Home Blog Page 128

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

0
मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय - www.bharatkaitihas.com
मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय भगवान विष्णु तथा उनके अवतारों के प्रति भक्ति भावना रखने के निमित्त स्थापित हुए थे। इन समस्त सम्प्रदायों के मूल दर्शन में भगवान का भक्तवत्सल स्वरूप तथा दुष्ट हंता स्वरूप केन्द्रीय भाव में था, साथ ही भगवान को मोक्ष भक्तों के पापों को दूर करके उन्हें मोक्ष देने वाला भी प्रदर्शित किया गया था।

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदायों में रामानुजाचार्य का श्री सम्प्रदाय, विष्णु गोस्वामी का रुद्र सम्प्रदाय, निम्बार्काचार्य का निम्बार्क सम्प्रदाय, माधवाचार्य का द्वैतवादी माध्व सम्प्रदाय, रामानंद का विशिष्टाद्वैतवादी रामानन्द सम्प्रदाय, वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतवादी पुष्टि सम्प्रदाय, चैतन्य महाप्रभु का गौड़ीय सम्प्रदाय अथवा चैतन्य सम्प्रदाय, हितहरिवंश का राधावल्लभी सम्प्रदाय तथा हरिदासी सम्प्रदाय महत्वपूर्ण हैं।

अन्य मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्ति सम्प्रदायों की इस परम्परा में विष्णु गोस्वामी का रुद्र सम्प्रदाय, हितहरिवंश का राधावल्लभी सम्प्रदाय तथा हरिदासी सम्प्रदाय महत्वपूर्ण हैं।

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदायों की विशेषताएँ

मध्य-युगीन भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने जिस भक्ति पर जोर दिया, उसका स्वरूप सरल एवं पवित्र था। उसका कोई पुरोहित तथा कर्मकाण्ड नहीं था। भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने हिन्दू-धर्म के आडम्बरों तथा जटिलताओं को दूर करके उसे सरल तथा स्पष्ट बनाने के प्रयास किए।

इन लोगों ने एकेश्वरवाद एवं अवतारवाद का सहारा लिया तथा ईश्वर की भक्ति विष्णु तथा उनके अवतारों अर्थात् राम एवं कृष्ण के रूप में की गई। हिन्दू-धर्म सुधारकों का विश्वास था कि मोक्ष केवल ईश्वर की कृपा से प्राप्त हो सकता है। भक्ति-मार्गी सुधारकों ने ‘नाम’ तथा ‘गुरु’ की महत्ता पर बल दिया। उनके उपदेशों में ‘समर्पण’ की प्रधानता है तथा ‘अहंकार’ का अभाव है।

इन सन्तों में से कुछ मूर्तिपूजक थे जबकि कुछ मूर्ति-पूजा को निरर्थक मानते थे परन्तु समस्त संतों ने एक स्वर से जाति-पाँति का विरोध किया तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुझाया। कुछ संतों ने भक्ति के साथ-साथ प्रपत्ति एवं शरणागति का मार्ग भी सुझाया।

समस्त संतों की मान्यता थी कि ईश्वर किसी स्थान विशेष में नहीं रहकर कण-कण में समाया हुआ है तथा प्रत्येक प्राणी के भीतर निवास करता है। ईश्वर को भक्ति से प्रसन्न एवं अपने वश में किया जा सकता है। प्रायः प्रत्येक संत ने साधक के लिए सच्चे गुरु का होना आवश्यक माना। भक्तिमार्गी सन्तों ने अपने दार्शनिक ग्रंथों की भाषा संस्कृत रखी किंतु उपदेशों एवं भजनों के लिए हिन्दी एवं लोकभाषा को स्वीकार किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

0
भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ - www.bharatkaitihas.com
भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

मध्यकालीन भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ देखने में भले ही अलग-अलग लगती हों किंतु वस्तुतः एक ही लक्ष्य को लेकर चलती हैं। वह लक्ष्य है भगवत्-प्राप्ति।

श्रीमद्भगवत्गीता में मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग बताये गये हैं- ज्ञान, कर्म एवं भक्ति। इनमें से ज्ञान-मार्ग सर्वाधिक कठिन और भक्ति-मार्ग सर्वाधिक सरल है। भक्ति अपने उपास्यदेव के प्रति भक्त की अपार श्रद्धा तथा असीम प्रेम है। भक्ति करने से भक्त को ईश्वर का प्रसाद अर्थात् विशेष कृपा प्राप्त होती है जिससे मोक्ष मिलता है। ईश्वर भक्ति के तीन प्रधान मार्गों- ज्ञान, प्रेम तथा उपासना को आधार बनाकर भक्ति की तीन धाराएं प्रवाहित हुईं- ज्ञान-मार्गी धारा, प्रेम-मार्गी धारा तथा भक्ति-मार्गी धारा।

ज्ञान-मार्गी धारा

ज्ञान-मार्गी धारा के संतों ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बाह्याडम्बरों तथा मिथ्याचारों की आलोचना करके दोनों को एक दूसरे के निकट लाने का प्रयत्न किया। इस धारा के प्रधान प्रवर्तक कबीर थे। वे एकेश्वरवादी तथा निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे। उन्होंने नाम तथा गुरु दोनों की महत्ता को स्वीकार किया।

प्रेम-मार्गी धारा

प्रेम-मार्गी धारा के सन्तों ने ईश्वर के विभिन्न रूपों से प्रेम करने का मार्ग अपनाया। इन सन्तों ने ईश्वर को स्वामी, पिता, पति एवं सखा आदि सम्बन्धों से स्वीकार किया तथा उसी भाव से उन्हें भजने का मार्ग पुष्ट किया। तुलसी के लिए वे स्वामी थे, सूर के लिए सखा थे, मीरां के लिए पति थे और नामदेव के लिए वे पिता थे। प्रेम-मार्गी भक्तों की हरिदासी आदि धाराओं के संतों ने स्वयं को अपने उपास्य देव की प्रेयसी घोषित किया।

भक्ति-मार्गी धारा

भक्ति-मार्गी धारा के सन्त अपने इष्टदेव की पूजा तथा उपासना में लीन रहते थे। वे ईश्-भजन को जीवात्मा के कल्याण का सर्वोत्तम उपाय मानते थे। भक्ति-मार्गी सन्तों को राज-दरबार के ऐश्वर्य के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। इन सन्तों ने विष्णु एवं उनके अवतारों राम तथा कृष्ण के सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति की। वे दुर्गा, लक्ष्मी एवं सरस्वती आदि ईश्वरीय शक्तियों की भी उपासना करते थे।

इन सन्तों ने अपने कर्मों तथा गुणों की अपेक्षा भगवत् कृपा को अधिक महत्व दिया। इस युग के संतों ने जिस धार्मिक धारा का आह्वान किया वह पूर्णतः आस्तिक थी, वेदों की सर्वोच्चता में विश्वास रखती थी एवं श्रीराम और श्रीकृष्ण को वैदिक देवता ‘विष्णु’ का अवतार मानती थी। भक्ति-मार्गी सन्तों की दो धाराएं हैं- राम-भक्ति धारा एवं कृष्ण-भक्ति धारा-

(1.) राम-भक्ति धारा

राम-भक्ति धारा के सन्तों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अतिशय विनयशीलता तथा मर्यादाशीलता है। रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य तथा तुलसीदास, राम-भक्ति मार्गी सन्त थे। इन सन्तों ने विभिन्न मत-मतान्तरों, उपासना-पद्धतियों तथा विचार-धाराओं में समन्वय स्थापित किया तथा हिन्दू जाति को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया।

(2.) कृष्ण-भक्ति धारा

कृष्ण-भक्ति धारा के सन्तों ने श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं का गुणगान किया और श्रीकृष्ण की उपासना पर बल दिया। निम्बार्काचार्य, चैतन्यमहाप्रभु तथा सूरदास, मीराबाई आदि कृष्ण-भक्ति मार्गी सन्त थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

0
भक्ति आन्दोलन का प्रभाव - www.bharatkaitihas.com
भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

हिन्दू जाति पर मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन का प्रभाव बहुत व्यापक था। जब मुसलमान आक्रांता बलपूर्वक हिन्दुओं को मुसलमान बना रहे थे, तब हिन्दुओं को भक्त कवियों की रचनाओं ने सम्बल प्रदान किया।

भक्ति-आन्दोलन का भारतीयों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। यह प्रभाव इतना गहरा था कि जहाँ साधारण जनता मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध धर्म को अपनी ढाल बनाकर खड़ी हो गई, वहीं भारत के हिन्दू राजाओं ने भी शत्रुओं के हाथों से अपनी प्रजा की रक्षा करने के काम को ईश्वरीय आदेश की तरह शिरोधार्य किया-

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

(1.) हिन्दू जाति में साहस का संसार

हिन्दू जनता मुस्लिम शासन द्वारा किये जा रहे दमन के कारण नैराश्य की नदी में डूब रही थी। भगवद्गीता से प्रसूत ईश्-भक्ति का अवलम्बन प्राप्त हो जाने से उसमें मुसलमानों के अत्याचारों को सहन करने की शक्ति उत्पन्न हो गई।

(2.) मुसलमानों के अत्याचारों में कमी

भक्ति-मार्गी सन्तों के उपदेशों का मुसलमानों पर भी प्रभाव पड़ा। इन सन्तों ने ईश्वर के एक होने का उपदेश दिया और बताया कि एक ईश्वर तक पहुँचने के लिये विभिन्न धर्म विभिन्न मार्ग की तरह हैं। इससे मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं पर किये जा रहे अत्याचारों में कमी हुई।

(3.) बाह्याडम्बरों में कमी

भक्तिमार्गी सन्तों ने धर्म में बाह्याडम्बरों की घोर निन्दा की और जीवन को सरल तथा आचरण को शुद्ध बनाने का उपदेश दिया।

(4.) मूर्ति-पूजा का खंडन

कबीर, नामदेव तथा नानक आदि संत निर्गुण-निराकार ईश्वर की पूजा में विश्वास रखते थे। उन्होंने मूर्ति-पूजा का खंडन किया।

(5.) उदार भावों का संचार

भक्ति-मार्गी सन्तों के उपदेशों के फलस्वरूप हिन्दुओं तथा मुसलमानों में उदारता का संचार हुआ और वे एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता प्रदर्शित करने लगे।

(6.) धर्मों की मौलिक एकता का प्रदर्शन

भक्तिमार्गी सन्तों तथा सूफी प्रचारकों ने एकेश्वरवाद, ईश्वर प्रेम एवं भक्ति पर जोर देकर दोनों धर्मो की मौलिक एकता प्रदर्शित की। इसका हिन्दू तथा मुसलमान, दोनों पर प्रभाव पड़ा और वे एक दूसरे को समझने का प्रयत्न करने लगे।

(7.) जातीय एवं व्यक्तिगत गौरव की उत्पति

भक्ति मार्गी सन्तों द्वारा विष्णु एवं उसके अवतारों के भक्त-वत्सल होने तथा अत्याचारी का दमन करने के लिये अवतार लेने का संदेश बड़ी मजबूती से जनमसामान्य तक पहुँचाया गया। इससे हिन्दुओं में जातीय एवं व्यक्तिगत गौरव उत्पन्न हुआ। वे निर्बल की रक्षा करना ईश्वरीय गुण मानने लगे और स्वयं को भी इस कार्य के लिये प्रस्तुत करने लगे। उन्होंने गौ, स्त्री तथा शरणागत की रक्षा को ईश कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना।

(8.) प्रान्तीय भाषाओं का विकास

भक्ति मार्गी सन्तों ने अपने उपदेश जन-सामान्य तक पहुँचाने के लिये लोक भाषाओं को अपनाया। फलतः प्रान्तीय भाषाओं तथा हिन्दी भाषा की प्रगति को बड़ा बल मिला और विविध प्रकार के साहित्य की उन्नति हुई।

(9.) दलित समझी जाने वाली जातियों को नवजीवन

सन्तों के उपदेशों से भारत की दलित समझी जाने वाली जातियों में नवीन उत्साह तथा नवीन आशा जागृत हुई। भक्ति, प्रपत्ति और शरणागति के मार्ग का अवलम्बन करके हर वर्ग एवं हर जाति का मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता था। इस आन्दोलन ने भारतीय समाज में उच्च एवं निम्न जातियों के बीच बढ़ती हुई खाई को कम किया तथा हिन्दू समाज में नवीन आशा का संचार किया।

(10.) राष्ट्रीय भावना की जागृति

भक्ति आन्दोलन का राजनीतिक प्रभाव भी बहुत बड़ा पड़ा। इसी आन्दोलन के परिणामस्वरूप पंजाब तथा महाराष्ट्र में मुगल काल में राष्ट्रीय आन्दोलन आरम्भ हुए। इस आन्दोलन को पंजाब में गुरु गोविन्दसिंह ने और महाराष्ट्र में शिवाजी ने चलाया था। यह प्रभाव ब्रिटिश शासन काल में भी चलता रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

रामानुजाचार्य

0
रामानुजाचार्य - www.bharatkaitihas.com
रामानुजाचार्य

रामानुजाचार्य भक्ति मार्गी सन्त थे। वे वैष्णव भक्ति के सर्वप्रमुख देव विष्णु एवं देवी की भक्ति को प्रमुखता देते थे। उन्होंने जो परम्परा स्थापित की, वह आज तक विद्यमान है।

भक्ति मार्गी सन्त रामानुजाचार्य

ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी से भारत में वैष्णव आचार्यों की एक नवीन परम्परा आरम्भ हुई। इस परम्परा में आलवार संत यमुनाचार्य के प्रधान शिष्य रामानुजाचार्य (ई.1016-1137) को विशेष सफलता प्राप्त हुई। रामानुजाचार्य को मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन का जन्मदाता कहा जाता है। उनका जन्म ई.1016 में श्रीरंगम् के आचार्य परिवार में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद उन्हें कांजीवरम् के यादव प्रकाश के पास वेदान्त की शिक्षा के लिए भेजा गया।

वेद की ऋचाओं के अर्थ निकालने में उनका अपने गुरु से मतभेद हो गया और उन्होंने स्वतन्त्र रूप से अपने विचारों का प्रचार आरम्भ किया। कुछ दिनों तक गृहस्थ जीवन बिताने के बाद उन्होंने सन्यास ले लिया। उन्होंने दक्षिण तथा उत्तर भारत के धार्मिक स्थानों का भ्रमण किया तथा विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया।

उन्होंने अपने विचारों की पुष्टि के लिए पाँच ग्रन्थों की रचना की-(1.) वेदान्त सारम् (2.) वेदान्त संग्रहम्, (3.) वेदान्त दीपक, (4.) भगवद्गीता की टीका और (5.) ब्रह्मसूत्र की टीका जो ‘श्रीभाष्य’ के नाम से प्रसिद्ध है।

रामानुजाचार्य ने 120 वर्ष के दीर्घ आयुकाल में ‘श्री सम्प्रदाय’ की स्थापना की तथा शंकर के ‘अद्वैतवाद’ एवं ‘मायावाद’ का खण्डन करके ‘विशिष्टाद्वैत दर्शन’ का प्रतिपादन किया। शंकर का ब्रह्म शुद्ध, बुद्ध और निराकार था। उसका मनुष्य से कोई सीधा सम्पर्क नहीं है। साधारण मनुष्य उसकी कल्पना भी नहीं कर पाता था।

इसी ब्रह्म में ईश्वरत्व का आरोपण कर रामानुज ने उसे साधारण मनुष्य की बुद्धि की पकड़ में लाने का प्रयास किया। रामानुज ने ईश्वर, जगत् और जीव, तीनों को सत्य, नित्य और अनादि माना तथा जीव और जगत् को अनिवार्य रूप से ईश्वर पर आश्रित माना। रामानुज का ईश्वर सगुण, सर्वगुण सम्पन्न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वत्र है।

वह इस सृष्टि का निर्माता है और उसकी रचना सीमित अर्थ में सृष्टि से अलग है। ईश एवं सृष्टि का यही द्वैध, भक्ति के सिद्धान्त का आधार है। भक्ति के माध्यम से जीव ईश्वर से प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित कर सकता है।

रामानुजाचार्य को ‘शेष’ अर्थात् लक्ष्मण का अवतार माना जाता है। उनके शिष्यों की मान्यता है कि शेष ही राम के साथ लक्ष्मण के रूप में तथा श्रीकृष्ण के साथ बलराम के रूप में अवतरित हुए तथा कलियुग में उन्होंने रामानुज के रूप में अवतार लेकर विष्णु-धर्म की रक्षा की। रामानुज ने विष्णु एवं लक्ष्मी को एक ही घोषित किया तथा उनकी सगुण भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुझाया।

वे ईश्वर को प्रेम तथा सौन्दर्य के रूप में मानते थे। उनका मानना था कि विष्णु सर्वेश्वर हैं। वे मनुष्य पर दया करके इस पृथ्वी पर मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं। रामानुज ‘राम’ को विष्णु का अवतार मानते थे और राम की पूजा पर जोर देते थे। उनका कहना था कि पूजा तथा भक्ति से मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

रामानुज के प्रयासों से, सगुणोपासना करने वाले वैष्णव धर्म को सम्पूर्ण दक्षिण भारत में लोकप्रियता प्राप्त हुई एवं जनसाधारण तेजी से इस ओर आकर्षित होने लगा। उन्हें न केवल अपने धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास हुआ अपितु भगवान के भक्त-वत्सल होने तथा भगवान द्वारा भक्तों की रक्षा करने के लिए दौड़कर चले आने में भी विश्वास हुआ।

रामानुज ने भक्ति के साथ-साथ ‘प्रपत्ति’ का मार्ग भी सुझाया। मोक्ष प्राप्ति के लिए यह मार्ग सबसे सरल है, क्योंकि इसमें ज्ञान, विद्याभ्यास तथा योग साधना की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर में पूर्ण विश्वास करके स्वयं को उसके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देना ही ‘प्रपत्ति’ है।

ईश्वर प्राप्ति का यह मार्ग समस्त मनुष्यों के लिए खुला था। इससे लाखों शूद्रों और अन्त्यजों के लिए भी हिन्दू-धर्म में बने रहने के लिए नवीन आशा का संचार हुआ। अब उन्हें धार्मिक तथा आध्यात्मिक सन्तोष के लिए दूसरा मार्ग ढूँढने की आवश्यकता न रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

चैतन्य महाप्रभु

माधवाचार्य (मध्वाचार्य)

0
माधवाचार्य - www.bharatkaitihas.com
माधवाचार्य

दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में माधवाचार्य (ई.1197-1278) वैष्णव परम्परा के बड़े आचार्य हुए। उनका जन्म ई.1197 में कन्नड़ जिले के उडिपी नगर के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अपनी शारीरिक शक्ति के कारण वे भीम समझे जाते थे। उन्होंने युवावस्था में ही सन्यास ले लिया। वे भी रामानुज की भांति विष्णु के उपासक थे। उन्हें आनंदतीर्थ भी कहा जाता है तथा वायुदेव का अवतार माना जाता है।

माधवाचार्य ने शंकर के अद्वैतवाद का खण्डन करके वैष्णव-भक्ति परम्परा में ‘द्वैतवाद’ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार ब्रह्म, जीव एवं माया तीनों के पृथक् अस्तित्व हैं और तीनों ही अक्षर हैं अर्थात् इनका कभी क्षरण नहीं होता। उन्होंने वेदान्त के निर्गुण ब्रह्म के स्थान पर ‘विष्णु’ की प्रतिष्ठा की।

मध्वाचार्य में वाद-विवाद करने की अद्भुत योग्यता थी। अपने विचारों की पुष्टि के लिए उन्होंने देश के विभिन्न भागों का भ्रमण किया और अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। मध्वाचार्य का ‘द्वैतवाद’ का सिद्धान्त रामानुज के ‘विशिष्टाद्वैत’ के सिद्धान्त से काफी मिलता-जुलता है। दोनों ईश्वर की भक्ति में विश्वास रखते हैं और विष्णु को ही ईश्वर मानते हैं।

अन्तर केवल इतना ही है कि रामानुज ने ईश्वर, जगत् और जीव, तीनों को सत्य, नित्य और अनादि माना तथा जीव और जगत् को अनिवार्य रूप से ईश्वर पर आश्रित माना। अर्थात् इनमें विशिष्ट प्रकार का द्वैत है। जबकि मध्वाचार्य जीव और जगत् को ईश्वर से सर्वथा भिन्न मानते हैं। मध्वाचार्य के विचार से अन्य समस्त तत्त्व ईश्वर से भिन्न होते हुए भी उस पर आधारित हैं। केवल ईश्वर की ही अपनी स्वतन्त्र सत्ता है।

मध्वाचार्य का ईश्वर सर्वगुणसम्पन्न है और उसका सम्पूर्ण ज्ञान मानव की शक्ति एवं समझ से परे है। ज्ञान द्वारा ईश्वर की प्राप्ति सम्भव नहीं हो सकती। ईश्वर की प्राप्ति केवल भक्ति से हो सकती है। इसके लिए निष्काम कर्म, योग्य गुरु का मार्गदर्शन और ईश्वर की उपासना आवश्यक है। उनके विचार में मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य ‘हरि-दर्शन’ प्राप्त करना है। हरि-दर्शन से मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

निम्बार्काचार्य

0
निम्बार्काचार्य - www.bharatkaitihas.com
निम्बार्काचार्य

रामानुज तथा माधवाचार्य के बाद निम्बार्क स्वामी अथवा निम्बार्काचार्य ने बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में वैष्णव धर्म को नवीन गति दी। उनका जन्म मद्रास प्रान्त के वेलारी जिले में हुआ था। वे रामानुज के समकालीन थे।

निम्बार्काचार्य दक्षिण भारत से उत्तर भारत में चले आए तथा उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। उस काल में मथुरा नगर में बौद्ध और जैन मतावलम्बियों की संख्या अधिक थी। इस कारण निम्बार्काचार्य ने मथुरा में पुनः भागवत धर्म का प्रचार किया तथा उसे जन-जन में लोकप्रिय बनाया।

रामानुज की भांति निम्बार्काचार्य ने भी शंकाराचार्य के अद्वैतवाद का खण्डन किया किंतु निम्बाकाचार्य मध्यम मार्गी थे। वे द्वैतवाद तथा अद्वैतवाद दोनों में विश्वास करते थे।

इस कारण निम्बार्काचार्य का मत ‘द्वैताद्वैतवाद’ तथा ‘भेदाभेदवाद’ कहा जाता है। निम्बार्क के अनुसार जीव तथा ईश्वर व्यवहार में भिन्न हैं किन्तु सिद्धान्त्तः अभिन्न (एक) हैं। ब्रह्म इस विश्व का रचयिता है। निम्बार्काचार्य ‘कृष्ण-मार्गी’ थे और कृष्ण को ईश्वर का अवतार मानते थे। वे प्रेमाश्रयी धारा के संत थे। उनके विचार से राधा-कृष्ण के प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति एवं आत्मसमर्पण से मोक्ष मिल सकता है।

कुछ लोग निम्बार्क के मत को सनाकादिक सम्प्रदाय कहते हैं। इसे ‘सनक सम्प्रदाय’ भी कहा जाता है। सनक सम्प्रदाय में शरणागति का भाव तो स्वीकार्य था परन्तु ध्यान एवं योग आदि को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया। निम्बार्क का कृष्ण समस्त अच्छे गुणों से युक्त तथा समस्त विकारों से परे है। उनका अवतारवाद में भी विश्वास था। उन्होंने नैतिकता के नियमों के पालन पर जोर दिया। निम्बार्क सम्प्रदाय ने जन साधारण को चमत्कार दिखाकर भक्ति में शक्ति होने का विश्वास दिलाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय -भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

चैतन्य महाप्रभु

संत नामदेव

0
संत नामदेव - www.bharatkaitihas.com
संत नामदेव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के काल में महाराष्ट्र में हुए वैष्णव भक्तों में संत नामदेव का नाम अग्रणी है। उनका जन्म ई.1270 में महाराष्ट्र के नरसी बामनी गांव के एक दर्जी परिवार में हुआ।

संत नामदेव के पिता का नाम दयाशेठ और माता का नाम गोणाई था। उनका विवाह बाल्यावस्था में ही कर दिया गया तथा पिता की मृत्यु के बाद परिवार का बोझ भी उनके कन्धों पर आ पड़ा। माता और पत्नी ने उन्हें पैतृक व्यवसाय करने के लिए प्रेरित किया परन्तु नामदेव केवल हरि-कीर्तन करते रहे।

कुछ समय बाद नामदेव पण्ढरपुर में जाकर बस गए। बीस वर्ष की आयु में नामदेव की भेंट संत ज्ञानेश्वर से हुई। इसके बाद नामदेव ने भारत के कई प्रांतों की यात्रा की। दक्षिण भारत की जनता पर नामदेव के उपदेशों का बड़ा प्रभाव पड़ा। वे उत्तर भारत में भी पंजाब सहित कई प्रान्तों में गए किंतु उनका सर्वाधिक प्रभाव पंजाब के लोगों पर पड़ा।

गुरु नानकदेव के विचारों में संत नामदेव के उपदेशों का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। आज भी पंजाब में उनके लाखों अनुयायी हैं और उन्हें उनके नाम के साथ ‘नामदेव’ जोड़ते हैं। विष्णु-भक्ति का प्रचार करते हुए वे पुनः पुण्ढरपुर आ गए।

नामदेव प्रेमाश्रयी भक्ति धारा के कवि थे। उन्होंने जनसाधारण को रीति-रिवाजों एवं जाति-पाँति के बन्धनों से मुक्त होकर प्रेममयी-भक्ति करने का उपदेश दिया। रामानंद की तरह नामदेव के शिष्यों में भी समस्त जातियों और वर्गों के लोग थे। संत नामदेव ने हिन्दू और मुसलमान दोनों से अपनी बुराइयां त्यागने को कहा-

हिन्दू अन्धा, तुरको काना।

दूवौ तो ज्ञानी सयाना।

हिन्दू पूजै देहरा, मुसलमान मसीद,

नामा सोई सेविया जहं देहरा न मसीद।।

नामदेव एकेश्वरवादी थे और मूर्ति-पूजा करने तथा पुरोहितों के नियन्त्रण में रहने के विरुद्ध थे। नामदेव की मान्यता थी कि केव भक्ति के माध्यम से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

संत नामदेव के लिए प्रभु स्मरण ही जीवन का आधार था और सभी मनुष्यों को प्रभु के नाम का स्मरण करने का संदेश देते थे। वे भगवान के सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों को भजने योग्य मानते थे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के सगुण स्वरूप का गुणगान किया और साथ ही निर्गुण ईश्वर की उपासना की महत्ता भी बताई। उन्होंने कहा-

‘त्रिवेणी पिराग करौ मन मंजन।

सेवौ राजा राम निरंजन।’

संत नामदेव की शिक्षा समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने और मानव मात्र के प्रति प्रेम और सेवा की भावना को जागृत करने का आह्वान करती है। वे कहते हैं-

हमारे करता राम सनेही,

काहे रे नर गरब करत हो।

बिनस जायगी देही।

हरि नाम हीरा हरि नाम हीरा,

हरि नाम लेत मिटें सब पीरा।’

संत नामदेव ने मराठी में अभंग और हिंदी में पदों की रचना की। उनके भजनों और पदों में प्रभु स्मरण, सामाजिक समरसता और जीवन में भक्ति की महत्ता का बखान है।

संत नामदेव के भजन और पद गुरुग्रंथ साहिब में सम्मिलित किए गए। इन भजनों से नामदेव के व्यापक दृष्टिकोण की जानकारी मिलती है। वे समस्त प्राणियों में एक ही परमात्मा को देखते थे- ‘एकल माटी कुंजर चींटी, भाजन हैं बहु नाना रे।’

गुरुग्रंथ साहिब में उनका एक पद इस प्रकार से है-

‘कहा करउ जाती कहा करउ पाति,

राम को नाम जपउ दिन राति।’

गुरुग्रंथ साहिब में उनका एक अन्य प्रसिद्ध पद इस प्रकार से है-

‘भइया कोई तुलै रे रामाँय नाम,

जोग यज्ञ तप होम नेम व्रत। ए सब कौंने काम।।

संत नामदेव का मानना था कि राम नाम के समक्ष सारे यज्ञ, हवन, तपस्या, और व्रत तुच्छ हैं।

संत कबीर और संत रैदास आदि संतों ने संत नामदेव की महिमा का गुणगान किया है। संत रैदास ने कहा-

नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरे।

कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै। नामदेव द्वारा रचित पद एवं अभंग महाराष्ट्र के घर-घर में गाए जाते हैं। देश भर में भ्रमण करने वाले साधु-संत भी नामदेव द्वारा रचित भजन एवं पद गाते हैं। माना जाता है कि 80 वर्ष की आयु में ई.1350 में नामदेव ने शरीर छोड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

चैतन्य महाप्रभु

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

रामानन्दाचार्य

0
रामानन्दाचार्य - www.bharatkaitihas.com
रामानन्दाचार्य

रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में 14वीं शताब्दी ईस्वी में रामानंद हुए जिन्हें रामानन्दाचार्य भी कहा जाता है। उन्हें वैष्णव परम्परा की धार्मिक क्रांति को दक्षिण से उत्तर भारत में ले आने का श्रेय प्राप्त है- ‘भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाए रामानन्द।’

कुछ विद्वानों के अनुसार रामानंद का जन्म ई.1299 में प्रयाग के एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने बनारस में शिक्षा प्राप्त की तथा वहाँ स्वामी राघवानन्द से श्री सम्प्रदाय की दीक्षा ली।

रामानन्दाचार्य ने बैकुण्ठवासी विष्णु के स्थान पर मानव शरीरधारी और राक्षसों का संहार करने वाले भगवान् राम को अपना आराध्य बनाया। उस समय हिन्दू समाज को एक ऐसे धर्म की आवश्यकात थी जो वीरत्व, त्याग एवं बलिदान के लिए प्रेरित कर सके। यद्यपि विष्णु के अवतार के रूप में भगवान राम को पहले से ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी परन्तु राम की भक्ति और उपासना का व्यापक प्रचार रामानन्द ने ही किया।

रामानन्दाचार्य ने ‘ब्रह्मसूत्र’ पर ‘आनन्द भाष्य’ लिखा जिसमें ब्रह्म के रूप में श्रीराम को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने ईश्वर के सगुण और निर्गुण, दोनों रूपों का समर्थन किया। उनके द्वारा स्थापित सम्प्रदाय ‘रामावत सम्प्रदाय’ कहलाता है। रामानन्दी लोग राम तथा सीता की पूजा करते हैं।

रामानंद रामानुज के ‘विशिष्ठ दर्शन’ में आस्था रखते थे और उन्होंने रामानुज के विचारों का समस्त उत्तर भारत में प्रचार किया। रामानुज, निम्बार्क और मध्वाचार्य के उपदेशों की भाषा संस्कृत थी किंतु रामानंद ने अपने उपदेश हिन्दी में दिए।

रामानन्दाचार्य के विचार रामानुज के विचारों से भी अधिक क्रान्तिकारी थे। रामानुज चारों वर्णों और अनेक जातियों की एकता में विश्वास नहीं करते थे परन्तु रामानन्द जाति-प्रथा को नहीं मानते थे। रामानन्द ने जाति-पाँति और ऊँच-नीच का भेद नहीं माना और शूद्रों, मुसलमानों तथा स्त्रियों को भी अपना शिष्य बनाया। उनके पूर्व स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से धार्मिक विचार-विमर्षों में भाग नहीं लेने दिया जाता था।

रामानन्द ने इस प्रतिबन्ध को नहीं माना। उनकी मान्यता थी कि राम के भक्त बिना भेदभाव के एक साथ खा-पी सकते हैं। भगवान के भक्तों के लिए वर्णाश्रम का बन्धन व्यर्थ है। परमेश्वर का एक ही गोत्र है और एक ही परिवार है। अतः समस्त विष्णु-भक्त भाई-भाई हैं और सबकी जाति एक है।

रामानंद के 12 शिष्यों में सभी जातियों के स्त्री-पुरुष सम्मिलित थे- अनन्तानन्द, सुखानन्द, योगानन्द, सुरसुरानन्द, गालवानन्द, नरहरि आनन्द, भावानन्द (सभी ब्राह्मण), कबीरदास (जुलाहा), पीपा (क्षत्रिय), रैदास (चमार), धन्ना (जाट) तथा सेन (नाई)। कुछ सूचियों में योगानंद तथा गालवानंद के स्थान पर पद्मावती तथा सुरसुरी नामक महिला शिष्याओं के नाम मिलते हैं।

कहा जाता है कि गंगा नामक एक वेश्या ने भी रामानन्दाचार्य से दीक्षा प्राप्त की। रामानंद के शिष्यों में से कुछ सगुणोपासक हुए तथा कुछ निर्गुणोपासक। ये सभी शिष्य मुस्लिम शासन काल में हिन्दू-धर्म को दृढ़ता देने वाले सिद्ध हुए। इनकी प्रेरणा से समाज के विभिन्न वर्गों एवं जातियों के करोड़ों लोग, अनेक विपत्तियां सहकर भी वैष्णव धर्म में बने रहे।

चूंकि रामानन्दाचार्य ने स्वर्ग में रहने वाले विष्णु के स्थान पर धरती पर विचरने वाले राम एवं सीता को अपना आराध्य बनाया, संस्कृत के स्थान पर हिन्दी को उपदेशों का माध्यम बनाया तथा ब्राह्मण की जगह हर जाति के व्यक्ति को अपना शिष्य बनाया इसलिए उन्हें अपने पूर्ववर्ती वैष्णव आचार्यों अर्थात् रामानुज, माधवाचार्य तथा निम्बार्क से अधिक सफलता मिली। इस सफलता के आधार पर कई बार यह भी कह दिया जाता है कि मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन का सूत्रपात रामानन्द ने किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

चैतन्य महाप्रभु

रामानन्दाचार्य पर अन्य लेख

वैष्णव संत रामानंद से पहले हिन्दू धर्म की स्थिति

रामानंद की समन्वयवादी परम्परा

रामानंद के शिष्य

वल्लभाचार्य

0
वल्लभाचार्य - www.bharatkaitihas.com
वल्लभाचार्य

महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म ई.1479 में दक्षिण भारत के एक तैलंग ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता एक उच्चकोटि के विद्वान् थे और उन्होंने बनारस को अपना कार्यक्षेत्र बना रखा था। 13 वर्ष की आयु में ही वल्लभाचार्य समस्त धर्मग्रन्थों में पारंगत हो गए। उनके विचारों पर विष्णु स्वामी के भक्ति-सिद्धान्तों का विशेष प्रभाव पड़ा। वल्लभाचार्य ने उनके विचारों को अधिक सुस्पष्ट करके उनका प्रचार किया। उन्हें अग्निदेव का अवतार माना जाता है।

वल्लभाचार्य ने सनातन धर्म के समक्ष ‘शुद्धाद्वैत’ सिद्धांत की संकल्पना प्रस्तुत की तथा पुष्टि सम्प्रदाय की स्थापना की। उन्होंने अणुभाष्य, सिद्धान्त रहस्य और भागवत टीका सुबोधिनी आदि अनेक ग्रंथों की रचना करके अपने मत के समर्थन में दार्शनिक भावभूमि तैयार की तथा ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भागवत् और श्रीमद्भगवद्गीता को पुष्टि मार्ग का प्रमुख साहित्य घोषित किया।

वल्लभाचार्य की मान्यता थी कि सृष्टि में तीन तत्व विद्यमान हैं- ब्रह्म, जगत् एवं जीव। आत्मा और जड़-जगत् ब्रह्म के ही स्वरूप हैं। ब्रह्म बिना किसी वस्तु अथवा शक्ति की सहायता से विश्व का निर्माण करता है, वह सगुण और सच्चिदानन्द है किंतु हमारी अविद्या के कारण वह हमें जगत् से अलग जान पड़ता है। इस अविद्या से मुक्ति पाने का मार्ग भक्ति है।

वल्लभाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद का विरोध करके यह सिद्ध किया कि जीव उतना ही सत्य है जितना कि ब्रह्म। फिर भी, वह ब्रह्म का अंश और सेवक ही है। उन्होंने कहा कि जीव भगवान् की भक्ति के बिना शान्ति नहीं पा सकता। भगवान का अनुग्रह होने पर जीव का पोषण होता है। व

ल्लभाचार्य के अनुसार ब्रह्म के तीन स्वरूप हैं- आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं अंतर्यामी। अनंत दिव्य गुणों से युक्त पुरुषोत्तम श्री कृष्ण ही परमब्रह्म हैं। उनका मधुर रूप एवं लीलाएं, जीव में आनंद का आविर्भाव करने वाला अक्षय स्रोत है। सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म का विलास है तथा सम्पूर्ण जगत लीला के निमित्त ब्रह्म की आत्मकृति है। उन्होंने प्रेम-लक्षणा-भक्ति पर विशेष बल दिया और वात्सल्य-रस से ओत-प्रोत भक्ति की शिक्षा दी।

वल्लभाचार्य का भगवत्-कृपा में अटूट विश्वास था। उनके अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं। उनकी सेवा एवं भक्ति ही जीव का परम कर्त्तव्य है। मनुष्य संसारिक मोह और ममता का त्याग करके एवं श्रीकृष्ण के चरणों में सर्वस्व समर्पण करके भक्ति के द्वारा ही उनका अनुग्रह प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने भारत में कृष्ण-भक्ति का व्यापक प्रचार किया तथा भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को भक्ति का आधार बनाया ताकि जन साधारण, बाल-लीलाओं के गुणगान में रस का अनुभव कर सके और बालक के रूप में विहार करने वाले सहज-सरल ईश्वर के साथ अधिक तादात्म्य स्थापित कर सके। वल्लभाचार्य का लक्ष्य मुक्ति नहीं है। वह तो अपने आराध्य देव श्रीकृष्ण के निकट पहुँचकर सदैव के लिए उनकी सेवा में रत रहना चाहते हैं।

वल्लभाचार्य के जीवन का अधिकांश समय ब्रज में व्यतीत हुआ। उन्होंने मथुरा के निकट गोवर्द्धन पर्वत से भगवान श्रीकष्ण का विग्रह प्राप्त कर उसकी स्थापना की। भगवान के इस प्राकट्य को उस काल की विलक्षण घटना माना गया तथा देश भर से विष्णु-भक्त, भगवान के इस विग्रह के दर्शनों के लिए गोवर्द्धन पर्वत पहुँचने लगे।

वल्लभाचार्य की प्रेरणा से देश भर में श्रीमद्भागवत् का पारायण होने लगा। वल्लभाचार्य के सैंकड़ों शिष्य थे जिनमें सूरदास भी सम्मिलित थे। वल्लभाचार्य के शिष्य पूरे देश में फैल गए और उन्होंने भजन-कीर्तन एवं अपनी रचनाओं के माध्यम से देश भर में कृष्ण-भक्ति का प्रचार किया। यद्यपि वल्लभाचार्य ने संसार के भोग-विलास  त्याग कर विरक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का उपदेश दिया था परन्तु उनके अनुयायी इसका अनुसरण नहीं कर सके। ई.1531 में महाप्रभु वल्लभाचार्य का निधन हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

चैतन्य महाप्रभु

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

चैतन्य महाप्रभु

0

चैतन्य महाप्रभु महाप्रभु वल्लभाचार्य के समकालीन थे। चैतन्य का जन्म ई.1486 में कलकत्ता से 75 मील उत्तर में स्थित नवद्वीप अथवा नादिया ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उस समय मुसलमानों के आतंक से भयभीत वैष्णव-भक्त बंगाल से भागकर नवद्वीप में शरण ले रहे थे। इस कारण नवद्वीप में वैष्णव-भक्ति की धारा अबाध गति से बह रही थी।

चैतन्य ने संस्कृत, व्याकरण और काव्य का अध्ययन करने के बाद भागवत पुराण तथा अन पुराणों का अध्ययन किया। उनके बड़े बड़े भाई विष्णुरूप ने बहुत कम आयु में ही सन्यास ले लिया था, इसलिए उनकी माता ने बाल्यकाल में ही चैतन्य का विवाह कर दिया। जब चैतन्य 11 वर्ष के हुए तो उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के पिण्डदान और श्राद्ध के लिए ई.1505 में चैतन्य को गया जाना पड़ा।

वहाँ उनकी भेंट ईश्वरपुरी नामक सन्यासी से हुई। चैतन्य उनके शिष्य हो गए। इसके बाद चैतन्य गृहस्थ जीवन से विरक्त होकर कृष्ण-भक्ति में लीन रहने लगे। चैतन्य ने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया किंतु उनसे चैतन्य की जिज्ञासा शान्त हुई तो उन्होंने भक्ति तथा प्रेम के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग अपनाया। 24 वर्ष की आयु में वे केश्व भारती से दीक्षा लेकर सन्यासी हो गए। सन्यास लेने के बाद आठ वर्ष तक चैतन्य ने देश का भ्रमण किया।

वे सर्वप्रथम नीलांचल गए और इसके बाद दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र एवं सेतुबंध आदि स्थानों पर रहे। उन्होंने देश के कोने-कोने में जाकर हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया। ई.1515 में विजयादशमी के दिन चैतन्य ने अपनी विशाल शिष्य मण्डली के साथ वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। ये वन के रास्ते ही वृंदावन को चले।

कहा जाता है कि चैतन्य के हरिनाम उच्चारण से वशीभूत होकर वन्यपशु भी नाचने लगते थे। शेर, बाघ और हाथी आदि भी इनके आगे प्रेमभाव से नृत्य करते चलते थे। कार्तिक पूर्णिमा को चैतन्य अपने शिष्यों सहित वृंदावन पहुँचे। वृंदावन में आज भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन गौरांग-आगमनोत्सव मनाया जाता है।

वृंदावन में महाप्रभु ने इमली-तला और अक्रूर-घाट पर निवास किया तथा जन साधारण के समक्ष प्राचीन श्रीधाम वृंदावन की महत्ता प्रतिपादित कर लोगों की सुप्त भक्ति-भावनाओं को जागृत किया। वृंदावन से महाप्रभु प्रयाग गए। वहाँ कुछ काल तक निवास करने के पश्चात् महाप्रभु ने काशी, हरिद्वार, शृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा आदि तीर्थों में भगवद्नाम संकीर्तन किया। 

उनका मानना था कि ईश्वर कई रूप धारण करता है परन्तु उनमें सबसे मोहक और आकर्षक रूप श्रीकृष्ण का है। वे कृष्ण को ईश्वर का अवतार न मान कर ईश्वर मानते थे। उनके विचार से सबसे ऊँची भक्ति और प्रेम का घनिष्ठ स्वरूप पति-पत्नी के सम्बन्ध में होता है जिसमें किसी प्रकार का व्यापार नहीं होता और न उस प्रेम की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए राधा और कृष्ण की कल्पना की गई है।

कृष्ण परम-ब्रह्म हैं और उनके भक्त राधा स्वरूप हैं। इसलिए भक्त का कृष्ण के प्रेम में विह्वल होना स्वाभाविक है। चैतन्य आत्मविभोर होकर अपना अस्तित्त्व भूल जाते थे और कृष्ण में लीन हो जाते थे।

चैतन्य ने भगवान की भक्ति के लिए संगीत और नृत्य का सहारा लिया जो संकीर्तन कहलाता था। उन्होंने अपने शिष्यों के साथ ढोलक, मृदंग, झाँझ, मंजीरे आदि वाद्य बजाकर, नृत्य करते हुए उच्च स्वर में हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया- ‘हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे।’

उनकी संकीर्तन पद्धति मथुरा-वृन्दावन से लेकर पूर्वी-बंगाल तक व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गई। इसमें भक्तजन समूह में संकीर्तन करते थे। चैतन्य और उनके अनुयाई सार्वजनिक मार्गों पर भजन-कीर्तन करते हुए नाचते-गाते थे और अर्द्ध-मूर्च्छित स्थिति में पहुँच जाते थे। स्वयं चैतन्य भी भक्ति के आवेश में मूर्च्छित और समाधिस्थ हो जाते थे।

चैतन्य ने लोगों को कृष्ण-भक्ति का मन्त्र दिया। कृष्ण-भक्ति एवं कीर्तन का प्रचार उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। उनके निर्मल चरित्र एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार से असंख्य लोग उनके अनुयाई बन गए।

चैतन्य का धर्म रस्मों और आडम्बरों से मुक्त था। उन्होंने परमात्मा में पूर्ण आस्था रखने का उपदेश दिया। उनकी उपासना का स्वरूप प्रेम, भक्ति, कीर्तन और नृत्य था। प्रेमावेश में ही भक्त परमात्मा से साक्षात्कार का अनुभव करता है। चैतन्य का कहना था कि यदि कोई जीव कृष्ण पर श्रद्धा रखता है, अपने गुरु की सेवा करता है तो वह मायाजाल से मुक्त होकर कृष्ण के चरणों को प्राप्त करता है। चैतन्य ने ज्ञान के स्थान पर प्रेम और भक्ति को प्रधानता दी।

उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों से पृथक् रहने का उपदेश दिया। वे मूर्ति-पूजा और धर्मग्रन्थों के विरोधी नहीं थे परन्तु उन्हें कर्मकाण्ड तथा आडम्बरों से घृणा थी। चैतन्य के अनुसार समस्त लोग समान रूप से ईश्वर की भक्ति कर सकते हैं। भक्ति मार्ग में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं होता, समस्त भक्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणाश्रित होने के अधिकारी हैं।

चैतन्य और उनके अनुयाइयों ने मुसलमानों एवं निम्न जातियों के लोगों को भी कृष्ण-भक्ति का उपदेश दिया। चैतन्य के प्रभाव से शूद्रों को भी भक्ति का अधिकार मिल गया। चैतन्य ने अपने ‘शिक्षाष्टक’ में कृष्ण-भक्ति के विषय में अपने विचार व्यक्त किए हैं। उनके अनुसार भक्ति का प्रथम और प्रमुख साधन ‘हरिनाम संकीर्तन’ है।

चैतन्य महाप्रभु बंगाल के सबसे बड़े धर्म-सुधारक थे। उनके विचार में केवल कर्म से कुछ नहीं होता। मोक्ष प्राप्ति के लिए हरि-भक्ति तथा उनका गुण-गान करना आवश्यक है। प्रेम तथा लीला इस सम्प्रदाय की विशेषताएँ हैं। चैतन्य सम्प्रदाय, निम्बार्काचार्य की भांति भेदाभेद के सिद्धान्त को मानते थे अर्थात् जीवात्मा एक दूसरे से भिन्न तथा अभिन्न दोनों है। केवल भक्ति के बल से ही मानव की आत्मा श्रीकृष्ण तक पहुँच सकती है। मनुष्य की आत्मा ही राधा है। उसे श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन रहना चाहिए। दास, मित्र, पत्नी तथा पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण से प्रेम करना मानव जीवन का प्रधान लक्ष्य है।

चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष जगन्नाथ पुरी में व्यतीत किए। वे जीवन के अन्तिम बारह वर्ष में कृष्ण-विरह में व्याकुल रहा करते थे और हर समय उनके नेत्रों से आँसू बहा करते थे। उनके भक्त उन्हें कृष्ण की प्रेम-लीलाएँ सुना-सुना कर सान्त्वना दिया करते थे। ई.1533 में 47 वर्ष की अल्पायु में रथयात्रा के दिन चैतन्य भक्ति के उन्माद में समुद्र में घुस गए तथा उनका शरीर पूरा हो गया।

बंगाल, बिहार, उड़ीसा एवं उत्तर प्रदेश की प्रजा पर चैतन्य महाप्रभु की संकीर्तन भक्ति का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उनकी मृत्यु के पश्चात् वृन्दावन के गोस्वामियों ने चैतन्य के सिद्धान्तों और संकीर्तन-पद्धति को व्यवस्थित रूप प्रदान किया तथा चैतन्य-सम्पद्राय की स्थापना की। इस सम्प्रदाय को गौड़ीय सम्प्रदाय भी कहा जाता है। वृन्दावन के गोस्वामी, चैतन्य को अपना प्रभु मानते थे परन्तु नादिया ग्राम के अनुयाई उन्हें कृष्ण का अवतार मानने लगे और गौरांग महाप्रभु के रूप में स्वयं चैतन्य की पूजा होने लगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

चैतन्य महाप्रभु

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...