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छत्रसाल बुंदेला (67)

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छत्रसाल बुंदेला

औरंगजेब के दुश्मनों में छत्रसाल बुंदेला का नाम सबसे ऊपर आता है। इस छोटे से राजा ने औरंगजेब को जीवन भर युद्ध के मैदान में उलझाए रखा।

भारत के मध्य में स्थित बुंदेलखंड विंध्याचल का पहाड़ी क्षेत्र है। यह आल्हा-ऊदल जैसे वीरों की भूमि रही है। अकबर के समय रानी दुर्गावती बुंदेलखण्ड पर शासन करती थी। शाहजहाँ ने चम्पतराय बुंदेला को बुंदेलखण्ड क्षेत्र में कौंच की जागीर प्रदान की थी जिसे राजा चम्पतराय ने छोटे से राज्य में परिवर्तित कर लिया था।

आगे चलकर जब शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तो आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह, जोधपुर नरेश महाराजा जसवंतसिंह आदि की तरह बुंदेला राजा चम्पतराय ने भी औरंगजेब का साथ दिया था किंतु जब औरंगजेब ने हिन्दुओं का दमन करना आरम्भ किया तो चम्पतराय औरंगजेब का विरोधी हो गया।

इस पर औरंगजेब ने अपनी सेना को चम्पतराय पर आक्रमण करने के निर्देश दिए। मुगलों की विशाल सेना के सामने राजा चम्पतराय अपनी छोटी सी सेना लेकर रणक्षेत्र में उतरा। राजा चम्पतराय की रानी लालकुंवरि भी युद्ध क्षेत्र में चंपतराय के साथ रहकर युद्ध करती थी।

जब राजा और रानी मुग़ल सेना से घिर गए और ऐसा लगने लगा कि मुगल उन्हें जीवित ही पकड़ लेंगे तो राजा चम्पतराय तथा उसकी रानी लाल कुंवरि ने अपने-अपने पेट में कटार भौंककर देह छोड़ दी। उस समय उनके दो राजकुमार अंगद राय तथा छत्रसाल जीवित थे। वे दोनों अपने मामा के पास चले गए। 

कुछ समय बाद राजकुमार अंगदराय ने आम्बेर के शासक मिर्जाराजा जयसिंह के यहाँ नौकरी कर ली जबकि राजकुमार छत्रसाल बुंदेला ने अपनी स्वर्गीय माता के आभूषण बेचकर गुरु प्राणनाथ के मार्गदर्शन में 30 घुड़सवार और 347 पैदल सैनिकों की एक छोटी सी सेना तैयार की। इस सेना के भरोसे ही केवल 22 वर्ष की आयु में छत्रसाल ने अपने जीवन का पहला युद्ध लड़ा।

आरम्भ में तो छत्रसाल बुंदेला दूसरे राजाओं को अपनी सेना के साथ सेवा देता रहा किंतु बाद में उसकी सेना का विस्तार हो गया जिसमें 72 प्रमुख सरदार थे। स्त्रियों, साधु-सन्यांसियों एवं शरण में आए हुए लोगों की रक्षा करने के कारण छत्रसाल को बुंदेल खण्ड की जनता में लोकप्रियता प्राप्त हो गई।

कुछ समय बाद छत्रसाल भी मिर्जाराजा जयसिंह की सेना में शामिल हो गया। राजा छत्रसाल बुंदेला ने वसिया के युद्ध में अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन किया। इस युद्ध में मिली सफलता के बाद औरंगजेब ने छत्रसाल बुंदेला को राजा की मान्यता प्रदान की।

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जब औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह की दक्खिन के मोर्चे पर नियुक्ति की तो छत्रसाल अपनी सेना के साथ दक्खिन में चला गया। वहाँ छत्रसाल ने अनेक मोर्चों पर शिवाजी की सेना के विरुद्ध युद्ध किया। धीरे-धीरे छत्रसाल को समझ में आने लगा कि मिर्जाराजा जयसिंह गलत पक्ष में है तथा शिवाजी का पक्ष ही सही है।

इसलिए ईस्वी 1668 में राजा छत्रसाल एक दिन अपनी पत्नी और मित्रों के साथ शिकार खेलने के बहाने से मुगल खेमे से निकला और चुपचाप पूना जा पहुंचा। शिवाजी नेे उसका स्वागत किया और उसे राजनीति, छद्मनीति एवं छापामार युद्ध के बारे में जानकारी दी। छत्रसाल ने शिवाजी के साथ मिलकर औरंगजेब की सेना से युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की।

इस पर शिवाजी ने उसे सलाह दी कि वह अपनी मातृभूमि बुंदेलखण्ड लौट जाए और अपनी मातृभूमि को मुगलों से मुक्त कराए। वहाँ उसे अपने ही देश के बहुत से साथी मिल जाएंगे। छत्रसाल को यह सलाह उचित लगी। छत्रपति शिवाजी ने अपने हाथों से राजा छत्रसाल की कमर में तलवार बांधी तथा उसका तिलक किया।

इस घटना का वर्णन करते हुए भूषण ने लिखा है-

करो देस के राज छतारे, हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।

दौर देस मुग़लन को मारो, दपटि दिली के दल संहारो।

तुम हो महावीर मरदाने, करि हो भूमि भोग हम जाने।

जो इतही तुमको हम राखें, तो सब सुयस हमारे भाषें।

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शिवाजी से हुई भेंट के बाद राजा छत्रसाल मुगलों की नौकरी छोड़कर अपनी सेना सहित अपने पैतृक राज्य महोबा जाने का विचार करने लगा किंतु अपनी सेना को मुगलों के सैन्य-शिविर से अलग करके निकालना आसान कार्य नहीं था। अंततः ई.1670 में राजा छत्रसाल को अवसर मिल गया और वह अपनी सेना लेकर बुंदेलखण्ड चला आया। बुंदेलखण्ड आकर राजा छत्रसाल बुंदेला ने अपने सम्बन्धी राजाओं से औरंगजेब के विरुद्ध सहायता मांगी। किसी भी राजा ने छत्रसाल का समर्थन नहीं किया। दतिया नरेश शुभकरण ने छत्रसाल का सम्मान तो किया परन्तु बादशाह से बैर न करने की सलाह दी। ओरछा नरेश सुजान सिंह ने राजा छत्रसाल का अभिषेक तो किया पर स्वयं औरंगजेब के विरुद्ध संघर्ष से अलग रहा। छत्रसाल के बड़े भाई अंगदराय ने भी छत्रसाल का साथ देना स्वीकार नहीं किया।

राजाओं से सहयोग न मिलने पर राजा छत्रसाल ने जन-साधारण से सहयोग मांगा। छत्रसाल के बचपन के साथी महाबली तेली ने छत्रसाल की सहायता की तथा उसे कुछ धन प्रदान किया जिससे छत्रसाल ने नए सिरे से अपनी सेना का गठन किया तथा ई.1671 में औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। राजा छत्रसाल ने कालिंजर का क़िला जीत लिया और मांधाता चौबे को कालिंजर का किलेदार नियुक्त किया।

औरंगज़ेब ने छत्रसाल के विरुद्ध सेना भेजी किंतु यह सेना छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो सकी। इस पर औरंगजेब ने रणदूलह के नेतृत्व में 30 हज़ार सैनिकों की टुकड़ी छत्रसाल के पीछे भेजी। राजा छत्रसाल ने इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित अनेक स्थानों पर मुगलों से लड़ाई लड़ी तथा बड़ी संख्या में मुगल सरदारों को बंदी बनाकर उनसे दंड वसूल किया।

मुग़ल सेनापति तहव्वर ख़ाँ, अनवर ख़ाँ, सहरूदीन तथा हमीद खाँ छत्रसाल से मार खा-खाकर बुन्देलखंड छोड़कर भाग गए। बहलोद ख़ाँ छत्रसाल के साथ हुई लड़ाई में मारा गया था। मुरादबक्श ख़ाँ, दलेह ख़ाँ, सैयद अफगन जैसे सिपहसलार भी बुन्देला वीरों से पराजित होकर दिल्लीपति की शरण में भाग गये।

औरंगजेब यह देख-देखकर हैरान होता था कि आखिर छत्रपति शिवाजी ने राजा छत्रसाल को कौनसी घुट्टी पिला दी थी कि एक साधन विहीन छोटा सा जागीरदार, मुगलों की विशाल सेना में लगातार मार लगाता जा रहा था!

जिस प्रकार सिसोदिया राजपूत अरावली पर्वत में, कचोट राजपूत कांगड़ा घाटी में तथा मराठे कोंकण में पहाड़ी क्षेत्र के बल पर मुगलों की सेना को छका रहे थे, उसी प्रकार राजा छत्रसाल ने भी विंध्याचल पर्वत का सहारा लेकर बुन्देलखंड से मुग़लों को मार भगाया।

ईस्वी 1678 में राजा छत्रसाल ने पन्ना में अपनी राजधानी स्थापित की। ई.1687 में योगीराज प्राणनाथ के निर्देशन में छत्रसाल का राज्याभिषेक किया गया। जिस प्रकार महाराणा प्रताप की सफलता में उनके मंत्री भामाशाह का और छत्रपति शिवाजी की सफलता में समर्थ गुरु रामदास का हाथ था, उसी प्रकार राजा छत्रसाल की सफलता में उसके गुरु प्राणनाथ का बहुत बड़ी प्रेरणा काम कर रही थी।

पन्ना में आज भी गुरु प्राणनाथ की समाधि बनी हुई है। स्थानीय लोगों में मान्यता है कि गुरु प्राणनाथ ने इस अंचल को रत्नगर्भा होने का वरदान दिया था। इस कारण जहाँ तक छत्रसाल के घोड़े की टापों के पदचाप बनी, वह धरा धनधान्य से परिपूर्ण एवं रत्नों से सम्पन्न हो गयी।

छत्रसाल के विशाल राज्य के विस्तार के बारे में यह पंक्तियाँ कही जाती हैं-

इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस

छत्रसाल सों लरन की रही न काहू हौंस !

औरंगजेब तो ई.1707 में छत्रसाल का दमन करने की अधूरी इच्छा के साथ मर गया किंतु राजा छत्रसाल बुंदेला ई.1731 तक मातृभूमि की सेवा करता रहा। उस समय छत्रसाल की आयु 83 वर्ष थी किंतु वह तब भी मुगलों से संघर्ष कर रहा था। अपने जीवन काल में उसने 52 लड़ाइयां लड़ी थीं।

छत्रसाल बुंदेला के राज्य में चित्रकूट, पन्ना, कालपी, सागर, दमोह, झाँसी, हमीरपुर, जालौन, बाँदा, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, मण्डला, शिवपुरी, कटेरा, पिछोर, कोलारस, भिण्ड और मोण्डेर के परगने शामिल थे।

छत्रसाल के लिए यह कहावत प्रसिद्ध थी –

छत्ता तेरे राज में, धक-धक धरती होय।

जित-जित घोड़ा मुख करे, तित-तित फत्ते होय।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक

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छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक
छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक

छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक होते हुए देखना मुगलिया इतिहास के लिए जहर का घूंट पीने के समान थी। औरंगजेब के लिए तो यह और भी शर्मनाक थी किंतु हिन्दू इतिहास को युगों-युगों तक गौरवान्वित करने वाली थी।

शिवाजी को आगरा से लौटकर आए हुए आठ साल बीत गए थे किंतु औरंगजेब के मन का दुःख किसी तरह कम नहीं हेाता था। औरंगजेब ने जब से मिर्जाराजा जयसिंह को अपमानित करने के लिए दक्खिन की सूबेदारी से अलग किया था और जिन रहस्यमय परस्थितियों में मिर्जाराजा की मृत्यु हुई थी, उसके बाद से हिन्दू राजा औरंगजेब से घृणा करने लगे थे तथा मन मारकर औरंगजेब की नौकरी कर रहे थे।

अंग्रेज इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है- ‘जब तक वह कट्टरपंथी औरंगजेब, अकबर के सिंहासन पर बैठा रहा, एक भी राजपूत उसे बचाने के लिए अपनी अंगुली भी हिलाने को तैयार नहीं था। औरंगजेब को अपनी दाहिनी भुजा खोकर दक्षिण के शत्रुओं के साथ युद्ध करना पड़ा।’ यहाँ दाहिनी भुजा से लेनपूल का आशय राजपूतों की मित्रता से है।

जोधपुर नरेश जसवंतसिंह अब भी औरंगजेब की नौकरी में थे और उन्हें छत्रपति शिवाजी को नष्ट करने के काम पर लगाया गया था किंतु महाराजा जसवंतसिंह, छत्रपति के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही नहीं करते थे। इस कारण छत्रपति ने अपने राज्य का बहुत विस्तार कर लिया। उनकी आय भी बढ़ गई थी और उनकी सेना का आकार भी काफी बड़ा हो गया था।

इस समय तक शिवाजी की तलवार के घाव खा-खाकर मुगल सेनाएं दक्षिण भारत में पूरी तरह जर्जर हो चुकी थीं। बीजापुर तथा गोलकुण्डा के पुराने सुल्तान मर चुके थे और नए सुल्तानों में शिवाजी का प्रतिरोध करने की शक्ति शेष नहीं बची थी।

इसलिए शिवाजी अब अपने राज्य के सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न स्वामी थे। फिर भी शिवाजी किसी राजा के पुत्र नहीं थे, न उनका कभी राज्याभिषेक हुआ था। इसलिए बहुत से राजा उन्हें अपने बराबर नहीं मानते थे। यहाँ तक कि राजपूत राजाओं एवं काशी के पण्डितों द्वारा शिवाजी का कुल भी नीचा माना जाता था।

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हिन्दू शास्त्रों के अनुसार एक राजा ही प्रजा पर कर लगा सकता है और अपनी प्रजा को न्याय तथा दण्ड दे सकता है। राजा को ही भूमि दान करने का अधिकार प्राप्त है। इसलिए माता जीजाबाई ने शिवाजी से कहा कि वह काशी के ब्राह्मणों को बुलाकर अपना राज्याभिषेक करवाएं। इस प्रकार छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक माता जीजाबाई के आदेश का परिणाम थी।

शिवाजी ने भी राजनीतिक दृष्टि से ऐसा करना उचित समझा ताकि वे अन्य राजाओं के समक्ष स्वतंत्र राजा का सम्मान और अधिकार पा सकें। ई.1674 में शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण करने का निर्णय किया।

कुछ भौंसले परिवार जो कभी शिवाजी के ही समकक्ष अथवा उनसे अच्छी स्थिति में थे, वे शिवाजी की सफलता के कारण ईर्ष्या करते थे तथा शिवाजी को लुटेरा कहते थे जिसने बलपूर्वक बीजापुर तथा मुगल राज्यों के इलाके छीन लिए थे। बीजापुर राज्य अब भी शिवाजी को एक जागीरदार का विद्रोही पुत्र समझता था।

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ब्राह्मणों की मान्यता थी कि शिवाजी किसान के पुत्र हैं इसलिए उनका राज्याभिषेक नहीं हो सकता। इसलिए शिवाजी ने अपने मंत्री बालाजी, अम्बाजी तथा अन्य सलाहकारों को काशी भेजा ताकि इस समस्या का समाधान किया जा सके। इन लोगों ने काशी के पण्डित विश्वेश्वर से सम्पर्क किया जिसे गागा भट्ट भी कहा जाता था। वह राजपूताने के कई राजाओं का राज्याभिषेक करवा चुका था। शिवाजी के मंत्रियों ने गागा भट्ट से शिवाजी की वंशावली देखने का अनुरोध किया। पण्डित गागा भट्ट ने शिवाजी की वंशावली देखने से मना कर दिया। शिवाजी के मंत्री कई दिनों तक उसके समक्ष प्रार्थना करते रहे। अंततः एक दिन गागा, शिवाजी की वंशावली देखने को तैयार हुआ।

उसने पाया कि शिवाजी का कुल मेवाड़ के सिसोदिया वंश से निकला है तथा विशुद्ध क्षत्रिय है। उसने छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक करने की अनुमति प्रदान कर दी। इसके बाद यह प्रतिनिधि मण्डल राजपूताने के आमेर तथा जोधपुर आदि राज्यों में भी गया ताकि राज्याभिषेक के अवसर पर होने वाली प्रथाओं एवं रीति-रिवाजों की जानकारी प्राप्त की जा सके।

गागा भट्ट की अनुमति मिलते ही रायपुर में राज्याभिषेक की तैयारियां होने लगीं। बड़ी संख्या में सुंदर एवं विशाल अतिथि-गृह एवं विश्राम-भवन बनवाने आरम्भ किए गए ताकि देश भर से आने वाले सम्माननीय अतिथि उनमें ठहर सकें। नए सरोवर, मार्ग, उद्यान आदि भी बनाए गए ताकि शिवाजी की राजधानी सुंदर दिखे।

गागा से प्रार्थना की गई कि वह स्वयं रायपुर आकर राज्याभिषेक सम्पन्न कराए। गागा ने इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। काशी से महाराष्ट्र तक की यात्रा में गागा भट्ट का महाराजाओं जैसा सत्कार किया गया। उसकी अगवानी के लिए शिवाजी अपने मंत्रियों सहित रायपुर से कई मील आगे चलकर आए तथा उसका भव्य स्वागत किया।

भारत भर से विद्वानों एवं ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया। 11 हजार ब्राह्मण, शिवाजी की राजधानी में आए। स्त्री तथा बच्चों सहित उनकी संख्या 50 हजार हो गई। लाखों नर-नारी इस आयोजन को देखने राजधानी पहुंचे। सेनाओं के सरदार, राज्य भर के सेठ, रईस, दूसरे राज्यों के प्रतिनिधि, विदेशी व्यापारी भी रायपुर पहुंचने लगे। चार माह तक राजा की ओर से अतिथियों को फल, पकवान एवं मिठाइयां खिलाई गईं तथा उन लोगों के राजधानी में ठहरने का प्रबन्ध किया गया।

ब्रिटिश राजदूत आक्सिनडन ने लिखा है कि प्रतिदिन के धार्मिक संस्कारों और ब्राह्मणों से परामर्श के कारण शिवाजी राजे को अन्य कार्यों की देखभाल के लिए समय नहीं मिल पाता था। जीजाबाई इस समय 80 वर्ष की हो चुकी थीं। छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक होते हुए देखकर वही सबसे अधिक प्रसन्न थीं।

उनका पुत्र शिवा आज धर्म का रक्षक, युद्धों का अजेय विजेता तथा प्रजा-पालक था। जिस दिन राज्याभिषेक के समारोह आरम्भ हुए, उस दिन शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास तथा माता जीजाबाई की चरण वंदना की तथा चिपलूण के परशुराम मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन किए।

शिवाजी ने अपनी कुल देवी तुलजा भवानी की प्रतिमा पर सवा मन सोने का छत्र चढ़ाया जिसका मूल्य उस समय लगभग 56 हजार रुपए था। शिवाजी ने अपने कुल-पुरोहित के निर्देशन में महादेव, भवानी तथा अन्य देवी-देवताओं की पूजा की। ब्राह्मणों तथा निर्धनों को विपुल दान दक्षिणा दी गई। मुख्य पुरोहित गागा भट्ट को 7000 स्वर्ण-मुद्राएं तथा अन्य ब्राह्मणों को 1700-1700 मुद्राएं दी गईं जिन्हें होन कहा जाता था।

शिवाजी द्वारा जाने-अनजाने में किए गए पापों एवं अपराधों के प्रायश्चित के लिए उनके हाथों से सोना, चांदी, तांबा, पीतल, शीशा आदि विभिन्न धातुओं, अनाजों, फलों, मसालों आदि से तुलादान करवाया गया। इस तुलादान में शिवाजी ने एक लाख होन भी मिलाए ताकि ब्राह्मणों में वितरित किए जा सकें।

कुछ ब्राह्मण इस दान-दक्षिणा से भी संतुष्ट नहीं हुए तथा उन्होंने शिवाजी पर 8 हजार होन का अतिरिक्त जुर्माना लगाया क्योंकि शिवाजी ने अनेक नगर जलाए थे तथा लोगों को लूटा था। शिवाजी ने ब्राह्मणों की बात मान ली। इस प्रकार भारी मात्रा में स्वर्ण दान लेकर ब्राह्मणों ने शिवाजी को पाप-मुक्त, दोष-मुक्त एवं पवित्र घोषित कर दिया।

5 जून का दिन शिवाजी ने आत्म-संयम और इंद्रिय-दमन में व्यतीत किया। उन्होंने गंगाजल से स्नान करके, गागा भट्ट को 5000 होन का दान किया तथा अन्य प्रसिद्ध ब्राह्मणों को सोने की 2-2 स्वर्ण मोहरें दान में दीं और दिन भर उपवास किया।

6 जून 1674 को शिवाजी का राज्याभिषेक कार्यक्रम आयोजित किया गया। राज्याभिषेक के अवसर पर शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की। छत्रपति शिवाजी महाराज की जय-जयकार से आकाश गुंजारित हो गया। राज्याभिषेक हो चुकने के बाद छत्रपति के मंत्री नीराजी पंत ने अंग्रेजों के दूत हेनरी आक्सिनडन को शिवाजी के सम्मुख प्रस्तुत किया।

आक्सिनडन ने पर्याप्त दूरी पर खड़े रहकर छत्रपति का अभिवादन किया तथा दुभाषिए की सहायता से अंग्रेजों की तरफ से हीरे की एक अंगूठी भेंट की। दरबार में कई और विदेशी भी उपस्थित थे, उन्हें भी शिवाजी महाराज ने अपने निकट बुलाया तथा उनका यथोचित सम्मान किया और परिधान भेंट किए।

अपने राज्याभिषेक के पश्चात् महाराज शिवाजी ने अपने नाम से सिक्के ढलवाए तथा नए संवत् का भी प्रचलन किया। भारतीय आर्य राजाओं में यह परम्परा थी कि जब कोई राजा स्वयं को स्वतंत्र सम्राट या चक्रवर्ती सम्राट घोषित करता था तो उसकी स्मृति में नवीन मुद्रा तथा संवत् का प्रचलन किया करता था। प्राचीन भारत में विक्रम संवत, शक संवत तथा गुप्त संवत इसी प्रकार आरम्भ किए गए थे।

शिवाजी का राज्याभिषेक एक युगांतरकारी घटना थी। औरंगजेब के जीवित रहते यह संभव नहीं था किंतु शिवाजी ने औरंगजेब के साथ-साथ बीजापुर एवं गोलकुण्डा के मुसलमान बादशाहों और सुल्तानों से लड़कर अपने राज्य का निर्माण किया तथा स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित किया। उस समय उत्तर भारत में केवल महाराणा राजसिंह तथा दक्षिण भारत में केवल छत्रपति शिवाजी ही ऐसे राजा थे जिनकी मुगलों से किसी तरह की अधीनता, मित्रता या संधि नहीं थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय औरतों से विवाह (68)

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भारतीय औरतों से विवाह

पुर्तगालियों ने अराकानी स्त्रियों के साथ विवाह करने आरम्भ कर दिए क्योंकि पुर्तगाली औरतें भारत में आकर रहने को तैयार नहीं थीं। औरंगजेब को पसंद नहीं था कि पुर्तगाली पुरुष भारतीय औरतों से विवाह करें!

मुगलों के शासनकाल में भारत की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर अराकान नामक प्रसिद्ध राज्य था। इस क्षेत्र में सदियों से भारतीय आर्य-राजा राज्य करते आ रहे थे। महाभारत काल में पाण्डवों ने, बौद्ध काल में अशोक ने तथा गुप्त सम्राटों के काल में समुद्रगुप्त ने अराकान के जंगली लोगों को पराजित करके अपने अधीन किया था। इस कारण अराकान के शासक आर्य जाति के थे किंतु अराकान की प्रजा वनवासी थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि जब औरंगजेब के बेटों में तख्त और ताज के लिए खून-खच्चर मचा था तो औरंगजेब द्वारा भेजी गई सेनाओं के डर से औरंगजेब का बड़ा भाई शाहशुजा जो कि बंगाल का सूबेदार था, अपनी राजधानी ढाका छोड़कर अराकान के जंगलों में भाग गया था। उस समय अराकान में माघ वंश का शासन था जो कि सदियों से हिन्दू धर्म को मानता आया था।

अराकान के इसी हिन्दू राजा ने शाहशुजा को शरण दी थी किंतु कुछ समय बाद जब कृतघ्न मुगल शहजादे ने अराकान के राजा की हत्या का षड्यन्त्र रचा तो अराकान के राजा ने शाहशुजा का वध करने के आदेश दिए। इस पर शाहशुजा रातों-रात अराकान के राजा का महल छोड़कर जंगलों भाग गया। अराकान के पहाड़ों में रहने वाले जंगली लोगों ने शाहशुजा और उसके हरम को पकड़ लिया तथा उनका सामान लूट कर उन सभी लोगों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

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माघ राजाओं की राजधानी चटगांव थी। जब वास्कोडीगामा भारत आया था तो पुर्तगालियों की एक बस्ती गोआ के आसपास बसनी आरम्भ हुई थी। इन्हीं पुर्तगालियों में से कुछ लोग अकबर के समय चटगाँव चले आए और राजधानी चटगाँव में उन्होंने एक व्यापारिक कोठी तथा बस्ती बना ली। इन पुर्तगालियों को स्थानीय लोग फिरंगी कहते थे।

फिरंगियों ने माघ राजाओं से गठबन्धन कर लिया था जिसके अनुसार पुर्तगाली व्यापारी, माघ राजा को कर एवं उपहार देते थे तथा उनके बदले में माघ राजा पुर्तगालियों के जहाजों एवं बस्ती को संरक्षण देते थे ताकि स्थानीय लोग पुर्तगालियों पर हमला न करें।

आगे चलकर पुर्तगालियों ने भारतीय औरतों से विवाह करने आरम्भ कर दिए क्योंकि पुर्तगाली औरतें भारत में आकर रहने को तैयार नहीं थीं। चटगांव के पुर्तगाली जब अमीर हो गए तो उन्होंने अपनी छोटी-मोटी सेना बना ली और वे बंगाल के निचले भाग में समुद्री तट तथा नदियों के तट पर लूट-खसोट करने लगे। भारतीय औरतों से विवाह करना उनके लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया।

भारतीय औरतों से विवाह करना पुर्तगाली मर्दों को इसलिए भी अच्छा लगता था क्योंकि वे पुर्तगाली औरतों से अधिक सुंदर थीं, विशेषकर अराकानी औरतें।

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पाठकों को स्मरण होगा कि जब छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब के मामा शाइस्ता खाँ को पूना से मार भगाया था तो औरंगजेब ने शाइस्ता खाँ को बंगाल का गवर्नर बना दिया था। औरंगजेब ने शाइस्ता खाँ को आदेश दिए कि वह इन पुर्तगालियों को दण्डित करे तथा अराकानियों को नष्ट करके चटगांव पर अधिकार कर ले।

औरंगजेब ने अराकानियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने बंगाल के पूर्व सूबेदार शाहशुजा तथा उसके परिवार की हत्या की थी। शाइस्ता खाँ ने एक नौ-सेना तैयार की और ब्रह्मपुत्र नदी के मुहाने पर स्थित सन्द्वीप नामक द्वीप पर अधिकार कर लिया।

उन्हीं दिनों माघ राजा तथा फिरंगियों में झगड़ा हो गया। शाइस्ता खाँ ने इस स्थिति से लाभ उठाते हुए फिरंगियों को अपनी ओर मिला लिया।

अब चटगाँव पर आक्रमण करना सरल हो गया। पुर्तगालियों के एक जहाजी बेड़े ने अराकानियों के जहाजी बेड़े को नष्ट कर दिया। इसके बाद मुगल सेना ने चटगाँव पर अधिकार जमा लिया और चटगांव का नाम इस्लामाबाद रखकर उसे बंगाल प्रांत में सम्मिलित कर लिया।

इस प्रकार ईस्वी 1666 में अराकानियों की शक्ति समाप्त हो गई तथा अब औरंगजेब ने पुर्तगालियों की स्वतंत्रता भी नष्ट करके उन्हें अपने अधीन कर लिया। अराकान के मुगलों के अधीन हो जाने के बाद पुर्तगालियों को भारतीय औरतों से विवाह करने से रोक दिया गया। क्योंकि इससे भारत में ईसाइयों की संख्या बढ़ रही थी जबकि औरंगजेब भारत में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ाना चाहता था।

अराकान को जीतने के बाद औरंगजेब की सेना ने आसाम के अहोम शासक पर हमला कर दिया तथा उसके बहुत से प्रदेश छीन लिए। अहोम राजाओं ने मुगलों के विरुद्ध दीर्घकालीन संघर्ष छेड़ दिया ताकि अपने खोये हुए प्रदेशों को फिर से प्राप्त कर सकें।

ई.1667 में अहोम सेनाओं ने गौहाटी पर अधिकार कर लिया। मुगलों ने आसाम पर आक्रमण किया किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद दुर्भाग्यवश अगले ग्यारह वर्ष तक आसाम के राजवंश में गृहयुद्ध चलता रहा। इस छोटी सी अवधि में आसाम की गद्दी पर सात शासक बैठे।

इससे अहोम राजवंश कमजोर पड़ गया। अहोम राजवंश की कमजोरी का लाभ उठाकर ई.1679 में मुगलों ने फिर से आसाम पर अधिकार कर लिया। यह अधिकार दो वर्ष तक ही रह सका। इस प्रकार आसाम अधिक समय तक मुगलों के अधीन नहीं रहा किंतु कूचबिहार के शासकों ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।

इस प्रकार बिहार से लेकर बंगाल और आसाम तक का क्षेत्र औरंगजेब के अधीन हो गया। इस पूरे क्षेत्र में औरंगजेब ने इस्लाम का जबर्दस्त प्रसार करवाया और बहुत सी जनसंख्या मुसलमान हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सतनामियों के ताबीज (69)

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सतनामियों के ताबीज

औरंगजेब की ताकत उसकी सेना में बसती थी। उसकी सेना में तलवार, तीर और तोप से लड़ने की तो ताकत थी किंतु इतनी ताकत नहीं थी कि वे सतनामियों के ताबीज से लड़ सकें।

दिल्ली और आगरा के लाल किलों का स्वामी औरंगजेब चाहता था कि वह अपने जीवन काल में ही भारत की समस्त जनता को इस्लाम में परिवर्तित कर ले किंतु भारत में इतने सारे छोटे-छोटे धार्मिक समुदाय रहते थे जिनकी गिनती करना संभव नहीं था और वे अपने धर्म एवं सम्प्रदाय में इतनी गहराई से विश्वास करते थे कि वे सिर कटवाने को तैयार थे किंतु इस्लाम स्वीकारने को तैयार नहीं थे।

इन्हीं धार्मिक समुदायों में से एक था नारनौल क्षेत्र का सतनामी सम्प्रदाय। नारनौल कस्बा दिल्ली से 75 मील-दक्षिण पश्चिम में स्थित है तथा वर्तमान में हरियाणा प्रांत के महेंद्रगढ़ जिले में आता है। नारनौल के निकट बीजासर नामक बसा हुआ है। औरंगजेब के पूर्वज बाबर के भारत में आने के समय बीजासर गांव में बीरभान नामक एक किसान रहता था। वह बहुत सच्चा और भला आदमी था। ईश्वर की भक्ति में उसकी बड़ी रुचि थी। वह संत रैदास का शिष्य हो गया।

संत रैदास के आशीर्वाद से बीरभान बहुत सुंदर भजन गाने लगा। धीरे-धीरे बीरभान स्वयं भी एक भक्त के रूप में प्रसिद्ध हो गया और आसपास के गांवों के लोग उसके भजन और उपदेश सुनने आने लगे। बहुत से लोग बीरभान को अपना गुरु मानने लगे। बीरभान की मुख्य शिक्षा यह थी कि ईश्वर ही एक मात्र सत्य है इसलिए मनुष्य अपने जीवन में सदैव सत्य भाषण करे, किसी को धोखा न दे, किसी का अपमान न करे, किसी का दिल न दुखाए। किसी से न डरे।

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ये बातें गांवों के सरल एवं सीधे-सादे लोगों को बहुत अच्छी लगीं और बीरभान के शिष्यों ने एक अलग सम्प्रदाय बना लिया जो स्वयं को सतनामी कहते थे। ये लोग बहुत साधारण जीवन व्यतीत करते थे तथा विलासिता के समस्त साधनों से दूर रहते थे। सतनामी साधु अपने सिर के सारे बाल मुंडवाते थे। यहाँ तक कि भौहें भी साफ करवा लेते थे। इस कारण लोग उन्हें मुंडिया भी कहते थे। इस पंथ का कोई धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं था तथा वे समस्त संसार को अपना परिवार मानते थे।

सतनामी संत, धनी लोगों की गुलामी करने को अच्छा नहीं मानते थे। उनका उपदेश था कि गरीब को मत सताओ। जालिम बादशाह और बेईमान साहूकार से दूर रहो। दान लेना अच्छा नहीं है। ईश्वर के सामने सब मनुष्य बराबर हैं।

ग्रामीण क्षेत्र में प्रकट होने से सतनामी सम्प्रदाय की लोकप्रियता विभिन्न जातियों में हो गई। इस कारण जाट, रैगर, सुनार, खाती आदि विभिन्न श्रमजीवी जातियों के लोग इसके अनुयायी हो गए। उन दिनों मालखाने के मुगल कर्मचारी एवं सिपाही भूराजस्व की वसूली के लिए किसानों को विभिन्न प्रकार के कष्ट दिया करते थे। सतनामियों ने घोषणा की कि उत्पीड़न सहना पाप है। इसलिए सतनामी सम्प्रदाय के किसान अपने साथ हथियार लेकर चलने लगे।

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औरंगजेब का समय आते-आते सतनामी समुदाय दिल्ली के आसपास व्यापक रूप से फैल गया तथा नारनौल इस पंथ का गढ़ बन गया। ईस्वी 1672 में नारनौल के निकट एक गांव में मालखाने के एक प्यादे और एक सतनामी किसान के बीच झगड़ा हो गया। मुगल प्यादे ने गुस्से में आकर सतनामी किसान के सिर में लाठी दे मारी। इससे किसान बुरी तरह से जख्मी हो गया।

जब कुछ सतनामियों ने प्यादे का विरोध किया तो प्यादे के साथियों ने सतनामियों की झोंपड़ियों में आग लगा दी। इस पर सतनामी भड़क उठे। वे बड़ी संख्या में इकट्ठे हो गए और उन्होंने प्यादे को पीट-पीट कर मार डाला। उन्होंने प्यादे के साथ आए दूसरे सिपाहियों को भी पीटा और उनके हथियार छीन लिए।

नारनौल का फौजदार कारतलखान इस घटना के बारे में सुनकर आग-बबूला हो गया। उसने सतनामियों को गिरफ्तार करने के लिए कुछ घुड़सवार और प्यादे भेजे। तब तक सतनामी भी तैयार हो गए थे। उन्होंने बड़ी संख्या में एकत्रित होकर फौजदार की सेना का सामना किया। इस लड़ाई में कुछ मुगल सिपाही मारे गए और बहुत से जख्मी हो गए। सतनामियों ने कुछ मुगल सिपाहियों को पकड़कर बंदी बना लिया।

इस सूचना से फौजदार की चिंता का पार नहीं रहा। क्योंकि यदि यह खबर बादशाह तक जा पहुंचती तो फौजदार को हटा दिया जाता। इसलिए फौजदार ने आनन-फानन में नए घुड़सवार और सिपाही भर्ती किए। आसपास के हिन्दू और मुसलमान जमींदारों और जागीरदारों से भी फौजें मंगवाईं।

इस तरह नारनौल के फौजदार कारतलखान ने बड़ी सेना के साथ सतनामियों के विरुद्ध कूच किया। सतनामियों ने भी सरकारी फौज का डटकर मुकाबला किया। यह युद्ध इतना भयंकर हो गया कि न केवल मुगल सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए अपितु स्वयं फौजदार भी मार दिया गया। नाराज सतनामियों ने नारनौल पर अधिकार कर लिया और अपनी सरकार स्थापित कर ली। उन्होंने नारनौल तथा आसपास के देहाती क्षेत्र में अपनी चौकियां तैनात कर दीं और लगान वसूली करना भी शुरू कर दिया।

लाल किले की ठीक नाक के नीचे यह काम हो गया और लाल किला बेधकड़क सोता रहा। जब तक औरंगजेब को इस घटना का पता लगा तब तक सतनामियों ने अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली। औरंगजेब ने आम्बेर नरेश विष्णु सिंह की अध्यक्षता में सतनामियों के विरुद्ध एक सेना भेजी। आम्बेर के इतिहास में इस राजा को बिशनसिंह कच्छवाहा भी कहा जाता है। सतनामियों ने विष्णुसिंह की सेना को भी मार भगाया।

उत्तर भारत के मुगल फौजदारों एवं जागीरदारों में राजा विष्णुसिंह की पराजय की खबर तेजी से फैल गई तथा सतनामियों के बारे में तरह-तरह की अफवाहें कही जाने लगीं। यहाँ तक कि सतनामियों की शक्ति को एक चमत्कार समझा जाने लगा।

इस घटना के बारे में फारस का इतिहासकार खफ़ी ख़ान लिखता है कि इसी बीच आसपास के जमींदारों और राजपूत सरदारों ने अवसर का लाभ उठाकर बादशाह को भूराजस्व देना बंद कर दिया। यहाँ तक कि सतनामियों तथा जाटों ने दिल्नी शहर को जाने वाले अनाज की आपूर्ति बंद कर दी। इससे दिल्ली में अनाज कम हो गया और जनता भयभीत हो गई।

उन्हीं दिनों सतनामी समुदाय की एक वृद्धा सतनामियों का नेतृत्व करने के लिए सामने आई। वह सतनामियों में माता मीनाक्षी के नाम से प्रसिद्ध थी। उसके बारे में यह विख्यात हो गया कि माता मीनाक्षी लकड़ी के घोड़े पर बैठकर सतनामियों की फौज के आगे-आगे चलती है। उसके पास जादुई ताकत है तथा उसने सतनामियों को यह भरोसा दिलाया है कि मेरा आशीर्वाद उन सतनामियों के साथ है जो औरंगजेब के विरुद्ध लड़ रहे हैं।

माता मीनाक्षी ने हजारों की संख्या में ताबीज बनाकर सतनामियों के झंडों पर बांध दिए। सतनामियों के ताबीज के कारण सतनामी योद्धाओं में यह विश्वास हो गया कि सतनामियों पर न तीर काम करता है न तलवार। न ही तोप के गोले उन पर कोई असर डालते हैं। औरंगजेब की सेना ने कई बार प्रयास किया किंतु सतनामी वीर पूरे आत्मविश्वास और उत्साह के साथ डटे रहे। जब औरंगजेब की यह सेना भी पराजित होकर भाग गई तो हजारों सतनामी दिल्ली की तरफ बढ़ने लगे। उनका निश्चय लाल किले पर कब्जा करने का था। जब दिल्ली केवल सोलह मील दूर रह गई तो विशाल शाही सेना ने सतनामियों का मार्ग रोका।

इस बार सतनामियों के विरुद्ध शाही सेना द्वारा बंदूकों एवं तोपों का प्रयोग किया जाना था जबकि सतनामियों के पास केवल तलवारें, बल्लम और भाले जैसे अस्त्र-शस्त्र ही थे किंतु सतनामियों को विश्वास था कि माता मीनाक्षी का ताबीज होने के कारण उन्हें कोई ताकत हरा नहीं सकती।

मुगल सिपाहियों ने अपने सेनापतियों के माध्यम से औरंगजेब तक संदेश भिजवाया कि सतनामी लोग माता मीनाक्षी द्वारा दिए गए ताबीज के कारण सुरक्षित हैं। उन पर तोप के गोलों और बंदूक की गोलियों का असर नहीं होगा। इस पर औरंगजेब के धूर्त मस्तिष्क में एक नया विचार आया। उसने घोषित किया कि मैं भी जिंदा पीर हूँ तथा मेरे पास भी जादुई ताकत है।

औरंगजेब ने अपने हाथ से कुरान शरीफ की आयतें लिख-लिखकर झंडों पर सिलवा दीं और सैनिकों से कहा कि अब सतनामियों के ताबीज का जादू तुम पर नहीं चलेगा। औरंगजेब का विचार काम कर गया। इन ताबीजों के कारण शाही फौजों में भी हिम्मत आ गई।

शाही सेनाओं का उत्साह बढ़ाने के लिए औरंगजेब ने अपने एक शहजादे को आदेश दिया कि वह स्वयं युद्ध के मैदान में रहकर सतनामियों का सफाया करे। शहजादा दस हजार सैनिकों एवं शाही तोपखाने के साथ सतनामियों से लड़ने आया। औरंगजेब ने युद्ध के दौरान शहजादे की रक्षा करने के लिए अपनी स्वयं की अंगरक्षक सेना भी उसके साथ कर दी ताकि शहजादा भी स्वयं को सुरक्षित अनुभव करे। राजा विष्णुसिंह तथा सेनापति हामिद खाँ को भी इस सेना के साथ भेजा गया।

दिल्ली से लगभग 16 मील की दूरी पर दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध हुआ। दोनों तरफ के हजारों सिपाही मारे गए जिनमें से सतनामियों की संख्या पांच हजार थी। अंत में शाही सेना द्वारा सतनामियों का पूरी तरह सफाया कर दिया गया तथा नारनौल पर कब्जा कर लिया गया। 

चूंकि मैदान छोड़ कर भागना सतनामियों के उसूलों के खिलाफ था। इसलिए वे आखिरी दम तक लड़ते रहे, जब तक कि मुगल फौजों ने उनकी बोटी-बोटी नहीं काट डाली। मुगलों की तरफ के दो सौ बड़े अफसर मारे गए तथा शाही फौज का काफी बड़ा हिस्सा लड़ाई में खप गया। राजा विष्णु सिंह कछवाहे का हाथी युद्ध के दौरान बुरी तरह घायल हो गया किंतु विष्णुसिंह स्वयं बच गया।

सतनामियों के इस विद्रोह के बाद मथुरा और आगरा के जाट भी अधिक उग्र हो गए। वे वीर गोकुला के बलिदान का बदला लेने के लिए पहले से ही उत्सुक थे। अब तो सतनामियों का आंदोलन भी जाटों के सामने एक मिसाल बन गया। माना जाता है कि भारत में चल रहे भक्ति आंदोलन ने भारत वासियों के मन में न्याय और स्वाभिमान की भावना जाग्रत की थी। उसी भावना के चलते मुगलों को स्थान-स्थान पर हिंदुओं का सामना करना पड़ रहा था।

सतनामी लोग प्रायः समाज के दबे और कुचले हुए लोग थे। उनमें इतनी शक्ति नहीं थी कि वे औरंगजेब जैसे प्रबल बादशाह के विरुद्ध उठ खड़े होते किंतु संत रैदास तथा उनके शिष्यों द्वारा दिए गए भगवद्भक्ति के मंत्र ने इन लोगों को इतना साहस प्रदान किया कि वे भारतीय इतिहास का अमिट हिस्सा बन गए। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिक्ख गुरुओं की हत्या (70)

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सिक्ख गुरुओं की हत्या

सिक्ख गुरुओं की हत्या मुगलों के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। लाल किले की सत्ता ने गुरु अर्जुन देव और गुरु तेग बहादुर की तो हत्या की ही, बाद में बंदा बैरागी को भी यातनाएं देकर मार डाला!

बाबर ने लोदियों से, हुमायूँ ने सिकन्दरशाह सूरी से और अकबर ने हेमचंद्र विक्रमादित्य से दिल्ली छीनकर तीन बार भारत में मुगल सल्तनत की स्थापना की थी। इसके बाद अकबर के समय में मुगल सल्तनत के विस्तार का कार्य आरम्भ हुआ। इसके लिए मुगलों को राजपूतों, जाटों, सिक्खों, मराठों, बुंदेलों तथा दक्षिण के शिया राजपूतों आदि शक्तियों से दीर्घकालीन संघर्ष करना पड़ा।

अकबर ने सबसे पहले राजपूतों को छल-बल और प्रेम के जाल में फंसा कर अपने अधीन किया तथा उनसे ही मुगल सल्तनत का विस्तार करवाया। राजपूतों के सम्बन्ध में यह नीति जहांगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में भी बनी रही। जाटों के दमन का काम शाहजहाँ के काल में आरम्भ हुआ जिसे औरंगजेब ने चरम पर पहुंचा दिया।

मराठों से मुगलों की शत्रुता औरंगजेब के समय उत्पन्न हुई किंतु सिक्खों से मुगलों की दुश्मनी जहांगीर के काल में ही पैदा हो गई थी। इस दुश्मनी के कारण मुगलों ने सिक्ख गुरुओं की हत्या करने में भी संकोच नहीं किया।

यह दुश्मनी सिक्खों द्वारा जहांगीर के बड़े पुत्र खुसरो को शरण देने के कारण उत्पन्न हुई थी। जहांगीर की बुरी आदतों से तंग आकर अकबर अपने बाद जहांगीर के पुत्र खुसरो को बादशाह बनाना चाहता था किंतु जब जहांगीर ने अंतिम सांसें गिन रहे अकबर के कमरे में जाकर हुमायूँ की तलवार और अकबर की पगड़ी उठा ली तो अकबर ने जहांगीर को ही बादशाह बना दिया। इस पर जहाँगीर का पुत्र खुसरो डर गया और फतहपुर सीकरी से भाग कर सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुनदेव की शरण में चला गया।

गुरु अर्जुनदेव ने खुसरो को पांच हजार रुपए दिए ताकि वह अपने लिए एक सेना खड़ी कर सके। जहाँगीर को इस बात का पता लगा तो उसने गुरु अर्जुनदेव को लाहौर बुलवाया। जहांगीर, गुरु अर्जुनेदेव के उपदेशों को पसन्द नहीं करता था तथा उनके उपदेशों को कुफ्र समझता था। इसलिए जहांगीर ने गुरु पर दो लाख रुपयों का जुर्माना लगाया तथा उन्हें आज्ञा दी कि आदि ग्रंथ में से वे समस्त पंक्तियाँ निकाल दें जिनसे इस्लाम के सिद्धांतों का थोड़ा भी विरोध होता है। अब इस ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब कहा जाता है।

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गुरु अर्जुनदेव ने बादशाह की इन दोनों आज्ञाओं को मानने से इन्कार कर दिया। इस पर जहाँगीर ने गुरु अर्जुनदेव पर आमानुषिक अत्याचार करवाए। उन पर जलती हुई रेत डाली गई, उन्हें जलती हुई लाल कड़ाही में बैठाया गया और उन्हें उबलते हुए गर्म जल से नहलाया गया। इससे गुरु अर्जुनदेव के शरीर की चमड़ी बुरी तरह जल गई। गुरु ने समस्त उत्पीड़न सहन कर लिया तथा इस दौरान वे परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहते रहे- ‘तेरा कीआ मीठा लागे, हरि नामु पदारथ नानक मांगे।’

बुरी तरह जलाए जाने के बाद अर्जुनदेव को एक कोठरी में डाल दिया गया। अगली सुबह उन्होंने मुगल अधिकारियों से कहा कि वे रावी नदी में स्नान करना चाहते हैं। जिस आदमी के शरीर की चमड़ी पूरी तरह जल जाती है, वह ठण्डे जल का स्पर्श नहीं कर सकता। इसलिए मुगल सैनिकों ने इसे भी उत्पीड़न का एक तरीका माना और वे गुरु अर्जुनदेव को रावी नदी के तट पर ले गए। शरीर की अदम्य पीड़ा के साथ गुरु अर्जुनदेव नदी में उतरे और नदी के तल में जाकर उन्होंने समाधि ले ली। वे नदी से जीवित बाहर नहीं निकाले जा सके। अपने अंतिम समय में भी उन्होंने हरि स्मरण जारी रखा।

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इस प्रकार ई.1606 में गुरु अर्जुनदेव की हत्या हो जाने के बाद सिक्खों का इतिहास पूरी तरह से बदल गया। अब वे भजन-कीर्तन करने वाले शांत लोग नहीं रहे, अपितु अपने सिद्धांतों के लिए लड़-मरने वाले समूहों में संगठित होने लगे। वे अवसर मिलते ही मुगलों को क्षति पहुंचाने का प्रयास करते थे। गुरु अर्जुनदेव के बाद छठे गुरु हरगोविन्द हुए। गुरु अर्जुनदेव के साथ जो अमानुषिक अत्याचार हुए, उससे सिक्खों में नई जागृति उत्पन्न हुई। वे समझ गए कि केवल जप और माला से धर्म की रक्षा नहीं की जा सकती। इसके लिए तलवार भी धारण करनी चाहिए और उसके पीछे राज्य-बल भी होना चाहिए। इसलिए गुरु हरगोविन्द ने अपनी सेली अर्थात् चोला फाड़कर गुरुद्वारे में डाल दिया और शरीर पर राजा और योद्धा के परिधान धारण कर लिए।

यहीं से सिक्ख-पंथ की प्रेम और भक्ति की परम्परा ने सैनिक चोला पहना। गुरु हरगोविन्द ने माला और कण्ठी के बजाय दो तलवारें रखनी शुरू कीं, एक आध्यात्मिक शक्ति की प्रतीक के रूप में और दूसरी लौकिक प्रभुत्व के प्रतीक के रूप में।

उन्होंने समस्त ‘मज्झियों’ के ‘मसण्डों’ अर्थात् धर्म प्रचारकों को आदेश दिया कि अब भक्तजन, गुरुद्वारे में चढ़ाने के लिए द्रव्य नहीं भेजें अपितु अश्व और अस्त्र-शस्त्र भेजें। उन्होंने पाँच सौ सिक्खों की एक फौज तैयार की और उन्हें सौ-सौ सिपाहियों के दस्तों में संगठित किया। उन्होंने अमृतसर में लोहागढ़ का किला बनवाया तथा लौकिक कार्यों की देख-रेख के लिए हर मन्दिर के सामने अकाल तख्त स्थापित किया।

गुरु हरगोविन्द के समय सिक्खों और मुगलों में तीन बड़ी लड़ाइयाँ हुई और हर लड़ाई में मुगलों को मुँह की खानी पड़ी। इससे सिक्खों की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और समस्त हिन्दू एवं सिक्ख समाज उन्हें धर्म और संस्कृति के रक्षक के रूप में देखने लगा। सिक्खों की संख्या बढ़ाने को प्रायः यह परम्परा चल पड़ी कि हर हिन्दू परिवार अपने ज्येष्ठ पुत्र को गुरु की शरण में समर्पित कर दे। आज भी पंजाब में ऐसे हिन्दू परिवार हैं जिनका एक सदस्य अनिवार्य रूप से सिक्ख होता है।

शाहजहाँ के समय में सिक्खों और मुगलों की दुश्मनी ने नए चरण में प्रवेश किया। ई.1628 में शाहजहाँ, अमृतसर के निकट आखेट खेल रहा था। उसका एक बाज गुरु हरगोविन्द के डेरे में चला गया। जब बादशाह के सिपाहियों ने सिक्खों से बाज लौटाने की मांग की तो सिक्खों ने शरण में आए हुए बाज को लौटाने से मना कर दिया। इस पर बादशाह की सेना ने सिक्खों पर आक्रमण कर दिया परन्तु गुरु हरगोविन्द के नेतृत्व में सिक्खों ने मुगल सेना को मार भगाया। इस पर मुगल सेनापति वजीर खाँ तथा गुरु के अन्य शुभचिंतकों ने बादशाह के क्रोध को शान्त किया।

कुछ समय बाद गुरु हरगोविंद ने पंजाब में व्यास नदी के किनारे एक नए नगर का निर्माण आरम्भ किया जो आगे चल कर श्री हरगोविन्दपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पंजाब के मध्य में इस नगर का निर्माण मुगल सल्तनत के लिए हितकर नहीं समझा गया। इसलिए बादशाह ने गुरु को आदेश दिया कि वे नगर का निर्माण नहीं करें किंतु सिक्खों ने इस आदेश की उपेक्षा करके नगर का निर्माण पूर्ववत् जारी रखा। सिक्खों के विरुद्ध पुनः एक सेना भेजी गई जिसे गुरु हरगोविंद के सिक्खों ने मार भगाया। इस बार पुनः मामला किसी तरह शांत किया गया।

गुरु हरगोविंद का मुगलों के साथ तीसरा संघर्ष एक चोरी के कारण हुआ। बिधीचन्द्र नामक एक कुख्यात डाकू गुरु हरगोविंद का परम भक्त था। उसने शाही अस्तबल से दो घोड़े चुराकर गुरु को भेंट कर दिए। गुरु ने अनजाने में वे घोड़े स्वीकार कर लिए। इसलिए ई.1631 में एक प्रबल मुगल सेना गुरु हरगोविंद के विरुद्ध भेजी गई परन्तु गुरु की सेना ने उसे भी खदेड़ दिया। इसके बाद सिक्खों ने पंजाब में सात मस्जिदों पर अधिकार जमा लिया तथा उन्हें अपने काम में लेने लगे। शाहजहाँ ने सेना भेजकर उन्हें मस्जिदों से बाहर निकाला।

जिस समय औरंगजेब मुगलों के तख्त पर बैठा उस समय सातवें गुरु हरराय सिक्खों का नेतृत्व कर रहे थे। गुरु हरराय की भी औरंगजेब से नहीं बनी किंतु उनके समय में मुगलों से कोई लड़ाई नहीं हुई और सिक्ख धर्म के संगठन का काम जारी रहा। आठवें गुरु हरकिशन के समय भी सिक्ख धर्म के संगठन का कार्य निरंतर चलता रहा।

गुरु हरकिशन के बाद ई.1664 में गुरु तेग बहादुर सिक्ख धर्म के नौवें गुरु बने। उस समय औरंगजेब का दमन-चक्र जोरों पर था। हिन्दुओं से बलपूर्वक इस्लाम स्वीकार करवाया जा रहा था। औरंगजेब ने हिन्दुओं के मन्दिरों की भाँति सिक्खों के गुरुद्वारों को भी तुड़वाना आरम्भ कर दिया। इस पर गुरु तेगबहादुर ने विद्रोह का झण्डा बुलंद किया। जब कश्मीर के कुछ पण्डितों को इस्लाम ग्रहण करने के लिए मजबूर किया गया तो कुछ कश्मीरी पण्डित आनन्दपुर आकर गुरु तेग बहादुर से मिले।

गुरु ने कहा- ‘किसी महापुरुष के बलिदान के बिना धर्म की रक्षा असम्भव है।’

उस समय उनके पुत्र गोविन्दसिंह पास ही खड़े थे। उन्होंने कहा- ‘पिताजी, आपसे बढ़कर दूसरा महापुरुष कौन होगा?’

गुरु तेगबहादुर को यह परामर्श उचित लगा। उन्होंने कश्मीरी पंडितों से कहा कि औरंगजेब को समाचार भेज दो कि यदि तेग बहादुर इस्लाम स्वीकार कर ले तो समस्त हिन्दू खुशी-खुशी मुसलमान बन जाएंगे। औरंगजेब ने गुरु तेगबहादुर को अपने दरबार में बुलवाया। जब गुरु तेगबहादुर औरंगजेब से मिलने गए तो औरंगजेब ने उनसे कहा कि वे इस्लाम स्वीकार करें।

गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया। इस पर 11 नवम्बर 1675 को दिल्ली के चाँदनी चौक में काज़ी ने फ़तवा पढ़ा और जल्लाद जलालदीन ने तलवार से गुरु तेग बहादुर का शीश धड़ से अलग कर दिया। गुरु तेगबहादुर के बलिदान से सिक्खों की क्रोधाग्नि और अधिक भड़क उठी।

सिक्ख गुरुओं की हत्या से केवल सिक्ख जाति ही मुसलमानों की शत्रु नहीं बनी अपितु पूरा हिन्दू समाज और भारत माता इन महान गुरुओं के बलिदान से दुखी और विक्षुब्ध हुआ। सिक्ख गुरुओं की हत्या भी उन कारणों में शामिल थी जिनके कारण मुगलों का राज्य तेजी से पतन की ओर चला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नेताजी पाल्कर

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नेताजी पाल्कर

औरंगजेब ने नेताजी पाल्कर को जबर्दस्ती मुसलमान बनाकर उसका नाम कुली खाँ रखा किंतु कई साल बाद मौका मिलते ही वह फिर से हिन्दू धर्म में लौट आया। लाल किले को धता बताकर नेताजी पाल्कर फिर से हिन्दू बन गया!

ईस्वी 1976 में घटित यह अद्भुत ऐतिहासिक घटना छत्रपति शिवाजी के साथी नेताजी पाल्कर से सम्बन्धित है जिसे छत्रपति शिवाजी के जीवन काल में ही द्वितीय शिवाजी कहा जाता था किंतु वह लाल किले के षड़यंत्रों में फंसकर मुसलमान हो गया था और औरंगजेब ने उसका नाम मुहम्मद कुली खाँ रखा था। इस ऐतिहासिक घटना की पृष्ठभूमि जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा।

10 नवम्बर 1659 को जब छत्रपति शिवाजी ने बीजापुर के सेनापति अफजल खाँ का वध किया था तो शिवाजी के दो सेनापति नेताजी पाल्कर तथा तथा पेशवा मोरोपंत भी अपने कुछ सैनिकों को लेकर शिवाजी के साथ बीहड़ जंगल में गए थे जहाँ शिवाजी की अफजल खाँ से भेंट होनी तय थी।

जब भेंट के दौरान अफजल खाँ ने शिवाजी को मारने की चेष्टा की तो शिवाजी ने ही शेर की तरह उछल कर अफजल खाँ को मार डाला। इस पर बीजापुर की मुस्लिम सेना ने शिवाजी को वहीं पर घेर लिया। शिवाजी के अंगरक्षक तानाजी मलसुरे तथा जीवमहला बड़ी बहादुरी से शिवाजी की रक्षा करने लगे।

पलक झपकते ही नेताजी पाल्कर और पेशवा मोरोपंत झाड़ियों से निकल आए और अपने प्राणों की बाजी लगाकर शिवाजी को वहाँ से निकाल ले गए। इस घटना के बाद नेताजी पाल्कर हर समय शिवाजी की छाया बनकर उनके साथ रहने लगा। वह इतना बहादुर था कि उसे महाराष्ट्र में द्वितीय शिवाजी कहा जाने लगा।

दुर्भाग्य से जब 11 जून 1665 को मिर्जाराजा जयसिंह एवं शिवाजी में पुरंदर की संधि हुई तब शिवाजी एवं नेताजी पाल्कर में मतभेद हो गया और नेताजी पाल्कर शिवाजी का साथ छोड़कर बीजापुर की सेना में भर्ती हो गया। मिर्जाराजा जयसिंह नहीं चाहता था कि नेताजी पाल्कर बीजापुर की सेवा में रहे। इसलिए मिर्जाराजा ने नेताजी पाल्कर को बहुत सारा धन देकर अपने पक्ष में मिला लिया। इस प्रकार नेताजी पाल्कर शिवाजी का सहायक न रहकर मुगलों का सेनापति हो गया।

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जब छत्रपति शिवाजी आगरा से निकल भागे तो औरंगजेब ने शिवाजी का मनोबल तोड़ने के लिए एक खतरनाक योजना बनाई। उसने मिर्जाराजा जयसिंह को लिखा कि वह शिवाजी के पूर्व साथी नेताजी पाल्कर को बंदी बनाकर दिल्ली भेज दे। औरंगजेब का आदेश पाकर जयसिंह ने नेताजी पाल्कर को छल से बंदी बना लिया और उसे दिल्ली भेज दिया।

जब नेताजी पाल्कर को औरंगजेब के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो औरंगजेब ने उससे कहा कि या तो वह मुसलमान बनकर मुगल सल्तनत की सेवा करे या फिर मृत्यु का वरण करे। नेताजी पाल्कर ने मुसलमान होना स्वीकार किया। औरंगजेब ने एक मुस्लिम युवती का पाल्कर के साथ विवाह करा दिया तथा पाल्कर को अफगानिस्तान युद्ध में भेज दिया।

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नेताजी पाल्कर 8 साल तक मुगलों के लिए लड़ता रहा और औरंगजेब की कृपा प्राप्त करता रहा। जब औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह से दक्खिन की सूबेदारी छीनकर शहजादे मुअज्जम को वहाँ का सूबेदार बनाया तो जोधपुर नरेश जसवंतसिंह को भी अपनी सेना के साथ दक्खिन के मोर्चे पर भेजा गया।

जब मुअज्जम, जसंवतसिंह एवं दिलेर खाँ को शिवाजी के विरुद्ध कोई सफलता नहीं मिली तो औरंगजेब को नेताजी पाल्कर की याद आई जो पिछले आठ सालों से मुहम्मद कुली खाँ के नाम से अफगानिस्तान के मोर्चे पर लड़ रहा था।

औरंगजेब ने मुहम्मद कुली खाँ को शिवाजी के विरुद्ध झौंकने का निर्णय लिया। औरंगजेब कभी किसी हिन्दू राजा का विश्वास नहीं करता था। जो लोग बादशाह के दबाव में हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान बन जाते थे, उनकी विश्वसनीयता भी संदिग्ध होती थी। इस दृष्टि से औरंगजेब को मुहम्मद कुली खाँ पर विश्वास नहीं करना चाहिए था किंतु अब औरंगजेब के पास शिवाजी से लड़ने के लिए कोई ऐसा सेनापति ही नहीं बचा था जो शिवाजी के मुकाबले में टिक सके।

मुहम्मद कुली खाँ को शिवाजी के राज्य की भौगोलिक एवं सामरिक परिस्थितियों की पूरी जानकारी थी। इतना ही नहीं, औरंगजेब जानता था कि केवल मुहम्मद कुली खाँ ही यह पूर्वानुमान लगा सकता था कि शिवाजी किन परिस्थितियों में क्या निर्णय लेगा!

इसलिए औंरगजेब ने दिलेर खाँ को दक्खिन का फौजदार नियुक्त किया तथा मुहम्मद कुली खाँ को उसके साथ दक्षिण के मोर्चे पर भेज दिया। दिलेर खाँ पहले भी बरसों तक दक्षिण में सेवाएं दे चुका था तथा उसे शिवाजी से लड़ने का लम्बा अनुभव था। इन दोनों मुगल सेनापतियों ने शिवाजी की राजधानी सतारा के निकट अपना डेरा जमाया।

औरंगजेब को पूरा विश्वास था कि शहजादा मुअज्जम, महाराजा जसवंतसिंह, फौजदार दिलेर खाँ और मुहम्मद कुली खाँ जैसे चार प्रबल सेनापति मिलकर छत्रपति शिवाजी को पकड़ लेंगे या मार डालेंगे किंतु औरंगजेब का दुर्भाग्य उससे दो कदम आगे चल रहा था।

जब मुहम्मद कुली खाँ को बादशाह की तरफ से यह प्रस्ताव मिला कि वह शिवाजी से लड़ने के लिए दक्खिन जाए तो मुहम्मद कुली खाँ उर्फ नेताजी पालकर अत्यंत खुशी से दक्खिन के मोर्चे पर जाने को तैयार हो गया। उसे अफगानिस्तान में लड़ते हुए आठ साल बीत चुके थे और अब वह अपने देश लौट जाना चाहता था। इसके साथ ही उसके मन में एक और योजना चल रही थी जिसके बारे में उसने किसी को भनक तक नहीं लगने दी।

मुहम्मद कुली खाँ केवल अपने देश ही नहीं लौटना चाहता था अपितु वह फिर से अपने धर्म में, अपने परिवार में और छत्रपति शिवाजी की शरण में लौट जाने को आतुर था। इन सब बातों के लिए यह अच्छा अवसर था कि औरंगजेब स्वयं ही उसे दक्खिन के मोर्चे पर भेज रहा था।

जब दिलेर खाँ और मुहम्मद कुली खाँ ने सतारा के पास अपने डेरे गाढ़े तो उन दिनों छत्रपति शिवाजी सतारा में ही थे। एक दिन मुहम्मद कुली खाँ अचानक मुगल डेरे से भाग निकला और सीधा अपने पुराने स्वामी छत्रपति शिवाजी की शरण में जा पहुँचा। उसने छत्रपति से अनुरोध किया कि मेरी शुद्धि करवाकर मुझे फिर से हिन्दू बनाया जाए। शिवाजी ने अपने पुराने साथी के सारे अपराध एवं सारी गलतियां क्षमा कर दीं और उसे फिर से हिन्दू धर्म में लेने की व्यवस्थाएं कीं।

इस प्रकार छत्रपति की कृपा से 19 जून 1676 को नेताजी पाल्कर फिर से हिन्दू धर्म में प्रविष्ट हो गया। इसके बाद वह आजीवन शिवाजी एवं संभाजी की सेवा करता रहा। इस प्रकार छत्रपति के विरुद्ध औरंगजेब का यह वार भी खाली चला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब की औलादें

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औरंगजेब की औलादें

औरंगजेब की औलादें जेलों में सड़-सड़ कर मरीं, जो जीवित बचीं वे आपस में कट-कट कर मरीं। औरंगजेब ने अपनी जिंदगी तो नर्क बना ही रखी थी, औरंगजेब की औलादें भी नर्क जैसी पीड़ा भोग कर मरीं। शहजादा मुहम्मद सुल्तान सलीमगढ़ की जेल में मर गया!

औरंगजेब के पांच पुत्र थे मुहम्मद सुल्तान, मुअज्जमशाह, (बहादुरशाह प्रथम), आजम शाह, मुहम्मद अकबर तथा मुहम्मद कामबख्श। औरंगजेब के पांचों पुत्र परम दुर्भाग्यशाली सिद्ध हुए। संभवतः उन्हें अपने पिता के पापों का फल भोगना पड़ा! औरंगजेब ने बादशाह बनते ही सबसे बड़े शहजादे मुहम्मद सुल्तान को जेल में डाल दिया। वह 16 साल तक जेल में सड़ता रहा और अंत में जेल में ही मरा।

औरंगजेब का दूसरा पुत्र मुहम्मद मुअज्जम शाह भी सात सालों तक औरंगजेब की जेल में रहा और औरंगजेब की मृत्यु के बाद 64 वर्ष की आयु में केवल पांच साल के लिए बादशाह बना।

औरंगजेब का तीसरा पुत्र आजम, औरंगजेब की मृत्यु के बाद अपने बड़े भाई मुअज्जम द्वारा मार डाला गया। औरंगजेब का चौथा पुत्र मुहम्मद अकबर, अपने बाप औरंगजेब का विद्रोही होकर ईरान भाग गया। उसके बच्चों को राजपूतों ने पाला। औरंगजेब का पांचवा पुत्र कामबख्श अपने बड़े भाई मुअज्जम से हुए युद्ध में रणभूमि में ही मारा गया। औरंगजेब की औलादें अपनी किस्मत खून और आंसुओं से लिखवाकर लाई थीं।

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औरंगजेब की पांच पुत्रियां थीं- जेबउन्निसा, जीनतउन्निसा, बदरउन्निसा, जब्दतउन्निसा तथा मेहरउन्निसा। ये पांचों भी बड़ी दुर्भाग्यशाली निकलीं। सबसे बड़ी शहजादी जेबुन्निसा को औरंगजेब ने बादशाह बनने के कुछ साल बाद जेल में डाल दिया और वह भी 20 साल तक जेल में रही और जेल में ही मरी।

औरंगजेब की औलादें अपनी इच्छा से विवाह भी नहीं कर सकती थीं। उनमें से प्रत्येक को केवल उसी मुगल शहजादे या शहजादी से विवाह करने की छूट थी, जिसकी आज्ञा औरंगजेब देता था। औरंगजेब की दूसरी पुत्री जीनतउन्निसा ने शिवाजी के पुत्र संभाजी से विवाह करना चाहा किंतु औरंगजेब ने संभाजी के टुकड़े करवा दिए। इसलिए वह आजीवन अविवाहित रही।

औरंगजेब की तीसरी पुत्री बदरउन्निसा केवल 22 वर्ष की आयु में अविवाहित अवस्था में ही मर गई। चौथी पुत्री जुब्दतन्निसा अपने ताउ दारा शिकोह के तीसरे पुत्र सिपहर शिकोह से ब्याही गई थी। वह 55 साल की आयु में निःसंतान ही मृत्यु को प्राप्त हुई।

हालांकि उसके एक पुत्र हुआ था जो छः माह की आयु में ही मर गया था। औरंगजेब की पांचवी शहदाजी मेहरउन्निसा का विवाह अपने चाचा मुरादबक्श के पुत्र इज्जाद बक्श मिर्जा से हुआ था। वह केवल 44 वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त हुई। उसका पति भी उसके साथ मरा।

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इस कड़ी में हम औरंगजेब के सबसे बड़े पुत्र मुहम्मद सुल्तान के दुर्भाग्यपूर्ण जीवन के बारे में बताने जा रहे हैं। औरंगजेब के सबसे बड़े पुत्र मुहम्मद सुल्तान का जन्म 30 दिसम्बर 1639 को औरंगजेब की दूसरे नम्बर की बेगम नवाब बाई के पेट से हुआ था। मुहम्मद शाह का पहला विवाह गोलकुण्डा तथा हैदराबाद के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह की पुत्री से हुआ। इस विवाह के पीछे बड़ा रोचक घटनाक्रम जुड़ा हुआ है।

हुआ यह कि ई.1656 में जब औरंगजेब दक्खिन का सूबेदार था, उसने गोलकुण्डा के शासक अब्दुल्ला कुतुबशाह को बंदी बना लिया। इस पर अब्दुल्ला कुतुबशाह की माता हयात बक्शी बेगम औरंगजेब से मिलने के लिए उसके शिविर में आई। उसने औरंगजेब को एक करोड़ रुपए दिए तथा एक पौत्री का विवाह औरंगजेब के बड़े शहजादे से करने का वचन दिया।

अब्दुल्ला कुतुब शाह के कोई पुत्र नहीं था, इसलिए अब्दुल्ला कुतुब शाह ने घोषणा की कि यदि औरंगजेब अपने बेटे का विवाह शाह की बेटी से करवाता है तो औरंगजेब के बेटे को ही गोलकुण्डा राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया जाएगा।

औरंगजेब ने ये सारी शर्तें अपने पिता शाहजहाँ के पास मंजूरी के लिए भिजवा दीं। शाहजहाँ ने अब्दुल्ला कुतुब शाह तथा उसकी माता द्वारा किए गए प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार औरंगजेब के बड़े पुत्र मुहम्मद सुल्तान का पहला विवाह अब्दुल्ला कुतुब शाह की पुत्री के साथ हो गया।

मुहम्मद सुल्तान का दूसरा विवाह अपने ताऊ शाहशुजा की पुत्री गुलरुख बानो से हुआ था जो कि बंगाल का सूबेदार था। इस विवाह के पीछे भी एक बड़ा राजनीतिक कारण था। हम पहले चर्चा कर चुके हैं कि शाहजहाँ के चारों पुत्र शाहजहाँ को तख्त से हटाकर स्वयं बादशाह बनना चाहते थे।

इस कारण चारों शहजादे एक दूसरे से घृणा करते थे किंतु जब यह लगने लगा कि बड़ा शहजादा दारा शिकोह आगरा के तख्त पर अधिकार कर लेगा तो शेष तीनों भाइयों ने मिलकर दारा के विरुद्ध एक संघ बना लिया।

इसी दौरान शाहशुजा तथा औरंगजेब ने एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहने का दिखावा करने के लिए अपने बच्चों को वैवाहिक बंधन में बांधने का निश्चय किया। इस क्रम में शाहशुजा की पुत्री गुलरुख बानो बेगम का विवाह औरंगजेब के सबसे बड़े पुत्र सुल्तान मुहम्मद से कर दिया गया। इस शहजादी को इतिहास में माह खानम के नाम से भी जाना जाता है।

ई.1657 में जब औरंगजेब तथा उसके भाईयों के बीच उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तो शाहशुजा ने अपनी पुत्री गुलरुख बानो के हाथों अपने जवांई मुहम्मद सुल्तान को संदेश भेजा कि यदि वह शाहशुजा के पक्ष में आ जाए तो शाहजहाँ को हटाने के बाद मुहम्मद सुल्तान को ही बादशाह बना दिया जाएगा।

इस कारण 18 जून 1659 की रात को सुल्तान मुहम्मद बहुत बड़ी संख्या में सोने के सिक्के, आभूषण तथा अपने पांच नौकरों को लेकर अपने पिता औरंगजेब के कैम्प से निकल गया और चुपके से अपने श्वसुर शाहशुजा के कैम्प में पहुंच गया।

जब शाहशुजा पराजित होकर अराकान भाग गया तो 20 फरवरी 1660 को शहजादा सुल्तान मुहम्मद फिर से अपने पिता औरंगजेब के पास आ गया। जबकि उसकी बेगम गुलरुख बानो अपने पिता शाहशुजा के साथ अराकान के जंगलों में जंगली लोगों द्वारा मार दी गई। 8 मई 1660 को औरंगजेब ने अपने पुत्र मुहम्मद सुल्तान को दिल्ली के सलीमगढ़ दुर्ग में बंदी बना लिया।

छः माह बाद मुहम्मद सुल्तान को ग्वालियर दुर्ग में स्थानांतरित कर दिया गया। दिसम्बर 1672 तक मुहम्मद सुल्तान ग्वालियर के दुर्ग में बंद रहा तथा बाद में उसे पुनः सलीमगढ़ में लाकर बंद कर दिया गया। 14 दिसम्बर 1676 को सलीमगढ़ के बंदीगृह में ही मुहम्मद सुल्तान की मृत्यु हुई। इस प्रकार मुहम्मद सुल्तान को उसके दो श्वसुरों ने बादशाह बनाने का सपना दिखाया किंतु उसके अपने पिता ने उसे आजीवन कारावास देकर मृत्यु के मुख में धकेल दिया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यूसुफजइयों के कबीले

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यूसुफजइयों के कबीले

अफगानिस्तान के पहाड़ी प्रदेशों में कबाइली जाति निवास करती थी। अफगानिस्तान के पहाड़ी प्रदेशों में कबाइली जाति निवास करती थी। इनमें यूसुफजइयों के कबीले बड़े दुर्दान्त, लड़ाकू एवं क्रूर थे। वे प्रायः आसपास के मैदानों पर धावा बोलते थे और लूटमार करके भाग जाते थे।

अफगानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र में कृषि योग्य भूमि का अभाव होने तथा रोजगार का कोई अन्य साधन नहीं होने से, वहाँ के लोग बड़े लड़ाकू एवं असभ्य होते थे। जब भारत के व्यापारी अपना माल लेकर पहाड़ी दर्रों से जाने का प्रयास करते थे तब कबाइली लड़ाके, भारतीय व्यापारियों पर धावा करके उनका माल लूट लेते थे।

यूसुफजइयों के कबीले इतने अविश्वसनीय, उद्दण्ड तथा अनुशासनहीन थे कि उन्हें मुगल एवं ईरानी सेनाओं में भी भर्ती नहीं किया जाता था। भारत के सीमावर्ती प्रदेशों के शासक प्रायः इनके मुखियाओं को रिश्वत देकर शांत रखा करते थे। मुगलों ने कई बार अफगान लुटेरों पर रोक लगाने के प्रयास किये थे किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। शाहजहाँ ने किशनगढ़ नरेश रूपसिंह राठौड़ को अफगानिस्तान के क्षेत्र में नियुक्त कर रखा था।

जब तक महाराजा रूपसिंह जीवित रहा, तब तक बल्ख तथा बदख्शां की पहाड़ियां कबायलियों एवं उजबेकों के खून से तर रहीं किंतु जब ई.1658 में शामूगढ़ के मैदान में महाराजा रूपसिंह औरंगजेब के हाथी की अम्बारी की रस्सी काटता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ तब से मुगल सल्तनत में, अफगानिस्तान को नियंत्रण में रखने वाला कोई हिन्दू राजा या मुस्लिम अमीर नहीं रहा।

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इस कारण कबायलियों एवं उजबेकों ने फिर से सिर उठाना आरम्भ कर दिया। ईस्वी 1667 में कई हजार युसुफजई लुटेरों ने भागू नामक मुखिया के नेतृत्व में एकत्रित होकर सिंधु नदी पार की तथा अटक से लेकर पेशावर तक के क्षेत्रों में लूटमार करने लगे। औरंगजेब ने युसुफजई लुटेरों को खदेड़ने के लिये तीन सेनाएँ भेजीं। इन सेनाओं ने अफगान लुटेरों का दमन करके अटक से पेशावर तक शांति स्थापित की।

इस घटना के पांच साल बाद ईस्वी 1672 में आफरीदियों ने मुगलों के राज्य पर आक्रमण करके सीमांत प्रदेशों पर कब्जा कर लिया तथा उनके नेता अकमल खाँ ने स्वयं को बादशाह घोषित करके अपने नाम के सिक्के ढलवाये। अकमल खाँ ने मुगलों के विरुद्ध व्यापक युद्ध की घोषणा कर दी तथा पठानों से सहयोग मांगा। उसने खैबर घाटी को बंद कर दिया ताकि मुगलों की सेना दर्रे को पार करके उस तक नहीं पहुंच सके।

उन दिनों मुगलों की तरफ से मुहम्मद अमीन खाँ, काबुल में सूबेदार के पद पर नियुक्त था। उसने पेशावर में अपना निवास बना रखा था। वह मीर जुमला का पुत्र था। उसी ने पांच साल पहले यूसुफजइयों के कबीले के विरुद्ध सफल कार्यवाही की थी। जब उसे अकमल खाँ द्वारा की जा रही कार्यवाहियों की जानकारी मिली तो वह अपनी सेना लेकर खैबरे दर्रे के मार्ग से काबुल की ओर बढ़ा। कबाइलियों के नेता अकमल खाँ ने अली मस्जिद नामक स्थान पर मुगल सेना को घेर लिया और दस हजार मुगल सैनिकों को तलवार के घाट उतार दिया।

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इसके बाद अकमल खाँ को मौत का नंगा नाच करने से रोकने वाला कोई न रहा। अकमल खाँ बीस हजार स्त्री-पुरुषों को बंदी बनाकर मध्य एशिया के बाजारों में बेचने के लिये ले गया। इनमें से ज्यादातर जीवित बचे हुए मुगल सिपाही, उनके खानसामे और बावर्ची आदि थे। मुगल सेना को इससे पहले इतना बड़ा नुक्सान नहीं हुआ था। मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाने के लिये खटक कबीले ने भी आफरीदियों के साथ गठबन्धन कर लिया और सम्पूर्ण पश्चिमोत्तर प्रदेश उनकी चपेट में आ गया।

जब काबुल का मुगल सूबेदार मुहम्मद अमीन खाँ मारा गया तो औरंगजेब ने महाबत खाँ को अफगानिस्तान का सूबेदार नियुक्त किया। महाबत खाँ अफगानिस्तान के मोर्चे पर नहीं जाना चाहता था। वह लम्बे समय से औरंगजेब से नाराज भी चल रहा था। इसलिए वह अफगानिस्तान पहुंचकर अकमल खाँ से मिल गया तथा उसने आफरीदियों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की।

जब यह सूचना औरंगजेब को मिली तो वह सिर पीट कर रह गया। उसने शुजात खाँ को अफगानिस्तान के आफरीदियों पर आक्रमण करने के लिए भेजा। जब तक शुजात खाँ नई सेना लेकर अफगानिस्तान पहुंचता, तब तक अफगानियों ने अपनी पकड़ बहुत मजबूत बना ली। उन्होंने शुजात खाँ की सेना को पहाड़ों में घेरकर बुरी तरह काट डाला। यहाँ तक कि ई.1674 में स्वयं शुजात खाँ भी युद्ध के मैदान में बेरहमी से काट डाला गया।

औरंगजेब की सेनाएं इस समय भारत की तीनों सीमाओं पर लड़ रही थीं। औरंगजेब का मामा शाइस्ता खाँ बंगाल के मोर्चे पर था और अराकानियों एवं असमियों से लड़ रहा था जबकि उसका पुत्र मुअज्जम तथा मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह दक्खिन के मोर्चे पर लड़ रहे थे। मिर्जाराजा जयसिंह पहले ही औरंगाबाद में मृत्यु को प्राप्त हो चुका था।

भारत की तीसरी सीमा अर्थात् काबुल की तरफ औरंगजेब के दो सूबेदार मारे जा चुके थे और तीसरा सूबेदार बागी हो चुका था। इस कारण औरंगजेब के पास विश्वसनीय सेनापतियों की कमी हो गई थी। वह अफगानिस्तान की परिस्थिति से निबटने के लिए उपाय सोच ही रहा था कि उसे दक्खिन के मोर्चे से अत्यंत चिंताजनक समाचार मिला कि औरंगजेब का दूसरा शहजादा मुहम्मद मुअज्जम शाह, महाराजा जसवंतसिंह की सहायता से स्वतंत्र होने की चेष्टा कर रहा है।

इसलिए यह आवश्यक हो गया था कि महाराजा जसवंतसिंह को दक्खिन के मोर्चे से हटाकर किसी ऐसी जगह भेजा जाए जहाँ महाराजा जसवंतसिंह मुगलों के लिए युद्ध करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सके। 

अंत में औरंगजेब ने एक उपाय सोचा जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे। उसने मारवाड़ नरेश जसवन्तसिंह को दक्खिन से बुलाकर सीमांत प्रदेश की स्थिति संभालने के लिये भेज दिया तथा उस पर अंकुश रखने के लिए शाइस्ता खाँ को भी नियुक्त कर दिया जो इन दिनों बंगाल का सूबेदार था।

शाइस्ता खाँ कभी नहीं चाहता था कि उसकी नियुक्ति अफगानिस्तान में की जाए किंतु लाल किले से मिले आदेशों की पालना करने के अतिरिक्त उसके पास और कोई उपाय नहीं था। वह मन मारकर अफगानिस्तान के लिए रवाना हो गया। उधर महाराजा जसवंतसिंह पहले से ही अफगारिस्तान जाने के लिए दक्खिन का मोर्चा छोड़ चुका था।

इस प्रकार न केवल यूसुफजइयों के कबीले, अपितु आफरीदियों के कबीले भी जीवन भर औरंगजेब के लिए मुसीबत बने रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा जसवंतसिंह की रानियाँ

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महाराजा जसवंतसिंह की रानियाँ

महाराजा जसवंतसिंह की रानियाँ सम्पूर्ण मानव जाति का गौरव थीं। उनमें हिन्दू धर्म, क्षात्रत्व और वात्सल्य के जो उच्च भाव देखने को मिलते हैं, वैसे भाव इस संसार के अन्य देशों की रानियों में देखने को नहीं मिलते! उनके तेज से भयभीत औरंगजेब ने महाराजा जसवंतसिंह की रानियाँ कैद में डाल दीं।

ई.1670 में महाराजा जसवंतसिंह अफगानिस्तान के मोर्चे पर पहुंच गया। उसकी राजपूत सेना ने बड़ी बहादुरी से अफगानियों का सफाया करना आरम्भ किया तथा खैबर दर्रे को अफगानियों के चंगुल से मुक्त करवा लिया। महाराजा जसवंतसिंह के रहते हुए किसी यूसुफजई की हिम्मत नहीं थी कि वह भारतीय प्रजा को पकड़कर मध्य एशिया के देशों में बेच सके।

हालांकि यह एक विडम्बना ही थी कि ई.712 से लेकर ई.1526 तक की अवधि में मध्य एशिया एवं अफगानिस्तान से आने वाले मुस्लिम आक्रांता सदैव यही घोषित करते आए थे कि वे जेहाद पर हैं तथा भारत से कुफ्र समाप्त करके इस्लाम का प्रसार करने आए हैं किंतु अब मध्य एशिया के बाजारों में वही भारतीय बिक रहे थे जिन्होंने मध्य एशिया से आए आक्रांताओं के भय से इस्लाम स्वीकार किया था! यह एक ऐसा जेहाद था जिसे किसी भी तरह परिभाषित नहीं किया जा सकता था!

महाराजा जसवंतसिंह की सफलताओं को देखते हुए औरंगजेब ने उसे अफगानिस्तान में ही नियुक्त किए रखा तथा इस प्रकार एक-एक करके छः साल बीत गए। ई.1676 में जमरूद में जसवंतसिंह के द्वितीय पुत्र जगतसिंह का देहान्त हो गया।

महाराजा जसवंतसिंह इस सदमे को झेलने की स्थिति में नहीं था। उसका बड़ा कुंअर पृथ्वीसिंह पहले ही ई.1667 में दिल्ली में औरंगजेब की सेवा में रहते हुए चेचक की बीमारी से मर चुका था।

कर्नल टॉड ने लिखा है कि ई.1670 में महाराजा जसवंतसिंह के बड़े पुत्र महाराजकुमार पृथ्वीसिंह को औरंगजेब ने एक जहरीली पोषाक उपहार में दी जिसे पहनने से राजकुमार की दर्दनाक मृत्यु हो गई। जबकि महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा तथा पं. विश्वेश्वर नाथ रेउ ने कुंअर पृथ्वीसिंह की मृत्यु का कारण चेचक बताया है।

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जिस समय कुंअर पृथ्वीसिंह की मृत्यु हुई थी, उस समय महाराजा जसवंतसिंह ईरान के अभियान पर था तथा उसे अपने पुत्र की मौत पर शोक मनाने का अवसर भी नहीं मिला था किंतु अब जबकि दूसरे पुत्र जगतसिंह की मृत्यु हुई तो महाराजा उसी मोर्चे पर मौजूद था। अपने पुत्र का शव देखकर महाराजा टूट गया।

महाराजा का कोई और पुत्र या पौत्र जीवित नहीं था, जो महाराजा के बाद मारवाड़ राज्य का शासन संभाल सकता। इस कारण महाराजा को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा और वह बीमार पड़ गया। इसी बीमारी के चलते 28 नवम्बर 1678 को कुर्रम दर्रे के निकट जमरूद में महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया। उस समय महाराजा की आयु केवल 52 वर्ष थी।

जब महाराजा की मृत्यु का समाचार दिल्ली पहुंचा तो औरंगजेब बड़ा प्रसन्न हुआ। तारीखे मोहम्मदशाही में लिखा है कि यह समाचार सुनकर औरंगजेब ने कहा- ‘दर्वाजा ए कुफ्र शिकस्त।’ अर्थात् आज अधर्म का दरवाजा टूट गया। इस पर औरंगजेब की बेगम ने कहा- ‘इमरोज जाये दिल गिरिफ्तगीस्त के ईं चुनी रुक्ने दौलत ब शिकस्त।’ अर्थात् आज शोक का दिन है क्योंकि सल्तनत का ऐसा स्तम्भ टूट गया!

औरंगजेब महाराजा जसवंतसिंह के जीते जी तो महाराजा का कुछ नहीं बिगाड़ सका किंतु अब उसने जोधपुर राज्य को समाप्त करने का निर्णय लिया तथा उसी समय अपनी सेना जोधपुर के लिए रवाना कर दी ताकि महाराजा के राज्य पर कब्जा किया जा सके। मुगल सेना ने जोधपुर पर अधिकार करके उसे ‘खालसा’ कर लिया अर्थात् बादशाह द्वारा प्रत्यक्षतः शासित क्षेत्र घोषित कर दिया। औरंगजेब स्वयं भी अजमेर के लिए रवाना हो गया ताकि जोधपुर अभियान को निष्कंटक सम्पादित करवाया जा सके।

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महाराजा जसवंतसिंह की रानियां कुल मिलाकर थीं जिनमें से ग्यारह रानियां महाराजा के साथ जमरूद में ही थीं। जब महाराजा जसवंतसिंह की रानियाँ महाराजा के साथ सती होने लगीं, उस समय जादव रानी जसकुंवरि और रानी नरूकी गर्भवती थीं। इसलिए उन्हें सती नहीं होने दिया गया। शेष 9 रानियां और 6 खवासनें महाराजा की देह के साथ सती हो गईं। जब यह समाचार जोधपुर पहुंचा तो वहाँ जसवंतसिंह की रानी चंद्रावतजी, बीस खवासनों के साथ मण्डोर में सती हो गई।

महाराजा के निधन के बाद राठौड़ सरदार, स्वर्गीय महाराजा की विधवा रानियों को लेकर जोधपुर के लिए रवाना हुए। जब इन लोगों ने अटक नदी पार करनी चाही तो शाही हाकिम ने उन्हें यह कहकर रोकने का प्रयास किया कि उनके पास बादशाह की आज्ञा या काबुल के सूबेदार का परवाना नहीं है। इस पर राठौड़ सरदार मरने-मारने पर उतारू हो गए। अटक का हाकिम डर कर पीछे हट गया और ये लोग अटक पार करके भारत में प्रवेश कर गए। जब ये लोग लाहौर पहुंचे तो वहाँ दानों रानियों ने एक-एक पुत्र को जन्म दिया।

जब राजकुमारों के जन्म की सूचना औरंगजेब को मिली तब औरंगजेब अजमेर में था। उसके सेनापति जोधपुर राज्य पर कब्जा कर चुके थे और स्वर्गीय महाराजा की समस्त सम्पत्ति भी जब्त कर चुके थे। इसलिए औरंगजेब ने लाहौर में ठहरे हुए राठौड़ सरदारों को आदेश भिजवाए कि वे रानियों एवं राजकुमारों को लेकर दिल्ली आ जाएं। औरंगजेब स्वयं भी दिल्ली रवाना हो गया।

दोनों शिशु राजकुमारों में से छोटे राजकुमार दलथंभन की तो मार्ग में ही मृत्यु हो गई किंतु दूसरा राजकुमार अजीतसिंह अपनी माताओं के साथ सकुशल दिल्ली पहुंच गया। औरंगजेब ने इन्हें नूरगढ़ में रखने के आदेश दिए किंतु वीर दुर्गादास तथा मुकुंददास खीची ने दोनों विधवा रानियों एवं राजकुमार अजीतसिंह को किशनगढ़ महाराजा की हवेली में रखने की मांग की जो रूपसिंह राठौड़ की हवेली के नाम से जानी जाती थी। औरंगजेब ने राठौड़ों की यह मांग स्वीकार कर ली तथा इस हवेली के चारों ओर अपने सिपाही एवं गुप्तचर नियुक्त कर दिए।

राठौड़ सरदारों ने औरंगजेब से प्रार्थना की कि कुंवर अजीतसिंह को जोधपुर का राज्य लौटा दिया जाए। इस पर औरंगजेब ने जवाब दिया कि अजीतसिंह का लालन-पालन मुगल हरम में किया जाएगा तथा जब वह बड़ा हो जाएगा तो उसे मुगल सल्तनत का मनसबदार बनाकर जोधपुर का राज्य सौंप दिया जाएगा और यदि अजीतसिंह को आज ही मुसलमान बनना स्वीकार हो तो उसे तत्काल जोधपुर राज्य सौंप दिया जाएगा।

औरंगजेब के धूर्तता भरे प्रस्ताव को सुनकर राजपूत सरदारों को उसके खतरनाक इरादों का पता लग गया। अब उन्होंने बालक अजीतसिंह को दिल्ली से निकाल ले जाने की योजना बनाई। छत्रपति शिवाजी पहले ही इस तरह की एक योजना बनाकर औरंगजेब के चंगुल से निकल भागे थे। राठौड़ों ने भी उसी घटना को दोहराने का निश्चय किया।

एक दिन जोधपुर राज्य के विश्वसनीय सरदार मुकुंददास खीची ने संपेरे का वेश बनाया तथा चांदावत मोहकमसिंह की पत्नी बाघेली ने राजकुमार अजीतसिंह को गोद में ले लिया। बाघेली का पुत्र हरिसिंह भी अपनी माता के साथ हो लिया। इस तरह यह एक साधारण संपेरे का परिवार दिखाई देने लगा। ये लोग कुंवर को लेकर दिल्ली से बाहर निकल गये। औरंगजेब तथा उसके अधिकारी इसके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जान सके।

जब राठौड़ों ने बालक अजीतसिंह को मुगल हरम में भेजने से मना कर दिया तो 15 जुलाई 1679 को औरंगजेब ने दिल्ली के कोतवाल फौलाद खाँ को निर्देश दिए कि वह बालक अजीतसिंह को तत्काल पकड़कर हाजिर करे। औरंगजेब कभी किसी का विश्वास नहीं करता था, इसलिए उसने फौजदार के साथ अपने अंगरक्षक दल के मुखिया को भी बीस हजार सिपाहियों के साथ भेजा ताकि राजपूत सरदार किसी भी तरह दिल्ली से बाहर नहीं निकल सकें।

जब शाही सेना ने रूपसिंह राठौड़ की हवेली को घेर लिया तो भाटी सरदार रघुनाथसिंह ने अपने एक सौ सैनिकों के साथ मुगलों को ललकारा। देखते ही देखते दोनों पक्षों में तलवारें बजनी आरम्भ हो गईं। भाटियों का आक्रमण इतना जबर्दस्त था कि मुगल सेना में अफरा-तफरी मच गई। इस स्थिति का लाभ उठाकर स्वर्गीय जसवंतसिंह की विधवा रानियां मर्दाने कपड़े पहनकर वीर दुर्गादास के साथ राजा रूपसिंह की हवेली से बाहर निकल गईं।

भाटियों ने मुगलों को हवेली से दूर खदेड़ना शुरु किया तो मुगल सिपाही दिल्ली की तंग गलियों में दौड़कर अपनी जान बचाने लगे। दिल्ली की गलियों में खून की नदियां बह गईं। अंत में रघुनाथसिंह भाटी के सभी सिपाही वीरगति को प्राप्त हुए। जब मुगल सिपाही पुनः हवेली की तरफ आने लगे तो रणछोड़दास जोधा ने मुगलों के सिर काटने आरम्भ कर दिए। अंत में वीर जोधा भी पुण्य अर्जित करके इस लोक से चला गया।

जब मुगल सिपाही हवेली के भीतर घुसे तो उन्होंने हवेली को पूरी तरह रिक्त पाया। अब दिल्ली का फौजदार मारवाड़ की तरफ जाने वाले रास्ते पर दौड़ा किंतु उसके हाथ कुछ भी न लग सका।

स्वर्गीय महाराजा जसवंतसिंह की दोनों रानियों के सम्बन्ध में अलग-अलग ख्यातों में अलग-अलग बातें लिखी हुई हैं। कुछ ख्यातों के अनुसार राजपूत सिपाहियों के साथ पुरुष वेश में चल रही दोनों रानियों ने भी मुगलों से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की तथा उनके शरीरों को यमुनाजी को समर्पित कर दिया गया। कुछ अन्य स्रोत कहते हैं कि जब मुगल सेना का आक्रमण हुआ तो वीर दुर्गादास ने चन्द्रभाण नामक सरदार से कहा कि यदि मुगल सेना जीतने लगे तो रानियों पर लोहा कर देना अर्थात् अपने हाथों से उनकी गर्दन काट देना ताकि रानियों को मुगलों के हाथों में पड़ने से बचाया जा सके। उस समय वास्तव में क्या हुआ, यह बताने के लिए कोई भी जीवित नहीं बचा।

इस लड़ाई में औरंगजेब के पांच सौ सिपाही मारे गए जबकि वीर गति को प्राप्त होने वाले राजपूत सिपाहियों की संख्या लगभग तीन सौ थी जो राजा रूपसिंह की हवेली पर अपने राजकुमार की रक्षा के लिए तैनात थे।

 औरंगजेब को पूरा विश्वास था कि स्वर्गीय महाराजा जसवंतसिंह की रानियाँ एवं राजकुमार अजीतसिंह दिल्ली में ही कहीं पर छिपे हुए हैं। अतः घर-घर तलाशी ली गई।

दिल्ली के कोतवाल फौलाद खाँ ने औरंगजेब के कोप से बचने के लिए किसी हिन्दू के घर से एक बालक को जबर्दस्ती उठा लिया और औरंगजेब के सामने पेश करके कहा कि यही राजकुमार अजीतसिंह है। स्वर्गीय महाराजा की कुछ दासियों को भी कोतवाल ने पकड़ लिया जो दिल्ली के अलग-अलग घरों में छिपी हुई थीं। उनसे महाराजा जसवंतसिंह की रानियाँ के कुछ गहने एवं आभूषण भी बरामद किए गए।

जब बादशाह ने उन दासियों से पूछा कि क्या यही राजकुमार अजीतसिंह है, तो दासियों ने कोतवाल के भय से स्वीकार कर लिया कि यही राजकुमार है। इस पर औरंगजेब ने उस बालक की सुन्नत करवाकर उसका नाम मुहम्मदीराज रखा तथा अपनी पुत्री जेबुन्निसा को सौंप दिया ताकि मुगलिया हरम में उसकी परवरिश की जा सके। इस पर भी औरंगजेब संतुष्ट नहीं हुआ, उसने कोतवाल फौलाद खाँ को नौकरी से निकाल दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में जजिया

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भारत में जजिया

जजिया एक विशेष प्रकार का कर है जो मुस्लिम शासकों द्वारा अपनी गैर-मुस्लिम प्रजा से लिया जाता था। भारत में जजिया से प्रथम परिचय ई.712 में हुआ था जब मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध प्रदेश को जीतकर वहाँ के हिन्दुओं पर जजिया लागू किया था। लाल किले के नए मालिकों ने भी कई बार भारत में जजिया लगाया और हटाया।

इसके बाद जब ई.1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का सुल्तान बना तो उसने अपनी सल्तनत में रहने वाले हिन्दुओं पर जजिया आरोपित किया। जैसे-जैसे दिल्ली सल्तनत का प्रसार होता रहा, जजिया कर का दायरा बढ़ता रहा।

ई.1556 में जब अकबर दिल्ली और आगरा का बादशाह बना तो उसने कुछ सालों बाद हिन्दू राजाओं को अपने पक्ष में लेने के लिए हिन्दुओं पर से जजिया समाप्त कर दिया। जहांगीर और शाहजहाँ के समय में भी यही व्यवस्था बनी रही किंतु औरंगजेब यह सहन नहीं कर सकता था कि उसके राज्य में काफिर जनता बादशाह को जजिया न दे।

जब तक प्रबल हिन्दू राजा जीवित रहे, तब तक औरंगजेब जजिया लगाने का साहस नहीं कर सका किंतु जोधपुर नरेश जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब का रास्ता साफ हो गया। आम्बेर का शासक मिर्जाराजा जयसिंह पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो चुका था।

किशनगढ़ का प्रबल राजा रूपसिंह राठौड़ एवं बूंदी का प्रबल राजा छत्रसाल हाड़ा भी शामूगढ़ के मैदान में काम आ चुके थे, बीकानेर का राजा कर्णसिंह भी राज्यच्युत होकर औरंगाबाद में मृत्यु के मुख में जा चुका था। इन राजाओं के उत्तराधिकारियों में इतनी शक्ति नहीं थी कि वे औरंगजेब का विरोध कर सकें। इसलिए औरंगजेब ने 2 अप्रेल 1679 को मुगल सल्तनत की हिन्दू प्रजा पर फिर से जजिया लगा दिया।

हिन्दुओं के लिए यह अनिवार्य था कि वे यह कर अपने हाथों से कर-वसूली अधिकारी को विनम्रता पूर्वक प्रदान करें। समस्त गैर-मुस्लिम प्रजा को तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया था। तत्कालीन इतिहासकार मनूची ने लिखा है कि पहली श्रेणी वाले हिन्दू 48 दरहम, द्वितीय श्रेणी वाले हिन्दू 24 दरहम तथा तृतीय श्रेणी वाले हिन्दू 12 दरहम वार्षिक जजिया चुकाते थे।

औरंगजेब के समय में एक दरहम का मूल्य चार आने से कुछ अधिक होता था तथा एक आना चार पैसे का होता था। अर्थात् जजिया की अधिकतम राशि लगभग आठ रुपए वार्षिक तथा न्यूनतम राशि लगभग 2 रुपए वार्षिक थी।

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इन करों से बचने के लिए बहुत से हिन्दू अपना धर्म छोड़कर मुसलमान बन गए। प्रत्येक हिन्दू को प्रयाग में गंगा-स्नान करने के लिए 6 रुपए 4 आने तीर्थ-कर के रूप में देने पड़ते थे। अन्य तीर्थों पर भी उनकी महत्ता के अनुसार अगलग-अलग कर लगाया गया था।

औरंगजेब के इस निर्णय का पूरे देश में विरोध हुआ। सबसे अधिक प्रबल विरोध उसकी अपनी राजधानी दिल्ली तथा उसके निकटवर्ती प्रांतों मथुरा एवं राजस्थान में हुआ। बहुत से स्थानों पर जजिया वूसली अधिकारियों को पीटा गया तथा उनकी दाढ़ी नौंचकर उन्हें भगा दिया गया।

मथुरा में इस विद्रोह का नेतृत्व जाटों ने किया तथा राजस्थान में जाट एवं राजपूत जातियों ने मिलकर किया। कुछ स्थानों पर मस्जिदों को तोड़ दिया गया तथा उनमें नमाज पढ़ने वालों को भी भगा दिया गया। मथुरा में मंदिरों को तोड़ने वाले अधिकारी अब्दुल नबी को जाटों ने मार डाला तथा सादाबाद परगने को लूट लिया।

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जब औरंगजेब जुम्मे की नमाज पढ़ने के लिए लाल किले से जामा मस्जिद जाया करता था, तब हजारों हिन्दू उसके मार्ग में खड़े होकर उससे प्रार्थना करते थे कि भारत में जजिया हटा दिया जाए। औरंगजेब पर इन प्रार्थनाओं का कोई प्रभाव नहीं हुआ। इसलिए एक शुक्रवार को हजारों हिन्दू उस मार्ग में लेट गए जिस मार्ग से होकर बादशाह का काफिला जुम्मे की नमाज पढ़ने के लिए जामा मस्जिद जाया करता था। औरंगजेब ने अपने आदमियों से कहा कि अपने हाथियों और घोड़ों को इन लोगों के ऊपर से होकर ले जाया जाए। बादशाह के इस आदेश पर भी हिन्दू जनता सड़कों पर लेटी रही। इस कारण सैंकड़ों लोग हाथियों एवं घोड़ों के पैरों के नीचे कुचल कर मारे गए एवं बहुत से घायल हो गए। जब यह समाचार भारत के विभिन्न भागों में में फैला तो घर-घर में कोहराम मच गया।

कुफ्र हटाने के लिए औरंगजेब ने जो मार्ग चुना था, उसने भारतवासियों को तैमूर लंगड़े की याद दिला दी थी जिसने पंजाब से लेकर दिल्ली और हरिद्वार तक लाशों के ढेर लगवा दिए थे।

मध्यकाल के मुस्लिम शासकों का मानना था कि जो लोग इस्लाम को स्वीकार न करें उनके विरुद्ध जेहाद या धर्मयुद्ध किया जाये परन्तु यदि वे जजिया देने को तैयार हों तो उनकी जान बख्श दी जाये। दुनिया भर में मुस्लिम बादशाहों एवं सुल्तानों द्वारा यहूदियों तथा ईसाइयों के साथ भी यही व्यवहार किया जाता था। हिन्दुओं को जजिया से बहुत घृणा थी। इससे उन्हें अपनी गुलामी का अहसास होता था। इस कर को फिर से लगाकर औरंगजेब ने हिन्दुओं, विशेषकर राजपूतों की भावनाओं को बड़ा आघात पहुँचाया।

मराठा शासक छत्रपति शिवाजी तथा मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने औरंगजेब को कड़े पत्र लिखकर भारत में जजिया लगाने के लिए उसकी जबर्दस्त भर्त्सना की। महाराणा ने लिखा कि यदि बादशाह को गरीबी ने घेर लिया है तो सबसे पहले वह मुझसे जजिया वसूल करके दिखाए तथा उसके बाद जयपुर के कच्छवाहे रामसिंह से जजिया वसूल करे। जबकि छत्रपति शिवाजी ने लिखा कि यदि तुझे अपनी गरीबी दूर करनी है तो पहले महाराणा राजसिंह से और फिर मुझसे जजिया वसूल करके दिखाए।

यह एक आश्चर्य ही है कि छत्रपति शिवाजी तथा महाराणा राजसिंह द्वारा बादशाह को लिखे गए पत्रों की भाषा बहुत मिलती-जुलती है। इससे अनुमान होता है कि दोनों ने एक राय होकर ही औरंगजेब को ये पत्र लिखे थे। कुछ इतिहासकारों ने इन पत्रों को नकली सिद्ध करने का प्रयास किया है। यहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लिखे गए पत्र का मुख्य अंश दिया जा रहा है। महाराणा द्वारा लिखा गया पत्र भी लगभग ऐसा ही है।

छत्रपति ने यह पत्र मूलतः हिन्दी भाषा में लिखा था तथा नीला प्रभु नामक एक व्यक्ति से इस पत्र का फारसी भाषा में रूपांतरण करवाकर औरंगजेब को भेजा था। छत्रपति ने लिखा-

‘सम्राट आलमगीर की सेवा में, यह सदा मंगल कामना करने वाला शिवाजी ईश्वर के अनुग्रह तथा सम्राट की अनुकम्पा का धन्यवाद करने के बाद जो सूर्य से भी अधिक स्पष्ट है, जहांपनाह को सूचित करता है कि यद्यपि यह शुभेच्छु अपने दुर्भाग्य के कारण बिना आपकी आज्ञा लिए ही आपकी खिदमत से चला आया तथापि वह सेवक के रूप में पूरा कर्त्तव्य यथासम्भव उचित रूप में निभाने के लिए तैयार है।

हाल ही में मेरे कानों में यह बात पड़ी है कि मेरे साथ युद्ध में आपका धन समाप्त हो जाने तथा कोष खाली हो जाने के कारण आपने आदेश दिया है कि जजिया के रूप में हिन्दुओं से धन एकत्र किया जाए और उससे शाही आवश्यकताएं पूरी की जाएं।

श्रीमान्, साम्राज्य के निर्माता बादशाह अकबर ने सर्व-प्रभुता से पूरे 52 ‘चन्द्र-वर्ष’ तक राज्य किया। उन्होंने समस्त सम्प्रदायों जैसे ईसाई, यहूदी, मुसलमान, दादूपंथी, आकाश पूजक, फलकिया, अंसरिया (अर्थात् अनात्मवादी) दहरिया (अर्थात् नास्तिक), ब्राह्मण और जैन साधुओं के प्रति सार्वजनिक सामंजस्य की प्रशंसनीय नीति अपनाई थी। उनके उदार हृदय का ध्येय सभी लोगों की भलाई और रक्षा करना था, इसलिए उन्होंने जगतगुरु की उपाधि पाई।

तत्पश्चात् बादशाह जहांगीर ने 22 वर्ष तक विश्व के लोगों पर अपनी उदार छत्रछाया फैलाई। मित्रों को अपना हृदय दिया तथा काम में हाथ बंटाया और अपनी इच्छाओं की प्राप्ति की। बादशाह शाहजहाँ ने 32 चन्द्र-वर्ष तक अपनी ममतामयी छत्रछाया पृथ्वी के लोगों पर डाली। परिणाम स्वरूप अनन्त जीवन फल प्राप्त किया।

वह जो अपना नाम करता है,

चिरस्थाई धन प्राप्त करता है।

क्योंकि मृत्यु पर्यंत उसके सुकर्मों के आख्यान,

उसके नाम को जीवित रखते हैं।

किन्तु श्रीमान् के राज्य में अनेक किले और प्रदेश श्रीमान् के कब्जे से बाहर निकल गए हैं और शेष भी निकल जाएंगे। क्योंकि मैं उन्हें नष्ट और ध्वंस करने में कोई ढील नहीं डालूंगा। आपके किसान दयनीय दशा में हैं, हर गांव की उपज कम हो गई है। एक लाख की जगह केवल एक हजार और हजार की जगह केवल दस रुपए एकत्रित किए जाते हैं, और वह भी बड़ी कठिनाई से।

जब बादशाह तथा शहजादों के महलों में गरीबी और भीख ने घर कर लिया है तो सामंतों और अमीरों की दशा की कल्पना आसानी से की जा सकती है।

आपका राज्य ऐसा है जिसमें सेना में उत्तेजना है, व्यापारी वर्ग को शिकायतें हैं, मुसलमान रोते हैं, हिन्दुओं को भूना जाता है। अधिकतर लोगों को रात का भोजन नहीं मिलता और दिन में वे अपने गालों को वेदना में पीट-पीटकर सुजा लेते हैं। ऐसी शोचनीय स्थिति में आपका शाही स्वभाव किस तरह आपको जजिया लादने की इजाजत देता है।

यह बदनामी बहुत जल्दी पश्चिम से पूरब तक फैल जाएगी तथा इतिहास की किताबों में दर्ज हो जाएगी कि हिन्दुस्तान का बादशाह भिक्षा पात्र लेकर ब्राह्मणों, जैन साधुओं, योगियों, सन्यासियों, वैरागियों, दरिद्रों, भिखारियों, दीन-दुखियों तथा अकालग्रस्तों से धन वसूल करता है। अपना पराक्रम भिक्षुओं के झोलों पर आक्रमण करके दिखाता है। उसने तैमूर वंश का नाम मिट्टी में मिला दिया है।

न्याय की दृष्टि से जजिया बिल्कुल गैर-कानूनी है। राजनीतिक दृष्टि से यह तभी अनुमोदित किया जा सकता है जबकि एक सुन्दर स्त्री सोने के आभूषण पहने हुए बिना किसी डर के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जा सकती हो किंतु आजकल शहर लूटे जा रहे हैं, खुले हुए देहातों की तो बात ही क्या?

जजिया लगाना न्याय संगत नहीं है, यह केवल भारत में ही की गई सर्जना है और अनुचित है। यदि आप हिन्दुओं को धमकाने और सताने को ही धर्मनिष्ठा समझते हैं तो सर्वप्रथम जजिया आपको राणा राजसिंह पर लगाना चाहिए जो हिन्दुओं के प्रधान हैं। तब मुझसे वसूल करना इतना कठिन नहीं होगा क्योंकि, मैं आपका अनुचर हूँ, किंतु चींटियों और मक्खियों को सताना शूरवीरता नहीं है।

मुझे आपके अधिकारियों की स्वामिभक्ति पर आश्चर्य होता है, क्योंकि वे वास्तविकता को आपसे छिपाते हैं और प्रज्वलित अग्नि को फूस से ढंकते हैं। मेरी कामना है कि जहांपनाह का राजत्व महानता के क्षितिज के ऊपर चमके।’

छत्रपति शिवाजी एवं महाराणा राजसिंह के पत्रों का औरंगजेब पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह समस्त प्रार्थनाओं, अनुनय, विनय और अपीलों को अनसुनी करता गया जिसके परिणाम स्वरूप भारत में जजिया जारी रहा और हिन्दुओं में औरंगजेब के प्रति नफरत की आग तेजी से फैल गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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