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रोमन कैथोलिक चर्च का इतिहास (41)

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रोमन कैथोलिक चर्च - bharatkaitihas.com
रोमन कैथोलिक चर्च का इतिहास

रोमन कैथोलिक चर्च का आशय किसी एक विशिष्ट भवन से न होकर विश्व-व्यापी संस्था से है। यह विश्व का सबसे बड़ा ईसाई चर्च है। इस चर्च के सदस्यों की संख्या एक सौ करोड़ से अधिक है। उनके नेता पोप हैं जो विश्व भर में फैले हुए ईसाई धर्माध्यक्षों अर्थात् पादरियों, बिशपों एवं कार्डिनलों के समुदाय के प्रधान हैं। रोम का कैथोलिक चर्च पश्चिमी और पूर्वी कैथोलिक चर्चों का एक समागम है।

रोमन कैथोलिक चर्च का लक्ष्य यीशू मसीह के सुसमाचार संसार भर के लोगों तक पहुँचाना, श्रद्धालु मनुष्यों को ईसाई संस्कार प्रदान करना तथा दयालुता के प्रयोग करना है। यह चर्च विश्व के सबसे पुराने संस्थानों में से एक है और इसने पश्चिमी सभ्यता के इतिहास में प्रमुख भूमिका निभाई है।

चर्च की स्थापना

ईसाई जगत् में मान्यता है कि रोम के इस कैथोलिक चर्च को यीशू मसीह द्वारा स्थापित किया गया था तथा सेंट पीटर को इस चर्च का पहला बिशप नियुक्त किया था। इस कारण इसे ‘पापल बेसिलिका ऑफ सेंट पीटर’ भी कहा जाता है। कैथोलिक जगत् में यह भी मान्यता है कि सेंट पीटर को स्वर्ग की चाबियां सौंपी गई थीं। रोम का सेंट पीटर कैथोलिक चर्च संसार का सबसे पहला चर्च है। इस चर्च के धर्माध्यक्ष धर्मदूतों के उत्तराधिकारी हैं। इस चर्च के पोप को संत पीटर के उत्तराधिकारी के रूप में सार्वभौमिक प्रधानता प्राप्त है।

चर्च का भवन

ईसा मसीह ने जिस चर्च की स्थापना की थी, उस समय इसका भवन निःसंदेह बहुत साधारण रहा होगा। उसके बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता किंतु सेंट पीटर की मृत्यु के बाद उन्हें उसी चर्च में दफनाया गया था। चौथी शताब्दी ईस्वी में जब रोमन एम्परर कॉस्टेन्टाइन ने पुराने चर्च के स्थान पर एक नए चर्च का निर्माण करवाया तो सेंट पीटर की कब्र को सुरक्षित रखा गया। वर्तमान बेसिलिका का निर्माण ई.1506 में आरम्भ किया गया तथा इसका विशाल भवन और उसके चारों ओर की सरंचनाएं ई.1626 में बनकर पूरी हुईं। सेंट पीटर की कब्र अब भी इसी चर्च के अंदर तथा उसी स्थान पर है, जहाँ उसे मूल रूप से दफनाया गया था।

पवित्र आत्मा का मार्ग-दर्शन

चर्च का कहना है कि उसे पवित्र आत्मा अर्थात् ईसा मसीह का मार्ग-दर्शन प्राप्त है जिसके कारण वह धार्मिक विश्वास और नैतिकता पर अपनी शिक्षाओं को अचूकता से परिभाषित कर सकता है।

यूकेरिस्ट

कैथोलिक पूजा ‘यूकेरिस्ट’ पर केंद्रित है जिसके अनुसार चर्च की मान्यता है कि ‘रोटी और शराब यीशू मसीह के शरीर और रक्त में अलौकिक रूप से रूपांतरित हैं।’

माता मरियम के प्रति विशेष श्रद्धा

यह चर्च माता मरियम के प्रति विशेष श्रद्धा रखता है। मरियम के सम्बन्ध में कैथोलिक मान्यताओं में उनका मूल, पाप के दाग से रहित, निर्मल गर्भधारण तथा उनके जीवन के अंत में स्वर्ग में स्थाई निवास करने सम्बन्धी धारणाएं सम्मिलित हैं।

कैथोलिक शब्द का अर्थ

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कैथोलिक शब्द मूलतः ग्रीक शब्द ‘कैथोलिकोस’ से बना है जिसका अर्थ है- ‘सार्वभौमिक’। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग दूसरी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में चर्च के वर्णन के लिए किया गया था। ई.1054 में पूर्वी एवं पश्चिमी सम्प्रदायों के विभाजन के बाद जो ईसाई चर्च, रोम के पोप के साथ जुड़े रहे, वे ‘कैथोलिक‘ कहलाए तथा जो चर्च पोप की सत्ता को नहीं मानते थे, वे ‘पूर्वी यूनानी चर्च’ ‘रूढ़िवादी’ या ‘पूर्वी रूढ़िवादी’ (ऑर्थोडोक्स) के नाम से जाने गए। इस विभाजन के बाद पश्चिमी ईसाइयों का धर्माध्यक्ष ‘पोप’ कहलाता रहा जबकि पूर्वी ईसाइयों का धर्माध्यक्ष ‘पात्रिआर्क’ कहलाया। इस विभाजन के तत्काल बाद पोप तथा पात्रिआर्क दोनों ने एक दूसरे को ईसाई धर्म से बहिष्कृत कर दिया। 16वीं सदी में हुए सुधारों के बाद, रोम के पोप के साथ जुड़े चर्चों ने स्वयं को प्रोटेस्टेंट चर्चों से अलग रखने के लिए अपने लिए ‘कैथोलिक’ शब्द का प्रयोग किया। कैथोलिक चर्च की प्रश्नोत्तरी के शीर्षक में भी ‘कैथोलिक चर्च’ का प्रयोग किया गया है। इन्हीं शब्दों का प्रयोग पॉल (षष्ठम्) ने दूसरी वेटिकन परिषद् के सोलह दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते समय किया था। पोप के तथा धर्माध्यक्षीय सम्मेलनों के दस्तावेजों में कभी-कभी चर्च का नाम ‘रोमन कैथोलिक चर्च’ प्रयुक्त किया गया है। पोप पायस (दशम्) की प्रश्नोत्तरी में चर्च को ‘रोमन’ कहा गया है।

प्रारंभिक ईसाइयत

कैथोलिक सिद्धांत के अनुसार पोप, संत पीटर के उत्तराधिकारी हैं। कैथोलिक मत बताता है कि कैथोलिक चर्च की स्थापना यीशू मसीह द्वारा प्रथम सदी ईस्वी में की गई एवं धर्म-प्रचारकों पर पवित्र आत्मा आने से इसकी सार्वजनिक सेवा आरम्भ होने का संकेत मिला।

यीशू के धर्म-प्रचारकों ने भूमध्यसागरीय समुद्र के पास यहूदी समुदायों में धर्मांतरितों को पाया। टारसस के पॉल आदि धर्म-प्रचारकों ने गैर-यहूदियों को ईसाई धर्म में धर्मान्तरित करना आरम्भ किया। इसी काल में ईसाई धर्म यहूदी परम्पराओं से अलग हुआ और इसने स्वयं को पृथक धर्म के रूप में स्थापित किया।

रोम के बिशप को अन्य पादरियों पर सर्वोच्चता

प्रारंभिक चर्च का संगठन अधिक शिथिल था और ‘इवेंजिलवाद’ पर आधारित था जिसके परिणाम स्वरूप ईसाई मत की अलग-अलग व्याख्याएं प्रचलित थीं। अपनी शिक्षाओं में एकरूपता लाने के लिए द्वितीय सदी के आरम्भ में, चर्च ने पादरियों की विभिन्न श्रेणियों की सुनिश्चित व्यवस्था आरम्भ की। केन्द्रीय ‘धर्माध्यक्ष’ को अपने शहर में पादरी वर्ग पर सर्वोच्चता का अधिकार दिया गया।

इसके साथ ही एक धर्मप्रदेशीय संगठन स्थापित किया गया जो रोमन साम्राज्य के क्षेत्रों एवं शहरों का प्रतिनिधित्व करता था। राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण शहरों के धर्माध्यक्षों ने, निकटवर्ती शहरों के धर्माध्यक्षों पर वृहत् अधिकार प्राप्त करने के प्रयास किए। उस काल में एंटिओक, एलेक्जेंड्रिया एवं रोम के चर्चों के स्थान सर्वोच्च थे।

सार्वभौम धर्म-सभाएं

चर्च के सिद्धांतों को समय-समय पर होने वाली सार्वभौम धर्म-सभाओं द्वारा परिभाषित किया गया। द्वितीय शताब्दी ईस्वी में धर्माध्यक्ष सैद्धान्तिक एवं नीति सम्बन्धी मामलों को सुलझाने के लिए क्षेत्रीय धर्म-सभाओं का आयोजन करते थे। आगे चलकर धर्म-विज्ञानियों एवं धर्म-शिक्षकों की एक शृंखला द्वारा धर्म-सिद्धांतों को और अधिक परिष्कृत किया गया जिन्हें सामूहिक रूप से चर्च-पिताओं (फादर) के नाम से जाना जाता है।

धर्म विषयक विवादों को सुलझाने में सार्वभौम परिषदों को निर्णयकारी माना गया। इन सार्वभौम परिषदों से जो सैद्धांतिक सूत्र निकले वे ईसाई धर्म के इतिहास में मील के पत्थर सिद्ध हुए।

पोप की अपील कोर्ट के रूप में भूमिका

तृतीय शताब्दी ईस्वी तक, रोमन धर्माध्यक्ष ने उन समस्याओं पर ‘अपील कोर्ट’ के रूप में कार्य करना प्रारंभ कर दिया जिन्हें क्षेत्रीय धर्माध्यक्ष नहीं सुलझा पाते थे।

ईसाइयों के बारे में दुष्प्रचार

रोमन साम्राज्य के अधिकांश धर्मों के विपरीत, ईसाई धर्म चाहता था कि उसके अनुयायी अन्य दूसरे ईश्वरों को त्याग दें। ईसाईयों द्वारा गैर-ईसाई समारोहों में शामिल होने से इंकार किया जाता था। इस कारण वे सार्वजनिक जीवन के अधिकांश समारोहों एवं अवसरों में सम्मिलित नहीं होते थे।

इस अस्वीकृति ने गैर-इसाईयों में भय उत्पन्न किया कि ईसाई लोग रोम के देवताओं को नाराज कर रहे हैं। रोम के आरम्भिक ईसाइयों ने अपने कर्मकाण्डों को गोपनीय रखा जिसके कारण जन-साधारण में ईसाइयों के बारे में कई तरह की अफवाहें फैल गईं। कहा जाने लगा कि ईसाई उच्छृंखल, कौटुम्बिक व्यभिचारी एवं नरभक्षी हैं। उस काल के स्थानीय अधिकारियों ने भी इन अफवाहों के कारण ईसाईयों को उपद्रवी मानकर उन्हें सताया।

ईसाई मतावलम्बियों की प्रताड़ना

तीसरी सदी के अंत में इसाईयों को पीड़ित करने का संगठित सिलसिला प्रारंभ हुआ। रोमन एम्परर ने आदेश जारी किया कि ईसाइयों की उपस्थिति के कारण रोम के देवता कुपित हो गए हैं, इस कारण साम्राज्य में सैनिक, राजनीतिक एवं आर्थिक संकट आ रहे हैं। इस आदेश के बाद बहुत से इसाईयों को सजा मिली।

बहुत से बंदी बनाए गए, उत्पीड़ित किए गए, उनसे बल-पूर्वक श्रम करवाया गया, उनमें से बहुत से बधिया कर दिए गए या वेश्यालयों में भेज दिए गए। बहुत से ईसाई चुपचाप रोम छोड़कर भाग गए। जो ईसाई, राजकीय कर्मियों द्वारा पहचाने नहीं जा सके, वे रोम में ही चुपचाप निवास करते रहे। कुछ लोगों ने सम्राट के भय से ईसाई धर्म छोड़ दिया।

डोनाटिस्टों तथा नोवाटिआनिस्टों का विभाजन

इसी काल में कैथोलिक चर्च में धर्मगुरुओं की भूमिका को लेकर मतभेद हो गया तथा ईसाई मतावलम्बी डोनाटिस्टों तथा नोवाटिआनिस्टों में विभाजित हो गए।

ईसाई धर्म को रोमन एम्परर की मान्यता

ई.313 में सम्राट कॉन्स्टेंटाइन द्वारा कैथोलिक इसाईयत को कानूनी मान्यता दी गई।

रोमन साम्राज्य की राजधानी का परिवर्तन

ई.325 में रोम का एम्परर कॉन्स्टेंटीन, रोमन साम्राज्य की राजधानी को बिजैन्तिया (बिजेन्टाइन) ले गया तथा बाद में उसके निकट नई राजधानी का निर्माण किया गया जिसे सम्राट के नाम पर कान्सटेंटिनोपल (कुस्तुंतुनिया) कहा गया।

एरियन एवं कैथोलिक ईसाइयों का विभाजन

ई.325 में रोम के ईसाई समुदाय में इस विचार को लेकर बड़ा विवाद छिड़ गया कि ईसा का अस्तित्व अनन्त काल तक नहीं था बल्कि वे ईश्वर द्वारा निर्मित थे और इसलिए वे पिता-ईश्वर से कमतर हैं। इस सिद्धांत को ‘एरियनवाद’ कहा जाता है। एरियनवाद पर विचार करने के लिए ई.325 में निकाईया में ईसाई संघ की प्रथम परिषद् बुलाई गई जिसमें एरियनवाद को अस्वीकार कर दिया गया तथा ईसा के अस्तित्व एवं ईश्वरत्व सदा स्थायी रहने वाले माने गए। इस पर ‘ऐरियन ईसाई’, ‘कैथोलिक मत’ से अलग हो गए।

ईसाई धर्म को राजधर्म की मान्यता

ई.380 में ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का राजधर्म घोषित किया गया।

बाईबिल-सम्बन्धी आधिकारिक आदेश

ई.382 में रोम की सभा ने बाईबिल के सम्बन्ध में प्रथम आधिकारिक आदेश जारी किया तथा ओल्ड एवं न्यू टेस्टामेण्ट की मान्य पुस्तकों को सूचीबद्ध किया।

एकीकृत ईसाई जगत् की स्थापना के प्रयास

ई.387 में नाइसिया की द्वितीय परिषद हुई। पहली सात सार्वभौम परिषदों ने ईसाई संघ की मान्यताओं के बारे में एक परम्परागत सर्वसम्मति बनाने और एकीकृत ईसाई जगत की स्थापना करने की दिशा में कार्य किया।

निकेने धर्मसार

ईसाई धर्म के सिद्धान्तों को संक्षिप्त रूप से अभिव्यक्त करने के लिए, सभा ने एक धर्मसार जारी किया जिसे ‘निकेने धर्मसार’ कहा जाता है। इस परिषद् ने चर्च के क्षेत्र को भौगोलिक एवं प्रशासकीय क्षेत्रों में चिह्नित किया जिसे ‘धर्मप्रदेश’ कहा गया।

चर्च द्वारा लैटिन भाषा को मान्यता

रोमन साम्राज्य में अत्यंत प्राचीन काल में संस्कृत भाषा बोली जाती थी। सैंकड़ों साल के अंतराल में उसी संस्कृत से लैटिन भाषा का जन्म हुआ। इस कारण लैटिन भाषा को हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की रोमन शाखा में रखा जाता है। यह आज भी संस्कृत से मिलती-जुलती है। फ्रैंच, इटालवी, जर्मन स्पैनिश, रोमानियाई और पुर्तगाली भाषाओं का जन्म लैटिन भाषा से हुआ है किंतु अंग्रेजी भाषा इससे अलग एवं स्वतंत्र मानी जाती है।

चौथी शताब्दी ईस्वी में, पोप डमासस (प्रथम) ने अपने सचिव सेंट जेरोम को उत्कृष्ट क्लासिकल लैटिन भाषा में बाईबिल के नए अनुवाद का कार्य सौंपा। चर्च अब लैटिन भाषा में सोचने एवं पूजा-प्रार्थना करने के लिए प्रतिबद्ध था। लैटिन भाषा ने चर्च के रोमन अनुष्ठान में पूजन पद्धति की भाषा के रूप में अपनी भूमिका जारी रखी और आज भी चर्च की आधिकारिक भाषा के रूप में लैटिन ही प्रयुक्त होती है। यद्यपि वर्तमान में लैटिन को एक मृत भाषा माना जाता है तथापि रोमन कैथोलिक चर्च की धर्मभाषा और वैटिकन सिटी राज्य की राजभाषा यही लैटिन है।

नेस्टोरियनों एवं मोनोफिसाइटों के बीच विभाजन

ई.431 में इफेसस की धर्म-सभा और ई.451 में कैलसीडन की धर्म-सभा ने ईसा मसीह की दिव्यता एवं मानवीय स्वभावों में सम्बन्धों को परिभाषित किया। अनेक ईसाई इन व्याख्याओं से असंतुष्ट थे जिसके कारण वे दो नेस्टोरियन एवं मोनोफिसाइट समुदायों में विभक्त हो गए।

पोप की सर्वोच्चता

ई.325 में रोमन सम्राट कॉन्स्टेंन्टाइन के रोम छोड़कर बेजेन्टाइन (विजेन्तिया) जाने से लेकर ई.500 के बीच पोप के अधिकारों में लगातार वृद्धि हुई।  ई.451 में कैलसीडन की सभा में कॉन्सटेंटिनोपल (कुस्तुंतुनिया) के धर्माध्यक्ष को रोम के धर्माध्यक्ष के बाद प्रमुखता एवं शक्ति में ‘द्वितीय’ घोषित किया गया।

जनजातीय समुदायों का ईसाई बनना

पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन (ई.410) के समय तक, कई यूरोपीय जनजातियां ईसाई धर्म अपना चुकी थीं किंतु उनमें से अधिकतर जनजातियों जिनमें ओस्त्रोगोथ, विसिगोथ, बुर्गुण्डि और वाण्डाल शामिल थे, ने ईसाई धर्म की शिक्षाओं को ‘अरियासवाद’ के रूप में अपनाया था। यह एक ऐसी धार्मिक पद्धति थी जिसे कैथोलिक चर्च द्वारा पहले ही अमान्य घोषित कर दिया गया था।

यूरोपीय एरियन तथा रोमन कैथोलिकों में विवाद

जब इन जनजातीय कबीलों ने रोमन साम्राज्य के विजित प्रदेशों पर अपने छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना की तो इन जातियों के प्राचीन ईसाई सम्प्रदाय, जिसे यूरोपीय एरियन कहा जाता था और रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय के बीच धार्मिक मतभेद उत्पन्न हो गया। अन्य जनजातीय कबीलों के राजाओं के विपरीत, फ्रेंक जाति का शासक क्लोविस (प्रथम), ई.497 में अरियासवाद सम्प्रदाय को छोड़कर कैथोलिक मत में दीक्षित हो गया।

इससे इटली में निवास कर रहे उत्तरी यूरोप के जनजातीय कबीलों में फ्रैंक कबीले की स्थिति अधिक मजबूत हो गई क्योंकि अब उसका कैथोलिक चर्च के पोप के साथ सीधा सम्बन्ध स्थापित हो गया। कुछ अन्य यूरोपीय राज्यों ने भी फ्रैंकों का अनुकरण किया। अंततः ई.589 में स्पेन में विसिगोथ और 7वीं शताब्दी ईस्वी में इटली में लोम्बर्ड्स ने भी कैथोलिक चर्च के धर्म को स्वीकार कर लिया।

सेंट बेनेडिक्ट द्वारा ईसाई मठों की व्यवस्था में सुधार

6वीं शताब्दी के आरम्भ में, यूरोपीय धार्मिक मठों ने संत बेनेडिक्ट के शासन-ढांचे का अनुसरण किया जिससे वे जन सामान्य के लिए आध्यात्मिक केंद्र होने के साथ-साथ कला, शिल्प, लेखन, पुस्तकालय और कृषि केन्द्रों की कार्यशाला आदि विविध उपयोगों के लिए विकसित हो गए। इससे इन चर्चों की लोकप्रियता में अपार विस्तार हुआ।

पोप ग्रेगरी (प्रथम) द्वारा इंग्लैण्ड में ईसाई धर्म का प्रचार

छठी शताब्दी ईस्वी के अंत में पोप ग्रेगरी (प्रथम) (ई.540-604) ने चर्च में प्रशासनिक सुधारों और ग्रेगोरियन मिशन की शुरूआत की। उन्हें पोप ग्रेगरी महान् भी कहा जाता है। ईसाई धर्म का सर्वोपरि नेता चुने जाने के पहले उन्हें रोमन सिनेटर का सम्मान प्राप्त था। वे राजनीति के क्षेत्र को छोड़कर धर्म के क्षेत्र में आ गए।

ई.590 में उन्हें पोप चुना गया। पोप ग्रेगरी ने इंग्लैण्ड में ईसाई धर्म के व्यापक प्रचार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पाँचवी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ तक इंग्लैंड रोमन साम्राज्य का ही हिस्सा था किंतु रोमन साम्राज्य के बिखर जाने के बाद इंग्लैण्ड से रोमन प्रभाव तथा ईसाई धर्म दोनों का लोप होने लगा।

इस काल में ‘एंजल्स’ नामक एक जर्मन जाति जर्मनी से आकर इंग्लैण्ड में बसने लगी जो विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करती थी। इस जाति ने इंग्लैंड के ईसाई धर्म को नष्ट कर दिया। एक बार पोप ग्रेगरी ने कुछ अंग्रेज बालकों को रोम के बाजार में दास के रूप में बिकते हुए देखा।

पोप इन बालकों की सुंदरता से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने निश्चय किया कि ब्रिटिश द्वीप में फिर से ईसाई धर्म का प्रचार किया जाए। उन्होंने आगस्टाइन नामक एक प्रसिद्ध पादरी को इंग्लैंड भेजा। आगस्टाइन ने केंट के राजा एथलबर्ट के दरबार में जाकर ईसाई धर्म का प्रचार प्रारंभ किया।

एथलबर्ट ने फ्रांस की एक ईसाई राजकुमारी से विवाह किया था, अतः एथलबर्ट ने सरलता से ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और आगस्टाइन को केंटरबरी में एक गिरजाघर बनाने की अनुमति प्रदान की। इस प्रकार पोप ग्रेगरी के प्रयत्नों से इंग्लैंड में ईसाई धर्म का फिर से प्रचार आरम्भ हुआ।

पोप ग्रेगरी द्वारा ईसाई धर्म के ग्रंथों का निर्माण

पोप ग्रेगरी ने ईसाई धर्म के सर्वोच्च नेता के रूप में उच्च-स्तरीय प्रशासकीय प्रतिभा का परिचय दिया। उनके पत्रों से उनकी व्यावहारिक बुद्धि और प्रशासनिक योग्यता का परिचय मिलता है। पोप ग्रेगरी ने ईसाई धर्म के उस समय तक प्रचलित ग्रंथों की समीक्षा की तथा ईसाई धर्म की मुख्य बातों को वार्तालाप के रूप में प्रस्तुत किया।

लैटिन भाषा की इन रचनाओं में उन्होंने गूढ़ विषयों के निरूपण के लिए अधिकांशतः रूपक शैली का प्रयोग किया। इस शैली में शब्द दो अर्थ रखते हैं, एक तो ऊपरी अर्थ जो स्वतः स्पष्ट होता है और दूसरा लाक्षणिक अर्थ जिससे धर्म सम्बन्धी गूढ़ विचार भी सरलता से समझ में आ जाते हैं। पोप ग्रेगरी ने ईसाई धर्म से पहले की कथाओं के स्थान पर ईसाई संतों की कहानियों का प्रचार करवाया।

उन्होंने जो कुछ भी लिखा, धर्म के व्यापक प्रचार की भावना से लिखा। उनका ध्यान विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति पर था, न कि शैली पर। फिर भी उनकी भाषा में सौंदर्य और प्रभावोत्पादकता का अद्भुत समन्वय हुआ है।

दक्षिणी भूमध्य भागों से पोप के प्रभाव की समाप्ति

7वीं शताब्दी ईस्वी में मुस्लिम आक्रांताओं ने दक्षिणी भूमध्य क्षेत्र के अधिकांश भागों को जीत लिया। इस कारण इन क्षेत्रों से पोप का प्रभाव समाप्त हो गया। यहाँ तक कि स्वयं पश्चिमी ईसाई जगत के लिए भी खतरा उत्पन्न हो गया।

एम्परर और पोप के सम्बन्धों में सुधार से कैथोलिक धर्म का प्रचार

रोम के कैरोलिनगियन राजाओं ने एम्परर और पोप के बीच के सम्बन्धों को सशक्त बनाया। ई.754 में सबसे युवा राजकुमार पीपीन (पेपिन) को रोम के पोप स्टीफन (द्वितीय) द्वारा एक भव्य समारोह में ताज पहनाया गया। पीपीन ने लोम्बर्ड्स को परास्त करके कैथोलिक राज्य का विस्तार किया। जब उसका पुत्र शार्लमेन सम्राट बना तो उसने अपनी शक्ति का तेजी से विस्तार किया।

ई.782 तक वह पश्चिमी राजाओं में सबसे ताकतवर ईसाई शासक हो गया। ई.800 में उसने रोम में कैथोलिक राज्याभिषेक प्राप्त किया। उसने सम्राट के, कैथोलिक चर्च के संरक्षक के रूप में हस्तक्षेप करने के अधिकार की व्याख्या की।

सिरिलिक वर्णमाला का आविष्कार

9वीं शताब्दी ईस्वी में बुल्गारिया में संत स्यरिल और मेथोडिउस द्वारा सिरिलिक वर्णमाला का आविष्कार किया गया।

ऑर्थोडोक्स का कैथोलिक चर्च से अलगाव

9वीं सदी में, मूर्ति-भंजन तथा धार्मिक चित्रों के विनाश ने रोमन चर्च तथा पूर्वी चर्च के बीच नए सिरे से फूट की शुरूआत की। रोमन ईसाई माता मैरी तथा ईसा मसीह के चित्रों एवं मूर्तियों की पूजा करते थे। साथ ही अन्य ईसाई संतों की भी मूर्तियां एवं चित्रों को पूजाघरों में स्थान देते थे। जबकि पूर्वी ईसाई इसके विरोधी थे तथा इसे ईसाई धर्म के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध मानते थे।

9वीं शताब्दी ईस्वी में बीजेन्टाइन (कुस्तुंतुनिया) द्वारा नियंत्रित दक्षिणी इटली एवं बल्गेरियाई मिशनों में गिरिजाघर के क्षेत्राधिकारों को लेकर संघर्ष हुआ जिससे दोनों चर्चों के बीच मतभेद इतना बढ़ा कि ई.1054 में दोनों चर्चों में औपचारिक अलगाव हो गया। फूट के बाद, कुस्तुंतुनिया के ईसाई सम्प्रदाय को रूढ़िवादी चर्च कहा जाने लगा, जबकि रोम के पोप के साथ संलग्नता दिखाने वाले चर्चों को कैथोलिक कहा गया।

बाद में ई.1274 में ल्यों में आयोजित परिषद और ई.1439 में फ्लोरेंस में आयोजित परिषद में दोनों चर्चों के मतभेद दूर करने के प्रयास हुए किंतु इन प्रयासों को सफलता नहीं मिली।

पोप पर एम्परर की सर्वोच्चता सीमित करने के प्रयास

11वीं और 12वीं सदी में रोमन चर्च में आंतरिक सुधार के प्रयास किए गए। ई.1059 में पोप के चुनाव को सम्राट और कुलीनों के हस्तक्षेप से मुक्त कराने के लिए कार्डिनल कॉलेज स्थापित किया गया। ई.1122 में पोप तथा एम्परर के बीच यह सहमति हुई कि चर्च के धर्माध्यक्ष का चयन चर्च के कानून के अनुसार किया जाएगा।

पोप ग्रेगरी (सप्तम्) के काल में पोप और एम्परर के बीच ‘अलंकरण-विवाद’ भड़क उठा। रोम के एम्परर द्वारा धर्माध्यक्षों को अलंकृत किया जाता था। राजा के इस अधिकार के कारण पोप पर राजा की सर्वोच्चता प्रकट होती थी। इसलिए पोप ने एम्परर के इस अधिकार का विरोध किया।

सेंट्रल चर्च ऑर्गेनाइजेशन

14वीं सदी के आरम्भ में रोम में एक केंद्रीकृत चर्च संगठन (सेंट्रल चर्च ऑर्गेनाइजेशन) की स्थापना की गई।

याचक आदेश की स्थापना

फ्रांसिस असीसी और डोमिनिक डी गुजमान के द्वारा शहरी जीवन में पवित्रता लाने के उद्देश्य से याचक आदेश की स्थापना की गई। इन आदेशों ने विश्वविद्यालयों में चर्च के प्रभाव के विकास में बड़ी भूमिका निभाई। डोमिनिकन थॉमस एक्विनास जैसे शैक्षिक ब्रह्मविज्ञानियों ने इस तरह के विश्वविद्यालयों में अध्ययन और अध्यापन का कार्य किया। उन्होंने अरस्तू के विचारों और ईसाइयत के संयोग से ‘सुम्मा थियोलोजिका’ का निर्माण किया जो उनकी महत्त्वपूर्ण बौद्धिक उपलब्धि थी।

जॉन हस वैक्लिफ का जीवित ही अग्नि दहन

ई.1305 में पोप क्लीमेंट (पंचम्) रोम छोड़कर फ्रांस के अविगानो शहर में चला गया। इस कारण पोप का पद फ्रेंच-प्रभुत्व के अधीन हो गया। ई.1376 में पोप के पुनः रोम लौट आने पर अविगानो के पोप का पद समाप्त हो गया किंतु ई.1378 में रोम तथा अविगानो में और ई.1409 में रोम तथा पीसा के बीच पोप के पद के लिए विवाद खड़े हुए।

पश्चिमी ईसाई संघ के मतभेद का कारण कुछ लोगों द्वारा पोप की एकल प्रधानता के स्थान पर सामूहिक अधिकार की मांग करना था। इस मांग को ईसाई संघ का समर्थन भी प्राप्त हुआ परन्तु जब मार्टिन (पंचम्) पोप बना तो ई.1417 में कोंस्टेंस की परिषद् में इस निर्णय को पलट दिया गया और यह घोषणा की गई कि- ‘पोप ने ईसा से अधिकार प्राप्त कर लिया है।

इस घोषणा का समर्थन करते हुए इंग्लैण्ड के निवासी जॉन वैक्लिएफ ने लिखा कि ‘चर्च की चिरकालिक स्थिति को बाइबिल में देखा जा सकता है और यह सभी के लिए उपलब्ध है।’

प्राग के जॉन हस वैक्लिफ ने इस घोषणा का विरोध किया। हस को लोगों का विशाल समर्थन प्राप्त होने लगा। इस कारण कॉन्स्टेंस की परिषद् में हस को धर्मनिन्दा का दोषी घोषित किया गया और उसे जीवित जला देने की सजा सुनाई गई।

चर्च के आंतरिक भ्रष्टाचार में सुधार के प्रयास

कॉन्स्टेंस की परिषद, बेसल की परिषद और पाँचवीं लैटर्न परिषद ने चर्च के आंतरिक भ्रष्टाचार में सुधार लाने के प्रयास किए। ई.1460 में कांस्टेंटिनोपल में तुर्कों के पतन के साथ पोप पायस (द्वितीय) ने एक सामान्य परिषद के गठन से मना कर किया। इस कारण पोप के पद पर रोदेरिगो बोर्गिया (पोप अलेक्जेंडर षष्ठम्) को चुना गया। पोप जूलियस (द्वितीय) ने स्वयं को एक धर्मनिरपेक्ष पोप के रूप में प्रस्तुत किया।

16वीं सदी के प्रारंभिक दिनों में डेसिडेरियस इरास्मस नामक व्यक्ति ने ‘मूर्खता की प्रशंसा’ नामक एक रचना प्रकाशित करवाई जिसमें चर्च में सुधार नहीं करने के लिए चर्च की आलोचना की गई थी। ई.1517 में जर्मनी के मार्टिन लूथर ने कुछ ईसाई धर्माध्यक्षों को अपना एक शोध भेजा जिसमें उसने कैथोलिक सिद्धांत के मुख्य बिंदुओं का उल्लेख करते हुए चर्च द्वारा की जा रही क्षमा-पत्रों की बिक्री का विरोध किया।

इसी प्रकार स्विट्जरलैंड में हुर्ल्द्यच ज्विन्गली, जॉन केल्विन और एनी ने भी कैथोलिक शिक्षाओं की आलोचना की। विभिन्न लोगों द्वारा चर्च के समक्ष खड़ी की जा रही ये चुनौतियां ही आगे चल कर यूरोपीय आंदोलन में बदल गईं जिसे प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार कहा जाता है।

जर्मनी में प्रोटेस्टेंट सुधार, स्च्माल्काल्दिक लीग और कैथोलिक सम्राट चार्ल्स (पंचम्) के बीच नौ वर्षीय युद्ध का कारण बना जो ई.1518 में एक बहुत ही गंभीर तीस वर्षीय युद्ध में बदल गया। ई.1562 से 1598 के बीच फ्रांस में संघर्ष की एक लम्बी शृंखला चली जिसे धर्म की फ्रांसिसी लड़ाई कहते हैं। ये युद्ध हुगुएनोट्स और फ्रेंच कैथोलिक लीग की सेनाओं के मध्य लड़े गए। इस संघर्ष में ‘संत बर्थोलोमेव दिवस नरसंहार’ महत्त्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।

ई.1598 के नैनटेस के आदेश के साथ धार्मिक सहिष्णुता का पहला प्रयोग आरम्भ किया गया। इस आदेश  ने प्रोटेस्टेन्ट्स को नागरिक और धार्मिक मान्यता प्रदान की। पोप क्लेमेंट (अष्ठम्) द्वारा अत्यंत हिचहिचाकहट के साथ इस ओदश को स्वीकार कर लिया गया।

इंग्लैण्ड में हेनरी (अष्ठम्) के शासनकाल में एक राजनीतिक विवाद के रूप में धार्मिक सुधार आरम्भ हुए। जब पोप ने सम्राट हेनरी के विवाह के समय सम्राट की एक याचिका को अस्वीकार कर दिया तो सम्राट ने स्वयं को ब्रिटिश चर्च का प्रमुख घोषित कर दिया। हेनरी ने बहुत से ईसाई मठों, फ्रेयारिस, कॉन्वेंट और धार्मिक स्थलों की सम्पत्ति भी जब्त कर ली।

उसके शासनकाल के अंत में एक व्यापक सैद्धांतिक और मरणोत्तर सुधारों की शुरूआत की गई जो एडवर्ड (षष्ठम्) के शासनकाल और आर्क बिशप थॉमस क्रेन्मेर के समय भी जारी रहे। महारानी मैरी (प्रथम) के शासनकाल में इंग्लैंड संक्षिप्त रूप से रोम के चर्च के साथ पुनः संयुक्त हो गया किंतु महारानी एलिजाबेथ (प्रथम) ने अलग चर्च की स्थापना करके कैथोलिक पादरियों पर नियंत्रण स्थापित किया तथा कैथोलिकों को राजनीतिक जीवन में भाग लेने से रोका।

ई.1545-1563 की अवधि में ट्रेंट की परिषद ने काउंटर सुधारों को आगे बढ़ाया। उसने केंद्रीय कैथोलिक शिक्षाओं की पुष्टि की तथा तत्त्वान्तरण और मोक्ष प्राप्ति के लिए प्यार तथा आशा के साथ-साथ श्रद्धा रखने पर बल दिया। इसने संरचनात्मक सुधार भी किया। पादरियों की शिक्षा में सुधार और रोमन करिया के मध्य क्षेत्राधिकार को मजबूत करने का कार्य किया।

काउंटर सुधार की शिक्षाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए, चर्च ने कला, संगीत और वास्तुकला में ‘बैरोक शैली’ को प्रोत्साहित किया। 16वीं शताब्दी के मध्य में ‘द सोसायटी ऑफ यीशू’ की औपचारिक रूप से स्थापना की गई। इसी समय टेरेसा ऑफ अविला, फ्रांसिस डि सेल्स और फिलिप्स नेरी जैसे चरित्रों के लेखन ने चर्च में नवीन उत्साह का संचार किया।

17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में, पोप इनोसेंट (नवम्) ने चर्च के पदानुक्रम में होने वाली अनियमितताओं में सुधार लाने के प्रयत्न किए। उन्होंने धर्मपद बेचने, भाई-भतीजावाद करने और पोप द्वारा अति-व्यय किए जाने पर रोक लगाई। पोप इनोसेंट को एक बड़ा ऋण-भार विरासत के रूप प्राप्त हुआ था।

उन्होंने मिशनरी की गतिविधियों को बढ़ावा दिया, तुर्की के आक्रमण के खिलाफ यूरोप को एकजुट करने का प्रयास किया, प्रभावशाली कैथोलिक शासकों को प्रोटेस्टेन्ट्स से विवाह करने की छूट प्रदान की तथा धार्मिक उत्पीड़न की दृढ़ता से निंदा की।

मध्यकाल में कैथोलिक मत स्पेन, पुर्तगाल, अमेरिका, एशिया और ओशिनिया में फैल गया। पोप अलेक्जेंडर (षष्ठम्) ने स्पेन और पुर्तगाल को नई खोजी गई भूमियों के सर्वाधिक अधिकार दिए और पत्रेनेतो व्यवस्था के माध्यम से यह सुनिश्चित किया कि औपनिवेशिक व्यवस्था राज्य के अधिकारियों की अनुमति से हो न कि वेटिकन प्रणाली से।

औद्योगिक युग

पोप लियो (तेरहवें) ने औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप उत्पन्न सामाजिक चुनौतियों की प्रतिक्रिया के रूप में ‘एनसाइक्लिकल रेरम नोवार्म’ प्रकाशित किया। उसने कैथोलिक सामाजिक शिक्षण को प्रारम्भ किया तथा कार्यप्रणाली स्थितियों के विनियमन, निर्वाह-मजदूरी की स्थापना तथा व्यापार संघ बनाने के लिए श्रमिकों के अधिकार की वकालत की।

अभ्रांतता के सिद्धांत की पुष्टि

सैद्धांतिक मामलों में चर्च की अभ्रांतता हमेशा से चर्च का सिद्धांत रही थी। ई.1870 में पहली वेटिकन परिषद में पोप ने ‘अभ्रांतता के सिद्धांत’ की औपचारिक रूप से पुष्टि की।

डॉन बॉस्को की सेल्सियन सिस्टर्स

ई.1872 में जॉन बॉस्को और मारिया माजारेल्लो ने इटली में ‘सेल्सियन सिस्टर्स ऑफ डॉन बॉस्को’ नामक संस्था स्थापित की जो वर्ष 2009 में 14,420 सदस्यों के साथ दुनिया में महिलाओं की सबसे बड़ी कैथोलिक संस्था बन गई।

वेटिकन सिटी के प्रभुत्व को स्वीकृति

इटली के एकीकरण के बाद पोप के पद तथा इटैलियन सरकार के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। यह विवाद ई.1929 की लेटरन संधि द्वारा वेटिकन के प्रभुत्व को पवित्र स्वीकृत किये जाने के बाद ही सुलझ पाया।

बीसवीं सदी में कैथोलिक पादरियों पर अत्याचार

20वीं सदी में दुनिया के विभिन्न देशों में राजनैतिक कट्टरपंथियों तथा पादरी-विरोधी सरकारों ने कैथोलिक चर्चों को क्षति पहुँचाई। मैक्सिको में 3,000 से अधिक पादरी या तो मार दिए गए  या निर्वासित कर दिये गए। चर्चों को अपवित्र किया गया, उनका मजाक उड़ाया गया, ननों के साथ बलात्कार किया गया तथा पकड़े गए पादरियों को गोली मार दी गई।

सोवियत संघ में ई.1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद चर्चों तथा कैथोलिक पादरियों पर अत्याचार आरम्भ हुए जो ई.1930 में भी जारी रहे। पादरियों की फांसी और निर्वासन, धार्मिक साधनों का अधिग्रहण और चर्चों का बंद होना आम बात थी। स्पेन में भी कैथोलिक पादरियों एवं चर्चों पर भयानक अत्याचार हुए।

रोम के ग्यारहवें पोप पायस ने इन तीन देशों (मैक्सिको, रूस तथा स्पेन) को एक ‘भयानक त्रिभुज’ के रूप में तथा यूरोप और अमेरिका में विरोध की विफलता को एक ‘मौन षड़यन्त्र’ के रूप में उल्लिखित किया।

द्वितीय विश्व युद्ध में कैथोलिक ईसाइयों एवं यहूदियों का उत्पीड़न

द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले नाजी जर्मनी में चर्चों को नुक्सान पहुँचाया गया। सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होने के बाद, चर्च ने पोलैंड के हमले तथा बाद में 1940 में नाजियों पर हुए हमलों की निंदा की। नाजियों के अधिकार वाले क्षेत्र में हजारों कैथोलिक पादरियों, ननों और भाइयों को जेल भेज दिया गया तथा मार दिया गया।

मैक्सिमिलियन कोल्बे तथा एडिथ स्टैन आदि ईसाई-संत भी इन्हीं में शामिल थे। युद्धकाल में, पोप पायस (तेरहवें) ने चर्च अनुक्रम को निर्देशित किया कि वे नाजियों से यहूदियों की रक्षा करें। कुछ इतिहासकारों द्वारा बारहवें पायस को लाखों यहूदियों को बचाने में मदद देने का श्रेय दिया गया जबकि दूसरी तरफ कुछ इतिहासकारों द्वारा यहूदी विरोधवाद युग को प्रोत्साहित करने तथा पायस द्वारा नाजियों के अत्याचारों को रोकने में नाकामी के लिए चर्च को दोषी माना गया।

कम्युनिस्ट सरकारों द्वारा कैथोलिक पादरियों का उत्पीड़न

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद पूर्वी यूरोप में अनेक देशों की कम्युनिस्ट सरकारों ने धार्मिक स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया। हालांकि कम्युनिस्ट शासन के साथ कुछ पादरियों और धार्मिक लोगों ने सहयोग किया। इस काल में अनेक कैथोलिक पादरियों को कैद कर लिया गया, उन्हें निर्वासित किया गया या मार दिया गया।

कम्युनिस्ट शासकों की धारणा थी कि यूरोप में साम्यवाद के पतन के लिए चर्च एक महत्त्वपूर्ण खिलाड़ी होगा। ई.1949 में चीन में कम्युनिस्टों की सत्ता में वृद्धि, समस्त विदेशी मिशनरियों का निष्कासन लेकर आयी। नई सरकार ने राष्ट्रवादी चर्चों की स्थापना की तथा अपनी पसंद के पादरी नियुक्त किए। रोम ने इन पादरियों को अस्वीकार कर दिया किंतु जब चीन की सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही तो रोम ने इन पादरियों को स्वीकार कर लिया तथा उन्हें कैथोलिक सम्प्रदाय के भीतर मान लिया।

ई.1960 की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान चीन में सभी धार्मिक प्रतिष्ठान बंद कर दिए गए। कुछ वर्षों बाद जब चीनी चर्च फिर से खुले तब उन्हें राष्ट्रवादी चर्चों के नियंत्रण में रखा गया। कई कैथोलिक पादरियों तथा याजकों ने रोम के प्रति निष्ठा त्यागने से मना कर दिया। इस पर चीन की सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया।

ऑर्थोडॉक्स चर्च एवं प्रोटेस्टेण्ट्स से सम्बन्ध मधुर बनाने की पहल

पोप जॉन (तेबीसवें) द्वारा ई.1962 में द्वितीय वेटिकन परिषद् शुरू की गई। पोप के समर्थकों ने इस परिषद् को ‘झरोखा खुलने की शुरूआत’ कहकर इसका स्वागत किया। इस पारिषद् ने लैटिन चर्च के भीतर उपासना पद्धति में परिवर्तन किया।

चर्च के मिशन का पुनः-संकेन्द्रण किया गया एवं सार्वभौमिकता को पुनः परिभाषित किया गया ताकि पूर्वी पारंपरिक चर्च (ऑर्थोडॉक्स चर्च) एवं प्रोटेस्टेण्ट्स के साथ सम्बन्ध मधुर बनाए रखे जा सकें।

परम्परावादी कैथोलिकों जिनका प्रतिनिधित्व मार्शल लेफेब्रे आदि कर रहे थे, ने परिषद् की कटु आलोचना करते हुए कहा कि इसने लैटिन जनता की पवित्रता को दूषित किया, ‘झूठे धर्मों’ के प्रति धार्मिक उदासीनतावाद को बढ़ावा दिया और ऐतिहासिक कैथोलिक धर्म-सिद्धांत एवं परम्परा के साथ समझौता किया।

बिशप कार्लोस को नोबल पुरस्कार

ई.1966 में बिशप कार्लोस फिलिप जिमेनेन्स बेलो को ईस्ट तिमोर युद्ध में उचित एवं शांतिपूर्ण समाधान के लिए कार्य करने पर नोबल पुरस्कार दिया गया।

प्रथम गैर-इटालवी पोप

ई.1978 में, पोप जॉन पॉल (द्वितीय) 455 वर्षों में प्रथम गैर-इटालवी पोप बने। उनका 27 वर्षों का कार्यकाल, रोम के पोपों के इतिहास में सबसे लंबे कार्यकालों में से एक था। सोवियत संघ के अंतिम शासक मिखाइल गोर्बाचोव ने पोप जॉन पोल (द्वितीय) को ही यूरोप में साम्यवाद के पतन को तीव्र करने के लिए जिम्मेवार माना।

उन्होंने तृतीय विश्व में ऋण राहत एवं इराकी युद्ध के विरुद्ध आंदोलन का समर्थन किया। पोप ने यौन-नैतिकता के प्रश्न पर पक्के रूढ़िवादी ओपस देई को एक वैयक्तिक धर्माधिकारी बनाया। पोप जॉन पॉल (द्वितीय) के कार्यकाल में ई.1979 में कलकत्ता की कैथोलिक नन मदर टेरेसा को भारत के गरीब लोगों के बीच मानवतावादी कार्य करने के लिए नोबल शांति पुरस्कार दिया गया।

1980 के दशक में पोप जॉन पॉल (द्वितीय) ने लैटिन अमेरिका में उदारवादी धर्मविज्ञान पर मार्क्सवादी प्रभाव को अस्वीकृत करते हुए कहा कि चर्च को गरीब एवं पीड़ित के लिए विभेदकारी राजनीति या क्रांतिकारी हिंसा से कार्य नहीं करना चाहिए। उन्होंने अपने कार्यकाल में 483 संतों को संत का दर्जा दिया।

यह अपने सभी पूर्ववर्ती पोपों द्वारा घोषित किए गए संतों की कुल संख्या के जोड़ से भी अधिक था। उन्होंने यहूदियों एवं मुस्लिमों के साथ मेल-मिलाप के लिए कार्य किया, चर्च के उत्पीड़कों को क्षमा किया एवं चर्च द्वारा की गई ऐतिहासिक गलतियों के लिए क्षमा मांगी, जिसमें यहूदी औरतें, स्वदेशी लोग, मूलनिवासी, अप्रवासी, गरीब एवं अजन्मों के विरुद्ध की गई धार्मिक असहिष्णुता एवं अन्याय शामिल हैं। ई.1986 में उन्होंने विश्व युवा दिवस स्थापित किया।

इस काल में मानव अधिकारों एवं सामाजिक न्याय हेतु चल रहे आंदोलनों के कारण कैथोलिक पादरियों एवं बिशपों को शहादत देनी पड़ी, विशेषकर लैटिन अमेरिका में। ई.1980 में अल सल्वाडोर के आर्क-बिशप आस्कर रोमेरियो को वेदी पर मार दिया गया एवं ई.1989 में मध्य अमेरिकी विश्वविद्यालय के छः जेसुसुईटों की हत्या कर दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैथोलिक चर्च के सिद्धांत एवं शिक्षाएं (42)

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कैथोलिक चर्च के सिद्धांत एवं शिक्षाएं

कैथोलिक चर्च के सिद्धांत एवं शिक्षाएं उन्हीं मूलभूत अवयवों से निर्मित हैं जिन तत्वों से धर्म नामक सार्वभौमिक तत्व का निर्माण होता है। फिर भी कैथोलिक चर्च के सिद्धांत एवं शिक्षाएं दुनिया भर के मजहबों, पंथों, सम्प्रदायों से स्वयं को अलग दिखाने का प्रयास करते हैं। कुछ सीमा तक यह पृथकता एक वास्तविकता भी है। इसी पृथकता के कारण संसार के अन्य मजहबों से ही नहीं, स्वयं ईसाइयत की विभिन्न धाराओं से उसका खूनी टकराव रहा है।

रोमन कैथोलिक चर्च मानता है कि इस जगत में एक अनन्त परमेश्वर, तीन व्यक्तियों के रूप में स्थित है- परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और पवित्र आत्मा। ये तीनों एक साथ मिलकर त्रिमूर्ति (ट्रिनिटी) का निर्माण करते हैं।

कैथोलिक धर्म विश्वास करता है कि ‘चर्च’ पृथ्वी पर यीशू की सतत उपस्थिति है। चर्च परमेश्वर के लोगों को सूचित करता है कि जो यीशू मसीह के आज्ञा पालन में निरत रहते हैं और और जो मसीह की देह के साथ पोषित होते हैं, वे मनुष्य, मसीह की देह हो जाते हैं। पोप सम्बन्धी ‘मिस्टीक कोर्पोरिस क्रिस्टी’ (ईसाई धर्म सम्बन्धी रहस्यवाद) में कैथोलिक चर्च को मसीह के रहस्यात्मक शरीर के रूप में वर्णित किया गया है।

चर्च मानता है कि मुक्ति के साधन की परिपूर्णता केवल कैथोलिक चर्च में ही मौजूद है, किन्तु यह भी मानता है कि पवित्र आत्मा ईसाईयत से स्वयं को अलग किये हुए समुदाय के उद्धार के लिए भी कार्य कर सकती है। जो कोई व्यक्ति बचाया जाता है, परोक्ष रूप से चर्च के माध्यम से बचाया जाता है।

कैथोलिक चर्च यीशू मसीह द्वारा स्थापित किया गया था। नव विधान यीशू मसीह के कार्यों और शिक्षाओं को बारह प्रेरितों की नयुक्ति और उनको अपने कार्य जारी रखने के लिए दिए गए अधिकारों का वर्णन करता है। चर्च का मानना है कि यीशू मसीह ने अपने शिष्य साइमन पीटर को प्रेरितों के नेता के रूप में इस उद्घोषणा के साथ नियुक्त किया- ‘इस चट्टान से मैं अपने चर्च का निर्माण करूंगा ….. मैं तुम्हें स्वर्ग के राज्य की कुंजियां दूंगा …..।’

चर्च कहता है कि प्रेरितों पर पवित्र आत्मा का आगमन पेंटेकोस्ट के रूप में जाना जायेगा, जो चर्च की सार्वजनिक सेवा की शुरुआत का संकेत है। तब से, सभी विधिवत् पवित्र धर्माध्यक्षों को प्रेरितों का उत्तराधिकारी माना जाता है और वे पवित्र प्रेरितों से प्राप्त पवित्र परम्परा को जारी रखते हैं।

ईसा मसीह के सम्बन्ध में अवधारणा

कैथोलिक ईसाइयों का मानना है कि मसीह पूर्व विधान की मुक्तिदायिनी भविष्यवाणियों के मसीहा हैं। एक ऐसी घटना जिसे अवतार के रूप में जाना जाता है, जिसके बारे में चर्च बताता है कि पवित्र आत्मा की शक्ति के माध्यम से, परमेश्वर मानव प्रकृति के साथ एकजुट हो गये, तब ‘मसीह’ कुमारी माता मरियम के गर्भ में आए।

इस कारण मसीह को पूरी तरह से दिव्य और पूरी तरह से मानव दोनों माना जाता है। चर्च द्वारा यह सिखाया जाता है कि पृथ्वी पर मसीह का मिशन, जिसमें लोगों को उनकी शिक्षाओं के बारे में बताना और उन्हें स्वयं का उदाहरण प्रदान करना शामिल है, जैसा कि चार धर्म उपदेशों में दर्ज है।

माता मरियम के सम्बन्ध में कैथोलिक चर्च की अवधारणा

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मरियम की प्रार्थनाएं और भक्ति कैथोलिक धार्मिकता का हिस्सा हैं किन्तु परमेश्वर की पूजा से पृथक हैं। चर्च ‘मैरी’ को नित्य कुमारी और परमेश्वर की माता के रूप में विशेष आदर प्रदान करता है। मरियम के सम्बन्ध में कैथोलिक विश्वासों में मूल पाप के दाग के बिना पवित्र गर्भाधान तथा जीवन के अंत में शारीरिक धारणा के साथ स्वर्ग में स्थान शामिल हैं। इन दोनों मान्यताओं को ई.1854 में पोप पायस (नवम्) तथा ई.1950 में पोप पायस (बारहवें) ने सिद्धांत के रूप में परिभाषित किया था। ‘मैरीऑलोजी’ न केवल माता मैरी के जीवन के बारे में अपितु उनके दैनिक जीवन में पूजा, प्रार्थना और मैरियन कला, संगीत और वास्तुकला पर विस्तार से प्रकाश डालती है। चर्च वर्ष के दौरान अनेक मैरियन मरणोत्तर भोज का आयोजन करता है और उन्हें अनेक उपाधियों, जैसे कि, ‘स्वर्ग की रानी’ आदि से विभूषित किया जाता है। पोप पॉल (षष्ठम्) ने उन्हें ‘चर्च की माँ’ कहकर पुकारा, क्योंकि यीशू मसीह को जन्म देने के कारण वह यीशू के शरीर से जुड़े सभी सदस्यों की आध्यात्मिक माँ हुईं। उनके द्वारा यीशू के जीवन में प्रभावशाली भूमिका निभाने के कारण उनकी प्रार्थना और भक्ति, माला, जय हो मैरी, साल्वे रेजाइना और मैमोरारे सामान्य कैथोलिक व्यवहार हैं।

चर्च ने मेरियन की आभासी छाया की विश्वसनीयता की पुष्टि अवर लेडी ऑफ लूर्डेस, फातिमा, ग्वाडालूप और विस्कोंसिन, लेडी ऑफ गुड होप आदि के रूप में की है। इन तीर्थस्थलों की यात्राएं लोकप्रिय कैथोलिक भक्तियां हैं।

चर्च की दृष्टि में पाप कर्म

पाप कर्म में शामिल होने को यीशू मसीह के विपरीत होना माना जाता है। पाप करने से व्यक्ति की आत्मा ईश्वर के प्रेम से दूर हो जाती है। पापों की शृंखला परमेश्वर के साथ व्यक्ति के सम्बन्ध को समाप्त कर सकती है।

आध्यात्मिक अमरता

 चर्च के अनुसार मसीह का जुनून (पीड़ा) और उनको सलीब पर चढ़ाये जाने के प्रति प्रेम, सभी लोगों के लिए अपने पापों से मुक्ति और क्षमा प्राप्ति का एक अवसर है। ताकि परमेश्वर से मिलाप हो सके। कैथोलिक विश्वास के अनुसार, यीशू के जी उठने, ने मनुष्यों के लिए एक संभव आध्यात्मिक-अमरता प्राप्त की, जो पहले मूल-पापों की वजह से उन्हें नहीं दी गई थी। चर्च का मानना है कि मसीह के शब्दों और कर्मों का पालन करके, कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है।

संस्कार परमेश्वर के स्वरूप हैं

ट्रेंट की परिषद के अनुसार, मसीह ने सात संस्कार स्थापित कर उन्हें चर्च को सौंपा था। इन संस्कारों में पुष्टिकरण, बपतिस्मा, युकेरिस्ट, सामंजस्य (तपस्या), बीमार को तेल लगाना (चर्म लेप या अंतिम संस्कार), पवित्र आदेश और पवित्र विवाह के बंधन सम्मिलित हैं। ‘संस्कार’ महत्त्वपूर्ण दृश्य रिवाज है जिसे कैथोलिक ‘परमेश्वर की उपस्थिति’ के रूप में देखते हैं।

पुष्टिकरण संस्कार

कैथोलिकों का विश्वास है कि पुष्टिकरण संस्कार के माध्यम से मनुष्य, पवित्र आत्मा को प्राप्त करते हैं और बप्तिस्मा के समय प्राप्त होने वाला आशीर्वाद सशक्त होता है। ठीक से पुष्टि के लिए कैथोलिकों को अनुग्रह की अवस्था में होना चाहिए, जिसका अर्थ हैं कि वे स्वीकार नहीं किये जाने वाले नैतिक पापों के विरुद्ध सचेत रहेंगे। उन्हें पुष्टिकरण के लिए आध्यात्मिक रूप से तैयार रहना चाहिए, साथ ही आध्यात्मिक सहायता के लिए एक प्रायोजक चुनकर, एक संत का उनके विशेष संरक्षण और हिमायत के लिए चुनाव करना चाहिये।

बपतिस्मा

पूर्वी कैथोलिक चर्चों में पुष्टिकरण के तुरंत बाद ‘शिशु-बपतिस्मा’ किया जाता है जिसे ईसाईकरण (क्रिस्मेसन) कहा जाता है और इसे ‘परम-कृपा का अभिनन्दन’ माना जाता है।

पापों से मुक्ति के लिए प्रायश्चित संस्कार

बपतिस्मा के बाद कैथोलिक ‘प्रायश्चित’ संस्कार के माध्यम से अपने पापों के लिए क्षमा प्राप्त कर सकते हैं। इस संस्कार में, व्यक्ति एक पादरी के समक्ष अपने पापों को स्वीकार करता है। पादरी उस व्यक्ति को सलाह देता है और विशेष प्रायश्चित करने के लिए कहता है। तदुपरांत पादरी औपचारिक रूप से उस व्यक्ति के पापों को क्षमा कर देता है और उस व्यक्ति के पाप मुक्त होने की घोषणा करता है।

पादरी किसी भी पाप या बयान के प्रकटीकरण के तहत सुनी गई बातों को किसी के भी समक्ष प्रकट नहीं करते। व्यक्ति द्वारा अपने पापों को स्वीकार करने और क्षमा प्राप्त करने के बाद चर्च द्वारा उसे एक क्षमा-पत्र प्रदान किया जा सकता है। एक क्षमा-पत्र नरक में मिलने वाले पापों से आंशिक या पूर्ण रूप से छुटकारा दिला सकता है।

सार्वभौमिक न्याय

चर्च के अनुसार, मृत्यु के तुरंत बाद प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा के बारे में परमेश्वर की ओर से एक विशेष निर्णय प्राप्त होगा जो कि व्यक्ति के सांसारिक जीवन के कर्मों के आधार पर होगा। एक दिन जब मसीह समस्त मानव जाति के लिए सार्वभौमिक न्याय करेंगे। यह अंतिम निर्णय मानव इतिहास का अंत लाने के लिए तथा एक नए और बेहतर स्वर्ग एवं पृथ्वी पर परमेश्वर के धर्म-शासन की शुरुआत होने का प्रतीक होगा।

देवदूत मैथ्यू द्वारा किए जाने वाले विस्तृत वर्णन के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा के बारे में निर्णय लिया जायेगा। माना जाता है मैथ्यू के सुसमाचार में निम्नतम लोगों द्वारा किये गए दया के कार्यों को भी शामिल किया जायेगा।

कैथोलिक प्रश्नोत्तरी के अनुसार, अंतिम निर्णय भी स्वयं से आगे का परिणाम प्रस्तुत करेगा, व्यक्ति ने अपने सांसारिक जीवन के दौरान जो अच्छे कार्य किये हैं या वैसा करने में असफल हो गए हैं, को प्रकट करेगा। प्रस्तुत निर्णय के अनुसार, एक आत्मा जीवन के बाद के तीन राज्यों में से किसी एक में प्रवेश करती है। ‘स्वर्ग’ परमेश्वर के साथ शानदार संयोजन और अकथ्य खुशी का जीवन है, जो हमेशा के लिए रहता है। ‘यातना’ आत्मा की शुद्धि के लिए एक अस्थायी स्थिति है।

जो व्यक्ति पर्याप्त रूप से पाप-मुक्त नहीं हैं, वे सीधे स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकते, उन्हें यातना से गुजराना होता है। नर्क की आत्माओं को श्रद्धालुजन की प्रार्थनाओं और पवित्र लोगों की सहानुभूति के द्वारा स्वर्ग में पहुँचने में सहायता मिलती है। जिन व्यक्तियों ने पाप-पूर्ण और स्वार्थमय जीवन चुना है और जो पश्चाताप नहीं करते तथा पूर्णतः अपने तरीके से जीना चाहते हैं, नर्क में भेजे जाते हैं जो कि परमेश्वर से एक चिरस्थायी जुदाई होती है।

किसी को भी नर्क में तब तक नहीं भेजा जाता है जब तक कि उसने स्वतंत्र रूप से परमेश्वर को अस्वीकार करने का फैसला नहीं लिया है। किसी भी व्यक्ति का नर्क में जाना पूर्व-निर्धारित नहीं है और न ही कोई इस बात का निर्णय कर सकता है कि किसी की निंदा की गई है या नहीं! रोमन कैथोलिक ईसाई धर्म सिखाता है कि परमेश्वर की दया से कोई व्यक्ति मृत्यु से पहले जीवन के किसी भी बिंदु पर पश्चाताप करके पापों से मुक्त हो सकता है।

कुछ कैथोलिक ब्रह्मविज्ञानियों का विचार है कि ‘अ-बपतिस्मा हुए शिशुओं की आत्माएं’ जो मूल-पाप में मर जाते हैं, वे उपेक्षित स्थान को जाते हैं, हालांकि यह चर्च का अधिकारिक सिद्धांत नहीं है।

कैथोलिक विश्वासों का संग्रह

कैथोलिक विश्वासों का ‘नाइसीन पंथ’ में सारांशित और ‘कैथोलिक चर्च की प्रश्नोत्तरी’ में विस्तृत रूप से वर्णन है। धर्मप्रचार में मसीह के वादे के आधार पर, चर्च का मानना है कि यह लगातार पवित्र आत्मा के द्वारा निर्देशित है और इसलिए सैद्धांतिक त्रुटि में गिरने से बिना गलती किए रक्षित है। कैथोलिक चर्च सिखाता है कि पवित्र आत्मा परमेश्वर की सच्चाई को पवित्र धर्मग्रन्थ, पवित्र परम्परा और मैजिस्टीरियम के माध्यम से उद्घाटित करता है।

पवित्र धर्मग्रंथ

कैथोलिक पवित्र धर्मग्रन्थों में 73 कैथोलिक बाइबिल पुस्तकें हैं। इनमें 46 प्राचीन ग्रीक संस्करण की पूर्व विधान की पुस्तकें हैं, जिन्हें ‘सेप्तुआजिन्त’ कहा जाता है और 27 नव विधान की पुस्तकें हैं जो पहले कोडेक्स वैटिकन्स ग्रैकस 1209 में पाई गईं और ‘अथानासिउस’ के उन्तालीसवें आनंदित पत्र में सूचीबद्ध हैं।

चर्च की शिक्षाएं

पवित्र परम्परा में चर्च की शिक्षाएं शामिल हैं जिनके बारे में चर्च मानता है कि वे प्रेरितों के समय से चली आ रही हैं। पवित्र शास्त्र और पवित्र परम्परा सामूहिक रूप से ‘विश्वास की जमा’ के रूप में जाना जाता है। इन सबकी व्याख्या मैजिस्टीरियम द्वारा की गई है। मैजिस्टर लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है- ‘शिक्षक’।

मरणोत्तर संस्कार

कैथोलिक चर्च में प्रचलित मरणोत्तर परम्पराओं अथवा संस्कारों का अंतर, मान्यताओं में अंतर के बजाय ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। मरणोत्तर संस्कारों में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली प्रक्रिया रोमन संस्कार हैं परन्तु लैटिन कैथोलिक चर्च में कुछ अन्य संस्कार भी उपयोग में लाये जाते हैं और वे पूर्वी कैथोलिक चर्चों में प्रयुक्त होने वाले संस्कारों से अलग हैं।

वर्तमान में रोमन अनुष्ठान के दो रूप अधिकृत रूप से प्रचलित हैं। ई.1962 के पूर्व की रोमन मिसल (पॉल षष्ठम् की प्रार्थना) अब संस्कार का साधारण रूप है और ज्यादातर स्थानीय भाषा में मनाया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में, अंग्रेजी प्रयोग लुप्त होता जा रहा है, कुछ रोमन संस्कार अंग्रेजी के मरणोत्तर संस्कार के कई पहलुओं को बरकरार रखे हुए हैं। अन्य गैर रोमन पश्चिमी संस्कारों में अम्ब्रोसियन अनुष्ठान और मोजराबिक संस्कार शामिल हैं।

पूर्वी कैथोलिक चर्च के द्वारा प्रयोग किये गए संस्कारों में बीजान्टिन संस्कार, अलेक्जेन्द्रिया या कोप्टिक संस्कार, सिरिएक संस्कार, अर्मेनियाई संस्कार, मरोनिते संस्कार और कलडीन संस्कार शामिल हैं।

युकेरिस्ट

युकेरिस्ट या मास, कैथोलिक पूजा केंद्र है। कैथोलिक ईसाइयों का मानना है कि प्रत्येक मास में, रोटी और शराब अलौकिक रूप से मसीह के शरीर और रक्त में रूपांतरित हैं। चर्च की मान्यता है कि मसीह के अंतिम भोजन में मानवता के साथ एक नया नियम युकेरिस्ट की संस्था के माध्यम से स्थापित हुआ।

चर्च के अनुसार मसीह युकेरिस्ट में मौजूद हैं। कैथोलिकों को प्रोटेस्टेंट चर्च में समन्वय प्राप्त करने की अनुमति नहीं है, क्योंकि पवित्र आदेश और युकेरिस्ट के बारे में उनकी अलग मान्यताएं और तरीके हैं। इसी तरह, प्रोटेस्टेंट को कैथोलिक चर्च में समन्वय प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। पूर्वी ईसाइयत के चर्चों के सम्बन्ध में, कैथोलिक चर्च कम प्रतिबंधक है।

कैथोलिक पदानुक्रम और संस्थाएं

चर्च मानता है कि मसीह ने पोप का पद स्थापित किया था। चर्च के अनुक्रम का नेतृत्व रोम के धर्माध्यक्ष पोप द्वारा किया जाता है। पोप रोमन प्रांत के प्रधान धर्माध्यक्ष और महानगरीय, इटली के धर्माधिपति, लेटिन चर्च के आचार्य, तथा सार्वलौकिक चर्च के श्रेष्ठ धर्माध्यक्ष आदि के रूप में भी कार्य करते हैं। धर्माध्यक्ष के रूप में, वे ईसा मसीह के प्रतिनिधि हैं तथा रोम के धर्माध्यक्ष के रूप में वे संतों के उत्तराधिकारी हैं।

पीटर और पॉल तथा परमेश्वर के सेवकों के सेवक, वे वेटिकन सिटी के प्रधान भी हैं। प्रशासन में सलाह और सहायता के लिए, पोप शायद अनुक्रम के अगले स्तर कॉलेज के प्रधान में बदल सकते हैं। पोप की मृत्यु होने पर या पद छोड़ने पर, 80 साल की उम्र के अंतर्गत जो कॉलेज के धर्म प्रधान सदस्य आते हैं वे मिलकर नये पोप का चुनाव करते हैं।

हालांकि कैथोलिक सम्मेलन किसी भी कैथोलिक पुरुष को सैद्धांतिक रूप से पोप नियुक्त कर सकता था, ई.1389 के बाद से केवल धर्म-प्रधानों को ही उस स्तर तक उठाया गया है।

कैथोलिक चर्च में वर्ष 2008 तक 2,795 धर्म-प्रदेश शामिल थे। इनकी देख-रेख धर्माध्यक्ष द्वारा की जाती थी। धर्म-प्रदेश व्यक्तिगत समुदायों में विभाजित किये जाते हैं जिन्हें बस्ती कहा जाता है, प्रत्येक बस्ती में एक से अधिक पादरी, छोटे पादरी तथा धर्माध्यक्षों के सह-कार्यकर्ता होते हैं। ये लोग प्रवचन देना, सिखाना, नाम रखना, गवाह विवाह कराना तथा अंतिम संस्कार की पूजन पद्धति कराना आदि कार्य करते हैं।

धर्माध्यक्ष और पादरियों को युहरिस्ट, मिलाप (प्रायश्चित्त) तथा बीमार का अभिषेक कराना आदि संस्कार करवाने की अनुमति है। केवल धर्माध्यक्ष ही पवित्र आदेशों का संस्कार कर सकते हैं। इस समय कैथोलिक चर्च से सम्बद्ध चर्चों में चार लाख से अधिक पादरी कार्यरत हैं।

अधिकतर संत तथा नन एक तपस्वी के समान कैथोलिक धार्मिक व्यवस्था में प्रवेश करते हैं, जैसे कि संत बेनिडिक्ट के अनुयायी, रोमन कैथोलिक तपस्वी, डोमीनिसियंस, फ्रांसिसकंस तथा दया की बहनें इत्यादि। वर्तमान में दुनिया भर में कैथोलिक चर्च के अनुयाइयों की संख्या 100 करोड़ से अधिक है। यदि कोई ईसाई औपचारिक रूप से चर्च छोड़ता है तो यह तथ्य व्यक्ति के बपतिस्मा रजिस्टर में नोट किया जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पोप (43)

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पोप

रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्म-गुरु, रोम के बिशप एवं वैटिकन के राज्याध्यक्ष को पोप कहते हैं। ‘पोप’ का शाब्दिक अर्थ ‘पिता’ होता है। यह लैटिन भाषा के ‘पापा’ (papa) शब्द से बना है जो स्वयं ग्रीक भाषा के ‘पापास्’ (pápas) शब्द से व्युत्पन्न है। उन्हें संत पापा (पिता) तथा ‘होली फादर’ भी कहते हैं।

ईसा ने अपने महाशिष्य संत पीटर को अपने चर्च का आधार तथा ‘प्रधान चरवाहा’ नियुक्त किया था और उन्हें यह आश्वासन दिया था कि उनका चर्च शताब्दियों तक अस्तित्व में रहेगा। संत पीटर का देहांत रोम में हुआ था। इसलिए प्रारंभ ही से संत पीटर के उत्तराधिकारी, रोम के बिशप, समूचे चर्च के अध्यक्ष तथा पृथ्वी पर ईसा के प्रतिनिधि माने गए।

रोम के बिशप के अतिरिक्त किसी ने कभी संत पीटर का उत्तराधिकारी होने का दावा नहीं किया किंतु पूर्वी चर्च के अलग हो जाने से तथा प्रोटेस्टैंट मत के उद्भव से पोप के अधिकारों के विषय में शताब्दियों तक वाद विवाद होता रहा। अंततोगत्वा वैटिकन के पोप ही इस पद पर प्रथम अधिकार रखते हैं।

वे ईसा की शिक्षाओं के सर्वोच्च व्याख्याता हैं और चर्च के परमाधिकारी की हैसियत से धर्मशिक्षा की व्याख्या करते समय भ्रमातीत अर्थात् अचूक हैं। पोप जॉन पाल (द्वितीय) (ई.1978-2005) वैटिकन को आधुनिक युग में लाए।

पोप बेनेडिक्ट (सोलहवें) को 19 अप्रैल 2005 को कैथोलिक चर्च के 265वां पोप चुना गया। वर्ष 2013 में अर्जेन्टीना मूल के ‘फ्रांसिस’ नए पोप बने। ग्रेगोरी (तृतीय) (ई.731-41) के बाद ‘फ्रांसिस’ पहले पोप हैं जो यूरोप से बाहर के हैं। वर्तमान समय में वही सेंट पीटर्स बेसिलिका एवं कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्माधिकारी हैं तथा वेटिकन के शासक हैं।

वेटिकन सिटी

ई.1929 में पोप लुईस (नवम्) तथा इटली के राजा इमैनुएल (तृतीय) के बीच हुई संधि के बाद वेटिकन सिटी नामक धार्मिक राज्य अस्तित्व में आया। यह राज्य, इटली के लगभग मध्य में स्थित रोम नामक शहर में स्थित है। यह कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप का अधिकृत निवास तथा उनकी राजधानी है। पोप इस राज्य के एकमात्र शासक हैं। वर्ष 2005 में वेटिकन सिटी को पूर्ण स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया गया।

भौगोलिक तथा राजनीतिक विस्तार

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वैटिकन सिटी टाइबर नदी के पश्चिमी छोर पर रोम के मध्य में एक त्रिकोणीय भूमि पर स्थित है। इसके दक्षिण-पूर्वी किनारे पर संत पीटर चौक है जिसमें सेंट पीटर्स चर्च स्थित है। इस चर्च के चारों ओर विशाल स्तंभ बने हुए हैं। इसके उत्तर में चतुर्भुजीय क्षेत्र में प्रबंधकीय भवन तथा बेल्विडर पार्क स्थित हैं। बेल्विडर पार्क के पश्चिम में पोप का महल है और उसके आगे वैटिकन गार्डन है जो कि इस छोटे साम्राज्य का आधा भाग है। लियोनिन दीवार पश्चिमी तथा दक्षिणी सीमा का काम करती है। रोम में धार्मिक महत्त्व के कई स्थान तथा चर्च स्थित हैं जिन्हें इटली सरकार ने कर-मुक्त कर रखा है किन्तु वे धार्मिक साम्राज्य अर्थात् वैटिकन सिटी का भाग नहीं हैं। वैटिकन सिटी की अपनी नागरिकता, अपनी करंसी, अपनी डाक टिकट तथा अपना झंडा तथा अपने राजनयिक हैं। यह चर्च पूरे साल यात्रियों के खुला रहता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु पोप से सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत रूप से मिल सकते हैं। वेटिकन का अपना समाचार पत्र, रेलवे स्टेशन तथा प्रसारण सुविधाएं भी हैं। वैटिकन सिटी के सात विश्वविद्यालय हैं जो रोम में स्थित हैं। वैटिकन सिटी की स्वतंत्रता अक्षुण्ण है तथा इसकी सुरक्षा रोम की सरकार द्वारा की जाती है।

चर्च की सरकार

पोप वेटिकन के चर्च को कार्डिनल्स के कॉलेज के माध्यम से नियंत्रित करते हैं। वे हर प्रकार का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं किन्तु वे सभी मामलों में कार्डिनल्स पर भरोसा करते हैं और उनसे सलाह लेते हैं। स्विस गार्ड की सैन्य टुकड़ी पोप के अंगरक्षकों के रूप में नियुक्त रहती है जिसकी स्थापना 16वीं शताब्दी में की गई थी। इसके सदस्य माइकल एंजलो द्वारा डिजाइन की गई पोशाक पहनते हैं।

वैटिकन सिटी की सार्वजनिक सरकार का प्रमुख, वैटिकन सिटी के लिए नियुक्त धर्माध्यक्ष आयोग का अध्यक्ष होता है जो कि एक कार्डिनल होता है एवं राज्य का विधायक होता है। राज्य को संवैधानिक कानून 2000 के अंतर्गत चलाया जाता है। कानून व्यवस्था धर्मविधान पर आधारित है और इसका न्यायालय चर्च का हिस्सा है।

महल तथा वैटिकन का खजाना

वैटिकन के महल तीन-चार मंजिला भवनों से निर्मित हैं जिनमें समय-समय पर विस्तार और बदलाव होते रहे हें। पोप का आवास और कार्यालय सेंट पीटर चौक पर बने स्तंभों के पास स्थित हैं। शेष भाग को वैटिकन संग्रहालय तथा लाइब्रेरी में बदल दिया गया है। वैटिकन संग्रहालय का विश्व भर में महत्त्वपूर्ण स्थान है। 18वीं शताब्दी में स्थापित मूसियो पायो-क्लिमैंटिनो संग्रहालय में विश्व की प्राचीनतम वस्तुएं संग्रहीत हैं।

19वीं शताब्दी में स्थापित चेयरामोंटी संग्रहालय में ग्रीक मूर्तियों का संग्रह है। वेटिकन में ब्राकियो न्योवो, मिस्री संग्रहालय एवं इट्रोस्कॉन संग्रहालय भी स्थापित किए गए हैं जिनमें विख्यात चित्रकारों गियोटा, गुरसिनो, कारावागियो तथा पॉसिन आदि कलाकारों के बनाए हुए चित्र संग्रहीत हैं। वैटिकन सिटी का संग्रहालय 14.5 किलोमीटर लंबा है।

ऐसा कहा जाता है कि यदि आप एक पेंटिंग को देखने में एक मिनट लगाते हैं तो पूरा संग्रहालय देखने में चार साल लग जाएंगे। इन संग्रहालयों में वैटिकन के कला-खजाने का एक छोटा भाग ही रखा गया है। अधिकतर मॉडर्न पेंटिग विभिन्न भवनों की गैलरियों में प्रदर्शित की गई हैं।

वैटिकन लाइब्रेरी पश्चिमी क्षेत्र में स्थित है और इसमें प्राचीन एवं मध्यपूर्व की विभिन्न भाषाओं की हस्तलिखित पांडुलिपियों को रखा गया है। वैटिकन का प्रमुख प्रार्थना भवन सिस्टीन चैपल है जिसकी छत पर माइकल एंजलो ने ई.1508 से 1512 के बीच पेंटिंग बनाई थीं और जो आज भी सुरिक्षत हैं।

वैटिकन का इतिहास

5वीं शताब्दी के बाद वेटिकन सिटी को पोप के आवास के रूप में विकसित किया गया। सम्राट कॉन्स्टेंटीन (प्रथम) ने जब सेंट पीटर बेसेलिका बनवाया तो पोप साइमाकुस ने उसके निकट ही एक महल का निर्माण करवाया।

14वीं शताब्दी में बैबिलोन के अधिकार से पहले पोप एविग्नान, फ्रांस के लैट्रन पैलस में रहता था। ई.1377 में पोप के रोम में आ जाने से वैटिकन ही पोप का अधिकृत आवास बन गया। सामान्यतः सभी पोप कलाओं के पोषक थे। उन्होंने विभिन्न प्रकार की बहुमूल्य कलाकृतियों, मूर्तियों एवं चित्रों का संग्रह किया और विशाल गैलेरियों का निर्माण करवाया।

17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच पोप के महल के निर्माण पर वैटिकन ने काफी धन व्यय किया। ई.1870 से 1946 तक यह महल इटली के शासक का निवास रहा और वर्तमान में इटली के राष्ट्रपति का अधिकृत आवास है। वैटिकन सिटी में आज भी राजतंत्र प्रचलन में है किन्तु इस राजतंत्र में वंशवाद नहीं है। वेटिकन का राजा कुछ निश्चित नियमों के अंतर्गत चयनित होता है।

इस देश की अर्थव्यवस्था प्रकाशन उद्योग, सिक्कों के निर्माण, डाक टिकटों की बिक्री तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर है। विश्व भर में फैले कैथोलिक चर्चों से वैटिकन को अर्थिक सहायता प्राप्त होती है। डाक टिकटों तथा सिक्कों की बिक्री के अलावा वैटिकन सिटी को पर्यटन स्थल के रूप में भी आय होती है।

वैटिकन सिटी का कुल क्षेत्रफल 44 हैक्टेयर अर्थात् 110 एकड़ है। इस देश की जनसंख्या वर्ष 2007 की जनगणना के अनुसार 857 है। यह विश्व का एकमात्र राज्य है जिसमें कृषि नहीं होती। वैटिकन सिटी में साक्षरता दर शत प्रतिशत है। यहाँ बोली जाने वाली भाषाओं में अंग्रेजी, फ्रैंच, इटालियन तथा लैटिन प्रमुख हैं।

वेटिकन में स्विस, इटालियन तथा कई अन्य देशों की नागरिकता प्राप्त लोग रहते हैं। वैटिकन की अपनी डाक व्यवस्था एवं सिक्के हैं। 1 यूरो के सिक्के पर वर्तमान पोप की तस्वीर होती है और संग्रहकर्त्ताओं में इसकी भारी मांग है। इटालियन नागरिकों को अपनी सरकार की बजाए वैटिकन सिटी को सालाना 8 प्रतिशत टैक्स दान के रूप में देने की छूट होती है।

वैटिकन सिटी अपना पासपोर्ट जारी करता है। पोप, कार्डिनल्स तथा स्विस गार्ड के सदस्य इसके धारक होते हैं। वैटिकन की डाक प्रणाली का प्रयोग अधिकतर इटैलियन लोग करते हैं क्योंकि इटली की बजाए वेटिकन की डाकसेवा अधिक तेज है।

 314 मीटर लंबे और 240 मीटर चौड़े सेंट पीटर चौराहे व स्तंभों का निर्माण 1667 में ब्रनीनी द्वारा पूरा करवाया गया। यह इटली का सबसे विशाल चौक है। इसके स्तंभों एवं अन्य स्थानों को 140 संतों की मूर्तियों से सजाया गया है। वैटिकन सिटी का रेडियो स्टेशन वैटिकन गार्डन में स्थित है और इससे विश्व की 20 भाषाओं में प्रसारण किया जाता है।

वैटिकन सिटी में सड़कें नाममात्र ही हैं अधिकतर गलियां एवं गलियारे हैं। वैटिकन सिटी का रेलवे ट्रैक मात्र 0.86 किमी लंबा है। इसके रेलवे स्टेशन को ई.1930 में खोला गया था। ईसाई धर्म के प्रसार से पहले भी इस स्थान को पवित्र माना जाता था और किसी को भी इस क्षेत्र में रात में ठहरने की अनुमति नहीं होती थी। 13 मई 1981 को एक तुर्क नागरिक ने सेंट पीटर चौराहे पर पोप पर गोली चलाई।

आधुनिक युग में पोप को जान से मारने का यह प्रथम प्रयास था। पोप ने 3 जून 1985 को उस आक्रमणकारी से भेंट की तथा उसे क्षमा कर दिया। इसके बाद इटली ने वैटिकन की स्वतंत्रता पर पुनर्विचार किया और ई.1929 की संधि को रद्द कर दिया। नई संधि के अनुसार वैटिकन की स्वतंत्रता पहले की तरह ही बनी रही किन्तु रोम के अन्य चर्चों को इटली की सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू धर्म-साहित्य का अद्भुत कथा-संसार (1)

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हिन्दू धर्म-साहित्य का अद्भुत कथा-संसार

हिन्दू धर्म-साहित्य अत्यंत विशाल है। विश्व में अन्य किसी धर्म का इतना विपुल साहित्य उपलब्ध नहीं है। हिन्दू धर्म-साहित्य का अद्भुत कथा-संसार इतना रोचक, ज्ञानवर्द्धक और आत्मा के लिए कल्याणकारी है, जिसे शब्दों में वर्णित करना कठिन है।

धर्म का अर्थ है धारण करना। जो मनुष्य उत्तम विचार, उत्तम दर्शन और उत्तम आचरण को धारण करता है, वह मनुष्य धर्म से सम्पन्न है। इस कारण संसार भर में मनुष्य मात्र का धर्म एक ही है।

सभी मनुष्य एक ही धर्म से संचालित होते हैं किंतु सांसारिक स्तर पर धर्म के अगल-अलग नाम और स्वरूप दिखाई देते हैं। वस्तुतः ये नाम और स्वरूप धर्म के नहीं, सम्प्रदायों के हैं। धर्म तो एक ही है।

यही कारण है कि भारत के लोग प्रायः यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि ‘हिन्दू धर्म’ कोई  धर्म नहीं है, यह तो जीवन शैली है। सत्य-सनातन धर्म ही हिन्दुओं का धर्म है, वस्तुतः सत्य सनातन धर्म ही संसार भर के मनुष्यों का वास्तविक धर्म है। उसी को हम हिन्दू धर्म कहते हैं।

इस धर्म के नियम किसी ने बनाए नहीं हैं, मनुष्य ने अपने अनुभव से प्राप्त किए हैं। जैसे कि दूसरों की भलाई करने से पुण्य मिलता है, अथवा भूखे को रोटी और प्यासे को पानी देने से पुण्य मिलता है। ये नियम सभी धर्मों में एक जैसे हैं। यही सत्य-सनातन धर्म है।

संसार भर के समस्त मनुष्यों का एक ही सत्य-सनानत धर्म है, यह बात हिन्दू धर्म से बाहर के लोगों को समझ में नहीं आती इसलिए वे अपने-अपने सम्प्रदाय का जोर-शोर से प्रचार करते हुए अपने सम्प्रदाय को ही धर्म कहते हैं। जबकि किन्हीं भी दो मनुष्यों के धर्म अलग-अलग नहीं हो सकते, वह तो एक ही है।

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मनुष्य मात्र का धर्म क्या है, इसे समझने के लिए संसार भर में अनेक विद्वानों ने धर्म के अर्थ, परिभाषाएं एवं लक्षण बताए हैं। अलग-अलग अर्थ, अलग-अलग परिभाषाओं एवं अलग-अलग लक्षणों के बताए जाने के कारण धर्म के तत्व को समझ पाना कठिन हो जाता है। मनुष्य धर्म पर चले, इसके लिए आवश्यक है कि वह धर्म को समझे। यही कारण है कि जब से मनुष्य का धर्म नामक विचार से परिचय हुआ है, तब से ही मनुष्य ने धर्म के मर्म को समझने के लिए कथाओं का सहारा लिया है। हम इस धारावाहिक में हिन्दू धर्म की कथाओं के बारे में जानने का प्रयास करेंगे। हिन्दू धर्म का साहित्य-कोश बहुत समृद्ध है। इसका कारण यह है कि हिन्दू धर्म किसी एक पुस्तक से बंधा हुआ नहीं है। हिन्दू धर्म किसी एक ऋषि, एक अवतार या एक मंत्र से बंधा हुआ नहीं है। हिन्दू धर्म किसी एक पूजा-पद्धति से संचालित नहीं होता। हिन्दू धर्म एक अभिवादन से बंधा हुआ नहीं है। इस धर्म में ना-ना पंथ हैं। ना-ना देवी देवता हैं, ना-ना पूजा-पद्धतियां हैं, ना-ना प्रकार के अभिवादन हैं। असंख्य ऋषियों द्वारा दिए गए असंख्य मंत्र हैं, असंख्य ग्रंथ हैं, असंख्य अभिवादन हैं। इस धर्म को मानने वाले लोग सैंकड़ों बोलियां बोलते हैं, विविध प्रकार की वेशभूषा रखते हैं, विविध प्रकार के तिलक लगाते हैं, अलग-अलग तरह के पूजा-स्थल बनाते हैं, अलग-अलग तरह के विधि-विधान करते हैं।

अलग-अलग तरह का भोजन करते हैं। अलग-अलग तरह के यज्ञ, अलग-अलग तरह के व्रत, अलग-अलग तरह के दान आदि धार्मिक कृत्य करते हैं।

हिन्दू धर्म के भीतर सैंकड़ों तरह की वैवाहिक पद्धतियां हैं, सैंकड़ों तरह की मान्यताएं हैं। सैंकड़ों तरह के संस्कार एवं मृतकों की अंत्येष्टियां हैं।

फिर भी इतने सारे पंथ, इतने सारे देवी-देवता, इतनी सारी पूजा पद्धतियां, इतने सारे अभिवादन, इतने सारे ग्रंथ, ना-ना प्रकार के विधि-विधान, अलग-अलग तरह के पूजा स्थल मिलकर हिन्दू धर्म का निर्माण करते हैं।

बिना किसी परिभाषा के, बिना किसी व्याख्या के, बिना किसी लाक्षणिक विवेचना के कोई भी व्यक्ति दूर से ही देखकर पहचान जाता है कि यह व्यक्ति हिन्दू है, यह हिन्दू धर्म में आस्था रखता है।

देखें यह वी-ब्लॉग-

हिन्दू धर्म-साहित्य की कथाओं को विभिन्न शीर्षकों में रखा जा सकता है। उदाहरण के लिए नीति कथाएं, धर्म कथाएं, व्रत एवं त्यौहार की कथाएं, अध्यात्म कथाएं, दार्शनिक कथाएं तथा विभिन्न ग्रंथों में प्रसंगवश आए हुए उद्धरणों एवं पात्रों पर आधारित कथाएं आदि। हम इस चैनल को विभिन्न धर्मग्रंथों में आई हुई कथाओं पर केन्द्रित करेंगे चाहे वे नीतिक कथाएं हों, अथवा व्रत कथाएं अथवा पात्र विशेष से सम्बन्धित कथाएं।

हमें आशा है कि हिन्दू धर्म-साहित्य की इन कथाओं के माध्यम से धर्म के उस मर्म तक पहुंचने का प्रयास करेंगे जिनका प्रणयन हमारे ऋषियों, मुनियों एवं विद्वत्जनों ने आदि काल से किया है। हम सुनते आए हैं कि वेद हिन्दू धर्म के प्राचीनतम धर्म ग्रंथ हैं। इन्हें समस्त सत्य विद्याओं की पुस्तक कहा जाता है।

इन्हें अपौरुषेय भी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है कि इन्हें किसी व्यक्ति ने नहीं लिखा है। व्यावहारिक स्तर पर इस बात के दो अर्थ हो सकते हैं, पहला यह कि वेद हमें देवताओं द्वारा दिए गए और दूसरा यह कि यह किसी एक व्यक्ति ने नहीं लिखे अपितु जंगलों में बैठे ऋषिगण समय-समय पर ऋचाओं का प्राकट्य करते रहे और बाद में महर्षि वेदव्यास ने उन मंत्रों को एक संहिता के रूप में अर्थात् पुस्तकों के रूप में लिपिबद्ध कर दिया जिन्हें हम वेद कहते हैं।

वेदों की ही तरह ब्राह्मणों, उपनिषदों, आरण्यकों तथा पुराणों में भी हजारों साल पुरानी कहानियां उपलब्ध होती हैं। हजारों कथाएं ऐसी भी हैं जो एक से अधिक ग्रंथों में आई हैं तथा उनके विन्यास में थोड़ा-बहुत अंतर भी है।

इन प्राचीनतम ग्रंथों में बहुत सी कथाएं ऐसी भी हैं जो प्राकृतिक घटनाओं का दैवीकरण एवं मानवीकरण करके कथाओं के रूप में लिखी गई हैं। इन कथाओं में पृथ्वी की उत्पत्ति होने से लेकर, पृथ्वी के समुद्र से बाहर निकलने, सप्त द्वीपों का निर्माण होने, दिन-रात बनने, सूर्य-चंद्र ग्रहण लगने, धरती पर कोहरा फैलने जैसी सैंकड़ों छोटी-बड़ी प्राकृतिक घटनाओं का निरूपण किया गया है।

हिन्दू धर्म-साहित्य में बारम्बार आई ऐसी ही एक कथा है भगवान विष्णु द्वारा मधु-कैटभ नामक राक्षसों का वध किए जाने की। इस कथा का आशय एक प्राकृतिक घटना से है।

हम आगामी कड़ियों में वेदों, ब्राह्मणों, उपनिषदों, आरण्यकों तथा पुराणों में मिलने वाली विविध कथाओं की चर्चा करेंगे। इन प्राचीन ग्रंथों के अतिरिक्त महिर्ष वाल्मिीकि द्वारा लिखित रामायण एवं महिर्ष वेदव्यास द्वारा लिखित महाभारत में भी अनूठी धर्म कथाओं के भण्डार भरे पड़े हैं। इस चैनल में उन कथाओं को भी स्थान देने का प्रयास किया जाएगा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मधु-कैटभ के वध की कथा पृथ्वी की उत्पत्ति से जुड़ी है (2)

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मधु-कैटभ के वध की कथा पृथ्वी की उत्पत्ति से जुड़ी है

मधु-कैटभ के वध की कथा पृथ्वी की उत्पत्ति से जुड़ी है

वेदों में हिरण्यगर्भ से सौरमण्डल के उत्पन्न होने की कथा मिलती है। हिरण्यगर्भ को पुराणों में डिम्ब या अण्ड भी कहा गया है जिससे सौर मण्डल की उत्पत्ति हुई जिसमें सूर्य तथा उसके नौ ग्रहों के अस्तित्व में आने का उल्लेख है।

इस कथा के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माण्ड में दो स्वर्गीय नक्षत्र तेजी से चलते हुए एक-दूसरे के निकट आये। उन नक्षत्रों के आकर्षण के कारण दोनों नक्षत्रों की सतह पर ज्वार उठे। इस ज्वार के कारण एक धूम्रदण्ड का निर्माण हुआ जो दिखने में धुएं की लकीर जैसा था। जब वे दोनों नक्षत्र इस धूम्रदण्ड से दूर गए तो वह धूम्रदण्ड टूट कर दो टुकड़ें में बंट गया और ये दोनों धूम्रदण्ड अपने-अपने नक्षत्र की परिक्रमा करने लगे। इसी धूम्रदण्ड से टूट-टूटकर नवग्रहों का निर्माण हुआ, जो अब तक केन्द्रीय नक्षत्र अर्थात् सूर्य की परिक्रमा करते आ रहे हैं। इन्हीं नवग्रहों में से पृथ्वी भी एक है।

यह कथा दो सौर-मण्डलों के एक साथ अस्तित्व में आने की किसी विराट् खगोलीय घटना की ओर संकेत करती है जिसमें से एक सौर मण्डल में हमारी धरती भी है। इस कथा में यह भी संकेत किया गया है कि नौ ग्रह सूर्य के चक्कर लगा रहे हैं तथा सूर्य अपनी आकाश गंगा में चक्कर लगा रहा है।

ऋग्वेद, ब्रह्मवैवर्त पुराण, मार्कण्डेय पुराण, महाभारत तथा अमरकोश में भी एक विशाल अण्ड से पृथ्वी की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। यही कथा आगे चलकर भगवान विष्णु के कानों से उत्पन्न होने वाले मधु-कैटभ नामक दो दैत्यों की कहानी का रूप ले लेती है जिसमें धूम्रदण्ड को भगवान विष्णु के रूप में उल्लिखित किया गया है। मधु कैटभ की कथा इस प्रकार से है- अत्यंत प्राचीन समय की बात है।

उस समय सम्पूर्ण सृष्टि में केवल जल ही विद्यमान था। इस जल को क्षीरसागर कहते थे जिसमें श्रीहरि भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर सोये हुए थे। उनके कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो महापराक्रमी दानव उत्पन्न हुए। दोनों राक्षस सोचने लगे कि हमारी उत्पत्ति का कारण क्या है? कैटभ ने कहा- ‘भैया मधु! इस जल में हमारी सत्ता को बनाने वाली भगवती महाशक्ति ही हैं। उनमें अपार बल है। उन्होंने ही इस जलतत्त्व की रचना की है। वे ही परम आराध्या शक्ति हमारी उत्पत्ति की कारण हैं।’

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

इतने में आकाश में गूँजता हुआ सुन्दर ‘वाग्बीज’ सुनाई पड़ा। उन दोनों ने सोचा कि यही भगवती का महामन्त्र है। अब वे उसी मन्त्र का ध्यान और जप करने लगे। अन्न और जल का त्याग करके उन्होंने एक हजार वर्ष तक बड़ी कठिन तपस्या की। भगवती महाशक्ति उन पर प्रसन्न हो गयीं। अन्त में आकाशवाणी हुई- ‘हे दैत्यो! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। इच्छानुसार वर माँगो!’

आकाशवाणी सुनकर मधु और कैटभ ने कहा- ‘सुन्दर व्रत का पालन करने वाली देवि! आप हमें स्वेच्छा-मृत्यु का वरदान दें।’

इस पर देवी ने कहा- ‘हे दैत्यो! मेरी कृपा से इच्छा करने पर ही मौत तुम्हें मार सकेगी। देवता और दानव कोई भी तुम दोनों भाइयों को पराजित नहीं कर सकेंगे।’

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देवी के वर देने पर मधु और कैटभ को अत्यन्त अभिमान हो गया। वे समुद्र में जलचर जीवों के साथ क्रीड़ा करने लगे। एक दिन अचानक प्रजापति ब्रह्माजी पर उनकी दृष्टि पड़ी। ब्रह्माजी श्रीहरि के नाभि-कमल के आसन पर विराजमान थे। उन दैत्यों ने ब्रह्माजी से कहा- ‘सुव्रत! तुम हमारे साथ युद्ध करो। यदि लड़ना नहीं चाहते तो इसी क्षण यहाँ से चले जाओ, क्योंकि यदि तुम्हारे अन्दर शक्ति नहीं है तो इस उत्तम आसन पर बैठने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है।’ मधु और कैटभ की बात सुनकर ब्रह्माजी को अत्यन्त चिन्ता हुई। उनका सारा समय तप में बीता था। युद्ध करना उनके स्वभाव के प्रतिकूल था। इसलिए वे भगवान विष्णु की शरण में गए। उस समय भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे। ब्रह्माजी के बहुत प्रयास करने पर भी भगवान विष्णु की निद्रा नहीं टूटी। इस पर ब्रह्माजी ने भगवती योगनिद्रा की स्तुति करते हुए कहा- ‘भगवती! मैं मधु और कैटभ के भय से भयभीत होकर आपकी शरण में आया हूँ। भगवान विष्णु आपकी माया से अचेत पड़े हैं। आप सम्पूर्ण जगत् की माता हैं। सभी के मनोरथ पूर्ण करना आपका स्वभाव है। आपने ही मुझे जगत्-स्रष्टा बनाया है। यदि मैं दैत्यों के हाथ से मारा गया तो आपकी बड़ी अपकीर्ति होगी। अतः आप भगवान विष्णु को जगाकर मेरी रक्षा करें।’

ब्रह्माजी की प्रार्थना सुनकर भगवती योगमाया, भगवान विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु और हृदय से निकल कर आकाश में स्थित हो गयीं और भगवान उठकर बैठ गए। तदनन्तर भगवान विष्णु का मधु और कैटभ से पाँच हज़ार वर्षों तक घनघोर युद्ध हुआ, फिर भी भगवान विष्णु मधु-कैटभ को परास्त नहीं कर सके।

विचार करने पर भगवान को ज्ञात हुआ कि इन दोनों दैत्यों को भगवती योगमाया ने इच्छा-मृत्यु का वरदान प्रदान किया है। इसलिए भगवती की कृपा के बिना इनको मारना असम्भव है। भगवान द्वारा स्मरण किए जाते ही भगवान को भगवती योगनिद्रा के दर्शन हुए। भगवान ने रहस्यपूर्ण शब्दों में भगवती की स्तुति की।

भगवती ने प्रसन्न होकर कहा- ‘विष्णु! तुम देवताओं के स्वामी हो। मैं इन दैत्यों को माया से मोहित कर दूँगी, तब तुम इन्हें मार डालना।’

भगवती का अभिप्राय समझकर भगवान ने दैत्यों से कहा- ‘तुम दोनों के युद्ध से मैं परम प्रसन्न हूँ। अतः मुझसे इच्छानुसार वर माँगो।’

दैत्य भगवती की माया से मोहित हो चुके थे। उन्होंने कहा- ‘विष्णो! हम याचक नहीं हैं, दाता हैं। तुम्हें जो माँगना हो हम से प्रार्थना करो। हम देने के लिए तैयार हैं।’

इस पर भगवान बोले- ‘यदि देना ही चाहते हो तो मेरे हाथों से मृत्यु स्वीकार करो।’

भगवती की कृपा से मोहित होकर मधु और कैटभ ने भगवान की बात स्वीकार कर ली। भगवान विष्णु ने दैत्यों के मस्तकों को अपनी जांघों पर रख कर सुदर्शन चक्र से काट डाला। इस प्रकार मधु और कैटभ का अन्त हुआ।

अन्य पुराणों में आए विवरणों के अनुसार मधु-कैटभ की उत्पत्ति कल्पांत तक सोते हुए भगवान विष्णु के कानों के मैल, अथवा पसीने, या रजोगुण और तमोगुण से हुई थी। जब वे दोनों राक्षस ब्रह्माजी को मारने दौड़े तो विष्णु ने उन राक्षसों का वध कर दिया। तभी से विष्णु ‘मधुसूदन’ और ‘कैटभजित्’ कहलाए।

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार उमा ने कैटभ को मारा था, जिससे वे ‘कैटभा’ कहलाईं। महाभारत और हरिवंश पुराण का मत है कि जिस स्थान पर इन असुरों के मेद का ढेर लगा, उस ढेर को ‘मेदिनी’ अर्थात् पृथ्वी कहा गया। पद्मपुराण के अनुसार मधु तथा कैटभ ने देवासुर संग्राम में हिरण्याक्ष की ओर से संघर्ष किया था।

दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में लिखा है कि महर्षि मेधा ने राजा सुरथ को योगमाया की माया के प्रभाव से मधु कैटभ के वध की कथा सुनाई।

महाभारत के सभापर्व के अध्याय 38 में भगवान नारायण द्वारा मधु-कैटभ के वध का वर्णन हुआ है। इस कथा के अनुसार ब्रह्माजी की प्रेरणा से मधु-कैटभ के शरीरों में वायु का प्रसार हुआ जिसके कारण वे परम बलशाली हो गए। इस कथा में यह भी कहा गया है कि जब श्रीहरि विष्णु ने मधु-कैटभ को मारने की इच्छा व्यक्त की तो उन दैत्यों ने भगवान से कहा- ‘तुम हमें ऐसे स्थान पर मारो, जहाँ की भूमि पानी में डूबी हुई न हो तथा मरने के पश्चात हम दोनों तुम्हारे पुत्र हों।’

कुछ पुराणों के अनुसार मधु-कैटभ ने कहा- ‘जो हमें युद्ध में जीत ले, हम उसी के पुत्र हों- ऐसी हमारी इच्छा है।’

इस प्रकार यह आख्यान और भी अनेक ग्रंथों में थोड़े-बहुत अंतर के साथ मिलता है। वस्तुतः मधु और कैटभ पृथ्वी के निर्माण की प्राचीन भारतीय अवधारणा से जुड़े हुए हैं जिसका आशय यह है कि यह धरती अच्छाई और बुराई दोनों से मिलकर बनी है।

जल-प्लावन से जुड़ी हैं मत्स्यावतार, कूर्मावतार एवं वराह अवतार की कथाएं (3)

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जल-प्लावन से जुड़ी हैं मत्स्यावतार, कूर्मावतार एवं वराह अवतार की कथाएं

अत्यंत प्राचीन काल में धरती पर आए जल-प्लावन की कथाएं विश्व के प्रत्येक भूभाग की प्राचीन संस्कृतियों में मिलती हैं। इन कथाओं के अनुसार पृथ्वी का अधिकांश भूभाग इस जल-प्लावन में डूब गया था जिसके कारण प्राणियों की सृष्टि बड़ी कठिनाई से जीवित बची थी।

भगवान श्री हरि विष्णु के तीन प्रथम अवतारों मत्स्यावतार, कूर्मअवतार एवं वराहअवतार की कथाएं अग्नि पुराण, मत्स्य पुराण, हरिवंश पुराण, भविष्य पुराण नारद पुराण, पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भागवत पुराण, वायु पुराण, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, गणेश पुराण, गरुड़ पुराण, गर्ग संहिता, कथासरित्सागर, अमरकोश आदि अत्यंत प्राचीन ग्रंथों में मिलती हैं।

ये कथाएं प्रकृति में दो हिमकालों के बीच होने वाले जलप्लावन एवं तत्पश्चात् ऊष्णकाल के आगमन की घटनाओं को दर्शाती हैं तथा भगवान द्वारा धरती को जल में बाहर निकालने, मानव सृष्टि एवं ज्ञान की रक्षा करने, सृष्टि को उसका खोया हुआ वैभव लौटाने आदि उद्देश्यों के लिए अवतार लेने की संकल्पना को व्याख्यायित करती है।

पिछली कहानी में हमने देखा कि किस प्रकार हमारे सौर मण्डल के समस्त ग्रह सूर्य से टूटकर अलग हुए जिनमें से पृथ्वी भी एक है। कूर्मअवतार एवं वराह अवतार की कथाओं के पौराणिक संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में उनके वैज्ञानिक पक्ष को भी समझना चाहिए। यह न केवल पृथ्वी पर आने वाले हिम युगों, गर्म युगों एवं जल प्लावन की घटनाओं को समझाने में सहायता देता है अपितु डार्विन के विकासवाद को भी किसी सीमा तक समर्थन देता हुआ प्रतीत होता है। वैज्ञानिकों द्वारा हिमयुगों एवं उनके बीच आने वाले गर्म युगों का वैज्ञानिक इतिहास इस प्रकार बताया जाता है-

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आज से लगभग 457 करोड़ वर्ष पूर्व जब पृथ्वी सूर्य से अलग हुई, उस समय यह आग का गोला थी। यह धीरे-धीरे ठण्डी हुई। इस प्रक्रिया में करोड़ों वर्ष लगे। धीरे-धीरे यह इतनी ठण्डी हो गई कि पूरी तरह बर्फ की मोटी पर्त से ढक गई। इसे धरती का पहला हिमयुग कहते हैं। यह घटना आज से लगभग 240 करोड़ वर्ष पहले हुई। कई करोड़ वर्ष तक पृथ्वी इसी स्थिति में रही। इसके बाद सूर्य के प्रभाव से धरती की बर्फ पिघलने लगी और धीरे-धीरे धरती पर समुद्रों, झीलों एवं नदियों का विकास हुआ। इस काल को गर्मयुग कहते हैं।

वैज्ञानिकों ने पानी के चिह्नों के आधार पर धरती पर अब तक हुए पाँच बड़े हिमयुगों तथा उनके बाद आने वाले गर्मयुगों का पता लगाया है। सबसे अंतिम हिमयुग आज से 26 लाख साल पहले आरम्भ हुआ जो आज से लगभग 20 हजार साल पहले समाप्त होना आरम्भ हुआ तथा आज से लगभग 11,700 वर्ष पहले समाप्त हो गया।

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जब भी धरती पर हिमयुग समाप्त होता और गर्मयुग आता तो धरती पर जल-प्लावन की स्थिति बन जाती। जब यह जल मानसून के चक्र के कारण धरती के वायुमण्डल में चला जाता तो धरती जल से बाहर निकलती थी और वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं का विकास होने लगता था। इसके विपरीत जब हिमयुग आता तो जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ नष्ट होने लगते, केवल कुछ स्थानों पर ही उनका अस्तित्व बचा रहता। ऐसे ही एक गर्मयुग के आगमन पर आज से लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व धरती पर मानव जाति का विकास होना आरम्भ हुआ। ये मानव आधुनिक मानवों एवं वानरों के बीच की जातियाँ थीं। आज से लगभग तीन लाख साल पहले इन्हीं वानरों में से मानव की आधुनिक जाति का विकास हुआ जिसे हम ‘होमोसेपियन’ कहते हैं। यही होमोसेपियन जाति आज से लगभग 10 हजार साल पहले ‘क्रोमैगनन मैन’ नामक आधुनिकतम जाति में बदल गई जिसने मानव सभ्यता का बहुत तेजी से विकास किया। मानव की इस प्रजाति को अपना पिछला इतिहास धुंधले रूपों में याद है। ‘होमोसेपियन’ मानव ने पिछले 25 हजार सालों में धरती पर छोटे-छोटे हिमकाल देखे थे तथा इन हिमकालों के बाद ग्लेशियरों का जल पिघल कर समुद्रों में आते हुए तथा धरती को उस जल में समाते हुए एवं पुनः हिमकाल के आरम्भ होने पर धरती को जल से बाहर निकलते हुए देखा था।

मत्स्यावतार, कूर्मावतार एवं वराह अवतार की कथाएं इसी प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं से जुड़ी हुई हैं। 

भू वैज्ञानिक खोजों से ज्ञात हुआ है कि राजस्थान का दक्षिण-पूर्वी भाग संसार का प्राचीनतम क्षेत्र है जबकि पश्चिमी एवं उत्तरी भाग इसके बाद का है। जालोर-भीनमाल-जसवंतपुरा का धन्व क्षेत्र तो उत्तरी भागों से भी बाद का है। यह अंशतः समुद्र के गर्भ में स्थित था। इस काल में मध्यप्रदेश से पंजाब जाने के लिए समुद्री मार्ग नर्मदा घाटी तथा कच्छ से होकर था।

यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र से समुद्र कब हटा किंतु यह निश्चित है कि इसको हटने में हजारों वर्ष लगे होंगे। यह भी निश्चित है कि समुद्र के इस क्षेत्र से हटने की घटना ऋग्वैदिक मानव ने अपनी आंखों से देखी। ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 136वें सूक्त के 5वें मंत्र में पूर्व तथा पश्चिम के दो समुद्रों का स्पष्ट उल्लेख है जिनका विवरण शतपथ ब्राह्मण भी देता है।

पुराणों में वर्णित जल प्लावन की घटना भी इस ओर संकेत करती दिखाई देती है। काठक संहिता, तैत्तरीय संहिता, तैत्तरीय ब्राह्मण तथा शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति के वराह बनकर पृथ्वी प्राप्ति का विवरण मिलता है।

पण्डित भगवद्दत्त बी.ए. लिखते हैं- ‘भारतीय ऋषियों के अनुसार एक बार सारी पृथ्वी का संवर्तक अग्नि से भंयकर दाह हुआ। तदनु एक वर्ष की अतिवृष्टि से महान् जल-प्लावन आया। सारी पृथ्वी जल-निमग्न हो गई। वृष्टि की समाप्ति पर, जल के शनै-शनैः नीचे होने से, कमलाकार पृथ्वी प्रकट होनी लगी। उस समय उन जलों में श्री ब्रह्माजी ने योगज शरीर धारण किया। उनके साथ योगज शरीर-धारी सप्तर्षि और कई अन्य ऋषि-मुनि भी प्रकट हुए। सृष्टि वृद्धि को प्राप्त हुई। तब बहुत काल के पश्चात समुद्रों के जलों के ऊंचा हो जाने के कारण एक दूसरा जल प्लावन वैवस्वत मनु और यम के समय में आया। मनु ने एक नौका में अनेक प्राणियों की रक्षा की। लिंग पुराण में इस घटना का उल्लेख हुआ है।’

समुद्र के हट जाने पर प्रकट हुई धरती अर्थात् थार के रेगिस्तान में आज भी नमक, फ्लोराइड, संगमरमर, चूना पत्थर एवं खड्डी आदि खनिज बहुतायत से उपस्थित हैं तथा रेतीले धोरों में शंख, सीपी एवं घोंघे प्राप्त होते हैं। राजस्थान एवं गुजरात का वह हिस्सा जो समुद्र से लगता हुआ है, आज भी इस प्रक्रिया से होकर निकल रहा है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मत्स्यावतार की कथा महा जल-प्लावन एवं जीवों के क्रमिक विकास से जुड़ी है (4)

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मत्स्यावतार की कथा - bharatkaitihas.com
मत्स्यावतार की कथा महा जल-प्लावन एवं जीवों के क्रमिक विकास से जुड़ी है

भगवान श्री हरि विष्णु के मत्स्यावतार की कथा वाल्मीकि रामायण, महाभारत, मत्स्य पुराण, हरिवंश पुराण आदि विविध ग्रंथों में मिलती है। यह कथा प्रकृति में दो हिमकालों के बीच होने वाले जलप्लावन एवं तत्पश्चात् आने वाले ऊष्णकाल के आगमन की घटना को दर्शाती है तथा भगवान द्वारा सृष्टि एवं ज्ञान की रक्षा के लिए अवतार लेने की संकल्पना को व्याख्यायित करती है।

मत्स्यावतार की कथा के माध्यम से उस संघर्ष को भी दर्शाया गया है जो बुरे मनुष्यों द्वारा ज्ञान का विनाश करके अज्ञान फैलाने वालों और अच्छे मनुष्यों द्वारा ज्ञान की रक्षा करने वालों के बीच में अनंतकाल से चल रहा है।

हिन्दू धर्म की अटल मान्यता है किये वेद समस्त सत्य-ज्ञान का भण्डार हैं तथा वे मानव मात्र को ईश्वर तक पहुंचाने का मार्ग प्रदान करते हैं। हिन्दू धर्मावलम्बी आदि-काल से यह भी मानते आए हैं कि वेद अपौरुषेय हैं तथा ब्रह्मााजी के मुख से प्रकट हुए हैं।

दुष्ट राक्षस नहीं चाहते कि मानव जाति ज्ञान प्राप्त करके उन्नति करे तथा ईश्वरत्व को प्राप्त करे। इसलिए दुष्ट राक्षसों की यह प्रवृत्ति रहती है कि वे वेदों अर्थात् सत्य ज्ञान को छिपा दें अथवा उन्हें नष्ट कर दें। जबकि श्री हरि भगवान विष्णु चाहते हैं कि वेद मनुष्य जाति के पास उपलब्ध रहें। भगवान श्रीहरि का यह संकल्प है कि धरती पर जब भी धर्म की हानि होगी अथवा साधुओं को सताया जाएगा, तब वे स्वयं धरती पर आकर धर्म एवं संतों की रक्षा करेंगे।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

पुराणों में आई कथाओं के अनुसार दुष्ट-राक्षस नहीं चाहते कि मानव जाति ज्ञान प्राप्त करके उन्नति करे तथा ईश्वरत्व को प्राप्त करे। इसलिए दुष्ट-राक्षसों की यह प्रवृत्ति रहती है कि वे वेदों अर्थात् सत्य ज्ञान को छिपा दें अथवा उन्हें नष्ट कर दें। जबकि श्रीहरि भगवान विष्णु चाहते हैं कि वेद मनुष्य जाति के पास उपलब्ध रहें। इसलिए एक बार जब हयग्रीव नामक राक्षस ने वेदों को चुरा कर छिपा दिया तब भगवान श्रीहरि विष्णु ने भी हयग्रीव का अवतार धारण करके वेदों को राक्षस से मुक्त करवाया तथा पुनः ब्रह्माजी को प्रदान किया।

भगवान श्रीहरि का यह संकल्प है कि धरती पर जब भी धर्म की हानि होगी अथवा साधुओं को सताया जाएगा, तब वे स्वयं धरती पर आकर धर्म एवं संतों की रक्षा करेंगे। इसी संकल्प के कारण एक बार भगवान को मत्स्यावतार लेना पड़ा। मत्स्यावतार की कथा इस प्रकार से है-

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एक बार जब सृष्टि का कल्पांत हुआ और सृष्टि का विघटन होकर प्रलय होने लगा तो, उसके ठीक पहले, प्रजापति ब्रह्मा के मुख से वेदों का ज्ञान प्रकट हुआ किंतु उसी समय ब्रह्माजी को नींद आ जाने के कारण हयग्रीव नामक एक दैत्य ने वेदों को चुराकर निगल लिया। इससे संसार में अज्ञान का अंधकार व्याप्त हो गया। तब भगवान श्रीहरि विष्णु ने मत्स्यावतार के रूप में धरती पर प्रकट होने का निश्चय किया। उस समय धरती पर सत्यव्रत नामक एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। इस राजा को मनु भी कहा जाता है। यह मनु कल्पांत के पूर्व का राजा था अर्थात् उसका जन्म वर्तमान सृष्टि से पहले जो सृष्टि चल रही थी, उसमें हुआ था। वह बड़ा पुण्यात्मा एवं अत्यंत उदार हृदय का राजा था। भगवान श्रीहरि ने उसी राजा के समक्ष प्रकट होने का निश्चय किया। एक दिन जब प्रातःकाल में राजा मनु ने कृतमाला नामक नदी में स्नान करके तर्पण के लिए अंजलि में जल भरा, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। राजा मनु ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। इस पर वह मछली बोली- ‘हे राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य ही कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। अतः कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए।’

यह सुनकर राजा मनु के हृदय में दया उत्पन्न हो गई। उसने मछली को नदी से निकालकर जल से भरे हुए अपने कमण्डल में रख लिया। राजा ने वह कमण्डल अपने महल में लाकर रख दिया। जब रात्रि हुई तो राजा को एक आवाज सुनाई दी। राजा ने देखा कि कमण्डल में तैर रही मछली का शरीर इतना बढ़ गया है कि कमंडल उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा है।

इसलिए मछली ने राजा मनु से कहा- ‘राजन्! मेरे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान ढूंढ़िए, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है।’

 इस पर राजा मनु ने मछली को कमंडल से निकालकर पानी से भरे हुए एक घड़े में रख दिया। पुनः अगली रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ गया।

दूसरे दिन मछली पुनः मनु से बोली- ‘राजन्! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है।’

तब राजा मनु ने मछली को निकालकर अपने महल के सरोवर में रख दिया। जब सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया तो राजा मनु ने मछली को पहले नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया। राजा ने देखा कि मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया है कि समुद्र भी उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा है।

अतः मछली पुनः मनु से बोली- ‘राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए।’

मछली का आकार देखकर राजा विस्मित हो उठा। उसने इतनी विशाल मछली पहले कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला- ‘मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? आपका शरीर जिस गति से प्रतिदिन बढ़ता है, उससे लगता है कि आप अवश्य परमात्मा हैं। यदि यह बात सत्य है, तो कृपा करके बताइए कि आपने मत्स्य रूप क्यों धारण किया है?’

तब मत्स्यावतार रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया- ‘राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। इससे जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय-चक्र में जाएगी और धरती पर समुद्र उमड़ कर आ जाएगा। चारों ओर भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दिखाई नहीं देगा। तुम्हारे पास एक नाव पहुँचेगी। तुम समस्त अनाजों और औषधियों के बीजों, पशु-पक्षियों एवं विभिन्न प्राणियों तथा सप्त-ऋषियों को अपने साथ लेकर उस नाव में बैठ जाना तथा वासुकि नाग से उस नाव को मेरे सींग से बांध लेना। जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी, मैं नाव समुद्र में खींचता रहूंगा। उस समय तुम जो भी प्रश्न करोगे मैं उनके उत्तर दूंगा।’

इतना कहकर भगवान अदृश्य हो गए।

राजा मनु उसी दिन से हरि-स्मरण करते हुए प्रलय होने की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन धरती पर प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया। समुद्र उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में पृथ्वी पर जल ही जल हो गया और सम्पूर्ण पृथ्वी जल में समा गई।

उसी समय राजा मनु को एक नाव दिखाई पड़ी। राजा ने समस्त अनाजों और औषधियों के बीज, पशु-पक्षी एवं विविध प्रकार के प्राणी उस नाव में भर लिए तथा सप्त-ऋषियों को अपने साथ लेकर उस नाव में बैठ गए। अचानक राजा मनु को मत्स्यावतार रूपी भगवान, प्रलय के सागर में दिखाई पड़े।

तब राजा मनु ने सर्पराज वासुकि को रस्सी बनाकर अपनी नाव को मत्स्यावतार रूपी भगवान श्रीहरि के सींग से बाँध लिया। भगवान उस नाव को लेकर सुमेरु पर्वत की ओर चल दिए। इस प्रकार यह नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। इस समय पूरी धरती पर केवल समुद्र लहरा रहा था जिसमें उस नाव के अतिरिक्त और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

जब समुद्री ज्वार समस्त ब्रह्माण्ड को निगलने लगा तब राजा मनु एवं सप्त-ऋषि, मत्स्य रूपी भगवान श्रीहरि की स्तुति करने लगे- ‘हे प्रभो! आप ही सृष्टि के आदि हैं, आप ही पालक हैं और आप ही रक्षक हैं। दया करके हमें अपनी शरण में लीजिए, हमारी रक्षा कीजिए।’

राजा मनु और सप्त-ऋषियों की प्रार्थना से मत्स्यावतार रूपी भगवान श्रीहरि विष्णु प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा मनु को मत्स्य पुराण सुनाया तथा राजा मनु को आत्मज्ञान प्रदान किया। भगवान ने कहा- ‘मैं ही समस्त प्राणियों में निवास करता हूँ। मेरी बनाई हुई नश्वर सृष्टि में मेरे अतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है। जो प्राणी मुझे सबमें देखता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह अंत में मुझमें ही मिल जाता है।’

यह आत्मज्ञान प्राप्त करके राजा मनु शरीर में ही जीवन-मुक्त हो गए। मत्स्य रूपी भगवान श्रीहरि ने नौका को हिमालय पर्वत की चोटी से बांध दिया। इसके बाद श्रीहरि विष्णु ने हयग्रीव नामक दैत्य को मारने के लिए स्वयं भी हयग्रीव का अवतार लिया तथा उससे वेद छीन लिए। जब ब्रह्मरात्रि समाप्त हुई तो ब्रह्माजी अपनी नींद से उठे। इसी समय धरती पर प्रलय की स्थिति समाप्त हो गई। भगवान ने वेद पुनः ब्रह्माजी को सौंप दिए। पुराणों में ब्रह्मरात्रि की अवधि 432 करोड़ मानव-वर्ष बताई गई है। 

पूर्व-कल्पांत के राजा मनु अथवा राजा सत्यव्रत ही वर्तमान महाकल्प में ‘वैवस्वत मनु’ के नाम से जाने गए। ‘विवस्वान’ का अर्थ होता है ‘सूर्य’ और ‘वैवस्वत’ का अर्थ होता है- ‘सूर्य का पुत्र।’ माना जाता है कि धरती पर स्थित समस्त मानव इन्हीं राजा मनु की संतान हैं। इसीलिए भारत में उन्हें मानव, मनुपुत्र, मनुष्य तथा मनुज कहा जाता है। यूरोप में ‘मैन’ कहा जाता है।

हैनीमैन तथा सोलोमन आदि ईसाई नामों में ‘मैन’ एवं ‘मन’ आदि शब्द प्रयुक्त होते हैं जबकि मुसलमान, सलमान, सुलेमान आदि आदि नामों में भी ‘मान’ अर्थात् ‘मैन’ शब्द लगा हुआ है। इस प्रकार वर्तमान समय में धरती पर निवास कर रहे समस्त मानव एक ही पिता ‘मनु’ की संतान हैं किंतु भारतीय पुराण आदि विविध धार्मिक ग्रंथों का मानना है कि इनकी माताएं अलग-अलग होने के कारण इनमें देव, दानव, राक्षस आदि विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियां पाई जाती हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कूर्मावतार की कथा मानव सृष्टि को वैभव प्रदान करने से जुड़ी है (5)

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कूर्मावतार की कथा मानव सृष्टि को वैभव प्रदान करने से जुड़ी है

कूर्मावतार की कथा सृष्टि का आरम्भ होने की घटना से जुड़ी हुई है। पुराणों के अनुसार प्रजापति ने सन्तति प्रजनन के अभिप्राय से कूर्म का रूप धारण किया।

शतपथ ब्राह्मण, महाभारत के आदि पर्व तथा पद्मपुराण के उत्तरखंड में उल्लेख है कि संतति प्रजनन हेतु प्रजापति, कच्छप का रूप धारण करके पानी में संचरण करता है।

कूर्मावतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। कूर्म अथवा कच्छप का अर्थ कछुआ होता है। भगवान श्री हरि विष्णु का पहला अवतार मछली के रूप में तथा दूसरा अवतार कछुए के रूप में हुआ जो कि डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के क्रम से मेल खाता है। मछली केवल जल में रहती है जबकि कछुआ उभयचर है जो कि जल एवं थल दोनों में रह सकता है। इस प्रकार कछुआ उत्पत्ति-विकास के क्रम में मछली के बाद आता है।

नरसिंह पुराण के अनुसार कूर्मावतार भगवान श्री हरि विष्णु का द्वितीय अवतार है जबकि भागवत पुराण के अनुसार कूर्मअवतार भगवान का ग्यारहवाँ अवतार है। लिंगपुराण के अनुसार जब पृथ्वी रसातल को जा रही थी, तब विष्णु ने कच्छप-रूप में अवतार लेकर पृथ्वी को रसातल में जाने से रोका। इस विशाल कच्छप की पीठ का घेरा एक लाख योजन था।

पद्मपुराण के ब्रह्मखण्ड में वर्णन है कि जब देवराज इन्द्र ने दुर्वासा द्वारा प्रदत्त पारिजात पुष्पों की माला का अपमान किया तो महर्षि दुर्वासा ने कुपित होकर इन्द्र को शाप दिया कि- ‘तुम्हारा वैभव नष्ट होगा।’

इस श्राप के प्रभाव से विश्व की लक्ष्मी समुद्र में लुप्त हो गई। इस कारण भगवान विष्णु के आदेश पर देवताओं तथा दैत्यों ने लक्ष्मी को पुनः प्राप्त करने के लिए मंदराचल पर्वत की मथानी तथा वासुकि सर्प की डोरी बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

समुद्र-मंथन के दौरान जब मंदराचल पर्वत रसातल में समाने लगा तो भगवान विष्णु ने कूर्मावतार रूप में प्रकट होकर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया और देवताओं एवं दानवों ने समुद्र से 14 रत्नों की प्राप्ति करके सृष्टि में पहले की तरह वैभव स्थापित किया। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की कथा इस प्रकार है-

एक बार की बात है। देवताओं के राजा इन्द्र, ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर कहीं जाने के लिए तैयार थे। उसी समय महर्षि दुर्वासा वहाँ आए। उन्होंने अत्यंत विनीत भाव से देवराज को पारिजात-पुष्पों की एक माला भेंट की। देवराज ने ऋषि के हाथों से माला लेकर ऐरावत के मस्तक पर डाल दी और स्वयं चलने को उद्यत हुए। हाथी मद से उन्मत्त हो रहा था। उसने सुगन्धित तथा कभी म्लान न होने वाली उस माला को सूंड से खींच कर नीचे गिरा दिया और अपने पैरों से कुचल दिया।

यह देखकर ऋषि दुर्वासा अत्यंत क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने देवराज इन्द्र को शाप देते हुए कहा- ‘रे मूढ़! तुमने मेरी दी हुई माला का कुछ भी आदर नहीं किया। तुम त्रिभुवन की राजलक्ष्मी से संपन्न होने के कारण मेरा अपमान करते हो, इसलिए जाओ आज से तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो जायेगी और तुम्हारा यह वैभव भी श्रीहीन हो जाएगा।’

ऋषि के श्राप से संसार की लक्ष्मी लुप्त हो गई तथा देवताओं ने अपनी शक्ति खो दी। देवता अत्यंत निराश होकर ब्रह्माजी के लोक में पहुँचे। ब्रह्माजी देवताओं को अपने साथ लेकर वैकुण्ठ में श्रीहरि नारायण के पास पहुंचे और भगवान श्री नारायण की स्तुति करके उन्हें बताया कि- ‘प्रभु हमें दैत्यों के द्वारा अत्यंत कष्ट दिया जा रहा है और इधर महर्षि के शाप से श्रीहीन भी हो गए हैं। आप शरणागतों के रक्षक हैं, इस महान कष्ट से हमारी रक्षा कीजिये।’

भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवताओं को सलाह दी कि- ‘आप क्षीर समुद्र का मंथन करें जिससे अमृत की प्राप्ति होगी। इस अमृत को पीने से देवों की शक्ति वापस लौट आएगी और देवता सदा के लिए अमर हो जाएँगे।’

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समुद्र-मंथन के महान् कार्य को मन्दर पर्वत और सर्पराज वासुकि की सहायता से ही सम्पन्न किया जा सकता था। मंदर पर्वत को मथानी और वासुकि को रस्सी बनाया गया किंतु निर्बल देवता अकेले ही इस कार्य को नहीं कर सकते थे। इसलिए देवताओं ने भगवान विष्णु के परामर्श पर असुरों से सहायता मांगी। असुरों ने अमृत के लालच में समुद्र-मंथन में देवताओं की सहायता करना स्वीकार कर लिया। भगवान विष्णु की प्रेरणा से सर्पराज वासुकि, मन्दर पर्वत के चारों ओर लिपट गया। उसे एक ओर से देवताओं ने तथा दूसरी ओर से राक्षसों ने पकड़ लिया। कुछ देर तक समुद्र-मंथन करने से एक घातक विष निकलने लगा जिससे सारा संसार झुलसने लगा। तब भगवान श्रीहरि विष्णु की प्रेरणा से भगवान शिव ने इस विष को पीकर अपने कण्ठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से भगवान शिव का कण्ठ नीला पड़ गया तथा तभी से वे ‘नीलकंठ’ कहलाने लगे। विष से छुटकारा मिल जाने के बाद समुद्र-मंथन का कार्य पुनः आरम्भ हुआ किंतु थोड़ी ही देर में मंदर पर्वत रसातल में धंसने लगा। यह देखकर अचिन्त्य शक्ति संपन्न लीलावतारी भगवान श्रीहरि विष्णु ने कूर्म रूप धारण किया। इस विशाल कछुए की पीठ का व्यास एक लाख योजन था। भगवान ने मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण कर लिया। भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घूमने लगा।

कूर्मावतार एकादशी के दिन हुआ था। इसलिए संसार में एकादशी का उपवास प्रचलित हुआ। कूर्म पुराण में लिखा है कि भगवान विष्णु ने अपने कूर्मावतार के समय ऋषियों को मनुष्य जीवन के चार लक्ष्यों अर्थात्- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का वर्णन किया।

समुद्र-मंथन से कुल चौदह रत्न प्रकट हुए जिनमें देवी लक्ष्मी, कौस्तुभ मणि आदि रत्न, रम्भा आदि दिव्य अप्सराएँ, वारूणी, शंख, ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष, चन्द्रमा, कामधेनु आदि गौएं, धनुष, धन्वतरि, विष एवं अमृत सम्मिलित थे।

जब देवी लक्ष्मी प्रकट र्हुईं तो समस्त देवताओं ने उनके दर्शन किए। इससे समस्त देवता लक्ष्मीवान हो गए। देवी लक्ष्मी को भगवान श्रीहरि विष्णु ने धारण कर लिया। ऐरावत हाथी पुनः इन्द्र को दे दिया गया। कौस्तुभ आदि मणियां, रम्भा आदि अप्सराएं, कल्पवृक्ष तथा कामधेनु स्वर्ग में स्थापित कर दिए गए।

सबसे अंत में भगवान विष्णु के अंशभूत धन्वन्तरी प्रकट हुए जिन्होंने धरती पर आयुर्वेद का प्रवर्तन किया। उनके हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश था। दैत्यों ने अमृत का कलश धन्वन्तरि के हाथ से छीन लिया और वहाँ से दूर भाग गए।

समुद्र-मंथन के आरम्भ में निश्चित की गई शर्तों के अनुसार अमृत का बंटवारा देवताओं एवं राक्षसों में होना था किंतु अब राक्षस इसे अकेले ही पीना चाहते थे। इस कारण देवताओं एवं राक्षसों में युद्ध आरम्भ हो गया। अतः भगवान को उसी क्षण एक और अवतार लेना पड़ा जिसे मोहिनी अवतार कहते हैं। भगवान श्री हरि विष्णु के इस अवतार की चर्चा हम अगली कथा में करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मोहिनी अवतार की कथा सृष्टि को पुनः वैभव प्रदान करने से जुड़ी है (6)

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मोहिनी अवतार - bharatkaitihas.com
मोहिनी अवतार की कथा सृष्टि को पुनः वैभव प्रदान करने से जुड़ी है

मोहिनी अवतार धारी भगवान श्रीहरि ने देवताओं को अमृत तथा राक्षसों को वारुणि पिलाना आरम्भ कर दिया। राक्षस उस वारुणि को पीकर मदमत्त होने लगे। ‘राहू’ नामक एक राक्षस को भगवान के मोहिनी अवतार की इस चालाकी का पता चल गया।

हमने पिछली कड़ी में समुद्र मंथन के दौरान हुए भगवान श्री हरि विष्णु के कूर्म अवतार की चर्चा की थी। समुद्र मंथन से जो चौदह रत्न प्राप्त हुए थे, उनमें से अमृत भी एक था। जब भगवान श्री हरि विष्णु के अंशभूत धन्वन्तरी अपने हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए तो जम्भ आदि दैत्य अमृत कलश धन्वन्तरि के हाथ से छीन कर भाग गए।

समुद्र मंथन के आरम्भ में निश्चित की गई शर्तों के अनुसार अमृत का बंटवारा देवताओं एवं राक्षसों में होना था किंतु अब देवता और राक्षस दोनों अकेले ही इसका पान करना चाहते थे। न तो राक्षस चाहते थे कि इसे देवता पिएं और न देवता चाहते थे कि इसे राक्षस पिएं। इस कारण देवताओं एवं राक्षसों में युद्ध आरम्भ हो गया।

राक्षसों को अमृत का कलश ले जाते देखकर भगवान विष्णु का चिंता हुई। वे जानते थे कि यदि दुष्ट राक्षसों ने अमृत का पान कर लिया तो वे सृष्टि को बहुत दुख देंगे। इसलिए भगवान श्री हरि विष्णु ने राक्षसों से अमृत छीनकर देवताओं तक पहुंचाने का निश्चय किया।

भगवान श्री हरि विष्णु एक सुंदर स्त्री का रूप धारण करके दैत्यों के मार्ग में जाकर खड़े हो गए। इस घटना को मोहिनी अवतार कहा जाता है। भगवान के मोहिनी अवतार के रूप में खड़ी उस मायावी एवं अत्यंत रूपवती स्त्री को देखकर समसत दैत्य मोहित हो गए ओर बोले- ‘सुमुखी! तुम हमारी भार्या हो जाओ और यह अमृत लेकर हमें पिलाओ।’

मोहिनी अवतार धारी भगवान श्रीहरि ने राक्षसों की यह बात स्वीकार कर ली तथा अमृत का कलश राक्षसों के हाथों से ले लिया। मोहिनी ने राक्षसों एवं देवताओं से कहा- ‘राक्षस और देवता अलग-अलग कतार बनाकर बैठ जाएं।’ भगवान ने अपनी माया से अमृत-कलश में एक तरफ ‘अमृत’ तथा दूसरी तरफ ‘वारुणि’ अर्थात् मदिरा भर दिया।

मोहिनी अवतार धारी भगवान श्रीहरि ने देवताओं को अमृत तथा राक्षसों को वारुणि पिलाना आरम्भ कर दिया। राक्षस उस वारुणि को पीकर मदमत्त होने लगे। ‘राहू’ नामक एक राक्षस को भगवान के मोहिनी अवतार की इस चालाकी का पता चल गया। वह देवताओं का रूप धारण करके देवताओं की पंक्ति में जाकर बैठ गया।

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जैसे ही राहू ने अमृत पान किया, वैसे ही सूर्य एवं चंद्र नामक देवताओं को ज्ञात हो गया कि यह तो कोई राक्षस है। उन्होंने जोर से चिल्लाकर भगवान विष्णु को यह बात बता दी। भगवान श्रीहरि विष्णु ने उसी समय सुदर्शन चक्र से राहू का मस्तक काट डाला। उस समय तक राहू अमृत का पान कर चुका था। इसलिए उसका सिर और धड़ दोनों ही जीवित रहे। उसके सिर को ‘राहू’ तथा ‘धड़’ को केतु कहा जाता है।

राहू ने भगवान श्रीहरि से कहा- ‘सूर्य और चंद्र ने मेरा मस्तक कटवाया है इसलिए मैं भी बार-बार इन्हें ग्रहण करके कष्ट दूंगा। यदि उस समय संसार के लोग दान देंगे तो इनका कष्ट कम होगा।’

इस कारण तब से ही सूर्य और चन्द्रमा बार-बार राहू द्वारा पकड़ लिए जाते हैं तथा उन पर ग्रहण लगता है। मोहिनी ने राक्षसों को वारुणि तथा देवताओं को अमृत पिलाकर अपना रूप त्याग दिया। अमृत का पान करके देवता पुनः शक्तिशाली हो गए तथा उन्होंने राक्षसों को स्वर्ग से मार भगाया। देवता स्वर्ग में विराजमान हुए और दैत्य पाताल में जाकर छिप गए। जो मनुष्य देवताओं की इस विजयगाथा का पाठ करता है, वह मृत्यु के पश्चात् स्वर्गलोक में जाता है।

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 देवों एवं दैत्यों के मध्य हुए अमृत-विभाजन के दौरान अचानक हुए मोहिनी अवतार की कथा यहाँ पूरी हो जाती है किंतु अग्नि पुराण, महाभारत, गणेश पुराण, गरुड़ पुराण, गर्ग संहिता, नारद पुराण, पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भविष्य पुराण, भागवत पुराण, वायु पुराण, मत्स्य पुराण, रुक्मांगद-मोहिनी आख्यान, व्याघ्रानल असुर वध, कथासरित्सागर आदि ग्रंथों में मोहिनी अवतार की कथा कई रूपों में, कई कारणों सहित तथा कई प्रकार से मिलती है। बहुत से ग्रंथों में विष्णु के 21 अवतारों में मोहिनी को भी एक अवतार माना जाता है। यह भगवान श्रीहरि विष्णु का एकमात्र स्त्री-रूप-अवतार है। कुछ ग्रंथों में मोहिनी अवतार की कथा आगे तक चलती है। इसके अनुसार जब भगवान श्रीहरि विष्णु का मोहिनी रूप विलुप्त हो गया तो भगवान शिव को मोहिनी रूप का पुनःदर्शन करने की इच्छा हुई। अतः उन्होंने श्रीहरि से अनुरोध किया- ‘भगवन्! आप अपने स्त्री रूप का मुझे पुनः दर्शन करावें।’ देवाधिदेव भोलेनाथ की प्रार्थना पर भगवान् श्रीहरि ने उन्हें अपने मोहिनी रूप का पुनः दर्शन करवाया। मोहिनी को देखते ही भगवान शिव, श्रीहरि की माया के वशीभूत होकर मोहिनी को पकड़ने के लिए दौड़े। उन्होंने नग्न और उन्मत्त होकर मोहिनी के केश पकड़ लिए।

मोहिनी अपने केशों को छुड़ाकर वहाँ से चल दी। उसे जाती देखकर महादेव भी उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे। इस दौरान भगवान का वीर्य स्खलित होकर पृथ्वी पर गिरने लगा। जहाँ-जहाँ भगवान् शंकर का वीर्य गिरा, वहाँ-वहाँ शिवलिंगों के क्षेत्र एवं सुवर्ण भण्डार बन गए। तत्पश्चात ‘यह माया है’ ऐसा जान कर भगवान् शंकर अपने स्वरूप में स्थित हुए।

तब भगवान श्रीहरि ने प्रकट होकर शिवजी से कहा- ‘रूद्र! तुमने मेरी माया को जीत लिया है। पृथ्वी पर तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा नहीं है, जो मेरी इस माया को जीत सके।’

शिव पुराण सहित अनेक पुराणों में भगवान श्रीहरि विष्णु के मोहिनी रूप धारण करने की कथा भस्मासुर राक्षस के संदर्भ में भी मिलती है। इस कथा के अनुसार एक राक्षस भगवान भोलेनाथ की सेवा किया करता था। वह नित्य ही भगवान भोलेनाथ को देह पर रमाने के लिए भस्म लेकर आया करता था। एक बार भोलेनाथ उससे प्रसन्न हो गए तथा उन्होंने राक्षस से कहा कि वह कोई वरदान मांग ले।

राक्षस ने विनीत् भाव से कहा- ‘मुझे आपके लिए भस्म का प्रबंध करने के लिए दूर-दूर तक भटकना पड़ता है। इसलिए आप मुझे वरदान दें कि मैं जिस वस्तु पर हाथ रखूं वह भस्म बन जाए।’

भोलेनाथ ने उस राक्षस को यह वरदान दे दिया। इसके बाद राक्षस जिस भी वस्तु पर हाथ रखता, वह भस्म बन जाती। इससे उस राक्षस का नाम भस्मासुर पड़ गया।

यह वरदान पाकर भस्मासुर को घमण्ड आ गया और वह पार्वतीजी को प्राप्त करने के उद्देश्य से भोलेनाथ को ही भस्म करने के लिए दौड़ा। भोलेनाथ भस्मासुर से बचने के लिए दौड़े तथा उन्होंने भगवान श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया। भगवान श्रीहरि विष्णु पुनः मोहिनी रूप धारण करके भस्मासुर के मार्ग में आकर खड़े हो गए।

राक्षस भोलेनाथ के पीछे भागना छोड़कर मोहिनी के पीछे भागा। मोहिनी-रूप-धारी श्रीहरि ने भस्मासुर से कहा कि- ‘यदि तू मेरी तरह नृत्य करके दिखाए तो मैं तुझे प्राप्त हो जाउंगी।’

अब भस्मासुर भगवान की माया के वशीभूत होकर मोहिनी के साथ उसी की तरह नृत्य करने लगा। नृत्य के बीच में भगवान विष्णु ने अपने सिर पर हाथ रखा, भस्मासुर ने भी वरदान की बात भूलकर अपने सिर पर हाथ रख लिया और उसी क्षण जलकर भस्म हो गया। कई कथाओं में मोहिनी अवतार के विवाह का प्रसंग भी आया है, जिसमें मोहिनी द्वारा भगवान शिव से विवाह करके विहार करने का उल्लेख किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नील वाराह की अवतार कथा किसी प्राचीन हिमयुग की समाप्ति से जुड़ी है (07)

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नील वाराह - bharatkaitihas.com
नील वाराह की अवतार कथा किसी प्राचीन हिमयुग की समाप्ति से जुड़ी है

ब्रह्माजी ने चिंतित होकर, जल में निवास करने वाले श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया और फिर भगवान श्रीहरि विष्णु ने नील वाराह के रूप में प्रकट होकर धरती के कुछ भागों को जल से मुक्त किया।

हमारे सौर मण्डल के समस्त ग्रह सूर्य से टूटकर अलग हुए हैं जिनमें से पृथ्वी भी एक है। आज से लगभग 457 करोड़ वर्ष पूर्व जब पृथ्वी सूर्य से अलग हुई, उस समय यह आग का गोला थी। यह धीरे-धीरे ठण्डी हुई। इस प्रक्रिया में करोड़ों वर्ष लगे। धीरे-धीरे यह इतनी ठण्डी हो गई कि पूरी तरह बर्फ की मोटी पर्त से ढक गई। इसे धरती का पहला हिमयुग कहते हैं। यह घटना आज से लगभग 240 करोड़ वर्ष पहले हुई।

कई करोड़ वर्ष तक पृथ्वी इसी स्थिति में रही। इसके बाद सूर्य के प्रभाव से धरती की बर्फ पिघलने लगी और धीरे-धीरे धरती पर समुद्रों, झीलों एवं नदियों का विकास हुआ। इस काल को गर्म युग कहते हैं।

वैज्ञानिकों ने पानी के चिह्नों के आधार पर धरती पर अब तक हुए पाँच बड़े हिमयुगों का पता लगाया है। सबसे अंतिम हिमयुग आज से 26 लाख साल पहले आरम्भ हुआ जो आज से लगभग 20 हजार साल पहले अपने चरम पर पहुंचा तथा आज से लगभग 11,700 वर्ष पहले समाप्त हो गया।

जब भी धरती पर हिमयुग समाप्त होता और गर्म युग आता तो धरती पर वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं का विकास होने लगता था, प्रत्येक हिम युग के साथ पुरानी वनस्पतियों तथा पुराने जीवों का नाश हो जाता था तथा प्रत्येक गर्मयुग में नई प्रकार की वनस्पतियां एवं नए प्रकार के जीव-जंतु विकसित होते थे।

ऐसे ही हिम-युगों एवं गर्म-युगों में आज से लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व मानव जाति का विकास होना आरम्भ हुआ। धरती के प्रारम्भिक मानव, आधुनिक मानवों से इतने भिन्न थे के उन्हें मानव कहने की बजाय विकसित वानर कहा जाना अधिक उचित होगा।

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वैज्ञानिकों के अनुसार आज से लगभग 3 लाख साल पहले ‘होमोसेपियन’ नामक मानव प्रजाति विकसित हुई। आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले ‘होमोसेपियन’ प्रजाति से एक अन्य परिष्कृत मानव जाति ने जन्म लिया जिन्हें वैज्ञानिक ‘होमोसेपियन सेपियन’ कहते हैं।

यही होमो सेपियन मनुष्य विकसित होता हुआ आज से लगभग चालीस हजार साल पहले आधुनिक मानव बना जिसे वैज्ञानिक ‘क्रो-मैग्नन मैन’ कहते हैं। मानव जाति के विकास क्रम में हिमयुगों के आने-जाने की घटना ने बड़ी भूमिका निभाई है।

विभिन्न हिन्दू धर्म ग्रंथों में आई भगवान श्रीहरि विष्णु के वराह अवतार की कथाएं कम से कम दो हिमयुगों के समाप्त होने के बाद धरती के जल में समाने और धरती पर नया जीवन आरम्भ होने की घटना से जुड़ी हुई प्रतीत होती है। भारतीय धर्म साहित्य में तीन वराह अवतारों की धारणा प्रस्तुत की गई है- ‘नील-वराह, आदि-वराह एवं श्वेत वराह’। इन तीनों अवतारों की संकल्पना वस्तुतः हिमयुगों एवं गर्मयुगों के आने-जाने की घटनाओं से जुड़ी हुई हैं।

प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में मानव इतिहास को पाँच कल्पों में बाँटा गया है। इनमें से पहला है- ‘महत्-कल्प’ जिसका अर्थ होता है अंधकार युग। पुराणों के अनुसार इस कल्प की अवधि 1 लाख 9 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व से लेकर 85 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व तक थी।

इस काल का इतिहास नहीं मिलता किंतु माना जाता है कि महत्-कल्प में विचित्र प्रकार के प्राणी और मनुष्य थे। शिवजी की बरात में विचित्र प्रकार के भूत-प्रेतों के सम्मिलित होने का प्रसंग मिलता है। संभवतः वे भूत-प्रेत महत्-कल्प के मनुष्य थे। गोस्वामी तुलसीदासजी ने इनके बारे में लिखा है-

कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।

बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना।

अर्थात्- किसी प्राणी के तो मुख ही नहीं है और किसी के बहुत सारे मुख हैं। किसी प्राणी के कोई हाथ या पैर नहीं है जबकि कुछ प्राणियों के बहुत से हाथ-पैर हैं। किसी के बहुत सी आंखें हैं तथा कोई नेत्र-विहीन है। कोई प्राणी बहुत हृष्ट-पुष्ट है और कोई अत्यंत पतला है। जब धरती पर महत्-कल्प बीत गया तो ‘महाप्रलय’ हुई जिसमें महत्-कल्प के समस्त प्राणी नष्ट हो गए।

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हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार महाप्रलय के समाप्त होने पर दूसरा कल्प अर्थात् ‘हिरण्यगर्भ-कल्प’ आरम्भ हुआ। इसकी अवधि 85 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व से लेकर 61 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व तक थी। हिरण्यगर्भ-कल्प में धरती पीले रंग की थी इसीलिए इसे हिरण्यगर्भ-कल्प कहते हैं। इस काल में धरती पर स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे तथा हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, हिरण्यानी रैंडी अर्थात् अरंडी, पीले वृक्ष एवं वनस्पति तथा हिरण आदि पशु अधिक थे। हिन्दू धर्म-ग्रंथों के अनुसार हिरण्यगर्भ कल्प के बाद धरती पर तीसरा कल्प अर्थात् ‘ब्रह्म-कल्प’ आरम्भ हुआ। इस कल्प की अवधि 60 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व से लेेकर 37 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व तक थी। इस कल्प में मनुष्य जाति केवल ‘ब्रह्म’ अर्थात् ईश्वर की उपासक थी। प्राणियों में विचित्रताएं और सुंदरताएं थी। इस काल में धरती पर ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, ब्राह्मी लिपि, ब्राह्मी प्रजाएं, परब्रह्म और ब्रह्मवाद के उपासकों का बाहुल्य था। ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्ड पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में इस कल्प का ऐतिहासिक विवरण दिया गया है। जब ब्रह्मकल्प बीत गया तो धरती पर चौथा कल्प अर्थात् ‘पद्म-कल्प’ आरम्भ हुआ। इस कल्प की अवधि 37 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व से लेकर 13 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व तक थी। इस कल्प का विवरण पद्मपुराण में मिलता है।

इस कल्प में धरती पर 16 समुद्र विद्यमान थे। यह कल्प नागवंशियों का था। इस काल में नाग, कोल, कमठ, बानर एवं किरात जातियों का बाहुल्य था और कमल-पत्र एवं कमल-पुष्पों का बहुविधि प्रयोग होता था। इस कल्प में सिंहल द्वीप पर पद्मिनी-प्रजा निवास करती थी।

इन चारों कल्पों के बीत जाने के बाद धरती पर पांचवा एवं वर्तमान कल्प आरम्भ हुआ जिसे ‘वराह-कल्प’ कहते हैं। इस कल्प के आरम्भ होने का विवरण वराह पुराण में मिलता है। इस कल्प में भगवान श्रीहरि विष्णु के वराह अवतार का वर्णन है। इसी कल्प में भगवान विष्णु के 12 अवतार हुए और इस कल्प में वर्तमान समय में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है। इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की। वराह के तीन अवतारों में पहली कथा नील-वराह के अवतार की है। यह कथा इस प्रकार है-

पद्म-कल्प का अंत हो जाने के बाद धरती पर महाप्रलय हुई। सूर्य के भीषण ताप से धरती के समस्त वन सूख गए। समुद्र का जल भी जल गया। ज्वालामुखी फूट पड़े। सूखा हुआ जल वाष्प बनकर आकाश में मेघों के रूप में स्थिर हो गया। इसके बाद अंत में, न रुकने वाले जल-प्रलय का क्रम आरम्भ हुआ। चक्रवात उठने लगे और देखते ही देखते समस्त धरती जल में डूब गई।  यह देखकर ब्रह्माजी ने चिंतित होकर, जल में निवास करने वाले श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया और फिर भगवान श्रीहरि विष्णु ने नील वाराह के रूप में प्रकट होकर धरती के कुछ भागों को जल से मुक्त किया।

पुराणों के अनुसार नील वाराह ने अपनी पत्नी नयना देवी के साथ अपनी सम्पूर्ण वाराही-सेना को भी प्रकट किया और धरती को जल से बचाने के लिए तीक्ष्ण दरातों, पाद प्रहारों, फावड़ों, कुदालियों और गेंतियों द्वारा धरती को समतल करके उसे रहने योग्य बनाया। भगवान नील-वराह ने पर्वतों तथा रेत के टीलों को तोड़कर गड्ढों में भर दिया ताकि धरती को समतल किया जा सके।

 यह एक प्रकार का यज्ञ था, इसलिए नील वाराह को यज्ञ-वराह भी कहा गया। नील वाराह के इस कार्य को आकाश से देवतागण देख रहे थे। प्रलयकाल का जल उतर जाने के बाद भगवान के प्रयत्नों से अनेक प्रकार के सुगंधित वन, तालाब, झील, सरोवर आदि निर्मित हुए। वृक्ष एवं लताएं उग आईं और धरती पर फिर से हरियाली छा गई। संभवतः इसी काल में मधु और कैटभ का वध किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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