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सवाई जयसिंह

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सवाई जयसिंह

आम्बेर का राजा सवाई जयसिंह भारत के इतिहास में एक अद्भुत राजा हुआ है। उसने कम से कम पांच मुगल शासकों के काल में मुगलों की सेवा की तथा उनकी नाक के नीचे हिन्दू धर्म का उत्थान किया। जब भी लाल किला उजड़ता हुआ दिखाई दिया, तब ही सवाई जयसिंह ने लाल किले को संरक्षण प्रदान किया।

ई.1713 में जब फर्रूखसियर मुगलों का तख्त हथियाने में सफल हुआ, तब आम्बेर का राजा सवाई जयसिंह और जोधपुर का राजा अजीतसिंह उदयपुर के महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) के साथ लाल किले के विरुद्ध एक संघ का निर्माण करने में सफल हुए थे।

इन दोनों राजाओं ने महाराणा को वचन दिया था कि वे भविष्य में मुगलों की नौकरी नहीं करेंगे तथा मुगलों को बेटी नहीं देंगे किंतु जब फर्रूखसियर के आदेश पर सैयद हुसैन अली खाँ ने अजमेर में राठौड़ों को पराजित किया तो अजीतसिंह को अपनी पुत्री इंद्रकुंवरी का विवाह बादशाह फर्रूखसियर से करना पड़ा।

इसी प्रकार जब फर्रूखसियर ने आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह को सात हजारी मनसब देकर उसे मालवा का सूबेदार बना दिया तो सवाई जयसिंह भी अपनी कसम भूलकर मुगलों की चाकरी करने लगा। उस समय मालवा में एक तरफ तो अफगान सरदार इनायत खाँ और दिलेर खाँ ने बगावत का झण्डा उठा रखा था तो दूसरी तरफ मराठे नर्मदा नदी को पार करके उत्तर भारत की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहे थे।

फर्रूखसियर ने सवाई जयसिंह को सात हजार का मनसब दिया तो जयसिंह की बांछें लिख गईं। फर्रूखसियर के बाबा औरंगजेब ने अपने जीवन काल में सवाई जयसिंह को कभी डेढ़-दो हजार से अधिक का मनसब नहीं दिया था। यहाँ तक कि जयसिंह को नगाड़ा रखने की अनुमति भी नहीं थी।

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औरंगजेब ने एक पत्र के माध्यम से जयसिंह को आदेश दिया था कि- ‘वह धरती पर केवल सूजनी अर्थात् पतली दरी बिछाकर बैठा करे।’ उसी जयसिंह पर मुगल बादशाह फर्रूखसियर सात हजार का मनसब न्यौछावर कर रहा था, इससे स्पष्ट है कि औरंगजेब द्वारा छोड़ा गया मुगल राज्य केवल 6 वर्ष की अल्पावधि में ही धराशायी होने को आतुर था। जयसिंह भी समझ गया था कि अब समय पलट रहा है।

सवाई जयसिंह ने बुंदेलखण्ड के शासक छत्रसाल बुन्देला तथा बूंदी के राजा बुद्धसिंह हाड़ा के सहयोग से अफगान विद्रोहियों को दबाना आरम्भ किया। राजा जयसिंह ने इनायत खाँ और दिलेर खाँ को स्थान-स्थान पर पराजित करके उनकी शक्ति को कुचल दिया। उन्हीं दिनों इस क्षेत्र के कुछ हिन्दू राजाओं ने भी विद्रोह किए जिनमें राजगढ़ का राजा मोहनसिंह, नरवर का राजा गजसिंह तथा पूरनमल अहीर मुख्य थे। जयसिंह ने इन सभी विद्रोहों को कुचल दिया।

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उस काल में सवाई जयसिंह के पास 10 हजार सैनिक थे जिनमें बंदूकधारी सैनिक भी अच्छी संख्या में थे। इस सेना के पास गोला-बारूद भी पर्याप्त मात्रा में था। इस कारण सवाई जयसिंह ने घामुनी नामक स्थान पर दिलेर अफगान के 12 हजार सैनिकों को परास्त करके उसके 2 हजार सैनिक तलवार के घाट उतार दिये। जयसिंह के भी पांच सौ सैनिक काम आये।

अप्रेल 1715 में मराठों की दो बड़ी सेनाएं मालवा में घुस आईं। कान्होजी भोंसले तीस हजार और खाण्डेराव दाभाड़े बारह हजार सैनिक लेकर आया था। मराठों ने कम्पिल परगने से 3 साल की चौथ मांगी। इस कारण सरकारी अमला, मराठों से घबराकर उज्जैन भाग आया। मराठों ने काम्पिल लूट लिया। जयसिंह उस समय भेलसा में था। वह तत्काल उज्जैन के लिये रवाना हुआ। 8 मई 1715 को जयसिंह कम्पिल पहुंचा। वहाँ उसे ज्ञात हुआ कि मराठे लूट का माल लेकर पिलसुद के निकट नर्मदा पार करने की तैयारी में हैं।

इस पर जयसिंह उसी समय पिलसुद के लिये चल पड़ा और मार्ग में कहीं भी रुके बिना, 10 मई की संध्या होने से कुछ समय पहले पिलसुद पहुंच गया। मराठों के पास, जयसिंह की तुलना में कई गुना सेना थी इसलिये वे उत्साह में भरकर जयसिंह से लड़ने के लिये आये। चार घण्टे तक दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ।

जयसिंह के साथ बूंदी के राजा बुद्धसिंह हाड़ा, छत्रसाल बुंदेला तथा धीरजसिंह खींची ने इस युद्ध में अद्भुत वीरता दिखाई। मराठे अपने हथियार छोड़कर भाग खड़े हुए। जब युद्ध बंद हुआ तो पूरी तरह रात हो चुकी थी। कुछ ही देर बाद जयसिंह ने अपने भूखे-प्यासे और थके हुए सैनिकों को फिर से उठाया और मराठों पर हमला बोलने के आदेश दिये।

 जैसे ही जंगलों में पड़े हुए मराठों ने देखा कि राजपूत चढ़े चले आ रहे हैं तो वे सिर पर पैर धरकर भाग छूटे। वे अपने घायल सिपाहियों, जानवरों और लूट के सामान को छोड़कर रात में ही नर्मदा के पार उतर गये। जयसिंह ने अपने सैनिकों को जीते हुए माल में से बहुत बड़ा हिस्सा दिया ताकि वे सालों तक आराम से जीवन यापन कर सकें तथा जीवन भर जयसिंह के प्रति वफादार रहें।

मराठों को राजपूताने में इससे पहले इतना कठिन पाठ किसी ने नहीं पढ़ाया था। इस विजय से सम्पूर्ण भारत में सवाई जयसिंह के नाम की धूम मच गई। फर्रूखसियर ने महाराजा सवाई जयसिंह को प्रशंसा पत्र भिजवाया।

इधर सवाई जयसिंह मालवा में मुगल सल्तनत की स्थिति मजबूत करता जा रहा था और उधर दिल्ली में राजनैतिक स्थितियां तेजी से बदल रही थीं। एक तरफ तो फर्रूखसियर और सैयद बन्धुओं के बीच कटुता बढ़ती जा रही थी तो दूसरी तरफ दिल्ली और आगरा के बीच यमुना के दक्षिणी प्रदेश में चूड़ामन के नेतृत्व में जाटों के उपद्रव बढ़ते जा रहे थे।

इस कारण फर्रूखसियर ने सवाई जयसिंह को मालवा से दिल्ली बुलाया। मई 1716 में जयसिंह दिल्ली पहुंचा। बादशाह ने उसे जाटों का दमन करने को कहा। जयसिंह ने सहर्ष इस काम को स्वीकार कर लिया क्योंकि आमेर के कच्छवाहे अपने राज्य की सीमा पर जाटों की बढ़ती हुई शक्ति को कुचलना चाहते थे और इस क्षेत्र के कुछ परगनों को अपने राज्य में मिलाने की लालसा रखते थे।

सवाई जयसिंह ने रूपाराम धायभाई को मालवा का नायब सूबेदार बनाकर भेज दिया और स्वयं जयपुर, कोटा, बूंदी तथा नरवर के राजाओं और उनकी सेनाओं को लेकर चूड़ामन जाट के विरुद्ध चल पड़ा। चूड़ामन बीस वर्ष की खाद्य सामग्री तथा गोला बारूद एकत्र करके थूण के दुर्ग में बंद हो गया। चूड़ामन का पुत्र अपने जाट सैनिकों के साथ थूण दुर्ग से बाहर निकल गया ताकि वह जयसिंह की सेनाओं पर पीछे से धावे मारकर तथा उनकी रसद रोककर क्षति पहुंचा सके।

सवाई जयसिंह तथा उसके अधीन राजाओं की सेनाएं सात माह तक थूण का दुर्ग घेरे रहीं किंतु चूड़ामन को किले से बाहर नहीं निकाल सकीं। इस पर जयसिंह ने थूण के चारों ओर का जंगल काटकर साफ करवा दिया और थूण से आगरा तक के मार्ग पर राजपूतों की चौकियां स्थापित कर दीं। इस प्रकार दो वर्ष बीत गये और इस अभियान पर मुगल बादशाह के दो करोड़ रुपये खर्च हो गये। जनवरी 1717 में फर्रूखसियर ने एक बड़ी तोप भिजवाई किंतु वह घेरे की खंदकें पार करके, थूण दुर्ग की दीवारों के पास नहीं पहुंच सकी।

10 फरवरी को महाराजा सवाई जयसिंह, बूंदी के महाराजा बुद्धसिंह को शिविर में छोड़कर, कोटा के महाराजा भीमसिंह के साथ मथुरा से दक्षिण-पश्चिम में 10 मील दूर सोंख की गढ़ी पर चौकी स्थापित करने गया। रात में लौटते समय जब सेना असावधान और अव्यवस्थित थी, थूण के पास घात में बैठे जाटों ने उस पर गोलियां चलाईं।

कुछ गोलियां उन हाथियों तक भी पहुंचीं जिन पर मुगल अधिकारी सवार थे। इस पर फर्रूखसियर ने जयसिंह को नाराजगी भरा पत्र लिखकर अपने गुप्तचरों को दण्डित करने को कहा जो जाटों के उस नाले को नहीं खोज सके जहाँ वे घात लगाकर बैठे थे।

फर्रूखसियर ने खानजहाँ बहादुर सैयद मुजफ्फर खाँ के नेतृत्व में एक और सेना भिजवाई। सैयद मुजफ्फर खाँ, फर्रूखसियर के वजीर सैयद अब्दुल्ला का आदमी था और जयसिंह को पसंद नहीं करता था। सैयद मुजफ्फर खाँ ने चूड़ामन से समझौता कर लिया। इस समझौते से राजा जयसिंह को जानबूझ कर दूर रखा गया।

जब 10 अप्रेल 1718 को चूड़ामन तथा रूपा को बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो खानजहाँ बहादुर सैयद मुजफ्फर खाँ ने जीत का समस्त श्रेय स्वयं बटोर लिया और सवाई जयसिंह हाथ मलता ही रह गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फर्रुखसीयर की हत्या

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फर्रुखसीयर की हत्या

सैयद बन्धु फर्रूखसियर को अनुभवहीन जानकर उसे अपने हाथों की कठपुतली बनाकर रखना चाहते थे किंतु जब फर्रुखसीयर ने सैयद बंधुओं के इशारों पर नाचने से मना कर दिया तो उन दोनों दुष्टों ने बादशाह फर्रुखसीयर की हत्या करने का षड़यंत्र रचा।

फर्रूखसियर सैयद बन्धुओं के सहयोग से बादशाह बना था। इसलिये उसने सैयद अब्दुल्ला को अपना वजीर तथा सैयद हुसैन अली को बख्शी नियुक्त किया था। इन दोनों भाईयों ने बादशाह को अपने अहसानों के बदले दबा हुआ जानकर सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथों में ले लिए।

सैयद बन्धु फर्रूखसियर को अनुभवहीन जानकर उसे अपने हाथों की कठपुतली बनाकर रखना चाहते थे। जबकि फर्रूखसियर ने सत्तासीन होते ही सैयद बन्धुओं के प्रभाव से बाहर निकलने के प्रयास आरम्भ कर दिए। बादशाह ने मीर जुमला, निजाम-उल-मुल्क तथा इनायतउल्ला कश्मीरी का सहयोग प्राप्त किया किंतु ये लोग सैयद बंधुओं का कुछ नहीं बिगाड़ सके।

अतः फर्रूखसियर ने सैयद बंधुओं से छुटकारा पाने के लिए एक योजना बनाई। उसने ई.1719 में बड़े सैयद अर्थात् हुसैन अली खाँ को दक्षिण का सूबेदार बनाकर भेज दिया ताकि उसे दक्षिण के नायब सूबेदार दाऊद खाँ के हाथों मरवाया जा सके।

इसके साथ ही फर्रूखसियर ने दिल्ली में रह रहे छोटे सैयद अर्थात् अब्दुल्ला खाँ को मरवाने का षड्यन्त्र किया। किसी तरह अब्दुल्ला खाँ को इस षड़यंत्र की जानकारी हो गई और उसने अपने बड़े भाई सैयद हुसैन अली को संदेश भिजवाया कि वह दाऊद खाँ से सतर्क रहे तथा मराठों से सहायता लेकर दिल्ली पर आक्रमण करे।

यह संदेश पाकर सैयद हुसैन ने दाऊद खाँ को मार डाला तथा मराठों से संधि करके उन्हें अपने पक्ष में कर लिया। इसके बाद सैयद हुसैन अली 15,000 मराठा सैनिकों तथा स्वयं अपनी सेना लेकर दिल्ली आ धमका।

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हालांकि महाराजा अजीतसिंह की पुत्री इंद्रकुंवरि का विवाह फर्रूखसियर से हुआ था तथापि जोधपुर नरेश अजीतसिंह ने धूर्त फर्रूखसियर का साथ नहीं दिया। महाराजा अजीतसिंह आरम्भ से ही सैयद बंधुओं के साथ था। इसी प्रकार जाट नेता चूड़ामन को फर्रूखसियर ने अपना मनसबदार तथा जटवाड़ा क्षेत्र की राहदारी का अधिकार दिया था किंतु उसने भी संकट की इस घड़ी में धूर्त फर्रूखसियर का साथ न देकर सैयद बंधुओं का साथ दिया।

इस समय आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह फर्रूखसियर के पक्ष में था। फर्रूखसियर ने जयसिंह के माध्यम से सैयदों से संधि करने का प्रयास किया किंतु सैयदों ने किसी भी तरह की बात करने से मना कर दिया। इस पर जयसिंह ने बादशाह से कहा कि मेरे पास बीस हजार राजपूत सैनिक हैं, यदि आप चाहें तो मैं अभी सैयदों पर आक्रमण करके उन्हें समाप्त करने का अंतिम प्रयास कर सकता हूँ तथा अपनी अंतिम सांस रहते आपके लिए लड़ने के लिए तैयार हूँ किंतु बादशाह इसके लिए तैयार नहीं हुआ।

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महाराजा सवाई जयसिंह की इच्छा थी कि बादशाह फर्रूखसियर तथा उसके सहायक कायरता दिखाने की बजाए लड़ते हुए मरें तो ज्यादा उचित है। जब सैयद बंधुओं को ज्ञात हुआ कि महाराजा जयसिंह बादशाह की रक्षा करने के लिए लड़ने-मरने के लिए तैयार है तो सैयदों ने बादशाह को संदेश भिजवाया कि यदि आप हमसे सुलह करना चाहते हैं तो महाराजा जयसिंह तथा बूंदी के राव बुद्धसिंह को दिल्ली से विदा कर दें।

भयभीत फर्रूखसियर ने अपने हाथों से पत्र लिखकर महाराजा जयसिंह और राव बुद्धसिंह को आदेश भिजवाए के वे इसी समय दिल्ली छोड़कर अपने राज्यों में चले जाएं। इस पर इन दोनों राजाओं ने दिल्ली से प्रस्थान कर दिया। अब सैयदों को किसी तरह का भय नहीं रहा। उन्होंने फर्रुखसीयर की हत्या करने का निश्चय किया।

27 फरवरी 1719 को कुतुबुलमुल्क अर्थात् सैयद हुसैन अली खाँ ने लाल किले में प्रवेश किया। कोटा नरेश भीमसिंह हाड़ा, जोधपुर नरेश अजीतसिंह राठौड़ तथा जाटों का नेता चूड़ामन भी उसके साथ किले में गए।

उन्होंने लाल किले में नियुक्त शाही गोलंदाजों और पहरेदारों को हटाकर अपने विश्वसनीय सिपाही तैनात कर दिए। इस प्रकार लाल किले पर मुसलमानों एवं राजपूतों ने कब्जा कर लिया और दिल्ली शहर में मराठों को तैनात किया गया। हर गली एवं हर मोड़ पर मराठा घुड़सवार दिखाई देने लगे। मराठों को दिल्ली की गलियों में देखकर दिल्ली की जनता सहम गई। इससे पहले दिल्ली में मराठा सैनिक कभी नहीं देखे गए थे।

बादशाह के गुप्तचर उसे लाल किले तथा दिल्ली के समाचार पहुंचा रहे थे। मराठों के आगमन की सूचना से फर्रूखसियर समझ गया कि अब मामला उसके हाथों से पूरी तरह निकल गया है। शाम के समय फर्रूखसियर ने सैयद बंधुओं को संदेश भिजवाया कि वह सैयदों की समस्त शर्तें स्वीकार करने को तैयार है किंतु सैयदों ने बादशाह के संदेश का कोई उत्तर नहीं दिया। वे तो फर्रुखसीयर की हत्या करने का निश्चय कर चुके थे।

इस पर फर्रूखसियर ने जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह को लिखा कि यमुना की तरफ महल की पूर्वी बाजू पर सैयदों का पहरा नहीं है। यदि आप अपने कुछ आदमी वहाँ बैठा दें तो मैं उधर की तरफ से लाल किले से बाहर निकल जाउंगा।

फर्रूखसियर सोचता था कि महाराजा अजीतसिंह उसका श्वसुर है, इसलिए वह फर्रुखसीयर की हत्या नहीं करेगा, उल्टे उसकी सहायता करेगा किंतु वह यह नहीं सोच पाता था कि महाराजा अजीसिंह ने अपनी इच्छा से अपनी पुत्री बादशाह से नहीं ब्याही थी, इसलिए अजीतसिंह सहायता क्यों करेगा!

बादशाह ने महाराजा को विवश करके उसकी पुत्री से विवाह किया था। इसलिए महाराजा ने फर्रूखसियर की जरा भी परवाह नहीं की तथा उसे उत्तर भिजवाया कि अब बहुत देर हो चुकी है, मैं क्या कर सकता हूँ? इस पत्र-व्यवहार की खबर सैयदों तक भी पहुंच गई। इसलिए उन्होंने लाल किले की पूर्वी दिशा में भी अपना पहरा बैठा दिया।

सैयद बंधुओं ने बादशाह को अपने हरम से बाहर आने के लिए कहलवाया किंतु बादशाह हरम से बाहर नहीं आया। इस पर सैयदों ने राजा रत्नचंद्र, राजा बख्तमल, नजमुद्दीन अली खाँ और दिलदार खाँ के नेतृत्व में 400 पठानों को अंतःपुर में घुसने और फर्रूखसियर को पकड़कर लाने के आदेश दिए।

जब ये लोग बादशाह के हरमखाने में घुसे तो सशस्त्र तुर्की स्त्रियों ने इन पर हमला कर दिया। देखते ही देखते दोनों ओर से तलवारें चलने लगीं और समस्त सशस्त्र तुर्की स्त्रियां मार दी गईं।

फर्रूखसियर एक छोटे से कमरे में छिपा हुआ था। जब उसका दरवाजा तोड़ा गया तो वह अपने जीवन से निराश होकर तलवार हाथ में लेकर बाहर आया और पठान सैनिकों पर वार करने लगा। जब बादशाह पठानों के वार से घायल हो गया तो बादशाह की बेगमों और बेटियों ने उसे घेर लिया और वे शत्रु सैनिकों के पैरों में गिर कर बादशाह के प्राणों की भीख मांगने लगीं।

सिपाहियों ने इन औरतों को एक ओर धकेल दिया तथा बादशाह को घसीटकर उसके हरम से बाहर ले आए। फर्रूखसियर को हरम से नंगे सिर तथा नंगे पैरों घसीटते हुए, गालियां देते हुए एवं पीटते हुए निकाला गया तथा अन्धा करके कैद में डाल दिया गया।

हरम पर हमला करने गए पठानों ने हरमखाने की बेगमों के सोने-चांदी तथा हीरे मोतियों के आभूषण उतार लिए। उनके सोने, चांदी, ताम्बे और पीतल के बरतन लूट लिए। बादशाह की रखैलों एवं दासियों को पठान सैनिक सामान की तरह उठाकर ले गए।

महाराजा अजीतसिंह के कहने पर सैयद बंधुओं ने महाराजा की पुत्री इंद्रकुंवरि महाराजा को सौंप दी। महाराजा अजीतसिंह ने पिछले तीन दिन से लाल किले के दीवाने आम में अपना आवास बना रखा था। वह वहीं पर घण्टों और शंख-ध्वनियों के बीच हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा कर रहा था।

राजकुमारी इंद्रकुंवरि ने अपने पिता की सुरक्षा में आकर, मुसलमानी कपड़े त्याग दिए तथा अपनी शुद्धि करवाकर हिन्दू पोशाक पहन ली। वह लगभग एक करोड़ रुपए की सम्पत्ति लेकर अपने पिता के साथ जोधपुर चली गई। इससे कट्टर मुसलानों में बड़ा असंतोष हुआ किंतु सैयदों को इस समय महाराजा के सहयोग की अत्यंत आवश्यकता थी। इसलिए वे चुप रहे।

फर्रूखसियर को कोठरी में बंद कर दिए जाने के बाद शहजादे रफीउद्दरजात को बादशाह घोषित कर दिया गया। कुछ दिनों बाद गला घोंटकर फर्रुखसीयर की हत्या कर दी गई। ठीक वैसे ही, जैसे कुछ साल पहले ई.1713 में फर्रूखसियर ने अपने ताऊ जहांदारशाह को इसी लाल किले में इसी प्रकार मार डाला था।

लाल किले ने मुगल शहजादों की कई बार ऐसी दुर्गति होती हुई देखी थी किंतु अब लाल किला मुगल बादशाहों की भी वैसी ही दुर्गति होते हुए देख रहा था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सैयद बन्धु

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सैयद बन्धु

सैयद बन्धु ईरान से आए हुए शिया मुसलमान थे। विगत कुछ वर्षों में लाल किले की कमजोर का फायदा उठाकर वे अत्यंत शक्तिशाली हो गए थे। वे मुगल बादशाहों को कीड़े-मकोड़ों की तरह मारने लगे!

अब तक सैयद बन्धु दो मुगल बादशाहों अर्थात् जहांदारशाह और फर्रूखसियर के प्राण ले चुके थे। इनमें से जहांदारशाह औरंगजेब के पुत्र बहादुरशाह का बेटा था जबकि फर्रूखसियर बहादुरशाह के दूसरे पुत्र अजीमुश्शान का बेटा था। अब सैयद बन्धु की दृष्टि शहजादे रफी-उद्-दरजात पर गई।

रफी-उद्-दरजात का जन्म 1 दिसम्बर 1699 को हुआ था। पाठकों का याद होगा कि औरंगजेब के पुत्र बहादुरशाह के चार पुत्रों में से सबसे छोटे पुत्र का नाम रफी-उस्-शान था जिसे बहादुरशाह के पुत्र अजीम-उस्-शान ने ई.1712 में उत्तराधिकार के युद्ध में मार डाला था।

रफी-उस्-शान के कई पुत्र थे जिनमें से तीसरे पुत्र का नाम रफी-उद्-दरजात था। वह भारत के मुगलों के तख्त पर बैठने वाला दसवां बादशाह था। 28 फरवरी 1719 को उसे बादशाह बनाया गया। जब रफी-उद्-दरजात को तख्त पर बैठाने के लिए ले जाया गया, तब उसकी माता फूट-फूटकर रो रही थी। क्योंकि वह जानती थी कि दुष्ट सैयद बन्धु जिस तरह जहांदारशाह तथा फर्रूखसियर को मार चुके थे, एक दिन वे रफी-उद्-दरजात को भी मार डालेंगे।

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रफी-उद्-दरजात राजयक्ष्मा अर्थात् ‘टुबरकुलोसिस’ का मरीज था और किसी भी कीमत पर बादशाह नहीं बनना चाहता था किंतु जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह तथा जाटों के नेता चूड़ामन ने रफी-उद्-दरजात का एक-एक हाथ पकड़ा तथा उसे हिम्मत बंधाते हुए उसी तख्ते ताउस पर बैठा दिया जिस पर कभी शाहजहाँ और औरंगजेब बैठा करते थे।

महाराजा अजीतसिंह के आग्रह पर बादशाह रफीउद्दरजात ने हिन्दुओं पर से जजिया उठा लिया तथा हिन्दू तीर्थों को सब प्रकार की बाधाओं से मुक्त कर दिया। चूंकि फर्रूखसियर को तख्ते ताउस से उतारने में कोटा नरेश भीमसिंह, जोधपुर नरेश अजीतसिंह, जाटों के नेता चूड़ामन, राजा रत्नचंद्र, राजा बख्तमल तथा मराठों का बहुत बड़ा हाथ था, इसलिए मुसमान अमीर सल्तनत में से जजिया के हटाए जाने पर चुप रहे।

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पाठकों को स्मरण होगा कि सैयद बन्धु ने फर्रूखसियर से कहकर आम्बेर नरेश जयसिंह तथा बूंदी नरेश बुद्धसिंह को अपने-अपने राज्यों में चले जाने के आदेश दिलवाए थे। अभी ये दोनों राजा मार्ग में ही थे कि उन्हें फर्रूखसियर की हत्या हो जाने के समाचार मिले। इस पर इन दोनों राजाओं की स्थिति बड़ी विचित्र हो गई। अब तक मुगल बादशाह के दरबार में इन्हीं दोनों की तूती बोलती थी और ये दोनों राजा ही बादशाह के बड़े मित्र माने जाते थे किंतु अब वे अचानक ही मुगलिया राजनीति के हाशिए पर फैंक दिए गए थे। सवाई जयसिंह को लगा कि फर्रूखसियर को हटाने के बाद सैयद बंधु जयसिंह को भी तंग करेंगे। इसलिए आम्बेर नरेश ने एक त्वरित योजना तैयार की।

जयसिंह ने आगरा के किलेदार मित्रसेन को संदेश भिजवाया कि वह शहजादे नेकूसीयर को जेल से निकालकर बादशाह घोषित कर दे। मैं तेरी सहायता के लिए आगरा आ रहा हूँ। पाठकों को स्मरण होगा कि नेकूसीयर औरंगजेब के विद्रोही पुत्र अकबर का सबसे छोटा बेटा था। जब ई.1687 में अकबर महाराष्ट्र से ईरान भाग गया था तब अकबर का दो साल का बेटा नेकूसीयर आगरा के मुगलिया हरम में ही छूट गया था। तब से औरंगजेब ने इसे आगरा में बंदी बना रखा था।

मित्रसेन एक ब्राह्मण वैद्य था तथा अपनी योग्यता के बल पर उन्नति करता हुआ आगरा के किलेदार के पद पर जा पहुंचा था। वह आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह का विश्वसनीय व्यक्ति था। इसलिए मित्रसेन ने सवाई जयसिंह का संदेश मिलते ही 18 मई 1719 को नेकूसीयर को जेल से बाहर निकाल कर आगरा के लाल किले में उसका राज्याभिषेक करवाया।

नेकूसीयर ने बादशाह बनने के बाद किलेदार मित्रसेन को राजा बीरबल की पदवी दी तथा उसे सात हजारी मनसबदार बनाया। नेकूसीयर ने लाल किले में नियुक्त कर्मचारियों एवं सिपाहियों को अपने प्रति निष्ठावान बनाने के लिए शाही कोष से एक करोड़ रुपया निकालकर उनमें वितरित करवाए।

इसके बाद नेकूसीयर के आदेश से आगरा में स्थित गैरत खाँ के मकान पर गोलीबारी आरम्भ कर दी गई। गैरत खाँ आगरा सूबे का नाजिम था तथा सैयदों का विश्वस्त था। उसने नेकूसियर के सैनिकों का सामना किया तथा आगरा की समस्त गतिविधियों के समाचार सैयद बंधुओं को लिखकर भिजवा दिए।

सैयद हुसैन अली खाँ कोटा नरेश भीमसिंह तथा जाटों के नेता चूड़ामन को अपने साथ लेकर आगरा का विद्रोह दबाने के लिए रवाना हो गया। इन लोगों ने 23 जून 1719 को दिल्ली से प्रस्थान किया और कुछ ही दिनों में आगरा पहुंचकर लाल किले को घेर लिया। 12 अगस्त 1719 को नेकूसीयर तथा मित्रसेन ने आत्मसमर्पण कर दिया।

इस प्रकार केवल तीन माह के लिए ही सही किंतु नेकूसीयर मुगलों का बादशाह हुआ। भले ही वह दिल्ली के तख्त पर न बैठा हो किंतु आगरा के लाल किले में उसकी विधिवत् ताजपोशी हुई थी। यदि वंशावली के हिसाब से देखा जाए तो मुगलों के तख्त पर रफीउद्दरजात की बजाय नेकूसीयर का अधिकार पहले था क्योंकि वह औरंगजेब का पौत्र था जबकि रफीउद्दरजात औरंगजेब का प्रपौत्र था। इन दोनों में से किसी का भी पिता बादशाह नहीं बना था।

जब किलेदार मित्रसेन ने आगरा में नेकूसीयर की ताजपोशी की तब सवाई राजा जयसिंह भी एक सेना लेकर आगरा की तरफ बढ़ा किंतु जब वह टोडा पहुंचा तो उसे आगरा में नेकूसीयर तथा मित्रसेन की पराजय के समाचार मिले, इसलिए वह पुनः आम्बेर लौट गया। महाराजा जयसिंह ने इलाहाबाद के सूबेदार छबेलाराम को भी सेना लेकर आगरा पहुंचने के लिए लिखा था किंतु उस समय इलाहाबाद सूबे में एक बड़ा विद्रोह चल रहा था और छबेलाराम की सेना वहाँ व्यस्त थी, इसलिए छबेलाराम भी नेकूसीयर की सहायता के लिए नहीं पहुंच सका।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार नेकूसीयर ने आगरा से निकल भागने के लिए चूड़ामन से गुप्त संधि की तथा उसने नेकूसीयर को सुरक्षित रूप से आम्बेर राज्य में पहुंचा देने का वचन दिया किंतु जब नेकूसीयर पचास लाख रुपये तथा अपने भतीजे मिर्जा असगरी को साथ लेकर चूड़ामन के साथ किले से बाहर निकला तो चूड़ामन ने नेकूसीयर को पकड़कर सैयद हुसैन अली खाँ को सौंप दिया तथा रुपये अपने पास रख लिये।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार कोटा के महाराजा भीमसिंह ने नेकूसीयर को बंदी बनाकर फिर से लाल किले की उसी जेल में डाल दिया। कुछ दिन बाद नेकूसीयर को दिल्ली के सलीमगढ़ दुर्ग की जेल में भेज दिया गया। यह भाग्यहीन शहजादा जीवन भर जेल में ही पड़ा रहा और 11 मार्च 1723 को जेल में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ।

जिस समय सैयद बन्धुओं ने फर्रूखसियर को तख्त से उतार कर रफी-उद्-दरजात को बादशाह बनाया था, उस समय रफीउद्दरजात की आयु केवल 20 वर्ष थी किंतु वह राजयक्ष्मा अर्थात् ‘टुबरकुलोसिस’ का मरीज था। उसे अपनी मौत नजदीक आती हुई दिखाई दे रही थी। अतः तीन महीने बाद उसने सैयद बंधुओं से कहा कि मुझे हटाकर मेरे बड़े भाई रफीउद्दौला को बादशाह बना दो।

इस पर 4 जून 1719 को रफी-उद्-दरजात के बड़े भाई रफी-उद्-दौला को तख्त पर बैठाया गया। इसके 7 दिन बाद अर्थात् 11 जून 1719 को आगरा के लाल किले में रफी-उद्-दरजात की मृत्यु हो गई। उसने केवल तीन माह नौ दिन राज्य किया।

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि संभवतः सैयद बंधुओं ने आगरा में रफी-उद्-दरजात की हत्या कर दी ताकि वह भविष्य में कभी भी सैयद बंधुओं के लिए खतरा न बन सके। उसका शव दिल्ली लाया गया और महरौली में ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह के निकट दफना दिया गया।

नया बादशाह अर्थात् रफीउद्दौला अपने भाई रफी-उद्-दरजात से केवल 18 माह बड़ा था। सैयद बंधु उसे बादशाह नहीं बनाना चाहते थे किंतु परिस्थितियों ने सैयदों को विवश कर दिया था कि वे रफीउद्दौला को बादशाह बनाएं। रफीउद्दौला ने शाहजहाँ की उपाधि धारण की। मुगलों के इतिहास में उसे शाहजहाँ (द्वितीय) भी कहा जाता है।

सैयद बन्धु ने नए बादशाह के चारों ओर अपने गुप्तचर नियुक्त कर दिए तथा उसकी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखने लगे। उसे किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थी। वह जुम्मे की नमाज में शामिल नहीं हो सकता था। यहाँ तक कि सैयद बन्धु के सिपाही बादशाह के कपड़ों और भोजन का भी निरीक्षण किया करते थे।

पूर्ववर्ती बादशाह की तरह नया बादशाह भी राजयक्ष्मा का रोगी था, साथ ही अफीम के सेवन का आदी था। बादशाह बनने के बाद उसने अफीम छोड़ने का प्रयास किया किंतु इस प्रयास में वह और अधिक बीमार हो गया। 18 सितम्बर 1719 को उसका भी निधन हो गया। उसनके केवल चार माह और 16 दिन ही राज्य किया। उसे भी महरौली में ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह के निकट दफना दिया गया।

कामवर खाँ ने आरोप लगाया है कि इन दोनों बादशाहों अर्थात् रफी-उद्-दरजात एवं रफीउद्दौला को सैयद बन्धु ने विष देकर मरवाया था। इस प्रकार सैयद बंधुओं ने पांच मुगल बादशाहों जहांदारशाह, फर्रूखसीयर, नेकूसीयर, रफीउद्दरजात तथा शाहजहाँ (द्वितीय) को कीड़े मकोड़ों की तरह मरवाया तथा शासन सूत्र अपने हाथों में रखकर निरंकुश शासन किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मदशाह रंगीला

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मुहम्मदशाह रंगीला

मुहम्मदशाह रंगीला मुगलिया इतिहास की कुछ ऐसी विस्मयकारी कथाओं का नायक बन गया है जो परीकथाओं जैसी प्रतीत होती हैं तथा मुगलों के नैतिक पतन की कहानी कहती हैं।

जब ईस्वी 1719 में बादशाह शाहजहाँ (द्वितीय) अर्थात् रफीउद्दौला मर गया तो सैयद बंधुओं ने नए बादशाह की तलाश आरम्भ की। इस बार उनकी दृष्टि शहजादे रौशन अख्तर पर पड़ी। वह मरहूम बादशाह बहादुरशाह (मुअज्जमशाह, शाहआलम प्रथम) के चौथे पुत्र जहानशाह मिर्जा का बेटा था।

रौशन अख्तर का जन्म 7 अगस्त 1702 को अफगानिस्तान के गजना नामक स्थान पर कुदसिया बेगम के पेट से हुआ था। उस समय रौशन अख्तर का पिता जहानशाह अपने पिता मुअज्जमशाह के साथ अफगानिस्तान के मोर्चे पर नियुक्त था।

सौभाग्य एवं दुर्भाग्य ने रौशन अख्तर के साथ अनोखा खेल खेला था। जब ईस्वी 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई तो रौशन अख्तर के बाबा मुअज्जमशाह ने जजाउ के युद्ध में अपने भाई आजमशाह को मारकर मुगलों के तख्त पर अधिकार कर लिया था किंतु जब ईस्वी 1712 में मुअज्जमशाह अर्थात् बहादुरशाह की मृत्यु हुई तो उसके बाद हुए उत्तराधिकार के युद्ध में रौशन अख्तर का पिता जहानशाह मिर्जा मार डाला गया।

उस समय रौशन अख्तर 12 साल का बालक था। उसके ताऊ जहांदारशाह ने बालक रौशन अख्तर को मारने का निर्णय लिया किंतु रौशन अख्तर इतना सुंदर एवं मासूम दिखता था तथा इतना हाजिर-जवाब था कि जहांदारशाह ने अपना निर्णय बदल दिया और रौशन अख्तर तथा उसकी माता को बंदी बना लिया।

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रौशन अख्तर की माता कुदसिया बेगम ने रौशन अख्तर को अच्छी शिक्षा दिलवाई थी। संभवतः इसलिए भी रौशन अख्तर ने अपने ताऊ जहांदारशाह के मन पर अच्छा प्रभाव डाला था। जब ईस्वी 1719 में फर्रूखसियर को गद्दी से उतारा गया तब रौशन अख्तर तथा उसकी माता कुदसिया बेगम को जेल से मुक्त कर दिया गया।

जब लगभग 8 माह की अवधि में रफीउद्दरजात और रफीउद्दौला नामक दो बादशाह मर गए अथवा मार डाले गए तब रौशन अख्तर का फिर से भाग्योदय हो गया। 29 सितम्बर 1719 को उसे ‘अबु अल फतेह नासिरूद्दीन रौशन अख्तर मुहम्मदशाह’ के नाम से बादशाह बनाया गया। भारत के इतिहास में उसे मुहम्मदशाह रंगीला के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

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दिल्ली के लाल किले में बड़ी धूमधाम से मुहम्मदशाह रंगीला की ताजपोशी की गई। उसकी माता को 15 हजार रुपए मासिक पेंशन स्वीकृत की गई। इस प्रकार बाल्यकाल में ही जीवन के कई उतार-चढ़ाव देख चुका रौशन अख्तर ईस्वी 1719 में केवल 17 साल की आयु में मुहम्मदशाह रंगीला के नाम से मुगलों के तख्त पर बैठा। उसके तख्त पर बैठते ही सैयद बंधुओं ने अपना पुराना खेल आरम्भ कर दिया। वे बादशाह के हरम से लेकर उसके दरबार तक कड़ा पहरा रखते थे और बादशाह की ओर से लिए जाने वाले समस्त निर्णय स्वयं लेते थे।

इधर मुहम्मदशाह रंगीला भी अत्यंत महत्वाकांक्षी युवक था। उसके लिए यह संभव नहीं था कि बादशाह जैसे सर्वोच्च पद पर बैठकर वह अपने ही अमीरों का नियंत्रण स्वीकार करे। अतः उसने तख्त पर बैठते ही सबसे पहला काम उन तरीकों को तलाशने का किया जिनसे सैयद बंधुओं को मारा जा सके। इस समय सैयद हुसैन अली खाँ सल्तनत के मुख्य सेनापति के पद पर कार्य कर रहा था और उसका छोटा भाई अब्दुल्ला खाँ सल्तनत का प्रधानमंत्री था।

मुहम्मदशाह के सौभाग्य से इस समय तूरानियों का गुट भी बहुत प्रबल था जो कि सैयद बंधुओं द्वारा अब तक किए गए कार्यों से बहुत नाराज था।

इस समय तूरानी गुट में कमरूद्दीन खाँ तथा जैनुद्दीन अहमद खाँ आदि अमीरों का बोलबाला था। इन लोगों ने मुहम्मदशाह रंगीला को तो बादशाह स्वीकार कर लिया किंतु सैयद बंधुओं के प्रबल विरोधी हो गए। मुहम्मदशाह भी सैयदों के प्रति समर्पित न रहकर सैयदों के विरोधी अमीरों अर्थात् तूरानी गुट के साथ हो गया।

सैयदों को सबसे अधिक खतरा चिनकुलीच खाँ से था। इसलिए उन्होंने चिनकुलीच खाँ को मालवा का सूबेदार नियुक्त करके दिल्ली से दूर भिजवा दिया। चिनकुलीच खाँ का वास्तविक नाम कमरूद्दीन खाँ था। उसे औरंगजेब ने चिनकुलीच खान की, फर्रूखसियर ने निजामुलमुल्क फतेहजंग की तथा मुहम्मदशाह ने आसफजाह की उपाधियां दी थीं। इसलिए इतिहास की पुस्तकों में चिनकुलीच खां के अलग-अलग नाम मिलते हैं।

सैयद बंधुओं ने चिनकुलीच खाँ को फर्रूखसियर के समय से ही तंग करना आरम्भ कर दिया था। फर्रूखसियर के काल में सैयद बंधुओं ने चिनकुलीच खाँ को दक्षिण में सूबेदार बनाकर भेजा था। चिनकुलीच खाँ छः माह ही दक्षिण में सूबेदारी कर सका था कि सैयद बंधुओं ने उसका स्थानांतरण मुरादाबाद कर दिया तथा उसके स्थान पर सैयद हुसैन अली को नियत कर दिया।

चिनकुलीच खाँ दक्षिण से चल पड़ा तथा बादशाह फर्रूखसियर से अनुमति प्राप्त करके कुछ दिन के लिए दिल्ली आ गया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि फर्रूखसियर ने ही चिनकुलीच खाँ को दिल्ली आने के लिए लिखा था ताकि सैयद बंधुओं का दमन किया जा सके।

जब चिनकुलीच खाँ दिल्ली में ही था कि अब्दुल्ला खाँ ने चिनकुलीच खाँ को मुरादाबाद की जगह बिहार का सूबेदार बना दिया तथा उसे पटना जाने के आदेश दिए। अभी चिनकुलीच खाँ दिल्ली से रवाना भी नहीं हुआ था कि सैयद बंधुओं ने बादशाह फर्रूखसियर की हत्या कर दी। इससे चिनकुलीच खाँ सैयदों पर नाराज हुआ तथा पटना जाने की तैयारी करने लगा।  

सैयद बंधुओं ने उसे बिहार भेजना ठीक नहीं समझा अपितु उसे मालवा की सूबेदारी सौंप दी गई। इस बार चिनकुलीच खाँ ने अब्दुल्ला खाँ को लिखा कि वह एक शर्त पर मालवा जाएगा कि उसे वहाँ से हटाया नहीं जाए। अब्दुल्ला खाँ ने चिनकुलीच खाँ को आश्वस्त किया कि उसे मालवा से जल्दी नहीं हटाया जाएगा। वह मालवा पहुंचकर विद्रोहियों पर नियंत्रण स्थापित करे।

इस पर चिनकुलीच खाँ ने सैयद बंधुओं के आदेश पर मालवा की ओर प्रस्थान कर दिया। जब वह मालवा के लिए जा रहा था तब मार्ग में उसे बादशाह मुहम्मद शाह की माँ कुदसिया बेगम का गुप्त पत्र मिला जिसमें लिखा था कि चिनकुलीच खाँ दुष्ट सैयदों के मंसूबों को सफल नहीं होने दे और सैयदों के विनाश का प्रबंध करे। इस पत्र को पढ़कर चिनकुलीच खाँ का उत्साह बढ़ गया। उसे अपने जीवन के लिए एक मजबूत लक्ष्य मिल गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सैयद बंधुओं की हत्या

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सैयद बंधुओं की हत्या

सैयद बंधु फर्रुखसीयर के समय से ही लाल किले में बादशाहों का कत्ल करते आ रहे थे और अब तक कई बादशाहों को कीड़े-मकोड़ों की तरह मार चुके थे। इसलिए नए बादशाह को लगा कि जब तक सैयद बंधुओं की हत्या नहीं की जाएगी, बादशाह का जीवन सुरक्षित नहीं है।

जब मुहम्मदशाह रंगीला भारत का बादशाह बन गया तब सैयद बंधुओं ने मालवा की तरफ हो रहा विद्रोह कुचलने के लिए चिनकुलीच खाँ को मालवा का सूबेदार बनाया तथा उसे मालवा जाने का आदेश दिया।

चिनकुलीच खाँ ने सैयद बंधुओं के आदेश से मालवा की ओर प्रस्थान किया किंतु मार्ग में उसे बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला की माँ कुदसिया बेगम का पत्र मिला कि वह सैयद बंधुओं की हत्या का प्रबंध करे। इसलिए चिनकुलीच खाँ ने मालवा पहुंचते ही नई सेना की भर्ती आरम्भ कर दी तथा असीरगढ़ दुर्ग के किलेदार को रिश्वत देकर दुर्ग पर पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद चिनकुलीच खाँ ने बुरहानपुर के दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया।

जब सैयद बंधुओं को चिनकुलीच खाँ की कार्यवाहियों के बारे में ज्ञात हुआ तो सैयदों ने दिलावर खाँ के नेतृत्व में दिल्ली से एक सेना चिनकुलीच खाँ के विरुद्ध भेजी। कोटा नरेश भीमसिंह को भी चिनकुलीच खाँ पर आक्रमण करने के निर्देश दिए। महाराव भीमसिंह को सैयदों की ओर से आश्वासन दिया गया कि इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद महाराव को सात हजारी मनसब दिया जाएगा। इसी तरह नरवर के राजा गजसिंह को भी महाराव भीमसिंह के साथ युद्ध में जाने के आदेश दिए गए।

सैयदों ने दोस्त मुहम्मद खाँ रूहेला को भी साढ़े तीन हजार घुड़सवारों के साथ चिनकुलीच खाँ पर चढ़ाई करने के लिए रिवाना कर दिया। कोटा नरेश भीमसिंह तेरह हजार घुड़सवारों के साथ चिनकुलीच खाँ के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए रवाना हो गया। जब उत्तर भारत में स्थित मुगलों की सेनाएं मालवा की तरफ रवाना हुईं तो चिनकुलीच खाँ उज्जैन से कुछ दूरी पर स्थित पन्धार नामक स्थान पर मोर्चा बांधकर बैठ गया।

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सैयद बंधु किसी भी कीमत पर चिनकुलीच खाँ को कुचल देना चाहते थे ताकि बादशाह मुहम्मद शाह को अपने नियंत्रण में लेकर उसे दण्डित किया जा सके। इसलिए सैयदों ने दक्षिण भारत के नायब सूबेदार आलम अली खाँ को भी चिनकुलीच खाँ पर अभियान करने के निर्देश भेज दिए।

सैयदों का अनुमान था कि चिनकुलीच खाँ दोनों तरफ से आने वाली मुगल सेनाओं के बीच में पिस जाएगा किंतु चिनकुलीच खाँ की तैयारी पूरी थी। बादशाह की माता का समर्थन मिल जाने से उसके पास नैतिक शक्ति भी थी और वह पूरे उत्साह में था।

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 19 जून 1720 को पन्धार में दोनों पक्षों के बीच भयानक युद्ध हुआ। सैयदों की सेना का मुख्य सेनापति दिलावर खाँ रणक्षेत्र में ही छाती में गोली लग जाने से मारा गया। कोटा का राजा भीमसिंह इस युद्ध में हाथी पर बैठकर लड़ रहा था। वह भी थोड़ी ही देर में तोप का गोला लग जाने से मारा गया। राजा गजसिंह भी इस युद्ध में हाथी पर बैठकर लड़ रहा था। जब उसने देखा कि सैयदों का प्रधान सेनापति अपने सैयद सिपाहियों के साथ बुरी तरह काट डाला गया है तथा महाराव भीमसिंह भी वीरगति को प्राप्त हो गया है तो राजा गजसिंह हाथी से उतरकर घोड़े पर बैठ गया। अंत में वह चिनकुलीच खाँ की सेना के बहुत से सैनिकों को मारकर स्वयं भी रणखेत रहा।

इस प्रकार पन्धार के युद्ध में सैयदों की समस्त सेनाएं बुरी तरह परास्त हो गईं। दक्षिण का नायब सूबेदार हुसैन अली खाँ भी इस युद्ध में मारा गया। वह हुसैन अली खाँ का दत्तक पुत्र था। उसकी मृत्यु से सैयदों का दक्षिण में मुख्य स्तम्भ टूट गया। जब सैयद हुसैन खाँ की सेनाएं चिनकुलीच खाँ द्वारा परास्त कर दी गईं तो दिल्ली में बैठै एतमादुद्दौला, सआदत अली ख़ाँ और हैदर ख़ाँ ने सैयद बंधुओं की हत्या का षड्यंत्र रचा।

इस षड्यंत्र में बादशाह मुहम्मद शाह तथा बादशाह की माता भी शामिल हो गई। हैदर ख़ाँ ने हुसैन अली को मारने का बीड़ा उठाया। इसके बाद मुहम्मदशाह ने फतेहपुर सीकरी में दरबार का आयोजन किया। 9 अक्टूबर 1720 को जब हुसैन अली खाँ दरबार में एक याचिका पढ़ रहा था, उसी समय हैदर ख़ाँ ने हुसैन अली की छुरा मारकर हत्या कर दी। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि जब हुसैन अली खाँ बादशाह से मिलकर वापस जा रहा था, तब एक मुगल ने हुसैन अली खाँ की बगल में खन्जर घुसा दिया तथा दूसरे मुगल ने हुसैन अली खाँ के पैर खींचकर उसे पालकी से नीचे गिरा दिया और छाती पर चढ़कर उसका सिर काट डाला।

इस हत्या पर टिप्पणी करते हुए इतिहासकार इर्विन ने ‘लेटर मुगल्स’ में लिखा है कि ‘भारतीय कर्बला में दूसरे याज़ीद ने दूसरे हुसैन को शहीद कर दिया।’ इसके पश्चात् बादशाह मुहम्मदशाह ने स्वयं को समस्त सेनाओं का मुख्य सेनापति घोषित कर दिया।

सैयद हुसैन अली खाँ का सिर काटकर उसके छोटे भाई अब्दुल्ला खाँ को भेज दिया गया तथा अब्दुल्ला खाँ को निर्देश दिए गए कि वह तुरंत बादशाह की सेवा में हाजिर हो किंतु अब्दुल्ला खाँ बादशाह के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ। अब्दुल्ला ख़ाँ ने अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए एक विशाल सेना एकत्रित की तथा मुहम्मद शाह के स्थान पर रफ़ी-उस-शान के पुत्र मुहम्मद इब्राहीम को बादशाह घोषित कर दिया।

इस पर बादशाह मुहम्मदशाह ने मुहम्मद अमीन खाँ तूरानी को आठ हजार का मनसब प्रदान करके उसे प्रधानमंत्री सैयद हुसैन अली खाँ बारहा को कुचलने के लिए भेजा। उसके साथ मीर मुहम्मद अमीन ईरानी तथा मुहम्मद हैदर बेग आदि को भी भेजा गया।

13 नवम्बर 1720 को आगरा के निकट हसनपुर में बादशाह की सेना तथा अब्दुल्ला ख़ाँ के बीच घमासान युद्ध हुआ जिसमें अब्दुल्ला खाँ हार गया। उसे बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया गया। 2 वर्ष के बाद 11 अक्टूबर 1722 को विष देकर मार दिया गया। इस प्रकार दोनों सैयद बंधुओं की हत्या हो गई तथा लाल किले को दोनों सैयदों से छुटकारा मिल गया।

जिस शहजादे इब्राहीम मुहम्मद को अब्दुल्ला खाँ ने बादशाह घोषित किया था, उसे भी कैद कर लिया गया तथा उसकी 40 रुपए प्रतिदिन की पेंशन बांध दी गई। मुहम्मद शाह रंगीला ने बादशाह बनने के तीन साल के भीतर ही सैयद बंधुओं के क्रूर शिकंजे से छुटकारा पा लिया। सैयद बंधुओं की हत्या किए बिना उनसे छुटकारा पाना संभव नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मदशाह रंगीला का दरबार

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मुहम्मदशाह रंगीला का दरबार

मुहम्मदशाह रंगीला का दरबार संसार भर के शासकों के दरबारों से अलग था। संसार की समस्त रंगीनियाँ उस दरबार में सजी रहती थीं। यहाँ तक कि भरे दरबार में बादशाह स्वयं अपने नंगे चित्र बनाया करता था।

जब ई.1720 में बादशाह मुहम्मदशाह ने सैयद बंधुओं का सफाया कर दिया तो मुहम्मदशाह रंगीला निरंकुश शासक बन गया। उसने चिनकुलीच खाँ को अपना प्रधानमंत्री बना लिया तथा राज्य का सारा भार उस पर डालकर स्वयं रंगरेलियों में व्यस्त हो गया। मुहम्मदशाह को संगीत एवं नृत्यकला से बहुत प्रेम था। इस कारण लोगों ने उसका नाम ‘सदा रंगीला’ रख दिया था। मुगल इतिहास में उसे मुहम्मद शाह रंगीला भी कहा जाता है। उसके काल में मुगल सल्तनत का तेजी से ह्रास हुआ।

मुहम्मदशाह के साथ ही लाल किले की रंगीनियां फिर से लौट आईं। पाठकों को स्मरण होगा कि शाहजहाँ के काल में दिल्ली एवं आगरा के लाल किलों के भीतर गवैयों, नर्तकियों, भाण्डों, नक्कालों, हिंजड़ों, विदेशी शराब, इत्र, हीरे-मोती के आभूषण तथा रेशमी वस्त्रों के विक्रेताओं के झुण्ड मण्डराया करते थे किंतु जब औरंगजेब बादशाह हुआ तो उसने लाल किलों को इन समस्त रंगीनियों से मुक्त करवाया दिया था।

इटैलियन यात्री निकोलो मनूची ने औरंगजेब के काल का एक किस्सा लिखा है। वह लिखता है कि जब औरंगज़ेब ने संगीत पर पाबंदी लगाई तो गवैयों और संगीतकारों की रोज़ी-रोटी बंद हो गई। इससे तंग आकर एक हज़ार गवैयों, नचकैयों, वेश्याओं एवं भाण्डों आदि ने जुम्मे के दिन दिल्ली की जामा मस्जिद से ढोल-नगाड़ों एवं तुरहियों आदि संगीत यंत्रों का जनाजा निकाला तथा जोर-जोर से रोते-पीटते हुए औरंगजेब के सामने से निकले।

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औरंगज़ेब ने जनाजे में शामिल एक गवैये को अपने पास बुलाकर पूछा- ‘ये किसका जनाज़ा लिए जा रहे हो जिसकी ख़ातिर इस क़दर रोया पीटा जा रहा है?’

इस पर उस गवैये ने जवाब दिया- ‘बादशाह ने संगीत का क़त्ल कर दिया है, उसे दफ़नाने जा रहे हैं।’

औरंगज़ेब ने उससे कहा- ‘क़ब्र ज़रा ग़हरी खोदना।’

मुहम्मदशाह के तख्त पर बैठते ही वे सारे वाद्ययंत्र मानो कब्र से निकल कर फिर से जीवित हो गए थे और एक साथ ही मुहम्मदशाह रंगीला का दरबार उनसे आबाद हो गया था। लाल किलों की रंगीनियां एक बार फिर से पूरे जोर-शोर के साथ लौट आई थीं।

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उन्हीं दिनों ‘मरक़ए दिल्ली’ नामक एक पुस्तक लिखी गई जिसमें मुहम्मदशाह रंगीला का दरबार विस्तार से वर्णित है। इस पुस्तक को मुहम्मदशाह के दरबारी ‘दरगाह क़ली ख़ान’ ने लिखा था। इस पुस्तक के अनुसार- ‘इस काल की दिल्ली में एक ओर तो मुट्ठी भर शाही और धनी लोग थे जो सब तरह के ऐश और आराम की जिंदगी जी रहे थे और दूसरी ओर बहुत बड़ी संख्या में गरीब लोग थे जो भूख, लाचारी और बेबसी की जिंदगी जी रहे थे। वे दुर्भाग्य से अपना माथा पटकते थे और उन्हें पेट भर भोजन नहीं मिलता था। इस काल की दिल्ली में औलियाओं का बोलबाला था। गरीब लोग अपने दुर्भाग्य से पीछा छुड़ाने के लिए औलियाओं का दामन थामते थे जिनके पास भविष्य के काल्पनिक सुखों का आश्वासन देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं था।’

‘मरक़ए दिल्ली’ में आंहज़ोर के क़दम शरीफ़, क़दम गाह हज़रत अली, निज़ामुद्दीन औलिया का मक़बरा, कुतुब साहब की दरग़ाह और सैंकड़ों दरगाहों का उल्लेख किया गया है जहाँ उनके सामने मन्नतें मानने वालों एवं गिड़गिड़ाने वालों की भीड़ लगी रहती थी।

‘मरक़ए दिल्ली’ में लिखा है- ‘यहाँ औलिया कराम की इतनी क़ब्रें हैं कि उनसे बहार भी जल उठे। इन दरगाहों एवं कब्रों पर झाड़-फ़ानूस सजाए जाते हैं और महफ़िलें रोशन होती हैं।’

‘मरक़ए दिल्ली’ के लेखक दरग़ाह कली खान ने इस काल के अनेक संगीतकारों का वर्णन  किया है जो शाही दरबार से सम्बन्ध रखते थे। उनमें ‘अदा रंग’ और ‘सदा रंग’ सर्वाधिक विख्यात हैं जिन्होंने ख़याल-तर्ज़-ए-गायकी को नई ऊँचाइयां प्रदान कीं। ‘मरक़ए दिल्ली’ में कहा गया है- ‘सदा रंग जैसे ही अपने नाख़ून से साज़ के तार छेड़ता है दिलों से आह निकलने लगती है और जैसे ही उस के गले से आवाज़ निकलती है, लगता है बदन से जान निकल गई।’

उसी दौर की एक बंदिश आज भी गाई जाती है-

‘मुहम्मदशाह रंगीले सजना तुम बिन कारी बदरया, तन ना सुहाए।’

अर्थात्- हे मुहम्मदशाह रंगीले सजना, तुम्हारे बिना काले बादल हृदय को अच्छे नहीं लगते।

उस दौर में नूर बाई नामक वेश्या के कोठे के आगे शाही अमीरों और धनी लोगों की इतनी भीड़ लगती थी कि उनके हाथियों से दिल्ली की गलियों में जाम लग जाता था। जिसे आज की भाषा में ट्रैफिक जाम कहा जाता है।

मरक़ए दिल्ली में लिखा है- ‘जिस किसी को नूरबाई की महफ़िल का चस्का लगा उसका घर बर्बाद हुआ और जिस दिमाग़ में उसकी दोस्ती का नशा समाया वो बगुले की तरह चक्कर काटता रहता। एक दुनिया ने अपनी पूंजी खपा दी और अनगिनत लोगों ने उस काफ़िर की खातिर सारी दौलत लुटा दी।’

दरग़ाह क़ुली ख़ान ने एक और तवायफ़ अद बेग़म का हैरत अंगेज़ हाल लिखा है- ‘अद बेग़म दिल्ली की मशहूर बैग़म हैं जो पायजामा नहीं पहनती, बल्कि अपने बदन के निचले हिस्से पर पायजामों की तरह फूल-पत्तियां बना लेती हैं। ऐसी फूल-पत्तियां बनाती हैं जो बुने हुए रोमन थान में होती हैं। इस तरह वो अमीरों की महफ़िल में जाती हैं और कमाल ये है कि पायजामे और उस नक्क़ाशी में कोई फ़र्क़ नहीं कर पाता। जब तक उस राज़ से पर्दा ना उठे कोई उनकी कारीगरी को नहीं भांप सकता।’

उस काल के शाइर मीर तक़ी मीर ने तवायफ अद बेग़म की तारीफ करते हुए लिखा है-

‘जी फट गया है रश्क से चसपां लिबास के

क्या तंग जामा लिपटा है उसके बदन के साथ।’

मुहम्मदशाह अपने दिन की शुरुआत झरोखा दर्शन से करता था। उस समय शाही महल के झरोखे के सामने बटेरों या हाथियों की लड़ाइयां आयोजित की जाती थीं। हाथियों और बटेरों की लड़ाइयों से तंग आकर जनता ने झरोखा दर्शन के लिए आना बंद कर दिया। अमीरों को तो अपनी नौकरी करनी ही थी।

मुहम्मदशाह दोपहर के समय बाज़ीगरों, नटों, नक्क़ालों और भांडों की कलाओं से दिल बहलाता था। वह प्रति दिन संध्याकाल में एक पालकी पर बैठकर अपने बाज के साथ शाही उद्यान में घूमने जाता था। उसकी शामें नृत्य और संगीत से तथा रातें औरतों से रंगीन रहा करती थीं।

बादशाह को औरतों के कपड़े पहनने का बड़ा शौक था। इसलिए वह कई बार दरबार में भी औरतों के कपड़े पहनकर आता था। जनाना रेशमी पोशाक का स्पर्श बादशाह को मदहोश बनाए रखता था। उसके पांव में मोती जड़े जूते होते थे।

मुग़ल चित्रकारी जो औरंगज़ेब के दौर में मुरझा गई थी अब पूरी चमक के साथ सामने आई। उस दौर के विख्यात चित्रकारों में निधामल और चित्रमन के नाम शामिल हैं जिनके चित्र मुग़लिया चित्रकारी के सुनहरे दौर के कलाकारों के समकक्ष हैं।

मुहम्मदशाह कालीन मुगलिया चित्रशैली में हल्के रंगों का प्रयोग किया गया है। जहांगीर कालीन चित्रकला में चित्रों में पूरा फ्रेम खचाखच भर दिया जाता था जबकि मुहम्मदशाह के दौर में परिदृश्य में सादगी दिखाने और खाली स्थान रखने का रुझान पैदा हुआ।

कहा जाता है कि जब मुहम्मदशाह औरतों के कपड़ों में मुगलिया दरबार में आने लगा तो उसके बारे में लोगों ने अफवाह उड़ा दी कि बादशाह नपुंसक है। इस पर मुहम्मदशाह रंगीला ने स्वयं अपने नग्न चित्र बनाए जिनमें वह दूसरी स्त्रियों के साथ सहवास करता हुआ दिखाया जाता था। इन चित्रों में से कुछ चित्र आज भी भारत के संग्रहालयों में मौजूद हैं।

कुछ लेखकों ने लिखा है कि मुहम्मदशाह रंगीला, कई बार तो दरबार में बिना कपड़े पहने ही आता था और दरबारियों को भी नग्न होने के लिए कहता था ताकि लोग देख सकें कि बादशाह और उसके अमीर नामर्द नहीं हैं।

मुहम्मदशाह रंगीला का दरबार मुगलों के नैतिक एवं चारित्रिक पतन का सबसे ज्वलंत उदाहरण था किंतु लाल किले ने मुगलों के पतन के इससे भी भयंकर चित्र अतीत में देख रखे थे और कुछ वीभत्स दृश्य लाल किला शीघ्र ही देखने वाला था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बदनसिंह जाट

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बदनसिंह जाट

औरंगजेब के समय से लेकर मुहम्मदशाह रंगीला के समय तक ब्रज क्षेत्र के जाट काफी शक्तिशाली हो चुके थे। बदनसिंह जाट ने जाटों की सामरिक शक्ति को राजनीतिक शक्ति के रूप में बदल दिया। यही कारण था कि सवाई जयसिंह ने अपने हाथों से बदनसिंह जाट का राजतिलक किया!

सैयद बंधुओं का सफाया करने के बाद मुहम्मदशाह ने एक दरबार का आयोजन करके बादशाह के प्रति विश्वस्त लोगों का सम्मान किया तथा उन्हें नए पद एवं अधिकार दिए। इस अवसर पर उसने आम्बेर नरेश जयसिंह का भी खूब सम्मान किया। ऐसा लगता है कि मुहम्मदशाह ने तख्त पर बैठते समय जयसिंह के लिये एक विशेष भूमिका सोच रखी थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि ईस्वी 1717 में फर्रूखसियर ने महाराजा सवाई जयसिंह को चूड़ामन जाट के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए थूण दुर्ग पर आक्रमण करने के आदेश दिए थे किंतु अप्रैल 1718 में सैयद बंधुओं के विश्वसनीय खानजहाँ बहादुर सैयद मुजफ्फर खाँ ने जयसिंह को अंधेरे में रखकर चूड़ामन से संधि कर ली थी।

इस संधि के समय चूड़ामन जाट ने जितने वचन दिये थे, उनमें से एक भी पूरा नहीं किया था तथा सम्पूर्ण ब्रज क्षेत्र में जाटों की गतिविधियां अत्यंत बढ़ गई थीं जिनसे मुगल राजस्व को बहुत हानि हो रही थी। इस बीच चूड़ामन की मृत्यु हो गई तथा उसका पुत्र मोहकमसिंह जाटों का नेतृत्व करने लगा।

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चूंकि जाटों की गतिविधियों का केन्द्र मुगलों की राजधानी आगरा से लेकर जयपुर राज्य की सीमा के बीच स्थित था। इसलिये जयपुर नरेश ही जाटों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही में अधिक सफल हो सकता था। अतः ईस्वी 1722 में नए बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने सवाई जयसिंह को पुनः जाटों का दमन करने का काम सौंपा।

इस बार सवाई जयसिंह को अकेले ही इस अभियान की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई तथा उसे आगरा का सूबेदार नियुक्त किया गया ताकि वह जाटों के प्रभाव वाले पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण कर सके। जयसिंह अपने 14 हजार सैनिकों को साथ लेकर जाटों के विरुद्ध अभियान पर चल पड़ा।

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सवाई जयसिंह ने मोहकमसिंह जाट को थूण दुर्ग के भीतर घुस जाने पर विवश कर दिया तथा फिर तेजी से दुर्ग के चारों ओर का जंगल काटकर अपनी सेनाओं को दुर्ग के इतने निकट पहुंचा दिया कि दुर्ग की दीवारें तोपों की प्रहार सीमा में आ जायें। तीन सप्ताह तक जाटों ने जयसिंह का सामना किया। वे रात्रि में दुर्ग से बाहर निकलकर जयसिंह की सेनाओं पर आक्रमण करते और भाग जाते।

इस समय जाट नेताओं में फूट पड़ी हुई थी तथा चूड़ामन का भतीजा बदनसिंह, अपने चचेरे भाई मोहकमसिंह से नाराज चल रहा था। मोहकमसिंह एक धोखेबाज व्यक्ति था और उसने पारिवारिक सम्पत्ति में से अपने भाई जुलकरण तथा चचेरे भाई बदनसिंह को फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी। इसलिये बदनसिंह ने सवाई जयसिंह से सम्पर्क किया तथा उसे मोहकमसिंह की रणनीतिक कमजोरियां बताकर सोहगर और सांसनी की गढ़ियों पर महाराजा जयसिंह का अधिकार करवा दिया।

इस बीच मोहकमसिंह ने जोधपुर से भाड़े की सेना बुलवाई। जोधुपर का सेनापति विजयराज भण्डारी 23 अक्टूबर 1722 को जोबनेर तक पहुंच गया। जब जयसिंह को इस सेना के आने की जानकारी मिली तो उसने थूण दुर्ग पर दबाव बढ़ा दिया। मोहकमसिंह ने निराश होकर 7-8 नवम्बर 1722 की रात्रि में दुर्ग के भीतर बारूद में आग लगा दी और सारा खजाना लेकर भाग गया।

बदनसिंह ने महाराजा जयसिंह को समय रहते ही सूचित कर दिया कि आज रात को मोहकमसिंह दुर्ग के भीतर बारूद में आग लगायेगा। अतः सावधान रहें। इस पर महाराजा जयसिंह, अपनी सेना लेकर थूण गढ़ से दूर चला गया। इस कारण जब थूण दुर्ग में बारूद का बड़ा विस्फोट हुआ तो महाराजा जयसिंह तथा उसके सैनिकों के प्राण बच गये।

इस घटना के बाद जयसिंह, बदनसिंह जाट का मित्र बन गया। जयसिंह ने विद्रोही जाटों के कई गढ़ तथा गढ़ी नष्ट कर दिये और नष्ट हो चुके थूण दुर्ग में गधों से हल चलवाया। मोहकमसिंह प्राण बचाने के लिए जोधपुर की तरफ चला गया क्योंकि महाराजा अजीतसिंह और मोहकमसिंह के पिता चूड़ामन के अच्छे सम्बन्ध रहे थे। मोहकमसिंह के भाग जाने से आगरा सूबे में जाटों की कार्यवाहियों पर नियंत्रण लग गया। बदनसिंह जाट की गंभीरता एवं विश्वसनीयता को देखते हुए उसे जाटों का नेता मान लिया गया।

थूण दुर्ग पर विजय प्राप्त करके सवाई जयसिंह ने 2 दिसम्बर 1722 के दिन बदनसिंह के सिर पर सरदारी की पाग बांधी तथा राजाओं की भांति उसका तिलक किया। जयसिंह ने बदनसिंह को पांच परिधानों के साथ पचरंगी निसान देकर ठाकुर के पद से सम्मानित किया। इस प्रकार बदनसिंह जाट कच्छवाहों का खिदमती जागीरदार बन गया।

मुगल बादशाह की तरफ से उसे ‘राजा’ की पदवी दी गई। बदनसिंह जाट को डीग का राजा घोषित किया गया तथा ‘ब्रजराज’ की उपाधि दी गई। बदनसिंह की तरफ से दिल्ली के बादशाह को दिया जाने वाला वार्षिक कर भी निर्धारित कर दिया गया। इस प्रकार ईस्वी 1722 में महाराजा सवाई जयसिंह के प्रयत्नों से ‘भरतपुर’ नामक नवीन रियासत का गठन हुआ। बदनसिंह विनम्र तथा विश्वसनीय व्यक्ति था इस कारण वह एक बड़े राज्य की स्थापना कर सका तथा राजा का पद पा सका।

राजा बदनसिंह इतना विनम्र था कि उसने कभी स्वयं को राजा नहीं कहा। वह सदैव स्वयं को जयसिंह का सामंत बताता रहा और अपने लिये ठाकुर शब्द का प्रयोग करता रहा। उस युग में जब समस्त शक्तियां एक दूसरे को निगल जाने की होड़ में थीं, सवाई जयसिंह जैसा वीर राजा ही इतनी बड़ी सोच रख सकता था कि जाटों को अखिल भारतीय स्तर पर एक राज्य के रूप में संगठित होने का अवसर दे ताकि वे उत्तर भारत की राजनीति में मुख्य धारा के अंग बन सकें।

बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने सवाई राजा जयसिंह की उपलब्धियों से प्रसन्न होकर 2 जून 1723 को उसे ‘राजराजेश्वर श्री राजाधिराज महाराजा सवाई जयसिंह’ की उपाधि से सम्मानित किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू राज्य की स्थापना

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हिन्दू राज्य की स्थापना

भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना का स्वप्न महाराणा प्रताप से लेकर छत्रपति शिवाजी, छत्रसाल बुंदेला, गुरु गोविंदसिंह, बंदासिंह बैरागी तथा महाराजा अजीतसिंह जैसे अनेक वीर राजाओं ने देखा किंतु उनके प्रयास अन्य राजाओं का समर्थन नहीं मिलने से असफल हो जाते थे। महाराजा अजीतसिंह भी अपने बाल्यकाल से भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना का स्वप्न देखा करता था।

मुहम्मदशाह रंगीला ने दिल्ली के तख्त पर बैठने के बाद अजमेर सूबे का प्रबंध महाराजा अजीतसिंह को सौंप दिया तथा साथ ही उसे गुजरात का सूबेदार भी बना दिया। यह महाराजा अजीतसिंह का चरमोत्कर्ष था किंतु जब महाराजा अजीतसिंह ने गुजरात तथा अजमेर में गौवध निषिद्ध कर दिया तो बादशाह मुहम्मदशाह महाराजा से चिढ़ गया और उसने महाराजा अजीतसिंह से अजमेर वापस लेकर वहाँ फिर से मुगल सूबेदार नियुक्त कर दिया।

जब दिल्ली से आए मुगल अधिकारियों ने अजमेर अपने अधिकार में ले लिया तो महाराजा के अधिकारियों ने महाराजा के पास इस आशय की सूचना भिजवाई। महाराजा अजीतसिंह यह सुनते ही आग-बबूला हो गया और उसने अपनी तलवार निकालकर शपथ खाई कि वह अजमेर को अपने अधीन करेगा।

कुछ दिनों बाद महाराजा ने तीस हजार घुड़सवारों के साथ अजमेर नगर को घेर लिया तथा मुगल सूबेदार को अजमेर से मारकर भगा दिया। अजमेर नगर एवं तारागढ़ पर महाराजा का फिर से अधिकार हो गया।

अजमेर पर महाराजा अजीतसिंह के स्वंतत्र रूप से अधिकार करते ही अजमेर की मस्जिदों में बांग शांत हो गई। मंदिरों में घण्टे बजने लगे। कुरानों के स्थान पर पुराण सुनाई देने लगे तथा मस्जिदों का स्थान मंदिरों ने ले लिया। इस प्रकार अजमेर में महाराजा अजीतसिंह के राजत्व में हिन्दू राज्य की स्थापना हो गई।

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काजी ब्राह्मणों के लिये रास्ता छोड़ने लगे। जहाँ गायें काटी गई थीं, वहाँ यज्ञों के लिये कुण्ड खोदे जाने लगे। अजीतसिंह ने सांभर तथा डीडवाना झीलों पर भी अधिकार कर लिया। उसने अनेक दुर्गों पर राठौड़ों के झण्डे चढ़ा दिये तथा बादशाह की परवाह छोड़कर स्वाधीनता सहित आनासागर के शाही महलों में रहने लगा।

अजीतसिंह अब बादशाह द्वारा दिये गये सिंहासन पर न बैठ कर अजमेर में अपने सिंहासन पर बैठा। उसने अपने सिर पर छत्र धारण कर लिया जो उसकी सर्वोच्चता का प्रतीक था। उसने अपने नाम के सिक्के ढलवाये, लम्बाई नापने के लिये अपना गज तथा भार नापने के लिये अपना सेर चलाया। उसने न्याय करने के लिये अपना न्यायालय स्थापित किया। अपने सरदारों के लिये नये रैंक बनाये। उसने सम्प्रभु शासक के प्रत्येक चिह्न को स्थापित किया। एक कवि ने अजीतसिंह के अजमेर में होने के महत्त्व को रेखांकित करते हुए लिखा है-

‘अजमेर में अजमल वैसा ही था जैसे दिल्ली में अस्पति।’

अर्थात्- महाराजा अजीतसिंह अजमेर का उसी प्रकार स्वतंत्र शासक था जिस प्रकार दिल्ली में मुगल बादशाह था।

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महाराजा अजीतसिंह की सफलता के समाचार न केवल भारत वर्ष के कौने-कौने में फैल गये, बल्कि भारत से बाहर मक्का और ईरान में भी उसकी खबरें पहुँच गईं कि भारत में एक नए हिन्दू राज्य की स्थापना हुई है। ये समाचार सुनकर बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने अजमेर को फिर से प्राप्त करने की तैयारी की। उसने सआदत खाँ को अजमेर की सूबेदारी दी तथा अजमेर पर चढ़ाई करने की आज्ञा दी परंतु इस कार्य में कोई भी मुस्लिम अमीर, सआदत खाँ का साथ देने को तैयार नहीं हुआ।

इस कारण सआदत खाँ की हिम्मत नहीं हुई कि वह अजीतसिंह पर हमला करे। अक्टूबर 1721 में हैदरकुली खाँ को गुजरात की तथा मुजफ्फर अली खाँ को अजमेर की सूबेदारी दी गई। मुजफ्फर अली खाँ बीस हजार आदमी लेकर अजमेर पर अधिकार करने पहुँचा किन्तु अजीतसिंह ने अजमेर खाली नहीं किया तथा महाराजकुमार अभयसिंह को मुजफ्फर अली खाँ का सामना करने के लिए भेजा। मुजफ्फर अली खाँ मनोहरपुर में बैठा रहा। जब धनाभाव के कारण मुजफ्फर अली खाँ के सिपाही उसे छोड़कर जाने लगे तो सवाई राजा जयसिंह ने मुजफ्फर अली खाँ को अपनी राजधानी आमेर में बुला लिया।

इस प्रकार मुजफ्फर अली खाँ बिना युद्ध किए ही लौट गया और उसने अजमेर की सूबेदारी का फरमान तथा खिल्लअत बादशाह को पुनः लौटा दी। बादशाह ने सैयद नुसरतयार खाँ बरहा को अजमेर का नया सूबेदार बनाया तथा उसे अजीतसिंह पर चढ़ाई करने की आज्ञा दी।

अजीतसिंह को जब यह सूचना मिली कि नुसरतयार खाँ अजमेर पर अधिकार करने आ रहा है तो महाराजा अजीतसिंह ने अपने पुत्र महाराजकुमार अभयसिंह को नारनौल, अलवर, तिजारा, शाहजहाँपुर, दिल्ली तथा आगरा के आस-पास के प्रदेशों को लूटने की आज्ञा दी।

महाराजकुमार अभयसिंह दिल्ली के आठ मील दूर सराय अलीवर्दी खाँ तक धावे मारने लगा जिससे दिल्ली में कोहराम मच गया। नारनौल में राजकुमार अभयसिंह का, मुगल फौजदार बयाजीद खॉं मेवाती के हाकिम से सामना हुआ। अभयसिंह ने उसे परास्त करके नारनौल को लूटा तथा अलवर, तिजारा और शाहजहाँपुर होते हुए दिल्ली से 16 किलोमीटर दूर सराय अली वर्दी खाँ तक जा पहुँचा।

इसके बाद अजीतसिंह ने मुहम्मदशाह को चिट्ठी भिजवाई कि आपने नुसरतयार को अजमेर का गर्वनर बनाकर ठीक नहीं किया। इस पर बादशाह ने अजीतसिंह को ही फिर से अजमेर का सूबेदार बना दिया तथा सांभर के फौजदार नाहर खाँ को अजमेर सूबे का दीवान नियुक्त कर दिया।

महाराजा अजीतसिंह को नाहर खाँ की नियुक्ति पसंद नहीं आई। अतः 6 जनवरी 1723 को अजीतसिंह ने मुगल शिविर पर आक्रमण करके नाहर खाँ, रूहेला खाँ तथा उसके 25 अधिकारियों को मार डाला।

महाराजा अजीतसिंह की इस कार्यवाही के बाद, मुहम्मदशाह को लगने लगा कि जल्दी ही कुछ नहीं किया गया तो गंगा-यमुना के हरे-भरे मैदानों पर फिर से हिन्दुओं का शासन हो जाएगा। बादशाह ने मुगल साम्राज्य के समस्त सेनापतियों और अमीर-उमरावों को अजमेर पहुँचने के आदेश दिये।

उसने हैदर कुली खाँ को अजमेर का सूबेदार बनाया तथा शर्फुद्दौला इरदत-मन्द खाँ को विशाल सेना देकर अजीतसिंह के विरुद्ध भेज दिया। मुहम्मद खाँ बंगश तथा अन्य कई अमीर, उमराव एवं सरदार, 50 हजार घोड़े लेकर अजीतसिंह के विरुद्ध इकट्ठे हुए। दुर्भाग्य से जयपुर का राजा सवाई जयसिंह तथा राजा गिरिधर बहादुरसिंह भी मुसलमानों की तरफ हो गए। क्योंकि जयसिंह कभी नहीं चाहता था कि मारवाड़ के राठौड़ उत्तर भारत में सबसे बड़ी ताकत बन जाएं।

महाराजा जयसिंह के विरोध के कारण महाराजा अजीतसिंह के लिए संभव नहीं रहा कि वह मुगलों को अकेला ही सामना कर सके। यह भारत भूमि का दुर्भाग्य ही था कि जिस सवाई जयसिंह को एक दिन स्वयं महाराजा अजीतसिंह ने हाथ पकड़ कर जयपुर का राजा बनाया था आज वही जयसिंह, महाराजा अजीतसिंह के विरोध पर उतर आया।

महाराजा अजीतसिंह ने निमाज ठाकुर अमरसिंह और खीमसिंह भण्डारी के पुत्र विजयसिंह को अजमेर का दायित्व सौंप दिया तथा स्वयं अपने परिवार को लेकर अपनी राजधानी जोधपुर चला गया।

ठाकुर अमरसिंह तथा विजयसिंह ने एक महीने तक मुगलों को अजमेर में नहीं घुसने दिया। एक दिन हैदर कुली खाँ, सरबलंद खाँ तथा महाराजा जयसिंह हाथी पर सवार होकर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जा रहे थे, तब तोप का एक गोला उनके दल के एक हाथी पर आकर गिरा। इस गोले से हाथी पर सवार महावत की मौत हो गई। इससे शाही पक्ष में भय व्याप्त हो गया। उन्होंने महाराजा जयसिंह के माध्यम से महाराजा अजीतसिंह के साथ संधि वार्ता चलाई। 

दोनों पक्षों में संधि की शर्तें निर्धारित होने के बाद महाराजा अजीतसिंह ने अजमेर खाली करने तथा कुंवर अभयसिंह को फिर से शाही दरबार में भेजने का निर्णय लिया।

इस संधि के बाद अजीतसिंह की सेना अपना झण्डा फहराती हुई, नगाड़े बजाती हुई, सम्मान पूर्वक दुर्ग से बाहर निकलकर मारवाड़ को चली गई। इस प्रकार ईस्वी 1724 में अजमेर पर फिर से मुगलों का अधिकार हो गया तथा जफरकुली खाँ को अजमेर का सूबेदार बनाया गया।

जयपुर नरेश सवाई जयसिंह नहीं चाहता था कि अजमेर पर जोधपुर नरेश अजीतसिंह का अधिकार हो। इसलिये उसने अपने मित्र अजीतसिंह से गद्दारी करके अजमेर पर मुगलों का अधिकार करवा दिया। हिन्दू राज्य की स्थापना का स्वप्न फिर से भंग हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मल्लिका उज्जमानी

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मल्लिका उज्जमानी

महाराजा अजीतसिंह ने मल्लिका उज्जमानी के पिता फर्रुखसीयर की हत्या में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इसलिए जब मल्लिका उज्जमानी बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की बेगम बनी तो वह महाराजा के प्राणों की प्यासी हो गई।

जब मुहम्मदशाह रंगीला ने फर्रूखसियर की पुत्री मल्लिका उज्जमानी से विवाह करके उसे बादशाह बेगम घोषित कर दिया तो फर्रूखसियर का परिवार फिर से सत्ता के केन्द्र में आ गया। बादशह बेगम बनकर फर्रूखसियर की बेटी मलिका उज्जमानी महाराजा अजीतसिंह के प्राणों की प्यासी हो गई।

कुछ साल पहले तक अजीतसिंह की पुत्री इन्द्रकुंवरी तथा मलिका उज्जमानी की माँ गौहरउन्निसा बादशाह फर्रूखसियर की बेगमें हुआ करती थीं। जब सैयद बंधुओं ने पठान सैनिकों को बादशाह फर्रूखसियर को घसीटकर लाने के लिए उसके महल में भेजा था तब मल्लिका उज्जमानी की माँ गौहरउन्निसा पठान सैनिकों के कदमों में गिर कर बादशाह के प्राणों की भीख मांग रही थीं किंतु महाराजा अजीतसिंह की बेटा इन्द्रकुंवरी एक करोड़ रुपए की सम्पत्ति के साथ अपने पिता के पास जाने की तैयारी कर रही थी।

मल्लिका उज्जमानी उन दृश्यों को भूल नहीं पाती थी। इसलिए अब फिर से सत्ता के केन्द्र में पहुंचकर पुरानी बातों का बदला लेना चाहती थी।

जिस प्रकार मुहम्मदशाह ने सैयद बंधुओं को मरवा डाला था,मल्लिका उज्जमानी चाहती थी कि महाराजा अजीतसिंह को भी मार डाला जाए। मुहम्मदशाह भी महाराजा अजीतसिंह की नीतियों से तंग आ चुका था और वह भी महाराजा से छुटकारा पाना चाहता था।

इसी तरह आम्बेर नरेश जयसिंह भी महाराजा अजीतसिंह के हाथों काफी नीचा देख चुका था क्योंकि जयसिंह के मना करने के बावजूद अजीतसिंह ने अजमेर पर अधिकार करके उसे राठौड़ राज्य का हिस्सा बना लिया था।

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ये सब लोग महाराजा अजीतसिंह के प्राणों के पीछे हाथ धोकर पड़ गए किंतु उस काल में न तो मुगलों में इतनी ताकत थी कि वे जोधपुर के राजा अजीतसिंह को घेर कर मार सकें और न आम्बेर नरेश में इतना दम था कि वह अजीतसिंह की ओर आंख उठाकर देख सके। इसलिए छल और कपट का सहारा लिया गया।

महाराजा सवाई जयसिंह की एक पुत्री का विवाह महाराजा अजीतसिंह के पुत्र अभयसिंह से हुआ था। महाराजा जयसिंह ने अपनी इसी पुत्री को मोहरा बनाकर महाराजकुमार अभयसिंह को समझाया कि महाराजा अजीतसिंह की गतिविधियों के चलते मुगल दरबार में मारवाड़ राज्य की इज्जत समाप्त हो गई है। यदि महाराजा अजीतसिंह को समाप्त कर दिया जाए तो अभयसिंह को राजा बनाकर फिर से मुगलों की मित्रता प्राप्त की जा सकती है।

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अभयसिंह से कहा गया कि यदि वह अजीतसिंह की हत्या करता है तो अभयसिंह न केवल जोधपुर का राजा बनेगा अपितु उसे मुगल दरबार में बड़ा मनसब एवं अन्य प्रदेशों की सूबेदारियां भी मिलेंगी। महाराजकुमार अभयसिंह, अपने श्वसुर की बातों में आ गया। उसने अपने छोटे भाई बखतसिंह को महाराजा अजीतसिंह की हत्या करने के लिए तैयार किया। मुगल बादशाह की तरफ से सवाई जयसिंह ने बखतसिंह को आश्वस्त किया कि यदि बखतसिंह इस काम में सहयोग करेगा तो उसे नागौर का स्वतंत्र राज्य दे दिया जाएगा तथा शाही दरबार में उच्च मनसब प्रदान किया जाएगा।

उस काल के भारत में जिस प्रकार मुगल शहजादों की हत्याएं हो रही थीं, उसी प्रकार हिन्दू राजाओं के वंश भी इस बुराई का शिकार हो गए थे और प्रत्येक राजपरिवार के राजकुमार भी एक दूसरे की हत्या करने में नहीं हिचकिचा रहे थे। माना जा सकता है कि भारत के दूषित राजनीतिक वातावरण के प्रभाव से अभयसिंह और बखतसिंह अपने पिता की हत्या करने को तैयार हो गए।

जिस अजीतसिंह की रक्षा के लिये महाराजा जसवंतसिंह की विधवा रानियां औरंगजेब के सैनिकों के हाथों तिनकों की तरह कट मरीं थीं, जिस अजीतसिंह के लिये वीर दुर्गादास तथा मुकुंददास खीची ने अपना पूरा जीवन घोड़े की पीठ पर बिताया था, जिस अजीतसिंह की रक्षा के लिये राठौड़ों ने तीस वर्ष तक युद्ध से मुंह नहीं मोड़ा था, जिस अजीतसिंह के लिये मेवाड़ियों ने औरंगजेब को अरावली की पहाड़ियों में खींचकर मार डालने का प्रयास किया था, उसी अजीतसिंह को उसके पुत्रों ने मारने का निश्चय कर लिया।

अदूरदर्शी राजकुमार अभयसिंह तथा बख्तसिंह, न तो मुगलों के षड़यंत्र को समझ पाये, न सवाई जयसिंह की दुष्टता को समझ पाये, न अपने पिता द्वारा चलाये जा रहे हिन्दू राज्य की स्थापना के अभियान का मूल्य समझ पाये। राज्य के लालच में अंधे होकर 23 जून 1724 की रात्रि में उन्होंने महाराजा अजीतसिंह की हत्या कर दी। उस समय अजीतसिंह जोधपुर के मेहरानगढ़ में स्थित अपने महल में गहरी नींद में सो रहा था।

इस प्रकार मुहम्मदशाह की बेगम मल्लिका उज्जमानी ने अपने पिता की हत्या का बदला ले लिया। मुहम्मदशाह को भी अजीतसिंह से छुटकारा मिल गया। सवाई जयसिंह को भी उत्तर भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर प्राप्त हो गया। राजकुमार अभयसिंह को मारवाड़ का और बखतसिंह को नागौर का राज्य मिल गया। यदि इस हत्या से किसी का नुक्सान हुआ था तो वह था हिन्दू धर्म जो वीर दुर्गादास और महावीर अजीतसिंह जैसे राजपूतों को खोकर अपने दुर्भाग्य पर आठ-आठ आँसू बहा रहा था। 

महाराजा की हत्या पर दुःख व्यक्त करते हुए तथा राजकुमार बखतसिंह को धिक्कारते हुए एक कवि ने लिखा है-

बखता बखत बायरो, क्यूं मार्यो अजमाल।

हिन्दवाणी रो सेवरो, तुरकाणी रो काल।

अर्थात्- हे बिना बख्त यानि बिना तकदीर वाले बख्तसिंह! तुमने अजमाल यानि अजीतसिंह को क्यों मारा? वह हिन्दुस्तान का रक्षक और तुर्कों का काल था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चिनकुलीच खाँ

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चिनकुलीच खाँ

चिनकुलीच खाँ औरंगजेब के बेटे बहादुरशाह उर्फ शाहआलम प्रथम का शव लेकर लाहौर से दिल्ली आया था। उसे सैयदों ने बहुत तंग किया था किंतु मुहम्मदशाह रंगीला का माँ कुदसिया बेगम ने चिनकुलीच खाँ के साथ मिलकर सैयद बंधुओं की हत्या करवाई थी। चिनकुलीच खाँ मुगलों का वफादार सेनापति था किंतु मुहम्मदशाह रंगीला ने अपनी बेवकूफी से उसे मुगलों का बागी बना दिया।

बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने जब ई.1720 में सैयद बंधुओं का सफाया किया तो उसने सल्तनत में शांति स्थापित करने के लिए अपने मित्रों को सम्मानित किया तथा अब तक सैयदों का साथ निभा रहे बहुत से दुश्मनों को भी क्षमा कर दिया। बादशाह मुहम्मदशाह ने 21 अप्रेल 1721 को एक बड़े दरबार का आयोजन करके बहुत से अमीर, उमरावों एवं राजाओं का सम्मान किया। आम्बेर नरेश जयसिंह को इस अवसर पर सरमद-ए-राजा-ए-हिन्द की उपाधि दी गई।

हालांकि कोटा के महाराव भीमसिंह ने पन्धार के युद्ध में चिनकुलीच खाँ के विरुद्ध युद्ध किया था तथापि बादशाह मुहम्मदशाह ने कोटा नरेश भीमसिंह के पुत्र अर्जुनसिंह को कोटा का नया महाराव स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मुहम्मदशाह ने अपने बहुत से दुश्मनों की गलतियों को नजर अंदाज करके उन्हें अपनी सेवा में बने रहने दिया। नरवर का राजा गजसिंह भी पंधार के युद्ध में चिनकुलीच खाँ के विरुद्ध एवं सैयदों की ओर से लड़ा था, मुहम्मदशाह ने उसके पुत्र को भी नरवर का राजा स्वीकार कर लिया।

इस प्रकार उत्तर भारत में शांति स्थापित हो गई किंतु इसी समय मराठों की गतिविधियों के कारण दक्षिण भारत अचानक अशांत हो गया। अतः चिनकुलीच खाँ आसफजाह को दक्षिण के छः प्रांतों का सूबेदार बनाकर दक्षिण में भेज दिया गया।

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चिनकुलीच खाँ का वास्तविक नाम कमरूद्दीन खान सिद्दकी बायफंदी था। उसका यह नाम औरंगजेब ने रखा था। उसका जन्म 20 अगस्त 1671 को बुखारा से भारत आकर बसे एक तुर्की परिवार में हुआ था। यह परिवार खलीफा अबू बकर के वंशजों में से निकला था। चिनकुलीच खाँ का परबाबा बुखारा में सूफी संत के रूप में प्रसिद्ध था।

चिनकुलीच खाँ का बाबा कुलीच खाँ ई.1654 में शाहजहाँ के शासनकाल में बुखारा से भारत आया था। ई.1657 में वह औरंगाबाद पहुंचकर औरंगजेब की सेना में भरती हो गया। उसने ई.1658 में शामूगढ़ के युद्ध में औरंगजेब की तरफ से दारा शिकोह के विरुद्ध युद्ध किया था।

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चिनकुलीच खाँ का पिता फीरोज जंग औरंगजेब का विश्वसनीय अमीर था। जब औरंगजेब बादशाह बना तो उसने फीरोज जंग को बीदर का सूबेदार नियुक्त किया। जब फीरोज जंग का बेटा कमरूद्दीन केवल छः साल का हुआ, तब औरंगजेब ने बालक कमरूद्दीन को एक छोटा सा मनसब देकर अपना मनसबदार बना लिया। बालक कमरूद्दीन ने तेरह वर्ष की आयु में अपने जीवन का पहला युद्ध लड़ा जिसके बाद औरंगजेब ने उसे 400 जात एवं 100 सवारों का मनसबदार नियुक्त किया। इसके बाद चिनकुलीच खाँ ने युद्धों के मैदानों में ही अपना जीवन बिताया था। उसे अनेक बड़ी लड़ाइयों का नेतृत्व करने का अवसर मिला था।

चिनकुलीच खाँ ने औरंगजेब के शासन काल में मराठों से हुए युद्धों में बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी किंतु उसका वास्तविक अभ्युदय बहादुरशाह के काल में आरम्भ हुआ था। उस समय चिनकुलीच खाँ बहादुरशाह के दरबार में तूरानी गुट के प्रभावशाली सदस्यों में गिना जाता था और उसका गुट सैयद बंधुओं का प्रबल विरोधी था।

ई.1712 में जब बहादुरशाह का लाहौर के दुर्ग में आकस्मिक निधन हुआ था तब चिनकुलीच खाँ ने बहादुरशाह के पुत्रों में हुए उत्तराधिकार के युद्ध में प्रत्यक्ष लड़ाई में भाग नहीं लिया था अपितु वह बहादुरशाह के शव के साथ लाहौर दुर्ग में ही बैठा रहा। जब ई.1713 में बहादुरशाह के पुत्र जहांदारशाह को गद्दी से उतारकर फर्रूखसियर को मुगलों के तख्त पर बैठाया गया था, तब इस कार्य में चिनकुलीच खाँ ने भी सैयदों को पूरा सहयोग दिया था।

उसे औरंगजेब ने चिनकुलीच खान की, फर्रूखसियर ने निजामुलमुल्क फतेहजंग की तथा मुहम्मदशाह ने आसफजाह की उपाधियां दी थीं। इसलिए इतिहास की पुस्तकों में उसे चिनकुलीच खान, निजामुलमुल्क तथा आसफजाह आदि नामों से सम्बोधित किया गया है। इस कारण पाठक कई बार असमंजस में पड़कर इन्हें अलग-अलग व्यक्तियों के नाम समझ लेते हैं।

जब चिनकुलीच दक्षिण भारत में चला गया तो मुगल बादशाह को उसकी कमी अखरने लगी। सल्तनत का काम बिगड़ने लगा जिसे सुधारने के लिए चिनकुलीच खाँ जैसा विश्वसनीय तथा योग्य अधिकारी हर समय बादशाह के पास होना जरूरी था। इसलिए मुहम्मदशाह ने चिनकुलीच खाँ को दक्षिण से पुनः दिल्ली बुलवा लिया तथा 21 फरवरी 1722 को उसे अपना प्रधानमंत्री बना दिया।

चिनकुलीच खाँ ने बादशाह के आदेश के अनुसार सल्तनत का काम संभाल लिया। चिनकुलीच खाँ ने मुहम्मदशाह को सलाह दी कि बादशाह अपने पूर्वज अकबर की तरह सावधान रहे तथा औरंगजेब की तरह बहादुर बने किंतु जब मुहम्मदशाह सल्तनत पर ध्यान देने की बजाय मौज-मस्ती में डूबा रहने लगा। 

वजीर चिनकुलीच सल्तनत की व्यवस्था सुधारना चाहता था किंतु मुहम्मदशाह रंगरेलियों में डूबे रहना चाहता था। इस कारण दोनों में प्रायः कहा-सुनी होने लगी। बादशाह को यह पसंद नहीं था कि उसके कामों में टोका-टाकी की जाए। इस कारण मुहम्मदशाह, चिनकुलीच को नापसंद करने लगा और उसके सामने ही उसका उपहास करने लगा। बादशाह सरेआम लोगों से कहता था- ‘देखो दक्षिण का गधा कितना सुंदर नाचता है।’

बादशाह के रवैये से दुखी होकर चिनकुलीच ने प्रधानमंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया और मुगल दरबार में आना छोड़ दिया। इस पर ईस्वी 1723 में मुहम्मदशाह ने उसे दक्षिण भारत में मुबरिज खाँ के विरुद्ध लड़ने के लिए भेजा। चिनकुलीच खाँ के लिए मुबरिज खाँ पर विजय प्राप्त करना कठिन था इसलिए उसने मराठों की सहायता प्राप्त की तथा मुबरिज खाँ को परास्त करके हैदराबाद पर अधिकार कर लिया। अब वह वापस दिल्ली नहीं जाना चाहता था। इसलिए वह हैदराबाद में ही रहने लगा।

इस प्रकार चिनकुलीच मुगलों का सबसे विश्वस्त सेनापति था किंतु मुगल सल्तनत के विखण्डन की शुरुआत उसी के हाथों हुई। उसने ई.1725 में हैदराबाद में आसफजाही राजवंश की स्थापना की। यहाँ से आगे के इतिहास में चिनकुलीच खाँ को निजामुलमुल्क तथा निजाम के नाम से जाना गया। वह 1 जून 1748 तक शासन करता रहा। इस प्रकार दक्षिण भारत में फिर से एक स्वतंत्र राज्य अस्तित्व में आ गया तथा चिनकुलीच खाँ इसका प्रथम स्वतंत्र शासक हुआ।

कुछ ही समय में निजाम ने अपने राज्य की सीमाएँ ताप्ती नदी से लेकर कर्नाटक, मैसूर और त्रिचनापल्ली तक बढ़ा लीं। निजाम ने यद्यपि पूर्ण स्वतंत्र शासक की भाँति शासन किया किंतु उसने न तो अपने नाम के सिक्के चलाये और न राजछत्र धारण किया। उसने मुगल बादशाह से सम्बन्ध विच्छेद भी नहीं किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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