Home Blog Page 167

अवध की मुक्ति

0
अवध की मुक्ति- bharatkaitihas.com
अवध की मुक्ति

अंग्रेजों के द्वारा बड़ी तेजी से भारतीय रियासतें हड़पी जा रही थीं। इस लूट-खसोट के दो परिणाम हो रहे थे। पहला परिणाम हिन्दू नरेशों द्वारा अपने राज्य खोने के रूप में था और दूसरा परिणाम मुस्लिम आक्रांताओं से भारत की मुक्ति के रूप में था। अवध की मुक्ति भी अंग्रजों की लूट-खसोट का परिणाम थी।

यदि डलहौजी ने डॉक्टराइन ऑफ लैप्स नहीं बनाई होती तो भारत की प्रजा कभी भी मुसलमानों के शासन से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकती थी।

सरयू एवं गंगा-यमुना के निर्मल जल से सिंचित उत्तर-भारत की सर्वाधिक समृद्ध रियासत अवध को हड़पने के लिए अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह पर आरोप लगाया कि उसकी रियासत कुप्रबंधन की शिकार हो गई है, जनता की स्थिति खराब है तथा शासक अय्याशी में डूबा हुआ है। इसलिए अंग्रेजों ने नवाब को पेंशन देने तथा लखनऊ छोड़कर कलकत्ता चले जाने का प्रस्ताव दिया किंतु वाजिद अली शाह ने यह प्रस्ताव स्वीकार करने से मना कर दिया किंतु गोरी सरकार अवध की मुक्ति का संकल्प ले चुकी थी।

इस पर ईस्वी 1857 में कम्पनी सरकार की सेनाओं ने अवध पर आक्रमण किया। कुछ अंग्रेजों ने लिखा है कि जिस समय कम्पनी की सेना अवध के राजमहलों में घुसी, उस समय वाजिद अली शाह अपने महल में मौजूद था।

अंग्रेजों की सेना के आगमन की खबर सुनकर उसके समस्त नौकर-चाकर, बेगमें और शहजादे महल छोड़कर भाग गए किंतु वाजिद अली शाह नहीं भाग सका क्योंकि तब महल में कोई सेवक मौजूद नहीं था जो नवाब के पावों में जूतियां पहना सके। चूंकि नवाब साहब को किसी ने जूतियां नहीं पहनाई इसलिए वह पकड़ा गया और उसे गिरफ्तार करके कलकत्ता भेज दिया गया।

वाजिद अली शाह के सम्बन्ध में एक किस्सा और भी कहा जाता है कि जिस समय अंग्रेजी सेना ने अवध पर घेरा डाला तब किसी ने वाजिद अली शाह को अंग्रेजों के आक्रमण की सूचना दी। उस समय वाजिद अली शाह अपने दरबार में था। उसने अपने दरबारियों से पूछा कि अंग्रेज शब्द स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग! इस विषय पर दरबारियों के बीच इतनी देर तक बहस होती रही कि अंग्रेजों ने दरबार में घुसकर वाजिद अली शाह को पकड़ लिया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

रोज़ी लेवेलिन-जोन्स ने अपनी पुस्तक ‘द लास्ट किंग’ में वाजिद अली शाह के चरित्र को अत्यंत विचित्र बताया है। इस पुस्तक के अनुसार वाजिद अली शाह स्त्री-लोलुपता, शतरंज और कत्थक के लिए जाना जाता था। लखनऊ की सुप्रसिद्ध नफासत और तमीज का जन्म वाजिद अली शाह के काल में ही हुआ था।

वाजिद अली शाह स्वयं घण्टों तक कपड़ों पर चिकन का बारीक काम किया करता था। कई-कई दिन तक वह रदीफ़ और काफ़िया जोड़कर शायरी करता रहता था। नवाब कई तरह का भोजन पकाने और अतिथि-सत्कार के लिए भी जाना जाता था। वर्तमान समय में विश्व भर में प्रसिद्ध अवध शैली की पाक कला का विकास वाजिद अली शाह के समय में और वाजिद अली शाह के प्रयासों से हुआ।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान - bharatkaitihas.com
TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

वाजिद अली शाह ने ‘इश्क़नामा’ शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी जिसमें उसने अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए बताया है कि उसने लगभग 300 शादियां कीं और तलाक़ भी खूब दिए।

कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तक ‘परीखाना’ में वाजिद अली शाह द्वारा अनेक महिलाओं के साथ रहे प्रेम प्रसंगों का वर्णन किया गया है। वाजिद अली शाह बहुत कम आयु से ही नाचने-गाने वाली नर्तकियों, खिदमतगार कनीजों और गायिकाओं के संपर्क में रहने लगा था। उनमें से कईयों के साथ उसने विवाह किए तथा उन्हें अलग-अलग बेगम के खि़ताब दिए।

वाजिद अली शाह ने हसीन बेगमों को रहने और उन्हें नृत्य का प्रशिक्षण देने के लिए ‘परीखाना’ का निर्माण करवाया था। वाजिद अली शाह का पहला प्रेम-प्रसंग केवल आठ वर्ष की आयु में आरम्भ हुआ जब उसने रहीमन नामक अधेड़ दासी से प्रेम किया। इसके बाद बेशुमार परियों और बेगमों ने वाजिद अली शाह की जिन्दगी और दिल में जगह बनाने की कोशिश की किंतु उनमें से कुछ ही ऐसी थीं जिनसे वाजिद अली को वास्तव में मोहब्बत हुई या जिनके लिए उनके दिल में खास जगह बनी और जिनके बिछड़ने पर वाजिद रोया भी!

बेगम हज़मती महल भी इन्हीं में से एक थी। उसके बचपन का नाम मुहम्मदी ख़ानुम था। उसका जन्म अवध रियासत के फ़ैज़ाबाद कस्बे में हुआ था। वह पेशे से तवायफ़ थी और अपने माता-पिता द्वारा बेचे जाने के बाद खवासीन के रूप में अवध के शाही हरम में लाई गई थी। तब उसे शाही आधिकारियों के पास बेचा गया था और बाद में वह ‘परी’ के रूप में पदोन्नत हुई और उसे ‘महक परी’ के नाम से जाना गया।  

हज़मती महल को वाजिद अली शाह की रखैल के रूप में स्वीकार किए जाने पर उसे बेगम का खि़ताब हासिल हुआ। उसके पुत्र बिरजिस क़द्र के जन्म के बाद उसे हज़रत महल का खिताब दिया गया। वह वाजिद अली शाह की सबसे छोटी बेगम थी।

कहा जाता है कि जब ईस्वी 1856 में अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह को अवध से निर्वासित किया तो नवाब ने एक ठुमरी गाते हुए अपनी रियासत से विदा ली। इस ठुमरी के बोल इस प्रकार से थे- ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय।’ इस ठुमरी की रचना भी वाजिद अली शाह ने की थी।

जब कहारों ने वाजिद अली शाह की पालकी उठाई तो लखनऊ के सैंकड़ों लोग जोरों से विलाप करते हुए लखनऊ से कानपुर तक उसके पीछे-पीछे चले किंतु बेगम हजरत महल वाजिद अली शाह के साथ कलकत्ता नहीं गई। अंग्रेज अधिकारियों से सांठ-गांठ करके वह अवध रियासत की शासक बन गई।

एक तत्कालीन लेखक ने लिखा है- ‘देह से जान जा चुकी थी। शहर की काया बेजान थी…। कोई सड़क, कोई बाजार और घर ऐसा नहीं था जहाँ से विलाप का शोर न गूँजा हो।’

एक लोक गीत में इस शोक की अभिव्यक्ति इस प्रकार की गई है- ‘अंगरेज बहादुर आइन, मुल्क लई लीन्हों।’

नवाब को हटाए जाने से दरबार और उसकी संस्कृति भी समाप्त हो गई। संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों, सरकारी कर्मचारियों और बहुत से लोगों की रोजी-रोटी जाती रही। उस काल के भारत में अवध की रियासत भारत की विख्यात रियासतों में से एक थी।

मुस्लिम शासन से अवध की मुक्ति ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन की बड़ी उपलब्धि थी। यह कार्य आसान नहीं था किंतु अंग्रेजों ने चुटकियों में कर डाला।

जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार द्वारा अवध के नवाब को इस प्रकार अपमानित करके निर्वासित कर दिया गया तो भारत की अन्य रियासतों के शासकों में बेचैनी व्याप्त हो गई और कम्पनी सरकार के शासन से असंतुष्ट राजा, सैनिक तथा सामान्यजन अंग्रेजों से छुटकारा पाने के लिए कसमसाने लगे। अवध की मुक्ति देखकर भारतीय रियासतों में इस तरह की बेचैनी होना स्वाभाविक था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू सैनिकों का क्रोध

0
हिन्दू सैनिकों का क्रोध - bharatkaitihas.com
हिन्दू सैनिकों का क्रोध

डलहौजी की नीति ने भारत के देशी रजवाड़ों में तो बेचैनी उत्पन्न की ही थी किंतु साथ ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेनाओं में नियुक्त हिन्दू सैनिकों का क्रोध भी उबाल पर था। इसके कई कारण थे।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार ने न केवल लाल किले में बैठे बादशाह से लेकर अवध के नवाब, पूना के पेशवा सहित अनेक देशी शासकों की सत्ता को ही कुचल कर समाप्त प्रायः कर दिया था अपितु भारतीय जन-जीवन के प्रत्येक अंग पर शिकंजा कसकर उसे बुरी तरह चूसना आरम्भ कर दिया था। क्रांति की देवी आशा भरी दृष्टि से लाल किले की तरफ देख रही थी।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों ने इंगलैण्ड के कारखानों को कच्चा माल उपलब्ध करवाने और संसार भर में लड़ रही अपनी सेनाओं का पेट भरने के लिए भारतीय कृषि और कुटीर उद्योगों का संतुलन बिगाड़ दिया था। उन्होंने भारतीय किसानों को विवश किया कि वे कहीं पर केवल नील की, कहीं पर केवल कपास की, कहीं पर केवल गेहूं की तो कहीं पर केवल गन्ने की खेती करें।

इससे भारतीय किसानों की परम्परागत आत्म-निर्भरता नष्ट हो गई। इसी प्रकार मैनचेस्टर की मिलों का माल भारत में खपाने के लिए अंग्रेजों ने भारत के कुटीर उद्योगों को नष्ट कर दिया।

भारतीय कृषि एवं कुटीर उद्योगों के नष्ट हो जाने से भारत में बड़े-बड़े अकाल पड़ने लगे। ई.1770 में बंगाल का वीभत्सतम अकाल पड़ा जिसमें बिहार एवं बंगाल में एक करोड़ लोगों की मृत्यु हो गई। वारेन हेस्टिंग्स ने ई.1772 में इस अकाल पर तैयार रिपोर्ट में लिखा है कि निम्न-गंगा-क्षेत्र अर्थात् बिहार एवं बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या इस अकाल में समाप्त हो गई।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

ई.1837 में गंगा-यमुना के दो आब में भयानक अकाल पड़ा। इस अकाल में आठ लाख लोग मारे गये थे। लॉर्ड जॉन लॉरेंस ने लिखा है- ‘मेरे जीवन में ऐसे दृश्य कभी दिखाई नहीं दिये जैसे होडल तथा पलवल आदि परगनों में देखे। कानपुर में सैनिक टुकड़ियां लाशों को हटाने जाती थीं। हजारों लाशें गांवों और कस्बों में तब तक पड़ी रहती थीं जब तक कि जंगली जानवरों द्वारा खा नहीं ली जाती थीं।’

अकाल पीड़ितों की सहायता के लिये कम्पनी शासन ने कोई प्रयत्न नहीं किया। इस कारण स्थान-स्थान पर रोटी एवं पानी के लिए उपद्रव हुए। अंग्रेजी सेना ने इन उपद्रवों का दमन किया। इन अकालों के कारण उत्तर भारत की आत्मा कराह उठी। भारत के लोग फिरंगियों के राज्य के नाश की कामना करने लगे।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान - bharatkaitihas.com
TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

डलहौजी के बाद ई.1856 में जब लॉर्ड केनिंग भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया तो उसने कम्पनी के बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स के समक्ष भाषण देते हुए कहा- ‘एक धन-धान्यपूर्ण देश में 15 करोड़ लोग शांति और संतोष के साथ विदेशियों की सरकार के समक्ष घुटने टिकाये हुए हैं……..मैं नहीं जानता कि घटनाएं किस ओर जायेंगी। मैं आशा करता हूँ कि हम युद्ध से बच जायेंगे।…… मैं चाहता हूँ कि मेरा कार्यकाल शांतिपूर्ण हो। …….. हमें नहीं भूलना चाहिये कि भारतीय आकाश यद्यपि इस समय बिल्कुल शांत है किंतु एक छोटा सा बादल जो एक मुट्ठी से बड़ा न हो, उठ सकता है, जो बढ़कर हमारा सर्वनाश कर सकता है …….. यदि सब-कुछ करने पर भी अंत में यह आवश्यक हो जाये कि हम शस्त्र उठाएं तो हम साफ दिल से प्रहार करेंगे। ऐसा करने से युद्ध जल्दी समाप्त हो जायेगा और सफलता निश्चित होगी।’

इस वक्तव्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत की अँग्रेजी सरकार को यह जानकारी हो गई थी कि हिन्दू सैनिकों का क्रोध कभी भी विद्रोह का रूप ले सकता है।

लॉर्ड केनिंग एक बुद्धिमान एवं व्यवहार कुशल अधिकारी था किंतु वह भी भारत में पनप रहे असंतोष को कम करने में असफल रहा। कम्पनी सेना में अधिकांश भारतीय सैनिक उच्च जाति के ब्राह्मण, राजपूत, जाट एवं पठान आदि थे। वे कट्टर रूढ़िवादी थे।

अँग्रेजों ने सेना में पाश्चात्य नियम लागू करते हुए सैनिकों को माला पहनने व तिलक लगाने की मनाही कर दी। मुसलमान सैनिक दाढ़ी नहीं रख सकते थे। हिन्दुओं को विदेशी मोर्चों पर भेजा जाने लगा। हिन्दुओं में विदेश जाना धर्म विरुद्ध माना जाता था। इस पर हिन्दू सैनिकों का क्रोध भड़क गया और उन्होंने विदेश जाने से इन्कार कर दिया।

इस पर लॉर्ड केनिंग ने सामान्य सेना भर्ती अधिनियम पारित करके भारतीय सैनिकों को सेवा के लिए कहीं भी भेजे जा सकने का नियम बना दिया। एक अन्य आदेश के अनुसार, विदेशों में सेवा के लिए अयोग्य समझे गये सैनिकों को सेवानिवृत्ति प्राप्त करने पर पेंशन से वंचित कर दिया गया। इससे भारतीय सैनिकों में यह भावना दृढ़ हो गई कि अँग्रेज उनके धर्म को नष्ट करके उन्हें ईसाई बना रहे हैं। ऐसे वातावरण में चर्बी-युक्त कारतूसों ने आग में घी का काम किया।

उन्हीं दिनों ब्रिटेन में एनफील्ड नामक रायफल का आविष्कार हुआ जिसमें प्रयुक्त कारतूस को चिकना करने हेतु गाय एवं सूअर की चर्बी का प्रयोग होता था। इस कारतूस को रायफल में डालने से पूर्व उसकी टोपी को मुँह से काटना पड़ता था। इस रायफल का प्रयोग ई.1853 से भारत में भी आरम्भ किया गया किंतु कारतूस में चर्बी लगी होने की बात भारतीयों को ज्ञात नहीं थी।

ई.1857 में दमदम शस्त्रागार में एक दिन निम्न समझी जाने वाली जाति के एक खलासी ने एक ब्राह्मण सैनिक के लोटे से पानी पीना चाहा किन्तु उस ब्राह्मण ने इसे अपने धर्म के विरुद्ध मानकर उसे रोका।

इस पर खलासी ने व्यंग्य किया कि ‘उसका धर्म तो नये कारतूसों के प्रयोग से समाप्त हो जायेगा, क्योंकि उस पर गाय और सूअर की चर्बी लगी हुई है।’ खलासी के व्यंग्य से सत्य खुल गया और हिन्दू सैनिकों का क्रोध अचानक ही चरम पर पहुँच गया।

सुंदरलाल ने अपनी पुस्तक भारत में ब्रिटिश राज में लिखा है- ‘दमदम की एक कारतूस फैक्ट्री के लिये चर्बी की आपूर्ति हेतु एक ठेकेदार 4 आने प्रति सेर के हिसाब से देने के लिये नियुक्त था। ब्रिटिश इतिहासकार केय ने अपनी पुस्तक इण्डियन म्यूटिनी में लिखा है कि टूकर नामक एक कर्नल ने ई.1853 में यह खुलासा कर दिया था कि कारतूस में लगने वाले छर्रे गाय एवं सूअर की चर्बी से युक्त रहते थे।’

इन कारतूसों को मुंह से खोलकर बंदूक में भरना पड़ता था। इस कारण हिन्दू एवं मुसलमान दोनों ही सम्प्रदायों के सिपाही अंग्रेजों के शासन को मिटाने पर उतारू हो गए। जब अँग्रेजों द्वारा सती प्रथा निषेध का कानून बनाया गया तो भारतीयों को लगा कि अँग्रेज जाति भारतीयों की सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करके हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को नष्ट करना चाहती है।

सुन्दरलाल तथा उनके बाद के साम्यवादी लेखकों ने कम्पनी सरकार में सूअर की चर्बी लगे कारतूसों के माध्यम से मुस्लिम सैनिकों के असंतोष को बढ़ा-चढ़ा कर दर्शाया है किंतु वास्तविकता यह थी कि उस काल में कम्पनी सरकार की सेना में मुसलमान सैनिकों की संख्या बहुत कम थी। यह तो हिन्दू सैनिकों का क्रोध ही था जो कम्पनी सरकार के विरुद्ध ज्वालामुखी की तरह उबल रहा था।

इस प्रकार ई.1857 में सम्पूर्ण भारत में चारों ओर कम्पनी के शासन के विरुद्ध वातावरण बन गया। इस वातावरण में एक छोटी सी चिन्गारी बड़ा विस्फोट करने के लिये पर्याप्त थी और क्रांति की देवी प्रकट होने को आतुर थी किंतु क्रांति की देवी को इस काल के भारत में ऐसी कोई सर्वमान्य शक्ति दिखाई नहीं देती थी जो क्रांति की देवी का स्वागत कर सके और उसका हाथ पकड़कर सफलता के सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो सके।

ऐसी स्थिति में क्रांति की देवी ने बड़ी आशा भरी दृष्टि से लाल किले की तरफ देखा किंतु लाल किला न केवल थका हुआ और निराश था अपितु किंकर्तव्य विमूढ़ होकर बैठा था। उसका समस्त तेज नष्ट हो चुका था। लाल किले का बादशाह बहादुरशाह जफर बूढ़ा, जर्जर और अकर्मण्य था। उससे यह आशा करना व्यर्थ था कि वह क्रांति की देवी का स्वागत करने को तत्पर होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नाना साहब पेशवा

0
नाना साहब पेशवा - bharatkaitihas.com
नाना साहब पेशवा

नाना साहब पेशवा उन्नीसवीं सदी के इतिहास में राजनीति की बिसात से बलपूर्वक उठाकर फैंका गया ऐसा दुर्भाग्यशाली मोहरा था जिसका दर्द भारतीय इतिहास में बहुत कम उभर कर सामने आया है।

ई.1857 की क्रांति के बारे में इतिहासकारों की अलग-अलग राय है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस क्रांति में देश व्यापी विभिन्न तत्वों ने भाग लिया जिनमें धार्मिक नेताओं, पूर्व राजाओं, जागीरदारों, कृषकों, कारीगरों, सैनिकों और सामान्य जनता की भागीदारी थी। जबकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह क्रांति अंग्रेजों से असंतुष्ट चल रहे कुछ राजाओं, मुट्ठी भर बड़े जागीरदारों तथा अंग्रेजी सेनाओं के असंतुष्ट भारतीय सैनिकों तक ही सीमित थी। जनसामान्य ने इसमें भाग नहीं लिया।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 1857 की क्रांति अनायास ही फूट पड़े असंतोष का परिणाम थी जबकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह सोची-समझी एवं पूर्व नियोजित योजना थी। इसका नेतृत्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग लोगों ने किया। इस क्रांति में लाल किले की विशेष भूमिका नहीं थी किंतु क्रांति की देवी ने लाल किले को इस क्रांति के केन्द्र में जबर्दस्ती घसीट लिया।

बहुत से इतिहासकारों की धारणा है कि ईस्वी 1857 की क्रांति का बीजारोपण पेशवा नाना साहब (द्वितीय) ने किया था। पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1803 में अंग्रेजों ने मराठों से दिल्ली छीन ली थी। तब से ही अंग्रेज मराठों को कुचलने में लगे रहे और अंत में उन्होंने ई.1818 में पेशवा बाजीराव (द्वितीय) को पेंशन देकर पूना से बाहर निकाल दिया तथा उसे कानपुर के पास बिठूर में रहने के लिए बाध्य कर दिया। पेशवा बाजीराव (द्वितीय) के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसने धोंधू पंत नामक एक बालक को गोद लिया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

पेशवा बाजीराव (द्वितीय) ई.1852 में मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसका दत्तक पुत्र धोंधू पंत नाना साहब (द्वितीय) के नाम से उसका उत्तराधिकारी हुआ किंतु कम्पनी सरकार ने नाना साहब को पेंशन देने से मना कर दिया। नाना साहब ने पेंशन पाने के लिए लार्ड डलहौजी से पत्राचार किया किंतु जब उसने भी मना कर दिया तो नाना साहब ने अपने सेनापति अजीमुल्ला खाँ को अपना वकील नियुक्त करके महारानी विक्टोरिया के पास लंदन भेजा।

अजीमुल्ला खाँ ने महारानी से मिलकर पेशवा का पक्ष स्पष्ट करने का प्रयास किया किंतु उसे सफलता नहीं मिली। अजीमुल्ला खाँ लंदन से फ्रांस, इटली तथा रूस आदि देशों की यात्रा करता हुआ फिर से भारत आ गया। उसने नाना साहब को ब्रिटिश सरकार की खराब नीयत, अपनी विफलता तथा यूरोपीय देशों में आजादी के लिए चल रहे संघर्षों आदि की जानकारी दी।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान - bharatkaitihas.com
TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इस पर नाना साहब ने भारत में भी राष्ट्रव्यापी स्वातंत्र्य संग्राम आरम्भ करने की योजना बनाई। इस योजना के प्रचार के लिए नाना साहब ने उन रजवाड़ों से सम्पर्क करने की योजना बनाई जिनके राज्य अंग्रेजों ने छीन लिए थे या जिन राजाओं की पेंशनें बंद कर दी थीं। ईस्वी 1856 में नाना साहब ने बिठूर से भारत भर में अपने गुप्त दूत और प्रचारक दिल्ली से लेकर मैसूर तक के विस्तृत क्षेत्र में स्थित रियासतों भिजवाए। ये दूत नाना साहब का गुप्त पत्र लेकर इन रियासतों के राजाओं तक पहुंचे। इस पत्र में बड़े ही रहस्यपूर्ण शब्दों में भिन्न-भिन्न धर्मों के नरेशों और सामंतों को सलाह दी गई थी कि वे लोग आगामी युद्ध के लिए तैयार रहें तथा भारत को पराधीन बनाने के अंग्रेजों के प्रयत्नों को विफल बनाएं।

इसी बीच ईस्वी 1856 में अंग्रेजों के हाथों अवध के नवाब वाजिद नवाब वाजिद अली शाह की गिरफ्तारी और अवध पर अंग्रेजों के अधिकार के समाचारों ने देशी रियासतों के राजाओं और नवाबों को चिंतित कर दिया। वे स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे। इसलिए पहले से ही असंतुष्ट चल रहे राजाओं ने पेशवा नाना साहब द्वारा बनाई जा रही सशस्त्र क्रांति की योजना में भाग लेना स्वीकार कर लिया।

अवध के पूर्व नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल और अवध के वजीर अलीनकी खाँ ने भी क्रांति की योजना में सहयोग देने का निश्चय किया। वजीर अलीनक़ी खाँ इस समय कलकत्ता में था। उसने अपने गुप्त दूत मुसलमान फकीरों और हिंदू साधुओं के रूप में उत्तर भारत की रियासतों में भिजवाए और उन रियासतों के भारतीय अधिकारियों से पत्र-व्यवहार किया।

ईस्वी 1857 के आरम्भ में पेशवा नाना साहब (द्वितीय) अपने भाई बाला साहब को लेकर कानपुर से भारत के विभिन्न स्थानों के लिये तीर्थयात्रा पर निकला। इस तीर्थयात्रा के दौरान पेशवा उन स्थानों पर भी गया जहाँ अँग्रेजों द्वारा अपदस्थ रजवाड़ों के परिवार रहते थे। उसने कालपी, लखनऊ, आगरा, अम्बाला आदि स्थानों की भी यात्रा की और सैनिक छावनियों में पहुंचकर अंग्रेजी सेनाओं के हिंदुस्तानी सैनिकों से सम्पर्क किया। नाना साहब ने हिन्दुस्तानी सैनिकों को निकट भविष्य में होने वाली राष्ट्रव्यापी क्रांति की गुप्त योजना बताई।

इसके बाद नाना साहब पेशवा ने दिल्ली पहुंच कर लाल किले में बादशाह बहादुरशाह जफर तथा उसकी बेगम जीनत महल से भेंट की। संभवतः इसी दौरान कोई गुप्त संगठन तैयार हुआ जिसने क्रांति के लिये 31 मई 1857 की तिथि निर्धारित की।

इस समय अंग्रेजी पलटनों के भारतीय सिपाही ईस्ट इण्डिया कम्पनी की दूषित नीतियों के कारण अंग्रेज अधिकारियों से नाराज थे। इस कारण अनेक भारतीय रेजीमेंटें नवनिर्मित गुप्त क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गईं जिसने 31 मई 1857 का दिन विद्रोह के लिये नियत किया था।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि कोई गुप्त संगठन नहीं बना था, अपितु विद्रोह अचानक फूट पड़ा था जो बाद में बड़े क्षेत्र में फैल गया था, क्योंकि किसी गुप्त संगठन के कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं हुए हैं।

इस क्रांति का जितनी तेजी से प्रचार किया गया, वह भी आश्चर्यजनक था। बंगाल के बैरकपुर से लेकर पख्तूनिस्तान के पेशावर तक और संयुक्त प्रांत के लखनऊ से लेकर महाराष्ट्र के सातारा तक हजारों फकीरों एवं सन्यासियों ने गांव-गांव और सैनिक पलटनों में घूम-घूमकर आजादी की लड़ाई का प्रचार किया। कुछ ही समय में क्रांतिकारियों के पांच प्रमुख केंद्र बन गए- दिल्ली, बिठूर, लखनऊ, कलकत्ता और सतारा।

इस प्रचार की विशेष बात यह थी कि अंग्रेजों को लम्बे समय तक इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी। क्रांति का प्रचार होने के साथ-साथ संगठन के केंद्रों की संख्या भी बढ़ने लगी। इन केंद्रों के बीच गुप्त पत्र-व्यवहार आरंभ हो गया।

क्रांति के संदेश का प्रचार करने के लिये तीर्थ-स्थलों, मेलों और उत्सवों का उपयोग किया गया। छद्म सन्यासियों, मदारियों एवं फकीरों द्वारा गांवों के चौकीदारों को रोटी पहुंचाई जाती थी जो प्रसाद के रूप में वितरित की जाती थी। इसी प्रसाद के साथ, सम्पूर्ण भारत में विद्रोह के लिये 31 मई 1857 की तिथि निर्धारित होने का संदेश दिया जाता था।

हालांकि नाना साहब जहाँ भी जाता था, वहाँ सैनिक छावनियों, स्थानीय राजाओं एवं जमींदारों के साथ-साथ जनसामान्य एवं स्थानीय अंग्रेज अधिकारियों से अवश्य मिलता था ताकि अंग्रेजों को उसकी यात्रा के वास्तविक उद्देश्य की जानकारी न हो सके किंतु इस पर भी कुछ अँग्रेज अधिकारियों को नाना साहब पेशवा की इन गतिविधियों की जानकारी हो गई और वे चौकन्ने हो गए।

एक तत्कालीन अँग्रेज अधिकारी विल्सन ने कम्पनी सरकार के उच्च अधिकारियों को सूचित किया कि कम्पनी सरकार के विरुद्ध एक गुप्त संगठन बनाया गया है जिसने भारत-व्यापी विद्रोह के लिये 31 मई 1857 की तिथि निर्धारित की है। विल्सन ने अपने अधिकारियों को सूचित किया कि कम्पनी सरकार की सेनाओं के हिन्दू सैनिकों को गंगाजल तथा तुलसीदल एवं मुसलमान सैनिकों को कुरान की शपथ दिलवाकर भावी विद्रोह के लिये तैयार किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाल कमल का फूल

0
लाल कमल का फूल - bharatkaitihas.com
लाल कमल का फूल

हिन्दू संस्कृति में लाल कमल का फूल बहुत श्रद्धा से देखा जाता है। देवी लक्ष्मी कमल के आसान पर विराजमान हैं, भगवान विष्णु के हाथों में कमल का फूल है तथा ब्रह्माजी की पूजा कमल के फूलों से की जाती है। इस कारण 1857 की राष्ट्रव्यापी सशस्त्र क्रांति के समय लाल कमल का फूल क्रांति का संदेश फैलाने के लिए मुख्य प्रतीक के रूप में चुना गया।

लाल कमल का फूल तो सशस्त्र क्रांति की हुंकार का प्रतीक बना ही, इसके साथ रोटी भी रहस्यमय ढंग से हिन्दू सैनिकों के क्रोध की अभिव्यक्ति का प्रतीक बन गई जिसे अंग्रेजी सत्ता हिन्दुओं के मुंह से छीनकर इंग्लैण्ड ले जा रही थी।

18 अप्रेल 1857 को नाना साहब पेशवा जिन्हें पेशवा नाना साहब (द्वितीय) भी कहा जाता है, तीर्थयात्रा पूरी करके बिठूर लौट आया। इस बीच वह अवध की बेगम हजरत महल, मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर और बेगम जीनत महल आदि से मिलकर भारत-व्यापी सशस्त्र क्रांति की योजना के विचार को अंतिम रूप दे चुका था।

 इस प्रकार 1857 की क्रांति का वास्तविक जनक पेशवा नाना साहब (द्वितीय) को ही माना जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि वही इस क्रांति का केन्द्रीय पात्र था। पेशवा ने क्रांति के भावी नेताओं से परामर्श करके दो मुख्य चिह्न निश्चित किए- एक था कमल का फूल और दूसरी थी- रोटी।

कमल का फूल उन पलटनों में घुमाया जाता था जो इस योजना में शामिल की जानी थीं। किसी एक पलटन का सिपाही फूल लेकर दूसरी पलटन में जाता था। उस पलटन में वह फूल समस्त भारतीय सिपाहियों के हाथों से होता हुआ अंत में जिसके हाथ में आता था, वह उसे अपने पास की दूसरी पलटन के भारतीय सिपाहियों तक पहुंचाता था। इसका गुप्त अर्थ यह था कि उस पलटन के सिपाही क्रांति में भाग लेने के लिए तैयार हैं।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

इसी तरह रोटी को एक गांव का चौकीदार दूसरे गांव के चौकीदार के पास ले जाता था। वह चौकीदार उस रोटी में से थोड़ी सी खुद खा लेता था और बाकी गांव के दूसरे लोगों को खिलाता था। वह गेहूं अथवा दूसरे आटे की रोटियां बनवा कर पास के गांव में पहुंचाता इसका मतलब यह होता था कि उस गांव की जनता निकट भविष्य में होने वाली राष्ट्रीय क्रांति के लिए तैयार है। कमल और रोटी के ये प्रतीक सारे भारत के गांवों में जितनी तेजी से पहुंचे उसे देखकर किसी को भी हैरानी हो सकती है!

कमल के फूल और रोटी के साथ पेशवा नाना साहब का एक संदेश भी पहुचाया जाता था। यह संदेश इस प्रकार था- ‘भाइयो! हम स्वयं विदेशी सरकार की तलवार अपने अंदर घुसा रहे हैं। यदि हम खड़े हो जाएं तो सफलता निश्चित है, कोलकाता से पेशावर तक का सारा मैदान हमारा होगा।’

लाल किले की दर्दभरी दास्तान - bharatkaitihas.com
TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

क्रांति के प्रचार के प्रतीक के रूप में रोटियों और लाल कमल के फूल का प्रयोग किया गया। क्रांति के प्रत्यक्षदर्शी अंग्रेज अधिकारी एवं लेखक सर जी. ओ. ट्रैवेलियन ने अपनी पुस्तक ‘कानपोर’ में लिखा है- ‘लाल कमल ने सचमुच सारी जनता को एक कर दिया है…….. बंगाल में जवान और किसान दोनों एक ही भाव, सब-कुछ लाल होने जा रहा है, की अभिव्यक्ति देते हुए पाये गये।’  

1857 की क्रांति के भुगतभोगी अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स थियोफिलस मेटकाफ ने अपनी पुस्तक ‘टू नेटिव नरेटिव्ज ऑफ द म्यूटिनी ऑफ डेल्ही’ में लिखा है- ‘बंगाल में ऐसी कोई छावनी या स्टेशन नहीं था जहाँ कमल का प्रसारण न हुआ हो…… षड्यंत्र के इस साधारण प्रतीक का प्रसारण अवध के विलीनीकरण के पश्चात् हुआ।’

उस काल के कलकत्ता तथा बैरकपुर सहित समस्त बंगाल में चल रही गतिविधियों से अनुमान होता है कि 1857 की क्रांति आरम्भ करने में पेशवा नाना साहब तथा उसके मंत्री अजीमुल्ला खाँ की जितनी बड़ी भूमिका थी, उतनी ही बड़ी भूमिका कलकत्ता में निर्वासन व्यतीत कर रहे अवध के नवाब वाजिद अली शाह तथा उसके वजीर अलीनकी खाँ की भी थी।

बंगाल आर्मी जो एशिया की सबसे बड़ी एवं आधुनिक फौज थी, उसके 1 लाख 39 हजार सिपाहियों में से 7 हजार 796 को छोड़कर बाकी सभी ने अपने ब्रिटिश स्वामियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था।  

कुछ भारतीय इतिहासकारों के अनुसार कमल का फूल और रोटी के प्रतीक चिह्न का प्रयोग होने की बात झूठी थी और यह अँग्रेज अधिकारियों द्वारा जानबूझ कर गढ़ी गई थी ताकि वे अपने द्वारा किये गये नर-संहार को यह कहकर उचित ठहरा सकें कि यह सरकार के विरुद्ध एक सुनियोजित षड्यंत्र था जिसे कुचला जाना आवश्यक था।

अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति आरम्भ होने के दिनों में लंदन से प्रकाशित होने वाली ‘टाइम्स’ मैगजीन का विशेष प्रतिनिधि सर विलियम हार्वर्ड रसल भारत में था। उसने लिखा-

‘यह कैसा युद्ध था जिसमें लोग अपने धर्म के नाम पर, अपनी कौम के नाम पर बदला लेने के लिए और अपनी आशाओं को पूरा करने के लिए उठे थे। उस युद्ध में समूचे राष्ट्र ने अपने ऊपर से विदेशियों के जुए को फेंक कर उसकी जगह देशी नरेशों की सत्ता और देशी धर्मों का अधिकार फिर से स्थापित करने का संकल्प लिया था’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मंगल पाण्डे

0
मंगल पाण्डे - bharatkaitihas.com
मंगल पाण्डे

मंगल पाण्डे ने अंग्रेज अधिकारी को गोली मारकर राष्ट्रव्यापी महाक्रांति का बिगुल बजा दिया!

26 फरवरी 1857 को कलकत्ता से 120 मील दूर स्थित बहरामपुर छावनी के सैनिकों को जैसे ही ज्ञात हुआ कि उन्हें गाय एवं सूअर की चर्बी से चिकने किए गए कारतूत दिए गए हैं तो भारतीय सिपाहियों ने चर्बी-युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। लॉर्ड केनिंग ने उस कम्पनी को भंग कर दिया। इससे अन्य सैनिक टुकड़ियों में असन्तोष फैल गया।

29 मार्च 1857 को कलकत्ता से 5 मील दूर स्थित बैरकपुर छावनी में 34वीं कम्पनी के सिपाही मंगल पाण्डे ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। उसने अपने साथियों को ललकारा- ‘तुम लोग धर्म के लिये संग्राम में उतर पड़ो।’ मंगल पाण्डे ने अपने अंग्रेज एडजुटेण्ट पर गोली चलाकर उसे मार डाला।

इस पर बर्मा से एक गोरी पलटन बैरकपुर बुलवाई गई जिसने मंगल पाण्डे को बन्दी बनाकर 8 अप्रेल 1857 को फांसी पर चढ़ा दिया। बैरकपुर में स्थित समस्त भारतीय सैनिकों के हथियार रखवा लिए गए तथा वायसराय के आदेश से पूरी कम्पनी को भंग कर दिया। भंग कम्पनी के सैनिकों ने अपने-अपने गांव पहुंचकर मंगल पाण्डे के बलिदान की गाथा लोगों को सुनाई। इससे भारत की विभिन्न छावनियों में स्थित सैनिकों में भी चर्बी-युक्त कारतूसों के विरुद्ध क्रांति करने की भावना जागृत हुई।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

डलहौजी द्वारा ई.1856 में अवध को अँग्रेजी राज्य में मिलाये जाने के कारण, अवध में अँग्रेजों के विरुद्ध भारी असन्तोष था। 2 मई 1857 को लखनऊ की अवध रेजीमेंट ने चरबी-युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। 3 मई 1857 को लखनऊ में सैनिक विद्रोह हुआ जिसे दबा दिया गया। 31 मई 1857 को एक बार पुनः विद्रोह फूट पड़ा। यह विद्रोह अवध राज्य के विभिन्न भागों में फैल गया।

अवध का नवाब वाजिद अलीशाह कलकत्ता में अँग्रेजों का बन्दी था, अतः विद्रोहियों ने उसके अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादर को नवाब घोषित करके शासन, बेगम हजरत महल को सौंप दिया। अवध के जमींदारों, किसानों और सैनिकों ने, बेगम हजरत महल की सहायता की। 20 जून 1857 को क्रांतिकारियों ने अँग्रेजी सेना को परास्त कर दिया। ब्रिटिश सेना ने भागकर ब्रिटिश रेजीडेंसी में शरण ली।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान - bharatkaitihas.com

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO.

क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश रेजीडेंसी में आग लगा दी। इसके बाद अवध के अधिकांश ताल्लुकेदारों एवं जमींदारों ने अपनी जागीरों तथा जमींदारियों पर अधिकार कर लिया। लखनऊ में रह रहे अँग्रेजों की सहायता के लिए प्रधान सेनापति कॉलिन कैम्पबेल, आउट्रम तथा हेवलॉक अपनी-अपनी सेनाएं लेकर लखनऊ पहुंचे। नेपाल से गोरखा सेना बुलाई गई। 31 मार्च 1858 को अँग्रेजों ने लखनऊ पर पुनः अधिकार कर लिया। इसके बाद भी ताल्लुकेदार छिपकर अँग्रेजों की हत्या करते रहे किन्तु मई 1858 में बरेली पर अँग्रेजों का अधिकार हो जाने पर अवध के क्रान्तिकारियों ने हथियार डाल दिये। इसके बाद अवध रेजीमंेट को भंग कर दिया गया।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारतीय सैनिकों को दिए गए कारतूसों के चर्बी-युक्त होने की सूचना मेरठ छावनी में भी पहुँच गई। 24 अप्रैल 1857 को घुड़सवारों की एक सैनिक टुकड़ी ने इन कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। मेरठ छावनी का अधिकारी कारमाइकेल स्मिथ अत्यन्त घमण्डी था। उसने सैनिकों को 5 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। 9 मई 1857 को 85 सैनिकों को अपराधियों के कपड़े पहनाकर बेड़ियाँ लगा दी गईं।

कारमाइकेल ने भारतीय सैनिकों को चुनौती दी कि वे चाहें तो अपने साथियों के अपमान का बदला ले सकते हैं। 9 मई की शाम को जब कुछ सिपाही नगर में घूमने निकले तो राह चलती स्त्रियों ने उन पर ताने कसे। मुरादाबाद के तत्कालीन जज जे. सी. विल्सन ने लिखा है- ‘महिलाओं ने सिपाहियों से कहा, छिः! तुम्हारे भाई जेलखाने में हैं और तुम यहाँ बाजार में मक्खियां मार रहे हो। तुम्हारे जीने पर धिक्कार है।’

10 मई 1857 को सांय 5 बजे मेरठ की एक पैदल सैनिक टुकड़ी ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह घुड़सवारों की टुकड़ी में भी फैल गया। कारमाइकेल जान बचाकर भाग गया। क्रांतिकारी सैनिक, जेल में घुसे और उन्होंने बन्दी सैनिकों की बेड़ियाँ काटकर उन्हें अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। इसके बाद अँग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतार कर, वे दिल्ली की ओर चल पड़े। उस समय जनरल हेविट के पास 2,200 यूरोपीय सैनिक थे परंतु उसने इस प्रचण्ड विद्रोह को रोकने का साहस नहीं किया।

जहाँ भारतीय इतिहासकारों ने मंगल पाण्डे को अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति का अग्रदूत बताया है, वहीं अंग्रेज इतिहासकारों ने मंगल पाण्डे की बगावत का इस क्रांति से कोई सम्बन्ध होना नहीं माना है। विलियम डैलरिंपल ने अपनी पुस्तक द लास्ट मुगल में लिखा है कि- ‘जब से विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक द इंडियन वॉर ऑफ इण्डिपेंडेंस 1857 प्रकाशित हुई, तब से बैरकपुर में मार्च की साजिश गदर का एक मुख्य हिस्सा बन गई जिसे बॉलीवुड की फिल्म मंगल पांडे ने और बढ़ावा दिया किंतु वास्तव में मंगल पाण्डे का इस गदर को कोई सम्बन्ध नहीं है जो दो महीने बाद मेरठ में आरम्भ हुआ था।’

वस्तुतः भारतीय इतिहासकारों एवं अंग्रेज इतिहासकारों के दृष्टिकोण में अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति को लेकर आरम्भ से ही विरोध रहा है। भारतीय इतिहासकार इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महान् आयोजन मानते हैं तो अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे असंतुष्ट भारतीय तत्वों की बगावत कहकर उसकी गरिमा को कम करने का प्रयास किया है।

फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति केवल किसी एक तत्व द्वारा आरम्भ की गई योजना के दायरों में सीमित नहीं थी, यह राष्ट्रव्यापी घटनाओं का एक असम्बद्ध किंतु दीर्घ सिलसिला थी।

इस क्रांति के बहुत से आयाम निःसंदेह बहुत महान् थे जिनमें 29 मार्च 1857 को आरम्भ हुई बैरकपुर की क्रांति, 10 मई 1857 को आरम्भ हुई मेरठ की क्रांति, 31 मई 1857 को आरम्भ हुई अवध की क्रांति, 8 जून 1857 को आरम्भ की गई झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की गई क्रांति, मराठी ब्राह्मण तात्या टोपे द्वारा की गई क्रांति, पेशवा नाना साहब द्वारा बिठूर में की गई क्रांति, बिहार के जगदीशपुर के जागीरदार कुंवरसिंह की क्रांति, मध्य भारत के नीमच की क्रांति, राजपूताना के नसीराबाद, ऐरनपुरा, कोटा, देवली तथा आउवा की क्रांति, बिहार की दानापुर रेजिमेंट द्वारा की गई क्रांति, रामगढ़ की क्रांति तथा दक्षिण भारत के कुछ स्थानों पर हुई क्रांति की घटनाएं सम्मिलित थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

द लास्ट मुगल

0
द लास्ट मुगल - bharatkaitihas.com
द लास्ट मुगल

बहादुरशाह जफर लाल किले में रहने वाला आखिरी मुगल था। इसलिए अंग्रेज उसे द लास्ट मुगल भी कहते थे। वह पूर्णतः ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार द्वारा दी जा रही पेंशन पर जीवित था। उसकी आय का कोई अन्य स्रोत नहीं था।

द लास्ट मुगल अर्थात् बहादुरशाह जफर पेंशन के पैसे पर अपने हरम की ढेर सारी शहजादियों, बेगमों, लौण्डियों एवं बांदियों को पालता था। शहजादे भी उसी पेंशन में से रोटी खाते थे। द लास्ट मुगल के पास अपना एक भी सिपाही नहीं था फिर भी उसने 1857 की सशस्त्र सैनिक क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार किया।

क्रांति के राष्ट्रव्यापी घटनाक्रम में आगे बढ़ने से पहले हमें लाल किले के भीतर के तत्कालीन परिदृश्य पर एक दृष्टि डालनी चाहिए। पाठकों को स्मरण होगा कि भारत में 19वें मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने चार विवाह किए थे जिनसे उसे 22 शहजादों की प्राप्ति हुई थी। इनमें से 6 शहजादे बहादुरशाह के जीवन-काल में ही मर गए थे।

अंग्रेज लेखक विलियम डैलरिम्पल ने अपनी पुस्तक द लास्ट मुगल में लिखा है कि बहादुरशाह जफर ने ई.1840 में 64 वर्ष की आयु में 19 वर्ष की जीनत महल से विवाह किया था। जीनत महल के पेट से एक शहजादे का जन्म हुआ था जिसका नाम जवांबख्श था।

जीनत से विवाह होने से पहले ताज बेगम, बादशाह की मुख्य बेगम हुआ करती थी। वह बहादुरशाह जफर के दरबार के एक संगीतकार की खूबसूरत बेटी थी। ईस्वी 1837 में जब बहादुरशाह जफर मुगलों के तख्त पर बैठा था, तब लाल किले में हुए समस्त समारोहों का प्रबंधन इसी हसीना ने अर्थात् ताजमहल ने किया था क्योंकि बहादुरशाह की दो बेगमें अशरफ महल तथा अख्तर महल इस समय तक पर्याप्त वृद्धा हो चुकी थीं।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

बहादुरशाह ताजमहल बेगम पर दिलो-जान से फिदा था किंतु एक बार बादशाह को संदेह हो गया कि बेगम ताजमहल, बादशाह के भतीजे मिर्जा कामरान से प्रेम करती है। इस पर बादशाह ने ताजमहल को जेल में बंद कर दिया। कुछ समय बाद परिवार के लोगों ने बीच-बचाव करके बेगम ताजमहल को कैद से मुक्त करवाया। ताजमहल जेल से तो बाहर आ गई किंतु वह जीवन भर बहादुरशाह और उसकी सबसे छोटी बेगम जीनत महल से रुष्ट रही।

हालांकि जीनत महल मुख्य बेगम बनी रही किंतु बहादुरशाह की चारों बेगमें अपने-अपने पुत्र को अगला बादशाह बनाना चाहती थीं। इसलिए लाल किले का वातावरण पूरी तरह विषाक्त हो गया था। जीनत महल का बेटा जवांबख्श बादशाह के 16 जीवित पुत्रों में से 15वें नम्बर का था किंतु जीनत महल चाहती थी कि हर हाल में जवांबख्श ही अगला बादशाह हो। इसके लिए वह कोई भी खतरनाक काम करने को तैयार थी।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान - bharatkaitihas.com
TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

विलियम डैलरिंपल ने अपनी पुस्तक ‘द लास्ट मुगल’ में बहादुरशाह के कुछ शहजादों का उल्लेख किया है। उसके अनुसार सबसे पहले शहजादा मिर्जा दाराबख्त बहादुरशाह का उत्तराधिकारी घोषित हुआ जो कि बहादुरशाह जफर का सबसे बड़ा पुत्र था किंतु वह ई.1849 में बुखार आने से मर गया। इसके बाद मिर्जा फखरू को उत्तराधिकारी बनाया जाना था किंतु जीनत महल अपने आठ वर्षीय बेटे जवांबख्त को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित करने की जिद करने लगी तो बादशाह ने उत्तराधिकारी नियुक्त करने का प्रश्न टाल दिया।

ई.1856 में लॉर्ड डलाहौजी के स्थान पर लॉर्ड केनिंग कम्पनी सरकार का गवर्नर जनरल बनकर आया। केनिंग ने घोषणा की कि बहादुरशाह के बाद उसका उत्तराधिकारी केवल शहजादे के रूप में जाना जायेगा। उसे बादशाह की उपाधि नहीं दी जायेगी। उसे लाल किला छोड़कर महरौली वाले महल में रहना होगा तथा उसे 15 हजार रुपये प्रतिमाह मामूली पेंशन दी जाएगी। बादशाह के सबसे बड़े जीवित पुत्र मिर्जा फखरू ने अंग्रेजों की इन समस्त शर्तों को स्वीकार कर लिया। कुछ स्थानों पर इस शहजादे का नाम मिर्जा कोयास लिखा हुआ मिलता है।

भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग तथा दिल्ली के रेजीडेंट थियोफिलस मेटकाफ द्वारा की जा रही इन कार्यवाहियों से लाल किले में अँग्रेजों के विरुद्ध असन्तोष गहराने लगा। जब बहादुरशाह जफर को थियोफिलस मेटकाफ द्वारा मिर्जा फखरू को वली-ए-अहद बनाए जाने की सूचना मिली तो बादशाह ने अपरे दरबार में उपस्थित लोगों के सामने गुस्से का प्रदर्शन करते हुए कहा- ‘एक मरियल कुत्ते को गलती से भेड़िया समझा जा सकता है।’

बादशाह ने उसी समय मिर्जा फखरू का मकान, उसकी जमीन-जायदाद, ओहदा, उसके नौकर-चाकर सब छीन लिए और उन्हें मिर्जा फखरू के छोटे भाइयों में बांट दिया। बादशाह ने खुले आम यह घोषणा भी की कि जो कोई भी मिर्जा फखरू से मिलेगा, वह बादशाह का दुश्मन माना जाएगा।

बादशाह ने रेजीडेंट को भी एक पत्र लिखकर अपना रोष प्रकट किया- ‘ऐसा लगता है कि मेरे घराने का सिवाय नाम के कुछ और नहीं बचा है। बहुत खेद है कि ब्रिटिश शासन मेरी प्रसन्नताओं का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रख रहा है। इसलिए श्रेष्ठ यही होगा कि मैं ब्रिटिश शासन को और कष्ट न दूं तथा हज के लिए मक्का चला जाऊं और अपने जीवन के शेष दिन वहीं बिता दूं। मैंने यह दुनिया तो खो ही दी है, अब वो दुनिया भी क्यों खोऊं?’

ई.1856 में मिर्जा फखरू हैजे से मर गया। कहा जाता था कि उसे बेगम जीनत महल ने जहर दिलवा दिया था ताकि जवांबख्त को बादशाह का उत्तराधिकारी बनाने का रास्ता साफ हो सके।

बहादुरशाह का पुत्र मिर्जा मुगल वैसे तो पांचवे नम्बर का था किंतु जब मिर्जा फखरू की मृत्यु हुई तो जीवित शहजादों में मिर्जा मुगल ही सबसे बड़ा था। वह बेगम शरफुल महल का बेटा था जो एक सैदानी थी तथा जफर के हरम में काफी ऊंचे दर्जे पर थी। मिर्जा फखरू की मृत्यु के बाद बहादुरशाह ने मिर्जा मुगल को लाल किले का किलेदार बना दिया।

मिर्जा जफर का नौवां बेटा मिर्जा खिजर सुल्तान बहादुरशाह जफर की एक रखैल से उत्पन्न हुआ था इसलिए उसे बादशाह की नाजायज औलाद माना जाता था। वह बदचलन और आवारा किस्म का नौजवान था। वह अपने गुण्डों को भेजकर दिल्ली के किसी भी धनी-मानी व्यक्ति को उठवा लेता था तथा उससे फिरौती की राशि लेकर छोड़ देता था। ई.1857 की क्रांति के समय मिर्जा खिजर सुल्तान क्रांतिकारी सैनिकों से मिल गया किंतु बाद में दुश्मनों से रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। 

जीनत महल का बेटा जवांबख्त भी एक बिगड़ा हुआ स्वार्थी शहजादा था। उसके माता-पिता के अतिरिक्त संसार में और कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो जवांबख्त को पसंद करता हो। जब मेरठ के क्रांतिकारी दिल्ली आए तो जीनत महल ने जवांबख्त को क्रांतिकारियों से मेल-जोल करने से मना कर दिया। क्योंकि जीनत महल को आशा थी कि बगावत कुछ ही दिनों में थम जाएगी, तब जीनत महल अंग्रेजों से कहकर जवांबख्त को लाल किले का बादशाह बनवाने में कामयाब हो जाएगी।

इन दिनों लाल किले के शहजादों में मिर्जा अबू बकर भी खूब प्रसिद्ध था। वह बहादुरशाह जफर का पोता था और मरहूम शहजादे मिर्जा फखरू का बड़ा बेटा था। उसे शाही-खानदान में गुण्डे और बदमाश के रूप में जाना जाता था। बादशाह के सामने उन दिनों जो अर्जियां पेश की जाती थीं उनमें से ज्यादातर अर्जियां मिर्जा अबू बकर की बदमाशियों के बारे में होती थीं जिनमें वेश्यावृत्ति, बदमस्ती, नौकरों को कोड़े मारने, सिपाहियों पर हमला करने आदि शिकायतें होती थीं।

जब ईस्वी 1857 की क्रांति आरम्भ हुई तो मिर्जा अबू बकर ने कुछ क्रांतिकारी सिपाहियों को अपनी तरफ मिला लिया और उन्हें साथ लेकर गुड़गांव आदि क्षेत्रों में लूटपाट मचाने लगा। उसने मेरठ पर भी हमला किया किंतु वहाँ से हारकर भाग आया। अंत में गाजियाबाद के पास हिण्डन नदी के पुल पर अंग्रेजों ने उसे कड़ी शिकस्त दी।

इस समय लाल किले में बहादुरशाह जफर तथा उसकी बेगमों के साथ-साथ पूर्व बादशाहों की विधवा बेगमें, रखैलें, शहजादे एवं सलातीन भी रहते थे। बादशाह के लिए इन सबका पेट भर पाना अत्यंत कठिन था। इस कारण वे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। इस समय लाल किला इतनी जबर्दस्त आंतरिक कलह में डूबा हुआ था कि वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर भी अंग्रजों का सामना करने की स्थिति में नहीं था। न ही वह क्रांतिकारियों का नेतृत्व करने की स्थिति में था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहादुरशाह जफर का हरम

0
बहादुरशाह जफर का हरम - bharatkaitihas.com
बहादुरशाह जफर का हरम

लाल किला गरीब था किंतु बहादुरशाह जफर का हरम आबाद था!

जब ईस्वी 1803 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार किया था तब लाल किला नितांत गरीब एवं असहाय था। बादशाह शाहआलम (द्वितीय) अंधा और बूढ़ा था किंतु जब ई.1806 में उसका पुत्र अकबरशाह (द्वितीय) बादशाह बना तो लाल किले की रंगीनियां लौट आईं।

पतन के गर्त में पोर-पोर डूब चुकी सल्तनत के मालिक होने के बावजूद बहादुरशाह जफर का हरम फिर से औरतों से भरने लगा था। बादशाह की अय्याशियां दिल्ली के नए मालिकों अर्थात् अंगेजों को भी प्रभावित करती थीं।

दिल्ली का पहला अंग्रेज रेजीडेंट डेविड ऑक्टरलोनी मुगल बादशाह की तरह जामा और पगड़ी पहनकर हाथी पर बैठकर दिल्ली की सड़कों पर निकला करता था। उसकी तेरह हिन्दुस्तानी बीवियां थीं। उसकी बेगमों में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख एवं ईसाई आदि सभी धर्मों की औरतें शामिल थीं।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान - bharatkaitihas.com
TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

ऑक्टरलोनी की प्रमुख बेगम का नाम बीबी महरुतन मुबारकुन्न्सिा बेगम था। वह ऑक्टरलोनी की बेगमों में ससबे कम उम्र की थी तथा बूढ़े जनरल को अंगुलियों पर नचाया करती थी। जब तक ऑक्टरलोनी दिल्ली का रेजीडेंट रहा, दिल्ली की वास्तविक शासक यही महरुतन मुबारकुन्न्सिा बेगम रही।

वास्तव में वह पूना में नाचने वाली एक ब्राह्मण लड़की थी जो बाद में मुसलमान बना दी गई थी। डेविड ऑक्टरलोनी संध्या काल में हाथी पर बैठकर तथा अपनी तेरह बेगमों को अलग-अलग हाथी पर बैठा कर लाल किले की चार दीवारी के चारों ओर बनी सड़क पर हवाखोरी करने निकलता था।

भारत के कला संग्रहालयों में डेविड ऑक्टरलोनी के बहुत से चित्र देखने को मिलते हैं जिनमें वह अपने दरबार में मसनद के सहारे अधलेटा होकर चांदी का हुक्का गुड़गुड़ाता हुआ दिखाई देता है। इस तरह और भी अंग्रेज अधिकारी थे जो उस जमाने में मुगल बादशाहों के हरम तथा उसकी संस्कृति की नकल करके स्वयं को कृतार्थ समझने लगे थे। दिल्ली का रेजेडेंट थियोफिलस मेटकाफ सुबह नाश्ता करने के बाद आधे घण्टे तक चांदी का हुक्का गुड़गुड़ाया करता था।

जब तक बहादुरशाह जफर बादशाह बना तब तक बादशाह को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तरफ से पन्द्रह लाख रुपया सालाना पेंशन मिलने लगी थी। बादशाह को लगभग अठारह लाख रुपए की वार्षिक आय अपनी निजी सम्पत्तियों के किराए से मिल जाती थी। बादशाह इस आय में से अपने हरम से लेकर, शहजादों एवं सलातीनों को उनके निजी खर्च के लिए हर महीने रुपए बंटवाता था। शाही परिवार के कुछ सदस्य लखनऊ में भी रहते थे, उन्हें भी बादशाह एक हजार रुपए प्रतिमाह भिजवाता था।

1850 के दशक में बादशाह बहादुरशाह जफर के शहजादों की आर्थिक स्थिति भले ही खराब हो किंतु बादशाह का अपना हरम पूरी तरह गुलजार था। उसकी चार विवाहिता बेगमों के साथ-साथ बहुत सी चहेती स्त्रियां भी रहती थीं जिन्हें इतिहासकारों ने बादशाह की रखैलें कहकर सम्बोधित किया है।

बादशाह का अधिकांश समय हरम में ही गुजरता था। विलियम डैलरिंपल ने लिखा है कि ई.1853 में कम से कम पांच ऐसी औरतें थीं जो बहादुरशाह की खिदमत अंजाम देती थीं। क्योंकि उसी साल जुलाई में जफर ने चांदी के पांच जोड़ी पलंग बनवाए थे। जफर के हरम में हर समय खूब रौनक रहती थी तथा उसके अस्सी साल के होने तक हरम इसी तरह गुलजार रहा।

विलियम के अनुसार जफर के 16 बेटियां और 31 बेटे थे। उसके अंतिम पुत्र अब्बास के जन्म के समय बादशाह पूरे सत्तर साल का था। जफर का हरम अनुशासन और सुरक्षा की कमी के कारण काफी बदनाम था। एक बार बादशाह की खास रखैल पिया बाई तानरस खान नामक एक दरबारी से गर्भवती हो गई। कई अन्य रखैलों पर भी कई बार खुले आम आपत्तिजनक आरोप लगे।

शहजादे जवांबख्त के विवाह से दो माह पहले एक सिपाही जो किले के यमुना के नीचे के किनारे खुलने वाले पानी दरवाजे के पहरे पर था, वह बादशाह के हरम की एक दासी से प्रेम करने लगा तथा उससे मिलने के लिए चोरी-छिपे बादशाह के महल में जाने लगा। यह दासी बहादुरशाह की भी रखैल थी।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब यह बात बादशाह तक पहुंची तो उसने सिपाही को पकड़वाकर उसमें कोड़े लगवाए तथा जंजीरों से बांधकर जेल में डलवा दिया। दासी को चक्की पीसने की सजा दी गई। लाल किले की 1 फरवरी 1852 की दैनिक डायरी में लिखा है कि- ‘बादशाह ने किले के प्रबंधक को बुलाकर उससे कहा कि बादशाह जनाने के प्रबंध से बेदह अप्रसन्न है। सारे चौकीदार और चोबदार हर समय गायब रहते हैं। इस कारण बाहर के लोग आसानी से जनाने में आ-जा सकते हैं।’

बादशाह की रखैल चांदबाई ने बादशाह को बताया कि ख्वाजासराओं द्वारा रोके जाने के बावजूद नबी बख्श जबरदस्ती सुल्तान बाई के घर में घुस गया। ऐसा लगता है कि उस समय जनानखाने में बिल्कुल अफरा-तफरी मच गई।

विलियम ने लिखा है- ‘बहादुरशाह में कई खूबियां हो सकती हैं किंतु हरम को काबू में रखना उसके वश में नहीं था।’

मुगलों का हरम धरती भर में सबसे अधिक चमक-दमक वाली एवं मजबूत संस्था हुआ करता था किंतु बादशाह की तमाम रंगीन तबियत के बावजूद उसका हरम गुजरे हुए जमाने का खण्डहर मात्र ही प्रतीत होता था। शहजादे भी हरम में ही रहते थे। उन्हें पढ़ाई-लिखाई सीखने, शिकार पर जाने, कबूतरवाजी या बेटेरबाजी करने की पूरी छूट थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भूखे-नंगे शहजादे

0
भूखे-नंगे शहजादे - bharatkaitihas.com
भूखे-नंगे शहजादे

अठारह सौ सत्तावन के लाल किले दो हजार भूखे-नंगे शहजादे बंद थे! इन शहजादों को सलातीन कहा जाता था। इनकी जिंदगी दिल्ली के किसी मुसलमान मजदूर से भी बुरी थी।

अठारह सौ सत्तावन के लाल किले में केवल बादशाह, उसकी बेगमें और उनके शहजादे ही नहीं रहते थे, अपितु लगभग दो हजार सलातीन भी लाल किले के स्थाई निवासी थे। भूखे-नंगे शहजादे अर्थात् सलातीनों में बाबर से लेकर बहारुदरशाह जफर के पूर्ववर्ती तमाम मुगलिया बादशाहों की औलादों की औलादें, पोतों के पोते, पड़पोतों के पड़पोते, पीढ़ी दर पीढ़ी बूढ़ी होती जा रही, जवान, किशोरी और शिशु शहजादियां सम्मिलित थीं। लाल किले में रह रहे सलतीनों की संख्या इस समय लगभग दो हजार थी।

ये भूखे-नंगे शहजादे चूंकि तैमूरी और चंगेजी शाही खानदान के थे, इसलिए कोई काम नहीं करते थे। सेनाएं भंग हो चुकी थीं, अन्यथा यही शहजादे मुगल सेनाओं के बड़े-बड़े जनरल, सूबेदार और आला अफसर होते किंतु अब वे बादशाह से मिलने वाली पेंशन पर अपना गुजारा किया करते थे।

जब तक सल्तनत कायम थी तब तक सलातीनों की जिंदगी बेहतर थी किंतु जैसे ही ई.1739 में नादिरशाह लाल किले को लूटकर और शाही खजाने में झाड़ू लगाकर चला गया, तब से इन सलातीनों की हालत खराब होने लगी और वे गरीबी तथा अभाव में अपना जीवन बिताने लगे। ये भूखे-नंगे शहजादे मानवता के नाम पर काला दाग थे, उससे अधिक कुछ नहीं थे।

ई.1754 में जब मीरबख्शी गाजीउद्दीन इमादुलमुल्क ने बादशाह अहमदशाह बहादुर को अंधा करके जेल में डाला था और आलमगीर (द्वितीय) को बादशाह बनाया था, तब से बादशाह की आय निरंतर घटती जा रही थी और लाल किले में सलातीनों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी। इस कारण भी सलातीनों की जिंदगी नारकीय हो गई।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

चूंकि इन सलातीनों के परिवार कुछ नहीं करते थे इसलिए सलातीन और उनके परिवारों के सदस्य हर समय किसी न किसी बात पर आपस में झगड़ते रहते थे। अशिक्षा, गरीबी एवं बेरोजगारी के कारण सलातीनों के परिवार अशिक्षित, अर्द्धसभ्य एवं झगड़ालू बन चुके थे। इस कारण लाल किले का मुख्य हिंजड़ा महबूब अली, बेगम जीनत महल के कान भर कर उन्हें सजा दिलवाता रहता था।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान - bharatkaitihas.com
TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

अंग्रेजों के दिल्ली में आ जाने से दरियागंज तथा चांदनी चौक सहित शाहजहानाबाद का अधिकांश हिस्सा नई रौनकों से गुलजार हो उठा था किंतु सलातीनों के लिए वहाँ जाकर अपना भाग्य नए सिरे से तलाशना संभव नहीं था। अधिकतर सलातीन अपनी तंग कोठरियों में बंद रहते थे, उन्होंने शायद ही कभी बहादुरशाह जफर की रंगीन जिंदगी को अपनी आंखों से देखा था। क्योंकि किसी भी सलातीन को उस ऊंची दीवार को फांदकर लाल किले के उस हिस्से में आने की अनुमति नहीं थी जिस हिस्से में बादशाह का हरम था, रूप से दमदमाती जवान औरतें थीं, बांके शहजादे थे और स्वयं बहादुरशाह जफर का दरबार था।

एक अंग्रेज द्वारा लिखे गए विवरण के आधार पर विलियम डैलरिम्पल ने लिखा है- ‘सलातीन के निवास में एक बहुत ऊंची दीवार है ताकि कोई उनको नहीं देख पाए। इसके अंदर उनके लिए छप्पर वाली अनेक झौंपड़ियां हैं। जहाँ यह बेचारे रहते हैं। जब दरवाजे खुले तो बहुत से अधनंगे, भूखे, मुसीबत जदा लोगों ने हमको घेर लिया। उनमें से कुछ तो अस्सी साल के थे और बिल्कुल प्राकृतिक अवस्था में थे, अर्थात् नंगे थे।’

बादशाह बहादुरशाह जफर के मन में तैमूरी और चंगेजी खानदान की इन उम्दा नस्लों के लिए कोई हमदर्दी नहीं थी। बादशाह का विचार था कि लाल किले में हो रही अधिकतर चोरियों और झगड़ों के लिए केवल सलातीन जिम्मेदार हैं।

एक बार एक चोर किले की दीवार पर देखा गया। जब बादशाह को यह बात बताई गई तो उसने कहा कि अवश्य ही वह कोई सलातीन होगा। वे एक-दूसरे के यहाँ चोरी करते हैं और शराब पीकर झगड़ा करते हैं।

जब बादशाह को सूचना दी गई कि जूनियर सलातीनों में से एक मिर्जा महमूद सुल्तान पागल हो गया है और रात के समय किले में घूमता रहता है तो बादशाह ने तुरंत आदेश दिया कि उसके पैरों में जंजीरें डालकर कैद कर दिया जाए। जब कभी सलातीन बगावत कर देते तो बादशाह के सामने बहुत बड़ी कठिनाई उत्पन्न हो जाती। दो बार उन सबने मिलकर अंग्रेज रेजीडेंट को अर्जी भिजवाई कि उनके बुनियादी अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

ईस्वी 1847 में जब बहादुरशाह को गद्दी पर बैठे हुए 10 साल हो गए तब सलातीनों ने अंग्रेज रेजीडेंट मेटकाफ को प्रार्थनापत्र भिजवाया कि उन पर जुल्म किया जा रहा है।दिल्ली के बादशाह के व्यवहार और स्वभाव के कारण हमारी पस्थितियां अत्यंत निर्धन और अपमानयुक्त हो गई हैं। बादशाह के केवल गलत नौकरों की बात सुनते हैं तथा ख्वाजासरा महबूब अली हमें तरह-तरह अपमानित करता है।

इसके एक साल बाद फिर सलातीन ने एक और बगावत की। इस समय उत्तर-पश्चिम सूबों का अंग्रेज लेफ्टिनेंट गवर्नर दिल्ली आया। उस वक्त एक चर्मी कागज उसके समक्ष प्रस्तुत किया गया जिस पर डेढ़ सौ से अधिक सलातीन की मुहर लगी हुई थी। इसमें गवर्नर से प्रार्थना की गई थी कि वे सलातीन की रक्षा करें तथा बहादुरशाह जफर ने वली अहद को मैटकाफ से मिलने तथा सलातीन की मुसीबतों के बारे में बात करने से मना कर दिया है।

अंग्रेज इतिहासकार रसेल ने उस काल के लाल किले के भीतर रह रहे मुगलों की दयनीय अवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘हमने उनकी दुर्दशा करके उन पर गरीबी और कर्ज लादकर उन्हें महल में बंद कर दिया और उन पर आरोप लगाया कि वे आलसी, नीच और इंद्रिय परायण हैं। हमने उनसे हर इज्जत और महत्वाकांक्षा छीन ली है।’

इस प्रकार जिस समय बादशाह ने मेरठ से आए क्रांतिकारियों के कहने से क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार किया, उस समय लाल किले तथा कम्पनी सरकार के बीच तनाव अपने चरम पर था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सर चार्ल्स मेटकाफ

0
सर चार्ल्स मेटकाफ - bharatkaitihas.com
सर चार्ल्स मेटकाफ

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में इंग्लैण्ड से बहुत से परिवार आकर भारत में बस गए थे। ये अंग्रेज कम्पनी में बड़े-बड़े पदों पर काम करते थे। सर चार्ल्स मेटकाफ का परिवार भी उनमें से एक था। मेटकाफ परिवार ने लाल किले को दयनीय बना दिया था!

अंग्रेजों ने ई.1803 में दिल्ली पर अधिकार किया था। तब से ही वे लाल किले की जड़ें खोदकर लाल किले को कमजोर करते आ रहे थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में भेजे जाने वाले अंग्रेज लड़के 18-20 साल से लेकर 20-25 साल की आयु के होते थे जो रातों-रात अमीर बन जाने के लालच में अपना देश छोड़कर सात समंदर पार करके भारत आया करते थे।

ये अंग्रेज लड़के कम्पनी सरकार में बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त किये जाते थे। इन्हें जीवन का कोई अनुभव नहीं होता था। इनमें से अधिकांश लड़के निहायत ही बदतमीज, बददिमाग और लालची होते थे। वे भारत की अपार सम्पदा, बड़े-बड़े महलों तथा हीरे-मोतियों के ही भूखे नहीं होते थे, अपितु भारतीय औरतों पर भी कुदृष्टि रखा करते थे।

भारत में नियुक्त होकर आए इन्हीं लड़कों में से एक था सर चार्ल्स मेटकाफ जो 19 वर्ष की आयु में ई.1804 में जनरल लेक का पॉलिटिकल असिस्टेंट नियुक्त हुआ था। यह वही जनरल लेक था जिसने ई.1803 में दिल्ली पर आक्रमण करके मराठों को परास्त किया था।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

ईस्वी 1811 से 1819 तथा 1826 से 1832 तक दिल्ली का रेजीडेंट रहा सर चार्ल्स मेटकाफ अत्यंत चालाक व्यक्ति था। उसने शालीमार बाग में अपने लिए एक शानदार बंगला बनवा रखा था और एक खूबसूरत सिक्ख लड़की से विवाह करके उस बंगले में रहा करता था। वह बादशाह के साथ तमीज से पेश आता था किंतु उसकी कोई बात नहीं मानता था तथा बादशाह की गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण रखता था। कुछ दिन बाद उसने अपनी हिन्दुस्तानी पत्नी को छोड़ दिया तथा अंग्रेजी मेम के साथ रहने लगा।

चार्ल्स मेटकाफ शुरु में तो लाल किले में बैठे मुगल बादशाह अकबर शाह को सम्मान देता था किंतु बाद में उसे नापसंद करने लगा था। एक स्थान पर चार्ल्स मेटकाफ ने लिखा है – ‘मैंने तैमूर घराने से अपनी पहले की वफादारी छोड़ दी है।’

ई.1813 में चार्ल्स मेटकाफ ने अपने छोटे भाई सर थॉमस मेटकाफ को भी इंग्लैण्ड से भारत बुला लिया तथा अपने कार्यालय में उच्च पद पर नियुक्त कर दिया।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान - bharatkaitihas.com
TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जब ई.1832 में चार्ल्स मेटकाफ दिल्ली छोड़कर कलकत्ता चला गया और ईस्ट इण्डिया कम्पनी की कलकत्ता कौंसिल का सदस्य बन गया तो उसके स्थान पर हार्वे दिल्ली का रेजीडेंट बना। उस समय बादशाह द्वारा दिल्ली के रेजीडेंट को जो पत्र लिखा जाता था, उसमें रेजीडेंट को ‘फरजंदे अंजुमंद’ कहा जाता था जिसका अर्थ होता है- ‘प्रिय पुत्र!’ नए रेजीडेंट को यह सम्बोधन पसंद नहीं था। वह तो स्वयं को बादशाह का मालिक समझता था। इसलिए हार्वे ने बादशाह को बात-बात पर अपमानित करना आरम्भ किया ताकि बादशाह स्वयं ही नाराज होकर रेजीडेंट को ‘फरजंदे अंजुमंद’ लिखना बंद कर दे।

अंग्रेज रेजीडेंट अब तक बादशाह को अपने पत्रों के आरम्भ में ‘योअर मेजस्टी’ कहकर सम्बोधित करते थे तथा पत्र के अंत में ‘योअर मेजस्टी’ज फेथफुल सर्वेंट’ लिखा करते थे किंतु अब वे अपने पत्रों के आरम्भ में बादशाह के लिए ‘डीयर’ शब्द का प्रयोग करने लगे। इस प्रकार रेजीडेंट हार्वे ने बादशाह को अच्छी तरह याद करवा दिया कि अब अकबरशाह हिंदुस्तान का बादशाह नहीं है, उसे तो बादशाह के नाम से केवल याद किया जाता है।

हालांकि गवर्नर जनरल द्वारा बादशाह को लिखे जाने वाले पत्रों में अब भी जो मुहर लगती थी, उसमें गवर्नर जनरल स्वयं को ‘फिदवी ए खास’ अर्थात् ‘मुख्य सेवक’ लिखता था।

रेजीडेंट हार्वे के बाद पूर्ववर्ती रेजीडेंट सर चार्ल्स मेटकाफ का भाई सर थॉमस मेटकाफ ईस्वी 1835 में दिल्ली का रेजीडेंट नियुक्त हुआ। वह 18 साल तक अर्थात् ई.1853 तक इस पद पर रहा। इस बीच ईस्वी 1837 में अकबरशाह की मृत्यु हो गई तो उसने अकबरशाह के पुत्र बहादुरशाह जफर की सहायता की ताकि बहादुरशाह बादशाह बन सके जबकि अकबरशाह अपने बड़े पुत्र जहांगीर को बादशाह बनाना चाहता था।

ईस्वी 1852 में मिजेली जॉन जेनिंग्स नामक एक ईसाई पादरी दिल्ली में नियुक्त होकर आया। उसने लाल किले में ही रहने का निश्चय किया ताकि वह लाल किले में रहने वाले शाही परिवार के साथ घुल-मिलकर उसे ईसाई बन सके। मिजेली जॉन जेनिंग्स ईसाई धर्म के प्रचार के लिए इतना उतावला था कि वह तुरंत ही समस्त भारतीयों को ईसाई बना देना चाहता था। यहाँ तक कि स्वयं अंग्रेज भी उसे पसंद नहीं करते थे और उसे धर्मांध कहते थे। जब उसने दिल्ली के दो विख्यात हिन्दुओं- चमनलाल और मास्टर ताराचंद को ईसाई बना लिया तो मिजेली जॉन जेनिंग्स पूरी दिल्ली में बदनाम हो गया।

ईस्वी 1853 में बहादुरशाह जफर की सबसे छोटी बेगम जीनत महल ने सर थॉमस मेटकाफ से सम्पर्क किया तथा उससे कहा कि वह जीनत के पुत्र जवांबख्श को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित कर दे। शहजादा जवांबख्श बहादुरशाह के 16 बेटों में से 15वां था। इसलिए सर थॉमस मेटकाफ ने जीनत का प्रस्ताव ठुकरा दिया तथा यहाँ तक कह दिया कि बहादुरशाह जफर अंतिम बादशाह है, उसके बाद कोई बादशाह नहीं होगा।

सर थॉमस मेटकाफ ने बादशाह की इच्छा के विरुद्ध, बहादुरशाह के सबसे बड़े जीवित पुत्र मिर्जा फखरू को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों द्वारा मिर्जा फखरू से संधि की गई कि वह अपने पिता की मृत्यु के बाद दिल्ली का लाल किला खाली कर देगा, स्वयं को बादशाह नहीं कहेगा तथा एक लाख रुपये के स्थान पर 15 हजार रुपये मासिक पेंशन स्वीकार करेगा।

इस पर बेगम जीनत महल ने ई.1853 में रेजीडेंट थॉमस मेटकाफ को जहर दे दिया जिससे थॉमस मेटकाफ की मृत्यु हो गई। डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि सर थॉमस मेटकाफ की मृत्यु मैदे की खराबी से हुई थी किंतु उनका यह भी विचार था कि यह खराबी जहर के कारण हुई थी। इस घटना के बाद लाल किले तथा अंग्रेजों के बीच इतने दिन से सदाशयता का जो प्रदर्शन चल रहा था, वह भी जाता रहा।

इस घटना के तीन साल बाद ई.1856 में शहजादा मिर्जा फखरू भी हैजे से मर गया। उसके बारे में लाल किले में यह अफवाह उड़ी कि शहजादे को जहर दिया गया था।

जिस समय ई.1857 की बगावत हुई तब थॉमस मेटकाफ का बेटा सर थियोफिलस मेटकाफ दिल्ली में कम्पनी सरकार की अदालत में लोअर मजिस्ट्रेट था। उस समय वह अकेला अंग्रेज अधिकारी था जो क्रांतिकारी सैनिकों से बचकर दिल्ली छोड़कर भाग जाने में सफल हुआ था। पहाड़गंज पुलिस स्टेशन के थानेदार मुइनुद्दीन खाँ ने थियोफिलस मेटकाफ को दिल्ली से जीवित ही निकल भागने में सहायता की थी। यह थानेदार उर्दू के विख्यात शाइर मिर्जा गालिब का चचेरा भाई था।

कुछ माह बाद जब अंग्रेजों ने दुबारा दिल्ली पर हमला किया तब सर थियोफिलस मेटकाफ कम्पनी सरकार की दिल्ली फील्ड फोर्स में भरती हो गया तथा उसने लाल किले में बहुत रक्त-पात मचाया।

सर थॉमस मेटकाफ का एक जंवाई भी उन दिनों दिल्ली में तैनात था जिसका नाम सर एडवर्ड कैंपबैल था। वह दिल्ली में नियुक्त ब्रिटिश सेना का कमांडर इन चीफ था। जब उसकी रेजीमेंट ने विद्रोह किया तब वह भी दिल्ली से भाग खड़ा हुआ और बाद में दिल्ली फील्ड फोर्स में भरती होकर दिल्ली लौटा। उसने अंग्रेजों की सेना को दिल्ली में थामे रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली में खूनी क्रांति

0
दिल्ली में खूनी क्रांति - bharatkaitihas.com
दिल्ली में खूनी क्रांति

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति की आग भले ही बंगाल, मेरठ और कानपुर में सुलगी हो किंतु इस आग ने दिल्ली में खूनी क्रांति का रूप ले लिया। क्रांतिकारियों के हौंसले देखकर बहादुरशाह जफर ने राष्ट्रव्यापी क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया!

11 मई 1857 को दिल्ली की सड़कों पर सवेरा अभी उतर ही रहा था, जीवन की हलचल अभी आरम्भ भी नहीं हुई थी कि तभी मेरठ से आए सिपाहियों का एक दस्ता चुपचाप यमुना पार करके दिल्ली शहर में पहुंचा। इन सैनिकों ने चुंगी के एक दफ्तर में आग लगा दी और फिर लाल किले की तरफ बढ़ गए।

सिपाहियों के शहर में प्रवेश करते ही दिल्ली जैसे नींद से जाग उठी। दिल्ली के बहुत से लोग भीड़ के रूप में इन सिपाहियों के पीछे हो लिए। भविष्य में होने वाली किसी बड़ी घटना के बारे में सोचकर सब रोमांचित थे। यह दिल्ली में खूनी क्रांति की शुरुआत थी।

राजघाट दरवाजा पार करके ये सिपाही लाल किले के भीतर पहुंचे। सिपाहियों का यह दस्ता बादशाह से अपील करने आया था कि बादशाह इन सिपाहियों का नेतृत्व स्वीकार करे तथा कम्पनी सरकार को भारत से बाहर निकालकर भारत का शासन ग्रहण करे।

बहादुरशाह जफर इस समय 69 वर्ष का हो चुका था तथा इस अवस्था में नहीं था कि वह किसी युद्ध या क्रांति में भाग ले फिर भी बहादुरशाह ने मेरठ से आए क्रांतिकारी सैनिकों से बात की। उसने क्रांतिकारी सैनिकों से स्पष्ट कहा- ‘मेरे पास इतना धन नहीं है कि मैं तुम्हें वेतन दे सकूं। न मेरे पास कोई सल्तनत है जिसकी अमलदारी में तुम्हें रख सकूं। ‘

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

क्रांतिकारी सिपाहियों ने बादशाह से कहा- ‘हम अपना मजहब और विश्वास बचाने के लिए जमा हुए हैं। हमें बादशाह से वेतन नहीं चाहिए। हम आपके पाक कदमों पर अपनी जान कुर्बान करने आए हैं, आप तो केवल हमारे सिर पर हाथ रख दें।’

बादशाह ने उनकी यह बात मान ली। इस प्रकार 12 मई 1857 को मेरठ से आए क्रांतिकारियों के अनुरोध पर बहादुरशाह जफर ने क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया। बादशाह की तरफ से एक ऐलान जारी किया गया कि- ‘यह एक मजहबी जंग है और मजहब के नाम पर लड़ी जा रही है। इसलिए तमाम शहरों और गांवों के हिन्दुओं और मुसलमानों का फर्ज है कि वे अपने-अपने मजहब और रस्मो-रिवाज पर कायम रहें और उनकी हिफाजत करें।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

दिल्ली में खूनी क्रांति करने के इच्छुक क्रांतिकारी सैनिकों ने लाल किले में प्रवेश करके बादशाह को 21 तोपों की सलामी दी तथा उसे फिर से सम्पूर्ण भारत का बादशाह घोषित कर दिया। लाल किले पर एक बार फिर से मुगलों का झण्डा गर्व से फहराने लगा। क्रांतिकारी सैनिकों के अनुराध पर बादशाह ने दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों को लिखित आदेश भिजवाए कि वे दिल्ली में स्थित समस्त अंग्रेजी शस्त्रागार बादशाह को सौंप दें। दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों ने बादशाह के ये आदेश मानने से मना कर दिया। इस पर शस्त्रागारों में नियुक्त भारतीय सिपाहियों ने अंग्रेजों से बगावत करके उन्हें मारना आरम्भ कर दिया। अंग्रेज अधिकारी समझते थे कि यदि दिल्ली के शस्त्रागारों का गोला-बारूद क्रांतिकारी सैनिकों के हाथों में पहुंच गया तो अंग्रेजों के शासन को समाप्त होने से नहीं रोका जा सकेगा। इसलिए दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों ने दिल्ली में स्थित समस्त शस्त्रागारों में स्वयं ही आग लगा दी। इन शस्त्रागारों में रखे बारूद में विस्फोट हो जाने से पूरी दिल्ली धमाकों से दहल गई। क्रांतिकारी सैनिकों ने कर्नल रिपले सहित अनेक अँग्रेज अधिकारियों को मार डाला तथा दिल्ली पर अधिकार कर लिया।

अंग्रेज अधिकारियों के शस्त्र छीनकर क्रांतिकारी सैनिकों में बांट दिए। भले ही क्रांतिकारी सैनिकों के हाथ शस्त्रागारों का गोला-बारूद नहीं लग सका फिर भी यह क्रांतिकारी सैनिकों की बहुत बड़ी विजय थी क्योंकि एक तरह से उन्होंने दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों को निहत्था कर दिया था।

क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली में स्थित उन समस्त अंग्रेज अधिकारियों को मार दिया जिन्होंने क्रांतिकारी सैनिकों का विरोध किया। 12 मई से 16 मई 1857 तक की अवधि में दिल्ली को पूरी तरह से अंग्रेजों से मुक्त करवा लिया गया। दिल्ली के समस्त सरकारी भवनों पर बादशाह का नीला झण्डा लहराने लगा।

बहादुरशाह ने दिल्ली में इस क्रांति का नेतृत्व नाम-मात्र के लिये किया। वास्तविक नेतृत्व उसके सेनापति बख्त खाँ ने किया जिसकी बाद में 13 मई 1859 को अँग्रेजों से युद्ध करते हुए मृत्यु हुई। मेरठ तथा दिल्ली के समाचार अन्य नगरों में भी पहुँचे जिससे उत्तरी भारत के अधिकांश भागों में विद्रोह फैल गया।

पेशवा नाना साहब (द्वितीय) ने कानपुर पर अधिकार करके स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया। बुन्देलखण्ड में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने, मध्य भारत में तात्या टोपे नामक मराठा ब्राह्मण ने तथा बिहार में जगदीशपुर के जमींदार कुंवरसिंह ने क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया। अवध, कानपुर, आगरा, अलीगढ़, बरेली, मथुरा आदि नगर विद्रोह के प्रमुख केन्द्र बन गये।

दिल्ली क्रांति का मुख्य केन्द्र थी। क्रांतिकारी सैनिक पूर देश से आ-आकर दिल्ली में जमा होने लगे। उनके रेले के रेले आते जाते थे और दिल्ली की रिज पर एकत्रित होते जाते थे। क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली की जनता को अपने पक्ष में करने के लिए चांदनी चौक पर एक सभा की तथा उसमें दिल्ली के लोगों से पूछा- ‘भाइयो! क्या तुम मजहब वालों के साथ हो?’

मजहब नामक मुद्रा हर युग में और धरती के हर कौने पर कभी न बंद होने वाली मुद्रा है, जिसे कभी भी चलाया जा सकता है। यहाँ भी बखूबी चल गई। दिल्ली में खूनी क्रांति के समय मजहब का सिक्का तेजी से चलने का एक कारण यह भी था कि अंग्रेजों ने कुछ ही समय पहले दिल्ली के समस्त मदरसों को बंद कर दिया था। इसलिए दिल्ली के मुसलमानों को लगता था कि अंग्रेज उनके मजहब को नष्ट करना चाहते हैं।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि यद्यपि क्रांतिकारी सैनिकों में अधिकतर हिन्दू थे तथापि दिल्ली में जेहाद का ऐलान जामा मस्जिद से किया गया। बहुत से बागी सिपाही जो कि हिन्दू थे, स्वयं को मुजाहिद, गाजी और जिहादी कहते थे। देश भर से आने वाले इन क्रांतिकारियों की संख्या बढ़ती ही चली गई जो बड़े गर्व से स्वयं को मुजाहिद, जिहादी और गाजी कहते थे। ये सब मरने-मारने की इच्छा से आए थे और दिल्ली में खूनी क्रांति के बल पर भारत से अंग्रेजों का राज्य मिटाना चाहते थे।

ग्वालियर से आए गाजियों अर्थात् क्रांतिकारी सैनिकों के एक दल ने खुदकुशी करने की इच्छा व्यक्त की। अर्थात् उन्होंने घोषणा की- ‘वे दिल्ली में भोजन नहीं करेंगे। वे यहाँ भोजन करने नहीं आए हैं अपितु काफिर अंग्रेजों को नष्ट करने के लिए आए हैं। इसलिए हम केवल लड़ेंगे और जंग खत्म होने तक लड़ते रहेंगे। वे जो मरने के इरादे से आते हैं, उन्हें खाने की कोई जरूरत नहीं है।’

दिल्ली से भागे अंग्रेज अधिकारियों ने दिल्ली की निकटवर्ती पहाड़ी पर शरण ले रखी थी। उन्हें लगता था कि जनरल व्हीलर कानपुर से अंग्रेज सेना लेकर दिल्ली के लिए निकल पड़ा है किंतु उन्हें ज्ञात नहीं था कि पेशवा नाना साहब तथा अवध के सैनिकों ने व्हीलर से हथियार रखवा लिए हैं।

अंग्रेज अधिकारियों के बीच में यह अफवाह भी फैल गई थी कि ईरान से दो सेनाएं दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों की सहायता के लिए आ रही हैं। इनमें से एक सेना खैबर दर्रे से तथा दूसरी सेना उत्तर-पूर्वी समुद्री मार्ग से चलकर बम्बई होते हुए दिल्ली पहुंचेगी किंतु ये केवल अफवाहें थीं, ऐसी कोई सेनाएं थी ही नहीं!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...