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धर्म एवं विज्ञान में संघर्ष (31)

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धर्म एवं विज्ञान - bharatkaitihas.com
धर्म एवं विज्ञान में संघर्ष

धर्म एवं विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। भारत में तो धर्म को ही विज्ञान कहा जाता है तथा माना जाता है कि जब मनुष्य को आत्मा और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है तो उसे मोक्ष मिल जाता है किंतु ईसाइयत में धर्म एवं विज्ञान को एक दूसरे के शत्रु के रूप में देखा गया।

यद्यपि इटली में पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में रिनेंसाँ नामक आंदोलन आरम्भ हो चुका था तथा लोग नए तरीके से सोचने लगे थे तथापि रोमन चर्च ने स्वयं को इतना परिपक्व एवं अपरिवर्तनीय मान लिया था कि उसमें नवीन विचारों, दार्शनिक मीमांसाओं एवं वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर उद्घाटित तथ्यों, प्रश्नों एवं बहसों की स्वीकार्यता ही नहीं थी।

ईसाई धर्म ने न केवल पुराने रोमन धर्म एवं यूनानी धर्म के ग्रंथों, प्रतिमाओं, मंदिरों, प्रतीकों, उपदेशकों, दार्शनिकों एवं संतों को ढूंढ-ढूंढकर नष्ट किया था अपितु स्वयं को ऐसे लौह-पिंजर में बंद कर लिया जिसमें नवीन वायु के प्रवेश के लिए कोई छिद्र ही उपलब्ध नहीं था।

चर्च हर समय और हर बार विज्ञान एवं दार्शनिक विचारों को न केवल संदेहयुक्त दृष्टि से देखता था अपितु उन्हें धर्म-विरोधी घोषित कर देता था। इस कारण पंद्रहवीं शताब्दी के बाद न केवल रोम अथवा इटली में अपितु सम्पूर्ण यूरोप में धर्म और विज्ञान के बीच संघर्ष छिड़ गया।

शीघ्र ही यह संघर्ष खूनी जंग में बदल गया। दुर्भाग्य से यह जंग लम्बी चली। इस जंग में प्रायः विज्ञान एवं दर्शन हार जाता था तथा उसके प्रतिपादकों को चर्च द्वारा पकड़ कर जीवित ही आग में जला दिया जाता था।

बाइबिल के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति ईसा से ठीक 4004 साल पहले हुई थी, प्रत्येक वृक्ष एवं पशु अलग-अलग उत्पन्न किया गया था तथा सबसे अंत में मनुष्य बनाया गया था। ईसाई-संघ मानता था कि जल-प्रलय हुआ था और नूह की नाव में सारे जानवरों के जोड़े रखे गए थे ताकि किसी भी जाति का लोप न हो जाए।

बाइबिल के बहुत से विचार, संसार भर में विभिन्न स्थानों पर ‘प्रकट हो चुके’ तथा ‘प्रकट हो रहे’ ज्ञान से मेल नहीं खाते थे।

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चीन में ईसा से लगभग 600 साल पहले ‘त्सोन त्से’ नामक एक दार्शनिक हुआ। उसने बताया कि समस्त प्राणियों की उत्पत्ति एक ही प्रजाति के जीवों से हुई है। इस अकेली प्रजाति के जीवों में समय के साथ लगातार परिवर्तन होते गए जिससे अलग-अलग तरह के प्राणी बन गए। इन परिवर्तनों में हजारों-लाखों साल का समय लगा। यह बात ईसाई धर्म के सिद्धांत से मेल नहीं खाती थी, इसलिए यदि यूरोप में कोई व्यक्ति इस तरह की बातें करता था तो उसे धर्म-द्रोही घोषित कर दिया जाता था। चर्च का मानना था कि पाप और दुःख सभी मनुष्यों को अनिवार्यतः भोगने पड़ते हैं। इस धारणा के माध्यम से संसार में निर्धनता एवं संकट को एक स्थाई सम्मान प्रदान करने का प्रयास किया गया था। संसार के लगभग सभी धर्म इस मामले में ईसाई मत का समर्थन एवं पुष्टि करते हुए दिखाई देते हैं। महाभारत में महारानी कुंती भगवान श्रीकृष्ण से वरदान के रूप में अपने लिए विपत्तियों एवं दुःखों की मांग करती हैं ताकि संकट में उसे परमात्मा याद आएं और वह परमात्मा को कभी भूले नहीं। ईसाई धर्म सहित संसार के किसी भी धर्म में यह विचार नहीं के बराबर है कि मानव सभ्यता से गरीबी, दुःख एवं संकट के स्थाई निष्कासन की बात सोची जाए किंतु विज्ञान ने ऐसा सोचने का साहस निरंतर दिखाया है।

हालांकि रामराज्य में समस्त मनुष्यों एवं प्राणियों के सुखी होने की कल्पना की गई है।

निकोलस कोपर्निकस

ई.1543 में पोलैंड का रहनेवाला एक कैथोलिक वृद्ध अपनी चारपाई पर लेटा हुआ अपनी अंतिम साँसें ले रहा था और बड़ी कठिनाई से कुछ कागज पढ़ने का प्रयास कर रहा था। ये कागज उसी ने लिखे थे और अब मुद्रण के लिए तैयार थे। इस समय इस वृद्ध की आयु सत्तर साल थी और आने वाली दुनिया उसे महान् खगोल-विज्ञानी कोपर्निकस के नाम से जानने वाली थी।

अपनी मृत्यु शैय्या पर कोपर्निकस को संभवतः यह अनुमान नहीं था कि उसकी लिखी यह पुस्तक विश्व-मंडल के बारे में मानवीय दृष्टिकोण में एक महान् परिवर्तन लाने जा रही थी। इससे यूरोप के ईसाई जगत् में भी एक जोरदार बहस छिड़ जाने वाली थी।

निकोलस कोपर्निकस की पुस्तक का नाम है- ‘आकाश मंडल के दृष्टिकोण की कायापलट।’ इस पुस्तक में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया कि- ‘सौर मंडल का केंद्र पृथ्वी नहीं अपितु सूर्य है।’

इस सिद्धांत से ईसाई जगत् में इतनी बड़ी जंग छिड़ेगी, इसका पहले-पहल किसी को अनुमान नहीं था। यद्यपि कैथोलिक चर्च, पृथ्वी को सौर मंडल का केंद्र मानता था किंतु कोपर्निकस के सिद्धांत को आसानी से नकारा नहीं जा सकता था क्योंकि कोपर्निकस की अपनी प्रतिष्ठा थी। ईसाई संघ ने इस सिद्धांत पर बहुत आपत्तियां खड़ी कीं किंतु जब तक यह पुस्तक उनके हाथों में आती, कोपर्निकस इस नश्वर दुनिया से सदा के लिए निकल चुका था।

जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तो भयभीत संपादक ने इसकी प्रस्तावना में लिखा- ‘सूर्य-केंद्र के सिद्धांत का अर्थ यह नहीं कि विश्व-मंडल में सचमुच ऐसा है, यह सिर्फ गणित के हिसाब से निकाला गया परिणाम है।’

चर्च द्वारा दार्शनिक ब्रूनो को दर्दनाक मृत्युदण्ड

जैसे-जैसे मानवता आगे बढ़ रही थी, ऐशिया की भांति यूरोप में भी ज्ञान एवं विज्ञान प्रकट होना चाहता था किंतु रोम की धार्मिक व्यवस्था ज्ञान एवं विज्ञान के प्राकट्य को मानवता के लिए अत्यंत खतरनाक समझती थी।

कोपरनिकस की मृत्यु के केवल पाँच साल बाद ई.1548 में इटली के नेपल्स राज्य में जियोर्डानो ब्रूनो नामक विश्व-प्रसिद्ध दार्शनिक का जन्म हुआ। उसने कहा कि– ‘तारे दूर-दूर स्थित सूर्य ही हैं जिनके अपने ग्रह हैं। ब्रह्माण्ड अनंत है तथा उसका कोई केन्द्र नहीं है।’

ब्रूनो की ये बातें कैथोलिक चर्च की धार्मिक मान्यताओं से उलटी थीं। इसलिए बू्रनो को पकड़कर रोम के टॉवर ऑफ नोना में बंद कर  दिया गया तथा उस पर धर्म-विरोधी बातों के लिए मुकदमा चलाया गया। यह मुकदमा सात साल तक चला।

ब्रूनो पर आरोप लगाया गया कि उसके विचार अरब के दार्शनिकों पर आधारित हैं। उसने कैथोलिक मान्यताओं के विरुद्ध बातें कही हैं, ईसा मसीह की दिव्यता, उनके अवतार तथा जीसस की माता मैरी की पवित्रता एवं सरकारी मंत्रियों के विरुद्ध विचार व्यक्त किए हैं तथा उन्हें जनता में फैलाया है।

उसने कई ब्रह्मण्डों के अस्तित्व में होने एवं उनकी शाश्वतता का दावा किया है जबकि संसार तो एक ही है तथा वह नश्वर है। ब्रूनो पर आरोप लगाया गया कि उसने ईसाई मत की इस बात को गलत बताया है कि- ‘पशुओं में आत्मा नहीं होती।’

ब्रूनो ने अपना बचाव किया कि वह वेनिस में चर्च की शिक्षाओं को स्वीकार कर चुका है तथा वह तो केवल दार्शनिक बात कहने का प्रयास कर रहा है। उसका पक्का विश्वास है कि- ‘ब्रह्माण्ड अनेक हैं।’

रोम के कैथोलिक चर्च ने ब्रूनो के विचारों के लिए उसकी भर्त्सना की तथा उससे कहा कि वह अपने विचारों का पूर्ण परित्याग करके क्षमा याचना करे। ब्रूनो ने ऐसा करने से मना कर दिया। एक प्राचीन पुस्तक ‘जैस्पर शूप ऑफ ब्रेसलाओ’ के अनुसार ब्रूनो पर यह आरोप लगाया गया कि उसने अपने मुकदमे के न्यायाधीश को धमकी देते हुए कहा कि- ‘संभवतः तुम्हें मेरे विरुद्ध यह वाक्य बोलने पर उससे अधिक भय लगता है जिस भय के साथ मैं उसे सुनता हूँ।’ अर्थात् मुझसे ज्यादा तो तुम डरे हुए हो!

20 जनवरी 1600 को पोप क्लेमेंट (अष्टम्) ने ब्रूनो को धर्म विरोधी घोषित करके  उसे मृत्यु-दण्ड सुनाया। 17 फरवरी 1600 के दिन बू्रनो को रोम के मुख्य बाजार में स्थित चौक ‘कैम्पो डे फियोरी’ में नंगा करके सूली पर उलटा लटकाया गया। उस समय उसकी जीभ बंधी हुई थी क्योंकि उसने धर्म के विरुद्ध शैतानियत भरे शब्द उच्चारित किए थे। उसी हालत में ब्रूनो को जीवित जला दिया गया। उसकी राख टिबेर नदी में फैंक दी गई।

ब्रूनो के विरुद्ध मुकदमे का फैसला करने वाले पैनल में उस समय के अनेक विख्यात कार्डिनल शामिल किए गए थे जो विभिन्न यूरोपीय देशों के विख्यात चर्चों के बिशप थे। इनमें से कार्डिनल कैमिलो बोर्गसे आगे चलकर रोम के पोप भी बने तथा उन्हें पोप पॉल (पंचम्) के नाम से जाना गया।

गैलीलियो गैलिली

चर्च द्वारा ब्रूनो को सूली पर चढ़ाए जाने के कुछ समय बाद, धर्म और विज्ञान की खूनी-जंग में हिस्सा लेने वाला एक और युवा वैज्ञानिक सामने आया। वह था, इटली का खगोल-विज्ञानी, गणित-शास्त्री और भौतिक-विज्ञानी गैलिलियो गैलिली। इस महान् विचारक का जन्म 15 फरवरी 1564 को इटली के पीसा नामक नगर में एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। वह एक कैथोलिक ईसाई था तथा धार्मिक प्रवृत्ति का वैज्ञानिक था।

उसके प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों ने ईसाई धर्म की कई पुरानी मान्यताओं को नए सिरे से चुनौती दी तथा अपने पूर्ववर्ती चिंतकों, दार्शनिकों एवं वैज्ञानिकों द्वारा बताई गई बातों का वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर समर्थन किया। इसे आधुनिक विज्ञान का पिता कहा जाता है क्योंकि उसने भौतिक यंत्रों से किए जाने वाले प्रयोगों की आवृत्ति को दुहराने एवं उनसे प्राप्त परिणामों की सफलताओं एवं असफलताओं का विष्लेषण करके अंतिम निष्कर्ष प्राप्त करने की विधि निकाली थी।

ईश्वर की भाषा गणित है!

गैलीलियो ने अनुभव किया कि प्रकृति के नियम विभिन्न कारकों से प्रभावित होते हैं और किसी एक के बढ़ने और घटने के बीच गणित के समीकरणों जैसे ही सम्बन्ध होते हैं। इसलिए उसने कहा कि- ‘ईश्वर की भाषा गणित है।’

प्रकाश की गति का मापन

इस महान् गणितज्ञ और वैज्ञानिक ने प्रकाश की गति को नापने का साहस किया। इसके लिए गैलीलियो और उसका एक सहायक अंधेरी रात में कई मील दूर स्थित पहाड़ की दो अलग-अलग चोटियों पर जा बैठे।

गैलीलियो ने अपने पास एक लालटेन रखी, अपने सहायक का संकेत पाने के बाद उन्हें लालटेन और उसके खटके के माध्यम से प्रकाश का संकेत देना था। दूसरी पहाड़ी पर स्थित उनके सहायक को लालटेन का प्रकाश देखकर अपने पास रखी दूसरी लालटेन का खटका हटाकर पुनः संकेत करना था।

इस प्रकार दूसरी पहाड़ की चोटी पर चमकते प्रकाश को देखकर गैलीलियो को प्रकाश की गति का आकलन करना था। इस प्रकार गैलीलियो ने जो परिणाम पाया वह बहुत सीमा तक वास्तविक तो नहीं था परन्तु प्रयोगों की आवृत्ति और सफलता-असफलता के बाद ही अभीष्ट परिणाम पाने की जो शृंखला उनके द्वारा प्रारंभ की गयी वह अद्वितीय थी। कालान्तर में प्रकाश की गति और उर्जा के संबंधों की जटिल गुत्थी को सुलझाने वाले महान् वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन ने इसी कारण गैलीलियो को ‘आधुनिक विज्ञान का पिता’ कहकर संबोधित किया।

सूर्य भी बदलता है

गैलिलियो ने कुछ ही समय पहले आविष्कार किए गए एक लैन्स का प्रयोग करके ‘टेलीस्कोप’ नामक यंत्र बनाया। गैलिलियो पहला मनुष्य था जिसने टेलीस्कोप के जरिए इतनी सूक्ष्मता से अंतरिक्ष का अवलोकन किया। उसे पक्का विश्वास हो गया कि कोपर्निकस की बातें सच हैं। गैलिलियो ने सूरज में काले धब्बे भी देखे, जिन्हें अब सूर्य-धब्बे कहा जाता है। इस तरह उसने ‘धर्म’ की एक और प्रमुख धारणा पर वार किया कि ‘सूर्य कभी नहीं बदलता और ना ही उसका तेज कम होता है।’

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है

ई.1609 में गैलीलियो को एक ऐसी दूरबीन का पता चला जिसका आविष्कार हॉलैंड में हुआ था। इस दूरबीन की सहायता से दूरस्थ खगोलीय पिंडों को देख कर उनकी गति का अध्ययन किया जा सकता था। गैलीलियो ने इसका विवरण सुनकर स्वयं ऐसी दूरबीन का निर्माण कर लिया जो हॉलैंड में आविष्कृत दूरबीन से कहीं अधिक शक्तिशाली थी।

इसके आधार पर किए गए प्रयोगों के माध्यम से गैलीलियो ने यह पाया कि पूर्व में व्याप्त मान्यताओं के विपरीत ब्रह्माण्ड में स्थित पृथ्वी समेत सभी ग्रह, सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इससे पूर्व कॉपरनिकस ने भी यह कहा था कि ‘पृथ्वी समेत सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है ‘ जिसके लिए उसे चर्च का कोपभाजन बनना पड़ा था।

यहाँ तक कि ईसा से लगभग साढ़े पाँच सौ साल पहले स्वयं पाइथोगोरस यह कह चुका था ‘कि पृथ्वी और अन्य खगोलीय पिण्ड किसी अग्नि के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। ‘

हालांकि पाइथोगोरस इस अग्नि की पहचान सूर्य के रूप में नहीं कर सका था। पाइथोगोरस को दिव्य शक्ति प्राप्त थी जिसके आधार पर पाइथोगोरस ने यह बात कही थी जबकि कोपरनिकस नक्षत्रों की गति का अध्ययन करके और गैलीलियो दूरबीन से देखकर यह बात कह रहा था।

चर्च का कोपभाजन

गैलिलियो का स्वभाव कोपर्निकस से बिलकुल अलग था। वह पूरे जोश के साथ और बेधड़क होकर अपने विचार व्यक्त करता था। दुर्भाग्य से इस युग का धार्मिक वातावरण मैत्रीपूर्ण नहीं था। कैथोलिक चर्च कोपर्निकस के विचारों का प्रबल विरोध करता था। इसलिए जब गैलिलियो ने दावा किया कि सूर्य-केंद्र का सिद्धांत सिर्फ वैज्ञानिक तौर पर ही सही नहीं, अपितु बाइबिल से भी मेल खाता है, तो चर्च को उसकी बातों में धर्म-द्रोह की गंध आई।

जब गैलीलियों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि सूर्य-केंद्र का सिद्धांत बाइबल से मेल खाता है, तो उसने यह दिखाया मानो धर्म के बारे में उसे बहुत जानकारी है। इससे चर्च के अधिकारी और भी भड़क उठे। गैलिलियो अपने सिद्धांत का स्पष्टीकरण देने के लिए पीसा से रोम आया किंतु कुछ लाभ नहीं हुआ। ई.1616 में चर्च ने उसे आदेश दिया कि वह कोपर्निकस के विचारों को फैलाना बंद करे।

कुछ समय के लिए गैलिलियो चुप होकर बैठ गया किंतु ई.1632 में उसने कोपर्निकस के विचारों को पुनः सही ठहराते हुए एक और पुस्तक प्रकाशित की। उसके ठीक एक साल बाद रोमन कैथोलिक अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा दी किन्तु बाद में गैलीलियो के माफी मांग लेने पर उसकी वृद्धावस्था को देखते हुए उसकी सजा को ‘नजरबंदी’ में बदल दिया ताकि वह धर्म विरुद्ध वैज्ञानिक प्रयोगों को आगे जारी नहीं रख सके।

बहुत से लोगों का मानना है कि चर्च के विरुद्ध गैलिलियो का यह संघर्ष वास्तव में विज्ञान और धर्म के बीच की लड़ाई थी जिसमें विज्ञान की जीत हुई। क्योंकि समय के साथ लोगों ने मान लिया कि गैलीलियो जो कुछ भी कह रहा था, वह सही था। ई.1642 में गैलीलियो की मृत्यु हो गई।

चर्च द्वारा गलती सुधार

गैलीलियो की मृत्यु के ठीक साढ़े तीन सौ वर्ष बाद ई.1992 में वेटिकन सिटी स्थित कैथोलिक चर्च ने स्वीकार कर लिया कि गैलीलियो के मामले में निर्णय लेने में उनसे चूक हुई थी। यह संभवतः पहली बार था अन्यथा चर्च का यह दावा था कि वह सत्य की व्याख्या अचूक ढंग से करने में सक्षम है।

विज्ञान को आजादी

यूरोप में रोम के कैथोनिक चर्च के नेतृत्व में धर्म और विज्ञान की इस खूनी-जंग में प्राण गंवाने वाले वैज्ञानिकों की सूची अभी पूरी नहीं हुई है किंतु चूंकि हमारा केन्द्र-बिंदु रोम तथा इटली है, इसलिए हमें इस विषय को यहीं विराम देना पड़ेगा। अठारहवीं शताब्दी आते-आते यूरोप में ईसाई संघ की कट्टरता कम होने लगी तथा यूरोप में बुद्धिवाद का प्रचार हुआ जिससे विज्ञान को खुलकर सोचने की शक्ति मिल गई।

अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेज विज्ञानी आइजक न्यूटन (ई.1642-1727) ने गुरुत्वाकर्षण के नियमों की व्याख्या की तथा बताया कि चीजें पृथ्वी पर क्यों गिरती हैं। उसने सूर्य एवं ग्रहों की चालों के भेद को भी समझाया। इस वैज्ञानिक को पूरे संसार में बहुत आदर मिला।

इसी प्रकार उन्नीसवीं सदी के मध्य में ई.1859 के आसपास चार्ल्स डार्विन की पुस्तक ‘ओरिजिन ऑफ स्पीसीज’ प्रकाशित हुई। उसने बताया कि पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों के प्राणियों का उद्भव एवं विकास कैसे हुआ है!

इस प्रकार चीनी दार्शनिक ‘त्सोन त्से’ की बात को स्वीकार करने में यूरोप ने चार हजार साल लगा दिए। डार्विन ने सम्पूर्ण मानव जाति का सोचने का तरीका बदल दिया तथा अब धर्म नामक संस्था, अपनी मनमर्जी से विज्ञान को धर्म-विरोधी कहकर विज्ञान के उपासकों को आग या जेल में नहीं झौंक सकती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैथोलिक धर्म से अलग सम्प्रदायों का उदय (32)

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कैथोलिक धर्म से अलग सम्प्रदायों का उदय

ईसाइयत में कैथोलिक धर्म ही अकेला पंथ या सम्प्रदाय नहीं है। कैथोलिक धर्म से अलग भी बहुत से सम्प्रदाय हैं। ये पंथ एवं सम्प्रदाय भी ईसाई धर्म के अंतर्गत हैं किंतु कैथोलिक मान्यताओं से अलग मान्यताएं रखते हैं।

मार्टिन लूथर का आंदोलन

धर्म एवं विज्ञान के बीच हुए संघर्ष में वैज्ञानिकों पर किए गए अत्याचारों ने तथा इनक्विजीशन के माध्यम से ईसाई साधुओं पर किए गए जुल्मों ने बहुत से कैथोलिक ईसाइयों को दूसरे ढंग से सोचने के लिए प्रेरित किया। सोलहवीं सदी के आरम्भ में जर्मनी में मार्टिन लूथर नामक एक महान् नेता उत्पन्न हुआ।

वह एक ईसाई पादरी था। एक बार जब वह रोम गया तो वहाँ ईसाई संघ के भ्रष्टाचार एवं विलास ने उसके हृदय को ग्लानि से भर दिया। उसने कैथोलिक धर्म में फैले भ्रष्टाचार का विरोध करना आरम्भ किया। इस कारण रोमन ईसाई संघ दो टुकड़ों में विभक्त हो गया। पूर्वी यूरोप और रूस का प्राचीन काल से चला आ रहा यूनानी ईसाई संघ इस झगड़े से अलग ही रहा। वह तो पहले से ही रोम को सच्ची ईसाइयत से बहुत दूर समझता था।

मार्टिन लूथर के नेतृत्व में शुरु हुआ आंदोलन ‘प्रोटेस्टेण्ट विद्रोह’ कहलाया। चूंकि ये लोग प्रोटेस्ट अर्थात् विरोध करते थे इसलिए ‘प्रोटेस्टेण्ट-ईसाई’ कहलाए। बहुत से राजाओं ने भी इस आंदोलन को सहयोग दिया। ये राजा चाहते थे कि पोप उन पर आदेश चलाना बंद करे। बहुत से ईसाई पादरी जो अंतर्मन से चाहते थे कि धर्म नामक संस्था में घुस आए भ्रष्टाचार एवं विलासिता को समाप्त हो जाना चाहिए, वे भी इस आंदोलन से जुड़ गए।

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इटली अभी रिनेंसाँ के युग में चल ही रहा था, इसलिए जनता में भी बहुत से विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। कुछ लोग मैकियावेली की पुस्तकों को पढ़कर राजाओं एवं पोप आदि सत्ताओं से चिढ़ गए थे और वे भी कुछ करना चाहते थे। इस कारण पश्चिमी यूरोप में रोमन चर्च के विरोध का जर्बदस्त माहौल बन गया। पूरे पश्चिमी यूरोप में यह आंदोलन इतना अधिक फैल गया कि ईसाइयत दो संघों में बंट गई- रोम कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेण्ट। रोमन संघ के विरुद्ध हुए इस आंदोलन को रिफॉर्मेशन भी कहा जाता है। प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल एवं आधुनिक काल में रोम तथा पोप के विरुद्ध जितने भी आंदोलन हुए उनमें प्रोटेस्टेण्ट आंदोलन सबसे बड़ा सिद्ध हुआ। यह किसी एक या दो देशों में नहीं था अपितु यूरोप के अधिकांश देशों में फैल गया था। बाद में प्रोटेस्टेण्ट्स भी बहुत से फिरकों में बंट गए। सोलहवीं सदी में फ्रांसिस्कन एवं डोमिनिकन नामक ईसाई सम्प्रदाय अस्तित्व में आए। जब मार्टिन लूथर प्रोटेस्टेण्ट आंदोलन कर रहा था, तब उन्हीं दिनों लोयोला निवासी इग्नेशियस नामक एक स्पेनिश पादरी ने एक नया ईसाई संघ स्थापित किया। उसने इसका नाम ‘सोसायटी ऑफ जीसस’ रखा। इसके सदस्य जेजुइट कहलाए।

यह जीजस संघ एक अद्भुत संस्था थी। इसका मुख्य उद्देश्य रोमन ईसाई संघ तथा पोप की सेवा के लिए पूरा समय देने वाले समर्पित मनुष्यों का दल तैयार करना था। यह संघ अपने सदस्यों को कठोर प्रशिक्षण देकर हर तरह से मजबूत बनाता था। इस कारण इस संघ के सदस्य रोमन चर्च एवं पोप के बड़े विश्वस्त सिद्ध हुए।

इन लोगों ने अपना सम्पूर्ण जीवन अपने लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया था। इसलिए वे चर्च तथा पोप के आदेश पर किसी तरह की शंका नहीं करते थे अपितु उनके हर आदेश पर आंख मींचकर विश्वास करते थे। ईसाई संघ के हितों के लिए वे अपना जीवन न्यौछावर करने में भी नहीं चूकते थे। इनके लिए ईसाई संघ के हित में सब-कुछ उचित था।

इन लोगों का चरित्र बहुत उज्ज्वल था। इसके कारण लोग उनकी बातों को मानते थे। इन लोगों के प्रभाव का परिणाम यह हुआ कि स्वयं रोम में भ्रष्टाचार बहुत कम हो गया। हालांकि भ्रष्टाचार कम होने का बड़ा कारण प्रोटेस्टेण्ट आंदोलन था। उस काल में हैप्सबर्ग वंश का चार्ल्स (पंचम्) पवित्र रोमन साम्राज्य का सम्राट था। उसे अपने पिता और दादा के विवाहों के परिणामस्वरूप विरासत में बहुत बड़ा साम्राज्य मिल गया था जिसमें ऑस्ट्रिया, जर्मनी, नेपल्स, सिसली, नीदरलैण्ड और स्पेनी अमरीका सम्मिलित थे।

इस प्रकार यह राजा लगभग आधे यूरोप का स्वामी था। उसने प्रोटेस्टेण्ट्स के विरुद्ध पोप की सहायता करने का निर्णय लिया किंतु जर्मनी के बहुत से छोटे-छोटे राजाओं एवं सामंतों ने प्रोटेस्टेण्टों का साथ दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि जर्मनी में रोमन और लूथरन नामक दो झगड़ालू फिरके बन गए। इनके झगड़े इतने अधिक बढ़ गए कि जर्मनी में गृहयुद्ध छिड़ गया।

इंग्लैण्ड के राजा हेनरी (अष्टम्) ने पोप के विरुद्ध प्रोटेस्टेण्ट्स का साथ दिया। उसकी ललचाई आंखें रोमन चर्च तथा ईसाई संघ की सम्पत्ति पर लगी हुई थीं। इसलिए उसने रोम से सम्बन्ध तोड़कर मठों एवं गिरजों की सारी सम्पत्ति जब्त कर ली। हेनरी (अष्टम्) की पोप से नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी था कि हेनरी अपनी पहली रानी को छोड़कर दूसरी स्त्री से विवाह करना चाहता था किंतु पोप इसके लिए अनुमति नहीं दे रहा था। इंग्लैण्ड ने रोम से अपना सम्बन्ध तोड़ लिया तथा राजा हेनरी (अष्टम्) स्वयं इंग्लैण्ड के ईसाई संघ का प्रधान बन गया।

कुछ ही दिनों में इंग्लैण्ड में ईसाई धर्म एक सरकारी कार्यालय के रूप में चलने लगा जिससे राजा को कम ही मतलब था। फ्रांस में भी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई। वहाँ के सम्राट का प्रधानमंत्री ‘रिशैल्यू’ एक कार्डिनल था और राज्य का असली शासक भी वही था। रिशैल्यू ने फ्रांस को पोप एवं रोम के पक्ष में रखा और फ्रांस में प्रोटेस्टेण्ट्स का दमन किया।

रिशैल्यू इतना गहरा राजनीतिक था कि एक ओर वह अपने राज्य फ्रांस में प्रोटेस्टेण्ट्स का दमन कर रहा था तो दूसरी ओर वह जर्मनी में प्रोटेस्टेण्ट्स को बढ़ावा दे रहा था ताकि जर्मनी में गृहयुद्ध की आग ठण्डी न हो।

मार्टिन लूथर सबसे बड़ा प्रोटेस्टेण्ट था और उसने रोम की सत्ता का जमकर विरोध किया किंतु वह स्वयं भी धर्म के मामले में बहुत कट्टर था। उसने एक नए ढंग के धार्मिक-उन्मत्त पैदा कर दिए- ‘प्यूरिटन’ तथा ‘कैलविनिस्ट’। पोप एवं रोम के इनक्विजीशन एवं कर प्रणाली से दुःखी जन-साधारण ने भी, विशेषकर किसानों ने प्रोटेस्टेण्ट्स का साथ दिया।

देखते ही देखते यूरोप में किसानों का बड़ा आंदोलन आरम्भ हो गया और वह प्रोटेस्टेण्ट्स के आंदोलन से भी आगे बढ़ गया। उनकी मुख्य मांग यह थी कि गुलाम-काश्तकार की प्रथा समाप्त की जाए। इस पर मार्टिन लूथर जो स्वयं को धर्म-सुधारक कहता था, किसानों पर भड़क गया।

लूथर ने सार्वजनिक भाषणों में अपने अनुयाइयों से अपील की कि- ‘इस शर्त से तो सब आदमी बराबर हो जाएंगे और ईसा का आध्यात्मिक राज्य बदलकर एक बाहरी सांसारिक राज्य बन जाएगा। असम्भव! पृथ्वी का कोई ऐसा राज्य रह ही नहीं सकता जिसमें सब व्यक्ति बराबर हों। कुछ को आजाद, दूसरों को गुलाम, कुछ को राजा, दूसरों को प्रजा रहना ही पड़ेगा….

…. आंदोलनकारी किसानों को मार डालना जरूरी है। इसलिए जो लोग भी ऐसा कर सकते हों, वे किसानों को खुल्लम-खुल्ला या छिपकर काट डालें। कत्ल कर डालें और छुरों से भोंक दें, और समझ लें कि एक बागी से बढ़कर जहरीला, बुरा और निपट शैतान कोई नहीं है। तुम उसे मार डालो, जैसे तुम पागल कुत्ते को मार डालते हो। अगर तुम उस पर टूट नहीं पड़ोगे तो वह तुम पर और सारे देश पर टूट पड़ेगा।’

लूथर के समर्थकों द्वारा की गई हिंसात्मक कार्यवाहियों के कारण किसान प्रोटेस्टेण्ट आंदोलन से दूर हो गए तथा इस आंदोलन के अंत में यूरोप का मध्यमवर्ग ही इस आंदोलन के साथ रह गया। उस काल में यूरोप में मध्यम वर्ग तेजी से आगे बढ़ रहा था। मध्यम-वर्ग की उन्नति में कैथोलिक चर्च की बजाय प्रोटेस्टेण्ट विचार अधिक सहायक सिद्ध हो रहे थे।

इसलिए यूरोप के बहुत बड़े हिस्से में तथा बहुत बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग के लोग कैथोलिक धर्म छोड़कर प्रोटेस्टेण्ट के अनुयाई हो गये। यूरोप के अधिकांश राजा भी पोप और चर्च के बंधन से मुक्त हो गए। लोग कैथोलिक चर्च से दूर होकर प्रोटेस्टेण्ट बन रहे थे किंतु अब धर्म लोगों के दिमागों में नहीं, गलियों में लड़ रहा था।

कैथोलिकों और प्रोटेस्टेण्टों के खूनी झगड़ों, कैथोलिकों और कैलविनों के रक्तपातों, इनक्विजिशन द्वारा बांटी जा रही दर्दनाक मौतों के साथ-साथ यूरोप में प्यूरिटन नामक सम्प्रदाय द्वारा लाखों स्त्रियों को डायन बताकर की गई हत्याओं का अंततः यही परिणाम होना था कि लोग धर्म से उकता जाएं किंतु इसके लिए यूरोप में आर्थिक समृद्धि एवं वैज्ञानिक खोजों का दौर आरम्भ होना आवश्यक था।

समृद्धि एवं विज्ञान के आालोक में ही यह सम्भव था कि लोग धर्म के वास्तविक स्वरूप एवं आडम्बर में अंतर करके देख सकें किंतु उस दौर को आरम्भ होने के लिए लोगों को अठारहवीं सदी के मध्य तक प्रतीक्षा करनी थी। तब तक के लिए यूरोप में रक्तपात और हिंसा का चक्र इसी प्रकार जारी रहना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण (33)

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यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण

यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण का सिलसिला आदि काल से है। संसार में यूरोप के लोगों को सर्वाधिक सुसभ्य माना जाता है किंतु यह बात सही नहीं है। आज भी यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण संसार की अन्य सभ्यताओं की तुलना में अधिक हैं।

धर्म के नाम पर अत्याचारों का सिलसिला

ईसाई धर्म के उदय के साथ ही धार्मिक झगड़ों एवं साम्प्रदायिक वैमनस्य ने हिंसक रूप ले लिया। यहूदियों ने न केवल ईसा मसीह को सूली पर चढ़वाया अपितु येरूशलम के आसपास चोरी-छिपे ईसाई बन रहे लोगों को को ढूंढ-ढूंढ कर मारा जिसके कारण यहूदियों एवं ईसाइयों के बीच घृणा की स्थाई दीवार खिंच गई।

रोमवासियों ने भी अपने प्राचीन रोमन धर्म को बचाने के लिए ईसाई संतों एवं प्रचारकों की निर्मम हत्याएं कीं। मिस्र के लोगों ने रोमवासियों से बहुत पहले ईसाई धर्म अपना लिया था इस कारण रोमन सेनाओं ने मिस्री ईसाइयों पर बहुत अत्याचार किए जिससे मिस्र के ईसाइयों को भागकर रेगिस्तान में छिप जाना पड़ा।

रेगिस्तान में ईसाइयों के अनेक गुप्त मठ बन गए और इन मठों में रहने वाले साधुओं के चमत्कारों की आश्चर्य युक्त और रहस्यमयी कहानियाँ ईसाई जगत में फैल गईं।

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बाद में जब कुस्तुंतुनिया के सम्राट कान्सेन्टीन ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया, तब ईसाइयत रोमन साम्राज्य का राजकीय धर्म बन गई। इसके बाद रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को मानने की मनाही हो गई। इसलिए रोम के कैथोलिक ईसाइयों ने प्राचीन रोमन धर्म मानने वालों को ढूंढ-ढूंढ कर जिंदा जलाया। जब रोम में ईसाई धर्म को मान्यता मिल गई तो मिस्र के ईसाइयों ने भी भी मिस्र में निवास कर रहे गैर-ईसाइयों पर, अर्थात् प्राचीन मिस्री धर्म को मानने वालों पर बड़े अत्याचार किए। इसके बाद इस्कंदरिया ईसाई शिक्षा का बड़ा केन्द्र हो गया। समय के साथ ईसाई धर्म विभिन्न सम्प्रदायों में टूटता-बिखरता एवं बंटता चला गया तथा ईसाइयत कई फिरकों में बंट गई। ये फिरके अपने-अपने वर्चस्व के लिए परस्पर संघर्ष करते थे। ये रक्त-रंजित संघर्ष जनसामान्य के लिए बहुत दुःखदायी सिद्ध हुए। जब सातवीं सदी में अरब वाले इस्लाम को लेकर आए तो बहुत से मिस्र वासियों ने उनका स्वागत किया। अरबों ने मिस्र और उत्तरी अफ्रीका को सरलता से विजय कर लिया तथा अब इस्लाम को मानने वाले ईसाइयों पर अत्याचार करने लगे और उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर मारने लगे। जब पंद्रहवीं सदी में इस्लाम ने कुस्तुंतुनिया पर आक्रमण किया तो कुस्तुंतुनिया के ईसाई सामंतों ने ‘पोप के ताज  से रसूल की पगढ़ी अच्छी है’ कहकर इस्लाम का स्वागत किया।

इंग्लैण्ड द्वारा आयरलैण्ड के कैथोलिकों पर अत्याचार

आयरलैण्ड में चूंकि ईसाई धर्म बहुत पहले आ गया था इसलिए अधिकतर आयरलैण्ड निवासी भी कैथोलिक धर्म को मानते थे। उन्हें इंग्लैण्ड में बड़ी हिकारत की दृष्टि से देखा जाता था। इंग्लैण्ड के धनी सामंत लोग प्रोटेस्टेण्ट्स थे तथा उनकी संख्या बहुत अधिक थी। वे लॉर्ड्स कहलाते थे। जबकि आयरलैण्ड में कैथोलिकों की संख्या अधिक थी तथा वे खेतों में मजदूरी करते थे।

आयरलैण्ड में कैथोलिकों की जनसंख्या बहुत अधिक होने पर भी आयरलैण्ड की पार्लियामेंट प्रोटेस्टेण्ट्स के हाथों में थी। ये लोग इंग्लैण्ड से आकर उत्तरी आयरलैण्ड में बस गए थे। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में आयरलैण्ड से भी इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट के लिए सदस्य चुने जाते थे किंतु किसी भी कैथोलिक को इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट में प्रवेश करने का अधिकार नहीं था।

अमरीका में इटली के कैथोलिक मजदूरों से भेदभाव

अठारहवीं एवं उन्नीसवीं सदी में यूरोप के बहुत से देशों के लोग अमरीका में जाकर बसने लगे। इनमें जर्मनी, आयरलैण्ड, इंग्लैण्ड, पोलैण्ड एवं इटली आदि देशों के लोग प्रमुख थे। यह एक आश्चर्य की बात थी कि उत्तरी यूरोप के देशों से आए हुए लोग दक्षिणी यूरोप अर्थात् इटली से आए हुए लोगों को नीची दृष्टि से देखते थे। इटली से आए हुए लोगों को हिकारत से ‘डेगो’ कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ है- ‘गेहुएँ रंग वाला विदेशी’

ये लोग अमरीका में मजदूरी करते थे तथा कमजोर एवं बिखरे हुए थे। अन्य यूरोपीय देशों से आए हुए जिन मजदूरों को अच्छा वेतन मिलता था, वे भी इटली के मजदूरों को अलग वर्ग का समझते थे और उन्हें अपने साथ नहीं बिठाते थे।

यूरोप की धन-पिपासा और गुलाम-प्रथा

यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण का सबसे बड़ा माध्यम गुलाम प्रथा थी। यूरोप में गुलामी की प्रथा ईसा के जन्म से शताब्दियों पहले से प्रचलन में थी। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि युग आते थे और जाते थे, राज्य और साम्राज्य बनते थे और मिटते थे किंतु रोम से लेकर यूरोप के अंतिम छोर तक गुलामी की प्रथा ज्यों की त्यों बनी हुई थी।

एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य की देह को पशुओं की तरह हांके जाना, मनुष्यता नामक तत्व पर कलंक के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता था। जब तक कोई समाज गुलामी करने और करवाने की अपनी प्रवृत्ति से दूर नहीं होता, उस समाज में वैचारिक क्रांति को जन्म नहीं मिलता। ऐसा समाज केवल शक्ति, दण्ड एवं पूंजी से चलता है, मानवता के पवित्र गुणों से नहीं।

यूरोपीय समाज में युगों से प्रचलित गुलामी करवाने की मनोवृत्ति के कारण इंग्लैण्ड, हॉलैण्ड, फ्रांस, पुर्तगाल, तथा स्पेन आदि छोटे-छोटे देश पूरी दुनिया में औपनिवेशिक साम्राज्य खड़े करने में सफल रहे। प्राचीन युगों में अफ्रीकी देश, यूरोप की धन-पिपासा की चपेट में रहे किंतु मध्य युग में अमरीकी एवं एशियाई देशों पर भी यूरोपीय उपनिवेशवाद एवं गुलामी लाद दी गई। इसके लिए बड़ी संख्या में मानवों का रक्त बहाया गया।

नए गुलामों की आवश्यकता

सत्रहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के मध्य तक सम्पूर्ण यूरोप में गुलाम प्रथा अपने चरम पर थी। इस काल में इंग्लैण्ड का विख्यात शहर लिवरपूल गुलामों की बड़ी मण्डी के रूप में जाना जाता था। ये गुलाम विभिन्न देशों से पकड़कर लाए जाते थे जिनमें अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित देश प्रमुख थे।

इस स्थान को यूरोप में ‘गुलामों का तट’ कहा जाता था। ई.1730 में लिवरपूल के 15 जहाज गुलामों को पकड़कर लाने के काम में लगे हुए थे जिनकी संख्या ई.1792 में 132 हो गई। इंग्लैण्ड के लंकाशायर में रुई की कताई का उद्योग बहुत उन्नति कर गया था जिसके लिए गुलामों की जरूरत पड़ती थी। यह रुई भारत के खेतों से बलपूर्वक उठाकर पानी के जहाजों के माध्यम से इंग्लैण्ड पहुँचाई जाती थी।

अमरीका के दक्षिण राज्यों में भी रुई की भारी पैदावार होने लगी थी। इन खेतों में भी अफ्रीका से पकड़कर लाए गए हब्शियों से बल पूर्वक कार्य करवाया जाता था। ई.1790 में अमरीका में गुलामों की संख्या लगभग 7 लाख थी जो ई.1861 में बढ़कर 40 लाख हो गई।

गुलाम प्रथा के विरुद्ध कमजोर आवाजें

स्वाभाविक ही था कि कुछ लोग इस बर्बर प्रथा के खिलाफ सोचना शुरु करते और उनके लिए संघर्ष करते। इन्हीं संघर्षों का परिणाम था कि उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में यूरोपीय देशों एवं अमरीका में गुलाम प्रथा के विरुद्ध नियम बनने आरम्भ हुए। इंग्लैण्ड की सरकार ने गुलाम प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और कठोर सजा के प्रावधान किए किंतु गुलाम प्रथा ज्यों की त्यों जारी रही।

उन्हें रात के अंधेरों में चलने वाले पानी के जहाजों में जानवरों से भी बुरी हालत में एक-दूसरे के ऊपर लाद कर लाया जाता था। अमरीकी लेखक हैरियट बीचर स्टो ने अमरीकी गृहयुद्ध के आरम्भ होने से दस वर्ष पहले ‘अंकल टॉम्’स केबिन’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखी जिसमें इन गुलामों की दुःख-भरी जिंदगी का मार्मिक चित्रण किया गया है।

इन गुलामों की दशा में तब तक कोई सुधार नहीं आने वाला था जब तक कि यूरोपीय समुदाय के धन-पिपासु लोगों की आत्मा में ‘मनुष्य’ नामक पशु के लिए सहृदयता, सहानुभूति एवं समता के भाव उदित न हों।

मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक क्षमताएं ही रोटी, कपड़ा और मकान पर अधिकार का मानदण्ड

संसार के अन्य प्राचीन समुदायों की भांति यूरोप का ईसाई समुदाय भी मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता और बराबरी के विचार को मान्यता नहीं देता था। कहीं पर राजा ईश्वर का प्रतिनिधि था तो कहीं पर गुलामों के भीतर आत्मा नहीं पाई जाती थी। सभी मनुष्य समान नहीं हो सकते, इस विचार का आधार आदिकाल से ही प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं में अंतर पर टिका हुआ था जिनके कारण मनुष्यों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में अंतर उत्पन्न होता है।

कई मामलों में तो शारीरिक क्षमताओं को ही सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मान लिया जाता था तथा इसी आधार पर मनुष्यों के भोजन, वस्त्र, सम्पत्ति एवं आचरण सम्बन्धी अधिकारों को बढ़ा या घटा दिया जाता था। विशेषकर स्त्रियों, गुलामों एवं श्रमिकों के मामले में। स्त्रियों के लिए पुरुषों की तुलना में कम पौष्टिक आहार एवं कम शिक्षा को पर्याप्त मान लिया जाता था और उसे धर्म का हिस्सा बना दिया जाता था ताकि उस विचार का कोई विरोध न करे। यहाँ तक कि स्त्रियों का घर से बाहर आना, सभाओं में अपने विचार अथवा मत व्यक्त करना, खुलकर हंसना, परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य पुरुषों से बात करना आदि प्रतिबंधित होता था।

ये सब बातें ईसाई धर्म में भी विश्व के दूसरे मत-मतांतरों के अघोषित एवं अलिखित आचरण शास्त्र का अनिवार्य हिस्सा थीं। यहाँ तक कि स्त्रियों एवं पुरुषों की आत्माओं में भी अंतर माना गया था। यूरोपीय समुदाय में यह प्रवृत्ति अठारहवीं एवं उन्नीसवीं सदी में भी जारी रही।

शोषण के धार्मिक महिमामण्डन से मिली सामाजिक स्वीकार्यता

मनुष्य मात्र में अंतर करने की प्रवृत्ति को धार्मिक आवरण से मण्डित कर देने के कारण वह सहज सामाजिक आचरण बन जाता है। यही कारण है कि प्राचीन यूरोपीय समुदाय में मजदूरों एवं गुलामों से अधिक शारीरिक काम लेकर उन्हें बचा-खुचा, बासी, कम पौष्टिक, आधा-पेट भोजन देना सहज सामाजिक व्यवहार माना जाता था।

मनुष्यों में हर स्तर पर अंतर करने की प्रवृत्ति के कारण यूरोप में गणतंत्र अथवा लोकतंत्र जैसे विचारों को पनपने के लिए कम ही अवकाश बचता था। रोम की भांति यूरोप के अधिकतर देशों में निरंकुश शासन-तंत्र था जो शस्त्र एवं शास्त्र के बल पर समाज के श्रमजीवी एवं गुलाम वर्ग को नियंत्रण में रखता था।

जब तक यूरोप में लोकतंत्र का विचार सुदृढ़ नहीं हो गया, तब तक यही शोषणकारी व्यवस्था चलती रही। फिर भी वेनिस, फ्लोरेंस तथा यूरोप के कुछ अन्य राज्यों में सीमित प्रकार की गणतंत्र व्यवस्थाएं चलती थीं जो कि फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैण्ड एवं रोम की राजतंत्रात्मक व्यवस्थाओं से निःसंदेह अच्छी थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यूरोप में लोकतांत्रिक विचार (34)

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यूरोप में लोकतांत्रिक विचार

छोटे-छोटे बर्बर कबीलों में बंटा हुआ यूरोप छोटे-छोटे देशों में बदल गया। इस कारण यूरोप में लोकतांत्रिक विचार का जन्म लेना और विकसित होना एक अत्यंत कठिन कार्य था।

भाप के इंजन का आविष्कार

अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में ई.1712 में इंग्लैण्ड में भाप के ऐसे इंजन का आविष्कार हो गया जो तरह-तरह की मशीनें को लगातार ऊर्जा दे सकता था। इन मशीनों के आगमन ने मजदूरों को अपने भविष्य एवं भाग्य पर नए सिरे से सोचने पर विवश किया। देशों की अर्थव्यवस्थाएं बदलने लगीं और लोगों के रहन-सहन में बदलाव आने लगा।

विगत अठारह सौ सालों में विश्व

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हमने पिछले अध्याय में चर्चा की थी कि कैथोलिक धर्म के विरुद्ध प्रोटेस्टेण्ट सम्प्रदाय के उठ खड़े होने के बाद इंग्लैण्ड के राजा हेनरी (अष्टम्) ने रोम तथा पोप से सम्बन्ध पूरी तरह तोड़ लिए थे तथा हेनरी ने स्वयं को ईसाई-संघ का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। उसके बाद इंग्लैण्ड में धर्म केवल सरकारी कार्यालय के रूप में चलने लगा था और लोगों के दिमागों से धर्म का अंकुश कम हो गया था। यही कारण था कि इंग्लैण्ड में बड़ी मशीनों के आविष्कार का रास्ता सबसे पहले खुला और इंग्लैण्ड ने ही यूरोप में औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया। इस क्रांति का महत्त्व इस बात से समझा जा सकता है कि जूलियस सीजर के युग से लेकर अठारहवीं सदी के आरम्भ तक पूरी दुनिया में लोगों के आवागमन का मुख्य साधन घोड़ा एवं बग्घी ही बने हुए थे। जूलियस सीजर के समय से लेकर अठारहवीं सदी के आगमन तक यूरोप के लोगों के धर्म भले ही तेजी से बदल गए थे किंतु उनके सोचने का तरीका अठारहवीं सदी में भी वही था जो जूलियस सीजर के समय में था। लोगों की आर्थिक परिस्थितियाँ भी वही थीं और लोगों पर शासन करने के तरीके भी वही थे। कहने का अर्थ यह कि विगत अठारह सौ सालों में दुनिया बहुत कम बदली थी किंतु भाप का इंजन न केवल दुनिया के भौतिक स्वरूप को बदलने वाला था अपितु दुनिया के लोगों के दिमागों में भी भारी परिवर्तन करने वाला था।

यूरोप के निर्धन एंव मध्यमवर्गीय लोग धर्म की बजाय समृद्धि, उत्पादन, वाणिज्य एवं विज्ञान के बारे में सोचने लगे थे। लोग शिक्षा एवं स्वास्थ्य के बारे में सोचने लगे थे। अब उन्हें राजा की जगह प्रजा का राज्य चाहिए था। इस प्रकार यूरोप में लोकतांत्रिक विचार प्रकट होने लगे।

दार्शनिकों एवं लेखकों की लहर

यूरोप के जन-साधारण के चिंतन में आए इस परिवर्तन में केवल मशीनों की ही भूमिका नहीं थी, अपितु अठारहवी शताब्दी के यूरोप में दार्शनिकों, चिंतकों एवं लेखकों की एक लहर सी उत्पन्न हो गई थी जिसने यूरोप में लोकतांत्रिक विचार प्रकट होने की गति को तेज कर दिया।

प्लूमे वाल्टेयर

फ्रांसीसी इतिहासकार एवं दार्शनिक प्लूमे वॉल्टेयर ने अठारहवीं शताब्दी में पुरानी राजनीतिक एवं धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए उनके विरोध में यूरोपीय समाज के समक्ष अनेक नए विचार रखे। वह अपने समय के बुद्धिमान व्यक्तियों में से गिना जाता था। उसने ईसाईयत तथा रोमन कैथोलिक चर्च की कड़ी आलोचना की तथा धर्म की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और चर्च को शासन से अलग करने का समर्थन किया। वस्तुतः रोमन कैथोलिक चर्च की आलोचना इस बात की गारण्टी थी कि अब यूरोप में लोकतांत्रिक विचार प्रकट होने से रोके नहीं जा सकेंगे।

 उसके विचारों ने यूरोपियन सभ्यता को बहुत गहराई तक प्रभावित किया। 5 जनवरी 1767 को रूस के राजा फैड्रिक (द्वितीय) को लिखे एक पत्र में वॉल्टेयर ने लिखा- ‘हमारा धर्म (ईसाईयत) निश्चित रूप से संसार में आज तक हुए धर्मों में अत्यंत हास्यास्पद, अत्यधिक बेतुका तथा अत्यधिक रक्त-रंजित है। आप इस धर्म के अंध-विश्वासों को समाप्त करके मानवता पर शाश्वत उपकार कर सकते हैं। मैं भीड़ में अपनी बात नहीं कहता जो उपदेश दिए जाने योग्य नहीं है, तथा जो हर तरह से गुलामी के उपयुक्त है। मैं अपनी बात ईमानदार लोगों के बीच कहता हूँ जो सोचने-समझने की इच्छा रखते हैं।’  

वॉल्टेयर ने बाइबिल की एडम और ईव की कहानी को अस्वीकार करते हुए बहुजननिक सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य-प्रजाति का उद्भव पूरी तरह से अलग-अलग हुआ। इस प्रकार वॉल्टेयर के समय से लोग बाइबिल पर टिप्पणियां एवं सहमतियां-असहमतियां व्यक्त करने की हिम्मत करने लगे। इससे भी लोगों में स्वतंत्रता सम्बन्धी विचारों को बढ़ावा मिला।

वाल्टेयर को बंदी बना लिया गया तथा उसे फ्रांस से बाहर निकाल दिया गया। वाल्टेयर जिनेवा के पास फर्नी में जाकर रहने लगा। जेल में उसे कागज, पैन और स्याही उपलब्ध नहीं कराई गई। इसलिए उसने पुस्तकों की लाइनों के बीच में सीसे के टुकड़ों से कविताएं लिखीं। वाल्टेयर को अन्याय और कट्टरपन से सख्त नफरत थी। जनता के नाम उसका संदेश था- ‘इन बदनाम चीजों को नष्ट कर दो।’  वह ई.1778 तक जीवित रहा।

जीन जैक्यूज रूसो

वॉल्टेयर के काल में जिनेवा में रूसो नामक एक शिक्षा-शास्त्री हुआ। उसने धर्म और राजनीति पर इतने उत्तेजक लेख लिखे कि सम्पूर्ण यूरोप में रूसो की धूम मच गई। उसके विचारों ने फ्रांस की राज्य-क्रांति के लिए प्रेरक तत्व का कार्य किया। लोगों के दिमाग में क्रांति की आग सुलग उठी। उसकी सबसे विख्यात पुस्तक ‘सोशियल कॉण्ट्रेक्ट’ है जिसमें कहा गया है कि– ‘मनुष्य जन्म से मुक्त है किंतु वह सब स्थानों पर जंजीरों में जकड़ा हुआ है।’

गिबन

अठारहवीं सदी में ही गिबन नामक एक अंग्रेज लेखक हुआ जिसने ‘डिक्लाइन एण्ड फॉल ऑफ रोमन एम्पायर’ नामक ग्रंथ लिखा। इस ग्रंथ ने कैथोलिक इतिहास की कड़वी सच्चाई लोगों के सामने रखी।

मान्टेस्क्यू

फ्रांस में मान्टेस्क्यू नामक चिंतक हुआ जिसने ‘एस्पिरिट डेस लोइस’ नामक ग्रंथ लिखा।

एडम स्मिथ

 ई.1776 में इंग्लैण्ड में एडम स्मिथ की पुस्तक ‘वैल्थ ऑफ नेशन्स’ प्रकाशित हुई। यह अर्थशास्त्र की पुस्तक थी किंतु इसने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की आवश्यकता एवं उसके सामाजिक सौन्दर्य पर प्रकाश डाला। इस पुस्तक को चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व के भारतीय लेखक कौटिल्य द्वारा लिखी गई ‘अर्थशास्त्र’ की तरह ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ की पुस्तक कहा जाता है।

इसमें देशों की अर्थव्यवस्था को चलाने वाले नैसर्गिक नियमों की व्याख्या की गई है तथा देश के भीतर ऐसी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का समर्थन किया गया है जिससे उद्योगों का विकास हो, अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिले तथा प्रजा को भुखमरी, निर्धनता एवं अभावों से छुटकारा मिले।

यद्यपि इस पुस्तक का लोकतंत्र से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं था तथापि इस प्रकार के विचारों के सामने आने से लोगों को यह सोचने पर विवश होना पड़ा कि देश को धार्मिक मान्यताओं से जकड़ी हुई शासन व्यवस्था से बाहर निकालकर अर्थशास्त्रीय शासन व्यवस्था भी दी जा सकती है। उन्हीं दिनों अमरीका एवं फ्रांस की क्रांतियों ने यूरोप में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के प्रति प्यास बढ़ा दी।

थॉमस पेन

अठारहवीं सदी में थॉमस पेन नामक एक प्रभावशाली अंग्रेज लेखक पैदा हुआ। उसने अमरीका के स्वाधीनता संग्राम (ई.1775-83) में, कुछ समय के लिए अमरीका में रहकर अमरीकियों की सहायता भी की। ई.1783 में अमरीका के स्वतंत्र होने के बाद वह इंग्लैण्ड लौट आया। उस समय फ्रांस में क्रांति आरम्भ हो चुकी थी।

थॉमस पेन ने ई.1791 में फ्रांसीसी क्रांति के समर्थन में ‘दी राइट्स ऑफ मैन’ नामक पुस्तक लिखी जिसमें उसने राजशाही पर तीखा हमला बोला तथा लोकशाही शासन व्यवस्था का प्रबल समर्थन किया। अंग्रेज सरकार ने उसे राजद्रोही घोषित कर दिया, वह भाग कर फ्रांस चला गया। वहाँ उसे लुई (सोलहवें) की हत्या का विरोध करने के कारण बंदी बना लिया गया।

पेरिस के बंदीगृह में रहते हुए ई.1794 में उसने ‘द एज ऑफ रीजन’ (तर्क का युग) नामक एक और पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उसने शासन के धार्मिक दृष्टिकोण की आलोचना की। इस पुस्तक को कई देशों में प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक को यूरोप में मनुष्य जाति के लिए अत्यंत खतरनाक माना गया।

क्योंकि अधिकतर सरकारों को लगता था कि शासन के लिए धर्म का होना अत्यंत आवश्यक है। जनता को धर्म का भय दिखाकर ही अनुशासन में रखा जा सकता है। यदि शासन में धर्म का समावेश नहीं हुआ तो प्रजा निरंकुश और विद्रोही हो जाएगी। इसलिए कई देशों में इस पुस्तक के प्रकाशकों को जेल भेज दिया गया। अंग्रेज कवि शेली उन दिनों जीवित था। उसने इंग्लैण्ड में इस पुस्तक के प्रकाशक को जेल भेजने वाले जज को पत्र लिखकर उसके निर्णय की आलोचना की।

ऑगस्ट कौण्ट

उन्हीं दिनों फ्रांस में ऑगस्ट कौण्ट (ई.1798-1857) नामक विचारक हुआ। उसने कहा कि पुराने धर्म-शास्त्रवाद और कट्टरपंथी धर्म का युग चला गया है किंतु संसार को किसी न किसी धर्म की आवश्यकता है।

इसलिए उसने ‘रिलीजन ऑफ ह्यूमैनिटी’ (मानव-धर्म) की कल्पना की तथा उसका नाम ‘पॉजिटिविज्म’ (धनात्मकवाद) रखा। इस धर्म के आधारभूत तत्व प्रेम, व्यवस्था और प्रगति रखे गए। इस धर्म का आधार ‘अलौकिकता’ न होकर ‘विज्ञान’ था। इस धर्म को शायद ही किसी ने अपनाया किंतु इस धर्म की कल्पना का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण यूरोप पर पड़ा। लोगों के मन से धार्मिक रूढ़ियों का भय जाता रहा और वे अब सामाजिक व्यवस्था को वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में दखने लगे।

जॉन स्टुअर्ट मिल

कौण्ट के समय में ही जॉन स्टुअर्ट मिल नामक एक अंग्रेज चिंतक हुआ जिसने इंग्लैण्ड में पहले से ही पनप रहे उपयोगितावाद (यूटिलिटिज्म) के सिद्धांत को लोकप्रिय बनाने का काम किया। इस सिद्धांत का वैचारिक आधार ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ में निहित था। इस सिद्धांत के अनुसार भलाई-बुराई की केवल यही एकमात्र कसौटी थी, जिस काम से जितने अधिक लोगों को सुख मिले, वह काम उतना ही अधिक अच्छा है।

इस सिद्धांत के लोकप्रिय हो जाने के बाद यूरोपीय देशों में धर्म से लेकर समाज एवं सरकारों को इसी कसौटी पर परखा जाने लगा। इस प्रकार यूरोप के देशों में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बौद्धिक उद्वेलन एवं वैचारिक मंथन का युग आ पहुँचा और उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में पूरा यूरोप ही जैसे राजशाही और लोकशाही के विचारों के अन्तर्द्वन्द्व में फंस गया। कुछ देशों में राजशाहियां गिर गईं और लोकशाही का प्राकट्य होने लगा। लोगों को मताधिकार दिए जाने लगे।

राजतंत्र एवं लोकतंत्र में मनुष्य के अधिकारों में अंतर

यद्यपि लोकतंत्र सभी मनुष्यों को जीवन जीने के समान अधिकार देने वाली व्यवस्था का नाम है तथापि उसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह मनुष्य की बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमताओं के अंतर को नहीं देख पाता।

निरंकुश-तंत्र और लोक-तंत्र दोनों ही मनुष्य की बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमताओं के अंतर को देखते एवं जानते हैं किंतु निरंकुश-शासन-तंत्र एवं लोकतंत्र में आधारभूत अंतर यह है कि निरंकुश शासन तंत्र कम-बौद्धिक एवं कम-शारीरिक-क्षमताओं के आधार पर मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित कर देता है जबकि लोकतंत्र समस्त अधिक एवं कम शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमताओं वाले लोगों को जीवन यापन के एक जैसे आधारभूत अधिकार प्रदान करता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मनुष्यों में आर्थिक एवं शैक्षणिक अंतर बना रहता है किंतु उनकी राजनीतिक एवं सामाजिक हैसियत कम या ज्यादा नहीं आंकी जाती। उदाहरण के लिए मताधिकार की शक्ति। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में निर्धन एवं धनी, शिक्षित एवं अशिक्षित, शारीरिक रूप से बलिष्ठ एवं विकलांग, स्त्री एवं पुरुष सभी प्रकार के व्यक्तियों को एक ही वोट देने का अधिकार होता है।

इस प्रकार समस्त नागरिकों के दिमाग का औसत, यह तय करता है कि उनका शासक कौन होगा! अठारहवीं एवं उन्नीसवीं सदी का यूरोपीय समुदाय लोकतंत्र एवं मनुष्यों की समानता के विचारों से बहुत दूर था, हालांकि उसके लिए पिछले कई सौ सालों से आवाजें उठ रही थीं किंतु अब समय आ गया था जब लोकतंत्र के लिए आवाजें और तेज हो जाएं।

लोकतंत्र से निराशा

उन्नीसवीं शताब्दी आते-आते लोकतंत्र की मांग तेज होने लगी तथा उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक कई यूरोपीय देशों में नागरिकों को वोट देकर पार्लियामेंट चुनने के अधिकार मिल गए। लोगों ने समझा कि अब उनका जीवन बदल जाएगा किंतु कुछ वर्षों बाद उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि लोकतंत्र में भी वे उतने ही निर्धन एवं बेबस हैं जितने पहले थे।

उन्हें सरकार बनाने का अधिकार मिल गया था किंतु सत्ता में भागीदारी नहीं मिली थी, प्राणांतक भूख ज्यों की त्यों मुँह बाए खड़ी थी। इसलिए उन्नीसवीं सदी के अंत तक यूरोपीय देशों में लोकतंत्र के प्रति उत्साह मंदा पड़ने लगा और लड़खड़ाती हुई राजशाहियां एक बार के लिए थम सी गईं। लोगों का ध्यान इस बात पर गया कि शासन-तंत्र कोई भी हो, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि समाज में धन का बंटवारा कैसे होता है।

 जिन देशों में खराब लोकतंत्र आया था, वहाँ के खराब नेताओं ने निर्धन समाज तक धन को पहुँचने ही नहीं दिया। इस तरह समाजवाद के नए विचारों का आगमन होने लगा। विभिन्न देशों के करोड़ों औद्योगिक-मजदूर जानलेवा शोर करने वाली मशीनों, कारखानों के गंदे परिवेश एवं कोयले की खानों की गर्मी से छुटकारा चाहते थे, पेट भरने को निवाला, और काम के घण्टों में अनुशासन चाहते थे न कि लोकशाही।

ये ऐसी सुविधाएं थीं जिन्हें वे राजशाही के भीतर रहकर भी प्राप्त कर सकते थे। बशर्ते कि राजा अच्छा हो, राजकीय कर्मचारी संविधान से बंधे हुए हों और मिल-मालिकों को कानून का भय हो। फिर भी ये सब बातें अंत में लोकशाही पर आकर पूर्णता प्राप्त करती थीं। अतः सामान्य जनता में भले ही लोकतंत्र का विचार अधिक आदर प्राप्त नहीं कर सका किंतु यूरोपीय देशों का बौद्धिक वर्ग लोकतंत्र को ही समस्त दुःखों के अंत का माध्यम समझता था।

कार्ल मार्क्स

उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में ई.1818 में जर्मनी के यहूदी समुदाय में कार्ल मार्क्स नामक एक लेखक ने जन्म लिया। उसे अपने स्वतंत्र विचारों के कारण जर्मनी से निकाल दिया गया और वह पहले फ्रांस चला गया और वहीं रहने लगा। पेरिस में वह एंजेल्स नामक एक अन्य जर्मन के सम्पर्क में आया।

शीघ्र ही वे दोनों गहरे दोस्त बन गए। उन दोनों ने मिलकर कुछ पुस्तकें लिखीं जो यूरोप के लोगों के मस्तिष्क पर तेज रोशनी की तरह प्रभाव डालने वाली सिद्ध हुईं। इन पुस्तकों में लिखी गई बातों से नाराज होकर फ्रांस की सरकार ने भी कार्ल मार्क्स को फ्रांस से निकाल दिया, वह इंग्लैण्ड जाकर रहने लगा और वहाँ उसने एक कारखाना लगा लिया।

ई.1848 को यूरोप में क्रांतियों एवं आंदोलनों का वर्ष कहा जाता है। इनके मूल में श्रमिक आंदोलनों की प्रधानता थी। कार्ल मार्क्स ने अनुभव किया कि यूरोप की मुख्य समस्या श्रमिकों की खराब जीवन-परिस्थितियाँ हैं। यहाँ तक कि फ्रांस की क्रांति के मूल में भी यही समस्या खाद-पानी का काम कर रही है। इसलिए मार्क्स ने मजदूरों के जीवन का गहराई से अध्ययन किया।

सौभाग्य से वह स्वयं एक बड़े कारखाने का मालिक था। इसलिए उसे श्रमिकों की समस्या को समझने में अधिक समय नहीं लगा। ई.1848 में उसने एंजेल्स के साथ मिलकर एक घोषणा पत्र जारी किया जिसे साम्यवादी घोषणापत्र कहा जाता है। इसमें उस समय के स्वतंत्रता, समानता एवं भाईचारे के लोकतांत्रिक नारों की आलोचना की गई तथा कहा गया कि इनकी आड़ में शासकों एवं मिल-मालिकों द्वारा जनता एवं मजदूरों को बेवकूफ बनाकर उनका शोषण किया जा रहा है।

इस घोषणा पत्र के अंत में उन्होंने मजदूरों से अपील की- ‘संसार के मजदूरों एक हो जाओ। तुम्हें खोना कुछ नहीं है सिवाय अपनी गुलामी की जंजीरों के, और पाने को तुम्हारे सामने सारा संसार पड़ा है।’ यह अपील ही इस घोषणापत्र का सार थी।

कार्ल मार्क्स ने यूरोप के समाचार पत्रों एवं पर्चों के माध्यम से साम्यवाद का प्रचार करना आरम्भ कर दिया। इसके साथ ही वह मजदूर संगठनों को एक करने के लिए दिन-रात प्रयास करने लगा। संभवतः उसे यूरोप में कोई बड़ा संकट आता दिखाई दे रहा था और वह चाहता था कि मजदूर न केवल उस संकट के लिए तैयार रहें अपितु उस संकट से लाभ भी उठाएं।

ई.1854 में उसने न्यूयार्क के एक समाचार पत्र में लिखा- ‘फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यूरोप में छठी शक्ति भी है जो विशेष अवसरों पर पाँचों नामदार महान् शक्तियों पर अपनी सत्ता रखती है औ उन सबको थर्रा देती है। यह शक्ति क्रांति की है। बहुत दिन तक चुपचाप एकांतवास के बाद अब संकट और भूख इसे फिर लड़ाई के मैदान में बुला रहे हैं। केवल एक संकेत की आवश्यकता है। फिर से यूरोप की छठी और सबसे महान् शक्ति चमकता हुआ कवच पहने और हाथ में तलवार लिए हुए निकल पड़ेगी, जिस तरह ओलिम्पी के माथे से मिनर्वा प्रकट हुई थी।   यह संकेत यूरोप के शीघ्र आने वाले युद्ध से मिल जाएगा।’

कार्ल मार्क्स ने लंदन में यूरोप के समाजवादियों, मार्क्सवादियों, लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे युवकों, क्रांतिकारियों आदि का एक विशाल सम्मेलन बुलाया जिसमें इंग्लैण्ड, इटली, जर्मनी तथा स्पेन सहित कई अन्य देशों के लोग आए।

ई.1867 में मार्क्स की पुस्तक ‘दास कैपिटल’ अर्थात् ‘पूँजी’ प्रकाशित हुई। यह पुस्तक जर्मन भाषा में लिखी गई थी। इसमें यूरोप में प्रचलित तत्कालीन आर्थिक मतों का विश्लेष करके उनकी कमियां बतलाई गई थीं और अपना साम्यवादी मत विस्तार के साथ समझाया गया था।

उसने इधर-उधर की आदर्शवादी बातों को छोड़ड़कर बिना किसी लाग-लपेट के और वैज्ञानिक ढंग से इतिहास और अर्थशास्त्र के विकास की चर्चा की और मनुष्य समाज में वर्गों के क्रम-विकास, इतिहास एवं आपसी अंतर्द्वन्द्वों के बारे में दूर तक असर निकालने वाले नतीजे निकाले। मार्क्स का यह नया समाजवाद, बिल्कुल साफ और तंर्क-संगत था जिसे मार्क्स का समाजवाद, मार्क्सवाद, साम्यवाद एवं कम्यूनिज्म कहा गया।

यह उस धुंधले आदर्शवादी समाजवाद से अलग था, जो अब तक चल रहा था। इस पुस्तक ने न केवल यूरोप के लोगों की अपितु संसार भर के लोगों की बुद्धि पर प्रभाव डाला और यूरोप में साम्यवाद की जड़ें गहराई तक जाने लगीं। इसी के चलते ई.1871 में पेरिस कम्यून की हिंसक घटना हुई। यह संसार में निश्चय-पूर्वक किया गया पहला साम्यवादी विद्रोह था। इस कम्यून के बाद यूरोपीय देशों की सरकारों के मन में मजदूर संगठनों के आंदोलनों से भय बैठ गया तथा उनका रुख मजदूर-संगठनों के विरुद्ध और अधिक कठोर हो गया।

पुरुषों एवं महिलाओं में भेदभाव

उन्नीसवीं सदी में यूरोप के देशों में जब राजनीतिक आंदोलनों के बाद लोकतंत्र ने जन्म लेना आरम्भ किया तो उसके साथ बहुत से किंतु-परन्तु लगे हुए थे। उदाहरण के लिए स्त्रियों को वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया। यूरोपीय देशों की महिलाओं एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए गए जबर्दस्त आंदोलनों के बाद वोटिंग अधिकार मिलने आरम्भ हुए।

न्यूजीलैण्ड ने ई.1893 में महिलाओं को वोटिंग अधिकार दिए। उन्नीसवीं सदी में महिलाओं को मताधिकार देने वाला यह एक मात्र देश था। ऑस्ट्रेलिया ने ई.1902 में, फिनलैण्ड ने ई.1906 में, नोर्वे ने ई.1913 में, डेनमार्क एवं आइसलैण्ड ने ई.1915 में अपने देश की महिलाओं को वोटिंग अधिकार प्रदान किए। बहुत से यूरोपीय देशों ने प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद इस दिशा में कदम बढ़ाया।

इंग्लैण्ड में महिलाओं के मताधिकार के लिए ई.1867 से आंदोलन आरम्भ हुआ किंतु उनकी लड़ाई लम्बी चली। ई.1918 में 30 साल एवं उससे अधिक आयु की महिलाओं को मताधिकार प्राप्त हुआ। ई.1928 में इंग्लैण्ड में महिलाओं को पुरुषों के बराबर मताधिकार दिए गए।

अमरीकी महिलाओं को ई.1920 में वोट देने के अधिकार प्राप्त हुए। स्पेन में ई.1931 में, फ्रांस ने ई.1944 में तथा इटली ने ई.1946 में अपने देश की महिलाओं को मत देने के अधिकार दिए। स्विट्जरलैण्ड ने ई.1971 में महिलाओं को मताधिकार तो प्रदान किए किंतु वहाँ आज भी पुरुषों एवं महिलाओं के मताधिकारों में अंतर है तथा वहाँ की महिलाएं इस असमानता को दूर करने के लिए आज भी संघर्ष कर रही हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय (35)

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यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

यूरोप की धरती पर विभिन्न भाषाओं, रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं को मानने वाले लोग रहते थे। ये लोग अपने कबीले को ही अपना देश मानते थे। धीरे-धीरे यूरोप के लोगों ने अपनी कबीलाई पहचाहन को अपने राष्ट्र के रूप में देखना आरम्भ किया। इसी को यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय कहा जाता है।

अठारहवीं सदी में जर्मनी, इटली और स्विट्जरलैंड राजशाहियों, डचों और कैंटनों में बँटे हुए थे, जिनके बीच-बीच में कुछ स्वायत्त क्षेत्र भी स्थित थे। इसी प्रकार पूर्वी और मध्य यूरोप के क्षेत्र निरंकुश राजतन्त्रों के अधीन थे और इन क्षेत्रों में तरह-तरह के लोग रहते थे जो प्राचीन काल में किसी न किसी कबीले से सम्बद्ध थे।

इस कारण वे एक बड़े देश के रूप में अपनी सामूहिक पहचान को नहीं देख पाते थे तथा एक दूसरे की संस्कृति को अस्वीकार्य दृष्टि से देखते थे। इन समूहों को आपस में बाँधने वाला तत्व, केवल सम्राट के प्रति उनकी निष्ठा थी। 18वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में नेपोलियन बोनापार्ट के आक्रमणों ने यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया। इटली, पोलैण्ड, जर्मनी और स्पेन में नेपोलियन ने ही ‘नवयुग’ का संदेश पहुँचाया।

नेपोलियन के आक्रमण से इटली और जर्मनी में एक नया अध्याय आरम्भ हुआ। 19वीं शताब्दी में यूरोप में राष्ट्रवाद (Nationalism)  की लहर चली जिसने बहुत से यूरोपीय देशों का कायाकल्प कर दिया। इस लहर ने जर्मनी, इटली, रोमानिया, यूनान, पोलैण्ड, बल्गारिया आदि देशों का निर्माण एवं एकीकरण किया। बहुत से देशों ने राष्ट्रवाद की भावना से उद्वेलित होकर स्वाधीनता संग्राम लड़े तथा अपने देशों को उपनिवेशवाद के दैत्य से मुक्ति दिलवाई।

इटली में राष्ट्रवाद का उदय

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यूरोप में तेजी से पनप रहे राष्ट्रवाद के दौर में इटली में भी राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार हुआ। इटलीवासियों ने भी जातीय समूहों एवं कबीलों की पहचान से ऊपर उठकर सम्पूर्ण देश में एकता की आवश्यकता को अनुभव किया और उन्होंने इटली के छोटे-छोटे राज्यों को जोड़कर एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने का निश्चय किया। उन्हें रोम के प्राचीन गौरव का इतिहास ज्ञात था। विद्या, कला और विज्ञान के क्षेत्र में वह प्राचीन काल में संसार का नेतृत्व करता था। अतः वे एक बार फिर से इटली को एक देश के रूप में गठित करके उसे पुनः संसार में गौरवशाली स्थान दिलाने का स्वप्न देखने लगे। इस कारण अनेक विफलताओं के उपरांत भी यह आंदोलन तब तक चलता रहा जब तक कि इटली के एकीकरण का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया गया। इस आंदोलन का इतिहास बहुत लम्बा है। इटली के एकीकरण को इतालवी भाषा में ‘रिसोरजिमेंटो’ अर्थात् ‘पुनरुत्थान’ कहा जाता है। यह 19वीं सदी में इटली में घटित एक राजनैतिक और सामाजिक अभियान था जिसने इतालवी प्रायद्वीप के विभिन्न राज्यों को संगठित करके एक राष्ट्र बना दिया। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया ई.1814 से लेकर ई.1870 तक चली।

इटली में राष्ट्रवाद की चिन्गारी को दावानल में बदलने का काम उन यूरोपीय दैत्यों द्वारा आयोजित वियेना कांग्रेस के बाद आरम्भ हुआ जो स्वयं को महाशक्ति कहने का दंभ भरते थे।

राष्ट्रीयता के प्रसार में कवियों एवं लेखकों का योगदान

इटली में राष्ट्रीय भावनाओं के उदय में इटली के कवियों एवं लेखकों का बहुत बड़ा योगदान था किंतु इटली से बाहर के साहित्यकारों की इटली में उपस्थिति भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं थी।

अंग्रेज कवि कीट्स की रोम में मृत्यु

यूरोपीय साहित्यकारों एवं अंग्रेज कवियों को रोम इतना प्रिय लगता था कि उन्नीसवीं सदी के तीन बड़े अंग्रेज कवियों- शेली, कीट्स एवं बायरन में से एक कीट्स अपना देश छोड़कर रोम आ गया और यहीं निर्धनता एवं अभावों में जीवन बिताता हुआ कविताएं लिखता रहा। ई.1821 में केवल 26 वर्ष की आयु में रोम में कीट्स की मृत्यु हुई। तब कीट्स को दुनिया में कोई नहीं जानता था, रोम भी नहीं। कीट्स की मृत्यु के बाद उसके साहित्य को विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त हुई और वह आज भी दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है।

अंग्रेज कवि शेली की इटली के समुद्री तट पर मृत्यु

आज विश्व की शायद ही ऐसी कोई यूनिवर्सिटी होगी जिसमें अंग्रेजी साहित्य के विद्यार्थियों को अंग्रेज कवि ‘शेली’ न पढ़ाया जाता हो। शेली ने ‘गुलामी’ पर एक लम्बी कविता लिखी जिसका आशय इस प्रकार था-

स्वतंत्रता क्या है?

यह तो तुम खूब बता सकते हो,

है क्या चीज गुलामी,

नाम तुम्हारे का ही गुंजन।

यही गुलामी है-

कि काम तुम करते रहो मजदूरी लेकर,

केवल उतनी ही बस जिससे

अटके रहें तुम्हारे तन में प्राण तुम्हारे,

काल कोठरी के बंदी की भांति

परिश्रम अत्याचारी के हित करने।

बन जाओ तुम करघे, हल, तलवार, फावड़े उनके

और जुट जाओ उनकी रक्षा में, उनके पोषण में,

बिना विचारे इच्छा है या नहीं तुम्हारी।

यही गुलामी है-

कि तुम्हारे बच्चे भूखों मरें,

और उनकी माताएं सूख-सूख कर कांटा हो जावें-

जाड़े की चली हवाएं ठण्डी

जिनसे मरने लगे दीन बेचारे।

तुम्हें तरसते रहना है उस भोजन को,

जिसको धनवाला, मतवाला हो,

फैंक रहा अपने मोटे कुत्तों के आगे,

जो उसकी आंखों के नीचे।

छककर मस्त पड़े हैं सोते।

यही गुलामी है-

जिसमें बनना है तुमको दास आत्मा से भी,

जिससे रहे न तुमको काबू अपनी इच्छाओं पर,

और बनो तुम वैसे, जैसा लोग दूसरे तुम्हें बनावें।

और अंत में जब तुम करने लगो शिकायत,

धीरे-धीरे वृथा रुदन कर,

तब अत्याचारी के नौकर

तुमको और तुम्हारी पत्नियों को घोड़ों के तले कुचल कर,

ओस कणों की भांति लहू की बूंदें देते बिछा घास पर।

शेली ने ‘नास्तिकता की आवश्यकता’ शीर्षक से एक अंग्रेजी कविता लिखी। इस कविता के कारण इंग्लैण्ड के अंग्रेज उससे इतने नाराज हो गए कि शेली को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया। वह अपना देश छोड़कर इटली आ गया। कीट्स की मृत्यु के लगभग एक वर्ष बाद ई.1822 में इटली के समुद्री तट पर डूब जाने से शेली की मृत्यु हुई।

कीट्स एवं शेली दोनों इंग्लैण्ड छोड़कर इटली आए और दोनों ने निर्धनता का जीवन व्यतीत करते हुए सामाजिक व्यवस्था से विद्रोह करते हुए कविताओं की रचना की, इन दोनों घटनाओं से उन्नीसवीं सदी में रोम की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक दुर्दशा का स्वतः ही पता चल जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पवित्र रोमन साम्राज्य द्वितीय का अन्त (36)

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पवित्र रोमन साम्राज्य द्वितीय का अन्त

जिस प्रकार पवित्र रोमन साम्राज्य प्रथम का अन्त हुआ था, उसी प्रकार पवित्र रोमन साम्राज्य द्वितीय का अन्त भी बड़ा दुखद था। मुसलमानों के छोटे से धक्के से वह ताश के पत्तों की तरह बिखर गया।

नेपालियन का विजय अभियान

अठारहवीं शताब्दी के अंत में इटली में छोटे-छोटे राजा राज्य किया करते थे। इनमें से बहुत से राजा ऑस्ट्रिया के राजा के अधीन थे। उन्हीं दिनों फ्रांस तथा ऑस्ट्रिया के बीच यूरोप में वर्चस्व स्थापित करने के लिए दीर्घकालीन युद्ध हुआ। उस समय नेपोलियन बोनापार्ट फ्रैंच सेना में सैन्य अधिकारी हुआ करता था।

वह पूरी दुनिया को अपने अधीन करने के सपने देखता था जिस प्रकार कभी मैसीडोनिया के राजा सिकंदर ने देखा था। अपनी जिंदगी के शुरुआती दौर में जब वह केवल 27 साल का था तब उसने कहा था- ‘महान् साम्राज्य और जबर्दस्त परिवर्तन केवल पूर्व में ही हुए हैं, उस पूर्व में जहाँ साठ करोड़ लोग बसते हैं। यूरोप तो एक छोटी सी टेकरी है।’

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ई.1796 में 27 वर्ष की आयु में नेपोलियन को ‘फ्रेंच आर्मी ऑफ इटली’ का सेनापति बनकर इटली में स्थित सार्डीनिया राज्य पर विजय प्राप्त करने के लिए भेजा गया जहाँ फ्रांस की सेनाएं ऑस्ट्रिया की सेनाओं से लड़ रही थीं तथा हारती जा रही थीं। नेपोलियन ने इटली पर आक्रमण करने से पहले सार्वजनिक घोषणा की कि- ‘फ्रेंच सेना इटली को ऑस्ट्रिया की दासता से मुक्त कराने आ गयी है।’ विभिन्न स्थान पर हुए युद्धों में नेपोलियन ने ऑस्ट्रिया के 14 हजार सिपाहियों को मार डाला। नेपोलियन ने स्वयं ने भी 5 हजार सिपाही खोए किंतु उसने पहले तीन स्थानों पर शत्रु को परास्त कर ऑस्ट्रिया का पीडमॉण्ट से सम्बन्ध तोड़ दिया। इसके बाद उसने सार्डीनिया को युद्ध-विराम करने के लिए विवश कर दिया। नेपोलियन ने लोडी के युद्ध में इटली के मीलान राज्य को भी जीत लिया। रिवोली के युद्ध में मैंटुआ को समर्पण करना पड़ा। आर्कड्यूक चार्ल्स को भी संधिपत्र प्रस्तुत करना पड़ा और ल्यूबन का समझौता हुआ। इन सारे युद्धों और वार्ताओं में नेपोलियन ने पेरिस से किसी प्रकार का आदेश नहीं लिया। नेपोलियन ने लोंबार्डी नामक राज्य को सिसालपाइन नामक गणराज्य में तथा जिनोआ को लाइग्यूरियन नामक गणतंत्र में परिवर्तित कर दिया तथा इन दोनों स्थानों पर उसने फ्रेंच विधान पर आधारित एक नया विधान लागू किया।

नेपोलियन की इन सफलताओं से ऑस्ट्रिया की सेनाओं के इटली से पैर उखड़ गए तथा ऑस्ट्रिया को बेललियम प्रदेशों, राइन के सीमांत क्षेत्रों तथा लोंबार्डी के क्षेत्र छोड़ने पड़े। एक तरह से समूचा इटली ऑस्ट्रिया के हाथों से निकल गया।

पवित्र रोमन साम्राज्य द्वितीय का अन्त

 इटालियन अभियान से वापस अपने देश फ्रांस लौटने पर, नेपोलियन का भव्य स्वागत हुआ। नेपोलियन का अगला विजय अभियान ऑस्ट्रिया पर आक्रमण करके वहाँ के सम्राट को केंपोफोरमियो की अपमानजनक संधि के लिए बाध्य करना था।

इस समय ऑस्ट्रिया का राजा फ्रांसिस (द्वितीय) पवित्र रोमन साम्राज्य का सम्राट था।  उसे 18 अक्टूबर 1797 को नेपोलियन बोनापार्ट के सम्मुख कैंपो फौर्मियो ;ब्ंउचव थ्वतउपवद्ध की संधि के लिए प्रस्तुत होना पड़ा। इसी के साथ उससे पवित्र रोमन साम्राज्य के सम्राट की पदवी छीन ली गई और पवित्र रोमन साम्राज्य के द्वितीय संस्करण का औपचारिक एवं विधिवत् अंत हो गया जो ई.962 से किसी तरह घिसटता आ रहा था।

अब न तो पवित्र रोमन सम्राट रहा था और न रोम, सिसली, सार्डीनिया एवं मीलान उसके अधीन रहे थे। ऑस्ट्रियाई सम्राट का गर्व-भंजन करने के बाद नेपोलियन बोनापार्ट का ध्यान रोम तथा उसके पोप की तरफ गया।

पोप एवं नेपोलियन में टोलेन्टिन्ड की सन्धि

ई.1796 में नेपोलियन बोनापार्ट ने रोम पर आक्रमण किया। उसकी सेनाओं ने पापल ट्रूप्स को आसानी से परास्त कर दिया तथा एन्कोना एवं लोरेटो पर अधिकार कर लिया। पोप पायस (षष्ठम्) ने नेपोलियन से शांति की अपील की। इसके बाद 19 फरवरी 1979 को टोलेण्टिनो की संधि हुई  किंतु यह संधि कुछ ही दिन चल पाई।

28 दिसम्बर 1997 को रोम में एक उपद्रव हुआ जिसमें फ्रैंच ब्रिगेडियर जनरल मथुरियन-लियोनार्ड डूफोट और फ्रैंच दूत जोसेफ बोनापार्ट को मार दिया गया। पापल सेनाओं ने इस उपद्रव का आरोप कुछ इटेलियन एवं फ्रैंच आंदोलनकारियों पर लगाया। इस पर फ्रैंच जनरल बरथियर ने रोम पर दुबारा आक्रमण किया। रोम की सेनाएं फिर से परास्त हो गईं।

मैं तुम्हारा स्वामी

10 फरवरी 1798 को फ्रैंच सेनाएं रोम में प्रवेश कर गईं। नेपोलिनयन ने रोम में अपने भव्य-स्वागत की तैयारियां करवाईं तथा एक महानायक के रूप में रोम में प्रवेश किया। स्वागत का मुख्य आयोजन आर्क-बिशप के महल में किया गया।

इस समारोह में रोम के लोगों को सम्बोधित करते हुए नेपोलियन ने कहा- ‘मैं तुम्हारा स्वामी हूँ किंतु मेरा कार्य तुम्हारी सुरक्षा करना होगा। पाँच सौ तोपें एवं फ्रांस से मित्रता, बस यही मैं आपसे चाहता हूँ। आप स्वयं को फ्रांस की अपेक्षा अधिक सुरक्षित एवं स्वतंत्र अनुभव करेंगे। 50 लाख की जनसंख्या वाला यह राज्य एक नया गणतंत्र बनेगा तथा मीलान इसकी राजधानी होगी। आपको पाँच सौ तोपें रखने की अनुमति दी जाती है।

साथ ही आपको फ्रांस को मित्र-राष्ट्र बनाना होगा। मैं आप में से 50 व्यक्तियों का चुनाव करूंगा जो फ्रांस के नाम पर देश का संचालन करेंगे। अपने रीति-रिवाजों में ढालकर आपको हमारे कानून स्वीकार करने होंगे। परस्पर एकता बनाए रखने पर सब-कुछ व्यवस्थित चलेगा। यदि हैब्सबर्ग पुनः लोम्बार्डी को जीत लेता है तो भी मैं आपको विशेष सुरक्षा का वचन देता हूँ।

आपको कभी भी निर्वासित नहीं किया जाएगा। आपकी भूमि भी कोई नहीं छीन सकेगा। मेरे जीवित न रहने पर ही कुछ अवांछित हो सकता है। आप जानते हैं कि एथेंस बेसपार्टा भी सदा के लिए अपना अस्तित्व बनाए नहीं रख सके। मुझ पर भरोसा रखकर देश में एकता बनाए रखें। मेरा यही आप सबसे निवेदन है।’

रोम में गणतंत्र की स्थापना तथा पोप की गिरफ्तारी

नेपालियन द्वारा रोम में एक गणतंत्र की स्थापना कर दी गई। पोप के सारे राज्याधिकार समाप्त कर दिए गए तथा पोप से कहा गया कि वह अपने समस्त धार्मिक अधिकारों का भी त्याग कर दे। पोप ने फ्रैंच सेनाओं के आदेश मानने से मना कर दिया।

इस पर पोप पायस (षष्ठम्) को बंदी बना लिया गया। 20 फरवरी 1798 को उसे वेटिकन से सियेना ले जाया गया। वहाँ से उसे सेरटोसा तथा कुछ दिन बाद फ्लोरेंस ले जाया गया। पोप को टस्कनी, परमा, पियासेंजा, त्यूरिन तथा ग्रेनोबल होते हुए वालेन्स के सिटेडल में ले जाया गया।

वालेन्स पहुँचने के लगभग डेढ़ माह बाद 29 अगस्त 1799 को पोप की बंदी अवस्था में ही मृत्यु हो गई। वह रोम के चर्च के तब तक के इतिहास में सर्वाधिक अवधि तक पोप रहा। पोप का शरीर वालेंस के दुर्ग में खराब होता रहा किंतु उसे 30 जनवरी 1800 से पहले दफनाया नहीं गया। इसके बाद नेपोलियन ने हिसाब लगाया कि पोप के शरीर को इसी स्थान पर दफना देना ठीक है ताकि कैथोलिक चर्च का कार्यालय रोम से फ्रांस स्थानांतरित किया जा सके।

पाठकों को स्मरण होगा कि पहले भी कुछ समय के लिए पोप का कार्यालय फ्रांस में रहा था। पोप के साथी बिशपों ने नेपोलियन से कहा कि वे पोप को उसकी अंतिम इच्छा के अुनसार रोम में दफनाने की अनुमति दें किंतु नेपोलियन ने यह प्रार्थना स्वीकार नहीं की।

बाद में 24 दिसम्बर 1801 को पोप के कॉफीन को वालेंस की कब्र से निकालकर रोम ले जाया गया तथा 19 फरवरी 1802 को पोप पायस (सप्तम्) ने स्वर्गीय पोप पायस (षष्ठम्) की देह का कैथोलिक विधि से अंतिम संस्कार करवाया। 

नए पोप से नई संधि

इस काल में रोम एवं फ्रांस की बहुसंख्यक जनता कैथोलिक चर्च के प्रभाव में थी। नेपोलियन ने चर्च की शक्ति को कमजोर करके उसे राज्य के अधीन किया। चर्च की सम्पति का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और पादरियों को राज्य के प्रति निष्ठा रखने की शपथ लेने को कहा गया। इससे पोप नाराज हुआ और उसने आम जनता को विरोध करने के लिए उकसाया। फलतः सरकार और आमजनता के बीच तनाव पैदा हो गया। नेपोलियन ने इसे दूर करने के लिए ई.1801 में पोप पायस (सप्तम्) के साथ समझौता किया जिसे कॉनकारडेट (Concordate) कहा जाता है। इसके प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे-

1. कैथलिक धर्म को राजकीय धर्म के रूप में स्वीकार किया गया।

2. बिशपों की नियुक्ति प्रथम काउंसलर द्वारा होगी परन्तु वे पोप द्वारा दीक्षित किए जाएंगे।

3. बिशप शासन की स्वीकृति पर ही छोटे पादरियों की नियुक्ति करेंगे।

4. चर्च के समस्त अधिकारियों को राज्य के प्रति निष्ठा की शपथ लेना अनिवार्य होगा। इस तरह चर्च राज्य का अंग बन गया और उसके अधिकारी राज्य से वेतन पाने लगे।

5. गिरफ्तार किए गए समस्त पादरी छोड़ दिए गए और देश से भागे पादरियों को वापस आने की अनुमति दी गई।

6. चर्च की जब्त संपत्ति एवं भूमि से पोप ने अपना अधिकार त्याग दिया।

7. युद्ध-काल के कैलेण्डर को स्थगित कर दिया गया तथा प्राचीन कैलेण्डर एवं अवकाश दिवसों को पुनः लागू कर दिया गया।

इस प्रकार नेपोलियन ने राजनीतिक उद्देश्यों के पूर्ति के लिए पोप से संधि की और युद्ध कालीन अव्यवस्था को समाप्त करके चर्च को राज्य का सहयोगी एवं सहभागी बनाया। प्रकारांतर से नेपोलियन ने चर्च के युद्ध-कालीन घावों पर मरहम लगाने का प्रयास किया। उसने पोप को उसके पद पर बने रहने दिया किंतु उसके अधिकार सीमित कर दिए। अब पोप ‘पापल स्टेट’ का राजा भी नहीं रहा।

लोम्बार्डियों के लौह-मुकुट का स्वामी

26 मई 1805 को नेपोलियन बोनापार्ट ने मीलान के गिरजाघर में इटली के लोंबार्ड नरेशों का लौहमुकुट धारण किया। इसके साथ ही नेपोलियन ने रोम अथवा यूरोप के किसी भी भाग में किसी भी प्रकार के रोमन साम्राज्य के अस्तित्व में होने के भ्रम को सदा के लिए ध्वस्त कर दिया। जब नेपोलियन ने रोमन साम्राज्य का अंत किया तो संसार में किसी ने भी इस घटना पर ध्यान नहीं दिया।

 फिर भी इंग्लैण्ड, रूस, जर्मनी और अन्य देशों के राजा एम्परर, सीजर, कैसर और जार की उपाधियां धारण करते रहे जो प्राचीन रोमन साम्राज्य की अंतिम निशानियां थीं। यहाँ तक कि ई.1877 में इंग्लैण्ड की रानी विक्टोरिया ने ‘कैसर-ए-हिन्द’ की उपाधि धारण करके अपने प्रभुत्व का उद्घोष किया जिसका शाब्दिक अर्थ भारत-साम्राज्ञी माना गया। प्रथम विश्व युद्ध के अंत के बाद संसार से सीजर, कैसर एवं जार जैसे शब्दों की सदा के लिए विदाई हो गई।

पोप को पुनः बंदी बनाया गया

नेपोलियन का पोप के साथ किया गया यह समझौता अस्थायी सिद्ध हुआ। इस कारण ई.1807 में नेपोलियन को पुनः पोप के साथ संघर्ष करना पड़ा। अप्रैल 1808 में रोम पुनः नेपोलियन के अधिकार में चला गया। ई.1809 में पोप को बंदी बना लिया गया। इससे रोम ही नहीं अपितु पूरे यूरोप के कैथोलिक मतावलम्बियों को यह विश्वास हो गया कि नेपोलियन न केवल राज्यों की स्वतंत्रता नष्ट करने वाला दानव है अपितु उनके धर्म को भी नष्ट करने वाला है।

इसलिए यूरोप में नेपोलियन के प्रति सहानुभूति समाप्त हो गई। कैथोलिक चिंता का एक कारण यह भी था कि फ्रैंच-सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा लागू की गई नेपोलियन संहिता में कैथोलिक धर्म को राजधर्म तो स्वीकार किया गया था किंतु सभी धर्मों को बराबरी का अधिकार दिया गया था। कैथोलिक चर्च इस व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।

नेपोलियन का अंत

नेपोलियन ने एक बार कहा था कि– ‘सत्ता मेरी रखैल है। इसे वश में करने के लिए मुझे इतनी दिक्कत उठानी पड़ी है कि मैं न तो उसे किसी और को छीनने दूंगा और न अपने साथ भोगने दूंगा।’

संभवतः नेपोलियन कुछ अंशों में सही था कि सत्ता उसकी रखैल थी किंतु उसकी यह बात गलत थी कि मैं किसी और को उसे छीनने नहीं दूंगा। रखैल नामक प्राणी न तो किसी पुरुष के पास सदैव रहता है और न किसी पुरुष के जीवन में सुख का अंश बाकी छोड़ता है। जिस किसी के जीवन में रखैल नामक प्राणी का प्रवेश होता है, उसके सुख बहुत ही कम समय में उसका साथ छोड़ देते हैं और वह पुरुष सर्वनाश की ओर बढ़ जाता है।

 नेपोलियन के साथ भी यही हुआ। उसके सर्वनाश का समय निकट आ गया था। वैसे भी उस काल के यूरोप में पोप तथा चर्च जिस राजा के शत्रु हो जाएं, वह राजा अधिक समय तक अपने सिंहासन पर नहीं टिक पाता था, नेपोलियन बोनापार्ट भी नहीं टिक सका। जून 1815 में वाटरलू की लड़ाई में फ्रैंच सेनाएं परास्त हो गईं तथा अंग्रेजों ने नेपोलियन को बंदी बना कर एटलांटिक सागर के बीच स्थित सेंट हेलेना द्वीप पर भेज दिया जहाँ फरवरी 1821 में उसकी मृत्यु हो गई।

नेपोलियन द्वारा किए गए के युद्धों के दौरान इटली में बहुत से छोटे-छोटे राज्य समाप्त हो गए थे। इन राज्यों की जनता ने एक बड़ी शासन व्यवस्था के नीचे आकर स्वयं को वृहत्तर परिवेश में पाया तथा उन्होंने राष्ट्रीयता का अनुभव किया। इस कारण इटली में एक राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा हुआ जो इटली के इतिहास में रीसॉर्जीमेंटो (Risorgimento) कहलाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इटली का एकीकरण (37)

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इटली का एकीकरण

विभिन्न समुद्री द्वीपों और कबीलाई संस्कृतियों से बने इटली का एकीकरण एक कठिन प्रक्रिया थी। छोटे-छोटे इलाकों के राजा अपने अधिकारों को छोड़कर किसी एक बड़े देश में शामिल होने को तैयार नहीं थे। इटली का एकीकरण रीसॉर्जीमेंटो कहलाता है।

वियना कांग्रेस में इटली का बंटवारा

नेपोलियन बोनापार्ट को बंदी बनाए जाने के बाद सितंबर 1814 से जून 1815 तक ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में एक सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसे विश्व इतिहास में वियना कांग्रेस कहा जाता है। यह यूरोपीय देशों के राजनेताओं का एक सम्मेलन था।

इसकी अध्यक्षता ऑस्ट्रियाई राजनेता मेटरनिख ने की। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी क्रांतिकारी युद्ध, नेपोलियन युद्ध और पवित्र रोमन साम्राज्य के विघटन से उत्पन्न समस्याओं को सुलझाना था किंतु इस सम्मेलन में फ्रांस, ऑस्ट्रिया तथा इंग्लैण्ड के साम्राज्यवादी नेताओं ने इटली की समस्याओं को सुलझाने की बजाय भयानक रूप से बढ़ा दिया।

विजेता राष्ट्रों ने इटली एवं पूर्वी यूरोप के कई देशों को आपस में बांट लिया। ऑस्ट्रिया ने वेनिस (वेनेशिया) एवं उसके आसपास का बड़ा इलाका ले लिया। ऑस्ट्रिया के राजा को कई अच्छे क्षेत्र दे दिए गए। नेपल्स एवं दक्षिण इटली को मिलाकर दोनों सिसलियों का एक राज्य बना दिया गया और इसे बोर्बन राजा के अधीन कर दिया गया। फ्रांस की सीमा के निकट उत्तर-पश्चिम में पीडमॉण्ट और सार्डीनिया का राजा था।

पोप की वापसी

भले ही यूरोप के अनेक राजा पोप की सत्ता से छुटकारा  पाने के प्रयास करते रहे थे किंतु वे मन से यह कभी नहीं चाहते थे कि रोम का पोप सदैव के लिए समाप्त या विलुप्त  हो जाए। विएना समझौते के बाद हुए बंटवारे में पोप को उसका ‘पापल राज्य’ फिर से लौटा दिया गया जो नेपोलियन बोनापार्ट ने समाप्त कर दिया था। इस प्रकार रोम एवं उसके आसपास के क्षेत्रों पर पोप का शासन फिर से स्थापित हो गया।

इटली केवल भौगोलिक अभिव्यक्ति बन गया

वियना कांग्रेस के बाद मेटरनिख ने कहा- ‘इटली वस्तुतः केवल एक भौगोलिक अभिव्यक्ति बन कर रहा गया।’  अब इटली का राजनीतिक मानचित्र इस प्रकार था-

(1) उत्तरी इटली में लोम्बार्डी और वेनेशिया के प्रदेश, ऑस्ट्रिया के अधीन हो गए।

(2) मध्य-इटली में पोप का शासन हो गया।

(3) दक्षिण-इटली में नेपल्स और सिसली के राज्य पर बूर्बो-वंश का राज्य हो गया।

(4) फ्रांस की सीमा के निकट उत्तर-पश्चिम में पीडमॉण्ट और सार्डीनिया का सम्राट था।

इस प्रकार विएना कांग्रेस ने इटली को चार बड़े भागों में बाँट दिया, उनके भीतर भी अगल-अलग राज्य थे तथा उनके अलग-अलग शासक थे। पीडमॉण्ट के राजा को छोड़कर शेष छोटे-बड़े राजाओं ने बड़े निरंकुश ढंग से शासन किया तथा जनता का बहुत शोषण किया। इटली की जनता को राजाओं ने पहले कभी इतना दुःख नहीं दिया था। इस कारण देश की जनता में इन राजाओं के विरुद्ध असंतोष भड़कने लगा।

राष्ट्रवादी इटलीवासियों की समस्याएं

यूरोप में चल रही राष्ट्रवाद की आंधी से प्रेरित होकर इटली के जन-साधारण ने संपूर्ण इटली को एक राष्ट्र बनाने के लिए आंदोलन चलाने का निर्णय लिया। इसमें अनेक बाधाएँ थीं, जिन्हें दूर करना आवश्यक था। इटली के देशभक्तों के ससक्ष तीन प्रमुख समस्याएँ थीं-

(1) इटली के वे प्रदेश जो ऑस्ट्रिया के प्रभाव में थे, उन्हें मुक्त कराना।

(2) देश के शासन को लोकतंत्रवाद के अनुकूल बनाना।

(3) इटली में राष्ट्रीय-एकता की स्थापना करना।

गुप्त-समितियों का गठन

इटली की स्वतंत्रता एवं उसके एकीकरण हेतु आंदोलन का आरम्भ देशभक्त लोगों द्वारा गुप्त-समितियों के गठन से हुआ जिनमें कार्बानेरी नामक समिति सबसे-प्रसिद्ध थी। लगभग सम्पूर्ण इटली में इसका जाल बिछाया गया। इसके नेतृत्व में इटली में अनेक विद्रोह हुए, जिन्हें मेटरनिख द्वारा कुचल दिया गया। अतः लोगों का यह विश्वास दृढ़ हो गया कि जब तक इटली से ऑस्ट्रिया का प्रभाव समाप्त नहीं होगा तब तक इटली की एकता के प्रयास सफल नहीं होंगे।

मैजिनी का उदय

ज्यूसेपे मैजिनी का जन्म 22 जून 1805 को जिनेवा में हुआ था। वह फ्रांस की क्रान्ति से अत्यंत प्रभावित था। पढ़ाई पूरी करके वह कार्बानेरी नामक गुप्त संस्था का सदस्य बन गया। मेजिनी का मानना था कि ‘नये विचार तभी पनपते हैं जब उसे शहीदों के रक्त से सींचा जाता है।’ 

वह देश की तत्कालीन व्यवस्था से दुःखी था और उसमें सुधार लाने का उपाय सोचता था। उसने देश की जनता को संबोधित करते हुए कहा- ‘हमारी प्रतिष्ठा और उन्नति अवरुद्ध है। हमारी शानदार प्राचीन परम्परा रही है परन्तु वर्तमान में हमारा कोई राष्ट्रीय अस्तित्व नहीं है। इसके लिए ऑस्ट्रिया जिम्मेदार है। उसके विरुद्ध संगठित होकर उसका सामना करने की आवश्यकता है।’

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 ई.1830 में मेजिनी को जनता में असंतोष भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। वह लगभग एक वर्ष तक सेनोना की जेल में कैद रहा। जेल से मुक्ति के बाद उसने ई.1831 में मार्सेई में, निर्वासित इटालियन देशभक्तों की ‘जिओवेन इटालिया (जवान इटालिया)‘ नामक गुप्त समिति का गठन किया। मैजिनी ने इस संगठन के प्रसार के लिए कई वर्षों तक कठोर परिश्रम किया। इसकी सदस्य संख्या में निरंतर वृद्धि होती गयी। ई.1833 में इस गुप्त समिति के सदस्यों की संख्या 60 हजार हो गयी। मेजिनी अच्छा साहित्यकार था। उसकी कई रचनाएं इटली के लोगों में राष्ट्रवादी भावनाएं संचारित करने में सफल हुईं। इस दौरान उसे देश-निकाले में भी रहना पड़ा और कई बार उसके प्राणों पर संकट आया। ज्यूसेपे मेजिनी को ‘इटली का स्पन्दित हृदय’ कहा जाता है। महान् भारतीय क्रांतिकारी एवं भारतीय क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक वीर सावरकर, मेजिनी को अपना आदर्श नायक मानते थे। लाला लाजपत राय मेजिनी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। उन्होंने मेजिनी की प्रसिद्ध रचना ‘द ड्यूटी ऑफ मैन’ का उर्दू में अनुवाद किया। मेजिनी को इटली के राष्ट्रीय-एकीकरण के स्वप्न को साकार रूप देने का श्रेय है।

मेजिनी अपने विचारों से इटली की जनता को राष्ट्रीय-एकीकरण के लिए निरंतर प्रोत्साहित करता रहा और उनमें देशप्रेम तथा बलिदान की भावना उत्पन्न करता रहा। वह स्वतंत्रता के साथ-साथ गणतंत्र का भी समर्थक था। इस प्रकार वह इटली के स्वाधीनता संघर्ष का अग्रदूत बन गया। ई.1848 में ऑस्ट्रियाई चांसलर मेटरनिख का पतन हो गया। इससे इटली के देशभक्तों के उत्साह में वृद्धि हुई।

यूरोप के देशों में बलवे

ई.1848 का साल यूरोप में क्रांतियों का साल कहलाता है। इस साल यूरोप के कई देशों में दंगे हुए किंतु अधिकांश देशों में वे दबा दिए गए। पौलेण्ड, इटली, बोहेमिया और हंगरी के दंगों की पृष्ठभूमि में वहाँ के शासकों द्वारा बलपूर्वक दबाई गई राष्ट्रीयता थी। उत्तरी इटली में ऑस्ट्रिया के विरुद्ध विद्रोह किया गया।

पोप का रोम से निष्कासन

 ई.1848 में इटली में भी कई स्थानों पर विद्रोह की आग भड़क गई। मैजिनी इस अवसर का लाभ उठाने के लिए रोम आ गया। उसने पोप को रोम से बाहर निकाल दिया और रोम में एक गणराज्य की स्थापना की। इस गणराज्य के शासन के लिए उसने तीन सदस्यों की एक समिति बनाई। इस समिति को प्राचीन रोमन साम्राज्य की समिति की तर्ज पर ‘त्रियमवीर‘ कहा गया। इस समिति में मैजिनी स्वयं भी सम्मिलित था।

यूरोपीय राजाओं में बेचैनी

पोप का रोम से बाहर निकाला जाना एवं इटली में गणतंत्र का स्थापित होना यूरोप के विभिन्न देशों के राजाओं के लिए अत्यंत चिंताजनक था। वे सदियों से अपने देश की जनता को धर्म का भय दिखाकर राजा को ईश्वरीय प्रतिनिधि सिद्ध करते थे और अपने अस्तित्व को बनाए रहते थे। इन देशों के राजाओं की चिंता यह थी कि जब रोम में पोप ही नहीं रहेगा तब राजा लोग, धर्म को अपराजेय एवं स्वयं को धर्म के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित कैसे रख सकेंगे!

संसार की समस्त शासन व्यवस्थाओं में अब तक धर्म ही उस रज्जु का काम करती आई थी जिससे बंधी हुई जनता को शासन के दण्ड से जिधर चाहे हांका जा सकता है।

उस काल की यूरोपीय राज्य-व्यवस्था को देखने से ऐसा लगता है मानो धर्म राजा पर शासन कर रहा था किंतु भीतरी सच्चाई यह थी कि धर्म, राज्य को बनाए रखने के लिए बांदी की भूमिका निभा रहा था और राजा लोग इस दासी को अपने हाथ से नहीं निकलने दे सकते थे। यही कारण है कि गणतंत्र प्रायः धर्म की उपेक्षा करता है और राजतंत्र धर्म को पकड़ कर रखता है।

इटली के नवीन गणराज्य पर ऑस्ट्रिया, नेपल्स एवं फ्रांस की सेनाओं ने आक्रमण किए। ये लोग रोम से गणराज्य समाप्त करके फिर से पोप का शासन स्थापित करना चाहते थे। रोम गणराज्य की रक्षा के लिए गैरीबाल्डी नामक एक युवक आगे आया। उसकी सहायता के लिए रोम के सैंकड़ों देशभक्त युवक स्वेच्छा से आगे आए।

उन स्वयं-सेवकों ने गैरीबाल्डी के नेतृत्व में ऑस्ट्रिया, नेपल्स एवं फ्रांस की सेनाओं को कुछ समय के लिए रोम की तरफ बढ़ने से रोक दिया किंतु वे अधिक समय तक तीन देशों की सेनाओं का एक साथ सामनानहीं कर सके और गैरीबाल्डी को इटली छोड़ अमरीका भाग जाना पड़ा।

पोप की वापसी

ऑस्ट्रिया, नेपल्स एवं फ्रांस की सेनाओं से अलग-अलग मोर्चों पर लड़ते हुए इटली के बहुत से युवकों की जानें गईं किंतु अंततः रोम गणराज्य फ्रांसीसियों से हार गया और फ्रांस ने फिर से पोप को रोम का राजा बना दिया। इस पर भी मैजिनी और गैरीबाल्डी ने देश की जनता को प्रजातंत्र देने के संकल्प का त्याग नहीं किया। वे फिर से अपने काम में जुट गए। यद्यपि इन दोनों के काम करने के तरीकों एवं विचारों में बहुत अंतर था तथापि उनका लक्ष्य एक था। मैजिनी विचारक और आदर्शवादी था जबकि गैरीबाल्डी सिपाही था और छापामार युद्ध में निष्णात था।

काबूर का उदय

विदेशी शक्तियों द्वारा पोप को बलपूर्वक रोम में पुनः स्थापित कर दिए जाने से इटली के स्वतंत्रता संग्राम को बड़ा झटका लगा किंतु इस असफलता ने इटालवी युवकों में देशभक्ति एवं राष्ट्रवाद की प्यास और अधिक बढ़ा दी। जब मैजिनी और गैरीबाल्डी इटली के शत्रुओं से लड़ते हुए हारने लगे तब इटली के राजनीतिक मैदान में एक और युवक इटली की आजादी और एकता के लिए आगे आया। उसका नाम काबूर था। वह पीडमॉण्ट के राजा विक्टर एमेनुएल का प्रधानमंत्री था।

वह अपने युग का एक महत्त्वपूर्ण और कुशल कूटनीतिज्ञ था। उसका जन्म ई.1810 में ट्यूरिन के एक जमींदार परिवार में हुआ था। उसने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में आरंभ किया था किंतु बाद में वह पुनः नागरिक जीवन में आ गया। वह इटली में ‘वैधानिक- राजसत्ता’ का समर्थक था और इंग्लैण्ड की संसदीय प्रणाली से अत्यधिक प्रभावित था।

काबूर का लक्ष्य

ई.1848 में काबूर पीडमॉण्ट की संसद का सदस्य बना तथा उन्नति करता हुआ ई.1852 में पीडमाँट राज्य का प्रधानमंत्री बन गया।

काबूर का लक्ष्य इटली को विदेशी शक्तियों से मुक्त करवाकर इटली को एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का था किंतु वह यह काम लोकतंत्र की स्थापना के लिए नहीं करना चाहता था। वह पीडमॉण्ट के राजा विक्टर एमेनुएल के अधीन एक विशाल इटली की स्थापना का स्वप्न देख रहा था।

पीडमॉण्ट का सशक्तीकरण

काबूर की मान्यता थी कि जब तक राज्य मजबूत नहीं होगा, तब तक वह अपने संघर्षों में सफल नहीं हो सकेगा। इसलिए उसने इटली के एकीकरण का नेतृत्व करने के लिए पीडमाँट को मजबूत बनाने का प्रयास किया। उसने राज्य को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक सुधार किए। राज्य में व्यापार और व्यवसाय के विकास लिए भी विशेष प्रयास किये गए।

उसने व्यापार के क्षेत्र में ‘खुला छोड़ दो’ की नीति का अनुसरण करते हुए व्यापार को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। उसके मार्ग-दर्शन में यातायात के साधनों को मजूबत बनाया गया और कृषि क्षेत्र को विकसित किया गया। शिक्षा की उन्नति की ओर भी ध्यान दिया गया।

उसने सेना और कानून के क्षेत्र में नये सुधारों को क्रियान्वित किया और बैंक संबंधी नियमों में अनुकूल सुधार किए। इस प्रकार उसने प्रशासन के विभिन्न अंगों में सुधार करके राज्य के प्रशासन को गतिशील और मजबूत बनाया। उसके इन प्रयासों के कारण पीडमाँट राज्य की बहुमुखी उन्नति हुई और वह एक सशक्त राज्य बन गया।

अपनी बुनियाद को मजबूत कर लेने के बाद उसने देशभक्तों से सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। मेजिनी और गैरीबाल्डी उससे सहयोग करने के लिए तैयार हो गये। इस प्रकार राष्ट्रीय एकीकरण के कार्य में वह बहुसंख्यक जनता का सहयोग प्राप्त करने में सफल हुआ।

क्रीमिया के युद्ध में भागीदारी

काबूर ने अनुभव किया कि ऑस्ट्रिया के प्रभाव को समाप्त करने के लिए उसे फ्रांस से सहयोग प्राप्त हो सकता है। अतः उसने क्रीमिया के युद्ध में फ्रांस की सहायता की। यह युद्ध ई.1854 में पूर्वी समस्या के प्रश्न पर लड़ा गया था। इसकी समाप्ति ई.1856 में पेरिस की संधि से हुई। पेरिस की संधि पर विचार-विमर्श करने के लिए आयोजित सम्मेलन में काबूर भी उपस्थित हुआ।

वह उस सम्मेलन में इटालियन स्वाधीनता के दावे को कुशलतापूर्वक प्रस्तुत करने में सफल रहा। उसने इटली की दयनीय स्थिति के लिए ऑस्ट्रिया को जिम्मेदार ठहराते हुए इटली से उसके प्रभाव को समाप्त करने की वकालत की। फ्रांस का तत्कालीन राष्ट्रपति नेपोलियन (तृतीय) काबूर के तर्कों से प्रभावित हुआ और उसने इटली को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया।

फ्रांस से संधि

जून 1858 में नेपालियन (तृतीय) तथा काबूर के बीच प्लाम्बियर्स नामक स्थान पर एक संधि हुई जिसमें इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि इटली को ऑस्ट्रिया के नियंत्रण से निकालने के लिए फ्रांस, इटली को सैनिक सहायता देगा और इस सहायता के बदले इटली, नीस और सेवाय के प्रदेश फ्रांस को देगा। अब काबूर ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध करने के लिए तैयार हो गया।

ऑस्ट्रिया से युद्ध एवं ज्यूरिक की संधि

काबूर के प्रयासों से लोम्बार्डी और वेनेशिया में ऑस्ट्रिया के विरुद्ध विद्रोह हो गया। इस कारण ई.1859 में दोनों पक्षों में युद्ध प्रारंभ हो गया। इसी बीच प्रशिया, ऑस्ट्रिया की सहायता करने के लिए तैयार हो गया और युद्ध में भारी व्यय होने की संभावना उत्पन्न हो गई। इस कारण फ्रांस ने स्वयं को युद्ध से अलग कर लिया।

संभवतः अब तक नेपोलियन (तृतीय) को यह समझ में आ गया कि इटली का संगठित होना फ्रांस के लिए अच्छा नहीं है। ऐसी स्थिति में इटली, ऑस्ट्रिया और फ्रांस के बीच ज्यूरिक की संधि हुई जिसकी मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं –

(1) लोम्बार्डी का प्रदेश पीडमाँट के अधिकार में दे दिया गया,

(2) वेनेशिया को ऑस्ट्रिया के ही अधिकार में रखा गया,

(3) नीस और सेवाय के प्रदेश फ्रांस को दे दिए गए।

इस संधि से इटली को बड़ी निराशा हुई। वेनेशिया का ऑस्ट्रिया के अधीन रहना तथा नीस एवं सेवाय का इटली के हाथ से निकल जाना देशवासियों को खल रहा था। फिर भी लोम्बार्डी की प्राप्ति एकीकरण की दिशा में पहली बड़ी उपलब्धि थी। मध्य और दक्षिण में एकीकरण का कार्य अभी शेष था।

मध्य-इटली का एकीकरण

मध्य-इटली के राज्यों में भी स्वतंत्रता की माँग जोर पकड़ने लगी थी। ये राज्य भी अब पीडमाँट के साथ मिलने का प्रयास करने लगे थे। ई.1860 में मोडेना, परमा और टस्कनी आदि मध्य-इटली के राज्यों ने जनमत द्वारा पीडमाँट में मिलने का फैसला किया। इस प्रकार मध्य-इटली के राज्यों का भी एकीकरण हो गया।

अब दक्षिण-इटली के राज्यों को संगठित करना शेष था। शेष इटली को पीडमाँट में शामिल करने का जो आंदोलन चला उसमें किसी विदेशी शक्ति का सहयोग नहीं लिया गया। यह इटालियन राष्ट्रीयता की अपनी सफलता थी, जिसका नेता गैरीबॉल्डी था। सिसली और नेपल्स दक्षिण-इटली के राज्य थे जहाँ बूर्वो-वंश के राजा की सत्ता थी।

गैरीबाल्डी का योगदान

गैरीबाल्डी ने इटली के राष्ट्रीय-एकीकरण के कार्य में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उसका जन्म ई.1807 में नीस में हुआ था। उसने नौ-सेना की शिक्षा प्राप्त थी। वह समुद्री व्यापार से जुड़ा हुआ था तथा मेजिनी से बड़ा प्रभावित था। वह रिपब्लिकन-दल का समर्थक हो गया इसीलिए उसे गिरफ्तार कर लिया गया। सजा से बचने के लिए वह दक्षिण-अमेरिका भाग गया। ई.1848 में वह पुनः इटली लौटा।

क्रांति में असफलता प्राप्त करने के पश्चात वह पुनः अमेरिका चला गया। वहाँ से खूब धन कमाकर वह पुनः इटली आया। पीडमॉंट के प्रधानमंत्री काबूर और राजा विक्टर एमेनुअल से उसने संपर्क बनाये रखे। उसने अपने नेतृत्व में लालकुर्ती दल का गठन किया, जिसके सहयोग से वह सिसली और नेपल्स को स्वतंत्र करके उन्हें राष्ट्रीय-धारा से जोड़ने में सफल हुआ।

सिसली और नेपल्स की प्राप्ति

दक्षिण-इटली में सिसली और नेपल्स की जनता ने ब्रूवो राजा फ्रांसिस (द्वितीय) के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और गैरीबाल्डी से सहयोग मांगा। 11 मई 1859 को गैरीबाल्डी चुने हुए देशभक्तों के साथ अमरीका से पुनः अपनी मातृभूमि लौटा। गैरीबाल्डी एवं उसके एक हजार लाल-कुर्ती वाले सिपाही बिना किसी सैन्य-प्रशिक्षण के एवं बिना समुचित हथियारों के, नेपल्स एवं सिसली की प्रशिक्षित एवं विशाल सेना पर चढ़ बैठे।

यह एक अनोखी और बेमेल लड़ाई थी किंतु गैरीबाल्डी में गजब की नेतृत्व क्षमता थी जिसके बल पर उसकी छोटी सी अप्रशिक्षित सेना निरंतर सफलताएं हासिल करती थी। जब उसकी सेना हारने लगती थी तो गैरीबाल्डी अकेला ही युद्ध के मैदान में मौत का विकराल खेल खेलने लगता था जिसके कारण उसके भागते हुए सिपाही फिर से युद्ध के मैदान में आ-डटते थे और हारी हुई बाजी जीत ली जाती थी।

वह जब अपने साथियों के साथ गांवों एवं कस्बों से होकर गुजरता था तो ग्रामीण युवकों से अपील करता था कि वे देश की आजादी के लिए आगे आएं। वह कहता था- ‘चले आओ! चले आओ! जो घर में घुसा रहता है, वह कायर है। मैं तुम्हें थकान, तकलीफें और लड़ाइयां देने का वादा करता हूँ किंतु हम या तो जीतेंगे, या मर मिटेंगे। संसार सफलता की प्रतिष्ठा करता है।’

गैरीबाल्डी की पुकार सुनकर स्वयंसेवकों को तांता बंध गया। वे घरों से निकलकर गैरीबाल्डी का लिखा गीत गाते हुए सेनाओं में भर्ती होने लगे। इस गीत का आशय इस प्रकार था-

उघड़ गई हैं कब्रें, मुर्दे दूर-दूर से आते उठकर।

ले तलवारें हाथों में और कीर्ति-ध्वजों के साथ,

युद्ध के लिए खड़े हो रहे प्रेतगण, अमर शहीदों से अपने,

जिनके मृत हृदयों में गर्मी, इटली का नाम रहा है भर।

आओ, दो उनका साथ, देश के नवयुवको!

तुम चलो उन्हीं के पीछे!

आओ, फहरा दो झण्डा अपना और बाजे जंगी सब साजो!

आ जाओ! सब लेकर ठण्डी फौलादी तलवारें,

किन्तु हो आग हृदय में भरी हुई,

आ जाओ सब लेकर इटली की आशाओं की ज्योति अरे!

इटली से बाहर हो, ओ परदेशी,

तू बाहर निकल हमारे प्यारे वतन इटली से!

गैरीबाल्डी ने अपनी सेना की सहायता से जून 1860 में सिसली पर एवं सितम्बर 1860 में नेपल्स पर अधिकार कर लिया। सिसली विजय के बाद गैरीबाल्डी ने 20 हजार युवकों के साथ दक्षिण इटली में प्रवेश किया। 18 फ़रवरी 1861 को इटली की नई पार्लियामेंट की बैठक हुई और विक्टर इमानुअल को इटली का विधिवत् राजा घोषित कर दिया गया।

सिसली एवं नेपल्स को भी पीडमाँट के राज्य में शामिल कर लिया गया। सिसली और नेपल्स का शासक फ्रांसिस (द्वितीय) देश छोड़कर भाग गया। निःसंदेह काबूर ने गैरीबाल्डी की सफलताओं से लाभ उठाया था। इसी कारण पीडमॉण्ट का राजा विक्टर एमेनुएल इटली का शासक हो पाया था।

मैजिनी और गैरीबाल्डी इन अप्रत्याशित घटनाओं से हक्के-बक्के रह गए। वे जीवन भर इटली की आजादी और एकीकरण के लिए लड़ते रहे थे किंतु उन्होंने इस इटली की कल्पना नहीं की थी जिसका शासक एक राजा हो और जो देश पर सामंतशाही शिकंजा कड़ा कर दे। उनकी कल्पना ऐसे इटली की थी जिस पर इटली की प्रजा स्वयं शासन कर सके। गैरीबाल्डी के नेतृत्व में इटली के जिन युवकों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी, वे भी गणतंत्र की स्थापना के लिए व्याकुल थे।

इसलिए पीडमेंट का राजा और उसका प्रधानमंत्री काबूर, देश के बहुसंख्यक नागरिकों की भावनाओं की पूर्ण उपेक्षा नहीं सके। देश में एक पार्लियामेंट स्थापित की गई तथा देश के शासन के लिए एक संविधान का भी निर्माण किया गया किंतु यह सब राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था के अंतर्गत था।

इटली के एकीकरण के तुरंत बाद त्यूरिन में पार्लियामेंट की बैठक करके विक्टर एमेनुअल एवं काबूर ने देश की प्रजा को स्पष्ट संदेश दिया कि उन्हें संविधान के अंतर्गत शासन व्यवस्था प्रदान की जाएगी, राजा पूर्णतः निरंकुश होकर शासन नहीं करेगा।

काबूर का निधन

6 जून 1861 को काबूर की मृत्यु हो गयी। इटली को एक राष्ट्र का रूप देने का श्रेय काबूर को है, जिसमें मेजिनी, गैरीबाल्डी और विक्टर इमेनुएल का सहयोग उल्लेखनीय था। काबूर की इच्छा थी कि रोम संयुक्त इटली की राजधानी बने किंतु रोम अभी तक फ्रांसीसी सेना के अधिकार में था। वेनेशिया भी अभी तक ऑस्ट्रिया के अधिकार में था।

वेनेशिया की प्राप्ति

उन्हीं दिनों प्रशा के प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जर्मन राज्यों के एकीकरण का कार्य आरम्भ हुआ। ई.1866 में प्रशा ने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध आरम्भ कर दिया। इटली भी प्रशा की ओर से इस युद्ध में शामिल हो गया। इस युद्ध में प्रशा विजयी रहा। इटली द्वारा किए गए सहयोग के बदले में वेनेशिया का राज्य इटली को प्राप्त हो गया। अक्टूबर ई.1866 में इसे भी पीडमाँट में मिला लिया गया।

रोम की प्राप्ति

रोम का प्राचीन वैभव इटलीवासियों के लिए गौरव का विषय था। इस कारण इटलीवासी रोम को नवीन इटली राज्य की राजधानी बनाना चाहते थे किंतु उस पर पोप का अधिकार था। ई.1870 में फ्रांस और प्रशा के बीच युद्ध छिड़ गया। ऐसी स्थिति में फ्रांस को रोम में स्थित अपनी सेना को वापस बुलाना पड़ा। यह युद्ध सीडान के मैदान में लड़ा गया, जिसमें अंतिम सफलता प्रशा को मिली।

इस स्थिति ने इटली को रोम पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। 20 सितम्बर 1870 को इटली के सेनापति केडोनी ने रोम पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार इटलीवासियों की यह अंतिम इच्छा भी पूर्ण हो गयी।

2 जून 1871 को राजा विक्टर इमेनुएल ने रोम में प्रवेश किया। उसने इटली की नई संसद का उद्घाटन करते हुए कहा- ‘हमारी राष्ट्रीय एकता पूर्ण हो गयी, अब हमारा कार्य राष्ट्र को महान् बनाना है।’

विक्टर इमेनुएल का योगदान

यह सही है कि पीडमाँट के राजा विक्टर एमेनुएल ने एकीकृत इटली को गणतंत्र नहीं देकर राजतंत्र दिया किंतु इटली के एकीकरण को ठोस रूप देने में उसने महान् भूमिका का निर्वहन किया। यदि विक्टर इमेनुएल में दूरदृष्टि नहीं होती तो पीडमॉण्ट जैसे छोटे राज्य के लिए इतने बड़े देश के एकीकरण का नेतृत्व करना और अंत में उसे अपने संरक्षण में ले लेना कदापि संभव नहीं होता।

राजा विक्टर इमेनुएल उस काल के अन्य यूरोपीय शासकों से भिन्न व्यक्तित्व का धनी था। वह राष्ट्रीयता और देश के एकीकरण का समर्थक था। वह सच्चा देशभक्त, वीर और धैर्यवान राजा था। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि यदि विक्टर इमेनुएल नहीं होता तो इटली के एकीकरण का कार्य असंभव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता।

इटली की पीड़ा का चित्रण

इटली की आजादी के लिए हुए इस संघर्ष पर अंग्रेज कवि और उपन्यासकार जॉर्ज मेडिडिथ ने इटली के स्वातंत्र्य संग्राम पर एक बड़ा उपन्यास लिखा जिसे बहुत प्रसिद्धि मिली। मेडेडिथ द्वारा लिखी गई एक कविता का आशय इस प्रकार था-

हमने इटेलिया को घोर पीड़ा में देखा है!

वह उठने भी न पाई थी कि उसे फिर धरती

पर फैंक दिया गया,

और आज जब वह गेहूँ के पके हुए खेत की तरह,

जहाँ कभी हल चलते थे,

वरदानमयी तथा सुन्दर है,

तब हमें उनकी याद आती है,

जिन्होंने उसके ढांचे में जीवन की सांस फूंकी

काबूर, मैजिनी, गैरीबाल्डी तीनों;

एक उसका मस्तिष्क, एक आत्मा, एक तलवार,

जिन्होंने एक प्रकाशमान उद्देश्य को लेकर

विनाशकारी आंतरिक कलह से उसका उद्धार किया।

ट्रैवेलियन नामक अंग्रेज विद्वान ने गैरीबाल्डी को लेकर तीन पुस्तकें लिखीं- (1) गैरीबाल्डी एण्ड फाइट फॉर द रोमन रिपब्लिक, (2) गैरीबाल्डी एण्ड द थाउजैण्ड, (3.) गैरीबाल्डी एण्ड द मेकिंग ऑफ इटली।

इटली की लड़ाई के दिनों में इंग्लैण्ड के लोगों की सहानुभूति गैरीबाल्डी और उसके लाल कुर्तों के साथ थी। इस कारण बहुत से अंग्रेज कवियों ने इटली के लोगों को साहस बंधाने वाला साहित्य लिखा।

स्विनबर्न, मेरेडिथ और एलिजाबेथ बैरेट ब्राउनिंग नामक अंग्रेज कवियों ने सुंदर कविताएं लिखकर इटली-वासियों का उत्साह बढ़ाया। इन कविताओं में प्रजातंत्र एवं आाजादी के पक्ष में बहुत उच्च विचार व्यक्त किए गए थे। जबकि ठीक उन्हीं दिनों अंग्रेज जाति आयरलैण्ड, मिस्र एवं भारत की जनता पर बरसाने के लिए बंदूकें, मशीनगनें, तोपें और गोलियां बना रही थी।

जिस समय इटली का संघर्ष अपने दुर्दिनों से गुजर रहा था, तब अंग्रेज कवि स्विनबर्न ने ‘रोम के सामने पड़ाव’ शीर्षक से एक कविता लिखी जिसका आशय इस प्रकार था-

तुम क्रीतदास जिस स्वामी के, वह ही देगा उपहार तुम्हें,

उपहार भला क्या दे सकती, स्वतंत्रता की देवि तुम्हें;

वह आश्रयहीना स्वतंत्रता, आवास नहीं जिसका कोई,

वह बिना रुकावट सीमा के, प्रेरित करती जिन सेनाओं को,

बढ़ने को आगे नित ही।

वे सेनाएं खोकर जिन आंखों की निद्रा,

भूखों मरती, और खून बहाती चलती हैं,

निज प्राणों से आजादी की बोती जाती हैं बीज, तथा

बढ़ती जाती हैं, यह इच्छा लेकर-

उनकी मिट्टी से फिर निर्माण राष्ट्र का हो जाए,

और आत्माएं उनकी कर दें ज्योतित उसके ही तारे को।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बैनितो मुसोलिनी – फासिज्म का नायक (38)

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बैनितो मुसोलिनी - फासिज्म का नायक

इटली में कारखाने के मालिकों ने देश में चल रही कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने पक्ष में किया तथा उन्हें मजदूरों एवं समाजवादी नेताओं के विरुद्ध खड़ा कर दिया। इन संगठनों में बैनितो मुसोलिनी का ई.1910 से चल रहा संगठन प्रमुख था।

प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ होने से पहले ही इटली भयानक आर्थिक संकट में फंसा हुआ था। ई.1911-12 में तुर्की-युद्ध का अंत इटली की विजय के साथ हुआ था और उत्तरी अफ्रीका में त्रिपोली पर उसका अधिकार होने से इटली के साम्राज्यवादी नागरिकों ने प्रसन्नता का अनुभव किया था किंतु इस विजय से इटली की आर्थिक स्थितियों में कोई सुधार नहीं हुआ।

 ई.1914 में जब यूरोप प्रथम विश्व-युद्ध के मुहाने पर खड़ा हुआ था, तब इटली में आंतरिक क्रांति की चिन्गारियां सुलग रही थीं। कारखानों में हड़तालें चल रही थीं। मजदूर वर्ग के नर्म-दलीय समाजवादी नेता किसी तरह मजदूरों को काम पर लाने में सफल हुए। इसके साथ ही महायुद्ध छिड़ गया।

जर्मनी ने इटली से पुरानी मित्रता का हवाला देकर युद्ध में साथ देने के अनुरोध किया किंतु इटली ने मना कर दिया तथा युद्ध में तटस्थ रहने की नीति अपनाई ताकि इसके बदले में दोनों पक्षों को ललचाकर उनसे कुछ आर्थिक रियायतें प्राप्त कर सके। मित्र-राष्ट्रों अर्थात् इंग्लैण्ड एवं फ्रांस के गुट ने इटली को आर्थिक सहायता देकर उसे अपने पक्ष में लड़ने के लिए सहमत कर लिया।

इस प्रकार अगस्त 1916 में इटली अपने पुराने मित्र एवं अपने पुराने शासक जर्मनी के विरुद्ध विश्व-युद्ध में सम्मिलित हुआ। इटली को कुछ राशि नगद रूप में दी गई तथा स्मर्ना एवं तुर्की के कुछ क्षेत्र भी दे दिए गए जिन पर इटली अपना दावा जताता था किंतु उसी समय रूस में बोल्शेविक क्रांति हो गई जिससे इटली उन क्षेत्रों पर अधिकार नहीं कर सका।

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युद्ध समाप्ति के बाद ‘पेरिस शांति सम्मेलन’ आयोजित हुआ जिसमें मित्र-राष्ट्र ब्रिटेन और फ्राँस ने इटली के साथ विश्वासघात किया और उन्होंने इटली को वे क्षेत्र नहीं दिए जो इटली को देने तय हुए थे। इटली को आशा थी कि वह इन क्षेत्रों पर अधिकार करके कुछ आर्थिक कमाई करेगा किंतु यह संभव नहीं हो सका। इसलिए इटली के भीतर मित्र-राष्ट्रों के विरुद्ध असंतोष ने जन्म लिया। इटली का आरोप था कि मित्र-राष्ट्र जानबूझ कर इटली के हितों की उपेक्षा कर रहे थे। प्रथम विश्व-युद्ध में इटली के छः लाख सैनिक काम आए और लगभग 10 लाख सैनिक घायल हुए। युद्ध समाप्त होने के बाद इटली की आर्थिक स्थिति और अधिक खराब हो गई तथा बहुत से सैनिकों को नौकरी से हटा दिया गया। इस प्रकार इटली में किसान, मजदूर एवं नौकरी से हटाए गए सिपाही सड़कों पर दंगे करने लगे। ई.1920 में धातु का काम करने वालू मजदूरों ने बढ़ी हुई तन्खाहों की मांग की। इससे इटली में ‘काम रोको हड़ताल’ आरम्भ हो गई। कारखाने के मालिकों ने कारखानों में तालाबंदी कर दी। इस पर मजदूरों ने कारखानों के ताले तोड़कर उन पर अधिकार कर लिया तथा उन्हें समाजवादी ढंग से चलाने का प्रयत्न किया। इस समय इटली में समाजवादी दल का जोर था।

मजदूर-संघों के साथ-साथ तीन हजार म्युनिसिपल कमेटियों की बागडोर भी समाजवादियों के हाथों में थी। पार्लियामेंट में इस समय लगभग डेढ़ सौ अर्थात् एक तिहाई सदस्य समाजववादी थे। फिर भी समाजवादी नेता सिवाय भाषणों के और कुछ नहीं कर सके तथा देखते ही देखते कारखानों के मालिकों ने मिलों एवं कारखानों पर फिर से अधिकार कर लिए।

अब कारखाने के मालिकों ने देश में चल रही कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने पक्ष में किया तथा उन्हें मजदूरों एवं समाजवादी नेताओं के विरुद्ध खड़ा कर दिया। इन संगठनों में बैनितो मुसोलिनी का ई.1910 से चल रहा संगठन प्रमुख था जिसमें उसने पहले किसानों और कारखाना मजदूरों को भर्ती किया था तथा बाद में सेना से निकाले गए सैनिकों को बड़ी संख्या में सम्मिलित कर लिया था।

सैनिकों की भर्ती के बाद इस संगठन का स्वरूप ‘लड़ाकू गिरोह’ जैसा हो गया था। ये किसी पर भी हमला कर सकते थे। पूंजीपतियों एवं कारखाने के मालिकों ने इन्हें समाजवादियों एवं वामपंथियों पर हमले करने के काम पर लगा दिया।

लड़ाकू गिरोहों के सदस्य किसी भी समाजवादी अखबार के कार्यालय पर हमला करके उसे नष्ट कर देते थे, किसी भी वामपंथी कार्यालय को आग लगाकर उसके सदस्यों के घायल कर देते थे। इसी प्रकार जो म्युनिसिपल कार्पोरेशन तथा सहकारी समितियाँ वामपंथियों के प्रभाव में थीं, उन पर भी इन लोगों ने हमले करके उन्हें तहस-नहस कर दिया। इन सब कामों के बदले में पूंजीपति लोग इन लड़ाकू गिरोहों को धन दिया करते थे।

धीरे-धीरे इटली में इन गिरोहों को ‘फासिदि कॉम्बैतिमैन्ति’ कहा जाना लगा। अंग्रेजी भाषा का ‘फासिज्म’ तथा हिन्दी भाषा का ‘फासीवाद’ इसी इटेलियन शब्द ‘फासिदि’ से बने हैं। सरकार ने पूंजपतियों एवं इन लड़ाकू गिरोहों की ओर से आंखें मूंद लीं। सरकार चाहती थी कि ये लोग समाजवादियों एवं वामपंथियों से सड़कों पर ही निबट लें।

बैनितो मुसोलिनी का जन्म ई.1883 में एक लोहार के घर में हुआ था जो कि समाजवादी कार्यकर्ता था। इसलिए बैनितो मुसोलिनी का लालन-पालन समाजवादी विचारों के बीच हुआ। जब मुसोलिनी बड़ा हुआ तो वह भी समाजवादी नेता बन गया। वह नर्म विचारों वाले समाजवादियों को उनकी नर्म-नीति के लिए धिक्कारा करता था।

बैनितो मुसोलिनी सरकार एवं अपने विरोधियों के विरुद्ध बमों के प्रयोग का समर्थन करता था। तुर्की-युद्ध में इटली के समाजवादियों ने सरकार का समर्थन किया किंतु बैनितो मुसोलिनी ने इस युद्ध का विरोध किया तथा कई जगहों पर हिंसक कार्यवाहियां की जिनके कारण सरकार ने मुसलोलिनी को पकड़कर जेल में बंद कर दिया।

जब वह जेल से छूटा तो उसने समाजवादी दल से उन नेताओं को बाहर निकलवा दिया जो युद्ध का समर्थन करते थे। इसके बाद मुसोलिनी मीलान से प्रकाशित होने वाले एक समाचार पत्र ‘अवन्ती’ का सम्पादक बन गया। इस समाचार पत्र के माध्यम से मुसोलिनी अपने मजदूरों को सलाह देता था कि- ‘वे हिंसा का मुकाबला हिंसा’से करें।’  इटली के नर्म-समाजवादी नेताओं ने मुसोलिनी द्वारा भड़काई जा रही हिंसा का विरोध किया।

 जब प्रथम विश्व-युद्ध आरम्भ हुआ तो बैनितो मुसोलिनी ने युद्ध का विरोध किया तथा इस बात का प्रचार किया कि इटली को युद्ध से तटस्थ रहना चाहिए।  इस दौर में सरकार भी इसी नीति पर चल रही थी। अचानक बैनितो मुसोलिनी ने अपने विचार बदल दिए तथा यह प्रचार करना आरम्भ किया कि इटली को मित्र-राष्ट्रों की तरफ से युद्ध में भाग लेना चाहिए।

उसने समाजवादी समाचार-पत्र के सम्पादन का काम भी बंद कर दिया तथा एक नया समाचार पत्र आरम्भ किया जिसमें उसने मित्र-राष्ट्रों के समर्थन में जनमत तैयार करना आरम्भ किया।

इस पर समाजवादियों ने बैनितो मुसोलिनी को समाजवादी दल से निकाल दिया। अब बैनितो मुसोलिनी इटली की सेना में साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गया तथा प्रथम विश्व-युद्ध के मोर्चे पर लड़ने गया। युद्ध में वह गंभीर रूप से घायल हो गया। जब युद्ध समाप्त हो गया तो बैनितो मुसोलिनी ने स्वयं को बड़ी विचित्र स्थिति में पाया।

अब वह न तो समाजवादियों के काम का था, न सरकार के काम का था, न मजदूरों में उसका प्रभाव रह गया था। ऐसा हारा हुआ और कुण्ठित व्यक्ति प्रायः या तो अवसाद में चला जाता है, या फिर ‘अराजकतावादी’ हो जाता है। मुसोलिनी अराजकतावादी हो गया।

ई.1920 में उसने अपने संगठन में, युद्ध में बेकार हो गए तथा सेना से निकाले गए सैनिकों की दुबारा से भर्ती आरम्भ की तथा इटली में फासीवाद की नए सिरे से नींव डाली। इस अवसर पर उसने कहा- ‘चूंकि वे किसी तरह के निर्धारित कार्यक्रमों से बंधे हुए नहीं हैं, इसलिए वे बिना रुके हुए एक ही लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाते हैं, और वह लक्ष्य है इटली की जनता की भावी भलाई।’

कहने को तो मुसोलिनी जनता की भलाई की बात कह रहा था किंतु वास्तविकता यह थी कि उसके संगठन का हिंसा के अलावा और किसी सिद्धांत में विश्वास नहीं था। बहुत से शहरों में मजदूर संगठनों ने मुसोलिनी के संगठन के साथ हिंसक झड़पें कीं जिससे मुसोलिनी कठिनाई में पड़ गया किंतु तभी नर्मपंथी समाजवादी नेताओं ने मजदूरों को सलाह दी कि वे हिंसा का सामना हिंसा से न करके शांति एवं धैर्य से काम लें।

मजदूरों ने अपने नेताओं की सलाह मान ली और उन्होंने बैनितो मुसोलिनी के गुण्डों का हिंसक विरोध करना बंद कर दिया। इससे मुसोलिनी का काम आसान हो गया और देश में फासीवादी गिरोह पनप गए जिनका सर्वमान्य नेता मुसोलिनी था। प्रत्येक गिरोह को किसी न किसी धनी मिल मालिक का संरक्षण मिल गया था। सरकार ने इनके मामलों में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया क्योंकि ये गिरोह मिलों में हड़ताल नहीं होने देते थे।

मुसोलिनी ने एक नीति और अपनाई, उसके गिरोह काम तो धनी लोगों के लिए करते थे किंतु नारे हमेशा गरीबों, शोषितों, वंचितों, पीड़ितों, किसानों, मजदूरों आदि के समर्थन में लगाते थे। यह साम्यवादियों की पुरानी चाल थी, वे पीड़ितों की लड़ाई लड़ने की आड़ में अपनी जेबें भरा करते थे। मुसोलिनी ने भी यही किया।

इस प्रकार फासीवाद एक खिचड़ी जैसी चीज बन गया। वह प्रकट रूप से अमीरों के हितों के लिए कार्य करता था और प्रकट रूप से ही गरीबों के पक्ष में भाषण देता था। इस प्रकार अमीर उससे डरे हुए रहते थे और गरीब यह सोचते थे कि मुसोलिनी तो उनका अपना ही नेता है।

वास्तव में बैनितो मुसोलिनी का फासिज्म एक ऐसा पूंजीवादी आंदोलन था जो पूंजीवादियों के खिलाफ डरावनी बातें करता था। एक दिन वह गरीबों के पक्ष में भाषण देता था तो अगले ही दिन कारखाना मालिकों, पूंजीपतियों एवं बड़े उद्योगों को बनाए रखने की वकालात करता हुआ दिखाई देता था ताकि गरीबों की नौकरियां खतरे में न पड़ें।

मुसोलिनी ने समाज का ऐसा कोई वर्ग नहीं छोड़ा था जिसके पक्ष में एवं जिसके विरोध में मुसोलिनी ने भाषण नहीं दिए हों। जब वह अमीरों के विरोध में भाषण देता था तो निर्धन वर्ग के लोग खुश होते थे और जब वह अगली बार अमीरों के पक्ष में भाषण करता था तो निर्धन वर्ग के लोग सोचते थे कि यह तो केवल अमीरों को खुश करने के लिए बोला जा रहा है, वास्तव में मुसोलिनी गरीबों का नेता है। ठीक ऐसा ही अमीर वर्ग के लोग सोचते थे।

मध्यम वर्ग के बेकार एवं बेरोजगार नौजवान इस आंदोलन का बड़ा हथियार बन गए जिन्हें मुसोलिनी पेट भरने के लिए रोटी के पैसे उपलब्ध कराने लगा और मारपीट एवं गुण्डागर्दी के कामों में उन्हें अपनी सेना के रूप में काम में लेने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि असंगठित क्षेत्र के मजदूर लोग भी मुसोलिनी की छतरी के नीचे आकर जमा होने लगे ताकि मिल मालिकों से लड़कर उनकी नौकरियां सुरक्षित रखी जा सकें। 

इस प्रकार फासीवाद एक रंग-बिरंगी वस्तु बन गया जिसमें इटली की जनता के सभी रंग एक साथ दिखाई देते थे। चूंकि सरकार के पास ऐसा कोई उपाय नहीं था जिससे वह बेरोजगारों को रोजगार दे सके, पूंजीपतियों की शोषणकारी एवं दमनकारी नीतियों पर अंकुश स्थापित कर सके, मुसोलिनी के गुण्डों का दमन कर सके, इसलिए सरकार ने इस आंदोलन के समक्ष घुटने टेक दिए। अब देश का वास्तविक शासन यही गुण्डे चलाने लगे। कम से कम जनता के बीच तो इन्हीं गुण्डों का शासन था।

फासीवादियों ने अपनी ओर से चीजों के मूल्य तय कर दिए तथा व्यापारी वर्ग को विवश किया कि वे इन्हीं दामों पर दैनिक उपभोग की चीजें बेचें। इससे गरीबों को बड़ी राहत मिल गई और वे फासीवादियों के साथ हो लिए। मुसोलिनी चूंकि फौज में रहकर लड़ा था, इसलिए वह बड़ी आसानी से सैन्य अधिकारियों से मित्रता गांठ लेता था। इस कारण इटली की सेना में मुसोलिनी के सम्पर्क सूत्र स्थापित हो गए।

धीरे-धीरे बैनितो मुसोलिनी ने सेना के कुछ बड़े सेनापतियों को अपने पक्ष में कर लिया। यह कैसी विचित्र बात थी कि इटली का धनी वर्ग मुसोलिनी को अपनी सम्पत्ति का रक्षक समझता था, मजदूर वर्ग उसे अपनी नौकरियों का संरक्षक समझता था, समाजवादी नेता उससे भय खाते थे और सरकार के मंत्री उसे न सुलझने वाली पहेली समझकर सहन करते थे जबकि सैन्य अधिकारी उसे अपना मित्र मानते थे।

इस प्रकार बैनितो मुसोलिनी सबको किसी न किसी तरह से चकमा दे रहा था और उन्हें अपने पक्ष में रखे हुए था। ऐसे आदमी के लिए देश पर कब्जा कर लेना अधिक कठिन नहीं था। उसने रोम पर चढ़ाई करने का कार्यक्रम बनाया। इटली के राजा को उसका यह कार्यक्रम अच्छा लगा और राजा से सहायता लेकर अक्टूबर 1922 में फासीवादी दस्तों ने रोम पर चढ़ाई कर दी।

रोम के लिए कूच करने से पहले उसने अपने सैनिक-दस्तों का आह्वान इन शब्दों में किया- ‘हमारा कार्यक्रम बहुत सीधा-सादा है। हम इटली पर राज करना चाहते हैं।’

इटली का प्रधानमंत्री ‘नित्ती’ जो अब तक मुसोलिनी के विरुद्ध कार्यवाही करने से बच रहा था, उसे देश में सैनिक शासन लागू करना पड़ा किंतु तब तक देर हो चुकी थी, स्वयं राजा भी मुसोलिनी के पक्ष में हो गया था। उसने प्रधानमंत्री के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके द्वारा देश में सैनिक शासन लागू किया गया था।

प्रधानमंत्री ने नाराज होकर त्यागपत्र दे दिया और इटली के राजा विक्टर एमानुएल (तृतीय) ने मुसोलिनी को मीलान में आमंत्रित किया ताकि मुसोलिनी को नया प्रधानमंत्री बनाया जा सके। 30 अक्टूबर 1922 को फासीवादी सेना रोम पहुँच गई और उसी दिन मुसोलिनी प्रधानमंत्री बनने के लिए रेल में बैठकर मीलान चला आया।

बिना किसी विरोध और बाधा के मुसोलिनी इतने बड़े देश का प्रधानमंत्री बन गया। उसका ‘फासीवाद’ सत्ता प्राप्त करने में सफल रहा किंतु उसकी आगे की डगर बहुत कठिन थी। मुसोलिनी के सामने न कोई लक्ष्य था, न आदर्श था, न योजना थी, न किसी तरह का कार्यक्रम था। वह तो केवल देश की सत्ता छीनना चाहता था, जिसमें वह सफल हो गया था किंतु आगे क्या करना था, इसके बारे में उसने कुछ भी नहीं सोचा था।

मुसोलिनी ने इटालवी भाषा के विश्वकोश में फासीवाद पर लिखे एक लेख में लिखा है– ‘जब वह रोम पर चढ़ाई करने के लिए रवाना हुआ तब भविष्य के बारे में उसके दिमाग में कोई योजना नहीं थी। राजनीतिक संकट के समय कुछ करने की जोरदार इच्छा ने ही उसे इस युद्ध पर कूच करने के लिए प्रेरित किया था, और यह उसकी पिछली समाजवादी साधना का परिणाम था।’ 

मुसोलिनी के दल का प्रतीक चिह्न रोम का एक पुराना साम्राज्यशाही राज्यचिह्न था जो रोम के सम्राटों और मजिस्ट्रेटों के आगे-आगे चला करता था। यह छड़ियों का एक बण्डल होता था जिसके बीच में कुल्हाड़ी लगी रहती थी। ये छड़ियां फेसेज कहलाती थीं, इन्हीं से फासिमो शब्द बना है। फासीवादी लोगों के अभिवादन का तरीका भी पुराने रोमन ढंग का था जिसमें एक बाजू को उठाकर एक तरफ फैला दिया जाता है।

इसलिए कहा जा सकता है कि फासीवादी स्वयं को राष्ट्रवादी प्रदर्शित करने के लिए प्राचीन रोमन साम्राज्य के प्रतीकों को काम में ले रहे थे। फासीवादियों का काम करने का तरीका भी साम्राज्यशाही ढंग का था जिसमें ‘कोई तर्क नहीं, केवल आज्ञापालन’ का सिद्धांत निहित था। उनका नेता मुसोलिनी ‘इल द्यूचे’ अर्थात् तानाशाह कहलाता था। उनकी वर्दी में काली-कुर्ती सम्मिलित थी। इसलिए उन्हें ‘ब्लैक शर्ट्स’ अथवा ‘काली कुर्ती’ कहा जाता था।

प्रधानमंत्री बनने के बाद मुसोलिनी ने इटली में एक सूत्री कार्यक्रम चलाया, और वह था विरोधियों को ठिकाने लगाना। बहुत से मार्क्सवादी एवं समाजववादी नेताओं और उनके समर्थकों की हत्या कर दी गई। पार्लियामेंट के सदस्यों को जान से नहीं मारा गया किंतु उन्हें सड़कों, गलियों एवं उनके घरों में घुस कर लात-घूंसों और जूतों से पीटा गया ताकि वे पार्लियामेंट में मुसोलिनी का समर्थन करें। इसके बाद मुसोलिनी पार्लियामेंट में शाही प्रतिनिधि के चुनाव के सम्बन्ध में एक विधेयक लाया।

इस विधेयक में कहा गया कि शाही उत्तराधिकारी की नियुक्ति एक समिति द्वारा की जाए। यह राजा का घोर अपमना था किंतु जूतों के बल पर यह नया कानून प्रबल बहुमत से पारित करा लिया गया। इस तरह मुसोलिनी के पक्ष में भारी बहुमत हासिल कर लिया गया। बैनितो मुसोलिनी ने राजाज्ञाओं का पालन बंद कर दिया तथा सार्वजनिक रूप से दिए गए एक भाषण में कहा- ‘यह घोषणा-पत्र इमानुएल की राजगद्दी का अंत करने के लिए यथेष्ट है।’

मुसोलिनी के गुण्डों ने पुलिस को निष्क्रिय करके स्वयं मोर्चा संभाल लिया। वे जिसकी हत्या करना चाहते थे, उसे बलपूर्वक अरण्डी का ढेर सारा तेल पिला देते थे। देश की समस्त सरकारी नौकरियां फासीवादी दल के कार्यकताओं को दे दी गईं। ई.1224 में गायाकोमो मैतिओती की हत्या से सारा यूरोप थर्रा गया।

यह एक विख्यात समाजवादी था और पार्लियामेंट का सदस्य था। उन दिनों इटली में चुनाव होकर ही चुका था। गायाकोमो ने पार्लियामेंट में एक भाषण दिया जिसमें उसने फासीवादी तरीकों की निंदा की। कुछ ही दिन बाद गायाकोमो की हत्या कर दी गई। लोगों को दिखाने के लिए कुछ लोगों को पकड़कर उन पर मुकदमा चलाया गया किंतु अंत में उन सभी को छोड़ दिया गया।

अभी यह घटना होकर ही चुकी थी कि अमेन्दोला नामक एक नर्म-दली नेता को पीटा गया जिससे उसकी भी मृत्यु हो गई। पिछला प्रधानमंत्री ‘नित्ती‘ भी इसी दल का नेता था, वह जान बचाने के लिए चुपचाप इटली छोड़कर भाग गया। मुसोलिनी के कार्यकर्ताओं ने उसका घर जलाकर नष्ट कर दिया। ये समस्त कार्यवाहियां किसी उन्मत्त भीड़ द्वारा नहीं की गई थीं अपितु सोच-समझकर खुलेआम की गई थीं।

मुसोलिनी इटली का तानाशाह बन गया। वह केवल प्रधानमंत्री ही नहीं था अपितु पर-राष्ट्र विभाग (विदेश), स्वराष्ट्र विभाग (गृह), उपनिवेश विभाग, युद्ध विभाग, नौसेना विभाग, हवाई सेना विभाग और मजदूर विभाग का भी मंत्री था। एक तरह से वह पूरा मंत्रिमण्डल था। इटली का बूढ़ा राजा चुप होकर कौने में बैठ गया। उसके पास अब कोई शक्ति नहीं बची थी। यही काफी था कि उसके महल उसके पास थे जिनमें अब भी नौकर-चाकर काम करते थे। मुसोलिनी ने उन्हें नहीं हटाया था।

मुसोलिनी जब भाषण देता था तो आग उगलता था। उसे हर समय कोई शत्रु चाहिए था जिस पर वह गालियों एवं धमकियों की बौछार कर सके। वह यूरोप के किसी भी देश को धमका देता था जिससे यूरोप के देशों में बेचैन फैल गई। कौन जाने यह तानाशाह कब क्या कर बैठे?

उसने फ्रांस को धमकाया कि वह अपनी हद में रहे अन्यथा उसके आकाश में इटली के असंख्य हवाई जहाज छा जाएंगे। फ्रांस के सामने इटली की सामरिक शक्ति नगण्य सी थी किंतु फ्रांस इस पागल तानाशाह से लड़कर अपनी शक्ति खराब नहीं करना चाहता था। इसलिए फ्रांस ने कोई जवाब नहीं दिया। इटली राष्ट्रसंघ का सदस्य था किंतु मुसोलिनी अपने भाषणों में राष्ट्रसंघ के लिए असभ्य शब्दों एवं धमकियों का प्रयोग करता था।

राष्ट्रसंघ ने भी उन असभ्य टिप्पणियों को चुपचाप सुन लिया। वे जानते थे कि बैनितो मुसोलिनी अपने देश में जनता एवं सेना पर पकड़ बनाए रखने के लिए इस तरह की असभ्य भाषा का प्रयोग करता है, इससे आगे न तो उसे कुछ करना है और न कुछ करने की उसकी सामर्थ्य है।

ई.1929 में पोप एवं इटली की सरकार के बीच एक समझौता हुआ जिसके बाद, दोनों के बीच ई.1871 से चला आ रहा विवाद सुलझ गया। पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1861 में इटली के एकीकरण के बाद पीडमाँट का राजा इमेनुएल सम्पूर्ण इटली का शासक हो गया था। ई.1871 में राजा इमेनुएल ने रोम पर अधिकार कर लिया था तथा रोम को अपनी राजधानी घोषित कर दिया था।

 इसके बाद उसने रोम में ही अपने महल एवं कार्यालय स्थापित कर लिए थे। पोप ने राजा इमेनुएल की इस कार्यवाही को मान्यता नहीं दी क्योंकि पोप तो स्वयं पापल स्टेट का राजा था।

इसलिए तभी से पोप, वेटिकन स्थित अपने महलों तथा सेंट पीटर्स चर्च के अतिरिक्त, रोम एवं इटली की अन्य भूमि पर पैर नहीं रखता था। पोप ने अपनी इच्छा से स्वयं को वेटिकन में बंदी बना रखा था। ई.2929 के समझौते में रोम शहर में स्थित वेटिकन क्षेत्र को सम्पूर्ण-प्रभुत्व-सम्पन्न राज्य बना दिया गया तथा पोप को उसका राजा घोषित किया गया।

उस समय इस राज्य की जनसंख्या कुछ सौ ही थी किंतु पोप ने अपनी अदालत, अपनी डाक व्यवस्था, अपने डाक टिकट, अपना टकसाल, अपनी मुद्रा स्थापित की जो इटली में भी मान्य की गई। पोप के सम्मान को बहाल करने के लिए इटली के कैथोलिक नागरिकों ने मुसोलिनी के प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन किया।

इटली एवं रोम को वश में करने के बाद मुसोलिनी ने यूरोप के अन्य देशों में आग लगाने का कार्यक्रम बनाया। उसने कहा कि- ‘यूरोप के हर देश में राजगद्दियाँ इस प्रतीक्षा में खाली पड़ी हैं कि कोई योग्य व्यक्ति उन पर बैठ जाए।’

उसके इस विचार से बहुत से देशों में उद्दण्ड किस्म के लोग राजसत्ताएं हड़पने के लिए बलवे करने लगे। पार्लियामेंटों के सदस्यों को ठोका-पीटा जाने लगा तथा उनसे मन-माफिक कानून पारित करवाए जाने लगे।

स्पेन इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। स्पेन की पार्लियामेंट को ‘कोर्ते’ कहा जाता था। पार्लियामेंट में रोमन पादरियों का बड़ा प्रभाव था। स्पेन अपनी खराब आर्थिक स्थिति के कारण प्रथम विश्वयुद्ध से दूर रहा था किंतु स्पेन में औद्योगिकीकरण नहीं होने से जनता में गरीबी और बेरोजगारी अधिक थी।

इसलिए स्पेन की जनता ने न तो जर्मनी की तरह से ठोस मार्क्सवाद अपनाया और न इंग्लैण्ड की तरह नर्म समाजवाद अपनाया, स्पेन ने इटली की तरह फासीवाद अपना लिया जिससे स्पेन में अराजकता का बोलबाला हो गया। ऐसा बुरा हाल और भी कई देशों का हुआ। पौलेण्ड, यूगोस्लाविया, यूनान, बुलगारिया, पुर्तगाल, हंगरी और ऑस्ट्रिया में भी गुण्डा तत्वों ने तानाशाहियाँ स्थापित कर लीं।

यूरोप से लगते हुए तुर्की में भी कमाल पाशा नामक तानाशाह सत्ता पर कब्जा करके बैठ गया। दक्षिण-अमरीकी देशों में भी तानाशाहियों ने सरकारें हथिया लीं। इस प्रकार मुसोलिनी का जादू आधी से अधिक दुनिया के सिर चढ़कर बोलने लगा।

अबीसीनिया पर आक्रमण

ई.1935 में मुसोलिनी ने अबीसीनिया पर आक्रमण किया। यद्यपि द्वितीय विश्व-युद्ध अभी दूर था तथा उसे ई.1939 में आरम्भ होकर ई.1945 में समाप्त होना था किंतु व्यावहारिक रूप से कहा जा सकता है कि अबीसीनिया पर आक्रमण करके मुसोलिनी ने द्वितीय विश्व-युद्ध का पहला पटाखा फोड़ दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फासीवाद और नाजीवाद (39)

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फासीवाद और नाजीवाद

फासीवाद और नाजीवाद दोनों अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराएं थीं किंतु राजनीतिक स्वार्थों के चलते दोनों ने हाथ मिला लिया तथा इटली की सड़कों पर फासी-नाजी भाई-भाई के नारे लगने लगे।

फासीवाद और नाजीवाद में समानता

जिस समय रूस में बोल्शेविक क्रांति की सफलता के बाद साम्यवादी राज्य की स्थापना हो रही थी तथा एक नए समाज और नई अर्थव्यवस्था का गठन किया जा रहा था, उसी समय इटली में ‘फासीवाद’ और जर्मनी में ‘नाजीवाद’ ने जन्म लिया। इन्हें सामान्यतः ‘प्रतिक्रांति’ (Counter Revolution) के रूप में परिभाषित किया जाता है।

वस्तुतः फासीवाद ‘समाजवाद’ के विरोध में और नाजीवाद ‘साम्यवाद’ के विरोध में उठ खड़ा हुआ था। फासीवादी लोग इटली में समाजवादियों को कुचलकर तथा नाजीवादी लोग जर्मनी में साम्यवादियों को कुचलकर सत्तारूढ़ हुए थे।

फासीवादियों एवं नाजीवादियों ने व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, समानता और नागरिक अधिकारों का हरण कर लिया, जबकि इंग्लैण्ड तथा फ्रांस आदि देशों में व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया।

इन कारणों से इन देशों (इंग्लैण्ड तथा फ्रांस) में क्रांति के पश्चात् प्रजातांत्रिक एवं उदारवादी शासन व्यवस्था की स्थापना हुई थी, वहीं फासीवाद और नाजीवाद के दौरान अधिनायकतंत्र की स्थापना की गई। इसी संदर्भ में फासीवाद एवं नाजीवाद को प्रतिक्रांति के रूप में देखा जाता है।

इटालवी विश्वकोष में मुसोलिनी ने लिखा है- ‘फासीवाद शांति की आवश्यकता या लाभ में विश्वास नहीं करता। इसलिए वह शांतिवाद को अस्वीकार करता है, क्योंकि इसमें संघर्ष से इन्कार और बलिदान के अवसर पर कायरता के दोष हैं। युद्ध और केवल युद्ध ही ऐसी चीज है जो मानवीय शक्तियों को उच्च स्तर पर उठा देता है।

जिन समुदायों में युद्ध स्वीकार करने का साहस होता है, उन पर अपने बड़प्पन की छाप लगा देता है। शेष सब व्यवहार कृत्रिम हैं, वे मनुष्य के समक्ष मृत्यु और जीवन का प्रश्न नहीं रखतीं।’

बैनितो मुसोलिनी की सरकार के मंत्री ‘जिओवानी जैन्ताइल’ फासीवादी विचारधारा का माना हुआ शिल्पकार था।

उसने लिखा है- ‘लोगों को लोकतान्त्रिक ढंग से अपनी व्यक्तिगत विशेषता के माध्यम से स्वयं की वास्तविकता नहीं तलाशनी चाहिए अपितु फासीवादी तरीकों से जगत् की आत्म-चेतना रूप परामर्थिक अहम् की क्रियाओं के माध्यम से तलाशनी चाहिए। …… जहाँ तक कोई शक्ति इच्छा को साकार करने की सामर्थ्य रखती है, वहाँ तक वह शक्ति नैतिक है। फिर वह उपदेश या लाठी किसी भी उपाय को काम में लें।’

भारत के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने फासीवाद पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘फासीवाद कट्टर राष्ट्रवादी है तथा अन्तर्राष्ट्रीयता का विरोध करता है। वह तो राज्य को देवता बना देता है जिसकी वेदी पर व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों की बलि आवश्यक है। फासीवाद की दृष्टि में केवल अपना देश ही अपना है, दूसरे समस्त देश पराए हैं और शत्रु के बराबर हैं।’

रोम में हिटलर का स्वागत

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यह स्वाभाविक ही है कि एक जैसे विचार रखने वाले दो लोग गाढ़े मित्र हो जाते हैं। फासीवाद का जनक मुसोलिनी और नाजीवाद का जनक हिटलर आपस में मित्र बन गए। मुसोलिनी ने हिटलर को रोम में आमंत्रित किया। इस समाचार को सुनकर दुनिया दहल गई। संसार के दो बड़े तानाशाहों का मिलन संसार पर भारी पड़ने वाला था। 3 मई 1938 को रोम को दुल्हन की तरह सजाया गया। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा सैनिक नियुक्त किए गए ताकि कोई हिटलर की तरफ टोपी भी फैंकने का साहस न कर सके। हिटलर अपने साथ अपने दोनों विश्वस्त साथियों गोबेल्स एवं रिबनट्रॉप और पाँच सौ अधिकारियों को भी ले गया था जो जर्मनी के विदेश, गृह, गुप्तचर, रक्षा  एवं सैन्य विभागों के वरिष्ठतम अधिकारी एवं बड़े अखबारों के सम्पादक थे। इन लोगों के लिए जर्मनी से इटली तक एक विशेष ट्रेन चलाई गई थी। राजा एमानुएल विक्टर (तृतीय) एवं सीन्यौर (प्रधानमंत्री) मुसोलिनी ने स्वयं इस ट्रेन का स्वागत किया। हर एडोल्फ हिटलर ने मुसोलिनी से हाथ मिलाया तथा गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण किया। इसके बाद दोनों पक्षों के अधिकारियों ने एक गुप्त कमरे में बैठक की। इसके बाद हिटलर अपने आदमियों को लेकर वापस जर्मनी लौट गया। दुनिया कभी नहीं जान सकी कि उस बैठक में दोनों देशों के बीच क्या खिचड़ी पकी।

पूरी दुनिया गर्म हो गई

हिटलर के रोम से लौट जाने के बाद दुनिया अचानक गर्म हो गई। कोई नौसीखिया भी बता सकता था कि इटली और जर्मनी मिलकर इंग्लैण्ड और फ्रांस की खबर लेने वाले थे। इस समय चीन और जापान में गहरा घमासान मचा हुआ था और स्पेन पर बमवर्षा हो रही थी। समझा जा रहा था कि अब जर्मनी किसी भी समय ब्रिटेन पर आक्रमण कर सकता है।

इसलिए चर्चिल सम्भल कर बैठ गया, उसने चालीस लाख लड़ाकों की पीठ पर बंदूकें बांध दीं और युद्धक-विमानों की संख्या दो-गुनी कर दी। उसी सप्ताह रूमानिया में क्रांति शुरु हो गई। तौब्रुक का पतन हो गया। जापान ने अमरीका को लताड़ पिलाई। हिटलर और मुसोलिनी की संधि से ग्रीस को इतना जोश आया कि वह अलबेनिया में युद्ध जीत गया।

इटली में युद्ध के बाजे

हिटलर के इटली आने से पहले इटली- फ्रांस वार्ता चल रही थी किंतु हिटलर के लौट जाने के बाद इटली-फ्रांस वार्ता अचानक समाप्त हो गई। इटली के अखबार चीख-चीखकर कार्सिका और ट्यूनिश की मांग करने लगे। अनुमान था कि इटली जल-थल दोनों मार्गों से फ्रांस पर आक्रमण करेगा। सोवियत रूस को अनुकूल बनाने के लिए मुसोलिनी ने पहले ही हंगरी, रूमानिया, यूगोस्लाविया, बुल्गारिया, कालासागर और डून्यूब के मुहाने तक सोवियत प्रभाव को स्वीकार कर लिया था। इराक, ईरान और अफगानिस्तान को भी रूसी प्रभाव में स्वीकार कर लिया गया था। अब इटली में युद्ध के बाजे बजने लगे।

द्वितीय विश्व-युद्ध

प्रथम विश्व युद्ध के समय मुसोलिनी ने जर्मनी का विरोध किया था तथा मित्र-राष्ट्रों की तरफ से लड़ने के सम्बन्ध में प्रचार किया था। इटली के राजा इमानुएल ने प्रथम विश्व-युद्ध में मित्र-राष्ट्रों की तरफ से ही युद्ध किया था किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने के लिए स्वयं मुसोलिनी को ही निर्णय लेना था। इस समय तक जर्मनी का तानाशाह-शासक हिटलर उसका अच्छा मित्र बन चुका था।

इसलिए मुसोलिनी ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की तरफ से मैदान में उतरने का निर्णय लिया। वैसे भी मुसोलिनी इंग्लैण्ड तथा फ्रांस जैसे लिजलिजे समाजवादियों के साथ मिलकर युद्ध नहीं कर सकता था। जर्मनी की तरफ से लड़ रहे देशों को ‘धुरीराष्ट्र’ तथा इंग्लैण्ड की तरफ से लड़ रहे देशों को ‘मित्रराष्ट्र’ कहा जाता था। इटली का राजा ‘इमानुएल‘ हिटलर तथा युद्ध दोनों को ही पसंद नहीं करता था किंतु उसकी एक न चली।

क्लारा पेटाची

जब द्वितीय विश्व-युद्ध आरम्भ हो ही रहा था, क्लारा पेटाची नामक एक युवती मुसोलिनी के निकट आने में सफल हो गई। वह शीघ्र ही मुसोलिनी की प्रेमिका बन गई। इटली की सेना और गुप्तचर विभाग मानता था कि वह हिटलर की तरफ से मुसोलिनी के पास भेजी गई है तथा सरकार के भीतर किए जा रहे निर्णयों की जानकारी हिटलर तक पहुँचाती है।

इसलिए एक दिन पुलिस, सेना तथा गुप्तचर विभाग के प्रधान आपस में मिले तथा तीनों ने विचार-विमर्श करके फासिस्ट सेना के सलाहकार ‘गारगानो’ की सहायता से एक मैमोरेण्डम तैयार करवाया।

इन सभी अधिकारियों ने व्यक्तिशः यह मैमोरण्डम मुसोलिनी के समक्ष प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया था कि ‘क्लारा’ हिटलर की जासूस है। अतः मुसोलिनी को चाहिए कि वह इस स्त्री को स्वयं से दूर कर दे। मुसोलिनी इस मैमोरेण्डम को देखते ही आग-बबूला हो गया। इन समस्त अधिकारियों को तुरंत उनके पदों से हटा दिया गया।

द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ

कुछ ही दिनों में यूरोप में द्वितीय विश्व-युद्ध छिड़ गया। हिटलर और मुसोलिनी ने युद्ध शरू किया, उनका मुख्य निशाना ब्रिटेन तथा फ्रांस थे। बहुत से अन्य देश भी इस युद्ध से उदासीन नहीं रह सके तथा दोनों ही पक्षों में और भी शक्तियाँ जुड़ती चली गईं। थोड़े ही दिनों में दुनिया दो हिस्सों में साफ-साफ बंट गई। आधी दुनिया के नेता मुसोलिनी, हिटलर और तोजो हो गए थे तो बाकी की आधी दुनिया को चर्चिल, स्टालिन और रूजवेल्ट हांक रहे थे।

मुसोलिनी मुसीबत में

हिटलर ने फ्रांस को बर्बाद करके रख दिया किंतु मुसोलिनी अपने देश को अपने पक्ष में नहीं रख सका। राजा से लेकर प्रजा तक, पत्रकारों से लेकर सैनिकों तक कोई भी मुसोलिनी की युद्ध नीति से प्रसन्न नहीं था। इसका परिणाम यह हुआ कि मुसोलिनी की फासिस्ट सेनाएं मन लगाकर नहीं लड़ सकीं और इटली की सेना कई मोर्चों पर हार गई। अंत में ब्रिटिश सेना सिसली तक आ पहुँची।

मुसोलिनी भाग कर हिटलर से मिलने ‘फेल्ट्रे’ गया। हिटलर ने मुसोलिनी से कहा कि वह मोर्चे पर डटा रहे क्योंकि जर्मनी में ऐसे शस्त्रों का निर्माण हो रहा है जो शीघ्र ही अमरीका और इंगलैण्ड को राख के ढेर में बदल देंगे। मुसोलिनी प्रसन्न-चित्त होकर रोम लौट आया। उस समय तक रोम पर बम-वर्षा आरम्भ हो चुकी थी।

रोम बर्बाद हो जाएगा

मुसोलिनी ने राजा विक्टर इमानुएल (तृतीय) से भेंट करके उसे बताया कि भविष्य अत्यंत आशाजनक है किंतु राजा ने मुसोलिनी से कहा कि भविष्य अत्यंत निराशाजनक है। हवाई हमलों के समय जर्मन सैनिक मोर्चा छोड़कर भाग जाते हैं और इटली के सैनिक मारे जाते हैं। हम सिसली खो चुके हैं, बेहतर होगा कि हम युद्ध से बाहर हो जाएं। यदि यह युद्ध बंद नहीं हुआ तो रोम बर्बाद हो जाएगा। मुसोलिनी राजा से नाराज होकर चला गया।

ग्राण्ड कौंसिल की बैठक

जब मुसोलिनी ने राजा की सलाह स्वीकार नहीं की तो राजा ने ग्रांड कौंसिल की बैठक बुलाई। ग्रांड कौंसिल की बैठक शाही महल में रखी गई। मुसोलिनी को ज्ञात हो गया कि इस बैठक में विरोधी दल का नेता ‘ग्राण्डी’ मुसोलिनी के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखेगा।

मुसोलिनी ने शाही महल के चारों ओर फासिस्ट सेना का पहरा लगा दिया। मुसोलिनी के आदेश से ग्राण्ड कौंसिल के सदस्यों की गाड़ियां शाही महल के भीतरी प्रांगण में ले जाई गईं। उनकी गाड़ियों के द्वार बंद थे तथा अंदर काले परदे से ढके थे। सभी सदस्य काले कपड़े पहने हुए थे। कुल 36 सदस्य इस बैठक में भाग लेने के लिए आए। वे अपनी गाड़ियों से उतर कर सीधे सदन में चले गए।

सदस्यों के प्रवेश करते ही सदन का दरवाजा बंद कर दिया गया। थोड़ी ही देर में मुसोलिनी ने सदन में प्रवेश किया। वह फासिस्ट सेना के प्रधान की वर्दी पहने हुए था। उसका चेहरा अत्यंत सख्त दिखाई दे रहा था किंतु उसकी ओर सदस्यों ने देखा तक नहीं।

मुसोलिनी सीधे ही अध्यक्ष की कुर्सी पर जाकर बैठ गया तथा उसने अत्यंत रूखे शब्दों में घोषणा की- ‘ग्राण्ड कौंसिल की आज की बैठक सिसली की घटनाओं पर विचार करेगी। सिसली का पतन होने पर वहाँ के निवासियों ने मित्र-सेनाओं को अपना मुक्ति-दाता कहकर स्वागत किया है। इटली के सैनिकों ने दुश्मनों का बहुत कम प्रतिरोध किया जबकि जर्मन सैनिकों ने वीरता-पूर्वक अंतिम दम तक शत्रु का मुकाबला किया।’

इसके बाद ग्राण्डी खड़ा हुआ। उसने कहा- ‘मैं यह घोषित करता हूँ कि इटली की बर्बादी और विपत्ति के लिए हमारी सेना दोषी नहीं है। इसका एकमात्र दोष मुसोलिनी पर है। इटालियन जनता के साथ विश्वासघात करके उसे जर्मनी की गोद में फैंक दिया गया है। मैंने उसी दिन मुसोलिनी से कहा था कि आपने देश की प्रतिष्ठा, भावना और सम्मान के विरुद्ध हमारे देश को युद्ध में घसीट लिया है। आज इटली की माताएं चिल्ला-चिल्ला कर कह रही हैं कि मुसोलिनी ने हमारे बेटों को युद्ध में झौंककर मार डाला।’

इसके बाद दोनों नेताओं में लम्बा-चौड़ा वाद-विवाद हुआ। इसी दौरान ग्राण्डी ने मुसोलिनी के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रख दिया। इस पर मुसोलिनी ने यह कहकर सदन की कार्यवाही स्थगति कर दी कि- ‘युद्ध मैंने आरम्भ किया था, अब मैं ही इसे समाप्त करूंगा।’

इस पर सदस्यों ने मुसोलिनी का कड़ा विरोध किया और रात दो बजे तक सदन में तीखी बहस चलती रही। अंत में प्रस्ताव पर वोटिंग कराई गई। मुसोलिनी के विरोध में 19 तथा समर्थन में 17 मत आए। मुसोलिनी सदन में हार गया।

मुसोलिनी ने सदन छोड़ने से पहले वक्तव्य दिया कि- ‘आप लोगों ने शासन पर संकट ला दिया है। इससे राजतंत्र पुनः प्रकाश में आएगा तथा लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा।’

फासिस्ट दल के सचिव ने मुसोलिनी की अब तक की सेवाओं के लिए धन्यवाद प्रस्ताव रखना चाहा किंतु मुसोलिनी ने यह प्रस्ताव रखने के लिए मना कर दिया और अपने कागज समेट कर सदन से चला गया। उसने सेना को आदेश दिए कि वह ग्राण्डी तथा सियानो को बंदी बना ले। सियानो मुसोलिनी का दामाद था किंतु इस समय वह भी मुसोलिनी के विरोध में खड़ा हो गया था।

राजा विक्टर से भेंट

अगले दिन सायं-काल में मुसोलिनी राजा से मिलने उसके महल में गया। इस समय वह सैनिक वर्दी में नहीं था अपितु साधारण नागरिक के कपड़ों में भा। किसी भी सीन्यौर (प्रधानमंत्री) के लिए राजा के समक्ष जाने का यही नियम था। राजा ने महल की सीढ़ियों पर खड़े होकर सीन्यौर का स्वागत किया।

इस समय राजा ने मार्शल की वर्दी पहन रखी थी। इस स्वागत को देखकर मुसोलिनी चौंका किंतु राजा उसे बहुत ही प्रेम से अपने कक्ष में ले गया।

मुसोलिनी ने राजा को बताया कि- ‘कौंसिल ने उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित किया है किंतु युद्ध-काल होने के कारण मैं उसका कुछ भी महत्त्व नहीं समझता।’

राजा ने मुसोलिनी को समझाया कि- ‘उसे कौंसिल के निर्णय का सम्मान करना चाहिए और अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए क्योंकि इटली में अब उसे कोई भी पसंद नहीं करता। अब वह इटली में सबसे घृणित व्यक्ति है। मार्शल बोडगोलियो को सेना और पुलिस का समर्थन प्राप्त है। इसलिए अब देश की सुरक्षा की जिम्मेदार बोडगोलियो को दे दी गई है।’

राजा की बात सुनकर मुसोलिनी निराश हो गया। लगभग 20 मिनट में यह भेंट समाप्त हो गई।

मुसोलिनी की गिरफ्तारी

मुसोलिनी महल की सीढ़ियाँ उतर कर अपनी गाड़ी ढूंढने लगा तभी एक मार्शल ने आकर उसे सैल्यूट किया और कहा कि आप इस गाड़ी में आएं। मुसोलिनी ने देखा कि रेडक्रॉस की बंद गाड़ी उसके सामने खड़ी थी।

मुसोलिनी ने पूछा- ‘क्या मुझे गिरफ्तार किया जा रहा है?’

अधिकारी ने जवाब दिया- ‘हाँ ड्यूस आपको गिरफ्तार किया जा रहा है।’

जिस समय रेडक्रॉस की चारों ओर से बंद गाड़ी में मुसोलिनी को राजा के महल से गिरफ्तार करके सैनिक बैरकों में ले जाया जा रहा था, उस समय रोम की सड़कों पर मित्र-राष्ट्रों की सेनाएं बम गिरा रही थीं। ये बम मुसोलिनी ने ही आमंत्रित किए थे। अगले दिन सुबह रोम के लोगों को ज्ञात हुआ कि मुसोलिनी को गिरफ्तार कर लिया गया है।

लोग खुशी के मारे सड़कों पर निकल आए। उन्होंने मुसोलिनी के चित्र जलाए और फासिस्ट पार्टी के कार्यालय पर हमला बोलकर उसे तहस-नहस कर दिया। मुसोलिनी को रोम से निकालकर कोटे-डी सियानो नामक द्वीप पर ले जाया गया जहाँ किसी समय रोमन सम्राट ऑगस्टस की राजकुमारी जूलिया, रोमन सम्राट नीरो की माता ‘ऐग्रिप्पिना’ तथा रोम के एक पोप को भी निर्वासन में रखा गया था।

फासिस्टवादी गडरिए से भेंट

जिस द्वीप पर मुसोलिनी को रखा गया था, उस द्वीप पर मित्र-राष्ट्रों की सेनाएं बम गिराने लगीं तो मुसोलिनी को अन्यत्र ले जाया गया। 25 जुलाई 1943 को मुसोलिनी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। जब हिटलर के कार्यालय से मुसोलिनी के बारे में पूछताछ की गई तो इटली की सरकार ने उसे कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। अंत में हिटलर को मुसोलिनी की गिरफ्तारी के बारे में पता लग गया।

उसने रोम में स्थित जर्मन राजदूत को आदेश दिया कि वह मुसोलिनी से भेंट करे किंतु नए प्रधानमंत्री ने इसकी अनुमति नहीं दी। कुछ दिन बाद मुसोलिनी को तीन हजार फुट की ऊँचाई पर स्थित ‘ग्रानसासो’ नामक स्थान पर ले जाया गया। एक दिन जब मुसोलिनी पहाड़ी पर टहल रहा था, तब एक गड़रिए ने मुसोलिनी को पहचान लिया। वह फासिस्ट पार्टी का सदस्य रह चुका था।

गड़रिए ने बताया कि- ‘जर्मन सेना आपको ढूंढती हुई रोम के दरवाजे तक आ चुकी है। जर्मन सेना को बताया गया है कि आप स्पेन भाग गए हैं जबकि इटली के लोगों को बताया गया है कि आपको गोली मार दी गई है। आप चिंता न करें। मैं आपके यहाँ होने की सूचना जर्मन सैनिकों तक पहुँचा दूंगा।’

मुसोलिनी की मुक्ति

अपने पुराने नेता के प्रति वफादारी दिखाते हुए उस गड़रिए ने यह बात रोम जाकर जर्मन सैनिकों को बता दी। आनन-फानन में यह सूचना हिटलर को भिजवाई गई। हिटलर ने कैप्टेन स्कोर्जनी को आदेश दिया कि वह अभी तत्काल इटली जाए और मुसोलिनी को छुड़ा कर लाए। कैप्टेन स्कोर्जनी ने ग्लेडियरों की सहायता से अपने सैनिक ठीक उसी पहाड़ी पर उतार दिए जहाँ मुसोलिनी को बंदी बनाया गया था।

जब मुसोलिनी ने इन ग्लेडियरों को पहाड़ी पर उतरते हुए देखा तो उसने सोचा कि मित्र-राष्ट्रों की सेना उसे पकड़ने के लिए आई है किंतु बाद में उसे ज्ञात हुआ कि ये जर्मन सैनिक हैं तथा मुसोलिनी के उद्धार के लिए आए हैं। कैप्टेन स्कोर्जनी मुसोलिनी को एक विमान में बैठाकर उसी समय जर्मनी ले गया। जर्मन सेना ने उसी दिन मुसोलिनी की पत्नी को भी उसके घर से निकाल कर जर्मनी पहुँचा दिया।

नया समझौता

बर्लिन में हिटलर और मुसोलिनी के बीच एक नया समझौता हुआ जिसके अनुसार हिटलर ने इटली में दुबारा मुसोलिनी की फासिस्ट सरकार बनाने का वचन दिया तथा मुसोलिनी ने इटली के कुछ क्षेत्र जर्मनी को देने स्वीकार किए।

मुसोलिनी की वापसी

मुसोलिनी इटली लौट आया। इस बार उसने अपना मुख्यालय गार्गनानो नामक स्थान पर बनाया तथा वहाँ से देश की जनता के नाम से संदेश प्रसारित किया कि इटली में फासिस्ट सरकार का पुनर्गठन कर दिया गया है तथा शासन की बागडोर पुनः मुसोलिनी ने अपने हाथ में ले ली है। इटैलियन और जर्मन अंतिम क्षण तक मित्र-राष्ट्रों के विरुद्ध लड़ते रहेंगे।

मुसोलिनी के आते ही इटली का राजा रोम छोड़कर मित्र-राष्ट्रों की शरण में चला गया। ग्राण्ड कौंसिल की बैठक में मुसोलिनी के विरुद्ध वोट देने वाले समस्त 19 सदस्यों को पकड़कर उन पर मुकदमा चलाया गया। इनमें से 18 लोगों को प्राणदण्ड दिया गया, जिनमें मुसोलिनी का दामाद काउण्ट सियानो भी था। एक व्यक्ति को तीस साल की कैद की गई।

मुसोलिनी की बेटी एडा सियानो ने मुसोलिनी से प्रार्थना की कि वह अपने दामाद को छोड़ दे किंतु मुसोलिनी ने मना कर दिया। एडा हिटलर के पास गई किंतु हिटलर ने कहा कि मैं मुसोलिनी से कुछ नहीं कह सकता। एडा के पास कुछ गुप्त सरकारी कागज थे, उनके बदले में उसने अपने पति को छुड़वाना चाहा किंतु मुसोलिनी ने मना कर दिया।

इसके बाद एडा यूरोप के प्रत्येक उस प्रभावशाली व्यक्ति के पास गई जिसका मुसोलिनी पर प्रभाव था किंतु मुसोलिनी ने सभी को इन्कार कर दिया।

रोम पर मित्र-राष्ट्रों का अधिकार

मुसोलिनी के दोबारा सत्ता में आने के बाद भी फासिस्ट सेनाएं हारती ही चली गईं। इसका मुख्य कारण इटली की वे देशभक्त सेनाएं थीं जो मुसोलिनी को अपना नेता नहीं मानती थीं। उन्होंने ‘राष्ट्रीय मुक्ति सेना’ बना ली थी जो युद्ध में मुसोलिनी का साथ नहीं दे रही थी। 4 जून 1944 को रोम पर मित्र-राष्ट्रों की सेनाओं का अधिकार हो गया।

मुसोलिनी की हत्या

अप्रेल 1945 में मीलान शहर में मुसोलिनी तथा राष्ट्रीय मुक्ति सेना के अधिकारियों के बीच बैठक आयोजित की गई। राष्ट्रीय मुक्ति सेना जर्मनी और हिटलर से सम्बन्ध तोड़ने और युद्ध बंद करने की मांग कर रही थीं किंतु मुसोलिनी इन शर्तों को स्वीकार नहीं कर सकता था। मुसोलिनी बैठक से बाहर निकला तथा एक बंद मोटरगाड़ी में बैठकर अपने कुछ विश्वस्त साथियों एवं जर्मन अंगरक्षकों के साथ कोमो नामक शहर के लिए रवाना हो गया।

मार्ग में क्लारा भी उसे मिल गई। देशभक्त सेनाओं को मुसोलिनी के भागने का पता चल गया। उन्होंने मुसोलिनी के काफिले का पीछा किया तथा उसके बहुत से अंगरक्षकों को गोली मारी दी। अंत में वे लोग डोंगो पहुँचे। यहाँ देशभक्त सैनिकों के दस्ते ने नाकाबंदी करके इस काफिले को रोक लिया तथा प्रत्येक गाड़ी की तलाशी ली और सभी को उतारकर गिरफ्तार कर लिया गया।

अंत में एक जर्मन लॉरी की तालशी ली गई जिसमें ड्राइवर के केबिन की पीछे एक आदमी जर्मन आवेर कोट पहने हुए झपकियां ले रहा था। उसका लौह-टोप आंखों तक आगे की ओर लटका हुआ था जिससे उसका चेहरा ढंका हुआ था। ओवरकोट का कॉलर भी ऊंचा उठा हुआ था तथा आंखों पर काला चश्मा था।

जब जर्मन लोगों से पूछा गया कि यह कौन है तो जर्मन सिपाहियों ने जवाब दिया कि यह हमारा साथी है जो बहुत अधिक शराब पिए हुए है किंतु उनका यह ‘झूठ’ काम नहीं आया। देशभक्त सैनिकों के कर्नल बेलारियो तथा रेंजो नामक एक सैनिक ने मुसोलिनी को पहचान लिया। उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।

 26 अप्रैल 1945 को राष्ट्रीय मुक्ति सेना ने मुसोलिनी एवं उसके साथियों को अमरीकी सेना के हवाले कर दिया। 28 अप्रैल 1945 को मुसोलिनी, उसकी प्रेमिका क्लारा पेटाची और मुसोलिनी के सहयोगियों की हत्या करके उनके शव बेहद भद्दे तरीके से मीलान शहर में ले जाकर चौराहे पर टांग दिए गए।

लोगों ने मुसोलिनी तथा उसके साथियों के चेहरों पर घृणा से थूका तथा उनके चेहरे पर कीचड़ लगाकर अपने क्रोध का प्रदर्शन किया। इसी के साथ इटली में फासीवादी आंदोलन का अंत हो गया। अमरीकी सैनिक मुसोलिनी का मस्तिष्क निकालकर अमरीका ले गए ताकि उसके मस्तिष्क का अध्ययन किया जा सके।

मुसोलिनी के साथ चल रही गाड़ियों से एक अरब लीरा (इटैलिनयन मुद्रा), 66 किलो स्वर्ण, 1 करोड़ 60 लाख फ्रैंक (फ्रैंच सिक्का), 2 लाख स्विस फ्रैंक, ब्रिटिश पौण्ड, भारी मात्रा में अमरीकी डॉलर, स्पेन की मुद्रा, पुर्तगाल का क्यूडो भी प्राप्त हुए। हीरे-जवाहरात की अंगूठियां भी बहुत संख्या में थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इटली में गणराज्य की स्थापना (40)

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इटली में गणराज्य की स्थापना

वर्ष 1946 में इटली में इटली में गणराज्य की स्थापना हुई। यह वह समय था जब द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया में अधिकांश देशों के नक्शे बदल रहे थे और नई सरकारों की स्थापना हो रही थी।

गणतन्त्र शासन की स्थापना

2 जून 1946 को इटली में आम-चुनाव हुए जिनमें देश की जनता ने गणतंत्र शासन की स्थापना के पक्ष में मत दिया। इसके बाद 10 जून 1946 को इटली गणतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित हो गया और इस प्रकार इटली में गणराज्य की स्थापना हो गई।

साम्राज्यिक चिह्नों का अंत

18 जून 1946 को तत्कालीन अस्थायी सरकार ने ‘आर्डर ऑफ द डे’ नामक एक आदेश जारी करके इटली में पहले से चले आ रहे समस्त विधिक तथा शासकीय आदेशों, परिपत्रों आदि में अंकित साम्राज्यपरक संदर्भों तथा अवशेषों को पूर्णतः समाप्त कर दिया। इटली के राष्ट्रध्वज पर अंकित ‘हाउस ऑफ सेवाय की ढाल’ (शील्ड) के चिह्न को भी हटा दिया गया। इस प्रकार इटली में विगत लगभग दो हजार सालों से चले आ रहे राजतंत्र का अंत हो गया।

श्रम पर आधारित जनतांत्रिक गणतंत्र

22 दिसम्बर 1947 को इटली की संविधान सभा ने नया संविधान पारित कर दिया और 1 जनवरी 1948 से इटली में नया संविधान लागू हो गया। इसमें 139 अनुच्छेद तथा 18 संक्रमणकालीन धाराएँ हैं। संविधान में इटली का उल्लेख ‘श्रम पर आधारित जनतांत्रिक गणतंत्र’ के रूप में किया गया है।

इटली की संसद

इटली की संसद के दो अंग हैं- ‘प्रतिनियुक्तों का सदन’ तथा ‘सीनेट’। सदन के सदस्यों का चुनाव प्रति पाँचवें वर्ष वयस्क मताधिकार के माध्यम से प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति द्वारा किया जाता है। ‘डेपुटी’ पद के प्रत्याशी को कम से कम 25 वर्ष का होना चाहिए। उसका निर्वाचन मतदान द्वारा 80,000 व्यक्ति करते हैं।

सीनेट एवं राष्ट्रपति के चुनाव

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सीनेट के सदस्यों का चुनाव छः वर्ष के लिए क्षेत्रीय आधार पर किया जाता है। प्रत्येक क्षेत्र में कम से कम छः सीनेटर चुने जाते हैं और प्रत्येक सीनेटर दो लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है। किंतु ‘वाल दष्ओस्ता’ क्षेत्र से केवल एक ही सीनेटर का निर्वाचन होता है। राष्ट्रपति पाँच ऐसे व्यक्तियों को जीवन भर के लिए सीनेट के सदस्य मनोनीत कर सकता है जो समाज-विज्ञान, कला, साहित्य आदि के क्षेत्र में प्रख्यात एवं जाने माने हों। कार्यकाल समाप्त हो जाने पर इटली का राष्ट्रपति, जीवन भर के लिए सीनेट का सदस्य बन जाता है किंतु वह सदस्यता छोड़ भी सकता है। सदन तथा सीनेट के संयुक्त अधिवेशन में दो-तिहाई बहुमत से राष्ट्रपति का निर्वाचन किया जाता है जिसमें प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद् से तीन-तीन सदस्य मतदान करते हैं (वाल दष्ओस्ता से केवल एक सदस्य मतदान करता है)। तीन बार मतदान के बाद भी यदि राष्ट्रपति पद के किसी भी उम्मीदवार को दो तिहाई मत नहीं मिल पाते तो पूर्ण-बहुमत पानेवाले प्रत्याशी को राष्ट्रपति चुन लिया जाता है। राष्ट्रपति की आयु 50 वर्ष से ऊपर होनी आवश्यक है। उसका कार्यकाल सात वर्ष का होता है। सीनेट का अध्यक्ष राष्ट्रपति के डिप्टी की हैसियत से कार्य करता है। राष्ट्रपति संसद के सदनों का विघटन कर सकता है किन्तु कार्यकाल समाप्ति के पूर्व के छः महीनों में उसे यह अधिकार नहीं रहता।

न्यायालय

इटली में 15 न्यायाधीशों का एक संवैधानिक न्यायालय है जिसके पाँच न्यायाधीशों को राष्ट्रपति, पाँच को संसद् (दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में) तथा पाँच न्यायाधीशों को देश के सर्वोच्च न्यायालय (विधि तथा प्रशासन सम्बन्धी) नियुक्त करते हैं। इटली के संवैधानिक न्यायालय को लगभग वैसे ही अधिकार प्राप्त हैं जैसे अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय को।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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