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दिल्ली में भुखमरी

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दिल्ली में भुखमरी

तिलंगों ने दिल्ली को अंग्रेजों से मुक्त करवा लिया, बहादुरशाह जफर को दिल्ली का बादशाह घोषित कर दिया किंतु इसके आगे क्या और कैसे करना था, यह न तिलंगों को पता था और न लाल किले को। गुण्डों की लूटपाट से दुकानें बंद हो चुकी थीं, काम-धन्धे बंद हो चुके थे, सड़कों पर भी कोई तभी निकलता था जब बहुत जरूरी कार्य हो। इसलिए कुछ ही दिनों में दिल्ली में भुखमरी फैल गई।

कहा जा सकता है कि दल्ली में भुखमरी के कारण अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति विफल हो गई। एक तरफ तो दिल्ली की आम जनता देश भर से आए क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा शहर में की जा रही लूटपाट से तंग आ चुकी थी और दूसरी ओर स्वयं बादशाह बहादुरशाह जफर भी क्रांतिकारी सैनिकों से अप्रसन्न था। बादशाह को सर्वाधिक शिकायत लाल किले में घूमने वाले तिलंगों से थी। उनमें बात करने की तमीज नहीं थी और वे किसी भी प्रकार का अनुशासन नहीं रखते थे। हर बात पर बहस करते थे और बादशाह के सामने भी जोर-जोर से बोलते थे।

11 मई 1857 को जब पहली बार वे बादशाह के समक्ष प्रस्तुत हुए थे, उस दिन भी तिलंगों ने बादशाह के समक्ष कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था, इस कारण बादशाह उसी दिन से उन लोगों से नाराज था। 12 मई को जुलूस के दौरान भी तिलंगों का आचरण अशोभनीय था।

बहादुरशाह जफर का मानना था कि दिल्ली में घुस आए क्रांतिकारी सैनिक भरोसेमंद नहीं हैं। उन्हें दरबारी तौर-तरीकों की कोई जानकारी नहीं है। वे किसी की इज्जत करना नहीं जानते हैं। उन दिनों के एक अंग्रेजी पत्रकार ने लिखा है कि कुछ तिलंगे लाल किले में बादशाह के सामने जूते पहनकर खड़े रहते थे, इस कारण बादशाह उनसे बहुत नाराज रहता था।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब 16 मई 1857 को तिलंगों ने दिल्ली के लाल किले में लाकर रखे गए 52 अंग्रेजों की हत्या करने के लिए बादशाह पर दबाव बनाना शुरु किया तो बादशाह हैरान रह गया! बादशाह ने इन अंग्रेजों को मुसीबत की घड़ी में उनके प्राण बचाकर लाल किले में रखा था और उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिया था किंतु अब तिलंगे चाहते थे कि हाथ में आए हुए अंग्रेजों को जीवित नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

बादशाह अपनी शरण में रह रहे अंग्रेजों की हत्या नहीं करना चाहता था किंतु तिलंगे अपनी जिद छोड़ने को तैयार नहीं हुए। अंत में उन्होंने बादशाह की अनुमति की परवाह किए बिना ही उन अंग्रेजों को लाल किले से बाहर निकाल लिया और लाल किले के सामने ही एक पीपल के पेड़ के नीचे मार दिया। इन अंग्रेजों की हत्या करके तिलंगे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि इन हत्याओं की जिम्मेदारी बादशाह पर आ जाए ताकि भविष्य में कभी भी बादशाह अंग्रेजों से कोई समझौता नहीं कर सके। समझौते के सारे मार्ग बंद हो जाएं।

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जब दिल्ली के जनसाधारण को लाल किले में रह रहे अंग्रेजों को मार दिए जाने की सूचना मिली तो अधिकांश लोगों को प्रसन्नता हुई क्योंकि अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था किंतु बादशाह की खिन्नता का पार नहीं था। वह कवि हृदय था और रक्तपात को कतई पसंद नहीं करता था। लाल किले में रह रहे चापलूस किस्म के कुछ लोगों ने इस घटनाक्रम की जानकारी करनाल में रह रहे अंग्रेजों तक पहुंचा दी। धीरे-धीरे लाल किले के बहुत से लोग अंग्रेजों के खबरी बन गए और उन्हें दिल्ली में होने वाली घटनाओं की गुप्त सूचनाएं पहुंचाने लगे। अंग्रेजों के लिए गुप्तचरी करने वालों में से कुछ लोग तो लाल किले में बैठे बादशाह की नौकरी करते थे और कुछ लोग बादशाह के रिश्तेदार भी थे।

बादशाह ने अपने सबसे बड़े जीवित शहजादे मिर्जा मुगल को क्रांतिकारी सैनिकों का सेनापति नियुक्त किया किंतु मिर्जा मुगल को सेना का नेतृत्व करने का कोई अनुभव नहीं था इसलिए कम्पनी सरकार द्वारा सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त किए हुए तिलंगों ने शहजादे की कोई इज्जत नहीं की और उसके आदेशों का मजाक उड़या।

तिलंगों सहित देश के अन्य भागों से आए सिपाहियों ने भी शहजादे के आदेश मानने की बजाय अपने ही अधिकारियों के आदेश मानना बेहतर समझा। जो बादशाह, शहजादे या सेनापति इन सेनाओं को वेतन नहीं दे सकते थे, उस बादशाह, शहजादे या सेनापति के आदेश कोई भी सेना भला क्यों मानती!

शहजादे मिर्जा मुगल ने दिल्ली के नागरिक प्रशासन के लिए भी कुछ व्यवस्थाएं करनी चाहीं किंतु वहाँ भी वह अधिक कुछ नहीं कर सका। कम्पनी सरकार के भारतीय कर्मचारी अपनी जगहों पर तैनात थे किंतु उन्हें वेतन कौन देगा, इस प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं था। इसलिए इन सरकारी कर्मचारियों से काम करवाना शहजादे के लिए संभव नहीं था।

मुसीबत कभी अकेली नहीं आती। यह कहावत 1857 की दिल्ली की जनता के साथ भी चरितार्थ हुई थी। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि जब दिल्ली का कोई स्वामी नहीं रहा तो दिल्ली की सीमाओं पर आस पास के क्षेत्रों से गूजर समुदाय के कुछ समूह आकर बैठ गए।

उन्होंने दिल्ली नगर में आने वाले रास्तों पर अपने नाके स्थापित कर दिए और वे दिल्ली में अनाज लेकर आने वाले किसानों से बलपूर्वक चुंगी वसूलने लगे। उनके भय से बहुत से किसानों ने दिल्ली नगर में अनाज लाना बंद कर दिया। कुछ ही दिनों में दिल्ली में अनाज की कमी हो गई और चारों ओर भुखमरी फैलने लगी।

इन सबके बीच में दिल्ली की आम जनता घुन की तरह पिसने लगी। उसके कष्टों का कोई पार नहीं था। बहुत से घरों में एक समय चूल्हा जल सकने योग्य अनाज भी नहीं बचा था। दिल्ली की दुकानें और व्यापार बंद थे तथा इन परिस्थितियों के बीच किसी भी आदमी की कोई आमदनी या रोजगार नहीं रह गया था।

दिल्ली की सड़कों पर घूमते सैनिकों के कारण किसी भी घर की बहिन-बेटी अपने घर से बाहर निकलना तो दूर, घर से बाहर निकलने की बात सोच तक नहीं सकती थी। यहाँ तक कि पुरुष और बच्चे भी घरों से निकलने में डरते थे।

इस बार अंग्रेज सैन्य अधिकारी आधे कुचले हुए नाग की तरह क्रोध से फनफना रहे थे और उनके मन में दिल्ली वासियों के लिए किसी तरह की कोई कोमल भावना नहीं थी।

भारत की आजादी के बाद लिखी गई आधुनिक भारत के इतिहास की पुस्तकों में 1857 की क्रांति का वर्णन बड़े गौरव के साथ किया जाता है किंतु यह गौरव तब क्षीण होता हुआ जान पड़ता है जब हम 1857 की क्रांति के समय दिल्ली की जनता की वास्तविक दुर्दशा के बारे में जानते हैं।

राष्ट्रीय गौरव की भावना तब और भी सहम जाती है जब भारत के विभिन्न प्रदेशों से आए हुए क्रांतिकारी सैनिकों की दुर्दशा पर विचार करते हैं। जिस प्रकार जनता के पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा था, उसी प्रकार क्रांतिकारी सैनिकों के पास भी खाने को कुछ नहीं बचा था। उनमें से बहुत से बीमार एवं घायल हो गए थे और उनका उपचार करने वाला कोई नहीं था।

लाल किले में बैठे बादशाह की हालत तो इन सबसे बुरी थी। वह गरुड़ों की सेना से लड़ते हुए नागलोक के उस राजा की तरह था जिसके दांत और विष पूरे सौ साल पहले ही निकाल लिए गए थे। मई का महीना चल रहा था और दिल्ली में प्रचण्ड गर्मी पड़ रही थी। ऐसी विषम परिस्थितियों ने हैजे की महामारी ने किसी दुष्ट चील की तरह उत्तर भारत पर भीषण झपट्टा मारा जिससे जनता त्राहि-त्राहि कर उठी!

दिल्ली में भुखमरी ने जो ताण्डव मचाया था, उससे कहीं अधिक विनाश हैजे के रूप में आई महामारी ने किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अंग्रेजों का आक्रमण

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अंग्रेजों का आक्रमण
अंग्रेजों का आक्रमण

भले ही अचानक आक्रमण करके अंग्रेजों से दिल्ली खाली करवा ली गई थी किंतु अंग्रेज जाति इतनी आसानी से न तो दिल्ली छोड़कर जाने वाली थी और न भारत! जल्दी ही दिल्ली पर अंग्रेजों का आक्रमण हुआ।

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भारत भर में फैली सेनाओं ने विद्रोह का झण्डा उठाया था। इस कारण अंग्रेजों के लिए क्रांति को दबाना कठिन हो गया किंतु इस कठिन समय में राजस्थान के राजाओं ने अंग्रेजों का साथ दिया। इससे अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों की रक्षा हो गई। इसी प्रकार बर्मा, अफगानिस्तान, हिमालय की तराई एवं पंजाब में नियुक्त सेनाओं में विदा्रेह नहीं हुआ था। इस कारण अंग्रेजों ने इन स्थानों की सेनाओं को अम्बाला में एकत्रित करना आरम्भ किया ताकि दिल्ली पर आक्रमण किया जा सके। दिल्ली पर हमला करने से पहले ही बड़े अंग्रेज अधिकारी हैजे से मर गए!

1857 की क्रांति 29 मार्च 1857 को कलकत्ता के निकट बैरकपुर से आरम्भ हुई थी। उसके बाद मेरठ, लखनऊ, कानपुर, बिठूर, झांसी, जगदीशपुर, दानापुर, नीमच, नसीराबाद, ऐरनपुरा, कोटा, देवली, आउवा, रामगढ़ आदि विभिन्न स्थानों पर क्रांति फूट पड़ी थी। क्रांति के इस चरण में अंग्रेज भाग रहे थे और अपनी जान बचा रहे थे किंतु जैसे ही अंग्रेजों को दिल्ली से बाहर निकाल दिया गया क्रांति का दूसरा चरण आरम्भ हो गया।

पाठकों को स्मरण होगा कि 11 मई 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली से भागकर यमुना के पश्चिमी तट पर स्थित रिज पर बने फ्लैगस्टाफ-टॉवर के पास शरण ली थी, तभी कम्पनी सरकार के कर्मचारियों ने टेलिग्राफ के माध्यम से दिल्ली के बाहर स्थित छावनियों के अंग्रेज अधिकारियों को दिल्ली में हुए विद्रोह की सूचना भेज दी थी। इसलिए दिल्ली की तरफ अन्य सैनिक छावनियों से अंग्रेज सेनाएं अपेक्षाकृत अधिक शीघ्रता से भेजने की योजनाएं बनाई जाने लगीं किंतु इस कार्य में कई बाधाएं थीं।

इस काल में कम्पनी सरकार की राजधानी कलकत्ता में थी। इसलिए अंग्रेजों की सबसे बड़ी पलटन कलकत्ता के निकट बैरकपुर में रहती थी। इस काल में बंगाल आर्मी एशिया की सबसे बड़ी एवं आधुनिक सेना थी किंतु उसके 1 लाख 39 हजार सिपाहियों में से 1 लाख 32 हजार सिपाहियों ने अपने ब्रिटिश स्वामियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। इस कारण बंगाल आर्मी को निशस्त्र करने के लिए बर्मा से अंग्रेजी सेनाएं बुलाई गई थीं।

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बंगाल आर्मी के विद्रोह के कारण कलकत्ता से दिल्ली को किसी तरह की सैनिक सहायता भेजी जानी संभव नहीं थी। कम्पनी सरकार ने इस विद्रोह से पहले ही बंगाल आर्मी की ट्रांसपोर्ट यूनिट को खर्चा बचाने के चक्कर में भंग कर दिया था। इस कार्य से अंग्रेजों की मुसीबत और बढ़ गई।

अंग्रेजों की कुछ बड़ी सेनाएं अफगानिस्तान में थी और माना जाता था कि अंग्रेजी सेनाओं के सबसे जांबाज सेनापति अफगानिस्तान के बॉर्डर पर ही नियुक्त थे। ई.1848 में लगभग पूरा पंजाब अंग्रेजों के अधीन आ गया था, इस कारण हिमालय की तराई के ठण्डे स्थानों पर भी बहुत सी गोरी पलटनें पड़ी हुई थीं किंतु उन्हें दिल्ली तक पहुंचाना आसान नहीं था।

मोटर गाड़ी का आविष्कार होने में अभी 30 वर्ष का समय शेष था। इसलिए सेना के परिवहन के लिए घोड़ों की पीठ ही एकमात्र साधन था किंतु पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण बहुत से स्थानों पर तो सड़कें भी उपलब्ध नहीं थीं। पंजाब की नदियां भी इस कार्य में बड़ी रुकावट थीं।

इस कारण अंग्रेजों के पास तात्कालिक रूप से जो सीमित संभावनाएं मौजूद थीं, उनमें यही किया जा सकता था कि दिल्ली के आसपास से सेनाएं भिजवाकर दिल्ली के क्रांतिकारी सैनिकों को घेर लिया जाए ताकि उन्हें अनाज और रसद की कमी हो जाए। जब दूर की सेनाएं भी दिल्ली पहुंच जाएं तो विद्रोही सैनिकों पर सशस्त्र कार्यवाही आरम्भ की जाए।

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इतनी सारी मुसीबतों के होते हुए भी अंग्रेजों ने बहुत तेजी से फैसले लिए। सबसे पहले 17 मई 1857 को अम्बाला तथा मेरठ की गोरी पलटनों को दिल्ली के लिए रवाना किया गया। जब अम्बाला की सेना करनाल पहुंची तो सेना में हैजा फैल गया जिसके कारण सेना को करनाल में ही रुक जाना पड़ा। 27 मई को इस सेना का जनरल जॉर्ज एन्सन हैजे से मर गया। अपने जनरल की मृत्यु से अंग्रेजी सेना के मनोबल पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। इसी बीच अन्य छावनियों में भी विद्रोह हो जाने के समाचार मिलने लगे। इनमें नौशेरा, फिलोर, फीरोजपुर, नसीराबाद, हांसी, हिसार, मुरादाबाद, आगरा, अलीगढ़, मैनपुरी, इटावा, एटा, नीमच, देवली, माउण्ट आबू की छावनियां प्रमुख थीं।

यहाँ तक कि जब अम्बाला में ठहरी हुई गोरी पलटन के उच्च अधिकारी हैजे से जूझ रहे थे, तब अम्बाला छावनी के भारतीय सिपाहियों ने भी क्रांति का झण्डा उठा लिया और वे अपने हथियार लेकर दिल्ली की तरफ रवाना हो गए। अंग्रेज जनरल चुपचाप उन्हें जाते हुए देखते रहे। हैजे का प्रकोप कम होने पर अम्बाला वाली सेना ने मेजर जनरल हेनरी बरनार्ड के नेतृत्व में फिर से दिल्ली की तरफ बढ़ना आरम्भ किया।

वे अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार भी इस सेना के साथ हो लिए जो 11 मई 1857 को दिल्ली से प्राण बचाकर भाग आए थे। मेरठ से आ रही एक गोरी पलटन 7 जून 1857 को अलीपुर नामक स्थान पर अम्बाला वाली सेना से मिल गई। इस सेना का नेतृत्व ब्रिगेडियर आर्कडेल विल्सन कर रहा था। इन सेनाओं में गोरी पलटनों के साथ-साथ गोरखाओं की भी एक पलटन शामिल थी।

8 जून 1857 को ये दोनों अंग्रेजी सेनाएं एक साथ यमुना के पश्चिमी तट से लगभग 10 किलोमीटर दूर बड़ली की सराय नामक स्थान पर पहुंचीं। इस समय देश के विभिन्न स्थानों से आई हुई बहुत सी क्रांतिकारी सेनाएं इसी स्थान पर डेरा डाले हुए थीं। क्रांतिकारी सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी किंतु उनमें किसी तरह की संगठनात्मक रचना नहीं थी।

अतः अंग्रेज सेनाओं ने इन क्रांतिकारी सेनाओं पर तत्काल आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों का आक्रमण इतना प्रबल था कि क्रांतिकारियों की सेनाओं को बड़ली की सराय से पीछे भागकर दिल्ली में घुस जाना पड़ा और अंग्रेजों ने यमुना के पश्चिमी तट पर स्थित रिज पर अधिकार कर लिया जो कि दिल्ली के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित थी।

रिज से दिल्ली का काबुल गेट केवल सवा किलोमीटर दूर था तथा हिन्दू राव हाउस साफ दिखाई देता था। रिज पर अधिकार हो जाने से अंग्रेजों की स्थिति काफी मजबूत हो गई। पहाड़ी की बगल में यमुना से निकलने वाली एक नहर भी बहती थी जिससे अंग्रेजों को पानी की कमी नहीं रही।

अभी अंग्रेज रिज पर बैठकर आगे की योजनाएं ही बना रहे थे कि बंगाल आर्मी की 10 घुड़सवार सेनाएं तथा 15 पैदल सेनाएं भी दिल्ली पहुंचकर क्रांतिकारियों के साथ हो गईं। उन्होंने 19 जून को अंग्रेजों पर हमला किया किंतु ऊंचाई पर होने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें अपने निकट नहीं आने दिया।

23 जून 1857 को प्लासी के युद्ध के ठीक सौ वर्ष पूरे हुए। भारतीय लोगों में यह विश्वास प्रचलित था कि जिस दिन अंग्रेजों को भारत पर शासन करते हुए सौ साल हो जाएंगे, उसी दिन भारत से उनकी सत्ता समाप्त होगी। अतः 23 जून को क्रांतिकारी सैनिकों ने अंग्रेजों पर बड़ा हमला बोला। अंग्रेजों ने इस हमले को विफल कर दिया।

30 जून को गाजियाबाद के निकट हिण्डन नदी के पुल पर अंग्रेजों और क्रांतिकारी सैनिकों के बीच एक संक्षिप्त संघर्ष हुआ। इस युद्ध में क्रांतिकारी सैनिकों का नेतृत्व बहादुरशाह जफर के पुत्र अबू बकर ने किया किंतु क्रांतिकारियों की सेना पराजित हो गई।

इस बीच दिल्ली में गर्मी बहुत बढ़ गई तथा अंग्रेजी सेना में फिर से हैजा फैल गया। 5 जुलाई 1857 को जनरल बर्नार्ड की हैजे से मृत्यु हो गई। मेजर जनरल रीड भी हैजे की चपेट में आ गया। अतः अंग्रेजी सेना की कमान आर्कडेल विल्सन के हाथों में आ गई। उसे मेजर जनरल बना दिया गया। हैजे के कारण कुछ समय के लिए अंग्रेजों का आक्रमण टल गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विलियम हॉडसन के जासूस

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विलियम हॉडसन के जासूस

विलियम हॉडसन एक अंग्रेज पादरी का बेटा था। उसने इंग्लैण्ड में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की थी किंतु उसका मन पढ़ाई में कम तथा लड़ाई-झगड़े में अधिक लगता था। उसका कद काफी लम्बा था और चेहरे पर घनी मूंछें थी। उसकी आंखें उसके दुष्ट एवं कठोर स्वभाव की गवाही देती थीं।

जिन दिनों अंग्रेजी सेनाएं पंजाब तथा उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत से दिल्ली की तरफ रवाना की जा रही थीं, उन्हीं दिनों अंग्रेजों को विलियम हॉडसन नामक एक अंग्रेज अधिकारी की महत्वपूर्ण सेवाएं प्राप्त हो गईं जिसके कारण कम्पनी सरकार की सेनाओं का दिल्ली की तरफ बढ़ना सुगम हो गया।

विलियम हॉडसन ने इंग्लैण्ड में ही घुड़सवारी करना और तलवारबाजी करना सीख लिए थे। जिन दिनों भारत में आंग्ल-सिक्ख वार छिड़ा हुआ था, उन्हीं दिनों उसने भारत में पदार्पण किया तथा कम्पनी सरकार की न्यू कोर ऑफ गार्ड्स का एड्जूटेंट बन गया।

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कुछ समय बाद वह अमृतसर का डिप्टी कमिश्नर बन गया। कुछ समय बाद उसे उत्तर-पश्चिम फ्रंटियर प्रांत में स्थित यूसुफजई जिले का डिप्टी कमिश्नर बना दिया गया। उसने यूसुफजइयों, आफरीदियों एवं पठानों से निजी शत्रुता पाल ली तथा उनमें से बहुतों को बिना कारण ही मरवा दिया। इससे वह अफगानिस्तान में अत्यंत बदनाम हो गया।

उसके बारे में अंग्रेज अधिकारियों का कहना था कि वह इतना बेईमान था कि वह कभी अच्छा सिपाही हो ही नहीं सकता। अंग्रेजों की दृष्टि में हॉडसन केवल इटली के डाकुओं का नेतृत्व कर सकता है। ईस्वी 1854 में हॉडसन को रेजीमेंट के पैसों में गबन करने के आरोप में कम्पनी सरकार ने नौकरी से हटा दिया।

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जब ईस्वी 1857 में देश भर से क्रांतिकारी दिल्ली पहुंचने लगे तो अंग्रेजों को बहुत बड़ी संख्या में सैनिकों की आवश्यकता हुई। उन्हीं दिनों विलियम हॉडसन स्वयं पर लगाए गए आरोपों को मिथ्या सिद्ध करने के सिलसिले में कमांडर इन चीफ जॉन एन्सन से मिला। जॉन एन्सन ने जब बदमाश प्रवृत्ति के हॉडसन को देखा तो उसने हॉडसन को न केवल समस्त आरोपों से मुक्त कर दिया अपितु उसे अपने स्टाफ का विशेष विश्वासपात्र अधिकारी बना लिया। गदर के दिनों में अंग्रेजी कमांडर इन चीफ को ऐसे ही बदमाश और क्रूर अंग्रेज अधिकारियों की आवश्यकता थी।

इसलिए दिल्ली की बगवात आरम्भ होने के पांच दिन बाद अर्थात् 16 मई 1857 को हॉडसन को असिस्टेंट क्वार्टर मास्टर जनरल बना दिया गया तथा उसे आदेश दिए गए कि वह कमाण्डर इन चीफ की सुरक्षा के लिए घुड़सवारों का एक उड़नदस्ता गठित करे। हॉडसन उसी दिन से काम पर लग गया तथा उसने पंजाब में घूम-घूम कर अनियमित घुड़सवारों की एक रेजीमेंट गठित की जिसका नाम ‘हॉडसन्स हॉर्स’ रखा।

इस सेना में केवल सिक्ख घुड़सवारों को रखा गया। हॉडसन के इस घुड़सवार दस्ते को बागी सिपाहियों से लड़ना नहीं था अपितु अंग्रेजी सेनाओं के आगे रहकर शत्रु सेना की जासूसी करनी थी ताकि अंग्रेजों को अपनी रणनीति तय करने में सहायता मिल सके।

विलियम हॉडसन ने इस कार्य में मौलवी रजब अली को अपना प्रमुख सहायक बनाया जो एक आंख से काना था और अंग्रेजी सेना के लिए जासूसी करने का लम्बा अनुभव रखता था। रजब अली के जासूसों का जाल न केवल पंजाब, मेरठ तथा दिल्ली में फैला हुआ था अपितु लाल किले में भी उसके जासूस काम करते थे।

कमाण्डर इन चीफ के आदेश से विलियम हॉडसन ने अम्बाला से लेकर करनाल, दिल्ली तथा मेरठ और पुनः मेरठ से दिल्ली होते हुए करनाल एवं अम्बाला तक का मार्ग अपने घोड़े की पीठ पर बैठकर तय किया। उसका काम अंग्रेजी सेनाओं को ये सूचनाएं उपलब्ध कराने का था कि इन मार्गों पर कहाँ-कहाँ बागी सिपाहियों से मुठभेड़ होने की संभावना है तथा उनका जमावड़ा कहाँ-कहाँ पर स्थित है।

हॉडसन द्वारा इस कार्य में किए गए परिश्रम का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि करनाल से दिल्ली के लिए रवाना होते समय हॉडसन ने अपनी पत्नी को एक पत्र लिखा जिसमें उसने सूचित किया कि मैं पिछली पांच रातों में केवल एक रात बिस्तर पर सो पाया हूँ, इसलिए काफी थका हुआ हूँ।

जब विलियम हॉडसन ने कमाण्डर इन चीफ को सारी जानकारी दे दी तो कमाण्डर इन चीफ ने अंग्रेजी सेनाओं को दिल्ली कूच करने के आदेश दिए किंतु दुर्भाग्य से 27 मई को कमाण्डर इन चीफ जॉर्ज एन्सन हैजे से मर गया। अपने जनरल की मृत्यु से अंग्रेजी सेना के मनोबल पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। इस समय हॉडसन का गॉड फादर वही था, इसलिए हॉडसन को बड़ा झटका लगा किंतु उसने हिम्मत नहीं हारी। वह अपना काम पूरी निष्ठा एवं क्रूरता से करता रहा।

जब अम्बाला, करनाल और मेरठ की सेनाएं दिल्ली के रिज पर जमा हो गईं, तब हॉडसन ने भी रिज को अपना मुख्यालय बनाया। इस समय वह स्वयं तो दिल्ली में प्रवेश नहीं कर सकता था किंतु उसके सहायक रज्जब अली को न केवल दिल्ली में अपितु लाल किले में प्रवेश करने में भी कोई कठिनाई नहीं थी।

रज्जब अली ने पूरे नगर में जासूसों का एक जाल बिछा दिया जिसमें अंग्रजों के पुराने तरफदारों से लेकर मुगल खानदान के असंतुष्ट लोग और अंग्रेजों के कुछ पुराने नौकर शामिल थे। दिल्ली गजट का एक सब-एडीटर भी रज्जब अली के जासूसी दल में शामिल हो गया।

लाल किले में रह रहे चापलूस किस्म के कुछ लोगों ने दोनों हाथों में लड्डू रखने का विचार किया। वे एक तरफ तो बादशाह के प्रति निष्ठा दिखाते रहे और दूसरी तरफ लाल किले में हो रही घटनाओं की जानकारी अंग्रेजों तक पहुंचाते रहे। धीरे-धीरे लाल किले के बहुत से लोग अंग्रेजों के गुप्तचर बन गए और दिल्ली में होने वाली घटनाओं की गुप्त सूचनाएं अंग्रेजों तक पहुंचाने लगे। अंग्रेजों के लिए गुप्तचरी करने वालों में से कुछ लोग तो लाल किले में बैठे बादशाह की नौकरी करते थे और कुछ लोग बादशाह के रिश्तेदार थे।

सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह थी कि स्वयं बहादुरशाह जफर की बेगम जीनत महल भी हॉडसन के जासूस रज्जब अली के सम्पर्क में रहने लगी। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि बहादुरशाह जफर का प्रधानमंत्री हकीम अहसनुल्लाह खाँ और मरहूम शहजादे मिर्जा फखरू का ससुर मिर्जा इलाही बख्श भी अंग्रेजों के पक्षधर बन गए।

कम्पनी सरकार के अधिकारियों ने ई.1803 से ई.1857 तक की अवधि में यह अच्छी तरह से जान लिया था कि बहुत से हिन्दू कतई नहीं चाहते कि भारत में फिर से मुसलमान बादशाह का शासन हो। इसलिए दिल्ली शहर में कम्पनी के अधिकारियों के मित्रों की कमी नहीं थी। क्रांतिकारी सिपाहियों में शामिल हरियाणा रेजीमेंट के मेजर गौरी शंकर सुकुल एवं दिल्ली शहर के कुछ बड़े हिन्दू साहूकारों को भी मुगल बादशाह का राज्य पसंद नहीं था। इसलिए वे भी अंग्रेजों के लिए जासूसी करने लगे।

हॉडसन के जासूसी जाल का एक बड़ा केन्द्र दिल्ली की ब्रिटिश रेजीडेंसी का मोटा मीर मुंशी जीवनलाल था जो अपने घर के तहखाने में बंद रहकर अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा जासूस बन गया। उसने अपनी डायरी में लिखा है कि 19 मई 1857 को ही उसे फकीर के भेस में एक नीली आंखों वाले अंग्रेज ने निर्देश दिए थे कि वह अंग्रेजों के लिए शहर की खबरें हासिल करे।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि मुंशी जीवन लाल हर सुबह दो ब्राह्मण और और दो जाट शहर में भेजता था जो उसे बागी सिपाहियों के बारे में सूचनाएं लाकर देते थे और जीवन लाल उन सूचनाओं को लिखकर अंग्रेजों को भिजवाता था।

बहुत से जासूस फकीरों और साधुओं के वेश में थे जो क्रांतिकारी सैनिकों के जमावड़ों से लेकर अंग्रेजों की रिज तक बिना किसी रोक-टोक के घूमते थे और हॉडसन तथा उसके जासूसों के पत्र एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते थे।

इन जासूसों की सहायता से रिज पर पड़ी अंग्रेजी सेनाओं को दिल्ली के आम आदमी से लेकर, लाल किले तक एवं दिल्ली के भीतर से लेकर दिल्ली के बाहर दूर-दूर तक पड़ी क्रांतिकारी सेनाओं की वास्तविक स्थिति शीशे की तरफ साफ हो गई थी और अब अंग्रेजों के लिए दिल्ली पर हमला बोलना अधिक आसान हो गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाल किले पर गोलीबारी

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लाल किले पर गोलीबारी

जिस लाल किले की सत्ता के नाम पर अंग्रेजों ने दिल्ली में अपना शासन आरम्भ किया था, अब उसी लाल किले पर गोलीबारी करने में अंग्रेजों को बिल्कुल भी संकोच नहीं हुआ। बहुत से अंग्रेजों का मानना था कि जब तक लाल किले को मिट्टी में नहीं मिलाया जाएगा, तब तक बहादुरशाह जफर से लिया जाने वाला बदला पूरा नहीं हो सकता!

दिल्ली के उत्तर-पश्चिम में स्थित रिज से दिल्ली नगर पर 10 जून 1857 को गोलीबारी आरम्भ हुई। इस समय तक अंग्रेजों के पास बहुत कम तोपें थीं। घेराव करने वाली बड़ी तोपें तो थी ही नहीं। इसलिए इस गोलीबारी से दिल्ली नगर को बहुत कम नुक्सान हुआ और दिल्ली के जनसाधारण के लिए यह तोपबाजी एक तमाशा बन कर रह गई। जन साधारण को यह देखकर प्रसन्नता होती थी कि दिल्ली के परकोटे की बुर्जों पर पर लगी बागियों की बड़ी तोपों की कतार की तुलना में अंग्रेजों की तोपों की संख्या बहुत कम थी।

क्रांतिकारी सिपाहियों में बंगाल आर्मी के अनुभवी तोप अधिकारी शामिल थे इसलिए उनका निशाना अचूक था। अंग्रेज इन बागी तोपचियों से बहुत डरते थे। विलियम हॉडसन ने घेराबंदी के पहले ही दिन अनुमान लगा लिया था कि बागियों के पास जबरदस्त निशानेबाज हैं और वे सटीक निशाने लगाने में अंग्रेजों को मात देते हैं।

जब जनसाधारण ने देखा कि अंग्रेजों की तोपें अधिक नुक्सान नहीं पहुंचा सकतीं तो वे अपनी छतों पर उमड़ आए। बादशाह और शाही खानदान के लोग लाल किले की छत पर बैठ गए। सलातीन भी लाल किले की दीवारों के बुर्जों से इस गोली-बारी को देखते रहते।

यह कैसा तमाशा था! लाल किले पर गोलीबारी हो रही थी और लाल किले का बादशाह किले की छत पर बैठकर उसका आनंद ले रहा था।

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सरवरुल मुल्क ने अपनी डायरी में लिखा है- ‘उस वक्त खूब गर्मी थी और हर रात हम अपने सिरों के ऊपर से निकलते तोप के गोलों की चमक देखा करते। हम उन्हें आतिशबाजी मानते थे लेकिन अगर उनमें से कोई गोला किसी के घर पर गिर जाता जैसा कि एक महीने बाद हमारी हवेली में हुआ तो फिर यह सारा मजा खत्म हो जाता।

एक तोप के गोले ने हमारी हवेली के ऊपर की मंजिल की छत उड़ा दी और फिर बरामदे में आ गिरा जहाँ बैठे हम खाना खा रहे थे। मेरे चाचा ने जल्दी से दौड़ कर उस पर बाल्टियों से पानी डाला। लाल किले के भीतर स्थित शाही महल अंग्रेजों के लिए आसान निशाना बन गया और जल्दी ही एक अंग्रेजी तोप ऐसी जगह रख दी गई जहाँ से वह लगातार शाहजहाँ के लाल किले की लाल पत्थर की दीवारों के अंदर गोले फैंकती रहती थी।’

जहीर देहलवी ने लिखा है- ‘अंग्रेज विशेषकर सुंदर सफेद संगमरमर के शाही निवासों को निशाना बना रहे थे ……. अंग्रेजों के कब्जा किए हुए रिज से गोलीबारी होती रही और जैसे-जैसे उनका निशाना बेहतर होता गया वैसे-वैसे गोले फटने पर खूब तबाही मचती।

यदि कोई तोप का गोला किसी बहुमंजिला इमारत पर गिरता तो उसमें नीचे तक पहुंच जाता और यदि धरती पर गिरता तो वहीं पर कम से कम 10 गज अंदर घुस जाता तथा आसपास सब कुछ नष्ट कर देता। बम तो और भी खतरनाक थे। वे यदि किले के पुराने शाहजहानी घरों पर गिरते तो वे बिल्कुल ढह जाते थे। घेराबंदी के बाद के दौर में कभी-कभी रातों में ऐसा लगता था मानो धरती पर नर्क उतर आया हो। एक साथ 10 गोले फेंके जाते और वे एक के बाद एक फटते।’

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13 जून 1857 को जब रिज से तोपें छोड़ी गईं तो हिन्दू राव हाउस उनकी चपेट में आया और उसे बहुत क्षति पहुंची। बैंक ऑफ देहली का भवन भी अंग्रेजों की बमबारी में बर्बाद हो गया।

एक गोले ने यमुना किनारे बने हुए शाहबुर्ज को बहुत नुकसान पहुंचाया। दूसरा गोला लाल पर्दे के करीब आकर गिरा। इसकी वजह से अस्तबल का एक नौकर और एक एलची मारा गया। एक और गोला महल के दक्षिण में स्थित जनान खाने पर गिरा जिससे जीनत महल की एक खास दासी चमेली कुचल गई।

उसके बाद जीनत महल लाल किला छोड़ कर लालकुआं की अपनी हवेली में चली गई जिसे वह कम असुरक्षित मानती थी और शायद उन सिपाहियों की मौजूदगी से आजाद भी जो किले में हर जगह मौजूद थे। इससे वह अपने लाड़ले इकलौते पुत्र जवान बक्श और बागियों के बीच कुछ दूरी बनाने में भी कामयाब रही।

इसके कुछ समय बाद फिर से लाल किले पर गोलीबारी हुई तथा गोलों की एक बौछार में बादशाह सलामत खुद बाल-बाल बचे। ईद मुबारक शाह जिसे हाल ही में मुइनुद्दीन की जगह कोतवाल बनाया गया था, उस वक्त महल में ही मौजूद था। उसने लिखा है-

‘एक सुबह करीब आठ बजे बादशाह अपने कक्ष से बाहर आए। वहाँ 30-40 अमीर पहले से ही बैठे बादशाह का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही बादशाह सलामत अपने निजी कक्ष से बाहर निकले, तीन गोले उनके बिल्कुल सामने और पीछे आकर गिरे और फट गए लेकिन हैरत अंगेज ढंग से किसी को चोट नहीं आई।

बादशाह फौरन वापस चले गए और बाकी लोग भी जो जहाँ बैठे थे उठकर चले गए। उसी शाम को बादशाह ने क्रांतिकारी सैनिकों के बड़े अधिकारियों को बुलवाया और उनसे कहा- मेरे भाइयो! अब तुम्हारे लिए या दिल्ली के बाकी नागरिकों के लिए या खुद मेरे बैठने के लिए भी कोई स्थान सुरक्षित नहीं रह गया है।

इस लगातार होती गोलीबारी ने उसको भी खत्म कर दिया जैसा कि तुम देख रहे हो। जिस हौज पर मैं रोजाना आकर बैठता था उस पर भी गोला बारूद बरस रहा है। तुम कहते हो कि तुम यहाँ लड़ने और ईसाईयों को भगाने के लिए आए हो, क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते कि मेरे महल पर हो रही इस गोले बारूद की बारिश को रोक दो।’

बहादुरशाह जफर के लिए इस सप्ताह में यह दूसरा बड़ा झटका था। 14 जून को उनके खास खिदमतगार ख्वाजासरा महबूब अली खाँ की अचानक मौत हो गई। वह काफी दिन से बीमार था किंतु किले में अफवाह उड़ी कि उसे जहर दिया गया है। शहर में हर तरफ मायूसी छा रही थी।

सईद मुबारक शाह का कहना था कि बागी सिपाहियों की लूटमार और अंग्रेजों की गोलाबारी के बीच दिल्ली के लोगों को चाहे वे बुरे हों या अच्छे अंग्रेजों के पक्ष में हो या विरोध में, सबको अब लग रहा था कि वह चूहों की तरह पिंजरे में कैद हैं जहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं है।

उर्दू के सुप्रसिद्ध कवि मिर्जा गालिब ने लिखा है-

‘उनके मित्रों की परेशानी और वजन बढ़ाने के लिए रिज से खूब गोलाबारी हो रही थी। आग बरसाने वाली बंदूकों और बिजली गिराने वाली तोपों से उठता गहरा काला धुआं आसमान पर गिरे काले बादलों की तरह है और उनकी आवाज ऐसी है जैसे ओलों की बारिश हो रही हो।

दिन भर तोप चलने की आवाज सुनाई देती है, जैसे आसमान से पत्थर गिर रहे हों। उमरा के घरों में चिराग जलाने को तेल नहीं है। वह घुप अंधेरे में बिजली चमकने का इंतजार करते हैं ताकि अपना गिलास और सुराही ढूंढ सकें और अपनी प्यास बुझा सकें। बहादुर लोग भी अपने साए से डर रहे हैं और बागी सिपाही दरवेश और बादशाह दोनों पर हुकूमत कर रहे हैं।’

हालांकि जून, जुलाई एवं अगस्त के तीन महीनों में अंग्रेजी सेना छोटी तोपों से गोले चला रही थी और वह इन तोपों की सीमा को समझती थी फिर भी उसने तोपों से गोले दागना जारी रखा। वे यह नहीं देख रहे थे कि कौनसा गोला कहाँ गिर रहा है! उनके लिए यही पर्याप्त था कि तोप का गोला दिल्ली शहर में कहीं पर गिर रहा है! लाल किले पर गोलीबारी होती रही!

14 जुलाई 1857 को अंग्रेजी सेना का तेजतर्रार युवा ब्रिगेडियर नेविली चेम्बरलेन क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा किए गए हमले में बुरी तरह घायल हो गया। इससे अंग्रेज सेना का मनोबल टूटने लगा किंतु इसी बीच लाल किले में कुछ अप्रिय घटनाएं घट गईं जिनसके अंग्रेजों को बड़ा सम्बल मिला।

बहादुरशाह जफर का पुत्र मिर्जा मुगल तथा बहादुरशाह जफर का एक पोता मिर्जा अबू बकर क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा पूरी तरह नकार दिए गए। क्रांतिकारी सैनिकों ने इन अयोग्य शहजादों के आदेश मानने से मना कर दिया। इससे क्रांतिकारी सेनाएं नेतृत्व विहीन हो गईं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन

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ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन
ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन

ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन एक क्रूर आयरिश सेनापति था। वह किसी भी कीमत पर दिल्ली पर फिर से अधिकार करना चाहता था। जब दिल्ली में क्रांतिकारियों की सेना अंग्रेजी सेना पर भारी पड़ने लगी, तभी ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन भारतीय सिपाहियों का काल बनकर आ गया!

जिस समय मेरठ एवं दिल्ली में गदर आरम्भ हुआ था उस समय ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन अपने मित्र हर्बर्ट एड्वर्ड्स के साथ पेशावर में नियुक्त था। उसे भी दिल्ली के लिए रवाना कर दिया गया किंतु वह पेशावर से रवाना भी नहीं हुआ था कि पंजाब के नौशेरा में विद्रोह हो गया।

ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन ने नौशेरा के विद्रोह को बड़ी कठोरता से दबाया और दिल्ली के लिए रवाना हो गया। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि जॉन निकल्सन प्रोटेस्टेण्ट ईसाई था किंतु चापलूस हिन्दुस्तानियों का एक समूह उसे निकल सेन कहता था और उसे विष्णु का अवतार बताता था। निकल्सन इन चापलूसों को जब-तब कोड़ों से पिटवाता था क्योंकि वे लोग उसके सामने जमीन तक झुकते थे और उसके नाम का जाप करते थे।

जॉन निकल्सन के बारे में कहा जाता था कि जब वह रावलपिंडी में था तब उसने अपने हाथों से एक कबीले के सरदार का सिर काटा था। निकल्सन उस सिर को यादगार के रूप में अपनी मेज पर रखता था। भारतीय मुसलमानों के बारे में जॉन निकल्सन की राय अच्छी नहीं थी।

उसका कहना था कि हिंदुस्तानियों से बदतर सिर्फ अफगानी ही हो सकते हैं। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि अफगानियों के बारे में उसकी यह राय इसलिए बनी थी क्योंकि अफगानियों ने ई.1842 के आंग्ल-अफगान युद्ध में जॉन निकल्सन के भाई का बेरहमी से कत्ल कर दिया तथा उसका गुप्तांग काटकर उसके मुंह में ठूंस दिया था।

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जब निकल्सन अपनी सेना लेकर अफगानिस्तान से दिल्ली आ रहा था तो मार्ग में एक दिन भारतीय बावर्चियों ने निकल्सन और उसके साथी अंग्रेज अधिकारियों का डिनर बनाने में कुछ देरी कर दी। इस पर निकल्सन ने उन्हें पास के ही एक पेड़ पर फांसी से लटका दिया और अपनी सेना को बताया कि उसे अपने जासूसों से सूचना मिली थी कि ये हिन्दुस्तानी बावर्ची अंग्रेज अधिकारियों के खाने में जहर मिलाने वाले हैं। निकल्सन तो अब दुनिया में नहीं है किंतु उसने अपनी डायरी में लिखा है कि जब उसने इन भारतीय खानसामाओं द्वारा बनाया गया सूप एक बंदर को पिलाया तो वह बंदर ऐड़ियां रगड़ते हुए मर गया।

जॉन निकल्सन ने अपने साथी सैन्य अधिकारी हर्बर्ट एड्वर्ड्स को सुझाव दिया कि निकल्सन और एड्वर्ड्स मिलकर कम्पनी सरकार के समक्ष एक बिल पेश करें जिससे दिल्ली की अंग्रेज औरतों और बच्चों के हत्यारों के शरीरों से उनकी जिंदा खाल खींच ली जाए या उन्हें जीवित ही जला दिया जाए या उनकी देह में कीलें ठोकी जाएं। जिन भारतीयों ने अंग्रेज स्त्री एवं बच्चों की हत्या की है, उन्हें केवल साधारण फांसी देकर मारना उनके लिए पर्याप्त दण्ड नहीं है।

जब हर्बर्ट एड्वर्ड्स ने निकल्सन के सुझाव को मानने से मना कर दिया तो निकल्सन ने कहा कि वह अकेले ही इस प्रस्ताव को पेश करेगा तथा भारतीय लोगों से अंग्रेजों की हत्या का बदला लेगा। निकल्सन की ही तरह जॉन लॉरेंस भी भारतीय लोगों को कड़ी सजा देने के पक्ष में था।

14 अगस्त 1857 को ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन अपने 4 हजार 200 सैनिकों के साथ दिल्ली पहुंचा। उसकी सेना को फ्लाइंग कॉलम कहा जाता था तथा यह किसी भी नगर का घेरा डालने में अनुभवी थी। जैसे ही क्रांतिकारियों को इस अंग्रेजी सेना के आने की सूचना मिली, क्रांतिकारी सैनिकों ने इस सेना पर हमला करके उसे तितर-बितर करने का प्रयास किया किंतु क्रांतिकारी सैनिकों को सफलता नहीं मिली।

25 अगस्त 1857 को ब्रिगेडियर निकल्सन ने नजफगढ़ पर आक्रमण किया जहाँ क्रांतिकारी सैनिक मोर्चा बांधकर बैठे हुए थे। यद्यपि इस समय तक मानसून की वर्षा आरम्भ हो चुकी थी तथा रास्तों में स्थान-स्थान पर पानी भरा हुआ था, तथापि निकल्सन की सेना ने नजफगढ़ पहुंचकर क्रांतिकारी सैनिकों को नजफगढ़ से भगा दिया। क्रांतिकारी सैनिकों के लिए यह पराजय बहुत बड़ा झटका थी।

जॉन निकल्सन ने दिल्ली में पड़े भारतीय क्रांतिकारी सैनिकों के हथियार छीनकर उन्हें सूली पर चढ़ाना श्ुरु कर दिया। अंग्रेज सेनापति प्रायः बागियों को तोपों के सामने बांधकर उन्हें उड़ाते थे किंतु निकल्सन ने बागियों के लिए बारूद खर्च करना उचित नहीं समझा। उसे लगता था कि अंग्रेजी बारूद का उपयोग किसी बेहतर काम के लिए करना उचित होगा।

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निकल्सन ने दिल्ली के क्रांतिकारी सैनिकों पर इतने अत्याचार किए कि उसके किस्से विक्टोरियन युग की दास्तानें बन गए। उसके लिए कहा जाता है कि वह कभी सोता नहीं था और उसे किसी भी चीज का खौफ नहीं था। वह आदमी को तलवार के एक ही वार से दो हिस्सों में काट देता था और कत्ल करने के बाद कहता था कि तलवार की धार बुरी नहीं है।

निकल्सन न तो किसी को गिरफ्तार करता था और न किसी का कोर्ट मार्शल करता था। वह तो क्रांतिकारी सैनिकों को बैलगाड़ी में पटककर बांध लेता था और यूनियन जैक के नीचे एक साथ छः-छः क्रांतिकारियों को सूली पर चढ़ा देता था, यही उसका न्याय था।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है- ‘हो सकता है कि निकल्सन हिंसा का अवतार हो लेकिन उसका पागलपन इन मौजूदा हालात के लिए बहुत उपयुक्त था।’

जब सर जॉन लॉरेंस ने निकल्सन को लिखा कि- ‘देसी बागियों के कोर्ट मार्शल बहाल होने चाहिए तथा दी गई सजाओं की फेहरिस्त बननी चाहिए।’

इस पर संगदिल निकल्सन ने उस आदेशपत्र के पीछे एक लाइन लिखकर उसे वापस भेज दिया कि- ‘बगावत की सजा केवल मौत है।’

अंग्रेज अधिकारियों ने कई सौ भारतीय सिपाहियों को बिना कोर्ट मार्शल किए ही फांसी पर लटका दिया, गोलियों से उड़ा दिया और पेड़ों से बांधकर तोपों से उड़ा दिया था। कम्पनी सरकार के इन हैवानों से कोई कुछ कहने या पूछने वाला नहीं था। इस काम में अकेला निकल्सन ही जोर-शोर से भाग नहीं ले रहा था अपितु दो अंग्रेज और भी थे।

इनमें से पहला अंग्रेज था लोअर कोर्ट का मजिस्ट्रेट थियोफिलिस मेटकाफ जिसके कपड़े तिलंगों ने उतार लिए थे और दूसरा था विलियम हॉडसन जिसके जासूस दिल्ली में चप्पे-चप्पे पर मौजूद थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन

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मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन

मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन के नेतृत्व में जॉन निकल्सन, हेनरी बर्नार्ड, थियोफिलस मेटकाफ, विलियम हॉडसन, बेयर्ड स्मिथ तथा नेविली चेम्बरलेन आदि अनुभवी अंग्रेज अधिकारी दिल्ली को जीतने के लिए जी-जान से जूझ रहे थे किंतु बड़ी तोपों के अभाव में वे दिल्ली में घुसने का मार्ग नहीं बना पा रहे थे।

अंततः सितम्बर 1857 में पंजाब से छः 24 पाउण्डर लॉंग गन तथा 8 अठारह पाण्डर लॉंग गन, 6 आठ इंच होविट्जर्स, 10 दस इंच मोर्टार्स और गोला-बारूद एवं कारतूसों से भरे 600 बक्से दिल्ली की अंग्रेज सेना के पास सफलता पूर्वक पहुँच गए। लगभग इतना ही असला अंग्रेजी सेनाओं के पास पहले से ही था। इस प्रकार अंग्रेजों के पास गोला-बारूद की कमी नहीं रही।

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इन बड़ी तोपों को शक्तिशाली हाथियों द्वारा घसीट कर लाया गया था और बड़ी कठिनाई से रिज पर चढ़ाया गया था। इन तोपों का रिज तक पहुंच जाना क्रांतिकारी सैनिकों की भारी रणनीतिक विफलता थी। उन्होंने अंग्रेजी सेनाओं की रसद एवं गोला-बारूद की आपूर्ति रेखा को काटने की कोई योजना नहीं बनाई थी। 6 सितम्बर को अंग्रेजों ने रिज के दक्षिणी छोर पर 24 पाउण्डर तथा 9 पाउण्डर तोपों को स्थापित किया और दिल्ली के परकोटे को तोड़ने के लिए गोले दागने आरम्भ कर दिए।

7 सितम्बर 1857 को अंग्रेजों ने मोरी बुर्ज से केवल 700 गज की दूरी पर एक भारी तोप स्थापित की। आठ सितम्बर को चार बड़ी तोपें और मिल गईं। उसी दिन कश्मीरी बुर्ज पर गोलाबारी आरम्भ की गई। ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन की इस रणनीति से क्रांतिकारी सैनिकों के पैर उखड़ने लगे। अंग्रेज अपनी तोपों को रिज से उतार कर सिविल लाइंस में बने लुडलो कैसल तक ले आए। अब वे नगर प्राचीर से केवल 180 मीटर दूर रह गए। कहने को तो दिल्ली में क्रांतिकारियों का नायक स्वयं बादशाह था किंतु क्रांतिकारियों ने बादशाह द्वारा नियुक्त दोनों शहजादों को सेनापति के रूप में स्वीकार नहीं किया। इसलिए क्रांतिकारी सेनाओं में तालमेल का अभाव था किंतु बादशाह के सौभाग्य से उन्हीं दिनों बरेली से कम्पनी सरकार की एक सेना बागी होकर दिल्ली पहुंची।

इस सेना का नेतृत्व बख्त खाँ नामक एक तोपखाना अधिकारी कर रहा था। बादशाह ने बख्त खाँ को दिल्ली में स्थित समस्त क्रांतिकारी सेनाओं का सेनापति नियुक्त कर दिया। बख्त खाँ को इस तरह के युद्धों में भाग लेने का अच्छा अनुभव था।

मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन ने हेनरी बरनार्ड को एक बड़ी सेना देकर दिल्ली नगर में प्रवेश करने के लिए भेजा किंतु क्रांतिकारी सैनिकों ने अँग्रेजी सेना को पीछे धकेल दिया। अंग्रेज समझ गए कि अभी आमने-सामने की लड़ाई का समय नहीं आया है। इसलिए वे फिर से तोपों से गोले दागने लगे।

अब अंग्रेजों की 50 तोपें दिन और रात गोले छोड़ने लगीं जिससे नगर परकोटा ध्वस्त होने लगा तथा लगभग 300 क्रांतिकारी सैनिक मारे गए। आठ दिन की भीषण गोलाबारी के बाद 14 सितम्बर 1857 को प्रातः तीन बजे अंधेरे में अंग्रेजों ने क्रांतिकारी सैनिकों पर बड़ा धावा बोला जिसका नेतृत्व ब्रिगेडियर निकल्सन ने किया।

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ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन ने तीन कॉलम्स को खुदीसा बाग के पीछे जमा किया जहाँ मुगल बादशाह गर्मियों में निवास करते थे। चौथे कॉलम को काबुल गेट को खोलने की जिम्मेदारी दी गई। पांचवे कॉलम को रिजर्व में रखा गया। अब अंग्रेजी सेनाएं दिल्ली शहर के परकोट में बनी दरारों से होकर दिल्ली शहर में घुसने लगीं।

सार्जेंट कारमाइकल ने कश्मीरी गेट को बारूद से उड़ा दिया। क्रांतिकारी सैनिकों ने काबुल गेट के बाहर किशनगंज में अंग्रेजों से भयानक युद्ध किया। दोनों पक्षों ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना आत्मघाती युद्ध किया जिसके कारण दोनों ओर के सैनिकों को बड़ी संख्या में प्राण गंवाने पड़े। मेजर रीड बुरी तरह घायल हो गया और उसका पूरा कॉलम बिखर गया।

जब अंग्रेजों ने सेंट जेम्स चर्च पर अधिकार करना चाहा तो अंग्रेजी सेनाओं के 1170 सिपाही मारे गए। यह अंग्रेजों के लिए बहुत बड़ा धक्का था। कहा जाता है कि सेंट जेम्स चर्च पर क्रांतिकारी सैनिकों के दबाव को देखते हुए आर्कडेल विल्सन ने अपनी सेनाओं को चर्च से पीछे हटने के आदेश दिए।

उस समय तक ब्रिगेडियर निकल्सन भी बुरी तरह घायल हो चुका था तथा किसी भी समय उसकी मृत्यु हो सकती थी किंतु जब निकल्सन ने सुना कि मेजर जनरल विल्सन आर्कडेल ने अंग्रेजी सेना को पीछे हटने के आदेश दिए हैं तो ब्रिगेडियर निकल्सन ने मेजर जनरल आर्कडेल को धमकी दी कि या तो वह अपना आदेश वापस ले नहीं तो वह आर्कडेल को गोली मार देगा। इस पर बेयर्ड स्मिथ तथा चेम्बरलेन आदि अधिकारियों ने बीच-बचाव करके आर्कडेल को इस बात पर सहमत किया कि वह अपना आदेश वापस ले ले।

इस समय तक अंग्रेजी सेनाओं के इतने अधिकारी मारे जा चुके थे कि अंग्रेजी सेनाओं में यह भ्रम उत्पन्न होने लगा कि उनका वास्तविक अधिकारी कौन है। इसी दौरान उन्हें दिल्ली में एक शराब का स्टोर दिख गया। अंग्रेजी सेना के सैनिकों ने शराब के इस स्टोर को लूट लिया और वे अपने मन में बैठ गए भय को दूर करने के लिए बेतहाशा शराब पीने लगे। इस प्रकार दो दिन बीत गए।

16 सितम्बर 1857 को अंग्रेजी सेना ने मैगजीन पर फिर से अधिकार स्थापित कर लिया। पाठकों को स्मरण होगा कि मेरठ से आए तिलंगों ने 11 मई 1857 को इस मैगजीन पर अधिकार कर लिया था तथा अंग्रेजों ने स्वयं ही इसके गोला-बारूद में आग लगाकर उसे नष्ट कर दिया था। पूरे तीन महीने बाद अंग्रेज फिर से उसी मैगजीन में लौट आए थे किंतु इन तीन महीनों में दिल्ली में बहुत कुछ बदल चुका था, अब वह पहले वाली दिल्ली नहीं रही थी।

भारतीयों के सौभाग्य से विशेषकर दिल्ली वालों के भाग्य से 23 सितम्बर 1857 को ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन की मौत हो गई। अंग्रेजों के लिए यह एक बड़ा सदमा था। युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों ने जॉन निकल्सन की एक बड़ी प्रतिमा बनवाकर दिल्ली में लगवाई जो ई.1947 में उसकी जन्मभूमि उत्तरी आयरलैण्ड को भेज दी गई।

यह प्रतिमा आज भी आयरलैण्ड के डुंगनन कस्बे के रॉयल स्कूल में लगी हुई है। भारत के लोग उसे इंग्लैण्ड का निवासी समझते थे किंतु वह आयरलैण्ड का रहने वाला था। आयरलैण्डवासी आज भी जॉन निकल्सन को बड़े गर्व के साथ याद करते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली में दहशत

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दिल्ली में दहशत

पिछले कुछ समय से दिल्ली की जनता ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन के बारे में डरावने किस्से सुन रही थी। निकल्सन के बारे में कहा जा रहा था कि अफगानिस्तान से आया ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन दिल्ली वालों को कठोर दण्ड देगा। इस कारण दिल्ली में दहशत फैल गई। अंग्रेजी सेनाओं और गुण्डों के डर से दिल्ली खाली हो गई!

जब दिल्ली वालों ने सुना कि निकल्सन भारतीयों द्वारा मेरठ, कानुपर एवं दिल्ली आदि स्थानों में किए गए अंग्रेजों के खून का बदला भारतीयों के खून से लेगा तो दिल्ली में दहशत फैल जाना स्वाभाविक ही था। बदले की आग में जल रहे इस अंग्रेज अधिकारी के मस्तिष्क में भारतीयों का रक्त पी जाने के बहुत से तरीके मौजूद थे। इसलिए दिल्ली के नागरिकों ने दिल्ली से बाहर भाग आना आरम्भ कर दिया।

दिल्ली वालों के लिए अंग्रेजी सेनाओं से भयभीत होकर दिल्ली से भाग जाने का निर्णय पूरी तरह गलत भी नहीं था। यद्यपि ईस्वी 1803 से 1857 तक की अवधि में दिल्ली के अंग्रेज अधिकाारियों ने स्वयं को निष्पक्ष एवं न्यायप्रिय दिखाया था तथापि अनुशासन के नाम पर उन्होंने दिल्ली के लोगों पर जो अत्याचार किए थे, उन्हें दिल्ली की जनता कैसे भूल सकती थी!

किसी भी भारतीय के घर में आग लगा देना, सरे आम कोड़ों से पिटवाना और किसी भी भारतीय को फांसी के फंदे से लटका देना अंग्रेजों के लिए आम बात थी।

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एक ओर तो दिल्ली में दहशत फैली हुई थी और दूसरी ओर अंग्रेजी सेना दो दिन से शराब के नशे में धुत्त होकर पड़ी थी, उस समय क्रांतिकारी सैनिक चाहते तो अंग्रेजों के चरण चूम रही विजयश्री को फिर से अपने पक्ष में कर सकते थे किंतु इस समय तक क्रांतिकारी सैनिकों की हालत भी बहुत बुरी हो चुकी थी। उनके बहुत से साथी या तो मारे जा चुके थे या बुरी तरह घायल होकर मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्हें भोजन, पानी और दवा देने का कोई प्रबंध नहीं था।

ऐसी स्थिति में उन मुजाहिदों ने मोर्चा संभाला जो भूखे-प्यासे रहकर भी अपनी अंतिम सांस तक लड़ते हुए बहादुरशाह जफर को फिर से हिन्दुस्तान का बादशाह बनाने आए थे किंतु उन्हें युद्ध करने का न तो कोई प्रशिक्षण था और न कोई अनुभव!

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जब आर्कडेल विल्सन ने देखा कि उसकी सेना केवल शराब पीने में व्यस्त हैं तो विल्सन ने समस्त शराब को नष्ट करने के आदेश दिए। इससे अंग्रेजी सेना में फिर से अनुशासन स्थापित हो गया। अंग्रेजी सेना ने फिर से क्रांतिकारी सैनिकों पर धावा बोला। क्रांतिकारी सैनिकों ने मोर्चे छोड़ दिए, अब या तो सड़कों पर उनके शव पड़े हुए दिखाई दे रहे थे, या फिर उन्होंने अंग्रेजों की संगीनों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। बहुत से क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली छोड़कर भाग गए। अब तो दिल्ली में दहशत का कोई अंत नहीं रहा।

जब अंग्रेजों की सेना दिल्ली में घुसी तब दिल्ली के हजारों नागरिक दिल्ली खाली करके अपने सम्बन्धियों के पास निकटवर्ती गांवों और कस्बों में भाग गए। दिल्ली में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो चुका था और अनाज, दूध एवं सब्जियां मिलना बिल्कुल असंभव हो गया था। हालांकि दिल्ली में अधिकांश लोगों के घरों में लूटे जाने के लिए कुछ नहीं बचा था किंतु जब अंग्रेजों ने क्रांतिकारी सैनिकों का बिल्कुल सफाया कर दिया तब गुण्डे और लुटेरे फिर से अपने घरों से निकल आए और उन्होंने दिल्ली के बंद घरों को तोड़कर उनमें से सामान निकालना आरम्भ कर दिया।

अंग्रेज सेनाएं जीत की खुशी में पेट भरकर शराब पी रही थीं। इस कारण पूरे चार दिनों तक दिल्ली पर गुण्डों और बदमाशों का कब्जा रहा। इन गुण्डों के भय से भी बहुत से लोग दिल्ली खाली करके चले गए क्योंकि जब गुण्डे लूटपाट करने के लिए घरों में घुसते थे तो औरतों के साथ गुण्डागर्दी करने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे। गुण्डों के कारण दिल्ली में जो दहशत थी, उसका कुछ वर्णन उर्दू के प्रसिद्ध कवि मिर्जा गालिब ने लिखा है।

मिर्जा गालिब इन घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे। गालिब के लिए यह बगावत अंग्रेजों से इंतकाम लेने से अधिक निचले वर्ग के लोगों की सरकशी का संकेत था। इससे भी अधिक खतरनाक बात यह थी कि उनके अपने मुल्क के लोग उन जाहिल और बदनसीब गुण्डों के सामने बेबस थे।

गालिब ने लिखा है- ‘जो गुमनाम लोग जिनका कोई नामो-नसब था न कोई मालो-जर! अब वे बेहिसाब दौलत और इज्जत के हकदार हो गए हैं। वह जो सड़कों पर धूलो-खाक से भरे फिरते थे जैसे हवा का कोई आवारा झौंका उन्हें यहाँ फैंक गया हो, अपनी आस्ताना में हवा रखने का दावा करते हैं।

यह आवारागर्द बेशर्मी से तलवारें हाथ में लिए एक गिराहे से दूसरे में मिलते चले गए। सारे दिन इन बलवाइयों ने शहर को लूटा और शाम को मखमली बिस्तरों में जाकर सो गए। दिल्ली का पूरा शहर अपने हाकिमों से खाली हो गया और उसकी जगह खुदा के ऐसे बंदे यहां बस गए जो किसी खुदा को भी नहीं मानते।

जैसे यह कोई माल का बाग हो जो फूलों के दरख्तों से भरा हो। बादशाह उनको रोकने से बेबस थे। उनकी फौजें बादशाह के गिर्द जमा हो गईं और वह उनके दबाव में ऐसे ढक गए जैसे चांद ग्रहण लगने से ढक जाता है।’

बहुत से लोग अंग्रेजी सेना में दूसरे प्रांतों से आए अंग्रेज, सिक्ख, पख्तून एवं गोरखा सैनिकों से डरकर दिल्ली से बाहर चले गए क्योंकि ये लोग दिल्ली के नागरिकों के साथ बहुत कठोर व्यवहार कर रहे थे। हालांकि ऐसा कतई नहीं था कि अंग्रेजी सेना में शामिल समस्त भारतीय सैनिक एक तरह का व्यवहार कर रहे थे। बहुत से सिपाहियों ने भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को इन परिस्थितियों में भुलाया नहीं था।

एक अंग्रेज अधिकारी की डायरी के संदर्भ से विलियम डैलरिम्पल ने लिखा है- ‘बहुत से भारतीय सिपाहियों ने अपने अधिकारियों का अपमान किए बिना, खामोशी से लेकिन दृढ़तापूर्वक घोषणा कर दी कि उन्होंने स्वयं को कम्पनी की नौकरी से स्वतंत्र कर लिया है और अब वे दिल्ली के बादशाह की प्रजा बनने और उनकी सेवा करने जा रहे हैं।

बहुत से सिपाहियों ने अपनी अधिकारियों को सलाम किया और बहुत इज्जत और तमीज से अपने मुंह बगावत के केन्द्र अर्थात् दिल्ली की तरफ फेर लिए ताकि उन लोगों में सम्मिलित हो सकें और उनकी संख्या बढ़ा सकें जो कि हिन्दुस्तान की मुसलमान राजधानी में हमसे लड़ने वाले थे।’

इस अंग्रेज अधिकारी की डायरी के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सभी भारतीय सैनिक अनपढ़ एवं असभ्य नहीं थे।

जब कम्पनी सरकार से विद्रोह करने वाले बहुत से भारतीय सिपाही अपने पुराने स्वामियों अर्थात् अंग्रेजों के विरुद्ध तमीज से पेश आए थे तो निश्चित ही उन सिपाहियों की संख्या भी कम नहीं रही होगी जो अब भी कम्पनी सरकार की तरफ से लड़ रहे थे और उन्होंने अब भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पल्लू थाम रखा था किंतु दिल्ली वालों के मन में अंग्रेजी सेनाओं का भय घर कर चुका था। वे दूध से जले हुए थे और अब छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीना चाहते थे।

तिलंगों के साथ दिल्ली वासियों का अब तक का अनुभव बहुत बुरा था इसलिए अब वे फिर दिल्ली में घुस रही अंग्रेजी सेनाओं के हाथों और जलील नहीं होना चाहते थे। यही कारण था कि दिल्ली के बहुत से संभ्रांत लोगों ने अंग्रेजी सेनाओं के भय से दिल्ली खाली करके भाग जाना ही उचित समझा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली की औरतें

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दिल्ली की औरतें

दिल्ली की औरतें के जिहादी चाहते थे कि बादशाह बहादुरशाह जफर स्वयं घोड़े पर सवार होकर अंग्रेजों की सेना से लड़ें किंतु जब लोगों ने देखा कि बादशाह कायरता दिखा रहा है तो दिल्ली की औरतें जिहादियों की भीड़ में शामिल होकर अंग्रेजों को मारने के लिए निकल पड़ीं।

16 सितम्बर 1857 को जिस दिन अंग्रेजों ने मैगजीन पर फिर से अधिकार किया, उसी दिन क्रांतिकारी सेना का प्रधान सेनापति बख्त खाँ बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ में लिखा है-

‘बख्त खाँ ने बादशाह से कहा, दिल्ली अब आपके हाथों से निकलती जा रही है। फिर भी मैं यह नहीं कह सकता कि अब हमें विजय की कोई आशा ही नहीं रह गई है। मैं यह समझता हूँ कि अब एक ही स्थान पर एकत्रित होकर युद्ध करने के स्थान पर यदि हम बाहर निकलकर खुले प्रदेशों में शत्रु को थकाने में जुट जाएंगे तो अंतिम विजय हमें ही प्राप्त होगी।

जो वीर इस स्वाधीनता संग्राम में अंत तक अपनी तलवारें संभाल कर युद्ध करने के लिए कृत संकल्प होंगे, उन्हें अपने साथ लेकर मैं दिल्ली से बाहर निकलूंगा और शत्रुओं से लोहा लूंगा। शत्रु के समक्ष आत्मसमर्पण करने के स्थान पर मैं उससे युद्ध करते हुए दिल्ली से बाहर निकलना बेहतर समझता हूँ।

अतः जहांपनाह भी हमारे साथ दिल्ली से बाहर निकल चलें जिससे आपकी पताका के नीचे ही हम स्वराज्य की स्थापना का यह पावन संघर्ष जीवन की अंतिम घड़ी तक जारी रखें।’

वीर सावरकर ने लिखा है- ‘यदि इस वृद्ध मुगल बादशाह में बाबर, हुमायूँ अथवा अकबर की वीरता का सौवां हिस्सा भी होता तो वह इस निमंत्रण को स्वीकार कर लेता तथा बख्त खाँ के साथ दिल्ली से बाहर निकल पड़ता किंतु वार्धक्य से हताश, राजविलास से मतिमंद और पराजय से भयभीत हुआ बहादुरशाह जफर अंत तक कोई भी निश्चय नहीं कर पाया।’

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16 सितम्बर को दिल्ली के बहुत से जिहादी लाल किले के सामने आकर एकत्रित होने लगे जिनके लीडर मौलवी सरफराज अली थे और बागी फौज के कई प्रमुख अफसर भी थे।

जिहादी वे लोग थे जो सैनिक नहीं थे किंतु बादशाह को फिर से हिन्दुस्तान का राजमुकुट दिलवाने के लिए अपने प्राण हथेली पर लड़कर अंग्रेजों से मुकाबला कर रहे थे। इन जिहादियों में मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दू भी बड़ी संख्या में थे। यहाँ तक कि हिन्दुओं एवं मुसलमानों की औरतें भी इन जिहादी जत्थों में शामिल हो गई थीं।

ये लोग लाल किले के अंदर गए और बहादुरशाह जफर की मिन्नत करने लगे कि वह लड़ाई में उनका नेतृत्व करे। सईद मुबारक शाह ने बादशाह को विश्वास दिलाया कि दिल्ली के समस्त शहरी, पूरी सेना और आसपास के समस्त लोग उनके साथ होंगे और उनके लिए लड़ेंगे और मरेंगे। हम अंग्रेजों को निकाल बाहर करेंगे।

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जैसे जैसे और जिहादी और शहरी लोग डण्डे लिए, तलवारें उठाए और पुरानी बंदूकें संभाले किले के बाहर जमा होते गए तो ऐसा लगने लगा कि पासा पलटने का वक्त आ गया है। किले के अंदर हालात और भी ज्यादा गंभीर हाते जा रहे थे। शहजादे मिर्जा मुगल ने बादशाह से कुछ रुपए मांगे ताकि वह अपनी सेना को वेतन दे सके और सेना उस वेतन से कुछ खाना खरीद कर खा सके। इस पर जफर ने शहजादे के संदेशवाहक को जवाब दिया कि घोड़ों का सारा साजो सामान, हमारा चांदी का हौदा और कुर्सी मिर्जा मुगल को भिजवा दी जाए ताकि वह उसे बेचकर सिपाहियों को पैसा दे सके।

इस समय किले में चारों तरफ गोले गिर रहे थे। शहर में सामान मिलना बंद हो गया था इसलिए किले में सलातीन और शहजादे सभी भूखे मरने लगे थे। सईद मुबारक शाह ने लिखा है कि जब बादशाह को अंग्रेजों से बचने का कोई रास्ता नहीं दिखा तो दोपहर बारह बजे बादशाह की पालकी लाल किले से बाहर निकली। पूरी दिल्ली में यह समाचार आग की तरफ फैल गया कि बादशाह सलामत स्वयं अंग्रेजों से लड़ाई करने निकले हैं।

हड्डियों के ढांचे की तरह दिखाई दे रहे बूढ़े बादशाह को पालकी में बैठकर युद्ध के मोर्चे पर आया देखकर न केवल दिल्ली के जिहादी प्रसन्न हुए अपितु दिल्ली की औरतें भी जोश से भर गईं। हाथों में तलवार लेकर सड़कों पर लड़ने के लिए आईं दिल्ली की औरतें लड़ना नहीं जानती थीं किंतु उन्हें समझा दिया गया था कि यह जिहाद है, जिहाद के लिए लड़ना और लड़ते हुए जान गंवाना हर मुसलमान का फर्ज है।

जिहाद करने एवं बादशाह के लिए जान देने के लिए घर से निकलीं दिल्ली की औरतें केवल मुसलमान घरों से आई थीं। हिन्दू घरों की औरतों को न तो लड़ाई करना आता था और न वे यह समझ पा रही थीं कि दिल्ली पर किसका शासन होना चाहिए, ईसाइयों का या मुसलमानों का? हिन्दू औरतों के लिए तो दोनों ही एक जैसे थे! किस के लिए लड़तीं और किसके लिए जान गंवातीं? इस लड़ाई में जो भी पक्ष जीतता, सबसे पहले हिन्दू औरतों की देह नौंचता!

इसी समय दिल्ली तथा आसपास के गांवों के लोग भी अपनी लाठियां, तलवारें और बंदूकें लेकर आ गए। लाल किले के सामने लगभग 70 हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई। सारे शहरियों ने एक साथ आगे बढ़ना शुरु किया किंतु उन्हें अंग्रेजी तोपखाने से 200 गज पहले रुकना पड़ा क्योंकि जो भी आगे बढ़ा, गोली खाकर गिरा। अंग्रेजी सेना की बंदूकों से निकली गोलियां सड़क पर बारिश की तरह गिर रही थीं।

हकीम अहसान उल्लाह खाँ ने बादशाह के पास पहुंचकर कहा- ‘यदि एक कदम भी आगे बढ़े तो जरूर गोली खा जाएंगे क्योंकि अंग्रेज बंदूकें लेकर चारों तरफ के घरों में छिपे हुए हैं। आपको यहाँ इस तरह नहीं आना चाहिए था।’

सईद मुबारक शाह ने लिखा है- ‘यह सुनते ही बादशाह जुलूस छोड़कर शाम की नमाज पढ़ने का बहाना बनाकर वापस चले गए। यह देखकर दिल्ली के गाजियों और बागियों की भीड़ हैरान रह गई और आखिर वह बिखर गई।’

इस प्रकार बाबर का आखिरी वंशज अपने जीवन में पहली बार युद्ध करने के लिए लाल किले से बाहर आया किंतु बिना कोई लड़ाई किए फिर से लाल किले में भाग गया। बागियों का हौंसला जफर के खौफजदा होकर पीछे हटने से टूट गया।

अब दिल्ली की जनता को न केवल बादशाह का अपितु अपना और समूची दिल्ली का भविष्य साफ-साफ दिखाई देने लगा था। इसलिए तमाम गाजी और बागी दिल्ली से भाग छूटे। दिल्ली के बचे-खुचे लोग भी अपने जानवरों को लेकर अजमेरी दरवाजे से होकर दिल्ली से बाहर भागने लगे।

दिल्ली की औरतें यह दृश्य देखकर हैरान थीं। यह कैसा जिहाद थे, लोग जिहाद के लिए लड़ते हुए जान नहीं दे रहे थे अपितु कायरों की तरह चिल्लाते हुए भाग रहे थे!

हिन्दू राव भवन की छत पर बंदूकें लेकर खड़े अंग्रेज सिपाही भी यह दृश्य देखकर हैरान रह गए। थोड़ी ही देर में उन्हें समझ में आ गया कि समूची दिल्ली ने हार मान ली है। हॉडसन ने देखा कि बरेली की तरफ जाने वाले बागी सैनिकों के दस्ते दिल्ली से रवाना होने से पहले अपने गोला-बारूद में आग लगा रहे थे।

हॉडसन के जासूसों ने सूचना दी कि नीमच और बरेली के सिपाहियों ने अपना सामान पहले ही सड़क के रास्ते मथुरा भिजवा दिया है और खुद भी मोर्चा छोड़कर भागने को तैयार हैं।

16 सितम्बर 1857 की रात मुगल बादशाहों की परम्परा में वह अंतिम रात थी जब किसी मुगल बादशाह ने बादशाह की हैसियत से लाल किले में रात गुजारी थी। उसके बाद कोई बादशाह फिर कभी बादशाह की हैसियत से लाल किले में रात बिताने नहीं आया।

रात को लगभग 11 बजे बादशाह ने एक ख्वाजासरा को, अपनी सबसे प्यारी बेटी कुलसूम जमानी बेगम को बुलाने के लिए भेजा। बादशाह ने अपनी पुत्री को बहुत से जेवर और रुपए देकर कहा-

‘मैंने तुम्हें अल्लाह को सौंपा! मैं तुमसे जुदा नहीं होना चाहता किंतु तुम्हारी सलामती के लिए जरूरी है कि तुम मुझसे दूर रहो। तुम फौरन अपने शौहर मिर्जा जियाउद्दीन के साथ लाल किला छोड़ दो।’

कुलसूम जमानी बेगम उन जेवरों और अपने परिवार को लेकर फौरन ही लाल किले से बाहर निकल गई और मेरठ की तरफ रवाना हो गई। स्वयं कुलसूम जमानी ने लिखा है कि मार्ग में हमें गूजरों के एक गिरोह ने लूट लिया तथा हमें लगभग नंगा करके छोड़ा!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर का आखिरी वंशज

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बाबर का अखिरी वंशज

बहादुरशाह जफर बाबर का आखिरी वंशज था जो लाल किले में रहता था। जब अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को परास्त कर दिया तथा वे दिल्ली में घुसने लगे तो बहादुरशाह को अपने प्राणों की चिंता हुई। वह जानता था कि अंग्रेज उसके प्राण लिए बिना नहीं छोड़ेंगे। इस कारण बाबर का आखिरी वंशज रात के अंधेरे में लाल किला छोड़कर निकल गया।

17 सितम्बर 1857 का सूरज निकलने से पहले ही बादशाह बहादुरशाह जफर लाल किले के पानी वाले दरवाजे से होकर यमुनाजी की तरफ निकल गया। उसने वजीरे आजम और बेगम जीनत महल को भी अपने जाने के बारे में सूचना नहीं दी। बादशाह के साथ कुछ विश्वसनीय सेवक थे जो बादशाह का खजाना अपने कंधों पर उठाए हुए थे। कोई नहीं जानता था कि बाबर का आखिरी वंशज कहाँ जा रहा है!

बादशाह ने खानदानी खजाने की कुछ चुनी हुई चीजें अपने साथ ली थीं जिनमें कुछ बहुमूल्य शाही जेवरात, व्यक्तिगत स्वामित्व के कागज, उनकी पूरी सूची और एक पालकी थी। जब सूरज निकला तो बादशाह एक कश्ती में बैठकर अपनी मंजिल की ओर रवाना हो गया। कुछ देर बाद बाबर का आखिरी वंशज यमुना नदी के पुराने किले के घाट की तरफ उतरा।

बादशाह समझ रहा था कि उसे किले से निकलते हुए कोई नहीं देख रहा है किंतु वह गलत था। हॉडसन के कुछ जासूस चौबीसों घण्टे बादशाह पर दृष्टि रखते थे और पल-पल की खबर हॉडसन तक भिजवाते थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन जासूसों ने इस सूचना को हॉडसन तक पहुंचाने में कितनी शीघ्रता की होगी!

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बादशाह शाहजहानाबाद से तीन मील दूर दक्षिण में ख्वाजा निजामुद्दीन की दरगाह पर पहुंचा। उसने अपना सारा खजाना निजामी खानदान के वारिसों के पास अमानत के तौर पर रख दिया जिसमें एक संदूक उन पवित्र चीजों का था जिनके बारे में दुनिया के बहुत कम लोग जानते थे।

इस सामग्री में पैगम्बर की दाढ़ी के तीन पवित्र बाल भी थे जो तैमूरी खानदान में चौदहवीं सदी से बाप से बेटे को पवित्र विरासत के रूप में मिलते रहे थे और जफर को उनसे बेहद लगाव था। महल की डायरी और दूसरे संदर्भों से पता चलता है कि विशेष अवसरों पर बहादुरशाह जफर स्वयं अपने हाथों से उन पवित्र बालों को गुलाबजल से धोता था।

यह समस्त सामग्री निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सुरक्षित रख देने के बाद बादशाह ने दरगाह में अपनी और अपने परिवार की सलामती के लिए दुआ मांगी। दरगाह के पीरजादे ने बादशाह को बहुत साधारण नाश्ता करवाया।

नाश्ता करने के बाद बादशाह फूट-फूट कर रोने लगा तथा पीरजादा से कहने लगा-

‘मैं हमेशा से जानता था कि ये बागी हमारे सिर पर मुसीबत लाएंगे। मुझे शुरू से ही बहुत से अंदेशे थे और अब वे सब सच साबित हो रहे हैं। ये सिपाही अंग्रेजों के सामने भाग खड़े हुए। हालांकि मैं एक दरवेश हूँ और मेरा मिजाज सूफियाना और फकीराना है लेकिन मेरी रगों में जो अजीम खून दौड़ रहा है, वह मुझे खून की आखिरी बूंद तक लड़ने के लिए तैयार रखेगा। मेरे बुजुर्गों ने इससे भी ज्यादा बुरे दिन देखे थे लेकिन वे कभी हिम्मत नहीं हारे। लेकिन मैंने किस्मत का लिखा पढ़ लिया है।

मुझे अपनी नजरों के सामने यह मुसीबत नजर आ रही है जो मेरी नस्ल की शान को खत्म कर देगी और अब कोई शक नहीं रहा कि मैं तैमूर घराने का आखिरी हूँ जो हिंदुस्तान के तख्त पर बैठा। मुगल हुकूमत का चिराग भड़क रहा है तथा सिर्फ चंद घंटे और रौशन रहेगा।

जब मुझे यह मालूम है तो मैं क्यों बेकार का और खून बहने की वजह बनूं! इसलिए मैंने किला छोड़ दिया। अब यह मुल्क खुदा के हवाले है और यह उसकी मिल्कियत है। वह जिसे चाहे सौंपे।’

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इसके बाद बाबर का आखिरी वंशज अपनी पालकी में बैठकर अपने गर्मियों के महल को चल दिया जो महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास स्थित था। वहीं पर उसे प्रधान सेनापति बख्त खाँ मिलने वाला था। बादशाह अभी थोड़ी दूर ही गया था कि इलाही बख्श घोड़ा दौड़ाता हुआ बादशाह के पास आया और बादशाह से कहने लगा कि गूजरों का एक गिरोह रास्ते में हर एक को लूट रहा है जैसा उन्होंने पहले अंग्रेजों के साथ किया था। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि इलाही बख्श ने जो कहा था, वह सच था किंतु जफर को मालूम नहीं था कि इलाही बख्श हॉडसन का वेतनभोगी कर्मचारी था और वह हॉडसन के कहने पर ही बाहदशाह को ढूंढता हुआ वहाँ आया था।

बादशाह अंग्रेजों के हाथों में पड़ने से बचता फिर रहा था और हॉडसन अपना खेल खेल रहा था। वह भी नहीं चाहता था कि बादशाह अंग्रेजों के हाथों में पड़ जाए। वह बादशाह को एक सुरक्षित स्थान में जाकर छिप जाने देना चाहता था ताकि समय आने पर वह बादशाह को गिरफ्तार करके कम्पनी सरकार के सामने स्वयं को अत्यंत योग्य अधिकारी सिद्ध कर सके।

विलियम हॉडसन ने बेगम जीनत महल से एक गुप्त समझौता समय रहते ही कर लिया था कि जब भी बागियों का अंत हो जाएगा तो बादशाह तथा बेगम को विलियम हॉडसन के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ेगा। इसके बदले में विलियम हॉडसन कम्पनी सरकार से यह वचन लेगा कि कम्पनी सरकार बादशाह बहादुरशाह जफर, बेगम जीनत महल, शहजादे जवांबख्त और जीनत के पिता मिर्जा कुली खाँ की जान नहीं लेगी।

इस समझौते में बहादुरशाह जफर की अन्य बेगमों एवं उनके पुत्रों का कोई उल्लेख नहीं था किंतु यह बात न तो बादशाह को पता थी और न कम्पनी सरकार के किसी अन्य अधिकारी को। इसलिए बादशाह विचार कर रहा था कि वह अपने प्रधान सेनापति बख्त खाँ से मिलकर उसकी सहायता से दिल्ली से बाहर चला जाए।

यही कारण था कि बादशाह ने इलाही बख्श की बात नहीं मानी और कुतुब साहब की दरगाह की तरफ बढ़ना जारी रखा किंतु जब इलाही बक्श ने कहा कि बेगम जीनत महल ने हॉडसन से सारी बातें तय कर ली हैं तथा बेगम जीनत महल भी निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर पहुंचने वाली हैं तो बादशाह वापस निजामुद्दीन की दरगाह की तरफ मुड़ गया। कुछ देर बाद बेगम जीनत महल निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर आई तथा बादशाह को लेकर हुमायूँ के मकबरे पर चली गई जो निजामुद्दीन की दरगाह से अधिक दूर नहीं था।

पाठकों की सुविधा के लिए यह बता देना समीचीन होगा कि हुमायूँ का मकबरा एक विशाल भवन है जिसमें मुगल बादशाहों, बेगमों, शहजादियों की कब्रें बनी हुई हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि इसे मुगलों का कब्रिस्तान भी कहा जाता है। इस मकबरे का निर्माण सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में अकबर के शासन काल में हुआ था। बहादुरशाह जफर के समय की दिल्ली में इससे बड़ा और इससे शानदार भवन और कोई नहीं था।

बादशाह ने हुमायूँ के मकबरे पर पहुंचकर लाल किले में स्थित अपने विश्वसनीय अधिकारी के नाम गुप्त संदेश भेजा कि वह बादशाह के हाथी, हकीम अहसनुल्लाह की हवेली पर भेज दे तथा हकीम अहसनुल्लाह से कहे कि वह शाही खानदान के पास मकबरे पर आ जाए। इसके बाद बादशाह अपने पूर्वजों के मकबरे के अंदर के तहखाने में इंतजार और दुआ करने चला गया।

इधर तो यह सब घटनाएं हो ही रही थीं और उधर पूरी दिल्ली में यह सूचना आग की तरह फैल गई कि बहादुरशाह जफर ने आखिर वही कर दिखाया जिसे करने की धमकी वह लम्बे समय से दे रहा था। अर्थात् बाबर का आखिरी वंशज किला छोड़कर ख्वाजा कुतुब की दरगाह पर चला गया। जनता यही समझती थी कि बादशाह कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर गया है क्योंकि बादशाह कहाँ है, इस सूचना को बहुत सावधानी के साथ गुप्त रखा गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाल किले में हत्याकाण्ड

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लाल किले में हत्याकाण्ड

अंग्रेज अधिकारियों को जब ज्ञात हुआ कि शाही परिवार लाल किला छोड़कर भाग गया है तब उन्होंने लाल किले में हत्याकाण्ड करने का निश्चय किया। अंग्रेजों ने लाल किले में रहने वालों को तीतरों की तरह मार डाला!

ऐसा करके वे दिल्ली की जनता को संदेश देना चाहते थे कि कोई भी हिन्दुस्तानी अंग्रेजों का सामना करने का साहस न कर अन्यथा वह भी उसी तरह मारा जाएगा जिस तरह लाल किले के भीतर रहने वाले शाही खानदान के लोग मार दिए गए हैं।

अब बहादुरशाह जफर और उसका परिवार पूरी तरह से हॉडसन के जाल में फंस चुका था। बादशाह यह समझ रहा था कि वह अंग्रेजों को चकमा देकर लाल किले से निकलने में सफल रहा है किंतु वास्तविकता यह थी कि वह हॉडसन का बंदी हो गया था। एक मासूम परिंदा बहेलिये के जाल में बंद था और मासूमियत की इन्तिहां यह थी कि परिंदा समझ रहा था कि बहेलिया कभी भी उस तक नहीं पहुंच सकता।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि बहादुरशाह जफर की क्रांतिकारी सेनाओं के मुख्य सेनापति बख्त खान तथा अन्य क्रांतिकारियों ने बादशाह से अनुरोध किया कि वे भी बादशाह के साथ हुमायूँ के मकबरे में रहेंगे ताकि बादशाह की रक्षा की जा सके किंतु बादशाह का विचार था कि ऐसा करना अधिक खतरनाक होगा क्योंकि अंग्रेज अधिकारी तो क्रांतिकारी सैनिकों से बदला लेने के लिए उन्हें खोज रहे हैं, इसलिए अंग्रेज अधिकारी बादशाह तथा उसके परिवार को नहीं मारेंगे। इस प्रकार हुमायूँ के मकबरे में बादशाह और उसका परिवार बिना किसी सिपाही के अकेले ही रह गए।

वीर सावरकर ने लिखा है कि सेनापति बख्त खाँ ने बादशाह को सुझाव दिया था कि वह क्रांतिकारियों के साथ दिल्ली से बाहर निकल जाए क्योंकि आत्मसमर्पण करने से बेहतर होगा कि हम लड़ते हुए मरें किंतु बादशाह ने बख्त खाँ का यह निमंत्रण अस्वीकार कर दिया और हुमायूँ के मकबरे में जाकर छिप गया तथा मिर्जा इलाही बख्श का परामर्श मानकर अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करने पर विचार करने लगा।

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जब दिल्ली की बची खुची जनता को यह ज्ञात हुआ कि बादशाह और बेगमें भी लाल किला छोड़कर भाग गए तो दिल्ली से जन साधारण के पलायन की गति और तेज हो गई। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि दिल्ली की जनता में यह सूचना फैल गई कि दिल्ली से बाहर निकलने वालों को गूजर और मेवाती मार रहे हैं तो दिल्ली के लोग अजमेरी दरवाजे से निकलने की बजाय कश्मीरी दरवाजे की तरफ बढ़े क्योंकि बहुत से लोगों को लगता था कि उन्हें अंग्रेजों की बजाय गूजरों और मेवातियों से अधिक खतरा है।

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जब कश्मीरी दरवाजे पर नियुक्त अंग्रेज सिपाहियों ने देखा कि दिल्ली की जनता उनकी तरफ भागी आ रही है तो अंग्रेजों ने उन पर गोलियों की ताबड़तोड़ बौछार कर दी। इससे बहुत से निरपराध लोग मारे गए। अंग्रेज सिपाहियों द्वारा इन लोगों की तलाशी ली गई तथा उनके समस्त जेवर एवं रुपए छीन लिए गए। बहुत से दिल्ली वासियों ने दिल्ली से बाहर निकलकर प्रायः वही रास्ते पकड़े जिन पर चार महीने पहले अंग्रेज भागे थे। अर्थात् करनाल एवं मेरठ की ओर जाने वाले रास्ते।

हैरियट टाइटलर नामक एक अंग्रेज औरत जो 11 मई को स्वयं दिल्ली से जीवित बचकर करनाल भागी थी और अब दिल्ली लौट आई थी, उसने लिखा है- ‘कितना दर्दनाक दृश्य था जब औरतों और बच्चों की भीड़ कश्मीरी और मोरी दरवाजे से बाहर आ रही थी। इनमें वे औरतें भी थीं जो कभी अपने घरों से बाहर नहीं निकली थीं। जो अपने सहन में भी बस कुछ कदम ही चलती थीं और वे भी अपने नौकरों या घरवालों के साथ। अब उन्हें न केवल यूरोपियन सिपाहियों अपितु अपने लोगों के भी घूरने का सामना करना पड़ रहा था। मुझे उन पर बहुत तरस आ रहा था विशेषकर ऊंची जाति की उन हिन्दू औरतों पर जिनके लिए निचली जाति की औरतों के साथ चलना बहुत तकलीफदेह था।’

18 सितम्बर 1857 को अंग्रेजों ने जामा मस्जिद पर अधिकार कर लिया। अब वे लाल किले से अधिक दूर नहीं रह गए थे। 19 सितम्बर की रात में अंग्रेजों ने लाल किले के सामने मोर्चा बना लिया। इसके लिए दिल्ली बैंक के ध्वस्त भवन के मलबे का उपयोग किया गया।

तोपें जमा दी गईं और उनके पीछे गोला-बारूद रख दिया गया। आसपास के भवनों पर अंग्रेज सिपाहियों को बंदूकों के साथ तैनात कर दिया गया ताकि यदि कोई आदमी किले से बाहर निकलकर आए तो उसे उसी क्षण भून दिया जाए।

सर थॉमस मेटकाफ के जंवाई सर एडवर्ड कैंपबैल ने स्वयं अपनी निगरानी में यह तैयारी करवाई। वह भारत के इतिहास का एक पुराना पन्ना हमेशा के लिए फाड़कर नष्ट करने जा रहा था और एक नया पन्ना लिखने जा रहा था। उसने 20 सितम्बर की सुबह लगभग 10 बजे अपने सिपाहियों को बारूद के कुछ थैले लाल किले के मुख्य दरवाजों के नीचे रखने के लिए दौड़ाया, इन सिपाहियों पर लाल किले से हमला न हो, इसके लिए अंग्रेजों ने किले की तरफ खूब गोलियां बरसाईं।

विलियम हॉडसन को मालूम था कि इस समय किले में अंग्रेजों का सामना करने वाला कोई नहीं है किंतु उसने यह सूचना जानबूझ कर अपने जनरल को नहीं दी। हॉडसन चाहता था कि जनरल कैंपबैल को लगे कि उसने लाल किले को बड़ी मुश्किल से जीता है तथा बादशाह मौके का लाभ उठाकर कहीं फरार हो गया है और बाद में हॉडसन बहादुरशाह को बंदी बनाकर जीत का सारा श्रेय स्वयं ले ले।

हॉडसन ने बड़े आश्चर्य के साथ देखा कि भले ही बहादुरशाह जफर का कोई सिपाही या बख्त खाँ की सेना का कोई सिपाही इस समय लाल किले की रक्षा के लिए आगे नहीं आया किंतु दिल्ली के कुछ सिरफिरे लोग अब भी बंदूकें लेकर लाल किले की रक्षा के लिए खड़े थे जो स्वयं को गाजी कहते थे और इसलिए मृत्यु का वरण करने आए थे कि उन्हें कभी भी वह दिन न देखना पड़े जब अंग्रेज बहादुरशाह को बंदी बनाएं या उसे मार डालें। बादशाह से पहले वे स्वयं मर जाना चाहते थे!

लेफ्टिनेंट फ्रेड मेसी इस आक्रमण में शामिल था। उसने इस आक्रमण का वर्णन अपनी माँ एवं बहनों को लिखे पत्रों में किया है। वह लिखता है कि जैसे ही लाल किले के दरवाजे के पास रखे बारूद के थैलों में विस्फोट हुआ, वैसे ही उस विशालाकाय दरवाजे का एक हिस्सा तेज आवाज के साथ धरती पर गिर पड़ा और हम लोग नारे लगाते हुए किले में घुस गए। हमने लाल किले में दिखाई देने वाले इक्का दुक्का आदमियों को तीतरों की तरह गोलियों से उड़ा दिया।

सदियों से इस धरती पर यही परम्परा रही है, कमजोर को देखकर ताकतवर का गुस्सा और ज्यादा खतरनाक हो जाता है, लाल किले में घुसे अंग्रेज भी इस समय जबर्दस्त गुस्से में थे।

लाल किले में हत्याकाण्ड में ऐसे लोग भी मारे गए जो सैनिक नहीं थे, जिहादी नहीं थे, बादशाह के परिवार के नहीं थे, अपितु तांगा एवं बैलगाड़ी चलाकर रोजी-रोटी कमाने वाले थे। वे लाल किले के महलों में बर्तन मांजते थे, कपड़े धोते थे या फिर झाड़ू-बुहारी करते थे, अंग्रेज सिपाहियों ने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन करते हुए इन निर्धन और निर्दोष लोगों को मार डाला। मानो लाल किले में हत्याकाण्ड से प्रसन्न होकर लंदन में बैठी महारानी विक्टोरिया उन्हें विक्ट्री क्रॉस से सम्मानित करेगी और उन्हें अंग्रेजी पलटन का मेजर जनरल बना देगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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