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हिन्दू राज्य की स्थापना

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हिन्दू राज्य की स्थापना

भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना का स्वप्न महाराणा प्रताप से लेकर छत्रपति शिवाजी, छत्रसाल बुंदेला, गुरु गोविंदसिंह, बंदासिंह बैरागी तथा महाराजा अजीतसिंह जैसे अनेक वीर राजाओं ने देखा किंतु उनके प्रयास अन्य राजाओं का समर्थन नहीं मिलने से असफल हो जाते थे। महाराजा अजीतसिंह भी अपने बाल्यकाल से भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना का स्वप्न देखा करता था।

मुहम्मदशाह रंगीला ने दिल्ली के तख्त पर बैठने के बाद अजमेर सूबे का प्रबंध महाराजा अजीतसिंह को सौंप दिया तथा साथ ही उसे गुजरात का सूबेदार भी बना दिया। यह महाराजा अजीतसिंह का चरमोत्कर्ष था किंतु जब महाराजा अजीतसिंह ने गुजरात तथा अजमेर में गौवध निषिद्ध कर दिया तो बादशाह मुहम्मदशाह महाराजा से चिढ़ गया और उसने महाराजा अजीतसिंह से अजमेर वापस लेकर वहाँ फिर से मुगल सूबेदार नियुक्त कर दिया।

जब दिल्ली से आए मुगल अधिकारियों ने अजमेर अपने अधिकार में ले लिया तो महाराजा के अधिकारियों ने महाराजा के पास इस आशय की सूचना भिजवाई। महाराजा अजीतसिंह यह सुनते ही आग-बबूला हो गया और उसने अपनी तलवार निकालकर शपथ खाई कि वह अजमेर को अपने अधीन करेगा।

कुछ दिनों बाद महाराजा ने तीस हजार घुड़सवारों के साथ अजमेर नगर को घेर लिया तथा मुगल सूबेदार को अजमेर से मारकर भगा दिया। अजमेर नगर एवं तारागढ़ पर महाराजा का फिर से अधिकार हो गया।

अजमेर पर महाराजा अजीतसिंह के स्वंतत्र रूप से अधिकार करते ही अजमेर की मस्जिदों में बांग शांत हो गई। मंदिरों में घण्टे बजने लगे। कुरानों के स्थान पर पुराण सुनाई देने लगे तथा मस्जिदों का स्थान मंदिरों ने ले लिया। इस प्रकार अजमेर में महाराजा अजीतसिंह के राजत्व में हिन्दू राज्य की स्थापना हो गई।

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काजी ब्राह्मणों के लिये रास्ता छोड़ने लगे। जहाँ गायें काटी गई थीं, वहाँ यज्ञों के लिये कुण्ड खोदे जाने लगे। अजीतसिंह ने सांभर तथा डीडवाना झीलों पर भी अधिकार कर लिया। उसने अनेक दुर्गों पर राठौड़ों के झण्डे चढ़ा दिये तथा बादशाह की परवाह छोड़कर स्वाधीनता सहित आनासागर के शाही महलों में रहने लगा।

अजीतसिंह अब बादशाह द्वारा दिये गये सिंहासन पर न बैठ कर अजमेर में अपने सिंहासन पर बैठा। उसने अपने सिर पर छत्र धारण कर लिया जो उसकी सर्वोच्चता का प्रतीक था। उसने अपने नाम के सिक्के ढलवाये, लम्बाई नापने के लिये अपना गज तथा भार नापने के लिये अपना सेर चलाया। उसने न्याय करने के लिये अपना न्यायालय स्थापित किया। अपने सरदारों के लिये नये रैंक बनाये। उसने सम्प्रभु शासक के प्रत्येक चिह्न को स्थापित किया। एक कवि ने अजीतसिंह के अजमेर में होने के महत्त्व को रेखांकित करते हुए लिखा है-

‘अजमेर में अजमल वैसा ही था जैसे दिल्ली में अस्पति।’

अर्थात्- महाराजा अजीतसिंह अजमेर का उसी प्रकार स्वतंत्र शासक था जिस प्रकार दिल्ली में मुगल बादशाह था।

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महाराजा अजीतसिंह की सफलता के समाचार न केवल भारत वर्ष के कौने-कौने में फैल गये, बल्कि भारत से बाहर मक्का और ईरान में भी उसकी खबरें पहुँच गईं कि भारत में एक नए हिन्दू राज्य की स्थापना हुई है। ये समाचार सुनकर बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने अजमेर को फिर से प्राप्त करने की तैयारी की। उसने सआदत खाँ को अजमेर की सूबेदारी दी तथा अजमेर पर चढ़ाई करने की आज्ञा दी परंतु इस कार्य में कोई भी मुस्लिम अमीर, सआदत खाँ का साथ देने को तैयार नहीं हुआ।

इस कारण सआदत खाँ की हिम्मत नहीं हुई कि वह अजीतसिंह पर हमला करे। अक्टूबर 1721 में हैदरकुली खाँ को गुजरात की तथा मुजफ्फर अली खाँ को अजमेर की सूबेदारी दी गई। मुजफ्फर अली खाँ बीस हजार आदमी लेकर अजमेर पर अधिकार करने पहुँचा किन्तु अजीतसिंह ने अजमेर खाली नहीं किया तथा महाराजकुमार अभयसिंह को मुजफ्फर अली खाँ का सामना करने के लिए भेजा। मुजफ्फर अली खाँ मनोहरपुर में बैठा रहा। जब धनाभाव के कारण मुजफ्फर अली खाँ के सिपाही उसे छोड़कर जाने लगे तो सवाई राजा जयसिंह ने मुजफ्फर अली खाँ को अपनी राजधानी आमेर में बुला लिया।

इस प्रकार मुजफ्फर अली खाँ बिना युद्ध किए ही लौट गया और उसने अजमेर की सूबेदारी का फरमान तथा खिल्लअत बादशाह को पुनः लौटा दी। बादशाह ने सैयद नुसरतयार खाँ बरहा को अजमेर का नया सूबेदार बनाया तथा उसे अजीतसिंह पर चढ़ाई करने की आज्ञा दी।

अजीतसिंह को जब यह सूचना मिली कि नुसरतयार खाँ अजमेर पर अधिकार करने आ रहा है तो महाराजा अजीतसिंह ने अपने पुत्र महाराजकुमार अभयसिंह को नारनौल, अलवर, तिजारा, शाहजहाँपुर, दिल्ली तथा आगरा के आस-पास के प्रदेशों को लूटने की आज्ञा दी।

महाराजकुमार अभयसिंह दिल्ली के आठ मील दूर सराय अलीवर्दी खाँ तक धावे मारने लगा जिससे दिल्ली में कोहराम मच गया। नारनौल में राजकुमार अभयसिंह का, मुगल फौजदार बयाजीद खॉं मेवाती के हाकिम से सामना हुआ। अभयसिंह ने उसे परास्त करके नारनौल को लूटा तथा अलवर, तिजारा और शाहजहाँपुर होते हुए दिल्ली से 16 किलोमीटर दूर सराय अली वर्दी खाँ तक जा पहुँचा।

इसके बाद अजीतसिंह ने मुहम्मदशाह को चिट्ठी भिजवाई कि आपने नुसरतयार को अजमेर का गर्वनर बनाकर ठीक नहीं किया। इस पर बादशाह ने अजीतसिंह को ही फिर से अजमेर का सूबेदार बना दिया तथा सांभर के फौजदार नाहर खाँ को अजमेर सूबे का दीवान नियुक्त कर दिया।

महाराजा अजीतसिंह को नाहर खाँ की नियुक्ति पसंद नहीं आई। अतः 6 जनवरी 1723 को अजीतसिंह ने मुगल शिविर पर आक्रमण करके नाहर खाँ, रूहेला खाँ तथा उसके 25 अधिकारियों को मार डाला।

महाराजा अजीतसिंह की इस कार्यवाही के बाद, मुहम्मदशाह को लगने लगा कि जल्दी ही कुछ नहीं किया गया तो गंगा-यमुना के हरे-भरे मैदानों पर फिर से हिन्दुओं का शासन हो जाएगा। बादशाह ने मुगल साम्राज्य के समस्त सेनापतियों और अमीर-उमरावों को अजमेर पहुँचने के आदेश दिये।

उसने हैदर कुली खाँ को अजमेर का सूबेदार बनाया तथा शर्फुद्दौला इरदत-मन्द खाँ को विशाल सेना देकर अजीतसिंह के विरुद्ध भेज दिया। मुहम्मद खाँ बंगश तथा अन्य कई अमीर, उमराव एवं सरदार, 50 हजार घोड़े लेकर अजीतसिंह के विरुद्ध इकट्ठे हुए। दुर्भाग्य से जयपुर का राजा सवाई जयसिंह तथा राजा गिरिधर बहादुरसिंह भी मुसलमानों की तरफ हो गए। क्योंकि जयसिंह कभी नहीं चाहता था कि मारवाड़ के राठौड़ उत्तर भारत में सबसे बड़ी ताकत बन जाएं।

महाराजा जयसिंह के विरोध के कारण महाराजा अजीतसिंह के लिए संभव नहीं रहा कि वह मुगलों को अकेला ही सामना कर सके। यह भारत भूमि का दुर्भाग्य ही था कि जिस सवाई जयसिंह को एक दिन स्वयं महाराजा अजीतसिंह ने हाथ पकड़ कर जयपुर का राजा बनाया था आज वही जयसिंह, महाराजा अजीतसिंह के विरोध पर उतर आया।

महाराजा अजीतसिंह ने निमाज ठाकुर अमरसिंह और खीमसिंह भण्डारी के पुत्र विजयसिंह को अजमेर का दायित्व सौंप दिया तथा स्वयं अपने परिवार को लेकर अपनी राजधानी जोधपुर चला गया।

ठाकुर अमरसिंह तथा विजयसिंह ने एक महीने तक मुगलों को अजमेर में नहीं घुसने दिया। एक दिन हैदर कुली खाँ, सरबलंद खाँ तथा महाराजा जयसिंह हाथी पर सवार होकर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जा रहे थे, तब तोप का एक गोला उनके दल के एक हाथी पर आकर गिरा। इस गोले से हाथी पर सवार महावत की मौत हो गई। इससे शाही पक्ष में भय व्याप्त हो गया। उन्होंने महाराजा जयसिंह के माध्यम से महाराजा अजीतसिंह के साथ संधि वार्ता चलाई। 

दोनों पक्षों में संधि की शर्तें निर्धारित होने के बाद महाराजा अजीतसिंह ने अजमेर खाली करने तथा कुंवर अभयसिंह को फिर से शाही दरबार में भेजने का निर्णय लिया।

इस संधि के बाद अजीतसिंह की सेना अपना झण्डा फहराती हुई, नगाड़े बजाती हुई, सम्मान पूर्वक दुर्ग से बाहर निकलकर मारवाड़ को चली गई। इस प्रकार ईस्वी 1724 में अजमेर पर फिर से मुगलों का अधिकार हो गया तथा जफरकुली खाँ को अजमेर का सूबेदार बनाया गया।

जयपुर नरेश सवाई जयसिंह नहीं चाहता था कि अजमेर पर जोधपुर नरेश अजीतसिंह का अधिकार हो। इसलिये उसने अपने मित्र अजीतसिंह से गद्दारी करके अजमेर पर मुगलों का अधिकार करवा दिया। हिन्दू राज्य की स्थापना का स्वप्न फिर से भंग हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मल्लिका उज्जमानी

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मल्लिका उज्जमानी

महाराजा अजीतसिंह ने मल्लिका उज्जमानी के पिता फर्रुखसीयर की हत्या में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इसलिए जब मल्लिका उज्जमानी बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की बेगम बनी तो वह महाराजा के प्राणों की प्यासी हो गई।

जब मुहम्मदशाह रंगीला ने फर्रूखसियर की पुत्री मल्लिका उज्जमानी से विवाह करके उसे बादशाह बेगम घोषित कर दिया तो फर्रूखसियर का परिवार फिर से सत्ता के केन्द्र में आ गया। बादशह बेगम बनकर फर्रूखसियर की बेटी मलिका उज्जमानी महाराजा अजीतसिंह के प्राणों की प्यासी हो गई।

कुछ साल पहले तक अजीतसिंह की पुत्री इन्द्रकुंवरी तथा मलिका उज्जमानी की माँ गौहरउन्निसा बादशाह फर्रूखसियर की बेगमें हुआ करती थीं। जब सैयद बंधुओं ने पठान सैनिकों को बादशाह फर्रूखसियर को घसीटकर लाने के लिए उसके महल में भेजा था तब मल्लिका उज्जमानी की माँ गौहरउन्निसा पठान सैनिकों के कदमों में गिर कर बादशाह के प्राणों की भीख मांग रही थीं किंतु महाराजा अजीतसिंह की बेटा इन्द्रकुंवरी एक करोड़ रुपए की सम्पत्ति के साथ अपने पिता के पास जाने की तैयारी कर रही थी।

मल्लिका उज्जमानी उन दृश्यों को भूल नहीं पाती थी। इसलिए अब फिर से सत्ता के केन्द्र में पहुंचकर पुरानी बातों का बदला लेना चाहती थी।

जिस प्रकार मुहम्मदशाह ने सैयद बंधुओं को मरवा डाला था,मल्लिका उज्जमानी चाहती थी कि महाराजा अजीतसिंह को भी मार डाला जाए। मुहम्मदशाह भी महाराजा अजीतसिंह की नीतियों से तंग आ चुका था और वह भी महाराजा से छुटकारा पाना चाहता था।

इसी तरह आम्बेर नरेश जयसिंह भी महाराजा अजीतसिंह के हाथों काफी नीचा देख चुका था क्योंकि जयसिंह के मना करने के बावजूद अजीतसिंह ने अजमेर पर अधिकार करके उसे राठौड़ राज्य का हिस्सा बना लिया था।

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ये सब लोग महाराजा अजीतसिंह के प्राणों के पीछे हाथ धोकर पड़ गए किंतु उस काल में न तो मुगलों में इतनी ताकत थी कि वे जोधपुर के राजा अजीतसिंह को घेर कर मार सकें और न आम्बेर नरेश में इतना दम था कि वह अजीतसिंह की ओर आंख उठाकर देख सके। इसलिए छल और कपट का सहारा लिया गया।

महाराजा सवाई जयसिंह की एक पुत्री का विवाह महाराजा अजीतसिंह के पुत्र अभयसिंह से हुआ था। महाराजा जयसिंह ने अपनी इसी पुत्री को मोहरा बनाकर महाराजकुमार अभयसिंह को समझाया कि महाराजा अजीतसिंह की गतिविधियों के चलते मुगल दरबार में मारवाड़ राज्य की इज्जत समाप्त हो गई है। यदि महाराजा अजीतसिंह को समाप्त कर दिया जाए तो अभयसिंह को राजा बनाकर फिर से मुगलों की मित्रता प्राप्त की जा सकती है।

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अभयसिंह से कहा गया कि यदि वह अजीतसिंह की हत्या करता है तो अभयसिंह न केवल जोधपुर का राजा बनेगा अपितु उसे मुगल दरबार में बड़ा मनसब एवं अन्य प्रदेशों की सूबेदारियां भी मिलेंगी। महाराजकुमार अभयसिंह, अपने श्वसुर की बातों में आ गया। उसने अपने छोटे भाई बखतसिंह को महाराजा अजीतसिंह की हत्या करने के लिए तैयार किया। मुगल बादशाह की तरफ से सवाई जयसिंह ने बखतसिंह को आश्वस्त किया कि यदि बखतसिंह इस काम में सहयोग करेगा तो उसे नागौर का स्वतंत्र राज्य दे दिया जाएगा तथा शाही दरबार में उच्च मनसब प्रदान किया जाएगा।

उस काल के भारत में जिस प्रकार मुगल शहजादों की हत्याएं हो रही थीं, उसी प्रकार हिन्दू राजाओं के वंश भी इस बुराई का शिकार हो गए थे और प्रत्येक राजपरिवार के राजकुमार भी एक दूसरे की हत्या करने में नहीं हिचकिचा रहे थे। माना जा सकता है कि भारत के दूषित राजनीतिक वातावरण के प्रभाव से अभयसिंह और बखतसिंह अपने पिता की हत्या करने को तैयार हो गए।

जिस अजीतसिंह की रक्षा के लिये महाराजा जसवंतसिंह की विधवा रानियां औरंगजेब के सैनिकों के हाथों तिनकों की तरह कट मरीं थीं, जिस अजीतसिंह के लिये वीर दुर्गादास तथा मुकुंददास खीची ने अपना पूरा जीवन घोड़े की पीठ पर बिताया था, जिस अजीतसिंह की रक्षा के लिये राठौड़ों ने तीस वर्ष तक युद्ध से मुंह नहीं मोड़ा था, जिस अजीतसिंह के लिये मेवाड़ियों ने औरंगजेब को अरावली की पहाड़ियों में खींचकर मार डालने का प्रयास किया था, उसी अजीतसिंह को उसके पुत्रों ने मारने का निश्चय कर लिया।

अदूरदर्शी राजकुमार अभयसिंह तथा बख्तसिंह, न तो मुगलों के षड़यंत्र को समझ पाये, न सवाई जयसिंह की दुष्टता को समझ पाये, न अपने पिता द्वारा चलाये जा रहे हिन्दू राज्य की स्थापना के अभियान का मूल्य समझ पाये। राज्य के लालच में अंधे होकर 23 जून 1724 की रात्रि में उन्होंने महाराजा अजीतसिंह की हत्या कर दी। उस समय अजीतसिंह जोधपुर के मेहरानगढ़ में स्थित अपने महल में गहरी नींद में सो रहा था।

इस प्रकार मुहम्मदशाह की बेगम मल्लिका उज्जमानी ने अपने पिता की हत्या का बदला ले लिया। मुहम्मदशाह को भी अजीतसिंह से छुटकारा मिल गया। सवाई जयसिंह को भी उत्तर भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर प्राप्त हो गया। राजकुमार अभयसिंह को मारवाड़ का और बखतसिंह को नागौर का राज्य मिल गया। यदि इस हत्या से किसी का नुक्सान हुआ था तो वह था हिन्दू धर्म जो वीर दुर्गादास और महावीर अजीतसिंह जैसे राजपूतों को खोकर अपने दुर्भाग्य पर आठ-आठ आँसू बहा रहा था। 

महाराजा की हत्या पर दुःख व्यक्त करते हुए तथा राजकुमार बखतसिंह को धिक्कारते हुए एक कवि ने लिखा है-

बखता बखत बायरो, क्यूं मार्यो अजमाल।

हिन्दवाणी रो सेवरो, तुरकाणी रो काल।

अर्थात्- हे बिना बख्त यानि बिना तकदीर वाले बख्तसिंह! तुमने अजमाल यानि अजीतसिंह को क्यों मारा? वह हिन्दुस्तान का रक्षक और तुर्कों का काल था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चिनकुलीच खाँ

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चिनकुलीच खाँ

चिनकुलीच खाँ औरंगजेब के बेटे बहादुरशाह उर्फ शाहआलम प्रथम का शव लेकर लाहौर से दिल्ली आया था। उसे सैयदों ने बहुत तंग किया था किंतु मुहम्मदशाह रंगीला का माँ कुदसिया बेगम ने चिनकुलीच खाँ के साथ मिलकर सैयद बंधुओं की हत्या करवाई थी। चिनकुलीच खाँ मुगलों का वफादार सेनापति था किंतु मुहम्मदशाह रंगीला ने अपनी बेवकूफी से उसे मुगलों का बागी बना दिया।

बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने जब ई.1720 में सैयद बंधुओं का सफाया किया तो उसने सल्तनत में शांति स्थापित करने के लिए अपने मित्रों को सम्मानित किया तथा अब तक सैयदों का साथ निभा रहे बहुत से दुश्मनों को भी क्षमा कर दिया। बादशाह मुहम्मदशाह ने 21 अप्रेल 1721 को एक बड़े दरबार का आयोजन करके बहुत से अमीर, उमरावों एवं राजाओं का सम्मान किया। आम्बेर नरेश जयसिंह को इस अवसर पर सरमद-ए-राजा-ए-हिन्द की उपाधि दी गई।

हालांकि कोटा के महाराव भीमसिंह ने पन्धार के युद्ध में चिनकुलीच खाँ के विरुद्ध युद्ध किया था तथापि बादशाह मुहम्मदशाह ने कोटा नरेश भीमसिंह के पुत्र अर्जुनसिंह को कोटा का नया महाराव स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मुहम्मदशाह ने अपने बहुत से दुश्मनों की गलतियों को नजर अंदाज करके उन्हें अपनी सेवा में बने रहने दिया। नरवर का राजा गजसिंह भी पंधार के युद्ध में चिनकुलीच खाँ के विरुद्ध एवं सैयदों की ओर से लड़ा था, मुहम्मदशाह ने उसके पुत्र को भी नरवर का राजा स्वीकार कर लिया।

इस प्रकार उत्तर भारत में शांति स्थापित हो गई किंतु इसी समय मराठों की गतिविधियों के कारण दक्षिण भारत अचानक अशांत हो गया। अतः चिनकुलीच खाँ आसफजाह को दक्षिण के छः प्रांतों का सूबेदार बनाकर दक्षिण में भेज दिया गया।

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चिनकुलीच खाँ का वास्तविक नाम कमरूद्दीन खान सिद्दकी बायफंदी था। उसका यह नाम औरंगजेब ने रखा था। उसका जन्म 20 अगस्त 1671 को बुखारा से भारत आकर बसे एक तुर्की परिवार में हुआ था। यह परिवार खलीफा अबू बकर के वंशजों में से निकला था। चिनकुलीच खाँ का परबाबा बुखारा में सूफी संत के रूप में प्रसिद्ध था।

चिनकुलीच खाँ का बाबा कुलीच खाँ ई.1654 में शाहजहाँ के शासनकाल में बुखारा से भारत आया था। ई.1657 में वह औरंगाबाद पहुंचकर औरंगजेब की सेना में भरती हो गया। उसने ई.1658 में शामूगढ़ के युद्ध में औरंगजेब की तरफ से दारा शिकोह के विरुद्ध युद्ध किया था।

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चिनकुलीच खाँ का पिता फीरोज जंग औरंगजेब का विश्वसनीय अमीर था। जब औरंगजेब बादशाह बना तो उसने फीरोज जंग को बीदर का सूबेदार नियुक्त किया। जब फीरोज जंग का बेटा कमरूद्दीन केवल छः साल का हुआ, तब औरंगजेब ने बालक कमरूद्दीन को एक छोटा सा मनसब देकर अपना मनसबदार बना लिया। बालक कमरूद्दीन ने तेरह वर्ष की आयु में अपने जीवन का पहला युद्ध लड़ा जिसके बाद औरंगजेब ने उसे 400 जात एवं 100 सवारों का मनसबदार नियुक्त किया। इसके बाद चिनकुलीच खाँ ने युद्धों के मैदानों में ही अपना जीवन बिताया था। उसे अनेक बड़ी लड़ाइयों का नेतृत्व करने का अवसर मिला था।

चिनकुलीच खाँ ने औरंगजेब के शासन काल में मराठों से हुए युद्धों में बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी किंतु उसका वास्तविक अभ्युदय बहादुरशाह के काल में आरम्भ हुआ था। उस समय चिनकुलीच खाँ बहादुरशाह के दरबार में तूरानी गुट के प्रभावशाली सदस्यों में गिना जाता था और उसका गुट सैयद बंधुओं का प्रबल विरोधी था।

ई.1712 में जब बहादुरशाह का लाहौर के दुर्ग में आकस्मिक निधन हुआ था तब चिनकुलीच खाँ ने बहादुरशाह के पुत्रों में हुए उत्तराधिकार के युद्ध में प्रत्यक्ष लड़ाई में भाग नहीं लिया था अपितु वह बहादुरशाह के शव के साथ लाहौर दुर्ग में ही बैठा रहा। जब ई.1713 में बहादुरशाह के पुत्र जहांदारशाह को गद्दी से उतारकर फर्रूखसियर को मुगलों के तख्त पर बैठाया गया था, तब इस कार्य में चिनकुलीच खाँ ने भी सैयदों को पूरा सहयोग दिया था।

उसे औरंगजेब ने चिनकुलीच खान की, फर्रूखसियर ने निजामुलमुल्क फतेहजंग की तथा मुहम्मदशाह ने आसफजाह की उपाधियां दी थीं। इसलिए इतिहास की पुस्तकों में उसे चिनकुलीच खान, निजामुलमुल्क तथा आसफजाह आदि नामों से सम्बोधित किया गया है। इस कारण पाठक कई बार असमंजस में पड़कर इन्हें अलग-अलग व्यक्तियों के नाम समझ लेते हैं।

जब चिनकुलीच दक्षिण भारत में चला गया तो मुगल बादशाह को उसकी कमी अखरने लगी। सल्तनत का काम बिगड़ने लगा जिसे सुधारने के लिए चिनकुलीच खाँ जैसा विश्वसनीय तथा योग्य अधिकारी हर समय बादशाह के पास होना जरूरी था। इसलिए मुहम्मदशाह ने चिनकुलीच खाँ को दक्षिण से पुनः दिल्ली बुलवा लिया तथा 21 फरवरी 1722 को उसे अपना प्रधानमंत्री बना दिया।

चिनकुलीच खाँ ने बादशाह के आदेश के अनुसार सल्तनत का काम संभाल लिया। चिनकुलीच खाँ ने मुहम्मदशाह को सलाह दी कि बादशाह अपने पूर्वज अकबर की तरह सावधान रहे तथा औरंगजेब की तरह बहादुर बने किंतु जब मुहम्मदशाह सल्तनत पर ध्यान देने की बजाय मौज-मस्ती में डूबा रहने लगा। 

वजीर चिनकुलीच सल्तनत की व्यवस्था सुधारना चाहता था किंतु मुहम्मदशाह रंगरेलियों में डूबे रहना चाहता था। इस कारण दोनों में प्रायः कहा-सुनी होने लगी। बादशाह को यह पसंद नहीं था कि उसके कामों में टोका-टाकी की जाए। इस कारण मुहम्मदशाह, चिनकुलीच को नापसंद करने लगा और उसके सामने ही उसका उपहास करने लगा। बादशाह सरेआम लोगों से कहता था- ‘देखो दक्षिण का गधा कितना सुंदर नाचता है।’

बादशाह के रवैये से दुखी होकर चिनकुलीच ने प्रधानमंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया और मुगल दरबार में आना छोड़ दिया। इस पर ईस्वी 1723 में मुहम्मदशाह ने उसे दक्षिण भारत में मुबरिज खाँ के विरुद्ध लड़ने के लिए भेजा। चिनकुलीच खाँ के लिए मुबरिज खाँ पर विजय प्राप्त करना कठिन था इसलिए उसने मराठों की सहायता प्राप्त की तथा मुबरिज खाँ को परास्त करके हैदराबाद पर अधिकार कर लिया। अब वह वापस दिल्ली नहीं जाना चाहता था। इसलिए वह हैदराबाद में ही रहने लगा।

इस प्रकार चिनकुलीच मुगलों का सबसे विश्वस्त सेनापति था किंतु मुगल सल्तनत के विखण्डन की शुरुआत उसी के हाथों हुई। उसने ई.1725 में हैदराबाद में आसफजाही राजवंश की स्थापना की। यहाँ से आगे के इतिहास में चिनकुलीच खाँ को निजामुलमुल्क तथा निजाम के नाम से जाना गया। वह 1 जून 1748 तक शासन करता रहा। इस प्रकार दक्षिण भारत में फिर से एक स्वतंत्र राज्य अस्तित्व में आ गया तथा चिनकुलीच खाँ इसका प्रथम स्वतंत्र शासक हुआ।

कुछ ही समय में निजाम ने अपने राज्य की सीमाएँ ताप्ती नदी से लेकर कर्नाटक, मैसूर और त्रिचनापल्ली तक बढ़ा लीं। निजाम ने यद्यपि पूर्ण स्वतंत्र शासक की भाँति शासन किया किंतु उसने न तो अपने नाम के सिक्के चलाये और न राजछत्र धारण किया। उसने मुगल बादशाह से सम्बन्ध विच्छेद भी नहीं किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अलीवर्दी खाँ

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अलीवर्दी खाँ

अलीवर्दी खाँ बिहार का छोटा सा सूबेदार था किंतु उसने बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला के निकम्मेपन का लाभ उठाकर बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा पर कब्जा कर लिया तथा बंगाल में अलग मुस्लिम राज्य की स्थापना की।

औरंगजेब के समय से ही मुगलों का विरोध कर रहे राजपूतों, सिक्खों, मराठों तथा अन्य हिन्दू शक्तियों ने मुहम्मदशाह रंगीला के समय में अपने-अपने राज्यों की स्थापना करने एवं उन्हें मजबूत बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी। इसके परिणाम स्वरूप उत्तर एवं दक्षिण भारत में अनेक क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें से कुछ राज्यों के शासक, मुगल सल्तनत से पृथक् राज्य स्थापित करने के बाद भी मुगल सल्तनत के अन्तर्गत बने रहने की घोषणा करते रहे किंतु ये लोग दिल्ली के बादशाह के प्रति नाममात्र की निष्ठा रखते थे।

बादशाह फर्रूखसियर ने ई.1713 में मुर्शीद कुली खाँ नामक एक व्यक्ति को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया था। मुहम्मदशाह ने उसे वहीं पर नियुक्त रखा। जब ईस्वी 1727 में मुर्शीद कुली खाँ की मृत्यु हो गई तो मुहम्मदशाह ने मुर्शीद कुली खाँ के दामाद शुजाउद्दीन मुहम्मद खाँ को बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बना दिया।

ईस्वी 1733 में बादशाह मुहम्मदशाह ने उसे बिहार का सूबा भी दे दिया। इस प्रकार शुजाउद्दीन मुहम्मद खाँ के क्षेत्राधिकार में बंगाल, बिहार और उड़ीसा का विशाल क्षेत्र आ गया। जैसे-जैसे दिल्ली की शक्ति कमजोर होती चली गई, वैसे वैसे शुजाउद्दीन मुहम्मद खाँ निरंकुश शासक होता चला गया और केन्द्रीय सत्ता का प्रभाव नाम मात्र का रह गया।

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शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद ईस्वी 1739 में उसका पुत्र सरफराज खाँ सूबेदार बना। इस समय दिल्ली पर नादिरशाह का अधिकार था तथा मुगल सत्ता अत्यंत विपन्न अवस्था में थी। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दी खाँ ने बंगाल के सूबेदार सरफराज खाँ को मार कर बंगाल, बिहार और उड़ीसा सूबों पर अधिकार कर लिया। जब नादिरशाह वापस ईरान चला गया तब बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने अलीवर्दी खाँ को इन तीनों प्रांतों का सूबेदार मान लिया।

इसके बाद अलीवर्दी खाँ मुगल सल्तनत के भीतर होने का दिखावा करता रहा किंतु जैसे ही ईस्वी 1748 में बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला मृत्यु को प्राप्त हुआ, अलीवर्दी खाँ ने यह दिखावा करना भी बंद कर दिया। अलीवर्दी खाँ के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसने अपनी छोटी पुत्री के पुत्र सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

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ईस्वी 1756 में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। इसी सिराजुद्दौला और अँग्रेजों के बीच ईस्वी 1757 में प्लासी का युद्ध हुआ जिसमें सिराजुद्दौला की पराजय हो गई और अंग्रजों ने पहली बार भारत में राजनीतिक सत्ता की स्थापना की। जिस प्रकार बंगाल के अलग होने की प्रक्रिया मुहम्मदशाह के समय में शुरु हुई, उसी प्रकार अवध में भी स्वतंत्र राज्य की स्थापना का बीजारोपण मुहम्मदशाह के समय में हुआ। जब ईस्वी 1720 में मुहम्मदशाह ने सैयद बंधुओं का सफाया किया था, तब मीर मोहम्मद अमीन मुगल दरबार में ईरानी अमीरों का नेता था। उसे बुरहान-उल-मुल्क तथा सआदत खाँ भी कहा जाता है।

सआदत खाँ ने सैयद बंधुओं का सफाया करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसलिए बादशाह मुहम्मदशाह ने उसे ईस्वी 1720 में आगरा की और ईस्वी 1722 में अवध की सूबेदारी दी। जब उत्तर भारत में मराठों की गतिविधियां बढ़ गईं और मुगल उन्हें रोकने में असफल रहे तो इस्वी 1732 में सआदत खाँ ने मराठों को रोकने के लिए बादशाह मुहम्मदशाह के सामने कई प्रस्ताव रखे किंतु अन्य अमीरों ने उसके प्रस्तावों का समर्थन नहीं किया इसलिए सआदत खाँ को सफलता नहीं मिली।

बादशाह ने उसे पेशवा बाजीराव के विरुद्ध कार्यवाही करने के निर्देश दिये। सआदत खाँ ने मार्च 1737 में मराठों की एक छोटी सी सेना को परास्त किया तथा बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला को झूठी सूचना भिजवा दी कि उसने पेशवा बाजीराव को चम्बल के उस पार खदेड़ दिया है। जब पेशवा बाजीराव को सआदत खाँ के इस झूठ की जानकारी हुई तो उसने क्रोधित होकर दिल्ली पर धावा बोल दिया तथा सआदत खाँ की पोल खोल दी।

इस घटना से मुगल दरबार में सआदत खाँ की प्रतिष्ठा समाप्त हो गई। बादशाह ने सआदत खाँ को अपने दरबार में बुलाकर बुरी तरह अपमानित किया। इससे सआदत खाँ बादशाह मुहम्मदशाह से बुरी तरह नाराज होकर अपने सूबे को लौट गया और स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार करने लगा। जब ई.1739 में नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया तो सआदत खाँ ने मुहम्मदशाह की सहायता करने की बजाय नादिरशाह की सहायता की।

ईस्वी 1739 में सआदत खाँ की मृत्यु हो गई तथा उसका भतीजा एवं दामाद सफदरजंग अवध का सूबेदार बना। जब ईस्वी 1748 में मुहम्मदशाह रंगीला की मृत्यु हो गई तथा अहमदशाह नया बादशाह बना तो उसने सफदरजंग को दिल्ली बुलाकर मुगल सल्तनत का वजीर नियुक्त किया। कुछ समय बाद उसे इलाहबाद का सूबा भी दे दिया। सफदरगंज ने 22 अप्रैल 1752 को अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों से समझौता किया परन्तु बादशाह ने उस समझौते को रद्द करके पंजाब का क्षेत्र अहमदशाह अब्दाली को सौंप दिया।

इस पर बादशाह और वजीर में अघोषित युद्ध छिड़ गया जिसमें वजीर परास्त हो गया तथा अपना पद त्यागकर अपने सूबे अवध को चला गया। अक्टूबर 1754 में उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद अवध नाममात्र के लिए मुगलों के अधीन रह गया। ईस्वी 1762 में अवध सूबे को अंग्रेजों ने अपने नियंत्रण में ले लिया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पेशवा बालाजी विश्वनाथ

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पेशवा बालाजी विश्वनाथ

बालाजी विश्वनाथ मराठों का पहला पेशवा था। पेशवाओं ने कुछ ही समय में न केवल मराठा राजनीति पर नियंत्रण कर लिया अपितु वे सम्पूर्ण उत्तर भारत की राजनीति पर भी छा गये। पेशवाओं की भीषण टक्करों से मुगल सल्तनत चूर-चूर होकर बिखर गई।

मराठा शक्ति का अभ्युदय छत्रपति शिवाजी द्वारा ई.1645 से 1680 की अवधि में शाहजहाँ एवं औरंगजेब के काल में किया गया था। तब से मराठे निरंतर अपनी शक्ति बढ़ाते आ रहे थे।

छत्रपति शिवाजी के वंशज शाहूजी ने 16 नवम्बर 1713 को बालाजी विश्वनाथ को अपना पेशवा नियुक्त किया। पेशवा बालाजी विश्वनाथ द्वारा मराठा राज्य को दी गई महत्त्वपूर्ण सेवाओं के कारण शाहूजी के शासनकाल में पेशवाओं का उत्कर्ष हुआ। इसके बाद पेशवा का पद वंशानुगत हो गया।

पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने न केवल मराठा राजनीति में अपितु दिल्ली की मुगलिया राजनीति में भी बराबर की दिलचस्पी ली। जब ईस्वी 1719 में सैयद बंधुओं ने बादशाह फर्रूखसियर को उसके पद से हटाया तो सैयदों ने पेशवा बालाजी विश्वनाथ से सहायता माँगी।

इस अवसर पर पेशवा बालाजी विश्वनाथ और सैयद हुसैन अली के बीच एक सन्धि हुई जिसके अनुसार पेशवा ने सैयद हुसैन अली को 15 हजार मराठा घुड़सवार उपलब्ध करवाने का वचन दिया तथा इसके बदले में सैयदों ने छत्रपति शाहू को दक्षिण के 6 सूबों से चौथ और सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार देने का वचन दिया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

इस संधि के बाद पेशवा बालाजी विश्वनाथ 15 हजार मराठा घुड़सवारों की सेना लेकर सैयद बंधुओं की सहायता के लिये दिल्ली अया, जहाँ मारवाड़ नरेश अजीतसिंह तथा कोटा नरेश भीमसिंह आदि की सहायता से फर्रूखसियर को गद्दी से उतारकर मार डाला गया और रफी-उद्-दरजात को बादशाह बनाया गया।

नये बादशाह रफी-उद्-दरजात ने सैयद हुसैन अली द्वारा पेशवा से की गई सन्धि को स्वीकार कर लिया। इस घटना से मराठों को मुगलों की वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो गया। अतः दिल्ली से लौटने के बाद बालाजी विश्वनाथ ने उत्तर भारत में मराठा शक्ति के प्रसार की योजना बनाई किन्तु योजना को कार्यान्वित करने के पूर्व ही ईस्वी 1720 में उसकी मृत्यु हो गयी। इस समय तक मुहम्मदशाह रंगीला दिल्ली के तख्त पर बैठ चुका था और सैयद बंधुओं की हत्या करके सल्तनत पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने का प्रयास कर रहा था।

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बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उसका बीस वर्षीय पुत्र बाजीराव पेशवा बना। उसे इतिहास में पेशवा बाजीराव (प्रथम) के नाम से जाना जाता है। उसने हैदराबाद के सूबेदार निजाम-उल-मुल्क चिनकुलीच खाँ को दो बार बड़े युद्धों में परास्त किया। पेशवा बाजीराव ने पुर्तगालियों से बसीन एवं सालसेट के इलाके छीन लिये तथा मराठों के प्रभाव को गुजरात, मालवा और बुन्देलखण्ड तक पहुँचा दिया। उसने मुगलों के अधीन छः सूबों में चौथ एवं सरदेशमुखी वसूलने के लिए होलकर, सिन्धिया, पंवार तथा गायकवाड़ आदि मराठा सेनापतियों को नियुक्त किया।

इन मराठा सेनापतियों ने मुगलों द्वारा सौंपे गए अधिकार क्षेत्र के साथ-साथ इस क्षेत्र से बाहर भी चौथ वसूली का काम आरम्भ कर दिया। कुछ समय पश्चात् ये मराठा सेनापति इतने शक्तिशाली हो गए कि इन्होंने गुजरात तथा मालवा के मुगल क्षेत्रों में अपने चार राज्य स्थापित कर लिए। इनमें से सबसे पहला राज्य पिलाजी राव गायकवाड़ ने गुजरात के बड़ौदा में स्थापित किया। गुजरात सूबा मुगल सल्तनत के समृद्ध सूबों में से था तथा उस समय जोधपुर नरेश अभयसिंह गुजरात का सूबेदार था किन्तु केन्द्रीय शक्ति के ह्रास के कारण महाराजा के लिए गुजरात पर नियंत्रण बनाये रखना कठिन हो गया।

ईस्वी 1733 में मराठों ने महाराजा अभयसिंह को बुरी तरह परास्त किया। इस कारण महाराजा अभयसिंह गुजरात का शासन अपने अधिकारियों को सौंपकर जोधपुर चला गया। ईस्वी 1735 तक मराठे गुजरात के वास्तविक शासक बन गये।

ईस्वी 1730 में ऊदाजी राजे पवार ने धार में पृथक मराठा राज्य की स्थापना कर ली। ई.1731 में मल्हारराव होलकर ने इन्दौर में अपना अगल राज्य स्थापित कर लिया। ई.1731 में ही रानोजी सिंधिया ने भी ग्वालियर में अपना राज्य स्थापित कर लिया।

मराठों का पांचवा राज्य अब भी पूना में पेशवा के नेतृत्व में चल रहा था जो शेष चारों राज्यों का भी सर्वोच्च शासक था। जबकि क्षत्रपति शिवाजी का वंशज शाहूजी सतारा में नाममात्र का मराठा राजा था और अब भी छत्रपति कहलाता था। कहने को अब भी पेशवा छत्रपति का मंत्री था किंतु पेशवा पूना में बैठता था और स्वतंत्र रूप से अपने राज्य का संचालन करता था।

इस प्रकार पेशवा बाजीराव के प्रभाव से मराठा राजनीति दक्षिण भारत से बाहर निकाल कर उत्तर भारत तक फैल गई तथा मराठों की शक्ति के विस्तार के लिए नवीन क्षेत्र उपलब्ध हो गया।

इस काल में मराठे निरंतर आगे बढ़ते रहे जिसके कारण केन्द्रीय राजनीति में राजपूत राज्यों की भूमिका गौण हो गई तथा राजपूताना राज्यों के शासक अपने-अपने राज्यों में स्वतंत्र शासक की भांति शासन करने लगे।

बादशाह मुहम्मदशाह की हैसियत उसकी अपनी राजधानी दिल्ली में भी बहुत कम रह गई थी। एक बार कोटा नरेश दुर्जनशाल बादशाह से मिलने के लिये दिल्ली आया। वहाँ उसने कुछ कसाईयों को देखा जो गायों को काटने के लिये शाही बावर्चीखाने ले जा रहे थे। दुर्जनशाल ने अपने आदमियों को उन कसाइयों को मार डालने के आदेश दिए।

अपने राजा का आदेश सुनते ही हाड़ा सैनिक कसाइयों पर टूट पड़े। हो हल्ला सुनकर दिल्ली का कोतवाल भी कसाइयों की रक्षा के लिये आ गया। कोटा के सिपाहियों ने दिल्ली के कोतवाल को भी मार डाला तथा महाराव दुर्जनशाल उन गायों को लेकर कोटा लौट गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मराठों का आतंक

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मराठों का आतंक

अठ्ठारहवीं शताब्दी में मराठे भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन गए। उन्होंने मुगल साम्राज्य को नष्ट प्राय कर दिया तथा राजपूताना राज्यों की बड़ी दुर्दशा बनाई। इस कारण उत्तर भारत में मराठों का आतंक छा गया।

ईस्वी 1734 के आते-आते मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा धूल में मिलने लगी थी। मराठों ने अपने परम्परागत क्षेत्रों से आगे बढ़कर बड़ौदा, धार, इन्दौर तथा ग्वालियर में चार नए राज्य स्थापित कर लिए थे। ग्वालियर से आगरा अधिक दूर नहीं था। मराठों ने राजपूताना रियासतों पर बार-बार हमले करने और चौथ वसूलने की नीति अपना ली थी। इस कारण मराठों का आतंक पूरे उत्तर भारत में छा गया।

मालवा, गुजरात और बुन्देलखण्ड में मराठों की प्रगति को रोकने में मुगल बादशाह की असफलता तथा बूंदी के मामले में मराठों के हस्तक्षेप ने राजस्थान के राजाओं में बेचैनी उत्पन्न कर दी। उन्होंने अनुभव किया कि यदि उन्होंने संगठित होकर मराठों को रोकने का प्रयास नहीं किया तो उनके राज्यों की भी वही दशा हो जायेगी जो मालवा और गुजरात की हुई है।

अतः आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह ने ईस्वी 1734 में राजपूत राजाओं को मेवाड़ राज्य के हुरड़ा नामक स्थान पर एकत्रित होने के लिये आमंत्रित किया। इसे इतिहास में हुरड़ा सम्मेलन कहा जाता है। राजपूताना के राज्यों में मराठों का आतंक इतना अधिक था कि जो राजा कभी एक साथ नहीं बैठते थे, उन्हें एक साथ बैठने के लिए मजबूर होना पड़ा।

16 जुलाई 1734 को हुरड़ा सम्मेलन आरम्भ हुआ। मेवाड़ के नये महाराणा जगतसिंह (द्वितीय) ने सम्मेलन की अध्यक्षता की। सम्मेलन में आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह, जोधपुर नरेश अभयसिंह, नागौर का राव बख्तसिंह, बीकानेर महाराजा जोरावरसिंह, कोटा का महाराव दुर्जनसाल, बूंदी का महाराव दलेलसिंह, करौली का महाराजा गोपालदास, किशनगढ़ का महाराजा राजसिंह आदि कई प्रमुख राजपूत शासक सम्मिलित हुए।

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स्पष्ट देखा जा सकता था कि मराठों का आतंक एक काले साए की तरह हुरड़ा सम्मेलन पर व्याप्त था। दीर्घ विचार-विमर्श के बाद 17 जुलाई 1734 को राजाओं ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किये।

इस समझौते में समस्त राजाओं ने भविष्य में एकता बनाये रखने, एक दूसरे की प्रतिष्ठा का सम्मान करने, एक राज्य के विद्रोही को दूसरे राज्य द्वारा शरण न देने और वर्षा ऋतु के बाद मराठों के विरुद्ध ठोस कार्यवाही करने का संकल्प व्यक्त किया। राजपूत शासकों ने मराठों के विरुद्ध ठोस कार्यवाही करने हेतु अपनी सेनाओं सहित वर्षा ऋतु के बाद रामपुरा में एकत्रित होने का निर्णय लिया।

हुरडा सम्मेलन में राजपूत राजाओं द्वारा एक स्थान पर बैठकर विचार करना तथा मराठों के विरुद्ध संयुक्त रूप से सामना करने का निर्णय लेना, एक महत्त्वपूर्ण बात थी परन्तु दुर्भाग्वश किसी भी निर्णय को कार्यान्वित करने के लिये किसी भी राजा की ओर से कुछ भी नहीं किया गया। कोई भी शासक अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ने को तैयार नही था। मराठों का आतंक समस्त राजाओं को त्रस्त किए हुए था किंतु वे अपने अहंकार को त्यागकर एक-दूसरे क नेतृत्व में संघर्ष करने को तैयार नहीं थे।

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सवाई जयसिंह, महाराणा जगतसिंह (द्वितीय) और जोधपुर नरेश अभयसिंह, इन तीन प्रमुख राजाओं में भी एक दूसरे के प्रति सद्भावना का अभाव था। अतः ईस्वी 1734 की वर्षा ऋतु के बाद राजपूत राजाओं ने रामपुरा में एकत्रित होने की बजाय मुगल बादशाह द्वारा मराठों के विरुद्ध आयोजित अभियान में सम्मिलित होना अधिक श्रेयस्कर समझा। मराठों के ग्वालियर तक चढ़ आने से मुगलों द्वारा यह अनुभव किया जा रहा था कि यदि मराठों के विरुद्ध मुगलों की ओर से अब भी कोई बड़ी कार्यवाही नहीं की गई तो मराठे, निश्चित रूप से कुछ ही समय में आगरा एवं दिल्ली में आ धमकेंगे।

इसलिये नवम्बर 1734 में मीरबख्शी खाने दौरां के नेतृत्व में एक विशाल सेना मालवा की ओर भेजी गई। सभी मित्र राजपूतों से बादशाह की तरफ से अपील की गई कि वे संकट की इस घड़ी में बादशाह की सहायता के लिए आगे आएं। आम्बेर नरेश जयसिंह, जोधपुर नरेश अभयसिंह, कोटा नरेश राजा दुर्जनसाल सहित कई राजपूत राजा भी अपनी सेनाएं लेकर खाने दौरां की सेना से आ मिले।

इस कारण मुगल सेना अत्यंत विशाल दिखाई देने लगी। इस सेना में हाथियों के काफिले, घुडसवारों के जत्थे, पैदल सैनिकों के समूहों के साथ-साथ गोला-बारूद, रसद-पानी एवं तम्बू आदि विविध प्रकार की सामग्री की असंख्य गाड़ियां चल रही थीं। मुगल सैनिकों की आवश्यकता का सामान बेचने वाले बंजारों के समूह भी इस सेना के चारों ओर चल रहे थे।

कोटा राज्य का इतिहास के लेखक डॉ. मथुरालाल शर्मा ने लिखा है कि ई.1734 में राजपूताने में शाही लश्कर की कूंच मुगलों के वैभव की अन्तिम झलक थी। इस लश्कर में जो राजपूत नरेश सम्मिलित हुए थे, वह भी हिन्दू राजाओं द्वारा की जा रही मुगलों की अधीनता का अंतिम दृश्य था।

जब यह लश्कर कोटा राज्य का मुकुंदरा दर्रा पार करके रामपुरा क्षेत्र में पहुंचा तो फरवरी 1735 के आरम्भ में उसका सामना होल्कर और सिंधिया की सेनाओं से हुआ। खानेदौरां अनुभवहीन, कायर और अयोग्य सेनापति था तथा शाही सेना पूरी तरह असंगठित थी। राजपूत राजाओं की सेनाएं एक-दूसरे के साथ चलते हुए भी एक दूसरे से सहयोग नहीं कर रही थीं।

मराठों ने इस स्थिति को पहचान लिया। उन्हें ज्ञात था कि कोटा, बूंदी, जयपुर और जोधपुर राज्यों की लगभग समस्त सेनाएं इस समय खानेदौरां के साथ हैं तथा उनके अपने राज्य असुरक्षित हैं। इसलिये मराठों की कुछ सेनाएं इन राज्यों के लिये रवाना कर दी गईं।

अप्रैल 1734 में मल्हारराव होल्कर और राणोजी सिन्धिया ने बूंदी पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया तथा बूंदी नरेश बुद्धसिंह के पुत्र उम्मेदसिंह को बंूदी की गद्दी पर बैठा दिया। इस अवसर पर बुद्धसिंह की कच्छवाही रानी ने मल्हारराव होल्कर को राखी बांधी जो कि आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह की सौतेली बहिन थी।

बूंदी के साथ-साथ मराठे तेजी से कोटा, जयपुर और जोधपुर राज्यों में जा घुसे जिनकी सुरक्षा का इस समय कोई विशेष प्रबन्ध नहीं था। 18 फरवरी 1735 को सांभर में भारी लूट हुई। सांभर में मुगलों की ओर से फौजदार नियुक्त था। मराठों ने उसकी अतुल सम्पत्ति लूट कर उसे खाली हाथ कर दिया।

सांभर का काजी अपनी औरतों का कत्ल करके, मराठों से लड़ने के लिये आया और घायल होकर धरती पर गिर पड़ा। मराठों की इस चाल से सभी राजपूत शासक खानेदौरां का साथ छोड़कर, अपने राज्यों को लौट गये।

अब मल्हार राव होल्कर तथा राणोजी सिंधिया के छापामार घुड़सवारों ने रामपुरा में खानेदौरां को घेर लिया। इस प्रकार मराठों ने सैनिक बल की बजाय बुद्धि चातुर्य से काम लेकर ही मुगलों एवं राजपूतों को हरा दिया। आठ दिन तक खानेदौरां मराठों की घेराबंदी में रहा। इस बीच मराठों द्वारा मुगलों की रसद पंक्ति तोड़कर लूट ली गई।

अन्त में सवाई जयसिंह की मध्यस्थता से खानेदौरां और मराठों में समझौता हुआ जिसके अनुसार खानेदौरां ने बादशाह की ओर से मालवा की चौथ के रूप में 22 लाख रुपये मराठों को देने स्वीकार कर लिए।

मराठों के विरुद्ध इतना विशाल अभियान बुरी तरह विफल हो जाने तथा मराठों को 22 लाख की चौथ निर्धारित हो जाने पर दिल्ली दरबार में सवाई जयसिंह के विरुद्ध षड़यंत्र रचा गया। अवध के नवाब सआदत खाँ ने सवाई जयसिंह तथा खानेदौरां पर आरोप लगाया कि उन्होंने मराठों से सांठ-गांठ कर ली है। सरबुलंद खाँ ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई।

इस पर बादशाह मुहम्मदशाह ने अगस्त 1735 में सवाई जयसिंह को मालवा की सूबेदारी से हटा दिया तथा वे दो प्रांत जो पूर्व में सवाई जयसिंह को लिखित आदेश द्वारा जीवन भर के लिये दिए गए थे, वे भी छीन लिये।

ई.1735 में मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने मराठों को चौथ देना स्वीकार कर लिया तो पेशवा बाजीराव राजपूताने के राज्यों से भी चौथ मांगने लगा क्योंकि राजपूताना के राज्य मुगल सल्तनत के अधीन थे। इस काल में राजपूताना के राज्य इस स्थिति में नहीं थे कि वे मराठों से अपनी रक्षा कर सकते।

प्रसिद्ध इतिहासकार आर. सी. मजूमदार ने लिखा है कि ई.1736 में उदयपुर के महाराणा जगतसिंह ने मराठों को कर देना स्वीकार कर लिया। ई.1737 में कोटा मराठों से परास्त हुआ और उसने मराठों को चौथ देना स्वीकार किया। उसी वर्ष कोटा में मराठों का प्रतिनिधि नियुक्त हुआ जो कोटा और बूंदी से कर वसूलता था। आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह ने भी पेशवा बाजीराव से संधि कर ली और उसे कर देना स्वीकार कर लिया।

सिंधिया, होल्कर और पेशवा की सेनाओं ने मेवाड़ को जी भर कर लूटा। कर्नल टॉड ने लिखा है कि मेवाड़ नरेश जगतसिंह (ई.1734-51) से लेकर मेवाड़ नरेश अरिसिंह के समय (ई.1761-73) तक मराठों ने मेवाड़ से 181 लाख रुपये नगद तथा 28.5 लाख रुपये की वार्षिक आय के परगने छीन लिए। कविराज श्यामलदास ने अपने ग्रंथ वीर विनोद में लिखा है कि मराठों की रानी अहिल्याबाई होलकर ने केवल चिट्ठी से धमकाकर मेवाड़ से नींबाहेड़ा का परगना छीन लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पेशवा बाजीराव

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पेशवा बाजीराव

पेशवा बाजीराव मराठों के इतिहास में विख्यात योद्धा हुआ है। उसने अपने जीवन काल में न केवल मुगलों के इतिहास को अपितु सम्पूर्ण उत्तर भारत के इतिहास को कंपायमान कर दिया तथा लाल किले की चूलें हिला दीं!

जब मुगल अमीरों के कहने पर बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने सवाई जयसिंह से मालवा की सूबेदारी छीन ली तो सवाई जयसिंह ने भी अपनी नीति में परिवर्तन करने का विचार किया। वह समझ गया कि मुगल दरबार की राजनीति उसे कभी भी मराठों के विरुद्ध सफल नहीं होने देगी और यदि जयसिंह सफल हो भी गया तो भी उसे सफलता का पुरस्कार मिलने के स्थान पर मुगल बादशाह की ओर से दण्ड ही मिलेगा। इसलिये जयसिंह ने अब मुगल बादशाह के स्थान पर, मराठों के साथ सहयोग करने का निश्चय किया।

जयसिंह ने पेशवा बाजीराव को जयपुर बुलाने तथा जयपुर से दिल्ली ले जाकर बादशाह से मिलवाने का निश्चय किया। उसने पेशवा के पास अपना एक दूत भेजा तथा पेशवा को लिखा कि वह मराठों और मुगलों के बीच स्थायी शांति की स्थापना के लिये जयपुर आये। पेशवा 5000 सवारों को अपने साथ लेकर आये तथा मार्ग में किसी तरह की लूट-मार न करे।

इस यात्रा के लिये सवाई जयसिंह पेशवा को 50 हजार रुपये प्रति दिन का भुगतान करेगा तथा पीलाजी यादव की जागीर भी उससे तय करके पेशवा को किराये पर दिलवा देगा। पेशवा को हर हालत में सुरक्षित लौटा लाने की जिम्मेदारी पर बादशाह से मिलवाने भी ले जाया जायेगा।

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पेशवा बाजीराव (प्रथम) ने सवाई जयसिंह का निमंत्रण स्वीकार कर लिया और 9 अक्टूबर 1735 को सेना सहित पूना से रवाना होकर 15 जनवरी 1736 को डूंगरपुर तथा फरवरी 1736 में उदयपुर पहुंच गया। महाराणा ने पेशवा को डेढ़ लाख रुपये सालाना चौथ देने का वचन दिया।

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यहाँ से पेशवा ने अपने दूत महादेव भट हिंगाड़े को जयपुर भेजा जिसे सवाई जयसिंह के मंत्री राजामल ने जयसिंह से मिलवाया। सवाई जयसिंह ने पेशवा बाजीराव (प्रथम) को नगद और सम्पत्ति के रूप में 5 लाख रुपये देने स्वीकार कर लिये। सवाई जयसिंह का मंत्री राजामल स्वयं यह प्रस्ताव लेकर पेशवा के पास गया और पेशवा को जयपुर चलने के लिये कहा। स्थायी शांति की आशा में पेशवा ने राजपूताने में स्थित अपने सेनापतियों को लड़ाई बंद करके दक्षिण को लौट जाने के आदेश दिये तथा नाथद्वारा होते हुए जयपुर की ओर रवाना हुआ।

अजमेर से 30 मील पहले भमोला गांव में सवाई जयसिंह पेशवा बाजीराव से मिला। वहाँ दो शिविर बनाये गये तथा दो शिविरों के बीच में भेंट के लिये एक अलग मण्डप बनाया गया जिसके दोनों तरफ सशस्त्र मराठे और राजपूत सैनिक नियुक्त किये गये। 25 फरवरी 1736 को दोनों सरदार अलग-अलग दिशाओं से भमोला पहुंचे और एक साथ हाथियों से उतरकर गले मिले। दोनों राजपुरुष एक ही मसनद पर बैठे।

पेशवा बाजीराव पुरोहित कुल में उत्पन्न होते हुए भी राजसी शिष्टाचारों से अनभिज्ञ था। सुसभ्य और सुसंस्कृत महाराजा सवाई जयसिंह ने अर्द्धसभ्य मराठा नेता की अशिष्टताओं को देखा किंतु अपने चेहरे पर असंतोष का कोई भाव नहीं आने दिया। इस शिष्टाचार भेंट के बाद कई दिनों तक दोनों में निरन्तर विचार विमर्श हुआ।

सवाई जयसिंह ने बादशाह मुहम्मदशाह को पेशवा की मांगों के बारे में सूचित कर दिया परन्तु बादशाह ने जयसिंह को लिखा कि जयसिंह को मालवा का नाममात्र का सूबेदार तथा पेशवा को नायब सूबेदार बनाकर मालवा, पेशवा को सौंप दिया जायेगा किंतु पेशवा की और कोई मांग नहीं मानी जायेगी।

इस पर पेशवा बाजीराव नाराज होकर पूना लौट गया। सवाई जयसिंह ने पेशवा और बादशाह के मध्य समझौता कराने का पूरा-पूरा प्रयास किया था परन्तु पेशवा की बढ़ती हुई मांगों, मुगल दरबार के षड़यंत्रों और बादशाह की ढुलमुल नीति के कारण कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।

जयसिंह का विचार था कि जिन मराठों से औरंगजेब जैसे बादशाह को भी मुंह की खानी पड़ी थी, उन मराठों से मुहम्मदशाह जैसा कमजोर, निकम्मा और अदूरदर्शी बादशाह कैसे लड़ सकता था! एक न एक दिन मुगलों को मराठों के हाथों नीचा देखना पड़ेगा!

जयसिंह की भविष्यवाणी के सत्य सिद्ध होने का समय आ गया था। 12 नवम्बर 1736 को पेशवा बीजाराव ने एक शक्तिशाली सेना के साथ पुनः पूना से उत्तर भारत के लिए प्रस्थान किया। वह मालवा में राजपूतों, बुंदेलखण्ड में बुंदेलों तथा दो-आब में जाटों के प्रदेशों में तेजी से निकलता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ने लगा।

मुहम्मद शाह के निर्देश पर अवध के सूबेदार सआदत अली खाँ ने विशाल सेना लेकर आगरा के निकट बाजीराव का मार्ग रोका परन्तु बाजीराव पेशवा सआदत अली खाँ को भुलावे में डालकर दिल्ली पहुंच गया। उसने दिल्ली में घुसकर कालकाजी को लूट लिया तथा ताल कटोरा पर शाही सेना को भयानक पराजय का स्वाद चखाया। मुहम्मदशाह लाल किले में बंद हो गया।

पेशवा बाजीराव दिल्ली को लूटने के बाद राजपूताने की तरफ लौट गया। पेशवा बाजीराव ने बादशाह की इज्जत का खयाल करते हुए लाल किले में प्रवेश नहीं किया। मार्ग में वह पुनः आम्बेर राज्य से होकर निकला। इस बार जयसिंह ने मराठों से संधि कर ली और उन्हें कर देना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार ई.1737 में जयपुर भी मराठों को चौथ देने वाला राज्य बन गया।

इस पूरे अभियान में कोई भी राजपूत राजा; बादशाह बहादुरशाह रंगीला की सहायता के लिए आगे नहीं आया। इस पर बादशाह ने हैदराबाद के निजाम चिनकुलीच खाँ को तुरंत सेना लेकर आने के लिए लिखा। निजाम इस समय तक स्वयं को स्वतंत्र कर चुका था किंतु वह स्वयं मराठों से कई बार पराजित हो गया था इसलिए अपनी हार का बदला लेना चाहता था।

निजाम चिनकुलीच खाँ इस बात को भी समझ रहा था कि यदि मराठे दिल्ली के लाल किले में जाकर बैठ गए तो फिर निजाम के लिए हैदराबाद में राज्य कर पाना भी संभव नहीं रह जाएगा। अतः निजाम चिनकुलीच खाँ एक विशाल सेना लेकर तत्काल दिल्ली के लिए रवाना हो गया।

अभी वह भोपाल तक ही पहुंच पाया था कि उसे बाजीराव पेशवा की सेना सामने से आती हुई मिली। भोपाल में ही दोनों सेनाओं के बीच जबर्दस्त संघर्ष हुआ किंतु पेशवा बाजीराव ने निजाम की सेनाओं को पराजित कर दिया तथा चिनकुलीच खाँ को मुगलों के लिए अपमानजनक शर्तों पर संधि करने के लिए विवश कर दिया।

7 जनवरी 1738 को हुई दुराहा संधि ने मुगल प्रतिष्ठा की धज्जियां उड़ा कर रख दीं। मालवा सदैव के लिये मुगलों के हाथ से निकलकर पेशवा के अधिकार में चला गया और चम्बल तथा नर्मदा के बीच के सम्पूर्ण प्रदेश पर मराठों का अधिकार हो गया। निजामुल्मुल्क ने युद्ध की क्षति-पूर्ति के रूप में पेशवा को 50 लाख रुपये देने स्वीकार किये। इस काल में मराठे पूरी तरह उफान पर थे और विकराल जोंक बनकर पूरे उत्तरी भारत का रक्त चूस रहे थे।

28 अप्रैल 1740 को पेशवा बाजीराव (प्रथम) की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद छत्रपति शाहूजी ने बाजीराव के 19 वर्षीय पुत्र बालाजी बाजीराव को पेशवा नियुक्त किया। बालाजी बाजीराव के समय में मराठा साम्राज्य अपने चरम पर पहुँच गया। छत्रपति की समस्त शक्तियाँ पेशवा के हाथों में चली गईं और सतारा के स्थान पर पूना मराठा राजनीति का केन्द्र बन गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

उर्दू शायरी

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उर्दू शायरी

उर्दू शायरी और धु्रपद गायकी में पुरसुकून कट रही थी जिंदगी तभी आ गया जालिम नादिरशाह, कोहिनूर के लिए!

सैयदों बंधुओं के क्रूर शिकंजे से पीछा छूट जाने पर भी बादशाह नासिरुद्दीन मुहम्मदशाह रंगीला की स्थिति अच्छी नहीं हो सकी। वह 17 साल की आयु में बादशाह बना था तथा जब वह 20 वर्ष का हुआ तब तक उसके कई बच्चे हो चुके थे। दुर्व्यसनों में फंसा हुआ होने के कारण वह बीमार रहता था। बादशाह कोकी नामक एक मुस्लिम औरत के चक्कर में फंसा हुआ था और अपना अधिक समय शाही महल में नपुंसकों एवं वेश्याओं की संगति में व्यतीत करता था।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि बादशाह शासन में उन लोगों को बड़े से बड़ा पद दे देता था जो बादशाह को अधिक से अधिक घूस देते थे। शहजादों और शहजादियों को सल्तनत की बड़ी-बड़ी जागीरें बांट दी गई थीं। ये लोग न तो अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते थे और न बादशाह की नाराजगी की परवाह करते थे। इस कारण शासन में चारों ओर दुर्बलता और अव्यवस्था आ गई।

शारीरिक एवं चरित्रगत कमजोरियों के कारण बादशाह के लिए यह संभव नहीं था कि वह स्वयं को राजकाज पर केन्द्रित करे। इसलिए वह स्वयं भी राजकाज छोड़कर शराब एवं शबाब के साथ-साथ उर्दू शायरी , ख्याल गायकी एवं मुजरों के चक्कर में पड़ा रहता था। उसके समय में लाल किले के भीतर का वातावरण ऐसा बन गया कि चारों ओर गवैए, नचैए एवं शायर दिखाई देने लगे। पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ उर्दू शाइरी के जन्म एवं विकास पर कुछ चर्चा करना समीचीन होगा।

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मुस्लिम शासकों के भारत में आने से पहले भारत का पण्डित, शासक एवं सम्पन्न वर्ग संस्कृत भाषा में व्यवहार करता था जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सम्मिलित थे जबकि किसान एवं श्रमिक आदि बहुसंख्यक लोग प्राकृत, पालि, पैशाचिक एवं देशज भाषाओं का उपयोग करते थे। देशज भाषाएं संस्कृत से निकली थीं जिनमें ब्रज, शौरसैनी, पिंगल, डिंगल आदि भाषाएं थीं।

आगे चलकर ब्रज एवं पिंगल से छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी आदि बोलियों का और डिंगल से मारवाड़ी एवं गुजराती आदि बोलियों का विकास हुआ था। एक हजार ईस्वी के आसपास प्राकृत और संस्कृत के मिश्रण से अपभ्रंश और अपभ्रंश से हिन्दी भाषा ने जन्म लेना आरम्भ कर दिया था।

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जब तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में तुर्क आक्रांताओं ने भारत में शासन करना आरम्भ किया तो दिल्ली एवं मेरठ के बीच में हिन्दी भाषा का विकास हो चुका था। तुर्कों ने भारत में तुर्की, अरबी एवं अफगानी भाषाओं का प्रचलन किया। इस काल में हिन्दी का भी खूब विकास हुआ। तेरहवी शताब्दी ईस्वी के कवि अमीर खुसरो हिन्दी के बड़े कवियों में गिने जाते हैं।

जब सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में मुग़ल भारत में आए तो वे अपने साथ फारसी भाषा लेकर आए। मुगलों की पारिवारिक, दरबारी और सरकारी भाषा फ़ारसी थी जबकि वे लेखन के लिए अरबी लिपि प्रयुक्त करते थे। भारत में मुगल शहजादियों ने फारसी भाषा में खूब कविताएं लिखीं।

जब मुगलों के सैनिक लश्करों में तुर्क, मुगल, अफगान, राजपूत, जाट और अन्य स्थानीय लोग भी सम्मिलित होते चले गए तो मुगलों के सैन्य शिविर विविध भाषाओं के संगम स्थल बन गए। मुगलों के काल में लगभग दो सौ साल की भाषाई मिश्रण की प्रक्रिया के बाद मुगलों के सैन्य शिविरों में एक नई भाषा ने आकार लेना आरम्भ किया जिसे उर्दू कहते थे।

उर्दू का अर्थ होता है भीड़। यह भाषा सचमुच ही बहुत सी भाषाओं की भीड़ थी जिसमें अरबी, फारसी, अफगानी, तुर्की, यूनानी तथा विभिन्न देशज भाषओं के आसानी से समझ में आने वाले शब्दों का जमावड़ा था। कुछ समय बाद यह भाषा सैन्य शिविरों से बाहर निकलकर जन सामान्य के घरों, दास-दासियों एवं बाजारों तक पहुंचने लगी। इस कारण इस काल में हिन्दी का विकास एक बार के लिए रुक गया और उर्दू का विकास होने लगा। जैसे-जैसे मुगलों का शासन आगे बढ़ा, वैसे-वैसे जन सामान्य की भाषा उर्दू बनती चली गई। ठीक वैसे ही जैसे बरगद की पुरानी शाखाओं के सूख जाने पर उनके नीचे से दूसरी शाखाएं निकल आती हैं।

फारसी जानने वाले शाही परिवार के लोग एवं दरबारी अमीर उर्दू को निम्न लोगों की भाषा समझते थे किंतु शीघ्र ही उर्दू भाषा को नए प्रकार के कवियों का साथ मिल गया जिन्हें शायर कहा जाता था। इन लोगों ने प्रेम जैसे सुकोमल विषय को अपनी कविता का मुख्य विषय बनाया। जब ये शायर अपने विशिष्ट अंदाज में शेर, नज्म और गजल कहते थे, तो सुनने वाले वाह-वाह कर उठते।

इन शायरों के आ जाने से फारसी रुबाइयों का जमाना बीत गया और उर्दू गजलों का जमाना आ गया। धीरे-धीरे उर्दू शायरी के शायर मुहम्मदशाह रंगीला के दरबार में भी घुस आए। इनकी संख्या बहुत अधिक थी और इनकी कविता में नयापन था। इस दृष्टि से मुहम्मदशाह रंगीला के समय को उर्दू शायरी का सुनहरा दौर कहा जा सकता है।

जब ईस्वी 1719 में मुहम्मदशाह मुगलों के तख्त पर बैठा तो उसी वर्ष ‘वली दक्किनी’ नामक एक शायर ने अपना पहला उर्दू शायरी का दीवान बादशाह मुहम्मदशाह को भेंट किया। जब इस शायर ने अपने नए अंदाज में इस दीवान की कविता बादशाह को सुनाई तो बादशाह आनंद से झूम गया किंतु बादशाह के दरबारी फारसी कवियों ने इसे सुनकर नाक-मुंह सिकोड़ लिए। इस कारण दिल्ली की स्थिर साहित्यिक झील में ज़बरदस्त हलचल पैदा हो गई।

दिल्ली के दरबारी अमीरों को पहली बार पता चला कि उर्दू शायरी भी की जा सकती है। चूंकि इस भाषा का जन्म हिन्दुस्तान में हुआ था इसलिए फारसी अमीरों ने इसे बड़ी हिकारत के साथ हिंदी, हिंदवी तथा हिन्दुस्तानी कहा। कुछ लोग इसे दक्किनी भी कहते थे क्योंकि इस भाषा का पहला दीवान दक्किन में लिखा गया था और यह भाषा दक्किन के मुगलिया लश्करों से बाहर निकलकर ही उत्तर भारत के लाल किले में पहुंची थी।

देखते ही देखते उर्दू शायरी की पनीरी तैयार हो गई, जिन में शाकिर नाजी, नज़मउद्दीन अबूर, शदफ़उद्दीन मज़मून और शाह हातिम आदि शायरों के नाम प्रमुख हैं। शाह हातिम का शिष्य मिर्जा रफी सौदा हुआ। कहा जाता है कि मिर्जा रफी सौदा से अच्छा उर्दू का कवि आज तक नहीं हुआ जिसे उर्दू में क़सीदा निगार कहा जाता है।

सौदा के ही समकालीन मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल का मुक़ाबला आज तक नहीं मिल सका। उसी दौर की दिल्ली में एक तरफ़ मीर दर्द की ख़ानक़ाह है, वही मीर दर्द जिन्हें आज भी उर्दू का सबसे बड़ा सूफ़ी शायर माना जाता है। उसी काल में मीर हसन की शायरी प्रसिद्ध हुई जिस की मसनवी सहर-उल-बयान आज भी अपनी मिसाल स्वयं है।

उसी काल में मीर सौज़, क़ायम चांदपुरी, मिर्ज़ा ताबिल और मीर ज़ाहक आदि शायर भी हुए जिन्हें उस काल में द्वितीय स्तर का कवि माना जाता था इसलिए उनके नाम और उनकी शायरी दोनों ही खो गए किंतु यदि वे बाद के किसी काल में हुए होते तो उर्दू साहित्य के गगन में चांद बन कर चमके होते।

जब उर्दू शायरी मुगल दरबार से निकलकर दिल्ली की गलियों में टहलने निकली तो उसने वेश्याओं और नृत्यांगनाओं के कोठों पर मुकाम किया। मनचले अमीर तथा उनके बेटे इन कोठों पर आकर उर्दू शायरों की शायरी, रक्कासाओं की अदायगी तथा गवैयों की गायकी का एक साथ आनंद उठाने लगे।

साहित्य की तरह नृत्य में मुजरा और संगीत में ध्रुपद गायकी का प्रचलन हो गया। मुहम्मदशाह रंगीला खुद भी औरतों के कपड़े पहनकर मुजरा करता और ध्रुपद गाता। ध्रुपद गायकी आज तक की सबसे कठिन गायकी मानी जाती है।

मुहम्मदशाह रंगीला ने ध्रुपद में ख्याल का समावेश किया। धु्रपद और खयाल आज भी भारत में यदा-कदा सुनाई दे जाता है। चैती, दादरा, टप्पा, कजरी और ठुमरी जैसी गायकियां भी इसी दौर में अपने उफान पर आईं। इन स्वर लहरियों को सुनकर लाल किला औरंगजेब के समय को बिल्कुल भूल ही गया जब गवैयों और नचैयों ने मिलकर ढोल-मजीरों की अर्थी निकाली थी।

मुहम्मदशाह रंगीला की जिंदगी इन सब बातों में आराम से निकल रही थी। उसे राज्य करते हुए तीस साल हो गए थे किंतु उसने कभी भी कोई युद्ध नहीं लड़ा था। न महाराजा अजीतसिंह के पुत्र अभयसिंह से जो दिल्ली के बाहर सराय अली वर्दी खाँ तक धावे मार रहा था, न पेशवा बाजीराव से जो कालकाजी में लूट मचाकर वापस लौट गया था, न सिंधिया, गायकवाड़, पंवार और होलकर से जो मालवा और गुजरात में अलग-अलग राज्य स्थापित करके बैठ गए थे।

मानव जीवन बहुत कठोर है, वह सदा एक जैसा नहीं रहता, मुहम्मद शाह रंगीला का भी नहीं रहने वाला था किंतु अनायास ही हाथ आई बादशाहत के कारण मुहम्मद शाह इस बात को याद नहीं रख सका।

उसकी सल्तनत की पश्चिमी दिशा से एक क्रूर काली आंधी तेजी से दिल्ली की ओर बढ़ी चली आ रही थी। इस काली आंधी का नाम था नादिरशाह जो भारत की भूमि से सैंकड़ों किलोमीटर दूर ईरान से उठी थी किंतु मुहम्मद शाह ठुमरियां गा रहा था, मुजरे कर रहा था और अपने ही नंगे चित्र बनाने में व्यस्त था।

कहा जाता है कि जब एक हरकारा ईरान के शाह नादिरशाह के भारत में आने की चिट्ठी लेकर मुहम्मदशाह के पास आया, तो बादशाह ने उस चिट्ठी को शराब के प्याले में डुबो दिया और उर्दू शायरी के अंदाज में बोला-

‘आईने दफ्तार-ए-बेमाना घर्क-ए-मय नाब उला।’

अर्थात्- इस व्यर्थ की चिट्ठी को विशुद्ध शराब में डुबो देना बेहतर है!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नादिरशाह

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नादिरशाह

नादिरशाह ने दिल्ली में इतने अधिक इंसानों की हत्या कर दी कि उसके वजीर को ही नादिरशाह से रक्तपात रोकने का अनुरोध करना पड़ा। उसने नादिरशाह से कहा- कोई नहीं बचा जिसे तू अपनी तलवार से क़त्ल करे, सिवाए इसके कि मुर्दों को ज़िंदा करें और दोबारा क़त्ल करें!

ईस्वी 1739 में फारस के शाह नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। वह हिंदुकुश पर्वत को पार करके खैबर दर्रे के रास्ते भारत में प्रविष्ट हुआ। जब बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला को बताया गया कि नादिरशाह की फौजें हिन्दुकुश पर्वत को पार करके भारत में घुस आई हैं तो मुहम्मदशाह ने जवाब दिया-

‘हनूज़ दिल्ली दूर अस्त!’

अर्थात्- अभी दिल्ली बहुत दूर है। अभी से चिंता करने की क्या आवश्यकता है!

नादिरशाह ने सबसे पहले पेशावर के सूबेदार पर आक्रमण किया। पेशवार का सूबेदार आसानी से परास्त हो गया। इसके बाद नादिरशाह पंजाब की तरफ बढ़ा। इस समय चिनकुलीच खाँ हैदराबाद में बैठा था और अवध का नवाब सआदत खाँ बादशाह से नाराज चल रहा था। जब सआदत खाँ को नादिरशाह के भारत आक्रमण की जानकारी हुई तो उसने अपने संदेशवाहक नादिरशाह के पास भिजवाए तथा उससे कहलवाया कि यदि नादिरशाह दिल्ली पर आक्रमण करेगा तो सआदत खाँ नादिरशाह को पांच करोड़ रुपए देगा।

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यह वही सआदत खाँ था जिसने बादशाह मुहम्मदशाह को झूठी खबर भेजी थी कि उसने मराठों को नर्बदा के उस पार खदेड़ दिया है और उसका झूठ पकड़े जाने पर बादशाह मुहम्मदशाह ने उसे बहुत अपमानित किया था। अब सआदत खाँ अपने उस अपमान का बदला नादिरशाह के माध्यम से लेना चाहता था।

कांधार तथा लाहौर को जीतने के बाद नादिरशाह ईस्वी 1739 की गर्मियों में करनाल तक आ पहुंचा। करनाल में बादशाह मुहम्मदशाह के सेनापति मीरबख्शी खाने दौरां ने नादिरशाह का मार्ग रोका।

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मुगल सैनिक लश्कर अत्यंत विशाल था जिसका बड़ा हिस्सा बावर्चियों, गवैयों, रक्कासाओं, कुलियों, नाइयों, धोबियों, श्रमिकों, खजांचियों और विभिन्न प्रकार के कर्मचारियों से बना था किंतु लड़ाका फौज भी एक लाख से अधिक थी। उसके मुक़ाबले ईरानी फौज में केवल 55 हज़ार सैनिक थे। यदि कोई कुशल सेनापति मुगलों की सेना का नेतृत्व करता तो नादिरशाह की सारी हेकड़ी निकल जाती किंतु जिस बादशाह को औरतों के कपड़े पहनने और अपने ही नंगे चित्र बनाने से फुर्सत न हो, उस बादशाह की सेना का नेतृत्व करने के लिए कोई योग्य सेनापति कहाँ से आता!

यही कारण था कि एक लाख सैनिकों वाली सेना करनाल के मैदान में तीन घंटे से अधिक नहीं टिक सकी। मुगलों का प्रधान सेनापति मीर बख्शी खाने दौरां, अनेक प्रमुख अमीर तथा बारह हजार मुगल सैनिक युद्ध क्षेत्र में ही मारे गए। नादिरशाह की सेना ने युद्ध के मैदान से भागते हुए मुगल सैनिकों का बेरहमी से कत्ल किया। मुगल सेना के बावर्चियों, गवैयों, रक्कासाओं, कुलियों, नाइयों, धोबियों, श्रमिकों, खजांचियों को भी मार दिया गया!

विजेता नादिरशाह करनाल से दिल्ली के लिए चल पड़ा। कुछ दिन बाद नादिरशाह ने दिल्ली में प्रवेश किया। लाल किला प्रतिरोध करने की क्षमता खो चुका था। इसलिए मुहम्मदशाह ने नादिरशाह का लाल किले के दरवाजे पर खड़े होकर स्वागत किया तथा उसे दीवाने खास में ले जाकर अतिथि की तरह रखा।

अगले दिन इद-उल-जुहा थी। मुहम्मदशाह ने नादिरशाह के समक्ष उपस्थित होकर उसे ईद की मुबारकबाद दी। इस अवसर पर बड़ा भारी जश्न किया गया। नादिरशाह ने स्वयं को भारत का बादशाह घोषित कर दिया। दिल्ली की मस्जिदों में नादिर शाह के नाम का खुत्बा पढ़ा गया और टकसालों में उसके नाम के सिक्के ढाले जाने लगे।

मुहम्मदशाह को आशा थी कि नादिरशाह कुछ धन लेकर वापस ईरान लौट जाएगा। इसलिए उसने नादिरशाह के साथ बहुत सम्मानपूर्ण व्यवहार किया। दोनों बादशाह शाम के समय लाल किले की बारादरियों में एक साथ बैठकर महफिल सजाते। शराब के दौर चलते, शायर लोग बढ़-चढ़ कर शायरी सुनाते, रक्कासाएं नृत्य करतीं और शाम ढलते-ढलते ईरानी अमीर लाल किले की वेश्याओं को लेकर पड़ जाते।

लाल किले को देखकर ऐसा लगता ही नहीं था कि यह वही किला है जिसके बारह हजार सैनिक अपने प्रधान सेनापति सहित कुछ दिन पहले ही कत्ल किए गए हैं। हजारों सैनिकों के परिवार अपने पुत्रों की मौत पर मातम मना रहे थे और लाल किला अपनी रंगीनियों में डूबा हुआ था।

कुछ दिन तक इसी तरह चलता रहा किंतु एक दिन अचानक सब-कुछ बदल गया। किसी ने दिल्ली में अफ़वाह फैला दी कि एक तवायफ़ ने नादिरशाह का क़त्ल कर दिया है। इस अफवाह के फैलते ही दिल्ली के लोग अपने घरों से निकल आए और उन्होंने दिल्ली की गलियों में तैनात ईरानी सैनिकों का क़त्ल करना आरम्भ कर दिया। जब यह सूचना नादिरशाह को दी गई तो उसने दिल्ली को दण्डित करने का निर्णय लिया।

आधुनिक काल के एक पाकिस्तानी व्यंग्य लेखक ‘शफ़ीक-उर-रहमान’ ने अपनी पुस्तक ‘तुजुक-ए-नादरी’ में लिखा है- ‘सूरज की किरणें अभी-अभी पूर्वी आसमान में फूटी ही थीं कि नादिरशाह दुर्रानी अपने घोड़े पर सवार लाल किले से निकल आया। उसका बदन ज़र्रा-बक़्तर से ढका हुआ, सर पर लोहे का कवच और कमर पर तलवार बंधी हुई थी। उसके सैनिक कमांडर और जनरल उनके साथ थे। उसका रुख आधा मील दूर चांदनी चौक में मौजूद रोशनउद्दौला मस्जिद की ओर था।

मस्जिद के बुलंद सहन में खड़े हो कर नादिरशाह ने तलवार म्यान से बाहर निकाली। यह नादिरशाह के सिपाहियों के लिए कत्ल-ए-आम आरम्भ करने का संकेत था। प्रातः नौ बजे क़त्ल-ए-आम आरम्भ हुआ। कज़लबाश सिपाहियों ने घर-घर जाकर जो मिला उसे मारना आरम्भ कर दिया। दिल्ली की गलियों में इतना खून बहा कि खून नालियों के ऊपर से बहने लगा। लाहौरी दरवाज़ा, फ़ैज़ बाज़ार, काबुली दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, हौज़ क़ाज़ी और जौहरी बाज़ार के घने इलाक़े लाशों से पट गए।’

हज़ारों औरतों का बलात्कार किया गया, सैकड़ों औरतों ने कुओं में कूद कर अपनी जान दे दी। कई लोगों ने ख़ुद अपने घरों की स्त्रियों और बच्चियों को मार दिया ताकि वे ईरानी सिपाहियों के हाथों में न पड़ जाएं। तत्कालीन ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार कुछ ही घण्टों में तीस हज़ार नागरिकों को तलवार के घाट उतार दिया गया। अंततः बादशाह मुहम्मदशाह ने अपने प्रधानमंत्री को नादिर शाह के पास भेजा।

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नंगे पांव और नंगे सिर नादिर शाह के सामने पेश हुआ और उसने एक शेर पढ़ा-

‘दीगर नमाज़दा कसी ता बा तेग़ नाज़ कशी।

मगर कह ज़िंदा कनी मुर्दा रा व बाज़ क़शी’

अर्थात्- और कोई नहीं बचा जिसे तू अपनी तलवार से क़त्ल करे। सिवाए इसके कि मुर्दों को ज़िंदा करें और दोबारा क़त्ल करें।

नादिरशाह को मुहम्मदशाह के प्रधानमंत्री पर दया आ गई। उसने अपनी तलवार दोबारा म्यान में डाल ली। इसके बाद कत्लेआम रुक गया। नादिरशाह के सिपाहियों ने दिल्ली के लाल किले में रहने वाली बेगमों, शहजादियों और बड़े-बड़े अमीरों की स्त्रियों का शील हरण किया। अंत में मुहम्मदशाह ने नादिरशाह को 70 करोड़ रुपये नगद देकर उसके सैनिकों द्वारा किया जा रहा विनाश रुकवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाल किले का खजाना

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लाल किले का खजाना

लाल किले का खजाना मध्यकालीन संसार में सबसे बड़ा खजाना था। यह खजाना मुगल बादशाहों ने विगत ढाई शताब्दियों में भारत के राजाओं, जागीरदारों, मंदिरों, सेठों एवं किसानों से लूटकर एकत्रित किया था। इसी खजाने के कारण लाल किले में मानव इतिहास की सबसे बड़ी सशस्त्र डकैती हुई!

नादिरशाह के सैनिकों ने दिल्ली में तीस हजार मनुष्यों का कत्ल कर दिया। जब क़त्ल-ए-आम बंद हुआ तो लूटमार का बाज़ार खुल गया। नादिरशाह की सेनाओं को शहर के अलग-अलग हिस्सों में भेजा गया ताकि शहर का कोई हिस्सा लुटने से बच न जाए। जिन लोगों ने इस लूट का विरोध किया, उन्हें मृत्यु के हवाले कर दिया गया।

जब शहर में कत्ले-आम तथा लूट-मार के काम पूरे हो गए तो नादिरशाह ने शाही महल की ओर रुख किया। भारत में मुगलों के शासन को कुलीनों का शासन कहा जाता था। इन कुलीनों ने भारत की निर्धन जनता का रक्त निचोड़कर अपरिमित खजाना एकत्रित किया था।

लाल किले का खजाना य़द्यपि कल्पना से भी बाहर की चीज थी तथापि इस खजाने पर संक्षिप्त चर्चा करना समीचीन होगा। लाल किले का खजाना केवल मुगलों की लूट से ही तैयार नहीं हुआ था अपितु उसमें भारत के पूर्ववर्ती तुर्क लुटेरे शासकों के खजाने भी शामिल थे। जब ई.1526 में बाबर एवं हुमायूँ ने भारत पर आक्रमण किया था, तब बाबर ने दिल्ली के किलों में तथा हुमायूँ ने आगरा के लाल किले में स्थित शाही खजानों पर अधिकार कर लिया था।

इस प्रकार बाबर एवं हुमायूँ उस विशाल खजाने के अनायास ही मालिक बन गए थे जिसे ई.1193 से लेकर ई.1526 तक मुहम्मद गौरी के गुलामों, खिलजियों, तुगलकों, सैयदों एवं लोदियों द्वारा भारत की समृद्ध जनता, भारत के समृद्ध राजा एवं भारत के समृद्ध मंदिरों को लूटकर तुगलकाबाद, सीरी, सलीमगढ़, दीनपनाह एवं आगरे के लाल किले में जमा किया गया था।

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पूर्ववर्ती तुर्कों द्वारा 333 साल में जमा किया गया लाल किले का खजाना मुगलों का पेट नहीं भर सका। इसलिए अकबर, जहांगीर तथा शाहजहाँ ने अनेक हिन्दू राजवंशों के शताब्दियों पुराने खजाने छीनकर आगरा के लाल किले में जमा कर लिए। इस खजाने से भी मुगलों का पेट नहीं भरा।

इसलिए मुगलों ने ई.1526 से ई.1739 तक के काल में गंगा-यमुना के दो-आब से लेकर, रावी, चिनाव, झेलम सतलुज और व्यास नदियों में प्रवाहित होने वाले अमृत से सम्पन्न हरे-भरे पंजाब, मालवा और दक्कन के पठार तथा कृष्णा और कावेरी के दक्किनी दो-आब के किसानों की खून-पसीने की कमाई को चूसकर अपने महलों में भर लिया। बंगाल से लेकर असम तक की धरती हरा सोना उगलती थी, मुगलों ने इसे भी लूट लिया।

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लाल किले का खजाना संसार भर के महंगे रत्नों से भरा हुआ था। इन्हीं रत्नों का उपयोग करके शाहजहाँ ने संसार का सबसे महंगा राजसिंहासन बनवाया था जिसे तख्त-ए-ताउस के नाम से जाना जाता था। तख्ते ताउस 3.5 गज़ लम्बा, 2 गज़ चौड़ा और 5 गज़ ऊँचा था जो कि सम्पूर्णतः ठोस सोने से बना हुआ था और उसमें 454 सेर भार के बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे। इन रत्नों की मीनाकरी एवं पच्चीकारी में कई सौ कारीगरों ने 7 वर्ष तक निरंतर कार्य किया था। सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में तख्ते ताउस की लागत 2 करोड़ 14 लाख 50 हज़ार रुपये आई थी।

जब हुमायूँ ने आगरा के शाही खजाने पर अधिकार किया था तो उसे आगरा से जान बचाकर भाग रहे ग्वालियर के राजा विक्रमादित्य के परिवार से अपार सोने-चांदी एवं बहुमूल्य रत्नों के साथ-साथ कोहिनूर हीरा भी प्राप्त हुआ था जिसका मूल्य संसार के ढाई दिन के भोजन के व्यय के बराबार आंका जाता था। यह तख्ते ताउस और कोहिनूर अब भी मुहम्मदशाह रंगीला के पास थे। औरंगजेब के समय में कृषि पर वसूले जाने वाले बेतहाशा लगान के साथ-साथ हिन्दुओं से लिए जाने वाले जजिया एवं तीर्थकर से मुगल बादशाहों का खजाना दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से भरा था।

उस समय मालगुजारी से मुगल सल्तनत को 33 करोड़ 25 लाख रुपए मिलते थे। इस आय में जकात और जजिया से मिलने वाली राशि शामिल नहीं थी।

इस प्रकार भारत के मुगल बादशाहों का खजाना संसार के समस्त बादशाहों, सुल्तानों, सम्राटों और एम्पररों के खजानों से बड़ा था। जब नादिरशाह के सिपाही मुहम्मदशाह रंगीला के खजाने को लूटने पहुंचे तो उनकी आंखें इस अकूत सम्पदा को देखकर फटी की फटी रह गईं। इस खजाने का विवरण नादिरशाह के दरबारी इतिहासकार मिर्ज़ा महदी अस्राबादी ने इस प्रकार किया है-

‘चंद दिनों के अंदर-अंदर मज़दूरों को शाही खजाना खाली करने का हुक्म दिया गया। यहाँ मोतियों और मूंगों के समंदर थे, हीरे, जवाहरात, सोने चांदी के खदाने थीं, जो उन्होंने कभी ख्वाब में भी नहीं देखीं थीं।

हमारे दिल्ली में क़याम के दौरान, शाही खजाने से करोड़ों रुपए नादिरशाह के खजाने में भेजे गए। दरबार के उमराओं, नवाबों और राजाओं ने कई करोड़ रुपए की दौलत सोने और जवाहरात की शक्ल में बतौर फिरौती दिए।

सैकड़ों मज़दूर लगभग एक महीने तक सोने चांदी के आभूषणों, बर्तनों और दूसरे सामान को पिघलाकर उनकी ईंटें ढालते रहे ताकि उन्हें ईरान तक ढोकर ले जाने में आसानी हो।’

पाकिस्तानी व्यंग्य लेखक शफ़ीक़ुर्रहमान ने ‘तुज़ुक-ए-नादरी’ में लिखा है- ‘हमने कृपा की प्रतीक्षा कर रहे मुहम्मदशाह को इजाज़त दे दी कि अगर उसकी नज़र में कोई ऐसी चीज़ है जिसको हम बतौर तोहफ़ा ले जा सकते हों और ग़लती से याद न रही हो तो बेशक़ साथ बांध दें।

लाल किले के लोग दहाड़ें मार-मार कर रो रहे थे और बार-बार कह रहे थे कि हमारे बग़ैर लाल क़िला खाली-खाली सा लगेगा। ये हक़ीक़त थी कि लाल किला हमें भी खाली-खाली लगने लगा था।’

नादिरशाह ने मुगलों के कोष से 70 करोड़ रुपये नगद, 50 करोड़ रुपये के स्वर्णाभूषण एवं जहवाहरात, रत्न जटित तख्ते ताऊस, 7 हजार घोड़े, दस हजार ऊँट, 100 हाथी तथा हजारों गुलाम लूट लिए। यदि गुलामों को छोड़ दिया जाए तो शेष सम्पत्ति की कीमत आज के मूल्यों पर दस लाख पचास हज़ार करोड़ रुपए से अधिक होती है। यह मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी सशस्त्र डकैती थी।

नादिरशाह ने न केवल लाल किले का खजाना झाड़ू फेरकर साफ कर दिया अपितु सल्तनत के समस्त वजीरों, अमीरों एवं सेठ साहूकारों के घरों को लूटकर उन्हें कंगाल बना दिया। दिल्ली में ऐसा कोई आदमी नहीं बचा था जिसकी जेब न टटोली गई हो।

दिल्ली के साथ-साथ थानेश्वर, पानीपत और सोनीपत आदि समृद्ध नगर लुट चुके थे किंतु मुहम्मदशाह के पास अभी भी एक ऐसी चीज थी जिस पर नादिरशाह की दृष्टि नहीं पड़ी थी। वह थी। वह नायाब चीज थी- कोहिनूर हीरा।  बादशाह ने कोहीनूर को अपनी पगड़ी में छिपा लिया ताकि नादिरशाह यदि खजाने में झाड़ू लगवा दे तो भी मुहम्मदशाह के पास इतना धन बच जाए कि उससे वह मुगलिया सल्तनत को बिखरने से बचा सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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