शन’ (ध्रुव तारे को देखना) आदि विधान सम्पन्न किए जाते हैं। वर और वधू आजीवन एक दूसरे के साथ रहने की प्रतिज्ञा करते हैं। भारतीय परिवार में विवाह एक धार्मिक बन्धन माना जाता है। अविवाहित पुरुष को ‘यज्ञ’ करने का अधिकार नहीं होता।

(16) अंत्येष्टिसंस्कार

यह मनुष्य जीवन का अन्तिमसंस्कार है। इसमें मृतक के शरीर को स्नान आदि कराकर अर्थी पर लिटाकर श्मशान ने जाया जाता है और वहाँ चिता पर रखकर मन्त्रोच्चारण के साथ अग्नि को अर्पित कर दिया जाता है। तीसरे या दसवें दिन मृतक की अस्थियाँ चुनी जाती हैं जिन्हें फूल कहा जाता है।

इन अस्थियों को कलश में भरकर ऋग्वेद के मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है तथा किसी पवित्र नदी, सरोवर या जलाशय में मृतक की अस्थियां एवं भस्मी विसर्जित की जाती हैं। सपिण्डीकरण श्राद्ध द्वारा मृतक को पितरों में शामिल किया जाता है। मृत व्यक्ति के लिए समाधि या चबूतरा बनाया जाता था।

वर्तमान समय में बहुत से संस्कार विलुप्त हो गए हैं। केवल नामकरणसंस्कार, विवाहसंस्कार एवं अंतिमसंस्कार ही प्रचलन में रह गए हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा

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पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा

पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा मनुष्य के जीवन को संतुलित, सुखी एवं दीर्घ जीवन जीने के लिए है। यह प्रत्येक मनुष्य को अपना कर्म करते हुए मोक्ष की तरफ ले जाती है। इन्हें पुरुषार्थ भी कहा जाता है।

पुरुषार्थ-चतुष्टय के चार अंग हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें से प्रथम पुरषार्थ है- धर्म! धर्म के सम्बन्ध में मनुस्मृति का कथन है- वेद सब धर्मों का मूल है और वेद के जानने वाले लोगों की स्मृति तथा शील भी धर्म के मूल हैं। सत्पुरुषों का सदाचार भी धर्म का मूल है और अन्तरात्मा का संतोष भी धर्म का मूल है।                     

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में नाना प्रकार के सुख, सौभाग्य, सफलता एवं समृद्धि प्राप्त करने की आकांक्षा रखता है। इनकी प्राप्ति के लिए प्रत्येक मनुष्य को कुछ न कुछ उद्यम करना होता है। मनुष्य के लिए आवश्यक विभिन्न प्रकार के सुखों में से कुछ सुख भौतिक हैं, कुछ दैहिक हैं तथा कुछ दैविक अथवा आध्यात्मिक हैं।

संस्कृति के निर्माताओं ने इस बात पर गहनता से विचार किया कि मनुष्य को अपने जीवन में किन सुखों की कामना करनी चाहिए तथा वे कैसे प्राप्त किए जा सकते हैं। हमारे ऋषियों ने इस बात पर भी गहन विचार किया कि मनुष्य द्वारा प्राप्त किए जाने वाले सुखों में नैतिकता का तत्व किस प्रकार संलग्न रहे। अनीति पूर्वक प्राप्त किए गए सुख, सफलताएं एवं समृद्धि कभी भी किसी भी मनुष्य को अंतिम रूप से सुखी नहीं बना सकते।

ऋषियों ने अनुभव किया कि सांसारिक मोह-माया और भोग-विलास मनुष्य को आकर्षित तो करते हैं किंतु वे मनुष्य को सन्मार्ग की ओर न ले जाकर दुःखों की ओर ले जाते हैं। जबकि मर्यादित आचरण तथा आध्यात्मिक विचार उचित निर्णय लेने में मनुष्य की सहायता करते हैं। भारतीय मनीषियों ने पाया कि मनुष्य के जीवन का लक्ष्य क्षणिक सुखों की प्राप्ति की बजाए स्थाई सुखों की उपलब्धि होना चाहिए।

मनुष्य की चेष्टाएं विलासपरक न होकर धर्मपरक होनी चाहिए। आध्यात्मिक वृत्तियां मनुष्य को जीवन-दर्शन का वास्तविक अर्थ समझाती हैं जिसमें सांसारिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता, भोग के साथ योग तथा कामना के साथ निवृत्ति का संतुलन रहता है। वस्तुतः मनुष्य को अपने जीवन में दैहिक, दैविक एवं भौतिक, तीनों प्रकार के सुखों की आवश्यकता होती है।

पुरुषार्थ-चतुष्टय

ऋषियों ने इन सुखों को चार प्रकार के ‘पुरुषार्थों’ के रूप में अभिव्यक्त किया। इन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहा जाता है। इनमें से ‘काम’ दैहिक सुख है और अर्थ ‘भौतिक सुख’ है, ‘धर्म’ एवं ‘मोक्ष’ दैविक सुख हैं।

इन चार पुरुषार्थों को ‘चतुर्वर्ग’ एवं ‘पुरुषार्थ-चतुष्टय’ भी कहा गया है। पुरुषार्थों से ही मनुष्य बौद्धिक, नैतिक, शारीरिक, भौतिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष करता है। भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि के मध्य संतुलन स्थापित करना ही पुरुषार्थ का सही स्वरूप है। ‘धर्म’ के द्वारा मनुष्य नीति, विवेक, न्याय आदि क्रियाओं को समझ सकता है। ‘अर्थ’ मुनष्य की भौतिक समृद्धि का आधार है।

‘काम’ मानव के मन एवं देह को संतुष्टि देता है। इन तीनों के सम्यक् उपभोग से मनुष्य स्वतः ही ‘मोक्ष’ अर्थात् आत्मा की चरम उन्नति प्राप्त कर लेता है। मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ ही है।

चार्वाक दर्शन केवल दो ही पुरुषार्थों- अर्थ और काम को मान्यता देता है। वह धर्म और मोक्ष को नहीं मानता। महर्षि वात्स्यायन भी मनु के पुरुषार्थ-चतुष्टय के समर्थक हैं किन्तु वे मोक्ष तथा परलोक की अपेक्षा धर्म, अर्थ और काम पर आधारित सांसारिक जीवन को सर्वोपरि मानते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – पुरुषार्थ-चतुष्टय

पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा

धर्म – पुरुषार्थ-चतुष्टय (1)

अर्थ – पुरुषार्थ-चतुष्टय (2)

काम – पुरुषार्थ-चतुष्टय (3)

मोक्ष – पुरुषार्थ-चतुष्टय (4)

धर्म – पुरुषार्थ-चतुष्टय (1)

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धर्म - पुरुषार्थ-चतुष्टय (1)

पुरुषार्थ में धर्म का स्थान सर्वोपरि है परन्तु यह किसी विशेष प्रकार के धार्मिक विश्वासों, सम्प्रदायों की मान्यताओं अथवा ईश्वर की विशिष्ट उपासना पद्धतियों तक ही सीमित नहीं है। पुरुषार्थ के अर्थ में इसका आशय अत्यंत व्यापक है। इसका आशय स्वयं को संयमित, मर्यादित, अनुशासित करने से है।

इस प्रकार ‘धर्म’ व्यक्ति के चिंतन, आचरण और व्यवहार की एक आदर्श-संहिता है जो उसके कार्यों को देश, काल और पात्र के अनुसार व्यवस्थित, नियमित और नियंत्रित करता है तथा उसे निर्मल और पाप-रहित जीवन-यापन के लिए प्रेरित करता है। जिन कर्मों से मनुष्य, मुनष्यत्व को प्राप्त करता है, उसी को धर्म कहते हैं। इस प्रकार पुरुषार्थ के संदर्भ में इसका आशय उसकी व्यक्तिगत नैतिकता से है।

वेदों में मनुष्य-मात्र के लिए जिन कर्मों का विधान किया गया है, उन्हें धर्म कहा जा सकता है। महाभारत में आचार अथवा सदाचार को धर्म का लक्षण माना गया है तथा आचार से ही धर्म को फलीभूत होने वाला कहा गया है। आचार (सद्-आचरण) और धर्म को एक-दूसरे का पूरक मानकर आचार को ही परमधर्म स्वीकार किया गया है।

बौद्ध और जैन साहित्य में भी शुद्ध और सात्विक आचरण पर जोर दिया गया है, यह शुद्ध और सात्विक आचरण ही धर्म है। मनु का कथन है कि वेद और समृतियों में वर्णित आचार ही श्रेष्ठधर्म है। इस प्रकार ‘धर्म’ आचरण की वह संहिता है जिसके माध्यम से व्यक्ति समाज के सदस्य के रूप में और एक व्यक्तित्त्व के रूप मे नियंत्रित होता हुआ क्रमशः विकसित होता हुआ, अन्त में चरम उद्देश्य अर्थात् ‘मोक्ष’ की प्राप्ति करता है।

धर्म के तीन मूल कार्य हैं-

(1.) आत्म-नियंत्रण

(2.) व्यक्तित्त्व का उत्थान और

(3.) मोक्ष की उपलब्धि।

धर्म के द्वारा मनुष्य अपने कर्त्तव्यों और व्यवहारों को परिष्कृत करता है तथा बुरी कामनाओं को त्याग कर सद्-कामनाओं की पूर्ति करता है। इसलिए मनुष्य-मात्र का कर्त्तव्य है कि उसका प्रत्येक कार्य और उसका नित्य-स्वभाव नैतिकता से युक्त हो एवं सदाचरण पूर्वक संचालित हो। इससे मनुष्य के जीवन को पूर्णता प्राप्त होती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि धार्मिकता ऐसे मनुष्य की वह सहज प्रवृत्ति है जो किसी को क्लेश नहीं पहुँचाता, अपितु लोक कल्याण के माध्यम से समाज को सुखी बनाता है और स्वयं सुखी होता है।

मनु ने धर्म के चार आधार बताए हैं- (1.) श्रुति (वेद), (2.) स्मृति (धर्मशास्त्र), (3.) सदाचरण (नैतिक आचरण) और (4.) आत्मतुष्टि (संतोष)। धर्मसूत्रों ने वेदों, स्मृतियों तथा शीलगत व्यवहार को धर्म का मूल बताया है। वशिष्ट के अनुसार वेद और समृतियां, सदाचार से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

वेदों और स्मृतियों में मनुष्य के लिए जो कर्त्तव्य निर्देशित किए गए हैं, उनका निष्ठापूर्वक पालन ही धर्म है। भिन्न-भिन्न देशों और वर्गों के सद्-आचार भिन्न हो सकते हैं और एक जैसे भी, किंतु उनका मूल नैतिकता में निहित है। सामान्यतः सत्य-भाषण, नीति-युक्त आचरण और नैतिक व्यवहार को सदाचार माना जाता है। धर्मग्रन्थों में वर्णित कुछ सदाचरण युग के साथ बदल जाते हैं किन्तु प्रत्येक युग में उनका आधार वही रहते हैं।

साधारणधर्म

प्रत्येक स्थान एवं प्रत्येक युग में किए जाने वाले अपरिवर्तनीय-कर्त्तव्य एवं आचरण को ‘साधारणधर्म’ कहा जाता है। ‘साधारणधर्म’ मनुष्य के मानवता-युक्त नैतिक आचरण से सम्बन्धित होता है। समस्त मानव मूल्यों का नियोजन साधारण धर्म के अन्तर्गत होता है, जो प्रायः समस्त व्यक्तियों के लिए अनुकरणीय होता है। सदा सत्य बोलना, हिंसा न करना, किसी का धन न हड़पना, पराई स्त्री को माता समझना, ब्राह्मण, गौ, स्त्री, अशक्त एवं शरणागत की रक्षा करना मनुष्य-मात्र के ‘साधारणधर्म’ हैं।

विशिष्टधर्म

देश, काल एवं पात्र के साथ बदलने वाले ‘कर्त्तव्य’ अथवा ‘सदाचरण’ को ‘विशिष्ट धर्म’ कहा जाता है। सत्य बोलना साधारण धर्म है किंतु किसी परिस्थिति विशेष में किसी निर्दोष प्राणी के प्राण बचाने के लिए मिथ्या भाषण करना ‘विशिष्ट धर्म’ है। देश-धर्म, जाति-धर्म और कुल धर्म भी विशिष्ट धर्म हैं। शास्त्रकारों ने कई प्रकार के अन्य स्मार्त-धर्मों का भी उल्लेख किया है, जैसे- वर्णधर्म, आश्रमधर्म, वर्णाश्रम धर्म, गूढ़धर्म और नैमित्तिक धर्म।

धर्म के लक्षण

अलग-अलग धर्माचार्यों ने धर्म के अलग-अलग लक्षण बताए हैं। शास्त्रों में धर्म के तीस लक्षण भी वर्णित हैं। मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं-

धृति क्षमा दमोस्तेयं, शौचं इन्द्रियनिग्रहः।

धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो, दसकं धर्म लक्षणम्।।

अर्थात् धर्म के दस लक्षण हैं- धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध।

सत्य

शास्त्रों में में कहा गया है कि ‘सत्यम् वद् धर्मम् चर’, अर्थात् सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो। मनु के अनुसार, सत्य बोले, प्रिय बोले, सत्य भी अप्रिय न बोले और प्रिय भी असत्य न बोले, यही सनातन धर्म है। सत्य सम्भाषण से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं। सत्य से व्यक्ति और समाज दोनों की उन्नति होती है।

समस्त मानव-व्यवहारों का आधार सत्य है। असत्य आचरण से मन कलुषित तथा समाज दूषित होता है। अतः विकट से विकट परिस्थिति में भी मनुष्य को सत्य बोलना चाहिए। दान ध्यान, सहिष्णुता, लज्जा, दया, अहिंसा, निष्पक्षता, इन्द्रिय-निग्रह, सहर्ष कष्ट सहन, विवेक आदि को सत्य माना गया है।

ब्रह्मचर्य

स्त्री संसर्ग से दूर रहने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। मन की काम-वासनाओं पर नियंत्रण करना ही इसका उद्देश्य है। इससे शरीर बलिष्ठ रहता है, मन अपने काम पर केन्द्रित रहता है और मनुष्य ब्रह्म अर्थात् ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है। इस व्रत का पालन करने से व्यक्ति के निजी जीवन में श्रेष्ठता आती है तथा समाज में नैतिकता का प्रसार होता है।

अहिंसा

उपनिषदों में ‘अहिंसा’ को ‘परमधर्म’ कहा गया है। किसी भी प्राणी को अपने मन, वचन एवं कर्म से हानि नहीं पहुँचाना ही अहिंसा है। मनु के अनुसार जो मनुष्य जीवों का वध तथा बंधन नहीं करना चाहता, वह सबका हिताभिलाषी होकर अत्यन्त सुख प्राप्त करता है। समाज में शांति की स्थापना के लिए अहिंसा अत्यंत आवश्यक है।

इन्द्रिय-निग्रह

मनुष्य ज्ञानेन्द्रियों (आंख, नाक, कान, जीभ एवं त्वचा) से सुख-दुःख का अनुभव करता है एवं अपनी कर्मेन्द्रियों (हाथ, पांव, मुख, जननेन्द्रिय तथा गुदा) से सुख-दुःख का सृजन करता है। इन समस्त प्रकार की इन्द्रियों को नियंत्रण में रखना ही इन्द्रिय-निग्रह (दम) है। जो मनुष्य अपने कर्मों को तो अनुशासित रखता है किन्तु मन से संयमित नहीं है, वह भी मिथ्याचारी है।

जो पूर्ण रूप से तथा प्रत्येक दृष्टि से अपने मन एवं कर्म पर संयम रखता है, वही वास्तविक संयमी है। मन अर्थात् इच्छाओं पर नियन्त्रण न रहने से विषयों अर्थात् भोग-विलास में आसक्ति बढ़ती है, विषय-कामनाओं की पूर्ति नहीं होने से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से मूढ़ता आती है, मूढ़ता से स्मृति लुप्त होती है, स्मृति के लुप्त होने से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नष्ट होने से व्यक्ति का विनाश हो जाता है।

अतः मनुष्य को अपने मन, मस्तिष्क और शरीर पर समान रूप से संयम रखना चाहिए। इस प्रकार इन्द्रिय निग्रह प्रत्येक मनुष्य का धर्म है।

क्षमा

प्रत्येक प्राणी के प्रति क्षमा का भाव रखना मनुष्य का साधारण धर्म है। अपकार करने वाले व्यक्ति के प्रति भी उपकार की भावना रखना, क्षमाशील व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान है। सामर्थ्यवान ही क्षमा जैसे महान् गुण को धारण कर सकता है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है- ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ अर्थात् क्षमा वीर पुरुषों का आभूषण होता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए मधुर शब्दों का प्रयोग करना, क्रोध के वशीभूत होकर कठोर वचनों के उच्चारण से बचना, बदले की भावना न रखना आदि गुण भी क्षमा के अंतर्गत ही आते हैं।

श्रद्धा

मनुष्य को सृष्टि की प्रत्येक उपकारी वस्तु, व्यक्ति एवं व्यवस्था के प्रति श्रद्धा का भाव रखना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास ने शिव और पार्वती की तुलना श्रद्धा और विश्वास से की है- ‘भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।’

माता, पिता और गुरु के प्रति श्रद्धावान् होना धर्म है। नदियाँ जल देकर, पर्वत प्राणवायु एवं औषधियां देकर, आकाश वर्षा एवं स्थान देकर, सूर्य प्रकाश एवं ऊर्जा देकर, धरती अन्न एवं आश्रय देकर, गाय दूध, पंचगव्य एवं बछड़े देकर मनुष्य का उपकार करते हैं। सृष्टि में बहुत सी रचनाएं हैं जो मनुष्य को कुछ न कुछ देती हैं। मनुष्य को प्रकृति की व्यवस्था एवं उसे बनाने वाले आकाश, नदी, पर्वत, वृक्ष, गाय सूर्य, आदि के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।

मधुर वचन

मधुर सम्भाषण करना भी धर्म का महत्वपूर्ण अंग है। विनम्र व्यक्ति ही अहंकार रहित होने के कारण मधुर वाणी और प्रिय वचन बोलने में समर्थ होते हैं। मनु ने कटु सत्य को भी मधुरवाणी में कहने का निर्देश दिया है। मनुष्य की मधुर वाणी अच्छे और बुरे सभी लोगों को आकर्षित करती है। मधुर सम्भाषण से विरोधी एवं शत्रु को भी सरलता से झुकाया जा सकता है।

शील

शील का अर्थ ‘अच्छा स्वभाव’ होता है। धर्म और सत्य, शील पर ही निर्भर करते हैं। अर्थात् शीलवान् हुए बिना मनुष्य धर्म और सत्य युक्त आचरण नहीं रह सकता। महाभारत में कहा गया है- ‘शीलं प्रधानं पुरुषे।’ अर्थात् मनुष्य में शील ही सबसे प्रधान गुण है। मनुष्य का चरित्र, व्यवहार और आचरण शील से ही उत्पन्न होता है। जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए शील का होना अनिवार्य है। शीलवान व्यक्ति अपने कार्यों से मित्रों और शत्रुओं में भी प्रिय बन जाता है। जो मनुष्य विचार, वाणी, कर्म, अनुग्रह और दान में भी शील बनाए रखता है, वही व्यक्ति शीलसम्पन्न माना जाता है।

अतिथि-सेवा

अतिथि-सेवा को गृहस्थ द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले पंचमहायज्ञों में सम्मिलित किया गया है। इसे ‘अतिथि-धर्म’ भी कहा जाता है। मनु ने लिखा है कि अतिथि का पूजन करने से व्यक्ति को धन, आयु, यश और स्वर्ग मिलता है। बहुत से अतिथियों के एक साथ आ जाने पर आसन, विश्राम-स्थान, शैया, अनुगमन और सेवा, ये समस्त सत्कार, बड़ों का अधिक, मध्य श्रेणी वालों का मध्यम तथा निम्न श्रेणी वालों का कम करना चाहिए। महाभारत और भागवत पुराण के अनुसार यदि कभी शत्रु भी अपने द्वार पर आ जाए तो उसकी भी सेवा-सुश्रुषा करनी चाहिए।

विशिष्ट धर्म

देश, काल और पात्र के अनुसार मनुष्य को अपने साधारण धर्मों से हटकर कुछ विशिष्ट कर्त्तव्यों का निर्वाह करना पडता है जिन्हें ‘विशिष्ट धर्म’ कहा जाता है। समाज के प्रति मनुष्य के दायित्वों को भी ‘विशिष्ट धर्म’ के अन्तर्गत रखा जाता है। इन्हें मनुष्य का ‘स्वधर्म’ भी कहा जाता है।

वर्ण-धर्म

वर्ण-धर्म का तात्पर्य विभिन्न वर्णों के कर्त्तव्यों और नियमों के पालन से है। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में चारों वर्णों के अलग-अलग कर्त्तव्य और नियम निर्धारित किए गए हैं। ब्राह्मण के लिए वेद पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-कराना, दान देना और लेना; क्षत्रिय के लिए प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, वेद पढ़ना और विषयों में आसक्त न रहना; वैश्य के लिए पशुओं की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, वेद पढ़ना, व्यापार करना, ब्याज लेना और कृषि करना तथा शूद्रों के लिए तीनों वर्णों की सेवा करना मुख्य कर्त्तव्य बताए गए हैं। विभिन्न वर्णों के ये कर्त्तव्य ही वर्ण-धर्म हैं। इनके पालन से समस्त वर्णों के लोग धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक उपलब्धि कर सकते हैं।

आश्रम-धर्म

वैदिक-काल से ही आर्यों ने ‘आश्रम-व्यवस्था’ की ओर बढ़ना आरम्भ कर दिया था। उत्तरवैदिक-काल में चार आश्रमों का स्वरूप स्पष्ट रूप से सामने आया। ऋषियों ने मनुष्य जीवन को बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक चार आश्रमों में विभाजित किया- ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम।

इस व्यवस्था के माध्यम से मनुष्य अपना नैतिक, आध्यात्मिक और शारीरिक विकास कर सकता था। मनु के अनुसार इन चारों आश्रमों का विधिवत् पालन करके मनुष्य परम मोक्ष को प्राप्त करता है तथा ब्रह्मलोक का भागी बन जाता है। आश्रम-धर्म का पालन समस्त द्विज वर्ग के लिए श्रेयस्कर माना गया है। मनुष्य जीवन के अन्तिम लक्ष्य अर्थात् ‘मोक्ष’ को प्राप्त करने का यही एक सुगम और सुनियोजित मार्ग था। प्रत्येक आश्रम के लिए अलग नियम और संयम निर्धारित किए गए थे।

ब्रह्मचर्य आश्रम

ब्रह्मचर्य आश्रम के अन्तर्गत ब्रह्मचारी के लिए निर्देशित किया गया कि वह गुरु के सानिध्य में रहकर वेदाध्ययन करे, सूर्योदय से पूर्व उठे, स्नानादि से निवृत्त होकर सन्ध्योपासना और गायत्री मंत्र का जाप करे, शाकाहारी रहते हुए प्रसाधन सामग्री, स्त्री-स्पर्श, संगीत, नत्य आदि से दूर रहे, अपनी इन्द्रियों को वश में रखे, गुरु की सेवा करे तथा भिक्षा मांग कर अपना तथा गुरु का पोषण करे आदि।

गृहस्थ आश्रम

गृहस्थ के लिए आवश्यक था कि वह त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) का सेवन करता हुआ गृहस्थी के कार्यों का सम्पादन करे। मनु के अनुसार गृहस्थ आश्रम समुद्र के समान है जिसमें अन्य आश्रम नदी की तरह आकर मिलते हैं। गृहस्थ के लिए अंहिसा, सत्य वचन, दान आदि उत्तम धर्म माने गए। साथ ही पंच महायज्ञों का प्रावधान किया गया। देव-ऋण और पितृ-ऋण से मुक्ति भी गृहस्थ आश्रम के माध्यम से ही संभव थी।

वानप्रस्थ आश्रम

वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया त्यागकर वन में रहना होता था। उसे दम (इन्द्रिय निग्रह), संयम, त्याग, अनुशासन, धर्माचरण, सेवाभाव, तपस्या धर्म-चर्चा एवं स्वाध्याय आदि के माध्यम से स्वयं को सन्यास आश्रम के लिए तैयार करना होता था।

संन्यास आश्रम

संन्यास आश्रम में व्यक्ति स्वयं को संसार से पूर्णतः विरक्त करके ईश्वर भक्ति में लीन हो जाता था। उसे मोह, लोभ, क्रोध आदि से दूर रहकर सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, स्वाध्याय आदि का पालन करना पड़ता था।

इस प्रकार आश्रम-धर्म का पालन करना प्रत्येक व्यक्ति का परम कर्त्तव्य था, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने जीवन को संतुलित एवं उन्नत बनाता था।

कुल-धर्म

वर्णधर्म और आश्रम धर्म के साथ-साथ मनुष्य को अपने कुल-धर्म का भी पालन करना होता था। इसके अंतर्गत पारिवारिक और वंशगत नियमों तथा आचारों की पालना करनी होती थी। व्यक्ति का परिवार के सदस्यों के प्रति व्यवहार तथा कर्त्तव्य-पालन ही कुलधर्म का मुख्य अंग थे। पिता-धर्म, माता-धर्म, पति-धर्म, पुत्र धर्म, भ्रातृ-धर्म आदि कुल-धर्म के ही अंग हैं।

पिता का धर्म अपनी सन्तान और परिवार के अन्य सदस्यों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना है। माता का धर्म अपनी समस्त सन्तानों के प्रति प्रेम और परिवार के अन्य सदस्यों की सुविधाओं आदि का ध्यान रखना है। पति का धर्म अपनी पत्नी, सन्तान, माता-पिता आदि के साथ यथोचित व्यवहार तथा विनम्रता और सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करना है।

पत्नी का धर्म पति की सेवा, यौन-पवित्रता, सम-व्यवहार, बड़ों का आदर और छोटों से प्रेम तथा अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना है। पुत्र का धर्म अपने से बड़ों का आदर-सत्कार करना, माता-पिता की आशाओं को पूरा करना और देव-ऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण से मुक्त होना है। कन्या के प्रति माता-पिता का कर्त्तव्य तथा कन्या का माता-पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति कर्त्तव्य कुल-धर्म का ही अंग है।

युग-धर्म

युग-धर्म साधारण धर्म से अलग होता है। यह काल के अनुसार परिवर्तित हो जाता है। युग के अनुसार नैतिक आदर्श, कार्य-प्रणाली, आचार-विचार, व्यवहार, सांस्कृतिक प्रतिमान और नियम परिवर्तित होते रहते हैं। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग तत्कालीन समय के धर्म और आदर्श को व्यक्त करते हैं। सतयुग तप-धर्म के लिए, त्रेतायुग ज्ञान-धर्म के लिए, द्वापर युग यज्ञ-धर्म के लिए और कलियुग दान-धर्म की प्रधानता होती है।

राज-धर्म

राजा के लिए निर्धारित किए गए आदर्श एवं कर्त्तव्य साधारण जन के आदर्शों एवं कर्त्तव्यों से भिन्न हो सकते हैं। राजा को अपने स्वार्थ की रक्षा करने की बजाए प्रजा-हित पर अधिक ध्यान देना होता है तथा प्रजा में आदर्श स्थापित करने के लिए अपने सम्बन्ध में अप्रिय निर्णय लेने पड़ते हैं। राजा को प्रजा पर अपनी इच्छा आरोपित करने की बजाए धर्म के अनुसार शासन करना होता है तथा प्रजा को अपनी सन्तान मानकर उसके कल्याण के उपाय करने होते हैं।

राजा के प्रायः तीन प्रधान धर्म थे- (1.) बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा करना, (2.) देश और समाज को नियंत्रित रखना और (3.) समाज के लोगों को वर्णाश्रम धर्म पर चलने के लिए प्रेरित करना। राजा के लिए धर्म और नीति का ज्ञान होना अनिवार्य था। महाभारत के अनुसार धर्म का अनुपालन करने से राजा स्वर्ग का भागी होता है और अधर्म का अनुगमन करने पर नर्क का। सज्जन लोगों की रक्षा करना, दुर्जन लोगों को दण्डित करना तथा राज्य में सुख शान्ति और समृद्धि बनाए रखना राजा के मुख्य कर्त्तव्य थे।

स्वधर्म

परिवार और समाज के प्रति प्रत्येक मनुष्य के कुछ कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व होते हैं। परिस्थिति के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व भिन्न हो सकते हैं। इन्हीं कर्त्तव्यों को व्यक्ति का स्वधर्म कहा जाता है। पिता, माता, पुत्र, पुत्री आदि की स्थितियाँ धर्म के अनुसार भिन्न हैं, इसलिए उनके कर्त्तव्य भी भिन्न हैं।

वर्णाश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत मनुष्य जिन नैतिक कर्त्तव्यों का पालन करता है, वे कर्त्तव्य भी स्वधर्म के ही भाग हैं। भगवद् गीता के अनुसार अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए परधर्म से, गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। स्वधर्म में मरना भी कल्याणकारक है, परधर्म भय उत्पन्न करने वाला है- ‘श्रेयान्स्व धर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो मृत्यु भयावहा।’ यहाँ स्वधर्म का आशय वर्णाश्रम धर्म एवं मनुष्य के निजी कर्त्तव्य से है।

आपद्धर्म

परिस्थितियों के प्रतिकूल होने पर अथवा विपत्तिकाल में मनुष्य को साधरण धर्म का पालन करने से शिथिलता मिल जाती थी एवं वह आपद्धर्म का पालन कर सकता था। एक वर्ण के सदस्य विशेष परिस्थितियों में दूसरे वर्ण के धर्म को अपना सकते थे। ब्राह्मण क्षत्रिय अथवा वैश्य का, क्षत्रिय वैश्य का और वैश्य शूद्र का काम कर सकता था। ऐसी स्थिति में व्यक्ति का जन्म के वर्ण से सम्बन्धित कर्त्तव्य छूट जाता था तथा वह दूसरे वर्ण के कर्त्तव्य अपनाकर जीविकोपार्जन करता था।

शत्रु से घिर जाने पर राजा, अपने कुल एवं देश की रक्षार्थ युद्ध का त्याग कर सकता था। वह विपत्तिकाल में किसी ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य के घर में छिपकर रहता था तथा शत्रु को धोखा देने एवं राजा या राजकुमार के प्राण बचाने के लिए ब्राह्मण उसे अपनी थाली में भोजन करवाता था। इस प्रकार वर्ण-विरुद्ध आचरण करने से भी ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय को दोष नहीं लगता था। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – पुरुषार्थ-चतुष्टय

पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा

धर्म – पुरुषार्थ-चतुष्टय (1)

अर्थ – पुरुषार्थ-चतुष्टय (2)

काम – पुरुषार्थ-चतुष्टय (3)

मोक्ष – पुरुषार्थ-चतुष्टय (4)

अर्थ – पुरुषार्थ-चतुष्टय (2)

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अर्थ - पुरुषार्थ-चतुष्टय (3) - www.bharatkaitihas.com
अर्थ - पुरुषार्थ-चतुष्टय (3)

अर्थ रूपी पुरुषार्थ का आशय धन-सम्पत्ति एवं समृद्धि अर्जित करने से है। इसे दूसरा पुरुषार्थ माना गया है। धन के बिना समाज, परिवार एवं व्यक्ति का कार्य नहीं चल सकता किंतु धन में लालसा नहीं रखने को उच्च आदर्श माना जाता था। इस प्रकार भारतीय संस्कृति अर्थार्जन एवं निस्पृह जीवन के बीच संतुलन स्थापित करती है।

ऋग्वैदिक आर्य धन-सम्पत्ति, गौ-अश्व आदि की वृद्धि के लिए देवताओं से प्रार्थना करते थे। अतः अर्थ का अभिप्राय अत्यन्त विस्तृत है। यजुर्वेद की एक ऋचा के अनुसार ‘अर्थ समस्त लोक-व्यवहारों का मूल है।’ इसके बिना मनुष्य के लौकिक एवं पारलौकिक दायित्व सम्पादित नहीं हो सकते। वैदिक ऋचाओं में भी धन की कामना की गई है। शास्त्रों में धन का उपार्जन धर्मानुकूल कार्यों से करने का निर्देश दिया गया है। परिवार के भरण-पोषण तथा उसे समृद्ध एवं उन्नतिशील बनाने में अर्थ रूपी पुरुषार्थ का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

कौटिल्य ने अपने ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में मानव जीवन में अर्थ की महत्ता को सर्वोपरि मान्यता देते हुए लिखा है कि धर्म और काम दोनों अर्थमूलक ही होते हैं। अर्थात् इन दोनों का अस्तित्त्व अर्थ पर ही निर्भर है। लोक निर्वाह भी अर्थ के माध्यम से हो सकता है। जब ऋषि याज्ञवल्क्य राजा जनक के यहाँ पहुँचे तब जनक ने उनसे पूछा- ‘आपको धन और पशु चाहिए या शास्त्रार्थ और विजय?’

ऋषि याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि दोनों चाहिए। निश्चय ही याज्ञवल्क्य की दृष्टि में धन का भी महत्त्व था। कौटिल्य के अनुसार ‘काम से धर्म और धर्म से अर्थ श्रेष्ठ समझना चाहिए।’ यद्यपि मनुष्य जीवन में अर्थ की प्रधानता अपरिहार्य है किन्तु पुरुषार्थ में स्वीकृत ‘अर्थ’ का आशय धर्मपूर्वक अर्जित अर्थ से है।

महाभारत में कहा गया है कि अर्थ उच्चतम धर्म है। प्रत्येक वस्तु उस पर निर्भर करती है। धन-सम्पन्न लोग सुख से रह सकते हैं। किसी व्यक्ति के धन का क्षय करके उसके त्रिवर्ग (धर्म, काम और मोक्ष) को प्रभावित किया जा सकता है। धन को काम और धर्म का आधार माना गया है। इसी से स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त होता है। धर्म-स्थापन के लिए धन अनिवार्य है क्योंकि इसी से धार्मिक कृत्य सम्पन्न किए जा सकते हैं।

जो व्यक्ति धन से क्षीण है, वह धर्म से भी क्षीण है, क्योंकि धार्मिक कार्यों में धन की आवश्यकता होती है। धन-विहीन व्यक्ति ग्रीष्म की सूखी सरिता के समान कहा गया है। बृहस्पति-सूत्र में कहा गया है कि धन-सम्पन्न व्यक्ति के पास मित्र, धर्म, विद्या, गुण आदि सब-कुछ होता है जबकि धनहीन व्यक्ति मृतक अथवा चाण्डाल के समान होता है। इस प्रकार अर्थ ही जगत् का मूल है।

अनेक शास्त्रकारों ने धन को जीवन का प्रधान साधन माना है तथा किसी भी स्थिति में धन का जीवन से अलगाव स्वीकार नहीं किया है। धनी व्यक्ति अच्छे कुल और उच्च स्थिति का माना जाता है। वह पण्डित, वेदज्ञ (वेदों का ज्ञाता), वक्ता, गुणज्ञ एवं दर्शनीय माना जाता है। इस प्रकार धन में समस्त गुण समाहित हो जाते है। आपस्तम्ब धर्मसूत्र ने मनुष्य को धर्मानुकल समस्त सुखों का उपभोग करने के लिए निर्दिष्ट किया है।

धर्मशास्त्रों में अर्थ-शक्ति की निन्दा भी की गई है। मनु ने लिखा है- ‘जो व्यक्ति अर्थ और काम के प्रति अनासक्त है, उसी के लिए धर्म का विधान है।’ जब धनोपार्जन के साधन दूषित हो जाते हैं, जब अर्थ प्राप्ति के लिए हिंसा का आश्रय लेना पड़ता है, प्राणियों को पीड़ित किया जाता है, दूसरे व्यक्तियों के स्वत्व का अपहरण किया जाता है और शोषण-पद्धति द्वारा अर्थ-संचय की पाप-युक्त प्रवृत्ति उग्र रूप धारण कर लेती है, ऐसा ‘धन’ गर्हित, त्याज्य और अवांछनीय है। पाप से कमाए गए धन के कारण व्यक्ति मदान्ध एवं हिंसक हो जाते हैं। वेदों में ऐसे लोगों को ‘असुर’ कहा गया है। वेदों के अनुसार धर्मानुसार धन अर्जनीय है।

धन के विविध रूप हैं। मुद्रा, स्वर्ण, अन्न, फल, फूल, मेवा, रत्न, हीरा, माण्क्यि, गाय, घोड़ा, हाथी आदि भी धन ही हैं। बुद्धि, विवेक एवं ज्ञान भी धन हैं। वेदों ने ‘पार्थिव-धन’ एवं ‘दैवीय-धन’ की चर्चा की है। अनेक लोग बाह्य धन की अपेक्षा आन्तरिक धन की अधिक चिन्ता करते हैं परन्तु आन्तरिक धन भी बाह्य धन की उपेक्षा नहीं करता, उसे वह अपना सहायक समझता है। इस प्रकार अर्थ मनुष्य जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है और इसीलिए वह पुरुषार्थ की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – पुरुषार्थ-चतुष्टय

पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा

धर्म – पुरुषार्थ-चतुष्टय (1)

अर्थ – पुरुषार्थ-चतुष्टय (2)

काम – पुरुषार्थ-चतुष्टय (3)

मोक्ष – पुरुषार्थ-चतुष्टय (4)

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