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दिल्ली की लूट

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दिल्ली की लूट

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति का भयावह चेहरा दिल्ली की लूट के रूप में सामने आया। दिल्ली के गुण्डों और अपराधियों ने क्रांतिकारियों के साथ मिलकर दिल्ली के सेठों को लूट लिया तथा अंग्रेज परिवार की औरतों को कत्ल कर दिया। तिलंगों ने जेनिंग्स की खूबसूरत बेटी के टुकड़े कर दिए!

जब दिल्ली की सिविल लाइन्स से लेकर मुख्य गार्ड तथा मैगजीन के अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार या तो मारे गए या अपने घरों से भागकर इधर-उधर छिप गए तब तिलंगों अर्थात् मेरठ से आए पुरबिया सैनिकों ने दिल्ली के कश्मीरी बाजार की तरफ प्रस्थान किया। उन्हें देखते ही कश्मीरी बाजार में भगदड़ मच गई। अंग्रेज अधिकारी अपनी जान बचाने के लिए सड़कों एवं गलियों में बेतहाशा भागने लगे और जहाँ-तहाँ छिपने का प्रयास करने लगे।

बहुत से अंग्रेज अधिकारी हाथों में नंगी तलवारें लेकर भाग रहे थे और तिलंगे हाथों में बंदूकें लिए उनका पीछा कर रहे थे। शहर के उत्पाती लोग भी इन तिलंगों के साथ हो गए और वे भी अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके स्त्री-बच्चों पर ईंटें, पत्थर, डण्डे और लोहे के सरियों से वार करने लगे।

कुछ अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार फखरुल मस्जिद में जाकर छिप गए। इस पर क्रांतिकारी सैनिकों ने मस्जिद को घेर लिया तथा मस्जिद में छिपे हुए अंग्रेजों को मस्जिद से बाहर घसीट लिया। मौत के भय से कांपते हुए तथा अपने प्राणों की भीख मांगते हुए उन समस्त अंग्रेज स्त्री-पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया गया।

इसके बाद क्रांतिकारी सैनिकों ने कॉलिन्स साहब की हवेली तथा सेंट जेम्स चर्च घेर लिया। तिलंगों ने उन्हें भी बरबाद कर दिया। क्रांतिकारी सैनिकों ने छोटे-छोटे जत्थे बना लिया और वे दिल्ली की गलियों में बिखर गए। वे हर किसी से पूछते थे कि अंग्रेज कहां छिपे हुए हैं? जैसे ही किसी अंग्रेज के बारे में जानकारी मिलती थी, तिलंगे उस अंग्रेज को सड़क पर घसीटकर मार डालते थे। दोपहर होते-होते दिल्ली की सड़कों पर अंग्रेजों की लाशों के ढेर लग गए। तिलंगों ने प्रत्येक कोठी और बंगले में घुसकर अंग्रेजों को मार दिया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

दिल्ली का रेजीडेंट साइमन फ्रेजर, फ्रेजर का सहायक थॉमस कॉलिन्स, दिल्ली बैंक की चांदनी चौक शाखा का मुख्य अधिकारी ब्रैसफोर्ड, टेलिग्राफ ऑफिस का मुख्य अधिकारी चार्ल्स टॉड तथा कॉलिन्स के परिवार के तेबीस सदस्य मार डाले गए।

रेजीडेंट साइमन फ्रेजर के सहायक अधिकारी थॉमस कॉलिन्स के परिवार के समस्त सदस्य मार दिए गए। सेंट जेम्स चर्च में 23 लोगों को मार डाला गया। फादर जेनिंग्स, दिल्ली बैंक के बेरेसफोर्ड परिवार और हाल ही में ईसाई बने डॉ. चमनलाल को भी मार दिया गया। कचहरी में भी जबर्दस्त लूटमार मची।

मरने वालों में फादर जेनिंग्स की एक खूबसूरत बेटी भी शामिल थी। अभी उसने यौवन की देहरी पर पैर ही रखा था कि बेरहम मौत ने उसे बिना किसी अपराध के आकर जकड़ लिया। जब दिल्ली के अंग्रेजों को मार दिया गया तब दिल्ली के अमीर हिन्दुओं एवं मुसलमानों की बारी आई। बहुत से लुटेरे भी खाली बोरियां लेकर दिल्ली की सड़कों पर निकल आए और बड़े-बड़े घरों एवं हवेलियों में घुसकर लूटमार करने लगे।

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स्कॉटिश लेखक विलियम डेलरिम्पल ने ‘द लास्ट मुगल’ में लिखा है कि लुटेरों ने क्रांतिकारी सैनिकों का मार्गदर्शन करना आरम्भ कर दिया। वे किसी भी बड़ी हवेली की तरफ संकेत करके कहते कि इस हवेली में गोरी मेम छिपी हुई है। यह सुनकर क्रांतिकारी सैनिक उस हवेली पर हमला बोल देते और ये गुण्डे तथा लुटेरे उनके साथ हवेली में घुसकर उसे लूट लेते। मौलवी मुहम्मद बाकर ने ‘देहली उर्दू अखबार’ में लिखा है कि जब मेरी नजर दिल्ली कॉलेज की तरफ पड़ी तो मैंने देखा कि उसका सारा सामान, तस्वीरें, उपकरण, नक्शे, किताबें, दवाइयां लूटे जा चुके थे।

लोग इतने जोश में थे कि उन्होंने जमीनों पर लगे पत्थरों और दरवाजों के कब्जों तक को उखाड़ लिया। हर तरफ से बंदूकें चलने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। बहुत से लोग सिर्फ इसलिए लूटे गए क्योंकि वे अमीर थे। सबसे पहले दिल्ली के अमीर एवं अलोकप्रिय जैन और मारवाड़ी साहूकारों की बारी आई। लुटेरों ने बैंक के पार्टनरों सालिगराम और मथुरादास को निशाना बनाया। जब क्रांतिकारी सैनिक सालिगराम की हवेली के दरवाजे नहीं तोड़ सके तब आधी रात के समय स्थानीय मुसलमान युवकों के सहयोग से दरवाजों के पेच खोल दिए गए और हवेली में घुसकर सारा धन लूट लिया गया।

दिल्ली के मुस्लिम युवक, सालिगराम और मथुरादास से इसलिए नाराज थे क्योंकि कुछ दिन पहले इन दोनों ने अंग्रेजों से शिकायत करके शहजादे मिर्जा शाहरुख को गिरफ्तार करवाया था। सालिगराम संभवतः दिन में ही अपनी हवेली से बाहर निकल गया था। उसने रात होने पर बादशाह जफर के सामने घुटनों पर गिरकर पुकार लगाई कि आपके इस सेवक का सब-कुछ लुट गया है। मेरी तमाम हुंडियां और बहियां नष्ट कर दी गई हैं। घर में रोजमर्रा का सामान भी नहीं बचा है।

सालिगराम अब भी बादशाह को बादशाह समझ रहा था क्योंकि उसने सुना था कि यह क्रांति बहादुरशाह के निर्देश पर हो रही है किंतु वह यह नहीं जानता था कि इस समय बादशाह बहादुरशाह जफर सालिगराम की कोई सहायता नहीं कर सकता था! वह तो खुद उन समाचारों को सुनकर हैरान था जो दिल्ली की गलियों से निकल-निकल कर बादशाह तक पहुंच रहे थे!

दिल्ली के एक तत्कालीन पुलिस अधिकारी सईद मुबारक शाह ने लिखा है- ‘जब शहर में चारों तरफ गुण्डे-बदमाश लूटमार कर रहे थे तब एक सराय में ठहरे हुए आठ मुसलमान राजपूतों ने जिन्हें रंघोरिए कहा जाता था, कुछ डाकुओं और बदमाशों को एकत्रित करके शहर के एक हिस्से में आग लगा दी और फिर अपने ऊंटों पर सोने की मोहरें, जेवरात और दूसरी कीमती चीजें लादकर अपने गांव की ओर चल दिए। यह लूटमार पूरे दिन और रात भर जारी रही।’

बहादुरशाह जफर के खास खिदमतगार जहीर देहलवी ने लिखा है-

‘मैं हिम्मत करके घर से बाहर निकला तो मैंने देखा कि पीपल के एक पेड़ के नीचे बहुत से हिन्दू जमा थे और वे दिल्ली में घुस आए बागी सैनिकों को पूरियां और मिठाई खिला रहे थे। कोतवाली के सामने बदमाशों का एक गिरोह जमा था। रास्ते की सारी दुकानें लूटी जा रहीं थीं। शहर के सब बदमाश इन गुंडों और मुजरिमों के साथ हो गए।

लालच ओर जोश के मारे वे बैंक के दरवाजे पर आ गए और वहाँ बेरेसफोर्ड परिवार के लोगों को मार डाला जिनमें औरतें और बच्चे भी शािमल थे। लुटेरों ने बैंक की तिजारियों को तोड़कर सब नोट लूट लिए। बलवा करने वाले लोग कुछ तो बागी सिपाही थे, कुछ जेल से निकले मुजरिम। पहलवान, चोर, उचक्के तथा निम्न तबके के लोग भी इनमें शामिल हो गए थे। शरीफ घर का एक भी आदमी इस लूटमार में शामिल नहीं था।

महज एक घण्टे में चौदह लाख रुपए लूटे गए। बहुत से लोग इन गुण्डों से जान बचाने के लिए भाग रहे थे और सड़कों पर खून ही खून बिखरा पड़ा था। जब मैं किले के दरवाजे पर पहुंचा तो मैंने देखा कि पचास लोग लाइन लगाए अंदर जाने के रास्ते की निगरानी कर रहे थे। वहाँ जोर की हवा चल रही थी और उसमें एक फटी हुई अंग्रेजी किताब के पन्ने किले की दिशा में उड़ रहे थे।’ 

क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा बहुत से मुगल अमीरजादों एवं दिल्ली के महत्वपूर्ण लोगों के साथ बदसलूकी की गई और उनके घर लूटे गए। इनमें दिल्ली का शिया लीडर हामिद अली खाँ भी शामिल था। उस पर अंग्रेजों को छिपाने का इल्जाम लगाया गया। तिलंगों ने हामिद अली खाँ को पकड़कर बादशाह के सामने पेश किया। बादशाह ने किसी तरह बीच-बचाव करके हामिद अली की जान बचाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तिलंगों का कहर

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तिलंगों का कहर
तिलंगों का कहर

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में भाग लने वाले पुरबिया सैनिकों को भारतीय इतिहास में तिलंगा कहा गया है। दिल्ली वासियों ने इन तिलंगों का कहर अपनी आंखों से देखा। जब तिलंगों ने दिल्ली पर आक्रमण किया, तब उनका उद्देश्य अंग्रेजों को मारकर दिल्ली को मुक्त करवाना और बहादुरशाह जफर को बादशाह घोषित करना था किंतु जब ये दिल्ली में घुसे तो दिल्ली के गुण्डे और अराजक तत्व तिलंगों के साथ हो गए तथा दिल्ली में लूटपाट करने लगे।

11 मई 1857 को दिल्ली में केवल इतना ही नहीं हुआ था कि अंग्रेजों को दिल्ली से मारकर या भगाकर सरकारी कार्यालयों पर कब्जा कर लिया गया था और दिल्ली के कुछ बड़े रईसों को दिल्ली के स्थानीय गुण्डों ने लूट लिया था, अपितु कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं जिनका उल्लेख भारत के इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलता है।

इसका कारण यह है कि अंग्रेजों ने उस काल के अधिकांश दस्तावेजों को क्रांति समाप्त होने के बाद लंदन पहुंचा दिया था जिनमें वे अखबार, बहुत से लोगों की निजी डायरियां एवं पत्र आदि भी शामिल थे जिनमें इन घटनाओं का जिक्र किया गया था। ये दस्तावेज अब ब्रिटिश म्यूजियम के लाइब्रेरी खण्ड के बक्सों में बंद हैं।

1857 की घटनाओं से सम्बन्धित बहुत से दस्तावेजों के पुलिंदे लाल किले में नियुक्त मुस्लिम अधिकारियों के पास थे जो अंग्रेजों की नजरों से बचा लिए गए थे। ये पुलिंदे ईस्वी 1947 में पाकिस्तान बनने के समय दिल्ली से चुपचाप कराची पहुंचा दिए गए। ऐसे बहुत से दस्तावेज आज भी लाहौर एवं इस्लामाबाद की लाइब्रेरियों एवं संग्रहालयों में रखे हुए हैं।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

लाल किले की कुछ बेगमें एवं शाही परिवार के कुछ सदस्य ईस्वी 1858 में बादशाह बहादुरशाह जफर के साथ बर्मा चले गए थे। उन लोगों के पास भी कुछ पत्र एवं डायरियां थीं जो उनके साथ बर्मा चली गईं। इस प्रकार 1857 की क्रांति के दस्तावेजों का जखीरा बिखर गया और इस क्रांति का जो भी इतिहास लिखा गया, वह बहुत ही टूटा-फूटा इतिहास है। वीर सावरकर ने इस क्रांति की घटनाओं पर आधारित इतिहास को बहुत सुंदर तरीके से अपनी पुस्तक ‘अट्ठारह सौ सत्तावन का स्वातंत्र्य समर’ नामक पुस्तक में सहेज लिया जो आज भारत की अनुपम धरोहर है।

एक स्कॉटिश लेखक विलियम डेलरिम्पल ने ईस्वी 2004-2005 में लंदन, दिल्ली, कराची, लाहौर, रंगून आदि शहरों का भ्रमण करके इन दस्तावेजों को खंगाला तथा अपने ग्रंथ ‘द लास्ट मुगल’ में बहुत से नवीन तथ्यों का प्रकाशन किया। इस धारावाहिक की कुछ कड़ियों में उन तथ्यों को आधार बनाया गया है। डेलरिम्पल के वर्णन में तिलंगों का कहर प्रमुखता से चित्रित हुआ है।

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विलियम डेलरिम्पल ने 11 मई 1857 को कम्पनी सरकार की अदालत के लोअर मजिस्ट्रेट थियोफिलस मेटकाफ के सम्बन्ध में घटित एक घटना का बहुत रोचक वर्णन किया है।  11 मई को जब पहाड़गंज के थानेदार मुईनुद्दीन को मेरठ के तिलंगों के दिल्ली में घुसने की सूचना मिली तो उसने अपनी कोतवाली पहुंचकर सिपाहियों को हथियार दिए तथा उन्हें बागियों का सामना करने के आदेश दिए। जिस समय थानेदार यह कर ही रहा था कि कम्पनी सरकार की अदालत का लोअर मजिस्ट्रेट थियोफिलस मेटकाफ एक घोड़े पर सवार होकर कोतवाली पहुंचा। उसके हाथ में नंगी तलवार लहरा रही थी और वह पूरे जोश में था। थानेदार ने देखा कि मजिस्ट्रेट के शरीर पर केवल एक कमीज और जांघिया ही बचा है। उसके कपड़े तिलंगों ने उतार लिए थे।

थियोफिलस मेटकाफ तो तिलंगों के हाथों मारा ही जाने वाला था किंतु किसी दैवीय कृपा से वह एक खाई में गिर गया और तिलंगों की दृष्टि से बच गया। जब तिलंगे वहाँ से चले गए तब थियोफिलस मेटकाफ किसी तरह अपने घोड़े पर बैठकर कोतवाली पहुंचा। जब थानेदार ने मेटकाफ को इस हालत में देखा तो उसने मेटकाफ को अपने मित्र भूरे खाँ मेवाती के घर में छिपा दिया।

थियोफिलस मेटकाफ न केवल दिल्ली में कम्पनी सरकार की अदालत में लोअर मजिस्ट्रेट था अपितु वह दिल्ली के पूर्ववर्ती रेजीडेंट थॉमस मेटकाफ का बेटा भी था जिसे बहादुरशाह जफर की बेगम जीनत महल ने जहर देकर मरवाया था।

कुछ प्रत्यक्षदर्शी लोगों ने लिखा है कि जब मेटकाफ अपने घोड़े पर सवार होकर जा रहा था, तब उसने अचानक उन पुरबिया सैनिकों को देखा जो अंग्रेजों को मार रहे थे। इसलिए मेटकाफ तुरंत अपने घोड़े से उतर गया और उसने अपने कपड़े स्वयं ही उतार फैंके और उन लोगों की भीड़ में छिप गया जो सिपाहियों को देखने के लिए जमा हो गई थी। यदि मेटकाफ ऐसा नहीं करता तो निश्चित ही तिलंगों का कहर उस पर मौत बनकर टूटता!

जब तिलंगे कुछ दूर चले गए तो मेटकाफ फिर से अपने घोड़े पर बैठकर कोतवाली पहुंच गया। कुछ लोगों के अनुसार तिलंगों ने मेटकाफ को पकड़ लिया था और जब तिलंगे पकड़े गए अंग्रेजों को गोलियां मार रहे थे, तब मेटकाफ एक खड्डे में गिर गया और उसके प्राण बच गए।

थियोफिलस मेटकाफ की तरह कुछ और भी अंग्रेज 11 मई 1857 के दंगों में अपने प्राण बचाने में सफल हुए थे। दिल्ली की सैन्य छावनी, सिविल लाइन्स, चर्च आदि स्थानों से जीवित ही बच निकले अंग्रेज उत्तर-पश्चिम दिल्ली में स्थित एक पहाड़ी की टेकरी पर बने फ्लैगस्टाफ-टॉवर के निकट एकत्रित हो गए।

इस पहाड़ी को अंग्रेजों के शासन काल में ‘रिज’ के नाम से जाना जाता था। आज भी इस पहाड़ी को रिज ही कहा जाता है तथा इसे दिल्ली विश्वविद्यालय के निकट देखा जा सकता है।

हमने इस रिज का उल्लेख इसलिए किया है कि यह रिज 1857 की क्रांति की महत्वपूर्ण घटनाओं की साक्षी रही है। तिलंगों का कहर इसने अपनी आंखों से देखा है। अंग्रेज दिल्ली से भागने से पहले इसी रिज पर एकत्रित हुए थे और जब वे फिर से दिल्ली में लौटकर आए तो उन्होंने इसी रिज पर अपनी सेनाओं का जमावड़ा आरम्भ किया।

11 मई 1857 की शाम होने तक दिल्ली से जान बचाकर भागे अधिकांश अंग्रेज रिज पर स्थित फ्लैगस्टाफ-टॉवर तक पहुंचने में सफल रहे थे। फ्लैगस्टाफ-टॉवर पर कुछ टेलिग्राफ कर्मचारी भी एकत्रित हो गए। वे दिल्ली में स्थित उच्च अंग्रेज अधिकारियों एवं दिल्ली के निकटवर्ती स्थानों में स्थित अधिकारियों को दिल्ली में हुई घटनाओं की जानकारी भेजने लगे तथा सहायता के लिए आग्रह करने लगे किंतु थोड़ी ही देर में स्पष्ट हो गया कि दिल्ली के अंग्रेजों को कहीं से भी शीघ्र सहायता मिलने की आशा नहीं है।

जिस प्रकार जीवित अंग्रेज दिल्ली से भाग-भागकर रिज की तरफ आ रहे थे उसी प्रकार अंग्रेज अधिकारियों के शवों से भरी ही वह बैलगाड़ी भी रिज पर चली आई जिसे अंग्रेजों ने प्रातः काल में मुख्य गार्ड से बैरकों की ओर रवाना किया था। रिज पर स्थित अंग्रेजों ने अपने मृत साथियों के शवों का वहीं पर अंतिम क्रिया-कर्म किया।

कुछ अंग्रेज अधिकारियों ने उसी रात करनाल के लिए प्रस्थान कर दिया। बहुत से अंग्रेज अधिकारियों को मार्ग में स्थित ग्रामीण लोगों की सहायता मिल गई किंतु उनमें से अधिकतर अंग्रेजों को मार्ग में लुटेरों ने लूट लिया। बहुत से अंग्रेजों के बदन पर कपड़े तक न बचे।

अंग्रेजों को लूटा और मारा गया, यह बात समझ में आती है, किंतु यह बात समझ में नहीं आती कि उन निरपराध भारतीयों को किस बात की सजा मिली थी जिन्हें गुण्डों द्वारा सड़कों पर कत्ल करके उनका सब-कुछ लूट लिया गया था! संभवतः उन्हें सभ्य, सम्भ्रांत एवं निर्दोष होने की सजा मिली थी, जो प्रायः इस धरती के अधिकांश लोगों को मिला करती है!

पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरागांधी को लिखे एक एक पत्र में इन गुण्डों को समाज का कचरा कहकर सम्बोधित किया है। सभ्यता का दर्प रखने वाले भारतीय समाज में समाज का यह कचरा कुछ ज्यादा ही है, तब भी था और आज भी है!

उधर अंग्रेज करनाल की तरफ भागे जा रहे थे और इधर दिल्ली शहर पर रात की काली चादर अपना शिकंजा कसती जा रही थी। आग की लपटों, काले-सफेद धुंओं, और लुटे-पिटे घरों से निकलती सिसकारियों ने भी सुबह होते-होते दम तोड़ दिया। सूरज की किरणों के निकलने से बहुत पहले ही रोती-बिलखती दिल्ली चुप हो चुकी थी किंतु आगे क्या होगा, इसकी बेचैनी में तड़प रही थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अंग्रेजों की लाशें

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अंग्रेजों की लाशें

दिल्ली की सड़कें अंग्रेजों की लाशों से पट गईं। इन लाशों को उठाने की तो कौन कहे, इनकी ओर मुंह करके खड़े होने वाला भी कोई नहीं था। दिल्ली मानो खून के ज्वार-भाटे से बाहर निकली थी जो अपने पीछे गोरे इंसानों की लाशें छोड़ गया था।

अंततः 11 मई 1857 का मनहूस दिन और उसके बाद की चीत्कारों भरी रात बीत गई तथा 12 मई का मलिन सा सवेरा दिल्ली की वीरान सड़कों पर अनमने ढंग से उपस्थित हो गया। कल जो गुण्डे और लुटेरे दिल्ली की सड़कों पर राज कर रहे थे, आज वे कहीं भी दिखाई नहीं देते थे क्योंकि अब उन्हें लूटने की नहीं, अपितु लूट के उस माल को छिपाने की चिंता थी जो उन्होंने कल रईसों, सेठों और लालाओं की हवेलियों तथा अंग्रेजों के बंगलों से लूटा था।

ईस्वी 1857 में दिल्ली भारत की राजधानी नहीं थी किंतु मुगल बादशाह की उपस्थिति के कारण भारत में दिल्ली की प्रतिष्ठा अंग्रेजों की राजधानी कलकत्ता के समानांतर अवश्य थी। आज इसी समानांतर राजधानी के समस्त सम्भ्रांत लोग लुट-पिट कर रो रहे थे और जो लुटने से बच गए थे, अपने जान-माल की रक्षा के लिए अपने मकानों के तहखानों में दुबके पड़े थे।

किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि वह दिल्ली की उन सड़कों पर निकलकर देखे कि अंग्रेजों की लाशें किन-किन सड़कों पर पड़ी हैं! कौनसे लाला की हवेली के दरवाजे टूटे पड़े हैं और कौनसे रईस के अस्तबल के घोड़े कल सुबह से भूखे खड़े हैं!

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दिल्ली की सड़कों पर अंग्रेजों की लाशें बिखरी हुई थीं। ये शव उन रौबीले फिरंगियों के थे जिन्हें देखते ही कल तक हिन्दुस्तानियों की टांगें पसीने से भीग जाती थीं किंतु आज वे मानव-शरीर अपने रौब और घमण्ड को खोकर सड़कों पर तिनकों की भांति बिखरे हुए थे। अंग्रेजों की लाशें सभ्य भारतीयों को डराने के लिए उसी तरह पर्याप्त थीं, जिस तरह ये लाशें जीवित होने पर डराती थीं।

इन रौबीले शासकों के अचानक ही दृश्य से गायब हो जाने के कारण आज के दिन दिल्ली का कोई स्वामी नहीं रह गया था। इसलिए यह तय नहीं कि इन शवों की अंत्येष्टि कौन करेगा! उन दिनों की दिल्ली में नगर पालिका नहीं थी, पुलिस जरूर थी किंतु वह भी उच्च अधिकारियों के आदेश बजाने की इतनी अभ्यस्त थी कि स्वयं अपनी तरफ से कुछ भी निर्णय लेने में अक्षम थी।

लगभग ग्यारह बजे शहर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित पहाड़गंज पुलिस स्टेशन का थानेदार मुईनुद्दीन हुसैन खान अपने घर से निकला और किसी तरह डरता-सहमता हुआ लाल किले तक पहुंचा। वहाँ का दृश्य और भी विचित्र था! बादशाह के अधिकांश खिदमतगार, चोबदार और पहरेदार तिलंगों तथा लुटेरों के भय से लाल किला छोड़कर भाग चुके थे। लाल किले के मुख्य दरवाजे पर कोई नहीं था। जब मुइनुद्दीन सूने महलों में घुसा तो भी उसे रोकने वाला कोई नहीं था।

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अंत में थानेदार को एक कमरे में दो ख्वाजासरा दिखाई दिए जो अदब से खड़े हुए बादशाह की खिदमत बजा रहे थे। थानेदार ने उन ख्वाजासरों से कहा कि मुझे बादशाह सलामत से मिलने दें। ख्वाजासरों ने बादशाह से अनुमति लेकर थानेदार को बादशाह से बात करने की इजाजत दे दी। समय-समय की बात है, एक समय वह भी था कि बड़ी-बड़ी दाढ़ियों और भारी-भरकम भालों वाले ड्यौढ़ीदार और मीरबक्शी बादशाह की खिदमत में रहा करते थे और बादशाह तक यह निवेदन पहुंचने में कई-कई दिन और महीने लग जाया करते थे कि अमुक देश का राजकुमार या वजीर बादशाह के हुजूर में पेश होना चाहता है।

आज उसी महल में, उसी मुगलिया बादशाह के पास, दो हिंजड़ों के अलावा और कोई नहीं बचा था! ख्वाजासरा महबूब अली का भी कहीं अता-पता नहीं था। इसलिए थानेदार को बादशाह के सामने पहुंचने में कोई समय नहीं लगा। थानेदार मुईनुद्दीन हुसैन खान ने बादशाह को दिल्ली के हालात की जानकारी दी। कहने को वह दिल्ली का थानेदार था और इसी हैसियत से बादशाह के सामने उपस्थित हुआ था किंतु न तो वह अपनी कोतवाली को दंगाईयों के हाथों जलाए जाने से बचा पाया था और न किसी भी शहरी का मकान लुटने से रोक पाया था।

संभवतः कुछ देर बाद बादशाह के कुछ चोबदार दिल्ली की सड़कों पर शांति हो गई जानकर फिर से बादशाह के हुजूर में लौट आए थे। बादशाह ने थानेदार मुइनुद्दीन की बात विस्तार से सुनी तथा अपने चोबदारों को थानेदार के साथ दरियागंज भेजा ताकि वे बादशाह की ओर से मुनादी करें कि- ‘दिल्ली में कत्लो-गारत तुरंत बंद किया जाए।’

बादशाह ने थानेदार मुइनुद्दीन तथा अपने चोबदारों से यह भी कहा कि यदि उन्हें कोई घायल या बेसहारा अंग्रेज मिले तो उसे किले में लाकर उसकी हिफाजत करें। जब बादशाह के चोबदारों ने दरियागंज में बादशाह के आदेश का ऐलान किया तब दिल्ली की गलियां पूरी तरह सूनी थीं। लूट का सिलसिला थम चुका था। सड़कों पर आवारा कुत्तों के सिवाय और कोई दिखाई नहीं देता था। शायद दिल्ली में लुटने के लिए कुछ बचा ही नहीं था!

बादशाह के चोबदारों को लगभग एक दर्जन घायल अंग्रेज और उनके स्त्री बच्चे यत्र-तत्र छिपे हुए मिले जिन्हें वे लाल किले में ले आए। बादशाह ने उच्च अंग्रेज अधिकारियों फ्रेजर, डगलस, जेनिंग्स और उनके परिवार के लोगों के शवों को लाल किले में मंगवा लिया तथा दर्जियों को बुलवाकर अंग्रेजों के शवों के लिए कफन सिलवाए।

इसे समय का ही फेर कहा जा सकता है कि जो अंग्रेज पिछले 54 सालों से लाल किले के पर कतरते आ रहे थे आज वही लाल किला उन अंग्रेजों के लिए कफन सिलवा रहा था! जिन अंग्रेजों ने बादशाह को लाल किला छोड़कर जाने के आदेश दिए थे, आज उन्हीं अंग्रेजों के शव लाल किले से अंतिम विदाई ले रहे थे। बादशाह ने मुनादी करवाई कि लाल किले में रह रहे सभी मर्द, अंग्रेज अधिकारियों के जनाजे में शामिल होंगे!

बादशाह के आदेश से थानेदार ने दिल्ली के समस्त अंग्रेजों के बंगलों एवं चर्चों की तलाशी ली। चर्च के भीतर थानेदार को 19 अंग्रेज छिपे हुए मिले। थानेदार उन्हें लाल किले में ले आया। जब थानेदार मुइनुद्दीन यह काम निबटकार लाल किले से निकल ही रहा था कि मेरठ से आए क्रांतिकारी सिपाहियों का एक घुड़सवार दस्ता धड़धड़ाता हुआ लाल किले में घुस आया।

शाहजहाँ तथा औरंगजेब के जमाने में जिस लाल किले में घुसते हुए बड़ों-बड़ों की रूहें पानी मांग लेती थीं आज उसी लाल किले में घुसने के लिए तिलंगों को किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं थी!

जिस थानेदार मुईनुद्दीन हुसैन खान को देखकर बड़े-बड़े अपराधियों की टांगें कांपने लगती थीं, आज वही थानेदार इन तिलंगों को देखकर अपनी टांगों में कंपकंपी का अनुभव करने लगा। थानेदार समझ गया कि अब यही तिलंगे दिल्ली के असली मालिक हैं! किसी बड़ी अनहोनी की आशंका से उसका कलेजा कांप गया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहादुरशाह जफर की बादशाहत

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बहादुरशाह जफर की बादशाहत

बहादुरशाह जफर मुगलों के वंश में भारत का आखिरी बादशाह था किंतु बहादुरशाह जफर की बादशाहत लाल किले के भीतर तक ही सीमित थी। अठ्ठारह सौ सत्तावन के क्रांतिकारियों ने उसे कुछ दिन के लिए फिर से बादशाह बना दिया। यह बुझते हुए दीपक की अंतिम लौ थी। वह पहली और आखिरी बार दिल्ली की सड़कों पर बादशाह की हैसियत से निकला।

12 मई 1857 की दोपहर में घोड़ों पर बैठे तिलंगों का एक दस्ता लाल किले में धड़धड़ाता हुआ घुस गया था। ये तिलंगे बिना किसी भय के लाल किले में धंसते ही चले गए। लाल किले के लोग उन्हें देखते ही सहम गए और उनके लिए स्वयं ही रास्ता छोड़ने लगे। यहाँ तक कि ये सिपाही बादशाह के निजी महल तक पहुंच गए और अपने घोड़ों से उतर कर बादशाह के महल में दाखिल हो गए।

इन सिपाहियों ने आज से पहले कभी किसी बादशाह को नहीं देखा था, न उन्हें उन नियमों एवं परम्पराओं की जानकारी थी जिनका पालन बादशाह के समक्ष जाते समय करना होता था। उन सबने अपने शरीर पर तलवारें और पीठ पर बंदूकें लगा रखी थीं और वे जूते तथा टोप पहने हुए थे।

बादशाह के समक्ष कोई भी व्यक्ति अपने हथियार लेकर और जूते पहनकर नहीं जा सकता था किंतु तिलंगों को किसी अदब, कायदे और रवायत से कुछ लेना-देना नहीं था। वे तो दिल्ली के विजेता थे। दिल्ली आज इन तिलंगों के कदमों में थी। इतना ही नहीं, वे तो महारानी विक्टोरिया का ताज बहादुरशाह को सौंपने आए थे। इसलिए यदि तिलंगों के व्यवहार में दर्प झलकता था, तो इसमें कुछ आश्चर्यजनक नहीं था।

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जब तिलंगों ने बादशाह के कक्ष के बाहर तैनात एक चोबदार से कहा कि वे बादशाह से मिलना चाहते हैं तो बादशाह ने कहलवाया कि वह उन बागियों से नहीं मिलना चाहता है जिन्होंने दिल्ली में घुसकर निरपराध लोगों की हत्या कर दी है तथा दिल्ली के शरीफ लोगों के घरों में लूटपाट मचाई है।

तिलंगों को बादशाह के इन्कार पर हैरानी हुई। वे तो यह सोचते थे कि बादशाह बड़े उत्साह से क्रांतिकारियों का स्वागत करेगा तथा तुरंत स्वयं को हिंदुस्तान का बादशाह घोषित करके हिंदुस्तान पर उसी तरह राज करने लगेगा जिस तरह से रानी विक्टोरिया लंदन में बैठकर भारत पर राज कर रही थी किंतु यहाँ तो मामला बिल्कुल उलटा ही था। बादशाह क्रांतिकारियों का नेतृत्व करना तो दूर, उनसे मिलने से भी मना कर रहा था!

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बादशाह के पास इतनी सेना नहीं थी कि वह इन तिलंगों को महल में घुसने से रोक सके किंतु तिलंगों ने बादशाह के चोबदारों के उस आदेश को स्वीकार कर लिया कि किसी को भी बादशाह की अनुमति के बिना बादशाह सलामत के सामने जाने की अनुमति नहीं है। यदि किसी ने ऐसा दुस्साहस किया तो उसे बादशाह सलामत के कहर का सामना करना पड़ेगा। बादशाह के इन्कार कर देने से तिलंगे कुछ निराश तो हुए किंतु वे पीछे हटने को तैयार नहीं थे। वे जानते थे कि पीछे हटने का अर्थ केवल मौत है। भारत में केवल मेरठ या दिल्ली में ही अंग्रेजी सेनाएं नहीं थीं जिन्हें तिलंगों ने परास्त कर दिया था, अपितु कलकत्ता से लेकर राजपूताने तक अंग्रेजों की सैंकड़ों सेनाएं मौजूद हैं जो तिलंगों को मसल कर रख सकती थीं।

तिलंगे जानते थे कि यदि बहादुरशाह जफर ने क्रांतिकारी सैनिकों का साथ नहीं दिया तो भारत में मौजूद अंग्रेजी सेनाएं क्रांतिकारी सैनिकों को ढूंढ-ढूंढ कर मारेंगी। अतः तिलंगे लाल किले के भीतर ही डटे रहे तथा बादशाह के समक्ष अपना अनुरोध बार-बार-भिजवाते रहे। अंत में आधी रात के समय बहादुरशाह क्रांतिकारी सिपाहियों के सामने आया।

बहादुरशाह जफर ने क्रांतिकारी सिपाहियों से कहा कि उन्होंने बहुत गलत काम किया है। अंग्रेजों के निरपराध परिवारों एवं दिल्ली के रईसों को मारकर वे कौनसी क्रांति कर रहे हैं! इस पर कुछ तिलंगों ने बहुत तैश में आकर बादशाह की बात का प्रतिवाद किया। इससे बादशाह और अधिक नाराज हो गया।

अंत में देर तक चली बहस के बाद दोनों पक्ष शांत हो गए तथा बादशाह ने इस शर्त पर क्रांतिकारियों का नेतृत्व करना स्वीकार किया कि वे निरपराध लोगों पर हाथ नहीं उठाएंगे और उनकी सम्पत्तियों को नुक्सान नहीं पहुंचाएंगे तथा बादशाह के समक्ष तमीज से पेश आएंगे।

तिलंगों ने बादशाह की इन शर्तों को स्वीकार कर लिया और उन्होंने रात में ही बादशाह को 21 तोपों की सलामी दी। इस तरह 12 और 13 मई के बीच की आधी रात के सन्नाटे में लाल किले में से तोपें गरजने लगीं। इस प्रकार जिंदगी के अंतिम दिनों में बहादुरशाह जफर की बादशाहत आरम्भ हुई।

लाल किले से छूटते तोप के गोलों की आवाज से दिल्ली के लोगों की नींद खुल गई। अनजाने भय से सभी की छाती कांप गई। हे ईश्वर! जाने क्या होने को है! ये तोपें क्यों गरज रही हैं, क्या तिलंगों ने लाल किला उड़ा दिया या फिर अंग्रेज लौट आए! सैंकड़ों तरह की आशंकाएं प्रत्येक दिल्ली वासी के मन में कौंध गई।

लाल किले में गरजती हुई तोपों की आवाज यमुना के पश्चिमी तट पर स्थित रिज पर भी पहुंचीं किंतु तब तक अंग्रेज वहाँ से करनाल के लिए रवाना हो चुके थे। फिर भी वे दिल्ली से अधिक दूर नहीं जा पाए थे। इसलिए बहुत से अंग्रेजों ने भी तोपों की इन आवाजों को सुना। वे भी हैरान थे किंतु आधी रात में लाल किले में गरज रही तोपों का क्या मतलब है, वे समझ नहीं पाए!

सात समंदर पार करके लंदन से दिल्ली पर राज करने आए अंग्रेज आज की रात किसी भी बात का कोई भी अर्थ निकालने में असमर्थ थे। वे तो बस जितनी जल्दी हो सके दिल्ली से बहुत दूर निकल जाना चाहते थे। इसलिए वे असहायों की भांति रात के अंधेरे में भी करनाल की तरफ भागे चले जा रहे थे।

धीरे-धीरे तोपें शांत हो गईं, दिल्ली वासियों की फिर से आंख लग गई और करनाल की तरफ भाग रहे अंग्रेज भी दिल्ली से काफी दूर हो गए।

अंततः 12 मई 1857 की मनहूस रात भी बीत गई और 13 मई का दिन निकल आया। आज का दिन कल की तरह असमंजस से भरा हुआ नहीं था। दिल्ली ने एक दिशा ले ली थी। अब तिलंगे दिल्ली की सड़कों पर अवैध अतिथि नहीं थे। न ही अब वे दिशाहीन हत्यारे थे। और न ही दिल्ली के स्थानीय लुटेरे उन्हें भरम में डालकर उनसे सेठों और लालाओं की हवेलियां लूटने को कह सकते थे।

अब वे दुनिया में सबसे शानदार माने जाने अजीमुश्शान बादशाह बहादुरशाह जफर के सिपाही थे। ऐसे सिपाही जिन्हें बूढ़े बहादुरशाह जफर की बादशाहत स्थापित की थी।

दिल्ली की जनता को भी इस बात का पता चलना जरूरी था। इसलिए तिलंगों ने बादशाह बहादुरशाह जफर से अनुरोध किया कि वह दिल्ली की सड़कों पर एक जुलूस निकाले तथा दिल्ली की जनता को अभयदान दे। बहादुरशाह जुलूस निकालने का बड़ा शौकीन था। इसलिए वह इस कार्य के लिए तुरंत तैयार हो गया।

जब तिलंगे, बहादुरशाह को लेकर दिल्ली की सड़कों पर निकले तो बादशाह को स्वयं पर गर्व हुआ। आज जीवन में पहली बार उसे अनुभव हुआ कि बादशाह होने का अर्थ क्या होता है! तिलंगे पूरे जोश से बादशाह की जय-जयकार कर रहे थे तथा भारत माता की जय बोल रहे थे। जब तिलंगों ने रानी विक्टोरिया और गोरों को गालियां देना आरम्भ किया तो बादशाह खिन्न हो गया। उसने अनुभव किया कि तिलंगों की नारेबाजी में उस गरिमा का अभाव है जो बादशाह के जुलूसों में चलने वाले सिपाहियों में होती है।

तिलंगे अपनी विजय की प्रसन्नता का प्राकट्य अशोभनीय नारों से कर रहे थे, उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि अजीमुश्शान बादशाह हुजूर भी इस जुलूस में शामिल हैं और उनके सामने अशोभनीय शब्दों का उच्चारण नहीं किया जा सकता!

बादशाह अजीब सी दुविधा में फंस गया। एक तरफ से उसे लग रहा था कि यदि इन तिलंगों द्वारा की जा रही यह क्रांति सफल हो गई तो बहादुरशाह जफर भी अपने पुरखों की तरह हिंदुस्तान का बादशाह बन जाएगा किंतु दूसरी तरफ उसे अनुभव हो रहा था कि जब तक इन असभ्य पुरबियों को सभ्यता नहीं सिखाई जाएगी, तब तक ये बादशाह की गरिमा को समझ ही नहीं पाएंगे!

इसी दुविधा में फंसा हुआ बहादुरशाह जफर अपने हाथी पर बैठकर दिल्ली की सड़कों से गुजरता रहा। उसे पता नहीं था कि बहादुरशाह जफर की बादशाहत यहाँ से आरम्भ होकर यहीं पर समाप्त होने वाली थी। इस बादशाहत का कोई भविष्य नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

काफिरों पर कहर

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काफिरों पर कहर

जब तिलंगों ने लाल किले को अंग्रेजों की दासता से मुक्त करवाकर बहादुरशाह जफर को स्वतंत्र बादशाह बना दिया तो दिल्ली की जनता इस घटना की अलग-अलग तरह से व्याख्या करने लगी। हिन्दुओं ने कहा कि यह भारत की आजादी है किंतु मुसलमानों ने कहा कि यह काफिरों पर कहर है।

दिल्ली को पाण्डवों के काल से ही देश भर में सबसे अधिक गौरवशाली नगर होने का सम्मान प्राप्त हो गया था जो पांच हजार साल के काल-खण्ड में कुछ समय के लिए धूमिल पड़कर पुनः-पुनः स्थापित होता रहा था। चौहानों के काल में दिल्ली फिर से भारत की राजधानी का रूप लेने लगी थी। तुर्कों के काल में सवा तीन सौ साल तक दिल्ली देश की राजधानी रही थी। सूरी शासकों ने भी दिल्ली को अपनी राजधानी रखा।

औरंगजेब की तख्तनशीनी भी ई.1668 में दिल्ली के लाल किले में हुई थी, तब से दिल्ली उन मुगलों की राजधानी थी जो दुनिया में सबसे अमीर और सबसे ज्यादा शानोशौकत वाले माने जाते थे। यद्यपि मुगलों को यह अमीरी और शानो-शौकत भारत में आने के बाद प्राप्त हुई थी तथा ई.1739 में नादिरशाह के साथ ईरान चली गई थी तथापि संसार का सबसे गौरवशाली नगर होने की दिल्ली की खुमारी अभी उतरी नहीं थी।

मुहम्मदशाह रंगीला से लेकर बहादुरशाह जफर तक के काल में मुगल बादशाहों की खुमारी भले ही शनैःशनैः उतरती चली गई हो किंतु दिल्ली के नागरिकों की खुमारी उतरने का नाम नहीं लेती थी तो इसके कुछ कारण थे!

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दिल्ली के महलों में दम तोड़ रही मुगलिया संस्कृति, दिल्ली की गलियों में निर्धन भिखारिन की तरह भटकती हुई साफ देखी जा सकती थी। ‘आजाद’ नामक एक लेखक ने ‘आब ए हयात’ नामक पुस्तक में लिखा है- ‘उर्दू दिल्ली में ही पैदा हुई थी, वह शाइरों और इतिहासकारों की जुबान थी जो शाहजहानाबाद के बाजारों में अनाथ होकर घूम रही थी।’

दिल्ली वालों को अब भी अपनी जुबान पर चढ़ी हुई उर्दू भाषा और दिमाग में घुसी हुई मेहमानवाजी का बड़ा गुरूर था। यही कारण था कि जब देश भर के क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली का रुख किया तो दिल्ली का आत्मबोध फिर से द्विगुणित हो गया।

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दिल्ली के लोगों ने क्रांतिकारी सैनिकों का बाहें पसार कर स्वागत किया। जब मेरठ से आए तिलंगों ने दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों को पीटकर भगा दिया, उनके शस्त्रागार तथा कोषागार पर अधिकार कर लिया और अंग्रेजी थानों को उजाड़ दिया तब दिल्ली वालों ने क्रांतिकारी सैनिकों का बड़ा सम्मान किया। दिल्ली वासियों की तरफ से तिलंगों को स्थान-स्थान पर मालाएं पहनाई गईं तथा मिठाइयां खिलाई गईं। दिल्ली वालों का मानना था कि देश भर से आ रहे बागी सिपाही, काफिर-अंग्रेजों को दिल्ली से निकालकर फिर से बादशाह बहादुरशाह जफर की सल्तनत को जमाएंगे। इसलिए दिल्ली की मस्जिदों में क्रांतिकारी सैनिकों की सफलता के लिए दुआएं की जाने लगीं।

दिल्ली में उस समय उर्दू भाषा के दो-चार अखबार निकला करते थे। उनके सम्पादकों ने अपने लेखों में लिखा है- ‘ये बागी सैनिक खुदा की तरफ से काफिरों पर कहर ढाने के लिए भेजे गए हैं। यह सजा इन अंग्रेज काफिरों को इसलिए दी जा रही है क्योंकि उन्होंने हिन्दुस्तान के लोगों का मजहब खत्म करके उन्हें ईसाई बनाने के घमण्डी मंसूबे बांधे थे।’

17 मई 1857 को दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्र देहली उर्दू अखबार में सम्पादक मुहम्मद बाकर ने लिखा है- ‘कुछ लोग कसम खाकर कहते हैं कि तुर्की घुड़सवारों के आने के वक्त उन्होंने देखा कि कुछ ऊंटनियां उनके आगे चल रही हैं जिन पर कुछ लोग हरे लिबास पहने हुए बैठे हैं। वे ऊंटनियां एकदम दृष्टि से ओझल हो गईं और केवल घुड़सवार रह गए जिन्होंने जो भी अंग्रेज मिला, उनको मार दिया….।

सच तो ये है कि अंग्रेजों पर खुदा का कहर टूटा है। उनके घमंड को खुदाई इंतकाम ने चूर-चूर कर दिया है। कुरआन शरीफ में लिखा है कि खुदा घमण्ड करने वालों को पसंद नहीं करता है। वह इन ईसाइयों पर ऐसी प्रलय लाया है कि थोड़े ही समय में इस खून-खराबे ने उनको बिल्कुल ही तबाह और बर्बाद कर दिया। क्योंकि वह सब-कुछ कर सकता है और उसने ही अंग्रेजों के तमाम इरादों और मक्कारियों को नाकाम कर दिया है।

अब यह बहुत जरूरी है कि सब दिल्ली वाले खुदा पर विश्वास रखें और अपनी सारी ताकत जिल्ले सुब्हानी, साया ए खुदावंद शहंशाह सलामत बहादुरशाह जफर की वफादारी और खैरख्वाही में लगाएं। और जो ऐसा करेगा उसको खुदावंद तआला की मदद और समर्थन हासिल होगा।’

स्कॉटिश लेखक विलियम डैलरिम्पल ने अपनी पुस्तक ‘द लास्ट मुगल’ में लिखा है- ‘दिल्ली के एक बुजुर्ग ने उन्हीं दिनों स्वप्न में देखा कि पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हजरत ईसा से कहा कि आपके मानने वाले मेरे दुश्मन हो गए हैं और मेरे मजहब को बिल्कुल मिटा देना चाहते हैं। इस पर हजरत ईसा ने जवाब दिया कि अंग्रेज मेरे अनुयायी नहीं हैं, वे मेरे बताए हुए रास्ते पर नहीं चलते बल्कि शैतान के मानने वालों में शामिल हो गए हैं।’

उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि दिल्ली के मुसलमान तिलंगों द्वारा किए गए अंग्रेजों के कत्लेआम को खुदा का काफिरों पर कहर मान रहे थे।

हालांकि सिपाहियों में अधिकतर हिन्दू थे, फिर भी दिल्ली में जिहाद का झण्डा जामा मस्जिद से बुलंद किया गया। बहुत से बागी सिपाही स्वयं को मुजाहिद, गाजी या जिहादी कहते थे। घेरे की समाप्ति तक क्रांतिकारी सैनिकों में लगभग एक चौथाई सिपाही या तो मर चुके थे या भूख-प्यास से तंग आकर तथा बिना वेतन के निराश होकर मोर्चा छोड़कर चले गए थे। फिर अचानक ही दिल्ली में दूर-दूर से आए ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगी जो सिपाही नहीं थे किंतु वे बहादुरशाह जफर को फिर से हिन्दुस्तान का बादशाह बनाने के लिए स्वयं को युद्ध में झौंकने के लिए आए थे। वे भी स्वयं को मुजाहिद कहते थे।

मेरठ के तत्कालीन कलक्टर मार्क थॉर्नहिल ने दिल्ली पर विद्रोहियों द्वारा अधिकार कर लिए जाने के बाद अपनी डायरी में लिखा है-

‘उन लोगों की बातचीत किले की रस्मो-रिवाज के बारे में थी कि किस तरह उन रिवाजों को फिर से आरम्भ किया जाए। वे लोग अनुमान लगाते थे कि कौन वजीरे आजम बनेगा और राजपूतों के सरदारों में से कौन किसी दरवाजे का प्रहरी होगा! वे बावन राजा कौन से होंगे तो बादशाह की तख्तनशीनी के अवसर पर जमा होंगे। जैसे जैसे मैं उनकी बातें सुनता गया, मुझे यह स्पष्ट होता गया कि मुगलों के प्राचीन दरबार की शानौ-शौकत का आम लोगों के दिलो-दिमाग पर कितना असर है और ये मूल्य दिल्ली के लोगों के लिए कितना महत्व रखते हैं! हमारे जाने बिना ही किस तरह उन्होंने उन मूल्यों को सुरक्षित रखा है। मुगल सल्तनत में कुछ अजीब बात है जो सौ साल की खामोशी के बाद फिर से एक वैचारिक मूर्त रूप ले रही है!’

दिल्ली वालों के लिए देश भर से आए क्रांतिकारियों का महत्व केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं था अपितु धार्मिक रूप से भी था। स्वयं क्रांतिकारी सैनिकों ने 12 मई 1857 को बादशाह से कहा था कि हम सब अपना मजहब बचाने के लिए जमा हुए हैं।

इन सैनिकों ने चांदनी चौक पर खड़े होकर जब दिल्ली की आम जनता को सम्बोधित किया तो उन्होंने जनता से पूछा- ‘भाइयो! क्या आप महजब वालों के साथ हैं?’

दिल्ली की जनता ने एक स्वर में उत्तर दिया- ‘हाँ हम मजहब वालों के साथ हैं।’

यह कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रश्न पूछने वालों ने और उत्तर देने वालों ने मजहब शब्द का अर्थ अपनी-अपनी सुविधा और आकांक्षा के अनुसार लगाया था। इन सब कारणों से दिल्ली की मुस्लिम जनता की यह पक्की धारणा थी कि तिलंगों को खुदा ने ही दिल्ली में भेजा है ताकि उनके बादशाह, उनके मजहब और उनके मदरसों को काफिरों के हाथों नष्ट होने से बचाया जा सके! उनकी पक्की धारणा थी कि यह खुदा का काफिरों पर कहर है, और कुछ नहीं!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली की तवायफें

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दिल्ली की तवायफें

दिल्ली में घुसे तिलंगों ने जब कुछ अंग्रेजों को मार दिया और कुछ अंग्रेजों को दिल्ली से भगा दिया तब तिलंगों की निगाहों को दिल्ली की तवायफें अपनी ओर खींचने लगीं। भारी श्रम के पश्चात् तिलंगे आराम करने के लिए इन तवायफों के कोठों पर कब्जा कर लिया!

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति की क्रांति के समय यद्यपि दिल्ली के साधारण नागरिकों ने देश भर से आ रहे क्रांतिकारी सैनिकों का हृदय से स्वागत किया था तथापि उन्हें दिल्ली में घुस आए बागी सिपाहियों का रवैया परेशान करता था। दिल्ली के सम्भ्रान्त नागरिकों का माथा तो पहले ही दिन ठनक गया था जब तिलंगों ने अंग्रेजों को मारने और भगाने के बाद दिल्ली के धनी-मानी सेठों, लालाओं ओर रईसों के यहाँ लूटमार मचाई थी।

12 मई को दिल्ली पूरी तरह से अंग्रेजों से खाली हो चुकी थी तथा बादशाह ने क्रांति का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया था। उसके बाद भी देश भर के क्रांतिकारी दिल्ली में आते जा रहे थे। दिल्ली में उनके खाने और रहने का कोई प्रबंध नहीं था। इसलिए दिल्ली के जन-साधारण पर दबाव बढ़ने लगा।

जब दिन बीतने लगे तथा देश भर के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले, विभिन्न भाषाओं को बोलने वाले, अलग-अलग आदतों और अलग-अलग स्वभावों वाले सैनिकों का दिल्ली पहुंचना जारी रहा तो दिल्ली वालों को ये सैनिक खटकने लगे।

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चूंकि अंग्रेज दिल्ली छोड़कर भाग चुके थे इसलिए देश भर से आए क्रांतिकारी सैनिकों के पास इस समय करने के लिए कोई काम नहीं था। इसलिए उनके समूह दिल्ली की चकाचौंध देखने के लिए दिन रात दिल्ली की गलियों में घूमते रहते। दिल्ली की जनता क्रांतिकारी सैनिकों के लिए अधिक समय तक निःशुल्क भोजन का प्रबंध नहीं कर सकती थी। दिल्ली के लोग मेहमानवाजी से थकने लगे। विभिन्न क्षेत्रों से आए लोग विशेषकर पुरबिया सैनिकों का व्यवहार दिल्ली वालों को अधिक परेशान करता था। मुंहफट तिलंगे दिल्ली वासियों जितने सभ्य नहीं थे। वे बात-बात पर नागरिकों से झगड़ा करते थे, कोई भी दुकान लूट लेते थे, किसी का भी रास्ता रोक लेते थे।

विलियम डैलरिम्पल ने लिखा है- ‘केवल दो ही हफ्ते में ये क्रांतिकारी सैनिक जिन्हें अब कहीं से वेतन नहीं मिलता था, दिल्ली के ज्यादातर बाजारों को लूट चुके थे और उनके दोस्तों की हवेलियों पर हमला कर चुके थे और दिल्ली के सबसे नफीस तवायफों के कोठों पर काबिज हो गए थे। यह देखकर दिल्ली वालों की राय बदल गई।’

24 मई को ‘देहली उर्दू अखबार’ के सम्पादक मौलवी मुहम्मद बाकर ने लिखा है- ‘सारी रियाया अब लूटमार से तंग आ चुकी है। शहर के रईसों और अमीरों के लिए सख्त खतरा है और पूरा शहर तबाह हो रहा है।’

जब दिल्ली के लोग मेहमानवाजी से थक गए तब दिल्ली की तवायफें तिलंगों की नई शरणगाह बनीं। वैसे भी इन दिनों दिल्ली की तवायफें अपने कोठों पर अकेली बैठी मक्खियां मारा करती थीं क्योंकि कोठों पर मण्डराने वाले धनी लोग तो तिलंगों एवं गुण्डों द्वारा मार डाले गए थे, जो कुछ बचे भी थे, वे दिल्ली छोड़कर भाग चुके थे या तहखानों में छिपे बैठे थे।

तिलंगे तवायफों से जो कुछ चाहते थे, तवायफें उन्हें सहर्ष देने को तैयार थीं किंतु इसके बदले में दिल्ली की तवायफें पैसों की मांग करती थीं जो कि तिलंगों के पास नहीं थे। तवायफों का शरीर नौंचने के बाद उन्हें कुछ देना तो दूर रहा तिलंगे उनके पैसों को भी छीन लेते थे।

अगस्त महीना आते-आते देहली उर्दू समाचार पत्र में ये किस्से छपने लगे थे कि किसी तरह दिल्ली की ऐशो-आराम भरी जिंदगी के कारण क्रांतिकारी सैनिक नाकारा होते जा रहे हैं-

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‘जैसे ही क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली का पानी पीते हैं, या चांदनी चौक का एक चक्कर लगा लेते हैं, और जामा मस्जिद जाकर घंटेवाला की मिठाई चख लेते हैं, उनका दुश्मनों से लड़ने और उनको मारने का सारा जोश और उत्साह ठंडा पड़ जाता है। और सारी हिम्मत और हौंसला खत्म। बहुत से लोगों को कहना है कि वह लड़ाई पर तवायफों के कोठे से बगैर गुस्ल किए पहुंच जाते हैं और यह सब शिकस्त जो उनकी मिली है और आफत हम सब पर आई है, इसी नीच आदत का नतीजा है।’

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है- ‘शाहजहानाबाद के लोग बहुत जल्द इन बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के हिंसक और बेतरतीब देहातियों की विशाल और उज्जड फौज की मेहमानदारी से थक गए।’

दिल्ली से प्राप्त उन दिनों के दस्तावेजों में ऐसी बहुत सी अर्जियां भी हैं जो दिल्ली वालों ने बहादुरशाह जफर को लिखी थीं। इनमें लिखा था कि किस प्रकार देश भर से आए क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली के लोगों पर जुल्म ढा रहे हैं! इन चिट्ठियों में इन घटनाओं को गदर या जंगे-आजादी नहीं कहा गया है अपितु दंगा एवं फसाद कहा गया है।

ईस्वी 1857 की क्रांति के समय दिल्ली में प्रकटतः केवल दो ही पक्ष लड़ रहे थे- क्रांतिकारी सैनिक और अंग्रेज सैनिक किंतु इन दोनों के बीच में दिल्ली की जनता बुरी तरह से फंस गई थी। इस प्रकार अब लड़ाई तीन तरफा हो गई थी।

एक तरफ तो क्रांतिकारी सैनिकों के दल दिल्ली वासियों के मकानों और दुकानों को लूट रहे थे और दूसरी ओर दिल्ली की सीमाओं पर अंग्रेजों की सेनाएं आ पहुंची थीं जो हिंसा और रक्तपात के भारी मंसूबे लेकर दिल्ली तथा दिल्लीवासियों की तरफ बढ़ रही थीं। तीसरी तरफ दिल्ली की वह निरीह जनता थी, जिसके ऊपर बिना बुलाई मुसीबत चौबीसों घण्टे मण्डराया करती थी!

इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली की जनता का एक हिस्सा इस बगावत में प्रत्यक्ष भाग ले रहा था, विशेषकर वे मुसलमान जो अंग्रेजों से इसलिए नाराज थे क्योंकि अंग्रेजों ने दल्ली के बहुत से मदरसों को बंद कर दिया था। उन्हें ये बागी सिपाही खुदा की तरफ से भेजे गए फरिश्तों की तरह प्रतीत होते थे।

विलियम डेलरिम्पल ने आरोप लगाया है कि दिल्ली के क्रांतिकारी सैनिकों ने अपनी जंग को मजहबी रंग देने के लिए दिल्ली के उन तमाम हिन्दुओं एवं मुसलमानों को मार दिया जिन्होंने अपना मजहब छोड़कर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था। उन्होंने उन अंग्रेजों को हाथ भी नहीं लगाया जो ईसाई धर्म छोड़कर मुसलमान हो गए थे।

डॉ. चमनलाल जो कि हिन्दू से ईसाई बन गया था, उसे इन दंगों में मार दिया गया जबकि एंग्लो इण्डियन ईसाई औरत मिसेज ऑल्डवैल को इसलिए जीवित छोड़ दिया गया क्योंकि उसे कलमा पढ़ना आता था।

इसी प्रकार एक अंग्रेज जो कुछ साल पहले कम्पनी की नौकरी छोड़कर ईसाई से मुसलमान बन गया था और जिसने अपना नाम अब्दुल्लाह बेग रख लिया था, उसे भी नहीं मारा गया। वह क्रांतिकारी सैनिकों से मिल गया और पूरी बगावत के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध बहुत सक्रिय रहा।

एक और अंग्रेज, ईसाई धर्म छोड़कर मुसलमान हो गया था, उसका नाम सार्जेंट मेजर गॉर्डन था। वह भी अब्दुल्लाह बेग के साथ मिल गया और उसने क्रांतिकारियों की तरफ से उत्तरी दिल्ली के परकोटे पर तोपों की जिम्मेदारी ली।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तिलंगे

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तिलंगे

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के समय तिलंगे शब्द बड़ा विख्यात हुआ। अंग्रेज अधिकारी इस शब्द से भयभीत थे तो भारतीयों के सीने इस शब्द को सुनकर गर्व से फूल जाते थे। आज भी बहुत से नौजवान जानना चाहते हैं कि तिलंगे कौन थे और कहाँ से आए थे!

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति होने से पहले अंग्रेजों की राजधानी कलकत्ता थी। इस कारण यह स्वाभाविक ही था कि उनकी सबसे बड़ी सेना कलकत्ता के पास बैरकपुर में रहती थी जिसे बंगाल आर्मी कहा जाता था।

यह एशिया की सबसे बड़ी एवं उस काल की सबसे आधुनिक फौज थी, उसके 1 लाख 39 हजार सिपाही थे जो भारत के विभिन्न स्थानों पर नियुक्त थे। स्वाभाविक ही था कि इस सेना में बंगाल, बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के सैनिकों की संख्या अधिक होती।

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बंगाल आर्मी के इन सैनिकों को दिल्ली एवं उसके आसपास के प्रदेश में पुरबिया एवं तिलंगे कहा जाता था। 1857 में बैरकपुर की क्रांति का बिगुल बजाने वाले सिपाही यही पुरबिया थे।

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अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के समय मेरठ में हथियार उठाने वाले सिपाही भी यही पुरबिया थे। सबसे पहले दिल्ली पहुंचने वाले क्रांतिकारी सैनिक भी यही पुरबिया थे। बंगाल आर्मी के इन सैनिकों को भारतीय इतिहासकारों ने क्रांतिकारी सैनिक तथा अंग्रेज इतिहासकारों ने विद्रोही सैनिक एवं बागी कहकर पुकारा है किंतु दिल्ली के लोग इन्हें पुरबिया एवं तिलंगे कहते थे। तिलंगे शब्द का वास्तविक अर्थ तो ज्ञात नहीं किंतु परम्परागत रूप से किसी की परवाह न करने वाले लड़ाके को तिलंगा कहा जाता है।

चूंकि बंगाल आर्मी के ये पुरबिया सैनिक न तो किसी की परवाह करते थे और न किसी से युद्ध या झगड़ा करने से डरते थे, संभवतः इसलिए इन्हें दिल्ली के लोगों ने तिलंगे कहा। यद्यपि तत्कालीन अंग्रेज इतिहासकारों एवं मुगल इतिहासकारों ने इन तिलंगों को असभ्य एवं मुंहफट कहा है किंतु वास्तविकता यह है कि भारत माता इन तिलंगों की चिरकाल तक ऋणी रहेगी क्योंकि इन तिलंगों ने अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के समय राष्ट्रीय गौरव एवं स्वातंत्र्य की जो ज्वाला प्रज्जवलित की, वही ज्वाला अंततः 1947 में अंग्रेजी शासन को भस्म करके भारत राष्ट्र को स्वतंत्रता दिलवा सकी।

यद्यपि इन तिलंगों में से अधिकांश तिलंगे कुछ ही समय में अंग्रेजी सेनाओं द्वारा ढूंढ-ढूंढ कर मार दिए गए किंतु ये तिलंगे अपने पीछे ऐसा इतिहास छोड़ गए जिसकी मिसाल अन्य देशों के इतिहास में मिलनी असंभव है। भारत माता इन तिलंगों की सदैव ऋणी रहेगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली में भुखमरी

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दिल्ली में भुखमरी

तिलंगों ने दिल्ली को अंग्रेजों से मुक्त करवा लिया, बहादुरशाह जफर को दिल्ली का बादशाह घोषित कर दिया किंतु इसके आगे क्या और कैसे करना था, यह न तिलंगों को पता था और न लाल किले को। गुण्डों की लूटपाट से दुकानें बंद हो चुकी थीं, काम-धन्धे बंद हो चुके थे, सड़कों पर भी कोई तभी निकलता था जब बहुत जरूरी कार्य हो। इसलिए कुछ ही दिनों में दिल्ली में भुखमरी फैल गई।

कहा जा सकता है कि दल्ली में भुखमरी के कारण अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति विफल हो गई। एक तरफ तो दिल्ली की आम जनता देश भर से आए क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा शहर में की जा रही लूटपाट से तंग आ चुकी थी और दूसरी ओर स्वयं बादशाह बहादुरशाह जफर भी क्रांतिकारी सैनिकों से अप्रसन्न था। बादशाह को सर्वाधिक शिकायत लाल किले में घूमने वाले तिलंगों से थी। उनमें बात करने की तमीज नहीं थी और वे किसी भी प्रकार का अनुशासन नहीं रखते थे। हर बात पर बहस करते थे और बादशाह के सामने भी जोर-जोर से बोलते थे।

11 मई 1857 को जब पहली बार वे बादशाह के समक्ष प्रस्तुत हुए थे, उस दिन भी तिलंगों ने बादशाह के समक्ष कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था, इस कारण बादशाह उसी दिन से उन लोगों से नाराज था। 12 मई को जुलूस के दौरान भी तिलंगों का आचरण अशोभनीय था।

बहादुरशाह जफर का मानना था कि दिल्ली में घुस आए क्रांतिकारी सैनिक भरोसेमंद नहीं हैं। उन्हें दरबारी तौर-तरीकों की कोई जानकारी नहीं है। वे किसी की इज्जत करना नहीं जानते हैं। उन दिनों के एक अंग्रेजी पत्रकार ने लिखा है कि कुछ तिलंगे लाल किले में बादशाह के सामने जूते पहनकर खड़े रहते थे, इस कारण बादशाह उनसे बहुत नाराज रहता था।

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जब 16 मई 1857 को तिलंगों ने दिल्ली के लाल किले में लाकर रखे गए 52 अंग्रेजों की हत्या करने के लिए बादशाह पर दबाव बनाना शुरु किया तो बादशाह हैरान रह गया! बादशाह ने इन अंग्रेजों को मुसीबत की घड़ी में उनके प्राण बचाकर लाल किले में रखा था और उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिया था किंतु अब तिलंगे चाहते थे कि हाथ में आए हुए अंग्रेजों को जीवित नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

बादशाह अपनी शरण में रह रहे अंग्रेजों की हत्या नहीं करना चाहता था किंतु तिलंगे अपनी जिद छोड़ने को तैयार नहीं हुए। अंत में उन्होंने बादशाह की अनुमति की परवाह किए बिना ही उन अंग्रेजों को लाल किले से बाहर निकाल लिया और लाल किले के सामने ही एक पीपल के पेड़ के नीचे मार दिया। इन अंग्रेजों की हत्या करके तिलंगे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि इन हत्याओं की जिम्मेदारी बादशाह पर आ जाए ताकि भविष्य में कभी भी बादशाह अंग्रेजों से कोई समझौता नहीं कर सके। समझौते के सारे मार्ग बंद हो जाएं।

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जब दिल्ली के जनसाधारण को लाल किले में रह रहे अंग्रेजों को मार दिए जाने की सूचना मिली तो अधिकांश लोगों को प्रसन्नता हुई क्योंकि अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था किंतु बादशाह की खिन्नता का पार नहीं था। वह कवि हृदय था और रक्तपात को कतई पसंद नहीं करता था। लाल किले में रह रहे चापलूस किस्म के कुछ लोगों ने इस घटनाक्रम की जानकारी करनाल में रह रहे अंग्रेजों तक पहुंचा दी। धीरे-धीरे लाल किले के बहुत से लोग अंग्रेजों के खबरी बन गए और उन्हें दिल्ली में होने वाली घटनाओं की गुप्त सूचनाएं पहुंचाने लगे। अंग्रेजों के लिए गुप्तचरी करने वालों में से कुछ लोग तो लाल किले में बैठे बादशाह की नौकरी करते थे और कुछ लोग बादशाह के रिश्तेदार भी थे।

बादशाह ने अपने सबसे बड़े जीवित शहजादे मिर्जा मुगल को क्रांतिकारी सैनिकों का सेनापति नियुक्त किया किंतु मिर्जा मुगल को सेना का नेतृत्व करने का कोई अनुभव नहीं था इसलिए कम्पनी सरकार द्वारा सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त किए हुए तिलंगों ने शहजादे की कोई इज्जत नहीं की और उसके आदेशों का मजाक उड़या।

तिलंगों सहित देश के अन्य भागों से आए सिपाहियों ने भी शहजादे के आदेश मानने की बजाय अपने ही अधिकारियों के आदेश मानना बेहतर समझा। जो बादशाह, शहजादे या सेनापति इन सेनाओं को वेतन नहीं दे सकते थे, उस बादशाह, शहजादे या सेनापति के आदेश कोई भी सेना भला क्यों मानती!

शहजादे मिर्जा मुगल ने दिल्ली के नागरिक प्रशासन के लिए भी कुछ व्यवस्थाएं करनी चाहीं किंतु वहाँ भी वह अधिक कुछ नहीं कर सका। कम्पनी सरकार के भारतीय कर्मचारी अपनी जगहों पर तैनात थे किंतु उन्हें वेतन कौन देगा, इस प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं था। इसलिए इन सरकारी कर्मचारियों से काम करवाना शहजादे के लिए संभव नहीं था।

मुसीबत कभी अकेली नहीं आती। यह कहावत 1857 की दिल्ली की जनता के साथ भी चरितार्थ हुई थी। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि जब दिल्ली का कोई स्वामी नहीं रहा तो दिल्ली की सीमाओं पर आस पास के क्षेत्रों से गूजर समुदाय के कुछ समूह आकर बैठ गए।

उन्होंने दिल्ली नगर में आने वाले रास्तों पर अपने नाके स्थापित कर दिए और वे दिल्ली में अनाज लेकर आने वाले किसानों से बलपूर्वक चुंगी वसूलने लगे। उनके भय से बहुत से किसानों ने दिल्ली नगर में अनाज लाना बंद कर दिया। कुछ ही दिनों में दिल्ली में अनाज की कमी हो गई और चारों ओर भुखमरी फैलने लगी।

इन सबके बीच में दिल्ली की आम जनता घुन की तरह पिसने लगी। उसके कष्टों का कोई पार नहीं था। बहुत से घरों में एक समय चूल्हा जल सकने योग्य अनाज भी नहीं बचा था। दिल्ली की दुकानें और व्यापार बंद थे तथा इन परिस्थितियों के बीच किसी भी आदमी की कोई आमदनी या रोजगार नहीं रह गया था।

दिल्ली की सड़कों पर घूमते सैनिकों के कारण किसी भी घर की बहिन-बेटी अपने घर से बाहर निकलना तो दूर, घर से बाहर निकलने की बात सोच तक नहीं सकती थी। यहाँ तक कि पुरुष और बच्चे भी घरों से निकलने में डरते थे।

इस बार अंग्रेज सैन्य अधिकारी आधे कुचले हुए नाग की तरह क्रोध से फनफना रहे थे और उनके मन में दिल्ली वासियों के लिए किसी तरह की कोई कोमल भावना नहीं थी।

भारत की आजादी के बाद लिखी गई आधुनिक भारत के इतिहास की पुस्तकों में 1857 की क्रांति का वर्णन बड़े गौरव के साथ किया जाता है किंतु यह गौरव तब क्षीण होता हुआ जान पड़ता है जब हम 1857 की क्रांति के समय दिल्ली की जनता की वास्तविक दुर्दशा के बारे में जानते हैं।

राष्ट्रीय गौरव की भावना तब और भी सहम जाती है जब भारत के विभिन्न प्रदेशों से आए हुए क्रांतिकारी सैनिकों की दुर्दशा पर विचार करते हैं। जिस प्रकार जनता के पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा था, उसी प्रकार क्रांतिकारी सैनिकों के पास भी खाने को कुछ नहीं बचा था। उनमें से बहुत से बीमार एवं घायल हो गए थे और उनका उपचार करने वाला कोई नहीं था।

लाल किले में बैठे बादशाह की हालत तो इन सबसे बुरी थी। वह गरुड़ों की सेना से लड़ते हुए नागलोक के उस राजा की तरह था जिसके दांत और विष पूरे सौ साल पहले ही निकाल लिए गए थे। मई का महीना चल रहा था और दिल्ली में प्रचण्ड गर्मी पड़ रही थी। ऐसी विषम परिस्थितियों ने हैजे की महामारी ने किसी दुष्ट चील की तरह उत्तर भारत पर भीषण झपट्टा मारा जिससे जनता त्राहि-त्राहि कर उठी!

दिल्ली में भुखमरी ने जो ताण्डव मचाया था, उससे कहीं अधिक विनाश हैजे के रूप में आई महामारी ने किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अंग्रेजों का आक्रमण

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अंग्रेजों का आक्रमण
अंग्रेजों का आक्रमण

भले ही अचानक आक्रमण करके अंग्रेजों से दिल्ली खाली करवा ली गई थी किंतु अंग्रेज जाति इतनी आसानी से न तो दिल्ली छोड़कर जाने वाली थी और न भारत! जल्दी ही दिल्ली पर अंग्रेजों का आक्रमण हुआ।

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भारत भर में फैली सेनाओं ने विद्रोह का झण्डा उठाया था। इस कारण अंग्रेजों के लिए क्रांति को दबाना कठिन हो गया किंतु इस कठिन समय में राजस्थान के राजाओं ने अंग्रेजों का साथ दिया। इससे अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों की रक्षा हो गई। इसी प्रकार बर्मा, अफगानिस्तान, हिमालय की तराई एवं पंजाब में नियुक्त सेनाओं में विदा्रेह नहीं हुआ था। इस कारण अंग्रेजों ने इन स्थानों की सेनाओं को अम्बाला में एकत्रित करना आरम्भ किया ताकि दिल्ली पर आक्रमण किया जा सके। दिल्ली पर हमला करने से पहले ही बड़े अंग्रेज अधिकारी हैजे से मर गए!

1857 की क्रांति 29 मार्च 1857 को कलकत्ता के निकट बैरकपुर से आरम्भ हुई थी। उसके बाद मेरठ, लखनऊ, कानपुर, बिठूर, झांसी, जगदीशपुर, दानापुर, नीमच, नसीराबाद, ऐरनपुरा, कोटा, देवली, आउवा, रामगढ़ आदि विभिन्न स्थानों पर क्रांति फूट पड़ी थी। क्रांति के इस चरण में अंग्रेज भाग रहे थे और अपनी जान बचा रहे थे किंतु जैसे ही अंग्रेजों को दिल्ली से बाहर निकाल दिया गया क्रांति का दूसरा चरण आरम्भ हो गया।

पाठकों को स्मरण होगा कि 11 मई 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली से भागकर यमुना के पश्चिमी तट पर स्थित रिज पर बने फ्लैगस्टाफ-टॉवर के पास शरण ली थी, तभी कम्पनी सरकार के कर्मचारियों ने टेलिग्राफ के माध्यम से दिल्ली के बाहर स्थित छावनियों के अंग्रेज अधिकारियों को दिल्ली में हुए विद्रोह की सूचना भेज दी थी। इसलिए दिल्ली की तरफ अन्य सैनिक छावनियों से अंग्रेज सेनाएं अपेक्षाकृत अधिक शीघ्रता से भेजने की योजनाएं बनाई जाने लगीं किंतु इस कार्य में कई बाधाएं थीं।

इस काल में कम्पनी सरकार की राजधानी कलकत्ता में थी। इसलिए अंग्रेजों की सबसे बड़ी पलटन कलकत्ता के निकट बैरकपुर में रहती थी। इस काल में बंगाल आर्मी एशिया की सबसे बड़ी एवं आधुनिक सेना थी किंतु उसके 1 लाख 39 हजार सिपाहियों में से 1 लाख 32 हजार सिपाहियों ने अपने ब्रिटिश स्वामियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। इस कारण बंगाल आर्मी को निशस्त्र करने के लिए बर्मा से अंग्रेजी सेनाएं बुलाई गई थीं।

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बंगाल आर्मी के विद्रोह के कारण कलकत्ता से दिल्ली को किसी तरह की सैनिक सहायता भेजी जानी संभव नहीं थी। कम्पनी सरकार ने इस विद्रोह से पहले ही बंगाल आर्मी की ट्रांसपोर्ट यूनिट को खर्चा बचाने के चक्कर में भंग कर दिया था। इस कार्य से अंग्रेजों की मुसीबत और बढ़ गई।

अंग्रेजों की कुछ बड़ी सेनाएं अफगानिस्तान में थी और माना जाता था कि अंग्रेजी सेनाओं के सबसे जांबाज सेनापति अफगानिस्तान के बॉर्डर पर ही नियुक्त थे। ई.1848 में लगभग पूरा पंजाब अंग्रेजों के अधीन आ गया था, इस कारण हिमालय की तराई के ठण्डे स्थानों पर भी बहुत सी गोरी पलटनें पड़ी हुई थीं किंतु उन्हें दिल्ली तक पहुंचाना आसान नहीं था।

मोटर गाड़ी का आविष्कार होने में अभी 30 वर्ष का समय शेष था। इसलिए सेना के परिवहन के लिए घोड़ों की पीठ ही एकमात्र साधन था किंतु पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण बहुत से स्थानों पर तो सड़कें भी उपलब्ध नहीं थीं। पंजाब की नदियां भी इस कार्य में बड़ी रुकावट थीं।

इस कारण अंग्रेजों के पास तात्कालिक रूप से जो सीमित संभावनाएं मौजूद थीं, उनमें यही किया जा सकता था कि दिल्ली के आसपास से सेनाएं भिजवाकर दिल्ली के क्रांतिकारी सैनिकों को घेर लिया जाए ताकि उन्हें अनाज और रसद की कमी हो जाए। जब दूर की सेनाएं भी दिल्ली पहुंच जाएं तो विद्रोही सैनिकों पर सशस्त्र कार्यवाही आरम्भ की जाए।

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इतनी सारी मुसीबतों के होते हुए भी अंग्रेजों ने बहुत तेजी से फैसले लिए। सबसे पहले 17 मई 1857 को अम्बाला तथा मेरठ की गोरी पलटनों को दिल्ली के लिए रवाना किया गया। जब अम्बाला की सेना करनाल पहुंची तो सेना में हैजा फैल गया जिसके कारण सेना को करनाल में ही रुक जाना पड़ा। 27 मई को इस सेना का जनरल जॉर्ज एन्सन हैजे से मर गया। अपने जनरल की मृत्यु से अंग्रेजी सेना के मनोबल पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। इसी बीच अन्य छावनियों में भी विद्रोह हो जाने के समाचार मिलने लगे। इनमें नौशेरा, फिलोर, फीरोजपुर, नसीराबाद, हांसी, हिसार, मुरादाबाद, आगरा, अलीगढ़, मैनपुरी, इटावा, एटा, नीमच, देवली, माउण्ट आबू की छावनियां प्रमुख थीं।

यहाँ तक कि जब अम्बाला में ठहरी हुई गोरी पलटन के उच्च अधिकारी हैजे से जूझ रहे थे, तब अम्बाला छावनी के भारतीय सिपाहियों ने भी क्रांति का झण्डा उठा लिया और वे अपने हथियार लेकर दिल्ली की तरफ रवाना हो गए। अंग्रेज जनरल चुपचाप उन्हें जाते हुए देखते रहे। हैजे का प्रकोप कम होने पर अम्बाला वाली सेना ने मेजर जनरल हेनरी बरनार्ड के नेतृत्व में फिर से दिल्ली की तरफ बढ़ना आरम्भ किया।

वे अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार भी इस सेना के साथ हो लिए जो 11 मई 1857 को दिल्ली से प्राण बचाकर भाग आए थे। मेरठ से आ रही एक गोरी पलटन 7 जून 1857 को अलीपुर नामक स्थान पर अम्बाला वाली सेना से मिल गई। इस सेना का नेतृत्व ब्रिगेडियर आर्कडेल विल्सन कर रहा था। इन सेनाओं में गोरी पलटनों के साथ-साथ गोरखाओं की भी एक पलटन शामिल थी।

8 जून 1857 को ये दोनों अंग्रेजी सेनाएं एक साथ यमुना के पश्चिमी तट से लगभग 10 किलोमीटर दूर बड़ली की सराय नामक स्थान पर पहुंचीं। इस समय देश के विभिन्न स्थानों से आई हुई बहुत सी क्रांतिकारी सेनाएं इसी स्थान पर डेरा डाले हुए थीं। क्रांतिकारी सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी किंतु उनमें किसी तरह की संगठनात्मक रचना नहीं थी।

अतः अंग्रेज सेनाओं ने इन क्रांतिकारी सेनाओं पर तत्काल आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों का आक्रमण इतना प्रबल था कि क्रांतिकारियों की सेनाओं को बड़ली की सराय से पीछे भागकर दिल्ली में घुस जाना पड़ा और अंग्रेजों ने यमुना के पश्चिमी तट पर स्थित रिज पर अधिकार कर लिया जो कि दिल्ली के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित थी।

रिज से दिल्ली का काबुल गेट केवल सवा किलोमीटर दूर था तथा हिन्दू राव हाउस साफ दिखाई देता था। रिज पर अधिकार हो जाने से अंग्रेजों की स्थिति काफी मजबूत हो गई। पहाड़ी की बगल में यमुना से निकलने वाली एक नहर भी बहती थी जिससे अंग्रेजों को पानी की कमी नहीं रही।

अभी अंग्रेज रिज पर बैठकर आगे की योजनाएं ही बना रहे थे कि बंगाल आर्मी की 10 घुड़सवार सेनाएं तथा 15 पैदल सेनाएं भी दिल्ली पहुंचकर क्रांतिकारियों के साथ हो गईं। उन्होंने 19 जून को अंग्रेजों पर हमला किया किंतु ऊंचाई पर होने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें अपने निकट नहीं आने दिया।

23 जून 1857 को प्लासी के युद्ध के ठीक सौ वर्ष पूरे हुए। भारतीय लोगों में यह विश्वास प्रचलित था कि जिस दिन अंग्रेजों को भारत पर शासन करते हुए सौ साल हो जाएंगे, उसी दिन भारत से उनकी सत्ता समाप्त होगी। अतः 23 जून को क्रांतिकारी सैनिकों ने अंग्रेजों पर बड़ा हमला बोला। अंग्रेजों ने इस हमले को विफल कर दिया।

30 जून को गाजियाबाद के निकट हिण्डन नदी के पुल पर अंग्रेजों और क्रांतिकारी सैनिकों के बीच एक संक्षिप्त संघर्ष हुआ। इस युद्ध में क्रांतिकारी सैनिकों का नेतृत्व बहादुरशाह जफर के पुत्र अबू बकर ने किया किंतु क्रांतिकारियों की सेना पराजित हो गई।

इस बीच दिल्ली में गर्मी बहुत बढ़ गई तथा अंग्रेजी सेना में फिर से हैजा फैल गया। 5 जुलाई 1857 को जनरल बर्नार्ड की हैजे से मृत्यु हो गई। मेजर जनरल रीड भी हैजे की चपेट में आ गया। अतः अंग्रेजी सेना की कमान आर्कडेल विल्सन के हाथों में आ गई। उसे मेजर जनरल बना दिया गया। हैजे के कारण कुछ समय के लिए अंग्रेजों का आक्रमण टल गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विलियम हॉडसन के जासूस

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विलियम हॉडसन के जासूस

विलियम हॉडसन एक अंग्रेज पादरी का बेटा था। उसने इंग्लैण्ड में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की थी किंतु उसका मन पढ़ाई में कम तथा लड़ाई-झगड़े में अधिक लगता था। उसका कद काफी लम्बा था और चेहरे पर घनी मूंछें थी। उसकी आंखें उसके दुष्ट एवं कठोर स्वभाव की गवाही देती थीं।

जिन दिनों अंग्रेजी सेनाएं पंजाब तथा उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत से दिल्ली की तरफ रवाना की जा रही थीं, उन्हीं दिनों अंग्रेजों को विलियम हॉडसन नामक एक अंग्रेज अधिकारी की महत्वपूर्ण सेवाएं प्राप्त हो गईं जिसके कारण कम्पनी सरकार की सेनाओं का दिल्ली की तरफ बढ़ना सुगम हो गया।

विलियम हॉडसन ने इंग्लैण्ड में ही घुड़सवारी करना और तलवारबाजी करना सीख लिए थे। जिन दिनों भारत में आंग्ल-सिक्ख वार छिड़ा हुआ था, उन्हीं दिनों उसने भारत में पदार्पण किया तथा कम्पनी सरकार की न्यू कोर ऑफ गार्ड्स का एड्जूटेंट बन गया।

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कुछ समय बाद वह अमृतसर का डिप्टी कमिश्नर बन गया। कुछ समय बाद उसे उत्तर-पश्चिम फ्रंटियर प्रांत में स्थित यूसुफजई जिले का डिप्टी कमिश्नर बना दिया गया। उसने यूसुफजइयों, आफरीदियों एवं पठानों से निजी शत्रुता पाल ली तथा उनमें से बहुतों को बिना कारण ही मरवा दिया। इससे वह अफगानिस्तान में अत्यंत बदनाम हो गया।

उसके बारे में अंग्रेज अधिकारियों का कहना था कि वह इतना बेईमान था कि वह कभी अच्छा सिपाही हो ही नहीं सकता। अंग्रेजों की दृष्टि में हॉडसन केवल इटली के डाकुओं का नेतृत्व कर सकता है। ईस्वी 1854 में हॉडसन को रेजीमेंट के पैसों में गबन करने के आरोप में कम्पनी सरकार ने नौकरी से हटा दिया।

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जब ईस्वी 1857 में देश भर से क्रांतिकारी दिल्ली पहुंचने लगे तो अंग्रेजों को बहुत बड़ी संख्या में सैनिकों की आवश्यकता हुई। उन्हीं दिनों विलियम हॉडसन स्वयं पर लगाए गए आरोपों को मिथ्या सिद्ध करने के सिलसिले में कमांडर इन चीफ जॉन एन्सन से मिला। जॉन एन्सन ने जब बदमाश प्रवृत्ति के हॉडसन को देखा तो उसने हॉडसन को न केवल समस्त आरोपों से मुक्त कर दिया अपितु उसे अपने स्टाफ का विशेष विश्वासपात्र अधिकारी बना लिया। गदर के दिनों में अंग्रेजी कमांडर इन चीफ को ऐसे ही बदमाश और क्रूर अंग्रेज अधिकारियों की आवश्यकता थी।

इसलिए दिल्ली की बगवात आरम्भ होने के पांच दिन बाद अर्थात् 16 मई 1857 को हॉडसन को असिस्टेंट क्वार्टर मास्टर जनरल बना दिया गया तथा उसे आदेश दिए गए कि वह कमाण्डर इन चीफ की सुरक्षा के लिए घुड़सवारों का एक उड़नदस्ता गठित करे। हॉडसन उसी दिन से काम पर लग गया तथा उसने पंजाब में घूम-घूम कर अनियमित घुड़सवारों की एक रेजीमेंट गठित की जिसका नाम ‘हॉडसन्स हॉर्स’ रखा।

इस सेना में केवल सिक्ख घुड़सवारों को रखा गया। हॉडसन के इस घुड़सवार दस्ते को बागी सिपाहियों से लड़ना नहीं था अपितु अंग्रेजी सेनाओं के आगे रहकर शत्रु सेना की जासूसी करनी थी ताकि अंग्रेजों को अपनी रणनीति तय करने में सहायता मिल सके।

विलियम हॉडसन ने इस कार्य में मौलवी रजब अली को अपना प्रमुख सहायक बनाया जो एक आंख से काना था और अंग्रेजी सेना के लिए जासूसी करने का लम्बा अनुभव रखता था। रजब अली के जासूसों का जाल न केवल पंजाब, मेरठ तथा दिल्ली में फैला हुआ था अपितु लाल किले में भी उसके जासूस काम करते थे।

कमाण्डर इन चीफ के आदेश से विलियम हॉडसन ने अम्बाला से लेकर करनाल, दिल्ली तथा मेरठ और पुनः मेरठ से दिल्ली होते हुए करनाल एवं अम्बाला तक का मार्ग अपने घोड़े की पीठ पर बैठकर तय किया। उसका काम अंग्रेजी सेनाओं को ये सूचनाएं उपलब्ध कराने का था कि इन मार्गों पर कहाँ-कहाँ बागी सिपाहियों से मुठभेड़ होने की संभावना है तथा उनका जमावड़ा कहाँ-कहाँ पर स्थित है।

हॉडसन द्वारा इस कार्य में किए गए परिश्रम का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि करनाल से दिल्ली के लिए रवाना होते समय हॉडसन ने अपनी पत्नी को एक पत्र लिखा जिसमें उसने सूचित किया कि मैं पिछली पांच रातों में केवल एक रात बिस्तर पर सो पाया हूँ, इसलिए काफी थका हुआ हूँ।

जब विलियम हॉडसन ने कमाण्डर इन चीफ को सारी जानकारी दे दी तो कमाण्डर इन चीफ ने अंग्रेजी सेनाओं को दिल्ली कूच करने के आदेश दिए किंतु दुर्भाग्य से 27 मई को कमाण्डर इन चीफ जॉर्ज एन्सन हैजे से मर गया। अपने जनरल की मृत्यु से अंग्रेजी सेना के मनोबल पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। इस समय हॉडसन का गॉड फादर वही था, इसलिए हॉडसन को बड़ा झटका लगा किंतु उसने हिम्मत नहीं हारी। वह अपना काम पूरी निष्ठा एवं क्रूरता से करता रहा।

जब अम्बाला, करनाल और मेरठ की सेनाएं दिल्ली के रिज पर जमा हो गईं, तब हॉडसन ने भी रिज को अपना मुख्यालय बनाया। इस समय वह स्वयं तो दिल्ली में प्रवेश नहीं कर सकता था किंतु उसके सहायक रज्जब अली को न केवल दिल्ली में अपितु लाल किले में प्रवेश करने में भी कोई कठिनाई नहीं थी।

रज्जब अली ने पूरे नगर में जासूसों का एक जाल बिछा दिया जिसमें अंग्रजों के पुराने तरफदारों से लेकर मुगल खानदान के असंतुष्ट लोग और अंग्रेजों के कुछ पुराने नौकर शामिल थे। दिल्ली गजट का एक सब-एडीटर भी रज्जब अली के जासूसी दल में शामिल हो गया।

लाल किले में रह रहे चापलूस किस्म के कुछ लोगों ने दोनों हाथों में लड्डू रखने का विचार किया। वे एक तरफ तो बादशाह के प्रति निष्ठा दिखाते रहे और दूसरी तरफ लाल किले में हो रही घटनाओं की जानकारी अंग्रेजों तक पहुंचाते रहे। धीरे-धीरे लाल किले के बहुत से लोग अंग्रेजों के गुप्तचर बन गए और दिल्ली में होने वाली घटनाओं की गुप्त सूचनाएं अंग्रेजों तक पहुंचाने लगे। अंग्रेजों के लिए गुप्तचरी करने वालों में से कुछ लोग तो लाल किले में बैठे बादशाह की नौकरी करते थे और कुछ लोग बादशाह के रिश्तेदार थे।

सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह थी कि स्वयं बहादुरशाह जफर की बेगम जीनत महल भी हॉडसन के जासूस रज्जब अली के सम्पर्क में रहने लगी। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि बहादुरशाह जफर का प्रधानमंत्री हकीम अहसनुल्लाह खाँ और मरहूम शहजादे मिर्जा फखरू का ससुर मिर्जा इलाही बख्श भी अंग्रेजों के पक्षधर बन गए।

कम्पनी सरकार के अधिकारियों ने ई.1803 से ई.1857 तक की अवधि में यह अच्छी तरह से जान लिया था कि बहुत से हिन्दू कतई नहीं चाहते कि भारत में फिर से मुसलमान बादशाह का शासन हो। इसलिए दिल्ली शहर में कम्पनी के अधिकारियों के मित्रों की कमी नहीं थी। क्रांतिकारी सिपाहियों में शामिल हरियाणा रेजीमेंट के मेजर गौरी शंकर सुकुल एवं दिल्ली शहर के कुछ बड़े हिन्दू साहूकारों को भी मुगल बादशाह का राज्य पसंद नहीं था। इसलिए वे भी अंग्रेजों के लिए जासूसी करने लगे।

हॉडसन के जासूसी जाल का एक बड़ा केन्द्र दिल्ली की ब्रिटिश रेजीडेंसी का मोटा मीर मुंशी जीवनलाल था जो अपने घर के तहखाने में बंद रहकर अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा जासूस बन गया। उसने अपनी डायरी में लिखा है कि 19 मई 1857 को ही उसे फकीर के भेस में एक नीली आंखों वाले अंग्रेज ने निर्देश दिए थे कि वह अंग्रेजों के लिए शहर की खबरें हासिल करे।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि मुंशी जीवन लाल हर सुबह दो ब्राह्मण और और दो जाट शहर में भेजता था जो उसे बागी सिपाहियों के बारे में सूचनाएं लाकर देते थे और जीवन लाल उन सूचनाओं को लिखकर अंग्रेजों को भिजवाता था।

बहुत से जासूस फकीरों और साधुओं के वेश में थे जो क्रांतिकारी सैनिकों के जमावड़ों से लेकर अंग्रेजों की रिज तक बिना किसी रोक-टोक के घूमते थे और हॉडसन तथा उसके जासूसों के पत्र एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते थे।

इन जासूसों की सहायता से रिज पर पड़ी अंग्रेजी सेनाओं को दिल्ली के आम आदमी से लेकर, लाल किले तक एवं दिल्ली के भीतर से लेकर दिल्ली के बाहर दूर-दूर तक पड़ी क्रांतिकारी सेनाओं की वास्तविक स्थिति शीशे की तरफ साफ हो गई थी और अब अंग्रेजों के लिए दिल्ली पर हमला बोलना अधिक आसान हो गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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