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कानपुर की क्रांति

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कानपुर की क्रांति - bharatkaitihas.com
कानपुर की क्रांति

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में कानपुर की क्रांति महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस क्रांति का नायक नाना साहब पेशवा था। पेशवा की सेना ने गंगा नदी में घुसकर सैंकड़ों अंग्रेजों को मार डाला!

जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार ने नाना साहब को पेशवा मानने और पेंशन देने से मना कर दिया तथा नाना साहब पेशवा के मंत्री अजीमुल्ला खाँ को इंग्लैण्ड से निराश लौटा दिया तो नाना साहब ने उत्तर भारत के महत्वपूर्ण रजवाड़ों एवं सैनिक छावनियों में घूम-घूमकर भावी क्रांति की योजना का प्रचार किया। नाना साहब ने कानपुर के अंग्रेज कलक्टर को विश्वास में लेकर डेढ़ हजार सिपाहियों की एक निजी सेना खड़ी कर ली ताकि यदि कभी कोई बगावत हो तो नाना की सेना कानपुर की अंग्रेज सेना की सहायता कर सके।

हालांकि क्रांति की तिथि 31 मई 1857 निश्चित की गई थी किंतु क्रांति का सूत्रपात 29 मार्च 1857 को बैरकपुर के भारतीय सैनिकों द्वारा कर दिया गया। 3 मई 1857 को लखनऊ में भी विद्रोह हो गया। 10 मई 1857 को मेरठ में भी विद्रोह हो गया। 5 जून 1857 को झांसी में विद्रोह हो गया। इस प्रकार यह क्रांति कई स्थानों पर फूट पड़ी।

5 जून 1857 को कम्पनी सरकार के कानपुर में स्थित भारतीय सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। इस कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी तथा उनके परिवार कानपुर शहर के उत्तरी भाग में बनी खंदकों में छिप गए। इस प्रकार कानपुर की क्रांति आरम्भ हो गई।

विद्रोही सैनिक अपने हथियार लेकर कानपुर से दिल्ली के लिए रवाना हो गए। नाना साहब इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था। उसकी सेना ने उसी समय बिठूर से कानपुर आकर नगर के उत्तरी भाग में स्थित अंग्रेजी शस्त्रागार में प्रवेश कर लिया।

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अंग्रेजी शस्त्रागार की सुरक्षा के लिए तैनात 53वीं रेजीमेंट ने सोचा कि नाना साहब के सिपाही कम्पनी के अधिकारियों द्वारा शस्त्रागार की रक्षा के लिए भेजे गए हैं। इसलिए उन्होंने नाना साहब की सेना को बिना किसी रुकावट के शस्त्रागार में प्रवेश करने दिया।

नाना साहब की सेना ने शस्त्रागार पर अधिकार करके घोषणा की कि वे भी कम्पनी सरकार के विरुद्ध लड़ रहे क्रांतिकारी सैनिकों के साथ हैं। इसके बाद नाना साहब के सैनिकों ने कानपुर में स्थित अंग्रेजी कोषागार पर अधिकार कर लिया और घोषणा की कि उसने पेशवा के अधीन मराठा संघ को पुनर्जीवित कर दिया है तथा उसका लक्ष्य बहादुरशाह (द्वितीय) को फिर से भारत का बादशाह बनाना है। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि नाना साहब के नेतृत्व में हुई कानपुर की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार को बड़े संकट में डाल दिया।

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जब कानपुर कानपुर की क्रांति के क्रांतिकारी सैनिक कल्यानपुर पहुंचे तो नाना साहब ने उनसे भेंट की। क्रांतिकारी सैनिक बहादुरशाह जफर से मिलने दिल्ली जा रहे थे। नाना साहब ने इन क्रांतिकारियों से कहा कि वापस कानपुर चलो ताकि हम मिलकर अंग्रेजों को परास्त कर सकें किंतु क्रांतिकारी सैनिकों ने नाना साहब की बात मानने से मना कर दिया। इस पर नाना साहब ने उन्हें भरोसा दिया कि यदि वे नाना साहब की सेना में शामिल होते हैं तो उन्हें दोगुना वेतन दिया जाएगा। इस पर क्रांतिकारी सैनिक नाना साहब की तरफ हो गए। 6 जून 1857 को नाना साहब की सेना ने क्रांतिकारी सैनिकों के साथ मिलकर कानपुर की अंग्रेजी सेना पर हमला बोला। अंग्रेजी सेना खंदकों से निकलकर निकटवर्ती दुर्ग में चली गई। उसके पास बहुत ही कम पानी और रसद सामग्री थी। जब कम्पनी सरकार के भारतीय सिपाही जो अब भी अंग्रेजों के साथ थे, भूख और प्यास से मरने लगे तो वे भाग-भाग कर नाना की तरफ आने लगे। 10 जून तक नाना साहब की सेना में 10 से 12 हजार सिपाही हो गए किंतु अंग्रेजी सेना के जनरल व्हीलर तथा कैप्टेन मूर आदि अधिकारियों ने हार नहीं मानी। वे विद्रोही सेनाओं का मुकाबला करते रहे।

23 जून 1857 को प्लासी के युद्ध की सौवीं सालगिरह थी। भारतीय सिपाहियों का विश्वास था कि जिस दिन कम्पनी सरकार को भारत में शासन करते हुए 100 साल हो जाएंगे, उसी दिन कम्पनी सरकार नष्ट हो जाएगी। इसलिए 23 जून को नाना साहब की सेनाओं ने अंग्रेजों पर भयानक आक्रमण किया। पेशवा के सैनिकों ने जनरल व्हीलर के पुत्र लेफ्टिनेंट गोर्डन को मार डाला। इससे जनरल व्हीलर का साहस चुक गया। नाना साहब के सैनिकों ने कुछ अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को पकड़ लिया।

24 जून 1857 को नाना साहब ने एक अंग्रेज महिला कैदी रोज ग्रीनवे को एक पत्र देकर जनरल व्हीलर के पास भेजा। इस पत्र में कहा गया था कि यदि अंग्रेज कानपुर खाली कर देते हैं तो उन्हें सतीचूरा घाट तक सुरक्षित रास्ता दे दिया जाएगा जहाँ से वे अपने परिवारों को साथ लेकर नावों की सहायता से इलाहाबाद जा सकते हैं।

जनरल व्हीलर को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ और उसने कानपुर खाली करने से मना कर दिया। 25 जून 1857 को नाना साहब ने दूसरा पत्र भिजवाया जिस पर नाना साहब ने स्वयं हस्ताक्षर किए। यह पत्र मिसेज जैकोबी नामक एक अंग्रेज महिला बंदी के हाथों भिजवाया गया। इसके बाद नाना साहब ने अंग्रेजों की खंदकों पर गोलाबारी करनी बंद कर दी।

26 जून को अंग्रेजी सैनिकों ने अपने मृत साथियों को दफनाया और 27 जून को वे सतीचूरा घाट की तरफ रवाना हो गए। नाना साहब ने बड़ी संख्या में पालकियां, बैलगाड़ियां और हाथी भिजवाए ताकि औरतों और बच्चों को पैदल न चलना पड़े। कम्पनी के अधिकारियों एवं सिपाहियों को अपने शस्त्र साथ में ले जाने की अनुमति दी गई। नाना साहब के सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को अपनी सुरक्षा में ले लिया ताकि उन पर कोई व्यक्ति हमला न करे।

प्रातः 8 बजे अंग्रेज परिवार सतीचूरा घाट पर पहुंचे। जब अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार हाथियों, बैलगाड़ियों एवं पालकियों से उतरकर नावों की तरफ जाने लगे तो आसपास के बहुत से गांवों के स्त्री-पुरुष और बच्चे उन्हें देखने के लिए जमा हो गए।

नाना साहब ने अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों के लिए 40 नावों का प्रबंध किया था। उस दिन गंगा नदी में बहुत कम पानी था जिसके कारण इन नावों का चलना कठिन हो गया। इससे अंग्रेजों के प्रस्थान में कुछ विलम्ब हो गया।

इसी बीच इलाहाबाद से छठी नेटिव इन्फैंट्री तथा बनारस से 37वीं इन्फैंट्री के सिपाही भी सती चौरा आ पहुंचे। इन्हें जेम्स जॉर्ज स्मिथ नील कॉलम नामक ब्रिटिश अधिकारी लेकर आया था। नील कॉलम की दुष्टता के कारण वहाँ उपस्थित सिपाहियों में गोलीबारी आरम्भ हो गई। कहा नहीं जा सकता कि पहले गोलीबारी किसने आरम्भ की। भारतीय सिपाही गंगाजी में उतर पड़े तथा अंग्रेज अधिकारियों को नावों से खींच-खींचकर मारने लगे।

तात्या टोपे तथा अजीमुल्ला खाँ घटना-स्थल पर ही मौजूद थे जबकि नाना साहब यहाँ से दो किलोमीटर दूर डेरा डाले हुए था। कुछ स्रोतों को मानना है कि जब तात्या ने देखा कि अंग्रेजी सेना गोलीबारी कर रही है तो तात्या टोपे ने अपनी सेना के सिपाहियों को आदेश दिया के वे भी अंग्रेजों पर गोली चलाएं। इस गोलीबारी में 450 से अधिक अंग्रेज अधिकारी एवं सैनिक मारे गए।

जिस समय यह गोली काण्ड आरम्भ हुआ, उससे कुछ समय पूर्व ही जनरल व्हीलर की नाव गंगा नदी में कुछ दूर जा चुकी थी किंतु जब भारतीय सिपाहियों ने पीछे से आकर जनरल व्हीलर की नाव पर गोली-बारी की तो अंग्रेजों ने इस नाव पर सफेद झण्डा फहरा दिया। नाना के सिपाही इन अधिकारियों को पकड़कर नाना साहब के निवास स्थल अर्थात् सवादा महल में ले आए तथा उन्हें धरती पर बैठा दिया।

अंग्रेज औरतें नाव में डरी हुई बैठी थीं। जब कानपुर की क्रांति के सैनिकों ने अंग्रेज औरतों पर गोलीबारी की तो नाना साहब ने सिपाहियों को आदेश दिए कि वे औरतों और बच्चों को न मारें। नाना ने 120 अंग्रेज औरतों और बच्चों को नावों से उतरवाकर कानपुर में स्थित सवादा कोठी भिजवा दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बीबीघर का हत्याकाण्ड

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बीबीघर का हत्याकाण्ड

बीबीघर का हत्याकाण्ड अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के दौरान हुई एक बड़ी ही शर्मनाक घटना है जिसने भारतीय क्रांति के सैनिकों को कलंकित किया तथा अंग्रेजों को भारतीय सैनिकों का शत्रु बना दिया।

नाना साहब पेशवा ने अंग्रेजों से कानपुर मुक्त करवाकर अंग्रेज अधिकारियों को छूट दी थी कि वे अपने परिवारों को लेकर इलाहाबाद चले जाएं। इसके लिए नाना साहब ने 40 नावों का प्रबंध किया था। जब अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार नावों में बैठ रहे थे, तभी नील कॉलम नामक ब्रिटिश अधिकारी इलाहाबाद से नई सेना लेकर आ गया और पेशवा तथा अंग्रेज सेना में गोलीबारी आरम्भ हो गई।

इसके बाद पेशवा की सेना ने लगभग 450 अंग्रेज सैनिकों को मार डाला तथा कुछ अंग्रेज अधिकारियों और उनके परिवारों की औरतों एवं बच्चों को पकड़कर सवादा महल में ले आई। अंग्रेज अधिकारियों को सवादा हाउस के प्रांगण में धरती पर बैठा दिया गया।

जब भारतीय सिपाही अंग्रेज अधिकारियों को मारने के लिए उद्धत हुए तो अंग्रेज औरतें उनके साथ लिपट गईं तथा जिद करने लगीं कि हमें भी हमारे पति के साथ मारा जाए। भारतीय सिपाहियों ने इन अंग्रेज औरतों को खींच कर अलग कर दिया।

ब्रिटिश अधिकारी चैपलेन मॉनस्रिफ ने नाना साहब से याचना की कि उन्हें मरने से पहले प्रार्थना करने दी जाए। नाना ने उन्हें प्रार्थना करने की अनुमति दे दी। इन ब्रिटिश अधिकारियों को बंदूकों एवं तलवारों से मार दिया गया।

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उसी रात को समस्त अंग्रेज महिलाओं और बच्चों को नाना साहब के बीबी घर में रहने के लिए भेज दिया गया तथा उन्हें नाना साहब की रखैल हुसैनी खाना के संरक्षण में रख दिया गया। हुसैनी खाना के अधीन नाना साहब के कुछ सैनिक भी नियुक्त किए गए।

रात्रि में व्हीलर्स की बोट से बचाए गए कुछ और अंग्रेज महिलाएं एवं बच्चे लाए गए। फतेहगढ़ से भी कुछ अंग्रेज महिलाएं एवं बच्चे पकड़ कर लाए गए। उन्हें भी कानपुर के बीबी घर में लाकर बंद कर दिया गया। नाना साहब इन अंग्रेज औरतों एवं बच्चों का उपयोग अंग्रेजों से संधि के समय अपनी शर्तें मनवाने में करना चाहता था।

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अंग्रेज महिलाओं के साथ अतिथियों की तरह व्यवहार किया गया उन्हें इलाहाबाद भेजने की तैयारी की जाने लगी। कुछ ही दिनों में जनरल हैवलॉक तथा नील इलहाबाद से अंग्रेजी सेनाओं के साथ आ धमके। मेजर रेनॉड एवं जेम्स नाइल भी अपनी सेनाएं लेकर आ गए। अंग्रेजी सेनाएं सती चौरा (अथवा सतीचूरा) घाट पर हुए गोलीकाण्ड का बदला लेने के लिए भारतीय सैनिकों एवं निरीह लोगों को मारने लगी। नाना साहब ने उन पर दबाव बनाना आरम्भ किया कि वे इलाहाबाद लौट जाएं किंतु अंग्रेजी सेनाएं कानपुर की तरफ बढ़ती रहीं। नाना साहब एवं अंग्रेज सेनाओं में कई स्थानों पर युद्ध हुआ जिनमें दोनों ओर के बहुत से सिपाही मारे गए।

हैवलॉक तथा नील की सेनाओं ने अपने मार्ग में पड़ने वाले गांवों पर भयानक अत्याचार करने आरम्भ कर दिए। 15 जुलाई को जनरल हैवलॉक की सेना ने नाना साहब के भाई बाला राव की सेना को परास्त कर दिया। 16 जुलाई को जनरल हैवलॉक की सेना कानपुर पहुंच गई। जब अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए जा रहे जुल्मों की सूचना बीबी घर में पहुंची तो अंग्रेज महिलाओं की रक्षा कर रही हुसैनी खानम ने क्रोध में भरकर 15 जुलाई 1857 को देर शाम को बीबी घर की अंग्रेज महिलाओं को मरवा कर कुएं में फिंकवा दिया।

कहा जा सकता है कि बीबीघर का हत्याकाण्ड जनरल हैवलॉक किए जा रहे भारतीय सैनिकों के हत्याकाण्ड की बदले की कार्यवाही थी किंतु यह भारतीय परम्परा के अनुरूप नहीं थी। निर्दोष स्त्रियों की हत्या करना किसी भी दशा में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि बीबीघर का हत्याकाण्ड अजीमुल्ला खाँ के कहने पर किया गया जबकि कुछ लोगों का मानना था कि इसके आदेश स्वयं नाना साहब ने दिए। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि जब बीबी घर की भारतीय औरतों को ज्ञात हुआ कि अंग्रेज औरतों को मारा जाएगा तो भारतीय औरतों ने इस आदेश के विरुद्ध भूख हड़ताल कर दी।

जिन सिपाहियों को अंग्रेज औरतों एवं बच्चों को मारने के आदेश दिए गए उन्होंने भी आदेश मानने से मना कर दिया। इस पर बेगम हुसैनी खानम ने अपने मित्र सरवर खान से कहकर कसाइयों को बुलाया। कसाइयों ने छुरे भौंककर अंग्रेज औरतों एवं बच्चों को मार डाला। जिस समय यह हत्याकाण्ड किया गया, उस समय नाना साहब बीबी घर में नहीं था।

कुछ अंग्रेज स्त्रियों एवं बच्चों ने स्वयं को शवों के नीचे छिपा लिया। जब अगली सुबह सफाई कर्मचारियों को बुलाकर अंग्रेज महिलाओं एवं बच्चों के शव कुओं में फिंकवाए गए तब तीन औरतें और तीन बच्चे जीवित निकले। इन्हें भी लाशों के साथ कुओं में फैंक दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।

सती चौरा की घटना के लिए अंग्रेजों ने नाना साहब को जिम्मेदार ठहराया तथा नाना पर आरोप लगाया कि उसने जानबूझ कर नावों को रेत में लगवाया ताकि अंग्रेजों को आसानी से घेरकर मारा जा सके। इसी प्रकार बीबीघर का हत्याकाण्ड के लिए भी नाना साहब को जिम्मेदार ठहराया गया। इस प्रकार पेशवा नाना साहब अंग्रेजी हुकूमत का सबसे बड़े खलनायक बन गया!

सती चौरा हत्याकाण्ड तथा बीबीघर का हत्याकाण्ड की गूंज इंग्लैण्ड में भी सुनाई दी। पूरा इंग्लैण्ड भारत के विरुद्ध क्रोध से उबलने लगा। वहाँ के अखबारों में भारतीय लोगों के विरुद्ध खूब जहर उगला गया। इंग्लैण्ड के शहरों में नुक्कड़ नाटक खेले जाने लगे जिनमें नाना साहब के पुतलों को चौराहों पर फांसी दी जाती थी।

इंग्लैण्ड के लोगों को शांत करने के लिए अंग्रेजी सेना ने कानपुर शहर में भयानक नरसंहार किया। सैंकड़ों भारतीय सिपाहियों को पकड़कर पेड़ों पर लटका दिया गया। बरगद के एक पेड़ पर 135 शव लटकाए गए।

जनरल नील ने कानपुर में जन-साधारण पर भयानक अत्याचार किए। उसने एक मुसलमान अधिकारी को बीबीघर में फर्श पर लगे खून को जीभ से साफ करने का आदेश दिया। उस अधिकारी द्वारा आदेश पालन किये जाने पर भी नील ने उसे मृत्यु-दण्ड दिया। जनरल नील ने मृत ब्राह्मणों को जमीन में दफनाया तथा मुसलमानों को चिता पर जलवाया।

19 जून को हैवलॉक ने बिठूर पर आक्रमण किया किंतु तब तक नाना साहब बिठूर से जा चुका था। ब्रिटिश सेनाओं ने बिठूर गांव के लोगों को बुरी तरह काटकर फैंक दिया। गांव के समस्त स्त्री, पुरुष, बच्चे, जवान एवं वृद्ध सभी की नृशंसता पूर्वक हत्या कर दी गई।

नाना साहब के महल पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। अंग्रेजों को यहाँ से बड़ी संख्या में गोला-बारूद, तोपें, हाथी, घोड़े एवं ऊँट प्राप्त हुए। अंग्रेजों ने इस महल में आग लगा दी। नाना साहब अंग्रेजों के हाथ नहीं आ सका। पेशवा के सेनापति तात्या टोपे का घर भी जला दिया गया।

अंग्रेज सिपाहियों द्वारा बिठुर में भयंकर लूटमार की गई तथा धन मिलने की आशा में महल की एक-एक ईंट उखाड़ दी गई। अँग्रेजों को बिठुर की लूट में इतना अधिक सोना-चाँदी प्राप्त हुआ कि वे पूरा उठाकर नहीं ला जा सके। जनवरी 1858 के बाद नाना के बारे में कोई पता नहीं चला। बाद में पता लगा कि वह नेपाल चला गया है किन्तु उसके बाद उसकी कोई निश्चित जानकारी नहीं मिल सकी।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि नाना साहब नेपाल चला गया जहाँ वह नेपाल के प्रधानमंत्री की सुरक्षा में रहा। लोगों का मानना है वह ईस्वी 1902 में नेपाल में नाना साहब की मृत्यु हुई परंतु कुछ लोग उसकी मृत्यु ईस्वी 1906 में सीहोर में होना मानते हैं।

पेशवा नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे ने नवम्बर 1857 में कानपुर पर फिर से अधिकार करने का प्रयास किया। जब नाना साहब के गायब हो जाने के बाद भी देश भर में क्रांति की आग नहीं थमी तो अंग्रेज समझ गए कि जब तक पेशवा को नहीं पकड़ लिया जाता, तब तक क्रांति को नहीं दबाया जा सकता। अंग्रेज सरकार ने नाना साहब को पकड़वाने के लिए बड़े-बड़े इनाम घोषित किए किंतु नाना पकड़ में नहीं आया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बेगम हजरत महल

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बेगम हजरत महल

बेगम हजरत महल एक तवायफ थी जिसे वाजिद अली शाह ने अपनी परी बनाया और बाद में बेगम बना लिया। वह अपने बेटे को अवध का नवाब बनाना चाहती थी किंतु जब अंग्रेजों ने उसकी बात नहीं मानी तो वह हाथ में हथियार लेकर हाथी पर चढ़ गई और अंग्रेजों के मारने के लिए निकल पड़ी। बेगम हजरत महल ने हाथी पर बैठ कर अंग्रेजों को मारा!

बैरकपुर, कानपुर, कलकत्ता, मेरठ, बिठूर, झांसी तथा राजपूताने में हो रही हलचलों के समचार तेजी से पूरे देश में फैल रहे थे। लखनऊ की बेगम हजरत महल आरम्भ से ही पेशवा नाना साहब के सम्पर्क में थी। इसलिए उसने भी क्रांति की तैयारी की। इतिहासकारों का मानना है कि अवध में क्रांति की तैयारी अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक अच्छी थी।

बेगम हजरत महल का वास्तविक नाम हजमती महल था जिसे बचपन में मुहम्मदी ख़ानुम कहा जाता था। बेगम हज़रत महल का जन्म अवध रियासत के फ़ैज़ाबाद कस्बे में हुआ था। वह पेशे से तवायफ़ थी और अपने माता-पिता द्वारा बेचे जाने के बाद खवासीन के रूप में अवध के शाही हरम में ले ली गई थी।

तब उसे शाही आधिकारियों के पास बेचा गया था, बाद में वह परी के पद पर पदोन्नत हुई और उसे महक परी के नाम से जाना गया। अवध के नवाब की शाही रखैल के तौर पर स्वीकार किए जाने पर उसे बेगम का खि़ताब हासिल हुआ। उसके पुत्र बिरजिस क़द्र के जन्म के बाद उसे हज़रत महल का खिताब दिया गया था।

ईस्वी 1856 में जब अंग्रेज़ों ने अवध पर क़ब्ज़ा कर लिया और वाजिद अली शाह को निर्वासित करके कलकत्ता भेज दिया तब बेगम हजरत महल वाजिद अली शाह के साथ कलकत्ता नहीं गई। उसने अपने अवयस्क पुत्र बिरजिस कद्र को गद्दी पर बैठा दिया और स्वयं उसके रीजेंट के रूप में शासन करने लगी।

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बेगम हजरत महल ने अपना जीवन एक तवायफ अथवा नृत्यांगना के रूप में आरम्भ किया था किंतु राजनीति में वह नवाब वाजिद अली शाह से भी अधिक चतुर थी। नवाब तो अपनी रियासत खोकर कलकत्ता में निर्वासन भोग रहा था किंतु बेगम ने अवध रियासत को अपने पुत्र के हक में नष्ट होने से बचा लिया था।

बेगम हजरत महल अंग्रेजों से सम्बन्ध नहीं बिगाड़ना चाहती थी किंतु वह इस बात से नाराज थी कि अंग्रेज़ों ने लखनऊ और अवध के अधिकांश स्थानों पर अधिकार कर लिया था तथा वे रियासत को तेजी से हड़पते जा रहे थे। अपने बेटे बिरजिस क़द्र के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए बेगम हज़रत महल को कम्पनी सरकार के विरुद्ध बगावत करने पर विवश होना पड़ा।

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7 जून 1857 को राणा बेनीमाधव सिंह तथा आजमगढ़ के नाजिम राजा जयलाल सिंह की सहायता से बेगम हजरत महल ने अवध के शासन की बागडोर अपने हाथ में ली। 10 जून 1857 को अवध में आजादी का झंडा फहराने लगा। हज़रत महल ने अवध के जमींदारों, किसानों एवं जनसामान्य का आह्वान किया कि वे अवध को विदेशियों से मुक्त कराने में सहयोग दें।

बेगम हजरत महल ने आजमगढ़ के नाजिम राजा जयलाल सिंह को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया। राजा जयलाल सिंह ने अवध के युवकों की एक सेना तैयार की तथा 24 जून 1857 को अंग्रेजी सेना की दो टुकड़ियों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। राजा जयलाल सिंह ने 30 जून 1857 को लखनऊ से 6 मील दूर चिनहट नामक स्थान पर अंग्रेजों को भारी शिकस्त दी। बेगम हज़रत महल ने लखनऊ पर फिर से अधिकार कर लिया और अपने बेटे बिरजिस क़द्र को अवध का वली अर्थात् शासक घोषित कर दिया।

बेगम हज़रत महल की महिला सैनिक दल का नेतृत्व रहीमी नामक औरत के हाथों में था, जिसने फ़ौजी भेष में महिलाओं को तोप और बन्दूक चलाना सिखाया। उन दिनों लखनऊ की एक प्रसिद्ध तवायफ़ हैदरी बाई के यहाँ बहुत से अंग्रेज़ अधिकारी मुजरा देखने आया करते थे। वे क्रांतिकारियों के विरुद्ध़ की जाने वाली कार्यवाहियों पर भी चर्चा किया करते थे। हैदरीबाई ने इन सूचनाओं को क्रांतिकारियों तक पहुँचाया और बाद में वह भी रहीमी के सैनिक दल में शामिल हो गयी।

आलमबाग़ की लड़ाई में बेगम ने हाथी पर सवार होकर सशस्त्र युद्ध में भाग लिया। लखनऊ में रहीमी के नेतृत्व में महिलाओं ने अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया। इस युद्ध में पराजित होकर बेगम अवध के देहातों में चली गई और वहाँ भी क्रांति की चिंगारी सुलगाने लगी। 4 जुलाई 1857 को एक भीषण विस्फोट में अवध के कमिशनर हेनरी लॉरेन्स की मृत्यु हो गई। यह अंग्रेजों के लिए बहुत बड़ा सदमा था।

25 सितंबर 1857 को अंग्रेजों सेना ने आलमबाग से हटकर रेजिडेंसी की तरफ बढ़ना चाहा किंतु क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना में कसकर मार लगाई। इस युद्ध में जनरल नील मारा गया। जनरल नील की मृत्यु भी अंग्रेजी सेना के लिए जबरदस्त सदमा था किंतु अंग्रेजी सेना रेजिडेंसी पहुंचने में सफल हो गई।  

अवध के क्रांतिकारियों ने फिर से रेजिडेंसी को घेर लिया। हैवलॉक और उसकी सेना रेजीडेंसी के अंदर कैद हो गई। हैवलॉक और आउटरम की सेनाओं की सहायता के लिए 27 अक्टूबर अट्ठारह सौ सत्तावन को कोलकाता से नया कमाण्डर इन चीफ सर कॉलिन कैम्पबेल विशाल सेना लेकर रवाना हुआ।

कॉलिन कैंपबेल 3 नवंबर 1857 को कानपुर पहुंचा। उसने देखा कि सम्पूर्ण अवध बागी बन गया है। भारी तैयारी जगह-जगह नजर आ रही थी और उनको स्थानीय लोगों का खुला समर्थन था। कैंपबेल तथा जनरल ग्रांट अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आलमबाग पहुंचे। अब कंपनी के पास विशाल सेना थी। 8 नवंबर 1857 को लखनऊ में क्रांतिकारियों की सेना में एक लाख लोग थे और अंग्रेजों के पास 1.20 लाख।

14 नवंबर 1857 को कैंपबेल अपनी विशाल सेना के साथ रेजीडेंसी की तरफ बढ़ने लगा। यह सेना पहले दिलखुश बाग पहुंची तथा उसने 16 नवम्बर 1857 को सिकंदर बाग पर चढ़ाई की। दोनों पक्षों के बीच दिलखुश बाग, आलमबाग और शाहनजफ में घमासान लड़ाई होती रही जो 9 दिन तक अर्थात 23 नवंबर तक जारी रही।

इसी बीच क्रांतिकारियों को सूचना मिली कि अंग्रेजों ने दिल्ली से फिर से अधिकार कर लिया है किंतु इस पर भी लखनऊ के क्रांतिकारी सैनिक मैदान में डटे रहे। शहर अभी तक क्रांतिकारियों के हाल में था। अंग्रेजों ने पुनः अपनी सेनाओं को रेजीडेंसी मोर्चे से हटाकर आलमबाग में जमा करना पड़ा। आउट्रम को वहाँ का सेनापति नियुक्त किया गया।

इसी बीच अंग्रेजों को सूचना मिली कि नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे ने कानपुर की अंग्रेजी सेना को फिर से हराकर कानपुर पर कब्जा कर लिया है। इस पर कैम्पबेल, आउट्रम को लखनऊ छोड़कर कानपुर चला गया।

जब दिल्ली, कानपुर और लखनऊ जैसे प्रमुख केंद्रों में क्रांतिकारी सेनाओं की पराजय हो गई तो भी अवध के कई क्षेत्रों में क्रांतिकारी युद्ध जारी रखे हुए थे। कुछ दिनों की लड़ाई के बाद ये क्रांतिकारी सैनिक भी परास्त होने लगे। अवध का क्रांतिकारी जागीरदार जयलाल सिंह अंग्रेजों से परास्त होकर बाराबंकी के जंगलों में चला गया तथा वहाँ से गुरिल्ला युद्ध करके अंग्रेजी सेना को नुकसान पहुंचाने लगा।

अवध के देहाती इलाकों में ग्रामीणों ने जंग जारी रखी। बाराबंकी में 1 साल 7 माह और 5 दिन जंग चली। इस दौरान अंग्रेज केवल 10 रुपए का ही राजस्व संग्रह कर पाये। अंग्रेजों ने राणा बेनीमाधव, नरपत सिंह, देवीबख्श और गुलाब सिंह को अपने साथ मिलाने के प्रयास किए किंतु वे नहीं माने और लड़ते रहे। उनके पास साधन कम थे किंतु हिम्मत अटूट थी!

अथक प्रयासों के बाद अंततः 14 मार्च 1858 को अंग्रेजों ने लखनऊ पर अधिकार कर लिया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह तिथि 31 मार्च 1858 थीं।

1 नवम्बर 1858 को लॉर्ड केनिंग ने इलाहाबाद में भव्य दरबार का आयोजन किया तथा उसमें इंग्लैंड की महारानी की घोषणा पढ़कर सुनायी जिसमें कहा गया था कि जो लोग हथियार डाल देंगे उनको क्षमा कर दिया जाएगा और उनकी जागीरें लौटा दी जाएंगी, किंतु अवध के बहुत से स्वाभिमानी राजाओं एवं जागीरदारों पर इस घोषणा का असर नहीं पड़ा। उन्होंने लगभग एक साल तक जंग जारी रखी। यमुना, गोमती, घाघरा तथा गंगा के तटीय इलाकों की बगावत को दबाने के लिए अंग्रेजों को नौसेना का उपयोग करना पड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अंग्रेजों का खूनी खेल

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अंग्रेजों का खूनी खेल

अंग्रेज किसी भी कीमत पर भारत छोड़ने को तैयार नहीं थी। इसलिए उन्होंने क्रांतिकारियों को मारने के लिए बड़ी क्रूर नीति अपनाई। हजारों की संख्या में मनुष्यों को गोली मारना संभव नहीं था। इसलिए अंग्रेजों का खूनी खेल पेड़ों के माध्यम से चला। उन्होंने पेड़ों को फांसी देने की मशीन बना दिया!

अंग्रेजों का खूनी खेल तब तक चलता रहा जब तक कि प्रत्येक क्रांतिकारी या तो मार नहीं दिया गया या फिर पकड़ नहीं लिया गया। अंग्रेजों के दबाव के कारण बेगम हजरत महल अपने 1500 सैनिक, 500 क्रांतिकारी सिपाही और 16 हजार समर्थकों के साथ लखनऊ छोड़कर बहराइच चली गई जहाँ वह घाघरा के तट पर स्थित बौंडी किले में जुलाई 1858 तक रही। कई माह तक अंग्रेज वहाँ जाने की हिम्मत नहीं जुटा सके।

9 माह और 8 दिन तक अवध अंग्रेजी राज से मुक्त रहा। जब लखनऊ पर अंग्रेजों का अधिकार हुआ तो हजरत महल बौंडी का किला छोड़कर नेपाल चली गयी। नेपाल के प्रधानमंत्री जंग बहादुर ने बेगम को शरण दी। वहीं पर ई.1879 में उसका निधन हुआ।

जब लखनऊ और कानपुर सहित अवध के विभिन्न क्षेत्रों में अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को परास्त कर दिया तब कम्पनी सरकार की सेना ने जंगलों में भाग गए एवं नगरों में छिप गए क्रांतिकारी सैनिकों को दण्डित करने का काम आरम्भ किया। अंग्रेजों का खूनी खेल जंगलों में भी आरम्भ हो गया।

वे क्रांतिकारी सैनिकों को ढूंढ-ढूंढ कर गोलियों से उड़ाने लगे तथा उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी देने लगे ताकि भारतीय जन-साधारण अच्छी तरह समझ ले कि सरकार बहादुर से बगावत करने का अंजाम कितना भयावह होता है!

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अंग्रेज अधिकारी क्रांतिकारी सैनिकों को दण्डित करने के दौरान इतने अमानवीय हो गए थे कि रास्ता चलते लोगों तक को पकड़ कर फांसी दी गयी। अवध में लगभग समस्त क्षेत्रों में आज भी कुछ पेड़ों को ‘फंसियहवा पेड़’ कहा जाता है। ये वे पेड़ हैं जिन पर अंग्रेजों ने आजादी के नायकों से लेकर जनसामान्य को फांसियों पर लटकाया।

हजारों लोगों को सरेआम तोप के मुंह पर बांध कर उड़ाया गया। उन लोगों की रक्त-मज्जा एवं अस्थियां चूर-चूर होकर देश की मिट्टी में समा गईं। अकेले लखनऊ नगर में शहीद हुए लोगों की संख्या 20,270 बताई जाती है। इलाहाबाद में नीम के एक पेड़ पर 800 लोगों को फांसी दी गयी। बस्ती जिले के छावनी कस्बे में पीपल के एक पेड़ पर 400 से ज्यादा ग्रामीणों को फांसी पर लटका दिया गया, जबकि कानपुर में दो हजार लोगों को एक जगह फांसी दी गयी। कानपुर में एक बरगद के पेड़ पर 135 लोगों को मारकर लटकाया गया।

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यह भी उल्लेखनीय है कि 1857-58 की क्रांति के दौरान भारत में चिट्ठियों और पत्रों की आवाजाही बहुत कम थी। फिर भी डाक विभाग में रिकॉर्ड 23 लाख पत्र अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच सके। उन्हें यह लिखकर ‘डेड लेटर ऑफिस’ में पहुंचाया गया कि या तो ये लोग मार दिए गए हैं या पलायन कर गए हैं। 1857 के निरक्षर भारत में 23 लाख पत्रों की संख्या बहुत अधिक मानी जानी चाहिए। ‘डेड लेटर ऑफिस में लौटे पत्रों में सर्वाधिक पत्र अवध राज्य के थे। ग्रामीण क्षेत्रों में जिन पेड़ों पर फांसी दी गयी, वे आज भी लोगों के लिए श्रद्धा का विषय हैं। जिन किलों को ध्वस्त किया गया उनके खंडहर आज भी अंग्रेजों द्वारा किए गए क्रूर दमन की याद दिलाते हैं।

अंग्रेजों द्वारा अनेक ऐतिहासिक भवन एवं धरोहरें बदले की भावना से तोपों से उड़ा दी गईं। घने जंगलों की कटाई करने के साथ तमाम दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया। ईस्वी 1857 से पहले अवध राजय में 574 किले थे जिनमें सैंकड़ों तोपें थीं। राज्य में गढिय़ों की संख्या 1569 थीं, जिनको ध्वस्त कर दिया गया। कंपनी सरकार ने जागीरदारों से 720 तोपें, 1,92,306 बंदूकें तथा तमंचे, 5.79 लाख तलवारें और 6.94 लाख फुटकर हथियार जब्त कर लिए।

अवध की बेगमों तथा प्रसिद्ध लोगों को लूटा गया। अंग्रेजों ने लखनऊ पर अधिकार करके भारी लूटपाट की।

अवध में हुई जंग की कई खूबियां थीं। अत्याचारी अंग्रेज अधिकारी नील कॉलम को 16 सितंबर 1857 को लखनऊ में ही मारा गया। 10 मार्च 1858 को अत्याचारी विलियम हॉडसन भी लखनऊ में मारा गया, जिसने दिल्ली में मुगल शहजादों की हत्या की थी।

अवध में बेगम हजरत महल, बिरजीस कद्र, गंगासिंह, जनरल दिलजंग सिंह, तिलकराज तिवारी, राणा बेनीमाधव सिंह, राणा उमराव सिंह, राजा दुर्गविजय सिंह, नरपतसिंह, हरादोई के राजा गुलाबसिंह, बौंडी के राजा हरदत्तसिंह, गोंडा के राजा देवीबख्शसिंह, चर्दा-बहाराइच के राजा ज्योतिसिंह आदि जंग लड़ते हुए नेपाल की तराई में चले गए।

राणा बेनीमाधव सिंह ने जून 1858 में बैसवारा में 10,000 पैदल और घुड़सवार सेना संगठित कर ली थी। फरवरी 1858 की चांदा की लड़ाई में कालाकांकर के 26 वर्षीय युवराज लाल प्रताप चांदा शहीद हुए।

स्वाधीनता संग्राम के नायकों ने अपनी समानांतर डाक व्यवस्था भी बना ऱखी थी। इस नाते अवध क्षेत्र में अंग्रेजों को कदम-कदम पर दिक्कतें आयी थीं। अंग्रेजों की जांच पड़ताल में बनारस में यह बात सामने आई कि बड़ी संख्या में हरकारे क्रांतिवीरों की सेवा कर रहे थे। उनके द्वारा तमाम महत्वपूर्ण सूचनाएं आंदोलनकारियों तक पहुंच रही थीं। इस सेवा का प्रबंध बनारस में महाजनों और रईसों की ओर से किया गया था।

इस सेवा के आठ हरकारे 14 सितंबर 1857 को जलालपुर (जौनपुर) में पकड़े गए जिनके पास राजाओं से संबंधित कई पत्र निकले। सेवा संचालक भैरों प्रसाद तथा इन समस्त हरकारों को फांसी दे दी गयी। अवध राज्य में लगभग डेढ़ लाख लोगों को मार डाला गया।

बाराबंकी के जंगलों से छापामार गतिविधियां चला रहे अवध के क्रांतिकारी जागीरदार जयलाल सिंह को अंग्रेजों ने छल पूर्वक पकड़ लिया तथा उसे 1 अक्टूबर 1859 को लखनऊ में फांसी दे दी।

क्रांतिकारियों एवं अंग्रेजों के बीच चली लम्बी जंग में अवध क्षेत्र के बहुत से खेत उजड़ गए। गांव के गांव नष्ट हो गए तथा जब क्रांति समाप्त हो गई तब अंग्रेजों ने उन दस्तावेजों, पत्राचारों एवं इश्तहारों को नष्ट कर दिया जिनसे क्रांति को कुचले जाने के समय अंग्रेजों द्वारा की गई क्रूरताओं का पता चलता था।

ईस्वी 1879 में नेपाल में ही बेगम हजरत महल की मृत्यु हुई। उसे काठमांडू की जामा मस्जिद के मैदान में एक अज्ञात क़ब्र में दफ़नाया गया। उसकी मृत्यु के बाद, ईस्वी 1887 में रानी विक्टोरिया की जयंती के अवसर पर, ब्रिटिश सरकार ने बेगम हजरत महल के पुत्र बिरजिस क़द्र को माफ़ कर दिया और उसे लखनऊ लौटने की अनुमति दे दी।

ई.1857 की क्रंति देश के विशाल भू-भाग पर प्रकट हुई थी किंतु अवध की क्रांति में एवं दूसरे स्थानों की क्रांति में अंतर था।

इस काल में नाना साहब, तात्यां टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मी बाई जैसे शासक अपनी रियासत की सेनाओं के बल पर लड़ रहे थे, मेरठ, कानपुर, बैरकपुर, कलकत्ता, नसीराबाद, आउवा आदि के सैनिक ब्रिटिश सेनाओं के विद्रोही अंग थे किंतु अवध की क्रांति जनक्रांति थी जिसमें विद्रोही सैनिकों से अधिक संख्या में किसानों एवं जनसाधारण ने अपनी इच्छा से हथियार उठाए थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जागीरदार कुंवरसिंह

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जागीरदार कुंवरसिंह

अंग्रेजों ने जगदीशपुर के जागीरदार कुंवरसिंह की जागीर जब्त कर ली थी। अपनी जागीर को मुक्त करवाने के लिए कुंअरसिंह ने 1857 की क्रांति में खुलकर भाग लिया। कुंवरसिंह ने मरने से पहले अपना झण्डा महल पर चढ़ा दिया!

जब ई.1857 के आरम्भ में पेशवा नाना साहब (द्वितीय) तीर्थयात्रा पर गया था, तब उसने लखनऊ में बिहार की जगदीशपुर जमींदारी के 80 वर्षीय जागीरदार कुंवरसिंह से भी भेंट की थी। कुंवरसिंह की जमींदारी काफी बड़ी थी किन्तु अँग्रेजों ने उसे दिवालिया होने की स्थिति में पहुंचा दिया था।

वीर कुंवर सिंह का जन्म 23 अप्रेल 1777 को भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था। कुंवरसिंह का पिता बाबू साहबजादा सिंह भोज शासकों का वंशज था। वीर कुंवर सिंह बिहार में 1857 की क्रांति का महानायक था। वह अत्यंत न्यायप्रिय, साहसी और स्वाभिमानी व्यक्ति था किंतु उसकी जागीर को अंग्रेजों ने अन्याय पूर्वक हड़प लिया था। उसे भारतीय इतिहास में 80 वर्ष की आयु में युद्ध के मैदान में आकर लड़ने तथा विजय प्राप्त करने के लिए जाना जाता है।

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वीर कुंवर सिंह ने 27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ आरा नगर पर कब्जा कर लिया। कम्पनी सरकार की सेना ने भोजपुर के क्रांतिकारी सैनिकों पर हमला किया किंतु भोजपुर लम्बे समय तक स्वतंत्र रहा। जुलाई 1857 में क्रांतिकारी सैनिकों ने दानापुर पर अधिकार करके कुवरंसिंह को नेतृत्व करने के लिये आमंत्रित किया। अगस्त 1857 में कुवंरसिंह लखनऊ की ओर चल पड़ा। रास्ते में आजमगढ़ जिले में अँग्रेजी सेना से उसकी मुठभेड़ हुई।

कुवंरसिंह ने अँग्रेजी सेना को खदेड़कर मार्च 1858 में आजमगढ़ पर अधिकार कर लिया। अब कुवंरसिंह बनारस की ओर बढ़ा। 6 अप्रैल 1858 को लार्ड मार्क ने अपने तोपखाने सहित कुंवरसिंह से मुकाबला किया। कुंवरसिंह ने उसे भी परास्त करके भगा दिया। जब अंग्रेजी सेना ने आरा पर हमला किया तो बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ। इसमें क्रांतिकारी सेना परास्त हो गई। इस पर क्रांतिकारी सैनिक जगदीशपुर की ओर बढ़ गए। अंग्रेजी सेना ने जगदीशपुर पर भी आक्रमण किया। अंग्रेजी सेना के दबाव के कारण बाबू कुंवर सिंह और अमर सिंह को जन्म भूमि छोड़नी पड़ी।

अमर सिंह अंग्रेजों से छापामार लड़ाई लड़ते रहे और बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवां, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर एवं गोरखपुर में विप्लव के नगाड़े बजाते रहे। 22 अप्रैल 1858 को कुंवरसिंह ने अपनी जागीर जगदीशपुर पर अधिकार कर लिया।

जगदीशपुर पहुँचे हुए उसे 24 घण्टे भी नहीं हुए थे कि आरा से ली-ग्रेड एक सेना लेकर जगदीशपुर आ पहुँचा। कुवंरसिंह ने उसे भी पराजित कर दिया। 23 अप्रैल 1858 को कुंवरसिंह ने जगदीशपुर के पास अंतिम लड़ाई लड़ी। कुंवरसिंह के सिपाहियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों को खदेड़ कर जगदीशपुर के महल से यूनियन जैक उतारकर अपना झण्डा लगा दिया।

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इस युद्ध में कुंवरसिंह बुरी तरह घायल हो गया। 26 अप्रैल 1858 को जागीरदार कुंवरसिंह ने जगदीशपुर के महल में वीरगति पाई। उसकी मृत्यु के समय जगदीशपुर पर आजादी का ध्वज लहरा रहा था। बाद में मेजर आयर ने जगदीशपुर के महलों और मन्दिरों को नष्ट करके अपनी भड़ास निकाली।

ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने जागीरदार कुंवरसिंह के बारे में लिखा है- ‘उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्भुत वीरता और आन-बान के साथ लड़ाई लड़ी। यह गनीमत थी कि युद्ध के समय कुंवर सिंह की आयु अस्सी वर्ष थी। यदि वह युवा होते तो संभवतः अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ जाता।’

बहुत से इतिहासकारों ने लिखा है कि 1857 की क्रांति के समय नर्मदा का दक्षिणी भाग पूर्णतः शान्त रहा। इन इतिहासकारों के अनुसार क्रांति के प्रमुख केन्द्र बिहार, अवध, रूहेलखण्ड, चम्बल तथा नर्मदा के मध्य की भूमि एवं दिल्ली ही थे किंतु यह मत सही नहीं है।

आधुनिक शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह क्रांति समस्त महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और करेल तक फैल गई थी। गोवा और पाण्डिचेरी भी इस क्रांति से प्रभावित हुए। महाराष्ट्र में इस क्रांति को सतारा के रहने वाले रंगा बापूजी गुप्ते ने आरम्भ किया था।

दक्षिण भारत के प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं में कर्नाटक के सोनाजी पण्डित, कोल्हापुर के अण्णाजी फड़नवीस, मद्रास के गुलाम गौस तथा सुल्तान बख्श, चिंगलपुट के अरणागिरि एवं कृष्णा, कोयम्बटूर के मुलबागल स्वामी, मुल्ला अली, कोनजी सरकार, केरल के विजय कुदारत कुंजी मागा आदि उल्लेखनीय हैं।

दक्षिण में हैदराबाद एवं सूदूर दक्कन के बहुत से क्षेत्र इस क्रांति से अलग रहे। दक्षिण भारत की 1857 की क्रांति की घटनायें इसलिये इतिहास की पुस्तकों में नहीं आ सकीं क्योंकि अँग्रेज उस समय के समस्त अभिलेख उठाकर लंदन ले गये। जबकि इस क्रांति का दमन किये जाने के बाद अँग्रेजों ने दक्षिण भारत में अनेक भारतीयों पर मुकदमे चलाये जिनकी कार्यवाहियां आज भी लंदन के अभिलेखागार में सुरक्षित हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नसीराबाद की क्रांति

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नसीराबाद की क्रांति

नसीराबाद की क्रांति ने अंग्रेजों को मुसीबत में डाल दिया। क्रांतिकारी सैनिकों ने नसीराबाद में मेजर स्पॉट्सवुड को गोली मार दी और कर्नल न्यूबरी को टुकड़ों में काट दिया! इससे भयभीत होकर अंग्रेज अधिकारियों के परिवार जंगलों की ओर भागने लगे।

मेरठ के क्रांतिकारी सिपाहियों ने दिल्ली पहुंच कर अंग्रेज अधिकारियों से दिल्ली को मुक्त करवा लिया है, यह सूचना आग की तरह सम्पूर्ण भारत में फैल गई। इसलिए कम्पनी सरकार की सेनाओं के साथ-साथ बहुत से देशी राज्यों में रखी गई सेनाओं में भी विद्रोह के अंकुर फूट पड़े।

कम्पनी सरकार ने राजपूताना में डाकुओं को पकड़ने के लिये कोटा रेजीमेंट, जोधपुर लीजियन, शेखावाटी ब्रिगेड आदि सेनाओं का गठन किया था तथा इन्हें रखने के लिये नसीराबाद, नीमच, देवली, ब्यावर, एरिनपुरा तथा खैरवाड़ा में कुल छः स्थानों पर सैनिक छावनियां स्थापित की थीं। इन छावनियों में लगभग पाँच हजार भारतीय सैनिक नियुक्त थे।

इनमें एक भी यूरोपीय सैनिक नहीं था। राजपूताने की लगभग समस्त सैनिक छावनियों में भारतीय सैनिकों ने अँग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध हथियार उठा लिये।

राजपूताने के मध्य में स्थित अजमेर, ब्रिटिश शासित क्षेत्र था। जिस समय मेरठ और दिल्ली में सैनिक क्रांति आरम्भ होने के समाचार अजमेर पहुंचे, उस समय अजमेर का तोपखाना बंगाल इन्फैण्ट्री की 15वीं रेजीमेंट के अधीन था। यह सेना कुछ समय पहले ही मेरठ से नसीराबाद आई थी। जिस समय विद्रोह हुआ, अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर कर्नल डिक्सन ब्यावर में था।

अजमेर का शस्त्रागार (मैगजीन), अजमेर की सघन बस्ती के बिल्कुल निकट स्थित था। इसमें इतना बारूद, शस्त्र, तोपें तथा राजकीय खजाना मौजूद था कि पूरे राजपूताना के विद्रोही सैनिकों को आपूर्ति करने के लिये पर्याप्त था। कर्नल डिक्सन ने अपने सहायक, ऑफिशियेटिंग सैकण्ड इन कमाण्ड लेफ्टिनेंट डब्लू कारनेल को रात्रि में ही ब्यावर से मेरवाड़ा बटालियन की दो कम्पनियों के साथ अजमेर के लिये रवाना किया ताकि रात में ही अजमेर पहुँचकर मैगजीन पर अधिकार कर ले।

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ले. कारनेल अगली प्रातः मैगजीन के समक्ष प्रकट हुआ। उसने ब्रिटिश ऑफीसर इन कमाण्ड से अपनी सेना सहित मैगजीन से बाहर जाने के लिये कहा तो ब्रिटिश ऑफीसर इन कमाण्ड ने मैगजीन खाली करने से मना कर दिया। इस पर ले. कारनेल ने उस पर दबाव बनाया और मैगजीन पर कब्जा करके 15वीं बंगाल इन्फैण्ट्री को मैगजीन से बाहर निकाल दिया।

कारनेल, अँग्रेजों के परिवारों को मैगजीन के भीतर ले आया और उसने मैगजीन की बुर्जों पर पुरानी तोपें चढ़ा दीं। कारनेल ने मैगजीन के बीचों बीच एक कुआं खोदा तथा पर्याप्त रसद जमा करके, किसी भी आपात् स्थिति से निबटने के लिये तैयार होकर बैठ गया। जब 15वीं इण्डियन इनफैण्ट्री नसीराबाद पहुँची तो उनके साथियों ने उन्हें इस बात के लिये धिक्कारा कि उन्होंने निम्न जाति के मेर लोगों को मैगजीन सौंप दी।

राजपूताना के एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल कर्नल जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस को 19 मई 1857 को इस विद्रोह का समाचार मिला। उस दिन वह माउण्ट आबू में था। एजीजी ने कोटा कण्टिन्जेण्ट को अजमेर पहुंचने के निर्देश भेजे किंतु तब तक उसे आगरा भेजा जा चुका था।

एजीजी ने नसीराबाद की हिन्दुस्तानी सेना को आतंकित करने के लिये डीसा की लाइट इन्फैन्ट्री को नसीराबाद भेजने के आदेश भिजवाये ताकि नसीराबाद की क्रांति को दबाया जा सके। 23 मई 1857 को लॉरेंस ने राजपूताना की समस्त रियासतों के राजाओं से अपील की कि वे अपने राज्यों में व्यवस्था बनाये रखें तथा अपनी सेनाओं को ब्रिटिश शासन की सहायता के लिये राज्यों की सीमा पर तैनात करें।

23 मई 1857 को ही डीसा से लाइट इन्फैण्ट्री नसीराबाद के लिये चल पड़ी। उसके साथ लाइट फील्ड तोपखाना भी था। इसमें पूरी तरह यूरोपियन सैनिक थे। लॉरेन्स ने अपने सहायक, कैप्टेन फोर्ब्स को तोपखाने के साथ नसीराबाद के लिये रवाना किया। 15वीं नेटिव इन्फैण्ट्री की ग्रेनेडियर कम्पनी को भी अजमेर भेजा गया तथा उसे अजमेर दुर्ग में तैनात किया गया ताकि डीसा से आने वाली लाइट इन्फैण्ट्री को मजबूती दी जा सके।

अजमेर से कुछ दूरी पर स्थित नसीराबाद छावनी के बाहर यूरोपियन अधिकारियों के बंगले बने हुए थे। छावनी क्षेत्र में एक असिस्टेण्ट कमिश्नर, एक सिविल सर्जन तथा उसकी पत्नी, गवर्नमेंट कॉलेज का प्रिंसीपल, उसका एक सहायक तथा आधा दर्जन नॉन कमीशन्ड अधिकारी तोपखाने के पास ही रहते थे। नसीराबाद बारूद के ढेर पर बैठा था, किसी भी समय इस बारूद में आग लग सकती थी।

मेरठ, कानपुर, झांसी, बिठूर तथा दिल्ली क्रांति की आग में जल रहे थे तथा राजपूताना की छः सैन्य छावनियों में विद्रोह न हो, इसके लिए अंग्रेज अधिकारी जी-जान से जूझ रहे थे फिर भी राजपूताने में क्रांति सुलग उठी।

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28 मई 1857 को नसीराबाद की दो रेजीमेन्ट्स में विद्रोह हुआ। सबसे पहले 15वीं रेजीमेन्ट ने विद्रोह किया जो बहुत उद्दण्ड तथा अनुशासनहीन मानी जाती थी। इसके सैनिकों को व्यंग्य से पुरबिया (पूर्व के रहने वाले) कहा जाता था। उन्होंने शस्त्रागार से बन्दूकें लूट लीं और सरकारी बगंलों तथा निजी आवासों में घुसकर लूटपाट की और उन्हें जला दिया।

फर्स्ट बॉम्बे कैवेलरी तथा 30वीं नेटिव इनफैण्ट्री भी नसीराबाद में नियुक्त थीं। मेजर प्रिचार्ड ने इन टुकड़ियों के सिपाहियों को विद्रोहियों के विरुद्ध कार्यवाही करने का आदेश दिया किंतु सैनिकों ने आदेश मानने से मना कर दिया परन्तु जब ब्रिटिश अधिकारियों के बच्चे नसीराबाद से अजमेर के लिये रवाना हुए तो फर्स्ट बॉम्बे कैवेलरी ने स्त्रियों तथा बच्चों को सुरक्षा प्रदान की। विद्रोहियों द्वारा इस टुकड़ी के दो अधिकारी मार डाले गये।

कर्नल स्पॉट्सवुड को गोली मारी गई तथा कर्नल न्यूबरी को टुकड़ों में काट दिया गया। लेफ्टीनेंट लॉक तथा केप्टेन हार्डी को बुरी तरह से घायल कर दिया। यह हमला होते ही अँग्रेज अधिकारियों ने अजमेर की सड़क पकड़ी। अंग्रेज इसे गदर कह रहे थे किंतु भारतीय सैनिक इसे नसीराबाद की क्रांति कह रहे थे।

30वीं नेटिव इन्फैण्ट्री के कैप्टेन फेनविक ने नसीराबाद छोड़ने से मना कर दिया। कुछ वफादार सिपाहियों ने कैप्टेन से प्रार्थना की कि वह भी अजमेर चला जाये किंतु फेनविक ने मना कर दिया। सिपाही उसे मारना नहीं चाहते थे। इसलिये चार सिपाही उसे पकड़कर ले गये और छावनी के बाहरी छोर पर ले जाकर छोड़ दिया।

अँग्रेज अधिकारी कुछ विश्वस्त भारतीय सैनिकों को अपने साथ लेकर अजमेर की तरफ चल दिये किंतु ब्रिगेडियर मकाउ के निर्देशों पर वे अजमेर न जाकर ब्यावर की तरफ मुड़ गये। 30वीं नेटिव इन्फैण्ट्री के 120 मजबूत सिपाही तथा एक भारतीय अधिकारी के सरंक्षण में ये अँग्रेज अधिकारी ब्यावर पहुँच गये। अँग्रेज अधिकारियों के नसीराबाद छोड़ते ही छावनी में लूटपाट और आगजनी तेज हो गई।

नसीराबाद के चर्च तथा ब्रिटिश अधिकारियों के बंगलों में आग लगा दी गई और सरकारी खजाना लूट लिया गया। अधिकारियों के बंगलों में रात भर लूट चलती रही। उसके बाद दुकानों में लूट आरम्भ हुई। विद्रोहियों ने सदर बाजार के कोने पर तोप लगा दी और धमकी दी कि यदि कोई उनके मार्ग में आया तो उसे तोप से उड़ा दिया जायेगा किंतु किसी को नहीं मारा गया न घायल किया गया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चलो दिल्ली मारो फिरंगी

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चलो दिल्ली मारो फिरंगी

चलो दिल्ली मारो फिरंगी अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के क्रांतिकारियों का मुख्य उद्घोष था। पूरे उत्तर भारत के क्रांतिकारी चलो दिल्ली मारो फिरंगी का नारा लगाते हुए दिल्ली की ओर बढ़ने लगे।

बंगाल नेटिव इन्फेंटरी के सैनिक नसीराबाद से लूट का धन लेकर दिल्ली की ओर कूच कर गये। उनके पास लूट का इतना अधिक माल था कि उसे ढो पाना कठिन हो रहा था। फिर भी विद्रोही सैनिक दु्रतगति से कूच करते गये। लूट के सामान से लदे होने तथा खराब सड़कों के उपरांत भी उन्होंने लम्बी यात्रा जारी रखी।

उनके साथ उनकी बीमार स्त्रियां, बच्चे तथा बहुत सारा सामान था। कुछ समय पश्चात् उन्हें लूट का एक भाग रास्ते में ही छोड़ देना पड़ा था। अजमेर के असिस्टेण्ट कमिश्नर ले. वॉल्टर्स तथा राजपूताना की फीर्ल्ड फोर्सेज के डिप्टी असिस्टेण्ट क्वार्टर मास्टर जनरल ले. हीथकोट ने विद्रोहियों का पीछा किया। उनके साथ एक हजार सिपाही थे।

यह टुकड़ी राज ट्रूप्स कहलाती थी। इसमें निकटवर्ती जयपुर तथा जोधपुर रियासतों के सैनिक थे। इन सैनिकों ने विद्रोहियों पर आक्रमण नहीं किया। इन्होंने इस बात को छिपाया भी नहीं कि उन्हें विद्रोहियों से सहानुभूति है। 18 जून 1857 को क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली पहुँचे तथा उन्होंने दिल्ली में पड़ाव डाल दिया।

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12 जून 1857 को लाइट इन्फैण्ट्री डीसा से नसीराबाद पहुँच गई। अजमेर से 100 मील की दूरी पर एरिनपुरा छावनी में अनयिमित सेना थी जिसे जोधपुर लीजियन कहा जाता था। ब्रिटिश अधिकारियों के अधीन दो स्थानीय कोर भी थे जिनमें से एक भील कोर थी जिसमें मेवाड़ी भील सैनिक थे। दूसरी सेना खेरवाड़ा की मेरवाड़ा बटालियन थी जिसकी भरती कर्नल डिक्सन के द्वारा की गई थी। ये दोनों सेनायें अँग्रेजों के प्रति स्वामिभक्त बनी रहीं।

जब फर्स्ट बंगाल इंफैण्ट्री ने विद्रोह किया तो भील कोर ने उसे विफल कर दिया। चलो दिल्ली मारो फिरंगी का नारा लगाते हुए विद्रोहियों के दिल्ली रवाना होने के कुछ दिन बाद 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री की इकाई, जोधपुर लीजियन की इकाई, सैकेण्ड बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री, तीन तोपें, बॉम्बे हॉर्स आर्टिलरी तथा हिज मैजस्टी की 83वीं बटालियन के 200 सिपाहियों ने नसीराबाद पहुँचकर स्थानीय लोगों को अभयदान दिया। जो अँग्रेज अधिकारी विद्रोह के दिन नसीराबाद छोड़कर ब्यावर चले गये थे, वे इन टुकड़ियों के साथ नसीराबाद लौट आये।

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12 जून को फर्स्ट बॉम्बे लांसर्स का एक घुड़सवार घोड़े पर सवार होकर अपने सैनिकों की पंक्ति के समक्ष खड़ा हो गया तथा उसने अपने साथियों को विद्रोह करने के लिये आमंत्रित किया। बॉम्बे लांसर्स ने उसका पीछा किया, विद्रोही ट्रूपर, 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री की पंक्तियों में भाग गया जहाँ उसे शरण मिल गई। ब्रिगेडियर हेनरी मकाउ ने 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री को बैरकों से बाहर आने के आदेश दिये। इस पर केवल 40 सैनिक बाहर आये। ब्रिगेडियर ने तोपें मंगवा लीं तथा 83वीं पैदल टुकड़ी को दण्डित करने के निर्देश दिए।

थोड़ी देर में ही विद्रोही घुड़सवार को एक तोपची ने मार गिराया। उसके पांच विद्रोही साथियों को फांसी पर चढ़ा दिया गया। तीन को आजीवन कारावास दिया गया तथा पच्चीस सैनिकों के हथियार छीनकर दूसरे सैनिकों को दे दिये गये। कर्नल डिक्सन को आधुनिक अजमेर-ब्यावर का निर्माता माना जाता है। वह भारतीयों से बहुत प्रेम करता था तथा भील सैनिकों के साथ-साथ उसके सम्पर्क में आए समस्त भातीय सिपाहियों में बहुत लोकप्रिय था। इस कारण नसीराबाद के सैनिक विद्रोह से कर्नल डिक्सन को गहरा आघात पहुँचा जिससे 25 जून 1857 को ब्यावर में उसका निधन हो गया।

कर्नल एबॉट ने भारतीय सिपाहियों को गंगाजल तथा कुरान पर हाथ धरकर शपथ दिलवायी कि वे अँग्रेजी हुकूमत के प्रति वफादार रहेंगे। उसने स्वयं भी बाइबिल पर हाथ रखकर शपथ ली कि वह अपने भारतीय सैनिकों पर पूरा विश्वास रखेगा किंतु अविश्वास का वातावरण बन चुका था इसलिये इन शपथों से कुछ नहीं हुआ। 3 जून 1857 को रात्रि 11 बजे भारतीय सैनिकों ने तोपखाने पर अधिकार करके छावनी को घेर लिया तथा उसमें आग लगा दी।

कप्तान मेकडोनल्ड ने किले की रक्षा का प्रयास किया किंतु वहाँ तैनात टुकड़ी भी विद्रोही हो गयी। सैनिक कोष से 50 हजार रुपये तथा असैनिक कोष से 1 लाख 26 हजार रुपये लूट लिये गये। एक सार्जेंण्ट की पत्नी की हत्या करके उसके बच्चों को अग्नि में फैंक दिया गया। इसके अतिरिक्त कोई हत्या नहीं हुई।

नीमच छावनी से लगभग 40 अँग्रेज, औरतें व बच्चे मेवाड़ की ओर भागे। डूंगला गाँव में एक किसान ने उन्हें शरण दी। इसी समय खबर आयी कि मेवाड़ पोलिटिकल एजेंट कप्तान शावर्स बेदला के राव बख्तसिंह के नेतृत्व में सेना लेकर नीमच आ रहा है। इस पर विद्रोही सिपाहियों ने लूट का माल लेकर बैण्ड बजाते हुए छावनी से कूच किया।

10 जुलाई 1857 को कर्नल लॉरेंस ने नसीराबाद से हर मेजस्टी की 83वीं रेजीमेंट के 100 सैनिक, 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री के 200 सैनिक, सैकेण्ड बॉम्बे कैवलेरी का एक स्क्वैड्रन तथा अजमेर मैगजीन से दो तोपें नीमच भेजीं। तब तक नीमच के क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली के लिये कूच कर चुके थे।

राजपूताना की शाहपुरा रियासत के शासक लक्ष्मणसिंह ने क्रांतिकारी सिपाहियों को शरण दी तथा उनके लिये रसद आदि की व्यवस्था की। निम्बाहेड़ा में भी इन सिपाहियों का भव्य स्वागत हुआ। इन सिपाहियों ने देवली पहुँच कर ब्रिटिश सैनिक छावनी को लूटा। अँग्रेज पहले ही देवली को खाली करके जहाजपुर जा चुके थे।

यहाँ से विद्रोही सिपाही टोंक तथा कोटा होते हुए दिल्ली पहुँचे और दिल्ली के क्रांतिकारियों से मिलकर अंग्रेज सेना पर आक्रमण किया। कप्तान शावर्स ने सेना लेकर विद्रोही सिपाहियों का पीछा किया। वह शाहपुरा भी गया किंतु शाहपुरा के शासक ने उसके लिये नगर के द्वार नहीं खोले। शावर्स जहाजपुर व नीमच भी गया। उसकी सहायता के लिये ए.जी.जी. जार्ज लॉरेन्स भी आ गया किंतु तब तक ये क्रांतिकारी वहाँ से भी दिल्ली के लिये कूच कर चुके थे।

ए.जी.जी. ने डीसा से एक यूरोपियन सेना बुलाकर नसीराबाद में नियुक्त की तथा वहाँ स्थित समस्त भारतीय सैनिकों को सेवा मुक्त कर दिया। 12 अगस्त 1857 को नीमच छावनी के कमाण्डर कर्नल जैक्सन को सूचना मिली कि भारतीय सैनिक पुनः नीमच में विद्रोह करने की योजना बना रहे हैं। सैनिकों ने एक अँग्रेज अधिकारी को मार दिया तथा दो अधिकारियों को घायल कर दिया। मेवाड़ी सैनिकों के सहयोग से इस विद्रोह को भी दबा दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ठाकुर कुशालसिंह

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ठाकुर कुशालसिंह

ठाकुर कुशालसिंह जोधपुर राज्य की आउआ जागीर का सामंत था। वह जोधपुर के राजा से नाराज था। इस कारण उसने अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में खुलकर भाग लिया।

राजपूताना की नसीराबाद छावनी के क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली पहुंच चुके थे। मध्य भारत की नीमच छावनी के क्रांतिकारी जब राजपूताना होते हुए दिल्ली की तरफ बढ़े तो मार्ग में उनका स्थान-स्थान पर स्वागत हुआ। शाहपुरा रियासत के शासक लक्ष्मणसिंह ने क्रांतिकारी सिपाहियों को शरण दी तथा उनके लिये रसद आदि की व्यवस्था की।

निम्बाहेड़ा में भी इन सिपाहियों का भव्य स्वागत हुआ। इन सिपाहियों ने देवली पहुँच कर सैनिक छावनी को लूटा। अँग्रेज पहले ही देवली को खाली करके जहाजपुर जा चुके थे।

विद्रोही सिपाही देवली से टोंक तथा कोटा होते हुए दिल्ली पहुँचे और दिल्ली के क्रांतिकारियों से मिलकर अंग्रेज सेना पर आक्रमण करने लगे। कप्तान शावर्स ने सेना लेकर विद्रोही सिपाहियों का पीछा किया। वह शाहपुरा भी गया किंतु शाहपुरा के शासक लक्ष्मणसिंह ने कप्तान शावर्स के लिये नगर के द्वार नहीं खोले। कैप्टेन शावर्स जहाजपुर एवं नीमच भी गया। उसकी सहायता के लिये ए.जी.जी. जार्ज लॉरेन्स भी आ गया किंतु तब तक क्रांतिकारी दिल्ली के लिये कूच कर चुके थे।

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नसीराबाद, नीमच, शाहपुरा तथा निम्बाहेड़ा के समाचार मारवाड़ राज्य में स्थित सैनिक छावनियों में भी पहुंच रहे थे। इन छावनियों में बहुत लम्बे समय से असंतोष की आग सुलग रही थी। मारवाड़ राज्य पर उस समय महाराजा तख्तसिंह का शासन था। वह ईडर से लाकर राजा बनाया गया था इसलिये मारवाड़ के सामंत उसे विदेशी शासक मानते थे। तख्तसिंह ने मारवाड़ के सामंतों से परंपरागत रेख के साथ नजराना भी मांगा तथा हुक्मनामे में वृद्धि कर दी।

महाराजा तख्तसिंह ने गुजरात से अपने साथ आये आदमियों को राज्य में उच्च पद दिये। इससे मारवाड़ के सामंत, राजा से नाराज थे। उन्होंने राजा को रेख, नजराना व हुक्मनामा देने से मना कर दिया। इनमें आसोप, आउवा तथा पोकरण के ठाकुर प्रमुख थे।

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मारवाड़ राज्य में ई.1836 में जोधपुर-लीजियन नामक सेना स्थापित की गई थी जो ई.1857 में माउण्ट आबू तथा एरिनपुरा में तैनात थी। 18 अगस्त 1857 को जोधपुर लीजियन के कुछ सिपाहियों ने माउण्ट आबू में अँग्रेज सैनिकों की बैरकों में घुसकर गोलियां चलाईं तथा ए.जी.जी. के पुत्र ए. लॉरेंस को घायल कर दिया। कप्तान हॉल ने अंग्रेज सिपाहियों की सहायता से विद्रोही भारतीय सिपाहियों को अनादरा गाँव तक खदेड़ दिया। इसके बाद विद्रोही सैनिक 23 अगस्त 1857 को ऐरिनपुरा पहुँचे।

ऐरिनपुरा में इनका स्वागत हुआ तथा ऐरिनपुरा के भारतीय सिपाहियों में भी विद्रोह हो गया। विद्रोही सिपाही पाली की ओर बढ़े। जोधपुर नरेश तख्तसिंह ने जोधपुर के किलेदार अनाड़सिंह को सेना देकर अंग्रेजों की सहायता के लिये भेजा। इस पर क्रांतिकारी सैनिक पाली जाने के बजाय आउवा की तरफ मुड़ गये। आउवा ठाकुर कुशालसिंह ने इन सैनिकों का स्वागत किया। कुशालसिंह को लाम्बिया, बांटा, भीवलिया, राडावास, बांजावास आदि ठिकानों के सामंतों का समर्थन प्राप्त था। ठाकुर कुशालसिंह ने जोधपुर के पोलिटिकल एजेंट मॉक मेसन को सूचित किया कि उसने क्रांतिकारियों को इस बात पर सहमत कर लिया है कि यदि उन्हें क्षमा कर दिया जाये तो वे अपने हथियार तथा सरकारी सम्पत्ति अंग्रेज सरकार के पास जमा करवा देंगे।

इस पर पोलिटिकल एजेंट मॉक मेसन ने ठाकुर कुशालसिंह को लताड़ पिलाई कि वह उन लोगों की पैरवी कर रहा है जो देशद्रोही हैं तथा जिन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया है।

ठाकुर कुशालसिंह ने इसे अपना अपमान समझा तथा क्रांतिकारियों से बात करके उन्हें अपने किले में बुला लिया। कुशालसिंह ने अँग्रेजों से और राजा तख्तसिंह की सेनाओं से लड़ने का निश्चय किया। गूलर का ठाकुर बिशनसिंह, आसोप का ठाकुर शिवनाथसिंह तथा आलणियावास का ठाकुर अजीतसिंह भी अपनी सेनाएं लेकर आउवा पहुंच गये। खेजड़ला ठाकुर ने भी अपने कुछ सैनिक कुशालसिंह की मदद के लिये भेज दिये।

मेवाड़ के सलूम्बर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द के सामंतों ने भी अपनी सेनाएं आउवा भेज दीं। इस प्रकार आउवा मारवाड़ में क्रांतिकारियों का मुख्य केन्द्र बन गया। इसी बीच किलेदार अनाड़सिंह की सहायता के लिये जोधपुर से कुशलराज सिंघवी, छत्रसाल, राजमल मेहता, विजयमल मेहता आदि की सेनाएं भी आ गयीं। अनाड़सिंह ने अपनी तोपों के मुंह आउवा के किले की ओर खोल दिये।

क्रांतिकारी सैनिकों ने भी जोधपुर राज्य की सेना पर गोलीबारी आरम्भ कर दी। जोधपुर की राजकीय सेना के दस सिपाही मारे गये तथा अनाड़सिंह की सेना पराजित हो गयी। लेफ्टीनेंट हीथकोट ने पाँच सौ अश्वारोही लेकर क्रांतिकारी सिपाहियों पर आक्रमण किया। क्रांतिकारी सिपाहियों ने जोधपुर राज्य की सेना के 76 सिपाही मार डाले। किलेदार अनाड़सिंह स्वयं भी इस युद्ध में बुरी तरह घायल हो गया।

हीथकोट किसी तरह जान बचाकर भागा। कुशलराज सिंघवी और विजयमल मेहता भी मैदान छोड़कर भाग गये। क्रांतिकारी सिपाहियों ने राजकीय सेना के डेरे लूट लिये।

आउवा में पराजय के समाचार सुनकर ए.जी.जी. जॉर्ज लारेंस 18 सितम्बर को आउवा पहुँचा। एजीजी के आ जाने से आउवा और भी महत्वपूर्ण हो गया। एजीजी सम्पूर्ण राजपूतानें में सबसे बड़ा अंग्रेज अधिकारी हुआ करता था। इसलिए जोधपुर राज्य का पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेसन भी अपनी सेना लेकर आ गया।

बड़े-बड़े अंग्रेज अधिकारियों को स्वयं मुकाबले में आया देखकर क्रांतिकारी सिपाहियों का उत्साह दुगुना हो गया उन्होंने अंग्रेज सेना पर भयानक गोलीबारी की जिसमें मॉक मेसन मारा गया। क्रांतिकारी सैनिकों ने पोलिटिकल एजेंट मैक मॉसन का सिर काटकर आउवा किले के दरवाजे के सामने लटका दिया। ए.जी.जी. जॉर्ज लॉरेंस डरकर अजमेर भाग गया। इसके बाद आउवा के क्रांतिकारी भी दिल्ली के लिए प्रस्थान कर गए।

मारवाड़ राज्य के गूलर, आसोप, आलणियावास तथा आउवा ठिकानों के ठाकुर भी क्रांतिकारी सिपाहियों का नेतृत्व करते हुए नारनौल तक गये तथा अँग्रेजी फौजों से युद्ध किया। इस प्रकार राजपूताने में जोधपुर, जयपुर, बीकानेर, कोटा आदि बड़ी रियासतों के महाराजा अंग्रेजों की तरफ रहे जबकि उनके अधीनस्थ ठाकुरों ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का नेतृत्व किया। वे लाल किले में बैठे बूढ़े बादशाह बहादुरशाह जफर को फिर से भारत का बादशाह बनाना चाहते थे किंतु उनके प्रयास असंगठित थे, उनके पास कोई योजना नहीं थी, दिल्ली पहुंचकर भी उनके भाग्य में केवल अंग्रजी सेना से लड़ते हुए मर जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं था।

दिल्ली पर अधिकार कर लेने के बाद अँग्रेज सेना ने आउवा पर फिर से चढ़ाई की। 20 जनवरी 1858 को कर्नल होमल ने आउवा को घेरा। इस समय ठाकुर कुशालसिंह के पास केवल 700 सैनिक थे। चार दिन तक आउवा का घेरा चलता रहा। दोनों पक्षों में भीषण गोलीबारी हुई।

अंततः ठाकुर कुशालसिंह रात के अंधेरे में आउवा छोड़कर मेवाड़ चला गया और उसके भाई (लाम्बिया ठाकुर) ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व ग्रहण किया। अंत में अँग्रेजों ने आउवा के किलेदार को रिश्वत देकर किले पर अधिकार कर लिया। अँग्रेजों ने आउवा को जमकर लूटा। सिरियाली के ठाकुर को पकड़ कर राजा तख्तसिंह के पास भेज दिया। गूलर, आसोप एवं आलणियावास की किलेबंदी नष्ट कर दी।

जब अँग्रेजों ने आसोप घेर लिया तब आसोप ठाकुर ने अँग्रेज सेना पर आक्रमण किया। पाँच सप्ताह तक चले इस युद्ध के बाद आसोप ठाकुर की युद्ध सामग्री समाप्त हो गयी और उसे समर्पण करना पड़ा। आसोप ठाकुर को बंदी बना लिया गया तथा उसकी जागीर जब्त कर ली गयी।

गूलर तथा आलणियावास के ठाकुरों की जागीरें भी जब्त कर ली गयीं तथा उन्हें डाकू घोषित किया गया। आउवा ठाकुर भी मेवाड़ से नारनौल चलागया तथा कुछ समय बाद नारनौल से लौटकर कई वर्षों तक अपनी जागीर फिर से प्राप्त करने की जुगत करता रहा। उसने आउवा पर कई आक्रमण किये किंतु असफल रहा। अंत में ई.1860 में उसने नीमच में आत्म-समर्पण किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेजर बर्टन की हत्या

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मेजर बर्टन की हत्या

कोटा रियासत के विद्रोही सेनिकों ने ब्रिटिश सेना के मेजर बर्टन की हत्या कर दी और उसका सिर काटकर कोटा के किले पर लटका दिया। उन्होंने कोटा महाराव को भी किले में बंद कर दिया।

राजपूताना में 1857 की क्रांति में कोटा राज्य की क्रांति सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थी। कोटा में ई.1838 से कोटा कन्टिजेन्ट स्थापित थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी सरकार द्वारा कोटा के शासक से इस बटालियन के रख-रखाव का पूरा खर्चा लिया जाता था।

जून 1857 में नीमच विद्रोह को दबाने के लिये मेजर बर्टन कोटा कन्टीजेंट को लेकर नीमच गया। तब तक नीमच के क्रांतिकारी दिल्ली के लिये प्रस्थान कर चुके थे। अतः कोटा की सेना को आगरा भेज दिया गया। यह सेना सितम्बर 1857 में विद्रोह करने पर उतर आयी।

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जब कोटा कंटिजेंट की सैनिक टुकड़ी द्वारा आगरा में विद्रोह कर दिए जाने के समाचार कोटा पहुँचे तो कोटा में स्थित पलटनों में भी क्रांति के बीज फूट पड़े। मेजर बर्टन 12 अक्टूबर को आगरा से वापस कोटा लौटा।

कोटा महाराव रामसिंह (द्वितीय) ने मेजर बर्टन का स्वागत विजयी सेनानायक की भांति किया। मेजर बर्टन ने कोटा नरेश को गुप्त परामर्श दिया कि वह उन सैनिक अधिकारियों को बर्खास्त कर दे जिनमें ब्रिटिश विद्रोही भावनाएं हैं। यह परामर्श कोटा के सैनिकों को ज्ञात हो गया।

इससे क्रुद्ध होकर 15 अक्टूबर 1857 को कोटा राज पलटन में विद्रोह हो गया। कोटा की नारायण पलटन तथा भवानी पलटन ने हथियारों से लैस होकर कोटा रेजीडेंसी को घेर लिया जहाँ मेजर बर्टन का आवास था। तीन हजार सैनिकों ने लाला जयदयाल तथा रिसालदार मेहराबखान के नेतृत्व में प्रातः साढ़े दस बजे कोटा रेजीडेंसी पर गोलाबारी आरम्भ कर दी जहाँ पोलिटिकल एजेंट निवास करता था।

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इस हमले में रेजीडेंसी के सर्जन डॉ. सेल्डर तथा डॉ. काण्टम, मेजर बर्टन के दो पुत्रों एवं स्वयं मेजर बर्टन की हत्या हो गई। कोटा के क्रांतिकारियों को कोटा राज्य के अधिकांश अधिकारियों यहाँ तक कि विभिन्न किलों के किलेदारों का भी सहयोग मिल गया। क्रांतिकारी सैनिकों ने राजकीय भण्डारों, बंगलों, दुकानों, शस्त्रागारों, शहर कोतवाली आदि पर अधिकार कर लिया। उन्होंने कोटा राज्य के कोषागारों पर भी आक्रमण किया। मेजर बर्टन का सिर काटकर कोटा शहर में घुमाया गया तथा महाराव का महल घेर लिया गया। महाराव ने अँग्रेजों तथा करौली के शासक से सहायता मंगवाने के लिये संदेश भिजवाये। ये संदेश भी क्रांतिकारियों के हाथ लग गये। अतः सैनिकों ने राजमहल पर हमला कर दिया। महाराव रामसिंह ने मथुराधीश मंदिर के महंत को मध्यस्थ बनाकर विद्रोही सैनिकों से संधि कर ली।  सैनिकों ने महाराव से एक कागज पर लिखवाया कि मेजर बर्टन की हत्या महाराव के आदेश पर की गयी है तथा महाराव ने लाला जयदयाल को अपना मुख्य प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किया है। लगभग 6 माह तक कोटा महाराव का अपने राज्य पर कोई अधिकार नहीं रहा।

इस पर करौली के शासक मदनपाल तथा उदयपुर के महाराणा स्वरूपसिंह ने अपनी सेनाएं कोटा भेजीं ताकि कोटा महाराव को क्रांतिकारियों के चंगुल से छुड़ाया जा सके।

करौली तथा मेवाड़ से आई सेनाओं ने कोटा के क्रांतिकारी सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया। इससे कोटा का राजमहल तो क्रांतिकारियों के नियंत्रण से बाहर निकल गया किंतु शहर का एक भाग अब भी कोटा महाराव के नियंत्रण में नहीं था। वहाँ पर क्रांतिकारी सैनिकों ने भीषण लूटपाट आरम्भ कर दी।

कोटा महाराव ने क्रांति का दमन करने के लिये ए.जी.जी. से सहायता मांगी। ए.जी.जी. ने बम्बई से सेना मंगवाई जो मार्च 1858 में चम्बल नदी के उत्तरी किनारे पर पहुँची। इस समय चम्बल का दक्षिणी भाग क्रांतिकारी सैनिकों के अधिकार में था किंतु जनरल रॉबर्ट्स ने आसानी से इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में 120 से 130 क्रांतिकारी सैनिक मारे गये। 30 मार्च 1858 तक सम्पूर्ण कोटा शहर पर महाराव का अधिकार हो गया।

लाला जयदयाल तथा मेहराबखान भूमिगत हो गये किंतु उन्हें कुछ ही महीनों में पकड़कर फांसी दे दी गयी। कोटा की क्रांति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें राज्याधिकारी भी क्रांतिकारियों के साथ थे तथा उन्हें जनता का प्रबल समर्थन प्राप्त था। वे चाहते थे कि कोटा का महाराव अँग्रेजों के विरुद्ध हो जाये तो वे महाराव का नेतृत्व मान लेंगे किंतु महाराव इस बात पर सहमत नहीं हुआ। कोटा की क्रांति का सबसे दुखद पहलू मेजर बर्टन की हत्या थी।

जिस समय 1857 की भारत-व्यापी क्रांति आरम्भ हुई, उस समय मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह के सम्बन्ध न तो अपने सरदारों से अच्छे थे और न कम्पनी सरकार से। महाराणा सामंतों को प्रभावहीन करना चाहता था। इससे सरदार दो धड़ों में विभक्त थे तथा उनमें खूनी संघर्ष की संभावना थी। इस कारण महाराणा और कम्पनी सरकार दोनों को ही मेवाड़ के सामंतों से भय था। इसलिये महाराणा तथा कम्पनी सरकार दोनों को ही एक दूसरे के सहयोग की आवश्यकता थी।

मेरठ विद्रोह की सूचना मिलने पर राजपूताना के ए.जी.जी. लॉरेंस ने महाराणा स्वरूपसिंह को पत्र लिखा कि वह अपनी सेनाएं तैयार रखे ताकि उनका उपयोग संभावित विद्रोह को दबाने में किया जा सके। महाराणा ने अपने सामंतों को आदेश दिया कि वे अपनी सेनाएं तैयार रखें तथा पोलिटिकल एजेंट शावर्स के आदेशों को महाराणा के ही आदेश समझें। मेवाड़ की भील कोर का मुख्यालय खैरवाड़ा में था, वहाँ भी क्रांति होने का भय था।

नीमच के क्रांतिकारी सैनिक, नीमच छावनी में आग लगाने के बाद चित्तौड़, हमीरगढ़ एवं बनेड़ा में सरकारी बंगलों को लूटते हुए शाहपुरा पहुँचे। शाहपुरा के राजाधिराज लक्ष्मणसिंह ने क्रांतिकारी सैनिकों को अपने महल में शरण दी तथा उन्हें रसद सामग्री उपलब्ध करवाई।

क्रांतिकारी सैनिक शाहपुरा से देवली की ओर रवाना हुए। उनके आगमन की सूचना पाकर अँग्रेज अधिकारियों के परिवार देवली से भाग खड़े हुए। उन्हें जहाजपुर में स्थित मेवाड़ी सेना ने बचाकर उदयपुर भिजवाया।

कप्तान शावर्स ने मेवाड़ की एक टुकड़ी को क्रांतिकारी सैनिकों के पीछे भेजा तथा स्वयं नीमच होते हुए शाहपुरा आ गया। शाहपुरा के राजाधिराज लक्ष्मणसिंह ने शावर्स के लिये किले के दरवाजे नहीं खोले। इस पर शावर्स जहाजपुर होता हुआ बेगूं पहुंचा। बेगूं के रावत महासिंह ने शावर्स का स्वागत किया तथा क्रांतिकारियों को अपने ठिकाने में नहीं घुसने दिया। क्रांति समाप्त होने पर अँग्रेज सरकार ने रावत को दो हजार रुपए की खिलअत प्रदान की।

सलूम्बर के रावत ने परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए महाराणा स्वरूपसिंह को धमकाया कि यदि उसकी परम्परागत मांगें नहीं मानी गयीं तो वह चित्तौड़ के किले पर महाराणा के प्रतिद्वंद्वी को बैठा देगा। इस पर महाराणा ने अँग्रेजों से सहायता मांगी।

महाराणा का पत्र पाकर कप्तान शावर्स ने सलूम्बर के रावत को धमकी दी कि यदि वह गड़बड़ी करने का प्रयास करेगा तो उसका ठिकाना जब्त कर लिया जायेगा। इस पर सलूम्बर के रावत ने कहा कि मैं कुछ नहीं कर रहा, यह तो केवल अफवाह है। कुछ दिनों बाद क्रांतिकारी सैनिकों की एक टुकड़ी सलूम्बर में आकर ठहरी।

इस पर शावर्स ने रावत को लिखा कि विद्रोही सैनिकों को अपने यहाँ ही रोके तथा उनके मुखिया को गिरफ्तार करके भेज दे किंतु रावत ने ऐसा नहीं किया तथा विद्रोही सैनिकों को वहाँ से निकल जाने दिया। इस पर अँग्रेजों ने उससे स्पष्टीकरण मांगा। रावत ने कहा कि वह विद्रोही सैनिकों के आगे विवश था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महारानी लक्ष्मी बाई

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महारानी लक्ष्मी बाई

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के सबसे चमकते हुए सितारों में से एकथी महारानी लक्ष्मी बाई जिस पर प्रत्येक हिन्दू को गर्व है। महारानी लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों को भारतीय नारी की शक्ति से परिचित करवाया!

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में राजपूताने के बड़े राजा न केवल क्रांति के विरोधी बने रहे अपितु अंग्रेजों को संजीवनी भी देते रहे। जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, कोटा, बूंदी, झालावाड़, डूंगरपुर, बासंवाड़ा, सिरोही, प्रतापगढ़, जैसलमेर, भरतपुर तथा धौलपुर रियासतों के राजा-महाराजा नहीं चाहते थे कि यह क्रांति सफल हो। उदयपुर का महाराणा तथा करौली के महाराजा चाहते तो थे कि यह क्रांति विफल हो किंतु वे क्रांतिकारियों की सहायता करने में असमर्थ थे।

यद्यपि भारत की अधिकांश मुस्लिम रियासतें लाल किले में बैठे बहादुरशाह जफर को फिर से भारत का शासक बनाने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए थीं तथापि राजपूताने की एकमात्र मुस्लिम रियासत टोंक इस क्रांति के समय अंग्रेजों की सहायता कर रही थी क्योंकि टोंक का प्रथम नवाब अमीर खाँ एक कुख्यात पिण्डारी हुआ करता था जिसे अंग्रेजों ने टोंक का नवाब बना दिया था तथा राजपूताने में एकमात्र मुस्लिम रियासत की स्थापना की थी। इस रियासत को अस्तित्व में आए अभी पचास साल ही हुए थे।

बीकानेर एवं जोधपुर के राजाओं ने क्रांतिकारी सैनिकों के भय से जंगलों में भाग गए अंग्रेज अधिकारियों के परिवारों को ढूंढ-ढूंढ कर अपने महलों में बुलवाया तथा उन्हें अभयदान दिया। वस्तुतः राजपूताना ने ही अंग्रेजी शासन को जीवन दान दिया।

राजपूताना के राजाओं के इस रवैये का कारण राजाओं एवं सामंतों के बीच चल रहे खराब सम्बन्धों को ठहराया जा सकता है। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार ने विगत चालीस सालों से सामंतों की गतिविधियों एवं उच्छृंखलताओं पर रोक लगाकर देशी राजाओं एवं महाराजाओं के राज्यों को स्थायित्व एवं सुरक्षा प्रदान की थी।

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भले ही राजपूताना के बड़े राजा कम्पनी सरकार का साथ दे रहे थे किंतु देश के अन्य हिस्सों के कुछ राजा, कम्पनी सरकार के खिलाफ थे तथा इस क्रांति में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। इनमें से महारानी लक्ष्मीबाई भी एक थी।

हम पूर्व की कड़ियों में चर्चा कर चुके हैं कि ईस्वी 1857 की क्रांति की चिन्गारी अंग्रेजों से असंतुष्ट मराठों के खेमे से ही उठी थी। क्योंकि अंग्रेजों ने ईस्वी 1851 में अंग्रेजों की पेंशन पर पल रहे पेशवा बाजीराव (द्वितीय) की मृत्यु हो जाने पर उसके दत्तक पुत्र ढोन्ढू पन्त को पेशवा मानने और पेंशन देने से मना कर दिया था। इस पर उसने राष्ट्रव्यापी क्रांति की योजना बनाई जिसमें देश के बहुत से तत्व स्वतः ही जुड़ते चले गए थे। हम एक बार पुनः मराठा शिविर की ओर चलते हैं जहाँ महारानी लक्ष्मी बाई तथा तात्या टोपे की शौर्य-गाथाएं हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं।

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ईस्वी 1853 में झांसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई तथा अंग्रेजों ने उसके दत्तक शिशु पुत्र दामोदर राव को झाँसी का राजा मानने से मना कर दिया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को 60 हजार रुपए मासिक पेंशन स्वीकार की तथा उसे अपने दत्तक पुत्र को लेकर महल खाली करके चले जाने के आदेश दिए। जब कम्पनी सरकार ने झांसी को ब्रिटिश क्षेत्र में सम्मिलित करने का निर्णय लिया तो लक्ष्मीबाई ने कहा कि वह अपनी झांसी नहीं देगी। झाँसी राज्य को समाप्त होता देखकर झाँसी के सैनिकों में भी अँग्रेजों के विरुद्ध असन्तोष व्याप्त हो गया।

5 जून 1857 को झाँसी की सेना ने विद्रोह किया तथा झाँसी में मौजूद अँग्रेज अधिकारियों को दुर्ग में घेरकर 8 जून 1857 को उनकी हत्या कर दी। आरम्भ में रानी लक्ष्मीबाई ने विद्रोहियों का समर्थन नहीं किया तथा सागर डिवीजन के कमिशनर को पत्र लिखकर अपनी स्थिति भी स्पष्ट की। ब्रिटिश कमिश्नर अर्सकाइन ने रानी लक्ष्मीबाई को झांसी के प्रशासन का उत्तरदायित्व सौंपा, फिर भी अँग्रेजों ने झाँसी की घटनाओं के लिए रानी लक्ष्मीबाई को दोषी ठहराया।

जब ओरछा तथा दतिया के शासकों ने झाँसी पर आक्रमण किया, तब भी रानी लक्ष्मीबाई अँग्रेजों से सहायता प्राप्त करना चाहती थी किन्तु अँग्रेजों ने उसे सन्देह की दृष्टि से देखा। विवश होकर रानी ने झाँसी के विद्रोहियों का नेतृत्व ग्रहण कर लिया। रानी का दमन करने के लिए सर ह्यूरोज सेना लेकर बुन्देलखण्ड की ओर आया। रानी ने स्वयं सेना का संचालन किया।

ग्वालियर से तांत्या टोपे भी रानी लक्ष्मीबाई की सहायता के लिए आ पहुँचा किन्तु कुछ देशद्रोहियों ने किले के फाटक खोल दिये जिससे अंग्रेजों की सेना झांसी के किले के भीतर आ गई। अतः रानी लक्ष्मीबाई 4 अप्रैल 1858 को अपने पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधकर रात के अन्धेरे में नगर से बाहर चली गई और ग्वालियर, गुना, बीना तथा बारां होती हुई राजपूताना के झालावाड़ नगर के निकट कालीसिंध नदी के किनारे तक आ पहुंची।

जब झालावाड़ के राजराणा पृथ्वीसिंह को अपने सैनिकों से ज्ञात हुआ कि महारानी अँग्रेजों से लड़ती हुई कालीसिंध के तट पर आकर ठहरी है तो राजराणा ने महारानी लक्ष्मी बाई को महल में आमंत्रित किया। महारानी महारानी लक्ष्मी बाई की दशा देखकर पृथ्वीसिंह को भारत भूमि की दुर्दशा का बोध हुआ। पृथ्वीसिंह ने महारानी को दो दिन तक अपने महल में ठहराया तथा उसे नये वस्त्र प्रदान किये।

अँग्रेजी सेनाएं महारानी लक्ष्मी बाई का पीछा करती हुई झालावाड़ तक आ पहुंचीं। इस पर महारानी को झालावाड़ छोड़ना पड़ा। महारानी बहादुरी से लड़ती हुई कालपी पहुँच गयी। ह्यूरोज भी रानी का पीछा करते हुए कालपी आ पहुँचा। कालपी में दोनों पक्षों के बीच घमासान युद्ध हुआ। मई 1858 में कालपी पर अग्रेजों का अधिकार हो गया।

वहाँ से रानी ग्वालियर पहुँची तथा ग्वालियर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। ह्यूरोज भी रानी का पीछा करता हुआ ग्वालियर पहुँचा और रानी को घेर लिया। रानी ने यहाँ से भी निकलने का प्रयास किया किन्तु उसका घोड़ा एक नाला पार करते समय वहीं गिर गया। रानी स्वयं भी बुरी तरह घायल हो गई। वहीं पर उसकी देह छूट गई।

असीम धैर्य, साहस, स्वाभिमान और पराक्रम का परिचय देकर महारानी ने अँग्रेजों को खूब छकाया और अंत में मानव जाति के इतिहास में अपना नाम सबसे ऊपर लिखवा कर अमर हो गई। सुभद्रा कुमारी चौहान ने महारानी लक्ष्मी बाई को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है-

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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