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शहजादी सफियतुन्निसा

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शहजादी सफियतुन्निसा

वीर दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब के पौत्र बुलंद अख्तर एवं पौत्री शहजादी सफियतुन्निसा औरंगजेब को लौटा दिए। इससे औरंगजेब दुर्गादास से प्रसन्न तो हुआ किंतु औरंगजेब ने राठौड़ों को उनका राज्य लौटाने से मना कर दिया। वह राठौड़ों को बिना कोई राज्य दिए अपनी नौकरी में रखना चाहता था। यह बात राठौड़ों को पसंद नहीं आई।

पाठकों को स्मरण होगा कि औरंगजेब के चौथे पुत्र अकबर ने ई.1681 में अपने पिता से विद्रोह किया था किंतु दौराई के मैदान में असफल हो जाने के बाद वह राजपूतों के संरक्षण में मराठा शासक शंभाजी की शरण में चला आया था।

जब औरंगजेब अकबर तथा शंभाजी के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए स्वयं दक्खिन में आकर बैठ गया तो ई.1686 में अकबर भारत छोड़कर ईरान भाग गया था।

अकबर के दो पुत्र तथा दो पुत्रियां थीं। जब अकबर भारत छोड़कर ईरान भागा तो उसके चारों बच्चे भारत में ही छूट गए। इनमें से एक पुत्र नेकूसियर तथा एक पुत्री आगरा के लाल किले में निवास कर रहे औरंगजेब के हरम में थे तथा एक पुत्र बुलंद अख्तर एवं एक पुत्री शहजादी सफियतुन्निसा राजपूतों के पास थे एवं वीर दुर्गादास के संरक्षण में मारवाड़ में निवास कर रहे थे ताकि औरंगजेब उन्हें पकड़ न सके।

जब अकबर ईरान भाग गया तो औरंगजेब ने अकबर के परिवार के बारे में पता करवाया। औरंगजेब के गुप्तचरों ने औरंगजेब को जानकारी दी कि अकबर की एक बेगम अपने दो बच्चों के साथ वीर दुर्गादास के संरक्षण में जोधपुर के आसपास किसी अज्ञात स्थान पर निवास कर रही है। इस पर औरंगजेब ने जोधपुर के सूबेदार शुजात खाँ को आदेश भिजवाए कि वह किसी भी कीमत पर अकबर के परिवार को हासिल करे।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

शुजात खाँ ने मारवाड़ में बहुत से स्थानों पर छापे मारे किंतु वह अकबर के परिवार का पता नहीं लगा सका। इस पर औरंगजेब ने शुजात खाँ को लिखा कि या तो शहजादे के परिवार को ढूंढ कर लाए, या राठौड़ों से समझौता करके अकबर के परिवार को प्राप्त करे और यदि तुझसे कुछ भी न हो सके तो हाथों में चूड़ियां पहनकर मेरे समक्ष उपस्थित हो।

बादशाह की इस चिट्ठी के मिलते ही शुजात खाँ ने दुर्गादास से समझौता करने के प्रयास आरम्भ किए। उसने ईश्वरदास नागर के माध्यम से वीर दुर्गादास से इस सम्बन्ध में पत्र-व्यवहार किया। इ

स पर वीर दुर्गादास ने ईश्वरदास नागर को पत्र लिखा कि वह इस शर्त पर अकबर के परिवार को लौटा सकता है कि बादशाह औरंगजेब, अकबर की पत्नी और बच्चों को तंग न करे, राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर का राजा स्वीकार करे तथा भविष्य में कभी भी दुर्गादास का घर बर्बाद न करने का वचन दे। ईश्वरदास ने यह पत्र शुजात खाँ को भेज दिया तथा शुजात खाँ ने यह पत्र औरंगजेब को भेज दिया।

उस जमाने में औरंगजेब जैसा मक्कार भारत भर में नहीं था। वह अजीतसिंह को अजीतसिंह मानता ही नहीं था। इसलिए औरंगजेब ने दुर्गादास की दो बातें मान लीं किंतु स्वर्गीय महाराजा जसवंतसिंह के पुत्र अजीतसिंह को जोधपुर का राजा मानने से मना कर दिया।

औरंगजेब ने शुजात खाँ को लिखा कि दुर्गादास को स्वर्गीय महाराजा जसवंतसिंह के बराबर का मनसबदार बनाया जा सकता है। अर्थात् उसे पांच हजारी मनसब दिया जा सकता है। उस काल के मुगल-तंत्र में यह मनसब काफी बड़ा माना जाता था और केवल बड़े राजा-महाराजा और राजकुमारों को दिया जाता था।

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जब दुर्गादास को बताया गया कि औरंगजेब राजकुमार अजीतसिंह की बजाय दुर्गादास को पांच हजारी मनसब देने को तैयार है तो दुर्गादास ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तथा पुनः शुजात खाँ को पत्र लिखा कि स्वामी से पहले सेवक इस मनसब को स्वीकार नहीं कर सकता। इस पर औरंगजेब ने दुर्गादास को तीन हजारी और अजीतसिंह को डेढ़ हजारी जात तथा पांच सौ सवार का मनसब दिया। दुर्गादास तथा अजीतसिंह को मारवाड़ राज्य के कुछ परगनों की जागीरी भी दी गई।

हालांकि यह प्रस्ताव राजकुमार अजीतसिंह के लिए अपमानजनक था किंतु दुर्गादास तथा अजीतसिंह दोनों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया क्योंकि इस प्रस्ताव के माध्यम से औरंगजेब ने पहली बार अजीतसिंह को न केवल स्वर्गीय महाराजा जसवंतसिंह का पुत्र स्वीकार कर लिया था अपितु उसके पैतृक राज्य के कुछ हिस्से लौटाना भी स्वीकार कर लिया था। ई.1695 में औरंगजेब ने शहजादे अकबर की बेगम को शुजात खाँ के पास भेजा। शुजात खाँ ने उसे शाही सम्मान के साथ औरंगजेब के पास दक्खिन में भेज दिया।

जब दुर्गादास ने देखा कि औरंगजेब ने अकबर की बेगम के साथ अच्छा सुलूक किया है तो ई.1696 में उसने शहजादी सफियतुन्निसा को शुजात खाँ के पास भेज दिया।

जब शहजादी को औरंगजेब के समक्ष ले जाया गया तो औरंगजेब ने उसे पढ़ने के लिए कुरान दी। शहजादी सफियतुन्निसा ने उसी समय अपने बाबा औरंगजेब को कुरान पढ़कर सुनाई। यह देखकर औरंगजेब आश्चर्यचकित रह गया। उसे तो लगता था कि बचपन से ही राजपूतों के बीच में रहने के कारण इसे कुरान पढ़नी नहीं आती होगी किंतु शहजादी ने उसे बताया कि दुर्गादास ने शहजादी को कुरान पढ़ाने के लिए अलग से शिक्षक नियुक्त कर रखा था।

मारवाड़ की कुछ ख्यातों में आए उल्लेख के अनुसार राजकुमार अजीतसिंह शहजादी सफियतुन्निसा से विवाह करना चाहता था किंतु वीर दुर्गादास ने अजीतसिंह को शहजादी सफियतुन्निसा से मिलने एवं उससे विवाह करने पर रोक लगा दी। दुर्गादास ने शहजादी को कुरान पढ़ाने का प्रबंध किया ताकि अनुकूल समय आने पर उसे फिर से मुगलिया हरम में भेजा जा सके और वहाँ शहजादी को नीचा नहीं देखना पड़े।

जब औरंगजेब ने अकबर की बेगम तथा बेटी से अच्छा व्यवहार किया तो वीर दुर्गादास पूरी तरह संतुष्ट हो गया और दो वर्ष बाद अर्थात् ई.1698 में उसने अकबर के पुत्र बुलन्द अख्तर को भी औरंगजेब के पास भेज दिया।  जब शहजादे बुलंद अख्तर को उसके बाबा औरंगजेब के समक्ष प्रस्तुत किया तो शहजादे ने औरंगजेब से मारवाड़ी भाषा में बात की।

औरंगजेब तथा उसके दरबारी अमीरों को यह देखकर बहुत बड़ा धक्का लगा कि तैमूरी, चंगेजी ईरानी और तूरानी खून का वारिस मुगल शहजादा मारवाड़ी भाषा बोल रहा था, यह बात उनके लिए असहनीय थी। वे तो फारसी बोलने वाले अभिजात्य शाही लोग थे। मारवाड़ी उनके लिए जाहिलों की भाषा थी। फिर भी औरंगजेब ने अन्य शहजादों की तरह बुलंद अख्तर को भी शाही सेवा में रख लिया।

ई.1698 में दुर्गादास स्वयं भी दक्खिन में जाकर औरंगजेब से मिला। औरंगजेब ने दुर्गादास को पूरे शस्त्रों के साथ शाही दरबार में आने की अनुमति प्रदान की तथा दुर्गादास की बड़ी आवभगत की।

औरंगजेब ने दुर्गादास को राजकुमार अजीतसिंह से भी बड़ी जागीर प्रदान की तथा अनेक मूल्यवान पुरस्कार दिए। दुर्गादास ने यह सब स्वीकार कर लिया क्योंकि वह चाहता था कि किसी भी तरह औरंगजेब, मारवाड़ के वास्तविक स्वामी को उसका राज्य लौटा दे। एक सप्ताह के बाद दुर्गादास वापस मारवाड़ लौट आया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण भारत में औरंगजेब

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दक्षिण भारत में औरंगजेब

दक्षिण भारत में औरंगजेब अपने जीवन के अंतिम पच्चीस सालों में रहा। पूरे पच्चीस साल तक वह दक्षिण भारत में हाहाकार मचाता रहा!

औरंगजेब अपने बागी बेटे अकबर का पीछा करता हुआ ई.1682 में दक्खिन में आया था। अकबर तो अपने बाप के भय से भारत छोड़कर ईरान भाग गया किंतु औरंगजेब ने निश्चय किया कि वह मराठों तथा शियाओं को समाप्त करके ही अपनी राजधानी दिल्ली वापस लौटेगा। उसके लिए शिया भी उतने ही बुरे थे जितने मराठे! औरंगजेब की दृष्टि में दोनों ही कुफ्र थे और दोनों को ही मिट जाना चाहिए था।

दक्षिण भारत में औरंगजेब के पच्चीस साल उतने ही भयावह थे जितने तैमूर लंग के कुछ साल उत्तर भारत के लिए भयंकर विनाशकारी रहे थे।

औरंगजेब की दीर्घकालीन उपस्थिति के कारण दक्षिण भारत में हाहाकार मचा हुआ था फिर भी न तो शिया समाप्त होते थे और न मराठे काबू में आते थे। औरंगजेब अपने पिता शाहजहाँ के जीवन काल में ही गोलकुण्डा और बीजापुर राज्यों पर विजय प्राप्त कर चुका था परन्तु शाहजहाँ के हस्तक्षेप के कारण उन्हें मुगल सल्तनत में सम्मिलित नहीं कर सका था। अब वह अपनी इच्छा पूरी करना चाहता था।

दक्षिण भारत में औरंगजेब बीजापुर राज्य को बहुत गर्म आंखों से देखता था क्योंकि बीजापुर के शासकों की कमजोरी का लाभ उठाकर ही छत्रपति शिवाजी ने मराठों की शक्ति का विस्तार किया था। जब तक शिवाजी जीवित रहे मुगल सेनाएं बीजापुर को छू भी नहीं सकीं किंतु अब शिवाजी की मृत्यु हो चुकी थी तथा औरंगजेब पूरी तैयारी के साथ आया था।

 उसकी सेना ने बीजापुर को चारों ओर से घेरकर उसकी रसद आपूर्ति काट दी। इससे बीजापुर के सैनिक भूखों मरने लगे। अंत में बीजापुर के सुल्तान सिकन्दर को समर्पण करना पड़ा। औरंगजेब ने उसे एक लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर दौलताबाद के दुर्ग में बंद कर दिया और बीजापुर के राज्य को मुगल सल्तनत में मिला लिया।

 पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

दक्षिण भारत में औरंगजेब का दूसरा प्रमुख निशाना गोलकुण्डा राज्य था। इन दिनों गोलकुण्डा में विलासी तथा अकर्मण्य बादशाह अबुल हसन शासन कर रहा था। राज्य की वास्तविक शक्ति उसके ब्राह्मण मन्त्री मदन्ना तथा उसके भाई अदन्ना के हाथों में थी। मदन्ना ने मरहठों के साथ गठबन्धन कर लिया था। गोलकुण्डा ने मुगलों के विरुद्ध बीजापुर की भी सहायता की थी और बहुत दिनों से मुगल बादशाह को खिराज नहीं भेजा था।

यह सब औरंगजेब के लिए असह्य था। पाठकों को याद होगा कि औरंगजेब ने ई.1685 में शाहजादे मुअज्जम को गोलकुण्डा पर आक्रमण करने के लिए भेजा था किंतु मुअज्जम अपने पिता से बगावत करके गोलकुण्डा के शासक से मिल गया था। इस पर औरंगजेब ने मुअज्जम को पंजाब का सूबेदार बनाकर लाहौर भेज दिया था।

ई.1687 में दक्षिण भारत में औरंगजेब ने स्वयं गोलकुण्डा के दुर्ग पर घेरा डाला। आठ माह की लम्बी घेराबंदी के बाद गोलकुण्डा के दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया। गोलकुण्डा के शासक अबुल हसन को पकड़कर दौलताबाद के दुर्ग में भेज दिया गया और उसके राज्य को मुगल सल्तनत में मिला गया।

गोलकुण्डा तथा बीजापुर राज्यों को नष्ट करने के बाद वहाँ की सेनाओं के जो सैनिक जीवित बचे, उन्हें न तो मराठों ने और न औरंगजेब ने अपनी नौकरी में रखा। मराठों ने इसलिए नहीं रखा क्योंकि उन्हें आवश्यकता नहीं थी और मुगलों ने इसलिए नहीं रखा क्योंकि गोलकुण्डा और बीजापुर की सेनाओं के अधिकांश सैनिक शिया मुसलमान थे।

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इस कारण गोलकुण्डा और बीजापुर के सैनिक बेरोजगार होकर लूटपाट करने लगे। उन्होंने आम जनता का जीवन दूभर कर दिया। बीजापुर और गोलकुण्डा के क्षेत्र डाकुओं और लुटेरों से थर्रा उठे किंतु औरंगजेब मराठों से लड़ने में व्यस्त था। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि जनता को कौन लूट रहा है! गोलकुण्डा तथा बीजापुर के राज्य महाराष्ट्र तथा मुगल सल्तनत के मध्य में स्थित थे। इन दोनों राज्यों के समाप्त हो जाने से मरहठों तथा मुगलों की सीमाएं आ मिलीं।

लम्बे समय से महाराष्ट्र औरंगजेब के विरोधियों का शरण-स्थल बना हुआ था। विद्रोही शाहजादे अकबर को महाराष्ट्र में ही शरण मिली थी। मुअज्जम ने भी राजपूतों एवं मराठों का सहयोग पाकर बगावत की थी। औरंगजेब को आशा थी कि शिवाजी की मृत्यु के बाद मरहठे कमजोर पड़ जाएंगे किंतु शंभाजी ने मराठों के विजय अभियान को पूरे उत्साह से जारी रखा था। हम पूर्व में चर्चा कर चुके हैं कि ई.1689 में औरंगजेब ने शम्भाजी को बंदी बना लिया था और पन्द्रह दिनों की भयानक यातनाओं के बाद शम्भाजी के शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके नदी में फैंक दिए थे।

शम्भाजी की मृत्यु के बाद उनका छोटा भाई राजाराम मरहठों का राजा हुआ। औरंगजेब ने राजाराम को जि´जी के दुर्ग में घेर लिया। यह घेरा नौ वर्षों तक चलता रहा। ई.1695 में दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया परन्तु राजाराम वहाँ से भी निकल गया और सतारा पहुँचकर मरहठों को संगठित करने लगा। दुर्भाग्यवश ई.1700 में छत्रपति राजाराम का निधन हो गया।

राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी रानी ताराबाई ने मरहठों का नेतृत्व किया। उसने अपने पुत्र शिवाजी (द्वितीय) को सिंहासन पर बैठा कर मराठों का स्वतंत्रता संग्राम जारी रखा। अब मरहठों की शक्ति बहुत बढ़ गई। वे अहमदाबाद तथा मालवा पर धावा बोलने लगे। वे गुजरात में भी घुस गये और उसे भी जमकर लूटने लगे। उन्होंने बरार को भी लूटा परन्तु औरंगजेब कुछ नहीं कर सका। मरहठे औरंगजेब के जीवनकाल के अन्त तक मुगलों से युद्ध करते रहे।

दक्षिण भारत में औरंगजेब के अभियान में औरंगजेब का राज्यकोष रीत गया। इसकी पूर्ति दक्षिण के राज्यों से मिले धन से नहीं हो सकी। इस कारण मुगल सेनाओं को समय पर वेतन नहीं मिल पाता था और वे प्रायः गरीब जनता से लूट-खसोट करके अपना पेट भरते थे।

इतनी दीर्घ अवधि तक निरन्तर युद्ध चलते रहने से समचे प्रदेश की कृषि तथा व्यापार को बड़ा आघात लगा। दक्षिण की अर्थ-व्यवस्था चौपट हो गई और प्रायः अकाल पड़ने लगे जिससे प्रजा को बड़ा कष्ट भोगना पड़ा। अकाल में भूख से मरने वाली जनता एवं युद्ध में घायल होकर मरने वाले सैनिकों के शव जहाँ-तहाँ सड़ते रहते थे इस कारण इस क्षेत्र में कई प्रकार की बीमारियां एवं महामारियां फैल गईं जिनसे ग्रस्त होकर असंख्य सैनिकों, श्रमिकों तथा प्रजा के प्राण गये।

बादशाह की उत्तरी भारत से अनुपस्थिति के कारण उत्तर भारत में अराजकता तथा अनुशासनहीनता फैल गई। राजपूतों, जाटों, सिक्खों तथा बुंदेलों को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया।

उत्तर भारत की आर्थिक स्थिति पर भी दक्षिण भारत के युद्धों का बहुत बड़ा प्रभाव था। दक्षिण के मोर्चे पर भेजे जाने के लिए उत्तर भारत के किसानों से बलपूर्वक कर-वसूली की जा रही थी जिसके कारण किसान अपने खेत और गांव छोड़कर जंगलों में भाग रहे थे।

दक्षिण के युद्धों का देश के सांस्कृतिक जीवन पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा। देश की युद्धकालीन परिस्थिति के कारण साहित्य तथा कला की उन्नति नहीं हो सकी। कवियों, साहित्यकारों तथा कलाकारों को राज्य का संरक्षण नहीं मिला। देश के उत्तर तथा दक्षिण दोनांे ही भागों में सांस्कृतिक शून्यता उत्पन्न हो गई।

इस प्रकार दक्षिण भारत के पच्चीस वर्षीय युद्धों से मुगल सल्तनत की दृढ़ता, राजकोष, सैनिक शक्ति एवं गौरव पर भीषण आघात हुआ जिससे वह पतनोन्मुख हो गया। मुगल सल्तनत की कब्र दक्षिण के इन युद्धों में ही खुदकर तैयार हुई।

स्मिथ ने लिखा है- ‘दक्षिण भारत, मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा तथा उसके शरीर की समाधि सिद्ध हुआ।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगल काल में किसान

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मुगल काल में किसान

यूं तो सभी दुखी थे किंतु मुगल काल में किसान सबसे अधिक दुखी था। उसका पेट खाली था, सिर पर छान नहीं बची थी और उसके शरीर पर कपड़ों की जगह चीथड़े लटके हुए थे। किसानों का ऐसा शोषण किसी भी काल में किसी भी सत्ता द्वारा नहीं किया गया होगा! उन्हें देखकर यही कहा जा सकता था कि लाल किला भारत के लोगों का खून चूस रहा था!

प्राचीन काल से लेकर मध्य काल तक विश्व भर में शासकों की आय का मुख्य हिस्सा कृषि क्षेत्र से लगान के रूप में प्राप्त किए जाने वाले कर से आता था। मौर्य काल से लेकर गुप्त शासकों के समय में उत्तर भारत के गंगा-यमुना के मैदानों में किसानों के खेतों में इतना अनाज उत्पन्न होता था कि राजा द्वारा किसानों की उपज का केवल छठा हिस्सा अर्थात् 16 प्रतिशत भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था।

इससे मिलने वाले अनाज से राजा, सेना तथा राजपरिवार का काम बहुत अच्छी तरह चलता था। इस कारण राजा और प्रजा दोनों ही समृद्ध थे। राजा को नगद की प्राप्ति व्यापारियों द्वारा चुंगी के रूप में चुकाई जाने वाली स्वर्ण मुद्राओं से होती थी।

बारहवीं शताब्दी ईस्वी के अंत तक अर्थात् सम्राट पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु तक भारत में भू-राजस्व की यही दर प्रचलित थी। इस काल तक भी राजा और प्रजा सुखी एवं समृद्ध थे। जो किसान भू-राजस्व नहीं दे पाते थे, राजा द्वारा उनकी समस्या को सुना जाता था और उनके साथ न्याय करने एवं उनकी सहायता करने का प्रयास किया जाता था।

जब तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में मध्य एशिया से आए तुर्क शासकों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की तो उन्होंने किसानों से उपज का पचास से साठ प्रतिशत हिस्सा भू-राजस्व के रूप में तय किया जिसे वे मालगुजारी कहते थे।

किसानों के खेतों पर जाने वाले कर्मचारी एवं सिपाही बेईमान थे इस कारण वे किसानों से बड़ी क्रूरता से पेश आते थे और उनकी उनकी उपज का सत्तर से पिचहत्तर प्रतिशत तक छीन लेते थे। जो किसान कर नहीं दे पाते थे उन पर बड़े जुल्म ढाए जाते थे। उनके झौंपड़ों में आग लगा दी जाती थी और उनकी औरतों पर अत्याचार किए जाते थे।

यहाँ तक कि छोटे बच्चों को आग में फैंक दिया जाता था। इन कारणों से तुर्कों के शासन काल में भारत के किसानों की आर्थिक एवं सामाजिक दशा दयनीय होती चली गई थी।

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जब सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में मुगलों का शासन हुआ तब भारतीय किसानों के साथ सरकार की ओर से की जाने वाली क्रूरता में कमी आई। मुगलों के काल में उपज का चालीस प्रतिशत से पचास प्रतिशत हिस्सा मालगुजारी के रूप में लिया जाता था। इस कारण मुगल काल में किसान पूरी तरह दरिद्र एवं दुखी बना रहा।

अकबर के समय मुगल सल्तनत को भारत से 13 करोड़ 21 लाख रुपए मालगुजारी के रूप में मिलते थे जिसमें अफगानिस्तान से मिलने वाली मालगुजारी शामिल नहीं थी। औरंगजेब के समय में मालगुजारी से मुगल सल्तनत की आय 33 करोड़ 25 लाख रुपए होती थी। इस आय में जकात और जजिया से मिलने वाली राशि शामिल नहीं थी। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मुगल काल में किसान कितनी बुरी तरह लूटा जा रहा था!

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औरंगजेब के समय में हिन्दू किसानों से मालगुजारी के रूप में उनकी फसल का आधा हिस्सा लिया जाता था जबकि मुसलमान किसानों से फसल का चौथाई हिस्सा लिया जाता था। मुसलमानों से जकात के रूप में उनकी वार्षिक आय का ढाई रुपया सैंकड़ा वसूल किया जाता था। जबकि हिन्दुओं से ली जाने वाली जजिया की राशि प्रत्येक घर से दो रुपए से लेकर आठ रुपए प्रतिवर्ष वसूल की जाती थी। प्रत्येक तीर्थस्थान पर हिन्दुओं को अलग-अलग तीर्थकर चुकाना पड़ता था।

प्रयाग में गंगास्नान करने वालों को सवा छः रुपए चुकाने पड़ते थे। गया एवं हरिद्वार जैसे तीर्थों पर भी हिन्दुओं से बेरहमी से कर वसूला जाता था। इस प्रकार जजिया से औरंगजेब को करोड़ों रुपए सालाना की आय होती थी। यह सारी राशि शाही परिवार के सदस्यों को पेंशन के रूप में एवं सेनाओं को वेतन के रूप में दी जाती थी। इस काल में हुगली एवं मछलीपट्टनम नामक बंदरगाहों से प्राप्त होने वाले महसूल की जानकारी उपलब्ध नहीं है किंतु अकेले सूरत बंदरगाह से 12 लाख रुपए सालाना महसूल वसूला जाता था। जबकि अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, डचों एवं पुर्तगालियों आदि के जहाजों से हर साल इतना रुपया वूसला जाता था जिससे मुगलिया सल्तनत मालामाल हो गई थी।

अकबर से लेकर जहांगीर एवं शाहजहाँ के काल में सल्तनत का बहुत सा रुपया शाही परिवारों एवं सेनाओं पर खर्च किया जाता था फिर भी सल्तनत के खजाने से पूरे देश में बड़े-बड़े भवन बनाए गए थे जिनमें से अधिकतर मस्जिद एवं मकबरे थे।

औरंगजेब के समय शाही खजाने से बहुत कम मकबरे एवं मस्जिदें बनी थीं और सारा रुपया सेनाओं को वेतन चुकाने में और बेलदारों को मंदिर तोड़ने के बदले चुकाने में खर्च हो जाता था। इस पर भी औरंगजेब के पास अकूत सम्पदा एकत्रित हो गई थी।

उसके शहजादों एवं शहजादियों ने भी जनता का खून चूसकर सोने-चांदी के सिक्के एवं हीरे-मोती के गहने इकट्ठे कर लिए थे किंतु जब ई.1682 में औरंगजेब दक्खिन के मोर्चे पर चला गया तो सरकार का खर्चा बेतहाशा बढ़ गया। इस समय औरंगजेब को अफगानिस्तान, पंजाब, आगरा असम तथा महाराष्ट्र में बड़ी-बड़ी सेनाएं रखनी पड़ रही थीं तथा राजपूत युवकों के न मिलने से मुस्लिम युवकों को अधिक वेतन देकर सेनाओं में भर्ती करना पड़ रहा था।

इस काल में जनता की हालत यह थी कि एक गांव को मुगल लूट कर निकलते थे तो मराठे आ धमकते थे। मराठे निकलते थे तो डाकू आ धमकते थे, लुटी हुई जनता को कई बार लूटा जाता और जब भी फसल पक कर तैयार होती थी, लूट का सिलसिला शुरु हो जाता था।

सिपाही और लुटेरे निरीह लोगों पर तरह-तरह का अत्याचार करते। जबर्दस्ती उनके घरों में घुस जाते और उनका माल-असबाब उठा कर भाग जाते। बिना कोई धन चुकाये जानवरों को पकड़ लेते और उन्हें मार कर खा जाते। शायद ही कोई घर ऐसा रह गया था जिसमें स्त्रियों की इज्जत आबरू सुरक्षित बची थी। जनता इन जुल्मों की चक्की में पिस कर त्राहि-त्राहि कर रही थी लेकिन किसी ओर कोई सुनने वाला नहीं था।

बार-बार के सूखे और अकालों की स्थिति के कारण राजकोष जुटाना और सेना बढ़ाना संभव नहीं था। जब अकाल भयावह हो जाता था तो हजारों आदमी भूख से मर जाते थे। शहर के शहर खाली हो जाते थे। अच्छे-अच्छे घरों के लोग दूरस्थ इलाकों में भाग जाते थे जहाँ वे भीख मांगकर गुजारा करते थे।

लाख बार गिड़गिड़ाने पर भी भीख नहीं मिलती थी। रोजगार की आशा करने से अच्छा तो मौत की आशा करना था क्योंकि मौत फिर भी मिल जाती थी लेकिन रोजगार नहीं मिलता था। जब खाली हवेलियों में भूखे-नंगे लोग लूटमार के लिये घुसते तो उन्हें अनाज का दाना देखने को भी नहीं मिलता था।

संभ्रांत लोगों की यह हालत थी तो निर्धनों और नीचे तबके के लोगों की तकलीफों का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता। औरतें वेश्यावृत्ति करके पेट पालने लगीं। लाखों बच्चे भूख और बीमारी से तड़प-तड़प कर मर जाते थे। अकाल के साथ ही महामारी प्लेग का भी प्रकोप हुआ। प्लेग ने हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों को अपनी चपेट में ले लिया। शहर के शहर खाली हो गये। लोगों ने भाग कर जंगलों और पहाड़ों में शरण ली।

फिर भी असंख्य आदमी मर गये। अंत में ऐसी स्थिति आयी कि जब खाने को कहीं कुछ न रहा तो आदमी, आदमी का भक्षण करने लगा। इक्के-दुक्के आदमी को अकेला पाकर पकड़ लेने के लिये नरभक्षियों के दल संगठित हो गये। पूरे देश में हा-हा कार मचा हुआ था।

मुगलों में सबसे अच्छा शासन अकबर का माना जाता है। अकबर के काल में जनता की भयवाह स्थिति का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है-

खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि

बनिक  को  न  बनिज  न चाकर को चाकरी

जीविका  विहीन  लो  सीद्यमान   सोच  बस

कहै  एक एकन सौं,  कहाँ  जाय  का  करी।

जब अकबर के समय में देश की यह हालत थी तो औरंगजेब के समय में क्या रही होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है! भारत की जनता को इतना दुःख पहुंचा कर भी भी औरंगजेब संतुष्ट नहीं हुआ।

औरंगजेब को केवल एक ही चिंता सता रही थी कि उसके चारों ओर कुफ्र फैला हुआ था जो नष्ट होने में ही नहीं आता था! मुगल काल में किसान औरंगजेब के कुशासन और महजबी कट्टरता ने मुगल काल में किसान की हालत उसके निम्नतम स्तर पर पहुंचा दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब की मौत

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औरंगजेब की मौत
औरंगजेब की मौत

भारत माता को खून के आँसू रुलाकर, लाखों निरपराध हिन्दुओं का रक्त बहाकर, हरी-भरी धरती को उजाड़कर अंततः एक दिन औरंगजेब मर गया। क्रूरऔरंगजेब की मौत पर रोने वाला कोई नहीं था!

दिन आते थे और जाते थे। बदलते हुए मौसमों के साथ केवल पेड़ों के पत्ते ही नहीं बदलते थे अपितु पशु, पक्षियों, वनस्पतियों एवं मनुष्यों की पीढ़ियां भी बदलती जा रही थीं और इनके बदलने के साथ दुनिया भी अपनी गति से नित नया रूप धारण करती जा रही थी किंतु दुनिया में कुछ चीजें थीं जो न बदलने के लिए अभिशप्त थीं। उन्हीं में से एक था- औरंगजेब।

औरंगजेब का जन्म ई.1618 में हुआ था और अब वह जीवन के उननब्बेवां पतझड़ देख रहा था। यदि कोई और होता तो वह जीवन के उननब्बे बसंत देखता किंतु औरंगजेब तो पतझड़ों की सृष्टि करने के लिए धरती पर भेजा गया था।

अब औरंगजेब की कमर नब्बे डिग्री के कोण पर झुक गई थी फिर भी वह शांति से खाट में नहीं बैठता था। अब वह हाथी-घोड़ों पर सवार नहीं हो सकता था, इसलिए खुली पालकी में बैठकर चलता था।

रात के समय जब उसकी सेना सो जाती तब भी वह लाठी पकड़कर सैनिक शिविर के बीच घूमता रहता था। इस उम्र में भी वह युद्ध के मैदान में पालकी में सवार होकर जाता था। एक समय में आठ से बारह आदमी उसकी पालकी को लेकर दौड़ते थे। उन निहत्थे लोगों के प्राण भी हर समय सांसत में पड़े रहते थे।

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इस आयु में भी औरंगजेब के मन में अपने शत्रुओं से लड़ने का हौंसला इतना अधिक था कि उसकी मिसाल पूरे मानव इतिहास में नहीं मिल सकती! ई.1687 में जब गोलकुण्डा के घेरे के दौरान औरंगजेब अपनी पालकी पर बैठकर अपने सैनिकों को प्रोत्साहित एवं निर्देशित कर रहा था तब गोलकुण्डा के किले की तरफ से आने वाले तोपों के गोले औरंगजेब की पालकी के आसपास ही आकर गिरने लगे थे।

तब भी औरंगजेब पूरी मुस्तैदी से अपनी पालकी में बैठा हुआ, युद्ध के मैदान में चक्कर लगाता रहा। वह यह सहन कर सकता था कि उसे मृत्यु आ जाए किंतु यह सहन नहीं कर सकता कि उसके जीते जी भारत में एक भी शिया राज्य नष्ट होने से बच जाए!

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आयु बढ़ने के साथ औरंगजेब का क्षीणकाय शरीर और भी क्षीण हो गया था। उसके दांत गिर जाने से गालों में गड्ढे पड़ गए थे तथा आंखें भीतर की ओर धंस गई थीं तथा उनके भीतर घूमती हुई पुतलियां दहकते हुए अंगारों की तरह दिखाई देती थीं। उसके पोपले मुंह पर लम्बी सफेद दाढ़ी लटकती थी। इन कारणों से उसका चेहरा बहुत भयावह दिखने लगा था। यदि कोई व्यक्ति जिसने औरंगजेब को पहले कभी नहीं देखा हो तो उसे अकेले में देखकर प्रेत समझने की गलती कर सकता था।

कृशकाय, जर्जर एवं अतिवृद्ध हो जाने पर भी औरंगजेब के मन से हिन्दू धर्म को नष्ट करके इस्लाम का प्रचार करने का उत्साह कम नहीं हुआ था। इसलिए बहुत से कट्टरपंथी चाटुकारों ने उसके बारे में उड़ा दिया कि वह बादशाह नहीं है, अपितु जिंदा पीर है। उस काल में सुन्नियों के साथ-साथ शिया, खोजा एवं बोहरा मुसलमान भी भारत में रहते थे किंतु वह केवल सुन्नियों को ही मुसलमान मानता था। औरंगजेब ने अपने भाइयों को तो खुद ही मरवा दिया था किंतु उसके जीवन काल में उसकी समस्त बहिनें, बेटियां और बेगमें भी मर चुकी थीं।

ई.1657 में उसकी मुख्य बेगम दिलरास बानू का निधन हुआ। ई.1676 में औरंगजेब के बड़े पुत्र सुल्तान मुहम्मद की दिल्ली की जेल में मृत्यु हो गई। 6 सितम्बर 1681 को औरंगजेब की सबसे बड़ी बहिन जहानआरा की मृत्यु हो गई। ईस्वी 1688 में औरंगजेब की बेगम औरंगाबादी महल की और ईस्वी 1691 में बेगम नवाब बाई की मृत्यु हो गई।

ई.1702 में औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा की दिल्ली की जेल में मृत्यु हो गई। ईस्वी 1705 में औरंगजेब की पुत्र-वधू जहाँजेब की मृत्यु हो गई। ईस्वी 1706 में औरंगजेब की अकेली जीवित बहन गौहरआरा की मृत्यु हो गई। उसी वर्ष उसकी पुत्री मेहरुन्निसा और उसके पति इजिदबक्स की भी मृत्यु हो गई।

मेहरुन्निसा की मृत्यु के एक माह बाद औरंगजेब के पौत्र बुलन्द बख्तर की मृत्यु हो गई। ई.1706 में ईरान में रह रहे शहजादे अकबर की मृत्यु हो गई। ईस्वी 1707 के आरंभ में औरंगजेब की मौत से कुछ दिन पहले औरंगजेब के दो नातियों की मृत्यु हो गई। इस प्रकार औरंगजेब की मौत से पहले उसका लगभग पूरा परिवार मर गया। केवल तीन शहजादे आजम, मुअज्जम और कामबक्श, एक पत्नी उदयपुरी बेगम तथा एक पुत्री जीनत उन्निसा ही जीवित बचे थे।

फिर भी औरंगजेब के मन में अपने शत्रुओं को नष्ट करने, सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन करने तथा भारत से हिन्दुओं के मंदिर तथा तीर्थों, सिक्खों के गुरुद्वारों, सूफियों की दरगाहों और शियाओं के धार्मिक स्थलों को नष्ट करके कुफ्र समाप्त करने का उत्साह कम नहीं हुआ था।

ईस्वी 1705 में जब औरंगजेब 87 वर्ष का था, उसने मुहम्मद खलील और बेलदारों के दारोगा खिदमत राय को पंढरपुर भेजकर बिठोबा का प्रसिद्ध मंदिर तुड़वाया तथा कसाइयों को मंदिर में बुलाकर वहाँ गाएं कटवाईं।

इस आयु तक पहुंचते-पहुंचते औरंगजेब भारत वर्ष की संस्कृति का बहुत नुक्सान कर चुका था। इस कारण सिक्ख, जाट, मराठे, सतनामी एवं राजपूत पूरे देश में उसके दुश्मन हुए फिरते थे। अफगानी और शिया मुसलमान भी औरंगजेब का रक्त बहाने को आतुर थे।

औरंगजेब भी अपनु शत्रुओं के प्राण लेने के लिए हर समय उत्सुक एवं तत्पर रहता था। एक पल के लिए वह चैन से नहीं बैठ सकता था। भारत भर के बड़े हिन्दू राजाओं को मरवाकर, हजारों मंदिरों को तुड़वाकर तथा तथा शिया सुल्तानों को कैद करके भी उसे शांति नहीं मिली थी।

औरंगजेब के बेटे औरंगजेब की मौत की प्रतीक्षा करते-करते स्वयं बूढ़े-बूढ़े हो-होकर मरने लगे थे किंतु औरंगजेब पूरी तरह स्वस्थ था और युद्ध के मैदानों में डटा हुआ था।

अंततः जनवरी 1707 में औरंगजेब बीमार पड़ा। इस स्थिति में वह मराठों से लड़ाई जारी नहीं रख सकता था। इसलिए उसने फिर से दिल्ली लौट जाने का निर्णय लिया तथा अहमदनगर के लिये प्रस्थान किया।

जब मराठों को ज्ञात हुआ कि औरंगजेब बीमार है तथा दिल्ली जा रहा है तो मराठे उसके पीछे लग गये और उसके डेरों को लूटने लगे। 31 जनवरी 1707 को औरंगजेब अहमदनगर पहुँच गया। मराठों ने अहमदनगर को चारों ओर से घेर लिया। चार माह की भयानक लड़ाई के बाद मराठों को अहमदनगर से दूर खदेड़ा जा सका।

औरंगजेब जीवित ही दिल्ली पहुंचना चाहता था किंतु मराठों के कारण उसके लिए दिल्ली बहुत दूर हो चुकी थी। 3 मार्च 1707 को अहमदनगर में ही औरंगजेब का निधन हो गया। औरंगजेब की इच्छानुसार उसके शरीर को औरंगाबाद से 24 किलोमीटर दूर खुल्दाबाद नामक गांव में ले जाया गया जहाँ उसे शेख जेनुद्दीन की मजार के निकट दफना दिया गया। इस प्रकार मराठों ने औरंगजेब को जीवित या मृत, महाराष्ट्र से बाहर नहीं जाने दिया।

जिस समय औरंगजेब की मृत्यु हुई, भारत बड़ी विपन्न अवस्था में था। मराठे मालवा, खानदेश तथा गुजरात को लूट रहे थे। शहजादा आजम मालवा में सिन्धिया से संघर्ष कर रहा था। शहजादे कामबख्श को मराठों ने बीजापुर में घेर रखा था। दुर्गादास और अजीतसिंह मारवाड़ में गदर मचाए हुए थे। जैसे ही राठौड़ों को ज्ञात हुआ कि औरंगजेब मर गया तो 12 मार्च 1707 को महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर पर आक्रमण किया तथा अपने पूर्वजों की राजधानी पर अधिकार कर लिया।

औरंगजेब की मौत से पहले जाट, सिक्ख, सतनामी, बुंदेले तथा रुहेले भी मुगलों के राज्य को बर्बाद करने पर तुल गए। ऐसी विकट परिस्थितियों में औरंगजेब के तीनों शहजादे आजम, मुअज्जम तथा कामबख्श, एकजुट होकर शत्रुओं का सामना करने के स्थान पर मुगलिया सल्तनत पर अधिकार करने के लिये एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे।

लगभग पचास वर्षों के दीर्घ शासन में औरंगजेब ने देश को शमशान भूमि में नहीं तो बंदीगृह में अवश्य बदल दिया था। ऐसे आदमी के मरने पर किसी को दुःख नहीं हुआ। उसके बेटों-पोतों तक को उससे कोई लगाव नहीं था। उसकी मृत्यु पर कोई रोने वाला नहीं था। हालांकि शहजादे आजमशाह तथा शहजादी जीनतउन्निसा ने अपने जीवन में एक-एक बार उसकी कब्र पर अपनी उपस्थिति दी थी।

मुगलिया तवारीखों के अनुसार औरंगजेब ने अपनी कब्र बनाने के लिए टोपियां सिलकर कुछ रुपए एकत्र किए थे। इन्हीं रुपयों से खुल्दाबाद गांव में तीन गज लम्बी एक बहुत साधारण कब्र बनाई गई जिस पर उस समय 14 रुपए 12 आने खर्च हुए थे।

कब्र का ऊपरी हिस्सा मिट्टी से ढका गया था जिसके  ऊपर घास लगाई गई थी। जब भारत पर अंग्रेजों का शासन हुआ तो ई.1900 के आसपास भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन ने इस कब्र के चारों ओर संगमरमर का कटहरा बनवाया।

औरंगजेब की कब्र के आसपास ही अहमदनगर के उन शिया शासकों की कब्रें भी स्थित हैं जिन्हें मारकर मुगलों ने उनका राज्य छीन लिया था।

जो लोग कभी जीते जी शांतिपूर्वक एक दूसरे के साथ बैठ नहीं सके थे, अब उनके शव पिछले तीन सौ सालों से एक दूसरे की बगल में शांति से सोए पड़े हैं और उनकी रूहें कयामत होने का इंतजार कर रही हैं ताकि आसमान में रहने वाली अदृश्य सत्ता द्वारा उनके करमों का हिसाब किया जा सके!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चगताई शहजादों का रक्त

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चगताई शहजादों का रक्त

चगताई शहजादों का रक्त बहाने का अभ्यस्त था बाबर का वंश! चगताई शहजादे चंगेज खाँ के दूसरे बेटे चगताई खाँ के वंशज थे। भारत के मुगल स्वयं को इसी चगताई खाँ का वंशज मानते थे।

बाबर की नसों में चगताई खाँ के साथ-साथ तैमूर लंग का भी रक्त मिश्रित था। इसलिए उसके वंशज स्वयं को मुगल, बाबरी, चंगेजी, चगताई, तैमूरी एवं कजलबाश कहते थे। इस प्रकार चगताई शहजादों का रक्त मध्य एशियाई लड़ाकों के रक्त का मिश्रण बन गया था।

बाबर के वंशज चगताई शहजादों का रक्त बहाने के अभ्यस्त थे। ईस्वी 1530 में बाबर की मृत्यु से लकर ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु तक इस वंश के जितने शहजादों का खून स्वयं इस परिवार के सदस्यों ने बहाया, उतना खून उनके शत्रुओं ने भी नहीं बहाया था।

औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही भारत में मुगल शहजादों के रक्तपात का एक युग समाप्त हो जाता है तथा दूसरा युग आरम्भ होता है। औरंगजेब की मृत्यु के समय उसके तीन शहजादे आजम, मुअज्जम तथा कामबख्श जीवित थे जो दिल्ली एवं आगरा के लाल किलों, तख्ते ताउस तथा कोहिनूर हीरे पर अधिकार करने के लिए एक दूसरे पर टूट पड़े। इस खूनी खेल का इतिहास जानने से पहले हम पाठकों को चगताइयों के इतिहास में थोड़ा पीछे लेकर चलना चाहते हैं।

ई.1526 में भारत के मुगलों का पूर्वपुरुष बाबर बड़ी हसरतें लेकर भारत में आया था ताकि वह अपने वंशजों को एक बड़ी तथा सुरक्षित सल्तनत सौंपकर जा सके और उसके वंशज इस सल्तनत में सुख से रह सकें। उसकी नसों में चगताई शहजादों का रक्त जोर मारता था।

बाबर की इच्छा के अनुसार विगत दो सौ सालों से बाबर के वंशज अपनी सल्तनत का विस्तार करते आ रहे थे और उनका राज्य दिल्ली तथा आगरा से बढ़कर ऊपर कश्मीर तक तथा नीचे दक्षिण तक जा पहुंचा था किंतु अपने वंशजों के लिए बाबर ने जिस सुख की कामना की थी, वह उसके वंशजों को नसीब नहीं हो सका। वे एक-दूसरे को बुरी तरह मारते जा रहे थे। उन्हें शत्रुओं की आवश्यकता ही नहीं थी।

मुगल बादशाह एवं शहजादों के लिए अपने पिता, चाचा, भाई, बहिन, पुत्र-पुत्री तथा पोते-पोती तक के सिर कटवा देना, उन्हें जेल में बंद करके अफीम पिला-पिला कर मार देना, उनकी आंखें फोड़कर अंधा कर देना, उन्हें देश से भाग जाने के लिए विवश कर देना आदि बर्बरताएं उनके लिए बहुत साधारण बात थी। इन बर्बरताओं के चलते वे एक दूसरे का ही नहीं अपितु अपना सुख भी नष्ट करते जा रहे थे।

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बाबर को उसके चाचाओं एवं मामाओं ने उजबेकिस्तान से मारकर भगाया था जिसके कारण वह भारत आया था। बाबर के चार पुत्र थे- हुमायूं, कामरान, हिन्दाल, तथा अस्करी। ई.1530 में जब बाबर की मृत्यु हुई तो उसने मरने से पहले अपने बड़े बेटे हुमायूँ को शपथ दिलवाई थी कि वह अपने छोटे भाइयों को नहीं मारेगा किंतु छोटे भाइयों ने हुमायूँ को इतना तंग किया कि हुमायूँ का जीवन और राज्य दोनों बर्बाद हो गए।

कामरान ने हुमायूँ के पांच वर्षीय पुत्र अकबर को तोपों के सामने टांग कर उस पर गोले बरसाने के आदेश दिए किंतु शाही परिवार के लोगों ने किसी तरह अकबर को बचा लिया। चगताई शहजादों का रक्त एक दूसरे को माफ करने की परम्परा नहीं रखता था।

अंत में हुमायूँ ने लोहे की सलाइयां गर्म करवाकर कामरान की आंखें फुड़वाईं तथा अपने दूसरे छोटे भाई मिर्जा अस्करी को इस शर्त पर जीवित छोड़ा कि वह अंधे भाई कामरान को लेकर भारत से मक्का चला जाएगा तथा शेष जीवन वहीं पर व्यतीत करेगा। वे दोनों मक्का चले गए और वहीं पर मृत्यु को प्राप्त हुए। हुमायूँ का तीसरा भाई हिन्दाल भी हुमायूँ से छिपता फिरा और एक दिन किसी अफगान सिपाही द्वारा छुरा भौंक कर मार डाला गया।

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हुमायूँ के चार पुत्र हुए थे जिनमें से दो बाल्यकाल में ही मर गए थे। हुमायूँ की मृत्यु के समय चौदह साल का जलालुद्दीन अकबर और पांच साल का मिर्जा हकीम नामक दो पुत्र जीवित थे। ई.1556 में जब हुमायूँ की मृत्यु हुई तो हुमायूँ की पत्नी चूचक बेगम ने अपने पुत्र मिर्जा हकीम को तथा हुमायूँ के संरक्षक बैराम खाँ ने अकबर को भारत का बादशाह घोषित किया। दोनों भाईयों के बीच हुए खूनी संघर्ष के बाद अकबर को भारत का तथा मिर्जा हकीम को काबुल का शासक मान लिया गया। ई.1605 में जब अकबर की मृत्यु हुई तो उसका एक ही पुत्र जीवित था जिसका नाम सलीम था। सलीम राज्य का इतना भूखा था कि उसने अपने पिता अकबर से कई बार विद्रोह किया तथा अकबर के कई मित्रों एवं विश्वसनीय सेनापतियों को मार डाला।

सलीम ने अपनी पत्नी मानीबाई को शराब पीकर कोड़ों से मार डाला क्योंकि मानीबाई अकबर के मित्र मानसिंह कच्छवाहे की बहिन थी। सलीम ने ओरछा के बुंदेलों के हाथों अपने पिता अकबर के मित्र अबुल फजल की हत्या करवा दी जो अपने समय का माना हुआ इतिहासकार एवं लेखक था।

एक दिन सलीम को अपने पिता अकबर का एक निजी सेवक अकेला मिल गया। सलीम ने उसी समय तलवार निकालकर उस सेवक की हत्या कर दी। इन सब कारणों से अकबर ने सलीम को बंदी बना लिया और सलीम तथा मानीबाई के पुत्र खुसरो को बादशाह बनाने का निर्णय लिया किंतु जब अकबर मर रहा था तो एक दिन सलीम किसी तरह बंदीगृह से छूटकर अकबर के महल में जा पहुंचा और उसके पलंग के पास लटक रही हुमायूँ की तलवार तथा अकबर की पगड़ी उठा ली। इस पर अकबर ने सलीम को ही बादशाह बना दिया।

सलीम ने बादशाह बनते ही अपने पुत्र खुसरो को ढुंढवाया किंतु खुसरो अपने पिता के भय से सिक्खों के गुरु अर्जुन देव के पास भाग गया। सलीम ने खुसरो को पकड़कर मंगावा। खुसरो ने अपने पिता के पैरों में गिरकर अपने प्राणों की भीख मांगी चाही किंतु उसे सीधे खड़े रहने के लिए कहा गया।

इसके बाद खुसरो के मित्रों को जीवित ही गधे और बैलों की खालों में सिल दिया गया और पूंछ की तरफ मुंह करके गधे पर बैठाया गया तथा लाहौर की सड़कों पर घुमाया गया। इसके बाद सलीम को दिल्ली लाया गया तथा उसके सहयोगियों को मारकर चंादनी चौक की संकरी गलियों में भालों की नोकों पर लटका दिया गया। खुसरो को एक हाथी पर बैठाकर उनके बीच से गुजारा गया। खुसरो से कहा गया कि वह अपने मित्रों की सलामी कुबूल करता हुआ चले।

इसके बाद खुसरो की आंखें फोड़कर उसे जेल में बंद कर दिया गया। खुसरो को आशीर्वाद देने के अपराध में गुरु अर्जुनदेव की भी हत्या कर दी गई। ई.1622 में जब जहांगीर ने अपने अन्य पुत्र खुर्रम को किसी युद्ध के मोर्चे पर भेजना चाहा तो खुर्रम ने अपने पिता जहांगीर के समक्ष शर्त रखी कि वह युद्ध में तभी जाएगा जब उसे खुसरो सौंप दिया जाएगा। जहांगीर ने उसकी यह शर्त मान ली तथा अंधे शहजादे खुसरो को उसके छोटे भाई खुर्रम के हाथों में सौंप दिया।

खुर्रम ने अपने बड़े भाई खुसरो की हत्या कर दी, उसके बाद ही वह अपने पिता के आदेश पर सल्तनत के शत्रुओं से लड़ने के लिए गया। ताकि जब कभी भी मुगलिया तख्त पर बैठने का अवसर आए तो खुसरो, खुर्रम की राह का कांटा न बन सके। कुछ दिन बाद खुर्रम ने अपने बाप जहांगीर से बगावत की किंतु उसे खुर्रम के बड़े भाई परवेज द्वारा दबा दिया गया।

जब ई.1628 में जहांगीर मरने लगा तो जहांगीर के पुत्र खुर्रम ने गद्दी पर बैठने से पहले अपने भाई शहरयार तथा अपने मरहूम भाई खुसरो के इकलौते पुत्र दावरबख्श सहित कई मुगल शहजादों की हत्याएं करवाई। अपने बड़े भाई खुसरो को तो वह पहले ही मार चुका था। खुर्रम के लिए मारवाड़ में एक दोहा कहा जाता है-

सबळ सगाई ना गिने, सबळां में नीं सीर।

खुर्रम अठारा मारिया, कै काका कै बीर।

अर्थात्- सामर्थ्यवान किसी से अपना सम्बन्ध नहीं मानता, न उसकी सामर्थ्य में किसी की हिस्सेदारी होती है। बादशाह बनने पर खुर्रम ने अठारह लोगों की हत्या की थी जो या तो उसके भाई थे, या फिर उसके भाई! कहने का अर्थ ये कि चगताई शहजादों का रक्त बहुतायत से उपलब्ध था और उसे बड़े आराम से बहाया जा सकता था।

इस हत्याकाण्ड के बाद खुर्रम शाहजहाँ के नाम से बादशाह हुआ। वह ई.1658 में बीमार पड़ा तो उसके चारों पुत्रों दारा शिकोह, शाहशुजा, औरंगजेब तथा मुरादबक्श में मुगल सल्तनत पर कब्जा करने को लेकर भीषण रक्तपात हुआ।

शाहजहाँ की चारों पुत्रियां जहानआरा, रौशनआरा, पुरहुनार बेगम तथा गौहरा बेगम भी इस रक्तपात में कूद पड़ीं। इसका परिणाम यह हुआ कि औरंगजेब ने शाहजहाँ को कैद कर लिया तथा अपने तीनों भाइयों को मार डाला। शाहजहाँ पूरे आठ साल तक लाल किले में बंदी बनकर रहा।

औरंगजेब ने अपने बड़ी बहिन जहानआरा को आठ साल तक कैद में रखा तथा दूसरे नम्बर की बहिन रौशनआरा को जहर देकर मरवाया। इसके बाद औरंगजेब ने अपने पुत्र-पुत्रियों तथा पौत्र आदि का जो बुरा हाल किया वह सारा इतिहास हम अपनी पूर्ववर्ती कड़ियों में बता आए हैं।

ई.1707 में औरंगजेब मर गया किंतु चगताई शहजादों का रक्त भारत में और भी बुरा इतिहास लिखने को आतुर था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब की वसीयत

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औरंगजेब की वसीयत

मुगल बादशाहें में वसीयत लिखने की परम्परा नहीं थी किंतु औरंगजेब की वसीयत मुगलों के इतिहास की उस काली सच्चाई से परिचय करवाती है जो मुगल शहजादों का खून पीने के लिए आतुर थी।

औरंगजेब के पांच पुत्र थे जिनमें से दो उसके जीवन काल में ही मर गए थे। उसके जीवित बचे पुत्रों में से हालांकि मुअज्जमशाह सबसे बड़ा था किंतु औरंगजेब उसे पसंद नहीं करता था क्योंकि मुअज्जमशाह ने ई.1787 में जोधपुर नरेश जसवंतसिंह, मराठों के राजा शिवाजी और उसके पुत्र शंभाजी के साथ मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध बगावत की थी। इसलिए औरंगजेब ने ई.1787 से लेकर ई.1794 तक मुअज्जमशाह एवं उसके परिवार को दिल्ली की जेल में बंद रखा था।

हालांकि ई.1794 में मुअज्जमशाह को जेल से निकालकर लाहौर एवं काबुल का सूबेदार बना दिया गया था तथापि उसे कभी भी किसी सैनिक अभियान पर नहीं भेजा गया। क्योंकि सैनिक अभियान पर भेजने के लिए मुअज्जमशाह को बड़ी सेना देनी पड़ती तथा औरंगजेब को भय था कि मुअज्जमशाह उसी सेना के बल पर औरंगजेब को पकड़ लेगा या मार डालेगा।

जिस समय औरंगजेब की मृत्यु हुई, उसने आजमशाह एवं कामबक्श को अलग-अलग पत्र लिखे जिनसे यह ज्ञात होता है कि अपनी मृत्यु के समय औरंगजेब अपने सबसे छोटे पुत्र कामबक्श से सर्वाधिक प्रेम करता था तथा उसके जीवन को लेकर चिंतित था।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में झगड़ा न हो इसके लिए औरंगजेब बहुत सतर्क रहता था। वह यह दिखाने का प्रयत्न करता था कि उसके लिए तीनों पुत्र एक जैसे प्रिय हैं। इसलिए उसने किसी भी शहजादे को वली-ए-अहद घोषित नहीं किया था। वली-ए-अहद बादशाह के जीवन काल में शासन व्यवस्था में दूसरे नम्बर पर होता था तथा वही सल्तनत का उत्तराधिकारी समझा जाता था।

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अपने पुत्रों के भावी संघर्ष को रोकने के लिए औरंगजेब ने अपनी मृत्यु से पहले एक वसीयत भी लिखी जो औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके तकिये के नीचे से मिली थी। औरंगजेब की वसीयत में मुगल शहजादों को सलाह दी गई थी कि वे भारत के समस्त प्रांतों को तीन भागों में बांट लें। इनमें से दक्षिण भारत के प्रांत कामबक्श को दे दें जिनमें खानदेश, बरार, औरंगाबाद, बीदर तथा इस क्षेत्र के समस्त बंदरगाहों को सम्बद्ध किया जाए।

औरंगजेब की वसीयत में मुगल सल्तनत के उत्तरी भारत के प्रांतों को दिल्ली एवं आगरा नामक दो भागों में विभक्त करके अपने शेष दो पुत्रों को आपस में बांट लेने की सलाह दी थी। उसने आगरा के साथ मालवा, गुजरात और अजमेर को सम्बद्ध करने की सलाह दी तथा दिल्ली के साथ पंजाब, काबुल, मुलतान, थट्टा काश्मीर बंगाल, उड़ीसा बिहार, इलाहाबाद और अवध नामक ग्यारह सूबों को सम्बद्ध किए जाने की सलाह दी।

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औरंगजेब की वसीयत में भले ही कुछ भी क्यों न लिखा गया हो, औरंगजेब के पुत्रों ने सल्तनत के बंटवारे के विचार को स्वीकार नहीं किया। औरंगजेब के तीनों बेटे अपने बाप-दादों द्वारा शासित सम्पूर्ण क्षेत्र पर अपना-अपना अधिकार चाहते थे। मुअज्जमशाह नवाबबाई का बेटा था। उसे औरंगजेब ने शाहआलम की उपाधि दी थी इस कारण अनेक पुस्तकों में उसे शाहआलम कहा गया है। औरंगजेब की मृत्यु के समय मुअज्जम शाह पेशावर के निकट जमरूद में तथा कामबख्श बीजापुर में था। औरंगजेब ने आजमशाह को मालवा जाने के निर्देश दिए थे किंतु आजमशाह कोई बहाना बनाकर अहमदनगर से कुछ दूर जाकर रुक गया था और अपने पिता की मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था।

आजमशाह का पुत्र बेदारबख्त जो कि औरंगजेब को अत्यधिक प्रिय था, गुजरात के मोर्चे पर था। जैसे ही आजमशाह को बादशाह के मरने की सूचना मिली, वह अहमदनगर पहुंच गया और औरंगजेब को दौलताबाद के निकट एक गांव में दफनाने के बाद उसने स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। इसके बाद वह अपने पुत्र अली तबर, बेदारबख्त तथा मिर्जा वालाजहा के साथ आगरा की तरफ चल पड़ा।

बीजापुर में मुकाम कर रहे शहजादे कामबक्श ने भी स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया तथा अपने नाम के सिक्के ढलवाए। औरंगजेब का सबसे बड़ा जीवित शहजादा मुअज्जमशाह उस समय पेशावर के निकट जमरूद में था। आगरा से जमरूद 700 मील तथा आगरा से अहमदनगर 715 मील की दूरी पर हैं।

इस दृष्टि से मुअज्जमशाह तथा आजमशाह को आगरा पहुंचने में बराबर का समय लगने वाला था किंतु मुअज्जमशाह ने औरंगजेब की मृत्यु से पहले ही उत्तराधिकार की लड़ाई के लिए तैयारियां शुरु कर दी थीं। उसने लाहौर के नायब-सूबेदार मुनीम खाँ की सहायता से व्यास और सतलज के क्षेत्रों से स्थानीय शासकों की सेनाएं प्राप्त कर ली थीं।

मुअज्जमशाह ने पेशावर से लाहौर तक सड़क की मरम्मत करवा ली तथा पेशावर से आगरा की तरफ पड़ने वाली नदियों पर अस्थाई पुलों का निर्माण करवा लिया ताकि वह अपनी सेना को तेज गति से आगरा तक ले जा सके। उसने अपने पुत्र अजीमुश्शान को एक बड़ी सेना लेकर बंगाल से आगरा की तरफ आने के निर्देश भिजवाए तथा बूंदी नरेश बुधसिंह हाड़ा और आम्बेर नरेश विजयसिंह से दोस्ती करके उनसे भी सहायता प्राप्त कर ली।

3 मई 1707 को मुअज्जमशाह जमरूद से चलकर लाहौर पहुंचा। वहीं पर उसने स्वयं को बादशाह घोषित किया। इस समय लाहौर के शाही खजाने में 28 लाख रुपए मौजूद थे। मुअज्जमशाह इस खजाने को लेकर 5 मई 1707 को आगरा के लिए चल पड़ा। 1 जून को वह दिल्ली पहुंच गया। वहाँ उसने निजामुद्दीन औलिया तथा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर हाजिरी दी। उस समय दिल्ली के लाल किले में स्थित शाही खजाने में 30 लाख रुपए थे। मुअज्जमशाह ने वे रुपए भी ले लिए।

3 जून 1707 को मुअज्जमशाह आगरा के लिए रवाना हो गया। वह आगरा शहर के बाहर पोयाह घाट पर ठहरा तथा उसने आगरा दुर्ग के किलेदार बाक़ी खान कुल को निर्देश भिजवाए कि वह आगरा का दुर्ग मुनीम खाँ को सौंप दे। किलेदार बाक़ी खान कुल ने मुअज्जमशाह का मुकाबला करना बेकार समझा तथा मुनीम खाँ को दुर्ग सौंप दिया।

मुनीम खाँ ने आगरा के दुर्ग में घुस कर शाही खजाने को सील कर दिया। अब मुअज्जमशाह ने अपने भाई आजम खाँ को पत्र लिखकर निर्देशित किया-

‘वह दक्षिण भारत के प्रांतों पर संतोष करे जैसा कि उसके पिता ने अपनी वसीयत में लिखा है। यदि वह दक्षिण भारत के हिस्से से संतुष्ट नहीं है तो उसे गुजरात तथा अजमेर के सूबे भी दिए जा सकते हैं। यदि इस पर भी आजमशाह संतुष्ट नहीं हो तो फिर सल्तनत का निर्णय तलवार के द्वारा होगा।’

मुअज्जमशाह के पत्र के जवाब में आजमशाह ने लिखा-

‘मकान में मेरा हिस्सा फर्श से छत तक है जबकि तेरा हिस्सा छत से आकाश तक है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहआलम

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शाहआलम

औरंगजेब का चहेता बेटा कामबख्श था तथा औरंगजेब नहीं चाहता था कि मुअज्जमशाह को बादशाहत मिले किंतु औरंगजेब की मौत के बाद मुअज्जमशाह औरंगजेब के चहेते बेटों को मारकर शाहआलम के नाम से भारत का बादशाह बन गया। मुअज्जमशाह को मुगलों के इतिहास में बहादुरशाह (प्रथम) तथा शाहआलम (प्रथम) भी कहा जाता है।

जब मुअज्जमशाह के पत्र के जवाब में आजमशाह ने लिखा कि ‘मकान में मेरा हिस्सा फर्श से छत तक है जबकि तेरा हिस्सा छत से आकाश तक है।’ तो मुअज्जमशाह समझ गया कि अब युद्ध को टालना संभव नहीं है। इसलिए उसने धौलपुर की तरफ प्रस्थान किया ताकि आजमशाह से चम्बल के किनारे निबटा जा सके। मुअज्जमशाह को भारत के इतिहास में शाहआलम कहा जाता है।

इस समय तक मुअज्जमशाह का पुत्र अजीमुश्शान भी आगरा आ पहुंचा था जो कि बंगाल का गवर्नर था। वह बंगाल से 11 करोड़ रुपए एकत्रित करके लाया था। मुअज्जमशाह ने उसके कमाण्ड में 80 हजार घुड़सवारों को रखा। अजीमुश्शान को धौलपुर से कुछ दूरी पर चम्बल के किनारे स्थित एक दुर्ग पर कब्जा करने के निर्देश दिए गए।

उधर आजमशाह भी अहमदनगर से ग्वालियर आ पहुंचा। औरंगजेब का प्रधानमंत्री असद खाँ आजमशाह के साथ था। आजमशाह ने अपने पुत्र बेदार बख्त के कमाण्ड में 25 हजार घुड़सवार नियुक्त किए। अब आजमशाह कुछ राजपूत सरदारों तथा अपने पुत्र मिर्जा वालाजाह आदि के साथ आगरा की तरफ बढ़ा।

धौलपुर से आगे बढ़ने पर आजमशाह के पास 90 हजार घुड़सवार तथा 40 हजार पैदल सिपाही हो गए। आजमशाह ने इस सेना के चार हिस्से किए। एक हिस्सा स्वयं आजमशाह के नेतृत्व में, एक हिस्सा शहजादे बेदारबख्त के नेतृत्व में, एक हिस्सा शहजादे अली तबर के नेतृत्व में तथा एक हिस्सा शहजादे वालाजाह के नेतृत्व में रखा गया।

आजमशाह के पास लम्बी दूरी तक मार करने वाली तोपें नहीं थी किंतु ऊंटों एवं हाथियों की पीठ पर रखकर चलाई जाने वाली कुछ छोटी एवं हल्की तोपें थीं। आजमशाह तोपों की लड़ाई की अपेक्षा तलवारों की लड़ाई में अधिक विश्वास करता था। 17 जून 1707 को आजमशाह तथा उसकी सेना धौलपुर के निकट मानिया नामक स्थान पर पहुंची। उसे किसी नजूमी ने बताया कि यदि 20 जून को युद्ध आरम्भ हुआ तो तेरी विजय होगी।

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उधर मुअज्जमशाह अपनी सेना के साथ 18 जून को जजाऊ के मैदान में पहुंच गया किंतु यह बात आजमशाह को ज्ञात नहीं हुई। 20 जून को जब आजमशाह का पुत्र बेदारबख्त पानी के स्रोत की तलाश में जजाउ की तरफ गया जहाँ एक छोटी सी धारा बह रही थी, तब उसे एक सैनिक ने बताया कि उसने निकट के गांव में मुअज्जमशाह की सेना के तम्बू देखे हैं।

बेदारबख्त ने उसी समय खान आलम दक्क्निी तथा मुनव्वर खाँ को मुअज्जमशाह के पुत्र अजीमुश्शान के तम्बुओं पर हमला बोलने के लिए भेजा। मुअज्जमशाह के पुत्र अजीमुश्शान ने 500 हाथियों के साथ बेदारबख्त की सेना का रास्ता रोका किंतु अजीमुश्शान के हाथी परास्त हो गए तथा बेदारबख्त के सिपाहियों ने अजीमुश्शान की सेना के तम्बुओं को लूटकर उनमें आग लगा दी।

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शहजादे अजीमुश्शान ने कुछ दूरी पर कैम्प कर रहे अपने पिता मुअज्जमशाह को संदेश भिजवाया कि तत्काल और सेना भेजी जाए। मुअज्जमशाह ने उसी समय मुनीम खाँ तथा जहांदारशाह को 50 हजार घुड़सवारों के साथ जजाउ की तरफ रवाना कर दिया। उधर आजमशाह के सेनापति जुल्फिकार खाँ ने बेदारबख्त से कहा कि आज के लिए इतना काफी है, कल जब विधिवत् लड़ाई होगी, तब बाकी का काम निबटा लिया जाएगा।

जब मुअज्जमशाह के 50 हजार घुड़सवार बेदारबख्त की सेना के काफी निकट आ पहुंचे तब जाकर बेदारबख्त को उनके आने का पता चला किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसके सैनिक अब भी अजीमुश्शान के तम्बू लूटने में व्यस्त थे। बेदारबख्त के सेनापति इरादत खाँ ने उसी समय अपने संदेश वाहक अपने पिता आजमशाह के शिविर तक दौड़ाए और उससे कहलवाया कि वह तुरंत सेना लेकर आए। आजमशाह उसी समय अपने बेटे की मदद के लिए रवाना हो गया। जिस समय मुअज्जमशाह के पचास हजार सिपाही बेदारबख्त तक पहुंचे थे, उस समय बेदारबख्त के सिपाही अजीमुश्शान का कैम्प लूटने में व्यस्त थे तथा दूर-दूर तक बिखरे हुए थे।

इसलिए बेदारबख्त हतप्रथ रह गया। जबकि मुअज्जमशाह की घुड़सवार सेना ने बेदारबख्त की सेना पर दूर से ही तीर बरसाने आरम्भ कर दिए। उसी समय आजमशाह तथा उसका पुत्र वालाजाह युद्ध स्थल पर आ पहुंचे। वालाजाह ने अजीमुश्शान की सेना को रोक दिया किंतु थोड़ी ही देर में मुअज्जमशाह के पक्ष की राजपूत सेना आ गई और उनके दबाव के कारण शहजादे वालाजाह को युद्ध-क्षेत्र से भाग जाना पड़ा।

अब मुअज्जमशाह की राजपूत सेना ने बेदारबख्त के सेनापति जुल्फिकार खाँ पर आक्रमण किया। इस आक्रमण में जुल्फिकार खाँ के पैर में गहरा घाव लग गया। वह भी युद्ध छोड़कर भाग गया। कुछ देर के युद्ध के पश्चात् आजमशाह के पुत्र बेदारबख्त और अली तबर मारे गए। तब भी आजमशाह हाथी पर बैठकर युद्ध करता रहा।

शत्रुओं के तीर चारों तरफ से आकर उसे छलनी कर रहे थे किंतु आजमशाह उनकी परवाह किए बिना मैदान में डटा रहा। देखते ही देखते आजमशाह के सभी प्रमुख सेनापति एवं कमाण्डर मारे गए। अंत में बंदूक की एक गोली आजमशाह के माथे पर आकर लगी और आजमशाह अपने हाथी के हौदे में लुढ़क गया।

जब मुअज्जमशाह को बताया गया कि आजमशाह मारा गया है तो बहादुरशाह ने सैनिकों को अपने भाई का शव लाने के लिए भेजा। तब तक आजमशाह का पुत्र वालाजहा फिर से युद्ध के मैदान में लौट आया था, उसने मुअज्जमशाह के सैनिकों पर आक्रमण किया। इस युद्ध में वालाजाह भी मारा गया।

देर शाम को आठ बजे मुअज्जमशाह का अमीर ‘रुस्तम दिल खाँ’ आजमशाह के हाथी पर चढ़ा। आजमशाह का शव अब भी हाथी के हौदे में पड़ा था। रुस्तम खाँ ने मरे हुए शहजादे का सिर काट लिया। शहजादे अली तबर का शव भी अपने हाथी के हौदे में पड़ा हुआ था। रुस्तम ने इन दोनों हाथियों को पकड़ लिया। आजमशाह के हरम की कुछ औरतें भी रुस्तम ने पकड़ लीं। इन सबको लेकर वह मुअज्जमशाह के पास पहुंचा।

जब रुस्तम ने मुअज्जमशाह को बताया कि मैंने आजमशाह का सिर काट दिया है तो मुअज्जमशाह उससे बहुत नाराज हुआ। तत्कालीन ग्रंथ इबरतनामा के अनुसार मुअज्जमशाह ने रुस्तम खाँ के इस कृत्य के लिए उसकी बहुत भर्त्सना की।

जजाऊ के युद्ध को इतिहासकारों ने भारत के सबसे बड़े युद्धों में से एक बताया है। इस युद्ध में 12 हजार घुड़सवार तथा 10 हजार पैदल सिपाही काम आए। रामसिंह हाड़ा एवं राव दलपत बुंदेला भी युद्ध के दौरान रणखेत रहे। आजमशाह तथा उसके तीनों मृत पुत्रों के शव दिल्ली ले जाए गए तथा वहाँ स्थित हुमायूँ के मकबरे में दफना दिए गए।

इस युद्ध में विजय मिलने के बाद मुअज्जमशाह, बहादुरशाह के नाम से बादशाह बन गया। उसे इतिहास में बहादुरशाह (प्रथम) तथा शाहआलम (प्रथम) भी कहा जाता है। बादशाह बनते समय शाहआलम ने जो खुतबा पढ़ा उसमें स्वयं को अली के स्थान पर वली घोषित किया जिस पर मुल्ला-मौलवियों ने बहुत ऐतराज किया किंतु शाहआलम ने उनकी एक न सुनी।

मुगलिया सरकारी दस्तावेजों में मुअज्जमशाह का पूरा नाम साहिब-ए-क़ुरान मुअज्ज़म शाह आलमगीर सानी अबु नासिर सैयद कुतुबुद्दीन अबुल मुज़फ़्फ़र मुहम्मद आलम बहादुरशाह पादशाह गाज़ी (खुल्द मंजिल) कहा गया है। वह भारत में सातवां मुगल बादशाह था। बादशाह बनते समय उसकी आयु 63 वर्ष थी। वह केवल पांच साल शासन करके मृत्यु को प्राप्त हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा अजीतसिंह

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महाराजा अजीतसिंह

महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर दुर्ग को गंगाजल से धुलवाया!

ईस्वी 1678 में महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो जाने के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ राज्य खालसा कर लिया था तथा शिशु महाराजा अजीतसिंह की सुन्नत करके उसे मुसलमान बनाने का षड़यंत्र रचा था किंतु वह षड़यंत्र विफल हो गया था। जब ईस्वी 1707 में महाराजा अजीतसिंह ने फिर से जोधपुर दुर्ग पर अधिकार किया तो दुर्ग को गंगाजल से धुलवाकर पवित्र करवाया।

औरंगजेब ने शिशु राजकुमार अजीतसिंह को मुसलमान बनाने के लिए बहुत षड़यंत्र रचे थे किंतु राजपूत सरदार अपने स्वामी को औरंगजेब की दाढ़ में से निकाल लाए थे। राजपूतों ने राजकुमार अजीतसिंह को कुछ दिनों तक सिरोही राज्य के कालंद्री गांव में छिपाकर रखा किंतु बाद में महाराणा राजसिंह के संरक्षण में मेवाड़ में ले जाकर रखा।

शिशु अजीतसिंह के दिल्ली से निकल जाने पर पर औरंगजेब ने एक बालक को पकड़कर उसे अजीतसिंह घोषित किया तथा उसका खतना करके उसे अपने हरम के साथ पालने-पोसने की व्यवस्था की। उस बालक का नाम मुहम्मदी राज रखा गया। जब ई.1682 में औरंगजेब दक्खिन के मोर्चे पर गया तो वह मुहम्मदी राज को भी अपने साथ दक्षिण के मोर्चे पर ले गया किंतु वहाँ प्लेग फैल जाने के कारण बालक मुहम्मदीराज की मृत्यु हो गई।

इधर शिशु अजीतसिंह महाराणा राजसिंह के संरक्षण में पलकर बड़ा हो गया। ई.1687 में जब अजीतसिंह आठ साल का हुआ तो वीर मुकुंद दास खींची ने मारवाड़ के सरदारों के आग्रह पर बालक अजीतसिंह को मारवाड़ के समस्त सरदारों के समक्ष प्रकट कर दिया। उस समय वीर दुर्गादास दक्षिण के मोर्चे पर था।

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सबसे पहले बूंदी के राजा दुर्जनसिंह हाड़ा को अवसर दिया गया कि वह महाराजा अजीतसिंह से मिलकर उन्हें उपहार भेंट करे। उसी अवसर पर अजीतसिंह का राज्यतिलक करके उसे मारवाड़ का राजा घोषित कर दिया गया।

अधर जब शहजादा अकबर दक्खिन भारत छोड़कर ईरान चला गया तो वीर दुर्गादास भी दक्षिण का मोर्चा छोड़कर महाराजा अजीतसिंह के पास आ आया। कुछ समय पश्चात् वीर दुर्गादास तथा दुर्जनशाल हाड़ा ने मिलकर मुगल राज्य पर चढ़ाई की तथा रोहन, रोहतक एवं रेवाड़ी को लूट लिया। राजपूतों के चढ़ आने का समाचार सुनकर दिल्ली में हड़कम्प मच गया तथा चालीस हजार सैनिक इनका मार्ग रोकने के लिए भेजे गए। इस पर दुर्गादास और दुर्जनशाल अपनी सेना को लेकर वापस मारवाड़ आ गए।

जब औरंगजेब को यह ज्ञात हुआ कि राजकुमार अजीतसिंह प्रकट हो गया है तो उसने जोधपुर एवं अजमेर के सूबेदारों को आज्ञा दी कि वे अजीतसिंह को पकड़ लें किंतु मुगल अधिकारियों को इस कार्य में कभी भी सफलता नहीं मिल सकी।

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इसके बाद वीर दुर्गादास तथा उसके साथी औरंगजेब की सेनाओं से संघर्ष करते रहे और औरंगजेब से मांग करते रहे कि वह बालक अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा स्वीकार कर ले किंतु औरंगजेब यही जवाब देता रहा कि जिसे राजपूत अजीतसिंह बता रहे हैं, वह अजीतसिंह नहीं है क्योंकि उसकी तो मृत्यु हो गई है। अंत में जब ई.1686 में शहजादा अकबर अपने परिवार को वीर दुर्गादास के संरक्षण में छोड़कर ईरान भाग गया तो ई.1695 में औरंगजेब को राजपूतों से संधि करनी पड़ी।

औरंगजेब ने दुर्गादास को तीन हजारी जात और एक हजार सवारों का मनसब दिया जबकि महाराजा अजीतसिंह को डेढ़ हजारी जात तथा पांच सौ सवार का मनसब दिया। इसके साथ ही दुर्गादास तथा अजीतसिंह को मारवाड़ राज्य के कुछ परगनों की जागीरी भी दी गई। हालांकि यह प्रस्ताव राजकुमार अजीतसिंह के लिए अपमानजनक था किंतु दुर्गादास तथा अजीतसिंह दोनों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया क्योंकि इस प्रस्ताव के माध्यम से औरंगजेब ने पहली बार अजीतसिंह को उसके पैतृक राज्य के कुछ हिस्से लौटाना स्वीकार कर लिया था।

अजीतसिंह पूरे मारवाड़ राज्य का स्वामी था किंतु औरंगजेब ने उसे अपने ही राज्य में एक छोटा सा जागीरदार बनाने की साजिश की थी। इसलिए अजीतसिंह ने मनसब और जागीर तो स्वीकार कर ली किंतु उसने मारवाड़ में स्थित शाही थानों को लूटना जारी रखा।

जदुनाथ सरकार ने हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब में लिखा है कि औरंगजेब ने महाराजा अजीतसिंह को कई बार संदेश भिजवाए कि वह बादशाह के दरबार में उपस्थित होकर अपना राज्य प्राप्त कर ले, यहाँ तक कि औरंगजेब ने महाराजा अजीतसिंह को सात हजारी मनसब देने का भी आश्वासन दिया तथा इस फरमान पर अपने पंजे का निशान भी लगाया किंतु अजीतसिंह जानता था कि औरंगजेब पर विश्वास नहीं किया जा सकता इसलिए वह कभी भी औरंगजेब के दरबार में उपस्थित नहीं हुआ।

औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 को हुई थी। यह सुनते ही 12 मार्च 1707 को महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर पर आक्रमण किया। उस समय जफरकुली जोधपुर के दुर्ग का किलेदार था। उसने महाराजा अजीतसिंह से युद्ध किया किंतु अंत में दुर्ग खाली करके भाग गया।

अजितोदय नामक ग्रंथ में महाराजा अजीतसिंह का विश्वसनीय इतिहास लिखा गया है। इसके अनुसार महाराजा ने अपने पूर्वजों की राजधानी पर अधिकार कर लिया तथा अपने पूर्वज राव जोधा द्वारा बनवाए गए मेहरानगढ़ दुर्ग को गंगाजल एवं तुलसीदल से पवित्र करवाया गया। उसने स्वयं को स्वतंत्र रूप से जोधपुर का राजा घोषित कर दिया।

मारवाड़ राज्य का इतिहास लिखने वाले पण्डित विश्वेश्वर नाथ रेउ ने लिखा है कि विगत 28 वर्षों से जोधपुर पर मुसलमानों का अधिकार था, उन्होंने जोधपुर नगर में स्थित सैंकड़ों प्राचीन मंदिरों को तुड़वाकर उनके स्थान पर मस्जिदें बनवा दी थीं। जब महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर में प्रवेश किया, तब पूरे शहर में मस्जिदों से आने वाली अजान की आवाजें सुनाई देती थीं। महाराजा अजीतसिंह ने इन मस्जिदों को तुड़वा कर फिर से मंदिर बनवा दिए और शहर में घण्टे एवं शंखनाद सुनाई पड़ने लगे।

अजितोदय एवं अन्य ख्यातों में लिखा है कि अजीतसिंह द्वारा शहर में रह रहे काजियों एवं अन्य मुसलमानों के विरुद्ध भी कार्यवाही की गई जिससे बहुत से मुसलमान शहर छोड़कर भाग गए और बहुत से मुसलमानों ने दाढ़ी कटवाकर अपना वेश बदल लिया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहे बेखबर

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शाहे बेखबर

बादशाह शाहआलम (प्रथम) को बहादुरशाह (प्रथम) तथा शाहे बेखबर भी कहा जाता है। बादशाह शाहआलम (प्रथम) को बहादुरशाह (प्रथम) तथा शाहे बेखबर भी कहा जाता है। उसके बाप-दादे सुन्नी मुसलमान थे किंतु शाहे बेखबर अपने बाप औरंगजेब से इतनी घृणा करता था कि शाहे बेखबर ने स्वयं को शिया घोषित कर दिया। इस कारण शाहे बेखबर का दरबार शिया और सुन्नी में बंट गया!

औरंगजेब के पुत्र मुअज्जमशाह ने जजाऊ के युद्ध में अपने भाई आजमशाह तथा उसके तीनों पुत्रों को मारकर दिल्ली एवं आगरा पर पूरी तरह अधिकार कर लिया। हालांकि औरंगजेब के तीसरे पुत्र कामबख्श ने भी स्वयं को बीजापुर में बादशाह घोषित कर दिया था किंतु जब जजाऊ के युद्ध में मुअज्जम और आजम तलवार के जोर पर अपने भाग्यों का फैसला कर रहे थे, तब कामबख्श बीजापुर में चुपचाप बैठा रहा।

जजाऊ युद्ध की विजय के बाद मुअज्जम शाह ने स्वयं को बहादुरशाह के नाम से मुगलों का बादशाह घोषित कर दिया। इस अवसर पर उसने अपने समर्थकों को नई पदवियाँ तथा ऊंचे दर्जे प्रदान किए। उसने लाहौर के नायब सूबेदार मुनीम ख़ाँ को अपना वज़ीर नियुक्त किया जिसने हर मुश्किल समय में बहादुरशाह का साथ दिया था और जजाऊ की जीत का सेहरा उसी की सेवाओं के कारण बहादुरशाह के सिर पर सज सका था।

मरहूम बादशाह औरंगज़ेब के वज़ीर असद ख़ाँ तथा उसके बेटे ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने जजाऊ के मैदान में शहजादे आजमशाह का साथ दिया था किंतु मुअज्जमशाह ने उन दोनों को क्षमा कर दिया तथा उनके द्वारा औरंगजेब के समय सल्तनत को दी गई सेवाओं को स्मरण ररखते हुए पुरस्कृत किया।

बादशाह ने असद खाँ को वकील-ए-मुतलक़ तथा उसके बेटे ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को मीर बख्शी नियुक्त किया। इतने महत्वपूर्ण पदों पर अपने शत्रु पक्ष के अमीरों की नियुक्तियों को बहादुरशाह की दूरदृष्टि एवं उदारता के उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए।

बहादुरशाह ने अपनी ताजपोशी के समय स्वयं को शिया मुसलमान घोषित कर दिया था। मुगलिया सल्तनत के हिसाब से यह एक आश्चर्यजनक बात थी क्योंकि उससे पहले कोई भी मुगल शासक शिया नहीं था। फिर भी भारत के मुगल बादशाह इस मामले में उदार थे और वे शिया शहजादियों से विवाह करते आए थे तथा शिया योद्धाओं को निःसंकोच अपना मंत्री एवं सेनापति बनाते रहे थे।

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औरंगजेब का चरित्र इस मामले में बड़ा विचित्र था। औरंगजेब की प्रमुख बेगम दिलरास बानो ईरान के शाही वंश की शहजादी थी जो कि शिया मत का अनुयाई था। औरंगजेब का प्रमुख वजीर असद खाँ भी शिया था किंतु औरंगजेब ने न केवल असद खाँ को अपना सबसे विश्वसनीय वजीर बना रखा था अपितु उसके पुत्र जुल्फिकार खाँ को भी शासन में महत्वपूर्ण पद दे रखा था। जबकि दूसरी ओर औरंगजेब शियाओं से इतनी घृणा करता था कि उन्हें कुफ्र मानता था। यहाँ तक कि वह दक्षिण के मुस्लिम राज्यों को केवल इसीलिए नष्ट कर देना चाहता था क्योंकि वे सुन्नी नहीं थे, शिया थे।

मुअज्जमशाह ने बादशाह बनते समय शिया मत क्यों ग्रहण किया, इस सम्बन्ध में ऐतिहासिक विवरण प्राप्त नहीं होता है किंतु कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर ध्यान दिए जाने से इस विषय पर तस्वीर कुछ स्पष्ट होने लगती है। मुअज्जमशाह की माँ नवाब बाई एक हिन्दू स्त्री थी, वह औरंगजेब की दूसरी बेगम थी।

उसकी कोख से औरंगजेब के सबसे बड़े पुत्र सुल्तान मुहम्मद तथा दूसरे नम्बर के पुत्र मुअज्जमशाह का जन्म हुआ था किंतु जब सुल्तान मुहम्मद ने शाहजहाँ के समय हुए उत्तराधिकार के युद्ध में अपने पिता औरंगजेब की बजाय अपने श्वसुर शाहशुजा का साथ दिया था तब से औरंगजेब और नवाबबाई के सम्बन्ध खराब हो गए थे।

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नवाब बाई की इच्छा के विरुद्ध औरंगजेब ने शहजादे सुल्तान मुहम्मद को जीवन भर जेल में डाले रखा था। जब ई.1682 में नवाब बाई के दूसरे पुत्र मुअज्जमशाह ने औरंगजेब से पहली बार विद्रोह किया तो औरंगजेब नवाब बाई से बुरी तरह नाराज हो गया। उसने नवाब बाई के माध्यम से ही मुअज्जमशाह को विद्रोह करने से रोका था और औरंगजेब ने मुअज्जमशाह को जेल में नहीं डाला था।

जब मुअज्जमशाह ने ई.1687 में दूसरी बार औरंगजेब से विद्रोह किया था तो औरंगजेब ने सात साल के लिए मुअज्जमशाह को जेल में डाल दिया तथा उसके बाद उसे लाहौर एवं काबुल का सूबेदार बनाकर स्वयं से लगभग दो हजार किलोमीटर दूर नियुक्त कर दिया। संभवतः यही कारण था कि मुअज्जम को अपने पिता से इतनी घृणा हो गई कि उसने अपने पिता का सुन्नी मत छोड़कर शिया मत अपना लिया था। संभवतः असद खाँ और जुल्फिकार खाँ को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने का कारण भी यही रहा होगा कि वे शिया थे।

जब कोई शहजादा या व्यक्ति बादशाह बनता था तो उसके नाम का खुतबा पढ़ा जाता था। प्रत्येक शुक्रवार को सल्तनत की समस्त मस्जिदों में बादशाह के नाम के खुतबे को दोहराया जाता था। मुगल बादशाहों के खुतबे में उन्हें वली कहा जाता था किंतु मुअज्जमशाह अर्थात् बहादुरशाह ने अपने नाम का जो खुतबा पढ़वाया उसमें स्वयं को वली के स्थान पर अली घोषित किया।

इस खुतबे पर सुन्नी मुल्ला-मौलवियों ने बहुत ऐतराज किया किंतु बहादुरशाह ने उनकी एक न सुनी। लाहौर में तो कुछ इमामों ने बादशाह के खिलाफ सेना भी तैयार की किंतु वह कोई कार्यवाही नहीं कर सकी।

भारत के मुगल बादशाहों के दरबार में परम्परागत रूप से सुन्नी अमीरों का बोलबाला था किंतु बहादुशाह के दरबार में शियाओं को प्राथमिकता मिलने लगी इससे दरबारी अमीरों में गुटबंदी तेज हो गई और वे एक दूसरे के विरुद्ध षड्यन्त्र करने लगे। समस्त दरबारी दो दलों में बंट गए जिन्हें ईरानी और तूरानी दल कहा जाता था। ईरानी दल शिया मत को मानने वालों का था जिसमें असद ख़ाँ तथा उसके बेटे जुल्फिकार ख़ाँ जैसे प्रबल अमीर थे। जबकि तूरानी दल सुन्नी मतावलम्बियों का था जिसमें चिनकुलिच ख़ाँ तथा फ़िरोज़ ग़ाज़ीउद्दीन जंग जैसे प्रबल अमीर थे।

बहादुरशाह मुगलों की गद्दी पर बैठने वाला सबसे वृद्ध शासक था। उसका पूर्वज बाबर 11 वर्ष की आयु में, हुमायूँ 22 वर्ष की आयु में, अकबर 14 वर्ष की आयु में, जहांगीर 36 वर्ष की आयु में, शाहजहाँ 36 वर्ष की आयु में तथा औरंगजेब 39 वर्ष की आयु में बादशाह बने थे।

जब बहादुरशाह बना तो उस समय उसकी उम्र 63 वर्ष से अधिक थी। अपने पूर्ववर्ती समस्त मुगल बादशाहों की अपेक्षा वह अत्यन्त उदार था जबकि मुस्लिम इतिहासकारों ने उस पर आलसी तथा उदासीन होने का आरोप लगाया है।

मुगल कालीन इतिहासकार ख़फ़ी ख़ाँ ने लिखा है कि, बादशाह राजकीय कार्यों में इतना अधिक लापरवाह था, कि लोग उसे ‘शाहे-बेख़बर’ कहने लगे थे किंतु इतिहासकारों का यह आरोप सही नहीं लगता है। उसके शासनकाल में सिक्खों ने बंदा बहादुर के नेतृत्व में, राजपूतों ने दुर्गादास के नेतृत्व में तथा मुसलमानों ने कामबख्श के नेतृत्व में विद्रोह किए किंतु उन सभी विद्रोहों को सफलता पूर्वक दबा दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शहजादा कामबक्श

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शहजादा कामबक्श

जिस समय बहादुरशाह और उसका छोटा भाई आजमशाह जजाऊ के मैदान में अपने भाग्य का निर्णय कर रहे थे, उस समय उस समय औरंगजेब का सबसे छोटा शहजादा कामबक्श दक्खिन में शांत बैठा रहा।

0 दिसम्बर 1708 को शाहआलम (प्रथम) उर्फ बहादुरशाह (प्रथम) ने हैदराबाद के लिए सैनिक अभियान आरम्भ किया। उसके पास तीन सौ ऊंट और 20 हजार घुड़सवार थे। उसने अपने पुत्र जहांदारशाह के नेतृत्व में सेना की एक टुकड़ी को अग्रिम टुकड़ी के रूप में आगे बढ़ाया।

12 जनवरी 1709 को बहादुरशाह स्वयं भी हैदराबाद पहुंच गया। एक नजूमी ने घोषणा की कि बहादुरशाह इस युद्ध में आश्चर्यजनक रूप से विजय प्राप्त करेगा।

तत्कालीन इतिहासकार विलियम इरविन ने लिखा है-

‘जैसे-जैसे बहादुरशाह की सेना हैदराबाद की तरफ बढ़ती रही, वैसे-वैसे शहजादा कामबक्श के सिपाही कामबख्श का साथ छोड़कर बहादुरशाह की शरण में आते गए। अंत में कामबख्श के पास केवल 2500 घुड़सवार एवं 5000 पैदल सिपाही रह गए।

जब शहजादा कामबक्श ने अपने सेनापति से पूछा कि सिपाही हमारी फौज छोड़कर क्यों भाग रहे हैं तो सेनापति ने जवाब दिया कि हमारी सेनाओं को कुछ महीनों से वेतन नहीं दिया गया है, इस कारण वे हमें छोड़कर बहादुरशाह की तरफ जा रहे हैं।

इस पर कामबख्श ने जवाब दिया कि मैंने अपनी तरफ से सबका भला किया है तथा अल्लाह पर मेरा पूरा विश्वास है। जो कुछ भी सर्वश्रेष्ठ होगा, वही घटित होगा।’

उधर शहजादा कामबक्श अपने सैनिकों की संख्या घटने से चिंतित था और इधर बहादुरशाह को लगने लगा था कि अब कामबख्श भारत छोड़कर ईरान भाग जाएगा। इसलिए बहादुशाह ने अपने सेनापति जुल्फिकार खाँ नुसरत जंग को आदेश दिया कि वह मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नर थॉमस पिट्ट से समझौता करे कि कि यदि अंग्रेज कामबख्श को पकड़कर हमें सौंप देंगे तो उन्हें दो लाख रुपए दिए जाएंगे।

13 जनवरी 1709 को बहादुरशाह की सेना ने कामबख्श पर आक्रमण किया। बहादुरशाह ने अपने 20 हजार सिपाहियों को दो भागों में विभक्त किया। इनमें से एक भाग का नेतृत्व मुनीम खाँ कर रहा था जिसकी सहायता के लिय बहादुरशाह के दो शहजादे रफीउश्शान तथा जहानशाह को नियुक्त किया गया।

सेना के दूसरे भाग का नेतृत्व जुल्फिकार खाँ नुसरत जंग कर रहा था। इन दोनों सेनाओं ने मिलकर कामबख्श के शिविर को चारों तरफ से घेर लिया तथा जुल्फिकार खाँ ने बड़ी बेसब्री से एक छोटी टुकड़ी को साथ लेकर कामबख्श के शिविर पर हमला बोला।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

इस युद्ध में कामबख्श बुरी तहर से घायल हो गया तथा उसके शरीर से रक्त बह जाने के कारण वह बेहोश हो गया। जब यह सूचना बहादुरशाह को दी गई तो बहादुरशाह ने अपने सिपाहियों को आदेश दिए कि वह कामबक्श तथा उसके पुत्र बरीकुल्लाह को बंदी बनाकर ले आएं।

बुरी तरह घायल शहजादा कामबक्श को एक पालकी में डालकर बहादुरशाह के शिविर में लाया गया। बादहशाह ने अपने भाई के घावों को अपने रूमाल से साफ किया तथा उन पर मरहम-पट्टी करवाई किंतु कामबख्श के शरीर से इतना रक्त बह चुका था कि अगली सुबह होने से पहले ही उसका निधन हो गया।

इस प्रकार औरंगजेब के पांच पुत्रों में से अब धरती पर केवल एक ही पुत्र जीवित बचा था तथा वह औरंगजेब द्वारा छोड़ी गई विशाल मुगल सल्तनत का अकेला स्वामी था। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि बहादुरशाह बहुत उदार शासक था किंतु बहादुरशाह ने केवल पौने पांच साल शासन किया एवं इस दौरान वह अपने शत्रुओं से घिरा रहा। उसे शासन की नीति में परिवर्तन करने का कोई अवसर ही नहीं मिला। इसलिए उसके शासन काल में वही सब नीतियां चलती रहीं जो औरंगजेब के शासन काल में चलती थीं।

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हिन्दुओं से जजिया और तीर्थकर अब भी उसी तरह लिए जाते थे। हिन्दू किसानों से मुस्लिम किसानों की अपेक्षा दो-गुना लगान अब भी लिया जाता था। शासन में हिन्दू कर्मचारियों को रखने पर अब भी रोक यथावत् थी। बहादुरशाह ने अपने भाइयों के प्रति भी वही नीति अपनाई थी जो उसके पिता औरंगजेब ने अपनाई थी। अर्थात् भाइयों को युद्धों में मारकर पूरी मुगलिया सल्तनत पर अधिकार कर लिया। औरंगजेब और बहादुरशाह के शासन में यदि कोई अंतर आया था तो वह केवल इतना था कि अब बादशाह तथा उसकी सरकार शियाओं के प्रति उदार हो गए थे। बादशाह के वजीर पहले की तुलना में ज्यादा ताकतवर हो गए थे तथा बादशाह के पास इतने शहजादे नहीं थे जिन्हें वह एक-एक करके जेल में बंद कर सके!

औरंगजेब ने राजपूत शासकों को ताकत के बल पर अपने अधीन रखा था, बहादुरशाह ने भी वही नीति जारी रखी किंतु अब मुगल शक्ति सिक्खों, जाटों एवं मराठों की टक्करों से कमजोर हो चुकी थी और राजपूत शक्ति मुगलों से विमुख हो चुकी थी इसलिए अब राजपूतों को ताकत के बल पर अधीन नहीं रखा जा सकता था।

बहादुरशाह के समय में सिक्खों के प्रति नीति में भी कोई परिवर्तन नहीं आया किंतु सिक्खों के गुरु गोविंदसिंह ने उत्तराधिकार के युद्ध के समय बहादुरशाह का साथ दिया था, इसलिए कुछ समय के लिए सिक्खों से युद्ध रुक गया। लगभग डेढ़ साल बाद बंदा बैरागी के नेतृत्व में सिक्खों ने फिर से युद्ध छेड़ दिया जिसे बहादुरशाह दबा नहीं सका।

गुरु गोविंदसिंह की तरह बूंदी के राजा बुद्धसिंह हाड़ा ने उत्तराधिकार के युद्ध में बहादुरशाह का साथ दिया था, इसलिए बूंदी के राजा को मुगल दरबार में बहुत महत्व मिलने लगा और उसे अनुमति दी गई कि वह अपने पड़ौसी कोटा राज्य पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर ले।

आम्बेर के राजकुमार विजयसिंह ने भी उत्तराधिकार के युद्ध में बहादुरशाह का साथ दिया था जिसे चीमाजी भी कहा जाता था। बहादुरशाह ने विजयसिंह को पुरस्कृत करने का निर्णय लिया।

बहादुरशाह ने शहजादा कामबक्श को पराजित करने के बाद जुल्फिकार खाँ को दक्खिन का सूबेदार बना दिया जो कि पहले से ही बक्शी के पद पर नियुक्त था। बाबर से लेकर औरंगजेब तक किसी भी बादशाह ने कभी भी इतने बड़े दो पद किसी एक व्यक्ति को नहीं दिए थे।

बहादुरशाह की इस गलती का परिणाम यह हुआ कि आगे चलकर दक्खिन का सूबेदार इतना ताकतवर हो गया कि उसने दिल्ली से पृथक् सल्तनत खड़ी कर ली। चूंकि जुल्फिकार खाँ ईरानी था इसलिए बादशाह के दरबार में ताकतवर बनता जा रहा तूरानी गुट बादशाह से असंतुष्ट हो गया।

बहादुरशाह ने दरबार में अपना प्रभाव कायम रखने के लिए अपने धाय भाई कोकलताश की शक्तियों में वृद्धि की। कोकलताश ने बहुत से दरबारियों को अपनी तरफ करके एक अलग गुट खड़ा कर लिया जिसने इस दिशा में कार्य करना आरम्भ कर दिया कि बादशाह की शक्ति बादशाह के हाथों में रहे।

इस कारण दूसरे तूरानी अमीरों में कोकलताश के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हो गई और दरबार में गुटबंदी बढ़ गई। इस प्रकार दरबारी कई गुटों में बंट गए जिन्होंने आगे चलकर मुगलिया सल्तनत की जड़ ही खोद डाली।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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