Home Blog Page 155

ब्रजभूमि पर कहर (50)

0
ब्रजभूमि पर कहर - bharatkaitihas.com
ब्रजभूमि पर कहर

मजहबी कट्टरता से ग्रस्त औरंगजेब (Auranzeb) ने ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) ढाना आरम्भ किया तो फिर रुकने का नाम नहीं लिया। इस कहर से ब्रज तो उजड़ गया किंतु राजपूताना बस गया!

9 अप्रेल 1669 को जैसे ही औरंगजेब (Auranzeb) ने मुगल सल्तनत के समस्त हिन्दू मंदिरों को गिराने के आदेश दिए, वैसे ही ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) देखकर मथुरा और वृंदावन के मंदिरों के पुजारी और गुसाईंजन अपने-अपने अराध्यों की मूर्तियां लेकर रात के अंधेरों में गायब हो गए। कुछ दिनों तक जंगलों में छिपे रहने के बाद वे जयपुर, जोधपुर, किशनगढ़ तथा उदयपुर राज्यों में प्रकट होने लगे।

ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) के रूप में हिन्दू धर्म पर आए अभूतपूर्व संकट के समय राजपूत राजाओं ने दुष्ट औरंगजेब की जरा भी परवाह नहीं की, उन्होंने पुजारियों एवं गुसाइयों को ब्रज भूमि से निकल भागने में बड़ी सहायता की। महाप्रभु वल्लभाचार्यजी के वंशज गिरधर गुसाईंजी, बूंदी नरेश भावसिंह के सरंक्षण में भगवान मथुराधीश की विख्यात प्रतिमा को ब्रज से निकालकर बूंदी ले गए, जहाँ से यह प्रतिमा राजा दुर्जनशाल द्वारा कोटा ले जाई गई तथा उनके लिए कोटा में मथुरेशजी का विख्यात मंदिर बनवाया गया।

इस विग्रह का प्राकट्य गोकुल (Gokul) के निकट कर्णावल (Karnaval) गांव में हुआ था तथा यह विग्रह महाप्रभु वल्लभाचार्य (Mahaprabhu Vallabhacharya) ने अपने पुत्र विट्ठलनाथजी को दिया था। उन्होंने यह प्रतिमा अपने पुत्र गिरधरजी को दी थी। कोटा के मथुरेशजी मंदिर (Mathureshji Ka Mandir) को अब वल्लभ सम्प्रदाय की प्रथम पीठ माना जाता है।

इसी प्रकार ई.1669 में वृंदावन के विशाल गोविंददेव मंदिर (Govind Dev Mandir) के विग्रह को भी वृंदावन से निकालकर जयपुर पहुंचा दिया गया। इस विग्रह का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ (Raja Vajrnath) ने अपनी माता के मुख से सुने भगवान् श्रीकृष्ण के स्वरूप के आधार पर करवाया था। इस विग्रह को चैतन्य महाप्रभु के आदेश से उनके शिष्य रूप गोस्वामी ने गोमा टीले के नीचे से खोद कर प्राप्त किया था।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

ई.1590 में अकबर (Akbar) की अनुमति से आम्बेर के राजा मानसिंह (Raja Mansingh) ने वृंदावन में इस विग्रह हेतु एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था। मुगलकाल में इससे अधिक भव्य मंदिर नहीं बना था। अकबर ने इस मंदिर की गायों के चारागाह के लिए 135 बीघा भूमि प्रदान की थी। इसकी सातवीं मंजिल पर जलते हुए दीपों का प्रकाश आगरा तक दिखाई देता था।

जब औरंगजेब (Auranzeb) ने इस मंदिर को तोड़ने के आदेश दिए तो मंदिर के सेवादार शिवराम गोस्वामी, भगवान श्रीगोविंददेव और श्रीराधारानी के विग्रहों को लेकर जंगलों में जा छिपे।

ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) देखकर कुछ काल तक के लिए वैष्णव आचार्य हतप्रभ रह गए किंतु कुछ ही दिनों बाद वे भगवान श्रीगोविंददेव और श्रीराधारानी के विग्रहों को आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह के संरक्षण में वृंदावन से आम्बेर ले आए। अब यह प्रतिमा जयपुर के गोविंददेव मंदिर में विराजमान है। जयपुर के शासक गोविंददेव को राज्य का स्वामी तथा स्वयं को राज्य का दीवान मानते थे।  

To purchase this book, please click on photo.

ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) की ही कड़ी में ई.1670 में औरंगजेब (Auranzeb) के आदेश से वृंदावन में स्थित गोविंददेव का भव्य मंदिर तोड़ा गया। औरंगजेब ने वृंदावन के गोविंददेव मंदिर की तीन मंजिलों को तुड़वा दिया तथा अकबर द्वारा गौशाला के लिए दी गई 135 बीघा भूमि का पट्टा निरस्त कर दिया। ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) का यह सिलसिला औरंगजेब के जीवन काल में कभी नहीं रुका, वह बढत्रता ही रहा। ई.1670 में औरंगजेब के आदेश से मथुरा के केशवराय मन्दिर को तोड़कर उसके पत्थरों से उसी स्थान पर मस्जिद बनवाई गई तथा मथुरा (Mathura) का नाम बदलकर इस्लामाबाद (Islamabad) रख दिया गया। इस मंदिर से कई मूल्यवान प्रतिमाएं प्राप्त हुईं जिनमें हीरे-जवाहर लगे हुए थे। औरंगजेब ने इन प्रतिमाओं को बेगम साहिब की मस्जिद के रास्ते की सीढ़ियों में लगवा दिया ताकि उन्हें पैरों से ठोकर मारी जा सके। ब्रजभमि पर कहर का ऐसा दृश्य महमूद गजनवी एवं मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के समय में भी देखा गया था। गोविंददेवजी (Govind Dev Mandir) के साथ ही वृंदावन के मदनमोहनजी (Madan Mohan Madir) और गोपालजी (Goplaji) के विग्रह भी आम्बेर ले जाए गए थे।

इनमें से मदनमोहनजी तो बाद में करौली चले गए किंतु गोपालजी आज भी जयपुर के एक मंदिर में विराजमान हैं। जयपुर के गोविंद देवजी, करौली के मदन मोहनजी और जयपुर के गोपालजी की संयुक्त मूर्ति को परंपरागत रूप से त्रिभुवन बिहारी जी (Tribhuvan Bihari Ji) कहा जाता है।

29 सितम्बर 1669 को मथुरा के निकट गोवर्द्धन पर्वत (Govardhan Parvat) पर स्थित गिरिराज मंदिर के गुंसाई दामोदरजी, श्रीनाथजी को अपने साथ लेकर, अपने चाचा गोविन्दजी एवं अन्य पुजारियों के साथ गोवर्द्धन से राजपूताने की ओर रवाना हुए।

वे आगरा, बूंदी, कोटा एवं पुष्कर होते हुए किशनगढ़ पहुंचे। किशनगढ़ के महाराजा मानसिंह ने ‘पीताम्बर की गाल’ में भगवान को पूर्ण भक्ति सहित विराजमान करवाया और विविधत् उनकी पूजा की किंतु भगवान को किशनगढ़ में रखने में असमर्थता व्यक्त की।

इसलिए यहाँ से श्रीनाथजी जोधपुर राज्य के चौपासनी गांव पहुंचे। उस समय महाराजा जसवंतसिंह जमरूद के मोर्चे पर थे इसलिए राज्याधिकारियों ने आशंका व्यक्त की कि हम श्रीनाथजी के विग्रह (Idol of Sri Nath Ji) की रक्षा नहीं कर पाएंगे। इस पर मेवाड़ के गुसाइयों ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह (Maharana Rajsingh) से सम्पर्क किया। महाराणा ने गुसाइयों को वचन दिया कि मेवाड़ राज्य में एक लाख हिन्दुओं के सिर काटे बिना औरंगजेब श्रीनाथजी के विग्रह को स्पर्श नहीं कर पाएगा। इसलिए वे श्रीनाथजी को मेवाड़ ले आएं। इस प्रकार महाराणा राजसिंह के निमंत्रण पर ई.1672 में श्रीनाथजी मेवाड़ पधारे तथा उन्हें सिहाड़ गांव में विराजित किया गया जो अब नाथद्वारा (Nathdwara) कहलाता है।

चूंकि औरंगजेब (Auranzeb) ने मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए थे और ये आदेश ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) बनकर टूटे थे, इसलिए सभी राजपूत राजाओं ने ब्रज से आने वाले देव-विग्रहों के लिए हवेलियों का निर्माण करवाया। इन्हीं हवेलियों में श्रीकृष्ण की विभिन्न प्रतिमाओं को उनके पुजारियों के साथ रखा गया तथा उनके लिए गौशाला एवं चारागाह की भूमि की व्यवस्था की गई। आज भी राजस्थान के विभिन्न नगरों में इन हवेलियों को देखा जा सकता है। शीघ्र ही ये हवेलियां ब्रज की संस्कृति के प्रसार की केन्द्र बन गईं और श्रीनाथजी तथा अन्य विग्रहों एवं पुजारियों के आने से राजपूताना में ब्रज संस्कृति (Braj Saskriti in Rajputana) का प्रभाव व्याप्त हो गया।

मेवाड़ के महाराणा ने शैव-गुरु के साथ-साथ वैष्णव गुरु भी स्वीकार किया। जोधपुर तथा किशनगढ़ के राजवंश गोकुलिये गुसाइयों के शिष्य हो गए तथा वल्लभ सम्प्रदाय को मानने लगे। जोधपुर एवं किशनगढ़ में गोकुलिये गुसाइयों का बहुत जोर था। बीकानेर के राजा-रानियां एवं राजकुमारियां भी लक्ष्मीनारायणजी के उपासक हो गए।

उन दिनों किशनगढ़ वल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख केन्द्रों में से एक था। जहांगीर के जन्म से पहले अकबर ने सलेमाबाद पीठ के आचार्य से आशीर्वाद प्राप्त किया था। जोधपुर, जयपुर, बीकानेर, कोटा, बूंदी एवं किशनगढ़ के साहित्य, संगीत एवं चित्रकला यहाँ तक कि पूरी संस्कृति पर ब्रज संस्कृति का व्यापक प्रभाव पड़ा।

इसके कारण राजपूत सैनिक अपने गले में तुलसी की माला पहनने लगे और राजपूत राजा ब्रज भाषा में कविता करने लगे। जयपुर के राजा भगवान गोविंददेव को राज्य का वास्तविक स्वामी एवं स्वयं को उनका दीवान मानने लगे।

ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) से औरंगजेब (Auranzeb) की कुत्सित वृत्तियां तो शांत नहीं हुईं किंतु इसने भारत की संस्कृति को निर्बल बनाने की बजाय सम्पूर्ण भारत भूमि को ही ब्रजभूमि बनाने का काम कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजपूताने पर कहर (51)

0
राजपूताने पर कहर - bharatkaitihas.com
राजपूताने पर कहर

ब्रजभूमि पर कहर ढाने के बाद औरंगजेब ने राजपूताने पर कहर ढाना आरम्भ कर दिया। जिस राजपूताने ने मुगलों का राज्य भारत में जमाने एवं उसे हिमालय से लेकर समुद्र तक पहुंचाने में खून की नदियां बहा दी थीं, आज वही राजपूताना औरंगजेब की क्रूर नीति का शिकार होने जा रहा था।

औरंगजेब के भय से मथुरा एवं वृंदावन के मंदिरों से देव-विग्रह निकल कर राजपूत राज्यों में पहुंचा दिए गए थे तथा उन्हें मंदिरों की बजाय हवेलियों में रखा जा रहा था, यह बात अधिक दिनों तक औरंगजेब से छिपी नहीं रह सकती थी। इसलिए उसने राजपूत राज्यों पर कहर ढाना शुरु कर दिया।

ई.1679 में औरंगजेब ने मीर आतिश दाराब खाँ को शेखावाटी क्षेत्र के खण्डेला गांव में स्थित मोहनजी का विशाल मंदिर तोड़ने के लिए भेजा। 8 मार्च 1679 को आतिश दाराब खाँ ने मंदिर पर हमला किया तो 300 हिन्दू युवक, मंदिर की रक्षा के लिए आगे आए। आतिश खाँ ने उनकी हत्या कर दी। इनमें मारवाड़ से विवाह करके लौटा सुजानसिंह नामक एक राजपूत भी था जिसकी प्रशंसा में आज भी शेखावाटी क्षेत्र में लोकगीत गाए जाते हैं।

मुगल सेना ने खण्डेला स्थित मोहनजी का मंदिर, खाटू श्यामजी स्थित सांवलजी का मंदिर एवं निकटवर्ती अन्य मंदिर तोड़ दिए। खण्डेला का राजा बहादुरसिंह अपनी प्रजा एवं सैनिकों के साथ कोट सकराय के पहाड़ी दुर्ग में चला गया तथा वहीं से उसने मुगलों से भारी मोर्चा लिया।

25 मई 1679 को खानजहाँ बहादुर मारवाड़ राज्य के मंदिरों को ढहाकर दिल्ली लौटा। वह अपने साथ जोधपुर, फलोदी, मेड़ता, सिवाना, पोकरण, सांचोर, जालोर, भीनमाल तथा मारोठ आदि कस्बों में स्थित प्रसिद्ध मंदिरों की कीमती मूर्तियों को कई बैलगाड़ियों में भर कर लाया था। इन मूर्तियों में बहुत सी मूर्तियों पर हीरे-जवाहर लगे हुए थे। बहुत सी मूर्तियों पर सोने-चांदी के आभूषण एवं मुकुट आदि थे।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

औरंगजेब ने इन देव-विग्रहों को जिलाउखाना तथा जामा मस्जिद के रास्ते में लगवा दिया ताकि नमाज पढ़ने के लिए जाने वाले मुसलमान इन्हें रोज ठोकरों से मार सकें। खानजहाँ ने अपनी इस विध्वंस यात्रा में मण्डोर के 8वीं शताब्दी ईस्वी के प्राचीन मंदिर सहित ओसियां के हरिहर मंदिर, महिषासुर मर्दिनी मंदिर, त्रिविक्रम मंदिर सहित अनेक प्राचीन मंदिरों का विनाश किया जिनके ध्वंसावशेष आज भी बिखरे पड़े हैं। मुसलमान सैनिकों ने उन सैंकड़ों प्रतिमाओं के चेहरे विकृत कर दिए जिन्हें पूरी तरह तोड़ना संभव नहीं था।

अगस्त 1679 में औरंगजेब ने मुगल फौजदार तहव्वर खाँ को पुष्कर का वाराह मंदिर तोड़ने के लिए भेजा। मेड़तिया राठौड़ों ने मंदिर की रक्षार्थ अपना बलिदान करने का निर्णय लिया और 19 अगस्त को पुष्कर पहुंचकर मुगल फौजदार पर आक्रमण किया। तीन दिनों तक दोनों पक्षों में भयानक लड़ाई चलती रही जब तक कि उस समूह का अंतिम राठौड़ कटकर नहीं गिर गया।

To purchase this book, please click on photo.

फरवरी 1679 में औरंगजेब ने हसनअली खाँ को मेवाड़ क्षेत्र में सेना लेकर पहुंचने के आदेश दिए तथा औरंगजेब स्वयं भी 30 नवम्बर 1679 को अजमेर से मेवाड़ के लिए रवाना हुआ ताकि उदयपुर के मंदिरों को गिराया जा सके।

महाराणा राजसिंह उदयपुर नगर को छोड़कर गहन पहाड़ों में चला गया ताकि औरंगजेब को पहाड़ों में खींचकर मारा जा सके किंतु औरंगजेब महाराणा के पीछे जाने का साहस नहीं कर सका। 24 जनवरी 1680 को औरंगजेब उदयसागर झील के किनारे पहुंचा तथा वहाँ स्थित तीनों मंदिर ढहा दिए।

वहीं पर औरंगजेब को सूचना मिली कि 5 कोस की दूरी पर एक और झील है जिसके किनारे भी कई मंदिर बने हुए हैं। औरंगजेब ने यक्का ताज खाँ, हीरा खाँ, हसन अली खाँ तथा रोहिल्ला खाँ को उन्हें भी गिराने के आदेश दिए।

औरंगजेब की सेनाओं ने उदयपुर नगर में स्थित विख्यात एवं भव्य जगदीश मंदिर पर भी आक्रमण किया। इस मंदिर को महाराजा जगतसिंह ने कुछ साल पहले ही कई लाख रुपयों की लागत से बनवाया था। इसे जगन्नाथराय का मंदिर भी कहते थे।

इस मंदिर के सामने 20 माचातोड़ सैनिकों को सुलाया गया। राजस्थान में खटिया को माचा कहा जाता है। प्रत्येक राजपूत राजा के पास कुछ माचातोड़ सैनिक होते थे जो दिन रात-खाते-पीते और माचे पर पड़े रहते थे। जब शत्रु सेना आती थी तो एक-एक माचा तोड़ सैनिक उठ कर खड़ा होता था तथा कई-कई सैनिकों को मारकर वीरगति को प्राप्त होता था। जब मुगलों की सेना जगन्नाथराय मंदिर को तोड़ने आई तो माचातोड़ सैनिक एक-एक करके उठे तथा शत्रुओं के सिर काटते हुए स्वयं भी वीरगति को प्राप्त हुए।

29 जनवरी 1680 को हसन अली खाँ ने औरंगजेब को सूचित किया कि अब तक उदयपुर में 172 मंदिरों को ढहाया जा चुका है। इनमें से उस काल के प्रसिद्ध अनेक मंदिर सदा के लिए नष्ट हो गए और हिन्दू उन्हें पूरी तरह भूल गए। केवल वही मंदिर याद रहे जिनका कुछ अंश टूट जाने से शेष रहा था।

ई.1680 में औरंगजेब की आज्ञा से आम्बेर के प्रमुख हिन्दू मन्दिरों को गिरवा दिया गया। आम्बेर के कच्छवाहों ने अकबर के शासन काल से ही मुगलों की बड़ी सेवा की थी। इस कारण कच्छवाहों को औरंगजेब के इस कुकृत्य से बहुत ठेस लगी।

20 अप्रेल 1680 को मेरठ के दारोगा ने सूचित किया कि बादशाह के आदेश से मेरठ के मंदिरों के दरवाजों को तोड़ दिया गया है तथा अब वह चित्तौड़ के काफिरों को दण्ड देने जा रहा है। जून 1680 में अबू तुराब ने औरंगजेब को सूचित किया कि आम्बेर में 66 हिन्दू मन्दिरों को तोड़ दिया गया है।

22 फरवरी 1681 को औरंगजेब चित्तौड़ पहुंचा। उसने चित्तौड़ में स्थित 63 प्राचीन मंदिरों को ढहा दिया। इनमें आठवीं शताब्दी के सूर्य मंदिर को भी ढहा दिया गया जिसे अब कालिका माता मंदिर कहा जाता है। इसके साथ ही आठवीं से दसवीं शताब्दी के अनेक प्राचीन मंदिर भी बेरहमी से ढहाए गए। इन मंदिरों के साथ शिल्प एवं स्थापत्य का एक सुंदर संसार सदा के लिए मानव सभ्यता की आंखों से ओझल हो गया।

राजपूताने पर कहर ढाने के अभियान में जून 1681 तक औरंगजेब की सेनाओं ने मेवाड़ राज्य में ताण्डव किया। चित्तौड़ दुर्ग के भीतर स्थित 63 मंदिरों के अतिरिक्त चित्तौड़ क्षेत्र के अन्य सैंकड़ों मंदिर भी तोड़े गए। इनमें परिहारों द्वारा 10वीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित कूकड़ेश्वर महादेव, समिद्धेश्वर महादेव, अन्नपूर्णा एवं बाणमाता मंदिर भी सम्मिलित थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण भारत पर कहर (52)

0
दक्षिण भारत पर कहर - bharatkaitihas.com
दक्षिण भारत पर कहर

ब्रजभूमि के मंदिरों पर कहर ढाने के बाद औरंगजेब राजपूताने के मंदिरों पर कहर ढा चुका था और अब वह दक्षिण भारत पर कहर ढाने के लिए तैयार था। उस काल में दक्षिण भारत के गगनचम्बी मंदिर औरंगजेब के लिए किसी कुफ्र से कम नहीं थे। वह कुफ्र की इन निशानियों को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देना चाहता था।

औरंगजेब की सेना ने 2 अगस्त 1680 को मालवा का सुप्रसिद्ध सोमेश्वर मंदिर नष्ट कर दिया। 28 मार्च 1681 को असद अली खाँ ने आम्बेर के निकट गोनेर के लक्ष्मी-जगदीश मंदिर को नष्ट कर दिया। गोनेर को उस काल में राजपूताने का वृंदावन कहा जाता था। यहाँ मध्यकालीन 11 मंदिर थे, जिन्हें औरंगजेब की सेनाओं ने क्षति पहुंचाई।

जब औरंगजेब द्वारा मंदिरों एवं मूर्तियों को नष्ट करने का काम आरम्भ किया गया तो दक्षिण में नियुक्त अनेक राजपूत राजाओं ने देव-प्रतिमाओं को बचाने के प्रयास आरम्भ कर दिए।

जब औरंगजेब ने ब्रजभूमि के मंदिरों पर कहर ढाया था तब वहां की बहुत सी प्रसिद्ध देवप्रतिमाएं राजपूत राजाओं के राज्यों में लाई गईं। अब औरंगजेब दक्षिण भारत पर कहर ढाने को उत्युक था इसलिए राजपूत राजाओं ने दक्षिण के मंदिरों की मूर्तियां की रक्षा के लिए तैयार कर ली।

इनमें बीकानेर नरेश अनूपसिंह तथा आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह के नाम सबसे ऊपर हैं। महाराजा अनूपसिंह ने अष्टधातु की बहुत सी मूर्तियों की रक्षा की तथा उन्हें दक्षिण से निकालकर अपने राज्य में स्थित बीकानेर दुर्ग में भिजवा दिया।

इन मूर्तियों के लिए बीकानेर में तेतीस करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर बनाया गया। ई.1689 में दक्षिण के मोर्चे पर ही महाराजा अनूपसिंह का निधन हुआ। महाराजा द्वारा नष्ट होने से बचाई गई मूर्तियां आज भी बीकानेर में देखी जा सकती हैं।

ई.1693 में औरंगजेब ने गुजरात के वडनगर में स्थित हितेश्वर मंदिर को तोड़ने के आदेश दिए। उसके आदेशों से उत्तर प्रदेश में स्थित सोरों के सीता-राम मंदिर को भग्न किया गया। मंदिर के पुजारियों की मंदिर में ही हत्या की गई तथा गोंडा में देवी-पाटन के नाम पर स्थित देव-वन को नष्ट किया गया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह ने देश के कई नगरों में निजी सम्पत्तियां खरीदकर जयसिंहपुरा नामक स्थलों का निर्माण करवाया तथा उन्हें अपनी निजी सम्पत्ति बताकर ब्राह्मणों, साधुओं एवं बैरागियों को रहने के लिए दे दिया। ये लोग जयसिंहपुरा में रहकर अपने निजी मंदिर बनाते थे और उनमें देव-विग्रहों की स्थापना करके उनकी पूजा किया करते थे।

जब दिल्ली के एक जयसिंहपुरा में इस प्रकार की पूजा होने की सूचना मिली तो मुगल सेनाओं ने जयसिंहपुरा को घेर कर वहाँ के बैरागियों को पकड़ लिया। मुगल सेना ने 13 देव-मूर्तियां जब्त करके दिल्ली के सूबेदार के पास भेज दीं। जयसिंहपुरा के सामने हिन्दुओं की भारी भीड़ इकट्ठी हो गई। इस भीड़ ने बैरागियों को तो छुड़वा लिया किंतु देव-मूर्तियों को नहीं छुड़वाया जा सका।

To purchase this book, please click on photo.

ई.1698 में हमीदुद्दीन खाँ को बीजापुर भेजा गया। उसने बीजापुर के मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनवा दीं। बादशाह उसके काम से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने हमीदुद्दीन खाँ को गुसलखाने का दारोगा बना दिया ताकि वह प्रतिदिन हमीदुद्दीन खाँ को देख सके और उसकी प्रशंसा कर सके।

औरंगजेब के शासनकाल में उसके उन आदेशों की अक्षरशः पालना की गई जिनके अनुसार हिन्दू न तो अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार कर सकते थे और न नए मंदिर बना सकते थे।

पूरे देश के प्रसिद्ध तीर्थों एवं मंदिरों से देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवाया गया जिससे वे नमाज पढ़ने वालें के पैरों से ठुकराई जाएं। उसके शासन में देश भर के हजारों देवमंदिरों को मस्जिदों में बदल दिया गया। यहाँ तक कि छोटे-छोटे चबूतरों तथा पेड़ों के नीचे रखी देव-मूर्तियों एवं पत्थरों को भी तोड़ दिया गया।

इस समय तक औरंगजेब बहुत बूढ़ा हो गया था। फिर भी मंदिरों को तोड़ने की उसकी प्रवृत्ति ज्यों की त्यों बनी रही। 1 जनवरी 1705 को उसने मुहम्मद खलील और बेलदारों के दारोगा खिदमत राय को आदेश दिया कि महाराष्ट्र में पंढरपुर के बिठोबा मंदिर को तोड़ डाला जाए तथा कसाइयों को बुलाकर वहाँ गाएं कटवाई जाएं। यह मंदिर बहुत पुराना और प्रतिष्ठित था एवं इसका उल्लेख स्कंद पुराण में प्रमुख तीर्थ के रूप में किया गया था।

जैसे ही हिन्दुओं को औरंगजेब के इस भयावह आदेश की जानकारी मिली, उन्होंने विठोबा तथा रुक्मणि की प्रतिमाओं को मंदिर से हटाकर जंगलों में छिपा दिया। मुगल सैनिकों ने मंदिर में गायों को लाकर उनकी हत्या की तथा मंदिर को ढहा दिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद हिन्दुओं ने इस मंदिर को पुनः बनाया जिसमें वही प्राचीन प्रतिमाएं पुनः स्थापित की गईं।

औरंगजेब हिन्दू मंदिरों से कितनी घृणा करता था इसका अनुमान औरंगजेब द्वारा रूहिल्ला खाँ को लिखे गए एक पत्र से भली-भांति होता है जिसमें उसने लिखा कि-

‘महाराष्ट्र के बुतखाने पत्थर एवं लोहे के बने हुए होते हैं जिन्हें हमारी सेनाएं, मेरे उस रास्ते से होकर निकलने से पहले, पूरी तरह नहीं तोड़ पाती हैं इस कारण वे मुझे दिखाई देते हैं। इसलिए जब मैं वहाँ से होकर निकल जाऊँ तब मंदिर के ध्वंसावशेषों को और अधिक बेलदार लगाकर उन्हें फुर्सत से पूरी तरह तोड़ा जाए। इस कार्य में ऐसे दारोगा को लगाया जाए जो पूरी तरह से कट्टर हो और वह बुतखानों को तोड़ने के बाद उनकी नींवें भी उखाड़ फैंके।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाइस्ता खाँ की मक्कारी (53)

0
शाइस्ता खाँ की मक्कारी - bharatkaitihas.com
शाइस्ता खाँ की मक्कारी

लाल किले में शाइस्ता खाँ की मक्कारी के कई किस्से कहे जाते थे। उसकी औरत ने शाहजहाँ के शासनकाल में आत्मघात करके प्राण त्यागे थे क्योंकि शाहजहाँ ने दिल्ली के लाल किले में उसकी इज्जत लूटी थी। फिर भी शाइस्ता खाँ शाहजहाँ के साथ रहा और जब औरंगजेब ने शाहजहाँ के विरुद्ध बगावत की तो शाइस्ता खाँ ने औरंगजेब का भरपूर साथ देकर शाहजहाँ को बंदी बनाया था।

जिस समय औरंगजेब दक्खिन का सूबेदार था, उसने छत्रपति शिवाजी को मराठा शक्ति के रूप में उभरते हुए देखा था। वह शिवाजी को मुगलों के लिए बड़ा खतरा मानकर उन्हें नष्ट करने की योजना बना ही रहा था कि औरंगजेब के भाइयों में उत्तराधिकार का युद्ध छिद्ध गया और औरंगजेब को दक्खिन छोड़कर आगरा आना पड़ा। जब औरंगजेब मुगलों के तख्त पर बैठने में सफल हो गया तो उसने अपने मामा शाइस्ता खाँ को दक्खिन का सूबेदार नियत किया तथा उसे निर्देश दिए कि वह दक्खिन में जाकर छत्रपति शिवाजी का सफाया करे।

औरंगजेब की आधिकारिक जीवनी आलमगीरनामा में इस आदेश के सम्बन्ध में कहा गया है- ‘शक्तिशाली बनकर शिवाजी ने बीजापुरी राज्य के प्रति सभी तरह का भय और लिहाज छोड़ दिया। उसने कोंकण क्षेत्र को रौंदना और तहस-नहस करना आरम्भ कर दिया। यदा-कदा अवसर का लाभ उठाकर उसने बादशाह के महलों पर हमले किए। तब बादशाह ने दक्कन के सूबेदार अमीर-उल-अमरा शाइस्ता खाँ को हुक्म दिया कि वह शक्तिशाली सेना के साथ कूच करे, नीच का दमन करने का प्रयास करे, उसके इलाकों और किलों को हथिया ले और क्षेत्र को तमाम अशांति से मुक्त करे।’

शाइस्ता खाँ को कई युद्ध करने का अनुभव था। ई.1660 के आरंभ में वह विशाल सेना लेकर औरंगाबाद के लिए रवाना हुआ तथा 11 फरवरी 1660 को अहमदनगर जा पहुंचा। 25 फरवरी 1660 को वह अहमदनगर से दक्खिन के लिए रवाना हुआ। इस अभियान में शाइस्ता खाँ की मक्कारी के नए अध्याय खुलने वाले थे।

अभी शाइस्ता खाँ मार्ग में ही था कि उसे समाचार मिला कि शिवाजी ने छुरा भौंककर बीजापुर के सेनापति अफजल खाँ का वध कर दिया है। इस पर शाइस्ता खाँ ने अपनी सेना को तेजी से आगे बढ़ने के लिए कहा। दक्खिन तक पहुंचने से पहले ही उसे समाचार मिले कि शिवाजी ने मुगल सेनापति फजल खाँ, रूस्तमेजा तथा सिद्दी जौहर की सेनाओं को परास्त कर दिया है।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

9 मई 1660 को शाइस्ता खाँ पूना पहुंच गया। औरंगजेब ने मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह को भी शिवाजी के विरुद्ध लड़ने के लिए दक्खिन के मोर्चे पर पहुंचने के निर्देश दिए। इस कारण महाराजा जसवंतसिंह भी अपनी विशाल सेना के साथ पूना की तरफ बढ़ने लगा। दुष्ट शाइस्ता खाँ तथा महाराजा जसवंतसिंह को इतने बड़े सैन्य दलों के साथ महाराष्ट्र पर चढ़कर आया देखकर शिवाजी संकट में पड़ गए और पूना छोड़कर पहाड़ों में चले गए।

शाइस्ता खाँ ने पूना नगर पर अधिकार कर लिया तथा शिवाजी के महल में डेरा जमाकर बैठ गया जिसे लालमहल कहा जाता था। यह शाइस्ता खाँ की मक्कारी का एक और उदाहरण था कि वह छत्रपति के महल में ही जाकर रहने लगा।

शाइस्ता खाँ ने अपने सिपहसालार कर्तलब अली खाँ की कमान में एक सेना शिवाजी के कोंकण क्षेत्र वाले दुर्गों पर अधिकार करने भेजी। ई.1660 के अंत में कर्तलब खाँ शिवाजी का पीछा करते हुए भारी फौज के साथ लोणावाला के समीप घाटों से नीचे उतर गया।

To purchase this book, please click on photo.

शिवाजी कोंकण के चप्पे-चप्पे से परिचित थे इसलिए उन्होंने कर्तलब अली खाँ को भारी जंगल में प्रवेश करने दिया। शिवाजी ने उसे उम्बर खिन्ड नामक ऐसे दर्रे में घेर लिया जहाँ से कर्तलब खाँ का बचकर निकलना बहुत कठिन था। यह दर्रा 20-22 किलोमीटर लम्बे-चौड़े जलविहीन क्षेत्र के निकट स्थित निर्जन पहाड़ी में बना हुआ है जिसमें से एक साथ दो आदमी भी नहीं निकल सकते। दर्रे के दोनों तरफ ऊंची पहाड़ियां हैं। शिवाजी ने अपनी सेना को इन्हीं पहाड़ियों में छिपा दिया।

फरवरी 1661 में मुगल सेना अपनी तोपें और रसद लेकर खिन्ड दर्रे तक पहुंची। शिवाजी की सेना ने उसके आगे और पीछे दोनों तरफ के मार्ग बंद कर दिए। मुगल सेना बुरी तरह से घिर गई। अब शिवाजी के सैनिक पहाड़ियों के ऊपर से मुगलों पर पत्थरों, लकड़ियों तथा गोलियों से हमला करने लगे। मुगल सेना पिंजरे में बंद चूहे की तरह फंस गई। कुछ ही समय में उसके पास पानी समाप्त हो गया।

सैंकड़ों मुगल सिपाही इस घेरे में मारे गए। कर्तलब अली खाँ के स्वयं के प्राण संकट में आ गए। उसने शिवाजी के पास, युद्ध बंद करने का अनुरोध भिजवाया। शिवाजी ने उससे भारी जुर्माना वसूल किया तथा उसकी सारी सैन्य-सामग्री छीन ली तथा कर्तलब खाँ को लौट जाने का मार्ग दे दिया। कर्तलब अली खाँ अपने बचे हुए सिपाहियों को लेकर शाइस्ता खाँ के पास लौट गया।

कर्तलब खाँ को परास्त करने के बाद शिवाजी ने कोंकण प्रदेश में स्थित बीजापुर राज्य के दाभोल, संगमेश्वर, चिपलूण तथा राजापुर आदि कस्बों तथा पाली एवं शृंगारपुर आदि छोटी रियासतों को अपने राज्य में मिला लिया। शिवाजी की एक सेना ने नेताजी पाल्कर के नेतृत्व में मुगलों को उलझा लिया जबकि स्वयं शिवाजी एक सेना लेकर कोंकण के बचे हुए प्रदेश जीतने लगे। ई.1661 में शिवाजी ने समूचा कोंकण जीत लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाइस्ता खाँ की अंगुली (54)

0
शाइस्ता खाँ की अंगुली - bharatkaitihas.com
शाइस्ता खाँ की अंगुली

शाइस्ता खाँ की अंगुली मुगलिया इतिहास की ऐसी पहेली है जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में और कहीं मिलनी कठिन है। छत्रपति शिवाजी ने शाइस्ता खाँ की अंगुली नहीं काटी थी, अपितु अंगुली के रूप में औरंगजेब की नाक काटकर उसके हाथ में पकड़ाई थी।

शिवाजी शाइस्ता खाँ को कोंकण के पहाड़ों में खींचना चाहते थे इसलिए वे कोंकण के किलों की विजय में संलग्न थे किंतु शाइस्ता खाँ समझ गया था कि शिवाजी के पीछे जाना, साक्षात मृत्यु को आमंत्रण देना है। अतः वह पूना में बैठा रहा। इस बीच उसने शिवाजी के पूना, पन्हाला, चाकन आदि कई महत्वपूर्ण दुर्गों पर अधिकार कर लिया।

मई 1661 में शाइस्ता खाँ ने कल्याण तथा भिवण्डी के किलों पर भी अधिकार कर लिया। ई.1662 में शिवाजी के राज्य की मैदानी भूमि भी मुगलों के अधिकार में चली गई किंतु अब भी बहुत बड़ी संख्या में पहाड़ी किले शिवाजी के अधिकार में थे जिन्हें शाइस्ता खाँ छीन नहीं पा रहा था।

शिवाजी की सेनाओं ने शाइस्ता खाँ को कई मोर्चों पर परास्त करके पीछे धकेला किंतु इस अभियान में शिवाजी के सैनिक भी मारे जा रहे थे। शाइस्ता खाँ जानबूझ कर अभियान को लम्बा कर रहा था ताकि उसे औरंगजेब द्वारा चलाए जा रहे कांधार अभियान में न जाना पड़े। इसलिए वह थोड़ी-बहुत कार्यवाही करके औरंगजेब को यह दिखाता रहा कि शिवाजी के विरुद्ध अभियान लगातार चल रहा है।

जनवरी 1662 में शाइस्ता खाँ ने शिवाजी के 80 गांवों में आग लगा दी। शिवाजी ने इस कार्यवाही का बदला लेने का निर्णय लिया। शाइस्ता खाँ, शिवाजी के पूना स्थित लालमहल में रह रहा था, यह भी शिवाजी के लिए असह्य बात थी। अतः शिवाजी ने शाइस्ता खाँ का नाश करने के लिए एक दुस्साहसपूर्ण योजना बनाई जो भारत के भावी इतिहास में स्वर्णिम पन्नों में अंकित होने वाली थी।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

अप्रेल 1663 के आरम्भ में शिवाजी पूना के निकट सिंहगढ़ में आकर जाकर जम गए। 5 अप्रेल 1663 को शिवाजी ने अपने 1000 चुने हुए सिपाहियों को बारातियों के रूप में सजाया तथा उन्हें लेकर रात्रि के समय सिंहगढ़ से नीचे उतर आए। दिन के उजाले में इस अनोखी बारात ने गाजे-बाजे के साथ पूना नगर में प्रवेश किया।

यह बारात संध्या होने तक शहर की गलियों में नाचती-गाती और घूमती रही। संध्या होते ही शिवाजी के 200 सैनिक बारातियों वाले कपड़े उतारकर साधारण सिपाही जैसे कपड़ों में, मुगल सैन्य शिविर की ओर बढ़ने लगे। शेष 800 सिपाही मुगल शिविर के चारों ओर फैल गए ताकि समय आने पर शिवाजी को सहायता दी जा सके।

जब मुगल शिविर में घुस रहे शिवाजी तथा उनके सैनिकों को मुगल रक्षकों द्वारा रोका गया तो शिवाजी के सैनिकों ने उनसे कहा कि वे शाइस्ता खाँ की सेना के सिपाही हैं। चूंकि मुगल सेना में हिन्दू सैनिकों की भर्ती होती रहती थी तथा शाइस्ता खाँ ने शिवाजी के विरुद्ध लड़ाई के लिए हजारों हिन्दू सैनिकों को भरती किया था, इसलिए किसी ने इन सिपाहियों पर संदेह नहीं किया। इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी लेखक भीमसेन ने लिखा है कि शिवाजी अपने 200 सैनिकों के साथ 40 मील पैदल चलकर आए तथा रात्रि के समय शिविर के निकट पहुंचे।

To purchase this book, please click on photo.

शिवाजी एवं उसके सैनिक, लालमहल के पीछे की तरफ जाकर रुक गए और रात्रि होने की प्रतीक्षा करने लगे। अर्द्धरात्रि में उन्होंने महल के एक कक्ष की दीवार में छेद किया। शिवाजी इस महल के चप्पे-चप्पे से परिचित थे। जब वे इस महल में रहते थे, तब यहाँ खिड़की हुआ करती थी किंतु इस समय उस स्थान पर दीवार चिनी हुई थी। इससे शिवाजी को अनुमान हो गया कि इसी कक्ष में शाइस्ता खाँ अपने परिवार सहित मिलेगा।

शिवाजी का अनुमान ठीक निकला, शाइस्ता खाँ इसी कक्ष में था। शिवाजी तथा उनके 200 सिपाहियों ने रात्रि में एक अन्य कक्ष की खिड़की से महल में प्रवेश किया तथा ताबड़तोड़ तलवार चलाते हुए शाइस्ता खाँ के पलंग के निकट पहुंच गए। आवाज होने से शाइस्ता खाँ की आंख खुल गई।

शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर अपनी तलवार से भरपूर वार किया किंतु एक दासी ने शत्रु सैनिकों को देखकर महल की बत्ती बुझा दी ताकि शाइस्ता खाँ को बच निकलने का अवसर मिल सके।

जब शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर तलवार का वार किया ठीक उसी समय महल में अंधेरा हुआ और शाइस्ता खाँ अपने ही स्थान पर पलट गया। इस कारण शिवाजी की तलवार का वार लगभग खाली चला गया किंतु फिर भी शाइस्ता खाँ की एक अंगुली कट गई। ठीक इसी समय मुगल शिविर के बाहर खड़े शिवाजी की बारात के सिपाहियों ने जोर-जोर से बाजे बजाने आरम्भ कर दिए जिससे महल के चारों ओर पहरा दे रहे सिपाहियों को महल के भीतर चल रही गतिविधियों का पता नहीं चल सके। बाजों की आवाज के बीच मराठा सिपाहियों ने पूरे महल में मारकाट मचा दी।

शाइस्ता खाँ, अंधेरे का लाभ उठाकर भागने में सफल हो गया किंतु शिवाजी के सैनिकों ने शाइस्ता खाँ के पुत्र अबुल फतह को शाइस्ता खाँ समझकर उसका सिर काट लिया तथा इस सिर को अपने साथ लेकर भाग गए। इस कार्यवाही में शाइस्ता खाँ के 50 से 60 सिपाही घायल हुए तथा एक सेनानायक मारा गया।

धीरे-धीरे मुगल सिपाहियों को अनुमान हो गया कि भीतर क्या हो रहा है! वे महल के बाहर एकत्रित होने लगे। शिवाजी भी चौकन्ने था, उन्होंने तेज ध्वनि बजाकर संकेत किया और उनके सैनिक, शिवाजी को लेकर लालमहल तथा मुगल शिविर से बाहर निकल गए। मुगल सिपाही, आक्रमणकारियों को महल के भीतर ढूंढते रहे और शिवाजी पूना से बाहर सुरक्षित निकल गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा जसवंतसिंह का उपकार (55)

0
महाराजा जसवंतसिंह का उपकार - bharatkaitihas.com
महाराजा जसवंतसिंह का उपकार

यह महाराजा जसवंतसिंह का उपकार ही था कि छत्रपति शिवाजी रात के अंधेरे में शाइस्ता खाँ के पुत्र का सिर काट कर मुगल शिविर से सुरक्षित निकल गए।

जब वीर मराठे अपने राजा शिवाजी के नेतृत्व में औरंगजेब के ममेरे भाई अबुल फतह का कटा हुआ सिर लेकर भाग रहे थे तब मार्ग में मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह का सैन्य शिविर पड़ा। इस शिविर में राजपूतों का कड़ा पहरा था। इन पहरेदारों ने शिवाजी के सैंकड़ों सिपाहियों को अपने शिविर के सामने से भागते हुए देखा किंतु महाराजा जसवंतसिंह की तरफ से कोई हलचल नहीं की गई।

महाराजा की सेना की तरफ से ऐसा दिखाने का प्रयास किया गया कि राजपूत शिविर के सिपाहियों को शिवाजी द्वारा की गई कार्यवाही के बारे में कुछ भी पता नहीं चला किंतु मुगल अधिकारियों का यह मानना था कि औरंगजेब से नाराज जसवंतसिंह और उसके सिपाहियों ने जानबूझ कर शिवाजी को अपने शिविर के सामने से सुरक्षित निकल जाने का अवसर दिया।

उन दिनों पूरे देश में यह प्रचलित हो गया था कि शिवाजी के इस कार्य में महाराजा जसवंतसिंह की प्रेरणा काम कर रही थी क्योंकि शाइस्ता खाँ ने औरंगजेब से शिकायत करके धरमत के युद्ध के बाद महाराजा जसवंतसिंह को पदच्युत करवाया था। समकालीन लेखक भीमसेन ने लिखा है- ‘केवल ईश्वर जानता है कि सत्य क्या है!’

शिवाजी द्वारा जिस प्रकार अफजल खाँ की हत्या की गई और पूना के लाल महल में घुसकर जो ताण्डव किया गया, उससे लाल किले की नींद हराम हो गई। लाल किले के लिए शिवाजी किसी रहस्यमयी शक्ति से कम नहीं रह गए थे जो कहीं भी, कभी भी पहुंच कर कुछ भी कर सकते थे।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

औरंगजेब शाइस्ता खाँ की इस असफलता पर बहुत क्रोधित हुआ और उसे अपने डेरे-डण्डे उठाकर बंगाल जाने के निर्देश दिए। शाइस्ता खाँ भी यहाँ रुकना हितकर न समझकर, चुपचाप बंगाल के लिए रवाना हो गया। उसके लिए तो यही अच्छा था कि औरंगजेब ने उसे कंदहार के मोर्चे पर नहीं भेजा था। शाइस्ता खाँ कंदहार की सर्दी और पहाड़ की चढ़ाइयों से बहुत डरता था।

शाइस्ता खाँ के साथ-साथ महाराजा जसवंतसिंह के विरुद्ध भी कार्यवाही की जानी अपेक्षित थी किंतु उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई। औरंगजेब जानता था कि महाराजा जानबूझ कर शिवाजी के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर रहा था। इसलिए उसने महाराजा को वहीं पर नियुक्त रखा ताकि यदि जसवंतसिंह शिवाजी को नहीं मारे तो एक दिन शिवाजी ही जसवंतसिंह को मार डाले और औरंगजेब को इन दो प्रबल हिन्दू शक्तियों में से किसी एक से छुटकारा मिल सके।

To purchase this book, please click on photo.

नवम्बर 1663 में महाराजा जसवंतसिंह के नेतृत्व में शिवाजी के प्रसिद्ध दुर्ग सिंहगढ़ पर आक्रमण हुआ। समकालीन लेखक भीमसेन ने लिखा है-

‘जसवंतसिंह ने कोंडाणा दुर्ग पर आक्रमण किया जिसे सिंहगढ़ भी कहते थे। मुगलों ने किले की दीवारों पर चढ़ने का प्रयास किया किंतु शिवाजी के सैनिकों ने उन्हें मार गिराया। बड़ी संख्या में मुगल और राजपूत सैनिकों की जानें गईं। बारूदी विस्फोट से भी बहुत से लोग मारे गए। किले को जीतना असंभव हो गया। असफलता से निराश होकर महाराजा जसवंतसिंह और राव भाऊसिंह हाड़ा ने 28 मई 1664 को किले पर से घेरा उठा लिया और औरंगाबाद लौट गए।’

औरंगजेब की जीवनी आलमगीरनामा में बड़े खेद के साथ महाराजा के विरुद्ध टिप्पणी की गई है-

‘एक भी किले पर कब्जा नहीं हो पाया। शिवाजी के विरुद्ध अभियान कठिनाई में पड़ गया और क्षीण हो गया।’

हिन्दू जाति पर महाराजा जसवंतसिंह का उपकार यहीं तक सीमित नहीं था, जब तक वे जीवित थे, तब तक औरंगजेब हिन्दू धर्म को मिटाने के लिए अपनी पूरी ताकत नहीं लगा सकता था। औरंगजेब का मानना था कि शिवाजी के प्रति केवल महाराजा जसवंतसिंह ही नहीं अपितु सभी हिन्दू राजा सहानुभूति दिखा रहे थे। आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह जो वर्षों से शाहजहाँ तथा औरंगजेब की सेवा करता रहा था, उसके प्रति भी औरंगजेब सशंकित था। औरंगजेब को लगता था कि मिर्जाराजा जयसिंह जानबूझ कर शिवाजी से हार जाता था।

जबकि मिर्जाराजा जयसिंह ने शिवाजी को जितनी क्षति पहुंचाई थी, उतनी क्षति शायद ही किसी अन्य मुगल सूबेदार अथवा हिन्दू राजा ने पहुंचाई थी। जयसिंह ने शिवाजी के बहुत से किले छीनकर शिवाजी को पुरंदर की संधि करने के लिए विवश कर दिया था किंतु जसवंतसिंह की बात दूसरी थी, जसवंतसिंह और औरंगजेब के बीच शुरु से ही छत्तीस का आंकड़ा था इस कारण यदि औरंगजेब जसवंतसिंह पर संदेह करता था तो इसमें कुछ भी गलत नहीं था।

शिवाजी पर किया गया महाराजा जसवंतसिंह का उपकार स्वयं महाराजा के लिए बहुत भारी पड़ा। औरंगजेब ने जसवंतसिंह के पुत्रों को छल-बल से मारा। औरंगजेब ने जसवंतसिंह को अफगानिस्तान के युद्ध में झौंक दिया तथा उसके इकलौते कुंअर पृथ्वीसिंह को दिल्ली बुला लिया।

कुछ समय बाद औरंगजेब ने कुंअर पृथ्वीसिंह को एक विषबुझी पोषाक उपहार में दी। इस पोषाक को पहनने पर 8 मई 1667 को जसवंतसिंह के कुंअर पृथ्वीसिंह की दर्दनाक मृत्यु हो गई। महाराजा जसवंतसिंह पुत्र-शोक में डूब गया। पृथ्वीसिंह के बाद राज्य का कोई उत्तराधिकारी भी नहीं था। इसलिए जसवंतसिंह के भयानक शोक का कोई पार नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजकुमारी चारुमती का विवाह (56)

0
राजकुमारी चारुमती का विवाह - bharatkaitihas.com
राजकुमारी चारुमती का विवाह

राजकुमारी चारुमती का विवाह सम्पूर्ण हिन्दू जाति के लिए गर्व करने योग्य एवं औरंगजेब के लिए नाक कट जाने जैसी थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1658 में शामूगढ़ के युद्ध में शाहजहाँ के बड़े शहजादे दारा शिकोह का संरक्षक एवं प्रधान सेनापति महाराजा रूपसिंह वीर गति को प्राप्त हो गया था जो कि किशनगढ़ रियासत का राजा था। उसकी मृत्यु औरंगजेब के हाथी की अम्बारी की रस्सी काटने के बाद औरंगजेब की गर्दन काटने के प्रयास में हुई थी। अतः औैरंगजेब किशनगढ़ राज्य को दण्ड देना चाहता था। ई.1660 में औरंगजेब ने किशनगढ़ की राजकुमारी से विवाह करने के लिए डोला भिजवाया।

उन दिनों मुगल बादशाह किसी भी राजकुमारी से अपना या अपने शहजादे का विवाह करने के लिए अपनी सेना के साथ डोला भिजवा देते थे। वह सेना राजकुमारी को डोले में बैठाकर लाल किले में ले आती थी जहाँ बादशाह या कोई शहजादा उससे इस्लामिक पद्धति के अनुसार विवाह कर लेता था।

अकबरनामा आदि फारसी तवारीखों में लिखा है कि हिन्दू राजा बादशाह से अर्ज किया करते थे कि मेरी लड़की खूबसूरत है, इसलिए उसे शाही जनानखाने में दाखिल होने की इज्जत बख्शी जाए किंतु यह बात सही नहीं है तथा उस समय के लेखकों द्वारा बादशाह की चाटुकारिता करने के लिए लिखी गई है।

पूरे मध्यकालीन इतिहास में आम्बेर की राजकुमारी हीराकंवर ही एकमात्र ऐसी राजकुमारी थी जिसका विवाह अकबर के साथ हीराकंवर के बाबा भगवन्तदास तथा पिता भारमल ने अपनी इच्छा से किया था ताकि उन्हें अपने ही कुल के राजकुमारों के विरुद्ध अकबर का संरक्षण मिल सके। इस विवाह के कारण एक ओर तो आम्बेर को मुगलों का संरक्षण मिल गया तथा दूसरी ओर भारत में मुगल सल्तनत की जड़ें मजबूती से जम गईं।

इसलिए अकबर से लेकर फर्रूखसियर तक जो भी बादशाह हुए उन्होंने प्रयास किए कि वे हिन्दू राजाओं पर दबाव बनाकर उनकी राजकुमारियों को अपने हरम में ले आएं। यदि एक बार किसी हिन्दू राजकुमारी का विवाह किसी मुगल शहजादे या बादशाह से हो जाता था तो वह हिन्दू राजा तथा उसकी कई पीढ़ियां अपने प्राण देकर भी उस बादशाह तथा उसके वंशजों की रक्षा किया करती थीं।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब कोई मुगल बादशाह बलपूर्वक किसी हिन्दू राजकुमारी से विवाह करना चाहता था तो हिन्दू राजा यह सोचकर अपनी पुत्री मुगलों को देते थे कि एक लड़की का बलिदान करके वे अपनी प्रजा के लाखों निरीह बेटियों को मुगलों के कोप से बचा लेंगे। फिर भी ऐसे राजाओं की कमी नहीं थी जो हिन्दू राजकुमारियों के धर्म की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया करते थे। सिवाना का राजा कल्याणसिंह जिसे इतिहास में कल्ला राठौड़ कहा जाता है, इसी प्रकार का वीर राजा था जिसने बूंदी की राजकुमारी से विवाह करके उसे अकबर के हरम में जाने से बचाया था।

अब औरंगजेब ने किशनगढ़ के स्वर्गीय महाराजा रूपसिंह की पुत्री चारुमती पर अपनी कुदृष्टि गढ़ाई। इस समय रूपसिंह का पुत्र मानसिंह किशनगढ़ का राजा था। महाराजा रूपसिंह के वीरगति को प्राप्त होने के समय मानसिंह की आयु केवल 3 वर्ष थी तथा जिस समय औरंगजेब ने मानसिंह की बड़ी बहिन चारुमती के लिए डोला भिजवाया, उस समय मानसिंह पांच वर्ष का बालक था।

To purchase this book, please click on photo.

राज्य का शासन मानसिंह की दादी राजमाता कछवाहीजी और माता चौहानजी की आज्ञानुसार राठौड़ करनजी नामक एक वीर पुरुष चलाता था। औरंगजेब के काल में किशनगढ़ रियासत राजपूताने की सबसे छोटी रियासत थी। राज्य के संस्थापक महाराजा किशनसिंह की बड़ी बहिन जगत गुसाईन अकबर से ब्याही गई थी। इसलिए अकबर ने किशनसिंह को नया राज्य स्थापित करने की अनुमति दी थी किंतु यह राज्य इतना छोटा था तथा इसके संसाधन इतने सीमित थे कि इस रियासत की सेना मुगलों का सामना नहीं कर सकती थी।

इसलिए जब यह सूचना किशनगढ़ पहुंची कि औरंगजेब ने चारुमती को लाने के प्रयोजन से किशनगढ़ के लिए डोला रवाना किया है तो किशनगढ़ के राज्याधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। महाराजा रूपसिंह के बलिदान को अभी दो वर्ष ही हुए थे तथा राजकुल में कोई वयस्क व्यक्ति जीवित नहीं बचा था जो औरंगजेब से बात कर सकता! इसलिए किशनगढ़ के राज्याधिकारियों ने राजकुमारी को डोले में बैठा देने में ही अपनी भलाई समझी।

जब राजकुमारी चारुमती ने सुना कि मेरा विवाह मुसलमान बादशाह के साथ होने वाला है, तब वह अत्यंत दुःखी हुई। राजकुमारी चारुमती भी अपने पिता स्वर्गीय महाराजा रूपसिंह की तरह परम वैष्णव थी। वह श्रीकृष्ण को अपना आराध्य देव मानती थी तथा उनकी भक्ति में मीरांबाई की तरह पदों की रचना किया करती थी। राजकुमारी चारुमती ने अपनी माता तथा भाई से कहा कि यदि मेरा विवाह बादशाह के साथ करोगे तो मैं अपने प्राणों को तिलांजलि दे दूंगी किंतु राजकुमारी जानती थी कि ऐसा कह देने भर से कुछ होने वाला नहीं है। मुगलों की सेना किशनगढ़ राज्य को नष्ट कर देगी तथा राजकुमारी को बलपूर्वक डोले में बिठाकर ले जाएगी।

इसलिए चारुमती ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह की शरण लेने का निर्णय लिया और अपने विश्वस्त व्यक्ति के हाथों महाराणा के पास एक पत्र भिजवाया जिसमें राजकुमारी ने प्रार्थना की कि मैं हिन्दू राजकुमारी हूँ, भगवान श्रीकृष्ण की उपासिका हूँ, अपने धर्म की रक्षा किया चाहती हूँ। आप हिन्दू राजा हैं, हिन्दू कुमारियों के धर्म की रक्षा करना आपका कर्त्तव्य है, मैं आपको अपना पति स्वीकार करती हूँ। आप बारात लेकर आएं तथा मेरे साथ विवाह करके मेरे धर्म की रक्षा करें। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो मेरे पास देह-त्याग के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।

राजकुमारी का संदेश पाकर महाराणा राजसिंह एक छोटी सी सेना लेकर तुरंत किशनगढ़ के लिए रवाना हो गया और राजकुमारी चारुमती से विवाह करके उसे उदयपुर ले आया। महाराणा के इस साहस से किशनगढ़ राजपरिवार अत्यंत प्रसन्न हुआ और वह औरंगजेब का कोप सहन करने के लिए तैयार हो गया। राजगढ़ प्रशस्ति में इस घटना का उल्लेख इन शब्दों में किया गया है-

शते सप्तदशे पूर्णे वर्षे सप्तदशे ततः।

गत्वा कृष्णगढ़े दिव्यो महत्या सेनया युतः।।29।।

दिल्लीशार्थे रक्षिताया राजसिंह नरेश्वरः।

राठौड़ रूपसिंहस्य पुत्र्यिाः पाणिग्रहं व्यधात्।।30।।

अर्थात्- विक्रम संवत् 1717 में महाराणा राजसिंह अपनी सेना लेकर कृष्णगढ़ गए तथा दिल्ली के अधिपति से त्रस्त राजकन्या जो कि राठौड़ राजा रूपसिंह की पुत्री थी, उससे विवाह करके पुनः लौट आए।

जब यह सूचना प्रतापगढ़ रियासत के रावत हरिसिंह के हाथों बादशाह औरंगजेब के पास पहुंची तो औरंगजेब क्रोध से तिलमिला गया। उसे लगा कि ये हिन्दू राजा औरंगजेब के प्रत्येक काम को विफल कर रहे हैं। उसने महाराणा को एक कड़ा पत्र लिखकर अपनी नाराजगी व्यक्त की जिसमें कहा गया कि मेरे हुक्म के बिना किशनगढ़ जाकर तुमने शादी क्यों की?

इसके उत्तर में महाराणा ने बादशाह को लिखा कि राजपूतों का विवाह सदा से राजपूतों के साथ होता आया है और कभी इसके लिए मनाही नहीं हुई। राजकुमारी चारुमती का विवाह उन सब विवाहों से अलग कैसे है! इस पर औरंगजेब ने महाराणा से गयासपुर तथा बसाड़ के परगने छीनकर पुनः प्रतापगढ़ के रावत हरिसिंह को दे दिये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सूरत बंदरगाह की लूट (57)

0
सूरत बंदरगाह की लूट - bharatkaitihas.com
सूरत बंदरगाह की लूट

सूरत बंदरगाह की लूट औरंगजेब के गाल पर जड़ा गया ऐसा तमाचा था जिसकी गूंज पूरे भारत में सुनाई दी थी और इस लूट के बाद शिवाजी सम्पूर्ण हिन्दू जाति के नायक बन गए थे।

शिवाजी को नष्ट करने के लिए औरंगजेब ने अपने मामा शाइस्ता खाँ तथा मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह को दक्षिण के मोर्चे पर भेजा था। शाइस्ता खाँ द्वारा शिवाजी के विरुद्ध चलाए गए अभियान में शिवाजी को विपुल धन की हानि हुई थी। शिवाजी ने इस धन की भरपाई करने के लिए मुगलों के क्षेत्र लूटने की योजना बनाई। उन दिनों सूरत मुगल साम्राज्य का सर्वाधिक धनी नगर तथा भारत का प्रमुख बंदरगाह था। बादशाह औरंगजेब की बड़ी बहिन शाहबेगम जहानआरा सूरत की जागीरदार थी।

इस समय सूरत के बंदरगाह से दुनिया भर के देशों के व्यापारिक जहाज आते-जाते थे। लाल सागर एवं भूमध्य सागर होते हुए यूरोप के देशों तक भारतीय मसालों, रेशम, कपास, हाथीदांत, चंदन का व्यापार इसी बंदरगाह से होता था। उन दिनों हज के लिए मक्का जाने वाले मुसलमानों द्वारा भी इसी बंदरगाह का उपयोग किया जाता था। शाहबेगम जहानआरा को इस बंदरगाह से प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए का राजस्व प्राप्त होता था। इस धन का उपयोग मुगल सल्तनत की विशाल सेनाओं को वेतन चुकाने में होता था।

सूरत शहर में उस समय लगभग 20-25 व्यापारी ऐसे भी थे जिनके पास करोड़ों की सम्पत्ति जमा हो गई थी। शिवाजी ने सूरत बंदरगाह की लूट करने का निश्चय किया। चूंकि सूरत तक पहुंचने के लिए शिवाजी को बुरहानपुर होकर जाना पड़ता जहाँ मुगलों की बड़ी छावनी थी, इसलिए शिवाजी ने अपनी सेना के 4000 चुने हुए योद्धाओं को छोटे-छोटे दलों में विभक्त किया तथा उन्हें बुरहानपुर से दूर हटकर चलते हुए सूरत से 29 किलोमीटर दूर गनदेवी नामक स्थान पर पहुंचने के निर्देश दिए।

स्वयं शिवाजी भी 1 जनवरी 1664 को सूरत के लिए चल दिए। 6 जनवरी 1664 को ये टोलियां गनदेवी पहुंचकर आपस में मिल गईं। सूरत का मुगल गवर्नर इनायत खाँ बेईमान आदमी था। उसे सूरत शहर की रक्षा के लिए बादशाह से जितने सिपाही रखने का वेतन मिलता था, उसकी तुलना में वह बहुत कम सिपाही रखता था तथा सारा वेतन अपने पास रख लेता था। सूरत के चारों ओर कोई परकोटा भी नहीं था। इसलिए सूरत का लुट जाना अवश्यम्भावी था।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

शिवाजी ने इनायत खाँ को तथा सूरत के बड़े सेठों को पत्र लिखकर सूचित किया कि मेरा उद्देश्य किसी को हानि पहुंचाने का नहीं है किंतु बादशाह ने जबर्दस्ती मुझ पर युद्ध थोप दिया है तथा मेरा कोष भी जब्त कर लिया है। यहाँ तक कि मेरा घर लालमहल भी छीन लिया है और मुझे दर-दर की ठोकरें खाने पर विवश कर दिया है। इसलिए हमने निर्णय लिया है कि इन सब बातों की क्षतिपूर्ति न केवल बादशाह के खजाने से अपितु बादशाह की छत्रछाया में व्यापार करने वाले व्यापारियों से भी करेंगे।

आप लोग शांतिपूर्वक मुक्ति-धन दे दें या अपने साथ होने वाली कठोर कार्यवाही के लिए तैयार रहें। छत्रपति चाहता था कि सूरत के 20-25 धनी व्यापारी आपस में चंदा करके छत्रपति को केवल 50 लाख रुपए दे दें ताकि वह अपनी सेना का वेतन चुका सके। यह राशि सूरत के बड़े व्यापारियों के लिए बहुत छोटी थी किंतु व्यापारी शिवाजी को कोई राशि नहीं देना चाहते थे।

To purchase this book, please click on photo.

इन पत्रों के मिलने के बाद मुगल सूबेदार इनायत खाँ ने शिवाजी को सलाह भरा पत्र भेजा कि वह शक्तिशाली मुगलों से शत्रुता मोल न ले, तुझे मुगलों की ताकत का अंदाज नहीं हैं। तू लौटकर महाराष्ट्र तक नहीं पहुंच पाएगा। इनायत खाँ को लगता था कि शिवाजी इस बंदरघुड़की से डर जाऐंगे किंतु जब शिवाजी के घोड़े शहर की सीमा पर दिखाई देने लगे तो इनायत खाँ भागकर किले में छिप गया। सूरत के व्यापारी, मुगल सेनाओं के भरोसे अपने घरों में बंद हो गए।

सूरत में अनेक अंग्रेज एवं डच व्यापारी भी कोठी एवं कारखाने बनाकर रहते थे। उन दिनों कोठी का अर्थ व्यापारिक कार्यालय से होता था तथा कारखाने से तात्पर्य आयात-निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के गोदाम से होता था। सूरत के व्यापारी शिवाजी की शक्ति से भली भांति परिचित थे। इसलिए उन्होंने अपनी कोठियों और कारखानों पर सुरक्षा के प्रबन्ध कर लिए।

अंग्रेजों ने एक ईसाई पादरी को शिवाजी के पास भेजकर अनुरोध किया कि वह हमारी निर्धन ईसाई बस्ती पर दया करे। हमारे पास शिवाजी को देने के लिए कुछ भी नहीं है। इस पर शिवाजी ने अंग्रेज पादरी को वचन दिया कि वह निर्धन लोगों पर आक्रमण नहीं करेगा। वैसे भी शिवाजी को अंग्रेजों से नहीं उलझना था क्योंकि उनके पास व्यापारिक सामान तो था किंतु सोना-चांदी नहीं था।

शिवाजी ने शहर के निकट अपना शिविर स्थापित कर लिया तथा शहर में सिपाही भेजकर सूरत के व्यापारियों को मुक्ति-कर लेकर आने के लिए सूचना दी। पहले दिन जब कोई व्यापारी शिवाजी से मिलने नहीं आया तो शिवाजी ने अपने सैनिकों को सूरत शहर के व्यापारियों के घर लूटने के निर्देश दे दिए। शिवाजी के सिपाही सूरत नगर में घुसकर व्यापारियों का धन छीनने लगे और शिवाजी के डेरे में लाकर ढेर लगाने लगे।

इसी बीच मुगल गवर्नर इनायत खाँ ने एक सिपाही के हाथों कपट-युक्त सुलहनामा भेजा। इस सिपाही ने शिवाजी को गुप्त-संदेश देने का बहाना किया तथा बात करते-करते शिवाजी के अत्यंत निकट पहुंच गया। उसने अचानक अपने कपड़ों में से कटार निकाली तथा शिवाजी के शरीर में घोंप दी। शिवाजी के अंगरक्षक सतर्क थे। फिर भी शिवाजी को मामूली चोट पहुंची। शिवाजी के अंगरक्षकों ने तत्काल ही उस सिपाही का हाथ काट दिया।

इस कृत्य के बाद मराठों ने सख्ती बढ़ा दी। मकानों, दुकानों, संदूकों और अलमारियों के किवाड़ तोड़कर धन निकाला जाने लगा। धनी व्यापारियों के मकान खोदकर सम्पदा निकाल ली गई। कई मुहल्ले अग्नि की भेंट कर दिए गए। शिवाजी के पास लगभग 2 करोड़ रुपयों की सम्पत्ति आ गई तथा सूरत, बुरी तरह से बे-सूरत हो गया। समस्त धनी व्यापारियों के घरों में हाहाकार मच गया। शिवाजी के कोप से मुगलों की प्रजा को कोई बचाने वाला नहीं था।

इनायत खाँ के सिपाही किले की दीवार से शिवाजी के सिपाहियों पर तोप के गोले बनसाने लगे। इससे सूरत नगर में कई स्थानों पर आग लग गई। इसी बीच शिवाजी को समाचार मिला कि मुगलों की बहुत बड़ी सेना सूरत की तरफ बढ़ रही है। अतः शिवाजी ने लूट में प्राप्त कपड़े, बर्तन एवं अन्य सामग्री सूरत की निर्धन जनता में बांट दी और सोना-चांदी तथा रुपए लेकर 10 जनवरी 1664 को अचानक सूरत छोड़ दिया। छत्रपति आंधी की तरह सूरत में आए और तूफान की तरह निकल गए किंतु उनके जाने के बाद भी लोगों में धीरज उत्पन्न नहीं हुआ और व्यापारियों का सूरत से पलायन जारी रहा।

सूरत बंदरगाह की लूट के कई दिनों बाद मुगलों की सेना सूरत पहुंची। जिस सूरत के चर्चे पूरी दुनिया में शान से होते थे अब वहाँ एक वीरान और बदसूरत नगर बचा था जिसके बहुत से हिस्सों में आग अब भी सुलग रही थी। जिस समय शिवाजी सूरत को लूटने पहुंचे थे, उस समय अरब के कुछ अश्व-व्यापारी अपने घोड़े बेचने सूरत में आए हुए थे।

उन्हें ज्ञात हुआ कि शिवाजी अपनी सेना सहित आया है तो वे अपने घोड़े लेकर शिवाजी के पास पहुंचे। शिवाजी ने उनसे घोड़े लेकर उन्हें बंदी बना लिया। जब शिवाजी लूट का धन लेकर सूरत से जाने लगे तो उन्होंने अश्व-व्यापारियों को घोड़ों के मूल्य का भुगतान करके उन्हें रिहा कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिवाजी लाल किले में (58)

0
शिवाजी लाल किले में - bharatkaitihas.com
शिवाजी लाल किले में

शिवाजी लाल किले में वैसे ही निर्भीक दिखाई दिए जैसे रावण की सभा में कभी अंगद और हनुमान दिखाई दिए थे। अंतर केवल इतना था कि आज राक्षसराज की सभा में राजा का दूत नहीं खड़ा था, स्वयं राजा खड़ा था। औरंगजेब ने सिद्ध कर दिया कि औरंगजेब का कपट कभी कम नहीं होगा और मराठों की वीरता कभी मंद नहीं पड़ेगी।

जब तक शाहजहाँ जीवित रहा, औरंगजेब अपने राज्यारोहण का उत्सव दिल्ली के लाल किले में मनाता रहा किंतु जब 22 जनवरी 1666 को आगरा के लाल किले में औरंगजेब के दुर्भाग्यशाली पिता शाहजहाँ की बंदी अवस्था में मृत्यु हो गई तो उसके बाद औरंगजेब ने अपने राज्यारोहण का उत्सव आगरा के लाल किले में मनाने का निश्चय किया।

औरंगजेब इस उत्सव को यादगार बनाना चाहता था इसलिए उसने भारत भर से मुस्लिम सूबेदारों एवं हिन्दू राजाओं को आगरा पहुंचने के निर्देश दिए। उसने आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह से कहा कि यदि वह छत्रपति शिवाजी को इस उत्सव में शामिल होने के लिए राजी कर सके तो आपके लिए यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।

अपनी शक्ति के घमण्ड में चूर दुष्ट औरंगजेब समय रहते यह नहीं समझ सका कि शिवाजी लाल किले में न आए तो ही अच्छा है।

मिर्जाराजा जयसिंह कुछ ही दिन पहले शिवाजी के हाथों बीजापुर की लड़ाई में परास्त हो गया था। इसलिए मिर्जाराजा जयसिंह ने शिवाजी को प्रसन्न करके आगरा ले जाने की योजना बनाई ताकि औरंगजेब की नाराजगी को दूर किया जा सके।

मिर्जाराजा जयसिंह ने छत्रपति से भेंट की तथा उनसे आगरा चलने का अनुरोध किया ताकि शिवाजी और औरंगजेब के बीच बरसों से चली आ रही शत्रुता को दूर किया जा सके और दक्खिन में शांति स्थापित की जा सके। पहले तो शिवाजी ने आगरा चलने से मना कर दिया किंतु जब जयसिंह ने कहा कि इस यात्रा का सम्पूर्ण व्यय एवं प्रबन्ध बादशाह की तरफ से किया जाएगा तथा शिवाजी की सुरक्षा की समूची गारण्टी महाराजा जयसिंह की होगी तो शिवाजी आगरा चलने पर सहमत हो गए।

शिवाजी ने अपनी माता जीजाबाई से विचार-विमर्श करके अपने 8 वर्षीय पुत्र सम्भाजी के साथ आगरा जाने का निर्णय लिया। 5 मार्च 1666 को शिवाजी ने अपने 200 चुने हुए अंगरक्षकों तथा 4000 सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ रायगढ़ से आगरा के लिए प्रस्थान किया। शिवाजी की याात्रा के लिए शाही-खजाने से एक लाख रुपया दिया गया तथा पूना से आगरा तक के मुगल सूबेदारों को आज्ञा दी गई कि वे मार्ग में स्थान-स्थान पर शिवाजी का स्वागत करें।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब शिवाजी महाराष्ट्र से रवाना होकर आगरा जा रहे थे तो हिन्दू प्रजा में शिवाजी को देखने की होड़ मच गई। जब से शिवाजी ने अफजल खाँ को मारा था, शाइस्ता खाँ की अंगुली काटी थी, कर्तलब खाँ का सर्वस्व छीनकर जीवित छोड़ा था, फजल खाँ, रूस्तमेजा तथा सिद्दी जौहर की सेनाओं में कसकर मार लगाई थी तथा सूरत का बंदरगाह लूटा था, तब से भारत की जनता में शिवाजी के बारे में कई रहस्य और रोमांच भरे किस्से विख्यात हो चुके थे। भारत की जनता शिवाजी को हिन्दुओं एवं भारत भूमि के उद्धारक के रूप में देखती थी और मानती थी कि एक दिन शिवाजी दुष्ट औरंगजेब का भी विनाश करेंगे।

शिवाजी आगरा नहीं जाना चाहते थे किंतु मिर्जाराजा जयसिंह के दबाव में उन्होंने आगरा जाने का निर्णय ले लिया था। अब वे इस समय एवं श्रम का उपयोग हिन्दू जनता को अपने उद्देश्य एवं शक्ति का दर्शन कराने में करना चाहते थे। वे हिन्दुओं कोे बताना चाहते थे कि मुगल सर्वशक्तिमान नहीं हैं, उन्हें परास्त किया जा सकता है। आवश्यकता केवल अपने भीतर के बल को जगाने की है!

To purchase this book, please click on photo.

शिवाजी ने अपने दल को भव्य रूप से व्यवस्थित किया। शिवाजी के दल में सबसे आगे एक विशाल हाथी चलता था जिस पर एक महावत गेरुए रंग का एक ध्वज फहराता हुआ चलता था। हाथी के पीछे शिवाजी के अंगरक्षकों की टुकड़ी होती थी जिनके बीच में शिवाजी की पालकी होती थी।

शिवाजी की भव्य पालकी पर सोने-चांदी के पतरे चढ़े हुए थे। इस अंगरक्षक दल के चारों ओर शिवाजी के सिपाही रहते थे और अंत में बची हुई सेना चलती थी। हर थाने एवं मुकाम पर मुगल थानेदार, सूबेदार और सरकारी कर्मचारी शिवाजी की सेवा में उपस्थित होकर उनका स्वागत करते थे। सैंकड़ों वर्षों से पददलित हिन्दू जनता शिवाजी के दर्शनों के लिए दीवानी हुई जा रही थी।

हर कोई शिवाजी को अपनी आंखों से देखना चाहता था। शिवाजी ने जनता की छटपटाहट को पहचाना और जनता को समुचित सम्मान दिया। जो लोग, शिवाजी के दर्शन करना चाहते थे, उन्हें शिवाजी से मिलने का पूरा अवसर दिया जाता था।

इस प्रकार शान से चलता हुआ, हिन्दू प्रजा के हृदयों को जीतता हुआ और मुगलों में भय उत्पन्न करता हुआ जीजा का पुत्र और समर्थ गुरु रामदास का शिष्य शिवा 12 मई 1666 को आगरा नगर के मुख्य द्वार पर पहुंच गया। जब शिवाजी का जुलूस आगरा पहुंचा तो समूचे आगरा में धूम मच गई।

हजारों लोग आगरा शहर के प्रवेश द्वार से लेकर लाल किले तक के मार्ग के दोनों तरफ आकर खड़े हो गए। जगह-जगह स्वागत द्वार बनाए गए। जनता जैसे भूल ही गई कि वह औरंगजेब की प्रजा है न कि छत्रपति शिवाजी की। ये सारे समाचार औरंगजेब तक पहुंचाए जा रहे थे जिन्हें सुन-सुनकर औरंगजेब मन ही मन कुढ़ रहा था।

औरंगजेब इतनी बड़ी सल्तनत का एकच्छत्र स्वामी था किंतु जनता ने कभी भी उसका ऐसा स्वागत-सत्कार नहीं किया था किंतु एक छोटे से जमींदार के स्वागत में जनता सड़कों पर बिछ गई थी जो दूर देश का रहने वाला था और जिसे आगरा में किसी ने आज से पहले देखा भी नहीं था। औरंगजेब को बार-बार लग रहा था कि उसने शिवाजी को आगरा में बुलाकर गलती की किंतु अब कुछ नहीं हो सकता था, अब तो शिवाजी आगरा में घुस चुके थे और अपने भगवा झण्डे के साथ लाल किले की तरफ बढ़ रहे थे।

मिर्जाराजा जयसिंह का पुत्र रामसिंह कच्छवाहा, शिवाजी को उसी दिन दरबारे आम में बादशाह के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता था किंतु आगरा में प्रवेश के समय शिवाजी के स्वागत-सत्कार में काफी समय लग गया, तब तक औरंगजेब दरबारे आम से उठकर, दरबारे खास में जाकर बैठ गया। एक तरह से औरंगजेब का दरबारे आम में शिवाजी से भेंट नहीं करना ठीक ही रहा क्योंकि अवश्य ही वहाँ उपस्थित जनता औरंगजेब का भय भूलकर छत्रपति की जय-जयकार करने लगती जो कि औरंगजेब के जीवन में सबसे बुरा दिन होता।

अगले दिन शिवाजी लाल किले में उपस्थित हुए। औरंगजेब के बख्शी असद खाँ ने शिवाजी को दरबारे खास में बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया। शिवाजी का किसी भी तरह आगरा चले आना, औरंगजेब की बहुत बड़ी विजय थी किंतु वह शिवाजी के स्वागत-सत्कार से जल-भुन गया था।

इसलिए औरंगजेब पहली ही भेंट में शिवाजी का मानमर्दन करके उन्हें अपनी शक्ति का परिचय दे-देना चाहता था। उस कुटिल अभिमानी बादशाह को एक हिन्दू राजा का अपमान करने के सौ तरीके आते थे तथा वह दुष्टता का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देता था।

शिवाजी ने बादशाह को एक हजार मोहरें तथा दो हजार रुपए नजर किए तथा 5000 रुपए निसार के तौर पर दिए। शिवाजी के नौ वर्षीय पुत्र सम्भाजी ने औरंगजेब को पांच हजार मोहरें और एक हजार रुपए नजर किए एवं 2 हजार रुपए निसार के तौर पर प्रस्तुत किए। औरंगजेब ने उन उपहारों की तरफ देखा तक नहीं। उसने शिवाजी एवं सम्भाजी से एक भी शब्द नहीं कहा तथा न ही शिवाजी की कुशल-क्षेम पूछी। बख्शी ने शिवाजी को ले जाकर पांच हजारी मनसबदारों की पंक्ति में महाराजा जसवंतसिंह के पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिवाजी की गर्जना (59)

0
शिवाजी की गर्जना - bharatkaitihas.com
शिवाजी की गर्जना

जब शिवाजी लाल किले में खड़े होकर गरजे तो औरंगजेब जैसे क्रूर एवं मदांध बादशाह की रूह भी कांप उठी। शिवाजी की गर्जना से लाल किले की दीवारें कांप उठीं! शिवाजी की गर्जना न केवल मुगल इतिहास की, अपितु हिन्दुओं के इतिहास की भी अत्यंत महत्वपूर्ण घटना बन गई।

जब औरंगजेब के बख्शी असद खाँ ने छत्रपति शिवाजी को पांच हजारी मनसबदारों की पंक्ति में महाराजा जसवंतसिंह के पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया तो शिवाजी बहुत आहत हुए। मुगल दरबार में हिन्दू राजाओं एवं मुस्लिम अमीरों के खड़े होने की व्यवस्था अकबर के समय से ही निर्धारित थी। दरबार में बादशाह के अतिरिक्त सब खड़े रहते थे। उनके खड़े होने का क्रम मनसब के अनुसार होता था।

भारत का बड़े से बड़ा राजा इस दरबार में घण्टों पैरों पर खड़ा रहता था, थक जाने पर वह दो मिनट के लिए अपने पीछे लगी लकड़ी की बल्ली का सहारा लेता था। यदि कोई राजा या अमीर अधिक समय तक बल्ली का सहारा लेता था तो औरंगजेब के सिपाही उसे पीछे से लकड़ी चुभाकर सीधे खड़े होने का संकेत करते थे। जो राजा बूढ़े होते थे, उनके सहारे के लिए छत से रस्सी लटकाई जाती थी जिसे पकड़कर वे घण्टों खड़े रहते थे।

शिवाजी को संभवतः मुगल दरबार की इस व्यवस्था की जानकारी नहीं थी, यदि होती तो वे कभी भी इस दरबार में नहीं आते। शिवाजी को आशा थी कि उन्हें औरंगजेब के दरबार में सम्मानपूर्वक बैठाया जाएगा, इस भयावह अपमानजनक स्थिति में शिवाजी दो पल भी खड़े नहीं रह सकते थे। उन्होंने देखा कि उनके ठीक आगे जोधपुर नरेश महाराजा जसवंतसिंह खड़े हुए थे। यह देखते ही शिवाजी क्रोध और अपमान से तमतमा गए।

शिवाजी ने सोचा कि मेरे आगे खड़ा यह वही महाराजा जसवंतसिंह है जिसे मैंने कोंडाणा दुर्ग की चढ़ाई में परास्त किया था और जिसके डेरे के सामने से मैं औरंगजेब के ममेरे भाई का कटा हुआ सिर लेकर निकला था। आज वही महाराजा जसवंतसिंह औरंगजेब के दरबार में शिवाजी की तरफ पीठ करके खड़ा था! इस अपमान से शिवाजी तमतमा गए।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब औरंगजेब ने सरदारों और अमीरों को खिलअतें बांटीं तो शिवाजी ने खिलअत पहनने से मना कर दिया। इस पर औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह के कुंअर रामसिंह से कहा कि वह शिवाजी की तबियत के बारे में पूछे और उसे खिलअत पहनने के लिए समझाए। जब रामसिंह शिवाजी के पास गया तो शिवाजी ने जोर से चिल्ला कर कहा- आपने और आपके पिता ने देखा कि मैं किस तरह का इंसान हूँ फिर भी मुझे अपमानित करके इतनी देर तक खड़ा रखा गया। इसलिए मैं यह खिलअत पहनने से अस्वीकार करता हूँ।

कुंअर रामसिंह ने शिवाजी को शांत करने के लिए उनकी तरफ अपना हाथ बढ़ाया तो शिवाजी ने उसका हाथ झटक दिया और औरंगजेब की तरफ पीठ करके चलते हुए एक कौने में जाकर बैठ गए तथा जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि मेरी मृत्यु ही मुझे इस स्थान पर खींच लाई है। शिवाजी की इस भयंकर गर्जना से औरंगजेब के दरबार में भारी हलचल मच गई। हिन्दू राजाओं की बेचैनी और मुस्लिम सूबेदारों की घबराहट उनके चेहरों पर साफ देखी जा सकती थी। उनकी दृष्टि में शिवाजी ऐसा रहस्यमय व्यक्ति था जो किसी भी समय कुछ भी करने में समर्थ था।

To purchase this book, please click on photo.

शिवाजी की गर्जना के कारण औरंगजेब का मुंह अपमान से पीला पड़ गया। हालांकि औरंगजेब ने अपने जीवन में पहली बार यह दृश्य नहीं देखा था, इससे पहले भी वह अपने पिता शाहजहाँ के दरबार में अमरसिंह राठौड़ को सिंह-गर्जना करते हुए देख चुका था।

औरंगजेब के लिए यह तो अच्छा ही हुआ था कि शिवाजी को दरबारे आम में प्रस्तुत न करके दरबारे खास में प्रस्तुत किया गया था। अन्यथा आम जनता के सामने औरंगजेब की जो किरकिरी होती और जनता में शिवाजी के साहस के बारे में जो किस्से गढ़े जाते, उनका जवाब समूची मुगलिया सल्तनत के साहित्यकार मिलकर भी नहीं कर सकते थे।

शिवाजी के इस तरह विक्षुब्ध हो जाने और इतनी कठोर प्रतिक्रिया देने से औरंगजेब सहम गया। वह समझ चुका था कि उसने अनजाने में ही किस स्वाभिमानी हिन्दू राजा को नाराज कर दिया है। इसलिए उसने अपने अमीर-उमरावों को संकेत किया कि वे शिवाजी को समझाएं तथा खिलअत पहनाकर बादशाह के समक्ष लाएं।

औरंगजेब के अमीर-उमारावों ने ने शिवाजी को समझाने के बहुत प्रयास किए तथा बादशाह से कहकर उन्हें तथा उनके पुत्र को बड़ा मनसब दिलवाने के लालच दिए किंतु वीर शिवाजी ने खिलअत पहनने तथा दुष्ट औरंगजेब के सम्मुख जाने से मना कर दिया। शिवाजी इस समय भी क्रोधित थे और जोर-जोर से चिल्ला रहे थे कि मैं खिलअत नहीं पहनूंगा। बादशाह चाहे तो मुझे मार डाले या फिर मैं ही आत्मघात कर लूंगा किंतु बादशाह के समक्ष दुबारा नहीं जाऊंगा। मुझे मुसलमान बादशाह की सेवा नहीं करनी है।

औरंगजेब ने शिवाजी को अपमानित करने का प्रयास किया था किंतु स्वयं अपमानित हो गया। अपनी कपट चाल के कारण, वह जीती हुई बाजी हार चुका था। अंत में औरंगजेब के मंत्रियों ने औरंगजेब को सूचित कर दिया कि अब शिवाजी नहीं मानने वाला। इस पर औरंगजेब ने कुंअर रामसिंह कच्छवाहे से कहा कि वह शिवाजी को अपने डेरे पर ले जाकर शांत करे तथा अगले दिन फिर से हमारे सामने पेश करे।

कुंअर रामसिंह शिवाजी को आगरा के किले से निकालकर अपनी हवेली पर ले गया। उसने शिवाजी को बहुत ठण्डा-मीठा किया तथा दूसरे दिन उन्हें पुनः औरंगजेब के दरबार में लेकर आया। औरंगजेब का दरबार आज सुबह से ही ठसाठस भरा हुआ था। हर कोई यह देखना चाहता था कि आज शिवाजी क्या करेंगे? क्या दहकता हुआ अंगारा रात भर में शांत होकर बुझ चुका होगा, या फिर उस अंगारे की आंच और तेज हो गई होगी!

औरंगजेब भी रेशम से लिपटे अपने लकड़ी के कटरे के भीतर संभल कर बैठा था, हालांकि उसे पूरी आशा थी कि रात भर में राजकुमार रामसिंह ने शिवाजी को समझा-बुझा कर ठण्डा कर दिया होगा फिर भी उसे हिन्दू राजाओं का भरोसा नहीं था। क्या पता, कहीं वे एक साथ शिवाजी के पक्ष में आ गए तो सारी सल्तनत ताश के पत्तों की तरह एक क्षण में ढह जाएगी। इसलिए चिंता की लकीरें औरंगजेब के माथे पर रह-रह कर दिखाई पड़ती थीं। औरंगजेब ने अपने शहजादों को अपने कटरे के भीतर खड़ा कर लिया ताकि वे किसी भी अनहोनी का सामना कर सकें।

आखिर वह क्षण आ ही गया। कुंअर रामसिंह शिवाजी की अगवानी करता हुआ दरबारे खास में प्रविष्ट हुआ। कुंअर को पूरा विश्वास था कि आज शिवाजी शांत रहेंगे और बादशाह उन्हें क्षमा कर देगा किंतु शिवाजी के दरबार में प्रवेश करते ही जो कुछ हुआ, उसकी तो कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।

औरंगजेब को देखते ही शिवाजी की गर्जना आरम्भ हो गई। शिवाजी ने उस म्लेच्छ शासक के समक्ष जाने से मना कर दिया तथा बादशाह की तरफ पीठ करके दीवान-ए-खास से बाहर निकल गए। लाल किले की दीवारें छत्रपति शिवाजी की गर्जना से भयभीत होकर सहम गईं।

देश भर से आए राजाओं, राजकुमारों और अमीर-उमरावों की सैंकड़ों जोड़ी आंखें शिवाजी पर टिकी हुई थीं किंतु औरंगजेब उनकी तरफ देख पाने का साहस भी नहीं कर पा रहा था। वह हताश होकर तख्त पर रखे तकिए से टिक गया। जिस छत्रपति को औरंगजेब बड़ी हिकारत से पहाड़ी चूहा कहता था, वह सिंह जैसी शान से औरंगजेब के सामने से निकल कर जा रहा था और हतप्रभ औरंगजेब सूनी आंखों से न जाने किस शून्य में देख रहा था!

शिवाजी, औरंगजेब के दरबार से निकलकर वजीर जाफर खाँ के घर गए जो औरंगेब का मौसा था और जिसकी शिवाजी से पुरानी पहचान थी। शिवाजी ने उसे बहुमूल्य उपहार देकर अनुरोध किया कि वह शिवाजी के, आगरा से वापस जाने का प्रबन्ध करे। जाफर खाँ की पत्नी, औरंगजेब की मौसी थी। उसने जाफर खाँ को अंदर बुलाकर कहा कि इस व्यक्ति को यहाँ से तुरंत भगा दो। यह वही आदमी है जिसने आपके साले शाइस्ता खाँ पर जानलेवा हमला किया था और शाइस्ता खाँ के पुत्र का सिर तलवार से उड़ा दिया था।

जब जाफर खाँ ने अपनी बेगम को समझाने का प्रयास किया तो वह जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने लगी। इस पर जाफर खाँ ने शिवाजी को अपने घर से जाने के लिए कह दिया।

उधर औरंगजेब के हरम की औरतों को शिवाजी द्वारा बादशाह का अपमान किए जाने और जाफर खाँ के घर जाकर भेंट करने के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने बादशाह को संदेश भिजवाया कि इस उद्दण्ड हिन्दू राजा को दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ा जाए। हरम की औरतों की अगुवाई औरंगजेब की बहिन जहाँआरा कर रही थी जो इस समय शाहबेगम के पद पर नियुक्त थी।

जहानआरा शिवाजी से इसलिए नाराज थी क्योंकि शिवाजी ने उसकी जागीर में स्थित सूरत बंदरगाह को बेरहमी से लूटा और जलाया था। शाइस्ता खाँ की बेगम जो कि औरंगजेब की मामी थी, वह भी चाहती थी कि हाथ आए हुए शिवाजी को प्राणदण्ड मिलना चाहिए। वह भी हाय-तौबा मचाने लगी।

हरम की औरतों की चीख-पुकार से तंग आकर औरंगजेब ने शिवाजी तथा उसके पुत्र सम्भाजी को कुंअर रामसिंह के सरंक्षण में बंदी बनाने के निर्देश दिए। रामसिंह ने विवश होकर शिवाजी को बंदी बना लिया।

इस प्रकार शिवाजी अतिथि से बंदी हो गए। औरंगजेब के हरम की औरतें चाहती थीं कि शिवाजी को जान से मार डाला जाए क्योंकि शिवाजी ने शाइस्ता खाँ को घायल किया था और उसके पुत्र को मार डाला था किंतु औरंगजेब इस सम्बन्ध में जल्दबाजी में कोई खतरनाक निर्णय नहीं लेना चाहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...