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सूरत बंदरगाह की लूट (57)

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सूरत बंदरगाह की लूट

सूरत बंदरगाह की लूट औरंगजेब के गाल पर जड़ा गया ऐसा तमाचा था जिसकी गूंज पूरे भारत में सुनाई दी थी और इस लूट के बाद शिवाजी सम्पूर्ण हिन्दू जाति के नायक बन गए थे।

शिवाजी को नष्ट करने के लिए औरंगजेब ने अपने मामा शाइस्ता खाँ तथा मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह को दक्षिण के मोर्चे पर भेजा था। शाइस्ता खाँ द्वारा शिवाजी के विरुद्ध चलाए गए अभियान में शिवाजी को विपुल धन की हानि हुई थी। शिवाजी ने इस धन की भरपाई करने के लिए मुगलों के क्षेत्र लूटने की योजना बनाई। उन दिनों सूरत मुगल साम्राज्य का सर्वाधिक धनी नगर तथा भारत का प्रमुख बंदरगाह था। बादशाह औरंगजेब की बड़ी बहिन शाहबेगम जहानआरा सूरत की जागीरदार थी।

इस समय सूरत के बंदरगाह से दुनिया भर के देशों के व्यापारिक जहाज आते-जाते थे। लाल सागर एवं भूमध्य सागर होते हुए यूरोप के देशों तक भारतीय मसालों, रेशम, कपास, हाथीदांत, चंदन का व्यापार इसी बंदरगाह से होता था। उन दिनों हज के लिए मक्का जाने वाले मुसलमानों द्वारा भी इसी बंदरगाह का उपयोग किया जाता था। शाहबेगम जहानआरा को इस बंदरगाह से प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए का राजस्व प्राप्त होता था। इस धन का उपयोग मुगल सल्तनत की विशाल सेनाओं को वेतन चुकाने में होता था।

सूरत शहर में उस समय लगभग 20-25 व्यापारी ऐसे भी थे जिनके पास करोड़ों की सम्पत्ति जमा हो गई थी। शिवाजी ने सूरत बंदरगाह की लूट करने का निश्चय किया। चूंकि सूरत तक पहुंचने के लिए शिवाजी को बुरहानपुर होकर जाना पड़ता जहाँ मुगलों की बड़ी छावनी थी, इसलिए शिवाजी ने अपनी सेना के 4000 चुने हुए योद्धाओं को छोटे-छोटे दलों में विभक्त किया तथा उन्हें बुरहानपुर से दूर हटकर चलते हुए सूरत से 29 किलोमीटर दूर गनदेवी नामक स्थान पर पहुंचने के निर्देश दिए।

स्वयं शिवाजी भी 1 जनवरी 1664 को सूरत के लिए चल दिए। 6 जनवरी 1664 को ये टोलियां गनदेवी पहुंचकर आपस में मिल गईं। सूरत का मुगल गवर्नर इनायत खाँ बेईमान आदमी था। उसे सूरत शहर की रक्षा के लिए बादशाह से जितने सिपाही रखने का वेतन मिलता था, उसकी तुलना में वह बहुत कम सिपाही रखता था तथा सारा वेतन अपने पास रख लेता था। सूरत के चारों ओर कोई परकोटा भी नहीं था। इसलिए सूरत का लुट जाना अवश्यम्भावी था।

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शिवाजी ने इनायत खाँ को तथा सूरत के बड़े सेठों को पत्र लिखकर सूचित किया कि मेरा उद्देश्य किसी को हानि पहुंचाने का नहीं है किंतु बादशाह ने जबर्दस्ती मुझ पर युद्ध थोप दिया है तथा मेरा कोष भी जब्त कर लिया है। यहाँ तक कि मेरा घर लालमहल भी छीन लिया है और मुझे दर-दर की ठोकरें खाने पर विवश कर दिया है। इसलिए हमने निर्णय लिया है कि इन सब बातों की क्षतिपूर्ति न केवल बादशाह के खजाने से अपितु बादशाह की छत्रछाया में व्यापार करने वाले व्यापारियों से भी करेंगे।

आप लोग शांतिपूर्वक मुक्ति-धन दे दें या अपने साथ होने वाली कठोर कार्यवाही के लिए तैयार रहें। छत्रपति चाहता था कि सूरत के 20-25 धनी व्यापारी आपस में चंदा करके छत्रपति को केवल 50 लाख रुपए दे दें ताकि वह अपनी सेना का वेतन चुका सके। यह राशि सूरत के बड़े व्यापारियों के लिए बहुत छोटी थी किंतु व्यापारी शिवाजी को कोई राशि नहीं देना चाहते थे।

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इन पत्रों के मिलने के बाद मुगल सूबेदार इनायत खाँ ने शिवाजी को सलाह भरा पत्र भेजा कि वह शक्तिशाली मुगलों से शत्रुता मोल न ले, तुझे मुगलों की ताकत का अंदाज नहीं हैं। तू लौटकर महाराष्ट्र तक नहीं पहुंच पाएगा। इनायत खाँ को लगता था कि शिवाजी इस बंदरघुड़की से डर जाऐंगे किंतु जब शिवाजी के घोड़े शहर की सीमा पर दिखाई देने लगे तो इनायत खाँ भागकर किले में छिप गया। सूरत के व्यापारी, मुगल सेनाओं के भरोसे अपने घरों में बंद हो गए।

सूरत में अनेक अंग्रेज एवं डच व्यापारी भी कोठी एवं कारखाने बनाकर रहते थे। उन दिनों कोठी का अर्थ व्यापारिक कार्यालय से होता था तथा कारखाने से तात्पर्य आयात-निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के गोदाम से होता था। सूरत के व्यापारी शिवाजी की शक्ति से भली भांति परिचित थे। इसलिए उन्होंने अपनी कोठियों और कारखानों पर सुरक्षा के प्रबन्ध कर लिए।

अंग्रेजों ने एक ईसाई पादरी को शिवाजी के पास भेजकर अनुरोध किया कि वह हमारी निर्धन ईसाई बस्ती पर दया करे। हमारे पास शिवाजी को देने के लिए कुछ भी नहीं है। इस पर शिवाजी ने अंग्रेज पादरी को वचन दिया कि वह निर्धन लोगों पर आक्रमण नहीं करेगा। वैसे भी शिवाजी को अंग्रेजों से नहीं उलझना था क्योंकि उनके पास व्यापारिक सामान तो था किंतु सोना-चांदी नहीं था।

शिवाजी ने शहर के निकट अपना शिविर स्थापित कर लिया तथा शहर में सिपाही भेजकर सूरत के व्यापारियों को मुक्ति-कर लेकर आने के लिए सूचना दी। पहले दिन जब कोई व्यापारी शिवाजी से मिलने नहीं आया तो शिवाजी ने अपने सैनिकों को सूरत शहर के व्यापारियों के घर लूटने के निर्देश दे दिए। शिवाजी के सिपाही सूरत नगर में घुसकर व्यापारियों का धन छीनने लगे और शिवाजी के डेरे में लाकर ढेर लगाने लगे।

इसी बीच मुगल गवर्नर इनायत खाँ ने एक सिपाही के हाथों कपट-युक्त सुलहनामा भेजा। इस सिपाही ने शिवाजी को गुप्त-संदेश देने का बहाना किया तथा बात करते-करते शिवाजी के अत्यंत निकट पहुंच गया। उसने अचानक अपने कपड़ों में से कटार निकाली तथा शिवाजी के शरीर में घोंप दी। शिवाजी के अंगरक्षक सतर्क थे। फिर भी शिवाजी को मामूली चोट पहुंची। शिवाजी के अंगरक्षकों ने तत्काल ही उस सिपाही का हाथ काट दिया।

इस कृत्य के बाद मराठों ने सख्ती बढ़ा दी। मकानों, दुकानों, संदूकों और अलमारियों के किवाड़ तोड़कर धन निकाला जाने लगा। धनी व्यापारियों के मकान खोदकर सम्पदा निकाल ली गई। कई मुहल्ले अग्नि की भेंट कर दिए गए। शिवाजी के पास लगभग 2 करोड़ रुपयों की सम्पत्ति आ गई तथा सूरत, बुरी तरह से बे-सूरत हो गया। समस्त धनी व्यापारियों के घरों में हाहाकार मच गया। शिवाजी के कोप से मुगलों की प्रजा को कोई बचाने वाला नहीं था।

इनायत खाँ के सिपाही किले की दीवार से शिवाजी के सिपाहियों पर तोप के गोले बनसाने लगे। इससे सूरत नगर में कई स्थानों पर आग लग गई। इसी बीच शिवाजी को समाचार मिला कि मुगलों की बहुत बड़ी सेना सूरत की तरफ बढ़ रही है। अतः शिवाजी ने लूट में प्राप्त कपड़े, बर्तन एवं अन्य सामग्री सूरत की निर्धन जनता में बांट दी और सोना-चांदी तथा रुपए लेकर 10 जनवरी 1664 को अचानक सूरत छोड़ दिया। छत्रपति आंधी की तरह सूरत में आए और तूफान की तरह निकल गए किंतु उनके जाने के बाद भी लोगों में धीरज उत्पन्न नहीं हुआ और व्यापारियों का सूरत से पलायन जारी रहा।

सूरत बंदरगाह की लूट के कई दिनों बाद मुगलों की सेना सूरत पहुंची। जिस सूरत के चर्चे पूरी दुनिया में शान से होते थे अब वहाँ एक वीरान और बदसूरत नगर बचा था जिसके बहुत से हिस्सों में आग अब भी सुलग रही थी। जिस समय शिवाजी सूरत को लूटने पहुंचे थे, उस समय अरब के कुछ अश्व-व्यापारी अपने घोड़े बेचने सूरत में आए हुए थे।

उन्हें ज्ञात हुआ कि शिवाजी अपनी सेना सहित आया है तो वे अपने घोड़े लेकर शिवाजी के पास पहुंचे। शिवाजी ने उनसे घोड़े लेकर उन्हें बंदी बना लिया। जब शिवाजी लूट का धन लेकर सूरत से जाने लगे तो उन्होंने अश्व-व्यापारियों को घोड़ों के मूल्य का भुगतान करके उन्हें रिहा कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिवाजी लाल किले में (58)

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शिवाजी लाल किले में

शिवाजी लाल किले में वैसे ही निर्भीक दिखाई दिए जैसे रावण की सभा में कभी अंगद और हनुमान दिखाई दिए थे। अंतर केवल इतना था कि आज राक्षसराज की सभा में राजा का दूत नहीं खड़ा था, स्वयं राजा खड़ा था। औरंगजेब ने सिद्ध कर दिया कि औरंगजेब का कपट कभी कम नहीं होगा और मराठों की वीरता कभी मंद नहीं पड़ेगी।

जब तक शाहजहाँ जीवित रहा, औरंगजेब अपने राज्यारोहण का उत्सव दिल्ली के लाल किले में मनाता रहा किंतु जब 22 जनवरी 1666 को आगरा के लाल किले में औरंगजेब के दुर्भाग्यशाली पिता शाहजहाँ की बंदी अवस्था में मृत्यु हो गई तो उसके बाद औरंगजेब ने अपने राज्यारोहण का उत्सव आगरा के लाल किले में मनाने का निश्चय किया।

औरंगजेब इस उत्सव को यादगार बनाना चाहता था इसलिए उसने भारत भर से मुस्लिम सूबेदारों एवं हिन्दू राजाओं को आगरा पहुंचने के निर्देश दिए। उसने आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह से कहा कि यदि वह छत्रपति शिवाजी को इस उत्सव में शामिल होने के लिए राजी कर सके तो आपके लिए यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।

अपनी शक्ति के घमण्ड में चूर दुष्ट औरंगजेब समय रहते यह नहीं समझ सका कि शिवाजी लाल किले में न आए तो ही अच्छा है।

मिर्जाराजा जयसिंह कुछ ही दिन पहले शिवाजी के हाथों बीजापुर की लड़ाई में परास्त हो गया था। इसलिए मिर्जाराजा जयसिंह ने शिवाजी को प्रसन्न करके आगरा ले जाने की योजना बनाई ताकि औरंगजेब की नाराजगी को दूर किया जा सके।

मिर्जाराजा जयसिंह ने छत्रपति से भेंट की तथा उनसे आगरा चलने का अनुरोध किया ताकि शिवाजी और औरंगजेब के बीच बरसों से चली आ रही शत्रुता को दूर किया जा सके और दक्खिन में शांति स्थापित की जा सके। पहले तो शिवाजी ने आगरा चलने से मना कर दिया किंतु जब जयसिंह ने कहा कि इस यात्रा का सम्पूर्ण व्यय एवं प्रबन्ध बादशाह की तरफ से किया जाएगा तथा शिवाजी की सुरक्षा की समूची गारण्टी महाराजा जयसिंह की होगी तो शिवाजी आगरा चलने पर सहमत हो गए।

शिवाजी ने अपनी माता जीजाबाई से विचार-विमर्श करके अपने 8 वर्षीय पुत्र सम्भाजी के साथ आगरा जाने का निर्णय लिया। 5 मार्च 1666 को शिवाजी ने अपने 200 चुने हुए अंगरक्षकों तथा 4000 सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ रायगढ़ से आगरा के लिए प्रस्थान किया। शिवाजी की याात्रा के लिए शाही-खजाने से एक लाख रुपया दिया गया तथा पूना से आगरा तक के मुगल सूबेदारों को आज्ञा दी गई कि वे मार्ग में स्थान-स्थान पर शिवाजी का स्वागत करें।

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जब शिवाजी महाराष्ट्र से रवाना होकर आगरा जा रहे थे तो हिन्दू प्रजा में शिवाजी को देखने की होड़ मच गई। जब से शिवाजी ने अफजल खाँ को मारा था, शाइस्ता खाँ की अंगुली काटी थी, कर्तलब खाँ का सर्वस्व छीनकर जीवित छोड़ा था, फजल खाँ, रूस्तमेजा तथा सिद्दी जौहर की सेनाओं में कसकर मार लगाई थी तथा सूरत का बंदरगाह लूटा था, तब से भारत की जनता में शिवाजी के बारे में कई रहस्य और रोमांच भरे किस्से विख्यात हो चुके थे। भारत की जनता शिवाजी को हिन्दुओं एवं भारत भूमि के उद्धारक के रूप में देखती थी और मानती थी कि एक दिन शिवाजी दुष्ट औरंगजेब का भी विनाश करेंगे।

शिवाजी आगरा नहीं जाना चाहते थे किंतु मिर्जाराजा जयसिंह के दबाव में उन्होंने आगरा जाने का निर्णय ले लिया था। अब वे इस समय एवं श्रम का उपयोग हिन्दू जनता को अपने उद्देश्य एवं शक्ति का दर्शन कराने में करना चाहते थे। वे हिन्दुओं कोे बताना चाहते थे कि मुगल सर्वशक्तिमान नहीं हैं, उन्हें परास्त किया जा सकता है। आवश्यकता केवल अपने भीतर के बल को जगाने की है!

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शिवाजी ने अपने दल को भव्य रूप से व्यवस्थित किया। शिवाजी के दल में सबसे आगे एक विशाल हाथी चलता था जिस पर एक महावत गेरुए रंग का एक ध्वज फहराता हुआ चलता था। हाथी के पीछे शिवाजी के अंगरक्षकों की टुकड़ी होती थी जिनके बीच में शिवाजी की पालकी होती थी।

शिवाजी की भव्य पालकी पर सोने-चांदी के पतरे चढ़े हुए थे। इस अंगरक्षक दल के चारों ओर शिवाजी के सिपाही रहते थे और अंत में बची हुई सेना चलती थी। हर थाने एवं मुकाम पर मुगल थानेदार, सूबेदार और सरकारी कर्मचारी शिवाजी की सेवा में उपस्थित होकर उनका स्वागत करते थे। सैंकड़ों वर्षों से पददलित हिन्दू जनता शिवाजी के दर्शनों के लिए दीवानी हुई जा रही थी।

हर कोई शिवाजी को अपनी आंखों से देखना चाहता था। शिवाजी ने जनता की छटपटाहट को पहचाना और जनता को समुचित सम्मान दिया। जो लोग, शिवाजी के दर्शन करना चाहते थे, उन्हें शिवाजी से मिलने का पूरा अवसर दिया जाता था।

इस प्रकार शान से चलता हुआ, हिन्दू प्रजा के हृदयों को जीतता हुआ और मुगलों में भय उत्पन्न करता हुआ जीजा का पुत्र और समर्थ गुरु रामदास का शिष्य शिवा 12 मई 1666 को आगरा नगर के मुख्य द्वार पर पहुंच गया। जब शिवाजी का जुलूस आगरा पहुंचा तो समूचे आगरा में धूम मच गई।

हजारों लोग आगरा शहर के प्रवेश द्वार से लेकर लाल किले तक के मार्ग के दोनों तरफ आकर खड़े हो गए। जगह-जगह स्वागत द्वार बनाए गए। जनता जैसे भूल ही गई कि वह औरंगजेब की प्रजा है न कि छत्रपति शिवाजी की। ये सारे समाचार औरंगजेब तक पहुंचाए जा रहे थे जिन्हें सुन-सुनकर औरंगजेब मन ही मन कुढ़ रहा था।

औरंगजेब इतनी बड़ी सल्तनत का एकच्छत्र स्वामी था किंतु जनता ने कभी भी उसका ऐसा स्वागत-सत्कार नहीं किया था किंतु एक छोटे से जमींदार के स्वागत में जनता सड़कों पर बिछ गई थी जो दूर देश का रहने वाला था और जिसे आगरा में किसी ने आज से पहले देखा भी नहीं था। औरंगजेब को बार-बार लग रहा था कि उसने शिवाजी को आगरा में बुलाकर गलती की किंतु अब कुछ नहीं हो सकता था, अब तो शिवाजी आगरा में घुस चुके थे और अपने भगवा झण्डे के साथ लाल किले की तरफ बढ़ रहे थे।

मिर्जाराजा जयसिंह का पुत्र रामसिंह कच्छवाहा, शिवाजी को उसी दिन दरबारे आम में बादशाह के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता था किंतु आगरा में प्रवेश के समय शिवाजी के स्वागत-सत्कार में काफी समय लग गया, तब तक औरंगजेब दरबारे आम से उठकर, दरबारे खास में जाकर बैठ गया। एक तरह से औरंगजेब का दरबारे आम में शिवाजी से भेंट नहीं करना ठीक ही रहा क्योंकि अवश्य ही वहाँ उपस्थित जनता औरंगजेब का भय भूलकर छत्रपति की जय-जयकार करने लगती जो कि औरंगजेब के जीवन में सबसे बुरा दिन होता।

अगले दिन शिवाजी लाल किले में उपस्थित हुए। औरंगजेब के बख्शी असद खाँ ने शिवाजी को दरबारे खास में बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया। शिवाजी का किसी भी तरह आगरा चले आना, औरंगजेब की बहुत बड़ी विजय थी किंतु वह शिवाजी के स्वागत-सत्कार से जल-भुन गया था।

इसलिए औरंगजेब पहली ही भेंट में शिवाजी का मानमर्दन करके उन्हें अपनी शक्ति का परिचय दे-देना चाहता था। उस कुटिल अभिमानी बादशाह को एक हिन्दू राजा का अपमान करने के सौ तरीके आते थे तथा वह दुष्टता का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देता था।

शिवाजी ने बादशाह को एक हजार मोहरें तथा दो हजार रुपए नजर किए तथा 5000 रुपए निसार के तौर पर दिए। शिवाजी के नौ वर्षीय पुत्र सम्भाजी ने औरंगजेब को पांच हजार मोहरें और एक हजार रुपए नजर किए एवं 2 हजार रुपए निसार के तौर पर प्रस्तुत किए। औरंगजेब ने उन उपहारों की तरफ देखा तक नहीं। उसने शिवाजी एवं सम्भाजी से एक भी शब्द नहीं कहा तथा न ही शिवाजी की कुशल-क्षेम पूछी। बख्शी ने शिवाजी को ले जाकर पांच हजारी मनसबदारों की पंक्ति में महाराजा जसवंतसिंह के पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिवाजी की गर्जना (59)

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शिवाजी की गर्जना

जब शिवाजी लाल किले में खड़े होकर गरजे तो औरंगजेब जैसे क्रूर एवं मदांध बादशाह की रूह भी कांप उठी। शिवाजी की गर्जना से लाल किले की दीवारें कांप उठीं! शिवाजी की गर्जना न केवल मुगल इतिहास की, अपितु हिन्दुओं के इतिहास की भी अत्यंत महत्वपूर्ण घटना बन गई।

जब औरंगजेब के बख्शी असद खाँ ने छत्रपति शिवाजी को पांच हजारी मनसबदारों की पंक्ति में महाराजा जसवंतसिंह के पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया तो शिवाजी बहुत आहत हुए। मुगल दरबार में हिन्दू राजाओं एवं मुस्लिम अमीरों के खड़े होने की व्यवस्था अकबर के समय से ही निर्धारित थी। दरबार में बादशाह के अतिरिक्त सब खड़े रहते थे। उनके खड़े होने का क्रम मनसब के अनुसार होता था।

भारत का बड़े से बड़ा राजा इस दरबार में घण्टों पैरों पर खड़ा रहता था, थक जाने पर वह दो मिनट के लिए अपने पीछे लगी लकड़ी की बल्ली का सहारा लेता था। यदि कोई राजा या अमीर अधिक समय तक बल्ली का सहारा लेता था तो औरंगजेब के सिपाही उसे पीछे से लकड़ी चुभाकर सीधे खड़े होने का संकेत करते थे। जो राजा बूढ़े होते थे, उनके सहारे के लिए छत से रस्सी लटकाई जाती थी जिसे पकड़कर वे घण्टों खड़े रहते थे।

शिवाजी को संभवतः मुगल दरबार की इस व्यवस्था की जानकारी नहीं थी, यदि होती तो वे कभी भी इस दरबार में नहीं आते। शिवाजी को आशा थी कि उन्हें औरंगजेब के दरबार में सम्मानपूर्वक बैठाया जाएगा, इस भयावह अपमानजनक स्थिति में शिवाजी दो पल भी खड़े नहीं रह सकते थे। उन्होंने देखा कि उनके ठीक आगे जोधपुर नरेश महाराजा जसवंतसिंह खड़े हुए थे। यह देखते ही शिवाजी क्रोध और अपमान से तमतमा गए।

शिवाजी ने सोचा कि मेरे आगे खड़ा यह वही महाराजा जसवंतसिंह है जिसे मैंने कोंडाणा दुर्ग की चढ़ाई में परास्त किया था और जिसके डेरे के सामने से मैं औरंगजेब के ममेरे भाई का कटा हुआ सिर लेकर निकला था। आज वही महाराजा जसवंतसिंह औरंगजेब के दरबार में शिवाजी की तरफ पीठ करके खड़ा था! इस अपमान से शिवाजी तमतमा गए।

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जब औरंगजेब ने सरदारों और अमीरों को खिलअतें बांटीं तो शिवाजी ने खिलअत पहनने से मना कर दिया। इस पर औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह के कुंअर रामसिंह से कहा कि वह शिवाजी की तबियत के बारे में पूछे और उसे खिलअत पहनने के लिए समझाए। जब रामसिंह शिवाजी के पास गया तो शिवाजी ने जोर से चिल्ला कर कहा- आपने और आपके पिता ने देखा कि मैं किस तरह का इंसान हूँ फिर भी मुझे अपमानित करके इतनी देर तक खड़ा रखा गया। इसलिए मैं यह खिलअत पहनने से अस्वीकार करता हूँ।

कुंअर रामसिंह ने शिवाजी को शांत करने के लिए उनकी तरफ अपना हाथ बढ़ाया तो शिवाजी ने उसका हाथ झटक दिया और औरंगजेब की तरफ पीठ करके चलते हुए एक कौने में जाकर बैठ गए तथा जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि मेरी मृत्यु ही मुझे इस स्थान पर खींच लाई है। शिवाजी की इस भयंकर गर्जना से औरंगजेब के दरबार में भारी हलचल मच गई। हिन्दू राजाओं की बेचैनी और मुस्लिम सूबेदारों की घबराहट उनके चेहरों पर साफ देखी जा सकती थी। उनकी दृष्टि में शिवाजी ऐसा रहस्यमय व्यक्ति था जो किसी भी समय कुछ भी करने में समर्थ था।

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शिवाजी की गर्जना के कारण औरंगजेब का मुंह अपमान से पीला पड़ गया। हालांकि औरंगजेब ने अपने जीवन में पहली बार यह दृश्य नहीं देखा था, इससे पहले भी वह अपने पिता शाहजहाँ के दरबार में अमरसिंह राठौड़ को सिंह-गर्जना करते हुए देख चुका था।

औरंगजेब के लिए यह तो अच्छा ही हुआ था कि शिवाजी को दरबारे आम में प्रस्तुत न करके दरबारे खास में प्रस्तुत किया गया था। अन्यथा आम जनता के सामने औरंगजेब की जो किरकिरी होती और जनता में शिवाजी के साहस के बारे में जो किस्से गढ़े जाते, उनका जवाब समूची मुगलिया सल्तनत के साहित्यकार मिलकर भी नहीं कर सकते थे।

शिवाजी के इस तरह विक्षुब्ध हो जाने और इतनी कठोर प्रतिक्रिया देने से औरंगजेब सहम गया। वह समझ चुका था कि उसने अनजाने में ही किस स्वाभिमानी हिन्दू राजा को नाराज कर दिया है। इसलिए उसने अपने अमीर-उमरावों को संकेत किया कि वे शिवाजी को समझाएं तथा खिलअत पहनाकर बादशाह के समक्ष लाएं।

औरंगजेब के अमीर-उमारावों ने ने शिवाजी को समझाने के बहुत प्रयास किए तथा बादशाह से कहकर उन्हें तथा उनके पुत्र को बड़ा मनसब दिलवाने के लालच दिए किंतु वीर शिवाजी ने खिलअत पहनने तथा दुष्ट औरंगजेब के सम्मुख जाने से मना कर दिया। शिवाजी इस समय भी क्रोधित थे और जोर-जोर से चिल्ला रहे थे कि मैं खिलअत नहीं पहनूंगा। बादशाह चाहे तो मुझे मार डाले या फिर मैं ही आत्मघात कर लूंगा किंतु बादशाह के समक्ष दुबारा नहीं जाऊंगा। मुझे मुसलमान बादशाह की सेवा नहीं करनी है।

औरंगजेब ने शिवाजी को अपमानित करने का प्रयास किया था किंतु स्वयं अपमानित हो गया। अपनी कपट चाल के कारण, वह जीती हुई बाजी हार चुका था। अंत में औरंगजेब के मंत्रियों ने औरंगजेब को सूचित कर दिया कि अब शिवाजी नहीं मानने वाला। इस पर औरंगजेब ने कुंअर रामसिंह कच्छवाहे से कहा कि वह शिवाजी को अपने डेरे पर ले जाकर शांत करे तथा अगले दिन फिर से हमारे सामने पेश करे।

कुंअर रामसिंह शिवाजी को आगरा के किले से निकालकर अपनी हवेली पर ले गया। उसने शिवाजी को बहुत ठण्डा-मीठा किया तथा दूसरे दिन उन्हें पुनः औरंगजेब के दरबार में लेकर आया। औरंगजेब का दरबार आज सुबह से ही ठसाठस भरा हुआ था। हर कोई यह देखना चाहता था कि आज शिवाजी क्या करेंगे? क्या दहकता हुआ अंगारा रात भर में शांत होकर बुझ चुका होगा, या फिर उस अंगारे की आंच और तेज हो गई होगी!

औरंगजेब भी रेशम से लिपटे अपने लकड़ी के कटरे के भीतर संभल कर बैठा था, हालांकि उसे पूरी आशा थी कि रात भर में राजकुमार रामसिंह ने शिवाजी को समझा-बुझा कर ठण्डा कर दिया होगा फिर भी उसे हिन्दू राजाओं का भरोसा नहीं था। क्या पता, कहीं वे एक साथ शिवाजी के पक्ष में आ गए तो सारी सल्तनत ताश के पत्तों की तरह एक क्षण में ढह जाएगी। इसलिए चिंता की लकीरें औरंगजेब के माथे पर रह-रह कर दिखाई पड़ती थीं। औरंगजेब ने अपने शहजादों को अपने कटरे के भीतर खड़ा कर लिया ताकि वे किसी भी अनहोनी का सामना कर सकें।

आखिर वह क्षण आ ही गया। कुंअर रामसिंह शिवाजी की अगवानी करता हुआ दरबारे खास में प्रविष्ट हुआ। कुंअर को पूरा विश्वास था कि आज शिवाजी शांत रहेंगे और बादशाह उन्हें क्षमा कर देगा किंतु शिवाजी के दरबार में प्रवेश करते ही जो कुछ हुआ, उसकी तो कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।

औरंगजेब को देखते ही शिवाजी की गर्जना आरम्भ हो गई। शिवाजी ने उस म्लेच्छ शासक के समक्ष जाने से मना कर दिया तथा बादशाह की तरफ पीठ करके दीवान-ए-खास से बाहर निकल गए। लाल किले की दीवारें छत्रपति शिवाजी की गर्जना से भयभीत होकर सहम गईं।

देश भर से आए राजाओं, राजकुमारों और अमीर-उमरावों की सैंकड़ों जोड़ी आंखें शिवाजी पर टिकी हुई थीं किंतु औरंगजेब उनकी तरफ देख पाने का साहस भी नहीं कर पा रहा था। वह हताश होकर तख्त पर रखे तकिए से टिक गया। जिस छत्रपति को औरंगजेब बड़ी हिकारत से पहाड़ी चूहा कहता था, वह सिंह जैसी शान से औरंगजेब के सामने से निकल कर जा रहा था और हतप्रभ औरंगजेब सूनी आंखों से न जाने किस शून्य में देख रहा था!

शिवाजी, औरंगजेब के दरबार से निकलकर वजीर जाफर खाँ के घर गए जो औरंगेब का मौसा था और जिसकी शिवाजी से पुरानी पहचान थी। शिवाजी ने उसे बहुमूल्य उपहार देकर अनुरोध किया कि वह शिवाजी के, आगरा से वापस जाने का प्रबन्ध करे। जाफर खाँ की पत्नी, औरंगजेब की मौसी थी। उसने जाफर खाँ को अंदर बुलाकर कहा कि इस व्यक्ति को यहाँ से तुरंत भगा दो। यह वही आदमी है जिसने आपके साले शाइस्ता खाँ पर जानलेवा हमला किया था और शाइस्ता खाँ के पुत्र का सिर तलवार से उड़ा दिया था।

जब जाफर खाँ ने अपनी बेगम को समझाने का प्रयास किया तो वह जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने लगी। इस पर जाफर खाँ ने शिवाजी को अपने घर से जाने के लिए कह दिया।

उधर औरंगजेब के हरम की औरतों को शिवाजी द्वारा बादशाह का अपमान किए जाने और जाफर खाँ के घर जाकर भेंट करने के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने बादशाह को संदेश भिजवाया कि इस उद्दण्ड हिन्दू राजा को दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ा जाए। हरम की औरतों की अगुवाई औरंगजेब की बहिन जहाँआरा कर रही थी जो इस समय शाहबेगम के पद पर नियुक्त थी।

जहानआरा शिवाजी से इसलिए नाराज थी क्योंकि शिवाजी ने उसकी जागीर में स्थित सूरत बंदरगाह को बेरहमी से लूटा और जलाया था। शाइस्ता खाँ की बेगम जो कि औरंगजेब की मामी थी, वह भी चाहती थी कि हाथ आए हुए शिवाजी को प्राणदण्ड मिलना चाहिए। वह भी हाय-तौबा मचाने लगी।

हरम की औरतों की चीख-पुकार से तंग आकर औरंगजेब ने शिवाजी तथा उसके पुत्र सम्भाजी को कुंअर रामसिंह के सरंक्षण में बंदी बनाने के निर्देश दिए। रामसिंह ने विवश होकर शिवाजी को बंदी बना लिया।

इस प्रकार शिवाजी अतिथि से बंदी हो गए। औरंगजेब के हरम की औरतें चाहती थीं कि शिवाजी को जान से मार डाला जाए क्योंकि शिवाजी ने शाइस्ता खाँ को घायल किया था और उसके पुत्र को मार डाला था किंतु औरंगजेब इस सम्बन्ध में जल्दबाजी में कोई खतरनाक निर्णय नहीं लेना चाहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अमरसिंह राठौड़ की गर्जना (60)

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अमरसिंह राठौड़ की गर्जना

औरंगजेब ने जब शिवाजी को लाल किले में सिंहगर्जना करते हुए सुना तो उसे अमरसिंह राठौड़ की याद आ गई। औरंगजेब ने अमरसिंह राठौड़ को भी लाल किले में ऐसी ही गर्जना करते हुए देखा था। अमरसिंह राठौड़ की गर्जना से से भी लाल किले की दीवारें इसी प्रकार कांपने लगी थीं।

औरंगजेब के हरम की औरतें भले ही शिवाजी को प्राणदण्ड दिए जाने के लिए एक सुर से हाय-तौबा कर रही थीं किंतु शिवाजी की सिंहगर्जना से औरंगजेब बुरी तरह से सहम गया था। वह तो स्वयं ही चाहता था कि किसी तरह शिवाजी को मार डाला जाए किंतु आम्बेर के कच्छवाहे शिवाजी को अपने संरक्षण की गारण्टी पर आगरा लाए थे इसलिए औरंगजेब को पूरा विश्वास था कि यदि औरंगजेब ने शिवाजी को मारने की चेष्टा की तो कुंअर रामसिंह उसी समय विद्रोह कर देगा।

इतना ही नहीं, उस के साथ समस्त कच्छवाहे, राठौड़, भाटी और चौहान शासक भी औरंगजेब के प्रबल शत्रु बन जाएंगे जबकि सिसोदिए, जाट, मराठे और सतनामी तो पहले से ही औरंगजेब के लिए भारी मुसीबत बने हुए थे!

औरंगजेब वह दिन भूल नहीं पाता था जब नागौर के राव अमरसिंह राठौड़ ने औरंगजेब के पिता शाहजहाँ की आंखों के सामने ही भरे दरबार में बादशाह के बख्शी सलावत खाँ को मार डाला था और अमरसिंह राठौड़ की गर्जना लाल ने किले की दीवारों को कंपा दिया था।

वह सारा दृश्य औरंगजेब की आंखों के सामने एक बार फिर से घूम गया। औरंगजेब के पिता शाहजहाँ के शासन-काल में जोधपुर के महाराजा गजसिंह ने अपने छोटे कुंअर जसवंतसिंह को जोधपुर राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया। इस पर बड़ा कुंअर अमरसिंह राठौड़ अपने पिता गजसिंह से नाराज होकर शाहजहाँ के पास नौकरी मांगने के लिए आया।

कुंअर अमरसिंह के बाबा जोधपुर नरेश सूरसिंह की बहिन जगत गुसाइन शाहजहाँ की माँ थी। इस नाते शाहजहाँ, अमरसिंह को निकट से जानता था और उसकी वीरता का कायल था। इसलिए शाहजहाँ ने अमरसिंह को अपनी सेवा में रख लिया तथा उसे जोधपुर राज्य का नागौर परगना स्वतंत्र राज्य के रूप में दे दिया। शाहजहाँ ने अमरसिंह को राव की उपाधि भी दी।

अमरसिंह के राज्य नागौर के उत्तर में बीकानेर का मरुस्थलीय राज्य था, वह भी ई.1488 में जोधपुर राज्य के राजकुमार बीका द्वारा स्थापित किया गया था। इस प्रकार जोधपुर, नागौर एवं बीकानेर के राज्य एक ही राजकुल के राजकुमारों द्वारा स्थापित किए गए थे।

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ईस्वी 1631 में बीकानेर के पुराने राजा सूरतसिंह का निधन हो गया और उसका पुत्र कर्णसिंह बीकानेर राज्य का स्वामी हुआ। महाराजा कर्णसिंह अपने युग की विभूति था और उसमें हिन्दू नरेशों के सभी उच्च आदर्श देखे जा सकते थे। वह उस काल के भारत के महान राजाओं में गिने जाने योग्य था किंतु परिस्थतियों के वशीभूत होकर उसे मुगल बादशाह की सेवा करनी पड़ी थी।

उन दिनों नागौर और बीकानेर राज्यों की सीमा पर बीकानेर राज्य का जाखणिया नामक गांव स्थित था। ई.1644 में इस गांव के एक किसान के खेत में एक छोटी सी घटना घटित हुई जिसने इतना विकराल रूप ले लिया कि उसकी आंच शाहजहाँ के दरबार तक जा पहुंची।

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हुआ यह कि बीकानेर राज्य के जाखणिया गांव के एक किसान के खेत में मतीरे की बेल लगी। मतीरा एक रेगिस्तानी फल है जो देखने में तरबूज जैसा होता है। यह बेल फैलकर नागौर राज्य की सीमा में चली गयी और फल भी उधर ही लगे। जब बीकानेर राज्य का किसान अपनी बेल के फल लेने के लिये नागौर राज्य की सीमा वाले खेत में गया तो नागौर की तरफ के किसान ने कहा कि फल हमारे राज्य की सीमा में लगे हैं अतः उन पर हमारा अधिकार है।

इस बात पर दोनों किसानों में झगड़ा हो गया। बात राज्याधिकारियों तक पहुंची और दोनों राज्यों के अधिकारियों में भी झगड़ा हो गया। इस झगड़े में तलवारें चलीं जिससे नागौर राज्य के कई सिपाही मारे गये। उन दिनों नागौर नरेश अमरसिंह राठौड़ तथा बीकानेर नरेश कर्णसिंह दोनों ही शाहजहाँ के दरबार में थे। दोनों राज्यों के अधिकारियों ने अपने-अपने राजा को इस घटना की जानकारी भिजवाई।

अमरसिंह ने अपने आदमियों से कहलवाया कि वे सेना लेकर जाएं तथा जाखणिया गांव पर अधिकार कर लें। नागौर की सेना द्वारा ऐसा ही किया गया तथा बीकानेर की सेना के कई सिपाही मारे गए।

जब यह बात बीकानेर नरेश कर्णसिंह को ज्ञात हुई तो उसने अपने दीवान मुहता जसवंत को नागौर पर हमला करने के लिये भेजा। अमरसिंह के सेनापति केसरीसिंह ने बीकानेर की सेना का सामना किया किंतु बीकानेर की सेना भारी पड़ी और नागौर की तरफ के कई सिपाही मारे गये। बीकानेर के विशाल राज्य की सेना के सामने नागौर की छोटी सी सेना परास्त हो गई।

बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने शाहजहाँ को जाखणिया गांव में हुई घटना एवं उसके बाद हुए युद्ध की सारी बात बता दी। राव अमरसिंह राठौड़ ने भी बादशाह से मिलकर उसे सारी बात बतानी चाही तथा उससे छुट्टी लेकर नागौर जाना चाहा। इसलिए अमरसिंह ने बादशाह के बख्शी सलावत खाँ से कहा कि वह अमरसिंह की बादशाह सलामत से बात करवाए किंतु बादशाह ने बख्शी को पहले ही संकेत कर दिया था कि वह अमरसिंह को बादशाह से मिलने नहीं दे।

जब कई दिनों तक बख्शी ने अमरसिंह की बात बादशाह से नहीं करवाई तो अमरसिंह ने एक दिन बख्शी से अनुमति लिए बिना ही, बादशाह को मुजरा कर दिया। इस पर बख्शी सलावत खाँ ने अमरसिंह को गंवार कहकर उसकी भर्त्सना की। राव अमरसिंह बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति था, वह अपना अपमान सहन नहीं कर सका, इसलिए उसने क्रुद्ध होकर उसी समय अपनी कटार निकाली और बख्शी सलावत खाँ को बादशाह के सामने ही मार डाला।

शाही सिपाहियों ने उसी समय अमरसिंह को घेर लिया। जब अमरसिंह ने देखा कि वह चारों तरफ मुस्लिम सैनिकों से घिर गया है तो उसने दरबार में भयंकर सिंह-गर्जना की जिसे सुनकर अमरसिंह के अंगरक्षक भी तलवार सूंतकर अपने स्वामी की सहायता के लिए आ गए।

देखते ही देखते दोनों तरफ से तलवारें चलने लगीं और शाही सैनिक कट-कट कर फर्श पर गिरने लगे। शाहजहाँ की आंखों के सामने उसके अपने दरबार में इतनी बड़ी घटना के अचानक घटित होे जाने पर शाहजहाँ सकते में आ गया। उसने स्वप्न में भी इस दृश्य की कल्पना नहीं की थी कि राजपूत उसके दरबार में तलवार निकाल कर खड़े हो जाएंगे!

मुगलिया सल्तनत तो इन्हीं राजपूतों के बल पर टिकी हुई थी। आज वही तलवारें सूंतकर बादशाह के आदमियों की गर्दनें काट रहे थे। थोड़ी ही देर में आगरा का लाल किला मुगलों एवं राजपूतों के खून से नहा गया। अमरसिंह तथा उसके अंगरक्षक तलवार चलाते हुए बादशाह के सामने से सही-सलामत निकल गए किंतु तब तक दरबार के बाहर तैनात मुगल सिपाही, भीतर हो रहे शोर को सुनकर दरबार में आ गए और उन्होंने दरबार से बाहर निकल चुके अमरसिंह और उसके अंगरक्षकों को एक पतले गलियारे में रोककर मार दिया।

अमरसिंह राठौड़ की गर्जना के समय औरंगजेब 26 साल का युवक था और संयोगवश अपने पिता के दरबार में उपस्थित था। उसने इस दृश्य को अपनी आंखों से देखा था। आज जब मराठों के राजा छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब के दरबार में सिंह-गर्जना की तो औरंगजेब को वह समस्त दृश्य स्मरण हो आया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिवाजी का पलायन (61)

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शिवाजी का पलायन - bharatkaitihas.com
शिवाजी का पलायन

औरंगजेब ने शिवाजी को आगरा में नजरबंद कर रखा था किंतु उसके सैनिक शिवाजी का पलायन नहीं रोक पाए। लाल किले की दीवारें इतनी मजबूत नहीं थीं कि शिवाजी को रोककर रख सकें।

शिवाजी रामसिंह कच्छवाहे के कड़े पहरे में थे। शिवाजी ने अपनी रिहाई के अनेक प्रयास किए किंतु उनका कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में शिवाजी ने औरंगजेब के पास तीन प्रस्ताव भिजवाए-

1. बादशाह मुझे क्षमादान दे और मिर्जाराजा जयसिंह द्वारा अब तक छीने गए मेरे समस्त दुर्ग मुझे वापस लौटा दे। इसके बदले में, मैं बादशाह को दो करोड़ रुपए दूंगा तथा दक्षिण के युद्धों में सदैव मुगलों का साथ दूंगा।

2. बादशाह मेरी जान बख्श दे और मुझे सन्यासी होकर काशी में अपना जीवन व्यतीत करने दे।

3. बादशाह मुझे सकुशल घर जाने की अनुमति दे, इसके बदले में वे समस्त शाही दुर्ग जो अब मेरे अधिकार में हैं, बादशाह को सौंप दिए जाएंगे।

औरंगजेब ने इनमें से एक भी बात मानने से इन्कार कर दिया। शिवाजी को लगा कि उन्हें मृत्यु-दण्ड दिया जाएगा। इसलिए उन्होंने बादशाह को एक और पत्र भिजवाया जिसमें कहा गया कि मुझे भले ही आगरा में रोककर रखा जाए किंतु मेरे साथियों को आगरा से महाराष्ट्र लौट जाने की अनुमति दी जाए।

शिवाजी का यह प्रस्ताव बादशाह के काम को सरल बनाने वाला था, इसलिए इसकी तुरंत स्वीकृति मिल गई। इस स्वीकृति के मिलते ही शिवाजी एवं शंभाजी तथा उनके निजी सेवकों एवं अंगरक्षकों को छोड़कर शेष व्यक्ति आगरा छोड़कर चले गए। अब बादशाह द्वारा शिवाजी को आसानी से मारा जा सकता था।

जब शिवाजी के सिपाही आगरा से चले गए तो शिवाजी ने अपने हाथी-घोड़े, सोना, चांदी, कपड़े आदि बांटने आरम्भ कर दिए।

उधर जब दक्षिण के मोर्चे पर बैठे कच्छवाहा राजा जयसिंह को आगरा की घटनाओं के बारे में ज्ञात हुआ तो उसे शिवाजी के प्राणों की चिंता हुई। उसने बादशाह को पत्र लिखा कि शिवाजी मेरी जमानत पर आपके सम्मुख आया था, इसलिए उसके प्राण नहीं लिए जाएं।

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अंत में औरंगजेब ने एक खतरनाक जाल बुना। उसने शिवाजी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह अफगानिस्तान जाकर मुगल सेना की तरफ से लड़ाई करे। इस समय अफगानिस्तान में लड़ रही उस सेना का सेनापति रदान्द खाँ नामक एक दुष्ट व्यक्ति था। औरंगजेब की योजना यह थी कि शिवाजी को रदान्द खाँ के हाथों मरवाया जाए ताकि सबको लगे कि यह एक हादसा था।

शिवाजी पहले ही मना कर चुके थे कि वे मुसलमान बादशाह की नौकरी नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंने भी औरंगजेब के चंगुल से छूटने की एक योजना बनाई। औरंगजेब की तरफ से अफगानिस्तान जाने का प्रस्ताव मिलते ही शिवाजी बीमार पड़ गए और प्रतिदिन सायंकाल में भिखारियों एवं ब्राह्मणों को फल और मिठाइयां बांटकर उनसे आशीर्वाद लेने लगे।

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प्रतिदिन संध्याकाल में कहार, बांस की बड़ी-बड़ी टोकरियों में फल और मिठाइयां लाते और शिवाजी उन्हें स्पर्श करके, दान करने के लिए बाहर भेज देते। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। उन टोकरियों की गहराई से छान-बीन होती थी। जब इस प्रकार फल बांटते हुए कई दिन हो गए तो टोकरियों की जांच में ढिलाई बरती जाने लगी।

17 अगस्त 1666 को बादशाह ने आदेश दिया कि शिवाजी तथा उसके पुत्र संभाजी को राजकुमार रामसिंह के सरंक्षण से हटाकर एक मुस्लिम सेनापति की कैद में रखा जाए।

उसी दिन संध्याकाल में हीरोजी फरजंद नामक एक सेवक शिवाजी के कपड़े पहनकर शिवाजी के पलंग पर सो गया तथा शिवाजी एवं सम्भाजी, फलों की अलग-अलग टोकरियों में बैठ गए। इन टोकरियों को शिवाजी के अनुचरों ने उठाया तथा ब्राह्मणों को वितरित किए जाने वाले फलों की टोकरियों के साथ ही, रामसिंह की हवेली से बाहर निकल गए।

कुछ दूर जाने पर शिवाजी और सम्भाजी टोकरियां से बाहर निकले तथा वेष बदल कर यमुनाजी के किनारे-किनारे चलते हुए एक निर्जन स्थान पर पहुंचे। यहाँ रात के अंधेरे में उन्होंने नदी पार की। पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार शिवाजी के सिपाही घोड़े लेकर तैयार खड़े थे। शिवाजी और सम्भाजी उन घोड़ों पर बैठकर मथुरा की ओर रवाना हो गए।

उधर रामसिंह की हवेली में हीरोजी फरजंद शिवाजी के पलंग पर सुबह तक सोया रहा। उसके हाथ में पहना हुआ शिवाजी का सोने का कड़ा दूर से ही चमक रहा था। इसलिए पहरेदार भ्रम में रहे कि पलंग पर बीमार शिवाजी सो रहे हैं।

प्रातः होने पर हीरोजी ने पहरेदारों से कहा कि छत्रपति महाराज बहुत बीमार हैं अतः बाहर किसी तरह का शोर नहीं किया जाए। थोड़ी देर में वह भी महल से निकलकर भाग गया। किसी को कुछ भी भनक नहीं लग सकी। दोपहर में शहर कोतवाल शिवाजी के कमरे की जांच करने आया तो उसने पलंग की भी जांच की तो उसे ज्ञात हुआ कि शिवाजी का पलायन हो चुका है।

कोतवाल ने तत्काल बादशाह के महल में पहुंचकर बादशाह को शिवाजी का पलायन हो जाने की सूचना दी। कुछ ही देर में पूरे आगरा में यह अफवाह फैल गई कि शिवाजी अपनी जादुई शक्ति के बल पर रामसिंह की हवेली से अदृश्य हो गए। मुगल सिपाही और जासूस चप्पे-चप्पे पर मौजूद थे किंतु किसी भी व्यक्ति या पहरेदार ने शिवाजी को भागते हुए नहीं देखा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

संभाजी की वापसी (62)

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संभाजी की वापसी

जिस तरह शिवाजी की आगरा से रायगढ़ तक वापसी अत्यंत कठिनाईयों से भरी थी, उसी प्रकार संभाजी की वापसी भी आसान नहीं थी। सबसे बड़ी कठिनाई थी, उनकी पहचान छिपाना ! एक बार तो एक ब्राह्मण दम्पत्ति ने संभाजी को अपनी थाली में भोजन खिलाकर सिद्ध किया कि यह ब्राह्मण पुत्र है, शिवाजी का पुत्र नहीं है।

शिवाजी को आगरा शहर में जोर-शोर से ढूंढा जाने लगा किंतु तब तक 18 घण्टे बीत चुके थे और शिवाजी मथुरा पहुंचकर अदृश्य हो गए थे। शिवाजी ने अपने पुत्र सम्भाजी को मथुरा में एक मराठी ब्राह्मण के घर रख दिया तथा स्वयं एक साधु का वेश बनाकर बुंदेलखण्ड होते हुए गौंडवाना प्रदेश की तरफ रवाना हो गए। उनके अंगरक्षक उनके शिष्यों के रूप में उनके साथ हो लिए, उन्होंने भी भगवा कपड़े पहन लिए थे जिनके भीतर तलवारें छिपी हुई थीं।

शिवाजी के सैंकड़ों सिपाही वस्तुतः आगरा से निकल कर महाराष्ट्र नहीं गए थे अपितु पहले से ही निर्धारित योजना के अनुसार एक निश्चित स्थान पर रुककर अपने स्वामी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। शिवाजी के सैनिक भी किसानों एवं साधुओं के वेश में शिवाजी से कुछ दूरी पर चलते रहे। ताकि संकट की किसी घड़ी में शिवाजी को सहायता पहुंचाई जा सके।

 जब शिवाजी और उनके साथी गौंडवाना से कर्नाटक जा रहे थे, तब मार्ग में एक किसान, कुछ साधुओं को भोजन करवा रहा था। शिवाजी को भी सन्यासी समझकर भोजन के लिए आमंत्रित किया गया। जब शिवाजी, साधुओं के साथ पंक्ति में बैठकर भोजन कर रहे थे तब अचानक उस किसान की औरत यह कहकर साधुओं से क्षमा मांगने लगी कि हमोर घर में कुछ भी नहीं है इसलिए साधुओं को इतना साधारण भोजन करवाया जा रहा है। यदि मराठे हमारे परिवार का धन लूट कर नहीं ले गए होते तो हम साधुओं को अच्छा भोजन करवाते।

शिवाजी को उस गृहिणी की बात सुनकर अपार कष्ट हुआ और उनका सामना एक कड़वी सच्चाई से हुआ कि उनके अपने मराठा सैनिक मुगलों के राज्य में रहने वाली हिन्दू प्रजा को भी लूट रहे थे।

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रामसिंह कच्छवाहा के पहरे से निकलने के पच्चीसवें दिन शिवाजी, सन्यासी के वेश में अपनी माता जीजाबाई के समक्ष राजगढ़ में प्रकट हुए। जीजा ने अपने शेर को छाती से लगा लिया। समर्थ गुरु रामदास का शिष्य अपने हौंसले के बल पर आगरे के लाल किले की नाक काट लाया था। जहाँ से चिड़िया का भी बच निकलना कठिन था, वहाँ से शिवाजी अपनी सेना सहित पूर्णतः सुरक्षित निकल आए थे, यह बात उस युग की किसी चमत्कारी घटना से कम नहीं थी!

अपनी राजधानी में पहुंचकर शिवाजी ने सबसे पहले उसी किसान परिवार को अपने महल में आमंत्रित किया जिसके यहाँ उन्होंने सन्यासी के वेश में भोजन किया था तथा किसान की पत्नी को मराठा सैनिकों को कोसते हुए सुना था। शिवाजी ने उस महिला से क्षमा-याचना की तथा उसे बहुत सारा धन देकर संतुष्ट किया।

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उधर मथुरा में मुगल सिपाही उस मराठी-ब्राह्मण के घर पहुंच गए जहाँ एक नया बालक रहने के लिए आया था। जब मुगल अधिकारियों ने ब्राह्मण दम्पत्ति से पूछा कि यह कौन है तो उन्होंने कहा कि यह हमारा भतीजा है तथा कुछ दिन हमारे साथ रहने के लिए महाराष्ट्र से आया है। इस पर मुगलों को ब्राह्मण दम्पत्ति का विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि यदि यह भतीजा है तो ब्राह्मण दम्पत्ति उसके साथ एक ही थाली में भोजन करके दिखाए।

महाराष्ट्र में शिवाजी का कुल कुछ नीचा समझा जाता था इसलिए एक ब्राह्मण के लिए यह संभव नहीं था कि वह संभाजी के साथ एक ही थाली में भोजन करे किंतु ब्राह्मण को अपना धर्म बचाने के स्थान पर शरणागत संभाजी के प्राणों की रक्षा करना अधिक आवश्यक प्रतीत हुआ। इसलिए ब्राह्मण दम्पत्ति ने मुगलों के समक्ष संभाजी को अपने पास बैठाकर अपनी थाली में भोजन करवाया।

मुगल अधिकारी आश्वस्त होकर चले गए। जब यह बात शिवाजी तक पहुंची तो शिवाजी उस समय मार्ग में ही थे। इसलिए उन्होंने रायगढ़ पहुंचकर यह प्रचारित कर दिया कि मार्ग में सम्भाजी की मृत्यु हो गई है। शिवाजी ने रायगढ़ में सम्भाजी के समस्त संस्कार एवं क्रियाकर्म विधि-पूर्वक सम्पन्न कराए ताकि मुगलों को भ्रम में डाला जा सके और वे सम्भाजी को ढूंढने का प्रयास नहीं करें। एक तरफ तो यह झूठी खबर फैलाई गई और दूसरी तरफ संभाजी की वापसी की नए सिरे से पूरी व्यवस्था की गई।

कुछ दिनों बाद मथुरा का ब्राह्मण परिवार स्वयं ही 8 वर्ष के बालक सम्भाजी को लेकर रायगढ़ पहुंच गया। शिवाजी एवं सम्भाजी के सकुशल रायगढ़ पहुंचने का समाचार देश भर में फैल गया। पूरे महाराष्ट्र में दीपावली मनाई गई। जनता के बीच शिवाजी की रहस्यमयी शक्तियों के बारे में और अधिक विस्तार से प्रचार हो गया। उनकी सकुशल वापसी पर देश के अनेक हिस्सों में हर्ष मनाया गया और मिठाइयां वितरित की गईं। शिवाजी के पड़ौसी मुस्लिम राज्यों में शिवाजी का आतंक और भी अधिक गहरा गया। आखिर वे लाल किले का मानभंग करके अपनी राजधानी सकुशल लौट आए थे!

औरंगजेब को जब शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी की वापसी के समाचार मिले तो वह अपमान और क्रोध से तिलमिलका कर रह गया। उसे रह-रह कर हरम की औरतों की चीख-पुकार याद आ रही थी। यदि औरंगजेब ने हरम की औरतों का कहना मान लिया होता और शिवाजी को उसी समय मरवा दिया होता तो आज औरंगजेब को अपमान का यह कड़वा घूंट नहीं पीना पड़ता! किंतु अब कुछ नहीं हो सकता था, अब तो चिड़िया खेत चुग कर फुर्र हो चुकी थी।

औरंगजेब ने शिवाजी के आगरा से निकल भागने के लिए मिर्जाराजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह को जिम्मेदार ठहराया। उसने राजकुमार रामसिंह को औरंगजेब के दरबार में आने से मनाही कर दी तथा उसका पद भी छीन लिया। उधर मिर्जाराजा जयसिंह भी दक्षिण में चुपचाप बैठकर औरंगजेब के अगले आदेश की प्रतीक्षा करता रहा। शिवाजी की रायगढ़ वापसी की तरह संभाजी की वापसी भी मराठा इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी।

आगरा से लौट आने के बाद शिवाजी कुछ दिन तक पूरी तरह शांत होकर बैठे रहे किंतु वे मुगलों का आक्रमण होने की स्थिति में प्रजा की सुरक्षा करने का प्रबंध भी करते रहे। अंततः औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह को दक्षिण से हटा दिया तथा आगरा आकर दरबार में उपस्थिति देने के आदेश दिए।

औरंगजेब के शहजादे मुअज्जम को पुनः दक्षिण का सूबेदार बनाया गया तथा महाराजा जसवंतसिंह को मुअज्जम के साथ फिर से दक्षिण जाने के आदेश दिए गए। सेनापति दिलेर खाँ को दक्षिण में रहने के आदेश दोहराए गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू राजाओं की सुन्नत (63)

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हिन्दू राजाओं की सुन्नत

औरंगजेब अपने जीवन काल में ही भारत को मुसलमानों की भूमि बनाना चाहता था। इसके लिए उसने जीवन भर भयानक षड़यंत्र रचे। एक बार उसने हिन्दू राजाओं की सुन्नत करने का षड़यन्त्र रचा!

बाबर से लेकर औरंगजेब तक सारे मुगल बादशाहों की इच्छा रही कि पूरे हिन्दुस्तान को इस्लाम में परिवर्तित कर लिया जाये किंतु हिन्दू जनता के प्रतिरोध और हिन्दू धर्म-गुरुओं के प्रयत्नों के कारण ऐसा करना संभव नहीं हो सका। हिन्दू धर्म और इस्लाम में बहुत सी ऐसी बातें थीं जिनके कारण ये दोनों एक दूसरे के निकट नहीं आ सके।

हिन्दू सदियों से चले आ रहे मूर्ति-पूजन, गौ-संरक्षण, गंगा-स्नान, बहुदेव-पूजन, जाति-प्रथा एवं सगोत्रीय-विवाह-निषेध आदि बातों को छोड़ने को तैयार नहीं थे जबकि इस्लाम इन बातों को सहन करने को तैयार नहीं था। हिन्दू, चोटी तिलक एवं जनेउ को छोड़ने को तैयार नहीं थे जबकि इस्लाम सुन्नत, अजान और हज में विश्वास रखता था। इसी प्रकार के और भी बहुत से कारण थे जिनके कारण देनों के बीच की दूरियां बनी रहीं।

जब छत्रपति शिवाजी आगरा से निकल भागे तो औरंगजेब को लगा कि समस्त हिन्दू राजाओं ने मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध षड़यंत्र किया है तथा शिवाजी को आगरा से निकल भागने में सहायता पहुंचाई है। इसलिए औरंगजेब मन ही मन समस्त हिन्दू राजाओं के विनाश का उपाय सोचने लगा।

ई.1192 में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की हत्या से लेकर ई.1666 में शिवाजी के आगरा से भाग निकलने तक अर्थात् विगत लगभग 500 साल से मुस्लिम शासक भारत पर केन्द्रीय शक्ति के रूप में शासन कर रहे थे। भारत के बहुत से प्रांतों में भी मुस्लिम सूबेदार एवं सुल्तान हो गए थे किंतु अब भी हिन्दू-शासक इतनी बड़ी संख्या में थे तथा इतने शक्तिशाली थे कि उन्हें एक साथ नष्ट करना किसी भी केन्द्रीय शक्ति के लिए संभव नहीं था।

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यदि कोई भी मुस्लिम शासक इन्हें एक साथ नष्ट करने का प्रयास करता तो वह स्वयं ही नष्ट हो जाता। इसके विपरीत, यदि हिन्दू राजाओं को एक-एक करके नष्ट किया जाता तो इस कार्य में सदियां बीत जातीं। इसलिए औरंगजेब ऐसी योजना बनाने में लग गया जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे! स्वातंत्र्यपूर्व राजस्थान के सुप्रसिद्ध इतिहासकार महामहोपध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने बीकानेर राज्य का इतिहास नामक ग्रंथ में एक घटना का उल्लेख किया है।

यद्यपि यह घटना किसी भी मुस्लिम तवारीख में उपलब्ध नहीं है तथापि बीकानेर राज्य की कुछ प्राचीन ख्यातों एवं जयपुर राज्य की ख्यात में इस घटना का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार ई.1666 में औरंगजेब ने हिन्दू राजाओं के विरुद्ध एक भयानक षड़यंत्र रचा।

उसने अपने अधीनस्थ समस्त बड़े हिन्दू राजाओं और मुस्लिम अमीरों को इकट्ठा करके ईरान की ओर प्रस्थान किया। उसकी योजना थी कि वह समस्त हिन्दू राजाओं को ईरान ले जाकर एक साथ हिन्दू राजाओं की सुन्नत करवा दे ताकि सभी बड़े हिन्दू राजा एक साथ मुसलमान बन जाएं और भारत से कुफ्र का सफाया किया जा सके।

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बीकानेर की ख्यातों के अनुसार साहबे के एक सैयद फकीर को अस्तखां नामक एक मुगल अमीर से मालूम हुआ कि बादशाह सब को एक-दीन अर्थात् मुस्लिम करना चाहता है। उस फकीर ने इस बात की खबर बीकानेर नरेश महाराजा कर्णसिंह को दी। इस पर हिन्दू राजाओं ने एक गुप्त-बैठक की कि अब क्या करना चाहिये? उस समय औरंगजेब तथा समस्त हिन्दू राजा अटक नदी के इस तरफ डेरा डाले हुए थे जो कि भारत की अंतिम सीमा थी।

उन्हीं दिनों आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह की माता की मृत्यु का समाचार पहुंचा, जिससे हिन्दू राजाओं को 12 दिन तक वहीं पर रुक जाने का अवसर मिल गया। इसके बाद सारे राजा, महाराजा कर्णसिंह के पास गए और उससे कहा कि आपके बिना हमारा उद्धार नहीं हो सकता। आप यदि नावें तुड़वा दें तो हमारा बचाव हो सकता है, क्योंकि ऐसा होने से देश को प्रस्थान करते समय शाही सेना हमारा पीछा नहीं कर सकेगी।

बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने धर्म की रक्षा के लिये अपना सिर कटवाने का निश्चय करके योजना निर्धारित की कि बादशाह को अटक नदी के पार चले जाने दिया जाए। जब बादशाह चला जाए तब सारे हिन्दू सरदार नदी पार करने की बजाय अपनी-अपनी नावें जलाकर अपने-अपने राज्य को लौट जायें।

इस निश्चय के अनुसार, जैसे ही बादशाह ने नदी पार की वैसे ही हिन्दू नरेशों ने नावें इकट्ठी करके उनमें आग लगा दी। इसके बाद वहाँ उपस्थित समस्त हिन्दू राजाओं ने महाराजा कर्णसिंह का बड़ा सम्मान किया और उसे जंगलधर पादशाह की उपाधि दी। इस उपलक्ष्य में बीकानेर नरेश ने साहिबे के फकीर को बीकानेर राज्य में प्रतिघर प्रतिवर्ष एक पैसा उगाहने का अधिकार प्रदान किया।

जैसे ही औरंगजेब को हिन्दू राजाओं के निश्चय का पता लगा तो वह कुरान हाथ में लेकर फिर से नदी पार करके अटक के इस पार आया। उसने राजाओं से नावें जलाने का कारण पूछा। तब राजाओं ने जवाब दिया कि- ‘तुमने तो हमें मुसलमान बनाने का षड़यंत्र रच लिया इसलिये तुम हमारे बादशाह नहीं। हमारा बादशाह तो बीकानेर का राजा है। जो वह कहेगा वही करेंगे, धर्म छोड़कर जीवित नहीं रहेंगे।’

तब औरंगजेब ने समस्त राजाओं के सामने कुरान हाथ में रखकर कसम खाई कि- ‘अब ऐसा नहीं होगा, जैसा तुम लोग कहोगे, वैसा ही करूंगा। आप लोग मेरे साथ दिल्ली चलो। आप लोगों ने कर्णसिंह को जंगलधर बादशाह कहा है तो वह जंगल का ही बादशाह रहेगा।’

इस प्रकार हिन्दू राजाओं की सुन्नत तो नहीं हो सकी। हिन्दू नरेशों की एकता एवं दृढ़ता को देखकर औरंगजेब की हिम्मत नहीं हुई कि उनके साथ कोई जबर्दस्ती करे किंतु कुछ समय बाद औरंगजेब ने अपनी सेना को बीकानेर राज्य पर आक्रमण करने के आदेश दिए। कुछ दिन बाद औरंगजेब ने सेना के अभियान को रोक दिया तथा एक संदेशवाहक को बीकानेर भेजकर महाराजा कर्णसिंह को बादशाह के समक्ष उपस्थित होने के आदेश भिजवाए।

महाराजा कर्णसिंह अपने दो कुंवरों केसरीसिंह तथा पद्मसिंह को अपने साथ लेकर औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हुआ। औरंगजेब की योजना थी कि महाराजा कर्णसिंह को आगरा में मरवा दिया जाए तथा उसके बाद महाराजा कर्णसिंह के दासी-पुत्र वनमालीदास को बीकानेर का शासक बना दिया जाए जिसने राज्य मिलने के बाद मुसलमान हो जाने का वचन दिया था।

जब औरंगजेब ने देखा कि कि हिन्दू राजाओं की सुन्नत को रोकने वाले महाराजा कर्णसिंह के साथ राजकुमार केसरीसिंह तथा पद्मसिंह भी आए हैं तो औरंगजेब महाराजा कर्णसिंह की हत्या करवाने का साहस नहीं कर सका। क्योंकि ये वही केसरीसिंह तथा पद्मसिंह थे जिन्होंने शाहशुजा और औरंगजेब के बीच हुई खजुआ की लड़ाई में औरंगजेब के पक्ष में युद्ध किया था तथा विपुल पराक्रम का प्रदर्शन करके औरंगजेब को जीत दिलाई थी।

उस समय औरंगजेब इन दोनों राजकुमारों के अहसान के तले इतना दब गया था कि युद्ध समाप्त होने के बाद औरंगजेब ने अपनी जेब से रूमाल निकालकर केसरी सिंह तथा पद्म सिंह के बख्तरबंदों की धूल झाड़ी थी। अब वह उन्हीं राजकुमारों की आंखों के सामने उनके पिता कर्णसिंह की हत्या कैसे कर सकता था!

अतः औरंगजेब ने महाराजा कर्णसिंह की हत्या करने का विचार त्याग दिया तथा उसे पदच्युत करके औरंगाबाद भेज दिया। बीकानेर का राज्य महाराजा कर्णसिंह के बड़े पुत्र अनूपसिंह को दे दिया गया। औरंगाबाद पहुंचने के बाद महाराजा कर्णसिंह एक साल तक जीवित रहा। 22 जून 1669 को औरंगाबाद में ही महाराजा कर्णसिंह का निधन हुआ जहाँ आज भी उसकी छतरी बनी हुई है। महाराजा कर्णसिंह ने औरंगाबाद में कर्णसिंह पुरा नामक एक उपनगर बसाया जिसे आज भी कर्णपुरा मौहल्ले के नाम से जाना जाता है।

महाराजा कर्णसिंह का पुत्र महाराजा अनूपसिंह अपने समय का विख्यात राजा हुआ। उसने औरंगजेब की तरफ से दक्षिण के मोर्चे पर दीर्घकाल तक सेवाएं दीं तथा दक्षिण के मोर्चे पर तोड़े जाने वाले हिन्दू मंदिरों से प्रतिमाएं निकालकर बीकानेर भिजवाईं। महाराजा कर्णसिंह के छोटे कुंअर पद्मसिंह एवं केसरीसिंह औरंगजेब की तरफ से दक्षिण के मोर्चे पर लड़ते हुए मारे गए।

राजकुुमार पद्मसिंह को बीकानेर राजवंश का अब तक का सबसे वीर पुरुष माना जाता है। उसकी तलवार का वजन आठ पौण्ड तथा खाण्डे का वजन पच्चीस पौण्ड था। वह घोड़े पर बैठकर बल्लम से शेर का शिकार किया करता था। इस प्रकार बीकानेर का वीर राजवंश भी लाल किले के षड़यंत्रों एवं कुचक्रों से बचा नहीं रह सका।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मिर्जाराजा जयसिंह (64)

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मिर्जाराजा जयसिंह

शिवाजी महाराज के आगरा से भाग जाने के बाद, औरंगजेब द्वारा कुंअर रामसिंह को अपदस्थ किए जाने तथा उसके पिता मिर्जाराजा जयसिंह को दक्खिन की सूबेदारी से च्युत किए से आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह बुरी तरह आहत हो गया। औरंगजेब का आदेश मिलते ही मिर्जाराजा जयसिंह तत्काल दक्षिण का मोर्चा छोड़कर औरंगाबाद की तरफ रवाना हो गया।

जयसिंह तथा उसके पूर्वज अकबर के समय से मुगलों की सेवा करते आए थे तथा मुगलों और कच्छवाहों की मैत्री को अब सौ साल से अधिक हो गए थे। पिछले सौ साल में कच्छवाहों ने अपने राज्य में एक गज धरती भी नहीं बढ़ाई थी, वे हर समय मुगलों का राज्य स्थिर करने एवं उसका विस्तार करने में लगे रहे थे।

जब ई.1621 में औरंगजेब के बाबा जहांगीर ने देखा कि आम्बेर रियासत में कोई वयस्क राजकुमार जीवित नहीं बचा है तो जहांगीर ने अपनी इच्छा से 11 वर्षीय राजकुमार जयसिंह को आम्बेर का राजा बनाया था। तब से जयसिंह मुगलों की नौकरी करता आ रहा था। उसने 6 वर्ष तक जहांगीर की और 31 वर्ष तक शाहजहाँ की सेवा की थी तथा अब विगत 6 वर्षों से औरंगजेब की सेवा कर रहा था।

ई.1635 में जयसिंह ने शिवाजी के पिता शाहजी भौंसले के 3 हजार सिपाही और 8 हजार बैल पकड़े थे। इन बैलों पर बड़ा भारी तोपखाना और बारूद लदा हुआ था। इससे प्रसन्न होकर ई.1636 में शाहजहाँ ने जयसिंह को ‘मिर्जा-राजा’ की उपाधि दी थी। तब से मिर्जाराजा जयसिंह शाहजी एवं शिवाजी को हानि पहुंचाता आ रहा था।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

मिर्जाराजा जयसिंह को रह-रह कर वे पुराने दिन याद आते थे जब ई.1647 में शाहजहाँ बल्ख और बदख्शां में असफल होकर काबुल में फंस गया था और धन की कमी के कारण उसकी हालत पतली हो गई थी, तब मिर्जाराजा जयसिंह आगरा से 1 करोड़ 20 लाख रुपये, बारूद तथा रसद लेकर काबुल पहुंचा था जिसके कारण शाहजहाँ का काबुल से जीवित बच निकलना संभव हो पाया था।

शाहजहाँ के जीवन काल में ही एक बार औरंगजेब भी बल्ख में फंस गया। तब मिर्जाराजा जयसिंह उसे उजबेगों से बचाकर काबुल ले आया था। जब शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तब वली-ए-अहद दारा शिकोह द्वारा मिर्जाराजा जयसिंह को दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह का संरक्षक बनाया गया था किंतु जयसिंह ने दारा शिकोह का साथ छोड़कर औरंगजेब का साथ दिया था, अजमेर के युद्ध की जीत का बहुत बड़ा श्रेय मिर्जाराजा जयसिंह को ही था। इतना ही नहीं जयसिंह ने औरंगजेब के धुर विरोधी महाराजा जसवंतसिंह को भी औरंगजेब के पक्ष में कर रखा था।

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औरंगजेब पर मिर्जाराजा जयसिंह के उपकारों की सूची बहुत लम्बी थी। उत्तराधिकार के युद्ध के दौरान औरंगजेब के ओदश से मिर्जाराजा जयसिंह दारा शिकोह की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ गया था। जहाँ-जहाँ दारा गया, जयसिंह उसका दुर्भाग्य बनकर उसके पीछे लगा रहा। अंत में जयसिंह की सहायता से ही दारा को पकड़ा गया था और उसे भयानक अपमान एवं पीड़ादायक मृत्यु के हवाले किया गया था। औरंगजेब मिर्जाराजा जयसिंह से इतना प्रसन्न था कि उसने मिर्जाराजा जयसिंह को शिवाजी को पकड़ने या मारने की विशेष जिम्मेदारी सौंपी थी।

दक्खिन में पहुंचकर जयसिंह ने शिवाजी की सेना को बहुत क्षति पहुंचाई थी जिसके परिणाम स्वरूप 11 जून 1665 को छत्रपति शिवाजी तथा मुगलों के बीच पुरंदर की दुर्भाग्यपूर्ण संधि हुई थी। इस संधि के लिये छत्रपति को मिर्जाराजा जयसिंह ने अपनी तलवार के जोर पर विवश किया था। यह संधि मिर्जाराजा के जीवन की सबसे बड़ी सफलता और शिवाजी के जीवन की सबसे बड़ी विफलता थी। इस संधि के परिणाम स्वरूप शिवाजी ने अपने अधिकार वाले 35 दुर्गों में से 23 दुर्ग औरंगजेब को सौंप दिये थे।

इस प्रकार औरंगजेब का पिता शाहजहाँ तथा स्वयं औरंगजेब मिर्जाराजा जयसिंह के अहसानों के बोझ तले दबे हुए थे किंतु शिवाजी के आगरा से भाग निकलने के कारण औरंगजेब जयसिंह तथा उसके पूर्वजों के समस्त पिछले उपकारों और अहसानों को भूल गया तथा उसने जयसिंह को आगरा में बुलाकर अपमानित करने का निश्चय किया।

औरंगजेब के आदेश से मिर्जाराजा जयसिंह औरंगाबाद होता हुआ बुरहानपुर के लिए रवाना हुआ। 28 अगस्त 1667 को बुरहानपुर में ही मिर्जाराजा जयसिंह की मृत्यु हो गई। वह भी अपने बाबा मानसिंह की तरह टूटा हुआ हृदय लेकर इस असार संसार से गया। जीवन भर की गई मुगलों की सेवा का यही अंतिम पुरस्कार जयसिंह को मिला जैसा कि उसके बाबा मानसिंह को भी पूर्व में अपमानजनक मृत्यु के रूप में मिला था।

अंग्रेज इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इण्डिया के पृष्ठ संख्या 427-428 पर लिखा है- ‘औरंगजेब के कहने से आम्बेर नरेश जयसिंह के पुत्र कीरतसिंह ने अपने पिता मिर्जाराजा जयसिंह को जहर दे दिया जिससे महाराजा की मृत्यु हो गई।’ हालांकि जयपुर राज्य की ख्यातें तथा मुगल तवारीखें इस तथ्य की पुष्टि नहीं करतीं। वे केवल मिर्जाराजा की बुरहानपुर में मृत्यु हो जाने का उल्लेख करती हैं।

औरंगजेब का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘जयसिंह की मृत्यु एलिजाबेथ के दरबार के सदस्य वॉलघिंम की भांति हुई जिसने अपना बलिदान ऐसे स्वामी के लिये किया जो काम लेने में कठोर तथा काम के मूल्यांकन में कृतघ्न था।’

छत्रपति तथा उनका पुत्र शंभाजी, कच्छवाहा राजकुमार रामसिंह के पहरे से भाग निकले थे, इस बात को औरंगजेब जीवन-पर्यंत नहीं भुला सका। यहाँ तक कि अपने वसीयतनामे में भी औरंगजेब ने इस घटना का उल्लेख इन शब्दों में किया- ‘देखो, किस प्रकार उस अभागे शिवा का पलायन जो असावधानी के कारण हुआ, मुझे मृत्यु-पर्यंत परेशान करने वाली मुहिमों में उलझाये रहा।’

शिवाजी द्वारा औरंगजेब को इतना अपमानित किए जाने पर भी औरंगजेब ने अपनी मक्कारी नहीं छोड़ी। उसने शिवाजी को पत्र लिखकर उसे फिर से आगरा बुलवाया। 6 मई 1667 के फारसी रोजनामचे में लिखा है- ‘बादशाह ने वजीरे आजम को हुक्म दिया कि शिवा के वकील को बुलाए, उसे आश्वस्त करे और दो महीने में लौटने की शर्त पर शिवा को सूचित करे कि हुजूरे अनवर ने उसके गुनाहों को माफ कर दिया है। उसके पुत्र सम्भाजी को 5000 का मनसब बहाल किया गया है। वह अपनी शक्ति के अनुसार बीजापुर का जितना इलाका छीन सकता है, छीन ले। अन्यथा अपने स्थान पर डटा रहे और बादशाह के बेटे का हुक्म माने।’

शिवाजी ने औरंगजेब के आदेश की अनदेखी कर दी तथा दोनों ओर से शांति बनी रही। इस पर 9 मार्च 1668 को शहजादे मुअज्जम ने शिवाजी को पत्र लिखकर सूचित किया- ‘जहांपनाह ने आपको राजा की उपाधि देकर आपका सिर ऊंचा किया है जो कि आपकी उच्चतम अभिलाषा है।’

औरंगजेब द्वारा शिवाजी के प्रति इस प्रकार आदर और सम्मान प्रकट किए जाने पर शिवाजी ने अपने पुत्र संभाजी को मुगल शहजादे मुअज्जम के शिविर में जाने की अनुमति दे दी क्योंकि औरंगजेब ने संभाजी को पांच हजारी मनसबदार घोषित किया था। मुअज्जम और संभाजी के समवयस्क होने के कारण उन दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई।

औरंगजेब के सेनापति दिलेर खाँ को मुअज्जम और संभाजी की यह दोस्ती अच्छी नहीं लगी। उसने औरंगजेब को पत्र लिखकर सूचित किया कि शहजादा मुअज्जम, मराठों के साथ मिलकर स्वयं बादशाह बनने का षड़यंत्र रच रहा है। दिलेर खाँ का पत्र पाकर औरंगजेब ने मुअज्जम को आदेश भिजवाया कि वह सम्भाजी को दिल्ली भेज दे।

मुअज्जम को दिलेर खाँ के षड़यंत्र के बारे में पता लग गया और उसने सम्भाजी को सावधान कर दिया। इस पर सम्भाजी शिकार खेलने के बहाने से एक दिन अपने साथियों सहित मुगलों के शिविर से बाहर निकला और भागकर पूना चला गया।

इस प्रकार दक्षिण भारत में कुछ दिनों के लिए हुई शांति में एक बार फिर से विघ्न पड़ गया और लाल किला अपने षड़यंत्रों में सफल नहीं हो सका।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वीर गोकुला जाट (65)

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वीर गोकुला जाट

औरंगजेब ने आगरा के लाल किले में वीर गोकुला जाट के टुकड़े करवाए! औरंगजेब किसी भी कीमत पर भारत से हिन्दू धर्म को मिटाना चाहता था। ब्राह्मण, वैश्य, मराठे, राजपूत, सिक्ख, सतनामी आदि कोई भी ऐसी जाति नहीं थी जिसे कुचलने के लिए औरंगजेब ने कोई न कोई षड़यंत्र न किया हो। वीर गोकुला जाट भी उसी की एक कड़ी थी।

जाट एक अत्यंत प्राचीन भारतीय समुदाय है। यह प्रायः कृषि एवं पशुपालन से जुड़ा हुआ, सम्पन्न, परिश्रमी एवं संघर्षशील विशेषताओं से युक्त है जो उत्तर भारत के उपाजाऊ मैदानों एवं मध्य भारत के उपाजाऊ पठार में बड़ी संख्या में निवास करता आया है। उत्तर भारत के दिल्ली, पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश के  भरतपुर, धौलपुर, आगरा, मथुरा, मेरठ हिसार, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, नागौर, जोधपुर तथा बाड़मेर आदि जिलों में बड़ी संख्या में जाट निवास करते हैं।

गंगा-यमुना के दो-आब में निवास करने के कारण जाटों को मुसलमान शासकों के हाथों दीर्घकाल तक उत्पीड़न झेलना पड़ा जिसके कारण इनमें संघर्ष करने की प्रवृत्ति विकसित हो गई।

पहले तुर्कों एवं बाद में मुगलों के शासन काल में ब्रज-क्षेत्र के जाट मुस्लिम सैनिकों के अत्याचारों के बावजूद अपनी जमीनों पर अपना नियंत्रण बनाये रखने में सफल रहे। इस कारण उनमें संगठित होकर लड़ने की प्रवृत्ति का निरंतर विकास हुआ। मुस्लिम सेनाओं के विरुद्ध छोटे-छोटे समूहों में संगठित होकर अपनाई गई लड़ाका प्रणाली, जाटों के राजनीतिक उत्थान के लिये वरदायिनी शक्ति सिद्ध हुई।

सत्रहवीं शताब्दी में आगरा, मथुरा, अलीगढ़, मेवात, मेरठ, होडल, पलवल तथा फरीदाबाद से लेकर दक्षिण में चम्बल नदी के तट के पार गोहद तक जाट जाति का खूब प्रसार हो गया था। इस कारण यह विशाल क्षेत्र जटवाड़ा कहलाता था। इस क्षेत्र पर नियंत्रण रख पाना शाहजहाँ के लिये भारी चुनौती का काम हो गया। शाहजहाँ के काल में जाटों को घोड़े की सवारी करने, बन्दूक रखने तथा दुर्ग बनाने पर प्रतिबंध था।

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ई.1636 में शाहजहाँ ने ब्रजमण्डल के जाटों को कुचलने के लिये मुर्शीद कुली खाँ तुर्कमान को कामा, पहाड़ी, मथुरा और महाबन परगनों का फौजदार नियुक्त किया। उसने जाटों के साथ बड़ी नीचता का व्यवहार किया जिससे जाट मुर्शीद कुली खाँ के प्राणों के पीछे हाथ धोकर पड़ गये।

हुआ यह कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को मथुरा के पास यमुना के पार स्थित गोवर्धन में हिन्दुओं का बड़ा भारी मेला लगता था। मुर्शीद कुली खाँ भी हिन्दुओं का छद्म वेश धारण करके सिर पर तिलक लगाकर और धोती बांधकर उस मेले में आ पहुंचा। उसके पीछे-पीछे उसके सिपाही चलने लगे। उस मेले में जितनी सुंदर स्त्रियां थीं, उन्हें छांट-छांटकर उसने अपने सिपाहियों के हवाले कर दिया। उसके सिपाही उन स्त्रियों को पकड़कर नाव में बैठा ले गये। उन स्त्रियों का क्या हुआ, किसी को पता नहीं लगा।

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उस समय तो मुर्शीद कुली खाँ से कोई कुछ नहीं कह सका किंतु कुछ दिन बाद में ई.1638 में सम्भल के निकट स्थित जाटवाड़ नामक स्थान पर जाटों ने मुर्शीद कुली खाँ की हत्या कर दी। तब से जाटों और मुगलों में बुरी तरह से ठन गई।

शाहजहाँ ने जाटों को कुचलने के लिये आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह को नियुक्त किया। मिर्जाराजा जयसिंह ने जाटों, मेवों तथा गूजरों का बड़ी संख्या में सफाया किया तथा अपने विश्वस्त राजपूत परिवार इस क्षेत्र में बसाये।

जब भारत पर औरंगजेब का शासन हुआ तो औरंगजेब ने जाटों पर कड़ाई से नियंत्रण स्थापित करने की चेष्टा की। इस कारण जाट और अधिक भड़क गए। ई.1666 के आसपास ब्रज क्षेत्र के जाट तिलपत गांव के जमींदार गोकुला जाट के नेतृत्व में संगठित हुए।

इस पर औरंगजेब की सेना ने वीर गोकुला जाट को तंग करना शुरु कर दिया। मुगल सेना के अत्याचारों से तंग होकर गोकुला तिलपत छोड़कर महावन आ गया। उसने जाटों, मेवों, मीणों, अहीरों, गूजरों, नरूकों तथा पवारों को अपनी ओर मिला लिया तथा उन्हें इस बात के लिये उकसाया कि वे मुगलों को कर न दें।

कुछ समय बाद औरंगजेब के आदेश से मुगल सेनापति अब्दुल नबी खाँ ने गोकुला पर आक्रमण किया। उस समय गोेकुला सहोर गांव में था। जाटों ने अब्दुल नबी खाँ को मार डाला तथा मुगल सेना को लूट लिया। इसके बाद गोकुला ने सादाबाद गांव को जला दिया और उस क्षेत्र में भारी लूट-पाट की। अंत में औरंगजेब स्वयं मोर्चे पर आया और उसने जाटों को घेर लिया।

मुगल सैनिकों की विशाल संख्या के समक्ष जाटों की छोटी सी सेना का टिक पाना संभव नहीं था इसलिए जाटों की स्त्रियों ने जौहर किया तथा जाट वीर प्राण हथेली पर लेकर मुगलों पर टूट पड़े। इस संघर्ष में हजारों जाट मारे गये। उनके नेता वीर गोकुला जाट को हथकड़ियों में जकड़कर औरंगजेब के समक्ष ले जाया गया। औरंगजेब ने उससे कहा कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले। गोकुला ने इस्लाम मानने से मना कर दिया।

इस पर औरंगजेब ने 1 जनवरी 1670 को आगरा के लाल किले में स्थित कोतवाली के समक्ष वीर गोकुला जाट का एक-एक अंग कटवाकर फिंकवा दिया। पराजय, पीड़ा और अपमान का विष पीकर तिल-तिल प्राण गंवाता हुआ गोकुला अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिये विमल कीर्ति के अमल-धवल अमृत पथ पर चला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब को चुनौती (66)

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औरंगजेब को चुनौती

छत्रपति शिवाजी महाराज का सम्पूर्ण अस्तित्व ही धूर्त औरंगजेब को चुनौती था। औरंगजेब के समक्ष शिवाजी की शक्ति कुछ भी नहीं थी किंतु औरंगजेब शिवाजी को छू भी नहीं पाता था।

शिवाजी की आगरा यात्रा के लिए मिर्जाराजा जयसिंह के माध्यम से शिवाजी को शाही खजाने से 1 लाख रुपए दिए गए थे। जब शिवाजी आगरा से भाग निकले तो औरंगजेब ने मिर्जाराजा को आदेश दिए कि या तो वह शिवाजी से इस राशि की वसूली करे या वह स्वयं यह राशि शाही खजाने में जमा करवाए। इस बात से नाराज होकर छत्रपति शिवाजी ने दक्षिण में अब तक चली आ रही शांति को भंग करने तथा औरंगजेब को चुनौती देने का निर्णय लिया।

हम पूर्व में चर्चा कर चुके हैं कि दक्षिण में नियुक्त फौजदार दिलेर खाँ ने औरंगजेब को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि शहजादा मुअज्जम मराठों के साथ मिल गया है तथा उनकी सहायता से बादशाह बनना चाहता है। जब यह बात मुअज्जम को पता लगी तो उसने भी औरंगजेब को एक पत्र लिखकर दिलेर खाँ की शिकायत की।

मुअज्जम के साथ-साथ महाराजा जसवंतसिंह ने भी औरंगजेब को पत्र लिखकर दिलेर खाँ के विरुद्ध शिकायत की। इस पर दिलेर खाँ भयभीत हो गया और उसे डर लगा कि शहजादा मुअज्जम किसी भी दिन दिलेर खाँ की हत्या करवा सकता है। इसलिए दिलेर खाँ ने मुअज्जम से मिलना बंद कर दिया तथा गुजरात के सूबेदार बहादुर खाँ से औरंगजेब को एक पत्र लिखवाया कि दिलेर खाँ को दक्खिन से हटाकर गुजरात का फौजदार बना दिया जाए।

बादशाह ने बहादुर खाँ की यह सिफारिश स्वीकार कर ली। जब दिलेर खाँ गुजरात चला गया तो अक्टूबर 1670 में छत्रपति ने सूरत को दूसरी बार लूटने का निर्णय लिया ताकि दिलेर खाँ को दण्डित किया जा सके तथा औरंगजेब को युद्ध की खुली चुनौती दी जा सके।

जब यह बात दिलेर खाँ को ज्ञात हुई तो उसने गुजरात के अंग्रेज व्यापारियों से बादशाह को एक पत्र लिखवाया जिसमें शिवाजी तथा मुअज्जमशाह दोनों की शिकायत की गई थी।

इस पत्र में अंग्रेजों ने बादशाह को लिखा कि पहिले शिवाजी चोरों की तरह से आता था और लूटपाट करके जल्दी ही चला जाता था किंतु अब वह तीस हजार सैनिकों की एक बड़ी फौज लेकर देश पर देश जीतता हुआ आगे बढ़ता जाता है और शहजादे मुअज्जमशाह के इतने निकट होकर निकलता है जिससे ज्ञात होता है कि वह शहजादे की तनिक भी परवाह नहीं करता।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

1 अक्टूबर 1670 को सूरत के सरकारी कर्मचारियों को सूचना मिली कि शिवाजी 15 हजार घुड़सवारों की एक विशाल सेना लेकर सूरत से केवल 20 मील दूरी पर आ पहुंचा है। इस पर सरकारी कर्मचारी सूरत छोड़कर भागने लगे। अगले दिन 2 अक्टूबर को व्यापारियों ने भी सूरत छोड़ दिया। सूरत में केवल शाही सेना, ब्राह्मण परिवार, श्रमिक, निर्धन जनता और भिखारी ही बच गए।

3 अक्टूबर 1670 को शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण किया। अब तक सूरत शहर के चारों ओर एक मजबूत परकोटा बनाया जा चुका था। इसलिए मुगल सेना इस प्राचीर पर खड़े होकर शिवाजी की सेना पर गोलियां दागने लगीं किंतु शिवाजी की सेना ने मुगलों पर इतनी तेजी से दबाव बनाया कि मुगल सेना सूरत का परकोटा खाली करके किले के अंदर जा छिपी।

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शिवाजी के सैनिक सूरत में घुस गए और उन्होंने भारतीय व्यापारियों के साथ-साथ अंग्रेज डच, फ्रैंच, पुर्तगाली व्यापारियों की कोठियां एवं कारखाने घेर लिए। तुर्कों और ईरानी व्यापारियों ने कुछ समय पहले ही सूरत में एक नई सराय बनाई थी, जिसमें विदेशों से आए मुस्लिम व्यापारियों का जमावड़ा रहता था।

सूरत की तातार सराय में काशनगर के अपदस्थ बादशाह अब्दुल्ला खाँ ने डेरा डाल रखा था। वह कुछ दिन पहले ही हज करके लौटा था। इन सबको शिवाजी के सैनिकों ने अपने अधिकार में ले लिया।

फ्रांसीसियों ने शिवाजी को बड़े उपहार भेंट किए, इसलिए शिवाजी ने फ्रांसीसियों को भी छोड़ दिया। अंग्रेजों को इस समय तक मुगलों की दोस्ती का खुमार चढ़ चुका था इसलिए उन्होंने इस बार पहले जैसी दीनता नहीं दिखाई अपितु अपने कोठी पर नौसैनिक तैनात कर दिए जिन्होंने शिवाजी के सैनिकों से डटकर मुकाबला किया।

तातारों ने भी दिन भर मराठों का सामना किया। संध्याकाल में अवसर पाकर तातारी सैनिक अपने बादशाह अब्दुल्ला खाँ को लेकर किले के भीतर भाग गए। शिवाजी के सैनिकों ने तातारी सेना तथा उसके बादशाह का बहुमूल्य सामान लूट लिया।

उधर नई सराय में जो विदेशी तुर्क डेरा डाले हुए थे, उन्होंने मराठा सैनिकों को क्षति पहुंचाई। इस पर भी मराठों ने बड़ी आसानी से सूरत शहर के बड़े-बड़े घर लूट लिए और आधे सूरत शहर को जला कर राख कर दिया। 5 अक्टूबर 1670 को शिवाजी एवं उनकी सेना ने शहर खाली कर दिया। शिवाजी ने सूरत से आगे बढ़कर भड़ौंच तक धावे मारे तथा मुगलों की बहुत सी सम्पत्ति लूट ली।

जब मुगल सेना ने फिर से शहर में प्रवेश किया तो आकलन किया गया कि इस लूट में शिवाजी 66 लाख रुपए का माल ले गए थे। इस लूट के बाद धनी व्यापारियों ने हमेशा के लिए सूरत से मुंह मोड़ लिया। इसके बाद शिवाजी की सेना सूरत शहर में कभी नहीं आई किंतु जब तक शिवाजी जीवित रहे, तब तक कई बार यह अफवाह सूरत शहर में फैली कि शिवाजी अपनी सेना लेकर आ रहे हैं।

इस अफवाह के फैलते ही व्यापारी अपना माल-असबाब समुद्र में खड़े जहाजों में भरकर समुद्र में दूर-दूर तक भाग जाते थे। यूरोपीय व्यापारियों ने सुवाली में अपना ठिकाना बना लिया था। अब वे अपना कीमती सामान सुवाली में ही रखते थे। विदेशी सामान लेकर आने वाले जहाजों ने भी अब सूरत से मुंह मोड़ लिया। इससे औरंगजेब तथा जहानआरा दोनों को ही राजस्व की बड़ी हानि हुई किंतु वे शिवाजी के विरुद्ध कोई सख्त कार्यवाही नहीं कर सके।

यह शिवाजी द्वारा सूरत में की गई दूसरी बार की लूट थी। इसके माध्यम से छत्रपति ने शाहबेगम जहानआरा को संदेश दिया कि तू मुझे आगरा के लाल किले में मरवाना चाहती थी किंतु मैं फिर से सूरत को लूट रहा हूँ, मुगलिया सल्तनत जो कर सकती है कर ले!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
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डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

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चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...