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सिक्ख लाल किले में

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सिक्ख लाल किले में

महाराजा सूरजमल की हत्या के बाद दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों से जाटों की पकड़ ढीली पड़ने लगी। इसका लाभ उठाकर सिक्खों ने दिल्ली तक धावे मारने आरम्भ कर दिए। एक दिन सिक्ख लाल किले में घुसकर बैठ गए।

पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1761 में एक लाख मराठों का विनाश करने के बाद अहमदशाह अब्दाली अफगानिस्तान लौट गया था। इसके बाद पंजाब में राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हो गई थी। इस शून्यता को भरने के लिए पंजाब के सिक्ख समूह आगे आए। उन्होंने दल खालसा के नेतृत्व में बड़ी तेजी से अपनी शक्ति का विस्तार किया। वे सिंध नदी के पूर्व से लेकर यमुना के पश्चिम तक के क्षेत्र में बड़ी तेजी से फैलने लगे।

ई.1783 में सिक्खों के 12 मिसलों ने सरबत खालसा के दौरान आयोजित गुरुमत्ता में, यमुना पार करके दिल्ली पर चढ़ाई करने का निर्णय लिया। इनका नेतृत्व सरदार बघेल सिंह ने किया। बघेल सिंह दक्षिण-पूर्वी पंजाब में करोड़-सिंघिया मिसल का मुखिया था। उस काल की समस्त प्रमुख शक्तियों- मुगलों, मराठों, रोहिलों, जाटों तथा अंग्रेजों से उसके अच्छे सम्बन्ध थे। उसके पास 12 हजार घुड़सवारों की सेना थी।

जब सिक्खों की 12 मिसलें उसके झण्डे के नीचे आ गईं तो सिक्खों के चालीस हजार घुड़सवार एक विशाल सेना की तरह दिखाई देने लगे। सरदार बघेल सिंह ने यमुना पार करके गंगा-यमुना के दो-आब में प्रवेश किया तथा मेरठ, खुर्जा, अलीगढ़, टूंडला, शिकोहाबाद, फर्रूखाबाद, आगरा सहित दिल्ली से दो-आब के बीच के विस्तृत क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

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इस पूरे क्षेत्र में उस काल में छोटे-छोटे राजा और नवाब बन गए थे। सरदार बघेल सिंह ने इन सब राजाओं एवं नवाबों से राखी अर्थात् कर वसूल किया। ई.1775 में उसने रोहिलों की जागीर सहारनपुर पर अधिकार कर लिया। मार्च 1776 में सरदार बघेल सिंह ने मुजफ्फरनगर के निकट मुसलमानों की एक बड़ी सेना को परास्त किया जिसके बाद गंगा-यमुना के लगभग सम्पूर्ण दो-आब पर सिक्खों का अधिकार हो गया।

8 जनवरी 1778 को सरदार बघेल सिंह ने दिल्ली पर आक्रमण किया तथा शहादरा तक का क्षेत्र अपने अधीन कर लिया। 17 जुलाई 1778 को सरदार बघेल सिंह ने पहाड़गंज तथा जयसिंहपुरा तक के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। जहाँ आज नई दिल्ली बसी हुई है, वहीं पर सिक्खों के सैनिक शिविर स्थापित किए गए। सिक्खों की योजना लाल किले पर अधिकार करके उस पर निशान साहिब लगाना था किंतु दुर्भाग्य से सिक्खों को अनाज की आपूर्ति मिलनी बंद हो गई और उन्हें अपना अभियान बीच में छोड़कर पंजाब लौट जाना पड़ा किंतु उन्होंने लाल किले को जीतने का लक्ष्य छोड़ा नहीं।

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ई.1783 के आरम्भ में सिक्खों की सेनाओं ने दोबारा यमुना नदी पार की और वे लाल किले तक आ धमके। सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया एवं सरदार बघेल सिंह के नेतृत्व में 60 हजार सिक्खों ने दिल्ली को घेर लिया। 8 मार्च 1783 को सिक्खों ने मलकागंज तथा सब्जी मण्डी पर अधिकार कर लिया। बादशाह शाहआलम (द्वितीय) का पुत्र मिर्जा शिकोह थोड़े से मुस्लिम सैनिकों को लेकर सिक्खों का मार्ग रोकने के लिए आगे आया किंतु सिक्खों ने उसे बड़ी आसानी से परास्त कर दिया। शहजादा युद्ध क्षेत्र से भाग खड़ा हुआ।

9 मार्च को सिक्खों ने अजमेरी गेट पर अधिकार कर लिया। दिल्ली की जनता भाग कर लाल किले में चली गई। बघेलसिंह के 30 हजार सिक्ख सैनिक तीस हजारी क्षेत्र में जाकर बैठ गए। इसी समय जस्सासिंह रामगढ़िया भी 10 हजार सिक्ख सैनिकों को लेकर आ गया। 11 मार्च 1783 को सिक्खों ने लाल किले पर धावा बोला। बादशाह के मुट्ठी भर सिपाहियों ने लाल किले के दरवाजों को भीतर से बंद कर लिया किंतु सिक्खों को लाल किले के कुछ ऐसे कमजोर स्थानों का पता लग गया जहाँ से दीवार टूटी हुई थी और उसे लकड़ी के तख्तों से बंद किया गया था।

वहीं से सिक्ख लाल किले में घुसे। इस स्थान को अब मोरी गेट कहा जाता है। सिक्खों को लाल किले पर अधिकार करवाने में लाल किले के पूर्व मीरबख्शी नजीबुद्दौला के पुत्र जाबिता खाँ का भी हाथ था जिसने स्वयं को मीरबख्शी घोषित कर रखा था।

सिक्खों ने लाल किले से मुगलों का झण्डा उतारकर अपना केसरिया झण्डा ‘निशान साहब’ चढ़ा दिया और दीवाने आम में अपना डेरा लगाया। सिक्खों ने जस्सासिंह अहलूवालिया को दीवाने आम में एक तख्त पर बैठाकर हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया। जब जस्सासिंह रामगढ़िया तथा उसके साथियों ने जस्सासिंह अहलूवालिया के बादशाह बनने का विरोध किया तो अहलूवालिया ने सिक्ख एकता बनाए रखने के लिए सिंहासन खाली कर दिया।

सिक्ख लाल किले में घुस तो गए किंतु उनके लिए लाल किले पर सदा के लिए अधिकार करके बैठे रहना संभव नहीं था। उन्होंने बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के पास संधि का एक प्रस्ताव भेजा। बादशाह ने सिक्खों द्वारा भेजी गई शर्तें स्वीकार करके उनके साथ शांति स्थापित करने की संधि कर ली। इस संधि के अनुसार बादशाह शाहआलम (द्वितीय) ने सिक्खों को तीन लाख रुपया नजराना देना स्वीकार कर लिया तथा कोटवाली को सिक्खों की सम्पत्ति मान लिया। इसके बदले में सिक्खों ने लाल किला खाली करने का वचन दिया।

इस दौरान बघेलसिंह दिल्ली एवं उसके आसपास के क्षेत्र में अपने चार हजार सिपाहियों की सहायता से गुरुद्वारों का निर्माण करवाने में लगा रहा। जब सिक्खों और बादशाह के बीच संधि हो गई तो सिक्खों ने लाल किला खाली कर दिया तथा दिल्ली से निकल कर फिर से पंजाब लौट गए।

जिस लाल किले ने नादिरशाह को 70 करोड़ रुपए और ढेरों शहजादियां तथा अहमदशाह अब्दाली को नौ करोड़ रुपए और रूप से दमदमाती शहजादियों के साथ ढेरों बेगमें भी दी थीं, उसी लाल किले ने सिक्खों को केवल 3 लाख रुपए देकर अपनी जान छुड़ाई।

सिक्ख लाल किले में इससे अधिक की रुचि नहीं रखते थे। उन्हें न तो मुगलों की औरतें चाहिए थीं और न लाल किले की सत्ता! वे तो लाल किले का मान-मर्दन करके अपने गुरुओं एवं गुरु-पुत्रों की हत्याओं का बदला ले रहे थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बेगम समरू

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बेगम समरू

बेगम समरू कश्मीर के एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुई थी और भाग्यवश वेश्याओं के कोठों पर नाचकर अपना पेट भरती थी। मुगलों के इतिहास में एक ऐसा दिन भी आया जब बेगम समरू की सेना ने लाल किले में घुसकर बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के प्राणों की रक्षा की।

ई.1739 से ई.1783 तक की अवधि में ईरानियों, अफगानियों, मराठों, जाटों तथा सिक्खों ने लाल किले को लूटा और बर्बाद किया था किंतु लाल किला अब भी मुगलों की सत्ता और शक्ति का प्रतीक बनकर दिल्ली में खड़ा था। विगत डेढ़ सौ सालों में उसके लाल पत्थरों की चमक इंसानी खून से भीग-भीगकर और अधिक लाल हो गई थी। यह बात अलग थी कि उसके भीतर की समस्त रंगीनियां गायब हो चुकी थीं।

लाल किले की शहजादियों और बेगमों को ईरानी और अफगानी आक्रांता जबर्दस्ती पकड़-पकड़कर ले गए थे जिसके कारण लाल किला भीतर से बिल्कुल सुनसान दिखाई देता था। शाही हरम की रौनकें नष्ट हो चुकी थीं। लाल किले में छाए रहने वाले रूप और रंग के चौंधे तथा शहजादियों के बदन से उठते सुगंधों के झौंके अतीत की बात बन चुके थे। 

अब लाल किले के भीतर इंसानों से अधिक चमगादड़ें दिखाई देती थीं। जगह-जगह घास उग आई थी और किले के भीतर झाड़ू भी कहीं-कहीं लगती थी। वे भिश्ती गायब हो चुके थे जो सुबह-शाम अपनी मशकों में यमुनाजी का जल भरकर लाल किले में छिड़का करते थे। फूलों की क्यारियां सूख गई थीं, नहरों में जल का बहना बंद हो गया था। फव्वारों से निकलने वाली जल धाराओं के अब केवल निशान ही बाकी बचे थे।

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शाही महलों की दीवारों पर लगे मूंगों और मोतियों की जगह उनके निशान ही शेष बचे थे। किले के भीतर बने बावर्ची खानों से आने वाली बिरयानियों की खुशबू की जगह अब केवल रोटियों के सिकने की गंध आती थी। शाही बावर्ची खाने में नित्य ही कटने के लिए आने वाले बकरों, मेंढों और बैलों को राहत मिल गई थी। यमुनाजी से पकड़कर लाई जाने वाली मछलियां अब चैन से यमुनाजी में तैर सकती थीं। मुर्गियों को अब सुबह-सवेरे जिबह हो जाने की चिंता नहीं सताती थी। लाल किले में दाल और रोटी भी मुश्किल से पकती थी।

इतना सब बदल जाने पर भी किला अपनी जगह मौजूद था, उसके भीतर बादशाह रहता था और बादशाहत बनी हुई थी। यह नाममात्र की बादशाहत भी दुश्मनों की आंखों में चुभती थी और वे इसे भी नष्ट कर देने पर उतारू थे।

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पाठकों को स्मरण होगा कि अफगान आक्रांता अहमदशाह अब्दाली ने दो बार रूहेला अमीर नजीब खाँ उर्फ नजीबुद्दौला को लाल किले का मीर बख्शी नियुक्त किया था। आलमगीर (द्वितीय) तथा शाहजहाँ (तृतीय) ने नजीब खाँ उर्फ नजीबुद्दौला को उसके पद पर बनाए रखना चाहा था किंतु पुराने मीर बख्शी गाजीउद्दीन इमादुद्दौला, मराठा सरदार महादजी सिंधे और जाट राजा सूरजमल, नजीब खाँ को बार-बार दिल्ली से मारकर भगा देते थे। नजीबुद्दौला जिद्दी छिपकली की तरह बार-बार लाल किले में लौट आता था।

नजीबुद्दौला एक घमण्डी और अत्यंत महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। उसने लाल किले के बादशाह और उसकी बादशाहत की ताकत बनने की बजाय बादशाह और बादशाहत को कमजोर करने का काम किया था। इस काल की भारतीय राजनीति में नजीबुद्दौला एक घृणित व्यक्ति के रूप में उभर कर सामने आता है।

ई.1771 में नजीबुद्दौला मर गया तो उसका पुत्र जाबिता खाँ भी उसके नक्शे कदम पर चला। जब ई.1783 में सिक्खों ने दिल्ली पर आक्रमण किया था तब नजीबुद्दौला के पुत्र जाबिता खाँ ने सिक्खों का साथ दिया था और स्वयं को मुगल बादशाह का मीरबख्शी घोषित कर दिया था।

ईरान से आए मिर्जा नजफ खाँ नामक एक अमीर ने मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के लिए बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर कासिम की सहायता से एक सेना का निर्माण किया था। बादशाह ने इसी सेना को भेजकर जाबिता खाँ तथा उसके परिवार को पकड़ मंगवाया। बादशाह ने जाबिता खाँ तथा उसके परिवार पर सिक्खों के साथ मिल कर राजद्रोह करने का आरोप लगाया।

बादशाह ने जाबिता खाँ और उसके परिवार को बहुत प्रताड़ित किया तथा जाबिता खाँ के पुत्र गुलाम कादिर के यौन अंग कटवाकर उसे नपुंसक बनवा दिया। जाबिता खाँ और गुलाम कादिर उस समय तो कुछ नहीं कर सके किंतु बदले की आग उनके सीने में धधकती रही। जब जाबिता खाँ मर गया तब भी गुलाम कादिर मुगल बादशाह से अपना बैर नहीं भुला सका। ई.1787 में गुलाम कादिर ने एक बड़ी सेना तैयार करके दिल्ली पर आक्रमण किया।

इस समय कोई मराठा सेना दिल्ली में नहीं थी। इसलिए बादशाह असहाय स्थिति में था। उसने दिल्ली से लगभग 60 मील दूर स्थित सराधना राज्य की शासक बेगम समरू को अपनी सहायता के लिए बुलाया। लाल किले के इतिहास को किंचित् समय के लिए रोककर कर हमें बेगम समरू के बारे में कुछ चर्चा करनी होगी।

बेगम समरू के बचपन का नाम फरजाना था। उसका जन्म ई.1754 में कश्मीर के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। जब वह थोड़ी बड़ी हुई तो कश्मीर से लखनऊ आ गई और वेश्याघरों में नाचने लगी। जब वह 14 वर्ष की हुई तो भारत में नियुक्त लक्समबर्ग के 45 वर्षीय अंग्रेज अधिकारी वॉल्टर रीनहर्डट सोम्बर के सम्पर्क में आई। सोम्बर ने ही फरजाना को समरू नाम दिया तथा उसे कैथोलिक क्रिश्यचन बनाया।

इसके बाद समरू जीवन भर सोम्बर के साथ रही। सोम्बर उन्नति करता हुआ एक जागीर का स्वामी बन गया जिसकी वार्षिक आय 90 हजार पौण्ड प्रतिवर्ष थी। ई.1778 में सोम्बर का निधन हो गया तथा उसकी सम्पत्ति और जागीर पर समरू ने अधिकार कर लिया।

बेगम समरू की एक सेहली मेरठ के निकट स्थित सराधना जागीर की मालकिन थी। जब सराधना की जागीदारनी मर गई तो वह जागीर भी समरू के अधिकार में आ गई। बेगम समरू ने इस जागीर को मुगल बादशाह से स्वतंत्र करके छोटे राज्य में बदल दिया।

बेगम समरू गोरे रंग तथा नाटे कद की औरत थी जिसमें नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता थी। उसने दो बार बड़ी लड़ाइयों में अपनी सेनाओं का मार्ग दर्शन किया था तथा अपनी जागीर में वृद्धि करती हुई सराधना नामक छोटे से राज्य की स्वामिनी बन गई। बेगम समरू बड़ी व्यवहार कुशल औरत थी। अनेक बड़े अंग्रेज अधिकारियों, नवाबों एवं राजाओं से उसके मधुर सम्बन्ध थे। वह अपने मित्रों से अपने लिए कुछ भी प्राप्त कर सकती थी।

जब मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) छः वर्ष तक निर्वासन में रहा, तब बेगम समरू शाहआलम के सम्पर्क में आई। यही कारण था कि संकट की इस घड़ी में बादशाह ने बेगम समरू को स्मरण किया।

जब बेगम समरू को बादशाह का संदेश मिला तो समरू ने इसे अपने लिए बड़ा अवसर समझा और वह अपनी सेना लेकर दौड़ी चली आई। समरू की सेना ने गुलाम कादिर की सेना को परास्त करके भाग जाने पर विवश कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मलिका उज्मानी

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मलिका उज्मानी

मलिका उज्मानी मरहूम बादशाह फर्रूखसीयर की बेटी तथा मरहूम बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की बेगम थी किंतु उसने अपने खानदान से बदला लेने के लिए लाल किले की शहजादियों एवं बेगमों से बलात्कार करवाए तथा बादशाह शाहआलम (द्वितीय) की आंखें फुड़वा दीं।

बादशाह फर्रूखसियर की बेटी मलिका उज्मानी बाबर के वंशजों के लिए वंश-घातिनी सिद्ध हुई। वह शहंशाह औरंगजेब की परपौत्री, शहजादे अजीमुश्शान की पौत्री तथा शहंशाह फर्रूखसियर की बेटी होने के साथ-साथ अपने चचेरे भाई बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला की मुख्य बेगम थी। उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह मुगलिया खानदान की हिफाजत करेगी तथा उसे सभी खतरों से बचाएगी।

शाही हरम की समस्त औरतें या तो उसकी बुआएं, बहनें, भतीजियां और प्रपौत्रियां लगती थीं या फिर उसकी बहुएं किंतु बदले की आग में झुलस रही मलिका उज्मानी ने मुगलिया खानदान को जहरीली नागिन की तरह डस लिया। मुगलिया हरम के शहजादे भी मलिका उज्मानी के चाचा, भाई, भतीजे या पौत्र लगते थे किंतु मलिका उज्मानी ने किसी भी रिश्ते की परवाह नहीं की थी।

मलिका उज्मानी ने रूहेला अमीर गुलाम कादिर को लाल किले पर चढ़ाई करवाकर बाबरी खानदान के शहजादों एवं शहजादियों के साथ जो वीभत्स बलात्कार और हत्या काण्ड करवाया उसे देखकर सम्पूर्ण मानवता को अपने होने पर शर्म आ जाए किंतु मलिका उज्मानी को नहीं आई।

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आती भी कैसे! आखिर तो उसकी नसों में तैमूरी और चंगेजी खून जोर मार रहे थे। मध्य एशिया के दो बर्बर राजाओं के रक्त मिश्रण से उत्पन्न बाबरी खानदान अपने ही वंश के शहजादों को मारने और जेलों में बंद करके रखने के लिए कुख्यात था। इसलिए मलिका उज्मानी ने जो कुछ भी किया, वह मुगलिया खानदान के खून की तासीर का ही असर था।

तत्कालीन इतिहासकारों ने लिखा है कि गुलाम कादिर ने अपदस्थ बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के 19 बेटों को जेल में बंद करके भयानक यातनाएं दीं। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि लाल किले पर ढाई माह के अधिकार के दौरान गुलाम कादिर ने शाहआलम के 22 पुत्र-पुत्रियों को मार डाला। कुछ स्रोतों के अनुसार शाहआलम के 16 पुत्र तथा 2 पुत्रियां थीं। अतः अनुमान किया जा सकता है कि मारे जाने वालों में शाहआलम के पोते-पोती भी रहे होंगे।

जब महादजी सिंधिया को लाल किले में हुए इस घटनाक्रम की जानकारी मिली तो वह सन्न रह गया। बादशाह शाहआलम ने समय रहते ही महादजी सिंधिया को गुलाम कादिर के हमले की जानकारी दी थी किंत महादजी सिंधिया मध्य भारत के अभियान में व्यस्त होने के कारण न तो स्वयं दिल्ली पहुंच सका था और न अपनी सेना को भेज सका था।

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पश्चाताप और ग्लानि बोध से भरा हुआ महादजी सिंधिया अपनी सेना लेकर दिल्ली पहुंचा। पाठकों को महादजी सिंधिया के बारे में कुछ बताना समीचीन होगा। महादजी सिंधिया ग्वालियर राज्य के संस्थापक रानोजी सिंधिया का पुत्र था एवं इस समय ग्वालियर का शासक था। अठारहवीं सदी के भारत में महादजी सिंधिया एक महान योद्धा हो गया है। वह पेशवा के तीन प्रमुख सेनापतियों में से एक था। पानीपत के युद्ध में मराठा शक्ति को हुई क्षति के बाद मध्य भारत एवं दिल्ली की राजनीति में मराठों को पुनर्स्थापित करने में महादजी सिंधिया की बड़ी भूमिका थी।

जब मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) ई.1665 से ई.16671 तक अवध में रहकर निर्वासन काट रहा था, तब महादजी सिंधिया ही बादशाह को अंग्रेजों की दाढ़ में से निकालकर फिर से लाल किले में लाया था और उसे लाल किले एवं दिल्ली पर अधिकार दिलवाया था। महादजी सिंधिया ने ही रूहेलों की गतिविधियों पर विराम लगाकर दिल्ली में शांति स्थापित की थी तथा रूेहलखण्ड को लूटकर गुलाम कादिर के पिता जाबिता खाँ को दण्डित किया था।

जब शाहआलम फिर से लाल किले में लौटा था, तब उसने महादजी सिंधिया को अपना वकीले मुतलक अर्थात् मुख्य वजीर नियुक्त किया था तथा उसे अमीर-उल उमरा की उपाधि दी थी जिसका अर्थ होता है, सभी अमीरों का मुखिया।

इस काल में बादशाह द्वारा दी जाने वाली ये उपाधियां केवल पाखण्ड बन कर रह गई थीं। वास्तविकता यह थी कि इस काल में शाहआलम महादजी सिंधिया का संरक्षित बादशाह था। इसलिए महादजी सिंधिया के रहते यह संभव नहीं था कि दिल्ली पर उसकी मर्जी के खिलाफ कोई मुगल शहजादा या अन्य शक्ति शासन कर सके। यही कारण था कि जैसे ही महादजी को यह समाचार मिला कि शाहआलम को दिल्ली के तख्त से उतार कर बीदर बख्त को बादशाह बना दिया गया है तो महादजी विशाल सेना लेकर दिल्ली आया।

महादजी सिंधिया ने पूरी दिल्ली में रूहेलों का कत्लेआम मचाया तथा अंत में गुलाम कादिर को भी मार डाला। रूहलों द्वारा दिल्ली के तख्त पर बैठाए गए बादशाह बीदरबख्त को पकड़ कर कैद कर लिया गया तथा शाहआलम को फिर से बादशाह बना दिया गया।

इस प्रकार 18 जुलाई 1788 से 2 अक्टूबर 1788 तक बीदरबख्त उर्फ जहानशाह मुगलों का बादशाह हुआ। तख्त से उतारे जाने के बाद बीदरबख्त ई.1790 तक जेल में पड़ा सड़ता रहा और अंत में बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के आदेशों से मार दिया गया। उसकी मृत्यु से लगभग एक वर्ष पूर्व ही ई.1789 में मलिका-उज्मानी भी मर गई। उस समय मलिका 86 वर्ष की वृद्धा हो चुकी थी।

इस प्रकार ई.1788 में मराठों ने दिल्ली को अपने नियंत्रण में ले लिया। 11 सितम्बर 1803 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सेनापति जनरल गेरार्ड लेक ने दिल्ली पर आक्रमण किया। इस समय दिल्ली पर महादजी सिंधिया के उत्तराधिकारी दौलतराव शिंदे का अधिकार था। जब कम्पनी की सेना पटपड़गंज तक आ गई तो दौलतराव तथा उसके फ्रैंच सेनापति लुई बोरकिन ने मोर्चो संभाला।

हुमायूँ के मकबरे से थोड़ी दूर पटपड़गंज में दोनों तरफ की सेनाओं में भारी मुकाबला हुआ। यमुना के जिस तरफ लाल किला मौजूद है, उस तरफ मराठों की स्थिति काफी मजबूत थी किंतु जनरल लेक ने यमुनाजी को पार करके शीघ्र ही मराठों को पीछे धकेल दिया।

इस युद्ध में जनरल लेक के लगभग 4500 सिपाहियों ने भाग लिया था जबकि मराठों के पास 17 हजार सैनिक थे, फिर भी जनरल लेक की रणनीति के आगे मराठों की भारी पराजय हुई। तीन दिन की लड़ाई के बाद दिल्ली पर अंग्रेजी सेनाओं का अधिकार हो गया और मराठे दिल्ली छोड़कर भाग गए।

इस युद्ध में अंग्रेजी सेना के लगभग 485 सैनिक मारे गए या घायल हुए जबकि मराठों के लगभग 3000 सैनिक मारे गए या घायल हुए। युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने पटपड़गंज में उन अंग्रेज सैनिकों की स्मृति में एक स्मारक बनवाया जो इस युद्ध में काम आए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महादजी सिंधिया

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महादजी सिंधिया

बादशाह शाहआलम (द्वितीय) ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से हुई संधि तोड़कर महादजी सिंधिया का संरक्षण स्वीकार किया था किंतु महादजी सिंधिया बादशाह को मुगलिया खानदान के लोगों के अत्याचारों से नहीं बचा सका।

बादशाह फर्रूखसियर की बेटी मलिका उज्मानी बाबर के वंशजों के लिए वंश-घातिनी सिद्ध हुई। वह शहंशाह औरंगजेब की परपौत्री, शहजादे अजीमुश्शान की पौत्री तथा शहंशाह फर्रूखसियर की बेटी होने के साथ-साथ अपने चचेरे भाई बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला की मुख्य बेगम थी। उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह मुगलिया खानदान की हिफाजत करेगी तथा उसे सभी खतरों से बचाएगी।

शाही हरम की समस्त औरतें या तो उसकी बुआएं, बहनें, भतीजियां और प्रपौत्रियां लगती थीं या फिर उसकी बहुएं किंतु बदले की आग में झुलस रही मलिका उज्मानी ने मुगलिया खानदान को जहरीली नागिन की तरह डस लिया। मुगलिया हरम के शहजादे भी मलिका उज्मानी के चाचा, भाई, भतीजे या पौत्र लगते थे किंतु मलिका उज्मानी ने किसी भी रिश्ते की परवाह नहीं की थी।

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मलिका उज्मानी ने रूहेला अमीर गुलाम कादिर को लाल किले पर चढ़ाई करवाकर बाबरी खानदान के शहजादों एवं शहजादियों के साथ जो वीभत्स बलात्कार और हत्या काण्ड करवाया उसे देखकर सम्पूर्ण मानवता को अपने होने पर शर्म आ जाए किंतु मलिका उज्मानी को नहीं आई।

आती भी कैसे! आखिर तो उसकी नसों में तैमूरी और चंगेजी खून जोर मार रहे थे। मध्य एशिया के दो बर्बर राजाओं के रक्त मिश्रण से उत्पन्न बाबरी खानदान अपने ही वंश के शहजादों को मारने और जेलों में बंद करके रखने के लिए कुख्यात था। इसलिए मलिका उज्मानी ने जो कुछ भी किया, वह मुगलिया खानदान के खून की तासीर का ही असर था।


तत्कालीन इतिहासकारों ने लिखा है कि गुलाम कादिर ने अपदस्थ बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के 19 बेटों को जेल में बंद करके भयानक यातनाएं दीं। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि लाल किले पर ढाई माह के अधिकार के दौरान गुलाम कादिर ने शाहआलम के 22 पुत्र-पुत्रियों को मार डाला।

कुछ स्रोतों के अनुसार शाहआलम के 16 पुत्र तथा 2 पुत्रियां थीं। अतः अनुमान किया जा सकता है कि मारे जाने वालों में शाहआलम के पोते-पोती भी रहे होंगे।

जब महादजी सिंधिया को लाल किले में हुए इस घटनाक्रम की जानकारी मिली तो वह सन्न रह गया। बादशाह शाहआलम ने समय रहते ही महादजी सिंधिया को गुलाम कादिर के हमले की जानकारी दी थी किंत महादजी सिंधिया मध्य भारत के अभियान में व्यस्त होने के कारण न तो स्वयं दिल्ली पहुंच सका था और न अपनी सेना को भेज सका था।

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पश्चाताप और ग्लानि बोध से भरा हुआ महादजी सिंधिया अपनी सेना लेकर दिल्ली पहुंचा। पाठकों को महादजी सिंधिया के बारे में कुछ बताना समीचीन होगा। महादजी सिंधिया ग्वालियर राज्य के संस्थापक रानोजी सिंधिया का पुत्र था एवं इस समय ग्वालियर का शासक था। अठारहवीं सदी के भारत में महादजी सिंधिया एक महान योद्धा हो गया है।

वह पेशवा के तीन प्रमुख सेनापतियों में से एक था। पानीपत के युद्ध में मराठा शक्ति को हुई क्षति के बाद मध्य भारत एवं दिल्ली की राजनीति में मराठों को पुनर्स्थापित करने में महादजी सिंधिया की बड़ी भूमिका थी।

जब मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) ई.1665 से ई.16671 तक अवध में रहकर निर्वासन काट रहा था, तब महादजी सिंधिया ही बादशाह को अंग्रेजों की दाढ़ में से निकालकर फिर से लाल किले में लाया था और उसे लाल किले एवं दिल्ली पर अधिकार दिलवाया था। महादजी सिंधिया ने ही रूहेलों की गतिविधियों पर विराम लगाकर दिल्ली में शांति स्थापित की थी तथा रूहलखण्ड को लूटकर गुलाम कादिर के पिता जाबिता खाँ को दण्डित किया था।

जब शाहआलम फिर से लाल किले में लौटा था, तब उसने महादजी सिंधिया को अपना वकीले मुतलक अर्थात् मुख्य वजीर नियुक्त किया था तथा उसे अमीर-उल उमरा की उपाधि दी थी जिसका अर्थ होता है, सभी अमीरों का मुखिया।

इस काल में बादशाह द्वारा दी जाने वाली ये उपाधियां केवल पाखण्ड बन कर रह गई थीं। वास्तविकता यह थी कि इस काल में शाहआलम महादजी सिंधिया का संरक्षित बादशाह था। इसलिए महादजी सिंधिया के रहते यह संभव नहीं था कि दिल्ली पर उसकी मर्जी के खिलाफ कोई मुगल शहजादा या अन्य शक्ति शासन कर सके।

यही कारण था कि जैसे ही महादजी को यह समाचार मिला कि शाहआलम को दिल्ली के तख्त से उतार कर बीदर बख्त को बादशाह बना दिया गया है तो महादजी विशाल सेना लेकर दिल्ली आया।

महादजी सिंधिया ने पूरी दिल्ली में रूहेलों का कत्लेआम मचाया तथा अंत में गुलाम कादिर को भी मार डाला। रूहलों द्वारा दिल्ली के तख्त पर बैठाए गए बादशाह बीदरबख्त को पकड़ कर कैद कर लिया गया तथा शाहआलम को फिर से बादशाह बना दिया गया।

इस प्रकार 18 जुलाई 1788 से 2 अक्टूबर 1788 तक बीदरबख्त उर्फ जहानशाह मुगलों का बादशाह हुआ। तख्त से उतारे जाने के बाद बीदरबख्त ई.1790 तक जेल में पड़ा सड़ता रहा और अंत में बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के आदेशों से मार दिया गया। उसकी मृत्यु से लगभग एक वर्ष पूर्व ही ई.1789 में मलिका-उज्मानी भी मर गई। उस समय मलिका 86 वर्ष की वृद्धा हो चुकी थी।

इस प्रकार ई.1788 में मराठों ने दिल्ली को अपने नियंत्रण में ले लिया। 11 सितम्बर 1803 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सेनापति जनरल गेरार्ड लेक ने दिल्ली पर आक्रमण किया। इस समय दिल्ली पर महादजी सिंधिया के उत्तराधिकारी दौलतराव शिंदे का अधिकार था। जब कम्पनी की सेना पटपड़गंज तक आ गई तो दौलतराव तथा उसके फ्रैंच सेनापति लुई बोरकिन ने मोर्चो संभाला।

हुमायूँ के मकबरे से थोड़ी दूर पटपड़गंज में दोनों तरफ की सेनाओं में भारी मुकाबला हुआ। यमुना के जिस तरफ लाल किला मौजूद है, उस तरफ मराठों की स्थिति काफी मजबूत थी किंतु जनरल लेक ने यमुनाजी को पार करके शीघ्र ही मराठों को पीछे धकेल दिया।

इस युद्ध में जनरल लेक के लगभग 4500 सिपाहियों ने भाग लिया था जबकि मराठों के पास 17 हजार सैनिक थे, फिर भी जनरल लेक की रणनीति के आगे मराठों की भारी पराजय हुई। तीन दिन की लड़ाई के बाद दिल्ली पर अंग्रेजी सेनाओं का अधिकार हो गया और मराठे दिल्ली छोड़कर भाग गए।

इस युद्ध में अंग्रेजी सेना के लगभग 485 सैनिक मारे गए या घायल हुए जबकि मराठों के लगभग 3000 सैनिक मारे गए या घायल हुए। युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने पटपड़गंज में उन अंग्रेज सैनिकों की स्मृति में एक स्मारक बनवाया जो इस युद्ध में काम आए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुल्ला का किला

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मुल्ला का किला

तोमरों ने आगरा में लाल किला बनवाया था। उसकी तर्ज पर शाहजहाँ ने दिल्ली में लाल किला बनवाया। अंग्रेज उसे मुल्ला का किला कहते थे। अंग्रेजों के लिए मुगल बादशाह की कीमत एक मुल्ला से अधिक नहीं थी इसलिए उन्होंने लाल किले को मुल्ला का किला कहकर उसका उपास उड़ाया।

11 सितम्बर 1803 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना ने दिल्ली पर आक्रमण किया तथा तीन दिन तक चली लड़ाई के बाद मराठे दिल्ली छोड़कर भाग गए। 16 सितम्बर 1803 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सेनापति जनरल लेक ने लाल किले में बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के समक्ष उपस्थित हुआ।

उसने बादशाह से भेंट की तथा उसे बताया कि हमने दिल्ली को मराठों से मुक्त करा लिया है तथा बादशाह फिर से दिल्ली का शासक बन गया है। जनरल लेक ने आश्वस्त किया कि बादशाह का इकबाल उसी प्रकार बना रहेगा जिस प्रकार अब तक रहता आया है।

बादशाह आलमशाह (द्वितीय) ने भी जनरल लेक का स्वागत किया तथा उसे शम्सुद्दौला अस्त्य-उल-मुल्क, खानेदौरां, खान बहादुर, सिपहसालार फतेहजंग जैसी भारी भरकम उपाधियां देकर सम्मानित किया।

अंग्रेजों के लिए इन उपाधियों को कोई महत्व नहीं था किंतु लाल किला अपने ऊपर अहसान करने वालों को अपने जन्म से लेकर आज तक यही उपाधियां बांटता आया था। इन उपाधियों के अतिरिक्त अन्य किसी उपाधि में लाल किला समझता ही नहीं था!

8 अक्टूबर 1803 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली ने भी बादशाह शाहआलम (द्वितीय) को पाखण्ड भरा पत्र लिखकर विनम्रता का प्रदर्शन किया। उसने लिखा- ‘शहंशाह को उनकी गरिमा के अनुकूल ही लाल किले में फिर से पदस्थापित कर दिया गया है ताकि वे शांति के साथ रह सकें।’

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नेत्रहीन शाहआलम के पास लेने-देने के लिए कुछ नहीं था किंतु उसने भी वेलेजली को पाखण्ड भरा पत्र लिखकर संतोष व्यक्त किया कि- ‘आपके शब्दों से मुझे भरोसा हो गया है कि कम्पनी मुझे कभी शिकायत का मौका नहीं देगी।’

अंग्रेज चाहते तो बादशाह को दूध में से मक्खी की तरह लाल किले में से निकालकर फैंक सकते थे किंतु वे भारत की जनता पर अभी प्रत्यक्ष शासन करने की स्थिति में नहीं आए थे इसलिए बादशाह के नाम की आड़ लेकर अपना शासन आगे बढ़ाना चाहते थे। अंग्रेजों ने बादशाह को नए सिरे से पेंशन स्वीकृत की।

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बादशाह ने जनरल लेक के निवेदन पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दिल्ली एवं उसके आसपास के क्षेत्रों से राजस्व वसूली करने तथा सेना रखने की अनुमति दे दी। इसके बदले में कम्पनी ने बादशाह को उसके अधिकार वाली जागीरों में से मिलने वाले राजस्व का एक हिस्सा पेंशन के रूप में देने का वचन दिया। मराठे मुगल बादशाह को 17 हजार रुपए प्रति माह पेंशन देते थे जबकि अंग्रेजों ने उसे 60 हजार रुपए प्रतिमाह कर दिया। पेंशन की यह राशि यमनुाजी के पश्चिम में स्थित उस खालसा जागीर से वसूल की जानी थी जो बादशाह के अधिकार में थी। यद्यपि यह जागीर भारत के सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्रों में से एक थी किंतु औरंगजेब के समय से ही भारत के किसानों की जो दुर्दशा होनी आरम्भ हुई थी, उसकी चपेट में यह जागीर भी आ गई थी।

इस कारण अंग्रेजों के लिए यह संभव नहीं हुआ कि वे बादशाह की खालसा जागीर से 60 हजार रुपया प्रतिमाह वसूल करके बादशाह को दे सकें। इसलिए कम्पनी को खालसा जागीर से वसूली गई राशि में हर माह कुछ राशि अपनी जेब से भी मिलानी पड़ती थी।

अंग्रेजों ने बादशाह की दिल्ली छीन ली थी जिसके बदले में यह पेंशन दी जा रही थी किंतु अंग्रेज भारत में न्याय करने नहीं, अपितु भारत का रक्त चूसने के लिए आए थे। इसलिए शीघ्र ही उन्हें बादशाह को दी जाने वाली राशि चुभने लगी और वे इसे बंद करने का अवसर ढूंढने लगे।

अब बादशाह ने उस सेना को भंग कर दिया जो कुछ वर्ष पहले मुगल बादशाह के नाम पर बनाई गई थी। वैसे भी अब अंग्रेज दिल्ली के स्वामी थे इसलिए बादशाह को किसी सेना की आवश्यकता नहीं थी। न बादशाह अब किसी भी तरह से इस सेना का व्यय उठा सकता था।

 भले ही बादशाह अब अंग्रेजों के नजरबंद कैदी से अधिक हैसियत नहीं रखता था किंतु फिर भी वह मुगल बादशाह होने के नाते भारत के समस्त शासकों को आदेशात्मक भाषा में पत्र लिखता था। इस कारण जब भी दिल्ली का अंग्रेज रेजीडेंट बादशाह के दरबार में उपस्थित होता था तो उसे बादशाह के सामने खड़े रहना पड़ता था। हालांकि बादशाह की तरफ से अंग्रेज शक्ति को आदर देने के लिए रेजीडेंट के पीछे लाल पर्दा लगवाया जाता था।

अब दिल्ली का शासन पूरी तरह ईस्ट इण्डिया कम्पनी के नियंत्रण में चला गया था। दिल्ली में अंग्रेजी कानून लागू हेा गए थे, अंग्रेजी न्यायालय स्थापित होने लगे थे किंतु लाल किले के भीतर बादशाह की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार कर ली गई थी। अंग्रेज अब लाल किले को मुल्ला का किला कहते थे।

इस काल में मुगल बादशाह के पास जितनी शक्ति बच गई थी, उस दृष्टि से लाल किले को मुल्ला का किला कहना गलत भी नहीं था।

किले के भीतर रहने वाले लोगों के अपराध एवं विवादों पर अंग्रेजी न्यायालय की जगह बादशाह के दरबार में ही सुनवाई हो सकती थी। बादशाह लाल किले के भीतर रहने वाली बेगमों, शहजादों, शहजादियों एवं दासियों को अपनी रियाया कहता था और उनके झगड़ों तथा विवादों और अपराधों का निबटारा करता था। उनके मुकदमे अंग्रेजों के पास नहीं जा सकते थे।

अंग्रेजों ने दिल्ली में दीवानी एवं फौजदारी न्यायालय स्थापित किए जिनमें हिन्दुओं के मुकदमों को अंग्रेजी कानून के अनुसार तथा मुसलमानों के मुकदमों को शरिया के अनुसार निबटाने का प्रावधान किया गया जिनके लिए अंग्रेजी न्यायालयों में काजियों और मुफ्तियों की नियुक्तियां की गईं।

जब अंग्रेज किसी भी अपराधी को फांसी की सजा देते थे तो ब्रिटिश रेजीडेण्ट फांसी के निर्णय को लेकर मुल्ला का किला में बादशाह के समक्ष उपस्थित होता था। जब बादशाह उस व्यक्ति को फांसी दिए जाने की पुष्टि कर देता था, तभी उस अपराधी को फांसी दी जाती थी किंतु यह अंग्रेजी न्यायिक व्यवस्था का दिखावटी चेहरा था, वास्तविकता यह थी कि अंग्रेजों से पेंशन पा रहे बादशाह को उन सभी आदेशों पर अपनी मुहर लगानी पड़ती थी जो अंग्रेज उसके समक्ष प्रस्तुत करते थे।

19 नवम्बर 1806 को शाहआलम (द्वितीय) की मृत्यु हो गई। उसका शव दिल्ली के महरौली क्षेत्र में तेरहवीं शताब्दी के सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की कब्र के निकट दफनाया गया। पाठकों को स्मरण होगा कि औरंगजेब के पुत्र मुअज्जमशाह अर्थात् बहादुरशाह (प्रथम) की कब्र भी यहीं बनाई गई थी जिसे इतिहास में शाहआलम (प्रथम) भी कहा जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मिर्जा अकबर शाह

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मिर्जा अकबर शाह

19 नवम्बर 1806 को मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) की मृत्यु हो गई। उसके बहुत से पुत्र एवं पुत्रियां थीं जिनमें से मिर्जा अकबर शाह को हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित किया गया। वह अंग्रेजों की पेंशन पर पलने वाला बादशाह था। इस कारण जीवन भर अपनी पेंशन बढ़वाने के लिए अंग्रेज अधिकारियों के सामाने गिड़गिड़ाता रहा। बादशाह की पेंशन बढ़वाने के लिए राजा राममोहन राय लंदन गए!

मिर्जा अकबर शाह को 2 मई 1781 को लाल किले में आयोजित एक संक्षिप्त समरोह में वली-ए-अहद घोषित किया गया था। उसे वली एवं बहादुर की उपाधियां दी गईं थीं तथा दिल्ली का सूबेदार घोषित किया गया था।

ई.1788 में रूेहला अमीर गुलाम कादिर ने लाल किले में घुसकर जब बादशाह शाहआलम को तख्त से उतारकर अंधा किया था तब गुलाम कादिर ने शाहआलम के बहुत से पुत्र-पुत्रियों की हत्या कर दी थी किंतु वली-ए-अहद मिर्जा अकबर शाह जीवित बच गया था। अब वही मिर्जा अकबरशाह, मुगलों का अठारहवां बादशाह हुआ। उसे मुगलों के इतिहास में अकबर (द्वितीय) भी कहा जाता है।

कहने को तो वह मुगल बादशाह था तथा उसका नाम भी अकबर था किंतु वास्तविकता यह थी कि उसकी सत्ता केवल लाल किले के भीतर सीमित थी। अंग्रेज दिल्ली के वास्तविक स्वामी थे और वे बादशाह को अपने नजरबंद पेंशनभोगी से अधिक कुछ नहीं मानते थे।

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पाठकों को स्मरण होगा कि अंग्रेजों ने बादशाह शाहआलम (द्वितीय) को 60 हजार रुपए महीने की पेंशन दी थी। शाहआलम इस पेंशन को अपर्याप्त बताता था। इस कारण वह अंग्रेज अधिकारियों को अपनी पेंशन बढ़ाने के लिए लिखता रहता था। इसलिए अंग्रेजों ने उसकी पेंशन बढ़ाकर 12 लाख रुपए वार्षिक कर दी थी। ई.1805 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली ने वायदा किया कि वह बादशाह की पेंशन बढ़ाकर 15 लाख रुपया वार्षिक कर देगा किंतु ऐसा करने से पहले ही बादशाह शाहआलम मर गया।

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जब मिर्जा अकबर शाह उसका उत्तराधिकारी हुआ तो उसने अंग्रेजों से 30 लाख रुपए वार्षिक पेंशन मांगी। जब कम्पनी के अधिकारियों ने बादशाह की बात नहीं सुनी तो बादशाह अकबरशाह (द्वितीय) ने बंगाल के प्रसिद्ध वकील एवं समाज सुधारक राम मोहन राय को अपना वकील नियुक्त किया तथा उसे राजा की उपाधि देकर अपने प्रतिनिधि के रूप में इंग्लैण्ड भेजा।

राजा राममोहन राय ने लंदन पहुंचकर बादशाह मिर्जा अकबर शाह (द्वितीय) की तरफ से इंग्लैण्ड की सरकार के समक्ष एक मेमोरेण्डम प्रस्तुत किया कि उसे 30 लाख रुपए वार्षिक पेंशन मिलनी चाहिए! ब्रिटिश सरकार ने बादशाह के इस दावे को स्वीकार कर लिया तथा बादशाह की पेंशन 30 लाख रुपए वार्षिक कर दी गई किंतु कम्पनी की तरफ से बादशाह को अनेक अवसरों एवं त्यौहारों पर दिए जाने वाले उपहार आदि बंद कर दिए गए। अकबर ने लंदन की सरकार के इस निर्णय पर असंतोष प्रकट करते हुए नई पेंशन को स्वीकार कर लिया। बादशाह को आशा थी कि कुछ वर्षों बाद पेंशन में फिर वृद्धि हो सकेगी।

ई.1803 से 1835 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों द्वारा अकबर को लिखे गए पत्रों में उसे बादशाह कहा जाता था किंतु ई.1835 में अंग्रेजों ने उससे बादशाह का टाइटल छीन लिया तथा उसे ‘किंग ऑफ डेल्ही’ कहने लगे।

ई.1803 से ई.1835 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा सोने चांदी के जो सिक्के जारी किए गए उनमें मुगल बादशाह का नाम अंकित किया जाता था तथा सिक्कों की इबारत फारसी में लिखी जाती थी। ई.1835 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सिक्कों पर बादशाह का नाम लिखना बंद कर दिया तथा सिक्कों की इबारत फारसी के स्थान पर अंग्रेजी कर दी।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों ने अवध के नवाब तथा हैदराबाद के निजाम को इस बात के लिए उकसाया कि वे अपने पत्रों में स्वतंत्र शासक की उपाधियों का प्रयोग करें ताकि मुगल बादशाह के कद को घटाया जा सके। हैदराबाद के निजाम ने अंग्रेजों की यह बात मानने से मना कर दिया तथा वह स्वयं को मुगल बादशाह के सूबेदार के रूप में ही प्रदर्शित करता रहा जबकि अवध के नवाब ने स्वतंत्र शाही उपाधियां लिखनी आरम्भ कर दीं।

बादशाह अकबरशाह के जीवन काल की उपलब्ध्यिों में केवल एक ही घटना की चर्चा होती है। वह है दिल्ली के महरौली क्षेत्र में तेरहवीं शताब्दी के सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की कब्र पर फूल वालों की सैर नामक उत्सव आरम्भ करना।

कहा जाता है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों ने एक बार अकबरशाह के पुत्र मिर्जा जहांगीर को बंदी बना लिया। इस पर अकबर की बेगम ने कुतुबुद्दीन काकी की मजार पर जाकर मनौती मांगी कि यदि मिर्जा जहांगीर की रिहाई हो जाए तो वह काकी की दरगाह पर चादर चढ़ाएगी। जब कुछ समय बाद शहजादा रिहा हो गया तो बादशाह ने काकी की दरगाह पर फूल चढ़ाए।

उन दिनों काकी की दरगाह के निकट ही हिन्दुओं की आराध्य योगमाया देवी का एक मंदिर हुआ करता था। बादशाह के आदेश से दरगाह के साथ-साथ इस मंदिर में भी फूल चढ़ाए गए। इसके बाद प्रतिवर्ष उसी दिन दरगाह एवं मंदिर में फूल चढ़ाए जाने की परम्परा आरम्भ हो गई। इस उत्सव को फूल वालों की सैर कहा गया। कुछ वर्षों में इस उत्सव ने वार्षिक मेले का रूप ले लिया। इस अवसर पर झांकिया, झूले, बाजार आदि का आयोजन किया जाने लगा।

ई.1940 में अंग्रेजों को शक हुआ कि इस उत्सव की आड़ में हिन्दुओं और मुसलमानों को एक मंच पर आने का अवसर मिल रहा है। इस एकता का उपयोग भारत की आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों के विरुद्ध किया जा सकता है। इसलिए अंग्रेजों ने इस महोत्सव पर रोक लगा दी। भारत की आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ई.1961-62 में इस महोत्सव को फिर से आरम्भ करवाया। तब से यह महोत्सव प्रतिवर्ष मनाया जा रहा है।

ई.1837 में अकबर (द्वितीय) का निधन हो गया। उसका शव दिल्ली के महरौली क्षेत्र में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की कब्र के निकट दफनाया गया। पाठकों को स्मरण होगा कि औरंगजेब के पुत्र बहादुरशाह (प्रथम) की कब्र भी यहीं बनाई गई थी जिसे इतिहास में शाहआलम (प्रथम) कहा जाता है। अकबर (द्वितीय) के पिता शाहआलम (द्वितीय) की कब्र भी यहीं बनाई गई थी।

बादशाह अकबर (द्वितीय) के 14 शहजादे और 8 शहजादियां थीं। अकबर अपने पुत्र मिर्जा फख्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित करना चाहता था किंतु अंग्रेजों ने अकबर के द्वितीय पुत्र मिर्जा अबू जफर सिराजुद्दीन मुहम्मद को बादशाह घोषित कर दिया जिसे इतिहास में बहादुरशाह जफर के नाम से जाना जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहादुरशाह जफर

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बहादुरशाह जफर

मिर्जा अकबर शाह के बाद अबु जफर को हिंदुस्तान का बादशाह बनाया गया। बह बहादुरशाह जफर के नाम से मुगलों के तख्त पर बैठा। उसकी सल्तनत पूरे लाल किले पर भी नहीं चलती थी। उसकी सत्लतन का दायरा मुगलिया हरम तक सीमित था। लॉर्ड डलहौजी ने बहादुरशाह जफर से किला खाली करने को कहा!

मरहूम बादशाह मिर्जा अकबर शाह उर्फ अकबर (द्वितीय) की 22 संतानें थीं जिनमें से 14 पुत्र तथा 8 पुत्रियां थीं। बादशाह के बड़े पुत्र का नाम मिर्जा जहांगीर था। अकबरशाह चाहता था कि मिर्जा जहांगीर ही अगला बादशाह बने किंतु उसका दूसरे नम्बर का पुत्र मिर्जा अबु जफर सिराजुद्दीन मुहम्मद भी बादशाह बनना चाहता था।

उत्तराधिकार के प्रश्न पर बड़े शहजादे मिर्जा जहांगीर तथा उसके छोटे भाई मिर्जा अबु जफर के बीच दुश्मनी हो गई। बड़े भाई मिर्जा जहांगीर ने अपने छोटे भाई मिर्जा अबु जफर को दो बार जहर देकर मारने का षड़यंत्र किया किंतु शहजादा जफर दोनों ही बार बच गया।

बादशाह अकबरशाह की मृत्यु के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों ने बड़े शहजादे मिर्जा जहांगीर की बजाय उसके छोटे भाई मिर्जा अबु जफर को बादशाह बनाया क्योंकि छोटा भाई अपने बड़े भाई की अपेक्षा अधिक शिक्षित, विनम्र तथा सभ्य था। शाहजहाँ और औरंगजेब के जमाने में जिस मुगल तख्त पर अधिकार करने के लिए लाखों लोगों का रक्त बहाया जाता था, उसी मुगल तख्त पर अधिकार करने के लिए अब केवल अंग्रेज अधिकारियों की कृपा ही पर्याप्त थी।

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ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पॉलिटिकल ऑफिसर चार्ल्स टी. मेटकाफ ने अपनी डायरियों में दोनों शहजादों के बीच चल रही प्रतिस्पर्द्धा की चर्चा करते हुए लिखा है कि मेटकाफ ने शहजादों को सलाह दी थी कि भावी बादशाह को उतावला नहीं होना चाहिए अपितु धीर-गंभीर और शांत रहना चाहिए।

अनुमान लगाया जा सकता है कि अकबरशाह के बड़े शहजादे मिर्जा जहांगीर के स्थान पर मिर्जा अबु जफर को अगला बादशाह बनाने में चार्ल्सट टी. मेटकाफ की भी भूमिका रही होगी। चार्ल्स टी मेटकाफ कुछ समय के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भारत में एक्टिंग गवर्नर जनरल भी रहा था। भारत में कम्पनी का साम्राज्य जमाने में मेटकाफ की बड़ी भूमिका थी।

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मिर्जा अबु जफर सिराजुद्दीन मुहम्मद का जन्म 24 अक्तूबर 1775 को बेगम लालबाई की कोख से हुआ था। बादशाह अकबर शाह (द्वितीय) की मृत्यु के बाद 28 सितंबर 1837 को वह बहादुरशाह के नाम से भारत का 19वां मुगल बादशाह हुआ। उसे मुगलों के इतिहास में बहादुरशाह (द्वितीय) कहा जाता है। वह उर्दू भाषा में जफर उपनाम से कविताएं लिखा करता था इसलिए भारत के लोग उसे बहादुरशाह जफर कहना अधिक पसंद करते हैं।

बहादुरशाह जफर समय की सच्चाई को समझता था। वह जानता था कि वह बादशाह नहीं है, वह तो काल के गाल में समा चुकी मुगल बादशाहत की छाया मात्र है जो कौन जाने कब विलुप्त हो जाए! इसलिए बहादुरशाह जफर ने अंग्रेजों के काम में कभी हस्तक्षेप करने का प्रयास नहीं किया और अपना समय उर्दू एवं फारसी कविताएं पढ़ने-लिखने में व्यतीत करता रहा। इस काल में दिल्ली में उर्दू कविता की धूम मची हुई थी। बादशाह के दरबार में मिर्जा गालिब, दाग, मूमिन तथा जौक जैसे उर्दू शायर भी आ जुटे थे। ये शायर नित्य ही बादशाह के चारों ओर जमावड़ा लगाए रहते, एक दूसरे को अपने शेर, गजलें और नज्में सुनाया करते तथा एक दूसरे को दाद अर्थात् शाबासी दिया करते।

वे बादशाह के समक्ष सिर झुकाकर लम्बी-लम्बी कोर्निश करते तथा उसे शहंशाह, जिल्लेइलाही और साहबेआलम जैसे भारी-भरकम शब्दों से सम्बोधित करते। इन शब्दों के बाहरी अर्थ तो महान थे किंतु इनके भीतर सिवाय खोखलेपन के और कुछ नहीं था। इस पर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस काल के उर्दू शाइर अद्भुत प्रतिभा के धनी थे तथा उनकी उर्दू कविताएं आज भी विश्व के साहित्य कोश को समृद्ध कर रही हैं।

बहादुरशाह का जीवन शांत झील की तरह अपने आप में सिमटा हुआ था, उसे किसी से कुछ लेना-देना नहीं था। ऐसा लगता था कि उसकी बादशाहत ऐसे ही चलती रहेगी, ईस्ट इण्डिया कम्पनी उसे पेंशन देती रहेगी और उसके दोस्त उसकी कविताएं सुनने और सुनाने के लिए आते रहेंगे किंतु प्रकृति ने उसके भाग्य में हमेशा के लिए ऐसा होते रहना नहीं लिखा था!

लॉर्ड एलनबरो ई.1842 से 1844 तक भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल रहा। उसने बादशाह को कम्पनी की तरफ से विभिन्न अवसरों पर दिए जाने वाल समस्त उपहारों एवं भेंट पर रोक लगा दी। उसके बाद लॉर्ड डलहौजी ई.1848 में गवर्नर जनरल बनकर आया। उसने बादशाह बहादुरशाह जफर को लाल किला खाली करके दिल्ली के बाहर महरौली में जाकर रहने के लिये कहा किंतु बादशाह लाल किले में निवास करता रहा।

ई.1856 में डलहौजी के उत्तराधिकारी के रूप में आए गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग ने घोषणा की कि बहादुरशाह के बाद उसका उत्तराधिकारी केवल शहजादे के रूप में जाना जायेगा। उसे बादशाह की उपाधि नहीं दी जायेगी। बहादुरशाह जफर की चार बेगमें थीं जिन्होंने 22 शहजादों एवं शहजादियों को जन्म दिया था।

अँग्रेजों ने बादशाह की इच्छा के विरुद्ध, बादशाह के सबसे निकम्मे पुत्र मिर्जा कोयास को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। कम्पनी के अधिकारियों द्वारा शहजादे मिर्जा कोयास से संधि की गई कि वह अपने पिता की मृत्यु के बाद दिल्ली का लाल किला खाली कर देगा, स्वयं को बादशाह नहीं कहेगा तथा एक लाख रुपये के स्थान पर 15 हजार रुपये मासिक पेंशन स्वीकार करेगा।

कोयास ने इन समस्त शर्तों को स्वीकार कर लिया किंतु लॉर्ड केनिंग द्वारा की जा रही इन कार्यवाहियों से दिल्ली के मुसलमानों में अँग्रेजों के विरुद्ध असन्तोष उत्पन्न हो गया। दिल्ली से बाहर के मुसलमानों ने भी केनिंग की इस कारगुजारी को भारत से मुगल सत्ता समाप्त करने का षड़यंत्र माना तथा वे अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह करने की योजनाएं बनाने लगे।

लॉर्ड डलहौजी एवं लॉर्ड केनिंग द्वारा न केवल मुगल बादशाह के समस्त चिह्न नष्ट करने के प्रयास किए गए थे अपितु भारत के समस्त राजाओं, नवाबों और बेगमों के राज्य छीनकर पूरे भारत को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रत्यक्ष शासन के अधीन लाने के कुचक्र भी रचे गए थे।

कम्पनी सरकार की इन कार्यवाहियों ने भारत के देशी शासकों में जबर्दस्त गुस्से को जन्म दिया जिसके कारण बीस वर्ष की बादशाहत के बाद ई.1857 में लाल किले के शांत जीवन में जबर्दस्त भूकम्प आ गया जिससे बहादुरशाह जफर का जीवन दुःखों की दास्तान बनकर रह गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लॉर्ड डलहौजी का शिकंजा

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डलहौजी का शिकंजा

देशी रियासतों पर लॉर्ड डलहौजी का शिकंजा बड़ी तेजी से कसता चला गया। लाल किला भी इससे अछूता नहीं रहा। इस कारण लाल किले का असंतोष अंग्रेजों की तरफ चिन्गारी बनकर बढ़ने लगा!

ई.1848 से 1855 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड डलहौजी ने भारत के उन्नीसवें मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को दिल्ली का लाल किला खाली करके महरौली में जाकर रहने के लिए कहा था। जब ई.1856 में लॉर्ड केनिंग गवर्नर जनरल हुआ तो उसने बादशाह की इच्छा के विरुद्ध, शहजादे मिर्जा कोयास को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

कम्पनी के अधिकारियों द्वारा मिर्जा कोयास से संधि की गई कि शहजादा अपने पिता बहादुरशाह की मृत्यु के बाद दिल्ली का लाल किला खाली कर देगा, स्वयं को बादशाह नहीं कहेगा तथा एक लाख रुपये के स्थान पर 15 हजार रुपये मासिक पेंशन स्वीकार करेगा। लॉर्ड डलहौजी तथा लॉर्ड केनिंग द्वारा की गई इन कार्यवाहियों से भारत के मुसलमानों में अँग्रेजों के विरुद्ध असन्तोष उत्पन्न हो गया।

ऐसा नहीं था कि अंग्रेजों द्वारा यह व्यवहार केवल मुगल बादशाह के साथ किया गया था, अंग्रेजों की यह छीना-झपटी पूरे देश में एक जैसी चल रही थी। पिछले सौ सालों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार ने भारत वर्ष की विशाल भूमि पर अपना शिकंजा कस लिया था। जिसके कारण रानी विक्टोरिया का भारतीय उपनिवेश उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में हिंद महासागर तक और पश्चिम में हिन्दूकुश पर्वत से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी से आगे बर्मा तक विस्तृत हो गया था।

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इस समय तक भारत का लगभग आधा क्षेत्र ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रत्यक्ष शासन के अधीन था जबकि लगभग आधे भारत पर राजे-महाराजे नवाब एवं बेगमों के छोटे-बड़े लगभग 550 राज्य थे। इन देशी राज्यों को कम्पनी ने अधीनस्थ सहायता के समझौतों से अपने अधीन कर रखा था जिनके माध्यम से कम्पनी सरकार ने इन राज्यों पर शिकंजा कस लिया था।

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कम्पनी सरकार द्वारा समस्त देशी राज्यों की सेनाएं समाप्त कर दी गई थीं। उन राज्यों में कम्पनी सरकार अपनी सेनाएं रखती थी जिनका व्यय देशी राज्यों को उठाना होता था। कम्पनी ब्रिटिश अधिकारियों को इन राज्यों में अपना एजेण्ट बनाकर भेजती थी जो इन राज्यों में निरंकुश शासन करते थे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद जो भारत बिखर कर अलग-अलग राज्यों में बंट गया था वह डलहौजी के षड़यंत्रों से फिर से एक राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत आ गया। भारत का यह एकीकरण मुगल काल में हुए एकीकरण की ही तरह बहुत दुःखदायी था।

भारत की आत्मा फिर से परतंत्रता की बेड़ियों में बंधकर सिसक उठी। भारतवासी अपने ही देश में एक बार फिर नए मालिकों के गुलाम हो गये। ई.1825 में सर जॉन स्टुअर्ट मिल ने इस बात की वकालात की थी कि देशी राज्यों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए किंतु कम्पनी के पुराने प्रशासक इस बात से सहमति नहीं रखते थे। सर जॉन मैल्कम ने इस विचार का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि देशी राज्य हमारी दया पर निर्भर हैं तथा वे ही भारत में हमारी वास्तविक शक्ति हैं। इस शक्ति का अनुमान हमें तब तक नहीं होगा जब तक कि हम उसे खो न देंगे।

फिर भी भारत में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों ने बड़ी तेजी से देशी राज्यों को हड़पना आरम्भ कर दिया। डलहौजी के आने से पहले ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने माण्डवी, कोलाबा, जालौन, सूरत, एंगुल, अरकोट, गुलेर, जैन्तिया, जैतपुर, जसवान, कचारी, कांगड़ा, कन्नूर, किट्टूर, कोडागू, कोझीकोड, कुल्लू, कुरनूल, कुटलेहार, मकराई, सम्बलपुर, सतारा, सीबा, तुलसीपुर, छत्तीसगढ़ की उदयपुर तथा मेरठ आदि राज्यों, जागीरों एवं नगरों को अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर लिया था।

इन राज्यों को युद्धों में नहीं जीता गया था, अपितु इन राज्यों के राजाओं के मर जाने पर अथवा उसके उत्तराधिकारी के न रहने पर अंग्रेजों द्वारा हड़प लिया गया था।

डलहौजी ने डॉक्टराइन ऑफ लैप्स को कम्पनी सरकार का आधिकारिक दस्तावेज बना दिया। लॉर्ड डलहौजी का शिकंजा भारतीय राज्यों को नए सिरे से हड़पने और ब्रिटिश साम्राज्य के क्षेत्र को तेजी से बढ़ाने के लिए पूरे भारत पर कसा जाने लगा। डलहौजी ने कर्नाटक एवं तंजौर के शासकों की उपाधियाँ एवं पेंशनें बन्द कर दीं।

डलहौजी ने पेशवा नाना साहब (द्वितीय) की भी पेंशन बंद कर दी तथा बांदा, नारगुण्ड, रामगढ़ और झाँसी के राज्य हड़प लिए। लॉर्ड डलहौजी ने राजपूताना के करौली राज्य को भी हड़प लिया किंतु करौली किसी तरह अंग्रेजों के चंगुल से बच निकला। अवध अँग्रेजों का सर्वाधिक पुराना और घनिष्ठ मित्र राज्य था किन्तु ई.1856 में उसका भी अपहरण कर लिया गया।

जैसे-जैसे लॉर्ड डलहौजी का शिकंजा आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे समस्त देशी रजवाड़े ईस्ट इण्डिया कम्पनी के राज्य को भारत से उखाड़ फैंकने के लिए तत्पर हो गए, विशेषकर वे जिनके राज्य ब्रिटिश क्षेत्रों में मिला लिये गये थे अथवा जिनकी पेंशनें जब्त कर ली गई थीं।

भारत के राजे-महाराजे और नवाब ईस्ट इण्डिया कम्पनी से जितने नाराज थे, उससे कहीं अधिक नाराज देशी राज्यों के छोटे जागीरदार थे। इस काल के देशी राज्यों में हजारों छोटी-छोटी जागीरें विद्यमान थीं। इन जागीरों के स्वामी जागीरदार, ठाकुर एवं सामंत कहलाते थे। ये जागीरदार अपने क्षेत्र के किसानों से भू-राजस्व वसूल करते थे तथा एक निश्चित राशि अपने राज्य के राजा, नवाब अथवा बेगम को चुकाते थे।

इनमें से बहुत से जागीरदार इतने मजबूत थे कि वे अपने राजा की अवहेलना करते थे। इसलिए लॉर्ड डलहौजी का शिकंजा जागीरदारों की उच्छृंखलता एवं मनमानी पर लगाम लगाकर उन पर बहुत कठोरता से नियंत्रण स्थापित करने लगा। बहुत से जमींदारों के पट्टों की जांच करके उनकी जमीनें छीन लीं।

बम्बई के इमाम कमीशन ने लगभग 20 हजार जागीरी भूमियों का अपहरण कर लिया। विलियम बैंटिक ने बहुत से लोगों से माफी की भूमियां छीन लीं। इस प्रकार भारत में उस काल के तथाकथित कुलीन वर्ग को अपनी सम्पत्ति एवं आमदनी से हाथ धोना पड़ा। इससे कुलीन वर्ग क्रुद्ध हो गया।

राजाओं एवं जागीरदारों से भी अधिक आक्रोश उन भारतीय सिपाहियों में था जो अंग्रेजों के दोहरे मानदण्डों से असंतुष्ट थे। एक साधारण भारतीय सैनिक का वेतन सात या आठ रुपये मासिक होता था। इस वेतन में से रसद एवं वर्दी के व्यय की कटौती होती थी।

भारतीय सूबेदार का वेतन 35 रुपये मासिक था, जबकि अँग्रेज सूबेदार को 195 रुपये मिलते थे। यद्यपि कम्पनी की सेना में भारतीय सैनिकों की संख्या अधिक थी किन्तु सैनिक खर्च का आधे से अधिक भाग अँग्रेज सैनिकों पर खर्च होता जाता था।

भारतीय सैनिकों के लिए पदोन्नति के अवसर नहीं के बराबर थे। जब भारतीय सैनिक की पदोन्नति का अवसर आता था तो उसे इनाम देकर सेना से अलग कर दिया जाता था। इस अंतर से दुखी होकर ई.1806 से 1855 तक भारतीय सैनिकों ने कई बार विद्रोह किये।

अंग्रेज अधिकारियों ने विद्रोही सैनिकों को भीषण यातनाएँ दीं, उन्हें गोली से उड़ा दिया तथा उनकी कम्पनियां भंग कर दीं। इससे सैनिकों के साथियों में असंतोष को हवा मिली तथा उनका कम्पनी सरकार पर से भरोसा उठने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नीच और मूर्ख भारतीय

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नीच और मूर्ख भारतीय

अंग्रेजों ने धारणा स्थापित की कि नीच और मूर्ख भारतीय जाति गोरी एवं श्रेष्ठ अंग्रेज जाति द्वारा शासन करने के लिए बनी है। इसी अधिकार से वे भारतीयों को फांसी देने लगे।

भारत में अंग्रेजी शासन के दो चेहरे थे। अंग्रेजी सत्ता का सामने की ओर दिखाई देने वाला चेहरा बड़ा न्यायप्रिय, अनुशासनप्रिय एवं विकासवादी था। इस चेहरे का निर्माण भारत में खोले गए न्यायालयों, चर्चों, मिशनरी चिकित्सालयों, विद्यालयों, रेलगाड़ियों, सड़कों, पुलों आदि के माध्यम से किया जाता था।

अंग्रेजों का यह चेहरा देखने में बहुत मुलायम था किंतु इसकी वास्तविकता बड़ी भयावह थी। नीच और मूर्ख भारतीय जाति को सुधारने के लिए वे एक दूसरा चेहरा भी रखते थे।

अंग्रेजी सत्ता अपने न्यायालयों का उपयोग नीच और मूर्ख भारतीय जाति को फांसी की सजा सुनाने के लिए करती थी तथा उस निर्णय पर लाल किले में बैठे बादशाह से मुहर लगवाती थी। ताकि कोई भी व्यक्ति कम्पनी सरकार पर यह आरोप नहीं लगा सके कि वह भारतीयों को अपनी मर्जी से मार रही है। लाल किले की सत्ता को बनाए रखकर कम्पनी यह सिद्ध करना चाहती थी कि वह बादशाह के प्रतिनिधि के रूप में भारत पर शासन कर रही है।

रेलों, सड़कों एवं पुलों का निर्माण भारत की उन्नति के नाम पर किया जा रहा था किंतु इनका वास्तविक उपयोग अंग्रेजी सेनाओं तथा सैन्य सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने एवं भारत में उत्पन्न कच्चे माल को बंदरगाहों एवं गोदियों तक पहुंचाने में किया जाता था। अंग्रेजी विद्यालयों, चर्चों, मिशनरी चिकित्सालयों एवं विद्यालयों का उपयोग भारतीयों के प्रति करुणा दिखाने के नाम पर किया जा रहा था किंतु उनका वास्तविक उपयोग भारतीयों को ईसाई धर्म की तरफ लुभाने के लिए किया जा रहा था।

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कम्पनी सरकार का दूसरा चेहरा दिखाई नहीं देता था किंतु वह बड़ा विकराल एवं भयावह था। सम्पूर्ण अंग्रेज जाति भारतीयों को पशुओं के समान समझती थी। अंग्रेज अधिकारी भारतीयों को आधे गोरिल्ला, आधे हब्शी, निम्न कोटि के पशु, मूर्तिपूजक, काले भारतीय आदि कहकर उनका मखौल उड़ाया करते थे। आम आदमी जिसे वे नीच और मूर्ख भारतीय कहते थे, के साथ अंग्रेज अधिकारियों का बर्ताव बहुत बुरा था।

कॉलिंस एवं लैपियरे ने लिखा है- ‘जैसे-जैसे भारत में अंग्रेजों का राज्य फैलता गया वैसे-वैसे अंग्रेजों के मन में यह विश्वास जड़ जमाता गया कि गोरी जाति श्रेष्ठ और ऊंची है। काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं। उन पर शासन करने की जिम्मेदारी ईश्वर नामक रहस्यमय शक्ति ने अंग्रेजों के ही कंधों पर रखी है। अंग्रेज वह जाति है जो केवल जीतने और शासन करने के लिए पैदा हुई है। ….. भारतीयों द्वारा अंग्रेजों को ऊंचे दर्जे के डिब्बे में यात्रा के समय एवं उनके बंगलों तथा विश्राम-गृहों में शिकार से लौटे साहब लोगों के जूतों के फीते खोलने और उनकी थकी हुई टांगों पर तेल लगाने के लिए विवश किया जाता था। ….. भारत में अंग्रेजों की शासन पद्धति शुरू से कुछ ऐसी रही जैसे कोई बूढ़ा स्कूल मास्टर कक्षा के उज्जड विद्यार्थियों को बेंत के जोर पर सही करने निकला हो। इस स्कूल मास्टर को पूरा विश्वास था कि विद्यार्थियों को जो शिक्षा वह दे रहा है, वही उनके लिए सही और सर्वश्रेष्ठ है।’

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यदि अपवादों को छोड़ दें तो अंग्रेज अधिकारी अपनी योग्यता का परिचय देते थे किंतु उनमें धैर्य तथा शिष्टाचार का अभाव था और उनमें सिर से लेकर पांव तक भ्रष्टाचार व्याप्त था। अंग्रेज अधिकारी भारतीयों को नीच और मूर्ख समझते थे। इन नीच एवं मूर्ख भारतीयों पर शासन करने की दैवीय जिम्मेदारी का वहन करने के लिए अंग्रेजों ने इण्डियन सिविल सर्विस की स्थापना की जिसमें 2,000 अंग्रेज अधिकारी नियुक्त हुए। 10,000 अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय सेना सौंप दी गई। तीस करोड़ लोगों को अनुशासन में रखने के लिए 60,000 अंग्रेज सिपाही इंगलैण्ड से आ धमके। उनके अतिरिक्त दो लाख भारतीय सिपाही भारतीय सेनाओं में थे ही।

भारत में कम्पनी सरकार के प्रशासनिक तंत्र एवं न्याय तंत्र में भी भारतीयों के साथ भेदभाव किया जा रहा था, इसलिए भारतीय कर्मचारी कम्पनी के रवैये से असंतुष्ट थे। लार्ड कार्नवालिस ने भारतीयों को उच्च पदों से वंचित कर दिया। भारतीय प्रशासन में एक शक्तिशाली ब्रिटिश अधिकारी वर्ग उत्पन्न हो गया जो स्वयं को भारतीय कर्मचारियों से पूरी तरह अलग रखता था और उन्हें बात-बात पर अपमानित करता था।

भारतीय कर्मचारियों के साथ उनका व्यवहार मूक पशुओं के साथ होने वाले व्यवहार जैसा था। न्यायिक प्रशासन में भी अँग्रेजों को भारतीयों से श्रेष्ठ स्थान दिया गया था। भारतीय जजों की अदालतों में अँग्रेजों के विरुद्ध मुकदमा दायर नहीं हो सकता था क्योंकि किसी भी भारतीय जज को अंग्रेज जाति के व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमे सुनने का अधिकार नहीं था।

अँग्रेजों ने जो विधि प्रणाली लागू की, वह भारतीयों के लिए बिल्कुल नई थी। इस कारण साधारण भारतीय इसे समझ नहीं पाते थे। इसमें अत्यधिक धन व समय नष्ट होता था और अनिश्चितता बनी रहती थी।

भारतीयों के प्रति अँग्रेजों का सामान्य व्यवहार अत्यंत अपमानजनक था। भारतीय, रेलगाड़ी के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में यात्रा नहीं कर सकते थे। अँग्रेजों द्वारा संचालित होटलों एवं क्लबों की तख्तियों पर लिखा होता था- ‘कुत्तों और भारतीयों के लिये प्रवेश वर्जित।’

आगरा के एक मजिस्ट्रेट द्वारा एक आदेश के माध्यम से, अँग्रेजों के प्र्रति भारतीयों द्वारा सम्मान प्रदर्शन के तरीकों का एक कोड निर्धारित करने का प्रयास किया गया- ‘किसी भी कोटि के भारतीय के लिए कठोर सजाओं की व्यवस्था करके उसे विवश किया जाना चाहिये कि वह सड़क पर चलने वाले प्रत्येक अँग्रेज का अभिवादन करे। यदि कोई भारतीय घोड़े पर सवार हो या किसी गाड़ी में बैठा हो तो उसे नीचे उतर कर आदर प्रदर्शित करते हुए उस समय तक खड़े रहना चाहिये, जब तक अँग्रेज वहाँ से चला नहीं जाये।’

ई.1857 के आने तक भारत की सभी देशी रियासतों पर अंग्रेजों ने अपना अधिकार जमा लिया था। अब राज्यों के पास अपनी सैन्य शक्ति कुछ भी शेष नहीं बची थी। देशी राजाओं की स्थिति यह हो चुकी थी कि एक तरफ तो वे अंग्रेज अधिकारियों के शिकंजे में कसे जाकर छटपटा रहे थे तो दूसरी ओर उन्हें यह भी स्पष्ट भान था कि यदि देशी राज्यों को बने रहना है तो अंग्रेजी शासन को मजबूत बनाए रखने के लिए उन्हें हर संभव उपाय करना होगा।

सर थॉमसन मुनरो ने गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स को 11 अगस्त 1857 को लिखे एक पत्र में लिखा है कि घरेलू अत्याचार तथा पारदेशिक आक्रमण से सुरक्षा भारतीय नरेशों के लिए महंगी पड़ी है। उनको अपनी स्वतंत्रता, राष्ट्रीय आचरण तथा जो कुछ मनुष्य को आदरणीय बनाता है, इत्यादि का बलिदान करना पड़ा है।

इस स्थिति से राज्यों में द्वैध शासन जैसी समस्याएं उत्पन्न होने लगीं जिसका परिणाम यह हुआ कि राज्यों में अराजकता फैलने लगी और ई.1857 में लगभग पूरे देश के देशी राज्यों में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति विद्रोह हो गया। राजपूताने में भी विद्रोह की चिन्गारी बड़ी तेजी से फैली किंतु देशी राजाओं के सहयोग से इस विद्रोह को शीघ्र ही कुचल दिया गया। वस्तुतः राजपूताना ने ही अंग्रेजी शासन को जीवन दान दिया।

ई.1857 में देश में जिस प्रकार की परिस्थितियां बनीं, उनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर भले ही लॉर्ड डलहौजी द्वारा भारतीय राज्यों को हड़पने के लिए आविष्कृत डॉक्टराइन ऑफ लैप्स की नीति, भारत में ईसाई धर्म-प्रचार की चेष्टाएं तथा अपने ही भारतीय सैनिकों के प्रति भेदभाव युक्त कार्यवाहियाँ जिम्मेदार थीं किंतु राजपूताने में उत्पन्न स्थितियों के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी नहीं अपितु भारतीय रजवाड़ों तथा उनके अधीन आने वाले ठिकाणों का आपसी संघर्ष जिम्मेदार था।

यही कारण था कि जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अत्याचारों के कारण ई.1857 में पूरे देश में सशस्त्र सैनिक क्रांति हुई सैनिक विद्रोह हुआ तो उसे स्थानीय जागीरदारों तथा गिने-चुने असंतुष्ट राजाओं का सहयोग मिला जबकि अधिकांश बड़े राजाओं ने अंग्रेज शक्ति का साथ दिया। अंग्रेज जिन्हें नीच और मूर्ख भारतीय कहते थे, अब छाती ठोक कर अंग्रेजों के सामने खड़े हो गए और अंग्रेजों को गोली मारने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वाजिद अली शाह

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वाजिद अली शाह

लॉर्ड डलहौजी एक-एक करके बड़ी तेजी से देशी रियासतों को हड़पता जा रहा था। उसने अवध पर भी आंख गढ़ा दी जहाँ विलासी नवाब वाजिद अली शाह शासन कर रहा था।

ईस्वी 1848 से ही भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के खूनी पंजे भारत भूमि को तेजी से जकड़ते जा रहे थे। देशी रियासतों को हड़पने के लिए डॉक्टराइन ऑफ लैप्स तो डलहौजी का सबसे बड़ा हथियार था ही किंतु साथ ही वह उन राजाओं को जबर्दस्ती उनकी रियासतों से हटा देता था जो राजा अंग्रेजों के समक्ष विनय का प्रदर्शन नहीं करते थे।

कम्पनी सरकार के लिए इन राजाओं को हटाकर वृंदावन, बिठूर तथा कलकत्ता आदि स्थानों पर भेज दिया जाना बहुत सामान्य बात हो चली थी क्योंकि इस काल में देशी राजाओं के पास सेनाएं ना के बराबर थीं तथा अंग्रेज उन राजाओं पर केवल इतना सा आरोप लगाते थे कि उनका राज्य कुप्रबंधन का शिकार हो गया है। लॉर्ड डलहौजी तो मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को भी लाल किला खाली करके महरौली चले जाने का आदेश सुना चुका था।

अवध की प्रसिद्ध, विशाल एवं समृद्ध रियासत भी डलहौजी की इसी नीति का शिकार हुई। पाठकों को स्मरण होगा कि अवध के सूबेदार औरंगजेब की मृत्यु के बाद अर्द्धस्वतंत्र शासक की स्थिति में आ गए थे।

जब ईस्वी 1739, 1756 एवं 1761 में ईरानियों एवं अफगानियों ने मुगल सल्तनत पर भीषण आक्रमण करके लाल किले की चूलें हिला दीं तो अवध के सूबेदार नाममात्र के लिए लाल किले के अधीन रह गए। मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) को ईस्वी 1765 से 1771 तक अवध के नवाब शुजाउद्दौला के संरक्षण में इलाहाबाद के दुर्ग में रहना पड़ा था।

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ईस्वी 1765 में हुई इलाहाबाद की संधि के बाद अवध का सूबा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रभाव में चला गया था। ईस्वी 1818 से अवध मुगलों का एक सूबा न रहकर पूरी तरह से लाल किले से मुक्त हो गया तथा कम्पनी सरकार की अधीनस्थ मित्र रियासत के रूप में स्थापित हो गया था।

ईस्वी 1848 में अवध का अंतिम नवाब वाजिद अली शाह गद्दी पर बैठा। उसका जन्म 30 जुलाई 1822 को लखनऊ में हुआ था। उसका पिता अमजद अली शाह भी अवध का नवाब था। मुगल इतिहास में वाजिद अली शाह के बारे में दो तरह की धारणाएं मिलती हैं।

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पहली धारणा अंग्रेज लेखकों एवं कम्पनी के अधिकारियों द्वारा निर्मित की गई है जिसके अनुसार वाजिद अली शाह निकम्मा और अय्याश किस्म का शासक था जिसे शासन तथा प्रजा-पालन से कोई लेना-देना नहीं था। अंग्रेजों की दृष्टि में वह इतना अकर्मण्य था कि ईस्वी 1851 में लॉर्ड डलहौजी ने अवध की रियासत के बारे में सार्वजनिक वक्तव्य दिया कि ‘यह बेर एक दिन हमारे मुंह में आकर गिरेगा।’

जबकि दूसरी धारणा के अनुसार वाजिद अली शाह प्रजा-पालक तथा उदार शासक था। यह धारणा भारत के मुस्लिम एवं साम्यवादी चिंतकों द्वारा निर्मित की गई है। इन लेखकों के अनुसार नवाब वाजिद अली शाह को संगीत, नृत्य तथा अन्य ललित कलाओं से इतना प्रेम था कि उसे भारत के मुस्लिम इतिहास का दूसरा मुहम्मद शाह रंगीला कहा जा सकता है जो ललित कला के सबसे उदार और भावुक संरक्षकों में से एक था। भारतीय संगीत में नवाब वाजिद अली शाह का नाम अविस्मरणीय है। उसके दरबार में हर समय संगीत का जलसा हुआ करता था। गायकी की ठुमरी विधा का आविष्कार नवाब वाजिद अली शाह ने ही किया था जिसे कत्थक नृत्य के साथ गाया जाता था।

वाजिद अली शाह ने कई बेहतरीन ठुमरियों की रचना की। वह होली खेलने का भी शौकीन था। भगवान श्री कृष्ण को संबोधित करके लिखी गई उसकी एक ठुमरी इस प्रकार है- ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के, अब के होली मैं खेलूंगी डट के।’

उत्तर भारत के लोकप्रिय शास्त्रीय नृत्य कत्थक का वाजिद अली शाह के दरबार में विकास हुआ। गुलाबो-सिताबो नामक विशिष्ट कठपुतली शैली वाजिद अली शाह की जीवनी पर आधारित है। इस शैली का विकास वाजिद अली शाह के दरबार में प्रमुख आंगिक दृश्य कला के रूप में हुआ।

वाजिद अली शाह ने अपने दरबार में अनेक साहित्यकारों और कवियों को संरक्षण दिया जिनमें से बराक, अहमद मिर्जा सबीर, मुफ्ती मुंशी और आमिर अहमद अमीर आदि प्रमुख थे। इन साहित्यकारों ने वाजिद अली शाह, इरशाद-हम-सुल्तान और हिदायत-हम-सुल्तान के आदेशों पर कुछ पुस्तकें भी लिखीं।

कत्थक की तरह शतरंज का खेल भी वाजिद अली शाह के दरबार में अपने चरम पर पहुंचा। कला एवं साहित्य के क्षेत्र में उसके योगदान को देखते हुए कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि यह अवध का सौभाग्य था जो उसे वाजिद अली जैसा शासक मिला।

अनेक अंग्रेज अधिकारियों की डायरियों एवं पत्रों में कहा गया है कि उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में अवध एक खुशहाल प्रांत था। लखनऊ रेजीडेंसी के नायब मेजर बर्ड ने इसे भारत का चमन बताते हुए लिखा है कि- ‘कंपनी की सेना में अवध के रहने वाले कम से कम 50,000 सिपाही हैं लेकिन वे अपने परिवार को नवाब के राज्य में छोड़कर निश्चिंत भाव से नौकरी करते हैं। वे फौज से रिटायर होने के बाद अवध में वापस आकर शांति से रहते हैं।’

इसी तरह पादरी हेबर ने ईस्वी 1824-25 में अवध की यात्रा के बाद लिखा था कि- ‘इतनी व्यवस्थित खेतीबाड़ी और किसानी देख कर मैं आश्चर्यचकित हूं। लोग आराम से रहते है तथा जनता समृद्ध है।’

अंग्रेज अधिकारी स्लीमन ने ईस्वी 1852 में अपने एक उच्च अधिकारी को लिखे गए पत्र में लिखा था कि- ‘अवध की गद्दी पर इतना अच्छा और कटुता रहित बादशाह कभी नहीं बैठा। अवध पर हमारा एक भी पैसा ऋण नहीं है, उलटे कंपनी स्वयं अवध सरकार की चार करोड़ रूपए की कर्जदार है।’

अंग्रेजों को वाजिद अली शाह फूटी आंख नहीं सुहाता था। इसके कई कारण थे जिनमें से एक बड़ा कारण यह भी था कि नवाब वाजिद अली शाह ब्रिटेन में बने कपड़े की जगह देशी बुनकरों के हाथों से बुने हुए कपड़े को बढ़ावा देता था तथा स्वयं भी देशी बुनकरों के हाथों से बुना हुआ कपड़ा पहनता था।

एक देशी रियासत अंग्रेजों के सामने घुटने टिकाने और गिड़गिड़ाने के स्थान पर आत्मनिर्भर बनी रहे, यह किसी भी कीमत पर अंग्रेजों के लिए सह्य नहीं था। इसलिए अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह को हटाकर अवध की भारत-प्रसिद्ध एवं अत्यंत समृद्ध रियासत को हड़पने का निर्णय लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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