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औरंगजेब की कट्टरता (47)

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औरंगजेब की कट्टरता

औरंगजेब (Aurangzeb) का इस्लाम अपने जमाने के तमाम मुसलमानों से अलग था। जो शिया मुसलमान (Shia Musalman) तबर्रा (Tabarra) बोलते थे, औरंगजेब उनकी हत्या करवा देता था। कुछ लोग उसे पीर एवं औलिया मानते थे तो कुछ लोग इसे औरंगजेब की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) कहते थे।

इस्लाम का प्रचार करने की धुन में मदमत्त हुए औरंगजेब (Aurangzeb) ने केवल इतना ही नहीं किया था कि उसने लाल किलों (red Forts) से नचैयों, गवैयों, पत्थरसाजों एवं रंगसाजों को मार भगाया था जिन्हें वह कुफ्र की निशानियां कहता था, अपितु उसने कई ऐसी बातें भी कीं जो मुसलमानों को भी बुरी लगती थीं किंतु औरंगजेब के पास अपने तर्क थे जिनकी काट बड़े से बड़े मुल्ला-मौलवी के पास नहीं थी।

मुल्ला-मौलवी चाहते थे कि बादशाह द्वारा जारी सिक्कों पर कलमा लिखा जाए क्योंकि यह परम्परा तैमूरी खानदान के बादशाहों द्वारा प्राचीन काल से चली आ रही थी किंतु औरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा लिखवाना बन्द कर दिया क्योंकि वह गैर-मुसलमानों के हाथों में जाने से अपवित्र हो जाता था।

औरंगजेब (Aurangzeb) ने भारत के प्रत्येक बड़े नगर में मुहतासिब अर्थात् आचरण-निरीक्षक निुयक्त किये। जिनका काम यह देखना था कि प्रजा, इस्लाम के अनुसार जीवन व्यतीत करती है या नहीं! अर्थात् प्रजा मद्यपान तो नहीं करती! कोई जुआ तो नहीं खेलता! लोग चरित्र-भ्रष्ट तो नहीं हो रहे! लोग नियमित रूप से दिन में पाँच बार नमाज पढ़ते हैं या नहीं और रमजान के महीने में रोजा रखते हैं या नहीं!

औरंगजेब ने इस्लाम के सिद्धान्तों का विरोध करने वालों तथा सूफी मत (Sufism) को मानने वालों को दण्डित किया। औरंगजेब ने सरमद को मरवा दिया जो सूफी मत का अनुयाई था और दारा शिकोह का पक्षधर था।

हिन्दुओं की अनेक प्रथाओं पर भी की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) का कहर टूटा। उसने हिन्दुओं की सती प्रथा पर पूरी तरह रोक लगा दी। क्योंकि इस्लाम में ऐसी किसी प्रथा का प्रावधान नहीं किया गया है। औरंगजेब ने मुसलमानों पर से सभी तरह के कर एवं चुंगी हटा दिए तथा हिन्दुओं पर लगने वाले कर एवं चुंगी दो-गुने कर दिए। जो हिन्दू इन करों से बचना चाहते थे, उन्हें इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य था। इस कारण बहुत से निर्धन हिन्दू अपनी दैन्य अवस्था से छुटकारा पाने की लालसा में मुसलमान बन गए।

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औरंगजेब स्वयं को अपनी प्रजा का सेवक कहता था और उसके जीवन को सुखी बनाने के लिये हर समय प्रयत्नशील रहता था। प्रजा का तात्पर्य मुस्लिम-प्रजा से था, हिन्दू-प्रजा से नहीं। हिन्दुओं को वह काफिर कहता था और उनके प्रति बड़ा अनुदार था। औरंगजेब की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) का हाल यह था कि उसे इस बात की परवाह नहीं थी कि कोई उसे क्या कहेगा!

औरंगजेब (Aurangzeb) अपने खर्च के लिए राजकोष से धन नहीं लेता था। वह राजकाज से अवकाश मिलने पर नियमित रूप से टोपियां सिला करता था। इन टोपियों को खरीदने के लिए मुस्लिम अमीरों की भीड़ लगी रहती थी। इसी प्रकार वह कुरान की आयतों की नकल किया करता था। ये नकलें भी मुस्लिम अमीरों एवं आम रियाया में हाथों-हाथ बिक जाती थीं। इस धन से वह अपना व्यय चलाता था।

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औरंगजेब सूफियों की तरह शिया मुसलमानों (Shia Musalman) से भी घनघोर घृणा करता था। उसने दक्षिण के शिया राज्यों को उन्मूलित करने के लिए दिन-रात एक कर दिया जिन्हें वह दारूल-हार्श अर्थात् काफिर राज्य कहता था। जो शिया मुसलमान तबर्रा बोलते थे, औरंगजेब उनकी हत्या करवा देता था। ई.1665 में औरंगजेब (Aurangzeb) ने आदेश दिया कि राजपूतों के अतिरिक्त अन्य कोई हिन्दू हाथी, घोड़े अथवा पालकी की सवारी नहीं करेगा और अस्त्र-शस्त्र धारण नहीं करेगा। हिन्दुओं को मेले लगाने तथा त्यौहार मनाने की भी स्वतंत्रता नहीं थी। ई.1668 में औरंगजेब ने आदेश निकाला कि हिन्दू अपने तीर्थ-स्थानों के निकट मेले न लगायें। होली तथा दीपावली जैसे हिन्दू-त्यौहार भी बाजार के बाहर और कुछ प्रतिबन्धों के साथ ही मनाये जा सकते थे। हिन्दू अपने मंदिरों में शंख, घड़ियाल तथा खड़ताल बजाया करते थे। जब ये ध्वनियां औरंगजेब के कानों में पड़ती थीं तो उसे मर्मान्तक पीड़ा होती थी। इसलिए औरंगजेब जिस मार्ग से गुजरता था तथा जहाँ उसका पड़ाव होता था, वहाँ दूर-दूर तक के मंदिरों में पूजा करने तथा शंख एवं घण्टे बजाने पर रोक लगा दी जाती थी और मंदिरों को तोड़ दिया जाता था। जो मंदिर समय के अभाव में तोड़े नहीं जा सकते थे, उनके शिखर को तोड़कर शेष भाग को तिरपालों से ढक दिया जाता था ताकि कुफ्र (Kufr) की ये निशानियां बादशाह की दृष्टि में न पड़ें। औरंगजेब की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) का इससे अधिक प्रमाण और क्या हो सकता था!

इस प्रकार औरंगजेब की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) ने अकबर द्वारा स्थापित सहिष्णुता तथा सुलह-कुल (Sulah Kul) की ‘मधु-मण्डित नीति’ को छोड़ दिया और हिन्दू प्रजा पर तरह-तरह के अत्याचार किये जिनके माध्यम से उसने हिन्दू धर्म, हिन्दू सभ्यता, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू जाति को समाप्त करने का प्रयास किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब का मंदिर विनाश (48)

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औरंगजेब का मंदिर विनाश
औरंगजेब का मंदिर विनाश

औरंगजेब (Aurangzeb) का मंदिर विनाश भारत के इतिहास की ऐसी क्रूर गाथा है जिसकी मिसाल दुनिया में और कहीं शायद ही देखने को मिले। उस मदांध एवं क्रूर बादशाह के आदेश से दिल्ली का लाल किला (Red Fort of Delhi) हिन्दू मंदिरों पर हथौड़े बरसाने लगा!

दिल्ली और आगरा के लाल किले (Red Fort of Delhi and Agra) जो किसी समय रक्कासाओं के घुंघुरुओं से झंकृत रहा करते थे, जहाँ तानसेन की स्वर लहरियां गूंजा करती थीं और अनारकलियों पर रौनकें रहा करती थीं, औरंगजेब का स्वामित्व पाकर समूचे हिन्दुस्तान पर आंखें तरेरने लगे और गुस्से से लाल-पीले तथा आग-बबूला होकर मंदिरों पर हथौड़े बरसाने लगे।

ये वही लाल किले (Red Fort of Delhi and Agra) थे जो अकबर, जहांगीर (Jahangir) और शाहजहाँ (Shahjahan) के समय जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर की राजकुमारियों द्वारा लाई गई कृष्ण कन्हैया की मूर्तियों को बड़ी निष्ठा के साथ पूजते रहे थे और भोर होने पर प्रभातियां गा-गा कर कृष्ण-कन्हैया को जगाते रहे थे किंतु औरंगजेब का शासन क्या आया, लाल किले प्रभातियां गाना भूल गए।

सुबह-शाम बजने वाले नगाड़े और शहनाइयां के स्वर मानो औरंगजेब (Aurangzeb) के भय से यमुनाजी के जल में समाधि ले चुके थे। अब लाल किले (Red fort of Delhi) के बाशिन्दे पांच वक्त की नमाज के अतिरिक्त और कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रखते थे।

औरंगजेब (Aurangzeb) का मानना था कि मुसलमानों के लिए यह उचित नहीं है कि उनकी दृष्टि किसी बुतखाने अर्थात् मंदिर पर पड़े। इसलिए बादशाह बनने से पहले ही औरंगजेब ने हिन्दू पूजा-स्थलों को गिरवाना तथा देव-मूर्तियों को भंग करना आरम्भ कर दिया था। जब वह गुजरात का सूबेदार था तब अहमदाबाद में चिन्तामणि का मन्दिर बनकर तैयार हुआ ही था। औरंगजेब ने उसे ध्वस्त करवाकर उसके स्थान पर मस्जिद बनवा दी।

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दिल्ली के लाल किले (Red fort of Delhi) का स्वामी बनते ही औरंगजेब ने बिहार के मुगल सूबेदार को निर्देश दिए कि कटक तथा मेदिनीपुर के बीच में जितने भी हिन्दू मन्दिर हैं, उन्हें गिरवा दिया जाए। इनमें तिलकुटी का नवनिर्मित भव्य मंदिर भी सम्मिलित था। औरंगजेब के आदेश से सोमनाथ का मन्दिर भी ध्वस्त करवा दिया गया। ई.1665 में उसने आदेश दिए कि गुजरात का जो मंदिर तोड़ा गया था, उसे हिन्दुओं ने फिर से बनवा लिया है, उसे पुनः तोड़ा जाए।

ई.1666 में औरंगजेब (Aurangzeb) ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर स्थित केशवराय मंदिर के पत्थर के उस कटरे अर्थात् रेलिंग को तुड़वाया जिसे दारा शिकोह ने बनवाया था। इस मंदिर का मूल निर्माण लगभग ई.पू.3500 में श्रीकृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाथ द्वारा करवाया गया था। चैतन्य महाप्रभु ने मथुरा में इसी मंदिर के दर्शन किए थे।

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28 अगस्त 1667 को आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) की मृत्यु हो गई। इसके 6 दिन बाद अर्थात् 3 सितम्बर 1667 को औरंगजेब ने सीदी फौलाद खाँ को निर्देश दिए के वह 100 बेलदार लगाकर 2,000 वर्ष पुराने दिल्ली के कालकाजी शक्तिपीठ तथा उसके क्षेत्र में आने वाले समस्त हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दे। यह मंदिर मिर्जाराजा जायसिंह के संरक्षण में था। 12 सितम्बर 1667 को सीदी फौलाद खाँ ने औरंगजेब को सूचना दी कि बादशाह के आदेशों की पूर्णतः पालना हो गई है। मंदिर तोड़ने के दौरान एक ब्राह्मण ने सीदी फौलाद खाँ पर तलवार से वार किए जिससे सीदी के शरीर पर तीन घाव लगे। सीदी ने उस ब्राह्मण का सिर पकड़ लिया। काली-भक्त ब्राह्मण को वहीं मार दिया गया किंतु दुष्ट सीदी बच गया। औरंगजेब (Aurangzeb) का मंदिर विनाश उसके सम्पूर्ण शासनकाल में जारी रहा। 9 अप्रेल 1669 को औरंगजेब ने दिल्ली के लाल किले (Red fort of Delhi) से फरमान जारी किया कि मुगल सल्तनत के समस्त मंदिरों एवं हिन्दू विद्यालयों को नष्ट कर दिया जाए। इस आदेश के जारी होते ही सम्पूर्ण भारत में हा-हाकार मच गया। बादशाह के आदेश से उन सैंकड़ों और हजारों साल पुराने मंदिरों को ढहाया जाने लगा जिन्होंने भारतीय संस्कृति के निर्माण की भूमिका निभाई थी।

मई 1669 में सालेह बहादुर को राजपूताना में मोरेल नदी के तट पर स्थित मलारना गांव के सैंकड़ों साल पुराने शिव मंदिर को तोड़ने भेजा गया। इस मंदिर के खण्डहर आज भी राजस्थान के सवाईमाधोपुर जिले में देखे जा सकते हैं।

इसके बाद औरंगजेब (Aurangzeb) की दृष्टि काशी विश्वनाथ के मंदिर (Kashi Vishvanath Temple) पर गई। इस मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण सहित कई प्राचीन पुराणों में मिलता है। इस पौराणिक मंदिर को ई.1194 में दुष्ट कुतुबुद्दीन एबक ने तोड़ डाला था किंतु कुछ समय बाद ही गुजरात के एक व्यापारी ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था।

बाबर (Babur) के भारत में आने से कुछ साल पहले ही सिकंदर लोदी (Sikandar Lodi) ने गुजराती व्यापारी द्वारा बनवाए गए काशी-विश्वनाथ मंदिर को तोड़ दिया था। अकबर (Akbar) के शासनकाल में आम्बेर नरेश मानसिंह (Raja Mansingh) ने इस मंदिर को फिर से बनवाने की चेष्टा की किंतु हिन्दुओं ने मानसिंह के मंदिर को स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह मुसलमान बादशाह अकबर का सम्बन्धी था।

इस पर ई.1585 में राजा टोडरमल (Raja Todarmal) ने अकबर से धन लेकर इस मंदिर का निर्माण करवाया। औरंगजेब के काल में इस मंदिर को पुनः तोड़ा गया तथा इस बार उसके स्थान पर मस्जिद बना दी गई। औरंगजेब ने काशी का नाम मुहम्मदाबाद रख दिया। जब मुगलों का राज चला गया तो मराठा रानी अहिल्याबाई होलकर ने इस मस्जिद के पास एक नया मंदिर बनवा दिया जिसे आजकल काशी विश्वनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है।

औरंगजेब (Aurangzeb) का मंदिर विनाश कभी भी रुका या थका नहीं। यही उसके जीवन का चरम लक्ष्य था। औरंगजेब अपने लक्ष्य को तो नहीं पा सका किंतु इस कार्य ने मुगल सल्तनत के विनाश के बीज बो दिए। हिन्दू मंदिरों को तोड़ते-तोड़ते दिल्ली का लाल किला (Red fort of Delhi) स्वयं भी जर्जर हो चला।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूर्तिभंजक औरंगजेब (49)

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मूर्तिभंजक औरंगजेब
मूर्तिभंजक औरंगजेब

मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) ने भारत के हजारों मंदिर तुड़वा दिए तथा देवमूर्तियां मस्जिदों तक जाने वाले रास्तों में गढ़वा दीं। उसने विश्वप्रसिद्ध उज्जैन, अयोध्या और जगन्नाथपुरी के मंदिर तोड़ दिए!

औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि हिन्दू अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार नहीं करें तथा नये मंदिर नहीं बनवायें। उसने हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवा दिया जिससे वे मुसलमानों के पैरों से कुचली तथा ठुकराई जायें और उनका घोर अपमान हो।

मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) चाहता था कि देव-मंदिरों, हिन्दू-विद्यालयों एवं धर्म-ग्रंथों को नष्ट करके, हिन्दुओं के मेलों और तीज-त्यौहारों को बंद करके, हिन्दू न्याय एवं विधि को समाप्त करके तथा तीर्थों के वास्तविक नामों को बदलकर हिन्दुओं के मन से हिन्दू धर्म के गौरव को पूर्णतः मिटा दिया जाए।

मथुरा एवं वृंदावन के मंदिरों (Temples of Mathura Vrindavan) को तोड़ने के बाद मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) ने गदा बेग को 400 सिपाहियों के साथ उज्जैन के मंदिर तोड़ने के लिए भेजा तथा मालवा के सूबेदार वजीर खाँ को भी उज्जैन पहुंचने के आदेश दिए।

जब मुस्लिम सेना उज्जैन (Ujjain) के सुप्रसिद्ध महाकाल मंदिर (Mahakal Mandir) पर हमला करने पहुंची तो उज्जैन के रावत ने मुस्लिम सेना का प्रबल विरोध किया। उसने गदा बेग तथा उसके 121 सिपाहियों का वध कर दिया। रावत की बहादुरी को आज भी मालवा के लोकगीतों में स्मरण किया जाता है।

औरंगजेब के सेनापतियों ने अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर ‘त्रेता के ठाकुर’ (Treta Ke Thakur Ka Mandir) को नष्ट कर दिया जहाँ भगवान ने अपनी लौकिक देह का त्याग किया था। अयोध्या का ‘स्वर्गद्वारम्’ (Ayodhya Ka Swarg dwaram Mandir) नामक मंदिर भी तोड़ दिया गया जहाँ भगवान की लौकिक देह का अंतिम संस्कार किया गया था।

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कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अयोध्या (Ayodhya) का ‘जन्मस्थानम्’ (Janmsthanam) नामक मंदिर भी औरंगजेब के शासकाल में तोड़ा गया था जहाँ भगवान ने लौकिक देह में अवतार लिया था। अधिकतर इतिहासकारों की मान्यता है कि जन्मस्थानम् मंदिर को बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने ई.1528 में ध्वस्त किया था।

ई.1672 में मंदिरों को तोड़ने का औरंगजेब का आदेश बंगाल प्रांत के प्रत्येक परगने में भेजा गया। ढाका जिले के धामारी गांव के यशोमाधव मंदिर (Yashomadhav Mandir) से इस आदेश की एक प्रति प्राप्त हुई है।

उन्हीं दिनों मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) ने गदा बेग को 400 सिपाहियों के साथ उज्जैन के मंदिर तोड़ने के लिए भेजा तथा मालवा के सूबेदार वजीर खाँ को भी को सूचना मिली कि काबुल क्षेत्र में घोरबंद नामक थाने पर नियुक्त राजा मांधाता, घोरबंद दुर्ग में स्थित मंदिर में फूलों से मूर्तियों की पूजा करता है तथा आरती एवं भोग लगाता है। इस पर राजा मांधाता को घोरबंद से अन्यत्र भेज दिया गया तथा मंदिर को तोड़कर वहाँ मस्जिद बनवाई गई।

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उसी वर्ष हसन अली खाँ ने मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) को सूचित किया कि उसने इस्लामाबाद (मथुरा) में एक मंदिर तोड़ा है तथा एक हिन्दू बस्ती को नष्ट करके वहाँ हसनपुर नामक गांव बसाया है। जून 1681 में शाइस्ता खाँ (Shaista Khan) को आदेश भेजकर ब्रह्मपुराण में वर्णित जगन्नाथपुरी के विश्व-प्रसिद्ध मंदिर को तुड़वाया गया। 21 सितम्बर 1681 को औरंगजेब ने बेलदारों के दारोगा जवाहर चंद को आदेश दिए कि वह बुरहानपुर (Burhanpur) जाए तथा अजमेर से बुरहानपुर तक के मार्ग में स्थित प्रत्येक मंदिर को तोड़ डाले। ई.1681 के अंतिम महीनों में दक्षिण के मोर्चे पर नियुक्त कोटा नरेश को ज्ञात हुआ कि औरंगजेब अजमेर से कोटा, बूंदी एवं माण्डू होता हुआ बुरहानपुर जाएगा। इसलिए कोटा नरेश ने अपने राज्याधिकारियों को पत्र भेजकर सूचित किया कि वे श्रीनाथजी (Sri Nathji) के सेवकों से कहें कि वे भगवान के विग्रह को लेकर बोराम्बा अथवा बिसलपुर चले जाएं तथा तब तक वहाँ रहें जब तक कि औरंगजेब वहाँ से वापस न लौट जाए। 13 नवम्बर 1681 को औरंगजेब बुरहानपुर पहुंचा तथा उसने बुरहानपुर के मंदिरों की रिपोर्ट मांगी। उसे बताया गया कि बुरहानपुर में काफी संख्या में मंदिर हैं जिनके पुजारी उन्हें बंद करके चले गए हैं।

मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) उन मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाना चाहता था किंतु बुरहानपुर के सूबेदार ने औरंगजेब को बताया कि बुरहानपुर (Burhanpur) में इतने मुसलमान नहीं हैं जो इन मंदिरों को तोड़ सकें। चूंकि औरंगजेब को अपनी सेना अपने विद्रोही पुत्र अकबर (Akbar) तथा शिवाजी के पुत्र शंभाजी के विरुद्ध भेजनी थी इसलिए उसने उन मंदिरों के दरवाजे तुड़वाकर उन्हें ईंटों से बंद करवा दिया।

ई.1682 में मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) के आदेशों से बनारस (Banaras) में स्थित सुप्रसिद्ध नंद-माधव अर्थात् बिंदु-माधव मंदिर को भी तोड़ डाला गया तथा उसके स्थान पर मस्जिद बनाई गई। इस विशाल मंदिर का निर्माण राजा टोडरमल (Raja Todarmal) एवं राजा मानसिंह (Raja Mansingh) द्वारा अकबर (Akbar) की अनुमति से ई.1585 में करवाया गया था।

13 सितम्बर 1682 को औरंगजेब ने शहजादे आजमशाह को आदेश दिए कि वह शंभाजी (Shambhaji) के राज्य में पेडगांव स्थित शिव मंदिर को तोड़ डाले। आजमशाह द्वारा इस मंदिर को तोड़ दिया गया तथा इस गांव का नाम बदलकर रहमतपुर कर दिया गया। 2 नवम्बर 1687 को अब्दुल खाँ को हैदराबाद के मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए गए। ई.1690 में औरंगजेब ने एलोरा, त्रयम्बकेश्वर, पंढरपुर जाजुरी तथा यवत के मंदिर तुड़वाए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रजभूमि पर कहर (50)

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ब्रजभूमि पर कहर

मजहबी कट्टरता से ग्रस्त औरंगजेब (Auranzeb) ने ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) ढाना आरम्भ किया तो फिर रुकने का नाम नहीं लिया। इस कहर से ब्रज तो उजड़ गया किंतु राजपूताना बस गया!

9 अप्रेल 1669 को जैसे ही औरंगजेब (Auranzeb) ने मुगल सल्तनत के समस्त हिन्दू मंदिरों को गिराने के आदेश दिए, वैसे ही ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) देखकर मथुरा और वृंदावन के मंदिरों के पुजारी और गुसाईंजन अपने-अपने अराध्यों की मूर्तियां लेकर रात के अंधेरों में गायब हो गए। कुछ दिनों तक जंगलों में छिपे रहने के बाद वे जयपुर, जोधपुर, किशनगढ़ तथा उदयपुर राज्यों में प्रकट होने लगे।

ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) के रूप में हिन्दू धर्म पर आए अभूतपूर्व संकट के समय राजपूत राजाओं ने दुष्ट औरंगजेब की जरा भी परवाह नहीं की, उन्होंने पुजारियों एवं गुसाइयों को ब्रज भूमि से निकल भागने में बड़ी सहायता की। महाप्रभु वल्लभाचार्यजी के वंशज गिरधर गुसाईंजी, बूंदी नरेश भावसिंह के सरंक्षण में भगवान मथुराधीश की विख्यात प्रतिमा को ब्रज से निकालकर बूंदी ले गए, जहाँ से यह प्रतिमा राजा दुर्जनशाल द्वारा कोटा ले जाई गई तथा उनके लिए कोटा में मथुरेशजी का विख्यात मंदिर बनवाया गया।

इस विग्रह का प्राकट्य गोकुल (Gokul) के निकट कर्णावल (Karnaval) गांव में हुआ था तथा यह विग्रह महाप्रभु वल्लभाचार्य (Mahaprabhu Vallabhacharya) ने अपने पुत्र विट्ठलनाथजी को दिया था। उन्होंने यह प्रतिमा अपने पुत्र गिरधरजी को दी थी। कोटा के मथुरेशजी मंदिर (Mathureshji Ka Mandir) को अब वल्लभ सम्प्रदाय की प्रथम पीठ माना जाता है।

इसी प्रकार ई.1669 में वृंदावन के विशाल गोविंददेव मंदिर (Govind Dev Mandir) के विग्रह को भी वृंदावन से निकालकर जयपुर पहुंचा दिया गया। इस विग्रह का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ (Raja Vajrnath) ने अपनी माता के मुख से सुने भगवान् श्रीकृष्ण के स्वरूप के आधार पर करवाया था। इस विग्रह को चैतन्य महाप्रभु के आदेश से उनके शिष्य रूप गोस्वामी ने गोमा टीले के नीचे से खोद कर प्राप्त किया था।

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ई.1590 में अकबर (Akbar) की अनुमति से आम्बेर के राजा मानसिंह (Raja Mansingh) ने वृंदावन में इस विग्रह हेतु एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था। मुगलकाल में इससे अधिक भव्य मंदिर नहीं बना था। अकबर ने इस मंदिर की गायों के चारागाह के लिए 135 बीघा भूमि प्रदान की थी। इसकी सातवीं मंजिल पर जलते हुए दीपों का प्रकाश आगरा तक दिखाई देता था।

जब औरंगजेब (Auranzeb) ने इस मंदिर को तोड़ने के आदेश दिए तो मंदिर के सेवादार शिवराम गोस्वामी, भगवान श्रीगोविंददेव और श्रीराधारानी के विग्रहों को लेकर जंगलों में जा छिपे।

ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) देखकर कुछ काल तक के लिए वैष्णव आचार्य हतप्रभ रह गए किंतु कुछ ही दिनों बाद वे भगवान श्रीगोविंददेव और श्रीराधारानी के विग्रहों को आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह के संरक्षण में वृंदावन से आम्बेर ले आए। अब यह प्रतिमा जयपुर के गोविंददेव मंदिर में विराजमान है। जयपुर के शासक गोविंददेव को राज्य का स्वामी तथा स्वयं को राज्य का दीवान मानते थे।  

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ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) की ही कड़ी में ई.1670 में औरंगजेब (Auranzeb) के आदेश से वृंदावन में स्थित गोविंददेव का भव्य मंदिर तोड़ा गया। औरंगजेब ने वृंदावन के गोविंददेव मंदिर की तीन मंजिलों को तुड़वा दिया तथा अकबर द्वारा गौशाला के लिए दी गई 135 बीघा भूमि का पट्टा निरस्त कर दिया। ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) का यह सिलसिला औरंगजेब के जीवन काल में कभी नहीं रुका, वह बढत्रता ही रहा। ई.1670 में औरंगजेब के आदेश से मथुरा के केशवराय मन्दिर को तोड़कर उसके पत्थरों से उसी स्थान पर मस्जिद बनवाई गई तथा मथुरा (Mathura) का नाम बदलकर इस्लामाबाद (Islamabad) रख दिया गया। इस मंदिर से कई मूल्यवान प्रतिमाएं प्राप्त हुईं जिनमें हीरे-जवाहर लगे हुए थे। औरंगजेब ने इन प्रतिमाओं को बेगम साहिब की मस्जिद के रास्ते की सीढ़ियों में लगवा दिया ताकि उन्हें पैरों से ठोकर मारी जा सके। ब्रजभमि पर कहर का ऐसा दृश्य महमूद गजनवी एवं मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के समय में भी देखा गया था। गोविंददेवजी (Govind Dev Mandir) के साथ ही वृंदावन के मदनमोहनजी (Madan Mohan Madir) और गोपालजी (Goplaji) के विग्रह भी आम्बेर ले जाए गए थे।

इनमें से मदनमोहनजी तो बाद में करौली चले गए किंतु गोपालजी आज भी जयपुर के एक मंदिर में विराजमान हैं। जयपुर के गोविंद देवजी, करौली के मदन मोहनजी और जयपुर के गोपालजी की संयुक्त मूर्ति को परंपरागत रूप से त्रिभुवन बिहारी जी (Tribhuvan Bihari Ji) कहा जाता है।

29 सितम्बर 1669 को मथुरा के निकट गोवर्द्धन पर्वत (Govardhan Parvat) पर स्थित गिरिराज मंदिर के गुंसाई दामोदरजी, श्रीनाथजी को अपने साथ लेकर, अपने चाचा गोविन्दजी एवं अन्य पुजारियों के साथ गोवर्द्धन से राजपूताने की ओर रवाना हुए।

वे आगरा, बूंदी, कोटा एवं पुष्कर होते हुए किशनगढ़ पहुंचे। किशनगढ़ के महाराजा मानसिंह ने ‘पीताम्बर की गाल’ में भगवान को पूर्ण भक्ति सहित विराजमान करवाया और विविधत् उनकी पूजा की किंतु भगवान को किशनगढ़ में रखने में असमर्थता व्यक्त की।

इसलिए यहाँ से श्रीनाथजी जोधपुर राज्य के चौपासनी गांव पहुंचे। उस समय महाराजा जसवंतसिंह जमरूद के मोर्चे पर थे इसलिए राज्याधिकारियों ने आशंका व्यक्त की कि हम श्रीनाथजी के विग्रह (Idol of Sri Nath Ji) की रक्षा नहीं कर पाएंगे। इस पर मेवाड़ के गुसाइयों ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह (Maharana Rajsingh) से सम्पर्क किया। महाराणा ने गुसाइयों को वचन दिया कि मेवाड़ राज्य में एक लाख हिन्दुओं के सिर काटे बिना औरंगजेब श्रीनाथजी के विग्रह को स्पर्श नहीं कर पाएगा। इसलिए वे श्रीनाथजी को मेवाड़ ले आएं। इस प्रकार महाराणा राजसिंह के निमंत्रण पर ई.1672 में श्रीनाथजी मेवाड़ पधारे तथा उन्हें सिहाड़ गांव में विराजित किया गया जो अब नाथद्वारा (Nathdwara) कहलाता है।

चूंकि औरंगजेब (Auranzeb) ने मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए थे और ये आदेश ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) बनकर टूटे थे, इसलिए सभी राजपूत राजाओं ने ब्रज से आने वाले देव-विग्रहों के लिए हवेलियों का निर्माण करवाया। इन्हीं हवेलियों में श्रीकृष्ण की विभिन्न प्रतिमाओं को उनके पुजारियों के साथ रखा गया तथा उनके लिए गौशाला एवं चारागाह की भूमि की व्यवस्था की गई। आज भी राजस्थान के विभिन्न नगरों में इन हवेलियों को देखा जा सकता है। शीघ्र ही ये हवेलियां ब्रज की संस्कृति के प्रसार की केन्द्र बन गईं और श्रीनाथजी तथा अन्य विग्रहों एवं पुजारियों के आने से राजपूताना में ब्रज संस्कृति (Braj Saskriti in Rajputana) का प्रभाव व्याप्त हो गया।

मेवाड़ के महाराणा ने शैव-गुरु के साथ-साथ वैष्णव गुरु भी स्वीकार किया। जोधपुर तथा किशनगढ़ के राजवंश गोकुलिये गुसाइयों के शिष्य हो गए तथा वल्लभ सम्प्रदाय को मानने लगे। जोधपुर एवं किशनगढ़ में गोकुलिये गुसाइयों का बहुत जोर था। बीकानेर के राजा-रानियां एवं राजकुमारियां भी लक्ष्मीनारायणजी के उपासक हो गए।

उन दिनों किशनगढ़ वल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख केन्द्रों में से एक था। जहांगीर के जन्म से पहले अकबर ने सलेमाबाद पीठ के आचार्य से आशीर्वाद प्राप्त किया था। जोधपुर, जयपुर, बीकानेर, कोटा, बूंदी एवं किशनगढ़ के साहित्य, संगीत एवं चित्रकला यहाँ तक कि पूरी संस्कृति पर ब्रज संस्कृति का व्यापक प्रभाव पड़ा।

इसके कारण राजपूत सैनिक अपने गले में तुलसी की माला पहनने लगे और राजपूत राजा ब्रज भाषा में कविता करने लगे। जयपुर के राजा भगवान गोविंददेव को राज्य का वास्तविक स्वामी एवं स्वयं को उनका दीवान मानने लगे।

ब्रजभूमि पर कहर (Devastation upon Braj Bhoomi) से औरंगजेब (Auranzeb) की कुत्सित वृत्तियां तो शांत नहीं हुईं किंतु इसने भारत की संस्कृति को निर्बल बनाने की बजाय सम्पूर्ण भारत भूमि को ही ब्रजभूमि बनाने का काम कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजपूताने पर कहर (51)

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राजपूताने पर कहर

ब्रजभूमि पर कहर ढाने के बाद औरंगजेब ने राजपूताने पर कहर ढाना आरम्भ कर दिया। जिस राजपूताने ने मुगलों का राज्य भारत में जमाने एवं उसे हिमालय से लेकर समुद्र तक पहुंचाने में खून की नदियां बहा दी थीं, आज वही राजपूताना औरंगजेब की क्रूर नीति का शिकार होने जा रहा था।

औरंगजेब के भय से मथुरा एवं वृंदावन के मंदिरों से देव-विग्रह निकल कर राजपूत राज्यों में पहुंचा दिए गए थे तथा उन्हें मंदिरों की बजाय हवेलियों में रखा जा रहा था, यह बात अधिक दिनों तक औरंगजेब से छिपी नहीं रह सकती थी। इसलिए उसने राजपूत राज्यों पर कहर ढाना शुरु कर दिया।

ई.1679 में औरंगजेब ने मीर आतिश दाराब खाँ को शेखावाटी क्षेत्र के खण्डेला गांव में स्थित मोहनजी का विशाल मंदिर तोड़ने के लिए भेजा। 8 मार्च 1679 को आतिश दाराब खाँ ने मंदिर पर हमला किया तो 300 हिन्दू युवक, मंदिर की रक्षा के लिए आगे आए। आतिश खाँ ने उनकी हत्या कर दी। इनमें मारवाड़ से विवाह करके लौटा सुजानसिंह नामक एक राजपूत भी था जिसकी प्रशंसा में आज भी शेखावाटी क्षेत्र में लोकगीत गाए जाते हैं।

मुगल सेना ने खण्डेला स्थित मोहनजी का मंदिर, खाटू श्यामजी स्थित सांवलजी का मंदिर एवं निकटवर्ती अन्य मंदिर तोड़ दिए। खण्डेला का राजा बहादुरसिंह अपनी प्रजा एवं सैनिकों के साथ कोट सकराय के पहाड़ी दुर्ग में चला गया तथा वहीं से उसने मुगलों से भारी मोर्चा लिया।

25 मई 1679 को खानजहाँ बहादुर मारवाड़ राज्य के मंदिरों को ढहाकर दिल्ली लौटा। वह अपने साथ जोधपुर, फलोदी, मेड़ता, सिवाना, पोकरण, सांचोर, जालोर, भीनमाल तथा मारोठ आदि कस्बों में स्थित प्रसिद्ध मंदिरों की कीमती मूर्तियों को कई बैलगाड़ियों में भर कर लाया था। इन मूर्तियों में बहुत सी मूर्तियों पर हीरे-जवाहर लगे हुए थे। बहुत सी मूर्तियों पर सोने-चांदी के आभूषण एवं मुकुट आदि थे।

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औरंगजेब ने इन देव-विग्रहों को जिलाउखाना तथा जामा मस्जिद के रास्ते में लगवा दिया ताकि नमाज पढ़ने के लिए जाने वाले मुसलमान इन्हें रोज ठोकरों से मार सकें। खानजहाँ ने अपनी इस विध्वंस यात्रा में मण्डोर के 8वीं शताब्दी ईस्वी के प्राचीन मंदिर सहित ओसियां के हरिहर मंदिर, महिषासुर मर्दिनी मंदिर, त्रिविक्रम मंदिर सहित अनेक प्राचीन मंदिरों का विनाश किया जिनके ध्वंसावशेष आज भी बिखरे पड़े हैं। मुसलमान सैनिकों ने उन सैंकड़ों प्रतिमाओं के चेहरे विकृत कर दिए जिन्हें पूरी तरह तोड़ना संभव नहीं था।

अगस्त 1679 में औरंगजेब ने मुगल फौजदार तहव्वर खाँ को पुष्कर का वाराह मंदिर तोड़ने के लिए भेजा। मेड़तिया राठौड़ों ने मंदिर की रक्षार्थ अपना बलिदान करने का निर्णय लिया और 19 अगस्त को पुष्कर पहुंचकर मुगल फौजदार पर आक्रमण किया। तीन दिनों तक दोनों पक्षों में भयानक लड़ाई चलती रही जब तक कि उस समूह का अंतिम राठौड़ कटकर नहीं गिर गया।

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फरवरी 1679 में औरंगजेब ने हसनअली खाँ को मेवाड़ क्षेत्र में सेना लेकर पहुंचने के आदेश दिए तथा औरंगजेब स्वयं भी 30 नवम्बर 1679 को अजमेर से मेवाड़ के लिए रवाना हुआ ताकि उदयपुर के मंदिरों को गिराया जा सके।

महाराणा राजसिंह उदयपुर नगर को छोड़कर गहन पहाड़ों में चला गया ताकि औरंगजेब को पहाड़ों में खींचकर मारा जा सके किंतु औरंगजेब महाराणा के पीछे जाने का साहस नहीं कर सका। 24 जनवरी 1680 को औरंगजेब उदयसागर झील के किनारे पहुंचा तथा वहाँ स्थित तीनों मंदिर ढहा दिए।

वहीं पर औरंगजेब को सूचना मिली कि 5 कोस की दूरी पर एक और झील है जिसके किनारे भी कई मंदिर बने हुए हैं। औरंगजेब ने यक्का ताज खाँ, हीरा खाँ, हसन अली खाँ तथा रोहिल्ला खाँ को उन्हें भी गिराने के आदेश दिए।

औरंगजेब की सेनाओं ने उदयपुर नगर में स्थित विख्यात एवं भव्य जगदीश मंदिर पर भी आक्रमण किया। इस मंदिर को महाराजा जगतसिंह ने कुछ साल पहले ही कई लाख रुपयों की लागत से बनवाया था। इसे जगन्नाथराय का मंदिर भी कहते थे।

इस मंदिर के सामने 20 माचातोड़ सैनिकों को सुलाया गया। राजस्थान में खटिया को माचा कहा जाता है। प्रत्येक राजपूत राजा के पास कुछ माचातोड़ सैनिक होते थे जो दिन रात-खाते-पीते और माचे पर पड़े रहते थे। जब शत्रु सेना आती थी तो एक-एक माचा तोड़ सैनिक उठ कर खड़ा होता था तथा कई-कई सैनिकों को मारकर वीरगति को प्राप्त होता था। जब मुगलों की सेना जगन्नाथराय मंदिर को तोड़ने आई तो माचातोड़ सैनिक एक-एक करके उठे तथा शत्रुओं के सिर काटते हुए स्वयं भी वीरगति को प्राप्त हुए।

29 जनवरी 1680 को हसन अली खाँ ने औरंगजेब को सूचित किया कि अब तक उदयपुर में 172 मंदिरों को ढहाया जा चुका है। इनमें से उस काल के प्रसिद्ध अनेक मंदिर सदा के लिए नष्ट हो गए और हिन्दू उन्हें पूरी तरह भूल गए। केवल वही मंदिर याद रहे जिनका कुछ अंश टूट जाने से शेष रहा था।

ई.1680 में औरंगजेब की आज्ञा से आम्बेर के प्रमुख हिन्दू मन्दिरों को गिरवा दिया गया। आम्बेर के कच्छवाहों ने अकबर के शासन काल से ही मुगलों की बड़ी सेवा की थी। इस कारण कच्छवाहों को औरंगजेब के इस कुकृत्य से बहुत ठेस लगी।

20 अप्रेल 1680 को मेरठ के दारोगा ने सूचित किया कि बादशाह के आदेश से मेरठ के मंदिरों के दरवाजों को तोड़ दिया गया है तथा अब वह चित्तौड़ के काफिरों को दण्ड देने जा रहा है। जून 1680 में अबू तुराब ने औरंगजेब को सूचित किया कि आम्बेर में 66 हिन्दू मन्दिरों को तोड़ दिया गया है।

22 फरवरी 1681 को औरंगजेब चित्तौड़ पहुंचा। उसने चित्तौड़ में स्थित 63 प्राचीन मंदिरों को ढहा दिया। इनमें आठवीं शताब्दी के सूर्य मंदिर को भी ढहा दिया गया जिसे अब कालिका माता मंदिर कहा जाता है। इसके साथ ही आठवीं से दसवीं शताब्दी के अनेक प्राचीन मंदिर भी बेरहमी से ढहाए गए। इन मंदिरों के साथ शिल्प एवं स्थापत्य का एक सुंदर संसार सदा के लिए मानव सभ्यता की आंखों से ओझल हो गया।

राजपूताने पर कहर ढाने के अभियान में जून 1681 तक औरंगजेब की सेनाओं ने मेवाड़ राज्य में ताण्डव किया। चित्तौड़ दुर्ग के भीतर स्थित 63 मंदिरों के अतिरिक्त चित्तौड़ क्षेत्र के अन्य सैंकड़ों मंदिर भी तोड़े गए। इनमें परिहारों द्वारा 10वीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित कूकड़ेश्वर महादेव, समिद्धेश्वर महादेव, अन्नपूर्णा एवं बाणमाता मंदिर भी सम्मिलित थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण भारत पर कहर (52)

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दक्षिण भारत पर कहर

ब्रजभूमि के मंदिरों पर कहर ढाने के बाद औरंगजेब राजपूताने के मंदिरों पर कहर ढा चुका था और अब वह दक्षिण भारत पर कहर ढाने के लिए तैयार था। उस काल में दक्षिण भारत के गगनचम्बी मंदिर औरंगजेब के लिए किसी कुफ्र से कम नहीं थे। वह कुफ्र की इन निशानियों को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देना चाहता था।

औरंगजेब की सेना ने 2 अगस्त 1680 को मालवा का सुप्रसिद्ध सोमेश्वर मंदिर नष्ट कर दिया। 28 मार्च 1681 को असद अली खाँ ने आम्बेर के निकट गोनेर के लक्ष्मी-जगदीश मंदिर को नष्ट कर दिया। गोनेर को उस काल में राजपूताने का वृंदावन कहा जाता था। यहाँ मध्यकालीन 11 मंदिर थे, जिन्हें औरंगजेब की सेनाओं ने क्षति पहुंचाई।

जब औरंगजेब द्वारा मंदिरों एवं मूर्तियों को नष्ट करने का काम आरम्भ किया गया तो दक्षिण में नियुक्त अनेक राजपूत राजाओं ने देव-प्रतिमाओं को बचाने के प्रयास आरम्भ कर दिए।

जब औरंगजेब ने ब्रजभूमि के मंदिरों पर कहर ढाया था तब वहां की बहुत सी प्रसिद्ध देवप्रतिमाएं राजपूत राजाओं के राज्यों में लाई गईं। अब औरंगजेब दक्षिण भारत पर कहर ढाने को उत्युक था इसलिए राजपूत राजाओं ने दक्षिण के मंदिरों की मूर्तियां की रक्षा के लिए तैयार कर ली।

इनमें बीकानेर नरेश अनूपसिंह तथा आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह के नाम सबसे ऊपर हैं। महाराजा अनूपसिंह ने अष्टधातु की बहुत सी मूर्तियों की रक्षा की तथा उन्हें दक्षिण से निकालकर अपने राज्य में स्थित बीकानेर दुर्ग में भिजवा दिया।

इन मूर्तियों के लिए बीकानेर में तेतीस करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर बनाया गया। ई.1689 में दक्षिण के मोर्चे पर ही महाराजा अनूपसिंह का निधन हुआ। महाराजा द्वारा नष्ट होने से बचाई गई मूर्तियां आज भी बीकानेर में देखी जा सकती हैं।

ई.1693 में औरंगजेब ने गुजरात के वडनगर में स्थित हितेश्वर मंदिर को तोड़ने के आदेश दिए। उसके आदेशों से उत्तर प्रदेश में स्थित सोरों के सीता-राम मंदिर को भग्न किया गया। मंदिर के पुजारियों की मंदिर में ही हत्या की गई तथा गोंडा में देवी-पाटन के नाम पर स्थित देव-वन को नष्ट किया गया।

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आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह ने देश के कई नगरों में निजी सम्पत्तियां खरीदकर जयसिंहपुरा नामक स्थलों का निर्माण करवाया तथा उन्हें अपनी निजी सम्पत्ति बताकर ब्राह्मणों, साधुओं एवं बैरागियों को रहने के लिए दे दिया। ये लोग जयसिंहपुरा में रहकर अपने निजी मंदिर बनाते थे और उनमें देव-विग्रहों की स्थापना करके उनकी पूजा किया करते थे।

जब दिल्ली के एक जयसिंहपुरा में इस प्रकार की पूजा होने की सूचना मिली तो मुगल सेनाओं ने जयसिंहपुरा को घेर कर वहाँ के बैरागियों को पकड़ लिया। मुगल सेना ने 13 देव-मूर्तियां जब्त करके दिल्ली के सूबेदार के पास भेज दीं। जयसिंहपुरा के सामने हिन्दुओं की भारी भीड़ इकट्ठी हो गई। इस भीड़ ने बैरागियों को तो छुड़वा लिया किंतु देव-मूर्तियों को नहीं छुड़वाया जा सका।

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ई.1698 में हमीदुद्दीन खाँ को बीजापुर भेजा गया। उसने बीजापुर के मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनवा दीं। बादशाह उसके काम से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने हमीदुद्दीन खाँ को गुसलखाने का दारोगा बना दिया ताकि वह प्रतिदिन हमीदुद्दीन खाँ को देख सके और उसकी प्रशंसा कर सके।

औरंगजेब के शासनकाल में उसके उन आदेशों की अक्षरशः पालना की गई जिनके अनुसार हिन्दू न तो अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार कर सकते थे और न नए मंदिर बना सकते थे।

पूरे देश के प्रसिद्ध तीर्थों एवं मंदिरों से देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवाया गया जिससे वे नमाज पढ़ने वालें के पैरों से ठुकराई जाएं। उसके शासन में देश भर के हजारों देवमंदिरों को मस्जिदों में बदल दिया गया। यहाँ तक कि छोटे-छोटे चबूतरों तथा पेड़ों के नीचे रखी देव-मूर्तियों एवं पत्थरों को भी तोड़ दिया गया।

इस समय तक औरंगजेब बहुत बूढ़ा हो गया था। फिर भी मंदिरों को तोड़ने की उसकी प्रवृत्ति ज्यों की त्यों बनी रही। 1 जनवरी 1705 को उसने मुहम्मद खलील और बेलदारों के दारोगा खिदमत राय को आदेश दिया कि महाराष्ट्र में पंढरपुर के बिठोबा मंदिर को तोड़ डाला जाए तथा कसाइयों को बुलाकर वहाँ गाएं कटवाई जाएं। यह मंदिर बहुत पुराना और प्रतिष्ठित था एवं इसका उल्लेख स्कंद पुराण में प्रमुख तीर्थ के रूप में किया गया था।

जैसे ही हिन्दुओं को औरंगजेब के इस भयावह आदेश की जानकारी मिली, उन्होंने विठोबा तथा रुक्मणि की प्रतिमाओं को मंदिर से हटाकर जंगलों में छिपा दिया। मुगल सैनिकों ने मंदिर में गायों को लाकर उनकी हत्या की तथा मंदिर को ढहा दिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद हिन्दुओं ने इस मंदिर को पुनः बनाया जिसमें वही प्राचीन प्रतिमाएं पुनः स्थापित की गईं।

औरंगजेब हिन्दू मंदिरों से कितनी घृणा करता था इसका अनुमान औरंगजेब द्वारा रूहिल्ला खाँ को लिखे गए एक पत्र से भली-भांति होता है जिसमें उसने लिखा कि-

‘महाराष्ट्र के बुतखाने पत्थर एवं लोहे के बने हुए होते हैं जिन्हें हमारी सेनाएं, मेरे उस रास्ते से होकर निकलने से पहले, पूरी तरह नहीं तोड़ पाती हैं इस कारण वे मुझे दिखाई देते हैं। इसलिए जब मैं वहाँ से होकर निकल जाऊँ तब मंदिर के ध्वंसावशेषों को और अधिक बेलदार लगाकर उन्हें फुर्सत से पूरी तरह तोड़ा जाए। इस कार्य में ऐसे दारोगा को लगाया जाए जो पूरी तरह से कट्टर हो और वह बुतखानों को तोड़ने के बाद उनकी नींवें भी उखाड़ फैंके।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाइस्ता खाँ की मक्कारी (53)

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शाइस्ता खाँ की मक्कारी

लाल किले में शाइस्ता खाँ की मक्कारी के कई किस्से कहे जाते थे। उसकी औरत ने शाहजहाँ के शासनकाल में आत्मघात करके प्राण त्यागे थे क्योंकि शाहजहाँ ने दिल्ली के लाल किले में उसकी इज्जत लूटी थी। फिर भी शाइस्ता खाँ शाहजहाँ के साथ रहा और जब औरंगजेब ने शाहजहाँ के विरुद्ध बगावत की तो शाइस्ता खाँ ने औरंगजेब का भरपूर साथ देकर शाहजहाँ को बंदी बनाया था।

जिस समय औरंगजेब दक्खिन का सूबेदार था, उसने छत्रपति शिवाजी को मराठा शक्ति के रूप में उभरते हुए देखा था। वह शिवाजी को मुगलों के लिए बड़ा खतरा मानकर उन्हें नष्ट करने की योजना बना ही रहा था कि औरंगजेब के भाइयों में उत्तराधिकार का युद्ध छिद्ध गया और औरंगजेब को दक्खिन छोड़कर आगरा आना पड़ा। जब औरंगजेब मुगलों के तख्त पर बैठने में सफल हो गया तो उसने अपने मामा शाइस्ता खाँ को दक्खिन का सूबेदार नियत किया तथा उसे निर्देश दिए कि वह दक्खिन में जाकर छत्रपति शिवाजी का सफाया करे।

औरंगजेब की आधिकारिक जीवनी आलमगीरनामा में इस आदेश के सम्बन्ध में कहा गया है- ‘शक्तिशाली बनकर शिवाजी ने बीजापुरी राज्य के प्रति सभी तरह का भय और लिहाज छोड़ दिया। उसने कोंकण क्षेत्र को रौंदना और तहस-नहस करना आरम्भ कर दिया। यदा-कदा अवसर का लाभ उठाकर उसने बादशाह के महलों पर हमले किए। तब बादशाह ने दक्कन के सूबेदार अमीर-उल-अमरा शाइस्ता खाँ को हुक्म दिया कि वह शक्तिशाली सेना के साथ कूच करे, नीच का दमन करने का प्रयास करे, उसके इलाकों और किलों को हथिया ले और क्षेत्र को तमाम अशांति से मुक्त करे।’

शाइस्ता खाँ को कई युद्ध करने का अनुभव था। ई.1660 के आरंभ में वह विशाल सेना लेकर औरंगाबाद के लिए रवाना हुआ तथा 11 फरवरी 1660 को अहमदनगर जा पहुंचा। 25 फरवरी 1660 को वह अहमदनगर से दक्खिन के लिए रवाना हुआ। इस अभियान में शाइस्ता खाँ की मक्कारी के नए अध्याय खुलने वाले थे।

अभी शाइस्ता खाँ मार्ग में ही था कि उसे समाचार मिला कि शिवाजी ने छुरा भौंककर बीजापुर के सेनापति अफजल खाँ का वध कर दिया है। इस पर शाइस्ता खाँ ने अपनी सेना को तेजी से आगे बढ़ने के लिए कहा। दक्खिन तक पहुंचने से पहले ही उसे समाचार मिले कि शिवाजी ने मुगल सेनापति फजल खाँ, रूस्तमेजा तथा सिद्दी जौहर की सेनाओं को परास्त कर दिया है।

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9 मई 1660 को शाइस्ता खाँ पूना पहुंच गया। औरंगजेब ने मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह को भी शिवाजी के विरुद्ध लड़ने के लिए दक्खिन के मोर्चे पर पहुंचने के निर्देश दिए। इस कारण महाराजा जसवंतसिंह भी अपनी विशाल सेना के साथ पूना की तरफ बढ़ने लगा। दुष्ट शाइस्ता खाँ तथा महाराजा जसवंतसिंह को इतने बड़े सैन्य दलों के साथ महाराष्ट्र पर चढ़कर आया देखकर शिवाजी संकट में पड़ गए और पूना छोड़कर पहाड़ों में चले गए।

शाइस्ता खाँ ने पूना नगर पर अधिकार कर लिया तथा शिवाजी के महल में डेरा जमाकर बैठ गया जिसे लालमहल कहा जाता था। यह शाइस्ता खाँ की मक्कारी का एक और उदाहरण था कि वह छत्रपति के महल में ही जाकर रहने लगा।

शाइस्ता खाँ ने अपने सिपहसालार कर्तलब अली खाँ की कमान में एक सेना शिवाजी के कोंकण क्षेत्र वाले दुर्गों पर अधिकार करने भेजी। ई.1660 के अंत में कर्तलब खाँ शिवाजी का पीछा करते हुए भारी फौज के साथ लोणावाला के समीप घाटों से नीचे उतर गया।

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शिवाजी कोंकण के चप्पे-चप्पे से परिचित थे इसलिए उन्होंने कर्तलब अली खाँ को भारी जंगल में प्रवेश करने दिया। शिवाजी ने उसे उम्बर खिन्ड नामक ऐसे दर्रे में घेर लिया जहाँ से कर्तलब खाँ का बचकर निकलना बहुत कठिन था। यह दर्रा 20-22 किलोमीटर लम्बे-चौड़े जलविहीन क्षेत्र के निकट स्थित निर्जन पहाड़ी में बना हुआ है जिसमें से एक साथ दो आदमी भी नहीं निकल सकते। दर्रे के दोनों तरफ ऊंची पहाड़ियां हैं। शिवाजी ने अपनी सेना को इन्हीं पहाड़ियों में छिपा दिया।

फरवरी 1661 में मुगल सेना अपनी तोपें और रसद लेकर खिन्ड दर्रे तक पहुंची। शिवाजी की सेना ने उसके आगे और पीछे दोनों तरफ के मार्ग बंद कर दिए। मुगल सेना बुरी तरह से घिर गई। अब शिवाजी के सैनिक पहाड़ियों के ऊपर से मुगलों पर पत्थरों, लकड़ियों तथा गोलियों से हमला करने लगे। मुगल सेना पिंजरे में बंद चूहे की तरह फंस गई। कुछ ही समय में उसके पास पानी समाप्त हो गया।

सैंकड़ों मुगल सिपाही इस घेरे में मारे गए। कर्तलब अली खाँ के स्वयं के प्राण संकट में आ गए। उसने शिवाजी के पास, युद्ध बंद करने का अनुरोध भिजवाया। शिवाजी ने उससे भारी जुर्माना वसूल किया तथा उसकी सारी सैन्य-सामग्री छीन ली तथा कर्तलब खाँ को लौट जाने का मार्ग दे दिया। कर्तलब अली खाँ अपने बचे हुए सिपाहियों को लेकर शाइस्ता खाँ के पास लौट गया।

कर्तलब खाँ को परास्त करने के बाद शिवाजी ने कोंकण प्रदेश में स्थित बीजापुर राज्य के दाभोल, संगमेश्वर, चिपलूण तथा राजापुर आदि कस्बों तथा पाली एवं शृंगारपुर आदि छोटी रियासतों को अपने राज्य में मिला लिया। शिवाजी की एक सेना ने नेताजी पाल्कर के नेतृत्व में मुगलों को उलझा लिया जबकि स्वयं शिवाजी एक सेना लेकर कोंकण के बचे हुए प्रदेश जीतने लगे। ई.1661 में शिवाजी ने समूचा कोंकण जीत लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाइस्ता खाँ की अंगुली (54)

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शाइस्ता खाँ की अंगुली

शाइस्ता खाँ की अंगुली मुगलिया इतिहास की ऐसी पहेली है जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में और कहीं मिलनी कठिन है। छत्रपति शिवाजी ने शाइस्ता खाँ की अंगुली नहीं काटी थी, अपितु अंगुली के रूप में औरंगजेब की नाक काटकर उसके हाथ में पकड़ाई थी।

शिवाजी शाइस्ता खाँ को कोंकण के पहाड़ों में खींचना चाहते थे इसलिए वे कोंकण के किलों की विजय में संलग्न थे किंतु शाइस्ता खाँ समझ गया था कि शिवाजी के पीछे जाना, साक्षात मृत्यु को आमंत्रण देना है। अतः वह पूना में बैठा रहा। इस बीच उसने शिवाजी के पूना, पन्हाला, चाकन आदि कई महत्वपूर्ण दुर्गों पर अधिकार कर लिया।

मई 1661 में शाइस्ता खाँ ने कल्याण तथा भिवण्डी के किलों पर भी अधिकार कर लिया। ई.1662 में शिवाजी के राज्य की मैदानी भूमि भी मुगलों के अधिकार में चली गई किंतु अब भी बहुत बड़ी संख्या में पहाड़ी किले शिवाजी के अधिकार में थे जिन्हें शाइस्ता खाँ छीन नहीं पा रहा था।

शिवाजी की सेनाओं ने शाइस्ता खाँ को कई मोर्चों पर परास्त करके पीछे धकेला किंतु इस अभियान में शिवाजी के सैनिक भी मारे जा रहे थे। शाइस्ता खाँ जानबूझ कर अभियान को लम्बा कर रहा था ताकि उसे औरंगजेब द्वारा चलाए जा रहे कांधार अभियान में न जाना पड़े। इसलिए वह थोड़ी-बहुत कार्यवाही करके औरंगजेब को यह दिखाता रहा कि शिवाजी के विरुद्ध अभियान लगातार चल रहा है।

जनवरी 1662 में शाइस्ता खाँ ने शिवाजी के 80 गांवों में आग लगा दी। शिवाजी ने इस कार्यवाही का बदला लेने का निर्णय लिया। शाइस्ता खाँ, शिवाजी के पूना स्थित लालमहल में रह रहा था, यह भी शिवाजी के लिए असह्य बात थी। अतः शिवाजी ने शाइस्ता खाँ का नाश करने के लिए एक दुस्साहसपूर्ण योजना बनाई जो भारत के भावी इतिहास में स्वर्णिम पन्नों में अंकित होने वाली थी।

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अप्रेल 1663 के आरम्भ में शिवाजी पूना के निकट सिंहगढ़ में आकर जाकर जम गए। 5 अप्रेल 1663 को शिवाजी ने अपने 1000 चुने हुए सिपाहियों को बारातियों के रूप में सजाया तथा उन्हें लेकर रात्रि के समय सिंहगढ़ से नीचे उतर आए। दिन के उजाले में इस अनोखी बारात ने गाजे-बाजे के साथ पूना नगर में प्रवेश किया।

यह बारात संध्या होने तक शहर की गलियों में नाचती-गाती और घूमती रही। संध्या होते ही शिवाजी के 200 सैनिक बारातियों वाले कपड़े उतारकर साधारण सिपाही जैसे कपड़ों में, मुगल सैन्य शिविर की ओर बढ़ने लगे। शेष 800 सिपाही मुगल शिविर के चारों ओर फैल गए ताकि समय आने पर शिवाजी को सहायता दी जा सके।

जब मुगल शिविर में घुस रहे शिवाजी तथा उनके सैनिकों को मुगल रक्षकों द्वारा रोका गया तो शिवाजी के सैनिकों ने उनसे कहा कि वे शाइस्ता खाँ की सेना के सिपाही हैं। चूंकि मुगल सेना में हिन्दू सैनिकों की भर्ती होती रहती थी तथा शाइस्ता खाँ ने शिवाजी के विरुद्ध लड़ाई के लिए हजारों हिन्दू सैनिकों को भरती किया था, इसलिए किसी ने इन सिपाहियों पर संदेह नहीं किया। इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी लेखक भीमसेन ने लिखा है कि शिवाजी अपने 200 सैनिकों के साथ 40 मील पैदल चलकर आए तथा रात्रि के समय शिविर के निकट पहुंचे।

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शिवाजी एवं उसके सैनिक, लालमहल के पीछे की तरफ जाकर रुक गए और रात्रि होने की प्रतीक्षा करने लगे। अर्द्धरात्रि में उन्होंने महल के एक कक्ष की दीवार में छेद किया। शिवाजी इस महल के चप्पे-चप्पे से परिचित थे। जब वे इस महल में रहते थे, तब यहाँ खिड़की हुआ करती थी किंतु इस समय उस स्थान पर दीवार चिनी हुई थी। इससे शिवाजी को अनुमान हो गया कि इसी कक्ष में शाइस्ता खाँ अपने परिवार सहित मिलेगा।

शिवाजी का अनुमान ठीक निकला, शाइस्ता खाँ इसी कक्ष में था। शिवाजी तथा उनके 200 सिपाहियों ने रात्रि में एक अन्य कक्ष की खिड़की से महल में प्रवेश किया तथा ताबड़तोड़ तलवार चलाते हुए शाइस्ता खाँ के पलंग के निकट पहुंच गए। आवाज होने से शाइस्ता खाँ की आंख खुल गई।

शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर अपनी तलवार से भरपूर वार किया किंतु एक दासी ने शत्रु सैनिकों को देखकर महल की बत्ती बुझा दी ताकि शाइस्ता खाँ को बच निकलने का अवसर मिल सके।

जब शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर तलवार का वार किया ठीक उसी समय महल में अंधेरा हुआ और शाइस्ता खाँ अपने ही स्थान पर पलट गया। इस कारण शिवाजी की तलवार का वार लगभग खाली चला गया किंतु फिर भी शाइस्ता खाँ की एक अंगुली कट गई। ठीक इसी समय मुगल शिविर के बाहर खड़े शिवाजी की बारात के सिपाहियों ने जोर-जोर से बाजे बजाने आरम्भ कर दिए जिससे महल के चारों ओर पहरा दे रहे सिपाहियों को महल के भीतर चल रही गतिविधियों का पता नहीं चल सके। बाजों की आवाज के बीच मराठा सिपाहियों ने पूरे महल में मारकाट मचा दी।

शाइस्ता खाँ, अंधेरे का लाभ उठाकर भागने में सफल हो गया किंतु शिवाजी के सैनिकों ने शाइस्ता खाँ के पुत्र अबुल फतह को शाइस्ता खाँ समझकर उसका सिर काट लिया तथा इस सिर को अपने साथ लेकर भाग गए। इस कार्यवाही में शाइस्ता खाँ के 50 से 60 सिपाही घायल हुए तथा एक सेनानायक मारा गया।

धीरे-धीरे मुगल सिपाहियों को अनुमान हो गया कि भीतर क्या हो रहा है! वे महल के बाहर एकत्रित होने लगे। शिवाजी भी चौकन्ने था, उन्होंने तेज ध्वनि बजाकर संकेत किया और उनके सैनिक, शिवाजी को लेकर लालमहल तथा मुगल शिविर से बाहर निकल गए। मुगल सिपाही, आक्रमणकारियों को महल के भीतर ढूंढते रहे और शिवाजी पूना से बाहर सुरक्षित निकल गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा जसवंतसिंह का उपकार (55)

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महाराजा जसवंतसिंह का उपकार

यह महाराजा जसवंतसिंह का उपकार ही था कि छत्रपति शिवाजी रात के अंधेरे में शाइस्ता खाँ के पुत्र का सिर काट कर मुगल शिविर से सुरक्षित निकल गए।

जब वीर मराठे अपने राजा शिवाजी के नेतृत्व में औरंगजेब के ममेरे भाई अबुल फतह का कटा हुआ सिर लेकर भाग रहे थे तब मार्ग में मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह का सैन्य शिविर पड़ा। इस शिविर में राजपूतों का कड़ा पहरा था। इन पहरेदारों ने शिवाजी के सैंकड़ों सिपाहियों को अपने शिविर के सामने से भागते हुए देखा किंतु महाराजा जसवंतसिंह की तरफ से कोई हलचल नहीं की गई।

महाराजा की सेना की तरफ से ऐसा दिखाने का प्रयास किया गया कि राजपूत शिविर के सिपाहियों को शिवाजी द्वारा की गई कार्यवाही के बारे में कुछ भी पता नहीं चला किंतु मुगल अधिकारियों का यह मानना था कि औरंगजेब से नाराज जसवंतसिंह और उसके सिपाहियों ने जानबूझ कर शिवाजी को अपने शिविर के सामने से सुरक्षित निकल जाने का अवसर दिया।

उन दिनों पूरे देश में यह प्रचलित हो गया था कि शिवाजी के इस कार्य में महाराजा जसवंतसिंह की प्रेरणा काम कर रही थी क्योंकि शाइस्ता खाँ ने औरंगजेब से शिकायत करके धरमत के युद्ध के बाद महाराजा जसवंतसिंह को पदच्युत करवाया था। समकालीन लेखक भीमसेन ने लिखा है- ‘केवल ईश्वर जानता है कि सत्य क्या है!’

शिवाजी द्वारा जिस प्रकार अफजल खाँ की हत्या की गई और पूना के लाल महल में घुसकर जो ताण्डव किया गया, उससे लाल किले की नींद हराम हो गई। लाल किले के लिए शिवाजी किसी रहस्यमयी शक्ति से कम नहीं रह गए थे जो कहीं भी, कभी भी पहुंच कर कुछ भी कर सकते थे।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

औरंगजेब शाइस्ता खाँ की इस असफलता पर बहुत क्रोधित हुआ और उसे अपने डेरे-डण्डे उठाकर बंगाल जाने के निर्देश दिए। शाइस्ता खाँ भी यहाँ रुकना हितकर न समझकर, चुपचाप बंगाल के लिए रवाना हो गया। उसके लिए तो यही अच्छा था कि औरंगजेब ने उसे कंदहार के मोर्चे पर नहीं भेजा था। शाइस्ता खाँ कंदहार की सर्दी और पहाड़ की चढ़ाइयों से बहुत डरता था।

शाइस्ता खाँ के साथ-साथ महाराजा जसवंतसिंह के विरुद्ध भी कार्यवाही की जानी अपेक्षित थी किंतु उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई। औरंगजेब जानता था कि महाराजा जानबूझ कर शिवाजी के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर रहा था। इसलिए उसने महाराजा को वहीं पर नियुक्त रखा ताकि यदि जसवंतसिंह शिवाजी को नहीं मारे तो एक दिन शिवाजी ही जसवंतसिंह को मार डाले और औरंगजेब को इन दो प्रबल हिन्दू शक्तियों में से किसी एक से छुटकारा मिल सके।

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नवम्बर 1663 में महाराजा जसवंतसिंह के नेतृत्व में शिवाजी के प्रसिद्ध दुर्ग सिंहगढ़ पर आक्रमण हुआ। समकालीन लेखक भीमसेन ने लिखा है-

‘जसवंतसिंह ने कोंडाणा दुर्ग पर आक्रमण किया जिसे सिंहगढ़ भी कहते थे। मुगलों ने किले की दीवारों पर चढ़ने का प्रयास किया किंतु शिवाजी के सैनिकों ने उन्हें मार गिराया। बड़ी संख्या में मुगल और राजपूत सैनिकों की जानें गईं। बारूदी विस्फोट से भी बहुत से लोग मारे गए। किले को जीतना असंभव हो गया। असफलता से निराश होकर महाराजा जसवंतसिंह और राव भाऊसिंह हाड़ा ने 28 मई 1664 को किले पर से घेरा उठा लिया और औरंगाबाद लौट गए।’

औरंगजेब की जीवनी आलमगीरनामा में बड़े खेद के साथ महाराजा के विरुद्ध टिप्पणी की गई है-

‘एक भी किले पर कब्जा नहीं हो पाया। शिवाजी के विरुद्ध अभियान कठिनाई में पड़ गया और क्षीण हो गया।’

हिन्दू जाति पर महाराजा जसवंतसिंह का उपकार यहीं तक सीमित नहीं था, जब तक वे जीवित थे, तब तक औरंगजेब हिन्दू धर्म को मिटाने के लिए अपनी पूरी ताकत नहीं लगा सकता था। औरंगजेब का मानना था कि शिवाजी के प्रति केवल महाराजा जसवंतसिंह ही नहीं अपितु सभी हिन्दू राजा सहानुभूति दिखा रहे थे। आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह जो वर्षों से शाहजहाँ तथा औरंगजेब की सेवा करता रहा था, उसके प्रति भी औरंगजेब सशंकित था। औरंगजेब को लगता था कि मिर्जाराजा जयसिंह जानबूझ कर शिवाजी से हार जाता था।

जबकि मिर्जाराजा जयसिंह ने शिवाजी को जितनी क्षति पहुंचाई थी, उतनी क्षति शायद ही किसी अन्य मुगल सूबेदार अथवा हिन्दू राजा ने पहुंचाई थी। जयसिंह ने शिवाजी के बहुत से किले छीनकर शिवाजी को पुरंदर की संधि करने के लिए विवश कर दिया था किंतु जसवंतसिंह की बात दूसरी थी, जसवंतसिंह और औरंगजेब के बीच शुरु से ही छत्तीस का आंकड़ा था इस कारण यदि औरंगजेब जसवंतसिंह पर संदेह करता था तो इसमें कुछ भी गलत नहीं था।

शिवाजी पर किया गया महाराजा जसवंतसिंह का उपकार स्वयं महाराजा के लिए बहुत भारी पड़ा। औरंगजेब ने जसवंतसिंह के पुत्रों को छल-बल से मारा। औरंगजेब ने जसवंतसिंह को अफगानिस्तान के युद्ध में झौंक दिया तथा उसके इकलौते कुंअर पृथ्वीसिंह को दिल्ली बुला लिया।

कुछ समय बाद औरंगजेब ने कुंअर पृथ्वीसिंह को एक विषबुझी पोषाक उपहार में दी। इस पोषाक को पहनने पर 8 मई 1667 को जसवंतसिंह के कुंअर पृथ्वीसिंह की दर्दनाक मृत्यु हो गई। महाराजा जसवंतसिंह पुत्र-शोक में डूब गया। पृथ्वीसिंह के बाद राज्य का कोई उत्तराधिकारी भी नहीं था। इसलिए जसवंतसिंह के भयानक शोक का कोई पार नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजकुमारी चारुमती का विवाह (56)

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राजकुमारी चारुमती का विवाह

राजकुमारी चारुमती का विवाह सम्पूर्ण हिन्दू जाति के लिए गर्व करने योग्य एवं औरंगजेब के लिए नाक कट जाने जैसी थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1658 में शामूगढ़ के युद्ध में शाहजहाँ के बड़े शहजादे दारा शिकोह का संरक्षक एवं प्रधान सेनापति महाराजा रूपसिंह वीर गति को प्राप्त हो गया था जो कि किशनगढ़ रियासत का राजा था। उसकी मृत्यु औरंगजेब के हाथी की अम्बारी की रस्सी काटने के बाद औरंगजेब की गर्दन काटने के प्रयास में हुई थी। अतः औैरंगजेब किशनगढ़ राज्य को दण्ड देना चाहता था। ई.1660 में औरंगजेब ने किशनगढ़ की राजकुमारी से विवाह करने के लिए डोला भिजवाया।

उन दिनों मुगल बादशाह किसी भी राजकुमारी से अपना या अपने शहजादे का विवाह करने के लिए अपनी सेना के साथ डोला भिजवा देते थे। वह सेना राजकुमारी को डोले में बैठाकर लाल किले में ले आती थी जहाँ बादशाह या कोई शहजादा उससे इस्लामिक पद्धति के अनुसार विवाह कर लेता था।

अकबरनामा आदि फारसी तवारीखों में लिखा है कि हिन्दू राजा बादशाह से अर्ज किया करते थे कि मेरी लड़की खूबसूरत है, इसलिए उसे शाही जनानखाने में दाखिल होने की इज्जत बख्शी जाए किंतु यह बात सही नहीं है तथा उस समय के लेखकों द्वारा बादशाह की चाटुकारिता करने के लिए लिखी गई है।

पूरे मध्यकालीन इतिहास में आम्बेर की राजकुमारी हीराकंवर ही एकमात्र ऐसी राजकुमारी थी जिसका विवाह अकबर के साथ हीराकंवर के बाबा भगवन्तदास तथा पिता भारमल ने अपनी इच्छा से किया था ताकि उन्हें अपने ही कुल के राजकुमारों के विरुद्ध अकबर का संरक्षण मिल सके। इस विवाह के कारण एक ओर तो आम्बेर को मुगलों का संरक्षण मिल गया तथा दूसरी ओर भारत में मुगल सल्तनत की जड़ें मजबूती से जम गईं।

इसलिए अकबर से लेकर फर्रूखसियर तक जो भी बादशाह हुए उन्होंने प्रयास किए कि वे हिन्दू राजाओं पर दबाव बनाकर उनकी राजकुमारियों को अपने हरम में ले आएं। यदि एक बार किसी हिन्दू राजकुमारी का विवाह किसी मुगल शहजादे या बादशाह से हो जाता था तो वह हिन्दू राजा तथा उसकी कई पीढ़ियां अपने प्राण देकर भी उस बादशाह तथा उसके वंशजों की रक्षा किया करती थीं।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब कोई मुगल बादशाह बलपूर्वक किसी हिन्दू राजकुमारी से विवाह करना चाहता था तो हिन्दू राजा यह सोचकर अपनी पुत्री मुगलों को देते थे कि एक लड़की का बलिदान करके वे अपनी प्रजा के लाखों निरीह बेटियों को मुगलों के कोप से बचा लेंगे। फिर भी ऐसे राजाओं की कमी नहीं थी जो हिन्दू राजकुमारियों के धर्म की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया करते थे। सिवाना का राजा कल्याणसिंह जिसे इतिहास में कल्ला राठौड़ कहा जाता है, इसी प्रकार का वीर राजा था जिसने बूंदी की राजकुमारी से विवाह करके उसे अकबर के हरम में जाने से बचाया था।

अब औरंगजेब ने किशनगढ़ के स्वर्गीय महाराजा रूपसिंह की पुत्री चारुमती पर अपनी कुदृष्टि गढ़ाई। इस समय रूपसिंह का पुत्र मानसिंह किशनगढ़ का राजा था। महाराजा रूपसिंह के वीरगति को प्राप्त होने के समय मानसिंह की आयु केवल 3 वर्ष थी तथा जिस समय औरंगजेब ने मानसिंह की बड़ी बहिन चारुमती के लिए डोला भिजवाया, उस समय मानसिंह पांच वर्ष का बालक था।

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राज्य का शासन मानसिंह की दादी राजमाता कछवाहीजी और माता चौहानजी की आज्ञानुसार राठौड़ करनजी नामक एक वीर पुरुष चलाता था। औरंगजेब के काल में किशनगढ़ रियासत राजपूताने की सबसे छोटी रियासत थी। राज्य के संस्थापक महाराजा किशनसिंह की बड़ी बहिन जगत गुसाईन अकबर से ब्याही गई थी। इसलिए अकबर ने किशनसिंह को नया राज्य स्थापित करने की अनुमति दी थी किंतु यह राज्य इतना छोटा था तथा इसके संसाधन इतने सीमित थे कि इस रियासत की सेना मुगलों का सामना नहीं कर सकती थी।

इसलिए जब यह सूचना किशनगढ़ पहुंची कि औरंगजेब ने चारुमती को लाने के प्रयोजन से किशनगढ़ के लिए डोला रवाना किया है तो किशनगढ़ के राज्याधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। महाराजा रूपसिंह के बलिदान को अभी दो वर्ष ही हुए थे तथा राजकुल में कोई वयस्क व्यक्ति जीवित नहीं बचा था जो औरंगजेब से बात कर सकता! इसलिए किशनगढ़ के राज्याधिकारियों ने राजकुमारी को डोले में बैठा देने में ही अपनी भलाई समझी।

जब राजकुमारी चारुमती ने सुना कि मेरा विवाह मुसलमान बादशाह के साथ होने वाला है, तब वह अत्यंत दुःखी हुई। राजकुमारी चारुमती भी अपने पिता स्वर्गीय महाराजा रूपसिंह की तरह परम वैष्णव थी। वह श्रीकृष्ण को अपना आराध्य देव मानती थी तथा उनकी भक्ति में मीरांबाई की तरह पदों की रचना किया करती थी। राजकुमारी चारुमती ने अपनी माता तथा भाई से कहा कि यदि मेरा विवाह बादशाह के साथ करोगे तो मैं अपने प्राणों को तिलांजलि दे दूंगी किंतु राजकुमारी जानती थी कि ऐसा कह देने भर से कुछ होने वाला नहीं है। मुगलों की सेना किशनगढ़ राज्य को नष्ट कर देगी तथा राजकुमारी को बलपूर्वक डोले में बिठाकर ले जाएगी।

इसलिए चारुमती ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह की शरण लेने का निर्णय लिया और अपने विश्वस्त व्यक्ति के हाथों महाराणा के पास एक पत्र भिजवाया जिसमें राजकुमारी ने प्रार्थना की कि मैं हिन्दू राजकुमारी हूँ, भगवान श्रीकृष्ण की उपासिका हूँ, अपने धर्म की रक्षा किया चाहती हूँ। आप हिन्दू राजा हैं, हिन्दू कुमारियों के धर्म की रक्षा करना आपका कर्त्तव्य है, मैं आपको अपना पति स्वीकार करती हूँ। आप बारात लेकर आएं तथा मेरे साथ विवाह करके मेरे धर्म की रक्षा करें। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो मेरे पास देह-त्याग के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।

राजकुमारी का संदेश पाकर महाराणा राजसिंह एक छोटी सी सेना लेकर तुरंत किशनगढ़ के लिए रवाना हो गया और राजकुमारी चारुमती से विवाह करके उसे उदयपुर ले आया। महाराणा के इस साहस से किशनगढ़ राजपरिवार अत्यंत प्रसन्न हुआ और वह औरंगजेब का कोप सहन करने के लिए तैयार हो गया। राजगढ़ प्रशस्ति में इस घटना का उल्लेख इन शब्दों में किया गया है-

शते सप्तदशे पूर्णे वर्षे सप्तदशे ततः।

गत्वा कृष्णगढ़े दिव्यो महत्या सेनया युतः।।29।।

दिल्लीशार्थे रक्षिताया राजसिंह नरेश्वरः।

राठौड़ रूपसिंहस्य पुत्र्यिाः पाणिग्रहं व्यधात्।।30।।

अर्थात्- विक्रम संवत् 1717 में महाराणा राजसिंह अपनी सेना लेकर कृष्णगढ़ गए तथा दिल्ली के अधिपति से त्रस्त राजकन्या जो कि राठौड़ राजा रूपसिंह की पुत्री थी, उससे विवाह करके पुनः लौट आए।

जब यह सूचना प्रतापगढ़ रियासत के रावत हरिसिंह के हाथों बादशाह औरंगजेब के पास पहुंची तो औरंगजेब क्रोध से तिलमिला गया। उसे लगा कि ये हिन्दू राजा औरंगजेब के प्रत्येक काम को विफल कर रहे हैं। उसने महाराणा को एक कड़ा पत्र लिखकर अपनी नाराजगी व्यक्त की जिसमें कहा गया कि मेरे हुक्म के बिना किशनगढ़ जाकर तुमने शादी क्यों की?

इसके उत्तर में महाराणा ने बादशाह को लिखा कि राजपूतों का विवाह सदा से राजपूतों के साथ होता आया है और कभी इसके लिए मनाही नहीं हुई। राजकुमारी चारुमती का विवाह उन सब विवाहों से अलग कैसे है! इस पर औरंगजेब ने महाराणा से गयासपुर तथा बसाड़ के परगने छीनकर पुनः प्रतापगढ़ के रावत हरिसिंह को दे दिये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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