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सवाई जयसिंह से दुश्मनी

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सवाई जयसिंह से दुश्मनी

जब औरंगजेब मर गया और उसके पुत्रों में सल्तनत पर अधिकार को लेकर युद्ध हुआ तो आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह ने औरंगजेब के पुत्र आजमशाह का साथ दिया। इस कारण नए बादशाह आलमशाह उर्फ बहादुरशाह ने सवाई जयसिंह से दुश्मनी बांध ली। इस कारण कच्छवाहों, राठौड़ों और सिसोदियों ने लाल किले के विरुद्ध संघ बना लिया!

दिसम्बर 1608 में बहादुरशाह ने अपने छोटे भाई कामबख्श को समाप्त करने के लिए हैदराबाद पर अभियान किया था। जिस समय वह दिल्ली से हैदराबाद जा रहा था, तब वह मार्ग में कच्छवाहों की राजधानी आम्बेर में रुका। आम्बेर रियासत के सम्बन्ध में वह मन ही मन बड़ा निर्णय करके आया था जिसे अब वह कार्यान्वित करना चाहता था। इस घटना पर चर्चा करने से पहले मुगलों और कच्छवाहों की दोस्ती का संक्षिप्त इतिहास जानना आवश्यक है।

आम्बेर नरेश भारमल ने 6 फरवरी 1562 को बहादुरशाह के बाबा के बाबा शहंशाह अकबर से अपनी पुत्री हीराकंवर का विवाह करके मुगलों और कच्छवाहों की मैत्री की शुरुआत की थी। तब से लेकर बहादुरशाह के बादशाह बनने तक राजा भारमल की सात पीढ़ियां मुगल बादशाहों की सेवा करती आई थीं।

भारत के मुगलों की जमीनी सच्चाई यह थी कि उनकी सल्तनत का विस्तार आम्बेर के कच्छवाहों के कंधों पर बैठ कर ही किया गया था। ई.1658 में जब औरंगजेब बादशाह हुआ तो उसमें भी आम्बेर के मिर्जाराजा जयसिंह की सबसे बड़ी भूमिका थी किंतु कृतघ्न औरंगजेब ने अपने निष्ठावान मित्र मिर्जाराजा जयसिंह को ई.1667 में जहर देकर मरवाया था। उसके बाद रामसिंह और रामसिंह के बाद बिशनसिंह आम्बेर के राजा हुए।

ई.1700 में राजा बिशनसिंह की मृत्यु हो गई। राजा बिशनसिंह के दो पुत्र थे। इनमें से बड़े पुत्र का नाम विजयसिंह और छोटे पुत्र का नाम जयसिंह था, जयसिंह को चीमाजी भी कहते थे। जब 10 वर्ष की आयु में विजयसिंह पहली बार औरंगजेब के समक्ष ले जाया गया तो उसे देखते ही औरंगजेब को उसके बाबा मिर्जाराजा जयसिंह की याद आई। इसलिए औरंगजेब ने विजयसिंह का नाम जयसिंह रख दिया और उसके छोटे भाई चीमाजी उर्फ जयसिंह का नाम बदलकर विजयसिंह कर दिया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

औरंगजेब ने 12 वर्ष के अल्पायु सवाई राजा जयसिंह को दक्खिन के मोर्चे पर बुला लिया। तब से लेकर औरंगजेब की मृत्यु होने तक यही जयसिंह आम्बेर का राजा था। जयसिंह ने औरंगजेब के लिए कई लड़ाइयां जीतीं जिनके कारण औरंगजेब ने जयसिंह को सवाई की उपाधि दी। इस कारण यह राजा इतिहास में सवाई जयसिंह तथा जयसिंह (द्वितीय) के नाम से जाना गया।

जब औरंगजेब के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तो सवाई जयसिंह का छोटा भाई चीमाजी अर्थात् विजयसिंह मुअज्जमशाह के साथ था। इसलिए चीमाजी ने इस युद्ध में बहादुरशाह का पक्ष लिया।

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जिस समय औरंगजेब की मृत्यु हुई उस समय आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह आजमशाह के पुत्र बेदारबख्त के साथ गुजरात में नियुक्त था। जब आजमशाह का पुत्र बेदारबख्त जजाऊ की लड़ाई लड़ने गया तो वह कच्छवाहा राजा सवाई जयसिंह को भी अपने साथ ले गया। इस कारण जजाऊ के युद्ध में जयसिंह को आजमशाह की तरफ से युद्ध लड़ना पड़ा था। इस कारण बहादुरशाह सवाई जयसिंह से दुश्मनी मानने लगा। जजाऊ के युद्ध में आजमशाह तथा बेदारबख्त की मृत्यु हो गई तथा सवाई जयसिंह के भी बहुत से राजपूत सिपाही मारे गए। इस कारण सवाई जयसिंह के पास केवल 1000 सिपाही ही बचे। सवाई जयसिंह इन सिपाहियों को लेकर आम्बेर चला आया।

बहादुरशाह की दृष्टि में सवाई जयसिंह ने दो अपराध किए थे। उसका पहला अपराध यह था कि वह जजाऊ के मैदान में आजमशाह की तरफ से तथा बहादुरशाह के खिलाफ लड़ने के लिए आया था तथा उसका दूसरा अपराध यह था कि सवाई जयसिंह युद्ध समाप्त होने के बाद बहादुरशाह के समक्ष उपस्थित होने के स्थान पर आम्बेर भाग आया था।

इसलिए ई.1708 में बहादुरशाह दिल्ली से हैदराबाद जाते समय कच्छवाहों की राजधानी आम्बेर आया ताकि सवाई जयसिंह से दुश्मनी निकाली जा सके और सवाई राजा जयसिंह को दण्डित किया जा सके। सवाई जयसिंह ने बहादुरशाह का स्वागत किया तथा उसे अपने महलों में रहने के लिए आमंत्रित किया।

बहादुरशाह ने कुछ दिनों तक आम्बेर के महलों में निवास किया तथा अपने पूर्वज शहंशाह अकबर द्वारा बनाई गई मस्जिद में बैठकर नमाज पढ़ी। इसके बाद बहादुरशाह ने जयसिंह का राज्य छीनकर आम्बेर का नाम मोमिनाबाद रख दिया तथा सवाई जयसिंह की जगह उसके छोटे भाई चीमाजी अर्थात् विजयसिंह को मोमिनाबाद का शासक बना दिया।

बहादुरशाह द्वारा की गई इस कार्यवाही के बाद ही जयसिंह की समझ में आया कि बहादुरशाह सवाई जयसिंह से दुश्मनी बांधकर बैठा है। इस कार्यवाही के कारण सवाई जयसिंह मुगलों का मनसबदार बनकर रह गया। उसके पास अपना कोई राज्य नहीं था। सवाई जयसिंह की लगभग पूरी सेना जजाऊ के मैदान में समाप्त हो चुकी थी इसलिए वह बहादुरशाह का प्रतिरोध नहीं कर सका।

आम्बेर के राजा को सफलतापूर्वक हटा देने के बाद बहादुरशाह ने जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह के साथ भी एक गहरी चाल चली। उसने अजीतसिंह को मेड़ता नामक स्थान पर मिलने के लिए बुलवाया तथा वहाँ एक आम दरबार का आयोजन करके अजीतसिंह को साढ़े तीन हजार जात और तीन हजार सवारों का मनसब प्रदान करके उसे अपना मनसबदार बना लिया किंतु साथ ही साथ बहादुरशाह ने कपट का सहारा लेते हुए उसी समय जोधपुर में अपनी सेना भेजकर जोधपुर पर कब्जा कर लिया।

इस प्रकार महाराजा अजीतसिंह भी बिना राज्य का हो गया किंतु महाराजा अजीतसिंह के पास भी इतनी सेना नहीं थी कि वह बहादुरशाह पर सीधा आक्रमण कर सके, इसलिए वह भी चुप रहा।

आम्बेर और मारवाड़ से निबटकर बहादुरशाह ने कामबख्श को समाप्त करने के लिए दक्खिन की ओर प्रस्थान किया तथा महाराजा जयसिंह और महाराजा अजीतसिंह को भी अपने साथ दक्खिन के मोर्चे पर चलने के निर्देश दिए। दोनों महाराजा अपना राज्य और कोष खो चुके थे इसलिए मन मारकर अपनी-अपनी सेनाओं को लेकर बहादुरशाह के साथ रवाना हुए किंतु मार्ग में जैसे ही बहादुरशाह ने नर्मदा नदी पार की, ये दोनों महाराजा, वीर दुर्गादास के साथ वापस राजपूताने को लौट आए तथा उदयपुर के महाराणा अमरसिंह के पास पहुंचे।

महाराणा अमरसिंह ने इन दोनों राजाओं का कई कोस आगे आकर स्वागत किया तथा उनकी हर तरह से सहायता करने का आश्वासन दिया। इसके बदले में अजीतसिंह तथा जयसिंह ने मेवाड़ के महाराणा को वचन दिया कि वे मुगलों से अपने सम्बन्ध तोड़ लेंगे तथा आज के बाद मुगलों की चाकरी नहीं करेंगे।

इस अवसर पर महाराणा अमरसिंह ने अपनी एक राजकुमारी का विवाह इस शर्त पर आम्बेर नरेश जयसिंह से कर दिया कि आम्बेर की राजकुमारी की कोख से उत्पन्न होने वाली लड़की का विवाह मुगल शहजादों से नहीं किया जाएगा तथा यदि मेवाड़ की राजकुमारी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न हुआ तो वह आम्बेर का भावी राजा होगा।

शाहआलम उर्फ बहादुरशाह ने सवाई जयसिंह से दुश्मनी कर तो ली किंतु आगे चलकर यह दुश्मनी मुगल सल्तनत के लिए बहुत भारी पड़ने वाली थी।

मेवाड़ के महाराणा से नए सिरे से मित्रता स्थापित करने के बाद महाराजा अजीतसिंह तथा सवाई जयसिंह जोधपुर आए तथा उन्होंने जोधपुर पर आक्रमण करके जोधपुर के किलेदार मेहराब खाँ को भगा दिया और जोधपुर राज्य पर फिर से अधिकार कर लिया। इस सफलता के बाद दोनों मित्रों ने आम्बेर पर आक्रमण किया और चीमाजी को गद्दी से उतारकर सवाई जयसिंह को फिर से आम्बेर की गद्दी पर बिठा दिया। बयाना का मुगल सूबेदार हुसैन खान बारहा आम्बेर पर चढ़कर आया किंतु उसे भी मार दिया गया।

इस पूरी कार्यवाही के दौरान बहादुरशाह दक्खिन के अभियान में व्यस्त रहा अतः वह महाराजा अजीतसिंह तथा सवाई जयसिंह के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सका। हालांकि कुछ समय बाद जब अजीतसिंह ने अजमेर पर अधिकार किया तो अजीतसिंह और जयसिंह की मित्रता भंग हो गई क्योंकि जयसिंह स्वयं अजमेर पर अधिकार करना चाहता था। इन दोनों राजाओं की दुश्मनी यहाँ तक बढ़ी कि आगे चलकर सवाई जयसिंह ने महाराजा अजीतसिंह की हत्या करवाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बंदासिंह बैरागी

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बंदासिंह बैरागी

बंदासिंह बैरागी को बन्दा बहादुर भी कहते हैं। उसका असली नाम माधवदास बैरागी था। बंदासिंह बैरागी ने गुरु गोविंदसिंह का आदेश मानकर सिक्खों को नेतृत्व प्रदान किया। इस कारण लाल किले को बंदासिंह बैरागी के रूप में नया दुश्मन मिल गया!

औरंगजेब ने गुरु गोविंदसिंह को समझौते के लिए दक्षिण भारत में आमंत्रित किया था किंतु जब गुरु गोविंदसिंह दक्षिण में पहुंचे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि 3 मार्च 1707 को औरंगजेब की मृत्यु हो गई है। अतः गुरु की औरंगजेब से भेंट नहीं हो सकी।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद 18 जून 1707 को उसके पुत्र मुअज्जमशाह एवं आजमशाह के बीच जजाऊ का युद्ध हुआ। इस लड़ाई में गुरु गोविन्द सिंह ने मुअज्जमशाह अर्थात् बहादुरशाह का साथ दिया जिसके कारण मुअज्जमशाह विजयी रहा। जब मुअज्जमशाह बहादुरशाह के नाम से बादशाह बन गया तब उसने गुरु गोविन्दसिंह को आगरा बुलवाया।

बहादुरशाह ने गुरु को एक कीमती सिरोपाव और एक धुकधुकी भेंट की जिसकी कीमत 60 हजार रुपए थी। सिरोपाव में एक कीमती चोगा होता था तथा धुकधुकी गर्दन में पहनने का मर्दाना गहना होता था।

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इस बात की प्रबल संभावना थी कि बहादुरशाह तथा गुरु गोविंदसिंह के बीच कोई स्थाई समझौता हो जाएगा। अभी बात चल ही रही थी कि बहादुरशाह को अपने भाई कामबख्श के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए दक्षिण भारत की तरफ जाना पड़ा। बहादुरशाह ने गुरु गोविंदसिंह से अनुरोध किया कि वे भी उसके साथ चलें। बादशाह के निमंत्रण पर गुरु गोबिंदसिंह एक बार फिर दक्षिण भारत के लिए रवाना हो गए।

जब सरहिंद के सूबेदार को ज्ञात हुआ कि गुरु गोबिंदसिंह बहादुरशाह के साथ दक्षिण भारत को जा रहे हैं तो उसने गुरु की हत्या करवाने की योजना बनाई। उसने जमशेद खाँ तथा वसील बेग नामक दो अफगानों को गुरु गोविंदसिंह की हत्या के लिए नियुक्त किया। जब गुरु गोविंदसिंह का शिविर गोदावरी नदी के तट पर नांदेड़ नामक स्थान पर लगा हुआ था, तब इन अफगानियों ने धोखे से गुरु के शिविर में प्रवेश करके उन पर घातक प्रहार किया जिससे गुरु बुरी तरह घायल हो गए।

गुरु की छाती पर हृदय से ठीक नीचे गहरा घाव लगा किंतु गुरु ने अपनी कटार निकालकर उसी समय हमलावर का काम तमाम कर दिया। हमलावर के साथी ने भागने का प्रयास किया किंतु उसे गुरु के अंगरक्षकों ने मार डाला।

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जब गुरु रोगशैय्या पर थे, तब माधवदास नामक एक अड़तीस वर्षीय बैरागी, गुरु के दर्शनों के लिए आया। वह काश्मीर के पंुछ जिले का रहने वाला डोगरा राजपूत था तथा उसके बचपन का नाम लक्ष्मण देव था किंतु वह वैराग्य धारण करके माधवदास बैरागी बन गया था और नांदेड़ में ही एक आश्रम बनाकर रहता था। जब उसे ज्ञात हुआ कि कुछ अफगानी मुसलमानों ने गुरु गोविंदसिंह को छुरा मारकर घायल कर दिया है तो वह गुरु से मिलने के लिए उनके शिविर में आया।

माधवदास बैरागी ने गुरु गोविंदसिंह के सामने प्रतिज्ञा ली कि वह मुगलों द्वारा की गई गुरुपुत्रों की हत्या का बदला लेगा। गुरु गोविंदसिंह ने उस युवक के भीतर चमक रहे तेज को पहचाना तथा उसे अपना शिष्य बना लिया और उसका नाम गुरुबख्शसिंह रखा। गुरु गोविंदसिंह ने उससे कहा कि वह सिक्खों के राजनीतिक संघर्ष को जारी रखे। माधवदास बैरागी, गुरु गोविंदसिंह की बातों से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने स्वयं को गुरु का बन्दा कहना आरम्भ कर दिया। तब से उसका नाम बन्दा बहादुर पड़ गया। इतिहास की पुस्तकों में उसे बंदासिंह बैरागी भी लिखा गया है।

गुरु ने बंदासिंह बैरागी को सिक्खों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा तथा अपने पाँच मुख्य अनुयायी एवं कुछ अन्य अनुयाइयों के साथ पंजाब जाने का आदेश दिया। बन्दा जब दिल्ली पहुँचा तब उसे समाचार मिला कि 7 अक्टूबर 1708 को गुरु गोविंदसिंह का नांदेड़ में निधन हो गया।

गुरु गोविन्दसिंह की मृत्यु के साथ भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण अध्याय की समाप्ति हो जाती है। भारत भूमि गुरु गोविंदसिंह की सेवाओं के प्रति युगों तक कृतज्ञ रहेगी। उन्होंने चण्डी शतक लिखकर अपनी भगवत्भक्ति का परिचय दिया तथा गुरुग्रंथ साहिब को नए सिरे से संकलित करवाकर भारत के महत्वपूर्ण भक्त-कवियों की रचनाओं को मानव मात्र के लिए सुलभ करवाया।

गुरु गोबिंदसिंह ने पिछले गुरुओं के समय से चली आ रही सिक्ख परम्पराओं में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। उन्होंने सिक्खों में गुरु बनाने की प्रथा को समाप्त कर दिया और कहा कि जहाँ भी पाँच सिक्ख एकत्रित होंगे, वहाँ मैं उपस्थित रहूँगा। इस प्रकार, उन्होंने सिक्ख सम्प्रदाय के हितों के बारे में निर्णय करने का अधिकार सिक्ख पंचायत को सौंप दिया। गुरु गोविंदसिंह ने कहा- ‘सब सिक्खन को हुकुम है, गुरु मानियो ग्रंथ!’ कुछ लोग इसे इस प्रकार भी कहते हैं– ‘गुरु मानो ग्रंथ, प्रगट गुरु दी देह!’

गुरु गोविन्दसिंह ने सिक्खों को पूर्णतः सैनिक समुदाय बनाया और खालसा पंथ तथा खालसा सेना की स्थापना की। उन्होंने जीवन भर मुगलों से संघर्ष किया। बंदा बैरागी ने गुरु गोविंदसिंह का आदेश मानकर सिक्खों को नेतृत्व प्रदान किया। उसने सिक्खों को गुरु का संदेश पहुँचाया और मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्नान किया। उसने सोनीपत से मुगल अधिकारियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आरम्भ किया तथा वहाँ के मुगल फौजदार को युद्ध में परास्त कर दिया।

इसके बाद बंदासिंह बैरागी ने कैथल, समाना, शाहबाद, अम्बाला, मुस्तफाबाद, क्यूरी तथा सधौरा पर अधिकार कर लिया। अब बंदा बैरागी ने पंजाब क्षेत्र के प्रमुख सूबे सरहिन्द पर आक्रमण किया जहाँ के फौजदार वजीर खाँ ने गुरु के दो पुत्रों को जीवित ही दीवार में चिनवाया था। इस युद्ध में वजीर खाँ मारा गया। उसकी अपार सम्पत्ति बन्दा बैरागी के हाथ लगी। बन्दा बैरागी ने सरहिन्द के 28 परगने अपने अधीन कर लिये। बन्दा बैरागी की इन सफलताओं ने उसे अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया।

मई 1710 में बंदा बैरागी के नेतृत्व में सिक्खों ने लाहौर एवं दिल्ली के बीच सतलुज नदी के दक्षिण में स्थित पंजाब का विशाल क्षेत्र जीत लिया। बंदा बैरागी ने गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा संकल्पित खालसा राज्य की स्थापना की जिसकी राजधानी लोहगढ़ थी। बंदा बैरागी ने गुरु नानक देव और गुरु गोबिन्द सिंह के नाम के सिक्के ढलवाए।

सिक्खों द्वारा सरहिंद के सूबेदार वजीर खाँ को मार दिए जाने से बहादुरशाह के कान खड़े हुए। उसने अपने प्रमुख अमीरों को सिक्खों का दमन करने के लिए पंजाब की तरफ रवाना किया तथा वह स्वयं भी विशाल सेना लेकर पंजाब की तरफ चल पड़ा।

दिसम्बर 1710 में मुगलों ने बन्दा बैरागी के मुख्य केन्द्र लौहगढ़ पर अधिकार कर लिया परन्तु बन्दा बैरागी वहाँ से भाग निकला। इससे पहले कि सिक्ख विद्रोह पूर्ण रूप से कुचल दिया जाता, फरवरी 1712 में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई।

इसके बाद बन्दा बैरागी ने बिना कोई समय खोए, फिर से अपने राज्य के एक बड़े भाग पर अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत कर लिया। बन्दा बैरागी ने सरहिन्द क्षेत्र से मुगल अधिकारियों को हटाकर सिक्ख अधिकारियों को नियुक्त किया।

इस प्रकार उसने प्रथम सिक्ख राज्य की स्थापना की किंतु बन्दा बहादुर ने स्वयं न तो कोई पदवी धारण की और न कभी दरबार लगाया। उसने सभी कार्य गुरु के नाम से किये।

बहादुरशाह के बाद मुगलों की गद्दी पर बैठे अल्पकालिक मुगल बादशाह सत्ता के लिए हो रहे खूनी संघर्षों, दक्षिण भारत के विद्रोहों तथा राजपूतों के हमलों से निबटने में लगे रहे और वे सिक्खों की तरफ ध्यान नहीं दे सके। बंदा बहादुर ने मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए पंजाब से बाहर निकलकर गंगा-यमुना दोआब में सहारनपुर और उसके निकट के क्षेत्रों तक आक्रमण किये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चूड़ामन जाट

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चूड़ामन जाट

चूड़ामन जाट सिनसिनी के जाट परिवार में उत्पन्न हुआ था। उसके पिता का नाम भज्जा सिंह था। चूड़ामन को ही भरतपुर के राजवंश का संस्थापक माना जाता है। एक समय ऐसा भी आया जब दिल्ली के लाल किले ने चूड़ामन जाट के सामने घुटने टेक दिए!

शाहजहाँ के समय से ही आगरा-मथुरा क्षेत्र में जाट संगठित एवं शक्तिशाली होने लगे थे। ईस्वी 1670 में औरंगजेब ने वीर गोकुला जाट के टुकड़े करवाकर जाटों को कुचलने का प्रयास किया था किंतु जाटों का आंदोलन ब्रजराज सिंह, भज्जासिंह तथा बदनसिंह आदि जाट नेताओं के नेतृत्व में निरंतर गति पकड़ता रहा।

ईस्वी 1688 में वीर राजाराम जाट ने औरंगजेब के पूर्वज शहंशाह अकबर की हड्डियाँ आग में डाल दीं थीं।  इसके बाद जाटों और मुगलों में नए सिरे से ठन गई थी।

जब औरंगजेब दक्षिण भारत में अंतिम सांसें गिन रहा था तब जाटों का नेतृत्व चूड़ामन जाट के हाथों में था। औरंगजेब ने चूड़ामन को कुचलने का बहुत प्रयास किया किंतु चूड़ामन आगरा, मथुरा, अलीगढ़, हाथरस, धौलपुर, रतनपुर, होडल आदि के जाटों के बल पर मुगलों से संघर्ष करता रहा।

उन दिनों दिल्ली से ग्वालियर, आगरा से अजमेर तथा मालवा की ओर जाने वाले शाही काफिले तथा व्यापारिक काफिले जाटों द्वारा लूटे जा रहे थे। जाटों ने गारू, हलैना, सौंख, सिनसिनी, थून आदि स्थानों पर गढ़ियां बना रखी थीं। ये गढ़ियां लूट के माल से भरती जा रही थीं जिनसे जाट वीरों को वेतन, अनाज एवं हथियार उपलबध करवाए जाते थे।

इस काल में राजपूतों एवं मुगलों को किसानों से भूराजस्व प्राप्त होता था जबकि मराठों, जाटों एवं सिक्खों की सेनाएं लूट तथा चौथ से प्राप्त पैसे पर खड़ी थीं। जब जून 1708 में औरंगजेब के शहजादे मुअज्जमशाह और आजमशाह जजाऊ के मैदान में लड़ने पहुंचे तो चूड़ामन भी एक विशेष योजना के साथ जाट बंदूकचियों को लेकर जजाऊ में जाकर बैठ गया। उसने इस युद्ध में किसी का भी पक्ष नहीं लिया।

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उन दिनों के युद्धों में यह एक आम प्रचलन था कि युद्ध के पश्चात् विजेता सैनिक, पराजित पक्ष की सेना के डेरे लूटता था किंतु चूड़ामन की योजना यह थी कि जब युद्ध के दौरान दोनों पक्षों की काफी क्षति हो चुकी होगी, तब वह कमजोर पक्ष वाले शहजादे के डेरे लूटकर भाग जाएगा।

मुअज्जमशाह और आजमशाह दोनों ही पक्ष चूड़ामन जाट के इरादों को नहीं भांप सके। उन्होंने जाटों को जजाऊ के निकट आकर जमा होते हुए देखा किंतु इस समय वे जाटों से बात करके उनके इरादों का पता लगाने की स्थिति में नहीं थे। परिस्थितियां भी कुछ ऐसी बन गई थीं कि युद्ध बिना किसी योजना के अचानक आरम्भ हो गया था अतः किसी भी पक्ष को जाटों की तरफ ध्यान देने का अवसर भी नहीं मिला।

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आगरा एवं धौलपुर का क्षेत्र उत्तर भारत के सबसे गर्म क्षेत्रों में से है। यदि चम्बल एवं यमुना को छोड़ दिया जाए तो गर्मियों में दूर-दूर तक कहीं पानी उपलब्ध नहीं होता। यही कारण था कि आजम और मुअज्जम चम्बल में पानी की उपलब्धता को देखते हुए जजाऊ में लड़ने के लिए आए थे।

20 जून 1708 को जिस समय अचानक युद्ध आरम्भ हुआ, उस समय सूर्य भगवान आकाश के मध्य में थे और धरती पर मानो आग बरस रही थी। भीषण गर्मी के कारण सैनिकों की आंखें बंद हो रही थीं और पानी के अभाव में उनके अंग शिथिल हो रहे थे। जब दोनों ओर से तोपें चलनी शुरु हुईं तो दोनों पक्षों के सिपाही बार-बार युद्ध का मैदान छोड़कर दूर-दूर भागने लगे। इस दौरान तोप का एक गोला लगने से मुअज्जमशाह के शिविर में आग लग गई। चूड़ामन जाट इसी अवसर की प्रतीक्षा में था। उसने जाट बंदूकचियों को मुअज्जमशाह के डेरे लूटने के आदेश दिए। जाटों ने मुअज्जमशाह के खेमे में जमकर लूट मचाई तथा जितना अधिक सामान उठा सकते थे उसे ऊंटों एवं घोड़ों पर लादकर भाग लिए।

जाटों का एक समूह अब भी मैदान के निकट जमा था। जैसे ही उन्हें ज्ञात हुआ कि मुअज्जमशाह का पलड़ा भारी हो गया है और आजमशाह की हार हो रही है तो जाट फिर से सक्रिय हो गए। इस बार उन्होंने आजमशाह के डेरों को लूटा।

इस लूट में चूड़ामन जाट को इतना अधिक धन एवं माल प्राप्त हुआ कि अब वह आराम से एक विशाल सेना खड़ी कर सकता था। चूड़ामन को दोनों खेमों से अपार खजाना, बहुमूल्य आभूषण, हीरे-जवाहरात, बड़ी संख्या में ऊंट, घोड़े एवं बैल हाथ लगे थे। जब तक मुअज्जमशाह युद्ध समाप्त करके अपने खेमे में लौटता तब तक चूड़ामन तथा उसके जाट जजाऊ से बहुत दूर जा चुके थे।

युद्ध की समाप्ति के बाद बहुत से मुगल एवं राजपूत सैनिक धौलपुर तथा ग्वालियर की ओर भागे। इन भागते हुए सैनिकों पर जाटों तथा रूहेलों ने आक्रमण किए। जान बचाने के लिए भागते हुए सैनिकों को पकड़-पकड़कर मारा गया। उनके शवों से चम्बल की खारें भर गईं। इरविन तथा नत्थनसिंह नामक आधुनिक लेखकों ने लिखा है कि एक भी मुगल सैनिक, जाटों की लूट से नहीं बच सका।

जजाऊ के युद्ध के बाद जब मुअज्जमशाह विजयी हुआ और बहादुरशाह के नाम से बादशाह बना तो उसने चूड़ामन जाट को अपने दरबार में बुलाया। बहादुरशाह ने अपने विरोधियों एवं शत्रुओं के प्रति एक विशेष प्रकार की नीति अपनाई थी। इस नीति के अनुसार वह अपने विरोधियों को अपने पक्ष में आने का अवसर देता था ताकि वे मित्र बनकर रहें।

इसी नीति के तहत बहादुरशाह ने चूड़ामन जाट को आगरा के लाल किले में बुलाया। उसने चूड़ामन को 1500 जात तथा 500 सवार का मनसब देकर शाही नौकरी में रख लिया। इस प्रकार लाल किले ने पहली बार जाटों के समक्ष घुटने टेक दिए। चूड़ामन साधारण किसान का बेटा था किंतु अब वह राजाओं-महाराजाओं की श्रेणी में 1500 जात का मनसबदार बन गया था।

जब बहादुरशाह ने सवाई जयसिंह को आम्बेर राज्य से हटाया तो बहादुरशाह ने चूड़ामन जाट को आम्बेर राज्य के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए नियुक्त किया। बाद में जब मुगल बादशाह कमजोर पड़ गए तो चूड़ामन ने आम्बेर नरेश जयसिंह से समझौता करके उत्तर भारत की राजनीति में जाटों के प्रभाव को और अधिक बढ़ा दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहादुरशाह की मृत्यु

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बहादुरशाह की मृत्यु

औरंगजेब का पुत्र मुअज्जमशाह मुगलों के इतिहास में शाहआलम (प्रथम) तथा बहादुरशाह (प्रथम) के नाम से जाना जाता है। जब बहादुरशाह की मृत्यु हुई तो उसका शव ढाई माह तक नहीं दफनाया जा सका!

जिस समय बहादुरशाह ने आम्बेर तथा जोधपुर के राजाओं को हटाकर उनके राज्यों पर कब्जा कर लिया था, उस समय उदयपुर का महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) भी इन सारी गतिविधियों को सतर्कता पूर्ण दृष्टि से देख रहा था। महाराणा को लगा कि अब बहादुरशाह उदयपुर की तरफ अभियान करेगा। इसलिए महाराणा अमरसिंह अपने पूर्वजों की नीति पर चलते हुए उदयपुर नगर खाली करके गहन पर्वतों में चला गया ताकि यदि बहादुरशाह अमरसिंह के पीछे आए तो उसे पहाड़ों में घेरकर नष्ट किया जा सके।

उधर बहादुरशाह भी अमरसिंह की गतिविधियों पर दृष्टि रख रहा था। इसलिए जब उसे ज्ञात हुआ कि महाराणा अमरसिंह पहाड़ों में चला गया है तो वह समझ गया कि यदि उसने उदयपुर जाने की गलती की तो उसकी सेना भी उसी तरह पीस दी जाएगी जिस तरह उसके पिता औरंगजेब की सेना को महाराणा अमरसिंह के बाबा राजसिंह ने पीस दिया था। अतः बहादुरशाह ने महाराणा के जाल में फंसने की बजाय घोषणा की कि वह उदयपुर पर अभियान करने की बजाय अपने भाई कामबख्श से निबटने के लिए हैदराबाद जाएगा।

जब बहादुरशाह अपने भाई कामबख्श का दमन करके दक्षिण भारत से लौटकर आया तो वह मेवाड़ के घाटे की तरफ बढ़ा। महाराणा अब भी पहाड़ों में था किंतु बहादुरशाह के लिए अब भी परिस्थितियां ऐसी नही हुई थीं कि वह उदयपुर के महाराणा से युद्ध में उलझ सके।

उसे पंजाब की परिस्थितियों की पूरी जानकारी थी जहाँ एक तरफ सिक्खों ने सरहिंद के बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया था तथा दूसरी तरफ लाहौर के सुन्नी मुल्ला-मौलवियों ने बादशाह के विरुद्ध बड़ा आंदोलन खड़ा कर लिया था। लाहौर के मुल्ला-मौलवी बादशाह द्वारा अपने खुतबे में वली के स्थान पर अली का प्रयोग किए जाने से नाराज थे। इसलिए बादशाह सिक्खों का दमन करने तथा लाहौर के मुल्ला-मौलवियों से समझौता करने के लिए लाहौर चला गया।

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बादशाह ने राजपूत राजाओं को शांत करने के लिए महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) को असद खाँ से पत्र लिखवाकर आश्वस्त किया कि महाराणा आपसे पूर्ववत् मित्रता रखते हैं, इसलिए आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। बादशाह ने महाराजा अजीतसिंह को जोधपुर का तथा महाराजा सवाई जयसिंह को आम्बेर का शासक स्वीकार कर लिया तथा उन्हें बादशाह के समक्ष उपस्थित होकर शाही सेवा करने के आदेश भिजवाए।

लाहौर में बादशाह ने मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक बुलाई तथा उनकी बातें सुनकर अपना पक्ष स्पष्ट करने का प्रयास किया किंतु बैठक के दौरान मुल्ला-मौलवियों ने बहुत शोर-शराबा किया और दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे। इस पर मुल्ला-मौलवियों ने बादशाह के विरुद्ध युद्ध करने की धमकी दी। इसके बाद बहादुरशाह ने बैठक बंद कर दी। अभी बहादुरशाह लाहौर में ही प्रवास कर रहा था कि जनवरी 1712 में बहादुरशाह का स्वास्थ्य खराब हो गया। इतिहासकार विलियम इरविन के अनुसार बहादुरशाह 24 फरवरी 1712 को अंतिम बार जनता के समक्ष आया।

इसके बाद वह खाट से नहीं उठ सका और 27-28 फरवरी की रात्रि में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई। शाही हकीमों के अनुसार बहादुरशाह की मृत्यु तिल्ली बढ़ जाने से हुई।

बहादुरशाह की मृत्यु के पश्चात् उसके चारों पुत्रों, जहाँदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह में उत्तराधिकार का युद्ध आरंभ हो गया। फलतः बहादुरशाह का शव लाहौर के दुर्ग में ही पड़ा रहा और उसे दफनाया नहीं जा सका। बहादुरशाह की बेगम मिहिर परवर तथा बादशाह का मंत्री चिनकुलीच खाँ बादशाह के शव की सुरक्षा के लिए उसके पास लाहौर में ही बैठे रहे।

उधर बहादुरशाह के पुत्रों में हुए उत्तराधिकार के संघर्ष में जहाँदारशाह ने मुगल सेनापति जुल्फिकार खाँ की सहायता से अपने बड़े भाई अजीमुश्शन को हरा दिया तथा 29 मार्च 1712 को दिल्ली के तख्त पर अधिकार जमाने में सफलता प्राप्त कर ली। जहाँदारशाह ने अपने पूर्वजों की नीति का अनुसरण करते हुए अपने तीनों भाइयों को मार डाला।

11 अप्रेल 1712 को बहादुरशाह की बेगम मिहिर परवर तथा बहादुरशाह का मंत्री चिनकुलीच खाँ बहादुरशाह का शव लेकर लाहौर से दिल्ली के लिए रवाना हुए। 15 मई 1712 को उसे दिल्ली के महरौली नामक स्थान पर मोती मस्जिद में दफना दिया गया। यह मस्जिद कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास स्थित है।

ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु से लेकर ई.1712 में बहादुरशाह की मृत्यु के समय तक भारत वर्ष की परिस्थितियों में विशेष परिर्वतन नहीं आया था किंतु निकट भविष्य में होने वाले परिवर्तनों की आहट साफ सुनाई देने लगी थी। औरंगजेब अपने जीवन के अंतिम 25 सालों में दक्षिण भारत में रहा था।

औरंगजेब का इतिहास लिखने वाले जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि इस दौरान दक्षिण भारत में युद्ध, सूखे, अकाल एवं महामारी के कारण प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख मनुष्यों एवं तीन लाख ऊंट, बैल एवं घोड़े आदि मालवाहक पशुओं की मृत्यु होती थी। इस कारण दक्षिण भारत में जगह-जगह पर शव सड़ते हुए दिखाई देते थे तथा पूरा क्षेत्र खेती से रहित होकर शमशान जैसा दिखाई देता था।

जब बहादुरशाह बादशाह हुआ तो उसने पांच साल में केवल तीन युद्ध लड़े थे जिनमें से पहला युद्ध जजाऊ के मैदान में आजमशाह से, दूसरा युद्ध हैदराबाद में अपने भाई कामबख्श से तथा तीसरा युद्ध सरहिंद में बंदा बहादुर से लड़ा था। जजाऊ के युद्ध में बड़ी जन हानि हुई थी किंतु हैदराबाद एवं पंजाब के युद्धों में अधिक विनाश नहीं हुआ था। यही कारण था कि बहादुरशाह के काल में दक्षिण भारत में जीवन के चिह्न फिर से दिखाई देने लगे थे।

फिर भी औरंगजेब अपने शासन के पचास साल में भारत की जनता को जो गहरे जख्म देकर गया था, वे जख्म कई शताब्दियों में भी ठीक नहीं हो सकते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जहाँदारशाह

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जहाँदारशाह

जहाँदारशाह मरहूम बादशाह शाहआलम प्रथम (बहादुरशाह प्रथम) का सबसे बड़ा पुत्र था जिसने अपने भाइयों को हराकर मुगलिया तख्त पर अधिकार कर लिया। वह इतना अय्याश किस्म का आदमी था कि उसने लाल किले को नृत्यांगनाओं का अड्डा बना दिया!

24 फरवरी 1712 को बहादुरशाह की मृत्यु हो गई। उसके चार पुत्र थे- जहाँदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह। जैसे ही बहादुरशाह की मृत्यु हुई, उसके दो पुत्रों जहाँदारशाह तथा अजीमुश्शान ने स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया।

बहादुरशाह के पुत्रों में से जहाँदारशाह सबसे बड़ा था। उसका वास्तविक नाम मिर्जा मुइज्जुद्दीन बेग मुहम्मद खान था। उसका जन्म 9 मई 1661 को दक्षिण भारत में हुआ था। उसकी माँ निजामबाई हैदराबाद के शिया अमीर फतेहयार की बेटी थी।

जहाँदारशाह की बुआ जीनत उन्निसा जहाँदारशाह को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी और प्रायः बादशाह औरंगजेब के समक्ष जहाँदारशाह की शिकायत किया करती थी। फिर भी औरंगजेब ने अपने पोते जहाँदारशाह को ई.1671 में बल्ख का सूबेदार नियुक्त किया था। एक बार उसे सिंध का सूबेदार भी नियुक्त किया गया।

जहाँदारशाह को समुद्री मार्ग से दूर देशों के साथ व्यापार करने का बहुत शौक था और वह अपने व्यापारिक जहाजों के साथ हिंद महासागर में दूर-दूर तक घूमा करता था। इस व्यापार के कारण ही जहाँदारशाह ने बहुत पैसा कमा लिया था।

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17 मार्च 1712 को जब बहादुरशाह मर गया तो लाहौर के निकट जहाँदारशाह तथा अजीमुश्शान के बीच बड़ा युद्ध हुआ। इस युद्ध में जहाँदारशाह को अपने पिता के वजीर मीर बख्शी जुल्फिकार खाँ की सहायता प्राप्त हो गई। इस कारण जहाँदारशाह उत्तराधिकार के युद्ध में विजयी रहा। अजीमुश्शन मारा गया।

जहाँदारशाह ने अपने शेष दोनों छोटे भाइयों रफ़ीउश्शान और जहानशाह को भी मार डाला। इसके बाद 29 मार्च 1712 को जहाँदारशाह मुग़लों के तख्त पर बैठा। जिस समय जहाँदारशाह बादशाह बना, वह 51 साल का प्रौढ़ हो चुका था।

जहाँदारशाह का पहला विवाह ईरान के सफावी राजवंश की पुत्री से हुआ था। जब जहाँदारशाह की पहली बेगम का निधन हो गया तो जहाँदारशाह ने मरहूम बेगम की भतीजी सयैद उन्निसा से विवाह कर लिया। जहाँदारशाह का तीसरा विवाह अनूपबाई नामक एक हिन्दू स्त्री से हुआ था।

इन विवाहों से जहाँदारशाह को तीन पुत्र प्राप्त हुए जिनमें से अनूपबाई का पुत्र अजीजुद्दीन आगे चलकर ई.1754 से 1759 की अवधि आलमगीर (द्वितीय) के नाम से बादशाह बना। जब जहाँदारशाह बादशाह बन गया तो उसने अपनी चहेती नर्तकी लाल कुंवर से विवाह कर लिया तथा उसे इम्तियाज महल का खिताब देकर अपनी मुख्य बेगम घोषित कर दिया।

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औरंगजेब के समय में एक शिया मुसलमान असद खाँ बादशाह का प्रधानमंत्री था। बहादुरशाह ने भी उसे अपना वकीले मुतलक नियुक्त किया था तथा उसके पुत्र ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को अपना बख्शी बनाया था। चूंकि असद खाँ तथा जुल्फिकार खाँ के सहयोग से ही जहाँदारशाह बादशाह बन सका था इसलिए जहाँदारशाह ने जुल्फिकार खाँ को प्रधान मंत्री एवं उसके पिता असद खाँ को वकीले मुतलक बने रहने दिया। असद खाँ तथा जुल्फिकार खाँ दोनों ही औरंगजेब तथा बहादुरशाह के प्रति पूर्ण निष्ठावान बनकर रहे थे अतः नए बादशाह ने भी उन पर पूर्ण विश्वास कर लिया। ये दोनों ही राजकाज से लेकर युद्धों के मैदान तक कई बार अपनी विश्वसनीयता, योग्यता एवं दक्षता को सिद्ध कर चुके थे।

जिस दिन जहाँदारशाह मुग़लों के तख्त पर बैठा, उस दिन उसके पिता बहादुरशाह को मरे हुए ठीक एक माह हुआ था। तब से बहादुरशाह का शव लाहौर के दुर्ग में पड़ा था। इसलिए प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने बादशाह का शव दिल्ली मंगवाकर दफनाया। प्रधानमंत्री जुल्फिकार खाँ तथा उसका पिता असद खाँ शिया मुसलमान थे तथा मुगल दरबार में ईरानी गुट के नेता थे।

तत्कालीन इतिहासकार खफी ख़ाँ ने लिखा है कि जहाँदारशाह के दरबार में चारणों, गायकों, नर्तकों, भाटों एवं भाण्डों का बोलबाला हो गया। इस कारण शासन की बागडोर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के हाथों में चली गई तथा जहाँदारशाह का दरबार नृत्यांगनाओं का अड्डा बन गया।

नए बादशाह ने मुगल सल्तनत पर भले ही अधिकार कर लिया था किंतु अपने ही दरबार में उसकी स्थिति मजूबत नहीं थी। उसका दरबार शिया और सुन्नी अर्थात् ईरानी एवं तूरानी गुटों में बंटा हुआ था। हिन्दुस्तानी अमीरों ने अपना अलग गुट बना रखा था। इस काल में बहुत से दरबारी एवं सूबेदार, जहाँदारशाह के अन्य भाइयों के पुत्रों को सुल्तान बनाने का प्रयास कर रहे थे।

शासन की शक्तियां जुल्फिकार खाँ के हाथों में चले जाने से बादशाह की स्थिति बड़ी विचित्र हो गई। एक ओर तो प्रधानमंत्री अपनी मनमर्जी से आदेश जारी करने लगा और दूसरी ओर दरबार के ईरानी एवं तूरानी अमीर, जुल्फिकार खाँ का निर्देशन स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इस काल में हिन्दू उमराव लगभग पूरी तरह से मुगल दरबार से दूर हो चुके थे।

बहादुरशाह ने हालांकि अपनी मृत्यु से पहले राजपूतों, मराठों एवं जाटों से अपने सम्बन्ध सामान्य बनाने का प्रयास किया था और सिक्खों के अंतिम गुरु गोविंदसिंह से भी उसके सम्बन्ध अच्छे हो गए थे तथापि बंदा बहादुर द्वारा संघर्ष को जारी रखने के कारण बहादुरशाह सिक्खों को अपने पक्ष में नहीं कर सका था। केवल पौने पांच साल के शासन के बाद बहादुरशाह की अचानक मृत्यु हो जाने से वह अपने प्रति निष्ठावान हिन्दू पक्ष खड़ा नहीं कर सका था।

जहांदारशाह इस बात को समझता था कि मुसलमान अमीर चाहे वे शिया हों या सुन्नी, चाहे वे ईरानी हों या तूरानी, चाहे वे विदेशी हों या देशी, हर समय अपनी ताकत बढ़ाने और बादशाह को कमजोर करने में लगे रहेंगे। जबकि हिन्दू सरदार विशेषतः राजपूत राजा यदि एक बार वचन दे देंगे तो जीवन भर बादशाह के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे। इसलिए उसने अपने पूर्वज अकबर की मधु-मण्डित सुलह कुल नीति पर लौटने का निर्णय लिया जिसे उसके बाबा औरंगजेब तथा पिता बहादुरशाह ने त्याग दिया था और जिसके कारण मुगल बादशाह की ताकत कमजोर हो गई थी तथा मुस्लिम अमीर बादशाह के विरुद्ध सिर उठाने लगे थे।

जहाँदारशाह ने सबसे पहले आम्बेर के सवाई राजा जयसिंह के पूर्वजों की सेवाओं को ध्यान में रखकर मुगल सल्तनत में उसकी शक्ति को पुनर्स्थापित करने का निर्णय लिया तथा सवाई जयसिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त कर दिया और उसे मिर्जाराजा की पदवी दी। सवाई जयसिंह के कहने से जहाँदारशाह ने पूरी सल्तनत में जजिया कर को भी समाप्त कर दिया।

बादशाह ने इसी तरह की रेशमी नीति मारवाड़ के राजा अजीत सिंह के साथ अपनाई तथा उसे महाराजा की पदवी देकर गुजरात का सूबेदार बना दिया। बादशाह ने चूड़ामन जाट तथा छत्रसाल बुन्देला के साथ भी मेल-मिलाप की नीति को तथा बन्दा बहादुर के विरुद्ध दमन की नीति को जारी रखा।

इस तरह जहाँदारशाह के काल में एक तरफ हिन्दू राजाओं को प्रसन्न करने का प्रयास किया जा रहा था तो दूसरी ओर मुस्लिम अमीरों के ओहदों में पिछले बादशाह के समय में की गई अंधाधुंध वृद्धि पर रोक लगा दी गई थी ताकि सल्तनत की वित्तीय स्थिति सुधर सके। इससे मुस्लिम अमीर जहाँदारशाह से नाराज हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जहाँदारशाह की हत्या

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जहाँदारशाह की हत्या

जहाँदारशाह की हत्या से भारत के मुगलों में बादशाहों की हत्या का एक लम्बा सिलसिला शुरु होता है। हत्याओं के इसी सिलसिले ने मुगल सल्तनत को उसके अंत तक पहुंचा दिया। ईरानी वजीरों ने गद्दारी करके जहाँदारशाह की हत्या करवाई!

मुगल बादशाह जहाँदारशाह ने शासन व्यवस्था में बड़े परिवर्तन करने के प्रयास किए। उसने राज्य की आय को बढ़ाने के लिए लगान वसूली के लिए इजारा व्यवस्था को बढ़ावा दिया। इसके अन्तर्गत इजारेदारों अर्थात् लगान वसूलने वाले ठेकेदारों से निश्चित भू-राजस्व वसूल करने के बदले में सरकार ने उन्हें यह अधिकार दे दिया था कि वे किसानों से जितना चाहे लगान वसूल कर लें।

इस व्यवस्था से मुगल सल्तनत में किसानों का शोषण एवं उत्पीड़न बढ़ गया। जहांदारशाह ने सोने, चांदी तथा ताम्बे के सिक्के भी ढलवाए ताकि लोगों के मन में नए बादशाह की महानता के प्रति विश्वास उत्पन्न हो सके।

यहाँ तक की नीतियों में तो वजीर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने बादशाह का साथ दिया किंतु जैसे ही बादशाह ने ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ की शक्तियों में कमी करनी चाही तो ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने बादशाह के विरुद्ध षड़यंत्र रचना प्रारंभ कर दिया। इस कारण बादशाह तथा वजीर के सम्बन्ध खराब हो गए।

ई.1712 में जिस समय जहाँदारशाह ने अपने छोटे भाई अजीमउश्शान को मार डाला था, उस समय अजीमुश्शान के दूसरे नम्बर के पुत्र फर्रूखसियर ने आत्महत्या करने का प्रयास किया था किंतु उसे बचा लिया गया।

फर्रूखसियर इस बात को कभी नहीं भूल सका कि उसके पिता को जहांदारशाह ने युद्ध के मैदान में मार गिराया था। वह अपने ताऊ से अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहता था। उसने अपनी स्वयं की एक सेना बनाने का प्रयास किया किंतु वह सेना इतनी छोटी थी कि मुगल बादशाह की विशाल सेना का सामना नहीं कर सकती थी।

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फर्रूखसियर ने पटना के सूबेदार सैयद हुसैन अली खाँ से इस सम्बन्ध में बात की। सूबेदार सैयद अली ने फर्रूखसियर को आश्वस्त किया कि यदि फर्रूखसियर, जहांदारशाह पर आक्रमण करेगा तो मैं तथा मेरा भाई सैयद अब्दुल्ला खाँ आपकी सहायता करेंगे। जिस प्रकार सैयद अली पटना का सूबेदार था, उसी प्रकार सयैद अब्दुल्ला खाँ इलाहाबाद का सूबेदार था।

सैयदों से यह आश्वासन मिलने पर फर्रूखसियर ने स्वयं को पटना में मुगलों का बादशाह घोषित कर दिया तथा अपने नाम के सिक्के चलाये। इसके बाद वह सेना लेकर आगरा की तरफ बढ़ा। 10 जनवरी 1713 को आगरा के निकट जहाँदारशाह तथा फर्रूखसियर की सेनाओं में युद्ध हुआ।

वजीर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ तथा उसका बाप वकीले मुतलक असद खाँ भी फर्रुखसीयर और सैयद बंधुओं से मिल गए। जहांदारशाह के दो बड़े वजीर चिनकुलीच खाँ एवं अमीन खाँ, युद्ध से तटस्थ हो गए। मरहूम बादशाह बहादुरशाह का धायभाई कोकतलाश इस युद्ध में जहांदारशाह के साथ रहा।

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यद्यपि जहाँदारशाह की सेना में 70-80 हजार घुड़सवार तथा बड़ी संख्या में पैदल सैनिक थे और फर्रूखसियर के पास इससे एक-तिहाई फौज भी नहीं थी, फिर भी वजीरों, सूबेदारों एवं अपने ही परिवार के लोगों की गद्दारी के कारण जहाँदारशाह बुरी तरह परास्त हो गया। जहांदारशाह युद्ध के मैदान से भाग कर अगारा शहर में पहुंचा तथा अपने महल में न जाकर वकीले मुतलक असद खाँ की हवेली में पहुंचा किंतु असद खाँ ने जहांदारशाह को पकड़कर फर्रूखसियर के हाथों सौंप दिया। फर्रूखसियर ने अपने ताऊ जहांदारशाह को उसकी बेगम लाल कुंवर के साथ लाल किले में एक कोठरी में बंद कर दिया।

11 फरवरी 1713 को फर्रूखसियर ने कुछ पेशेवर हत्यारों के द्वारा जहाँदारशाह की हत्या करवा दी। उसकी प्रेयसी लाल कुंवर को भी उसी के साथ मार डाला गया। जो असद ख़ाँ एवं ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ औरंगजेब और बहादुरशाह के शासनकाल में विश्वसनीयता एवं विनम्रता की प्रतिमूर्ति बने रहते थे, अब उन्होंने ही अपने मालिक से गद्दारी करके उसकी हत्या करवा दी ताकि नए बादशाह के शासन में भी असद ख़ाँ एवं ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को बड़े पद मिल सकें।

समकालीन मुस्लिम इतिहासकार इरादत ख़ाँ ने जहाँदारशाह के विषय में लिखा है- ‘वह रंगरेलियों में डूबे रहने वाला एक कमज़ोर बादशाह था, जिसने न तो राज्य के कार्यों की चिन्ता की, और न उमरावों में से किसी का उससे लगाव था। जहाँदारशाह के शासनकाल में उल्लू, बाज के घोंसले में रहता था, तथा कोयल का स्थान कौवे ने ले लिया था। वह लम्पट मूर्ख था तथा उसने लाल कुंवर नामक वेश्या को दरबार में हस्तक्षेप करने के अधिकार दे रखे थे।’

इरादत ख़ाँ के आरोप सही प्रतीत नहीं होते क्योंकि जहाँदारशाह ने 11 माह ही शासन किया। इतनी कम अवधि में उसने ऐसा क्या कर दिया था कि ‘उल्लू’ बाज के घोंसले में रहने लगा था, तथा ‘कोयल’ का स्थान कौवे ने ले लिया था। यह एक अनर्गल एवं अनावश्यक टिप्पणी प्रतीत होती है। संभवतः यह मुस्लिम इतिहासकार इरादत खाँ, वजीर जुल्फिकार खाँ के हाथों की कठपुतली था तथा साथ ही साथ धर्मान्ध भी था। इस कारण वह निष्पक्ष रहकर इतिहास नहीं लिख सका।

वास्तविकता यह थी कि उस काल में किसी वजीर को इस बात की चिंता नहीं होती थी कि बादशाह मूर्ख या लम्पट है। वजीर से लेकर तमाम अमीर एवं उमराव तो बादशाह के दुश्मन इसलिए हो गए थे क्योंकि बादशाह ने हिन्दू राजाओं से दोस्ती करके अपने मुस्लिम वजीरों एवं अमीरों पर नकेल कसनी आरम्भ कर दी थी।

मुस्लिम इतिहासकारों का अनुसरण करते हुए अंग्रेज इतिहासकार इरविन ने भी उन्हीं बातों को दोहरा दिया तथा लिखा कि- ‘तैमूर के ख़ानदान में जहाँदारशाह पहला बादशाह था, जिसने स्वयं को बेहद नीचता, क्रूर स्वभाव, दिमाग के छिछलेपन तथा कायरता के कारण शासन करने में पूरी तरह से अयोग्य पाया।’

बाद में जब स्वतंत्र भारत में कम्यूनिस्ट इतिहासकारों का बोलबाला हुआ तो उन्होंने भी बिना सोचे-समझे जहांदारशाह के विरुद्ध यही टिप्पणियां लिख मारीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फर्रूखसियर

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फर्रूखसियर

फर्रूखसियर ई.1713 में जुल्फिकार खाँ, असद खाँ तथा सैयद बन्धुओं की सहायता से बादशाह बना था। इन सभी लोगों ने अपने पुराने बादशाह जहांदारशाह से धोखा करके फर्रूखसियर को बादशाह बनाया था। इस कारण फर्रूखसियर बादशाह बनते ही भयानक षड़यंत्रों में घिर गया!

सैयद बंधुओं द्वारा फर्रूखसियर को सहायता दिए जाने का कारण यह था कि सैयद बंधुओं के उत्थान में फर्रूखसियर के पिता अजीम-उस-शान की बड़ी भूमिका रही थी जबकि जहांदारशाह सैयद बंधुओं को अच्छी दृष्टि से नहीं देखता था।

इसलिये सैयद बंधुओं ने जहाँदारशाह के विरुद्ध विद्रोह करके फर्रूखसियर को तख्त पर बैठाने में सहायता की थी। जुल्फिकार खाँ तथा असद खाँ द्वारा फर्रूखसियर से सहयोग किए जाने का कारण यह था कि बादशाह जहांदारशाह जुल्फिकार खाँ के अधिकारों में कटौती करने का प्रयास कर रहा था।

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बादशाह बनने के बाद फर्रूखसियर ने इलाहाबाद के सूबेदार सैयद अब्दुल्ला खाँ को अपना वजीर नियुक्त किया तथा अब्दुल्ला के छोटे भाई सैयद हुसैन अली को अपनी सेना का प्रधान नियुक्त किया। जुल्फिकार खाँ तथा असद खाँ भी उच्च पदों पर आसीन किए गए।

इन सभी गद्दार अमीरों का अनुमान था कि तीस वर्षीय अनुभवहीन फर्रूखसियर में निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है तथा अब तक किसी भी उच्च पद पर कार्य नहीं करने के कारण उसे शासन चलाने का अनुभव नहीं है।

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इस कारण इन वजीरों ने सल्तनत की सम्पूर्ण शक्ति अपने हाथों में रखने के षड़यंत्र आरम्भ कर दिए। ये लोग मनमानी करने लगे तथा सैयद बन्धुओं ने शासन के सूत्र अपने हाथों में ले लिए। यही कारण है कि फर्रूखसियर के शासन काल के आरंभ अर्थात् ईस्वी 1713 से लेकर ईस्वी 1721 तक के काल को मुगलों के इतिहास में सैयद बन्धुओं का युग कहा जाता है। उधर फर्रूखसियर इतना नासमझ नहीं था, जितना कि उसके वजीर समझ रहे थे। फर्रूखसियर को आशा थी कि एक बार बादशाह बन जाने पर परिस्थितियां स्वतः उसके अनुकूल हो जाएंगी तथा सैयद बंधु एवं समस्त वजीर बादशाह का आदेश मानने लगेंगे किंतुु सैयदों ने बादशाह की जरा भी परवाह नहीं की तथा वे बादशाह के आदेशों की उपेक्षा करके अपनी मर्जी से शासन चलाने लगे।

इस कारण फर्रूखसियर एवं सैयद बंधुओं में शीघ्र ही ठन गई। बादशाह ने सैयदों का प्रभाव कम करने के लिये सबसे पहले ईरानी गुट के नेता जुल्फिकार खाँ की हत्या करवा दी तथा तूरानी गुट के नेताओं मीर जुमला, चिनकुलीज खाँ और मुहम्मद अमीन खाँ आदि को अपने पक्ष में करके सैयदों पर नकेल कसने का प्रयास किया।

फर्रूखसियर ने आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह तथा जोधपुर नरेश अजीतसिंह से भी इस कार्य में सहायता लेनी चाही किंतु ये दोनों हिन्दू राजा फिर से मुगल बादशाहों के हाथों की कठपुतली नहीं बनना चाहते थे इसलिए उन्होंने फर्रूखसियर की कोई सहायता नहीं की।

इन दिनों चूड़ामन जाटों का नेतृत्व कर रहा था। उसने दिल्ली एवं आगरा के बीच के प्रदेशों में लूट मचा रखी थी। फर्रूखसियर ने आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह को निर्देश दिए कि वह जाटों के विरुद्ध कार्यवाही करे किंतु सवाई जयसिंह चूड़ामन को नहीं दबा सका। चूड़ामन के विरुद्ध अभियान जारी रखा गया। इस अभियान पर मुगलों के 2 करोड़ रुपये व्यय हुए। अंत में ईस्वी 1718 में फर्रूखसियर ने चूड़ामन से समझौता कर लिया।

मीर जुमला बादशाह के संवाद-वाहक विभाग का अध्यक्ष था किंतु वह फर्रूखसियर का अत्यंत विश्वसनीय बन गया। इसलिए बादशाह ने उसे शासन के समस्त बड़े निर्णय करने के अधिकार दे दिये। इस पर सैयद बंधुओं के कान खड़े हुए।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि जब बादशाह फर्रूखसियर ने हुसैन अली खाँ को मारवाड़ नरेश अजीतसिंह के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के लिए भेजा तब बादशाह ने महाराजा अजीतसिंह को एक गोपनीय पत्र भिजवाया कि यदि महाराजा अजीतसिंह सैयद हुसैन अली को खत्म कर दे तो अजीतसिंह को पुरस्कृत किया जायेगा।

यह बात ऐतिहासिक एवं तार्किक रूप से सही जान नहीं पड़ती क्योंकि महाराजा अजीतसिंह तथा बादशाह फर्रूखसियर के बीच इस तरह के विश्वास का कोई सम्बन्ध ही नहीं था।

जोधपुर के विरुद्ध सफलतापूर्वक कार्यवाही हो जाने के बाद फर्रुखसियर ने सैयद हुसैन अली को दक्षिण का सूबेदार बनाकर दक्षिण भारत जाने के आदेश दिये। साथ ही दक्षिण के कार्यवाहक सूबेदार दाऊद खाँ को गुप्त रूप से लिखा कि वह सैयद को रास्ते में ही खत्म कर दे।

दाऊद खाँ ने सैयद हुसैन अली की हत्या करने का प्रयास किया किंतु इस प्रयास में वह स्वयं मारा गया। बादशाह द्वारा दाऊद खाँ को प्रेषित गोपनीय कागज सैयद हुसैन के हाथ लग गये। उधर दिल्ली में फर्रूखसियर ने बड़े सैयद अब्दुल्ला खाँ को कत्ल करने की योजना बनाई परन्तु अन्य षड्यन्त्रों की भाँति वह भी विफल रही।

इतिहासकार एलफिंस्टन ने फर्रूखसियर पर आरोप लगाया है कि- ‘फर्रूखसियर बड़ी योजनाओं को समझ नहीं सकता था और छोटी योजनाओं को अपनी आलसी प्रकृति के कारण दूसरों की सहायता के बिना पूरी नहीं कर सकता था।’

इस काल में बादशाह की राजनीतिक दुर्दशा के कारणों को बहुत अच्छी तरह समझा जा सकता है। शहंशाह अकबर ने राजपूतों से मित्रता करके अपनी सल्तनत के चारों ओर जो मजबूत सुरक्षा चक्र तैयार किया था, उस सुरक्षा चक्र को मजहबी संकीर्णता के चलते औरंगजेब ने छिन्न-भिन्न कर दिया था।

अब औरंगजेब तो धरती से उठ चुका था किंतु उसके वंशज औरंगजेब की गलतियों का परिणाम भोगने के लिए अभिशप्त थे। फर्रूखसियर के दरबार में अब एक भी प्रबल हिन्दू राजा दिखाई नहीं देता था। वे तो स्वयं ही तलवारें खींचकर मुगलों का सत्यानाश करने पर तुल गए थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा अजीतसिंह से दुश्मनी

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महाराजा अजीतसिंह से दुश्मनी

मुगल बादशाह फर्रुखसीयर ने महाराजा अजीतसिंह से दुश्मनी बांध ली तथा एक दिन महाराजा अजीसिंह की हत्या करने उसके डेरे पर पहुंच गया!

मुगल बादशाह फर्रूखसियर एवं जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह के बीच सम्बन्ध शुरु से ही विचित्र प्रकार के रहे। जब ई.1713 में फर्रूखसियर बादशाह बना तो महाराजा अजीतसिंह ने फर्रूखसियर को बधाई का पत्र एवं एक हजार रुपए नजर के रूप में भिजवाए। फर्रूखसियर ने महाराजा को पांच हजार जात एवं पांच हजार सवार का मनसब दिया तथा उसे अपने दरबार में उपस्थित होने के निर्देश दिए किंतु महाराजा फर्रूखसियर के दरबार में उपस्थित नहीं हुआ।

फर्रूखसियर ने महाराजा को कई बार खिलअतें भेजीं तथा मुगल अधिकारियों को भी जोधपुर भेजा ताकि वे महाराजा को अपने साथ दिल्ली ले आएं किंतु महाराजा फर्रूखसियर के दरबार में नहीं गया। इस कारण फर्रूखसियर महाराजा अजीतसिंह से नाराज हो गया।

महाराजा अजीतसिंह का फर्रूखसियर के दरबार में नहीं जाने का एक विशेष कारण था। औरंगजेब तथा बहादुरशाह के शासन के दौरान वजीर के पद पर कार्य करने वाले जुल्फिकार खाँ ने जहांदारशाह तथा फर्रूखसियर के बीच आगरा के निकट तिलपत में हुए युद्ध में फर्रूखसियर का साथ दिया था किंतु जब फर्रूखसियर बादशाह बन गया तो फर्रूखसियर ने जुल्फिकार खाँ की हत्या करवा दी तथा वह सैयद बंधुओं को भी ठिकाने लगाने का षड़यंत्र करने लगा। 

इस कारण महाराजा सोचता था कि फर्रूखसीयर महाराजा अजीतसिंह से दुश्मनी मानता होगा तथा महाराजा अजीतसिंह की भी हत्या करवाएगा। क्योंकि अजीतसिंह अजमेर के मुगल फौजदार को तंग करता रहता था।

महाराजा का सोचना गलत नहीं था क्योंकि फर्रुखसीयर सचमुच ही महाराजा अजीतसिंह से दुश्मनी मानता था। इसके एक नहीं, कई कारण थे।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

महाराजा अजीतसिंह ने मारवाड़ के आसपास के क्षेत्र में गोवध बंद करवा दिया और इस्लाम के प्रचार पर रोक लगा दी। महाराजा ने अजमेर पर भी अधिकार कर लिया। जब फर्रूखसियर ने महाराजा अजीतसिंह को पांच हजारी मनसब दिया तो उसके साथ ही उसे निर्देश भिजवाए थे कि महाराजा मालवा में हो रहे उपद्रवों को रोकने के लिए मालवा जाए किंतु अजीतसिंह वहाँ नहीं गया। इससे फर्रूखसियर ने महाराजा अजीतसिंह के विरुद्ध दुश्मनी बांध ली।

किशनगढ़ एवं नागौर के राज्य जोधपुर राज्य में से ही निकले थे, इसलिए जोधपुर के शासक इन दोनों राज्यों को अपने जागीरदार की तरह समझते थे। इसलिए महाराजा अजीतसिंह ने किशनगढ़ के राजा राजसिंह तथा नागौर के राजा इन्द्रसिंह को अपनी सेवा में उपस्थित होने के आदेश भिजवाए।

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किशनगढ़ तथा नागौर के राजाओं ने महाराजा को पत्र लिखकर सूचित किया कि हम मुगल बादशाह के मनसबदार हैं तथा आपके अधीन नहीं हैं। इसलिए हम आपकी सेवा में उपस्थित नहीं होंगे। इस पर महाराजा अजीतसिंह ने उन दोनों को दण्डित करके उनसे भारी रकम वसूल की। इन सब लोगों ने दिल्ली पहुंचकर फर्रूखसियर को महाराजा अजीतसिंह के विरुद्ध भड़काया। इस पर फर्रूखसियर ने महाराजा अजीतसिंह को आदेश भिजवाए कि वह अपने पुत्र अभयसिंह को दिल्ली दरबार में भेजे किंतु महाराजा अजीतसिंह ने राजकुमार अभयसिंह को दिल्ली दरबार में नहीं भेजा तथा आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह से सलाह करके बादशाह को लिखा कि मुझे गुजरात की सूबेदारी दी जाए। आम्बेर नरेश ने भी एक पत्र लिखकर बादशाह से मांग की कि मुझे मालवा की सूबेदारी दी जाए।

इस समय तक फर्रूखसियर और सैयदों के सम्बन्ध बहुत खराब हो चुके थे। इसलिए स्वार्थी फर्रूखसियर ने 15 अक्टूबर 1713 को सवाई जयसिंह तथा अजीतसिंह को सात हजारी जात एवं सात हजारी सवार का मनसबदार बनाया। इसके साथ ही उसने सवाई जयसिंह को मालवा का तथा अजीतसिंह को थट्टा का सूबेदार बना दिया।

जब अजीतसिंह को थट्टा की सूबेदारी मिलने की सूचना मिली तो अजीतसिंह बहुत कुपित हो गया। उसे लगा कि बादशाह ने जानबूझकर महाराजा का अपमान किया है क्योंकि सवाई जयसिंह को उसकी इच्छा के अनुसार मालवा की सूबेदारी दे दी गई थी जबकि अजीतसिंह को गुजरात की सूबेदारी की बजाय थट्टा की सूबेदारी दी गई थी जो कि नितांज अनुपजाऊ प्रदेश था।

अतः अजीतसिंह ने थट्टा जाने से मना कर दिया तथा अजमेर पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। अजीतसिंह के इस कार्य को एक ओर तो बादशाह फर्रूखसियर ने अपना अपमान समझा तो दूसरी ओर सवाई जयसिंह ने भी अपना अपमान समझा। इन दोनों ने महाराजा अजीतसिंह से दुश्मनी ठान ली।

फर्रूखसियर के लिए राजपूताने के केन्द्र में स्थित अजमेर की राजनीतिक स्थिति अत्यधिक महतवपूर्ण थी क्योंकि अजमेर बारहवीं शताब्दी ईस्वी से ही दिल्ली के मुसलमान बादशाहों की प्रांतीय राजधानी बना हुआ था। महाराजा अजीतसिंह द्वारा अजमेर पर कब्जा कर लेने का अर्थ मुगल बादशाह की नाक काट लेने जैसा था।

सवाई जयसिंह के लिए अजमेर का राजनीतिक महत्व इसलिए था क्योंकि वह अजमेर पर अधिकार करके सांभर की नमक की झील पर अधिकार कर सकता था जो उन दिनों राजस्व प्राप्ति का महत्वपूर्ण स्रोत था।

जबकि महाराजा अजीतसिंह के लिए अजमेर का राजनीतिक महत्व इसलिए था क्योंकि शेरशाह सूरी के समय में अजमेर, जोधपुर के राठौड़ों के अधीन हुआ करता था तथा राठौड़ अजमेर को अपनी जागीर समझते थे।

इन सब कारणों से फर्रूखसियर ने अमीर-उल-उमरा अर्थात् सैयद हुसैन अली खाँ को आदेश दिया कि वह अजमेर पर चढ़ाई करके अजीतसिंह को अजमेर से बाहर निकाल दे। सैयद हुसैन अली खाँ ने एक विशाल सेना लेकर अजमेर पर आक्रमण किया। इस सेना ने राठौड़ों को बुरी तरह परास्त किया तथा उनसे अजमेर खाली करवा लिया। इस पर महाराजा अजीतसिंह ने अपने मंत्रियों को सैयद हुसैन अली खाँ के पास भेजकर उससे संधि कर ली।

मिर्जा मुहम्मद द्वारा लिखित रोजनामचा के अनुसार अजीतसिंह ने अजमेर नगर तथा दुर्ग मुगलों को सौंप दिए, अपने पुत्र अभयसिंह को बादशाह की सेवा में दिल्ली भेज दिया तथा अपनी पुत्री इंद्रकुंवरी का विवाह फर्रूखसियर से कर दिया। खफी खाँ, इदरत खाँ एवं अन्य फारसी ग्रंथ इस संधि के होने की पुष्टि करते हैं।

अजितोदय नामक ग्रंथ में लिखा है कि जब सैयद हुसैन अली खाँ मारवाड़ पर चढ़ाई करने के लिए मेड़ता में कैम्प कर रहा था तब फर्रूखसियर ने सैयद हुसैन अली खाँ के बड़े भाई अब्दुल्ला को आगरा में मरवाने का षड़यंत्र किया। इस कारण अब्दुल्ला ने अपने भाई सैयद हुसैन अली खाँ को लिखा कि वह शीघ्र ही दिल्ली लौट आए। इस कारण सैयद हुसैन अली खाँ महाराजा से लड़ने की बजाय संधि करके लौट गया।

इस संधि के बाद फर्रूखसियर ने महाराजा अजीतसिंह को गुजरात की सूबेदारी देकर उससे मित्रता कर ली। मीराते अहमदी नामक एक तत्कालीन ग्रंथ में लिखा है कि जब महाराजा ने गुजरात पर अधिकार किया तो कोल्हापुर के कोतवाल ने महाराजा को प्रसन्न करने के लिए गाय की कुरबानी पर रोक लगा दी। इस कारण वहाँ के मुसलमान भड़क उठे। मुसलमानों की शिकायत पर बादशाह ने कुछ दिन बाद ही अजीतसिंह से गुजरात की सूबेदारी छीन ली।

इसी बीच फर्रूखसियर और सैयदों के सम्बन्ध बेहद खराब हो गए। इसलिए फर्रूखसियर ने महाराजा अजीतसिंह को एक बार पुनः दिल्ली बुलवाया। इस बार महाराजा अजीतसिंह दिल्ली गया किंतु महाराजा को अब भी बादशाह की नीयत पर संदेह था इसलिए महाराजा ने बादशाह के विरोधी खेमे अर्थात् सैयद बंधुओं से मित्रता कर ली। जब अजीतसिंह बादशाह से मिलने के लिए उसके महल में गया तो महाराजा ने सैयद अब्दुल्ला खाँ को अपने हाथी पर बैठा लिया और अब्दुल्ला खाँ के साथ ही बादशाह के सामने पेश हुआ।

अजितोदय में लिखा है कि बादशाह महाराजा अजीतसिंह से अकेले में बात करना चाहता था ताकि महाराजा के माध्यम से सैयदों के विरुद्ध कार्यवाही की जा सके किंतु जब अजीतसिंह सैयद अब्दुल्ला के साथ ही महाराजा के सामने पेश हुआ तो बादशाह महाराजा से इतना अधिक अधिक चिढ़ गया कि उसने महाराजा को पकड़कर मार डालने के प्रयास किए।

बादशाह ने महल में कुछ सिपाहियों को छिपा दिया ताकि सैयद अब्दुल्ला और महाराजा अजीतसिंह की हत्या की जा सके किंतु ये दोनों भी पूरी तरह सतर्क थे इसलिए बादशाह को इस कार्य में सफलता नहीं मिल सकी।

इसके बाद बादशाह ने महाराजा अजीतसिंह से दुश्मनी निकालने तथा उसकी हत्या करने के लिए एक और योजना बनाई। बादशाह फर्रूखसियर शिकार खेलने के बहाने, अपने सैनिकों को साथ लेकर निकटवर्ती जंगल में गया तथा लौटते समय महाराजा अजीतसिंह के पड़ाव के निकट से होकर निकला। उसकी योजना थी कि जब महाराजा अजीतसिंह बादशाह की अगवानी के लिए अपने डेरे से बाहर आएगा, उसी समय उसे पकड़कर मार दिया जाएगा।

जब महाराजा अजीतसिंह को ज्ञात हुआ कि बादशाह का काफिला महाराजा के डेरों की तरफ आ रहा है तो महाराजा अपने डेरे से निकल गया और हुसैन अली के मकान पर जाकर खड़ा हो गया। इस कारण बादशाह हाथ मलता ही रह गया और अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया।

अजितोदय नामक ग्रंथ में लिखा है कि 9 दिसम्बर 1718 को बादशाह के आदेश से शाही तोपखाने के नायक बीका हजारी ने महाराजा अजीतसिंह के डेरे पर हमला कर दिया। महाराजा की सेना ने भी अपनी तोपों के मुंह बीका हजारी की तोपों की तरफ खोल दिए।

दोनों पक्षों के बीच तीन दिनों तक रह-रहकर तोप के गोलों की वर्षा होती रही। अंत में बादशाह ने यह लड़ाई बंद करवाई तथा जफर खाँ को महाराजा के पास भेजकर इस गलती के लिए क्षमा मांगी।

फर्रूखसियर अस्थिर चित्त का बादशाह था। कुछ दिन बाद उसने फिर से अजीतसिंह से मित्रता करने का निर्णय लिया और वह अब्दुल्ला खाँ को अपने साथ लेकर अजीतसिंह से मिलने उसके डेरे पर गया। फर्रूखसियर ने महाराजा को राजराजेश्वर की उपाधि दी तथा उसे फिर से गुजरात की सूबेदारी सौंप दी। इसके बाद महाराजा अजीतसिंह फिर से अपनी राजधानी जोधपुर लौट गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बंदासिंह बैरागी की हत्या

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बंदासिंह बैरागी की हत्या

बंदासिंह बैरागी ने गुरु गोविंदसिंह के आदेश से सिक्खों में जागृति लाने एवं सिक्ख समुदाय में एकता स्थापित करने का कार्य आरम्भ किया था। इस कारण बंदा बैरागी मुगल बादशाहों को मार्ग के कांटे की तरह खटकता था। इस कारण फर्रूखसियर ने बंदासिंह बैरागी की हत्या की करवाई तथा उसके साथियों के टुकड़े करवा दिए !

गुरु गोविंदसिंह की मृत्यु के बाद बंदासिंह बैरागी ने सिक्खों का नेतृत्व किया तथा सरहिंद के सूबेदार वजीर खाँ को मारकर प्रथम सिक्ख राज्य की स्थापना की। बंदा बैरागी के राज्य में पंजाब के सरहिंद, हिसार तथा समाना और गंगा-यमुना दोआब के सहारनपुर आदि क्षेत्र सम्मिलित थे। बाद में इस राज्य को लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत कर लिया गया।

जलालाबाद के फौजदार अली हामिद खाँ ने कुछ सिक्खों को बंदी बना लिया। इस पर बंदा बैरागी के सिक्खों ने जलालाबाद के लिए कूच कर दिया। मार्ग में सिक्खों ने बेहाट नामक स्थान पर आक्रमण किया जहाँ के पीरजादा लोग, हिन्दू प्रजा को तंग करते थे और गायों का वध करते थे।

बंदा बहादुर के सिक्खों ने बेहाट पर कब्जा करके पीरजादों को मार दिया। इसके पश्चात् बंदा बहादुर ने जलालाबाद के निकट पहुंचकर वहाँ के फौजदार को संदेश भिजवाया कि वह बंदी बनाए गए सिक्खों को मुक्त कर दे किंतु फौजदार ने सिक्खों को मुक्त करने से मना कर दिया।

इस पर बंदा बहादुर की सेना ने नानौता पर हमला किया तथा वहाँ के शेखजादों को परास्त करके उन्हें दण्डित किया। इसी बीच कृष्णा नदी में बाढ़ आ जाने के कारण बंदा बहादुर को जालंधर की तरफ चले जाना पड़ा।

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सिक्खों ने जालंधर तथा अमृतसर के मुसलमान फौजदारों के विरुद्ध भी कार्यवाही की। उन्होंने जालंधर के फौजदार शम्स खाँ से कहा कि वह अपना खजाना सिक्खों को समर्पित कर दे। इस पर शम्स खाँ ने सिक्खों के विरुद्ध जेहाद की घोषणा कर दी तथा आसपास के मुस्लिम फौजदारों को सिक्खों से लड़ने के लिए आमंत्रित किया। सिक्खों ने जालंधर के फौजदार को परास्त कर दिया तथा उसके बाद रोहन पर कब्जा कर लिया।

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बंदा बहादुर ने आठ हजार सिक्खों को लेकर अमृतसर पर आक्रमण किया तथा वहाँ से भी मुगल अधिकारियों को मार भगाया। इसके बाद सिक्ख सेना लाहौर की तरफ बढ़ी। लाहौर के मुल्लाओं ने भी सिक्खों के विरुद्ध जेहाद की घोषणा की किंतु सिक्खों ने लाहौर के गाजियों को परास्त करके लाहौर पर भी अधिकार कर लिया। जहाँ-जहाँ सिक्खों का अधिकार होता गया, वहाँ-वहाँ मुगल अधिकारियों को हटाकर सिक्ख अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया। बंदा ने लौहगढ़ को अपनी राजधानी बनाया तथा वहाँ पर एक टकसाल स्थापित की।

बंदा बहादुर ने अपने राज्य से मुगलों की भू-राजस्व व्यवस्था समाप्त करके किसानों को उनके द्वारा जोती जाने वाली भूमि का मालिक बना दिया। किसानों के हित में की गई यह व्यवस्था उस काल की बड़ी घटनाओं में से एक थी किंतु इतिहासकारों ने इसका उल्लेख बहुत कम किया है। दिसम्बर 1710 में मुगल बादशाह बहादुरशाह ने बन्दा बैरागी के मुख्य केन्द्र लौहगढ़ पर अधिकार कर लिया परन्तु बन्दा बैरागी वहाँ से भाग निकला तथा पहाड़ों में जाकर छिप गया।

इससे पहले कि सिक्ख विद्रोह पूर्ण रूप से कुचल दिया जाता, फरवरी 1712 में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई। इसके बाद बन्दा बैरागी ने फिर से अपने राज्य के एक बड़े भाग पर अधिकार कर लिया।

बहादुरशाह के बाद जहाँदरशाह ने और उसके बाद फर्रूखसियर ने सिक्खों को दबाने के भरसक प्रयत्न किए। ईस्वी 1715 में अब्दुल समद ख़ाँ के नेतृत्व में मुगल सेना ने गुरूदास-नांगल नामक स्थान पर बन्दा बहादुर को घेर लिया। बंदा बैरागी ने स्वयं को गुरदासपुर के किले में बंद कर लिया।

आठ माह तक मुगल सेना से घिरे रहने के बाद रसद की कमी हो जाने के कारण 7 दिसम्बर 1715 को बन्दा बहादुर को आत्म-समर्पण करना पड़ा। बंदा बहादुर को उसके 794 साथियों सहित दिल्ली लाया गया, जहाँ उसे इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया।

जब बंदा बहादुर ने मुसलमान बनने से मना कर दिया तो उससे कहा गया कि यदि वह मुसलमान नहीं बनेगा तो उसके शरीर के टुकड़े कर दिए जाएंगे। बंदासिंह बैरागी इस पर भी अपने धर्म पर अडिग रहा। बंदा बैरागी की आंखों के सामने उसके प्रिय साथियों के टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों को खिलाए गए।

तत्कालीन स्रोतों के अनुसार 5 मार्च से 12 मार्च 1715 तक, सात दिनों में प्रतिदिन 100 सिक्खों की हत्या की गई। 16 जून 1716 को फर्रूखसियर के आदेश से बंदासिंह बैरागी की हत्या की गई तथा उसके प्रमुख साथियों के शरीरों के टुकड़े कर दिये गये।

बंदासिंह बैरागी की हत्या के बाद सिक्ख नेतृत्व-विहीन हो गये। जब सिक्खों के सामने न गुरु रहा, न गुरु का बन्दा, तब सिक्खों ने सरबत खालसा और गुरुमत्ता की प्रथाएँ आरम्भ कीं।

वर्ष में दो बार- बैशाखी और दीवाली पर, सिक्खों ने विशाल सभाएँ करनी आरम्भ कीं जिन्हें सरबत खालसा कहा जाता था। सरबत खालसा में लिये गये निर्णयों को गुरूमत्ता कहा जाता था। बन्दा बहादुर के पश्चात् भी सिक्खों और मुगलों के बीच संघर्ष चलते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चूड़ामन जाट का अंत

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चूड़ामन जाट का अंत

चूड़ामन जाट का अंत पारिवारिक क्लेश की दुखद दास्तान है। उसके दो बेटों में हुए सम्पत्ति के झगड़े को निबटाने में असफल रहने के कारण चूड़ामन जाट ने आत्महत्या कर ली। इस प्रकार चूड़ामन जाट का अंत वैसा नहीं हुआ जैसा कि उसके जैसे योद्धा का होना चाहिए था!

ई.1712 में मुगल बादशाह जहांदारशाह ने नेता चूड़ामन जाट को आगरा के लाल किले में बुलाकर 1500 जात तथा 500 सवार का मनसब दिया तथा उसे शाही नौकरी में रख लिया था। जब ई.1713 में जहांदारशाह तथा फर्रूखसियर के बीच युद्ध हुआ तब चूड़ामन, जहांदारशाह की ओर से लड़ने के लिये युद्ध के मैदान में पहुंचा।

जैसे ही जहांदारशाह की सेना भारी पड़ने लगी, चूड़ामन और उसके सैनिक लड़ाई करना छोड़कर फर्रूखसियर का शिविर लूटने में लग गये किंतु फर्रूखसियर ने जाटों की तरफ ध्यान देने की बजाय युद्ध में ही ध्यान बनाए रखा और अंत में फर्रूखसियर को विजय प्राप्त हो गई।

जब फर्रूखसियर दिल्ली के तख्त पर बैठा तब चूड़ामन उसके दरबार में उपस्थित हुआ। चूड़ामन ने बादशाह फर्रूखसियर को सोने की इक्कीस मोहरें तथा दो घोड़े भेंट किए। इस समय फर्रूखसियर को नए दोस्तों की जरूरत थी इसलिए उसने युद्ध क्षेत्र में हुई घटनाओं को भुलाकर चूड़ामन को राव बहादुर की उपाधि दी। इसके साथ ही चूड़ामन को बादशाह की तरफ से एक हाथी दिया गया और उसके मनसब का दर्जा बढ़ा दिया गया।

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उस काल में जाटों के समूह आगरा, मथुरा, दिल्ली तथा ग्वालियर तक के क्षेत्र में व्यापारिक एवं शाही काफिलों को लूटते थे इसलिए फर्रूखसियर ने चूड़ामन को ही दिल्ली से चम्बल तक की राहदारी सौंप दी। चूड़ामन को राहदार बनाए जाने पर टिप्पणी करते हुए इतिहासकार कानूनगो ने लिखा है- ‘एक भेड़िये को भेड़ों के झुण्ड का रक्षक बना दिया गया।’

चूड़ामन ने इतनी कठोरता से राहदारी वसूलनी आरम्भ की कि चारों ओर हा-हाकार मच गया। उसने थूण परगने के प्रत्येक मनसबदार तथा जागीरदार से नजराना वसूलना आरम्भ कर दिया। अब वह जागीरदारों के मामलों में भी बेखटके हस्तक्षेप करने लगा। उसकी टोलियों ने मथुरा और फतहपुर सीकरी के परगनों के गांवों को लूटना आरम्भ कर दिया। चूड़ामन ने गुप्त रूप से अस्त्र-शस्त्र बनवाये और गढ़ियों को मजबूत कर लिया।

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जब चूड़ामन का आतंक बढ़ गया तब बादशाह फर्रूखसियर ने जयपुर नरेश सवाई जयसिंह को विपुल धन एवं विशाल सेना देकर चूड़ामन के विरुद्ध भेजा। चूड़ामन बीस वर्ष की खाद्य सामग्री एकत्रित करके थूण दुर्ग में बंद हो गया। मुगल सेनाओं के संभावित हमले को देखकर आस-पास के तमाम व्यापारियों ने भी अपने परिवारों एवं मालमत्ते के साथ थूण दुर्ग में शरण ली। जब सवाई जयसिंह, कोटा के महाराव भीमसिंह तथा बूंदी के महाराव बुधसिंह को लेकर थूण दुर्ग के निकट पहुंचा तो चूड़ामन ने दुर्ग में स्थित व्यापारियों से कहा कि वे अपना धन एवं सामग्री किले में छोड़कर किले से बाहर चले जायें। यदि युद्ध के बाद वह जीता तो उनके सामान की भरपाई कर देगा। व्यापारियों के पास चूड़ामन की बात मान लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। इस प्रकार व्यापारी बुरी तरह लुट-पिटकर थूण किले से बाहर निकल आये।

कच्छवाहा राजा सवाई जयंिसंह, हाड़ा राजा महाराव भीमसिंह तथा हाड़ा राजा महाराव बुधसिंह की सेनाएं सात माह तक थूण का दुर्ग घेरे रहीं किंतु चूड़ामन को किले से बाहर नहीं निकाल सकीं। इस पर मुगल साम्राज्य की पूरी ताकत थूण के विरुद्ध झौंक दी गई तथा थूण के चारों ओर का जंगल काटकर साफ कर दिया गया।

इस प्रकार दो वर्ष बीत गये और इस अभियान पर शाही खजाने के दो करोड़ रुपये खर्च हो गये। अंत में ई.1718 में जाटों और मुगलों में एक समझौता हुआ। इस समझौते से महाराज जयसिंह को जानबूझ कर दूर रखा गया। इस समझौते के अनुसार बादशाह ने चूड़ामन को क्षमा करके फिर से शाही नौकरी में रख लिया और उसे अपनी पत्नी, पुत्र तथा भतीजों सहित मुगल दरबार में उपस्थित होने के आदेश दिए गए। बादशाह ने डीग तथा थूण के किलों को नष्ट करने की आज्ञा दी।

जब कुछ समय बाद फर्रूखसियर को गद्दी से उतारा गया तो चूड़ामन ने सैयद बंधुओं का साथ दिया। जब सैयद बंधुओं ने बादशाह का फर्रूखसियर महल घेर लिया तब दिल्ली के लाल किले तथा उसके भीतर स्थित शाही महल की सारी चाबियां चूड़ामन ने ले लीं और बादशाह को अंधा करके कैद में डाल दिया।

फर्रूखसियर के स्थान पर शहजादे रफीउद्दरजात को तख्त पर बैठाया गया। इसके कुछ दिन बाद ही आगरा के किलेदार बीरबल ने आगरा के लाल किले में बंद शहजादे नेकूसीयर को जेल से बाहर निकालकर उसे बादशाह घोषित कर दिया।

इस पर चूड़ामन नेकूसीयर के पास गया और उसने गंगाजल हाथ में उठाकर कसम खाई कि नेकूसीयर को सुरक्षित रूप से जयपुर नरेश के राज्य में पहुंचा देगा। नेकूसीयर पचास लाख रुपये तथा अपने भतीजे मिर्जा असगरी को साथ लेकर चूड़ामन के साथ चल पड़ा। चूड़ामन ने नेकूसीयर को तो रफीउद्दरजात को सौंप दिया तथा रुपये अपने पास रख लिये।

इस प्रकार चूड़ामन ने अन्य कई अवसरों पर भी बहुत से व्यक्तियों के साथ विश्वासघात किया तथा उन्हें लूट-खसोट कर दुर्भाग्य के हवाले कर दिया। चूड़ामन ने जाटों के विख्यात नेता एवं अपने भतीजे बदनसिंह को बंदी बना लिया। चूड़ामन के इस कुकृत्य से समस्त जाट, चूड़ामन से नाराज हो गये और वे चूड़ामन का साथ छोड़कर बदनसिंह के साथ हो लिये।

उन्हीं दिनों चूड़ामन के पुत्र मोहकमसिंह ने अपने किसी सम्बन्धी की काफी बड़ी सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया। इस सम्पत्ति में से चूड़ामन के दूसरे पुत्र जुलकरण ने भी हिस्सा मांगा। इस बात पर दोनों भाइयों में झगड़ा हो गया तथा दोनों एक दूसरे को मारने के लिये तैयार हो गये। इस पर चूड़ामन ने मोहकमसिंह से कहा कि वह जुलकरण को कुछ सम्पत्ति दे दे। इस पर मोहकमसिंह चूड़ामन को भी मारने के लिये तैयार हो गया। इस पर चूड़ामन ने दुःखी होकर जहर खा लिया। इस प्रकार बहुत ही दुखद पस्थिति में चूड़ामन जाट का अंत हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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पुराणों का वास्तविक स्वरूप जानने के लिए मूल ग्रन्थों, वैदिक सन्दर्भों, पारिभाषिक शब्दावली और ऐतिहासिक प्रमाणों का आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है। 1. प्रस्तावना : पुराणों...