यूरोप की धरती पर विभिन्न भाषाओं, रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं को मानने वाले लोग रहते थे। ये लोग अपने कबीले को ही अपना देश मानते थे। धीरे-धीरे यूरोप के लोगों ने अपनी कबीलाई पहचाहन को अपने राष्ट्र के रूप में देखना आरम्भ किया। इसी को यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय कहा जाता है।
अठारहवीं सदी में जर्मनी, इटली और स्विट्जरलैंड राजशाहियों, डचों और कैंटनों में बँटे हुए थे, जिनके बीच-बीच में कुछ स्वायत्त क्षेत्र भी स्थित थे। इसी प्रकार पूर्वी और मध्य यूरोप के क्षेत्र निरंकुश राजतन्त्रों के अधीन थे और इन क्षेत्रों में तरह-तरह के लोग रहते थे जो प्राचीन काल में किसी न किसी कबीले से सम्बद्ध थे।
इस कारण वे एक बड़े देश के रूप में अपनी सामूहिक पहचान को नहीं देख पाते थे तथा एक दूसरे की संस्कृति को अस्वीकार्य दृष्टि से देखते थे। इन समूहों को आपस में बाँधने वाला तत्व, केवल सम्राट के प्रति उनकी निष्ठा थी। 18वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में नेपोलियन बोनापार्ट के आक्रमणों ने यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया। इटली, पोलैण्ड, जर्मनी और स्पेन में नेपोलियन ने ही ‘नवयुग’ का संदेश पहुँचाया।
नेपोलियन के आक्रमण से इटली और जर्मनी में एक नया अध्याय आरम्भ हुआ। 19वीं शताब्दी में यूरोप में राष्ट्रवाद (Nationalism) की लहर चली जिसने बहुत से यूरोपीय देशों का कायाकल्प कर दिया। इस लहर ने जर्मनी, इटली, रोमानिया, यूनान, पोलैण्ड, बल्गारिया आदि देशों का निर्माण एवं एकीकरण किया। बहुत से देशों ने राष्ट्रवाद की भावना से उद्वेलित होकर स्वाधीनता संग्राम लड़े तथा अपने देशों को उपनिवेशवाद के दैत्य से मुक्ति दिलवाई।
इटली में राष्ट्रवाद का उदय
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यूरोप में तेजी से पनप रहे राष्ट्रवाद के दौर में इटली में भी राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार हुआ। इटलीवासियों ने भी जातीय समूहों एवं कबीलों की पहचान से ऊपर उठकर सम्पूर्ण देश में एकता की आवश्यकता को अनुभव किया और उन्होंने इटली के छोटे-छोटे राज्यों को जोड़कर एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने का निश्चय किया। उन्हें रोम के प्राचीन गौरव का इतिहास ज्ञात था। विद्या, कला और विज्ञान के क्षेत्र में वह प्राचीन काल में संसार का नेतृत्व करता था। अतः वे एक बार फिर से इटली को एक देश के रूप में गठित करके उसे पुनः संसार में गौरवशाली स्थान दिलाने का स्वप्न देखने लगे। इस कारण अनेक विफलताओं के उपरांत भी यह आंदोलन तब तक चलता रहा जब तक कि इटली के एकीकरण का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया गया। इस आंदोलन का इतिहास बहुत लम्बा है। इटली के एकीकरण को इतालवी भाषा में ‘रिसोरजिमेंटो’ अर्थात् ‘पुनरुत्थान’ कहा जाता है। यह 19वीं सदी में इटली में घटित एक राजनैतिक और सामाजिक अभियान था जिसने इतालवी प्रायद्वीप के विभिन्न राज्यों को संगठित करके एक राष्ट्र बना दिया। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया ई.1814 से लेकर ई.1870 तक चली।
इटली में राष्ट्रवाद की चिन्गारी को दावानल में बदलने का काम उन यूरोपीय दैत्यों द्वारा आयोजित वियेना कांग्रेस के बाद आरम्भ हुआ जो स्वयं को महाशक्ति कहने का दंभ भरते थे।
राष्ट्रीयता के प्रसार में कवियों एवं लेखकों का योगदान
इटली में राष्ट्रीय भावनाओं के उदय में इटली के कवियों एवं लेखकों का बहुत बड़ा योगदान था किंतु इटली से बाहर के साहित्यकारों की इटली में उपस्थिति भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं थी।
अंग्रेज कवि कीट्स की रोम में मृत्यु
यूरोपीय साहित्यकारों एवं अंग्रेज कवियों को रोम इतना प्रिय लगता था कि उन्नीसवीं सदी के तीन बड़े अंग्रेज कवियों- शेली, कीट्स एवं बायरन में से एक कीट्स अपना देश छोड़कर रोम आ गया और यहीं निर्धनता एवं अभावों में जीवन बिताता हुआ कविताएं लिखता रहा। ई.1821 में केवल 26 वर्ष की आयु में रोम में कीट्स की मृत्यु हुई। तब कीट्स को दुनिया में कोई नहीं जानता था, रोम भी नहीं। कीट्स की मृत्यु के बाद उसके साहित्य को विश्वव्यापी ख्याति प्राप्त हुई और वह आज भी दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है।
अंग्रेज कवि शेली की इटली के समुद्री तट पर मृत्यु
आज विश्व की शायद ही ऐसी कोई यूनिवर्सिटी होगी जिसमें अंग्रेजी साहित्य के विद्यार्थियों को अंग्रेज कवि ‘शेली’ न पढ़ाया जाता हो। शेली ने ‘गुलामी’ पर एक लम्बी कविता लिखी जिसका आशय इस प्रकार था-
स्वतंत्रता क्या है?
यह तो तुम खूब बता सकते हो,
है क्या चीज गुलामी,
नाम तुम्हारे का ही गुंजन।
यही गुलामी है-
कि काम तुम करते रहो मजदूरी लेकर,
केवल उतनी ही बस जिससे
अटके रहें तुम्हारे तन में प्राण तुम्हारे,
काल कोठरी के बंदी की भांति
परिश्रम अत्याचारी के हित करने।
बन जाओ तुम करघे, हल, तलवार, फावड़े उनके
और जुट जाओ उनकी रक्षा में, उनके पोषण में,
बिना विचारे इच्छा है या नहीं तुम्हारी।
यही गुलामी है-
कि तुम्हारे बच्चे भूखों मरें,
और उनकी माताएं सूख-सूख कर कांटा हो जावें-
जाड़े की चली हवाएं ठण्डी
जिनसे मरने लगे दीन बेचारे।
तुम्हें तरसते रहना है उस भोजन को,
जिसको धनवाला, मतवाला हो,
फैंक रहा अपने मोटे कुत्तों के आगे,
जो उसकी आंखों के नीचे।
छककर मस्त पड़े हैं सोते।
यही गुलामी है-
जिसमें बनना है तुमको दास आत्मा से भी,
जिससे रहे न तुमको काबू अपनी इच्छाओं पर,
और बनो तुम वैसे, जैसा लोग दूसरे तुम्हें बनावें।
और अंत में जब तुम करने लगो शिकायत,
धीरे-धीरे वृथा रुदन कर,
तब अत्याचारी के नौकर
तुमको और तुम्हारी पत्नियों को घोड़ों के तले कुचल कर,
ओस कणों की भांति लहू की बूंदें देते बिछा घास पर।
शेली ने ‘नास्तिकता की आवश्यकता’ शीर्षक से एक अंग्रेजी कविता लिखी। इस कविता के कारण इंग्लैण्ड के अंग्रेज उससे इतने नाराज हो गए कि शेली को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया। वह अपना देश छोड़कर इटली आ गया। कीट्स की मृत्यु के लगभग एक वर्ष बाद ई.1822 में इटली के समुद्री तट पर डूब जाने से शेली की मृत्यु हुई।
कीट्स एवं शेली दोनों इंग्लैण्ड छोड़कर इटली आए और दोनों ने निर्धनता का जीवन व्यतीत करते हुए सामाजिक व्यवस्था से विद्रोह करते हुए कविताओं की रचना की, इन दोनों घटनाओं से उन्नीसवीं सदी में रोम की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक दुर्दशा का स्वतः ही पता चल जाता है।
जिस प्रकार पवित्र रोमन साम्राज्य प्रथम का अन्त हुआ था, उसी प्रकार पवित्र रोमन साम्राज्य द्वितीय का अन्त भी बड़ा दुखद था। मुसलमानों के छोटे से धक्के से वह ताश के पत्तों की तरह बिखर गया।
नेपालियन का विजय अभियान
अठारहवीं शताब्दी के अंत में इटली में छोटे-छोटे राजा राज्य किया करते थे। इनमें से बहुत से राजा ऑस्ट्रिया के राजा के अधीन थे। उन्हीं दिनों फ्रांस तथा ऑस्ट्रिया के बीच यूरोप में वर्चस्व स्थापित करने के लिए दीर्घकालीन युद्ध हुआ। उस समय नेपोलियन बोनापार्ट फ्रैंच सेना में सैन्य अधिकारी हुआ करता था।
वह पूरी दुनिया को अपने अधीन करने के सपने देखता था जिस प्रकार कभी मैसीडोनिया के राजा सिकंदर ने देखा था। अपनी जिंदगी के शुरुआती दौर में जब वह केवल 27 साल का था तब उसने कहा था- ‘महान् साम्राज्य और जबर्दस्त परिवर्तन केवल पूर्व में ही हुए हैं, उस पूर्व में जहाँ साठ करोड़ लोग बसते हैं। यूरोप तो एक छोटी सी टेकरी है।’
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ई.1796 में 27 वर्ष की आयु में नेपोलियन को ‘फ्रेंच आर्मी ऑफ इटली’ का सेनापति बनकर इटली में स्थित सार्डीनिया राज्य पर विजय प्राप्त करने के लिए भेजा गया जहाँ फ्रांस की सेनाएं ऑस्ट्रिया की सेनाओं से लड़ रही थीं तथा हारती जा रही थीं। नेपोलियन ने इटली पर आक्रमण करने से पहले सार्वजनिक घोषणा की कि- ‘फ्रेंच सेना इटली को ऑस्ट्रिया की दासता से मुक्त कराने आ गयी है।’ विभिन्न स्थान पर हुए युद्धों में नेपोलियन ने ऑस्ट्रिया के 14 हजार सिपाहियों को मार डाला। नेपोलियन ने स्वयं ने भी 5 हजार सिपाही खोए किंतु उसने पहले तीन स्थानों पर शत्रु को परास्त कर ऑस्ट्रिया का पीडमॉण्ट से सम्बन्ध तोड़ दिया। इसके बाद उसने सार्डीनिया को युद्ध-विराम करने के लिए विवश कर दिया। नेपोलियन ने लोडी के युद्ध में इटली के मीलान राज्य को भी जीत लिया। रिवोली के युद्ध में मैंटुआ को समर्पण करना पड़ा। आर्कड्यूक चार्ल्स को भी संधिपत्र प्रस्तुत करना पड़ा और ल्यूबन का समझौता हुआ। इन सारे युद्धों और वार्ताओं में नेपोलियन ने पेरिस से किसी प्रकार का आदेश नहीं लिया। नेपोलियन ने लोंबार्डी नामक राज्य को सिसालपाइन नामक गणराज्य में तथा जिनोआ को लाइग्यूरियन नामक गणतंत्र में परिवर्तित कर दिया तथा इन दोनों स्थानों पर उसने फ्रेंच विधान पर आधारित एक नया विधान लागू किया।
नेपोलियन की इन सफलताओं से ऑस्ट्रिया की सेनाओं के इटली से पैर उखड़ गए तथा ऑस्ट्रिया को बेललियम प्रदेशों, राइन के सीमांत क्षेत्रों तथा लोंबार्डी के क्षेत्र छोड़ने पड़े। एक तरह से समूचा इटली ऑस्ट्रिया के हाथों से निकल गया।
पवित्र रोमन साम्राज्य द्वितीय का अन्त
इटालियन अभियान से वापस अपने देश फ्रांस लौटने पर, नेपोलियन का भव्य स्वागत हुआ। नेपोलियन का अगला विजय अभियान ऑस्ट्रिया पर आक्रमण करके वहाँ के सम्राट को केंपोफोरमियो की अपमानजनक संधि के लिए बाध्य करना था।
इस समय ऑस्ट्रिया का राजा फ्रांसिस (द्वितीय) पवित्र रोमन साम्राज्य का सम्राट था। उसे 18 अक्टूबर 1797 को नेपोलियन बोनापार्ट के सम्मुख कैंपो फौर्मियो ;ब्ंउचव थ्वतउपवद्ध की संधि के लिए प्रस्तुत होना पड़ा। इसी के साथ उससे पवित्र रोमन साम्राज्य के सम्राट की पदवी छीन ली गई और पवित्र रोमन साम्राज्य के द्वितीय संस्करण का औपचारिक एवं विधिवत् अंत हो गया जो ई.962 से किसी तरह घिसटता आ रहा था।
अब न तो पवित्र रोमन सम्राट रहा था और न रोम, सिसली, सार्डीनिया एवं मीलान उसके अधीन रहे थे। ऑस्ट्रियाई सम्राट का गर्व-भंजन करने के बाद नेपोलियन बोनापार्ट का ध्यान रोम तथा उसके पोप की तरफ गया।
पोप एवं नेपोलियन में टोलेन्टिन्ड की सन्धि
ई.1796 में नेपोलियन बोनापार्ट ने रोम पर आक्रमण किया। उसकी सेनाओं ने पापल ट्रूप्स को आसानी से परास्त कर दिया तथा एन्कोना एवं लोरेटो पर अधिकार कर लिया। पोप पायस (षष्ठम्) ने नेपोलियन से शांति की अपील की। इसके बाद 19 फरवरी 1979 को टोलेण्टिनो की संधि हुई किंतु यह संधि कुछ ही दिन चल पाई।
28 दिसम्बर 1997 को रोम में एक उपद्रव हुआ जिसमें फ्रैंच ब्रिगेडियर जनरल मथुरियन-लियोनार्ड डूफोट और फ्रैंच दूत जोसेफ बोनापार्ट को मार दिया गया। पापल सेनाओं ने इस उपद्रव का आरोप कुछ इटेलियन एवं फ्रैंच आंदोलनकारियों पर लगाया। इस पर फ्रैंच जनरल बरथियर ने रोम पर दुबारा आक्रमण किया। रोम की सेनाएं फिर से परास्त हो गईं।
मैं तुम्हारा स्वामी
10 फरवरी 1798 को फ्रैंच सेनाएं रोम में प्रवेश कर गईं। नेपोलिनयन ने रोम में अपने भव्य-स्वागत की तैयारियां करवाईं तथा एक महानायक के रूप में रोम में प्रवेश किया। स्वागत का मुख्य आयोजन आर्क-बिशप के महल में किया गया।
इस समारोह में रोम के लोगों को सम्बोधित करते हुए नेपोलियन ने कहा- ‘मैं तुम्हारा स्वामी हूँ किंतु मेरा कार्य तुम्हारी सुरक्षा करना होगा। पाँच सौ तोपें एवं फ्रांस से मित्रता, बस यही मैं आपसे चाहता हूँ। आप स्वयं को फ्रांस की अपेक्षा अधिक सुरक्षित एवं स्वतंत्र अनुभव करेंगे। 50 लाख की जनसंख्या वाला यह राज्य एक नया गणतंत्र बनेगा तथा मीलान इसकी राजधानी होगी। आपको पाँच सौ तोपें रखने की अनुमति दी जाती है।
साथ ही आपको फ्रांस को मित्र-राष्ट्र बनाना होगा। मैं आप में से 50 व्यक्तियों का चुनाव करूंगा जो फ्रांस के नाम पर देश का संचालन करेंगे। अपने रीति-रिवाजों में ढालकर आपको हमारे कानून स्वीकार करने होंगे। परस्पर एकता बनाए रखने पर सब-कुछ व्यवस्थित चलेगा। यदि हैब्सबर्ग पुनः लोम्बार्डी को जीत लेता है तो भी मैं आपको विशेष सुरक्षा का वचन देता हूँ।
आपको कभी भी निर्वासित नहीं किया जाएगा। आपकी भूमि भी कोई नहीं छीन सकेगा। मेरे जीवित न रहने पर ही कुछ अवांछित हो सकता है। आप जानते हैं कि एथेंस बेसपार्टा भी सदा के लिए अपना अस्तित्व बनाए नहीं रख सके। मुझ पर भरोसा रखकर देश में एकता बनाए रखें। मेरा यही आप सबसे निवेदन है।’
रोम में गणतंत्र की स्थापना तथा पोप की गिरफ्तारी
नेपालियन द्वारा रोम में एक गणतंत्र की स्थापना कर दी गई। पोप के सारे राज्याधिकार समाप्त कर दिए गए तथा पोप से कहा गया कि वह अपने समस्त धार्मिक अधिकारों का भी त्याग कर दे। पोप ने फ्रैंच सेनाओं के आदेश मानने से मना कर दिया।
इस पर पोप पायस (षष्ठम्) को बंदी बना लिया गया। 20 फरवरी 1798 को उसे वेटिकन से सियेना ले जाया गया। वहाँ से उसे सेरटोसा तथा कुछ दिन बाद फ्लोरेंस ले जाया गया। पोप को टस्कनी, परमा, पियासेंजा, त्यूरिन तथा ग्रेनोबल होते हुए वालेन्स के सिटेडल में ले जाया गया।
वालेन्स पहुँचने के लगभग डेढ़ माह बाद 29 अगस्त 1799 को पोप की बंदी अवस्था में ही मृत्यु हो गई। वह रोम के चर्च के तब तक के इतिहास में सर्वाधिक अवधि तक पोप रहा। पोप का शरीर वालेंस के दुर्ग में खराब होता रहा किंतु उसे 30 जनवरी 1800 से पहले दफनाया नहीं गया। इसके बाद नेपोलियन ने हिसाब लगाया कि पोप के शरीर को इसी स्थान पर दफना देना ठीक है ताकि कैथोलिक चर्च का कार्यालय रोम से फ्रांस स्थानांतरित किया जा सके।
पाठकों को स्मरण होगा कि पहले भी कुछ समय के लिए पोप का कार्यालय फ्रांस में रहा था। पोप के साथी बिशपों ने नेपोलियन से कहा कि वे पोप को उसकी अंतिम इच्छा के अुनसार रोम में दफनाने की अनुमति दें किंतु नेपोलियन ने यह प्रार्थना स्वीकार नहीं की।
बाद में 24 दिसम्बर 1801 को पोप के कॉफीन को वालेंस की कब्र से निकालकर रोम ले जाया गया तथा 19 फरवरी 1802 को पोप पायस (सप्तम्) ने स्वर्गीय पोप पायस (षष्ठम्) की देह का कैथोलिक विधि से अंतिम संस्कार करवाया।
नए पोप से नई संधि
इस काल में रोम एवं फ्रांस की बहुसंख्यक जनता कैथोलिक चर्च के प्रभाव में थी। नेपोलियन ने चर्च की शक्ति को कमजोर करके उसे राज्य के अधीन किया। चर्च की सम्पति का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और पादरियों को राज्य के प्रति निष्ठा रखने की शपथ लेने को कहा गया। इससे पोप नाराज हुआ और उसने आम जनता को विरोध करने के लिए उकसाया। फलतः सरकार और आमजनता के बीच तनाव पैदा हो गया। नेपोलियन ने इसे दूर करने के लिए ई.1801 में पोप पायस (सप्तम्) के साथ समझौता किया जिसे कॉनकारडेट (Concordate) कहा जाता है। इसके प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे-
1. कैथलिक धर्म को राजकीय धर्म के रूप में स्वीकार किया गया।
2. बिशपों की नियुक्ति प्रथम काउंसलर द्वारा होगी परन्तु वे पोप द्वारा दीक्षित किए जाएंगे।
3. बिशप शासन की स्वीकृति पर ही छोटे पादरियों की नियुक्ति करेंगे।
4. चर्च के समस्त अधिकारियों को राज्य के प्रति निष्ठा की शपथ लेना अनिवार्य होगा। इस तरह चर्च राज्य का अंग बन गया और उसके अधिकारी राज्य से वेतन पाने लगे।
5. गिरफ्तार किए गए समस्त पादरी छोड़ दिए गए और देश से भागे पादरियों को वापस आने की अनुमति दी गई।
6. चर्च की जब्त संपत्ति एवं भूमि से पोप ने अपना अधिकार त्याग दिया।
7. युद्ध-काल के कैलेण्डर को स्थगित कर दिया गया तथा प्राचीन कैलेण्डर एवं अवकाश दिवसों को पुनः लागू कर दिया गया।
इस प्रकार नेपोलियन ने राजनीतिक उद्देश्यों के पूर्ति के लिए पोप से संधि की और युद्ध कालीन अव्यवस्था को समाप्त करके चर्च को राज्य का सहयोगी एवं सहभागी बनाया। प्रकारांतर से नेपोलियन ने चर्च के युद्ध-कालीन घावों पर मरहम लगाने का प्रयास किया। उसने पोप को उसके पद पर बने रहने दिया किंतु उसके अधिकार सीमित कर दिए। अब पोप ‘पापल स्टेट’ का राजा भी नहीं रहा।
लोम्बार्डियों के लौह-मुकुट का स्वामी
26 मई 1805 को नेपोलियन बोनापार्ट ने मीलान के गिरजाघर में इटली के लोंबार्ड नरेशों का लौहमुकुट धारण किया। इसके साथ ही नेपोलियन ने रोम अथवा यूरोप के किसी भी भाग में किसी भी प्रकार के रोमन साम्राज्य के अस्तित्व में होने के भ्रम को सदा के लिए ध्वस्त कर दिया। जब नेपोलियन ने रोमन साम्राज्य का अंत किया तो संसार में किसी ने भी इस घटना पर ध्यान नहीं दिया।
फिर भी इंग्लैण्ड, रूस, जर्मनी और अन्य देशों के राजा एम्परर, सीजर, कैसर और जार की उपाधियां धारण करते रहे जो प्राचीन रोमन साम्राज्य की अंतिम निशानियां थीं। यहाँ तक कि ई.1877 में इंग्लैण्ड की रानी विक्टोरिया ने ‘कैसर-ए-हिन्द’ की उपाधि धारण करके अपने प्रभुत्व का उद्घोष किया जिसका शाब्दिक अर्थ भारत-साम्राज्ञी माना गया। प्रथम विश्व युद्ध के अंत के बाद संसार से सीजर, कैसर एवं जार जैसे शब्दों की सदा के लिए विदाई हो गई।
पोप को पुनः बंदी बनाया गया
नेपोलियन का पोप के साथ किया गया यह समझौता अस्थायी सिद्ध हुआ। इस कारण ई.1807 में नेपोलियन को पुनः पोप के साथ संघर्ष करना पड़ा। अप्रैल 1808 में रोम पुनः नेपोलियन के अधिकार में चला गया। ई.1809 में पोप को बंदी बना लिया गया। इससे रोम ही नहीं अपितु पूरे यूरोप के कैथोलिक मतावलम्बियों को यह विश्वास हो गया कि नेपोलियन न केवल राज्यों की स्वतंत्रता नष्ट करने वाला दानव है अपितु उनके धर्म को भी नष्ट करने वाला है।
इसलिए यूरोप में नेपोलियन के प्रति सहानुभूति समाप्त हो गई। कैथोलिक चिंता का एक कारण यह भी था कि फ्रैंच-सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा लागू की गई नेपोलियन संहिता में कैथोलिक धर्म को राजधर्म तो स्वीकार किया गया था किंतु सभी धर्मों को बराबरी का अधिकार दिया गया था। कैथोलिक चर्च इस व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
नेपोलियन का अंत
नेपोलियन ने एक बार कहा था कि– ‘सत्ता मेरी रखैल है। इसे वश में करने के लिए मुझे इतनी दिक्कत उठानी पड़ी है कि मैं न तो उसे किसी और को छीनने दूंगा और न अपने साथ भोगने दूंगा।’
संभवतः नेपोलियन कुछ अंशों में सही था कि सत्ता उसकी रखैल थी किंतु उसकी यह बात गलत थी कि मैं किसी और को उसे छीनने नहीं दूंगा। रखैल नामक प्राणी न तो किसी पुरुष के पास सदैव रहता है और न किसी पुरुष के जीवन में सुख का अंश बाकी छोड़ता है। जिस किसी के जीवन में रखैल नामक प्राणी का प्रवेश होता है, उसके सुख बहुत ही कम समय में उसका साथ छोड़ देते हैं और वह पुरुष सर्वनाश की ओर बढ़ जाता है।
नेपोलियन के साथ भी यही हुआ। उसके सर्वनाश का समय निकट आ गया था। वैसे भी उस काल के यूरोप में पोप तथा चर्च जिस राजा के शत्रु हो जाएं, वह राजा अधिक समय तक अपने सिंहासन पर नहीं टिक पाता था, नेपोलियन बोनापार्ट भी नहीं टिक सका। जून 1815 में वाटरलू की लड़ाई में फ्रैंच सेनाएं परास्त हो गईं तथा अंग्रेजों ने नेपोलियन को बंदी बना कर एटलांटिक सागर के बीच स्थित सेंट हेलेना द्वीप पर भेज दिया जहाँ फरवरी 1821 में उसकी मृत्यु हो गई।
नेपोलियन द्वारा किए गए के युद्धों के दौरान इटली में बहुत से छोटे-छोटे राज्य समाप्त हो गए थे। इन राज्यों की जनता ने एक बड़ी शासन व्यवस्था के नीचे आकर स्वयं को वृहत्तर परिवेश में पाया तथा उन्होंने राष्ट्रीयता का अनुभव किया। इस कारण इटली में एक राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा हुआ जो इटली के इतिहास में रीसॉर्जीमेंटो (Risorgimento) कहलाता है।
विभिन्न समुद्री द्वीपों और कबीलाई संस्कृतियों से बने इटली का एकीकरण एक कठिन प्रक्रिया थी। छोटे-छोटे इलाकों के राजा अपने अधिकारों को छोड़कर किसी एक बड़े देश में शामिल होने को तैयार नहीं थे।इटली का एकीकरण रीसॉर्जीमेंटो कहलाता है।
वियना कांग्रेस में इटली का बंटवारा
नेपोलियन बोनापार्ट को बंदी बनाए जाने के बाद सितंबर 1814 से जून 1815 तक ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में एक सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसे विश्व इतिहास में वियना कांग्रेस कहा जाता है। यह यूरोपीय देशों के राजनेताओं का एक सम्मेलन था।
इसकी अध्यक्षता ऑस्ट्रियाई राजनेता मेटरनिख ने की। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी क्रांतिकारी युद्ध, नेपोलियन युद्ध और पवित्र रोमन साम्राज्य के विघटन से उत्पन्न समस्याओं को सुलझाना था किंतु इस सम्मेलन में फ्रांस, ऑस्ट्रिया तथा इंग्लैण्ड के साम्राज्यवादी नेताओं ने इटली की समस्याओं को सुलझाने की बजाय भयानक रूप से बढ़ा दिया।
विजेता राष्ट्रों ने इटली एवं पूर्वी यूरोप के कई देशों को आपस में बांट लिया। ऑस्ट्रिया ने वेनिस (वेनेशिया) एवं उसके आसपास का बड़ा इलाका ले लिया। ऑस्ट्रिया के राजा को कई अच्छे क्षेत्र दे दिए गए। नेपल्स एवं दक्षिण इटली को मिलाकर दोनों सिसलियों का एक राज्य बना दिया गया और इसे बोर्बन राजा के अधीन कर दिया गया। फ्रांस की सीमा के निकट उत्तर-पश्चिम में पीडमॉण्ट और सार्डीनिया का राजा था।
पोप की वापसी
भले ही यूरोप के अनेक राजा पोप की सत्ता से छुटकारा पाने के प्रयास करते रहे थे किंतु वे मन से यह कभी नहीं चाहते थे कि रोम का पोप सदैव के लिए समाप्त या विलुप्त हो जाए। विएना समझौते के बाद हुए बंटवारे में पोप को उसका ‘पापल राज्य’ फिर से लौटा दिया गया जो नेपोलियन बोनापार्ट ने समाप्त कर दिया था। इस प्रकार रोम एवं उसके आसपास के क्षेत्रों पर पोप का शासन फिर से स्थापित हो गया।
इटली केवल भौगोलिक अभिव्यक्ति बन गया
वियना कांग्रेस के बाद मेटरनिख ने कहा- ‘इटली वस्तुतः केवल एक भौगोलिक अभिव्यक्ति बन कर रहा गया।’ अब इटली का राजनीतिक मानचित्र इस प्रकार था-
(1) उत्तरी इटली में लोम्बार्डी और वेनेशिया के प्रदेश, ऑस्ट्रिया के अधीन हो गए।
(2) मध्य-इटली में पोप का शासन हो गया।
(3) दक्षिण-इटली में नेपल्स और सिसली के राज्य पर बूर्बो-वंश का राज्य हो गया।
(4) फ्रांस की सीमा के निकट उत्तर-पश्चिम में पीडमॉण्ट और सार्डीनिया का सम्राट था।
इस प्रकार विएना कांग्रेस ने इटली को चार बड़े भागों में बाँट दिया, उनके भीतर भी अगल-अलग राज्य थे तथा उनके अलग-अलग शासक थे। पीडमॉण्ट के राजा को छोड़कर शेष छोटे-बड़े राजाओं ने बड़े निरंकुश ढंग से शासन किया तथा जनता का बहुत शोषण किया। इटली की जनता को राजाओं ने पहले कभी इतना दुःख नहीं दिया था। इस कारण देश की जनता में इन राजाओं के विरुद्ध असंतोष भड़कने लगा।
राष्ट्रवादी इटलीवासियों की समस्याएं
यूरोप में चल रही राष्ट्रवाद की आंधी से प्रेरित होकर इटली के जन-साधारण ने संपूर्ण इटली को एक राष्ट्र बनाने के लिए आंदोलन चलाने का निर्णय लिया। इसमें अनेक बाधाएँ थीं, जिन्हें दूर करना आवश्यक था। इटली के देशभक्तों के ससक्ष तीन प्रमुख समस्याएँ थीं-
(1) इटली के वे प्रदेश जो ऑस्ट्रिया के प्रभाव में थे, उन्हें मुक्त कराना।
(2) देश के शासन को लोकतंत्रवाद के अनुकूल बनाना।
(3) इटली में राष्ट्रीय-एकता की स्थापना करना।
गुप्त-समितियों का गठन
इटली की स्वतंत्रता एवं उसके एकीकरण हेतु आंदोलन का आरम्भ देशभक्त लोगों द्वारा गुप्त-समितियों के गठन से हुआ जिनमें कार्बानेरी नामक समिति सबसे-प्रसिद्ध थी। लगभग सम्पूर्ण इटली में इसका जाल बिछाया गया। इसके नेतृत्व में इटली में अनेक विद्रोह हुए, जिन्हें मेटरनिख द्वारा कुचल दिया गया। अतः लोगों का यह विश्वास दृढ़ हो गया कि जब तक इटली से ऑस्ट्रिया का प्रभाव समाप्त नहीं होगा तब तक इटली की एकता के प्रयास सफल नहीं होंगे।
मैजिनी का उदय
ज्यूसेपे मैजिनी का जन्म 22 जून 1805 को जिनेवा में हुआ था। वह फ्रांस की क्रान्ति से अत्यंत प्रभावित था। पढ़ाई पूरी करके वह कार्बानेरी नामक गुप्त संस्था का सदस्य बन गया। मेजिनी का मानना था कि ‘नये विचार तभी पनपते हैं जब उसे शहीदों के रक्त से सींचा जाता है।’
वह देश की तत्कालीन व्यवस्था से दुःखी था और उसमें सुधार लाने का उपाय सोचता था। उसने देश की जनता को संबोधित करते हुए कहा- ‘हमारी प्रतिष्ठा और उन्नति अवरुद्ध है। हमारी शानदार प्राचीन परम्परा रही है परन्तु वर्तमान में हमारा कोई राष्ट्रीय अस्तित्व नहीं है। इसके लिए ऑस्ट्रिया जिम्मेदार है। उसके विरुद्ध संगठित होकर उसका सामना करने की आवश्यकता है।’
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ई.1830 में मेजिनी को जनता में असंतोष भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। वह लगभग एक वर्ष तक सेनोना की जेल में कैद रहा। जेल से मुक्ति के बाद उसने ई.1831 में मार्सेई में, निर्वासित इटालियन देशभक्तों की ‘जिओवेन इटालिया (जवान इटालिया)‘ नामक गुप्त समिति का गठन किया। मैजिनी ने इस संगठन के प्रसार के लिए कई वर्षों तक कठोर परिश्रम किया। इसकी सदस्य संख्या में निरंतर वृद्धि होती गयी। ई.1833 में इस गुप्त समिति के सदस्यों की संख्या 60 हजार हो गयी। मेजिनी अच्छा साहित्यकार था। उसकी कई रचनाएं इटली के लोगों में राष्ट्रवादी भावनाएं संचारित करने में सफल हुईं। इस दौरान उसे देश-निकाले में भी रहना पड़ा और कई बार उसके प्राणों पर संकट आया। ज्यूसेपे मेजिनी को ‘इटली का स्पन्दित हृदय’ कहा जाता है। महान् भारतीय क्रांतिकारी एवं भारतीय क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक वीर सावरकर, मेजिनी को अपना आदर्श नायक मानते थे। लाला लाजपत राय मेजिनी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। उन्होंने मेजिनी की प्रसिद्ध रचना ‘द ड्यूटी ऑफ मैन’ का उर्दू में अनुवाद किया। मेजिनी को इटली के राष्ट्रीय-एकीकरण के स्वप्न को साकार रूप देने का श्रेय है।
मेजिनी अपने विचारों से इटली की जनता को राष्ट्रीय-एकीकरण के लिए निरंतर प्रोत्साहित करता रहा और उनमें देशप्रेम तथा बलिदान की भावना उत्पन्न करता रहा। वह स्वतंत्रता के साथ-साथ गणतंत्र का भी समर्थक था। इस प्रकार वह इटली के स्वाधीनता संघर्ष का अग्रदूत बन गया। ई.1848 में ऑस्ट्रियाई चांसलर मेटरनिख का पतन हो गया। इससे इटली के देशभक्तों के उत्साह में वृद्धि हुई।
यूरोप के देशों में बलवे
ई.1848 का साल यूरोप में क्रांतियों का साल कहलाता है। इस साल यूरोप के कई देशों में दंगे हुए किंतु अधिकांश देशों में वे दबा दिए गए। पौलेण्ड, इटली, बोहेमिया और हंगरी के दंगों की पृष्ठभूमि में वहाँ के शासकों द्वारा बलपूर्वक दबाई गई राष्ट्रीयता थी। उत्तरी इटली में ऑस्ट्रिया के विरुद्ध विद्रोह किया गया।
पोप का रोम से निष्कासन
ई.1848 में इटली में भी कई स्थानों पर विद्रोह की आग भड़क गई। मैजिनी इस अवसर का लाभ उठाने के लिए रोम आ गया। उसने पोप को रोम से बाहर निकाल दिया और रोम में एक गणराज्य की स्थापना की। इस गणराज्य के शासन के लिए उसने तीन सदस्यों की एक समिति बनाई। इस समिति को प्राचीन रोमन साम्राज्य की समिति की तर्ज पर ‘त्रियमवीर‘ कहा गया। इस समिति में मैजिनी स्वयं भी सम्मिलित था।
यूरोपीय राजाओं में बेचैनी
पोप का रोम से बाहर निकाला जाना एवं इटली में गणतंत्र का स्थापित होना यूरोप के विभिन्न देशों के राजाओं के लिए अत्यंत चिंताजनक था। वे सदियों से अपने देश की जनता को धर्म का भय दिखाकर राजा को ईश्वरीय प्रतिनिधि सिद्ध करते थे और अपने अस्तित्व को बनाए रहते थे। इन देशों के राजाओं की चिंता यह थी कि जब रोम में पोप ही नहीं रहेगा तब राजा लोग, धर्म को अपराजेय एवं स्वयं को धर्म के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित कैसे रख सकेंगे!
संसार की समस्त शासन व्यवस्थाओं में अब तक धर्म ही उस रज्जु का काम करती आई थी जिससे बंधी हुई जनता को शासन के दण्ड से जिधर चाहे हांका जा सकता है।
उस काल की यूरोपीय राज्य-व्यवस्था को देखने से ऐसा लगता है मानो धर्म राजा पर शासन कर रहा था किंतु भीतरी सच्चाई यह थी कि धर्म, राज्य को बनाए रखने के लिए बांदी की भूमिका निभा रहा था और राजा लोग इस दासी को अपने हाथ से नहीं निकलने दे सकते थे। यही कारण है कि गणतंत्र प्रायः धर्म की उपेक्षा करता है और राजतंत्र धर्म को पकड़ कर रखता है।
इटली के नवीन गणराज्य पर ऑस्ट्रिया, नेपल्स एवं फ्रांस की सेनाओं ने आक्रमण किए। ये लोग रोम से गणराज्य समाप्त करके फिर से पोप का शासन स्थापित करना चाहते थे। रोम गणराज्य की रक्षा के लिए गैरीबाल्डी नामक एक युवक आगे आया। उसकी सहायता के लिए रोम के सैंकड़ों देशभक्त युवक स्वेच्छा से आगे आए।
उन स्वयं-सेवकों ने गैरीबाल्डी के नेतृत्व में ऑस्ट्रिया, नेपल्स एवं फ्रांस की सेनाओं को कुछ समय के लिए रोम की तरफ बढ़ने से रोक दिया किंतु वे अधिक समय तक तीन देशों की सेनाओं का एक साथ सामनानहीं कर सके और गैरीबाल्डी को इटली छोड़ अमरीका भाग जाना पड़ा।
पोप की वापसी
ऑस्ट्रिया, नेपल्स एवं फ्रांस की सेनाओं से अलग-अलग मोर्चों पर लड़ते हुए इटली के बहुत से युवकों की जानें गईं किंतु अंततः रोम गणराज्य फ्रांसीसियों से हार गया और फ्रांस ने फिर से पोप को रोम का राजा बना दिया। इस पर भी मैजिनी और गैरीबाल्डी ने देश की जनता को प्रजातंत्र देने के संकल्प का त्याग नहीं किया। वे फिर से अपने काम में जुट गए। यद्यपि इन दोनों के काम करने के तरीकों एवं विचारों में बहुत अंतर था तथापि उनका लक्ष्य एक था। मैजिनी विचारक और आदर्शवादी था जबकि गैरीबाल्डी सिपाही था और छापामार युद्ध में निष्णात था।
काबूर का उदय
विदेशी शक्तियों द्वारा पोप को बलपूर्वक रोम में पुनः स्थापित कर दिए जाने से इटली के स्वतंत्रता संग्राम को बड़ा झटका लगा किंतु इस असफलता ने इटालवी युवकों में देशभक्ति एवं राष्ट्रवाद की प्यास और अधिक बढ़ा दी। जब मैजिनी और गैरीबाल्डी इटली के शत्रुओं से लड़ते हुए हारने लगे तब इटली के राजनीतिक मैदान में एक और युवक इटली की आजादी और एकता के लिए आगे आया। उसका नाम काबूर था। वह पीडमॉण्ट के राजा विक्टर एमेनुएल का प्रधानमंत्री था।
वह अपने युग का एक महत्त्वपूर्ण और कुशल कूटनीतिज्ञ था। उसका जन्म ई.1810 में ट्यूरिन के एक जमींदार परिवार में हुआ था। उसने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में आरंभ किया था किंतु बाद में वह पुनः नागरिक जीवन में आ गया। वह इटली में ‘वैधानिक- राजसत्ता’ का समर्थक था और इंग्लैण्ड की संसदीय प्रणाली से अत्यधिक प्रभावित था।
काबूर का लक्ष्य
ई.1848 में काबूर पीडमॉण्ट की संसद का सदस्य बना तथा उन्नति करता हुआ ई.1852 में पीडमाँट राज्य का प्रधानमंत्री बन गया।
काबूर का लक्ष्य इटली को विदेशी शक्तियों से मुक्त करवाकर इटली को एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का था किंतु वह यह काम लोकतंत्र की स्थापना के लिए नहीं करना चाहता था। वह पीडमॉण्ट के राजा विक्टर एमेनुएल के अधीन एक विशाल इटली की स्थापना का स्वप्न देख रहा था।
पीडमॉण्ट का सशक्तीकरण
काबूर की मान्यता थी कि जब तक राज्य मजबूत नहीं होगा, तब तक वह अपने संघर्षों में सफल नहीं हो सकेगा। इसलिए उसने इटली के एकीकरण का नेतृत्व करने के लिए पीडमाँट को मजबूत बनाने का प्रयास किया। उसने राज्य को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक सुधार किए। राज्य में व्यापार और व्यवसाय के विकास लिए भी विशेष प्रयास किये गए।
उसने व्यापार के क्षेत्र में ‘खुला छोड़ दो’ की नीति का अनुसरण करते हुए व्यापार को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। उसके मार्ग-दर्शन में यातायात के साधनों को मजूबत बनाया गया और कृषि क्षेत्र को विकसित किया गया। शिक्षा की उन्नति की ओर भी ध्यान दिया गया।
उसने सेना और कानून के क्षेत्र में नये सुधारों को क्रियान्वित किया और बैंक संबंधी नियमों में अनुकूल सुधार किए। इस प्रकार उसने प्रशासन के विभिन्न अंगों में सुधार करके राज्य के प्रशासन को गतिशील और मजबूत बनाया। उसके इन प्रयासों के कारण पीडमाँट राज्य की बहुमुखी उन्नति हुई और वह एक सशक्त राज्य बन गया।
अपनी बुनियाद को मजबूत कर लेने के बाद उसने देशभक्तों से सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। मेजिनी और गैरीबाल्डी उससे सहयोग करने के लिए तैयार हो गये। इस प्रकार राष्ट्रीय एकीकरण के कार्य में वह बहुसंख्यक जनता का सहयोग प्राप्त करने में सफल हुआ।
क्रीमिया के युद्ध में भागीदारी
काबूर ने अनुभव किया कि ऑस्ट्रिया के प्रभाव को समाप्त करने के लिए उसे फ्रांस से सहयोग प्राप्त हो सकता है। अतः उसने क्रीमिया के युद्ध में फ्रांस की सहायता की। यह युद्ध ई.1854 में पूर्वी समस्या के प्रश्न पर लड़ा गया था। इसकी समाप्ति ई.1856 में पेरिस की संधि से हुई। पेरिस की संधि पर विचार-विमर्श करने के लिए आयोजित सम्मेलन में काबूर भी उपस्थित हुआ।
वह उस सम्मेलन में इटालियन स्वाधीनता के दावे को कुशलतापूर्वक प्रस्तुत करने में सफल रहा। उसने इटली की दयनीय स्थिति के लिए ऑस्ट्रिया को जिम्मेदार ठहराते हुए इटली से उसके प्रभाव को समाप्त करने की वकालत की। फ्रांस का तत्कालीन राष्ट्रपति नेपोलियन (तृतीय) काबूर के तर्कों से प्रभावित हुआ और उसने इटली को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया।
फ्रांस से संधि
जून 1858 में नेपालियन (तृतीय) तथा काबूर के बीच प्लाम्बियर्स नामक स्थान पर एक संधि हुई जिसमें इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि इटली को ऑस्ट्रिया के नियंत्रण से निकालने के लिए फ्रांस, इटली को सैनिक सहायता देगा और इस सहायता के बदले इटली, नीस और सेवाय के प्रदेश फ्रांस को देगा। अब काबूर ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध करने के लिए तैयार हो गया।
ऑस्ट्रिया से युद्ध एवं ज्यूरिक की संधि
काबूर के प्रयासों से लोम्बार्डी और वेनेशिया में ऑस्ट्रिया के विरुद्ध विद्रोह हो गया। इस कारण ई.1859 में दोनों पक्षों में युद्ध प्रारंभ हो गया। इसी बीच प्रशिया, ऑस्ट्रिया की सहायता करने के लिए तैयार हो गया और युद्ध में भारी व्यय होने की संभावना उत्पन्न हो गई। इस कारण फ्रांस ने स्वयं को युद्ध से अलग कर लिया।
संभवतः अब तक नेपोलियन (तृतीय) को यह समझ में आ गया कि इटली का संगठित होना फ्रांस के लिए अच्छा नहीं है। ऐसी स्थिति में इटली, ऑस्ट्रिया और फ्रांस के बीच ज्यूरिक की संधि हुई जिसकी मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं –
(1) लोम्बार्डी का प्रदेश पीडमाँट के अधिकार में दे दिया गया,
(2) वेनेशिया को ऑस्ट्रिया के ही अधिकार में रखा गया,
(3) नीस और सेवाय के प्रदेश फ्रांस को दे दिए गए।
इस संधि से इटली को बड़ी निराशा हुई। वेनेशिया का ऑस्ट्रिया के अधीन रहना तथा नीस एवं सेवाय का इटली के हाथ से निकल जाना देशवासियों को खल रहा था। फिर भी लोम्बार्डी की प्राप्ति एकीकरण की दिशा में पहली बड़ी उपलब्धि थी। मध्य और दक्षिण में एकीकरण का कार्य अभी शेष था।
मध्य-इटली का एकीकरण
मध्य-इटली के राज्यों में भी स्वतंत्रता की माँग जोर पकड़ने लगी थी। ये राज्य भी अब पीडमाँट के साथ मिलने का प्रयास करने लगे थे। ई.1860 में मोडेना, परमा और टस्कनी आदि मध्य-इटली के राज्यों ने जनमत द्वारा पीडमाँट में मिलने का फैसला किया। इस प्रकार मध्य-इटली के राज्यों का भी एकीकरण हो गया।
अब दक्षिण-इटली के राज्यों को संगठित करना शेष था। शेष इटली को पीडमाँट में शामिल करने का जो आंदोलन चला उसमें किसी विदेशी शक्ति का सहयोग नहीं लिया गया। यह इटालियन राष्ट्रीयता की अपनी सफलता थी, जिसका नेता गैरीबॉल्डी था। सिसली और नेपल्स दक्षिण-इटली के राज्य थे जहाँ बूर्वो-वंश के राजा की सत्ता थी।
गैरीबाल्डी का योगदान
गैरीबाल्डी ने इटली के राष्ट्रीय-एकीकरण के कार्य में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उसका जन्म ई.1807 में नीस में हुआ था। उसने नौ-सेना की शिक्षा प्राप्त थी। वह समुद्री व्यापार से जुड़ा हुआ था तथा मेजिनी से बड़ा प्रभावित था। वह रिपब्लिकन-दल का समर्थक हो गया इसीलिए उसे गिरफ्तार कर लिया गया। सजा से बचने के लिए वह दक्षिण-अमेरिका भाग गया। ई.1848 में वह पुनः इटली लौटा।
क्रांति में असफलता प्राप्त करने के पश्चात वह पुनः अमेरिका चला गया। वहाँ से खूब धन कमाकर वह पुनः इटली आया। पीडमॉंट के प्रधानमंत्री काबूर और राजा विक्टर एमेनुअल से उसने संपर्क बनाये रखे। उसने अपने नेतृत्व में लालकुर्ती दल का गठन किया, जिसके सहयोग से वह सिसली और नेपल्स को स्वतंत्र करके उन्हें राष्ट्रीय-धारा से जोड़ने में सफल हुआ।
सिसली और नेपल्स की प्राप्ति
दक्षिण-इटली में सिसली और नेपल्स की जनता ने ब्रूवो राजा फ्रांसिस (द्वितीय) के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और गैरीबाल्डी से सहयोग मांगा। 11 मई 1859 को गैरीबाल्डी चुने हुए देशभक्तों के साथ अमरीका से पुनः अपनी मातृभूमि लौटा। गैरीबाल्डी एवं उसके एक हजार लाल-कुर्ती वाले सिपाही बिना किसी सैन्य-प्रशिक्षण के एवं बिना समुचित हथियारों के, नेपल्स एवं सिसली की प्रशिक्षित एवं विशाल सेना पर चढ़ बैठे।
यह एक अनोखी और बेमेल लड़ाई थी किंतु गैरीबाल्डी में गजब की नेतृत्व क्षमता थी जिसके बल पर उसकी छोटी सी अप्रशिक्षित सेना निरंतर सफलताएं हासिल करती थी। जब उसकी सेना हारने लगती थी तो गैरीबाल्डी अकेला ही युद्ध के मैदान में मौत का विकराल खेल खेलने लगता था जिसके कारण उसके भागते हुए सिपाही फिर से युद्ध के मैदान में आ-डटते थे और हारी हुई बाजी जीत ली जाती थी।
वह जब अपने साथियों के साथ गांवों एवं कस्बों से होकर गुजरता था तो ग्रामीण युवकों से अपील करता था कि वे देश की आजादी के लिए आगे आएं। वह कहता था- ‘चले आओ! चले आओ! जो घर में घुसा रहता है, वह कायर है। मैं तुम्हें थकान, तकलीफें और लड़ाइयां देने का वादा करता हूँ किंतु हम या तो जीतेंगे, या मर मिटेंगे। संसार सफलता की प्रतिष्ठा करता है।’
गैरीबाल्डी की पुकार सुनकर स्वयंसेवकों को तांता बंध गया। वे घरों से निकलकर गैरीबाल्डी का लिखा गीत गाते हुए सेनाओं में भर्ती होने लगे। इस गीत का आशय इस प्रकार था-
उघड़ गई हैं कब्रें, मुर्दे दूर-दूर से आते उठकर।
ले तलवारें हाथों में और कीर्ति-ध्वजों के साथ,
युद्ध के लिए खड़े हो रहे प्रेतगण, अमर शहीदों से अपने,
जिनके मृत हृदयों में गर्मी, इटली का नाम रहा है भर।
आओ, दो उनका साथ, देश के नवयुवको!
तुम चलो उन्हीं के पीछे!
आओ, फहरा दो झण्डा अपना और बाजे जंगी सब साजो!
आ जाओ! सब लेकर ठण्डी फौलादी तलवारें,
किन्तु हो आग हृदय में भरी हुई,
आ जाओ सब लेकर इटली की आशाओं की ज्योति अरे!
इटली से बाहर हो, ओ परदेशी,
तू बाहर निकल हमारे प्यारे वतन इटली से!
गैरीबाल्डी ने अपनी सेना की सहायता से जून 1860 में सिसली पर एवं सितम्बर 1860 में नेपल्स पर अधिकार कर लिया। सिसली विजय के बाद गैरीबाल्डी ने 20 हजार युवकों के साथ दक्षिण इटली में प्रवेश किया। 18 फ़रवरी 1861 को इटली की नई पार्लियामेंट की बैठक हुई और विक्टर इमानुअल को इटली का विधिवत् राजा घोषित कर दिया गया।
सिसली एवं नेपल्स को भी पीडमाँट के राज्य में शामिल कर लिया गया। सिसली और नेपल्स का शासक फ्रांसिस (द्वितीय) देश छोड़कर भाग गया। निःसंदेह काबूर ने गैरीबाल्डी की सफलताओं से लाभ उठाया था। इसी कारण पीडमॉण्ट का राजा विक्टर एमेनुएल इटली का शासक हो पाया था।
मैजिनी और गैरीबाल्डी इन अप्रत्याशित घटनाओं से हक्के-बक्के रह गए। वे जीवन भर इटली की आजादी और एकीकरण के लिए लड़ते रहे थे किंतु उन्होंने इस इटली की कल्पना नहीं की थी जिसका शासक एक राजा हो और जो देश पर सामंतशाही शिकंजा कड़ा कर दे। उनकी कल्पना ऐसे इटली की थी जिस पर इटली की प्रजा स्वयं शासन कर सके। गैरीबाल्डी के नेतृत्व में इटली के जिन युवकों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी, वे भी गणतंत्र की स्थापना के लिए व्याकुल थे।
इसलिए पीडमेंट का राजा और उसका प्रधानमंत्री काबूर, देश के बहुसंख्यक नागरिकों की भावनाओं की पूर्ण उपेक्षा नहीं सके। देश में एक पार्लियामेंट स्थापित की गई तथा देश के शासन के लिए एक संविधान का भी निर्माण किया गया किंतु यह सब राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था के अंतर्गत था।
इटली के एकीकरण के तुरंत बाद त्यूरिन में पार्लियामेंट की बैठक करके विक्टर एमेनुअल एवं काबूर ने देश की प्रजा को स्पष्ट संदेश दिया कि उन्हें संविधान के अंतर्गत शासन व्यवस्था प्रदान की जाएगी, राजा पूर्णतः निरंकुश होकर शासन नहीं करेगा।
काबूर का निधन
6 जून 1861 को काबूर की मृत्यु हो गयी। इटली को एक राष्ट्र का रूप देने का श्रेय काबूर को है, जिसमें मेजिनी, गैरीबाल्डी और विक्टर इमेनुएल का सहयोग उल्लेखनीय था। काबूर की इच्छा थी कि रोम संयुक्त इटली की राजधानी बने किंतु रोम अभी तक फ्रांसीसी सेना के अधिकार में था। वेनेशिया भी अभी तक ऑस्ट्रिया के अधिकार में था।
वेनेशिया की प्राप्ति
उन्हीं दिनों प्रशा के प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जर्मन राज्यों के एकीकरण का कार्य आरम्भ हुआ। ई.1866 में प्रशा ने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध आरम्भ कर दिया। इटली भी प्रशा की ओर से इस युद्ध में शामिल हो गया। इस युद्ध में प्रशा विजयी रहा। इटली द्वारा किए गए सहयोग के बदले में वेनेशिया का राज्य इटली को प्राप्त हो गया। अक्टूबर ई.1866 में इसे भी पीडमाँट में मिला लिया गया।
रोम की प्राप्ति
रोम का प्राचीन वैभव इटलीवासियों के लिए गौरव का विषय था। इस कारण इटलीवासी रोम को नवीन इटली राज्य की राजधानी बनाना चाहते थे किंतु उस पर पोप का अधिकार था। ई.1870 में फ्रांस और प्रशा के बीच युद्ध छिड़ गया। ऐसी स्थिति में फ्रांस को रोम में स्थित अपनी सेना को वापस बुलाना पड़ा। यह युद्ध सीडान के मैदान में लड़ा गया, जिसमें अंतिम सफलता प्रशा को मिली।
इस स्थिति ने इटली को रोम पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। 20 सितम्बर 1870 को इटली के सेनापति केडोनी ने रोम पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार इटलीवासियों की यह अंतिम इच्छा भी पूर्ण हो गयी।
2 जून 1871 को राजा विक्टर इमेनुएल ने रोम में प्रवेश किया। उसने इटली की नई संसद का उद्घाटन करते हुए कहा- ‘हमारी राष्ट्रीय एकता पूर्ण हो गयी, अब हमारा कार्य राष्ट्र को महान् बनाना है।’
विक्टर इमेनुएल का योगदान
यह सही है कि पीडमाँट के राजा विक्टर एमेनुएल ने एकीकृत इटली को गणतंत्र नहीं देकर राजतंत्र दिया किंतु इटली के एकीकरण को ठोस रूप देने में उसने महान् भूमिका का निर्वहन किया। यदि विक्टर इमेनुएल में दूरदृष्टि नहीं होती तो पीडमॉण्ट जैसे छोटे राज्य के लिए इतने बड़े देश के एकीकरण का नेतृत्व करना और अंत में उसे अपने संरक्षण में ले लेना कदापि संभव नहीं होता।
राजा विक्टर इमेनुएल उस काल के अन्य यूरोपीय शासकों से भिन्न व्यक्तित्व का धनी था। वह राष्ट्रीयता और देश के एकीकरण का समर्थक था। वह सच्चा देशभक्त, वीर और धैर्यवान राजा था। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि यदि विक्टर इमेनुएल नहीं होता तो इटली के एकीकरण का कार्य असंभव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता।
इटली की पीड़ा का चित्रण
इटली की आजादी के लिए हुए इस संघर्ष पर अंग्रेज कवि और उपन्यासकार जॉर्ज मेडिडिथ ने इटली के स्वातंत्र्य संग्राम पर एक बड़ा उपन्यास लिखा जिसे बहुत प्रसिद्धि मिली। मेडेडिथ द्वारा लिखी गई एक कविता का आशय इस प्रकार था-
हमने इटेलिया को घोर पीड़ा में देखा है!
वह उठने भी न पाई थी कि उसे फिर धरती
पर फैंक दिया गया,
और आज जब वह गेहूँ के पके हुए खेत की तरह,
जहाँ कभी हल चलते थे,
वरदानमयी तथा सुन्दर है,
तब हमें उनकी याद आती है,
जिन्होंने उसके ढांचे में जीवन की सांस फूंकी
काबूर, मैजिनी, गैरीबाल्डी तीनों;
एक उसका मस्तिष्क, एक आत्मा, एक तलवार,
जिन्होंने एक प्रकाशमान उद्देश्य को लेकर
विनाशकारी आंतरिक कलह से उसका उद्धार किया।
ट्रैवेलियन नामक अंग्रेज विद्वान ने गैरीबाल्डी को लेकर तीन पुस्तकें लिखीं- (1) गैरीबाल्डी एण्ड फाइट फॉर द रोमन रिपब्लिक, (2) गैरीबाल्डी एण्ड द थाउजैण्ड, (3.) गैरीबाल्डी एण्ड द मेकिंग ऑफ इटली।
इटली की लड़ाई के दिनों में इंग्लैण्ड के लोगों की सहानुभूति गैरीबाल्डी और उसके लाल कुर्तों के साथ थी। इस कारण बहुत से अंग्रेज कवियों ने इटली के लोगों को साहस बंधाने वाला साहित्य लिखा।
स्विनबर्न, मेरेडिथ और एलिजाबेथ बैरेट ब्राउनिंग नामक अंग्रेज कवियों ने सुंदर कविताएं लिखकर इटली-वासियों का उत्साह बढ़ाया। इन कविताओं में प्रजातंत्र एवं आाजादी के पक्ष में बहुत उच्च विचार व्यक्त किए गए थे। जबकि ठीक उन्हीं दिनों अंग्रेज जाति आयरलैण्ड, मिस्र एवं भारत की जनता पर बरसाने के लिए बंदूकें, मशीनगनें, तोपें और गोलियां बना रही थी।
जिस समय इटली का संघर्ष अपने दुर्दिनों से गुजर रहा था, तब अंग्रेज कवि स्विनबर्न ने ‘रोम के सामने पड़ाव’ शीर्षक से एक कविता लिखी जिसका आशय इस प्रकार था-
तुम क्रीतदास जिस स्वामी के, वह ही देगा उपहार तुम्हें,
उपहार भला क्या दे सकती, स्वतंत्रता की देवि तुम्हें;
वह आश्रयहीना स्वतंत्रता, आवास नहीं जिसका कोई,
वह बिना रुकावट सीमा के, प्रेरित करती जिन सेनाओं को,
इटली में कारखाने के मालिकों ने देश में चल रही कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने पक्ष में किया तथा उन्हें मजदूरों एवं समाजवादी नेताओं के विरुद्ध खड़ा कर दिया। इन संगठनों में बैनितो मुसोलिनी का ई.1910 से चल रहा संगठन प्रमुख था।
प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ होने से पहले ही इटली भयानक आर्थिक संकट में फंसा हुआ था। ई.1911-12 में तुर्की-युद्ध का अंत इटली की विजय के साथ हुआ था और उत्तरी अफ्रीका में त्रिपोली पर उसका अधिकार होने से इटली के साम्राज्यवादी नागरिकों ने प्रसन्नता का अनुभव किया था किंतु इस विजय से इटली की आर्थिक स्थितियों में कोई सुधार नहीं हुआ।
ई.1914 में जब यूरोप प्रथम विश्व-युद्ध के मुहाने पर खड़ा हुआ था, तब इटली में आंतरिक क्रांति की चिन्गारियां सुलग रही थीं। कारखानों में हड़तालें चल रही थीं। मजदूर वर्ग के नर्म-दलीय समाजवादी नेता किसी तरह मजदूरों को काम पर लाने में सफल हुए। इसके साथ ही महायुद्ध छिड़ गया।
जर्मनी ने इटली से पुरानी मित्रता का हवाला देकर युद्ध में साथ देने के अनुरोध किया किंतु इटली ने मना कर दिया तथा युद्ध में तटस्थ रहने की नीति अपनाई ताकि इसके बदले में दोनों पक्षों को ललचाकर उनसे कुछ आर्थिक रियायतें प्राप्त कर सके। मित्र-राष्ट्रों अर्थात् इंग्लैण्ड एवं फ्रांस के गुट ने इटली को आर्थिक सहायता देकर उसे अपने पक्ष में लड़ने के लिए सहमत कर लिया।
इस प्रकार अगस्त 1916 में इटली अपने पुराने मित्र एवं अपने पुराने शासक जर्मनी के विरुद्ध विश्व-युद्ध में सम्मिलित हुआ। इटली को कुछ राशि नगद रूप में दी गई तथा स्मर्ना एवं तुर्की के कुछ क्षेत्र भी दे दिए गए जिन पर इटली अपना दावा जताता था किंतु उसी समय रूस में बोल्शेविक क्रांति हो गई जिससे इटली उन क्षेत्रों पर अधिकार नहीं कर सका।
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युद्ध समाप्ति के बाद ‘पेरिस शांति सम्मेलन’ आयोजित हुआ जिसमें मित्र-राष्ट्र ब्रिटेन और फ्राँस ने इटली के साथ विश्वासघात किया और उन्होंने इटली को वे क्षेत्र नहीं दिए जो इटली को देने तय हुए थे। इटली को आशा थी कि वह इन क्षेत्रों पर अधिकार करके कुछ आर्थिक कमाई करेगा किंतु यह संभव नहीं हो सका। इसलिए इटली के भीतर मित्र-राष्ट्रों के विरुद्ध असंतोष ने जन्म लिया। इटली का आरोप था कि मित्र-राष्ट्र जानबूझ कर इटली के हितों की उपेक्षा कर रहे थे। प्रथम विश्व-युद्ध में इटली के छः लाख सैनिक काम आए और लगभग 10 लाख सैनिक घायल हुए। युद्ध समाप्त होने के बाद इटली की आर्थिक स्थिति और अधिक खराब हो गई तथा बहुत से सैनिकों को नौकरी से हटा दिया गया। इस प्रकार इटली में किसान, मजदूर एवं नौकरी से हटाए गए सिपाही सड़कों पर दंगे करने लगे। ई.1920 में धातु का काम करने वालू मजदूरों ने बढ़ी हुई तन्खाहों की मांग की। इससे इटली में ‘काम रोको हड़ताल’ आरम्भ हो गई। कारखाने के मालिकों ने कारखानों में तालाबंदी कर दी। इस पर मजदूरों ने कारखानों के ताले तोड़कर उन पर अधिकार कर लिया तथा उन्हें समाजवादी ढंग से चलाने का प्रयत्न किया। इस समय इटली में समाजवादी दल का जोर था।
मजदूर-संघों के साथ-साथ तीन हजार म्युनिसिपल कमेटियों की बागडोर भी समाजवादियों के हाथों में थी। पार्लियामेंट में इस समय लगभग डेढ़ सौ अर्थात् एक तिहाई सदस्य समाजववादी थे। फिर भी समाजवादी नेता सिवाय भाषणों के और कुछ नहीं कर सके तथा देखते ही देखते कारखानों के मालिकों ने मिलों एवं कारखानों पर फिर से अधिकार कर लिए।
अब कारखाने के मालिकों ने देश में चल रही कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने पक्ष में किया तथा उन्हें मजदूरों एवं समाजवादी नेताओं के विरुद्ध खड़ा कर दिया। इन संगठनों में बैनितो मुसोलिनी का ई.1910 से चल रहा संगठन प्रमुख था जिसमें उसने पहले किसानों और कारखाना मजदूरों को भर्ती किया था तथा बाद में सेना से निकाले गए सैनिकों को बड़ी संख्या में सम्मिलित कर लिया था।
सैनिकों की भर्ती के बाद इस संगठन का स्वरूप ‘लड़ाकू गिरोह’ जैसा हो गया था। ये किसी पर भी हमला कर सकते थे। पूंजीपतियों एवं कारखाने के मालिकों ने इन्हें समाजवादियों एवं वामपंथियों पर हमले करने के काम पर लगा दिया।
लड़ाकू गिरोहों के सदस्य किसी भी समाजवादी अखबार के कार्यालय पर हमला करके उसे नष्ट कर देते थे, किसी भी वामपंथी कार्यालय को आग लगाकर उसके सदस्यों के घायल कर देते थे। इसी प्रकार जो म्युनिसिपल कार्पोरेशन तथा सहकारी समितियाँ वामपंथियों के प्रभाव में थीं, उन पर भी इन लोगों ने हमले करके उन्हें तहस-नहस कर दिया। इन सब कामों के बदले में पूंजीपति लोग इन लड़ाकू गिरोहों को धन दिया करते थे।
धीरे-धीरे इटली में इन गिरोहों को ‘फासिदि कॉम्बैतिमैन्ति’ कहा जाना लगा। अंग्रेजी भाषा का ‘फासिज्म’ तथा हिन्दी भाषा का ‘फासीवाद’ इसी इटेलियन शब्द ‘फासिदि’ से बने हैं। सरकार ने पूंजपतियों एवं इन लड़ाकू गिरोहों की ओर से आंखें मूंद लीं। सरकार चाहती थी कि ये लोग समाजवादियों एवं वामपंथियों से सड़कों पर ही निबट लें।
बैनितो मुसोलिनी का जन्म ई.1883 में एक लोहार के घर में हुआ था जो कि समाजवादी कार्यकर्ता था। इसलिए बैनितो मुसोलिनी का लालन-पालन समाजवादी विचारों के बीच हुआ। जब मुसोलिनी बड़ा हुआ तो वह भी समाजवादी नेता बन गया। वह नर्म विचारों वाले समाजवादियों को उनकी नर्म-नीति के लिए धिक्कारा करता था।
बैनितो मुसोलिनी सरकार एवं अपने विरोधियों के विरुद्ध बमों के प्रयोग का समर्थन करता था। तुर्की-युद्ध में इटली के समाजवादियों ने सरकार का समर्थन किया किंतु बैनितो मुसोलिनी ने इस युद्ध का विरोध किया तथा कई जगहों पर हिंसक कार्यवाहियां की जिनके कारण सरकार ने मुसलोलिनी को पकड़कर जेल में बंद कर दिया।
जब वह जेल से छूटा तो उसने समाजवादी दल से उन नेताओं को बाहर निकलवा दिया जो युद्ध का समर्थन करते थे। इसके बाद मुसोलिनी मीलान से प्रकाशित होने वाले एक समाचार पत्र ‘अवन्ती’ का सम्पादक बन गया। इस समाचार पत्र के माध्यम से मुसोलिनी अपने मजदूरों को सलाह देता था कि- ‘वे हिंसा का मुकाबला हिंसा’से करें।’ इटली के नर्म-समाजवादी नेताओं ने मुसोलिनी द्वारा भड़काई जा रही हिंसा का विरोध किया।
जब प्रथम विश्व-युद्ध आरम्भ हुआ तो बैनितो मुसोलिनी ने युद्ध का विरोध किया तथा इस बात का प्रचार किया कि इटली को युद्ध से तटस्थ रहना चाहिए। इस दौर में सरकार भी इसी नीति पर चल रही थी। अचानक बैनितो मुसोलिनी ने अपने विचार बदल दिए तथा यह प्रचार करना आरम्भ किया कि इटली को मित्र-राष्ट्रों की तरफ से युद्ध में भाग लेना चाहिए।
उसने समाजवादी समाचार-पत्र के सम्पादन का काम भी बंद कर दिया तथा एक नया समाचार पत्र आरम्भ किया जिसमें उसने मित्र-राष्ट्रों के समर्थन में जनमत तैयार करना आरम्भ किया।
इस पर समाजवादियों ने बैनितो मुसोलिनी को समाजवादी दल से निकाल दिया। अब बैनितो मुसोलिनी इटली की सेना में साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गया तथा प्रथम विश्व-युद्ध के मोर्चे पर लड़ने गया। युद्ध में वह गंभीर रूप से घायल हो गया। जब युद्ध समाप्त हो गया तो बैनितो मुसोलिनी ने स्वयं को बड़ी विचित्र स्थिति में पाया।
अब वह न तो समाजवादियों के काम का था, न सरकार के काम का था, न मजदूरों में उसका प्रभाव रह गया था। ऐसा हारा हुआ और कुण्ठित व्यक्ति प्रायः या तो अवसाद में चला जाता है, या फिर ‘अराजकतावादी’ हो जाता है। मुसोलिनी अराजकतावादी हो गया।
ई.1920 में उसने अपने संगठन में, युद्ध में बेकार हो गए तथा सेना से निकाले गए सैनिकों की दुबारा से भर्ती आरम्भ की तथा इटली में फासीवाद की नए सिरे से नींव डाली। इस अवसर पर उसने कहा- ‘चूंकि वे किसी तरह के निर्धारित कार्यक्रमों से बंधे हुए नहीं हैं, इसलिए वे बिना रुके हुए एक ही लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाते हैं, और वह लक्ष्य है इटली की जनता की भावी भलाई।’
कहने को तो मुसोलिनी जनता की भलाई की बात कह रहा था किंतु वास्तविकता यह थी कि उसके संगठन का हिंसा के अलावा और किसी सिद्धांत में विश्वास नहीं था। बहुत से शहरों में मजदूर संगठनों ने मुसोलिनी के संगठन के साथ हिंसक झड़पें कीं जिससे मुसोलिनी कठिनाई में पड़ गया किंतु तभी नर्मपंथी समाजवादी नेताओं ने मजदूरों को सलाह दी कि वे हिंसा का सामना हिंसा से न करके शांति एवं धैर्य से काम लें।
मजदूरों ने अपने नेताओं की सलाह मान ली और उन्होंने बैनितो मुसोलिनी के गुण्डों का हिंसक विरोध करना बंद कर दिया। इससे मुसोलिनी का काम आसान हो गया और देश में फासीवादी गिरोह पनप गए जिनका सर्वमान्य नेता मुसोलिनी था। प्रत्येक गिरोह को किसी न किसी धनी मिल मालिक का संरक्षण मिल गया था। सरकार ने इनके मामलों में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया क्योंकि ये गिरोह मिलों में हड़ताल नहीं होने देते थे।
मुसोलिनी ने एक नीति और अपनाई, उसके गिरोह काम तो धनी लोगों के लिए करते थे किंतु नारे हमेशा गरीबों, शोषितों, वंचितों, पीड़ितों, किसानों, मजदूरों आदि के समर्थन में लगाते थे। यह साम्यवादियों की पुरानी चाल थी, वे पीड़ितों की लड़ाई लड़ने की आड़ में अपनी जेबें भरा करते थे। मुसोलिनी ने भी यही किया।
इस प्रकार फासीवाद एक खिचड़ी जैसी चीज बन गया। वह प्रकट रूप से अमीरों के हितों के लिए कार्य करता था और प्रकट रूप से ही गरीबों के पक्ष में भाषण देता था। इस प्रकार अमीर उससे डरे हुए रहते थे और गरीब यह सोचते थे कि मुसोलिनी तो उनका अपना ही नेता है।
वास्तव में बैनितो मुसोलिनी का फासिज्म एक ऐसा पूंजीवादी आंदोलन था जो पूंजीवादियों के खिलाफ डरावनी बातें करता था। एक दिन वह गरीबों के पक्ष में भाषण देता था तो अगले ही दिन कारखाना मालिकों, पूंजीपतियों एवं बड़े उद्योगों को बनाए रखने की वकालात करता हुआ दिखाई देता था ताकि गरीबों की नौकरियां खतरे में न पड़ें।
मुसोलिनी ने समाज का ऐसा कोई वर्ग नहीं छोड़ा था जिसके पक्ष में एवं जिसके विरोध में मुसोलिनी ने भाषण नहीं दिए हों। जब वह अमीरों के विरोध में भाषण देता था तो निर्धन वर्ग के लोग खुश होते थे और जब वह अगली बार अमीरों के पक्ष में भाषण करता था तो निर्धन वर्ग के लोग सोचते थे कि यह तो केवल अमीरों को खुश करने के लिए बोला जा रहा है, वास्तव में मुसोलिनी गरीबों का नेता है। ठीक ऐसा ही अमीर वर्ग के लोग सोचते थे।
मध्यम वर्ग के बेकार एवं बेरोजगार नौजवान इस आंदोलन का बड़ा हथियार बन गए जिन्हें मुसोलिनी पेट भरने के लिए रोटी के पैसे उपलब्ध कराने लगा और मारपीट एवं गुण्डागर्दी के कामों में उन्हें अपनी सेना के रूप में काम में लेने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि असंगठित क्षेत्र के मजदूर लोग भी मुसोलिनी की छतरी के नीचे आकर जमा होने लगे ताकि मिल मालिकों से लड़कर उनकी नौकरियां सुरक्षित रखी जा सकें।
इस प्रकार फासीवाद एक रंग-बिरंगी वस्तु बन गया जिसमें इटली की जनता के सभी रंग एक साथ दिखाई देते थे। चूंकि सरकार के पास ऐसा कोई उपाय नहीं था जिससे वह बेरोजगारों को रोजगार दे सके, पूंजीपतियों की शोषणकारी एवं दमनकारी नीतियों पर अंकुश स्थापित कर सके, मुसोलिनी के गुण्डों का दमन कर सके, इसलिए सरकार ने इस आंदोलन के समक्ष घुटने टेक दिए। अब देश का वास्तविक शासन यही गुण्डे चलाने लगे। कम से कम जनता के बीच तो इन्हीं गुण्डों का शासन था।
फासीवादियों ने अपनी ओर से चीजों के मूल्य तय कर दिए तथा व्यापारी वर्ग को विवश किया कि वे इन्हीं दामों पर दैनिक उपभोग की चीजें बेचें। इससे गरीबों को बड़ी राहत मिल गई और वे फासीवादियों के साथ हो लिए। मुसोलिनी चूंकि फौज में रहकर लड़ा था, इसलिए वह बड़ी आसानी से सैन्य अधिकारियों से मित्रता गांठ लेता था। इस कारण इटली की सेना में मुसोलिनी के सम्पर्क सूत्र स्थापित हो गए।
धीरे-धीरे बैनितो मुसोलिनी ने सेना के कुछ बड़े सेनापतियों को अपने पक्ष में कर लिया। यह कैसी विचित्र बात थी कि इटली का धनी वर्ग मुसोलिनी को अपनी सम्पत्ति का रक्षक समझता था, मजदूर वर्ग उसे अपनी नौकरियों का संरक्षक समझता था, समाजवादी नेता उससे भय खाते थे और सरकार के मंत्री उसे न सुलझने वाली पहेली समझकर सहन करते थे जबकि सैन्य अधिकारी उसे अपना मित्र मानते थे।
इस प्रकार बैनितो मुसोलिनी सबको किसी न किसी तरह से चकमा दे रहा था और उन्हें अपने पक्ष में रखे हुए था। ऐसे आदमी के लिए देश पर कब्जा कर लेना अधिक कठिन नहीं था। उसने रोम पर चढ़ाई करने का कार्यक्रम बनाया। इटली के राजा को उसका यह कार्यक्रम अच्छा लगा और राजा से सहायता लेकर अक्टूबर 1922 में फासीवादी दस्तों ने रोम पर चढ़ाई कर दी।
रोम के लिए कूच करने से पहले उसने अपने सैनिक-दस्तों का आह्वान इन शब्दों में किया- ‘हमारा कार्यक्रम बहुत सीधा-सादा है। हम इटली पर राज करना चाहते हैं।’
इटली का प्रधानमंत्री ‘नित्ती’ जो अब तक मुसोलिनी के विरुद्ध कार्यवाही करने से बच रहा था, उसे देश में सैनिक शासन लागू करना पड़ा किंतु तब तक देर हो चुकी थी, स्वयं राजा भी मुसोलिनी के पक्ष में हो गया था। उसने प्रधानमंत्री के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके द्वारा देश में सैनिक शासन लागू किया गया था।
प्रधानमंत्री ने नाराज होकर त्यागपत्र दे दिया और इटली के राजा विक्टर एमानुएल (तृतीय) ने मुसोलिनी को मीलान में आमंत्रित किया ताकि मुसोलिनी को नया प्रधानमंत्री बनाया जा सके। 30 अक्टूबर 1922 को फासीवादी सेना रोम पहुँच गई और उसी दिन मुसोलिनी प्रधानमंत्री बनने के लिए रेल में बैठकर मीलान चला आया।
बिना किसी विरोध और बाधा के मुसोलिनी इतने बड़े देश का प्रधानमंत्री बन गया। उसका ‘फासीवाद’ सत्ता प्राप्त करने में सफल रहा किंतु उसकी आगे की डगर बहुत कठिन थी। मुसोलिनी के सामने न कोई लक्ष्य था, न आदर्श था, न योजना थी, न किसी तरह का कार्यक्रम था। वह तो केवल देश की सत्ता छीनना चाहता था, जिसमें वह सफल हो गया था किंतु आगे क्या करना था, इसके बारे में उसने कुछ भी नहीं सोचा था।
मुसोलिनी ने इटालवी भाषा के विश्वकोश में फासीवाद पर लिखे एक लेख में लिखा है– ‘जब वह रोम पर चढ़ाई करने के लिए रवाना हुआ तब भविष्य के बारे में उसके दिमाग में कोई योजना नहीं थी। राजनीतिक संकट के समय कुछ करने की जोरदार इच्छा ने ही उसे इस युद्ध पर कूच करने के लिए प्रेरित किया था, और यह उसकी पिछली समाजवादी साधना का परिणाम था।’
मुसोलिनी के दल का प्रतीक चिह्न रोम का एक पुराना साम्राज्यशाही राज्यचिह्न था जो रोम के सम्राटों और मजिस्ट्रेटों के आगे-आगे चला करता था। यह छड़ियों का एक बण्डल होता था जिसके बीच में कुल्हाड़ी लगी रहती थी। ये छड़ियां फेसेज कहलाती थीं, इन्हीं से फासिमो शब्द बना है। फासीवादी लोगों के अभिवादन का तरीका भी पुराने रोमन ढंग का था जिसमें एक बाजू को उठाकर एक तरफ फैला दिया जाता है।
इसलिए कहा जा सकता है कि फासीवादी स्वयं को राष्ट्रवादी प्रदर्शित करने के लिए प्राचीन रोमन साम्राज्य के प्रतीकों को काम में ले रहे थे। फासीवादियों का काम करने का तरीका भी साम्राज्यशाही ढंग का था जिसमें ‘कोई तर्क नहीं, केवल आज्ञापालन’ का सिद्धांत निहित था। उनका नेता मुसोलिनी ‘इल द्यूचे’ अर्थात् तानाशाह कहलाता था। उनकी वर्दी में काली-कुर्ती सम्मिलित थी। इसलिए उन्हें ‘ब्लैक शर्ट्स’ अथवा ‘काली कुर्ती’ कहा जाता था।
प्रधानमंत्री बनने के बाद मुसोलिनी ने इटली में एक सूत्री कार्यक्रम चलाया, और वह था विरोधियों को ठिकाने लगाना। बहुत से मार्क्सवादी एवं समाजववादी नेताओं और उनके समर्थकों की हत्या कर दी गई। पार्लियामेंट के सदस्यों को जान से नहीं मारा गया किंतु उन्हें सड़कों, गलियों एवं उनके घरों में घुस कर लात-घूंसों और जूतों से पीटा गया ताकि वे पार्लियामेंट में मुसोलिनी का समर्थन करें। इसके बाद मुसोलिनी पार्लियामेंट में शाही प्रतिनिधि के चुनाव के सम्बन्ध में एक विधेयक लाया।
इस विधेयक में कहा गया कि शाही उत्तराधिकारी की नियुक्ति एक समिति द्वारा की जाए। यह राजा का घोर अपमना था किंतु जूतों के बल पर यह नया कानून प्रबल बहुमत से पारित करा लिया गया। इस तरह मुसोलिनी के पक्ष में भारी बहुमत हासिल कर लिया गया। बैनितो मुसोलिनी ने राजाज्ञाओं का पालन बंद कर दिया तथा सार्वजनिक रूप से दिए गए एक भाषण में कहा- ‘यह घोषणा-पत्र इमानुएल की राजगद्दी का अंत करने के लिए यथेष्ट है।’
मुसोलिनी के गुण्डों ने पुलिस को निष्क्रिय करके स्वयं मोर्चा संभाल लिया। वे जिसकी हत्या करना चाहते थे, उसे बलपूर्वक अरण्डी का ढेर सारा तेल पिला देते थे। देश की समस्त सरकारी नौकरियां फासीवादी दल के कार्यकताओं को दे दी गईं। ई.1224 में गायाकोमो मैतिओती की हत्या से सारा यूरोप थर्रा गया।
यह एक विख्यात समाजवादी था और पार्लियामेंट का सदस्य था। उन दिनों इटली में चुनाव होकर ही चुका था। गायाकोमो ने पार्लियामेंट में एक भाषण दिया जिसमें उसने फासीवादी तरीकों की निंदा की। कुछ ही दिन बाद गायाकोमो की हत्या कर दी गई। लोगों को दिखाने के लिए कुछ लोगों को पकड़कर उन पर मुकदमा चलाया गया किंतु अंत में उन सभी को छोड़ दिया गया।
अभी यह घटना होकर ही चुकी थी कि अमेन्दोला नामक एक नर्म-दली नेता को पीटा गया जिससे उसकी भी मृत्यु हो गई। पिछला प्रधानमंत्री ‘नित्ती‘ भी इसी दल का नेता था, वह जान बचाने के लिए चुपचाप इटली छोड़कर भाग गया। मुसोलिनी के कार्यकर्ताओं ने उसका घर जलाकर नष्ट कर दिया। ये समस्त कार्यवाहियां किसी उन्मत्त भीड़ द्वारा नहीं की गई थीं अपितु सोच-समझकर खुलेआम की गई थीं।
मुसोलिनी इटली का तानाशाह बन गया। वह केवल प्रधानमंत्री ही नहीं था अपितु पर-राष्ट्र विभाग (विदेश), स्वराष्ट्र विभाग (गृह), उपनिवेश विभाग, युद्ध विभाग, नौसेना विभाग, हवाई सेना विभाग और मजदूर विभाग का भी मंत्री था। एक तरह से वह पूरा मंत्रिमण्डल था। इटली का बूढ़ा राजा चुप होकर कौने में बैठ गया। उसके पास अब कोई शक्ति नहीं बची थी। यही काफी था कि उसके महल उसके पास थे जिनमें अब भी नौकर-चाकर काम करते थे। मुसोलिनी ने उन्हें नहीं हटाया था।
मुसोलिनी जब भाषण देता था तो आग उगलता था। उसे हर समय कोई शत्रु चाहिए था जिस पर वह गालियों एवं धमकियों की बौछार कर सके। वह यूरोप के किसी भी देश को धमका देता था जिससे यूरोप के देशों में बेचैन फैल गई। कौन जाने यह तानाशाह कब क्या कर बैठे?
उसने फ्रांस को धमकाया कि वह अपनी हद में रहे अन्यथा उसके आकाश में इटली के असंख्य हवाई जहाज छा जाएंगे। फ्रांस के सामने इटली की सामरिक शक्ति नगण्य सी थी किंतु फ्रांस इस पागल तानाशाह से लड़कर अपनी शक्ति खराब नहीं करना चाहता था। इसलिए फ्रांस ने कोई जवाब नहीं दिया। इटली राष्ट्रसंघ का सदस्य था किंतु मुसोलिनी अपने भाषणों में राष्ट्रसंघ के लिए असभ्य शब्दों एवं धमकियों का प्रयोग करता था।
राष्ट्रसंघ ने भी उन असभ्य टिप्पणियों को चुपचाप सुन लिया। वे जानते थे कि बैनितो मुसोलिनी अपने देश में जनता एवं सेना पर पकड़ बनाए रखने के लिए इस तरह की असभ्य भाषा का प्रयोग करता है, इससे आगे न तो उसे कुछ करना है और न कुछ करने की उसकी सामर्थ्य है।
ई.1929 में पोप एवं इटली की सरकार के बीच एक समझौता हुआ जिसके बाद, दोनों के बीच ई.1871 से चला आ रहा विवाद सुलझ गया। पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1861 में इटली के एकीकरण के बाद पीडमाँट का राजा इमेनुएल सम्पूर्ण इटली का शासक हो गया था। ई.1871 में राजा इमेनुएल ने रोम पर अधिकार कर लिया था तथा रोम को अपनी राजधानी घोषित कर दिया था।
इसके बाद उसने रोम में ही अपने महल एवं कार्यालय स्थापित कर लिए थे। पोप ने राजा इमेनुएल की इस कार्यवाही को मान्यता नहीं दी क्योंकि पोप तो स्वयं पापल स्टेट का राजा था।
इसलिए तभी से पोप, वेटिकन स्थित अपने महलों तथा सेंट पीटर्स चर्च के अतिरिक्त, रोम एवं इटली की अन्य भूमि पर पैर नहीं रखता था। पोप ने अपनी इच्छा से स्वयं को वेटिकन में बंदी बना रखा था। ई.2929 के समझौते में रोम शहर में स्थित वेटिकन क्षेत्र को सम्पूर्ण-प्रभुत्व-सम्पन्न राज्य बना दिया गया तथा पोप को उसका राजा घोषित किया गया।
उस समय इस राज्य की जनसंख्या कुछ सौ ही थी किंतु पोप ने अपनी अदालत, अपनी डाक व्यवस्था, अपने डाक टिकट, अपना टकसाल, अपनी मुद्रा स्थापित की जो इटली में भी मान्य की गई। पोप के सम्मान को बहाल करने के लिए इटली के कैथोलिक नागरिकों ने मुसोलिनी के प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन किया।
इटली एवं रोम को वश में करने के बाद मुसोलिनी ने यूरोप के अन्य देशों में आग लगाने का कार्यक्रम बनाया। उसने कहा कि- ‘यूरोप के हर देश में राजगद्दियाँ इस प्रतीक्षा में खाली पड़ी हैं कि कोई योग्य व्यक्ति उन पर बैठ जाए।’
उसके इस विचार से बहुत से देशों में उद्दण्ड किस्म के लोग राजसत्ताएं हड़पने के लिए बलवे करने लगे। पार्लियामेंटों के सदस्यों को ठोका-पीटा जाने लगा तथा उनसे मन-माफिक कानून पारित करवाए जाने लगे।
स्पेन इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। स्पेन की पार्लियामेंट को ‘कोर्ते’ कहा जाता था। पार्लियामेंट में रोमन पादरियों का बड़ा प्रभाव था। स्पेन अपनी खराब आर्थिक स्थिति के कारण प्रथम विश्वयुद्ध से दूर रहा था किंतु स्पेन में औद्योगिकीकरण नहीं होने से जनता में गरीबी और बेरोजगारी अधिक थी।
इसलिए स्पेन की जनता ने न तो जर्मनी की तरह से ठोस मार्क्सवाद अपनाया और न इंग्लैण्ड की तरह नर्म समाजवाद अपनाया, स्पेन ने इटली की तरह फासीवाद अपना लिया जिससे स्पेन में अराजकता का बोलबाला हो गया। ऐसा बुरा हाल और भी कई देशों का हुआ। पौलेण्ड, यूगोस्लाविया, यूनान, बुलगारिया, पुर्तगाल, हंगरी और ऑस्ट्रिया में भी गुण्डा तत्वों ने तानाशाहियाँ स्थापित कर लीं।
यूरोप से लगते हुए तुर्की में भी कमाल पाशा नामक तानाशाह सत्ता पर कब्जा करके बैठ गया। दक्षिण-अमरीकी देशों में भी तानाशाहियों ने सरकारें हथिया लीं। इस प्रकार मुसोलिनी का जादू आधी से अधिक दुनिया के सिर चढ़कर बोलने लगा।
अबीसीनिया पर आक्रमण
ई.1935 में मुसोलिनी ने अबीसीनिया पर आक्रमण किया। यद्यपि द्वितीय विश्व-युद्ध अभी दूर था तथा उसे ई.1939 में आरम्भ होकर ई.1945 में समाप्त होना था किंतु व्यावहारिक रूप से कहा जा सकता है कि अबीसीनिया पर आक्रमण करके मुसोलिनी ने द्वितीय विश्व-युद्ध का पहला पटाखा फोड़ दिया।
फासीवाद और नाजीवाद दोनों अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराएं थीं किंतु राजनीतिक स्वार्थों के चलते दोनों ने हाथ मिला लिया तथा इटली की सड़कों पर फासी-नाजी भाई-भाई के नारे लगने लगे।
फासीवाद और नाजीवाद में समानता
जिस समय रूस में बोल्शेविक क्रांति की सफलता के बाद साम्यवादी राज्य की स्थापना हो रही थी तथा एक नए समाज और नई अर्थव्यवस्था का गठन किया जा रहा था, उसी समय इटली में ‘फासीवाद’ और जर्मनी में ‘नाजीवाद’ ने जन्म लिया। इन्हें सामान्यतः ‘प्रतिक्रांति’ (Counter Revolution) के रूप में परिभाषित किया जाता है।
वस्तुतः फासीवाद ‘समाजवाद’ के विरोध में और नाजीवाद ‘साम्यवाद’ के विरोध में उठ खड़ा हुआ था। फासीवादी लोग इटली में समाजवादियों को कुचलकर तथा नाजीवादी लोग जर्मनी में साम्यवादियों को कुचलकर सत्तारूढ़ हुए थे।
फासीवादियों एवं नाजीवादियों ने व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, समानता और नागरिक अधिकारों का हरण कर लिया, जबकि इंग्लैण्ड तथा फ्रांस आदि देशों में व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया।
इन कारणों से इन देशों (इंग्लैण्ड तथा फ्रांस) में क्रांति के पश्चात् प्रजातांत्रिक एवं उदारवादी शासन व्यवस्था की स्थापना हुई थी, वहीं फासीवाद और नाजीवाद के दौरान अधिनायकतंत्र की स्थापना की गई। इसी संदर्भ में फासीवाद एवं नाजीवाद को प्रतिक्रांति के रूप में देखा जाता है।
इटालवी विश्वकोष में मुसोलिनी ने लिखा है- ‘फासीवाद शांति की आवश्यकता या लाभ में विश्वास नहीं करता। इसलिए वह शांतिवाद को अस्वीकार करता है, क्योंकि इसमें संघर्ष से इन्कार और बलिदान के अवसर पर कायरता के दोष हैं। युद्ध और केवल युद्ध ही ऐसी चीज है जो मानवीय शक्तियों को उच्च स्तर पर उठा देता है।
जिन समुदायों में युद्ध स्वीकार करने का साहस होता है, उन पर अपने बड़प्पन की छाप लगा देता है। शेष सब व्यवहार कृत्रिम हैं, वे मनुष्य के समक्ष मृत्यु और जीवन का प्रश्न नहीं रखतीं।’
बैनितो मुसोलिनी की सरकार के मंत्री ‘जिओवानी जैन्ताइल’ फासीवादी विचारधारा का माना हुआ शिल्पकार था।
उसने लिखा है- ‘लोगों को लोकतान्त्रिक ढंग से अपनी व्यक्तिगत विशेषता के माध्यम से स्वयं की वास्तविकता नहीं तलाशनी चाहिए अपितु फासीवादी तरीकों से जगत् की आत्म-चेतना रूप परामर्थिक अहम् की क्रियाओं के माध्यम से तलाशनी चाहिए। …… जहाँ तक कोई शक्ति इच्छा को साकार करने की सामर्थ्य रखती है, वहाँ तक वह शक्ति नैतिक है। फिर वह उपदेश या लाठी किसी भी उपाय को काम में लें।’
भारत के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने फासीवाद पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘फासीवाद कट्टर राष्ट्रवादी है तथा अन्तर्राष्ट्रीयता का विरोध करता है। वह तो राज्य को देवता बना देता है जिसकी वेदी पर व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों की बलि आवश्यक है। फासीवाद की दृष्टि में केवल अपना देश ही अपना है, दूसरे समस्त देश पराए हैं और शत्रु के बराबर हैं।’
रोम में हिटलर का स्वागत
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यह स्वाभाविक ही है कि एक जैसे विचार रखने वाले दो लोग गाढ़े मित्र हो जाते हैं। फासीवाद का जनक मुसोलिनी और नाजीवाद का जनक हिटलर आपस में मित्र बन गए। मुसोलिनी ने हिटलर को रोम में आमंत्रित किया। इस समाचार को सुनकर दुनिया दहल गई। संसार के दो बड़े तानाशाहों का मिलन संसार पर भारी पड़ने वाला था। 3 मई 1938 को रोम को दुल्हन की तरह सजाया गया। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा सैनिक नियुक्त किए गए ताकि कोई हिटलर की तरफ टोपी भी फैंकने का साहस न कर सके। हिटलर अपने साथ अपने दोनों विश्वस्त साथियों गोबेल्स एवं रिबनट्रॉप और पाँच सौ अधिकारियों को भी ले गया था जो जर्मनी के विदेश, गृह, गुप्तचर, रक्षा एवं सैन्य विभागों के वरिष्ठतम अधिकारी एवं बड़े अखबारों के सम्पादक थे। इन लोगों के लिए जर्मनी से इटली तक एक विशेष ट्रेन चलाई गई थी। राजा एमानुएल विक्टर (तृतीय) एवं सीन्यौर (प्रधानमंत्री) मुसोलिनी ने स्वयं इस ट्रेन का स्वागत किया। हर एडोल्फ हिटलर ने मुसोलिनी से हाथ मिलाया तथा गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण किया। इसके बाद दोनों पक्षों के अधिकारियों ने एक गुप्त कमरे में बैठक की। इसके बाद हिटलर अपने आदमियों को लेकर वापस जर्मनी लौट गया। दुनिया कभी नहीं जान सकी कि उस बैठक में दोनों देशों के बीच क्या खिचड़ी पकी।
पूरी दुनिया गर्म हो गई
हिटलर के रोम से लौट जाने के बाद दुनिया अचानक गर्म हो गई। कोई नौसीखिया भी बता सकता था कि इटली और जर्मनी मिलकर इंग्लैण्ड और फ्रांस की खबर लेने वाले थे। इस समय चीन और जापान में गहरा घमासान मचा हुआ था और स्पेन पर बमवर्षा हो रही थी। समझा जा रहा था कि अब जर्मनी किसी भी समय ब्रिटेन पर आक्रमण कर सकता है।
इसलिए चर्चिल सम्भल कर बैठ गया, उसने चालीस लाख लड़ाकों की पीठ पर बंदूकें बांध दीं और युद्धक-विमानों की संख्या दो-गुनी कर दी। उसी सप्ताह रूमानिया में क्रांति शुरु हो गई। तौब्रुक का पतन हो गया। जापान ने अमरीका को लताड़ पिलाई। हिटलर और मुसोलिनी की संधि से ग्रीस को इतना जोश आया कि वह अलबेनिया में युद्ध जीत गया।
इटली में युद्ध के बाजे
हिटलर के इटली आने से पहले इटली- फ्रांस वार्ता चल रही थी किंतु हिटलर के लौट जाने के बाद इटली-फ्रांस वार्ता अचानक समाप्त हो गई। इटली के अखबार चीख-चीखकर कार्सिका और ट्यूनिश की मांग करने लगे। अनुमान था कि इटली जल-थल दोनों मार्गों से फ्रांस पर आक्रमण करेगा। सोवियत रूस को अनुकूल बनाने के लिए मुसोलिनी ने पहले ही हंगरी, रूमानिया, यूगोस्लाविया, बुल्गारिया, कालासागर और डून्यूब के मुहाने तक सोवियत प्रभाव को स्वीकार कर लिया था। इराक, ईरान और अफगानिस्तान को भी रूसी प्रभाव में स्वीकार कर लिया गया था। अब इटली में युद्ध के बाजे बजने लगे।
द्वितीय विश्व-युद्ध
प्रथम विश्व युद्ध के समय मुसोलिनी ने जर्मनी का विरोध किया था तथा मित्र-राष्ट्रों की तरफ से लड़ने के सम्बन्ध में प्रचार किया था। इटली के राजा इमानुएल ने प्रथम विश्व-युद्ध में मित्र-राष्ट्रों की तरफ से ही युद्ध किया था किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने के लिए स्वयं मुसोलिनी को ही निर्णय लेना था। इस समय तक जर्मनी का तानाशाह-शासक हिटलर उसका अच्छा मित्र बन चुका था।
इसलिए मुसोलिनी ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की तरफ से मैदान में उतरने का निर्णय लिया। वैसे भी मुसोलिनी इंग्लैण्ड तथा फ्रांस जैसे लिजलिजे समाजवादियों के साथ मिलकर युद्ध नहीं कर सकता था। जर्मनी की तरफ से लड़ रहे देशों को ‘धुरीराष्ट्र’ तथा इंग्लैण्ड की तरफ से लड़ रहे देशों को ‘मित्रराष्ट्र’ कहा जाता था। इटली का राजा ‘इमानुएल‘ हिटलर तथा युद्ध दोनों को ही पसंद नहीं करता था किंतु उसकी एक न चली।
क्लारा पेटाची
जब द्वितीय विश्व-युद्ध आरम्भ हो ही रहा था, क्लारा पेटाची नामक एक युवती मुसोलिनी के निकट आने में सफल हो गई। वह शीघ्र ही मुसोलिनी की प्रेमिका बन गई। इटली की सेना और गुप्तचर विभाग मानता था कि वह हिटलर की तरफ से मुसोलिनी के पास भेजी गई है तथा सरकार के भीतर किए जा रहे निर्णयों की जानकारी हिटलर तक पहुँचाती है।
इसलिए एक दिन पुलिस, सेना तथा गुप्तचर विभाग के प्रधान आपस में मिले तथा तीनों ने विचार-विमर्श करके फासिस्ट सेना के सलाहकार ‘गारगानो’ की सहायता से एक मैमोरेण्डम तैयार करवाया।
इन सभी अधिकारियों ने व्यक्तिशः यह मैमोरण्डम मुसोलिनी के समक्ष प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया था कि ‘क्लारा’ हिटलर की जासूस है। अतः मुसोलिनी को चाहिए कि वह इस स्त्री को स्वयं से दूर कर दे। मुसोलिनी इस मैमोरेण्डम को देखते ही आग-बबूला हो गया। इन समस्त अधिकारियों को तुरंत उनके पदों से हटा दिया गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ
कुछ ही दिनों में यूरोप में द्वितीय विश्व-युद्ध छिड़ गया। हिटलर और मुसोलिनी ने युद्ध शरू किया, उनका मुख्य निशाना ब्रिटेन तथा फ्रांस थे। बहुत से अन्य देश भी इस युद्ध से उदासीन नहीं रह सके तथा दोनों ही पक्षों में और भी शक्तियाँ जुड़ती चली गईं। थोड़े ही दिनों में दुनिया दो हिस्सों में साफ-साफ बंट गई। आधी दुनिया के नेता मुसोलिनी, हिटलर और तोजो हो गए थे तो बाकी की आधी दुनिया को चर्चिल, स्टालिन और रूजवेल्ट हांक रहे थे।
मुसोलिनी मुसीबत में
हिटलर ने फ्रांस को बर्बाद करके रख दिया किंतु मुसोलिनी अपने देश को अपने पक्ष में नहीं रख सका। राजा से लेकर प्रजा तक, पत्रकारों से लेकर सैनिकों तक कोई भी मुसोलिनी की युद्ध नीति से प्रसन्न नहीं था। इसका परिणाम यह हुआ कि मुसोलिनी की फासिस्ट सेनाएं मन लगाकर नहीं लड़ सकीं और इटली की सेना कई मोर्चों पर हार गई। अंत में ब्रिटिश सेना सिसली तक आ पहुँची।
मुसोलिनी भाग कर हिटलर से मिलने ‘फेल्ट्रे’ गया। हिटलर ने मुसोलिनी से कहा कि वह मोर्चे पर डटा रहे क्योंकि जर्मनी में ऐसे शस्त्रों का निर्माण हो रहा है जो शीघ्र ही अमरीका और इंगलैण्ड को राख के ढेर में बदल देंगे। मुसोलिनी प्रसन्न-चित्त होकर रोम लौट आया। उस समय तक रोम पर बम-वर्षा आरम्भ हो चुकी थी।
रोम बर्बाद हो जाएगा
मुसोलिनी ने राजा विक्टर इमानुएल (तृतीय) से भेंट करके उसे बताया कि भविष्य अत्यंत आशाजनक है किंतु राजा ने मुसोलिनी से कहा कि भविष्य अत्यंत निराशाजनक है। हवाई हमलों के समय जर्मन सैनिक मोर्चा छोड़कर भाग जाते हैं और इटली के सैनिक मारे जाते हैं। हम सिसली खो चुके हैं, बेहतर होगा कि हम युद्ध से बाहर हो जाएं। यदि यह युद्ध बंद नहीं हुआ तो रोम बर्बाद हो जाएगा। मुसोलिनी राजा से नाराज होकर चला गया।
ग्राण्ड कौंसिल की बैठक
जब मुसोलिनी ने राजा की सलाह स्वीकार नहीं की तो राजा ने ग्रांड कौंसिल की बैठक बुलाई। ग्रांड कौंसिल की बैठक शाही महल में रखी गई। मुसोलिनी को ज्ञात हो गया कि इस बैठक में विरोधी दल का नेता ‘ग्राण्डी’ मुसोलिनी के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखेगा।
मुसोलिनी ने शाही महल के चारों ओर फासिस्ट सेना का पहरा लगा दिया। मुसोलिनी के आदेश से ग्राण्ड कौंसिल के सदस्यों की गाड़ियां शाही महल के भीतरी प्रांगण में ले जाई गईं। उनकी गाड़ियों के द्वार बंद थे तथा अंदर काले परदे से ढके थे। सभी सदस्य काले कपड़े पहने हुए थे। कुल 36 सदस्य इस बैठक में भाग लेने के लिए आए। वे अपनी गाड़ियों से उतर कर सीधे सदन में चले गए।
सदस्यों के प्रवेश करते ही सदन का दरवाजा बंद कर दिया गया। थोड़ी ही देर में मुसोलिनी ने सदन में प्रवेश किया। वह फासिस्ट सेना के प्रधान की वर्दी पहने हुए था। उसका चेहरा अत्यंत सख्त दिखाई दे रहा था किंतु उसकी ओर सदस्यों ने देखा तक नहीं।
मुसोलिनी सीधे ही अध्यक्ष की कुर्सी पर जाकर बैठ गया तथा उसने अत्यंत रूखे शब्दों में घोषणा की- ‘ग्राण्ड कौंसिल की आज की बैठक सिसली की घटनाओं पर विचार करेगी। सिसली का पतन होने पर वहाँ के निवासियों ने मित्र-सेनाओं को अपना मुक्ति-दाता कहकर स्वागत किया है। इटली के सैनिकों ने दुश्मनों का बहुत कम प्रतिरोध किया जबकि जर्मन सैनिकों ने वीरता-पूर्वक अंतिम दम तक शत्रु का मुकाबला किया।’
इसके बाद ग्राण्डी खड़ा हुआ। उसने कहा- ‘मैं यह घोषित करता हूँ कि इटली की बर्बादी और विपत्ति के लिए हमारी सेना दोषी नहीं है। इसका एकमात्र दोष मुसोलिनी पर है। इटालियन जनता के साथ विश्वासघात करके उसे जर्मनी की गोद में फैंक दिया गया है। मैंने उसी दिन मुसोलिनी से कहा था कि आपने देश की प्रतिष्ठा, भावना और सम्मान के विरुद्ध हमारे देश को युद्ध में घसीट लिया है। आज इटली की माताएं चिल्ला-चिल्ला कर कह रही हैं कि मुसोलिनी ने हमारे बेटों को युद्ध में झौंककर मार डाला।’
इसके बाद दोनों नेताओं में लम्बा-चौड़ा वाद-विवाद हुआ। इसी दौरान ग्राण्डी ने मुसोलिनी के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रख दिया। इस पर मुसोलिनी ने यह कहकर सदन की कार्यवाही स्थगति कर दी कि- ‘युद्ध मैंने आरम्भ किया था, अब मैं ही इसे समाप्त करूंगा।’
इस पर सदस्यों ने मुसोलिनी का कड़ा विरोध किया और रात दो बजे तक सदन में तीखी बहस चलती रही। अंत में प्रस्ताव पर वोटिंग कराई गई। मुसोलिनी के विरोध में 19 तथा समर्थन में 17 मत आए। मुसोलिनी सदन में हार गया।
मुसोलिनी ने सदन छोड़ने से पहले वक्तव्य दिया कि- ‘आप लोगों ने शासन पर संकट ला दिया है। इससे राजतंत्र पुनः प्रकाश में आएगा तथा लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा।’
फासिस्ट दल के सचिव ने मुसोलिनी की अब तक की सेवाओं के लिए धन्यवाद प्रस्ताव रखना चाहा किंतु मुसोलिनी ने यह प्रस्ताव रखने के लिए मना कर दिया और अपने कागज समेट कर सदन से चला गया। उसने सेना को आदेश दिए कि वह ग्राण्डी तथा सियानो को बंदी बना ले। सियानो मुसोलिनी का दामाद था किंतु इस समय वह भी मुसोलिनी के विरोध में खड़ा हो गया था।
राजा विक्टर से भेंट
अगले दिन सायं-काल में मुसोलिनी राजा से मिलने उसके महल में गया। इस समय वह सैनिक वर्दी में नहीं था अपितु साधारण नागरिक के कपड़ों में भा। किसी भी सीन्यौर (प्रधानमंत्री) के लिए राजा के समक्ष जाने का यही नियम था। राजा ने महल की सीढ़ियों पर खड़े होकर सीन्यौर का स्वागत किया।
इस समय राजा ने मार्शल की वर्दी पहन रखी थी। इस स्वागत को देखकर मुसोलिनी चौंका किंतु राजा उसे बहुत ही प्रेम से अपने कक्ष में ले गया।
मुसोलिनी ने राजा को बताया कि- ‘कौंसिल ने उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित किया है किंतु युद्ध-काल होने के कारण मैं उसका कुछ भी महत्त्व नहीं समझता।’
राजा ने मुसोलिनी को समझाया कि- ‘उसे कौंसिल के निर्णय का सम्मान करना चाहिए और अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए क्योंकि इटली में अब उसे कोई भी पसंद नहीं करता। अब वह इटली में सबसे घृणित व्यक्ति है। मार्शल बोडगोलियो को सेना और पुलिस का समर्थन प्राप्त है। इसलिए अब देश की सुरक्षा की जिम्मेदार बोडगोलियो को दे दी गई है।’
राजा की बात सुनकर मुसोलिनी निराश हो गया। लगभग 20 मिनट में यह भेंट समाप्त हो गई।
मुसोलिनी की गिरफ्तारी
मुसोलिनी महल की सीढ़ियाँ उतर कर अपनी गाड़ी ढूंढने लगा तभी एक मार्शल ने आकर उसे सैल्यूट किया और कहा कि आप इस गाड़ी में आएं। मुसोलिनी ने देखा कि रेडक्रॉस की बंद गाड़ी उसके सामने खड़ी थी।
मुसोलिनी ने पूछा- ‘क्या मुझे गिरफ्तार किया जा रहा है?’
अधिकारी ने जवाब दिया- ‘हाँ ड्यूस आपको गिरफ्तार किया जा रहा है।’
जिस समय रेडक्रॉस की चारों ओर से बंद गाड़ी में मुसोलिनी को राजा के महल से गिरफ्तार करके सैनिक बैरकों में ले जाया जा रहा था, उस समय रोम की सड़कों पर मित्र-राष्ट्रों की सेनाएं बम गिरा रही थीं। ये बम मुसोलिनी ने ही आमंत्रित किए थे। अगले दिन सुबह रोम के लोगों को ज्ञात हुआ कि मुसोलिनी को गिरफ्तार कर लिया गया है।
लोग खुशी के मारे सड़कों पर निकल आए। उन्होंने मुसोलिनी के चित्र जलाए और फासिस्ट पार्टी के कार्यालय पर हमला बोलकर उसे तहस-नहस कर दिया। मुसोलिनी को रोम से निकालकर कोटे-डी सियानो नामक द्वीप पर ले जाया गया जहाँ किसी समय रोमन सम्राट ऑगस्टस की राजकुमारी जूलिया, रोमन सम्राट नीरो की माता ‘ऐग्रिप्पिना’ तथा रोम के एक पोप को भी निर्वासन में रखा गया था।
फासिस्टवादी गडरिए से भेंट
जिस द्वीप पर मुसोलिनी को रखा गया था, उस द्वीप पर मित्र-राष्ट्रों की सेनाएं बम गिराने लगीं तो मुसोलिनी को अन्यत्र ले जाया गया। 25 जुलाई 1943 को मुसोलिनी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। जब हिटलर के कार्यालय से मुसोलिनी के बारे में पूछताछ की गई तो इटली की सरकार ने उसे कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। अंत में हिटलर को मुसोलिनी की गिरफ्तारी के बारे में पता लग गया।
उसने रोम में स्थित जर्मन राजदूत को आदेश दिया कि वह मुसोलिनी से भेंट करे किंतु नए प्रधानमंत्री ने इसकी अनुमति नहीं दी। कुछ दिन बाद मुसोलिनी को तीन हजार फुट की ऊँचाई पर स्थित ‘ग्रानसासो’ नामक स्थान पर ले जाया गया। एक दिन जब मुसोलिनी पहाड़ी पर टहल रहा था, तब एक गड़रिए ने मुसोलिनी को पहचान लिया। वह फासिस्ट पार्टी का सदस्य रह चुका था।
गड़रिए ने बताया कि- ‘जर्मन सेना आपको ढूंढती हुई रोम के दरवाजे तक आ चुकी है। जर्मन सेना को बताया गया है कि आप स्पेन भाग गए हैं जबकि इटली के लोगों को बताया गया है कि आपको गोली मार दी गई है। आप चिंता न करें। मैं आपके यहाँ होने की सूचना जर्मन सैनिकों तक पहुँचा दूंगा।’
मुसोलिनी की मुक्ति
अपने पुराने नेता के प्रति वफादारी दिखाते हुए उस गड़रिए ने यह बात रोम जाकर जर्मन सैनिकों को बता दी। आनन-फानन में यह सूचना हिटलर को भिजवाई गई। हिटलर ने कैप्टेन स्कोर्जनी को आदेश दिया कि वह अभी तत्काल इटली जाए और मुसोलिनी को छुड़ा कर लाए। कैप्टेन स्कोर्जनी ने ग्लेडियरों की सहायता से अपने सैनिक ठीक उसी पहाड़ी पर उतार दिए जहाँ मुसोलिनी को बंदी बनाया गया था।
जब मुसोलिनी ने इन ग्लेडियरों को पहाड़ी पर उतरते हुए देखा तो उसने सोचा कि मित्र-राष्ट्रों की सेना उसे पकड़ने के लिए आई है किंतु बाद में उसे ज्ञात हुआ कि ये जर्मन सैनिक हैं तथा मुसोलिनी के उद्धार के लिए आए हैं। कैप्टेन स्कोर्जनी मुसोलिनी को एक विमान में बैठाकर उसी समय जर्मनी ले गया। जर्मन सेना ने उसी दिन मुसोलिनी की पत्नी को भी उसके घर से निकाल कर जर्मनी पहुँचा दिया।
नया समझौता
बर्लिन में हिटलर और मुसोलिनी के बीच एक नया समझौता हुआ जिसके अनुसार हिटलर ने इटली में दुबारा मुसोलिनी की फासिस्ट सरकार बनाने का वचन दिया तथा मुसोलिनी ने इटली के कुछ क्षेत्र जर्मनी को देने स्वीकार किए।
मुसोलिनी की वापसी
मुसोलिनी इटली लौट आया। इस बार उसने अपना मुख्यालय गार्गनानो नामक स्थान पर बनाया तथा वहाँ से देश की जनता के नाम से संदेश प्रसारित किया कि इटली में फासिस्ट सरकार का पुनर्गठन कर दिया गया है तथा शासन की बागडोर पुनः मुसोलिनी ने अपने हाथ में ले ली है। इटैलियन और जर्मन अंतिम क्षण तक मित्र-राष्ट्रों के विरुद्ध लड़ते रहेंगे।
मुसोलिनी के आते ही इटली का राजा रोम छोड़कर मित्र-राष्ट्रों की शरण में चला गया। ग्राण्ड कौंसिल की बैठक में मुसोलिनी के विरुद्ध वोट देने वाले समस्त 19 सदस्यों को पकड़कर उन पर मुकदमा चलाया गया। इनमें से 18 लोगों को प्राणदण्ड दिया गया, जिनमें मुसोलिनी का दामाद काउण्ट सियानो भी था। एक व्यक्ति को तीस साल की कैद की गई।
मुसोलिनी की बेटी एडा सियानो ने मुसोलिनी से प्रार्थना की कि वह अपने दामाद को छोड़ दे किंतु मुसोलिनी ने मना कर दिया। एडा हिटलर के पास गई किंतु हिटलर ने कहा कि मैं मुसोलिनी से कुछ नहीं कह सकता। एडा के पास कुछ गुप्त सरकारी कागज थे, उनके बदले में उसने अपने पति को छुड़वाना चाहा किंतु मुसोलिनी ने मना कर दिया।
इसके बाद एडा यूरोप के प्रत्येक उस प्रभावशाली व्यक्ति के पास गई जिसका मुसोलिनी पर प्रभाव था किंतु मुसोलिनी ने सभी को इन्कार कर दिया।
रोम पर मित्र-राष्ट्रों का अधिकार
मुसोलिनी के दोबारा सत्ता में आने के बाद भी फासिस्ट सेनाएं हारती ही चली गईं। इसका मुख्य कारण इटली की वे देशभक्त सेनाएं थीं जो मुसोलिनी को अपना नेता नहीं मानती थीं। उन्होंने ‘राष्ट्रीय मुक्ति सेना’ बना ली थी जो युद्ध में मुसोलिनी का साथ नहीं दे रही थी। 4 जून 1944 को रोम पर मित्र-राष्ट्रों की सेनाओं का अधिकार हो गया।
मुसोलिनी की हत्या
अप्रेल 1945 में मीलान शहर में मुसोलिनी तथा राष्ट्रीय मुक्ति सेना के अधिकारियों के बीच बैठक आयोजित की गई। राष्ट्रीय मुक्ति सेना जर्मनी और हिटलर से सम्बन्ध तोड़ने और युद्ध बंद करने की मांग कर रही थीं किंतु मुसोलिनी इन शर्तों को स्वीकार नहीं कर सकता था। मुसोलिनी बैठक से बाहर निकला तथा एक बंद मोटरगाड़ी में बैठकर अपने कुछ विश्वस्त साथियों एवं जर्मन अंगरक्षकों के साथ कोमो नामक शहर के लिए रवाना हो गया।
मार्ग में क्लारा भी उसे मिल गई। देशभक्त सेनाओं को मुसोलिनी के भागने का पता चल गया। उन्होंने मुसोलिनी के काफिले का पीछा किया तथा उसके बहुत से अंगरक्षकों को गोली मारी दी। अंत में वे लोग डोंगो पहुँचे। यहाँ देशभक्त सैनिकों के दस्ते ने नाकाबंदी करके इस काफिले को रोक लिया तथा प्रत्येक गाड़ी की तलाशी ली और सभी को उतारकर गिरफ्तार कर लिया गया।
अंत में एक जर्मन लॉरी की तालशी ली गई जिसमें ड्राइवर के केबिन की पीछे एक आदमी जर्मन आवेर कोट पहने हुए झपकियां ले रहा था। उसका लौह-टोप आंखों तक आगे की ओर लटका हुआ था जिससे उसका चेहरा ढंका हुआ था। ओवरकोट का कॉलर भी ऊंचा उठा हुआ था तथा आंखों पर काला चश्मा था।
जब जर्मन लोगों से पूछा गया कि यह कौन है तो जर्मन सिपाहियों ने जवाब दिया कि यह हमारा साथी है जो बहुत अधिक शराब पिए हुए है किंतु उनका यह ‘झूठ’ काम नहीं आया। देशभक्त सैनिकों के कर्नल बेलारियो तथा रेंजो नामक एक सैनिक ने मुसोलिनी को पहचान लिया। उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।
26 अप्रैल 1945 को राष्ट्रीय मुक्ति सेना ने मुसोलिनी एवं उसके साथियों को अमरीकी सेना के हवाले कर दिया। 28 अप्रैल 1945 को मुसोलिनी, उसकी प्रेमिका क्लारा पेटाची और मुसोलिनी के सहयोगियों की हत्या करके उनके शव बेहद भद्दे तरीके से मीलान शहर में ले जाकर चौराहे पर टांग दिए गए।
लोगों ने मुसोलिनी तथा उसके साथियों के चेहरों पर घृणा से थूका तथा उनके चेहरे पर कीचड़ लगाकर अपने क्रोध का प्रदर्शन किया। इसी के साथ इटली में फासीवादी आंदोलन का अंत हो गया। अमरीकी सैनिक मुसोलिनी का मस्तिष्क निकालकर अमरीका ले गए ताकि उसके मस्तिष्क का अध्ययन किया जा सके।
मुसोलिनी के साथ चल रही गाड़ियों से एक अरब लीरा (इटैलिनयन मुद्रा), 66 किलो स्वर्ण, 1 करोड़ 60 लाख फ्रैंक (फ्रैंच सिक्का), 2 लाख स्विस फ्रैंक, ब्रिटिश पौण्ड, भारी मात्रा में अमरीकी डॉलर, स्पेन की मुद्रा, पुर्तगाल का क्यूडो भी प्राप्त हुए। हीरे-जवाहरात की अंगूठियां भी बहुत संख्या में थीं।
वर्ष 1946 में इटली में इटली में गणराज्य की स्थापना हुई। यह वह समय था जब द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया में अधिकांश देशों के नक्शे बदल रहे थे और नई सरकारों की स्थापना हो रही थी।
गणतन्त्र शासन की स्थापना
2 जून 1946 को इटली में आम-चुनाव हुए जिनमें देश की जनता ने गणतंत्र शासन की स्थापना के पक्ष में मत दिया। इसके बाद 10 जून 1946 को इटली गणतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित हो गया और इस प्रकार इटली में गणराज्य की स्थापना हो गई।
साम्राज्यिक चिह्नों का अंत
18 जून 1946 को तत्कालीन अस्थायी सरकार ने ‘आर्डर ऑफ द डे’ नामक एक आदेश जारी करके इटली में पहले से चले आ रहे समस्त विधिक तथा शासकीय आदेशों, परिपत्रों आदि में अंकित साम्राज्यपरक संदर्भों तथा अवशेषों को पूर्णतः समाप्त कर दिया। इटली के राष्ट्रध्वज पर अंकित ‘हाउस ऑफ सेवाय की ढाल’ (शील्ड) के चिह्न को भी हटा दिया गया। इस प्रकार इटली में विगत लगभग दो हजार सालों से चले आ रहे राजतंत्र का अंत हो गया।
श्रम पर आधारित जनतांत्रिक गणतंत्र
22 दिसम्बर 1947 को इटली की संविधान सभा ने नया संविधान पारित कर दिया और 1 जनवरी 1948 से इटली में नया संविधान लागू हो गया। इसमें 139 अनुच्छेद तथा 18 संक्रमणकालीन धाराएँ हैं। संविधान में इटली का उल्लेख ‘श्रम पर आधारित जनतांत्रिक गणतंत्र’ के रूप में किया गया है।
इटली की संसद
इटली की संसद के दो अंग हैं- ‘प्रतिनियुक्तों का सदन’ तथा ‘सीनेट’। सदन के सदस्यों का चुनाव प्रति पाँचवें वर्ष वयस्क मताधिकार के माध्यम से प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति द्वारा किया जाता है। ‘डेपुटी’ पद के प्रत्याशी को कम से कम 25 वर्ष का होना चाहिए। उसका निर्वाचन मतदान द्वारा 80,000 व्यक्ति करते हैं।
सीनेट एवं राष्ट्रपति के चुनाव
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सीनेट के सदस्यों का चुनाव छः वर्ष के लिए क्षेत्रीय आधार पर किया जाता है। प्रत्येक क्षेत्र में कम से कम छः सीनेटर चुने जाते हैं और प्रत्येक सीनेटर दो लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है। किंतु ‘वाल दष्ओस्ता’ क्षेत्र से केवल एक ही सीनेटर का निर्वाचन होता है। राष्ट्रपति पाँच ऐसे व्यक्तियों को जीवन भर के लिए सीनेट के सदस्य मनोनीत कर सकता है जो समाज-विज्ञान, कला, साहित्य आदि के क्षेत्र में प्रख्यात एवं जाने माने हों। कार्यकाल समाप्त हो जाने पर इटली का राष्ट्रपति, जीवन भर के लिए सीनेट का सदस्य बन जाता है किंतु वह सदस्यता छोड़ भी सकता है। सदन तथा सीनेट के संयुक्त अधिवेशन में दो-तिहाई बहुमत से राष्ट्रपति का निर्वाचन किया जाता है जिसमें प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद् से तीन-तीन सदस्य मतदान करते हैं (वाल दष्ओस्ता से केवल एक सदस्य मतदान करता है)। तीन बार मतदान के बाद भी यदि राष्ट्रपति पद के किसी भी उम्मीदवार को दो तिहाई मत नहीं मिल पाते तो पूर्ण-बहुमत पानेवाले प्रत्याशी को राष्ट्रपति चुन लिया जाता है। राष्ट्रपति की आयु 50 वर्ष से ऊपर होनी आवश्यक है। उसका कार्यकाल सात वर्ष का होता है। सीनेट का अध्यक्ष राष्ट्रपति के डिप्टी की हैसियत से कार्य करता है। राष्ट्रपति संसद के सदनों का विघटन कर सकता है किन्तु कार्यकाल समाप्ति के पूर्व के छः महीनों में उसे यह अधिकार नहीं रहता।
न्यायालय
इटली में 15 न्यायाधीशों का एक संवैधानिक न्यायालय है जिसके पाँच न्यायाधीशों को राष्ट्रपति, पाँच को संसद् (दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में) तथा पाँच न्यायाधीशों को देश के सर्वोच्च न्यायालय (विधि तथा प्रशासन सम्बन्धी) नियुक्त करते हैं। इटली के संवैधानिक न्यायालय को लगभग वैसे ही अधिकार प्राप्त हैं जैसे अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय को।
रोमन कैथोलिक चर्च का आशय किसी एक विशिष्ट भवन से न होकर विश्व-व्यापी संस्था से है। यह विश्व का सबसे बड़ा ईसाई चर्च है। इस चर्च के सदस्यों की संख्या एक सौ करोड़ से अधिक है। उनके नेता पोप हैं जो विश्व भर में फैले हुए ईसाई धर्माध्यक्षों अर्थात् पादरियों, बिशपों एवं कार्डिनलों के समुदाय के प्रधान हैं। रोम का कैथोलिक चर्च पश्चिमी और पूर्वी कैथोलिक चर्चों का एक समागम है।
रोमन कैथोलिक चर्च का लक्ष्य यीशू मसीह के सुसमाचार संसार भर के लोगों तक पहुँचाना, श्रद्धालु मनुष्यों को ईसाई संस्कार प्रदान करना तथा दयालुता के प्रयोग करना है। यह चर्च विश्व के सबसे पुराने संस्थानों में से एक है और इसने पश्चिमी सभ्यता के इतिहास में प्रमुख भूमिका निभाई है।
चर्च की स्थापना
ईसाई जगत् में मान्यता है कि रोम के इस कैथोलिक चर्च को यीशू मसीह द्वारा स्थापित किया गया था तथा सेंट पीटर को इस चर्च का पहला बिशप नियुक्त किया था। इस कारण इसे ‘पापल बेसिलिका ऑफ सेंट पीटर’ भी कहा जाता है। कैथोलिक जगत् में यह भी मान्यता है कि सेंट पीटर को स्वर्ग की चाबियां सौंपी गई थीं। रोम का सेंट पीटर कैथोलिक चर्च संसार का सबसे पहला चर्च है। इस चर्च के धर्माध्यक्ष धर्मदूतों के उत्तराधिकारी हैं। इस चर्च के पोप को संत पीटर के उत्तराधिकारी के रूप में सार्वभौमिक प्रधानता प्राप्त है।
चर्च का भवन
ईसा मसीह ने जिस चर्च की स्थापना की थी, उस समय इसका भवन निःसंदेह बहुत साधारण रहा होगा। उसके बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता किंतु सेंट पीटर की मृत्यु के बाद उन्हें उसी चर्च में दफनाया गया था। चौथी शताब्दी ईस्वी में जब रोमन एम्परर कॉस्टेन्टाइन ने पुराने चर्च के स्थान पर एक नए चर्च का निर्माण करवाया तो सेंट पीटर की कब्र को सुरक्षित रखा गया। वर्तमान बेसिलिका का निर्माण ई.1506 में आरम्भ किया गया तथा इसका विशाल भवन और उसके चारों ओर की सरंचनाएं ई.1626 में बनकर पूरी हुईं। सेंट पीटर की कब्र अब भी इसी चर्च के अंदर तथा उसी स्थान पर है, जहाँ उसे मूल रूप से दफनाया गया था।
पवित्र आत्मा का मार्ग-दर्शन
चर्च का कहना है कि उसे पवित्र आत्मा अर्थात् ईसा मसीह का मार्ग-दर्शन प्राप्त है जिसके कारण वह धार्मिक विश्वास और नैतिकता पर अपनी शिक्षाओं को अचूकता से परिभाषित कर सकता है।
यूकेरिस्ट
कैथोलिक पूजा ‘यूकेरिस्ट’ पर केंद्रित है जिसके अनुसार चर्च की मान्यता है कि ‘रोटी और शराब यीशू मसीह के शरीर और रक्त में अलौकिक रूप से रूपांतरित हैं।’
माता मरियम के प्रति विशेष श्रद्धा
यह चर्च माता मरियम के प्रति विशेष श्रद्धा रखता है। मरियम के सम्बन्ध में कैथोलिक मान्यताओं में उनका मूल, पाप के दाग से रहित, निर्मल गर्भधारण तथा उनके जीवन के अंत में स्वर्ग में स्थाई निवास करने सम्बन्धी धारणाएं सम्मिलित हैं।
कैथोलिक शब्द का अर्थ
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कैथोलिक शब्द मूलतः ग्रीक शब्द ‘कैथोलिकोस’ से बना है जिसका अर्थ है- ‘सार्वभौमिक’। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग दूसरी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में चर्च के वर्णन के लिए किया गया था। ई.1054 में पूर्वी एवं पश्चिमी सम्प्रदायों के विभाजन के बाद जो ईसाई चर्च, रोम के पोप के साथ जुड़े रहे, वे ‘कैथोलिक‘ कहलाए तथा जो चर्च पोप की सत्ता को नहीं मानते थे, वे ‘पूर्वी यूनानी चर्च’ ‘रूढ़िवादी’ या ‘पूर्वी रूढ़िवादी’ (ऑर्थोडोक्स) के नाम से जाने गए। इस विभाजन के बाद पश्चिमी ईसाइयों का धर्माध्यक्ष ‘पोप’ कहलाता रहा जबकि पूर्वी ईसाइयों का धर्माध्यक्ष ‘पात्रिआर्क’ कहलाया। इस विभाजन के तत्काल बाद पोप तथा पात्रिआर्क दोनों ने एक दूसरे को ईसाई धर्म से बहिष्कृत कर दिया। 16वीं सदी में हुए सुधारों के बाद, रोम के पोप के साथ जुड़े चर्चों ने स्वयं को प्रोटेस्टेंट चर्चों से अलग रखने के लिए अपने लिए ‘कैथोलिक’ शब्द का प्रयोग किया। कैथोलिक चर्च की प्रश्नोत्तरी के शीर्षक में भी ‘कैथोलिक चर्च’ का प्रयोग किया गया है। इन्हीं शब्दों का प्रयोग पॉल (षष्ठम्) ने दूसरी वेटिकन परिषद् के सोलह दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते समय किया था। पोप के तथा धर्माध्यक्षीय सम्मेलनों के दस्तावेजों में कभी-कभी चर्च का नाम ‘रोमन कैथोलिक चर्च’ प्रयुक्त किया गया है। पोप पायस (दशम्) की प्रश्नोत्तरी में चर्च को ‘रोमन’ कहा गया है।
प्रारंभिक ईसाइयत
कैथोलिक सिद्धांत के अनुसार पोप, संत पीटर के उत्तराधिकारी हैं। कैथोलिक मत बताता है कि कैथोलिक चर्च की स्थापना यीशू मसीह द्वारा प्रथम सदी ईस्वी में की गई एवं धर्म-प्रचारकों पर पवित्र आत्मा आने से इसकी सार्वजनिक सेवा आरम्भ होने का संकेत मिला।
यीशू के धर्म-प्रचारकों ने भूमध्यसागरीय समुद्र के पास यहूदी समुदायों में धर्मांतरितों को पाया। टारसस के पॉल आदि धर्म-प्रचारकों ने गैर-यहूदियों को ईसाई धर्म में धर्मान्तरित करना आरम्भ किया। इसी काल में ईसाई धर्म यहूदी परम्पराओं से अलग हुआ और इसने स्वयं को पृथक धर्म के रूप में स्थापित किया।
रोम के बिशप को अन्य पादरियों पर सर्वोच्चता
प्रारंभिक चर्च का संगठन अधिक शिथिल था और ‘इवेंजिलवाद’ पर आधारित था जिसके परिणाम स्वरूप ईसाई मत की अलग-अलग व्याख्याएं प्रचलित थीं। अपनी शिक्षाओं में एकरूपता लाने के लिए द्वितीय सदी के आरम्भ में, चर्च ने पादरियों की विभिन्न श्रेणियों की सुनिश्चित व्यवस्था आरम्भ की। केन्द्रीय ‘धर्माध्यक्ष’ को अपने शहर में पादरी वर्ग पर सर्वोच्चता का अधिकार दिया गया।
इसके साथ ही एक धर्मप्रदेशीय संगठन स्थापित किया गया जो रोमन साम्राज्य के क्षेत्रों एवं शहरों का प्रतिनिधित्व करता था। राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण शहरों के धर्माध्यक्षों ने, निकटवर्ती शहरों के धर्माध्यक्षों पर वृहत् अधिकार प्राप्त करने के प्रयास किए। उस काल में एंटिओक, एलेक्जेंड्रिया एवं रोम के चर्चों के स्थान सर्वोच्च थे।
सार्वभौम धर्म-सभाएं
चर्च के सिद्धांतों को समय-समय पर होने वाली सार्वभौम धर्म-सभाओं द्वारा परिभाषित किया गया। द्वितीय शताब्दी ईस्वी में धर्माध्यक्ष सैद्धान्तिक एवं नीति सम्बन्धी मामलों को सुलझाने के लिए क्षेत्रीय धर्म-सभाओं का आयोजन करते थे। आगे चलकर धर्म-विज्ञानियों एवं धर्म-शिक्षकों की एक शृंखला द्वारा धर्म-सिद्धांतों को और अधिक परिष्कृत किया गया जिन्हें सामूहिक रूप से चर्च-पिताओं (फादर) के नाम से जाना जाता है।
धर्म विषयक विवादों को सुलझाने में सार्वभौम परिषदों को निर्णयकारी माना गया। इन सार्वभौम परिषदों से जो सैद्धांतिक सूत्र निकले वे ईसाई धर्म के इतिहास में मील के पत्थर सिद्ध हुए।
पोप की अपील कोर्ट के रूप में भूमिका
तृतीय शताब्दी ईस्वी तक, रोमन धर्माध्यक्ष ने उन समस्याओं पर ‘अपील कोर्ट’ के रूप में कार्य करना प्रारंभ कर दिया जिन्हें क्षेत्रीय धर्माध्यक्ष नहीं सुलझा पाते थे।
ईसाइयों के बारे में दुष्प्रचार
रोमन साम्राज्य के अधिकांश धर्मों के विपरीत, ईसाई धर्म चाहता था कि उसके अनुयायी अन्य दूसरे ईश्वरों को त्याग दें। ईसाईयों द्वारा गैर-ईसाई समारोहों में शामिल होने से इंकार किया जाता था। इस कारण वे सार्वजनिक जीवन के अधिकांश समारोहों एवं अवसरों में सम्मिलित नहीं होते थे।
इस अस्वीकृति ने गैर-इसाईयों में भय उत्पन्न किया कि ईसाई लोग रोम के देवताओं को नाराज कर रहे हैं। रोम के आरम्भिक ईसाइयों ने अपने कर्मकाण्डों को गोपनीय रखा जिसके कारण जन-साधारण में ईसाइयों के बारे में कई तरह की अफवाहें फैल गईं। कहा जाने लगा कि ईसाई उच्छृंखल, कौटुम्बिक व्यभिचारी एवं नरभक्षी हैं। उस काल के स्थानीय अधिकारियों ने भी इन अफवाहों के कारण ईसाईयों को उपद्रवी मानकर उन्हें सताया।
ईसाई मतावलम्बियों की प्रताड़ना
तीसरी सदी के अंत में इसाईयों को पीड़ित करने का संगठित सिलसिला प्रारंभ हुआ। रोमन एम्परर ने आदेश जारी किया कि ईसाइयों की उपस्थिति के कारण रोम के देवता कुपित हो गए हैं, इस कारण साम्राज्य में सैनिक, राजनीतिक एवं आर्थिक संकट आ रहे हैं। इस आदेश के बाद बहुत से इसाईयों को सजा मिली।
बहुत से बंदी बनाए गए, उत्पीड़ित किए गए, उनसे बल-पूर्वक श्रम करवाया गया, उनमें से बहुत से बधिया कर दिए गए या वेश्यालयों में भेज दिए गए। बहुत से ईसाई चुपचाप रोम छोड़कर भाग गए। जो ईसाई, राजकीय कर्मियों द्वारा पहचाने नहीं जा सके, वे रोम में ही चुपचाप निवास करते रहे। कुछ लोगों ने सम्राट के भय से ईसाई धर्म छोड़ दिया।
डोनाटिस्टों तथा नोवाटिआनिस्टों का विभाजन
इसी काल में कैथोलिक चर्च में धर्मगुरुओं की भूमिका को लेकर मतभेद हो गया तथा ईसाई मतावलम्बी डोनाटिस्टों तथा नोवाटिआनिस्टों में विभाजित हो गए।
ईसाई धर्म को रोमन एम्परर की मान्यता
ई.313 में सम्राट कॉन्स्टेंटाइन द्वारा कैथोलिक इसाईयत को कानूनी मान्यता दी गई।
रोमन साम्राज्य की राजधानी का परिवर्तन
ई.325 में रोम का एम्परर कॉन्स्टेंटीन, रोमन साम्राज्य की राजधानी को बिजैन्तिया (बिजेन्टाइन) ले गया तथा बाद में उसके निकट नई राजधानी का निर्माण किया गया जिसे सम्राट के नाम पर कान्सटेंटिनोपल (कुस्तुंतुनिया) कहा गया।
एरियन एवं कैथोलिक ईसाइयों का विभाजन
ई.325 में रोम के ईसाई समुदाय में इस विचार को लेकर बड़ा विवाद छिड़ गया कि ईसा का अस्तित्व अनन्त काल तक नहीं था बल्कि वे ईश्वर द्वारा निर्मित थे और इसलिए वे पिता-ईश्वर से कमतर हैं। इस सिद्धांत को ‘एरियनवाद’ कहा जाता है। एरियनवाद पर विचार करने के लिए ई.325 में निकाईया में ईसाई संघ की प्रथम परिषद् बुलाई गई जिसमें एरियनवाद को अस्वीकार कर दिया गया तथा ईसा के अस्तित्व एवं ईश्वरत्व सदा स्थायी रहने वाले माने गए। इस पर ‘ऐरियन ईसाई’, ‘कैथोलिक मत’ से अलग हो गए।
ईसाई धर्म को राजधर्म की मान्यता
ई.380 में ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का राजधर्म घोषित किया गया।
बाईबिल-सम्बन्धी आधिकारिक आदेश
ई.382 में रोम की सभा ने बाईबिल के सम्बन्ध में प्रथम आधिकारिक आदेश जारी किया तथा ओल्ड एवं न्यू टेस्टामेण्ट की मान्य पुस्तकों को सूचीबद्ध किया।
एकीकृत ईसाई जगत् की स्थापना के प्रयास
ई.387 में नाइसिया की द्वितीय परिषद हुई। पहली सात सार्वभौम परिषदों ने ईसाई संघ की मान्यताओं के बारे में एक परम्परागत सर्वसम्मति बनाने और एकीकृत ईसाई जगत की स्थापना करने की दिशा में कार्य किया।
निकेने धर्मसार
ईसाई धर्म के सिद्धान्तों को संक्षिप्त रूप से अभिव्यक्त करने के लिए, सभा ने एक धर्मसार जारी किया जिसे ‘निकेने धर्मसार’ कहा जाता है। इस परिषद् ने चर्च के क्षेत्र को भौगोलिक एवं प्रशासकीय क्षेत्रों में चिह्नित किया जिसे ‘धर्मप्रदेश’ कहा गया।
चर्च द्वारा लैटिन भाषा को मान्यता
रोमन साम्राज्य में अत्यंत प्राचीन काल में संस्कृत भाषा बोली जाती थी। सैंकड़ों साल के अंतराल में उसी संस्कृत से लैटिन भाषा का जन्म हुआ। इस कारण लैटिन भाषा को हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की रोमन शाखा में रखा जाता है। यह आज भी संस्कृत से मिलती-जुलती है। फ्रैंच, इटालवी, जर्मन स्पैनिश, रोमानियाई और पुर्तगाली भाषाओं का जन्म लैटिन भाषा से हुआ है किंतु अंग्रेजी भाषा इससे अलग एवं स्वतंत्र मानी जाती है।
चौथी शताब्दी ईस्वी में, पोप डमासस (प्रथम) ने अपने सचिव सेंट जेरोम को उत्कृष्ट क्लासिकल लैटिन भाषा में बाईबिल के नए अनुवाद का कार्य सौंपा। चर्च अब लैटिन भाषा में सोचने एवं पूजा-प्रार्थना करने के लिए प्रतिबद्ध था। लैटिन भाषा ने चर्च के रोमन अनुष्ठान में पूजन पद्धति की भाषा के रूप में अपनी भूमिका जारी रखी और आज भी चर्च की आधिकारिक भाषा के रूप में लैटिन ही प्रयुक्त होती है। यद्यपि वर्तमान में लैटिन को एक मृत भाषा माना जाता है तथापि रोमन कैथोलिक चर्च की धर्मभाषा और वैटिकन सिटी राज्य की राजभाषा यही लैटिन है।
नेस्टोरियनों एवं मोनोफिसाइटों के बीच विभाजन
ई.431 में इफेसस की धर्म-सभा और ई.451 में कैलसीडन की धर्म-सभा ने ईसा मसीह की दिव्यता एवं मानवीय स्वभावों में सम्बन्धों को परिभाषित किया। अनेक ईसाई इन व्याख्याओं से असंतुष्ट थे जिसके कारण वे दो नेस्टोरियन एवं मोनोफिसाइट समुदायों में विभक्त हो गए।
पोप की सर्वोच्चता
ई.325 में रोमन सम्राट कॉन्स्टेंन्टाइन के रोम छोड़कर बेजेन्टाइन (विजेन्तिया) जाने से लेकर ई.500 के बीच पोप के अधिकारों में लगातार वृद्धि हुई। ई.451 में कैलसीडन की सभा में कॉन्सटेंटिनोपल (कुस्तुंतुनिया) के धर्माध्यक्ष को रोम के धर्माध्यक्ष के बाद प्रमुखता एवं शक्ति में ‘द्वितीय’ घोषित किया गया।
जनजातीय समुदायों का ईसाई बनना
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन (ई.410) के समय तक, कई यूरोपीय जनजातियां ईसाई धर्म अपना चुकी थीं किंतु उनमें से अधिकतर जनजातियों जिनमें ओस्त्रोगोथ, विसिगोथ, बुर्गुण्डि और वाण्डाल शामिल थे, ने ईसाई धर्म की शिक्षाओं को ‘अरियासवाद’ के रूप में अपनाया था। यह एक ऐसी धार्मिक पद्धति थी जिसे कैथोलिक चर्च द्वारा पहले ही अमान्य घोषित कर दिया गया था।
यूरोपीय एरियन तथा रोमन कैथोलिकों में विवाद
जब इन जनजातीय कबीलों ने रोमन साम्राज्य के विजित प्रदेशों पर अपने छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना की तो इन जातियों के प्राचीन ईसाई सम्प्रदाय, जिसे यूरोपीय एरियन कहा जाता था और रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय के बीच धार्मिक मतभेद उत्पन्न हो गया। अन्य जनजातीय कबीलों के राजाओं के विपरीत, फ्रेंक जाति का शासक क्लोविस (प्रथम), ई.497 में अरियासवाद सम्प्रदाय को छोड़कर कैथोलिक मत में दीक्षित हो गया।
इससे इटली में निवास कर रहे उत्तरी यूरोप के जनजातीय कबीलों में फ्रैंक कबीले की स्थिति अधिक मजबूत हो गई क्योंकि अब उसका कैथोलिक चर्च के पोप के साथ सीधा सम्बन्ध स्थापित हो गया। कुछ अन्य यूरोपीय राज्यों ने भी फ्रैंकों का अनुकरण किया। अंततः ई.589 में स्पेन में विसिगोथ और 7वीं शताब्दी ईस्वी में इटली में लोम्बर्ड्स ने भी कैथोलिक चर्च के धर्म को स्वीकार कर लिया।
सेंट बेनेडिक्ट द्वारा ईसाई मठों की व्यवस्था में सुधार
6वीं शताब्दी के आरम्भ में, यूरोपीय धार्मिक मठों ने संत बेनेडिक्ट के शासन-ढांचे का अनुसरण किया जिससे वे जन सामान्य के लिए आध्यात्मिक केंद्र होने के साथ-साथ कला, शिल्प, लेखन, पुस्तकालय और कृषि केन्द्रों की कार्यशाला आदि विविध उपयोगों के लिए विकसित हो गए। इससे इन चर्चों की लोकप्रियता में अपार विस्तार हुआ।
पोप ग्रेगरी (प्रथम) द्वारा इंग्लैण्ड में ईसाई धर्म का प्रचार
छठी शताब्दी ईस्वी के अंत में पोप ग्रेगरी (प्रथम) (ई.540-604) ने चर्च में प्रशासनिक सुधारों और ग्रेगोरियन मिशन की शुरूआत की। उन्हें पोप ग्रेगरी महान् भी कहा जाता है। ईसाई धर्म का सर्वोपरि नेता चुने जाने के पहले उन्हें रोमन सिनेटर का सम्मान प्राप्त था। वे राजनीति के क्षेत्र को छोड़कर धर्म के क्षेत्र में आ गए।
ई.590 में उन्हें पोप चुना गया। पोप ग्रेगरी ने इंग्लैण्ड में ईसाई धर्म के व्यापक प्रचार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पाँचवी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ तक इंग्लैंड रोमन साम्राज्य का ही हिस्सा था किंतु रोमन साम्राज्य के बिखर जाने के बाद इंग्लैण्ड से रोमन प्रभाव तथा ईसाई धर्म दोनों का लोप होने लगा।
इस काल में ‘एंजल्स’ नामक एक जर्मन जाति जर्मनी से आकर इंग्लैण्ड में बसने लगी जो विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करती थी। इस जाति ने इंग्लैंड के ईसाई धर्म को नष्ट कर दिया। एक बार पोप ग्रेगरी ने कुछ अंग्रेज बालकों को रोम के बाजार में दास के रूप में बिकते हुए देखा।
पोप इन बालकों की सुंदरता से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने निश्चय किया कि ब्रिटिश द्वीप में फिर से ईसाई धर्म का प्रचार किया जाए। उन्होंने आगस्टाइन नामक एक प्रसिद्ध पादरी को इंग्लैंड भेजा। आगस्टाइन ने केंट के राजा एथलबर्ट के दरबार में जाकर ईसाई धर्म का प्रचार प्रारंभ किया।
एथलबर्ट ने फ्रांस की एक ईसाई राजकुमारी से विवाह किया था, अतः एथलबर्ट ने सरलता से ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और आगस्टाइन को केंटरबरी में एक गिरजाघर बनाने की अनुमति प्रदान की। इस प्रकार पोप ग्रेगरी के प्रयत्नों से इंग्लैंड में ईसाई धर्म का फिर से प्रचार आरम्भ हुआ।
पोप ग्रेगरी द्वारा ईसाई धर्म के ग्रंथों का निर्माण
पोप ग्रेगरी ने ईसाई धर्म के सर्वोच्च नेता के रूप में उच्च-स्तरीय प्रशासकीय प्रतिभा का परिचय दिया। उनके पत्रों से उनकी व्यावहारिक बुद्धि और प्रशासनिक योग्यता का परिचय मिलता है। पोप ग्रेगरी ने ईसाई धर्म के उस समय तक प्रचलित ग्रंथों की समीक्षा की तथा ईसाई धर्म की मुख्य बातों को वार्तालाप के रूप में प्रस्तुत किया।
लैटिन भाषा की इन रचनाओं में उन्होंने गूढ़ विषयों के निरूपण के लिए अधिकांशतः रूपक शैली का प्रयोग किया। इस शैली में शब्द दो अर्थ रखते हैं, एक तो ऊपरी अर्थ जो स्वतः स्पष्ट होता है और दूसरा लाक्षणिक अर्थ जिससे धर्म सम्बन्धी गूढ़ विचार भी सरलता से समझ में आ जाते हैं। पोप ग्रेगरी ने ईसाई धर्म से पहले की कथाओं के स्थान पर ईसाई संतों की कहानियों का प्रचार करवाया।
उन्होंने जो कुछ भी लिखा, धर्म के व्यापक प्रचार की भावना से लिखा। उनका ध्यान विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति पर था, न कि शैली पर। फिर भी उनकी भाषा में सौंदर्य और प्रभावोत्पादकता का अद्भुत समन्वय हुआ है।
दक्षिणी भूमध्य भागों से पोप के प्रभाव की समाप्ति
7वीं शताब्दी ईस्वी में मुस्लिम आक्रांताओं ने दक्षिणी भूमध्य क्षेत्र के अधिकांश भागों को जीत लिया। इस कारण इन क्षेत्रों से पोप का प्रभाव समाप्त हो गया। यहाँ तक कि स्वयं पश्चिमी ईसाई जगत के लिए भी खतरा उत्पन्न हो गया।
एम्परर और पोप के सम्बन्धों में सुधार से कैथोलिक धर्म का प्रचार
रोम के कैरोलिनगियन राजाओं ने एम्परर और पोप के बीच के सम्बन्धों को सशक्त बनाया। ई.754 में सबसे युवा राजकुमार पीपीन (पेपिन) को रोम के पोप स्टीफन (द्वितीय) द्वारा एक भव्य समारोह में ताज पहनाया गया। पीपीन ने लोम्बर्ड्स को परास्त करके कैथोलिक राज्य का विस्तार किया। जब उसका पुत्र शार्लमेन सम्राट बना तो उसने अपनी शक्ति का तेजी से विस्तार किया।
ई.782 तक वह पश्चिमी राजाओं में सबसे ताकतवर ईसाई शासक हो गया। ई.800 में उसने रोम में कैथोलिक राज्याभिषेक प्राप्त किया। उसने सम्राट के, कैथोलिक चर्च के संरक्षक के रूप में हस्तक्षेप करने के अधिकार की व्याख्या की।
सिरिलिक वर्णमाला का आविष्कार
9वीं शताब्दी ईस्वी में बुल्गारिया में संत स्यरिल और मेथोडिउस द्वारा सिरिलिक वर्णमाला का आविष्कार किया गया।
ऑर्थोडोक्स का कैथोलिक चर्च से अलगाव
9वीं सदी में, मूर्ति-भंजन तथा धार्मिक चित्रों के विनाश ने रोमन चर्च तथा पूर्वी चर्च के बीच नए सिरे से फूट की शुरूआत की। रोमन ईसाई माता मैरी तथा ईसा मसीह के चित्रों एवं मूर्तियों की पूजा करते थे। साथ ही अन्य ईसाई संतों की भी मूर्तियां एवं चित्रों को पूजाघरों में स्थान देते थे। जबकि पूर्वी ईसाई इसके विरोधी थे तथा इसे ईसाई धर्म के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध मानते थे।
9वीं शताब्दी ईस्वी में बीजेन्टाइन (कुस्तुंतुनिया) द्वारा नियंत्रित दक्षिणी इटली एवं बल्गेरियाई मिशनों में गिरिजाघर के क्षेत्राधिकारों को लेकर संघर्ष हुआ जिससे दोनों चर्चों के बीच मतभेद इतना बढ़ा कि ई.1054 में दोनों चर्चों में औपचारिक अलगाव हो गया। फूट के बाद, कुस्तुंतुनिया के ईसाई सम्प्रदाय को रूढ़िवादी चर्च कहा जाने लगा, जबकि रोम के पोप के साथ संलग्नता दिखाने वाले चर्चों को कैथोलिक कहा गया।
बाद में ई.1274 में ल्यों में आयोजित परिषद और ई.1439 में फ्लोरेंस में आयोजित परिषद में दोनों चर्चों के मतभेद दूर करने के प्रयास हुए किंतु इन प्रयासों को सफलता नहीं मिली।
पोप पर एम्परर की सर्वोच्चता सीमित करने के प्रयास
11वीं और 12वीं सदी में रोमन चर्च में आंतरिक सुधार के प्रयास किए गए। ई.1059 में पोप के चुनाव को सम्राट और कुलीनों के हस्तक्षेप से मुक्त कराने के लिए कार्डिनल कॉलेज स्थापित किया गया। ई.1122 में पोप तथा एम्परर के बीच यह सहमति हुई कि चर्च के धर्माध्यक्ष का चयन चर्च के कानून के अनुसार किया जाएगा।
पोप ग्रेगरी (सप्तम्) के काल में पोप और एम्परर के बीच ‘अलंकरण-विवाद’ भड़क उठा। रोम के एम्परर द्वारा धर्माध्यक्षों को अलंकृत किया जाता था। राजा के इस अधिकार के कारण पोप पर राजा की सर्वोच्चता प्रकट होती थी। इसलिए पोप ने एम्परर के इस अधिकार का विरोध किया।
सेंट्रल चर्च ऑर्गेनाइजेशन
14वीं सदी के आरम्भ में रोम में एक केंद्रीकृत चर्च संगठन (सेंट्रल चर्च ऑर्गेनाइजेशन) की स्थापना की गई।
याचक आदेश की स्थापना
फ्रांसिस असीसी और डोमिनिक डी गुजमान के द्वारा शहरी जीवन में पवित्रता लाने के उद्देश्य से याचक आदेश की स्थापना की गई। इन आदेशों ने विश्वविद्यालयों में चर्च के प्रभाव के विकास में बड़ी भूमिका निभाई। डोमिनिकन थॉमस एक्विनास जैसे शैक्षिक ब्रह्मविज्ञानियों ने इस तरह के विश्वविद्यालयों में अध्ययन और अध्यापन का कार्य किया। उन्होंने अरस्तू के विचारों और ईसाइयत के संयोग से ‘सुम्मा थियोलोजिका’ का निर्माण किया जो उनकी महत्त्वपूर्ण बौद्धिक उपलब्धि थी।
जॉन हस वैक्लिफ का जीवित ही अग्नि दहन
ई.1305 में पोप क्लीमेंट (पंचम्) रोम छोड़कर फ्रांस के अविगानो शहर में चला गया। इस कारण पोप का पद फ्रेंच-प्रभुत्व के अधीन हो गया। ई.1376 में पोप के पुनः रोम लौट आने पर अविगानो के पोप का पद समाप्त हो गया किंतु ई.1378 में रोम तथा अविगानो में और ई.1409 में रोम तथा पीसा के बीच पोप के पद के लिए विवाद खड़े हुए।
पश्चिमी ईसाई संघ के मतभेद का कारण कुछ लोगों द्वारा पोप की एकल प्रधानता के स्थान पर सामूहिक अधिकार की मांग करना था। इस मांग को ईसाई संघ का समर्थन भी प्राप्त हुआ परन्तु जब मार्टिन (पंचम्) पोप बना तो ई.1417 में कोंस्टेंस की परिषद् में इस निर्णय को पलट दिया गया और यह घोषणा की गई कि- ‘पोप ने ईसा से अधिकार प्राप्त कर लिया है। ‘
इस घोषणा का समर्थन करते हुए इंग्लैण्ड के निवासी जॉन वैक्लिएफ ने लिखा कि ‘चर्च की चिरकालिक स्थिति को बाइबिल में देखा जा सकता है और यह सभी के लिए उपलब्ध है।’
प्राग के जॉन हस वैक्लिफ ने इस घोषणा का विरोध किया। हस को लोगों का विशाल समर्थन प्राप्त होने लगा। इस कारण कॉन्स्टेंस की परिषद् में हस को धर्मनिन्दा का दोषी घोषित किया गया और उसे जीवित जला देने की सजा सुनाई गई।
चर्च के आंतरिक भ्रष्टाचार में सुधार के प्रयास
कॉन्स्टेंस की परिषद, बेसल की परिषद और पाँचवीं लैटर्न परिषद ने चर्च के आंतरिक भ्रष्टाचार में सुधार लाने के प्रयास किए। ई.1460 में कांस्टेंटिनोपल में तुर्कों के पतन के साथ पोप पायस (द्वितीय) ने एक सामान्य परिषद के गठन से मना कर किया। इस कारण पोप के पद पर रोदेरिगो बोर्गिया (पोप अलेक्जेंडर षष्ठम्) को चुना गया। पोप जूलियस (द्वितीय) ने स्वयं को एक धर्मनिरपेक्ष पोप के रूप में प्रस्तुत किया।
16वीं सदी के प्रारंभिक दिनों में डेसिडेरियस इरास्मस नामक व्यक्ति ने ‘मूर्खता की प्रशंसा’ नामक एक रचना प्रकाशित करवाई जिसमें चर्च में सुधार नहीं करने के लिए चर्च की आलोचना की गई थी। ई.1517 में जर्मनी के मार्टिन लूथर ने कुछ ईसाई धर्माध्यक्षों को अपना एक शोध भेजा जिसमें उसने कैथोलिक सिद्धांत के मुख्य बिंदुओं का उल्लेख करते हुए चर्च द्वारा की जा रही क्षमा-पत्रों की बिक्री का विरोध किया।
इसी प्रकार स्विट्जरलैंड में हुर्ल्द्यच ज्विन्गली, जॉन केल्विन और एनी ने भी कैथोलिक शिक्षाओं की आलोचना की। विभिन्न लोगों द्वारा चर्च के समक्ष खड़ी की जा रही ये चुनौतियां ही आगे चल कर यूरोपीय आंदोलन में बदल गईं जिसे प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार कहा जाता है।
जर्मनी में प्रोटेस्टेंट सुधार, स्च्माल्काल्दिक लीग और कैथोलिक सम्राट चार्ल्स (पंचम्) के बीच नौ वर्षीय युद्ध का कारण बना जो ई.1518 में एक बहुत ही गंभीर तीस वर्षीय युद्ध में बदल गया। ई.1562 से 1598 के बीच फ्रांस में संघर्ष की एक लम्बी शृंखला चली जिसे धर्म की फ्रांसिसी लड़ाई कहते हैं। ये युद्ध हुगुएनोट्स और फ्रेंच कैथोलिक लीग की सेनाओं के मध्य लड़े गए। इस संघर्ष में ‘संत बर्थोलोमेव दिवस नरसंहार’ महत्त्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।
ई.1598 के नैनटेस के आदेश के साथ धार्मिक सहिष्णुता का पहला प्रयोग आरम्भ किया गया। इस आदेश ने प्रोटेस्टेन्ट्स को नागरिक और धार्मिक मान्यता प्रदान की। पोप क्लेमेंट (अष्ठम्) द्वारा अत्यंत हिचहिचाकहट के साथ इस ओदश को स्वीकार कर लिया गया।
इंग्लैण्ड में हेनरी (अष्ठम्) के शासनकाल में एक राजनीतिक विवाद के रूप में धार्मिक सुधार आरम्भ हुए। जब पोप ने सम्राट हेनरी के विवाह के समय सम्राट की एक याचिका को अस्वीकार कर दिया तो सम्राट ने स्वयं को ब्रिटिश चर्च का प्रमुख घोषित कर दिया। हेनरी ने बहुत से ईसाई मठों, फ्रेयारिस, कॉन्वेंट और धार्मिक स्थलों की सम्पत्ति भी जब्त कर ली।
उसके शासनकाल के अंत में एक व्यापक सैद्धांतिक और मरणोत्तर सुधारों की शुरूआत की गई जो एडवर्ड (षष्ठम्) के शासनकाल और आर्क बिशप थॉमस क्रेन्मेर के समय भी जारी रहे। महारानी मैरी (प्रथम) के शासनकाल में इंग्लैंड संक्षिप्त रूप से रोम के चर्च के साथ पुनः संयुक्त हो गया किंतु महारानी एलिजाबेथ (प्रथम) ने अलग चर्च की स्थापना करके कैथोलिक पादरियों पर नियंत्रण स्थापित किया तथा कैथोलिकों को राजनीतिक जीवन में भाग लेने से रोका।
ई.1545-1563 की अवधि में ट्रेंट की परिषद ने काउंटर सुधारों को आगे बढ़ाया। उसने केंद्रीय कैथोलिक शिक्षाओं की पुष्टि की तथा तत्त्वान्तरण और मोक्ष प्राप्ति के लिए प्यार तथा आशा के साथ-साथ श्रद्धा रखने पर बल दिया। इसने संरचनात्मक सुधार भी किया। पादरियों की शिक्षा में सुधार और रोमन करिया के मध्य क्षेत्राधिकार को मजबूत करने का कार्य किया।
काउंटर सुधार की शिक्षाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए, चर्च ने कला, संगीत और वास्तुकला में ‘बैरोक शैली’ को प्रोत्साहित किया। 16वीं शताब्दी के मध्य में ‘द सोसायटी ऑफ यीशू’ की औपचारिक रूप से स्थापना की गई। इसी समय टेरेसा ऑफ अविला, फ्रांसिस डि सेल्स और फिलिप्स नेरी जैसे चरित्रों के लेखन ने चर्च में नवीन उत्साह का संचार किया।
17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में, पोप इनोसेंट (नवम्) ने चर्च के पदानुक्रम में होने वाली अनियमितताओं में सुधार लाने के प्रयत्न किए। उन्होंने धर्मपद बेचने, भाई-भतीजावाद करने और पोप द्वारा अति-व्यय किए जाने पर रोक लगाई। पोप इनोसेंट को एक बड़ा ऋण-भार विरासत के रूप प्राप्त हुआ था।
उन्होंने मिशनरी की गतिविधियों को बढ़ावा दिया, तुर्की के आक्रमण के खिलाफ यूरोप को एकजुट करने का प्रयास किया, प्रभावशाली कैथोलिक शासकों को प्रोटेस्टेन्ट्स से विवाह करने की छूट प्रदान की तथा धार्मिक उत्पीड़न की दृढ़ता से निंदा की।
मध्यकाल में कैथोलिक मत स्पेन, पुर्तगाल, अमेरिका, एशिया और ओशिनिया में फैल गया। पोप अलेक्जेंडर (षष्ठम्) ने स्पेन और पुर्तगाल को नई खोजी गई भूमियों के सर्वाधिक अधिकार दिए और पत्रेनेतो व्यवस्था के माध्यम से यह सुनिश्चित किया कि औपनिवेशिक व्यवस्था राज्य के अधिकारियों की अनुमति से हो न कि वेटिकन प्रणाली से।
औद्योगिक युग
पोप लियो (तेरहवें) ने औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप उत्पन्न सामाजिक चुनौतियों की प्रतिक्रिया के रूप में ‘एनसाइक्लिकल रेरम नोवार्म’ प्रकाशित किया। उसने कैथोलिक सामाजिक शिक्षण को प्रारम्भ किया तथा कार्यप्रणाली स्थितियों के विनियमन, निर्वाह-मजदूरी की स्थापना तथा व्यापार संघ बनाने के लिए श्रमिकों के अधिकार की वकालत की।
अभ्रांतता के सिद्धांत की पुष्टि
सैद्धांतिक मामलों में चर्च की अभ्रांतता हमेशा से चर्च का सिद्धांत रही थी। ई.1870 में पहली वेटिकन परिषद में पोप ने ‘अभ्रांतता के सिद्धांत’ की औपचारिक रूप से पुष्टि की।
डॉन बॉस्को की सेल्सियन सिस्टर्स
ई.1872 में जॉन बॉस्को और मारिया माजारेल्लो ने इटली में ‘सेल्सियन सिस्टर्स ऑफ डॉन बॉस्को’ नामक संस्था स्थापित की जो वर्ष 2009 में 14,420 सदस्यों के साथ दुनिया में महिलाओं की सबसे बड़ी कैथोलिक संस्था बन गई।
वेटिकन सिटी के प्रभुत्व को स्वीकृति
इटली के एकीकरण के बाद पोप के पद तथा इटैलियन सरकार के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। यह विवाद ई.1929 की लेटरन संधि द्वारा वेटिकन के प्रभुत्व को पवित्र स्वीकृत किये जाने के बाद ही सुलझ पाया।
बीसवीं सदी में कैथोलिक पादरियों पर अत्याचार
20वीं सदी में दुनिया के विभिन्न देशों में राजनैतिक कट्टरपंथियों तथा पादरी-विरोधी सरकारों ने कैथोलिक चर्चों को क्षति पहुँचाई। मैक्सिको में 3,000 से अधिक पादरी या तो मार दिए गए या निर्वासित कर दिये गए। चर्चों को अपवित्र किया गया, उनका मजाक उड़ाया गया, ननों के साथ बलात्कार किया गया तथा पकड़े गए पादरियों को गोली मार दी गई।
सोवियत संघ में ई.1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद चर्चों तथा कैथोलिक पादरियों पर अत्याचार आरम्भ हुए जो ई.1930 में भी जारी रहे। पादरियों की फांसी और निर्वासन, धार्मिक साधनों का अधिग्रहण और चर्चों का बंद होना आम बात थी। स्पेन में भी कैथोलिक पादरियों एवं चर्चों पर भयानक अत्याचार हुए।
रोम के ग्यारहवें पोप पायस ने इन तीन देशों (मैक्सिको, रूस तथा स्पेन) को एक ‘भयानक त्रिभुज’ के रूप में तथा यूरोप और अमेरिका में विरोध की विफलता को एक ‘मौन षड़यन्त्र’ के रूप में उल्लिखित किया।
द्वितीय विश्व युद्ध में कैथोलिक ईसाइयों एवं यहूदियों का उत्पीड़न
द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले नाजी जर्मनी में चर्चों को नुक्सान पहुँचाया गया। सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होने के बाद, चर्च ने पोलैंड के हमले तथा बाद में 1940 में नाजियों पर हुए हमलों की निंदा की। नाजियों के अधिकार वाले क्षेत्र में हजारों कैथोलिक पादरियों, ननों और भाइयों को जेल भेज दिया गया तथा मार दिया गया।
मैक्सिमिलियन कोल्बे तथा एडिथ स्टैन आदि ईसाई-संत भी इन्हीं में शामिल थे। युद्धकाल में, पोप पायस (तेरहवें) ने चर्च अनुक्रम को निर्देशित किया कि वे नाजियों से यहूदियों की रक्षा करें। कुछ इतिहासकारों द्वारा बारहवें पायस को लाखों यहूदियों को बचाने में मदद देने का श्रेय दिया गया जबकि दूसरी तरफ कुछ इतिहासकारों द्वारा यहूदी विरोधवाद युग को प्रोत्साहित करने तथा पायस द्वारा नाजियों के अत्याचारों को रोकने में नाकामी के लिए चर्च को दोषी माना गया।
कम्युनिस्ट सरकारों द्वारा कैथोलिक पादरियों का उत्पीड़न
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद पूर्वी यूरोप में अनेक देशों की कम्युनिस्ट सरकारों ने धार्मिक स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया। हालांकि कम्युनिस्ट शासन के साथ कुछ पादरियों और धार्मिक लोगों ने सहयोग किया। इस काल में अनेक कैथोलिक पादरियों को कैद कर लिया गया, उन्हें निर्वासित किया गया या मार दिया गया।
कम्युनिस्ट शासकों की धारणा थी कि यूरोप में साम्यवाद के पतन के लिए चर्च एक महत्त्वपूर्ण खिलाड़ी होगा। ई.1949 में चीन में कम्युनिस्टों की सत्ता में वृद्धि, समस्त विदेशी मिशनरियों का निष्कासन लेकर आयी। नई सरकार ने राष्ट्रवादी चर्चों की स्थापना की तथा अपनी पसंद के पादरी नियुक्त किए। रोम ने इन पादरियों को अस्वीकार कर दिया किंतु जब चीन की सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही तो रोम ने इन पादरियों को स्वीकार कर लिया तथा उन्हें कैथोलिक सम्प्रदाय के भीतर मान लिया।
ई.1960 की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान चीन में सभी धार्मिक प्रतिष्ठान बंद कर दिए गए। कुछ वर्षों बाद जब चीनी चर्च फिर से खुले तब उन्हें राष्ट्रवादी चर्चों के नियंत्रण में रखा गया। कई कैथोलिक पादरियों तथा याजकों ने रोम के प्रति निष्ठा त्यागने से मना कर दिया। इस पर चीन की सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया।
ऑर्थोडॉक्स चर्च एवं प्रोटेस्टेण्ट्स से सम्बन्ध मधुर बनाने की पहल
पोप जॉन (तेबीसवें) द्वारा ई.1962 में द्वितीय वेटिकन परिषद् शुरू की गई। पोप के समर्थकों ने इस परिषद् को ‘झरोखा खुलने की शुरूआत’ कहकर इसका स्वागत किया। इस पारिषद् ने लैटिन चर्च के भीतर उपासना पद्धति में परिवर्तन किया।
चर्च के मिशन का पुनः-संकेन्द्रण किया गया एवं सार्वभौमिकता को पुनः परिभाषित किया गया ताकि पूर्वी पारंपरिक चर्च (ऑर्थोडॉक्स चर्च) एवं प्रोटेस्टेण्ट्स के साथ सम्बन्ध मधुर बनाए रखे जा सकें।
परम्परावादी कैथोलिकों जिनका प्रतिनिधित्व मार्शल लेफेब्रे आदि कर रहे थे, ने परिषद् की कटु आलोचना करते हुए कहा कि इसने लैटिन जनता की पवित्रता को दूषित किया, ‘झूठे धर्मों’ के प्रति धार्मिक उदासीनतावाद को बढ़ावा दिया और ऐतिहासिक कैथोलिक धर्म-सिद्धांत एवं परम्परा के साथ समझौता किया।
बिशप कार्लोस को नोबल पुरस्कार
ई.1966 में बिशप कार्लोस फिलिप जिमेनेन्स बेलो को ईस्ट तिमोर युद्ध में उचित एवं शांतिपूर्ण समाधान के लिए कार्य करने पर नोबल पुरस्कार दिया गया।
प्रथम गैर-इटालवी पोप
ई.1978 में, पोप जॉन पॉल (द्वितीय) 455 वर्षों में प्रथम गैर-इटालवी पोप बने। उनका 27 वर्षों का कार्यकाल, रोम के पोपों के इतिहास में सबसे लंबे कार्यकालों में से एक था। सोवियत संघ के अंतिम शासक मिखाइल गोर्बाचोव ने पोप जॉन पोल (द्वितीय) को ही यूरोप में साम्यवाद के पतन को तीव्र करने के लिए जिम्मेवार माना।
उन्होंने तृतीय विश्व में ऋण राहत एवं इराकी युद्ध के विरुद्ध आंदोलन का समर्थन किया। पोप ने यौन-नैतिकता के प्रश्न पर पक्के रूढ़िवादी ओपस देई को एक वैयक्तिक धर्माधिकारी बनाया। पोप जॉन पॉल (द्वितीय) के कार्यकाल में ई.1979 में कलकत्ता की कैथोलिक नन मदर टेरेसा को भारत के गरीब लोगों के बीच मानवतावादी कार्य करने के लिए नोबल शांति पुरस्कार दिया गया।
1980 के दशक में पोप जॉन पॉल (द्वितीय) ने लैटिन अमेरिका में उदारवादी धर्मविज्ञान पर मार्क्सवादी प्रभाव को अस्वीकृत करते हुए कहा कि चर्च को गरीब एवं पीड़ित के लिए विभेदकारी राजनीति या क्रांतिकारी हिंसा से कार्य नहीं करना चाहिए। उन्होंने अपने कार्यकाल में 483 संतों को संत का दर्जा दिया।
यह अपने सभी पूर्ववर्ती पोपों द्वारा घोषित किए गए संतों की कुल संख्या के जोड़ से भी अधिक था। उन्होंने यहूदियों एवं मुस्लिमों के साथ मेल-मिलाप के लिए कार्य किया, चर्च के उत्पीड़कों को क्षमा किया एवं चर्च द्वारा की गई ऐतिहासिक गलतियों के लिए क्षमा मांगी, जिसमें यहूदी औरतें, स्वदेशी लोग, मूलनिवासी, अप्रवासी, गरीब एवं अजन्मों के विरुद्ध की गई धार्मिक असहिष्णुता एवं अन्याय शामिल हैं। ई.1986 में उन्होंने विश्व युवा दिवस स्थापित किया।
इस काल में मानव अधिकारों एवं सामाजिक न्याय हेतु चल रहे आंदोलनों के कारण कैथोलिक पादरियों एवं बिशपों को शहादत देनी पड़ी, विशेषकर लैटिन अमेरिका में। ई.1980 में अल सल्वाडोर के आर्क-बिशप आस्कर रोमेरियो को वेदी पर मार दिया गया एवं ई.1989 में मध्य अमेरिकी विश्वविद्यालय के छः जेसुसुईटों की हत्या कर दी गई।
कैथोलिक चर्च के सिद्धांत एवं शिक्षाएं उन्हीं मूलभूत अवयवों से निर्मित हैं जिन तत्वों से धर्म नामक सार्वभौमिक तत्व का निर्माण होता है। फिर भी कैथोलिक चर्च के सिद्धांत एवं शिक्षाएं दुनिया भर के मजहबों, पंथों, सम्प्रदायों से स्वयं को अलग दिखाने का प्रयास करते हैं। कुछ सीमा तक यह पृथकता एक वास्तविकता भी है। इसी पृथकता के कारण संसार के अन्य मजहबों से ही नहीं, स्वयं ईसाइयत की विभिन्न धाराओं से उसका खूनी टकराव रहा है।
रोमन कैथोलिक चर्च मानता है कि इस जगत में एक अनन्त परमेश्वर, तीन व्यक्तियों के रूप में स्थित है- परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और पवित्र आत्मा। ये तीनों एक साथ मिलकर त्रिमूर्ति (ट्रिनिटी) का निर्माण करते हैं।
कैथोलिक धर्म विश्वास करता है कि ‘चर्च’ पृथ्वी पर यीशू की सतत उपस्थिति है। चर्च परमेश्वर के लोगों को सूचित करता है कि जो यीशू मसीह के आज्ञा पालन में निरत रहते हैं और और जो मसीह की देह के साथ पोषित होते हैं, वे मनुष्य, मसीह की देह हो जाते हैं। पोप सम्बन्धी ‘मिस्टीक कोर्पोरिस क्रिस्टी’ (ईसाई धर्म सम्बन्धी रहस्यवाद) में कैथोलिक चर्च को मसीह के रहस्यात्मक शरीर के रूप में वर्णित किया गया है।
चर्च मानता है कि मुक्ति के साधन की परिपूर्णता केवल कैथोलिक चर्च में ही मौजूद है, किन्तु यह भी मानता है कि पवित्र आत्मा ईसाईयत से स्वयं को अलग किये हुए समुदाय के उद्धार के लिए भी कार्य कर सकती है। जो कोई व्यक्ति बचाया जाता है, परोक्ष रूप से चर्च के माध्यम से बचाया जाता है।
कैथोलिक चर्च यीशू मसीह द्वारा स्थापित किया गया था। नव विधान यीशू मसीह के कार्यों और शिक्षाओं को बारह प्रेरितों की नयुक्ति और उनको अपने कार्य जारी रखने के लिए दिए गए अधिकारों का वर्णन करता है। चर्च का मानना है कि यीशू मसीह ने अपने शिष्य साइमन पीटर को प्रेरितों के नेता के रूप में इस उद्घोषणा के साथ नियुक्त किया- ‘इस चट्टान से मैं अपने चर्च का निर्माण करूंगा ….. मैं तुम्हें स्वर्ग के राज्य की कुंजियां दूंगा …..।’
चर्च कहता है कि प्रेरितों पर पवित्र आत्मा का आगमन पेंटेकोस्ट के रूप में जाना जायेगा, जो चर्च की सार्वजनिक सेवा की शुरुआत का संकेत है। तब से, सभी विधिवत् पवित्र धर्माध्यक्षों को प्रेरितों का उत्तराधिकारी माना जाता है और वे पवित्र प्रेरितों से प्राप्त पवित्र परम्परा को जारी रखते हैं।
ईसा मसीह के सम्बन्ध में अवधारणा
कैथोलिक ईसाइयों का मानना है कि मसीह पूर्व विधान की मुक्तिदायिनी भविष्यवाणियों के मसीहा हैं। एक ऐसी घटना जिसे अवतार के रूप में जाना जाता है, जिसके बारे में चर्च बताता है कि पवित्र आत्मा की शक्ति के माध्यम से, परमेश्वर मानव प्रकृति के साथ एकजुट हो गये, तब ‘मसीह’ कुमारी माता मरियम के गर्भ में आए।
इस कारण मसीह को पूरी तरह से दिव्य और पूरी तरह से मानव दोनों माना जाता है। चर्च द्वारा यह सिखाया जाता है कि पृथ्वी पर मसीह का मिशन, जिसमें लोगों को उनकी शिक्षाओं के बारे में बताना और उन्हें स्वयं का उदाहरण प्रदान करना शामिल है, जैसा कि चार धर्म उपदेशों में दर्ज है।
माता मरियम के सम्बन्ध में कैथोलिक चर्च की अवधारणा
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मरियम की प्रार्थनाएं और भक्ति कैथोलिक धार्मिकता का हिस्सा हैं किन्तु परमेश्वर की पूजा से पृथक हैं। चर्च ‘मैरी’ को नित्य कुमारी और परमेश्वर की माता के रूप में विशेष आदर प्रदान करता है। मरियम के सम्बन्ध में कैथोलिक विश्वासों में मूल पाप के दाग के बिना पवित्र गर्भाधान तथा जीवन के अंत में शारीरिक धारणा के साथ स्वर्ग में स्थान शामिल हैं। इन दोनों मान्यताओं को ई.1854 में पोप पायस (नवम्) तथा ई.1950 में पोप पायस (बारहवें) ने सिद्धांत के रूप में परिभाषित किया था। ‘मैरीऑलोजी’ न केवल माता मैरी के जीवन के बारे में अपितु उनके दैनिक जीवन में पूजा, प्रार्थना और मैरियन कला, संगीत और वास्तुकला पर विस्तार से प्रकाश डालती है। चर्च वर्ष के दौरान अनेक मैरियन मरणोत्तर भोज का आयोजन करता है और उन्हें अनेक उपाधियों, जैसे कि, ‘स्वर्ग की रानी’ आदि से विभूषित किया जाता है। पोप पॉल (षष्ठम्) ने उन्हें ‘चर्च की माँ’ कहकर पुकारा, क्योंकि यीशू मसीह को जन्म देने के कारण वह यीशू के शरीर से जुड़े सभी सदस्यों की आध्यात्मिक माँ हुईं। उनके द्वारा यीशू के जीवन में प्रभावशाली भूमिका निभाने के कारण उनकी प्रार्थना और भक्ति, माला, जय हो मैरी, साल्वे रेजाइना और मैमोरारे सामान्य कैथोलिक व्यवहार हैं।
चर्च ने मेरियन की आभासी छाया की विश्वसनीयता की पुष्टि अवर लेडी ऑफ लूर्डेस, फातिमा, ग्वाडालूप और विस्कोंसिन, लेडी ऑफ गुड होप आदि के रूप में की है। इन तीर्थस्थलों की यात्राएं लोकप्रिय कैथोलिक भक्तियां हैं।
चर्च की दृष्टि में पाप कर्म
पाप कर्म में शामिल होने को यीशू मसीह के विपरीत होना माना जाता है। पाप करने से व्यक्ति की आत्मा ईश्वर के प्रेम से दूर हो जाती है। पापों की शृंखला परमेश्वर के साथ व्यक्ति के सम्बन्ध को समाप्त कर सकती है।
आध्यात्मिक अमरता
चर्च के अनुसार मसीह का जुनून (पीड़ा) और उनको सलीब पर चढ़ाये जाने के प्रति प्रेम, सभी लोगों के लिए अपने पापों से मुक्ति और क्षमा प्राप्ति का एक अवसर है। ताकि परमेश्वर से मिलाप हो सके। कैथोलिक विश्वास के अनुसार, यीशू के जी उठने, ने मनुष्यों के लिए एक संभव आध्यात्मिक-अमरता प्राप्त की, जो पहले मूल-पापों की वजह से उन्हें नहीं दी गई थी। चर्च का मानना है कि मसीह के शब्दों और कर्मों का पालन करके, कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है।
संस्कार परमेश्वर के स्वरूप हैं
ट्रेंट की परिषद के अनुसार, मसीह ने सात संस्कार स्थापित कर उन्हें चर्च को सौंपा था। इन संस्कारों में पुष्टिकरण, बपतिस्मा, युकेरिस्ट, सामंजस्य (तपस्या), बीमार को तेल लगाना (चर्म लेप या अंतिम संस्कार), पवित्र आदेश और पवित्र विवाह के बंधन सम्मिलित हैं। ‘संस्कार’ महत्त्वपूर्ण दृश्य रिवाज है जिसे कैथोलिक ‘परमेश्वर की उपस्थिति’ के रूप में देखते हैं।
पुष्टिकरण संस्कार
कैथोलिकों का विश्वास है कि पुष्टिकरण संस्कार के माध्यम से मनुष्य, पवित्र आत्मा को प्राप्त करते हैं और बप्तिस्मा के समय प्राप्त होने वाला आशीर्वाद सशक्त होता है। ठीक से पुष्टि के लिए कैथोलिकों को अनुग्रह की अवस्था में होना चाहिए, जिसका अर्थ हैं कि वे स्वीकार नहीं किये जाने वाले नैतिक पापों के विरुद्ध सचेत रहेंगे। उन्हें पुष्टिकरण के लिए आध्यात्मिक रूप से तैयार रहना चाहिए, साथ ही आध्यात्मिक सहायता के लिए एक प्रायोजक चुनकर, एक संत का उनके विशेष संरक्षण और हिमायत के लिए चुनाव करना चाहिये।
बपतिस्मा
पूर्वी कैथोलिक चर्चों में पुष्टिकरण के तुरंत बाद ‘शिशु-बपतिस्मा’ किया जाता है जिसे ईसाईकरण (क्रिस्मेसन) कहा जाता है और इसे ‘परम-कृपा का अभिनन्दन’ माना जाता है।
पापों से मुक्ति के लिए प्रायश्चित संस्कार
बपतिस्मा के बाद कैथोलिक ‘प्रायश्चित’ संस्कार के माध्यम से अपने पापों के लिए क्षमा प्राप्त कर सकते हैं। इस संस्कार में, व्यक्ति एक पादरी के समक्ष अपने पापों को स्वीकार करता है। पादरी उस व्यक्ति को सलाह देता है और विशेष प्रायश्चित करने के लिए कहता है। तदुपरांत पादरी औपचारिक रूप से उस व्यक्ति के पापों को क्षमा कर देता है और उस व्यक्ति के पाप मुक्त होने की घोषणा करता है।
पादरी किसी भी पाप या बयान के प्रकटीकरण के तहत सुनी गई बातों को किसी के भी समक्ष प्रकट नहीं करते। व्यक्ति द्वारा अपने पापों को स्वीकार करने और क्षमा प्राप्त करने के बाद चर्च द्वारा उसे एक क्षमा-पत्र प्रदान किया जा सकता है। एक क्षमा-पत्र नरक में मिलने वाले पापों से आंशिक या पूर्ण रूप से छुटकारा दिला सकता है।
सार्वभौमिक न्याय
चर्च के अनुसार, मृत्यु के तुरंत बाद प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा के बारे में परमेश्वर की ओर से एक विशेष निर्णय प्राप्त होगा जो कि व्यक्ति के सांसारिक जीवन के कर्मों के आधार पर होगा। एक दिन जब मसीह समस्त मानव जाति के लिए सार्वभौमिक न्याय करेंगे। यह अंतिम निर्णय मानव इतिहास का अंत लाने के लिए तथा एक नए और बेहतर स्वर्ग एवं पृथ्वी पर परमेश्वर के धर्म-शासन की शुरुआत होने का प्रतीक होगा।
देवदूत मैथ्यू द्वारा किए जाने वाले विस्तृत वर्णन के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा के बारे में निर्णय लिया जायेगा। माना जाता है मैथ्यू के सुसमाचार में निम्नतम लोगों द्वारा किये गए दया के कार्यों को भी शामिल किया जायेगा।
कैथोलिक प्रश्नोत्तरी के अनुसार, अंतिम निर्णय भी स्वयं से आगे का परिणाम प्रस्तुत करेगा, व्यक्ति ने अपने सांसारिक जीवन के दौरान जो अच्छे कार्य किये हैं या वैसा करने में असफल हो गए हैं, को प्रकट करेगा। प्रस्तुत निर्णय के अनुसार, एक आत्मा जीवन के बाद के तीन राज्यों में से किसी एक में प्रवेश करती है। ‘स्वर्ग’ परमेश्वर के साथ शानदार संयोजन और अकथ्य खुशी का जीवन है, जो हमेशा के लिए रहता है। ‘यातना’ आत्मा की शुद्धि के लिए एक अस्थायी स्थिति है।
जो व्यक्ति पर्याप्त रूप से पाप-मुक्त नहीं हैं, वे सीधे स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकते, उन्हें यातना से गुजराना होता है। नर्क की आत्माओं को श्रद्धालुजन की प्रार्थनाओं और पवित्र लोगों की सहानुभूति के द्वारा स्वर्ग में पहुँचने में सहायता मिलती है। जिन व्यक्तियों ने पाप-पूर्ण और स्वार्थमय जीवन चुना है और जो पश्चाताप नहीं करते तथा पूर्णतः अपने तरीके से जीना चाहते हैं, नर्क में भेजे जाते हैं जो कि परमेश्वर से एक चिरस्थायी जुदाई होती है।
किसी को भी नर्क में तब तक नहीं भेजा जाता है जब तक कि उसने स्वतंत्र रूप से परमेश्वर को अस्वीकार करने का फैसला नहीं लिया है। किसी भी व्यक्ति का नर्क में जाना पूर्व-निर्धारित नहीं है और न ही कोई इस बात का निर्णय कर सकता है कि किसी की निंदा की गई है या नहीं! रोमन कैथोलिक ईसाई धर्म सिखाता है कि परमेश्वर की दया से कोई व्यक्ति मृत्यु से पहले जीवन के किसी भी बिंदु पर पश्चाताप करके पापों से मुक्त हो सकता है।
कुछ कैथोलिक ब्रह्मविज्ञानियों का विचार है कि ‘अ-बपतिस्मा हुए शिशुओं की आत्माएं’ जो मूल-पाप में मर जाते हैं, वे उपेक्षित स्थान को जाते हैं, हालांकि यह चर्च का अधिकारिक सिद्धांत नहीं है।
कैथोलिक विश्वासों का संग्रह
कैथोलिक विश्वासों का ‘नाइसीन पंथ’ में सारांशित और ‘कैथोलिक चर्च की प्रश्नोत्तरी’ में विस्तृत रूप से वर्णन है। धर्मप्रचार में मसीह के वादे के आधार पर, चर्च का मानना है कि यह लगातार पवित्र आत्मा के द्वारा निर्देशित है और इसलिए सैद्धांतिक त्रुटि में गिरने से बिना गलती किए रक्षित है। कैथोलिक चर्च सिखाता है कि पवित्र आत्मा परमेश्वर की सच्चाई को पवित्र धर्मग्रन्थ, पवित्र परम्परा और मैजिस्टीरियम के माध्यम से उद्घाटित करता है।
पवित्र धर्मग्रंथ
कैथोलिक पवित्र धर्मग्रन्थों में 73 कैथोलिक बाइबिल पुस्तकें हैं। इनमें 46 प्राचीन ग्रीक संस्करण की पूर्व विधान की पुस्तकें हैं, जिन्हें ‘सेप्तुआजिन्त’ कहा जाता है और 27 नव विधान की पुस्तकें हैं जो पहले कोडेक्स वैटिकन्स ग्रैकस 1209 में पाई गईं और ‘अथानासिउस’ के उन्तालीसवें आनंदित पत्र में सूचीबद्ध हैं।
चर्च की शिक्षाएं
पवित्र परम्परा में चर्च की शिक्षाएं शामिल हैं जिनके बारे में चर्च मानता है कि वे प्रेरितों के समय से चली आ रही हैं। पवित्र शास्त्र और पवित्र परम्परा सामूहिक रूप से ‘विश्वास की जमा’ के रूप में जाना जाता है। इन सबकी व्याख्या मैजिस्टीरियम द्वारा की गई है। मैजिस्टर लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है- ‘शिक्षक’।
मरणोत्तर संस्कार
कैथोलिक चर्च में प्रचलित मरणोत्तर परम्पराओं अथवा संस्कारों का अंतर, मान्यताओं में अंतर के बजाय ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। मरणोत्तर संस्कारों में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली प्रक्रिया रोमन संस्कार हैं परन्तु लैटिन कैथोलिक चर्च में कुछ अन्य संस्कार भी उपयोग में लाये जाते हैं और वे पूर्वी कैथोलिक चर्चों में प्रयुक्त होने वाले संस्कारों से अलग हैं।
वर्तमान में रोमन अनुष्ठान के दो रूप अधिकृत रूप से प्रचलित हैं। ई.1962 के पूर्व की रोमन मिसल (पॉल षष्ठम् की प्रार्थना) अब संस्कार का साधारण रूप है और ज्यादातर स्थानीय भाषा में मनाया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में, अंग्रेजी प्रयोग लुप्त होता जा रहा है, कुछ रोमन संस्कार अंग्रेजी के मरणोत्तर संस्कार के कई पहलुओं को बरकरार रखे हुए हैं। अन्य गैर रोमन पश्चिमी संस्कारों में अम्ब्रोसियन अनुष्ठान और मोजराबिक संस्कार शामिल हैं।
पूर्वी कैथोलिक चर्च के द्वारा प्रयोग किये गए संस्कारों में बीजान्टिन संस्कार, अलेक्जेन्द्रिया या कोप्टिक संस्कार, सिरिएक संस्कार, अर्मेनियाई संस्कार, मरोनिते संस्कार और कलडीन संस्कार शामिल हैं।
युकेरिस्ट
युकेरिस्ट या मास, कैथोलिक पूजा केंद्र है। कैथोलिक ईसाइयों का मानना है कि प्रत्येक मास में, रोटी और शराब अलौकिक रूप से मसीह के शरीर और रक्त में रूपांतरित हैं। चर्च की मान्यता है कि मसीह के अंतिम भोजन में मानवता के साथ एक नया नियम युकेरिस्ट की संस्था के माध्यम से स्थापित हुआ।
चर्च के अनुसार मसीह युकेरिस्ट में मौजूद हैं। कैथोलिकों को प्रोटेस्टेंट चर्च में समन्वय प्राप्त करने की अनुमति नहीं है, क्योंकि पवित्र आदेश और युकेरिस्ट के बारे में उनकी अलग मान्यताएं और तरीके हैं। इसी तरह, प्रोटेस्टेंट को कैथोलिक चर्च में समन्वय प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। पूर्वी ईसाइयत के चर्चों के सम्बन्ध में, कैथोलिक चर्च कम प्रतिबंधक है।
कैथोलिक पदानुक्रम और संस्थाएं
चर्च मानता है कि मसीह ने पोप का पद स्थापित किया था। चर्च के अनुक्रम का नेतृत्व रोम के धर्माध्यक्ष पोप द्वारा किया जाता है। पोप रोमन प्रांत के प्रधान धर्माध्यक्ष और महानगरीय, इटली के धर्माधिपति, लेटिन चर्च के आचार्य, तथा सार्वलौकिक चर्च के श्रेष्ठ धर्माध्यक्ष आदि के रूप में भी कार्य करते हैं। धर्माध्यक्ष के रूप में, वे ईसा मसीह के प्रतिनिधि हैं तथा रोम के धर्माध्यक्ष के रूप में वे संतों के उत्तराधिकारी हैं।
पीटर और पॉल तथा परमेश्वर के सेवकों के सेवक, वे वेटिकन सिटी के प्रधान भी हैं। प्रशासन में सलाह और सहायता के लिए, पोप शायद अनुक्रम के अगले स्तर कॉलेज के प्रधान में बदल सकते हैं। पोप की मृत्यु होने पर या पद छोड़ने पर, 80 साल की उम्र के अंतर्गत जो कॉलेज के धर्म प्रधान सदस्य आते हैं वे मिलकर नये पोप का चुनाव करते हैं।
हालांकि कैथोलिक सम्मेलन किसी भी कैथोलिक पुरुष को सैद्धांतिक रूप से पोप नियुक्त कर सकता था, ई.1389 के बाद से केवल धर्म-प्रधानों को ही उस स्तर तक उठाया गया है।
कैथोलिक चर्च में वर्ष 2008 तक 2,795 धर्म-प्रदेश शामिल थे। इनकी देख-रेख धर्माध्यक्ष द्वारा की जाती थी। धर्म-प्रदेश व्यक्तिगत समुदायों में विभाजित किये जाते हैं जिन्हें बस्ती कहा जाता है, प्रत्येक बस्ती में एक से अधिक पादरी, छोटे पादरी तथा धर्माध्यक्षों के सह-कार्यकर्ता होते हैं। ये लोग प्रवचन देना, सिखाना, नाम रखना, गवाह विवाह कराना तथा अंतिम संस्कार की पूजन पद्धति कराना आदि कार्य करते हैं।
धर्माध्यक्ष और पादरियों को युहरिस्ट, मिलाप (प्रायश्चित्त) तथा बीमार का अभिषेक कराना आदि संस्कार करवाने की अनुमति है। केवल धर्माध्यक्ष ही पवित्र आदेशों का संस्कार कर सकते हैं। इस समय कैथोलिक चर्च से सम्बद्ध चर्चों में चार लाख से अधिक पादरी कार्यरत हैं।
अधिकतर संत तथा नन एक तपस्वी के समान कैथोलिक धार्मिक व्यवस्था में प्रवेश करते हैं, जैसे कि संत बेनिडिक्ट के अनुयायी, रोमन कैथोलिक तपस्वी, डोमीनिसियंस, फ्रांसिसकंस तथा दया की बहनें इत्यादि। वर्तमान में दुनिया भर में कैथोलिक चर्च के अनुयाइयों की संख्या 100 करोड़ से अधिक है। यदि कोई ईसाई औपचारिक रूप से चर्च छोड़ता है तो यह तथ्य व्यक्ति के बपतिस्मा रजिस्टर में नोट किया जाता है।
रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्म-गुरु, रोम के बिशप एवं वैटिकन के राज्याध्यक्ष को पोप कहते हैं। ‘पोप’ का शाब्दिक अर्थ ‘पिता’ होता है। यह लैटिन भाषा के ‘पापा’ (papa) शब्द से बना है जो स्वयं ग्रीक भाषा के ‘पापास्’ (pápas) शब्द से व्युत्पन्न है। उन्हें संत पापा (पिता) तथा ‘होली फादर’ भी कहते हैं।
ईसा ने अपने महाशिष्य संत पीटर को अपने चर्च का आधार तथा ‘प्रधान चरवाहा’ नियुक्त किया था और उन्हें यह आश्वासन दिया था कि उनका चर्च शताब्दियों तक अस्तित्व में रहेगा। संत पीटर का देहांत रोम में हुआ था। इसलिए प्रारंभ ही से संत पीटर के उत्तराधिकारी, रोम के बिशप, समूचे चर्च के अध्यक्ष तथा पृथ्वी पर ईसा के प्रतिनिधि माने गए।
रोम के बिशप के अतिरिक्त किसी ने कभी संत पीटर का उत्तराधिकारी होने का दावा नहीं किया किंतु पूर्वी चर्च के अलग हो जाने से तथा प्रोटेस्टैंट मत के उद्भव से पोप के अधिकारों के विषय में शताब्दियों तक वाद विवाद होता रहा। अंततोगत्वा वैटिकन के पोप ही इस पद पर प्रथम अधिकार रखते हैं।
वे ईसा की शिक्षाओं के सर्वोच्च व्याख्याता हैं और चर्च के परमाधिकारी की हैसियत से धर्मशिक्षा की व्याख्या करते समय भ्रमातीत अर्थात् अचूक हैं। पोप जॉन पाल (द्वितीय) (ई.1978-2005) वैटिकन को आधुनिक युग में लाए।
पोप बेनेडिक्ट (सोलहवें) को 19 अप्रैल 2005 को कैथोलिक चर्च के 265वां पोप चुना गया। वर्ष 2013 में अर्जेन्टीना मूल के ‘फ्रांसिस’ नए पोप बने। ग्रेगोरी (तृतीय) (ई.731-41) के बाद ‘फ्रांसिस’ पहले पोप हैं जो यूरोप से बाहर के हैं। वर्तमान समय में वही सेंट पीटर्स बेसिलिका एवं कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्माधिकारी हैं तथा वेटिकन के शासक हैं।
वेटिकन सिटी
ई.1929 में पोप लुईस (नवम्) तथा इटली के राजा इमैनुएल (तृतीय) के बीच हुई संधि के बाद वेटिकन सिटी नामक धार्मिक राज्य अस्तित्व में आया। यह राज्य, इटली के लगभग मध्य में स्थित रोम नामक शहर में स्थित है। यह कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप का अधिकृत निवास तथा उनकी राजधानी है। पोप इस राज्य के एकमात्र शासक हैं। वर्ष 2005 में वेटिकन सिटी को पूर्ण स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया गया।
भौगोलिक तथा राजनीतिक विस्तार
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वैटिकन सिटी टाइबर नदी के पश्चिमी छोर पर रोम के मध्य में एक त्रिकोणीय भूमि पर स्थित है। इसके दक्षिण-पूर्वी किनारे पर संत पीटर चौक है जिसमें सेंट पीटर्स चर्च स्थित है। इस चर्च के चारों ओर विशाल स्तंभ बने हुए हैं। इसके उत्तर में चतुर्भुजीय क्षेत्र में प्रबंधकीय भवन तथा बेल्विडर पार्क स्थित हैं। बेल्विडर पार्क के पश्चिम में पोप का महल है और उसके आगे वैटिकन गार्डन है जो कि इस छोटे साम्राज्य का आधा भाग है। लियोनिन दीवार पश्चिमी तथा दक्षिणी सीमा का काम करती है। रोम में धार्मिक महत्त्व के कई स्थान तथा चर्च स्थित हैं जिन्हें इटली सरकार ने कर-मुक्त कर रखा है किन्तु वे धार्मिक साम्राज्य अर्थात् वैटिकन सिटी का भाग नहीं हैं। वैटिकन सिटी की अपनी नागरिकता, अपनी करंसी, अपनी डाक टिकट तथा अपना झंडा तथा अपने राजनयिक हैं। यह चर्च पूरे साल यात्रियों के खुला रहता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु पोप से सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत रूप से मिल सकते हैं। वेटिकन का अपना समाचार पत्र, रेलवे स्टेशन तथा प्रसारण सुविधाएं भी हैं। वैटिकन सिटी के सात विश्वविद्यालय हैं जो रोम में स्थित हैं। वैटिकन सिटी की स्वतंत्रता अक्षुण्ण है तथा इसकी सुरक्षा रोम की सरकार द्वारा की जाती है।
चर्च की सरकार
पोप वेटिकन के चर्च को कार्डिनल्स के कॉलेज के माध्यम से नियंत्रित करते हैं। वे हर प्रकार का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं किन्तु वे सभी मामलों में कार्डिनल्स पर भरोसा करते हैं और उनसे सलाह लेते हैं। स्विस गार्ड की सैन्य टुकड़ी पोप के अंगरक्षकों के रूप में नियुक्त रहती है जिसकी स्थापना 16वीं शताब्दी में की गई थी। इसके सदस्य माइकल एंजलो द्वारा डिजाइन की गई पोशाक पहनते हैं।
वैटिकन सिटी की सार्वजनिक सरकार का प्रमुख, वैटिकन सिटी के लिए नियुक्त धर्माध्यक्ष आयोग का अध्यक्ष होता है जो कि एक कार्डिनल होता है एवं राज्य का विधायक होता है। राज्य को संवैधानिक कानून 2000 के अंतर्गत चलाया जाता है। कानून व्यवस्था धर्मविधान पर आधारित है और इसका न्यायालय चर्च का हिस्सा है।
महल तथा वैटिकन का खजाना
वैटिकन के महल तीन-चार मंजिला भवनों से निर्मित हैं जिनमें समय-समय पर विस्तार और बदलाव होते रहे हें। पोप का आवास और कार्यालय सेंट पीटर चौक पर बने स्तंभों के पास स्थित हैं। शेष भाग को वैटिकन संग्रहालय तथा लाइब्रेरी में बदल दिया गया है। वैटिकन संग्रहालय का विश्व भर में महत्त्वपूर्ण स्थान है। 18वीं शताब्दी में स्थापित मूसियो पायो-क्लिमैंटिनो संग्रहालय में विश्व की प्राचीनतम वस्तुएं संग्रहीत हैं।
19वीं शताब्दी में स्थापित चेयरामोंटी संग्रहालय में ग्रीक मूर्तियों का संग्रह है। वेटिकन में ब्राकियो न्योवो, मिस्री संग्रहालय एवं इट्रोस्कॉन संग्रहालय भी स्थापित किए गए हैं जिनमें विख्यात चित्रकारों गियोटा, गुरसिनो, कारावागियो तथा पॉसिन आदि कलाकारों के बनाए हुए चित्र संग्रहीत हैं। वैटिकन सिटी का संग्रहालय 14.5 किलोमीटर लंबा है।
ऐसा कहा जाता है कि यदि आप एक पेंटिंग को देखने में एक मिनट लगाते हैं तो पूरा संग्रहालय देखने में चार साल लग जाएंगे। इन संग्रहालयों में वैटिकन के कला-खजाने का एक छोटा भाग ही रखा गया है। अधिकतर मॉडर्न पेंटिग विभिन्न भवनों की गैलरियों में प्रदर्शित की गई हैं।
वैटिकन लाइब्रेरी पश्चिमी क्षेत्र में स्थित है और इसमें प्राचीन एवं मध्यपूर्व की विभिन्न भाषाओं की हस्तलिखित पांडुलिपियों को रखा गया है। वैटिकन का प्रमुख प्रार्थना भवन सिस्टीन चैपल है जिसकी छत पर माइकल एंजलो ने ई.1508 से 1512 के बीच पेंटिंग बनाई थीं और जो आज भी सुरिक्षत हैं।
वैटिकन का इतिहास
5वीं शताब्दी के बाद वेटिकन सिटी को पोप के आवास के रूप में विकसित किया गया। सम्राट कॉन्स्टेंटीन (प्रथम) ने जब सेंट पीटर बेसेलिका बनवाया तो पोप साइमाकुस ने उसके निकट ही एक महल का निर्माण करवाया।
14वीं शताब्दी में बैबिलोन के अधिकार से पहले पोप एविग्नान, फ्रांस के लैट्रन पैलस में रहता था। ई.1377 में पोप के रोम में आ जाने से वैटिकन ही पोप का अधिकृत आवास बन गया। सामान्यतः सभी पोप कलाओं के पोषक थे। उन्होंने विभिन्न प्रकार की बहुमूल्य कलाकृतियों, मूर्तियों एवं चित्रों का संग्रह किया और विशाल गैलेरियों का निर्माण करवाया।
17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच पोप के महल के निर्माण पर वैटिकन ने काफी धन व्यय किया। ई.1870 से 1946 तक यह महल इटली के शासक का निवास रहा और वर्तमान में इटली के राष्ट्रपति का अधिकृत आवास है। वैटिकन सिटी में आज भी राजतंत्र प्रचलन में है किन्तु इस राजतंत्र में वंशवाद नहीं है। वेटिकन का राजा कुछ निश्चित नियमों के अंतर्गत चयनित होता है।
इस देश की अर्थव्यवस्था प्रकाशन उद्योग, सिक्कों के निर्माण, डाक टिकटों की बिक्री तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर है। विश्व भर में फैले कैथोलिक चर्चों से वैटिकन को अर्थिक सहायता प्राप्त होती है। डाक टिकटों तथा सिक्कों की बिक्री के अलावा वैटिकन सिटी को पर्यटन स्थल के रूप में भी आय होती है।
वैटिकन सिटी का कुल क्षेत्रफल 44 हैक्टेयर अर्थात् 110 एकड़ है। इस देश की जनसंख्या वर्ष 2007 की जनगणना के अनुसार 857 है। यह विश्व का एकमात्र राज्य है जिसमें कृषि नहीं होती। वैटिकन सिटी में साक्षरता दर शत प्रतिशत है। यहाँ बोली जाने वाली भाषाओं में अंग्रेजी, फ्रैंच, इटालियन तथा लैटिन प्रमुख हैं।
वेटिकन में स्विस, इटालियन तथा कई अन्य देशों की नागरिकता प्राप्त लोग रहते हैं। वैटिकन की अपनी डाक व्यवस्था एवं सिक्के हैं। 1 यूरो के सिक्के पर वर्तमान पोप की तस्वीर होती है और संग्रहकर्त्ताओं में इसकी भारी मांग है। इटालियन नागरिकों को अपनी सरकार की बजाए वैटिकन सिटी को सालाना 8 प्रतिशत टैक्स दान के रूप में देने की छूट होती है।
वैटिकन सिटी अपना पासपोर्ट जारी करता है। पोप, कार्डिनल्स तथा स्विस गार्ड के सदस्य इसके धारक होते हैं। वैटिकन की डाक प्रणाली का प्रयोग अधिकतर इटैलियन लोग करते हैं क्योंकि इटली की बजाए वेटिकन की डाकसेवा अधिक तेज है।
314 मीटर लंबे और 240 मीटर चौड़े सेंट पीटर चौराहे व स्तंभों का निर्माण 1667 में ब्रनीनी द्वारा पूरा करवाया गया। यह इटली का सबसे विशाल चौक है। इसके स्तंभों एवं अन्य स्थानों को 140 संतों की मूर्तियों से सजाया गया है। वैटिकन सिटी का रेडियो स्टेशन वैटिकन गार्डन में स्थित है और इससे विश्व की 20 भाषाओं में प्रसारण किया जाता है।
वैटिकन सिटी में सड़कें नाममात्र ही हैं अधिकतर गलियां एवं गलियारे हैं। वैटिकन सिटी का रेलवे ट्रैक मात्र 0.86 किमी लंबा है। इसके रेलवे स्टेशन को ई.1930 में खोला गया था। ईसाई धर्म के प्रसार से पहले भी इस स्थान को पवित्र माना जाता था और किसी को भी इस क्षेत्र में रात में ठहरने की अनुमति नहीं होती थी। 13 मई 1981 को एक तुर्क नागरिक ने सेंट पीटर चौराहे पर पोप पर गोली चलाई।
आधुनिक युग में पोप को जान से मारने का यह प्रथम प्रयास था। पोप ने 3 जून 1985 को उस आक्रमणकारी से भेंट की तथा उसे क्षमा कर दिया। इसके बाद इटली ने वैटिकन की स्वतंत्रता पर पुनर्विचार किया और ई.1929 की संधि को रद्द कर दिया। नई संधि के अनुसार वैटिकन की स्वतंत्रता पहले की तरह ही बनी रही किन्तु रोम के अन्य चर्चों को इटली की सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया।
हिन्दू धर्म-साहित्य अत्यंत विशाल है। विश्व में अन्य किसी धर्म का इतना विपुल साहित्य उपलब्ध नहीं है। हिन्दू धर्म-साहित्य का अद्भुत कथा-संसार इतना रोचक, ज्ञानवर्द्धक और आत्मा के लिए कल्याणकारी है, जिसे शब्दों में वर्णित करना कठिन है।
धर्म का अर्थ है धारण करना। जो मनुष्य उत्तम विचार, उत्तम दर्शन और उत्तम आचरण को धारण करता है, वह मनुष्य धर्म से सम्पन्न है। इस कारण संसार भर में मनुष्य मात्र का धर्म एक ही है।
सभी मनुष्य एक ही धर्म से संचालित होते हैं किंतु सांसारिक स्तर पर धर्म के अगल-अलग नाम और स्वरूप दिखाई देते हैं। वस्तुतः ये नाम और स्वरूप धर्म के नहीं, सम्प्रदायों के हैं। धर्म तो एक ही है।
यही कारण है कि भारत के लोग प्रायः यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि ‘हिन्दू धर्म’ कोई धर्म नहीं है, यह तो जीवन शैली है। सत्य-सनातन धर्म ही हिन्दुओं का धर्म है, वस्तुतः सत्य सनातन धर्म ही संसार भर के मनुष्यों का वास्तविक धर्म है। उसी को हम हिन्दू धर्म कहते हैं।
इस धर्म के नियम किसी ने बनाए नहीं हैं, मनुष्य ने अपने अनुभव से प्राप्त किए हैं। जैसे कि दूसरों की भलाई करने से पुण्य मिलता है, अथवा भूखे को रोटी और प्यासे को पानी देने से पुण्य मिलता है। ये नियम सभी धर्मों में एक जैसे हैं। यही सत्य-सनातन धर्म है।
संसार भर के समस्त मनुष्यों का एक ही सत्य-सनानत धर्म है, यह बात हिन्दू धर्म से बाहर के लोगों को समझ में नहीं आती इसलिए वे अपने-अपने सम्प्रदाय का जोर-शोर से प्रचार करते हुए अपने सम्प्रदाय को ही धर्म कहते हैं। जबकि किन्हीं भी दो मनुष्यों के धर्म अलग-अलग नहीं हो सकते, वह तो एक ही है।
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मनुष्य मात्र का धर्म क्या है, इसे समझने के लिए संसार भर में अनेक विद्वानों ने धर्म के अर्थ, परिभाषाएं एवं लक्षण बताए हैं। अलग-अलग अर्थ, अलग-अलग परिभाषाओं एवं अलग-अलग लक्षणों के बताए जाने के कारण धर्म के तत्व को समझ पाना कठिन हो जाता है। मनुष्य धर्म पर चले, इसके लिए आवश्यक है कि वह धर्म को समझे। यही कारण है कि जब से मनुष्य का धर्म नामक विचार से परिचय हुआ है, तब से ही मनुष्य ने धर्म के मर्म को समझने के लिए कथाओं का सहारा लिया है। हम इस धारावाहिक में हिन्दू धर्म की कथाओं के बारे में जानने का प्रयास करेंगे। हिन्दू धर्म का साहित्य-कोश बहुत समृद्ध है। इसका कारण यह है कि हिन्दू धर्म किसी एक पुस्तक से बंधा हुआ नहीं है। हिन्दू धर्म किसी एक ऋषि, एक अवतार या एक मंत्र से बंधा हुआ नहीं है। हिन्दू धर्म किसी एक पूजा-पद्धति से संचालित नहीं होता। हिन्दू धर्म एक अभिवादन से बंधा हुआ नहीं है। इस धर्म में ना-ना पंथ हैं। ना-ना देवी देवता हैं, ना-ना पूजा-पद्धतियां हैं, ना-ना प्रकार के अभिवादन हैं। असंख्य ऋषियों द्वारा दिए गए असंख्य मंत्र हैं, असंख्य ग्रंथ हैं, असंख्य अभिवादन हैं। इस धर्म को मानने वाले लोग सैंकड़ों बोलियां बोलते हैं, विविध प्रकार की वेशभूषा रखते हैं, विविध प्रकार के तिलक लगाते हैं, अलग-अलग तरह के पूजा-स्थल बनाते हैं, अलग-अलग तरह के विधि-विधान करते हैं।
अलग-अलग तरह का भोजन करते हैं। अलग-अलग तरह के यज्ञ, अलग-अलग तरह के व्रत, अलग-अलग तरह के दान आदि धार्मिक कृत्य करते हैं।
हिन्दू धर्म के भीतर सैंकड़ों तरह की वैवाहिक पद्धतियां हैं, सैंकड़ों तरह की मान्यताएं हैं। सैंकड़ों तरह के संस्कार एवं मृतकों की अंत्येष्टियां हैं।
फिर भी इतने सारे पंथ, इतने सारे देवी-देवता, इतनी सारी पूजा पद्धतियां, इतने सारे अभिवादन, इतने सारे ग्रंथ, ना-ना प्रकार के विधि-विधान, अलग-अलग तरह के पूजा स्थल मिलकर हिन्दू धर्म का निर्माण करते हैं।
बिना किसी परिभाषा के, बिना किसी व्याख्या के, बिना किसी लाक्षणिक विवेचना के कोई भी व्यक्ति दूर से ही देखकर पहचान जाता है कि यह व्यक्ति हिन्दू है, यह हिन्दू धर्म में आस्था रखता है।
देखें यह वी-ब्लॉग-
हिन्दू धर्म-साहित्य की कथाओं को विभिन्न शीर्षकों में रखा जा सकता है। उदाहरण के लिए नीति कथाएं, धर्म कथाएं, व्रत एवं त्यौहार की कथाएं, अध्यात्म कथाएं, दार्शनिक कथाएं तथा विभिन्न ग्रंथों में प्रसंगवश आए हुए उद्धरणों एवं पात्रों पर आधारित कथाएं आदि। हम इस चैनल को विभिन्न धर्मग्रंथों में आई हुई कथाओं पर केन्द्रित करेंगे चाहे वे नीतिक कथाएं हों, अथवा व्रत कथाएं अथवा पात्र विशेष से सम्बन्धित कथाएं।
हमें आशा है कि हिन्दू धर्म-साहित्य की इन कथाओं के माध्यम से धर्म के उस मर्म तक पहुंचने का प्रयास करेंगे जिनका प्रणयन हमारे ऋषियों, मुनियों एवं विद्वत्जनों ने आदि काल से किया है। हम सुनते आए हैं कि वेद हिन्दू धर्म के प्राचीनतम धर्म ग्रंथ हैं। इन्हें समस्त सत्य विद्याओं की पुस्तक कहा जाता है।
इन्हें अपौरुषेय भी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है कि इन्हें किसी व्यक्ति ने नहीं लिखा है। व्यावहारिक स्तर पर इस बात के दो अर्थ हो सकते हैं, पहला यह कि वेद हमें देवताओं द्वारा दिए गए और दूसरा यह कि यह किसी एक व्यक्ति ने नहीं लिखे अपितु जंगलों में बैठे ऋषिगण समय-समय पर ऋचाओं का प्राकट्य करते रहे और बाद में महर्षि वेदव्यास ने उन मंत्रों को एक संहिता के रूप में अर्थात् पुस्तकों के रूप में लिपिबद्ध कर दिया जिन्हें हम वेद कहते हैं।
वेदों की ही तरह ब्राह्मणों, उपनिषदों, आरण्यकों तथा पुराणों में भी हजारों साल पुरानी कहानियां उपलब्ध होती हैं। हजारों कथाएं ऐसी भी हैं जो एक से अधिक ग्रंथों में आई हैं तथा उनके विन्यास में थोड़ा-बहुत अंतर भी है।
इन प्राचीनतम ग्रंथों में बहुत सी कथाएं ऐसी भी हैं जो प्राकृतिक घटनाओं का दैवीकरण एवं मानवीकरण करके कथाओं के रूप में लिखी गई हैं। इन कथाओं में पृथ्वी की उत्पत्ति होने से लेकर, पृथ्वी के समुद्र से बाहर निकलने, सप्त द्वीपों का निर्माण होने, दिन-रात बनने, सूर्य-चंद्र ग्रहण लगने, धरती पर कोहरा फैलने जैसी सैंकड़ों छोटी-बड़ी प्राकृतिक घटनाओं का निरूपण किया गया है।
हिन्दू धर्म-साहित्य में बारम्बार आई ऐसी ही एक कथा है भगवान विष्णु द्वारा मधु-कैटभ नामक राक्षसों का वध किए जाने की। इस कथा का आशय एक प्राकृतिक घटना से है।
हम आगामी कड़ियों में वेदों, ब्राह्मणों, उपनिषदों, आरण्यकों तथा पुराणों में मिलने वाली विविध कथाओं की चर्चा करेंगे। इन प्राचीन ग्रंथों के अतिरिक्त महिर्ष वाल्मिीकि द्वारा लिखित रामायण एवं महिर्ष वेदव्यास द्वारा लिखित महाभारत में भी अनूठी धर्म कथाओं के भण्डार भरे पड़े हैं। इस चैनल में उन कथाओं को भी स्थान देने का प्रयास किया जाएगा।
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