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काम – पुरुषार्थ-चतुष्टय (3)

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काम - पुरुषार्थ-चतुष्टय (3)

मनुष्य जीवन में ‘ काम ‘ को तीसरा पुरुषार्थ माना गया है। इस पुरुषार्थ का भी मनुष्य जीवन में शेष तीनों पुरुषार्थों के समान ही महत्त्व है।

काम के दो स्वरूप हैं- (1.) कामना अर्थात् किसी भी वस्तु अथवा सुख को प्राप्त करने की इच्छा। (2.) यौन-सुख अथवा ऐन्द्रिक-इच्छा। पुरुषार्थ रूपी काम का प्रमुख आशय यौन-इच्छाओं से ही है। यह प्राणी मात्र की सहज प्रवृत्ति है जो उसे प्रकृति से मिली है।

संतान प्राप्ति की इच्छा का कारण भले ही कुछ भी हो किंतु संतान प्राप्ति का माध्यम केवल यौन-इच्छा है। यौन-इच्छा के वशीभूत होकर प्राणी इस संसार चक्र को आगे बढ़ाने में समर्थ हेाता है। यौन-इच्छा के कारण ही मनुष्य पत्नी और सन्तान की कामना करता है। काम-भाव के अंतर्गत यौन-आकर्षण से लेकर स्नेह, प्रेम, वात्सल्य, अनुराग आदि सम्मिलित होते हैं तथा इस भाव का चरम इन्द्रिय-सुख और यौन-इच्छाओं की तृप्ति है।

‘काम’ मनुष्य जीवन में उत्साह एवं आनंद की सृष्टि करता है तथा उसे ऊंचाइयों तक ले जाता है किंतु इसका अतिरेक चारित्रिक दुर्बलता एवं महान् दुर्गुण माना जाता है। इसलिए काम का सेवन भी अर्थ की भांति धर्मानुकूल होना चाहिए। सामाजिक मर्यादाओं के बंधन में रहे बिना यौन-इच्छा की पूर्ति, व्यक्ति एवं सम्पूर्ण मानव समाज को हीन अवस्था में पहुँचा सकती है तथा उन्हें पशुवत् बना सकती है। अतः काम पर धर्म के बंधन के साथ-साथ सामाजिक मर्यादाओं का भी अंकुश होना चाहिए।

 महाभारत में कहा गया है कि ‘धर्म’ सदा ही ‘अर्थ’ प्राप्ति का कारण है और ‘काम’, ‘अर्थ’ का फल है। कौटिल्य ने काम को अन्तिम श्रेणी में रखा है तथा बिना धर्म और अर्थ को बाधा पहुँचाये इसका पालन करने का निर्देश दिया है। मनु ने ‘काम’ को ‘तमोगुण’ माना है। यौन-इच्छा को मनुष्य का अन्तिम उद्देश्य मानकर, धर्म और अर्थ की प्राप्ति के बाद ही इसकी ओर देखना चाहिए। फिर भी काम को धर्म का सार माना गया है क्योंकि व्यक्ति की समस्त अन्तर्वृतियाँ कामना से संचालित होती हैं।

यौन-इच्छा के तीन मुख्य आधार माने गए है- जैविकीय, सामाजिक और धार्मिक। व्यक्ति अपनी ‘ऐन्द्रिक-इच्छाओं’ अर्थात् वासनाओं की पूर्ति जैविकीय आधार पर करता है। ऐन्द्रिक-इच्छाओं की तृप्ति न होने पर मनुष्य में निराशा, तनाव, आक्रोश और क्रोध उत्पन्न होता है। जबकि इनकी पूर्ति से व्यक्ति के मन में तृप्ति का भाव आता है। उसके मन को पूर्णता प्राप्त होती है एवं उसके अहंकार की भी पूर्ति होती है। ऐसा मनुष्य संयत्, शीलयुक्त एवं मर्यादित आचरण करता है।

इच्छाओं से तृप्त व्यक्ति धर्म का अनुसरण करता है तथा अंत में ईश्वर को प्राप्त करने की चेष्टा करता है जबकि काम-इच्छाओं की पूर्ति न होने से मनुष्य, ‘कामाग्नि’ में झुलसता रहता है। कामेच्छा पूरी किए बिना उसे दूसरी वस्तुओं की कामना नहीं रह जाती। इसलिए कौटिल्य ने लिखा है- ‘मनुष्य को धर्म, अर्थ और काम का समान भाव से सेवन करना चाहिए।’ इनमें से किसी एक को अपनाने एवं अन्य पुरुषार्थों की उपेक्षा करने से मनुष्य का चिंतन, दृष्टिकोण एवं व्यवहार असंतुलित हो जाते हैं। 

अनेक विद्वानों द्वारा ‘काम’ को मात्र ‘यौन-सुख’ मानने की प्रवृत्ति की कटु आलोचना हुई तथा ‘कामना’ को भी ‘काम’ माना गया। यदि ‘काम’ सृष्टि का मूल है तो ‘कामना’ जीवन का आधार है। कामना-रहित जीवन, संभव नहीं है। कामना का मूल मनुष्य के ‘मन’ में कामना से विराजमान है।

इसीलिए काम को ‘मनोज’ अर्थात् ‘मन से जन्म लेने वाला’ कहा गया है। ‘काम’ से ही मन में विविध ‘कामनाएँ’ उत्पन्न होती हैं। किसी कामना के उदय होने पर ही हम किसी कार्य को करने के लिए उद्यत होते हैं और उस ‘उद्यम’ का फल कामनाओं की पूर्ति के रूप में प्राप्त होता है।

प्राचीन ऋषिगण किसी न किसी कामना से संयुक्त होकर तपस्या करते थे। कामना के वशीभूत होकर ही ब्राह्मण वेदों का अध्ययन एवं अध्यापन करते थे। कामना से ही मनुष्य श्राद्धकर्म, यज्ञकर्म, दान और प्रतिग्रह में प्रवृत्त होता है। व्यापारी, कृषक, शिल्पी तथा कर्मकार भी किसी न किसी कामना से ही अपने-अपने कर्मों में प्रवृत होते हैं।

बिना कामना के ब्राह्मण भी अच्छे अन्न का भोजन नहीं करते और न ही कोई बिना कामना के ब्राह्मणों को दान देता। मनु ने न तो कामुकता को प्रशंसनीय माना है और न ही काम-विहीन अवस्था को। यदि केवल ‘कामना-विहीनता’ को स्वीकार किया जाए तो सत् कार्यों के मूल में निहित काम का भी परित्याग करना पड़ता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – पुरुषार्थ चतुष्टय

पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा

धर्म – पुरुषार्थ-चतुष्टय (1)

अर्थ – पुरुषार्थ-चतुष्टय (2)

काम – पुरुषार्थ-चतुष्टय (3)

मोक्ष – पुरुषार्थ-चतुष्टय (4)

मोक्ष – पुरुषार्थ-चतुष्टय (4)

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मोक्ष - पुरुषार्थ-चतुष्टय (4)

मानव-जीवन का अन्तिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ है। धर्म, अर्थ और काम के सेवन का लक्ष्य भी मोक्ष है। वर्णाश्रम धर्म का लक्ष्य भी मोक्ष है। वेदों के अध्ययन-अध्यापन का अंतिम लक्ष्य भी मोक्ष है। श्रेष्ठतम एवं निकृष्टतम व्यक्ति भी अपने लिए अंत में मोक्ष की कामना करते हैं। इसलिए मोक्ष को चतुर्थ पुरुषार्थ में सम्मिलित किया गया है।

जीवन को पूर्णतः धार्मिक और आध्यात्मिक बना पाना अत्यन्त कष्टप्रद और दुर्गम है। उसके लिए मानवीय प्रवृत्तियों का उनके चरम स्तर तक संयमित होना आवश्यक है जबकि मनुष्य का मन अभिलाषाओं और आकांक्षाओं का घर होता है। इन अभिलाषाओं और आकांक्षाओं से छुटकारा पाना अत्यंत कठिन है और इनसे छुटकारा पाए बिना मनुष्य को निवृत्ति अर्थात् मोक्ष नहीं मिलता।

मनुष्य के भीतर प्रवृत्ति और निवृत्ति का संघर्ष जीवन भर चलता है। जब मनुष्य का हृदय इस संघर्ष में विजयी होकर सहज, स्वाभाविक, आत्म-चिन्तन से युक्त, आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत और बौद्धिकता से सम्पन्न होता है, तब उसकी अभिलाषाओं और आकांक्षाएं समाप्त होकर मोक्ष प्राप्त होता है।

प्रायः मनुष्य वृद्धावस्था में लौकिक सुखों का मोह त्यागकर पारलौकिक सुख की ओर अग्रसर होता है। धर्म एवं अध्यात्म के सहारे वह परमब्रह्म की ओर बढ़ने का प्रयास करता है। जब जीवात्मा परमब्रह्म में लीन होकर आवागमन के बन्धन से मुक्त हो जाता है तब वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। आत्मा और परमात्मा का तादात्म्य ही मोक्ष तथा परम आनन्द की उपलब्धि है। आत्मा ‘सीमित’ है तथा परमात्मा ‘असीम’।

मोक्ष ‘ससीम’ और ‘असीम’ में एकात्मकता स्थापित करता है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार मोक्ष ‘परम ज्ञान’ और ‘आनन्द’ की वह अवस्था है जिसमें जीव (आत्मा) परमब्रह्म (परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है तथा संसार के आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है।

साधारणतः ‘मोक्ष’ का अर्थ ‘जीवन से मुक्ति’ प्राप्त करने से लिया जाता है किन्तु वास्तव में मोक्ष का अर्थ ‘आत्मा की मुक्ति’ है। मनुष्य की प्रवृत्तियाँ  सत्, रज और तम नामक गुणों से संचालित होती हैं। जब मनुष्य की बुद्धि सात्विक वृत्ति से अविरल होती है तब वह राजसिक एवं तामसिक प्रवृत्तियों से छुटकारा पाकर मोक्ष की ओर आकर्षित होता है।

मनुष्य की बुद्धि और मन प्रकृति (माया) से ढंके हुए होते हैं इस कारण मनुष्य अपना वास्तविक स्वरूप भूल हुआ रहता है। जब मनुष्य को सात्विक ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है तब उस पर से माया का आवरण हट जाता है और उसे अपने वास्तविक स्वरूप के दर्शन होते हैं। इसी को ‘कैवल्य’ अथवा ‘मोक्ष’ कहते हैं। यही प्रकृति और पुरुष का वास्तविक सम्बन्ध अर्थात् जीव और आत्मा का मिलन है।

अज्ञान को त्यागकर वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करना, मोह के अंधकार से निकलकर अपने वास्तविक स्वरूप को जानना एवं तमोगुण और रजोगुण से निवृत्ति पाकर सतोगुण में स्थिर होना ही मोक्ष है। सतोगुण में स्थिर जीवात्मा प्रकृति (माया) को छोड़कर ब्रह्म से संयुक्त हो जाती है।

मोक्ष-प्राप्ति के मार्ग

मोक्ष-प्राप्ति के तीन मुख्य मार्ग हैं- कर्म, ज्ञान और भक्ति। मनुष्य इनमें से किसी भी मार्ग पर चलकर मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

कर्म-मार्ग

शास्त्रकारों का मत है कि मनुष्य अपने सामाजिक और धार्मिक कर्मों का निष्ठापूर्वक सम्पादन करके मोक्ष की और प्रवृत हो सकता है। वह अपने विभिन्न कर्त्तव्यों को, बिना किसी फल की आकांक्षा के करता है। इससे मनुष्य में अनासक्ति की भावना रहती है। इस प्रकार कर्म मार्ग पर चलने से उसे परम गति (मोक्ष) की प्राप्ति होती है। विभिन्न आश्रमों के अंतर्गत रहते हुए एवं निर्दिष्ट कर्मों का यथोचित सम्पादन करने से ही व्यक्ति मोक्ष-प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है।

मनु के अनुसार तीनों ऋणों (देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण) से उऋण होकर ही व्यक्ति को मोक्ष के लिए प्रयत्न करना चाहिए। इन ऋणों से उऋण हुए बिना मोक्ष प्राप्त नहीं होता अपितु मनुष्य नर्क का अधिकारी होता है। मोक्ष के इच्छुक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक था कि वह वेदों का ज्ञान प्राप्त करे, धर्मानुसार पुत्रों को उत्पन्न करे, यथाशक्ति यज्ञों का अनुष्ठान करे और तत्पश्चात् मोक्ष की इच्छा करे।

पुराणों के अनुसार समस्त आश्रमों के कार्य सम्पादित करने के बाद मोक्ष मिलता है। वायु-पुराण में कहा गया है कि अन्तिम आश्रम का अनुवर्ती व्यक्ति शुभ और अशुभ कर्मों को त्याग कर जब अपना स्थूल शरीर छोड़ता है तब वह जन्म-मृत्यु और पुनर्जन्म से पूर्णतः मुक्त हो जाता है।

ज्ञान-मार्ग

चिंतनशील व्यक्ति ज्ञान और विचार से ईश्वर के अव्यक्त और निराकार भाव के प्रति अनुरक्त होकर ‘ब्रह्म’ से एकाकार होने का प्रयास करता हैं। ज्ञानी और विद्वान् व्यक्तियों का यही आधार ज्ञान-मार्ग है।

भक्ति-मार्ग

श्रीमद्भागवत पुराण, श्रीमद्भागवत गीता एवं परवर्ती ग्रंथों में मोक्ष प्राप्त करने के लिए भक्ति-मार्ग का निरूपण किया गया है। इन ग्रंथों में  भक्ति को कर्म और ज्ञान से श्रेष्ठ बताया गया है। भक्ति-मार्ग के अन्तर्गत मनुष्य ब्रह्म के सगुण अथवा निर्गुण अथवा दोनों रूपों की उपासना करता है और अपने सांसारिक बंधनों एवं लालसाओं को त्यागकर स्वयं को पूर्ण रूप से ब्रह्म (ईश्वर) की सेवा में समर्पित कर देता है।

ब्रह्म तक पहुँचने के लिए कई तरह की भक्ति की जाती है। भक्त अपने सुख-दुःख, ऊँच-नीच, अच्छा-बुरा और जन्म-मृत्यु सब कुछ भूल जाता है। यही सच्ची और सार्थक भक्ति है।

मोक्ष-प्राप्ति हेतु चरित्र एवं आचरण की शुद्धता

मोक्ष के आकांक्षी व्यक्ति के लिए अपना अन्तःकरण और आचरण शुद्ध एवं सात्विक रखना आवश्यक था। वह दिन में एक बार भिक्षा मांगता था तथा भिक्षा मिलने या नहीं मिलने पर हर्ष या कष्ट का अनुभव नहीं करता था। वह उतनी ही भिक्षा मांगता था जिससे उसका उदर भर जाता था। वह आसक्ति से दूर रहता था। उसके लिए चित्त-वृत्तियों पर नियंत्रण एवं इन्द्रिय-निरोध का अभ्यास आवश्यक था।

इन्द्रियों को वश में किए बिना मनुष्य न तो मोह से दूर हो सकता है और न वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकता है। आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए चित्त-वृत्तियों पर नियंत्रण एवं इन्द्रिय-निरोध करके मन की एकाग्रता को प्राप्त करना आवश्यक है। मनु के अनुसार इन्द्रिय-निरोधी व्यक्ति, राग-द्वेष का त्यागी और अंहिसा में युक्त व्यक्ति ही मुक्ति के योग्य होता है।

नियंत्रणहीन इन्द्रियाँ मनुष्य के मन और मस्तिष्क को भ्रमित कर देती है, जिससे वह मोह-माया एवं सांसारिकता में फँसा रहता है और राग-द्वेष में लिप्त रहता है। राग-द्वेष के वशीभूत होकर वह मन, वचन एवं कर्म से दूसरों के प्रति हिंसा करता है।

पुराणों में भी मोक्ष के आकांक्षी व्यक्ति के लिए चरित्र एवं आचरण की शुद्धता का निर्देशन किया गया है। विष्णु-पुराण के अनुसार व्यक्ति को शत्रु और मित्र के प्रति सम-भाव रखते हुए किसी जीव की हिंसा नहीं करनी चाहिए तथा काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार का त्याग करना चाहये।

वायु-पुराण के अनुसार मोक्ष के इच्छुक व्यक्ति के लिए दया, क्षमा, अक्रोध, सत्य आदि गुण धारण करना अनिवार्य हैं। मत्स्य-पुराण में काम का परित्याग अनिवार्य बताया गया है। मनु के अनुसार अहिंसा, विषयों में अनासक्ति, वेद-प्रतिपादित कर्म और कठोर तपस्या से मनुष्य भू-लोक में परम-पद (ब्रह्म पद) को साध लेता है।

काम एवं अर्थ की उपेक्षा

कोई भी पुरषार्थी व्यक्ति धर्म, अर्थ और काम के नियमों का पालन करके अपना दैहिक, दैविक एवं भौतिक उत्थान कर सकता है तथा मोक्ष अर्थात् परम-पद का अधिकारी हो सकता है। वह शुद्ध विचारों तथा पवित्र आचरण का अनुसरण करके अपने जीवन को श्रेष्ठ एवं आदर्शमय बना सकता है।

संयम, नियम और अनुशासन से युक्त जीवन किसी भी मनुष्य के पुरुषार्थी होने का प्रमाण है। भारतीय शास्त्रों में वर्णित चारों पुरुषार्थ एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। किसी एक पुरुषार्थ की उपेक्षा करके अथवा किसी एक पुरुषार्थ को अधिक महत्व देकर मनुष्य के चिंतन एवं व्यक्तित्व का संतुलन भंग हो जाता है।

भारत में संन्यास-परम्परा की बलवती धारा प्रत्येक युग में विद्यमान रही है जिसके अंतर्गत मनुष्य गृहस्थ आश्रम एवं वानप्रस्थ आश्रम की उपेक्षा करके ब्रह्मर्च आश्रम एवं सन्यास आश्रम का ही पालन करता है। ऐसी स्थिति में वह केवल स्वयं को धर्म एवं मोक्ष नामक पुरुषार्थों पर केन्द्रित करता है और अर्थ एवं काम की पूर्ण उपेक्षा करता है।

वैदिक युग से काफी बाद में अपने विकसित रूप में आए भक्ति मार्ग में भी अर्थ एवं काम की उपेक्षा करके केवल धर्म एवं मोक्ष नामक पुरुषार्थों की साधना पर जोर दिया गया है किंतु सामान्य गृहस्थ के लिए वर्णाश्रम धर्म (अर्थात् चार वर्ण एवं चार आश्रम) के लिए निर्धारित कर्त्तव्यों का पालन करते हुए, चारों पुरुषार्थों की उपलब्धि हेतु प्रयास करने को ही श्रेयस्कर माना गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – पुरुषार्थ-चतुष्टय

पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा

धर्म – पुरुषार्थ-चतुष्टय (1)

अर्थ – पुरुषार्थ-चतुष्टय (2)

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मोक्ष – पुरुषार्थ-चतुष्टय (4)

आर्यों की आश्रम व्यवस्था

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आर्यों की आश्रम व्यवस्था

मनुष्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आर्यों की आश्रम व्यवस्था की स्थापना हुई तथा मनुष्य के लिए नियम एवं कर्त्तव्य निर्धारित किए गए।      

मनुष्य जीवन बचपन, यौवन, प्रौढ़वय एवं वृद्धावस्था से गुजरता हुआ  पूर्णता को प्राप्त होता है। प्रत्येक वय में मनुष्य की आवश्यकताएं, क्षमताएं एवं रुचियाँ भिन्न होती हैं तथा इनके अनुसार ही मनुष्य अलग-अलग कार्य करता है। मनुष्य जीवन की रुचियों को पूरा करने, उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने एवं क्षमताओं में वृद्धि करने के लिए आर्यों की आश्रम व्यवस्था की स्थापना हुई तथा प्रत्येक आश्रम के लिए नियम, पद्धतियां एवं कर्त्तव्य निर्धारित किए गए।

इन आश्रमों की व्यवस्था इस प्रकार की गई कि मनुष्य की दैहिक, दैविक एवं भौतिक आवश्यकताओं की सरलता से पूर्ति हो सके। उसकी आकांक्षाएं दमित न हों अपितु मर्यादित हों। उसकी रुचियां परिष्कृत हों। आश्रम व्यवस्था के पालन से मनुष्य को लौकिक और पारलौकिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक, निजी एवं सामाजिक सभी प्रकार की उपलब्धियां सहज ही प्राप्त हो सकें।

भारतीय आश्रम व्यवस्था विश्व भर की संस्कृतियों में सबसे अनूठी, सबसे विलक्षण और सबसे अलग थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत रहता हुआ मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों पुरुषार्थों का निर्बाध रूप से सेवन करता था। प्रत्येक आश्रम का आधार जैविकीय, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित किया गया था।

आश्रम व्यवस्था मनुष्य को कर्त्तव्यों एवं दायित्वों के साथ-साथ बाल-सुलभ जिज्ञासाओं की पूर्ति, युवा जीवन के रोमांच, गृहस्थी के सुख, तपस्या का सुख एवं सन्यासी के रूप में उसके अनुभवों का समाज में पुनः वितरण जैसी दुर्लभ उपलब्धियाँ कराती थीं।

भारतीय दर्शन में की गई पुरुषार्थ की संकल्पना आश्रम-व्यवस्था से ही सम्बद्ध है। ज्ञान, कर्त्तव्य, त्याग और अध्यात्म की उपलब्धि के लिए मनुष्य जीवन को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम में विभाजित किया गया। इस व्यवस्था का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति करना था। भारतीय चिन्तकों ने मनुष्य के जीवन को सौ वर्षों का मानकर, प्रत्येक आश्रम के लिए पच्चीस-पच्चीस वर्ष के चार कालखण्ड निर्धारित किए।

आर्यों की आश्रम-व्यवस्था का विकास

आश्रम व्यवस्था का उद्भव उत्तर-वैदिक-काल में हुआ। कुछ विचारकों का मत है कि आश्रम-व्यवस्था का प्रचलन महात्मा बुद्ध के बाद अथवा पिटक-साहित्य की रचना के बाद हुआ था, क्योंकि इन रचनाओं में आश्रम-व्यवस्था का उल्लेख नहीं हुआ है। इन विचारकों का यह भी मत है कि उपनिषदों में भी चारों आश्रमों के नाम नहीं मिलते किन्तु यह धारणा सही नहीं है क्योंकि उपनिषदों सहित विभिन्न वैदिक ग्रंथों में ‘ब्रह्मचारी, ब्रह्मचर्य, गृहपति, गृहस्थ एवं यति’ आदि शब्दों का उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है।

‘यति’ का ‘सन्यासी’ के अर्थ में उल्लेख दो या तीन स्थानों पर हुआ है। ब्राह्मण-ग्रन्थों, आरण्यकों और उपनिषदों के रूप में जो उत्तर-वैदिक साहित्य है, उनमें चारों आश्रमों के संकेत मिलते हैं। यद्यपि ‘ब्रह्मचारी’, ‘गृहस्थ’ (गृहपति) और ‘मुनि’ एवं ‘यति’ आदि शब्द ऋग्वेद में बार-बार आए हैं तथापि आश्रमों का सुस्पष्ट विभाजन उत्तर-वैदिककालीन व्यवस्था है। उपनिषदों में अनेक स्थानों पर आश्रम-सूचक शब्दों का उल्लेख हुआ है।

ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य आश्रम को पूर्ण कर ‘गृही’ (गृहस्थ) बने, गृही जीवन बिताकर ‘वनी’ (वानप्रस्थ) बने और फिर वनी होने के बाद ‘परिव्राजक’ (सन्यासी) बन जाए। ‘वृहदारण्यकोपनिषद्’ में महर्षि याज्ञवलक्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहा है- ‘मैं अब गृहस्थी से प्रव्रज्या ग्रहण करने जा रहा हूँ।’

जिन संज्ञाओं द्वारा चार आश्रमों का प्रतिपादन किया गया, उनका सर्वप्रथम उल्लेख ‘जाबालोपनिषद’ में मिलता है। याज्ञवल्क्य ने राजा जनक को विभिन्न आश्रमों की व्याख्या करके सुनाई थी। इस प्रकार चार आश्रमों की संकल्पना धीरे-धीरे विकसित हुई। इसका प्रस्फुटन वेदों के रचना काल में हुआ, इसका विकास उपनिषदों के रचना काल में हुआ तथा सुस्पष्ट रूप से स्थापन सूत्रग्रंथों के रचना काल में हुआ।

सूत्र-युग में ही आश्रमों के पारस्परिक सम्बन्ध और उनकी कर्मगत व्यवस्थाएं स्थिर हुईं। सूत्र-ग्रन्थों, पुराणों, महाभारत और स्मृतियों में चारों आश्रमों का स्पष्ट तथा विशद् वर्णन हुआ है और चारों आश्रमों के धर्म एवं कर्त्तव्य बताए गए हैं।

आश्रमों की प्रतिष्ठा

बोधायन धर्मसूत्र के अनुसार आश्रम-व्यवस्था का प्रारम्भ प्रहल्लाद के पुत्र कपिल द्वारा किया गया था। उसमें उल्लेख किया गया है कि देवताओं की स्पर्धा में मनुष्यों ने इसका सूत्रपात किया। देवता मानते थे कि आश्रम-व्यवस्था उन्नत और विकसित समाज के लिए आवश्यक है, अतः दूसरों को भी अपनानी चाहिए। महाभारत, ब्रह्माण्ड-पुराण और वायु-पुराण के अनुसार ब्रह्मा द्वारा चार वर्णों के समान चार आश्रमों की भी स्थापना की गई।

चार वर्णों की तरह चार आश्रमों का उद्गम ब्रह्मा से होना इसलिए बताया गया ताकि लोग इसे धर्म समझकर स्वीकार कर लें। इन आश्रमों के नाम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक दिए गए हैं। सन्यासी के लिए ही भिक्षुक शब्द का प्रयोग हुआ है।

पुराणों के अनुसार आश्रमों का चिन्तन इसलिए किया गया ताकि समाज के विभिन्न सदस्य अपने कर्म निष्ठापूर्वक सम्पादित कर सकें। ब्रह्माण्ड-पुराण के अनुसार महाराज सगर के राज्य में आश्रम-व्यवस्था का पूर्णतः पालन किया जाता था। छान्दोग्य-उपनिषद के अनुसार आश्रम धर्म का पालन करने वालों को पुण्य-लोक की प्राप्ति होती है।

मत्स्य-पुराण के अनुसार इसका पालन न करने वाले अथवा निरादर करने वाले यातना के भागी होते हैं। वायु पुराण के अनुसार इसका पालन न करने वालों को नर्क की प्राप्ति होती थी। द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों के लिए आश्रम-व्यवस्था का पालन करना आवश्यक था।

प्रारम्भ में आश्रमों की संख्या तीन थी- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ तथा वानप्रस्थ। उस काल में वानप्रस्थ और सन्यास को एक ही आश्रम माना गया था, क्योंकि दोनों (वानप्रस्थ और सन्यास) का आधार आध्यात्म, सत्य की खोज और मोक्ष की प्राप्ति करना था। व्यक्ति को सन्यास में जो कुछ करना होता था, उसी की तैयारी वह वानप्रस्थ आश्रम में करता था। सम्भवतः इसीलिए दोनों में भेद करना उचित नहीं समझा गया किंतु बाद में सन्यास आश्रम अलग से स्थापित हुआ तथा इन दोनों आश्रमों के कर्त्तव्य सुस्पष्ट रूप से अलग-अलग निर्धारित किए गए।

छान्दोग्य उपनिषद में धर्म के तीन स्कन्ध (आधार स्तम्भ) बताए गए हैं- (1.) यज्ञ, (2.) अध्ययन और (3.) दान। प्रथम स्कन्ध में तप करना, द्वितीय स्कन्ध में ब्रह्मचारी रूप में आचार्य-कुल में निवास करना और तृतीय स्कन्ध में अपने शरीर को क्षीण कर देना शामिल हैं। मनु ने भी एक स्थान पर तीन आश्रमों का उल्लेख किया है किन्तु बाद में उसने कहा है कि सौ वर्ष के चार आश्रमों को पच्चीस-पच्चीस वर्ष के चार भागों में विभाजित किया जा सकता है।

गौतम धर्मसूत्र, आपस्तम्ब धर्मसूत्र, विष्णु-पुराण, वसिष्ठ आदि शास्त्रकारों ने भी चार आश्रमों की चर्चा की है- (1.) ब्रह्मचर्य, (2.) गृहस्थ, (3.) वानप्रस्थ और (4.) सन्यास अथवा परिव्राजक (यति)।

राजा का यह कर्त्तव्य था कि प्रजा को अपने-अपने वर्ण-धर्मों का पालन करने के साथ-साथ आश्रम-धर्मों के पालन के लिए भी प्रेरित करे किंतु आश्रम-व्यवस्था मूलतः राजनीतिक या धार्मिक न होकर सामाजिक व्यवस्था थी। आश्रम व्यवस्था का व्यावहारिक अर्थ व्यवस्थित और नियमित जीवन जीने से है। अव्यवस्थित जीवन से मनुष्य भौतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियां अर्जित नहीं कर सकता।

मनुष्य स्वाभाविक रूप से भी अपने जीवन के प्राम्भ में शिक्षा ग्रहण करता है, उसके बाद गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके अर्थ और काम का सेवन करता है तथा अंत में आध्यात्मिक उपलब्धियों को अर्जित करता हुआ, मोक्ष प्राप्त करना चाहता है। आश्रम व्यवस्था में यद्यपि समस्त आश्रमों का बराबर महत्व था किंतु गृहस्थ आश्रम को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना गया था, क्योंकि अन्य सभी आश्रम गृहस्थाश्रम पर ही निर्भर करते थे।

मनु ने कहा है- ‘जिस प्रकार प्राणवायु का आश्रय प्राप्त कर समस्त जीव जीवित रहते हैं, उसी प्रकार गृहस्थ आश्रम का आश्रय प्राप्त करके समस्त आश्रम चलते हैं।’

आश्रम-व्यवस्था के धर्म एवं कर्त्तव्य

मनुष्य के जीवन को कर्म के अनुसार व्यस्थित करने के लिए वैदिक ऋषियों ने चार आश्रमों की व्यवस्था की थी- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम। याज्ञवल्क्य के अनुसार ब्राह्मणों के लिए चारों आश्रम अत्यंन्त आवश्यक थे और जो ब्राह्मण इन चारों आश्रमों का शास्त्रानुसार पालन करता था, वह परमगति को प्राप्त करता था।

ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य द्विजों (क्षत्रिय एवं वैश्य) के लिए तीन आश्रम- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ थे, उनके लिए सन्यास आश्रम का विधान नहीं था। पुराणों ने भी चार आश्रमों का महत्त्व बताया है। मत्स्य पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण और वायु पुराण के अनुसार गृहस्थ, भिक्षु, आचार्यकर्मा (ब्रह्मचारी) तथा वानप्रस्थ, चार आश्रमजीवी हैं तथा वर्णों के धर्म को प्रतिष्ठित करने के उपरान्त ब्रह्मा ने चार आश्रमों को स्थापित किया।

10वीं-11वीं शताब्दी के लेखक अलबरूनी ने भी चार आश्रमों का उल्लेख किया है। वह लिखता है- ‘ब्राह्मण (द्विज) का जीवन सात वर्ष की आयु के पश्चात् चार भागों (आश्रमों) में विभाजित है।’ इन विवरणों से स्पष्ट है कि उत्तर-वैदिक युग से पूर्व-मध्य-युग तक चार आश्रमों का अस्तित्त्व था।

आश्रम-व्यवस्था का महत्त्व

आश्रम-व्यवस्था व्यक्ति के जीवन को अनुशासन, गति और पूर्णता प्रदान करने और जीवन के अंतिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ की उपलब्धि कराने के लिए आरम्भ की गई थी। आश्रम-व्यवस्था व्यक्ति के निजी जीवन, पारिवारिक जीवन एवं सामाजिक जीवन में अनुशासन स्थापित करती थी। इसका निर्माण मानव जीवन की सब तरह की आवश्यकताओं को देखकर किया गया था।

यद्यपि चारों आश्रमों के लिए कठोर स्वधर्मों का निर्देशन किया गया था तथापि यह व्यवस्था व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरती थी। वस्तुतः इस व्यवस्था में मनुष्य की प्रत्येक अवस्था अर्थात् बाल्यावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में उसकी क्षमताओं एवं आवश्यकताओं, परिवार की आवश्यकताओं एवं समाज की आवश्यकताओं में संतुलन स्थापित किया गया था।

बाल्यावस्था ब्रह्मचर्य के लिए थी, युवावस्था गृहस्थ जीवन के लिए, प्रौढ़ावस्था वानप्रस्थ के लिए एवं वृद्धावस्था सन्यास के लिए निर्धारित की गई। विद्या, संस्कार और शिक्षा का अर्जन बाल्यकाल में ही सम्भव है। इसलिए बालयावस्था में मनुष्य को यम, नियम, संयम, दम, आचार, विचार आदि की शिक्षा दी जाती है।

इस अवस्था में मनुष्य इन शिक्षाओं को सहजता से ग्रहण कर लेता है। बाल्यकाल में प्राप्त किया गया ज्ञान, बुद्धि एवं विवेक ही मनुष्य के भावी जीवन का अधार बनता है तथा उसके व्यक्तित्त्व का सर्वांगीण विकास करता है। इसलिए बाल्यकाल हेतु ब्रह्मचर्य आश्रम निर्धारित किया गया।

युवावस्था में मनुष्य के मन में रागात्मक वृत्तियाँ संचालित होती हैं। वह यौवन के स्वाभाविक आकर्षण से सम्मोहित रहता है। अतः उसकी यौन-वृत्तियों को संतुष्ट करने के लिए गृहस्थ आश्रम की व्यवस्था की गई। गृहस्थ आश्रम के माध्यम से ही व्यक्ति विभिन्न पुरुषार्थों को अर्जित करता था एवं अपने, परिवार के तथा समाज के प्रति विभिन्न कर्त्तव्यों का पालन करता था। इसलिए युवावस्था हेतु गृहस्थाश्रम का प्रावधान किया गया।

पच्चीस वर्ष का ब्रह्मचर्य पूर्वक विद्याध्ययन एवं पच्चीस वर्ष का धर्मयुक्त काम-सेवन एवं धनार्जन करने के बाद पचास वर्ष की आयु होते-होते मनुष्य को परलोक की चिंता होने लगती है। इसलिए मनुष्य को इन्द्रिय-सुखों के सम्मोहन से विरक्त करने के उद्देश्य से वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था की गई।  इस आश्रम में रहता हुआ मनुष्य अपने आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि करता था तथा स्वयं को सन्यास आश्रम के लिए तैयार करता था।

पच्चीस वर्ष तक वानप्रस्थी जीवन व्यतीत करने से मनुष्य को इन्द्रिय-सुखों से विरक्त होकर जीवन जीने का अभ्यास हो जाता था। इस अवधि में वह अपने स्वाध्याय एवं चिंतन के आधार पर वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर लेता था। अतः पचहत्तर वर्ष की आयु में उसे सन्यासी होकर समाज में वापस लौटना होता था ताकि वह अपने स्वाध्याय, चिंतन एवं अनुभव से अर्जित ज्ञान को पुनः समाज को लौटा सके।

इस प्रकार व्यक्ति की विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न वृत्तियों को ध्यान में रखते हुए ही चार आश्रमों की व्यवस्था की गई थी। जिस प्रकार प्रत्येक वर्ण का अपना स्वधर्म होने से वर्ण-व्यवस्था को वर्ण-धर्म कहा गया, उसी प्रकार प्रत्येक आश्रम के कुछ निश्चित कर्त्तव्य होने से आश्रम व्यवस्था को आश्रम-धर्म कहा गया। इन दोनों को समवेत रूप से वर्णाश्रम धर्म कहा जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – आर्यों की आश्रम-व्यवस्था

आर्यों की आश्रम व्यवस्था

ब्रह्मचर्य आश्रम

गृहस्थ आश्रम

वानप्रस्थ आश्रम

संन्यास आश्रम

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

आश्रम व्यवस्था में स्त्री का स्थान

ब्रह्मचर्य आश्रम

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ब्रह्मचर्य आश्रम

मनुष्य को बाल्यकाल में ही शिक्षा, ज्ञान एवं विवेक प्राप्त हो, इसके लिए ब्रह्मचर्य आश्रम की व्यवस्था की गई। ब्रह्मचर्य दो शब्दों, ‘ब्रह्म’ और ‘चर्य’ से मिलकर बना है। ब्रह्म का अर्थ है ‘ईश्वर’ और ‘चर्य’ का अर्थ है। ‘विचरण’। इन दोनों का सम्मिलित अर्थ है ‘ब्रह्म के मार्ग पर चलना’।

ब्रह्मचर्य का व्यावहारिक अर्थ इन्द्रिय-निग्रह के साथ-साथ विद्या एवं वेदाध्ययन है। इस आश्रम का पालन करने हेतु बालक अपने पिता का घर छोड़कर गुरु अथवा आचार्य के आश्रम में रहता था एवं उसके सानिध्य में वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करता था। ‘ब्रह्म’ और ‘वेद’ का घनिष्ठ सम्बन्ध है। ब्रह्मचर्य का दूसरा अर्थ है ‘वेद मार्ग पर चलना’ अर्थात् ‘ब्रह्म-ज्ञान’। उपनिषद् काल में ब्रह्म-ज्ञान की प्रतिष्ठा अपने चरम पर थी। मनुष्य तप और संयम से रहता हुआ ज्ञान और विज्ञान का अर्जन करता था।

महाभारत के अनुसार ब्रह्मचर्य आश्रम में रहने वाले ब्रह्मचारी को आन्तरिक एवं बाह्य शुद्धि और वैदिक संस्कारों का पालन करते हुए अपने मन को वश में रखना चाहिए। प्रातः और सायं दोनों समय सन्ध्योपासना, सूर्योपासना और अग्निहोत्र (यज्ञ) द्वारा अग्निदेव की आराधना करनी चाहिए। तन्द्रा और आलस्य को त्याग कर प्रतिदिन गुरु को प्रणाम करना और वेदों के अभ्यास तथा श्रवण से अपनी अन्तरात्मा को पवित्र करना चाहिए।

 प्रातः, दोपहर और सायं तीनों समय स्नान करना चाहिए। नित्य भिक्षा मांग कर लानी चाहिए और उसे गुरु की सेवा में समर्पित करनी चाहिए। गुरु जो कुछ कहे, जिसके लिए संकेत करे और जिस कार्य के लिए आदेश दे, उसके विपरीत आचरण नहीं करना चाहिए। गुरु के कृपा-प्रसाद से मिले हुए स्वाध्याय में तत्पर रहना चाहिए।

कोई व्यक्ति उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार के पश्चात् ही ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश कर सकता था। इस संस्कार के द्वारा ब्रह्मचारी ‘गुरु’ का सान्निध्य प्राप्त करता था और उसके पास रहते हुए ज्ञानोपार्जन करता था। ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश करने के बाद बालक को ब्रह्मचारी कहा जाता था। वह ब्रह्म-विद्या के लिए व्रत का पालन करता था।

मनु के अनुसार वह सूर्योपासना के बाद भिक्षाटन के लिए निकलता था। ब्रह्मचारी के लिए भिक्षावृत्ति का निर्देश किया गया था ताकि वह निरभिमान होकर संयम और नियम का पालन करे। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्मचारी को भिक्षा प्रदान न करने वाली स्त्रियों से, दान-यज्ञ से उत्पन्न पुण्य, उनके पशुओं, उनके कुलों की विद्या और अन्न छीन लिया जाता है।

इसलिए ब्रह्मचारी को अपने द्वार से भिक्षा दिए बिना नहीं लौटाया जाता था। प्रत्येक गृहस्थ का परम कर्त्तव्य था कि वह ब्रह्मचारी को भिक्षा दे। ब्रह्मचारी दिन में दो बार अर्थात् प्रातःकाल और सायंकाल में ही भोजन करता था, बीच में भोजन करना निषिद्ध था।

ब्रह्मचारी का जीवन व्यवस्थित, संयमित और नियमों से बंधा हुआ होता था। वह मन, वचन एवं कर्म से शील, साधना और अनुशासन का अनुसरण करता था। वह गुरु के पशुओं की देखभाल करता था, समिधा एकत्रित करता था, भिक्षा माँगता था, यज्ञ करता था और निष्ठापूर्वक गुरु की सेवा करता था। ऐसा करने वाला ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होकर स्वर्ग को प्राप्त करता था। ब्रह्मचारी का जीवन समस्त धर्मों में अत्यन्त श्रेष्ठ, ब्रह्म-स्वरूप और आदर-युक्त था।

उसके लिए नृत्य, गायन, वाद्य, सुगंधित वस्तुएँ, माला, जूता, छाता, अंजन, हंसना, नग्न स्त्री को देखना, स्त्री की कामना करना तथा उसे अकारण स्पर्श करना आदि निषिद्ध था। उसे सत्य ही बोलना होता था और उसके लिए अंहकार करना वर्जित था। शिष्य के लिए गुरु से पहले जागना आवश्यक था। कौटिल्य के अनुसार ब्रह्मचारी का कर्त्तव्य वेद का अध्ययन करना, अग्नि अभिषेक करना, भिक्षावृति करना, गुरु की अनुपस्थिति में गुरु-पुत्र या ज्येष्ठ ब्रह्मचारी की सेवा करना है। मनु का कहना है कि गुरु विनयी, सेवारत और हितैषी विद्यार्थी को ही शिक्षा देता है।

सदाचार और सच्चरित्रता का पालन करना ब्रह्मचारी की अनुपम साधना थी। अपनी इच्छाओं को अपने वश में करना तथा अपनी क्रियाओं को धर्म-समन्वित करना उसका श्रेष्ठ आचरण था। वह अपनी विचरणशील इन्द्रियों को संयमित रखता था, जिससे उसे सिद्धि की प्राप्ति होती थी।

 इस प्रकार वह मनसा, वाचा और कर्मणा संयमशील होकर प्रतिष्ठित होता था। तप, स्वाध्याय और ईश्वर-आराधना उसके मुख्य कर्त्तव्य थे जिनसे ब्रह्मचारी का पूर्ण विकास होता था। यम-नियम का पालन करने से ब्रह्मचारी का आत्मिक विकास होता था। यमों के अन्तर्गत अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि नियमों का पालन करना होता था।

11वीं शताब्दी के भारत में भी ब्रह्मचारी का जीवन इसी प्रकार का था। अलबरूनी ने लिखा है- ‘वह दिन में तीन बार स्नान करता है, प्रातः एवं सायंकाल में होम करता है तथा होम के पश्चात् गुरु की पूजा करता है। वह एक दिन उपवास करता है और एक दिन उपवास तोड़ता है। वह गुरु-गृह में ही निवास करता है। भिक्षाटन के लिए जाते समय ही वह गुरु-गृह छोड़ता है।

एक बार में वह पांच से अधिक घर से भिक्षा नहीं माँगता। जो कुछ उसे भिक्षा में मिलता है वह गुरु के समक्ष समर्पित कर देता है, इसलिए कि वह इच्छानुसार ले ले, तब गुरु शेष भाग को उसे देकर खाने की आज्ञा देता है। इस प्रकार विद्यार्थी अपने गुरु के बचे भोजन से अपना पोषण करता है। फिर वह यज्ञ के लिए दो तरह के वृक्षों- पलास और दर्भ की लकड़ी लाता है क्योंकि हिन्दू यज्ञ-होम की अधिक पूजा करते और फूल चढ़ाते हैं।’

ब्रह्मचर्य में आश्रम ब्रह्मचारी के अध्ययन की अवधि

ब्रह्मचर्य आश्रम की अवधि प्रायः बारह वर्ष की होती थी,  ब्रह्मचर्य आश्रम पूर्ण होने तक उसकी आयु लगभग पच्चीस वर्ष हो जाती थी। वैसे कुछ ब्रह्मचारी 12, 24, 36 और 48 वर्ष तक अध्ययन करते थे। शिक्षा समाप्त करने के बाद वह गुरु की आज्ञा प्राप्त करके गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था।

ब्रह्मचर्य आश्रम की अवधि के सम्बन्ध में मनु ने लिखा है कि ब्रह्मचारी गुरु के समीप 36 वर्ष तक (तीन वेदों का अध्ययन) या उसका आधा 18 वर्ष तक अथवा उसका चतुर्थांश 9 वर्ष तक या वेदों के ग्रहण करने की अवधि तक अध्ययनरत रहे। निश्चय ही वेदों के अध्ययन में ब्रह्मचारी को अनेक वर्ष लगाने पड़ते थे।

वेदों का अध्ययन कम से कम 9 वर्ष में हो पाता था। तीन वेद या दो वेद अथवा एक वेद में ब्रह्मचारी का पांरगत होना अनिवार्य था। एक वेद का सम्यक् ज्ञान कम से कम नौ या बारह वर्ष में ही हो पाता था। छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार प्रजापति के निकट इन्द्र ने 101 वर्षों तक रहकर ज्ञान प्राप्त किया था। तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार भरद्वाज 75 वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहे।

ब्रह्मचारी के प्रकार

उत्तर-वैदिक-काल में गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करने वाले कई प्रकार के ब्रह्मचारी होते थे। इन्हें उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। कुछ ब्रह्मचारी पढ़ने में बहुत अच्छे होते थे तथा उनका आचरण और व्यवहार उत्तम होता था।

कुछ ब्रह्मचारी अध्ययन में मध्यम होते थे, जो न तो बहुत तीव्र होते थे और न बिल्कुल मन्द। कुछ ब्रह्मचारी ऐसे होते थे जो पढ़ने में अत्यन्त मन्द और हीन रहते थे किंतु बुद्धि-मेधा के आधार पर उनमें भेद नहीं किया जाता था। विद्यार्थियों का वर्गीकरण उप कुर्वाण और नैष्ठिक के रूप में किया जाता था।

उप-कुर्वाण ब्रह्मचारी

उप-कुर्वाण विद्यार्थी वे होते थे जो दस-पन्द्रह वर्ष गुरुकुल में रहते थे और विद्याध्ययन के पश्चात् अपने गुरु को यथा-शक्ति गुरु-दक्षिणा देकर अपने घर लौटते थे। उप-कुर्वाण विद्यार्थियों में भी तीन प्रकार के स्नातक होते थे- वेद स्नातक, व्रत स्नातक और वेद-व्रत स्नातक।

नैष्ठिक ब्रह्मचारी

नैष्ठिक ब्रह्मचारी वे होते थे जिनका आठ वर्ष की आयु में उपनयन संस्कार होता था। वे अड़तालीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य-व्रत रखते हुए छप्पन वर्ष की आयु होने तक अध्ययन करते थे। कभी-कभी वे जीवनपर्यन्त गुरु के आश्रम में रहकर अध्ययनरत रहते थे और अन्त में उन्हें ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती थी। उनका पुनर्जन्म नहीं होता था।

जो विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे, वे ‘अन्तेवासी’ कहे जाते थे। किसी विशेष विषय का अध्ययन करने के लिए दीक्षित हुआ विद्यार्थी गुरुकुल अवधि के अनुसार द्वादश वार्षिकी, वार्षिक, मासिक और अर्धमासिक विद्यार्थी कहा जाता था। कभी-कभी विद्यार्थी किसी विशेष ऋचा अथवा शास्त्र का अध्ययन करने के लिए भी गुरुकुल में प्रवेश लेता था।

ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति समावर्तन समारोह के साथ होती थी। इसके बाद ब्रह्मचारी अपने गुरु से आज्ञा लेकर अपने पिता के परिवार में लौट जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – आर्यों की आश्रम-व्यवस्था

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ब्रह्मचर्य आश्रम

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आश्रम व्यवस्था में स्त्री का स्थान

गृहस्थ आश्रम

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गृहस्थ आश्रम

मनुस्मृति में लिखा है कि जिस प्रकार प्राणवायु का आश्रय प्राप्त कर समस्त जीव जीवित रहते हैं, उसी प्रकार गृहस्थ आश्रम का आश्रय प्राप्त करके समस्त आश्रम चलते हैं। 

गृहस्थ आश्रम की श्रेष्ठता

गृहस्थ आश्रम मनुष्य जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण था। कुछ धर्मशास्त्रकारों ने इस आश्रम का महत्त्व प्रतिपादित करने के लिए आश्रमों के वर्णन में सर्वप्रथम गृहस्थ आश्रम की चर्चा की है। मनु के अनुसार- ‘जिस प्रकार समस्त नदी-नाले सागर में समाहित हो जाते हैं, उसी प्रकार समस्त आश्रम गृहस्थ आश्रम में समाहित हो जाते हैं।’

इस आश्रम का आरम्भ विवाह संस्कार के साथ होता था। पिता या कुटुम्ब के अन्य आदरणीय सदस्य योग्य कन्या का चयन करते थे एवं स्नातक होकर लौटे ब्रह्मचारी पुत्र से उसका विवाह सम्पादित करवाते थे। विवाह संस्कार का सम्पादन किसी योग्य पुरोहित द्वारा वैदिक विधि-विधान के साथ एवं वैदिक ऋचाओं के उच्चारण के साथ समारोह पूर्वक सम्पन्न करवाता था। इसके पश्चात् नवविवाहित दम्पत्ति धर्मानुसार गृहस्थ धर्म का पालन करते थे।

व्यास स्मृति में कहा गया है- ‘गृहस्थ धर्म का अनुसरण करने वाले को अपने घर में ही कुरूक्षेत्र, नैमिषारण्य, हरिद्वार और केदार आदि तीर्थों की प्राप्ति हो जाती है, जिनसे गृहस्थों के समस्त पाप धुल जाते हैं।’ महाभारत में गृहस्थ आश्रम की गरिमायुक्त प्रतिष्ठा की गई है तथा उसे अन्य समस्त आश्रमों से उत्कृष्ट माना गया है।

असमय ही गृहस्थी का त्याग कर सन्यासी बनने वालों की निन्दा की गई है। गृहस्थ आश्रम में ही देवताओं, पितरों और अतिथियों के लिए आयोजन होते हैं तथा त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) की प्राप्ति होती है।

गृहस्थ आश्रम के स्वधर्म अथवा प्रधान कर्त्तव्य

गृहस्थ आश्रम में रहकर मनुष्य अपने व्यक्तिगत, सामाजिक धार्मिक, नैतिक, आर्थिक आदि विभिन्न प्रकार के कर्त्तव्यों का पालन करता था। सत्य, अहिंसा, दया, शम, दान आदि गृहस्थ के उत्तम कर्म थे। मनु के अनुसार वह दस धर्मों का सेवन करता था- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, ज्ञान, विद्या, सत्य और क्रोध-त्याग आदि।

महाभारत के अनुसार परायी स्त्री के साथ सम्पर्क न करना, अपनी पत्नी तथा घर की रक्षा करना, न दी गई वस्तु को न लेना, मधु का सेवन न करना तथा मांस नहीं खाना, ये पाँच प्रकार के कर्म गृहस्थ को सुख देने वाले थे।

इस आश्रम का पालन करने से मनुष्य धर्म अर्जित करता था, क्योंकि परलोक में सहायता के लिए माता, पिता, पुत्र, पत्नी और सम्बन्धी नहीं होते। वहाँ प्राणी अकेला ही अपने पाप-पुण्य का फल भोगता है। मनुष्य द्वारा अर्जित पाप एवं पुण्य ही उसके साथ परलोक में जाते हैं।

अतः परलोक को सुधारने के लिए धर्म का उत्तरोत्तर संचय करना चाहिए। इस कारण गृहस्थी के लिए ज्ञानयोग की अपेक्षा कर्मयोग को प्रधानता दी गई। उसे धर्म-साधक की भाँति आचरण करना आवश्यक था।

गृहस्थ को अपने परिवार के भरण-पोषण हेतु धर्म-सम्मत कार्यों से अर्थोपार्जन का निर्देश दिया गया है। दूसरे के अर्थ और सहयोग से अपनी गृहस्थी चलाना निन्दनीय था। गृहस्थ को यथाशक्ति दान देने एवं शेष धन से अपना जीवन चलाने का निर्देश दिया गया था। गृहस्थ हर समय अतिथि-सत्कार हेतु तत्पर रहता था। यदि कोई गृहस्थ किसी अतिथि को असन्तुष्ट या अप्रसन्न करता था तो गृहस्थ के समस्त पुण्य क्षीण हो जाते थे। केवल अपने लिए ही भोजन बनाना अनुचित माना जाता था।

अतिथि के लिए भोजन बनाकर उसे सन्तुष्ट करना गृहस्थ का परम कर्त्तव्य था। मनु के अनुसार जिस गृहस्थ के घर में सामर्थ्यानुसार आसन, भोजन, शैया, जल, फल-फूल से अतिथि की पूजा नहीं होती, वहाँ कोई अतिथि निवास न करे। मनु ने पाखण्डी, स्वार्थी, विरुद्धकर्मी, आदि अतिथियों की सेवा नहीं करने का भी निर्देश दिया है। कौटिल्य के अनुसार विधानानुसार विवाह करना, अपनी भार्या से ही सम्पर्क रखना, स्वधर्म के अनुरूप जीविका चलाना, देवताओं, पितरों और भृत्यों को सन्तुष्ट करने के उपरान्त भोजन ग्रहण करना प्रत्येक गृहस्थ का स्वधर्म था।

गृहस्थ के अपने पुत्र गुरुकुल में अध्ययन करने के लिए चले जाते थे किंतु जो ब्रह्मचारी गृहस्थ के घर भिक्षावृत्ति के लिए आते थे, उन्हें भिक्षा देना गृहस्थ के प्रधान कर्त्तव्यों में सम्मिलित था। अन्यथा गृहस्थ पाप का भागी होता था।

गृहस्थ द्वारा संस्कारों की सम्पन्नता

व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले समस्त संस्कार (उपनयन एवं समावर्तन को छोड़कर) गृहस्थ आश्रम में ही सम्पन्न किए जाते थे। संस्कारों के माध्यम से ही व्यक्ति के जीवन को शुद्ध एवं सुसंस्कृत बनाया जाता था जिससे वह नैतिक, सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक विकास करने में समर्थ होता था।

गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णछेदन, विवाह, अन्त्येष्टि आदि विभिन्न संस्कार गृहस्थ आश्रम के माध्यम से ही सम्पन्न किए जाते थे। अतः संस्कारों का गृहस्थ आश्रम से अटूट सम्बन्ध था।

गृहस्थ व्यक्ति को देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से उऋण होने के लिए समस्त संस्कारों एवं यज्ञों का आयोजन करना होता था। मनु के अनुसार इन ऋणों से उऋण हुए बिना ही सन्यासी बनने वाला व्यक्ति नर्क में जाता है। मनु ने लिखा है कि प्रत्येक द्विज विविधपूर्वक वेदों का अध्ययन कर, धर्मानुसार पुत्रों को उत्पन्न कर और शक्ति-अनुसार यज्ञों का अनुष्ठान कर मोक्ष (सन्यास) में मन लगाए।

महाभारत में भी कहा गया है कि विधिपूर्वक किए गए कर्मकाण्डों से पितृगण को, यज्ञ द्वारा देवताओं को और स्वाध्याय द्वारा ऋषियों को पूजित करे तदन्तर अन्य आश्रमों के माध्यम से सिद्धि को प्राप्त करे। इन ऋणों से मुक्ति के मूल में भाव यह था कि समाज से लाभ उठाने वाले व्यक्ति अपने देवों, पितरों, पूर्वजों, ऋषियों आदि के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करें।

मनुष्यों पर देवी-देवताओं की अनुकम्पा को देव ऋण माना गया है। वेदों का अध्ययन करके  देव ऋण से मुक्त हुआ जाता था। यज्ञों का अनुष्ठान करके ऋषि ऋण से मुक्त हुआ जाता था और पुत्रों का उत्पन्न करके उनका पालन-पोषण करना पितृ ऋण से मुक्ति का उपाय था।

गृहस्थ द्वारा पंचमहायज्ञ

प्रत्येक गृहस्थ के लिए विभिन्न प्रकार के यज्ञ करना अनिवार्य था। देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से उऋण होने के लिए पाँच महायज्ञों का विधान किया गया था। मनुष्य द्वारा अग्नि जलाने, कूटने-पीसने, छीलने-काटने, कूप खोदने, हल चलाने आदि विविध कार्यों में जीव हिंसा होती है जिससे पाप लगता है। इन पापों के प्रायश्चित के लिए ‘ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और नृतज्ञ (अतिथि यज्ञ)’ नामक पंचमहायज्ञों का विधान किया गया।

इन पंचमहायज्ञों का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण और अनेक पुराणों में मिलता है। मनु ने पाँच पापों- ‘चुल्ली, पेषणी, उपस्कर, कण्डनी और जलकुम्भ’ से मुक्ति के लिए पांच यज्ञों का विधान किया है। मनु के अनुसार वेद का अध्ययन-अध्यापन करना ब्रह्मयज्ञ था, तर्पण करना पितृयज्ञ था, हवन करना देवयज्ञ था, बलिवैश्वदेव का आयेाजन भूतयज्ञ था एवं अतिथियों का भोजन-सत्कार करना नृयज्ञ था।

ब्रह्मयज्ञ

ब्रह्मयज्ञ द्वारा मनुष्य ऋषियों एवं आचार्यों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता था। गृहस्थ के लिए यह आवश्यक था कि वह वेदादि-शास्त्रों के अध्ययन में निरन्तर तत्पर रहे और स्वाध्याय से कभी प्रमाद न करे। इसी को ब्रह्मयज्ञ कहते थे। इसके दैनिक अनुष्ठान से गृहस्थ वेदादि-शास्त्रों को स्मरण रखता था।

पितृयज्ञ

पितृयज्ञ के अन्तर्गत मनुष्य पितरों अर्थात् पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता था। इसके लिए श्राद्ध का विधान किया गया था। श्राद्ध के अवसर पर पितरों के निमित्त पिण्डदान, तर्पण, बलिहरण, पितृश्राद्ध आदि का आयोजन किया जाता था। ये कर्म पुत्र द्वारा ही सम्पादित किए जाते थे। इसलिए ‘पितृश्राद्ध एवं पितृयज्ञ’ गृहस्थ आश्रम में ही किए जाने सम्भव थे।

देवयज्ञ

प्राचीन आर्य सूर्य, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी आदि प्राकृतिक शक्तियों को देवता मानते थे। मनुष्य को इनसे भोजन, जल, आश्रय एवं हिरण्य आदि प्राप्त होते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति इन देवताओं का ऋणी होता है। इस ऋण से उऋण होने के लिए देवयज्ञ का आयोजन किया जाता था। इस यज्ञ में देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती थी तथा उनके निमित्त बलि और अग्नि में आहुति देकर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती थी।

निष्ठा-विधिपूर्वक अग्नि में छोड़ी हुई आहुति सूर्य को प्राप्त होती थी, सूर्य से वृष्टि, वृष्टि से अन्न और अन्न से प्रजा को प्राप्त होती थी। यह यज्ञ पत्नी के बिना सम्भव नहीं था, इसलिए विवाहित होकर गृहस्थ बनना आवश्यक था। यज्ञ में आहुति देते समय इन्द्र, अग्नि, प्रजापति, सोम, पृथ्वी आदि देवी-देवताओं के नाम के साथ ‘स्वाहा’ उच्चारित किया जाता था।

भूतयज्ञ

भूत के अंतर्गत ‘सृष्टि में स्थित समस्त प्राणी’ आते हैं। इसलिए ईश्वर को ‘भूत-नाथ’ तथा ‘भूत-भावन’ कहा जाता है। संसार के प्रत्येक प्राणी का इस सृष्टि को सुखमय बनाने में योगदान होता है। इसलिए मनुष्य पर उनका ऋण होता है। इस ऋण से उऋण होने के लिए ‘भूतयज्ञ’ का विधान किया गया तथा इसके माध्यम से समस्त प्राणियों के प्रति ‘बलि’ अर्पित करने की व्यवस्था की गई।

 विध्नकारी और अमंगलकारी प्रेतात्माओं की तुष्टि के लिए भी भूतयज्ञ किया जाता था। इसमें बलि अग्नि में न डालकर विभिन्न दिशाओं में रख दी जाती थी। घर में बने भोजन का एक अंश गाय, कुत्ता, कौआ आदि विभिन्न प्राणियों के लिए पृथक् रख दिया जाता था। उसके बाद ही गृहस्थ स्वयं भोजन करता था।

नृयज्ञ

नृयज्ञ को अतिथि यज्ञ भी कहते थे। अतिथि-सेवा प्रत्येक गृहस्थ का धर्म था। अतिथि चाहे किसी भी जाति या वर्ण का क्यों न हो, उसे देवता के रूप में देखा जाता था। मान्यता थी कि अतिथि गृहस्थ का भोजन नहीं करता अपितु उसके पापों का भक्षण करता है। अतिथि चाहे प्रिय हो या अप्रिय, उसका सत्कार व्यक्ति को स्वर्ग पहुँचाने वाला होता था।

जो व्यक्ति अतिथि को एक रात अपने घर में ठहराता था, वह पृथ्वी के सुखों को प्राप्त कर लेता था, यदि दो रात ठहरता था तो अन्तरिक्ष लोकों की विजय प्राप्त करता था, यदि तीन रात ठहराता था तो वह स्वर्गीय लोकों को प्राप्त करता था और यदि चार रात ठहराता था तो असीम आनन्द को प्राप्त करता था। अगर अतिथि कई रात्रियों तक ठहरता था तो गृहस्थ विभिन्न प्रकार के समस्त सुखों को प्राप्त कर लेता था।

प्राचीन समय में सन्यासी या परिव्राजक किसी एक स्थान पर न रहकर सदा भ्रमण करते रहते थे। उनके पास अपनी कोई सम्पत्ति नहीं होती थी। उनका कार्य प्रजा को सन्मार्ग पर लाने हेतु धर्मोपदेश देना होता था। उनकी भौतिक आवश्यकताएँ नृयज्ञ के माध्यम से गृहस्थों द्वारा पूरी की जाती थीं। ऐसे सन्यासी जिस किसी भी गृहस्थ के घर आ जाएँ उनकी सेवा करना, आदरपूर्वक उन्हें घर पर ठहराना और उनके भोजन आदि की व्यवस्था करना गृहस्थ का कर्त्तव्य था।

इस प्रकार गृहस्थ व्यक्ति पंचयज्ञों के माध्यम से व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों को पूरा करता था।

गृहस्थों के विविध प्रकार

प्राचीन स्मृतियों में गृहस्थों का अनेक प्रकार से वर्गीकरण किया गया है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार गृहस्थों के चार वर्ग है-

(1.) कुसूल धान्यः जो गृहस्थ अपने कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए बारह दिन का भोजन संचित करके रखे।

(2.) कुम्भ धान्य: जो गृहस्थ अपने परिवार के लिए छः दिनों का भोजन संचित करके रखे।

(3.) त्र्यहिक : जो गृहस्थ केवल तीन दिन का भोजन अपने पास रखे।

(4.) अश्वस्तनिक: जिसके पास केवल आज के योग्य ही भोजन हो और जो कल का भोजन संचित करने का प्रयत्न न करे।

मनुस्मृति में भी इसी प्रकार से कुसूल धान्य, कुम्भ धान्य, अश्वस्तनिक और त्र्यहिक अथवा एकारिक गृहस्थों का उल्लेख किया गया है। नारद स्मृति के अनुसार गृहस्थ ब्राह्मण सद्य प्रक्षालिक (प्रतिदिन भोजनोपरान्त बर्तन साफ कर देने वाला) हो अथवा एक मास तक अन्न संचित करने वाला हो या छः मास अथवा एक वर्ष तक के लिए अन्न संचय करने वाला हो। महाभारत में भी चार प्रकार के गृहस्थ निर्दिष्ट किए गए हैं-

(1.) कुसूल धान्य: वे गृहस्थ जो षट् कर्म- यजन, याजन, पठन, पाठन, दान और प्रतिग्रह करते थे।

(2.) कुम्भ धान्य: वे गृहस्थ जो यज्ञ, अध्ययन और दान करते थे।

(3.) अश्वस्तन: वे गृहस्थ जो अत्यधिक अध्ययन और दान करते थे।

(4.) कपोतिमाश्रित: वे गृहस्थ जिनकी रुचि केवल स्वाध्याय में थी।

गृहस्थों के ये प्रकार सम्भवतः ब्राह्मण गृहस्थों के है, क्योंकि त्याग और अपरिग्रह का आदर्श ब्राह्मणों के लिए सर्वोपरि था। प्राचीन ऋषि एवं चिंतक मनुष्य में धन-संचय की प्रवृत्ति को अनुचित मानते थे। उनके अनुसार गृहस्थ द्वारा उत्पन्न भोजन सामग्री और अर्जित धन केवल अपने या अपने कुटुम्ब के लिए नहीं होकर सम्पूर्ण समाज के लिए थे।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्राचीन आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत गृहस्थों के लिए स्वधर्म के रूप में जो कर्त्तव्य निर्धारित किए गए थे, वे केवल अपने कुटुम्ब के जीवन-निर्वह के दायित्व तक सीमित नहीं थे अपितु गृहस्थ पर अतिथियों, पितरों, देवताओं, पशु-पक्षी आदि समस्त प्राणियों, ब्राह्मणों, ऋषियों एवं सन्यासियों की उदर-पूर्ति का दायित्व डाला गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – आर्यों की आश्रम-व्यवस्था

आर्यों की आश्रम व्यवस्था

ब्रह्मचर्य आश्रम

गृहस्थ आश्रम

वानप्रस्थ आश्रम

संन्यास आश्रम

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

आश्रम व्यवस्था में स्त्री का स्थान

वानप्रस्थ आश्रम

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वानप्रस्थ आश्रम

लगभग पचास वर्ष की आुय में जब मनुष्य अपने गृहस्थ-कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों को पूरा कर लेता था तब उसे सांसारिक मोह-माया त्यागकर वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना होता था। आरण्यक ग्रंथों की रचना इन्हीं वानप्रस्थी तपस्वियों ने की थी, जो अरण्यों (जंगलों) में रहा करते थे।

उपनिषद् युग में वानप्रस्थ जीवन का विस्तार हुआ। प्रौढ़ आयु के लोग वन में जाकर एकान्त जीवन व्यतीत करते थे और अपने ज्ञान एवं चिंतन का विस्तार करते थे। कुछ धर्मसूत्रों के अनुसार मनुष्य ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद ही प्रव्रज्या ग्रहण करके वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश कर सकता था।

मनु के अनुसार जब व्यक्ति के सिर के बाल सफेद होने लगें, शरीर पर झुर्रिंयाँ पड़ने लगें और उसके पौत्र उत्पन्न हो जाएँ तब वह मनुष्य वानप्रस्थी होकर वन में चला जाए। वह अकेला ही वानप्रस्थी हो सकता था अथवा अपनी पत्नी को भी वन में ले जा सकता था। मनु ने व्यवस्था दी थी कि ग्राम-आहार (धान, यव आदि ग्राम सुलभ भोजन) तथा परिच्छद (गौ, घोड़ा, हाथी, शैया आदि गृह-सम्पत्ति) का त्याग करके वन में जाने की इच्छा न करने वाली पत्नी को पुत्रों के उत्तरदायित्व में सौंपकर अथवा वन में साथ जाने वाली पत्नी को साथ लेकर वन जाना चाहिए।

महाभारत में इसी प्रकार का मत व्यक्त किया गया है। धर्मशास्त्रकारों ने यह व्यवस्था इसलिए की थी कि व्यक्ति शनैः-शनैः त्याग और वैराग्य का जीवन अपना सके तथा मोह-माया से स्वयं को अलग कर सके।

विष्णु-पुराण में गृहस्थ जीवन के बाद वानप्रस्थ जीवन नहीं अपनाने वालों को पाप-कर्मा कहा गया है। बौद्ध और जैन साहित्य से भी ज्ञात होता है कि वन जैसे एकान्त स्थल में रहकर व्यक्ति का विकास किया जा सकता था। वानप्रस्थ जीवन में व्यक्ति त्याग, तप, अंहिसा और ज्ञान का अर्जन करता था।

वानप्रस्थ आश्रम में वानप्रस्थी का जीवन

मनु के अनुसार वानप्रस्थी सर्वदा वेदाध्ययन में लगा रहे, ठंडा, गर्म, सुख-दुःखः, मान-अपमान आदि को सहन करे, सबसे मित्र-भाव रखे, मन को वश में रखे, दानशील बने, दान न ले और समस्त जीवों पर दया करें। इन नियमों का अनुसरण करते हुए व्यक्ति वानप्रस्थ का जीवन पचहत्तर वर्ष की अवस्था तक व्यतीत करता था। दिन में दो बार स्नान और होमानुष्ठान करना, इन्द्रिय-निग्रह तथा भिक्षा पर जीविकोपार्जन करना वानप्रस्थी के प्रधान धर्म थे।

वानप्रस्थी के लिए पंचमहायज्ञ और अतिथि सत्कार करना भी आवश्यक था। भोज्य पदार्थ से बलि करे, भिक्षा (जल, कन्द-मूल-फल) दे और अतिथियों को सन्तुष्ट करे। मनु ने भी वानप्रस्थी के लिए व्यवस्था दी है कि वह भूमि पर शयन करे, टहले अथवा पैर के अगले भाग पर दिन में कुछ समय तक खड़ा या बैठा रहे (बीच-बीच में टहले) तथा प्रातः मध्यान्ह और सायं काल में स्नान करे।

वह अपनी तपस्या का समय बढ़ाते हुए ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि ले, वर्षा ऋतु में खुले मैदान में रहे और शीत ऋतु में गीला कपड़ा धारण करे। इस प्रकार उसे कठोर जीवन व्यतीत करने का निर्देश दिया गया था।

गौतम धर्मसूत्र के अनुसार वानप्रस्थी को मूल-फल खाना चाहिए, शरीर को तप से पूर्ण करना चाहिए, पंचमहायज्ञ करने चाहिएं, अगम्य अतिथियों को छोड़कर अन्य अतिथियों का स्वागत करना चाहिए। उसे बाल, दाढ़ी और नख नहीं काटने चाहिए। उसे वन-सुलभ चर्म, कुश तथा काश से अपना परिधान और उत्तरीय बनाना चाहिए।

 निश्चय ही वानप्रस्थी का जीवन अत्यन्त साधना, संयम और तप का जीवन था। वानप्रस्थी के लिए गाँव अथवा नगर में प्रवेश करना वर्जित था। वह सत् और असत् के भेद को जानता था। दुःख और तृष्णा से मुक्त था। आसक्ति से दूर रहकर वह आध्यात्म और ब्रह्म-ज्ञान में लीन रहता था।

महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार गृहस्थ को अपने कर्त्तव्यों से निवृत होकर आयु के तीसरे भाग में वन की ओर प्रस्थान करना चाहिए। वन में रहते हुए उसे वन में उत्पन्न होने वाली वस्तुएँ खानी चाहिए, भूमि को शैया बनाना चाहिए, जटा, दाढ़ी और नख रखना चाहिए, वल्कल धारण करना चाहिए, देवता और अतिथि का सत्कार करना चाहिए, अग्निहोत्र सम्पन्न करना चाहिए तथा सनातन धर्म का पालन करना चाहिए। इन नियमों कापालन करने वाले को देवलोक की प्राप्ति होती है।

अलबरूनी ने लिखा है कि वानप्रस्थी अपनी गृहस्थी को छोड़कर ब्रह्मचर्य का पालन करता है। यदि उसकी पत्नी उसके साथ वानप्रस्थ नहीं अपनाती तो उसे वह अपनी पत्नी को अपने पुत्रों के पास छोड़ देता है। वह जन-सभ्यता से बाहर रहता है और उस जीवन को पुनः अपनाता है जिसे वह सबसे पहले वाले आश्रम में जी चुका होता है।

वह छाजन की छाया के नीचे आश्रय नहीं लेता और न कोई परिधान धारण करता है। केवल कटि भाग को ढकने के लिए वृक्ष की छाल मात्र पहनता है। वह पृथ्वी पर बिना किसी बिछावन के सोता है और केवल कन्द-मूल-फल खाकर पेट भरता है। वह बाल बढ़ा लेता है और तेल नहीं मलता। हमें ऐसे पूर्व-मध्ययुगीन राजाओं के नाम भी मिलते है जो राज्य-पाट त्याग कर वानप्रस्थी हो गए थे। प्रतिहार, पाल, सेन आदि राजवंशों के कुछ अभिलेखों से इस तथ्य की पुष्टि होती है।

इस प्रकार वानप्रस्थ आश्रम मनुष्य को स्वाध्याय, साधना और तपस्या के माध्यम से अंतिम आश्रम अर्थात् सन्यास आश्रम की तैयारी के पूर्व प्रशिक्षण शिविर की तरह होता था जिसमें मनुष्य ब्रह्मचर्य और सदाचार-पूर्ण जीवन जीकर अपने मन, बुद्धि और मस्तिष्क को पवित्र एवं निर्मल बनाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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आश्रम व्यवस्था में स्त्री का स्थान

आर्यों की आश्रम व्यवस्था में स्त्री का स्थान जानने के लिए वैदिक काल, उत्तर वैदिक काल, महाकाव्य काल, बुद्ध काल, शुंग काल तथा मध्य काल में स्त्रियों की बदलती हुई स्थिति को जानना आावश्यक है।

पुरुषों एवं स्त्रियों के लिए आश्रम-व्यवस्था के प्रावधानों में अंतर था। ब्राह्मण पुरुषों के लिए चार आश्रमों का तथा क्षत्रिय एवं वैश्य पुरुषों के लिए तीन आश्रमों का प्रावधान था किंतु इन तीनों वर्णां की स्त्रियों के लिए आश्रम-व्यवस्था स्वैच्छिक थी। शूद्र स्त्री-पुरुषों के लिए आश्रम व्यवस्था नहीं थी।

स्त्रियों के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम

उत्तरवैदिक-काल में द्विज वर्णों की स्त्रियां ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश करती थीं तथा उनका उपनयन संस्कार भी होता था। 16-17 वर्ष की आयु तक शिक्षा प्राप्त करने वाली कन्या ‘सद्योवधू’ कहलाती थी। इसके बाद उसका विवाह कर दिया जाता था। जो कन्या आजीवन शिक्षा ग्रहण करने में लगी रहती थी तथा वैवाहिक-बन्धन में नहीं बंधती थी, उसे ‘ब्रह्मवादिनी’ कहा जाता था।

बहुत कम स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करती थी। सूत्रकाल से स्त्रियों का ब्रह्मचर्य जीवन प्रायः समाप्त हो गया। वे विद्याध्ययन के लिए किसी गुरु के आश्रम में नहीं जाती थीं। इसलिए स्त्रियों का उपनयन संस्कार बंद हो गया। उनकी शिक्षा घर या गांव में ही होती थी। उनकी शिक्षा, साधारण ज्ञान तक सीमित हो गई।

स्त्रियों के लिए गृहस्थ आश्रम

सूत्रकाल एवं उसके बाद के युगों में कन्या का विवाह बाल्यावस्था में किया जाता था। जिस प्रकार ब्रह्मचारी अपने गुरु की सेवा करता था उसी प्रकार स्त्री को अपने पति की सेवा करनी होती थी। स्त्रियों के लिए विवाह अनिवार्य था। स्त्री के सहयोग के बिना गृहस्थ जीवन प्रयोजनहीन था।

मनु के अनुसार प्रजनन के उद्देश्य से ही स्त्री की सृष्टि हुई थी। गृहस्थ आश्रम में रहकर स्त्री अपने सामाजिक-धार्मिक कर्त्तव्यों का संपादन करती थी। वह पंचमहायज्ञ आदि यज्ञों के साथ-साथ अतिथि यज्ञ भी करती थी। स्त्रियों का परम कर्त्तव्य था कि गृहस्थ जीवन सुखी और सम्पन्न रहे। अथर्ववेद में उसे ‘गृह-साम्राज्ञी’ कहा गया है।

स्त्रियों के लिए वानप्रस्थ आश्रम

गृहस्थ आश्रम की समाप्ति के बाद स्त्री अपनी इच्छानुसार अपने पति के साथ वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करती थी। यह स्त्री की इच्छा पर निर्भर करता था कि वह वानप्रस्थ आश्रम में अपने पति के साथ जाए या अपने पुत्रों के साथ जीवन निर्वाह करे। ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब स्त्री अपने पति के साथ वानप्रस्थ में गई थी। बाद में स्त्रियों का वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश बिल्कुल बंद हो गया।

स्त्रियों के लिए संन्यास आश्रम

प्रायः समस्त धर्मशास्त्रकारों ने स्त्री के लिए संन्यास आश्रम का कोई उल्लेख नहीं किया है। संन्यास आश्रम की व्यवस्था पुरुषों के लिए थी, स्त्रियों के लिए नहीं। बौद्ध युग में युवतियाँ भी भिक्षुणी बनने लगीं, जिससे बौद्ध-संघारामों का नैतिक पतन हो गया। सम्भवतः इन्हीं समस्याओं की आंशका से धर्मशास्त्रकारों ने स्त्री के लिए संन्यासी का जीवन स्वीकार नहीं किया तथा उन्हें परिवार के वरिष्ठ सदस्य के संरक्षण में रहने का निर्देश दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – आर्यों की आश्रम व्यवस्था

आर्यों की आश्रम व्यवस्था

ब्रह्मचर्य आश्रम

गृहस्थ आश्रम

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संन्यास आश्रम

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

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संन्यास आश्रम

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संन्यास आश्रम

मनुष्य के जीवन का अन्तिम भाग, पचहत्तर वर्ष की आयु से सौ वर्ष अथवा इसके बाद तक संन्यास आश्रम के अन्तर्गत रखा गया था। वानप्रस्थ आश्रम के बाद सन्यास आश्रम प्रारम्भ होता था।

समस्त पुरुषार्थों के अन्तिम लक्ष्य अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में यह अंतिम चरण था। विष्णु-पुराण में उसे ‘परिवाट्’ तथा धर्मसूत्रों में ‘परिव्राजक’ कहा गया है। वैदिक ग्रन्थों में उसके लिए ‘यति’ शब्द का प्रयोग किया गया है।

सूत्रकाल में ‘सन्यास’ और ‘भिक्षु’ शब्द का प्रचलन होने लगा। सन्यासी का अर्थ पूर्ण त्याग है, भिक्षु का भिक्षुवृत्ति से और ‘यति’ का तपस्या से है। मनु के अनुसार अपनी वय के तीसरे भाग को वानप्रस्थ में बिताकर परिव्राजक बनना चाहिए। अनुत्तरदायी व्यक्ति अर्थात् गृहस्थ जीवन के कर्त्तव्यों का पूर्णतः पालन न करने वाला व्यक्ति सन्यास आश्रम को अपनाने का अधिकारी नहीं था।

संन्यास आश्रम में संन्यासी का जीवन

संन्यास आश्रम का मूल उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति करना था जिसके लिए कठोर साधना और तपस्या की आवश्यकता थी। सन्यास आश्रम में व्यक्ति पूर्ण रूप से निर्लिप्त होकर होकर अपनी आत्मा को ब्रह्म की ओर लगाता था। संन्यासी का जीवन राग-द्वेष और मोह-माया से विलग एवं एकाकी था। वह भोजन, वस्त्र अथवा अन्य वस्तुओं का संग्रह नहीं करता था। वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त वह अन्य कोई कार्य नहीं करता था।

विष्णु-पुराण में व्यवस्था की गई थी कि संन्यासी सम भाव रखे, जरायुज, अण्डज आदि किसी जीव से द्रोह न करे। वह काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दुर्गुणों को त्याग दे।

महाभारत के अनुसार संन्यासी अग्नि, धन, पत्नी और सन्तान के प्रति अनासक्त रहे। वस्त्र, आसन, शैया आदि सुख के साधनों का त्याग करे तथ एक स्थान पर न रहकर विचरण करता रहे। सन्यासी क्रोध-मोह का त्याग करके अंहिसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अशौच (पवित्रता), सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्राणिधान आदि नियमों का पालन करे।

कौटिल्य के अनुसार संन्यासी को इन्द्रिय-निग्रह के साथ जितेन्द्रिय होना चाहिए। मत्स्य पुराण में लिखा है कि जितेन्द्रिय ही वास्तविक भिक्षु था।

मनु ने उसके लिए निरपेक्ष और एकाकी जीवन व्यतीत करने के लिए निर्देश दिया है। वह चलते समय इधर-उधर दृष्टि नहीं डालता था, अपनी दृष्टि को पैरों की ओर ही गड़ाकर चलता था। इसलिए उसे ‘कुक्कुटीपाद’ अथवा ‘कौक्कुटिक’ कहा जाता था। मनु ने वास्तविक सन्यासी उसे स्वीकार किया है जो लौकिक अग्नि से रहित, गृहहीन, शरीर के रोगग्रस्त होने पर भी अपनी चिकित्सा का प्रबन्ध न करने वाला, स्थिर बुद्धि, ब्रह्म का मनन करने वाला और मन में ब्रह्म का भाव रखने वाला हो।

इन्हीं गुणों से सम्पन्न संन्यासी गाँव में भिक्षा के लिए जा सकता था। मनु का कथन है किसंन्यासी के लिए इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना आवश्यक था। वह विषयों की ओर आकृष्ट होती हुई इन्द्रियों को अल्प भोजन और एकान्तवास से रोके।

इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से रोकने से, राग और द्वेष के त्याग से तथा जीवों की अहिंसा से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता था। मनु ने उसे दिन में केवल एक बार भिक्षा ग्रहण करने का निर्देश दिया है, क्योंकि भिक्षा में आसक्त रहने वाला व्यक्ति विषयों में भी आसक्त हो सकता था। ‘विचरण’ संन्यासी का प्रधान गुण था। वह गाँव में एक रात्रि और नगर मे पाँच रात्रि से अधिक निवास नहीं करता था।

मत्स्य पुराण में सन्यासी को उतना ही भोजन करने का निर्देश दिया गया है, जितने से उसकी प्राणशक्ति बनी रहने में समर्थ होती है।

उत्तर-वैदिक-काल में सन्यास आश्रम की परम्परा प्रायः ब्राह्मणों में ही विद्यमान थी। बौद्ध और जैन भिक्षु भी संन्यासी के रूप में विचरण करते थे। रामायण और महाभारत में क्षत्रिय और वैश्य संन्यासियों की कोई जानकारी नहीं मिलती। शूद्रों के लिए केवल गृहस्थ आश्रम निर्दिष्ट था। महाकाव्य काल के प्रायः समस्त संन्यासी ब्राह्मण थे।

महाभारत में ब्राह्मण और संन्यासी को पर्यायवाची अर्थ में भी प्रयुक्त किया गया है। पुराण-काल में ब्राह्मणेत्तर वर्ण के लोग भी संन्यासी ग्रहण करते थे किन्तु ऐसे उदाहरण बहुत ही कम मिलते है। पूर्व-मध्य-युग में भी संन्यास का प्रचलन था। भारत आए अरब यात्रियों ने संन्यासी-जीवन के बारे में विस्तार से लिखा है।

अरब यात्री सुलेमान ने लिखा है-

‘भारत में ऐसे लोग भी हैं जो सदा पहाड़ों और जंगलों में घूमा करते हैं और लोगों से बहुत कम मिलते-जुलते हैं। जब भूख लगती है तब वे लोग जंगल के फल या घास-पत्ते खा लेते हैं। उनमें से कुछ लोग पूर्णतः नग्न रहते हैं। चीते की खाल का एक टुकड़ा उन पर अवश्य पड़ा रहता है। मैने इसी प्रकार के एक मनुष्य को धूप में बैठे हुए देखा था। सोलह वर्ष बाद जब मैं फिर उस ओर से गुजरा तब भी मैंने उसको उसी प्रकार और उसी दशा मे देखा। मुझे आश्चर्य है, धूप की गर्मी से उसकी आँखें क्यों न बह गईं!’

ईरानी लेखक अलबरूनी ने लिखा है-

‘चौथा काल जीवन के अन्त तक चलता है। मनुष्य लाल वस्त्र और हाथ में एक दण्ड धारण करता है। सदैव ध्यानस्थ रहता है। वह अपने मस्तिष्क को शत्रुता और मित्रता से तथा काम, क्रोध और लालसा से रहित कर लेता है। वह किसी से एकदम संभाषण नहीं करता। किसी स्वर्गीय पुरुस्कार प्राप्ति के निमित्त जब वह विशेष गुण युक्त स्थानों का भ्रमण करता है तब वह मार्ग के गाँव में एक दिन से अधिक और नगर में पाँच दिन से अधिक नहीं ठहरता। अगर कोई उसे कुछ देता है तो वह दूसरे दिन के लिए उसमें से नहीं बचाता। मुक्तिमार्ग की चिन्ता करने और जहाँ से इस संसार में लौटना नहीं होता, उस मोक्ष तक पहुँचने के अतिरिक्त उसके पास दूसरा कोई कार्य नहीं था।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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ब्रह्मचर्य आश्रम

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भगवद्भक्ति की अवधारणा

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भगवद्भक्ति की अवधारणा

आर्यों के प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद में ईश्वर की स्तुतियां लिखी गई थीं। इस प्रकार भगवद्भक्ति की अवधारणा का बीज वेदों में उपलब्ध था जो उपनिषद काल में हरे-भरे पौधे में बदलने लगा। बादरायण के ब्रह्मसूत्र ने भगवद्भक्ति की अवधारणा को भलीभांति आगे बढ़ाया।

श्रीमद्भगवतगीता ने भक्ति रूपी पौधे को वैचारिक एवं दार्शनिक खाद-पानी देकर भगवद्भक्ति की अवधारणा को विशाल वटवृक्ष बन जाने का अवसर प्रदान किया। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है- ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम् शरणम् व्रज।’ अर्थात् सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ। अर्थात् मेरी भक्ति कर। गीता के बारहवें अध्याय में भक्ति का अत्यन्त सौम्य निरूपण किया गया है।

छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में बौद्धों तथा जैनियों के धार्मिक आंदोलनों के उठ खड़े होने से भक्ति रूपी वृक्ष कूछ सूखने लगा किंतु शुंग, कण्व, सातवाहन तथा गुप्त शासकों के काल में भक्ति रूपी इस वृक्ष का फिर से उद्धार हुआ। यही कारण था कि शुंग काल (ई.पू.184-ई.पू.72) से लेकर गुप्त काल (ई.320-495) तक विविध धार्मिक साहित्य की रचना हुई और भक्ति रूपी विशाल वटवृक्ष फिर से पूरे उत्साह के साथ लहराने लगा।

शुंगकाल में सूत्र-ग्रंथों एवं स्मृतियों की रचना हुई जबकि गुप्तकाल में विविध पुराणों को लिखा गया जो मूल रूप से भक्ति-ग्रंथ हैं और विष्णु एवं उसके विविध रूपों अर्थात् भगवान एवं उसके अवतारों की भक्ति का उपदेश देते हैं। भागवत पुराण के अनुसार भगवान को पूर्ण आत्मसमर्पण करके हम ब्रह्म को आनन्दमय अवस्था में प्राप्त कर सकते हैं।

विभिन्न पुराणों के माध्यम से भगवद्भक्ति की अवधारणा के विशाल वटवृक्ष पर वैष्णव धर्म की विविध शाखाओं ने आकार लिया। पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म के जन्म एवं विकास की चर्चा हम ‘पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास’ नामक अध्याय में विस्तार से कर चुके हैं। पुरुगुप्त से लेकर विष्णुगुप्त तक (ई.467-550) के परवर्ती-गुप्त शासकों ने पुनः बौद्ध धर्म को आश्रय दिया जिससे भक्ति-धर्म का पौधा एक बार फिर मुरझाने लगा।

आठवीं शताब्दी ईस्वी में शंकराचार्य ने बौद्धों के मत का खण्डन करके ब्रह्म को जगत् का आधार बताया तथा ‘भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्, गोविन्दम् भज मूढ़मते’ का उद्घोष करके उन्होंने भगवद्भक्ति की अवधारणा के अवरुद्ध प्रवाह को पुनः खोल दिया। चूंकि शंकराचार्य का ‘ब्रह्म’ भक्तों की करुण-पुकार सुनने के लिए उपलब्ध नहीं था इसलिए शंकराचार्य के बाद के लगभग सभी आचार्यों ने शंकराचार्य के अद्वैतमत का खण्डन एवं मण्डन करके भक्ति को ज्ञान की काराओं से मुक्त कर दिया।

शंकराचार्य के बाद दक्षिण भारत में ‘सगुण वैष्णव-भक्ति’ की धारा प्रकट हुई। वेदों से लेकर, उपनिषदों, सूत्र ग्रंथों, स्मृतियों, पुराणों आदि में भक्ति के जितने भी सिद्धांत एवं स्वरूप प्रस्तुत किए गए थे, आलवार एवं नयनार संतों ने उन सिद्धांतों को लोकभाषा में गीत लिखकर भगवत्-भक्ति को सहज रूप से जन-सामान्य के लिए उपलब्ध करा दिया। उन्होंने भक्ति का अत्यंत सरस स्वरूप तैयार किया जिसकी दार्शनिक भावभूमि अत्यंत उच्च कोटि की थी।

यद्यपि आलवार एवं नयनार संतों का यह काल लगभग आठ सौ से नौ सौ वर्ष लम्बा है। ये संत कम शिक्षित थे और साधारण जीवन व्यतीत करते थे। इनकी संख्या तय करना कठिन है। आलवार सन्तों ने भगवान विष्णु को अराध्य देव मानकर गीतों और भजनों के माध्यम से भक्ति की धारा प्रवाहित की तो नयनार संतों ने शिव की उपासना का मार्ग प्रस्तुत किया। नयनार संत भगवान शिव को प्रेमपात्री के रूप में तथा स्वयं को प्रेमी के रूप में प्रदर्शित करते हुए गम्भीर भक्तिमय उद्गार प्रकट करते थे।

इस प्रकार दक्षिण से आई भक्ति की फुहारों का सहारा पाकर ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास हिन्दू-धर्मरूपी वटवृक्ष फिर से लहलहा उठा। भगवद्भक्ति की अवधारणा रूपी यह विशाल वटवृक्ष आज भी पूरी ऊर्जा के साथ खड़ा है और मनुष्य मात्र को शीतल छाया प्रदान कर रहा है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

चैतन्य महाप्रभु

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

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भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार

भारत के मध्यकालीन इतिहास में भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एक बड़ी घटना थी जिसने न केवल भारत की संस्कृति का आमूल-चूल परिवर्तन किया अपितु भारत के इतिहास की धारा का रुख भी मोड़ दिया।

भारतीय संस्कृति में भक्ति आंदोलन वस्तुतः एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है जो वेदों के काल से आरम्भ होकर आज तक चल रही है। समय-समय पर उसके पुनरुद्धार की आवश्यकता होती है। जब-जब किन्हीं भी बाह्य कारणों से संस्कृति पर खतरा मण्डराने लगता है तो भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार आरम्भ हो जाता है।

दिल्ली सल्तनत काल (ई.1206-1526) में, हिन्दू-धर्म को इस्लाम से बचाने के लिए भारत भूमि पर भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार हुआ। भक्ति आंदोलन तब तक वेगवती नदी के समान प्रवाहरत रहा जब तक कि पंद्रहवीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत कमजोर न पड़ गई। इस भक्ति आंदोलन के प्रभाव से हिन्दुओं को नवीन मनोबल प्राप्त हुआ तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रांतीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें से अनेक राज्य हिन्दू राजपूतों द्वारा शासित थे। उनके सरंक्षण में हिन्दू-धर्म के भीतर भक्ति आंदोलन अपने चरम को पहुँच गया।

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार – कारण एवं आवश्यकता

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार करने के निम्नलिखित कारण प्रतीत होते हैं-

(1.) राष्ट्रीय आवश्यकता

भारत में जिस समय दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई, उस समय देश में प्रचलित वैष्णव धर्म, शैव धर्म, शाक्त धर्म, बौद्ध धर्म तथा जैन-धर्म तो उपस्थित थे ही, साथ ही इन धर्मों के भीतर भी बड़ी संख्या में मत-मतांतर एवं सम्प्रदाय बने हुए थे। राजाओं-महाराजाओं एवं साधु-संतों से लेकर साधारण प्रजा तक दिग्भ्रमित होकर इन सम्प्रदायों में टूटी और बिखरी हुई थी।

प्रत्येक सम्प्रदाय स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ एवं एकमात्र सत्य घोषित करता था तथा दूसरे सम्प्रदाय को पूरी तरह नकारता था। ऐसी स्थिति में भारत भूमि पर जब इस्लाम का आक्रमण हुआ तो इन सम्प्रदायों को एक ही दार्शनिक भावभूमि में पिरोकर एक सर्व-स्वीकार्य धर्म की छतरी के नीचे लाने की आवश्यकता हुई। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो खण्ड-खण्ड हुआ हिन्दू-धर्म इस्लाम की चपेट खाकर पूरी तरह से नष्ट हो जाता।

इस काल में बौद्ध धर्म नष्ट-प्रायः था तथा जैन-धर्म का प्रभाव अत्यंत सीमित था किंतु हिन्दू-धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों को समेट कर एक करने की आवश्यकता थी। शंकर के अद्वैतवाद और मायावाद, हिन्दुओं को इस्लाम के समक्ष टिकाए रखने में समर्थ नहीं थे। इसलिए हिन्दू-धर्म को ऐसे दार्शनिक आधार की आवश्यकता थी जो भगवान के सर्व-सामर्थ्यवान एवं भक्त-वत्सल होने का भरोसा दे सके ताकि लोग अपने धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास करें और विदेशी धर्म को स्वीकार नहीं करें।

(2.) हारे को हरि नाम

मुस्लिम शासन काल में हिन्दू किसानों पर समस्त कर लाद दिए गए तथा मुसलमान बनने वाले किसानों के कर माफ कर दिए गए। इसी प्रकार हिन्दुओं के लिए राजकीय सेवा के द्वार बंद कर दिए गए थे किंतु मुसलमान बनने वालों को राजकीय सेवा में रखा जाता था और उन्हें सम्मानित किया जाता था।

जब हिन्दुओं का पेट भरना कठिन हो गया तो वे स्वतः ही मुसलमान बनने लगे। बहुत से लोग ऐसे भी थे जो मरना पंसद करते थे किंतु मुसलमान नहीं बनते थे। ऐसे लोगों ने हारे को हरिनाम कहावत को सार्थक करते हुए ईश्-भक्ति का सहारा लिया।

बर्नीयर ने तारीखे फीरोजशाही में लिखा है- ‘हिन्दुओं के पास धन अर्जित करने के साधन नहीं रह गये थे। उनमें से अधिकांश को निर्धनता एवं अभावों का जीवन-यापन करते हुए अजीविका के लिये निरंतर संघर्ष करना पड़ता था। हिन्दू प्रजा के रहन-सहन का स्तर अत्यंत निम्न कोटि का था। करों का समस्त भार उन्हीं पर था। राज्य पद उनको अप्राप्य थे। अल्लाउद्दीन खिलजी ने दोआब के हिन्दुओं से उपज का 50 प्रतिशत भाग बड़ी कठोरता से उगाहा था।’

इन विकट परिस्थतियों में हिन्दुओं में हारे को हरिनाम अर्थात् परास्त एवं कमजोर व्यक्ति का आसरा स्वयं परमेश्वर है, की भावना ने जन्म लिया तथा हिन्दुओं ने अपने कष्टों को कम करने के लिये ईश्वर की शरण में जाने का मार्ग पकड़ा। फलतः सल्तनत काल में हिन्दू-धर्म में भक्ति आंदोलन का पुनरुद्धार हुआ।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि यह बात अत्यन्त उपहासास्पद है कि जब मुसलमान उत्तर भारत के मन्दिर तोड़ रहे थे तब उसी समय अपेक्षाकृत निरापद दक्षिण में भक्तों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की। मुसलमानों के अत्याचार से यदि भक्ति की धारा को उमड़ना था तो पहले उसे सिन्ध में, फिर उत्तर भारत में, प्रकट होना चाहिए था, पर हुई वह दक्षिण में। 

(3.) क्रियात्मक शक्ति के नियोजन की आवश्यकता

जब हिन्दुओं को बड़ी संख्या में राजकीय सेवाओं से निकाल दिया गया, उनकी खेती बाड़ी चौपट हो गई, खेत एवं घर मुसलमानों द्वारा छीन लिये गये, उन्हें सम्पत्ति कमाने तथा रखने के अधिकारों से वंचित कर दिया गया तब हिन्दुओं के पास अपनी क्रियात्मक शक्ति को नियोजित करने का कोई माध्यम नहीं रहा। ऐसी स्थिति में संकटापन्न एवं विपन्न हिन्दुओं ने स्वयं को भगवद्-भक्ति में नियोजित किया। इस प्रकार भक्ति भावना की अपार धारा प्रवाहित हो चली।

(4.) सबके लिये सुलभ मार्ग की आवश्यकता

मुस्लिम शासन काल में हिन्दू-धर्म के बाह्याडम्बरों एवं जाति प्रथा से तंग आकर बहुत से हिन्दू स्वेच्छा से मुसलमान बनने लगे। तब हिन्दू-धर्म-सुधारकों ने इस बात को अनुभव किया कि हिन्दू-धर्म को सब लोगों के लिये सुगम बनाना होगा ताकि लोग इसे छोड़कर अन्य धर्म न अपनायें। इसलिये ईश्वर की सरल भक्ति का मार्ग विस्तारित किया गया जो सबके लिये सुलभ थी और सबको बराबर स्थान देती थी।

(5.) पराधीनता के कष्टों को भूलने का साधन

दिल्ली सल्तनत के शासकों द्वारा हिन्दुओं को आभूषण पहनने, घोड़े पर चढ़ने, राजकीय सेवा करने, सम्पत्ति रखने आदि अधिकारों से वंचित कर दिया गया था। यह पराधीनता उन्हें सालती थी। भक्ति-मार्ग उनकी पराधीनता के विस्मरण का अच्छा साधन सिद्ध हुआ। ईश्वर की प्राप्ति तथा मोक्ष को सर्वप्रधान मानकर यह प्रचारित किया जाने लगा कि ईश्वर की प्राप्ति केवल ईश्वर की दया एवं भक्ति से हो सकती है।

(6.) परस्पर सहयोग की आवश्यकता

मनुष्य सामाजिक प्राणी है, साथ-साथ रहने से उसे एक-दूसरे के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह तभी संभव है जब समाज में कटुता नहीं हो। भगवद्-भक्ति का आधार भी समस्त प्राणियों को ईश्वर की संतान मानकर उनसे प्रेम करने की प्रेरणा ही है। इस भावना को निरंतर विस्तारित करने की आवश्यकता थी, इसलिये भक्ति आंदोलन निरंतर आगे बढ़ता रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय -भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

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