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शाहबेगम (40)

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शाहबेगम - bharatkaitihas.com
शाहबेगम

औरंगजेब (Aurangzeb) ने जहानआरा को फिर से शाहबेगम (Shah Begum) बना दिया! वह अपनी इस बड़ी बहिन के अहसान कभी नहीं भूल सकता था। उसी ने औरंगजेब को पाला था।

औरंगजेब ने अपनी इस पुत्री को शाहबेगम (Shah Begum) का दर्जा दिया था। यह ओहदा मुमताज महल (Mumtaz Mahal) की मृत्यु के बाद रिक्त हुआ था। शाहबेगम के ओहदे के कारण ही जहानआरा अपने भाइयों एवं बहिनों सहित पूरे मुगलिया हरम (Mughal Harem) पर शासन करती थी।

जब शाहजहाँ मर गया तो औरंगजेब (Aurangzeb) दिल्ली से आगरा आया और अपनी बहिन शाहबेगम (Shah Begum) जहानआरा से मिला। जहानआरा ने उसे वह क्षमापत्र सौंप दिया जो शाहजहाँ ने अपने अंतिम क्षणों में लिखवाया था। औरंगजेब के लिए कागज के इस टुकड़े का कोई महत्व नहीं था, फिर भी अपनी बड़ी बहिन का दिल रखने के लिए औरंगजेब ने वह क्षमापत्र स्वीकार कर लिया।

बहुत देर तक भाई-बहिन एक-साथ बैठकर पुराने दिनों को याद करते रहे। औरंगजेब ने अनुभव किया कि बहिन की आंखों में औरंगजेब के प्रति किसी बात को लेकर कोई शिकायत नहीं थी। हालांकि इस बीच जहानआरा की आंखों में पुरानी बातों को याद करके जाने कितनी बार पानी आया किंतु औरंगजेब की शैतानी आंखों की बिल्लौरी चमक एक बार के लिए भी नम नहीं हुई। औरंगजेब अपनी इस बहिन को देखकर हैरान था। जाने ऊपर वाले ने उसे किस मजबूत मिट्टी से गढ़ा था, कितनी भी बड़ी मुसीबत क्यों नहीं हो, वह कभी परेशान नहीं होती थी!

औरंगजेब (Aurangzeb) यह देखकर भी हैरान था कि शहजादी जहानआरा करोड़ों रुपयों की मालकिन होने के बावजूद पिछले नौ साल से फकीरों जैसा जीवन जी रही थी तथा उसके चेहरे पर संतोष और तृप्ति की आभा दमक रही थी। जहानआरा (Jahanara) के पास बेतहाशा सोना-चांदी और लाखों रुपए वार्षिक आय की जागीरें थीं, वह चाहती तो औरंगजेब के बादशाह बनने के बाद उससे समझौता करके आराम से अपनी जिंदगी जी सकती थी किंतु उसने अपने समस्त ऐश्वर्य को ठोकर मारकर अपने बीमार, बूढ़े एवं अपदस्थ पिता के साथ बंदी की तरह जीवन जिया था।

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पिछले नौ साल में जहानआरा (Jahanara) ने जनाना महल से बाहर झांककर भी नहीं देखा था किंतु अब शाहजहाँ कयामत तक विश्राम करने के लिए ताजमहल में जा चुका था तथा औरंगजेब चाहता था कि जहानआरा जनाना महल से निकल कर पुनः बाहर की दुनिया में लौट आए।

ऐसा चाहने के पीछे औरंगजेब (Aurangzeb) का एक निजी स्वार्थ भी था। वह अपनी दूसरे नम्बर की बहिन रौशनआरा के व्यवहार से बुरी तरह तंग आ चुका था जो विगत नौ वर्षों से शाह-बेगम के रूप में सल्तनत की अंदरूनी राजनीति संभाल रही थी। औरंगजेब रौशनआरा को शाहबेगम (Shah Begum) के ओहदे से हटाकर उसके स्थान पर फिर से बहिन जहानआरा को प्रतिष्ठित करना चाहता था किंतु जहानआरा ने फिर से मुगलिया राजनीति में लौटने से मना कर दिया।

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जहानआरा (Jahanara) ने औरंगजेब (Aurangzeb) को समझाया कि हरम की औरतें अब जहानआरा का अनुशासन स्वीकार नहीं करेंगी इसलिए जहानआरा के लिए काम करना आसान नहीं होगा। इस पर औंगजेब ने जहानआरा से कहा कि रौशनआरा अपने काम में बुरी तरह असफल रही है और रियाया के साथ-साथ हरम और बादशाह का विश्वास खो चुकी है। इसलिए जहानआरा को अपने पद पर फिर से प्रतिष्ठा प्राप्त करने में कठिनाई नहीं होगी। इस पर जहानआरा ने पुनः शाहबेगम बनना स्वीकार कर लिया। अब जहानआरा फिर से शाहबेगम (Shah Begum) कहलाने लगी। इस समय तक जहानआरा 54 साल की प्रौढ़ हो चुकी थी। पुनः शाह-बेगम बनने के बाद जहानआरा लगभग 20 साल और जीवित रही किंतु उसका अपने भाई औरंगजेब से किसी बात पर झगड़ा नहीं हुआ और वह सल्तनत में मिले अधिकारों का बड़ी शान से उपयोग करती रही। जब औरंगजेब दक्षिण के मोर्चे पर रहने लगा तो शाह-बेगम (Shah Begum) जहानआरा ने उत्तरी भारत का शासन संभाला। उसने अकाल के समय में रियाया की बड़ी मदद की तथा हज के लिए मक्का जाने वाले लोगों को सरकार की तरफ से धन देने की परम्परा आरम्भ की।

जहानआरा ने साहित्य, दर्शन एवं कला पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए वजीफे की व्यवस्था की और धार्मिक ग्रंथों पर की जाने वाली समीक्षाओं को पुस्तकों के रूप में प्रकाशित करवाया। विश्व-प्रसिद्ध लेखक रूमी की पुस्तक ‘मथनवी’ पर की गई टीका का प्रकाशन जहानआरा ने ही करवाया था जो मुगल काल की महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।

सूफियों के कादरिया सम्प्रदाय (Qadriya or Qadiriyya Sampraday) का धर्मगुरु मुल्ला शाह बदख्शी, जहानआरा के सदाचरण से इतना प्रभावित था कि वह जहानआरा को अपनी उत्तराधिकारी घोषित करना चाहता था किंतु औरंगजेब ने इसकी अनुमति नहीं दी। जहानआरा (Jahanara) ने भारत में सूफियों के चिश्तिया सम्प्रदाय के संस्थापक ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी लिखी। दिल्ली में चांदनी चौक बाजार का निर्माण जहानआरा ने ही करवाया था। जहानआरा ने दिल्ली में कारवां सराय का निर्माण करवाया जो अपने समय की सबसे प्रसिद्ध सराय थी। आगरा की जामा मस्जिद भी जहानआरा ने बनाई थी।

जब ई.1679 में औरंगजेब (Aurangzeb) ने हिन्दुओं पर जजिया लगाया तो शाहबेगम (Shah Begum) जहानआरा (Jahanara) ने औरंगजेब के निर्णय का जमकर विरोध किया किंतु औरंगजेब अपने कठमुल्लापन को कभी छोड़ नहीं पाया और जजिया लगाकर ही माना।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रौशनआरा की हत्या (41)

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रौशनआरा की हत्या

औरंगजेब (Aurangzeb) ने रौशनआरा (Roshanara Begum) को धीमा जहर देकर मरवाया! रौशनआरा की हत्या मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) का एक ऐसा काला और रहस्यमय अध्याय है जो मुगलों की राजनीतिक हवस को अच्छी तरह उजागर करता है। मुगल शहजादों को केवल राज्य चाहिए था, राज्य के मार्ग में आने वाला प्रत्येक रिश्ता उनके लिए असह्य था।

ई.1657-58 में शाहजहाँ (Shahjahan) के पुत्रों में हुए उत्तराधिकार के युद्ध में रौशनआरा ने औरंगजेब का साथ दिया था जिसके कारण औरंगजेब को इस खूनी संघर्ष में विजय प्राप्त हुई थी। औरंगजेब रौशनआरा (Roshanara) द्वारा किए गए इस उपकार को भुला नहीं सकता था। इसलिए उसने बादशाह बनते ही रौशनआरा को पांच लाख रुपए ईनाम में दिए तथा उसे शाह-बेगम (Shah Begum) बना दिया। कुछ ही समय में सल्तनत में उसका रुतबा इतना बढ़ गया था कि फ्रैंच यात्री टैवरनियर ने उसे ‘ग्राण्ड-बेगम’ कहा है।

कुछ समय पश्चात् रौशनआरा के मन में दौलत एवं सत्ता पाने की भूख बढ़ गई। इस हवस के चलते वह उन कामों में भी हस्तक्षेप करने लगी जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर थे। ई.1662 में जब औरंगजेब (Aurangzeb) गंभीर रूप से बीमार पड़ा तो रौशनआरा ने औरंगजेब की शाही मुहर हथिया ली और उसके बल पर अमीरों एवं राजपूत सरदारों को धमकाने लगी।

रौशनाआरा (Roshanara) ने औरंगजेब के बीमारी की बात छिपाने के लिए औरंगजेब के महल के बाहर अपने विश्वस्त सिपाहियों का पहरा बैठा दिया तथा किसी को भी औरंगजेब से मिलने की मनाही कर दी। यहाँ तक कि वह औरंगजेब की चारों बेगमों दिलरास बानू, नवाब बाई, औरंगाबादी महल तथा उदयपुरी महल को भी औरंगजेब के कक्ष में नहीं जाने देती थी। इस कारण औरंगजेब की बेगमें रौशनआरा के खिलाफ हो गईं।

हालांकि रौशनआरा ने औरंगजेब के बीमार होने की बात सबसे छुपाई थी किंतु औरंगजेब (Aurangzeb) के चारों शहजादों- सुल्तान मुहम्मद (Sultan Muhammad), जहांदार शाह (Jahandar Shah), आजमशाह (Azam Shah) तथा मुअज्जम शाह (Muazzam Shah) को बादशाह के बीमार होने की बात पता चल गई। जब औरंगजेब काफी बीमार हो गया तो रौशनआरा ने अपने विश्वास के मुस्लिम अमीरों तथा राजपूत सरदारों को पत्र लिखकर उन्हें शहजादे आजम के पक्ष में तैयार रहने के लिए कहा ताकि यदि औरंगजेब की मृत्यु हो जाए तो शहजादे आजम को अगला बादशाह बनाया जा सके।

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शहजादा मुअज्जम को इन पत्रों के बारे में पता चल गया। उसने इस बात की शिकायत अपनी माँ नवाब बाई से की। नवाब बाई आग बबूला हो गई। वह यह कहते हुए औरंगजेब के कमरे में घुस गई कि रौशनआरा (Roshanara) जो कुछ भी कर रही है, गलत है क्योंकि बादशाह औरंगजेब अभी जीवित है और स्वस्थ है। इस पर रौशनआरा ने नवाब बाई के बाल पकड़कर उसे औरंगजेब के कक्ष से बाहर निकाल दिया।

जब कुछ माह बाद औरंगजेब (Aurangzeb) स्वस्थ हुआ तो शहजादे मुअज्जम ने बादशाह को बताया कि रौशनआरा ने किस प्रकार शहजादे की माँ को अपमानित किया है तथा उसे बालों से पकड़कर घसीटा है। इस पर औरंगजेब रौशनआरा से नाराज हुआ तथा उसने रौशनआरा को सबके सामने फटकार लगाई। नवाब बाई बेगम के कहने से औरंगजेब ने रौशनआरा से शाही मुहर वापस ले ली। इसके बाद औरंगजेब और रौशनआरा के सम्बन्ध कभी भी सामान्य नहीं हुए किंतु कोई विकल्प नहीं होने के कारण औरंगजेब ने उसे शाही-बेगम के पद से नहीं हटाया।

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जब ई.1666 में जहानआरा (Jahanara) ने शाह-बेगम (Shah Begum) बनना स्वीकार कर लिया तो औरंगजेब ने रौशनआरा (Roshanara) को अपने दरबार से निकाल दिया। अब रौशनआरा के लिए लाल किले (Red Fort) में रहना असंभव हो गया। वह उन्हीं शाही-बेगमों के बीच उपेक्षित शहजादी की तरह कैसे रह सकती थी जिन्हें वह विगत नौ सालों से कठोर अनुशासन में रखती आई थी! रौशनआरा ने औरंगजेब से कहा कि मुझे राजधानी दिल्ली से बाहर घने जंगल के बीच एक महल बनवाने की अनुमति दी जाए। मैं अपना शेष जीवन दुनिया के जंजालों से दूर रहकर ऊपर वाले की खिदमत में गुजारना चाहती हूँ। औरंगजेब (Aurangzeb) ने रौशनआरा को उसी क्षण इसकी अनुमति दे दी क्योंकि वह स्वयं भी चाहता था कि रौशनआरा लाल किले से दूर रहे ताकि जहानआरा बिना किसी बाधा के अपना काम कर सके। वास्तव में रौशनआरा मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) के मंच पर अपनी पारी खेल चुकी थी और अब समय आ गया था कि वह मुगलिया राजनीति के मंच से अदृश्य हो जाए किंतु धन और सत्ता की भूखी रौशनआरा इस बात को समझ नहीं पाई। उसने प्रकट रूप से तो दिखावा किया कि वह सांसारिक मोह-माया से दूर जा रही है किंतु सत्ता और धन के प्रति उसकी लालसा नष्ट नहीं हुई थी।

उसने बादशाह औरंगजेब की शाही मुहर चुरा ली और चोरी-छिपे उसका दुरुपयोग करने लगी। जब कुछ ऐसे शाही फरमान औरंगजेब (Aurangzeb) के सामने आए जिन पर बादशाह की मुहर तो थी किंतु वे बादशाह ने जारी नहीं किए थे तो औरंगजेब को रौशनआरा पर संदेह हो गया। उसने रौशनआरा (Roshanara) को भला-बुरा कहा। इस पर रौशनआरा ने औरंगजेब के पुत्र शाह आजम के साथ मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध षड़यंत्र रचा ताकि औरंगजेब की जगह शाह आजम को बादशाह बनाया जा सके।

औरंगजेब (Aurangzeb) को इस षड़यंत्र का पता चल गया। अब औरंगजेब के पास रौशनआरा (Roshanara) की हत्या करना ही एकमात्र विकल्प बच गया और वह रौशनआरा से छुटकारा पाने का उपाय सोचने लगा। उसने जंगल के बीच मकान बनाकर रह रही रौशनआरा को धीमा जहर दिए जाने की व्यवस्था की ताकि शाही हरम की औरतों, दरबारी अमीरों एवं आम रियाया को इस बात की जानकारी न हो सके। कुछ तत्कालीन लेखकों ने इस तथ्य का उल्लेख किया है।

धीमे जहर के प्रभाव से रौशनआरा ई.1671 में मर गई। दिल्ली के रौशनआरा बाग में उसका मकबरा बनवाया गया जिसे अब बारादरी के नाम से जाना जाता है। इस बारादरी के बीच में मिट्टी की एक कब्र है जिसमें दफ़्न रौशनआरा की देह आज भी कयामत होने का इंतजार कर रही है ताकि खुदा उसके करमों का हिसाब करके उसके साथ न्याय कर सके। रौशनआरा की हत्या का रहस्य भी इसी कब्र में और शहजादी के कंकाल में दफ्न है।

रौशनाआरा की कब्र (Tomb of Roshanara) पर कोई छत नहीं बनाई गई है ताकि रौशनआरा की रूह को कयामत के दिन कब्र से बाहर निकलने में कोई कठिनाई न हो। इस कब्र के चारों ओर सफेद संगमरमर का एक कटहरा बनाया गया है जो इस कब्र के शाही कब्र होने की घोषणा करता है। रौशनआरा ने आगरा में एक नगर बसाया था जिसे अब रौशनआरा मौहल्ला कहा जाता है और यह जहानआरा द्वारा आगरा में बनवाई गई जामा मस्जिद के पीछे स्थित है।

जिस औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपने बाप को आजीवन कैद में रखा, जिस औरंगजेब ने आपने तीन भाइयों और दर्जनों भतीजों का खून किया, उस औरंगजेब के लिए बहिन रौशनआरा की हत्या कोई शोक की बात नहीं थी, फिर भी जब रौशनआरा (Roshanara) की मृत्यु हुई तो औरंगजेब ने उसके लिए शोक मनाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगल शहजादियों के विवाह (42)

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मुगल शहजादियों के विवाह
मुगल शहजादियों के विवाह

लाल किले (Red Fort) में मुगल शहजादियों के विवाह की शहनाइयाँ फिर से बजने लगीं! ये शहनाइयाँ औरंगजेब (Aurangzeb) के परदादा अकबर (Akbar) के समय से बंद पड़ी थीं।

औरंगजेब (Aurangzeb) के मन में अपने बड़े भाई दारा शिकोह (Dara Shikoh) के विरुद्ध अपार घृणा थी इसलिए औरंगजेब ने दारा शिकोह की नृशंस हत्या करवाई थी किंतु ऐसा लगता है कि जब दारा शिकोह मर गया तो औरंगजेब के मन में दारा के सद्गुणों के प्रति किंचित् सम्मान का भाव जागा।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) के महल में गुलाम बंदी नामक एक नर्तकी हुआ करती थी। वह भी अपने स्वामी दारा की तरह सद्गुणों की खान थी। दारा को मारने के बाद औरंगजेब ने गुलाम बंदी से विवाह कर लिया। उसे उदयपुरी बेगम कहा जाता था, शहजादे कामबख्श का जन्म उसी के पेट से हुआ था। 

औरंगजेब (Aurangzeb) ने दारा शिकोह (Dara Shikoh) सहित अपने तीनों भाइयों के बच्चों को संरक्षण देने का निश्चय किया तथा उन्हें लालन-पालन के लिए अपनी बहिनों को सौंप दिया। सबसे बड़ी बहिन जहानआरा ने दारा शिकोह एवं मुरादबक्श की पुत्रियों को संभाला तो सबसे छोटी बहिन गौहरआरा ने मरहूम भाई शाहशुजा की पुत्रियों को पाला। गौहरआरा ने दारा शिकोह की बड़ी पुत्री सलीमा बानू बेगम तथा दारा शिकोह के एकमात्र जीवित पुत्र सिपहर शिकोह का भी लालन-पालन किया।

मरहूम दारा शिकोह (Dara Shikoh) की पुत्री जहांजेब (Jahanzeb) बानो को उसकी बुआ जहानआरा (Jahanara) ने बड़े लाड़ से पाला। उसके व्यक्तित्व में जहानआरा की छाप दिखाई देती थी तथा वह पढ़ाई-लिखाई में बहुत रुचि लेती थी। जहांजेब बानो को मुगलिया इतिहास में जानी बेगम के नाम से जाना जाता है। जानी बेगम पर औरंगजेब का अगाध स्नेह था।

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औरंगजेब (Aurangzeb) ने अनुभव किया कि हरम में रह रही कुंआरी शहजादियों के मनमुटाव के कारण लाल किले का वातावरण विषाक्त रहता था। राजनीतिक षड़यंत्र रचने में ये शहजादियां शहजादों से ज्यादा रुचि दिखाती थीं। इस कारण औरंगजेब ने अपने परबाबा अकबर द्वारा बनाए गए उस नियम को को तोड़कर फिर से मुगल शहजादियों के विवाह करवाने की परम्परा आरम्भ करने का निश्चय किया।

ई.1669 में औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपने पुत्र शाह आजम (Shah Azam) का विवाह दारा शिकोह की पुत्री जहांजेब बानो अर्थात् जानी बेगम (Jani Begum) से कर दिया। औरंगजेब जानी बेगम तथा उसके बच्चों से विशेष स्नेह करता था।

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ई.1672 में गौहर आरा ने दारा शिकोह (Dara Shikoh) की दूसरी पुत्री सलीमा बानू बेगम (Saleema Banu Begum) का विवाह औरंगजेब के चौथे शहजादे मुहम्मद अकबर से करवाया। इस विवाह में गौहरआरा ने सलीमा बानू की माँ की समस्त धार्मिक एवं शाही रस्में पूरी कीं। इस प्रकार लाल किले में मुगल शहजादियों के विवाह की शहनाइयां फिर से बजने लगीं। ई.1673 में औरंगजेब ने अपनी पुत्री जुबदत-उन-निसा का विवाह दारा शिकोह के छोटे पुत्र सिपहर शिकोह से किया। औरंगजेब की छोटी बहिन गौहर आरा तथा ममेरी बहिन हीमदा बानू बेगम ने इस विवाह का पूरा प्रबंध किया। इस विवाह के लिए दिल्ली के लाल किले (Red Fort Of Delhi) के बाहर स्थित दिल्ली गेट से लेकर गौहर आरा के महल तक सड़क के दोनों ओर लकड़ी का सजावटी ढांचा बनाया गया जिस पर रौशनी एवं आतिशबाजी की गई। औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपने तीनों भाइयों और बहिन रौशनआरा को मरवाया था किंतु ऐसा नहीं था कि औरंगजेब अपने परिवार से प्रेम नहीं करता था। औरंगजेब के संरक्षण में उसकी शेष तीनों बहिनें लम्बे समय तक जीवित रहीं। रौशनआरा की मृत्यु के चार साल बाद ई.1675 में पुरहुनार बेगम की मृत्यु हुई।

पुरहुनार बेगम का जन्म शाहजहाँ की बेगम मुमताज महल (Mumtaz Mahal) के पेट से नहीं हुआ था अपितु यह औरंगजेब की सौतेली बहिन थी तथा इसका जन्म शाहजहाँ (Shahjahan) की सबसे पहली पत्नी कांधरी बेगम के पेट से हुआ था जिसका वास्तविक नाम परहेज बेगम था।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार परहेज बेगम (Parhez Begum) तथा पुरहुनार बेगम (Purhunar Begum) अलग-अलग थीं। इनमें से परहेज बेगम का जन्म कांधारी बेगम (Kandhari Begum) के पेट से तथा पुरहुनार बेगम का जन्म मुमताज महल (Mumtaz Mahal) के पेट से हुआ था।

औरंगजेब (Aurangzeb) द्वारा शाह-बेगम (Shah Begum) के पद पर पुनर्प्रतिष्ठित जहानआरा ई.1681 तक औरंगजेब की सल्तनत को संभालती रही। उसने अपने जीवन काल में कई मस्जिदें बनवाईं तथा अरबी एवं फारसी के कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।

जहानआरा ने अपने जीवनकाल में ही दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास अपना मकबरा (Tomb of Jahanara) बनवाया। ई.1681 में जब जहानआरा मर गई तो उसे इसी मकबरे में दफनाया गया। जहानआरा की इच्छा के अनुसार इस कब्र को हरी घास से ढका गया जो गरीबों को भी बिना किसी धन के नसीब होती है।

जहानआरा (Jahanara) की मृत्यु के समय उसके पास लगभग तीन करोड़ रुपए की सम्पत्ति थी जो निजामुद्दीन औलिया की दरगाह (Nizamuddin Auliya Ki Dargah) पर रहने वाले फकीरों में बांट दी गई। अंत में केवल गौहरआरा बेगम (Gouharara Begum) बची जो औरंगजेब (Aurangzeb) की मृत्यु से कुछ महीने पहले ई.1706 में मरी। जब तक वह जीवित रही, औरंगजेब उससे प्रेम करता रहा और हर किसी से कहता रहा कि अब मेरी माँ की चौदह संतानों में से केवल दो संतानें जीवित हैं, मैं और मेरी बहिन गौहर आरा!

औरंगजेब (Aurangzeb) ने मुगल शहजादियों के विवाह की परम्परा इसलिए पुनः आरम्भ करवाई थी ताकि मुगल शहजादियाँ लाल किले के भीतर होने वाले राजनीतिक षड़यंत्रों से दूर रहकर स्वतंत्र जीवन जी सकें किंतु उससे भी समस्या हल नहीं हुई। मुगल बेगमें और शहजादियां पहले की ही तरह मुगलिया राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए पहले की ही तरह षड़यंत्र करती रहीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाल किले की रंगीनियाँ (43)

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लाल किले की रंगीनियाँ

शाहजहाँ (Shahjahan) के काल में गहरी जड़ें जमा चुकीं लाल किले (Red Fort) की रंगीनियाँ औरंगजेब (Aurangzeb) को फूटी आंख नहीं सुहाती थीं। वह इन रंगीनियों को इस्लाम विरोधी समझता था। इसलिए उसने लाल किलों (Red Forts of Delhi and Agra) से रंगीनियों को मार भगाया!

भारत में मुगलों का प्रवेश क्रूर आक्रांताओं के रूप में हुआ था जो भारत से हिन्दू धर्म का नाश करके इस्लाम का प्रचार करना चाहते थे किंतु बाबर(Babur) को इस कार्य का अवसर ही नहीं मिला था और उसका पुत्र हुमायूँ (Humayun) अपने दुर्भाग्य के कारण जीवन भर लड़खड़ाता रहा और आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हुआ।

अकबर (Akbar) ने बाबर (Babur) और हुमायूँ (Humayun) के जीवन से सबक लेते हुए हिन्दू धर्म के विनाश के तरीके बदल दिए थे। उसने हिन्दुओं के लिए वैवाहिक सम्बन्धों पर आधारित ‘मधु-मण्डित नीति’ अर्थात् ‘शुगर कोटेड पॉलिसी’ तैयार की जिसे वह सुलह कुल की नीति (Sulah Kul Ki Niti) कहता था। उसने उत्तर भारत के बड़े हिन्दू राजाओं की बेटियों से ब्याह करके उनकी निष्ठाओं को सदैव के लिए प्राप्त कर लिया तथा उनके माध्यम से मुगल सल्तनत के विस्तार का काम आरम्भ किया। 

जहांगीर (Jahangir) ने भी अपने पिता अकबर (Akbar) की नीति का अनुसरण किया और हिन्दू राजाओं से दोस्ती रखने के नाम पर उन पर उनकी बहिन-बेटियों से विवाह किए और उन्हें मुगलिया सल्तनत (Mughal Sultanate) के विस्तार कार्य पर लगाए रखा। शाहजहाँ (Shahjahan) ने भी अकबर और जहांगीर की ‘मधु-मण्डित नीति’ का अनुसरण किया। शाहजहाँ का बड़ा पुत्र दारा शिकोह इस्लाम की बजाय सूफी मत का अनुयायी था किंतु जब औरंगजेब लाल किलों (Red forts) का स्वामी हुआ तो उसने मुगलों की ‘मधु-मण्डित नीति’ का त्याग कर दिया।

इस समय भारत का अंग-प्रत्यंग मुस्लिम शासन के अधीन जकड़ा हुआ था। इसलिए औरंगजेब (Aurangzeb) को लगा कि अब मुगलों के लिए ‘मधु-मण्डित नीति’ की आवश्यकता नहीं है। उसने मुगल शहजादों एवं शहजादियों के विवाह अपने ही मरहूम भाइयों की संतानों से कर दिए और उनके माध्यम से भारत से हिन्दू धर्म, सिक्ख मत, सूफी मत एवं शिया मत को नष्ट करने का काम आरम्भ कर दिया।

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औरंगजेब (Aurangzeb) की दृष्टि में नाचना, गाना, चित्रकारी करना, मूर्ति बनाना, कलात्मक भवन बनाना आदि कार्य कुफ्र के कार्य थे क्योंकि इन सब कलाओं में मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों की आकृतियों का निर्माण किया जाता था जबकि इन आकृतियों के निर्माण का कार्य केवल अल्लाह ही कर सकता था। अतः औरंगजेब ने अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ के समय से लाल किलों (Red Fort) में रह रहे गवैयों, नचकैयों, संगतराशों और रंगसाजों को मार भगाया।

बहुत से कलाकार तो स्वयं ही लाल किलों को छोड़कर जयपुर, जोधपुर, बूंदी, कोटा, किशनगढ़ एवं उदयपुर के हिन्दू राजाओं के संरक्षण में चले गए। अब लाल किलों में गूंजने वाली तानसेन की मौसीकी और अनारकली (Anaarkali) के मुजरे, गुजरे जमाने की बातें हो गए थे।

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अकबर (Akbar) से लेकर जहांगीर (Jahangir)और शाहजहाँ (Shahjahan) तीनों ही शराब पीने के शौकीन थे। इसलिए दिल्ली और आगरा के लाल किलों (Red Forts of Delhi and Agra) के आसपास तरह-तरह की शराब बनाने वालों एवं देश-विदेश से शराब मंगवाकर बेचने वालों ने डेरे जमा रखे थे। औरंगजेब (Aurangzeb) ने न केवल शराब बनाने और बेचने वालों को लाल किलों से दूर कर दिया अपितु पियक्कड़ों की जमातों को भी लाल किलों से बाहर निकाल दिया। भारत भर के राजा, अमीर, धनी व्यापारी, विभिन्न विद्याओं के पारंगत और कलाकार इन लाल किलों के चारों और मण्डराते रहते थे ताकि किसी दिन उनकी किस्मत का ताला खुले और वे भी मुगलिया सल्तनत में ऊंचा ओहदा तथा माल पाने में सफल हो सकें। इन लोगों को लुभाने के लिए दिल्ली और आगरा के लाल किलों (Red Fort) के चारों ओर रक्कासाओं, वेश्याओं और भाण्डों का मेला लगा रहता था। लाल किले की रंगीनियाँ न केवल हिंदुस्तान में अपितु पूरे मध्य एशिया एवं पश्चिम एशिया में भी विख्यात हो गईं। बहुत से सूबेदार, नवाब, राजा और राजकुमार आगरा और दिल्ली से नृत्यांगनाओं और वेश्याओं को अपने राज्य में ले जाते थे और उन्हें बड़ी शान से अपने महलों में रखते थे। औरंगजेब ने इन रक्कासाओं, वेश्याओं और भाण्डों को दिल्ली और आगरा के लाल किलों से दूर खदेड़ दिया।

अकबर (Akbar) के जमाने से मुगल बादशाह सुबह-सेवेरे उठकर अपनी प्रजा को झरोखा दर्शन दिया करते थे। जहाँगीर (Jahangir) तथा शाहजहाँ ने भी इस परम्परा को जारी रखा था किंतु औरंगजेब (Aurangzeb) ने इस प्रथा को बन्द करवा दिया क्योंकि यह प्रथा, हिन्दुओं की देव-दर्शन प्रथा से मिलती थी और इसमें से बुतपरस्ती की गंध आती थी। 

अकबर (Akbar) के समय से आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) में बादशाह की वर्षगाँठ, नौरोजा, ईद तथा होली-दीवाली के समारोह मनाए जाते थे। मुस्लिम अमीरों, सूबेदारों, हिन्दू राजाओं तथा जनसामान्य को इन समारोहों में सम्मिलित होने और बादशाह को उपहार तथा भेंट देने की अनुमति होती थी। औरंगजेब ने इस प्रथा पर भी रोक लगा दी क्योंकि यह गैर-इस्लामिक जान पड़ती थी।

अकबर (Akbar) के समय से आगरा के लाल किले में नौरोज का त्यौहार बहुत जोर-शोर से मनाया जाता था। इस त्यौहार पर जैसी धूम होती थी, वैसी धूम उस काल में दुनिया के किसी अन्य त्यौहार में नहीं होती थी। औरंगजेब (Aurangzeb) ने इसे भी इस्लाम-विरुद्ध एवं लाल किले की रंगीनियाँ मानकर इस पर रोक लगा दी।

अकबर (Akbar) ने आगरा के लाल किले में मीना बाजार (Meena Bajar) लगाने की परम्परा आरम्भ की थी जिसमें मुस्लिम बेगमों, शहजादियों, हिन्दू रानियों एवं राजकुमारियों को हीरे-मोती, झाड़-फानूस, इत्र, सुगंधित तेल, मलमल, मखमल और रेशम आदि विलासिता की वस्तुओं की दुकानें लगानी होती थीं।

बादशाह, हरम की औरतों, शाही परिवार के सदस्यों, अमीरों एवं उमरावों के साथ इस बाजार में आता था और ऊंचे दामों पर खरीददारी करता था। इस बाजार में प्रायः सुंदर औरतें भी खरीद ली जाती थीं। मुमताजमहल से शाहजहाँ की पहली मुलाकात मीना बाजार में ही हुई थी। औरंगजेब ने मीना बाजार पर भी रोक लग दी।

अकबर (Akbar) के समय से दूर देशों से आने वाले जौहरी एवं व्यापारी कीमती इत्र, सुगंध, हीरे-जवाहरात, कपड़े एवं आभूषण लाकर मुगल शहजादियों एवं बेगमों को बेचते थे। इनके हुजूम भी अब आगरा और दिल्ली के लाल किलों (Red Forts of Delhi and Agra) से दूर कर दिए गए।

इन सब कारणों से कुछ ही सालों में न केवल दिल्ली के लाल किले (Red Fort of Delhi) की अपितु आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) की रंगीनियाँ भी नष्ट हो गईं और वहाँ सरलता, सादगी और सन्नाटों का राज हो गया। अब आगरा और दिल्ली में केवल पांच वक्त की अजान की आवाजें सुनाई देती थीं, इन आवाजों के अलावा और कोई आवाज धरती से उठकर आकाश तक नहीं पहुंच सकती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगलिया भवनों की सजावट (44)

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मुगलिया भवनों की सजावट
मुगलिया भवनों की सजावट

एक समय था जब मुगलिया भवनों (Mughal Buildings) की सजावट बड़ी शानो-शौकत से की जाती थी किंतु औरंगजेब (Aurangzeb) के समय में न केवल वह परम्परा इस्लाम विरोधी घोषित हो गई अपितु भारत के लाखों सुंदर भवनों को तोड़कर नष्ट भी किया गया, विशेषकर हिन्दू भवनों को!

बाबर (Babur) के सेनापति मीर बाकी (Mir Baqi) ने हिन्दुओं के सबसे बड़े आराध्य देव श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या (Ram Janmbhumi Ayodhya) में स्थित मंदिर को तोड़कर उसके स्थान पर बाबरी मस्जिद (Babari Maszid) की स्थापना की थी ताकि भारत में बाबर की स्मृति को चिरस्थाई रखा जा सके। बाबर की सेनाओं द्वारा अयोध्या के अलावा कुछ और मंदिरों को भी तोड़कर उन पर मस्जिदें बनाई गई थीं। ये सभी मस्जिदें उन्हीं मंदिरों से प्राप्त पत्थरों से बनाई गई थीं जिन पर साधारण चूने का पलस्तर किया गया था।

हुमायूँ (Humayun) ने भारत में अपनी स्मृति को बनाए रखने के लिए दिल्ली के पुराने किले में एक शानदार पुस्तकालय का निर्माण करवाया जिसे अब शेरगढ़ (Shergarh) के नाम से जाना जाता है। इसके निकट ही उसने एक मस्जिद भी बनवाई थी जो अब भी देखी जा सकती है। हुमायूँ के काल की मस्जिदों में भी स्थानीय पत्थरों का प्रयोग हुआ था किंतु शेरगढ़ की बाहरी दीवार को लाल बलुआ पत्थर की टाइलों से सजाया गया था।

अकबर (Akbar) पहला मुगल बादशाह था जिसने आगरा के लाल किले को सजा-संवारकर नया रंग-रूप दिया। उसके बाद पहले आगरा का लाल किला (Red Fort Of Agra) और बाद में दिल्ली का लाल किला (Red Fort of Delhi) बड़ी शान के साथ पूरे भारत में विशाल भवनों के निर्माण के लिए आदेश जारी करते रहे।

अकबर ने दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा (Tomb of Humayun), अजमेर में अकबरी मस्जिद (Akbari Masjid) , फतहपुर सीकरी में शाही-महल, बुलंद दरवाजा (Buland Darwaja) तथा शेख सलीम चिश्ती की मजार (Tomb of Sheikh Salim Chishti) का निर्माण करवाया ताकि भारत में अकबर (Akbar) की कीर्ति अक्षय रह सके। अकबर के समय बने समस्त भवनों में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है जो अकबर की सामान्य आर्थिक स्थिति की कहानी कहते हैं।

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जहांगीर (Jahangir) ने भवन निर्माण की तरफ अधिक ध्यान नहीं दिया था किंतु फिर भी उसने सिकंदरा में अकबर का भव्य मकबरा बनवाया जिसमें लाल बलुआ पत्थर के साथ-साथ सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया था।

जहांगीर की चहेती बेगम नूरजहां (Noorjahan) ने आगरा में अपने पिता एतमादुद्दौला का मकबरा (Tomb of Itimad-ud-Daulah) बनवाया। यह पहला भवन था जिसमें भारत के मुगलों ने पूरी तरह सफेद संगमरमर का प्रयोग किया था। इसकी दीवारों, छतों एवं फर्श में मुगलों ने हीरा, मोती, पन्ना, याकूत, गोमेद, नीलम आदि बहुमूल्य रत्नों की जड़ाई करवाई थी। सफेद संगमरमर तथा बहुमूल्य रत्नों की भरमार से यह जाना जा सकता है कि इस समय तक भारत के मुगल कितने धनी हो गए थे और आगरा का लाल किला कितने महंगे रत्नों से भर गया था।

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मुगल सिपाही दिन-रात भारत के हिन्दू राजाओं एवं अफगान अमीरों से हीरे-मोती और सोना-चांदी छीन रहे थे और ला-ला कर आगरा के लाल किले में भर रहे थे। जहांगीर ने लाहौर में अपनी प्रेयसी अनारकली का मकबरा तथा अपनी माँ की स्मृति में बेगम-शाही-मस्जिद का निर्माण करवाया था। जहांगीर के सेनापति वजीर खाँ ने लाहौर में एक विशाल मस्जिद बनवाई जो उस काल में दुनिया की सबसे अलंकृत और सबसे बड़ी मस्जिद थी। जहांगीर ने लाहौर में स्वयं अपना मकबरा (Tomb of Jahangir) बनाने का आदेश भी आगरा के लाल किले में बैठकर दिया था। यह मुगलों का एकमात्र ऐसा महत्वपूर्ण भवन है जिस पर कोई गुम्बद नहीं है। पंजाब की नूरमहल सराय, काश्मीर का शालीमार बाग (Shalimar Garden) , अजमेर का दौलत बाग, अजमेर का चश्मा ए नूर आदि भी जहांगीर (Jahangir) के शासन काल के प्रमुख भवन हैं। शाहजहाँ (Shahjahan) ने आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) को फिर से सजाया और दिल्ली का लाल किला (Red Fort of Delhi) बनवाया। उसने आगरा और दिल्ली के लाल किलों को सफेद संगमरमर के नए भवनों से भर दिया जिनमें महंगे रत्न जड़े गए थे।

दिल्ली का चांदनी चौक, दिल्ली की जामा मस्जिद, आगरा की मोती मस्जिद, लाहौर का शीश महल, लाहौर की मोती मस्जिद, लाहौर का शालीमार उद्यान, लाहौर का नूरजहां का मकबरा (Tomb of Noorjahan) शाहजहाँ के काल में ही बनवाए गए। शाहजहाँ ने सिंध सूबे में स्थित थट्टा में दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद बनवाई। कश्मीर का निशात बाग भी शाहजहाँ के काल में बना।

शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया आगरा का ताजमहल मुगलों की सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। यह मूलतः दिल्ली के प्राचीन हिन्दू राजाओं का विशाल महल था जिसे तेजोमय महल कहा जाता था। आम्बेर के कच्छवाहों ने मुगलों से दोस्ती हो जाने के बाद इस भवन को किसी हिन्दू राजा के वंशजों से खरीदा था। जब शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज महल (Mumtaj Mahal) के लिए एक मकबरा बनवाने की योजना बनाई तो कच्छवाहों ने यह भवन शाहजहाँ को समर्पित कर दिया।

शाहजहाँ (Shahjahan) ने तेजोमयम महल के मूल तहखानों को ज्यों का त्यों रखते हुए, उसके बाहरी भाग का नए सिरे से निर्माण करवाया और उसकी दीवारों और छतों को संसार के श्रेष्ठ रत्नों से पाट दिया। आज तक धरती पर ऐसा कोई भवन नहीं बना है जिसकी दीवारों पर इतने रत्न लगे हों।

इस प्रकार मुगल सैनिक पूरे भारत को लूट कर लाल किलों को महंगे रत्नों से भर रहे थे और लाल किलों में बैठे उनके मालिक इन रत्नों को इन भवनों में लगा रहे थे। शाहजहां कालीन मुगलिया भवनों की सजावट देखते ही बनती थी।

जब मुगलों का काल चला गया तो जमना पार से आए भरतपुर के जाटों, नर्बदा पार से आए मराठों, हिन्दूकुश पर्वत को पार करके आए अफगानों और सात समंदर पार करके आए अंग्रेजों ने एक-एक करके इन हीरे-मोतियों और महंगे रत्नों को उखाड़ लिया। कहा जाता है कि ई.1857 की क्रांति के समय जब अंग्रेजों ने आगरा पर अधिकार किया, उससे लगभग सौ साल पहले ही जाटों और मराठों ने ताजमहल (Taj Mahal) से सारे रत्न निकाल लिए थे इसलिए अंग्रेज सिपाहियों को ताजमहल से केवल लैपिज और लजूली नामक कीमती पत्थर ही प्राप्त हो सके थे।

फिलहाल औरंगजेब (Aurangzeb) लाल किलों (Red Forts of Agra and Delhi) का मालिक था और उसने भवनों में रत्न जड़वाना तो दूर, भवन बनाने पर ही रोक लगा दी। इस प्रकार अब न केवल मुगलिया भवनों (Mughal Buildings) की सजावट बंद हो गई अपितु लाल किलों से भवन निर्माण के आदेश जारी होने भी बंद हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिलरास बानू का मकबरा (45)

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दिलरास बानू का मकबरा
दिलरास बानू का मकबरा

औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपनी बेगम दिलरास बानू (Dilras Banu) का मकबरा (Tomb of Dilras Banu) अत्यंत साधारण पत्थरों से बनवाया था जिसे देखकर दिलरास बानू के पुत्रों को बड़ी निराशा हुई। उन्होंने औरंगाबाद (Aurangabad) में नया मकबरा बनवाया जिसे बीबी का मकबरा (Bibi Ka Maqbra) भी कहते हैं।

दक्खिन के पठार पर एक प्राचीन कस्बा बसा हुआ था जिसे सत्रहवीं सदी तक खाड़की के नाम से जाना जाता था। जब औरंगजेब (Aurangzeb) दक्खिन का सूबेदार हुआ तो उसने इस कस्बे में अपनी प्रांतीय राजधानी की स्थापना की तथा इसका नाम बदलकर औरंगाबाद (Aurangabad) कर दिया।

ई.1657 में औरंगाबाद (Aurangabad) में औरंगजेब की पहली पत्नी रबिया-उद्-दौरानी का निधन हुआ जिसे मुगलिया इतिहास में दिलरास बानू (Dilras Banu) के नाम से जाना जाता है। औरंगजेब ने दिलरास बानो को औरंगाबाद में ही दफना दिया तथा वहीं पर एक साधारण मकबरा (Tomb of Dilras Banu) बनवा दिया। दिलरास बानू का पुत्र आजमशाह इस मकबरे से संतुष्ट नहीं हुआ।

जब ई.1658 में औरंगजेब (Aurangzeb) बादशाह बन गया तो आजमशाह ने अपने पिता से अनुरोध किया कि मेरी इच्छा है कि जिस प्रकार आपके पिता शाहजहाँ ने आपकी माता की स्मृति में ताजमजल का निर्माण करवाया था, उसी प्रकार आप भी मेरी माता की स्मृति में औरंगाबाद में एक ताजमहल बनवाएं।

औरंगजेब को शहजादे के प्रस्ताव से बड़ी हैरानी हुई। औरंगजेब का मानना था कि वह संसार से कुफ्र मिटाकर इस्लाम का प्रसार करने आया है, उसके पास इन फालतू कामों के लिए न तो वक्त है और न पैसा। उसका काम कुफ्र की निशानियों को तोड़ना है न कि ताजमहल जैसी फालतू चीजें बनाना किंतु शहजादा आजमशाह नहीं माना। उसने जिद करके अपने पिता से छः लाख रुपए प्राप्त किए और औरंगाबाद में एक नया ताजमहल बनाने में जुट गया।

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शहजादी रौशनआरा ने भी इस कार्य में शहजादे आजमशाह की सहायता की जो औरंगजेब के बाद आजमशाह को बादशाह देखना चाहती थी। पिता से पैसे मिल जाने के बाद शाहआजम ने अताउल्लाह से सम्पर्क किया। आगरा के ताजमहल का डिजाइन इसी अताउल्लाह के पिता अहमद लाहौरी ने तैयार किया था। अहमद लाहौरी तो अब मर चुका था किंतु उसका पुत्र अताउल्लाह जिंदा था।

शहजादा आजमशाह अताउल्लाह को अपने साथ औरंगाबाद (Aurangabad) ले गया। ताजमहल (Tajmahal) का निर्माण ईशा नामक मुख्य शिल्पी के मार्गदर्शन में हुआ था जो ईरान से आया था किंतु वह भी अब मर चुका था। इसलिए आजमशाह ने एक नए शिल्पी की तलाश की। उन दिनों मुगल सल्तनत में हंसपतराय नामक एक शिल्पी विशाल भवनों के निर्माण के लिए बहुत प्रसिद्धि पा गया था। इसलिए आजमशाह ने अपनी माँ का मकबरा बनाने के लिए हंसपतराय की सेवाएं प्राप्त कीं।

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इस प्रकार अताउल्लाह ने दिलरास बानू (Dilras Banu) के मकबरे का डिजाइन तैयार किया तथा हंसपतराय ने उसका निर्माण किया। ताजमहल के निर्माण में ईरान से आये शिल्पियों की एक फौज ने कई सालों तक काम किया था। जबकि आजमशाह को भारत में उपलब्ध शिल्पियों से ही संतोष करना पड़ा। आगरा के ताजमहल की पच्चीकारी का काम कन्नौज के कुशल कारीगरों को दिया गया था किंतु आजमशाह द्वारा बनाए गए मकबरे में पच्चीकारी नहीं करवाई जा सकी। ई.1653 में जब आगरा का ताजमहल बनकर तैयार हुआ तो उस पर 3 करोड़ 20 लाख रुपए व्यय हुए थे। कहा जाता है कि शाहजहाँ ने ताजमहल में इतने रत्न लगाए थे कि मुगलों का खजाना ही रीत गया था। ताजमहल पर व्यय की गई रकम की तुलना में औरंगजेब द्वारा शहजादे आजमशाह को दिए गए छः लाख रुपए बहुत ही कम थे। फिर भी आजमशाह औरंगाबाद (Aurangabad) में एक नया ताजमहल बनाने में जुट गया। आजमशाह ने भरपूर प्रयास किया कि उसके द्वारा बनवाया गया मकबरा ताजमहल जैसा ही दिखाई दे किंतु धन और संसाधनों के अभाव में यह मकबरा ताजमहल जैसा नहीं बन पाया। इसकी मीनारों में संतुलन स्थापित न हो पाने के कारण पूरे भवन का सामन्जस्य बिखर गया और ताजमहल की असफल नकल बनकर रह गया।

आजमशाह द्वारा औरंगाबाद (Aurangabad) में बनवाया गया ताजमहल बीबी का मकबरा (Bibi Ka Maqbara or Tomb of Dilras Banu) तथा दक्कन का ताज के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस भवन को दूर से देखने पर ही अनुमान हो जाता है कि इसमें ताजमहल की नकल करने का असफल प्रयास किया गया है।

ग़ुलाम मुस्तफा नामक तत्कालीन लेखक की पुस्तक ‘तारीखनामा’ के अनुसार बीबी के मकबरे (Bibi Ka Maqbara) के निर्माण पर 6,68,203 रुपये व्यय हुए । इस मक़बरे के गुम्बद पर मकराना से लाया गया संगमरमर लगाया गया है तथा शेष निर्माण पर सफेद प्लास्टर किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जीनत-उन्निसा (46)

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मोती मस्जिद

जीनत-उन्निसा (Zeenat-un-Nisa) औरंगजेब (Aurangzeb) की दूसरे नम्बर की बेटी थी। वह अपने बाबा शाहजहाँ (Shahjahan) की लाड़ली थी और अपने बाप औरंगजेब को पसंद नहीं करती थी। उसने दिल्ली की मिनी जामा-मस्जिद (Mini Zama Masjid) बनवाई!

हालांकि औरंगजेब (Aurangzeb) नए भवनों का निर्माण करने के स्थान पुराने हिन्दू भवनों को तोड़ने पर पैसा, समय और श्रम व्यय करना चाहता था ताकि औरंगजेब के जीवनकाल में ही भारत से कुफ्र को समाप्त किया जा सके फिर भी औरंगजेब की संतानें तथा औरंगजेब के सूबेदार नए भवन बनाना चाहते थे ताकि उनकी मृत्यु के बाद भी उनका नाम इस संसार में जीवित रहे।

स्वयं औरंगजेब ने भी दिल्ली के लाल किले (Red Fort of Delhi) में एक मस्जिद बनवाई, जो उसकी सादगी का परिचय देती है। इसे मोती मस्जिद (Moti Masjid) भी कहा जाता है। यह मस्जिद उच्च कोटि के संगमरमर से निर्मित की गई है। इस मस्जिद के बनाने के पीछे यह कारण बताया जाता है कि जब वह लाल किले (Red Fort) से बाहर स्थित जामा मस्जिद में नमाज पढ़ने जाया करता था तो रास्ते में उसे यमुना-स्नान के लिए जाती हुई हिन्दू प्रजा दिखाई देती थी जो न केवल ढोेल-नगाड़े बजाती थी अपितु नाचती-गाती हुई किशनजी के भजन गाया करती थी।

औरंगजेब (Aurangzeb) प्रतिदिन इस कुफ्र को नहीं देख सकता था और न वह पूरे देश से आने वाले हिन्दुओं को यमुना स्नान करने से रोक सकता था। इसलिए उसने लाल किले (Lal Qila) में ही एक मस्जिद बनवा ली।

किसनजी के भजन गाने वालों एवं नाचने-गाने वाले हिन्दुओं का डर औरंगजेब के मन में मरते समय तक बना रहा। अपने अंतिम दिनों में औरंगजेब ने लिखा कि उसे दुःख है कि वह उन काफिर हिन्दुओं का कुछ न कर सका जो नित्य ही ढोल-नगाड़े बजाते हुए और नाचते गाते हुए उसके किले के आगे से निकला करते थे!

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औरंगजेब (Aurangzeb) कुछ समय के लिए लाहौर में भी रहा। इसलिए वहाँ भी उसने एक मस्जिद बनवाई जिसे बादशाही मस्जिद (Badshahi Masjid) कहा जाता है। इस मस्जिद का मुख्य भवन एवं मीनारें लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई हैं जबकि मुख्य भवन के गुम्बद तथा मीनारों के बुर्ज सफेद संगमरमर से बनाए गए हैं। उस समय यह विश्व की सबसे बड़ी मस्जिद थी। वर्तमान में यह विश्व की सातवें नम्बर की तथा पाकिस्तान की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद है। यह मुगलों द्वारा लाल पत्थर से बनाई गई अंतिम मण्डलीय मस्जिद है। इसके बाद मुगलों ने ऐसी मस्जिद फिर कभी नहीं बनाई।

औरंजेब द्वारा लाहौर में निर्मित बादशाही मस्जिद, शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में बनाई गई जामा मस्जिद की अनुकृति है किंतु  लाहौर की मस्जिद दिल्ली की जामा मस्जिद की तुलना में बहुत बड़ी है तथा ईदागाह के रूप में भी प्रयुक्त होती है। जब सिक्खों ने मुगलों को मारना शुरु किया तब महाराजा रणजीतसिंह की सेनाओं ने इस मस्जिद को बड़ी क्षति पहुंचाई।

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जब औरंगजेब (Aurangzeb) मृत्युशैय्या पर था तब औरंगजेब की दूसरे नम्बर की पुत्री जीनत-उन्निसा (Zeenat-un-Nisa) ने ई.1707 में दिल्ली के शाहजहाँनाबाद में खैराती दरवाजे के पास जीनत-अल-मस्जिद बनवाई। उस समय यमुना नदी इस मस्जिद के पास से होकर बहती थी इस कारण इसे घाट मस्जिद भी कहा जाता था। शाहजहाँ द्वारा बनाई गई दिल्ली की जामा मस्जिद के स्थापत्य से साम्य होने से इसे दिल्ली की मिनी जामा-मस्जिद भी कहा जाता है। शहजादी जीनत-उन्निसा का मरहूम बाबा शाहजहाँ अपनी पौत्री जीनत-उन्निसा (Zeenat-un-Nisa) से बहुत प्रेम करता था। इस कारण जीनत-उन्निसा ने अपने बाबा द्वारा बनाई गई मस्जिद के नक्शे पर ही यह मस्जिद बनवाई। इस मस्जिद के पास जीनत-उन्निसा का मकबरा भी बनाया गया। जब ई.1857 में बहादुरशाह जफर ने क्रांतिकारी सैनिकों का साथ दिया तब अंग्रेजों ने लाल किले पर अधिकार करके, उसके भीतर स्थित बहुत से भवनों को नष्ट किया था। उन्होंने जीनत-उन्निसा का मकबरा (Tomb of Zeenat-un-Nisa) गिरा दिया तथा जीनत-उन्निसा द्वारा बनवाई गई मस्जिद में बेकरी स्थापित कर दी। जीनत-उन्निसा का जन्म औरंगजेब की प्रिय बेगम दिलरास बानो के पेट से हुआ था जिसका मकबरा औरंगजेब (Aurangzeb) के पुत्र आजमशाह ने औरंगाबाद में बनाया था और बीबी का मकबरा के नाम से जाना जाता है।

जिस प्रकार जीनत-उन्निसा (Zeenat-un-Nisa) द्वारा निर्मित मस्जिद को मिनी जामा मस्जिद कहा जाता है, उसी प्रकार बीबी का मकबरा को मिनी ताजमहल (Mini Taj Mahal) कहा जाता है।

औरंगजेब के तीसरे शहजादे मुहम्मद शाह को बंगाल का सूबेदार बनाया गया था। उसने ढाका में लालबाग किले का निर्माण करवाया जो अब बांग्लादेश में है। इसके निर्माण में औरंगजेब की कोई भूमिका नहीं थी।

औरंगजेब (Aurangzeb) के धाय-भाई मुजफ्फर हुसैन ने पंजाब में पिंजोर गार्डन का निर्माण करवाया जिसे नवाब फिदाई खान कोका भी कहते थे। जब फिदाई खान अपने हरम की औरतों को लेकर पिंजौर बाग में रहने के लिए आया तो उसने देखा कि बाग में काम करने वाले बहुत से लोगों के गले में गांठें उभरी हुई थीं जिन्हें गण्डमाला अर्थात् घेंघा कहा जाता था।

आसपास के गांवों की जो औरतें हरम की औरतों को फल, फूल एवं सब्जियां बेचने आती थीं, वे भी इस बीमारी से ग्रस्त थीं। इन औरतों ने फिदाई खान के हरम की औरतों को बताया कि यहाँ की हवा एवं पानी के कारण यहाँ के लोग बीमारी से ग्रस्त होकर कुरूप हो जाते हैं। अतः फिदाई खाँ कुछ ही दिनों में इस बाग को छोड़कर चला गया ताकि उसके हरम की औरतें सुंदर बनी रह सकें।

माना जाता है कि पिंजौर के स्थानीय राजा ने फिदाई खाँ तथा औरंगजेब (Aurangzeb) को इस इलाके से दूर रखने के लिए यह योजना बनाई थी कि उन्हें गण्डमाला से ग्रस्त स्त्री-पुरुष दिखाकर औरंगजेब तथा फिदाई खाँ के मन में भय उत्पन्न किया जा सके। इस कारण यह बाग कुछ ही दिनों में उजड़ गया। आगे चलकर पटियाला के राजाओं ने इस उद्यान का उद्धार किया तथा इसमें गुलाबों की खेती आरम्भ करवाई जिनसे बहुत अच्छा इत्र तैयार किया जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब की कट्टरता (47)

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औरंगजेब की कट्टरता

औरंगजेब (Aurangzeb) का इस्लाम अपने जमाने के तमाम मुसलमानों से अलग था। जो शिया मुसलमान (Shia Musalman) तबर्रा (Tabarra) बोलते थे, औरंगजेब उनकी हत्या करवा देता था। कुछ लोग उसे पीर एवं औलिया मानते थे तो कुछ लोग इसे औरंगजेब की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) कहते थे।

इस्लाम का प्रचार करने की धुन में मदमत्त हुए औरंगजेब (Aurangzeb) ने केवल इतना ही नहीं किया था कि उसने लाल किलों (red Forts) से नचैयों, गवैयों, पत्थरसाजों एवं रंगसाजों को मार भगाया था जिन्हें वह कुफ्र की निशानियां कहता था, अपितु उसने कई ऐसी बातें भी कीं जो मुसलमानों को भी बुरी लगती थीं किंतु औरंगजेब के पास अपने तर्क थे जिनकी काट बड़े से बड़े मुल्ला-मौलवी के पास नहीं थी।

मुल्ला-मौलवी चाहते थे कि बादशाह द्वारा जारी सिक्कों पर कलमा लिखा जाए क्योंकि यह परम्परा तैमूरी खानदान के बादशाहों द्वारा प्राचीन काल से चली आ रही थी किंतु औरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा लिखवाना बन्द कर दिया क्योंकि वह गैर-मुसलमानों के हाथों में जाने से अपवित्र हो जाता था।

औरंगजेब (Aurangzeb) ने भारत के प्रत्येक बड़े नगर में मुहतासिब अर्थात् आचरण-निरीक्षक निुयक्त किये। जिनका काम यह देखना था कि प्रजा, इस्लाम के अनुसार जीवन व्यतीत करती है या नहीं! अर्थात् प्रजा मद्यपान तो नहीं करती! कोई जुआ तो नहीं खेलता! लोग चरित्र-भ्रष्ट तो नहीं हो रहे! लोग नियमित रूप से दिन में पाँच बार नमाज पढ़ते हैं या नहीं और रमजान के महीने में रोजा रखते हैं या नहीं!

औरंगजेब ने इस्लाम के सिद्धान्तों का विरोध करने वालों तथा सूफी मत (Sufism) को मानने वालों को दण्डित किया। औरंगजेब ने सरमद को मरवा दिया जो सूफी मत का अनुयाई था और दारा शिकोह का पक्षधर था।

हिन्दुओं की अनेक प्रथाओं पर भी की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) का कहर टूटा। उसने हिन्दुओं की सती प्रथा पर पूरी तरह रोक लगा दी। क्योंकि इस्लाम में ऐसी किसी प्रथा का प्रावधान नहीं किया गया है। औरंगजेब ने मुसलमानों पर से सभी तरह के कर एवं चुंगी हटा दिए तथा हिन्दुओं पर लगने वाले कर एवं चुंगी दो-गुने कर दिए। जो हिन्दू इन करों से बचना चाहते थे, उन्हें इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य था। इस कारण बहुत से निर्धन हिन्दू अपनी दैन्य अवस्था से छुटकारा पाने की लालसा में मुसलमान बन गए।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

औरंगजेब स्वयं को अपनी प्रजा का सेवक कहता था और उसके जीवन को सुखी बनाने के लिये हर समय प्रयत्नशील रहता था। प्रजा का तात्पर्य मुस्लिम-प्रजा से था, हिन्दू-प्रजा से नहीं। हिन्दुओं को वह काफिर कहता था और उनके प्रति बड़ा अनुदार था। औरंगजेब की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) का हाल यह था कि उसे इस बात की परवाह नहीं थी कि कोई उसे क्या कहेगा!

औरंगजेब (Aurangzeb) अपने खर्च के लिए राजकोष से धन नहीं लेता था। वह राजकाज से अवकाश मिलने पर नियमित रूप से टोपियां सिला करता था। इन टोपियों को खरीदने के लिए मुस्लिम अमीरों की भीड़ लगी रहती थी। इसी प्रकार वह कुरान की आयतों की नकल किया करता था। ये नकलें भी मुस्लिम अमीरों एवं आम रियाया में हाथों-हाथ बिक जाती थीं। इस धन से वह अपना व्यय चलाता था।

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औरंगजेब सूफियों की तरह शिया मुसलमानों (Shia Musalman) से भी घनघोर घृणा करता था। उसने दक्षिण के शिया राज्यों को उन्मूलित करने के लिए दिन-रात एक कर दिया जिन्हें वह दारूल-हार्श अर्थात् काफिर राज्य कहता था। जो शिया मुसलमान तबर्रा बोलते थे, औरंगजेब उनकी हत्या करवा देता था। ई.1665 में औरंगजेब (Aurangzeb) ने आदेश दिया कि राजपूतों के अतिरिक्त अन्य कोई हिन्दू हाथी, घोड़े अथवा पालकी की सवारी नहीं करेगा और अस्त्र-शस्त्र धारण नहीं करेगा। हिन्दुओं को मेले लगाने तथा त्यौहार मनाने की भी स्वतंत्रता नहीं थी। ई.1668 में औरंगजेब ने आदेश निकाला कि हिन्दू अपने तीर्थ-स्थानों के निकट मेले न लगायें। होली तथा दीपावली जैसे हिन्दू-त्यौहार भी बाजार के बाहर और कुछ प्रतिबन्धों के साथ ही मनाये जा सकते थे। हिन्दू अपने मंदिरों में शंख, घड़ियाल तथा खड़ताल बजाया करते थे। जब ये ध्वनियां औरंगजेब के कानों में पड़ती थीं तो उसे मर्मान्तक पीड़ा होती थी। इसलिए औरंगजेब जिस मार्ग से गुजरता था तथा जहाँ उसका पड़ाव होता था, वहाँ दूर-दूर तक के मंदिरों में पूजा करने तथा शंख एवं घण्टे बजाने पर रोक लगा दी जाती थी और मंदिरों को तोड़ दिया जाता था। जो मंदिर समय के अभाव में तोड़े नहीं जा सकते थे, उनके शिखर को तोड़कर शेष भाग को तिरपालों से ढक दिया जाता था ताकि कुफ्र (Kufr) की ये निशानियां बादशाह की दृष्टि में न पड़ें। औरंगजेब की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) का इससे अधिक प्रमाण और क्या हो सकता था!

इस प्रकार औरंगजेब की कट्टरता (Auranzeb Ki Kattarta) ने अकबर द्वारा स्थापित सहिष्णुता तथा सुलह-कुल (Sulah Kul) की ‘मधु-मण्डित नीति’ को छोड़ दिया और हिन्दू प्रजा पर तरह-तरह के अत्याचार किये जिनके माध्यम से उसने हिन्दू धर्म, हिन्दू सभ्यता, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू जाति को समाप्त करने का प्रयास किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब का मंदिर विनाश (48)

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औरंगजेब का मंदिर विनाश
औरंगजेब का मंदिर विनाश

औरंगजेब (Aurangzeb) का मंदिर विनाश भारत के इतिहास की ऐसी क्रूर गाथा है जिसकी मिसाल दुनिया में और कहीं शायद ही देखने को मिले। उस मदांध एवं क्रूर बादशाह के आदेश से दिल्ली का लाल किला (Red Fort of Delhi) हिन्दू मंदिरों पर हथौड़े बरसाने लगा!

दिल्ली और आगरा के लाल किले (Red Fort of Delhi and Agra) जो किसी समय रक्कासाओं के घुंघुरुओं से झंकृत रहा करते थे, जहाँ तानसेन की स्वर लहरियां गूंजा करती थीं और अनारकलियों पर रौनकें रहा करती थीं, औरंगजेब का स्वामित्व पाकर समूचे हिन्दुस्तान पर आंखें तरेरने लगे और गुस्से से लाल-पीले तथा आग-बबूला होकर मंदिरों पर हथौड़े बरसाने लगे।

ये वही लाल किले (Red Fort of Delhi and Agra) थे जो अकबर, जहांगीर (Jahangir) और शाहजहाँ (Shahjahan) के समय जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर की राजकुमारियों द्वारा लाई गई कृष्ण कन्हैया की मूर्तियों को बड़ी निष्ठा के साथ पूजते रहे थे और भोर होने पर प्रभातियां गा-गा कर कृष्ण-कन्हैया को जगाते रहे थे किंतु औरंगजेब का शासन क्या आया, लाल किले प्रभातियां गाना भूल गए।

सुबह-शाम बजने वाले नगाड़े और शहनाइयां के स्वर मानो औरंगजेब (Aurangzeb) के भय से यमुनाजी के जल में समाधि ले चुके थे। अब लाल किले (Red fort of Delhi) के बाशिन्दे पांच वक्त की नमाज के अतिरिक्त और कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रखते थे।

औरंगजेब (Aurangzeb) का मानना था कि मुसलमानों के लिए यह उचित नहीं है कि उनकी दृष्टि किसी बुतखाने अर्थात् मंदिर पर पड़े। इसलिए बादशाह बनने से पहले ही औरंगजेब ने हिन्दू पूजा-स्थलों को गिरवाना तथा देव-मूर्तियों को भंग करना आरम्भ कर दिया था। जब वह गुजरात का सूबेदार था तब अहमदाबाद में चिन्तामणि का मन्दिर बनकर तैयार हुआ ही था। औरंगजेब ने उसे ध्वस्त करवाकर उसके स्थान पर मस्जिद बनवा दी।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

दिल्ली के लाल किले (Red fort of Delhi) का स्वामी बनते ही औरंगजेब ने बिहार के मुगल सूबेदार को निर्देश दिए कि कटक तथा मेदिनीपुर के बीच में जितने भी हिन्दू मन्दिर हैं, उन्हें गिरवा दिया जाए। इनमें तिलकुटी का नवनिर्मित भव्य मंदिर भी सम्मिलित था। औरंगजेब के आदेश से सोमनाथ का मन्दिर भी ध्वस्त करवा दिया गया। ई.1665 में उसने आदेश दिए कि गुजरात का जो मंदिर तोड़ा गया था, उसे हिन्दुओं ने फिर से बनवा लिया है, उसे पुनः तोड़ा जाए।

ई.1666 में औरंगजेब (Aurangzeb) ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर स्थित केशवराय मंदिर के पत्थर के उस कटरे अर्थात् रेलिंग को तुड़वाया जिसे दारा शिकोह ने बनवाया था। इस मंदिर का मूल निर्माण लगभग ई.पू.3500 में श्रीकृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाथ द्वारा करवाया गया था। चैतन्य महाप्रभु ने मथुरा में इसी मंदिर के दर्शन किए थे।

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28 अगस्त 1667 को आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) की मृत्यु हो गई। इसके 6 दिन बाद अर्थात् 3 सितम्बर 1667 को औरंगजेब ने सीदी फौलाद खाँ को निर्देश दिए के वह 100 बेलदार लगाकर 2,000 वर्ष पुराने दिल्ली के कालकाजी शक्तिपीठ तथा उसके क्षेत्र में आने वाले समस्त हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दे। यह मंदिर मिर्जाराजा जायसिंह के संरक्षण में था। 12 सितम्बर 1667 को सीदी फौलाद खाँ ने औरंगजेब को सूचना दी कि बादशाह के आदेशों की पूर्णतः पालना हो गई है। मंदिर तोड़ने के दौरान एक ब्राह्मण ने सीदी फौलाद खाँ पर तलवार से वार किए जिससे सीदी के शरीर पर तीन घाव लगे। सीदी ने उस ब्राह्मण का सिर पकड़ लिया। काली-भक्त ब्राह्मण को वहीं मार दिया गया किंतु दुष्ट सीदी बच गया। औरंगजेब (Aurangzeb) का मंदिर विनाश उसके सम्पूर्ण शासनकाल में जारी रहा। 9 अप्रेल 1669 को औरंगजेब ने दिल्ली के लाल किले (Red fort of Delhi) से फरमान जारी किया कि मुगल सल्तनत के समस्त मंदिरों एवं हिन्दू विद्यालयों को नष्ट कर दिया जाए। इस आदेश के जारी होते ही सम्पूर्ण भारत में हा-हाकार मच गया। बादशाह के आदेश से उन सैंकड़ों और हजारों साल पुराने मंदिरों को ढहाया जाने लगा जिन्होंने भारतीय संस्कृति के निर्माण की भूमिका निभाई थी।

मई 1669 में सालेह बहादुर को राजपूताना में मोरेल नदी के तट पर स्थित मलारना गांव के सैंकड़ों साल पुराने शिव मंदिर को तोड़ने भेजा गया। इस मंदिर के खण्डहर आज भी राजस्थान के सवाईमाधोपुर जिले में देखे जा सकते हैं।

इसके बाद औरंगजेब (Aurangzeb) की दृष्टि काशी विश्वनाथ के मंदिर (Kashi Vishvanath Temple) पर गई। इस मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण सहित कई प्राचीन पुराणों में मिलता है। इस पौराणिक मंदिर को ई.1194 में दुष्ट कुतुबुद्दीन एबक ने तोड़ डाला था किंतु कुछ समय बाद ही गुजरात के एक व्यापारी ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था।

बाबर (Babur) के भारत में आने से कुछ साल पहले ही सिकंदर लोदी (Sikandar Lodi) ने गुजराती व्यापारी द्वारा बनवाए गए काशी-विश्वनाथ मंदिर को तोड़ दिया था। अकबर (Akbar) के शासनकाल में आम्बेर नरेश मानसिंह (Raja Mansingh) ने इस मंदिर को फिर से बनवाने की चेष्टा की किंतु हिन्दुओं ने मानसिंह के मंदिर को स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह मुसलमान बादशाह अकबर का सम्बन्धी था।

इस पर ई.1585 में राजा टोडरमल (Raja Todarmal) ने अकबर से धन लेकर इस मंदिर का निर्माण करवाया। औरंगजेब के काल में इस मंदिर को पुनः तोड़ा गया तथा इस बार उसके स्थान पर मस्जिद बना दी गई। औरंगजेब ने काशी का नाम मुहम्मदाबाद रख दिया। जब मुगलों का राज चला गया तो मराठा रानी अहिल्याबाई होलकर ने इस मस्जिद के पास एक नया मंदिर बनवा दिया जिसे आजकल काशी विश्वनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है।

औरंगजेब (Aurangzeb) का मंदिर विनाश कभी भी रुका या थका नहीं। यही उसके जीवन का चरम लक्ष्य था। औरंगजेब अपने लक्ष्य को तो नहीं पा सका किंतु इस कार्य ने मुगल सल्तनत के विनाश के बीज बो दिए। हिन्दू मंदिरों को तोड़ते-तोड़ते दिल्ली का लाल किला (Red fort of Delhi) स्वयं भी जर्जर हो चला।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूर्तिभंजक औरंगजेब (49)

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मूर्तिभंजक औरंगजेब
मूर्तिभंजक औरंगजेब

मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) ने भारत के हजारों मंदिर तुड़वा दिए तथा देवमूर्तियां मस्जिदों तक जाने वाले रास्तों में गढ़वा दीं। उसने विश्वप्रसिद्ध उज्जैन, अयोध्या और जगन्नाथपुरी के मंदिर तोड़ दिए!

औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि हिन्दू अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार नहीं करें तथा नये मंदिर नहीं बनवायें। उसने हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवा दिया जिससे वे मुसलमानों के पैरों से कुचली तथा ठुकराई जायें और उनका घोर अपमान हो।

मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) चाहता था कि देव-मंदिरों, हिन्दू-विद्यालयों एवं धर्म-ग्रंथों को नष्ट करके, हिन्दुओं के मेलों और तीज-त्यौहारों को बंद करके, हिन्दू न्याय एवं विधि को समाप्त करके तथा तीर्थों के वास्तविक नामों को बदलकर हिन्दुओं के मन से हिन्दू धर्म के गौरव को पूर्णतः मिटा दिया जाए।

मथुरा एवं वृंदावन के मंदिरों (Temples of Mathura Vrindavan) को तोड़ने के बाद मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) ने गदा बेग को 400 सिपाहियों के साथ उज्जैन के मंदिर तोड़ने के लिए भेजा तथा मालवा के सूबेदार वजीर खाँ को भी उज्जैन पहुंचने के आदेश दिए।

जब मुस्लिम सेना उज्जैन (Ujjain) के सुप्रसिद्ध महाकाल मंदिर (Mahakal Mandir) पर हमला करने पहुंची तो उज्जैन के रावत ने मुस्लिम सेना का प्रबल विरोध किया। उसने गदा बेग तथा उसके 121 सिपाहियों का वध कर दिया। रावत की बहादुरी को आज भी मालवा के लोकगीतों में स्मरण किया जाता है।

औरंगजेब के सेनापतियों ने अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर ‘त्रेता के ठाकुर’ (Treta Ke Thakur Ka Mandir) को नष्ट कर दिया जहाँ भगवान ने अपनी लौकिक देह का त्याग किया था। अयोध्या का ‘स्वर्गद्वारम्’ (Ayodhya Ka Swarg dwaram Mandir) नामक मंदिर भी तोड़ दिया गया जहाँ भगवान की लौकिक देह का अंतिम संस्कार किया गया था।

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कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अयोध्या (Ayodhya) का ‘जन्मस्थानम्’ (Janmsthanam) नामक मंदिर भी औरंगजेब के शासकाल में तोड़ा गया था जहाँ भगवान ने लौकिक देह में अवतार लिया था। अधिकतर इतिहासकारों की मान्यता है कि जन्मस्थानम् मंदिर को बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने ई.1528 में ध्वस्त किया था।

ई.1672 में मंदिरों को तोड़ने का औरंगजेब का आदेश बंगाल प्रांत के प्रत्येक परगने में भेजा गया। ढाका जिले के धामारी गांव के यशोमाधव मंदिर (Yashomadhav Mandir) से इस आदेश की एक प्रति प्राप्त हुई है।

उन्हीं दिनों मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) ने गदा बेग को 400 सिपाहियों के साथ उज्जैन के मंदिर तोड़ने के लिए भेजा तथा मालवा के सूबेदार वजीर खाँ को भी को सूचना मिली कि काबुल क्षेत्र में घोरबंद नामक थाने पर नियुक्त राजा मांधाता, घोरबंद दुर्ग में स्थित मंदिर में फूलों से मूर्तियों की पूजा करता है तथा आरती एवं भोग लगाता है। इस पर राजा मांधाता को घोरबंद से अन्यत्र भेज दिया गया तथा मंदिर को तोड़कर वहाँ मस्जिद बनवाई गई।

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उसी वर्ष हसन अली खाँ ने मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) को सूचित किया कि उसने इस्लामाबाद (मथुरा) में एक मंदिर तोड़ा है तथा एक हिन्दू बस्ती को नष्ट करके वहाँ हसनपुर नामक गांव बसाया है। जून 1681 में शाइस्ता खाँ (Shaista Khan) को आदेश भेजकर ब्रह्मपुराण में वर्णित जगन्नाथपुरी के विश्व-प्रसिद्ध मंदिर को तुड़वाया गया। 21 सितम्बर 1681 को औरंगजेब ने बेलदारों के दारोगा जवाहर चंद को आदेश दिए कि वह बुरहानपुर (Burhanpur) जाए तथा अजमेर से बुरहानपुर तक के मार्ग में स्थित प्रत्येक मंदिर को तोड़ डाले। ई.1681 के अंतिम महीनों में दक्षिण के मोर्चे पर नियुक्त कोटा नरेश को ज्ञात हुआ कि औरंगजेब अजमेर से कोटा, बूंदी एवं माण्डू होता हुआ बुरहानपुर जाएगा। इसलिए कोटा नरेश ने अपने राज्याधिकारियों को पत्र भेजकर सूचित किया कि वे श्रीनाथजी (Sri Nathji) के सेवकों से कहें कि वे भगवान के विग्रह को लेकर बोराम्बा अथवा बिसलपुर चले जाएं तथा तब तक वहाँ रहें जब तक कि औरंगजेब वहाँ से वापस न लौट जाए। 13 नवम्बर 1681 को औरंगजेब बुरहानपुर पहुंचा तथा उसने बुरहानपुर के मंदिरों की रिपोर्ट मांगी। उसे बताया गया कि बुरहानपुर में काफी संख्या में मंदिर हैं जिनके पुजारी उन्हें बंद करके चले गए हैं।

मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) उन मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाना चाहता था किंतु बुरहानपुर के सूबेदार ने औरंगजेब को बताया कि बुरहानपुर (Burhanpur) में इतने मुसलमान नहीं हैं जो इन मंदिरों को तोड़ सकें। चूंकि औरंगजेब को अपनी सेना अपने विद्रोही पुत्र अकबर (Akbar) तथा शिवाजी के पुत्र शंभाजी के विरुद्ध भेजनी थी इसलिए उसने उन मंदिरों के दरवाजे तुड़वाकर उन्हें ईंटों से बंद करवा दिया।

ई.1682 में मूर्तिभंजक औरंगजेब (Idol-breaker Aurangzeb) के आदेशों से बनारस (Banaras) में स्थित सुप्रसिद्ध नंद-माधव अर्थात् बिंदु-माधव मंदिर को भी तोड़ डाला गया तथा उसके स्थान पर मस्जिद बनाई गई। इस विशाल मंदिर का निर्माण राजा टोडरमल (Raja Todarmal) एवं राजा मानसिंह (Raja Mansingh) द्वारा अकबर (Akbar) की अनुमति से ई.1585 में करवाया गया था।

13 सितम्बर 1682 को औरंगजेब ने शहजादे आजमशाह को आदेश दिए कि वह शंभाजी (Shambhaji) के राज्य में पेडगांव स्थित शिव मंदिर को तोड़ डाले। आजमशाह द्वारा इस मंदिर को तोड़ दिया गया तथा इस गांव का नाम बदलकर रहमतपुर कर दिया गया। 2 नवम्बर 1687 को अब्दुल खाँ को हैदराबाद के मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए गए। ई.1690 में औरंगजेब ने एलोरा, त्रयम्बकेश्वर, पंढरपुर जाजुरी तथा यवत के मंदिर तुड़वाए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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