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अस्सी घाव (17)

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अस्सी घाव - www.bharatkaitihas.com
महाराणा संग्राम सिंह का प्रतीकात्मक चित्र

राणा ने अपने शत्रुओं का जी भर कर मान मर्दन किया किंतु इन लड़ाईयों में उसके शरीर के हर हिस्से पर घाव लग गये। उसके शरीर पर कुल अस्सी घाव थे। वह एक आँख, एक हाथ और एक पैर से वंचित हो गया था किंतु उसकी शक्तियाँ अब भी उसके पास थीं।

राजस्थान में मेवाड़ राजघराना धरती के सबसे पुराने राजवंशों में से है। यह वंश ईसा की पाँचवीं शताब्दी में गुहिल नाम के एक राजा से चला था जो रहस्यमयी शक्तियों का स्वामी था। एक हजार साल से यह राजवंश हिन्दू प्रजा एवं नरेशों के लिये आदरणीय बना हुआ था।

पंद्रहवीं शताब्दी में रायमल इस वंश का उत्तराधिकारी हुआ। उसकी राजधानी चित्तौड़ थी। रायमल के तीन बेटे थे- पृथ्वीराज, जयमल और संग्रामसिंह। तीनों राजकुमार बड़े ही वीर, महत्वाकांक्षी और दुस्साहसी थे। एक दिन तीनों राजकुमारों ने एक ज्योतिषी को अपनी जन्मपत्रियां दिखाईं।

ज्योतिषी ने कहा कि ग्रह तो पृथ्वीराज और जयमल के भी अच्छे हैं किंतु राजयोग संग्रामसिंह के हैं। इतना सुनते ही पृथ्वीराज और जयमल तलवार लेकर संग्रामसिंह पर टूट पड़े। पृथ्वीराज की तलवार की नोक संग्रामसिंह की आँख में जा घुसी।

संग्रामसिंह भी तलवार निकाल कर दोनों भाईयों से मुकाबिले के लिये तैयार हो गया। ठीक उसी समय महाराणा रायमल का चाचा सारंगदेव वहाँ आया। उसने इस दुष्टता के लिये दोनों राजकुमारों की प्रताड़ना की और सुझाव दिया कि ज्योतिषी की बात का विश्वास करना ठीक नहीं है।

इससे तो भीमल गाँव की देवी के मंदिर में सेवा करने वाली चारणी से निर्णय करा लो। जब तीनों राजकुमार अपने-अपने दल-बल सहित पुजारिन के पास पहुँचे तो चारणी ने भी संग्रामसिंह के राजा होने की घोषणा की। इतना सुनते ही एक बार फिर पृथ्वीराज और जयमल तलवार लेकर संग्रामसिंह पर टूट पड़े।

इस बार सारंगदेव सावधान था। उसने दोनों राजकुमारों की तलवारों को अपनी तलवार पर रोका। पृथ्वीराज घायल होकर वहीं पृथ्वी पर गिर पड़ा और संग्रामसिंह घोड़े पर बैठकर भाग निकला। जयमल उसे मारने के लिये पीछे लपका किंतु संग्रामसिंह मेवाड़ राज्य से बाहर निकल गया और जयमल के हाथ नहीं आया।

अपने भाई पृथ्वीराज से संग्रामसिंह को अपने शरीर पर लगने वाला पहला घाव मिला था जिससे उसकी एक आँख जाती रही थी। उसके बाद तो संग्रामसिंह को जीवन भर इन घावों का सामना करना पड़ा जिससे उसके शरीर पर घावों की संख्या अस्सी तक जा पहुँची थी। ये सब घाव एक से बढ़कर एक गंभीर थे।

पिता के राज्य से निकाला जाकर संग्रामसिंह जंगलों में भटकने लगा। एक दिन जब वह एक पेड़ के नीचे सोया हुआ था तब श्रीनगर[1]  का जागीरदार कर्मचंद वहाँ से निकला। मार्ग में एक अद्भुत दृश्य देखकर वह अपने घोड़े से नीचे उतर पड़ा। उसने देखा कि एक युवक पेड़ के नीचे सोया हुआ है और एक नाग उसके सिर पर फन फैलाये हुए छाया कर रहा है।[2]  

करमसिंह ने संग्रामसिंह को जगाया और उसका परिचय पूछा। संग्रामसिंह का परिचय पाकर करमसिंह उसे आदरपूर्वक अपने घर ले गया और अपनी बेटी का विवाह उसके साथ कर लिया। जब यह बात राणा रायमल को पता लगी तो उसने संग्रामसिंह को चित्तौड़ बुलवा लिया। तब तक संग्रामसिंह के दोनों भाई मारे जा चुके थे।

ई. 1509 में रायमल की मृत्यु हुई तो संग्रामसिंह चित्तौड़ की गद्दी पर बैठा। वह अत्यंत वीर और उदात्त भाव का स्वामी था। मानवोचित गुण उसमें कूट-कूट कर भरे थे। इतिहास में उसे जितना आदर प्राप्त हुआ उतना आदर संसार में बहुत कम लोगों को प्राप्त है। भारत वर्ष के इतिहास में वह राणा सांगा के नाम से विख्यात हुआ।

मेवाड़ के महाराणाओं में तो वह सबसे प्रबल हुआ ही, अपने समय का वह सबसे प्रबल हिन्दू सम्राट था। जिस समय वह मेवाड़ का स्वामी हुआ उस समय दिल्ली पर सिकंदर लोदी, गुजरात पर महमूद शाह बेगड़ा और मालवा पर नासिरशाह खिलजी शासन कर रहे थे। उन तीनों की आँख मेवाड़ पर लगी हुई थी। इसलिये वे तीनों ही सांगा के शत्रु हो गये।

सांगा भी अपनी तरह का एक ही वीर था। उसने गुजरात तथा मालवा की ईंट से ईंट बजा दी और गुजरात तथा मालवा अपने राज्य में शामिल कर लिये। राणा की बढ़ी हुई शक्ति देखकर इब्राहीम लोदी  राणा पर चढ़कर आया। हाड़ौती क्षेत्र में खातौली गाँव के पास राणा ने इब्राहीम लोदी[3] को रोका और उसमें जबर्दस्त मार लगायी।

इब्राहीम लोदी किसी तरह अपनी जान बचाकर भागा किंतु उसके बेटे को सांगा ने पकड़ लिया। कुछ दिन बाद सांगा ने उसे भी आजाद कर दिया। इस युद्ध में राणा का एक हाथ कट गया और एक घुटने पर तीर लगने से वह सदा के लिये लंगड़ा हो गया।

कुछ दिन बाद इब्राहीम लोदी ने फिर से राणा पर आक्रमण किया। इस बार भी राणा ने इब्राहीम लोदी को मार भगाया। इब्राहीम लोदी के कई हजार सिपाही मारे गये। जब मांडू के सुल्तान महमूद को पता चला कि राणा इब्राहीम लोदी के साथ उलझा हुआ है तो वह राणा के सामंत मेदिनीराय पर चढ़ बैठा।

राणा ने इब्राहीम लोदी से निबट कर महमूद को जा घेरा और उसे गिरफ्तार करके चित्तौड़ ले आया। महमूद धूर्त आदमी था। उसने राणा के पैरों पर गिरकर क्षमा याचना की और विश्वास दिलाया कि भविष्य में कभी भी दुष्टता नहीं करेगा। राणा ने उसका आधा राज्य छीनकर उसे जीवित छोड़ दिया। महमूद स्वतंत्र होते ही राणा के विरुद्ध षड़यंत्र रचने में व्यस्त हो गया।

राणा ने अपने शत्रुओं का जी भर कर मान मर्दन किया किंतु इन लड़ाईयों में उसके शरीर के हर हिस्से पर घाव लग गये। उसके शरीर पर कुल अस्सी घाव थे। वह एक आँख, एक हाथ और एक पैर से वंचित हो गया था किंतु उसकी शक्तियाँ अब भी उसके पास थीं। अपने पूर्वज गुहिल तथा ठक्कर बापा की तरह सांगा भी रहस्यमय शक्तियों का स्वामी था। वह संकल्प का धनी, अति उत्साही, उद्भट वीर और प्रखर बुद्धि युक्त था। पूरे मध्य युग में भारत भर में उसके जैसा और कोई दूसरा राजा नहीं था।

-अध्याय 17, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] अजमेर जिले में स्थित है।

[2] इस घटना का उल्लेख गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपनी पुस्तक उदयपुर राज्य का इतिहास में किया है।

[3] उस समय तक सिकंदर लोदी के स्थान पर इब्राहीम लोदी दिल्ली की गद्दी पर बैठ चुका था।

प्रसाद (18)

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प्रसाद - www.bharatkaitihas.com
मीराबाई

राजकुमार विक्रमादित्य ने अपने पिता महाराणा संग्राम सिंह से अपनी बड़ी भाभी मीराबाई की शिकायत की कि मीरा बाई प्रसाद लेने से मना कर रही हैं। क्योंकि मीराबाई की दृष्टि में यह प्रसाद नहीं भैंसे का मांस है।

– ‘प्रसाद का अपमान! भाभीसा, आप तो स्वयं को भगवान की भक्त कहती हैं!’ विक्रमादित्य ने चीख कर कहा।

– ‘यह प्रसाद नहीं है कुंअरजू! यह मांस है। हम इसे ग्रहण नहीं कर सकते।’

– ‘यह देवी को अर्पित किये गये भैंसे का मांस है। इस नाते यह प्रसाद है।’

– ‘भले ही यह देवी को अर्पित किया गया है किंतु यह है तो मांस ही।’

– ‘आप जानती हैं कि जब महाराणाजू को पता चलेगा कि आपने राजमहल की मर्यादा भंग की है और दशहरे के प्रसाद को मांस कहकर त्याग दिया है तो वे बहुत कुपित होंगे।’

– ‘मेरा पूरा विश्वास है कि राणाजू यह सुनकर कुपित नहीं होंगे।’

मीरां की ओर से निरुत्तर होकर राजकुमार विक्रमादित्य ने अपने बड़े भाई युवराज भोजराज की ओर देखा ठीक उसी समय कुंवरानी मीरां ने भी अपने पति भोजराज की ओर देखा। कुंअर भोजराज ने दोनों की ही आँखों में अपने लिये समर्थन की चाह देखी किंतु जहाँ कुंवरानी मीरां के नेत्रों में समर्थन प्राप्त करने का विनम्र अनुरोध था, वहीं विक्रमादित्य की आँखों में क्रोध की ज्वाला दहक रही थी।

– ‘क्यों न हम यह फैसला राणाजू से ही करवा लें!’ भोजराज ने सुझाव दिया। वह जानता था कि विक्रम नीच है, जब तक राणाजू अपने मुख से निर्देश न करेंगे, यह पीछा छोड़ने वाला नहीं।

– ‘ठीक है, आज फैसला हो ही जाये।’ विक्रमादित्य ने फुंकार कर कहा।

तीनों ही व्यक्ति थोड़ी दूर बैठे राणाजी के पास गये। राणाजी तकिये का सहारा लेकर कुछ विश्राम करने का प्रयास कर रहे थे। पूरा का पूरा भैंसा तलवार के एक ही वार से काट डालने से उन्हें कुछ थकान सी हो आयी थी, अब वे पहले जैसे युवा नहीं रहे थे।

– ‘महाराणाजू! भाभीसा प्रसाद लेने से मना करती हैं।’

– ‘क्यों बनीसा! क्या देवर-भौजाई में फिर कोई लड़ाई हो गयी।’

– ‘नहीं राणासा, कोई लड़ाई नहीं हुई’

– ‘तो फिर आपके देवरसा आपकी शिकायत क्यों करते हैं?’

– ‘हमने देवरजू को कहा कि हम मांस नहीं खाते।’

– ‘लेकिन पुत्री यह मांस नहीं, भगवान का प्रसाद है।’

– ‘दाता! हम वही प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे हमारे आराध्य किशन कन्हाई ग्रहण करते हैं।’

– ‘तो ठीक है, आप हलुआ खाईये, प्रसाद में वह भी तो बना है।’

– ‘हाँ! हम वह प्रसाद ग्रहण कर लेंगे।’

– ‘लेकिन राणाजू भाभीसा कब तक अपनी मनमानी करेंगी? वे भिखारियों के साथ बैठकर गीत गाती हैं। जाने कौन-कौन लोग इनके महलों में आते हैं जिन्हें प्रसन्न करने के लिये आप पूरी-पूरी रात नाचती हैं। भाई साहब को तो राज परिवार की कोई मर्यादा का भान है नहीं। क्या उन्हें दिखायी नहीं देता कि मेवाड़ की भावी महाराणी बिना पर्दा किये पराये मर्दों के साथ उठती बैठती हैं?

– ‘आप जाइये कुंअर जू! मीरां अभी बच्ची है। समय आने पर हम उसे सब कुछ समझा देंगे।’

– ‘लेकिन राणाजी आज तो यह बेपर्दा होकर नाच रही है लेकिन कल को जब राज परिवार का हर सदस्य मर्यादा भंग करने पर उतारू हो जायेगा। तब क्या होगा?’

– ‘हमने कहा ना अब आप जाइये। आप अपनी बात कह चुके हैं।’ राणा ने व्यथित होकर कहा।

– ‘लेकिन राणाजी………!’

– ‘विक्रम!!’ राणा ने आँख दिखाई तो विक्रम सहम गया। आगे के शब्द उसके मुँह में ही रह गये। वह लाल-लाल आँखों से कुंवरानी मीरां को देखता हुआ वहाँ से चला गया।

– ‘कुंअरजू!’ विक्रम के जाने के बाद महाराणा ने भोजराज को सम्बोधित किया।

– ‘हाँ महाराणाजू!’

– ‘इस दुष्ट का ध्यान रखना। जब मैं न रहूंगा तो यह तुम्हें और मीरां को बहुत कष्ट देगा। दासी पुत्र बनवारी ने इसकी बुद्धि मलिन कर दी है। इसका मामा सूरजराज भी इसे उल्टी-सीधी पट्टी पढ़ाता रहता है। यह अकारण ही अपने भाइयों से वैर करता घूमता है।’ महाराणा ने दीर्घ साँस छोड़ते हुए कहा। मीरां अपने श्वसुर के माथे की धूल सिर में लगा कर अपने महल के लिये चली गयी।

उस रात मीरां के महल से देर तक तानपूरे की आवाज आती रही। मीरां गा रही थी-

हे  री  मैं तो  प्रेम दीवाणी  मेरा दरद न  जाने  कोय।

सूली  ऊपर  सेज  हमारी,  किस  विधि  सोना  होय।।

गगन मण्डल पै सेज पिया की, किसी विधि मिलना  होय।

दरद की मारी बन बन  डालूँ  वैद  मिला  नहिं  कोय।।

मीरां  की  प्रभु  पीर  मिटै  जब  वैद  साँवरिया  होय।

मीरां के कोमल कण्ठ से निकली स्वर माधुरी से चित्तौड़ के रजकण उसी प्रकार चैतन्य हो गये जिस प्रकार चंदन से चर्चित होने पर प्रस्तरों से भी सुगंध आने लगती है। महाराणा बहुत देर तक कुंवराणी के महलों के बाहर खड़ा उसके भजन सुनता रहा।

-अध्याय 18, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

प्रस्थान (19)

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प्रस्थान

जब महाराणा सांगा ने बाबर से युद्ध करने के लिए चित्तौड़ से प्रस्थान किया तो उन्होंने महाराणी द्वारा तिलक किए जाने के बाद मीराबाई के हाथों से भी तिलक करवाया। सांगा का मन मीरा के भविष्य को लेकर उद्वेलित था।

जब महाराणा सांगा ने देखा कि बाबर ने देखते ही देखते दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया तो सांगा को भारत के भाग्य की चिंता हुई उसने भारत भूमि से म्लेच्छों को मार भगाने का संकल्प ले रखा था और वह कई वर्षों से इब्राहीम लोदी को उखाड़ फैंकने की तैयारियां कर रहा था। जब उसने सुना कि बाबर मध्य एशिया से अपनी सेना लेकर भारत की ओर आ रहा है तो सांगा चुप होकर बैठ गया और बाबर तथा इब्राहीम लोदी के युद्ध का परिणाम आने की प्रतीक्षा करने लगा।

उधर इब्राहीम लोदी से निबट कर बाबर की दृष्टि भी चित्तौड़ नरेश राणा सांगा की ओर गयी। वह जानता था कि सांगा ने इब्राहीम लोदी के विरुद्ध एक बड़ा लश्कर एकत्र कर रखा है। यह भी निश्चित था कि सांगा इस लश्कर का उपयोग बाबर के खिलाफ करेगा।

वैसे भी इब्राहीम लोदी का साम्राज्य हाथ में आते ही बाबर के साम्राज्य की सीमायें सांगा के साम्राज्य से आ मिलीं थीं। इसलिये स्वाभाविक ही था कि अब दोनों ही अपनी-अपनी शक्ति का परिचय एक दूसरे से करवाते।

यद्यपि चित्तौड़ में कुछ घटना चक्र ऐसा घूम गया था कि राणा का चित्तौड़ छोड़कर जाना उचित नहीं था। दुष्ट विक्रम राणा के गले की हड्डी बन गया था। कुंअर भोजराज के वीर गति प्राप्त कर लेने के बाद से तो विक्रम के हौंसले और भी बुलंद हो गये थे। विक्रम का मामा बूंदी का कुंअर सूरजमल भी उसके दुष्चक्रों में शामिल हो गया था।

वह विक्रम को महाराणा का उत्तराधिकारी बनाने के लिये राजकुमार रतनसिंह को मारने की फिराक में रहता था जो कि भोजराज के बाद चित्तौड़ का उत्तराधिकारी था। दुर्भाग्य से विक्रम की माँ भी इन दुष्चक्रों में सम्मिलित हो गयी थी। इतना सब होने पर भी राणा ने राष्ट्र पर आयी विपत्ति को अपने घर की विपत्ति से बड़ा जानकर बाबर से दो-दो हाथ करना ही उचित समझा।

महाराणा ने अपने अस्सी हजार[1]  सैनिकों के साथ गंभीरी नदी के तट पर स्थित खानुआ[2]  के मैदान में बाबर का मार्ग रोकने का निश्चय किया।

एक दिन बहुत सवेरे ही महाराणी ने महाराणा के विस्तृत भाल पर केशर और कुमकुम का तिलक अंकित किया। महाराणा नंगी तलवार हाथ में लेकर अपने नीले घोड़े पर सवार हुआ। सैंकड़ों कण्ठ महाराणा की जय, मेवाड़ भूमि की जय, एकलिंगनाथ की जय बोलने लगे।

– ‘राणीसा।’ अचानक ही राणा को कुछ याद हो आया। वह घोड़े से नीचे उतर गया। 

– ‘हुकुम राणाजू।’ राणा को घोड़े से नीचे उतरता देखकर महाराणी का कलेजा काँप गया। युद्ध पर जाते समय विदा लेकर भी अश्व पर से उतर जाना मंगल शगुन नहीं।

– ‘हम चाहते हैं कि आज युद्ध के लिये प्रस्थान करते समय कुंवराणी मीरां भी हमारा तिलक करें। जाने क्यों हमारा मन उनके लिये भर-भर आता है।’

– ‘लेकिन युद्ध पर जाते समय विधवाओं का मुख नहीं देखा जाता राणाजू।’

-‘राणीसा!’ राणा ने रुष्ट होकर कहा।

– ‘क्षमा करें राणाजू। आप कुंवराणी के हाथों से तिलक करवा कर ही रण भूमि में पधारें।’

जब श्वेत वस्त्र पहने और हाथ में तानपूरा लिये कुंवराणी मीरां राणाजू के सम्मुख उपस्थित हुई तो राणा के नेत्रों से जल की धारा बह निकली। मीरां चीख मारकर श्वसुर के पैरों में गिर गयी।

– ‘महाराणीसा।’ राणा ने अश्रुओं से भीग आये अपने श्वेत श्मश्रुओं को पौंछते हुए कहा।

– ‘हुकुम राणाजू।’ महाराणी की आँखें भी आज पुत्र भोजराज को स्मरण कर भर आयी थीं। यदि आज वह होता तो पिता के अश्व की वल्गा पकड़ कर उनके आगे-आगे चलता।

– ‘कुंअर भोजराज नहीं रहे। हम भी मोर्चे पर जाते हैं। कुंअर रतनसिंह भी हमारे साथ हैं। कौन जाने हम लोगों का फिर लौटना हो या न हो। इस चित्तौड़ को हम मीरां के भरोसे छोड़े जाते हैं और मीरां को तुम्हारे। मीरां के चरणों की धूल से मेवाड़ भूमि धन्य हो गयी है। हमारा पूरा कुल पवित्र हो गया है। यह मेड़तनी हमारी धरोहर है। इसका प्राणों से भी अधिक ध्यान रखना। दुष्ट विक्रम इसे त्रास न दे। नहीं तो हम जहाँ कहीं भी होगें हमारी आत्मा को कष्ट पहुँचेगा।’

युद्ध पर जाते हुए वृद्ध पति की यह मनोभावना देखकर महाराणी का मन पिघल गया। उसने श्वसुर के कदमों में पड़ी मीरां को उठाकर छाती से लगा लिया।

– ‘अपने प्राण देकर भी इसकी रक्षा करूंगी नाथ।’ महाराणी ने आँखों में आँसू भर कर कहा।

महाराणी के वचनों से आश्वस्त होकर महाराणा फिर से अश्वारूढ़ हुआ।

-अध्याय 19, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] बाबरनामा में बाबर ने अपने सैनिकों की संख्या का कहीं उल्लेख नहीं किया है किंतु राणा सांगा के सैनिकों की संख्या 2 लाख 22 हजार बताई है।

[2] अब यह धौलपुर जिले में है।

खानुआ (20)

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खानुआ

जिस दिन बाबर का मुख्य सेनापति अपने प्रथम सैनिक दस्ते के साथ खानुआ पहुँचा उसी दिन राणा सांगा ने बाबर पर आक्रमण किया।

अरावली की उपत्यकाओं से निकलने वाली गंभीरी नदी की विपुल जल राशि आज भले ही काल के गाल में समा चुकी है किंतु उन दिनों अपने नाम के अनुरूप सचमुच ही वह गहन गंभीर नदी थी। इस नदी के पुनीत जल में सहस्रों प्रकार के मत्स्य और कश्यप दिन रात अठखेलियाँ किया करते थे।

गंभीरी के तट पर खानुआ का विस्तृत मैदान स्थित था। अब तो इस मैदान का अधिकांश भाग खेतों में विलीन हो गया है किंतु उन दिनों यह सम्पूर्ण क्षेत्र निर्जन तथा रिक्त प्रायः था। इस मैदान में परस्पर डेढ़ मील की दूरी पर मध्यम ऊँचाई की दो पहाड़ियाँ हैं। महाराणा ने इनमें से एक पहाड़ी की टेकरी पर अपने अस्सी हजार सैनिकों के साथ डेरा जमाया और बाबर की प्रतीक्षा करने लगा।

जब बाबर की सेना बयाना के पास पहुँची तो राणा ने उसके अर्धसभ्य[1]  सैनिकों में जमकर मार लगायी। इस जबर्दस्त मार से बाबर के सैनिक भाग छूटे। उसके कई सैनिक मर गये। इससे बाबर की सेना में सांगा का आतंक छा गया। अब वे शौच जाने के लिये भी इक्के दुक्के न निकलते। सिपाहियों के इस खौफ को देखकर बाबर ने जौनपुर से हुमायूँ को भी बुला लिया।

भारत में बहुत से मुसलमानों के बाबर की सेना में भर्ती हो जाने पर भी बाबर के अधिकृत सैनिकों की संख्या पच्चीस हजार से बढ़कर चालीस हजार ही हो पायी थी किंतु बहुत से बर्बर लुटेरे एवं डाकू भी भेष बदल कर बाबर के लश्कर में जा मिले थे ताकि जब लड़ाई हो तो वे भी लूटमार में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले सकें।

जब बाबर धौलपुर पहुँचा तो उसने धौलपुर के कमलबाग में बने हुए विशाल सरोवर को देखकर अपने सिपाहियों से कहा- ‘यदि तुम राणा को परास्त कर दोगे तो मैं इस सरोवर को शराब से भरवा दूंगा।’

यह घोषणा भी उसके सैनिकों में उत्साह न भर सकी। ज्यों-ज्यों बाबर अपने सैनिकों के मन से राणा का भय भुलाने का प्रयास करता था, त्यों-त्यों बाबर के सैनिकों के मन में सांगा का आतंक गहराता जाता था। सांगा की बहादुरी के अनेक किस्से बाबर की सेना में फैल गये और उन्होंने राणा की सेना से लड़ने से इंकार कर दिया। वे वापिस अपने घर जाने की मांग करने लगे। सेना द्वारा हथियार डाल देने पर भी बाबर की खूनी ताकत ने हार नहीं मानी।

उसने एक योजना बनाई और अपने विश्वस्त आदमियों से कहा कि किसी तरह कुछ हिन्दू सिपाहियों के सिर काट लायें। जब बाबर के सैनिक कुछ हिन्दू सैनिकों को एकांत में पाकर धोखे से उनका सिर काट लाये तो बाबर ने अपनी सेना को एक विशाल मैदान में इकट्टा किया और स्वयं एक ऊँचे स्थान पर खड़ा हो गया।

उसने हिन्दू सैनिकों के कटे हुए सिरों को ठोकरें मारते हुए बड़ा जोशीला भाषण दिया- ‘जिन काफिरों को हमारे बाप-दादे और हम स्वयं पैरों से ठोकरें मारते आये हैं उनसे भय कैसा? हिन्दुस्थान में अब तक हमने जीत ही जीत हासिल की है और हर जगह बेशुमार दौलत और गुलाम हासिल किये हैं। यह आखिरी लड़ाई है। इसके बाद हिन्दुस्थान में हमारा मुकाबला करने वाला कोई नहीं होगा। यदि हम जीत गये तो हमें हिन्दुस्थान का राज्य मिलेगा और यदि मारे गये तो जन्नत में हूरें मिलेंगी। इस लड़ाई के बाद जो सिपाही घर जाना चाहेगा, उसे जाने दिया जायेगा।’

अपने भाषण के दौरान उसने अपने कीमती शराब के प्याले तथा कुरान मंगवायी। शराब के प्यालों को उसने अपने पैरों से कुचल कर तोड़ डाला और कुरान पर हाथ रखकर कसम खाई- ‘जब तक मैं काफिरों पर जीत हासिल नहीं कर लूंगा तब तक शराब और स्त्री को हाथ नहीं लगाऊंगा तथा अब जीवन में कभी भी दाढ़ी नहीं बनाऊंगा।’

इस नाटक का सिपाहियों पर जादू जैसा असर पड़ा। उन्होंने भी कुरान पर हाथ रखकर अपनी-अपनी पत्नी के परित्याग की घोषणा की। उन्होंने अंत तक बाबर का साथ देने का वचन दिया और वे खानुआ चलने को तैयार हो गये।

जिस दिन बाबर का मुख्य सेनापति अपने प्रथम सैनिक दस्ते के साथ खानुआ पहुँचा उसी दिन राणा सांगा ने बाबर पर आक्रमण किया। बाबर के कई नामी गिरामी सेनापति उस युद्ध में मारे गये। कुछ को सांगा ने कैद कर लिया। बाबर की सेना मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई सांगा के सैनिकों ने उसका पीछा किया और उन्हें दो मील दूर तक खदेड़ दिया। बाबर ने अतिरिक्त सेना भेजी किंतु वह भी कुछ नहीं कर सकी।

सैनिकों में एक बार फिर सांगा का आतंक फैल गया और शपथ का जोश तिरोहित हो गया। वे फिर से अपने देश लौटने की मांग करने लगे। इतना होने पर भी बाबर की खूनी ताकत हार मानने को तैयार नहीं थी। उसने अपने पूरे लश्कर को एक साथ खानुआ कूच करने का आदेश दिया। गंभीरी नदी के तट पर स्थित दूसरी पहाड़ी पर बाबर ने अपना पड़ाव डाला। राणा की पहाड़ी यहाँ से मात्र दो मील की दूरी पर थी।

राणा के विशाल लश्कर को देखकर इस बार स्वयं बाबर के भी छक्के छूट गये। उसे लगा कि शत्रु को भुजबल से नहीं जीता जा सकता है, इसके लिये बुद्धि बल का सहारा लेना होगा। उसने राणा के पास संधि का प्रस्ताव भिजवाया। राणा को पूरी उम्मीद थी कि बाबर की ओर से यह शैतानी भरा प्रस्ताव अवश्य आयेगा। राणा जानता था कि मुहम्मद गौरी ने भी इसी तरह छल करके महाराज पृथ्वीराज चौहान को परास्त किया था। अतः राणा ने बाबर का यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। बाबर के समक्ष युद्ध के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचा।

पूरे पन्द्रह दिन तक बाबर गंभीरी के तट पर बैठा सिर धुनता रहा और केवल एक ही बात पर विचार करता रहा कि किस तरह इस मैदान से वह सम्मान पूर्वक लौट जाये। बाबर के अमीरों ने एक योजना बनाई जिसके अनुसार उन लोगों को तलाशा गया जो राणा का साथ छोड़कर बाबर की ओर आ सकते थे।

सांगा की ओर से दो मुस्लिम सेनापति- अलवर का सुल्तान हसनखाँ मेवाती तथा अलहदी भी मैदान में मौजूद थे। बाबर के आदमियों ने उन दोनों से सम्पर्क किया। वीर हसनखाँ मेवाती ने गद्दारी करने से मना कर दिया लेकिन अलहदी लालच में फंस गया। उसे बाबर के अमीरों ने बड़े सब्ज बाग दिखाये। अलहदी ने बाबर से कहा कि आप निर्भय होकर राणा पर आक्रमण करें, मैं ऐन वक्त पर आपसे आ मिलूंगा। अलहदी ने अपने आप को राणा के हरावल[2]  में रखा ताकि उसे भागने में सुविधा रहे।

17 मार्च 1527 को प्रातः साढ़े नौ बजे मारवाड़ के राव गांगा ने बाबर की सेना पर पहला गोला दागा। वह अपने सात हजार सैनिकों को लेकर सांगा की सेवा में उपस्थित हुआ था। किसी तरह हिम्मत जुटा कर बाबर की सेना युद्ध के मैदान में कूद पड़ी। युद्ध आरंभ होते ही अलहदी अपनी सेना के साथ बाबर से जा मिला। अलहदी की इस गद्दारी से हिन्दुओं का सारा गणित गड़बड़ा गया। फिर भी हिन्दुओं ने बाबर की तोपों की परवाह न करके बाबर को उसके मध्यभाग में जा घेरा जिससे युद्ध का पलड़ा शुरू से ही हिन्दुओं के पक्ष में हो गया।

ऐसा भयानक युद्ध भारत के इतिहास में अब तक नहीं हुआ था। युद्ध लगातार बीस घण्टे तक चलता रहा। बाबर निराश हो गया। उसने युद्ध के मैदान में ही अपने प्रमुख सेनापतियों को बुलाया और उन्हें कुरान शरीफ का हवाला देकर अपने प्राण झौंक देने के लिये कहा। उस्ताद अली और मुस्तफा ने सिर पर कफन बांधा और अपने तोप खाने से मौत उगलने लगे।

जैसे समुद्र में लहर पर लहर चली आती है, उसी प्रकार हिन्दू सैनिक बाबर पर चढ़ दौड़े किंतु तीन दिशाओं से होने वाली बारूद वर्षा ने हिन्दू वीरों के परखचे उड़ा दिये। डूंगरपुर का रावल उदयसिंह अपने दो राजकुमारों सहित मारा गया। सलूम्बर का राव रतनसिंह अपने तीन सौ चूण्डावतों सहित खेत रहा।

मारवाड़ का राठौड़ राजकुमार रायमल और मीरांबाई के पिता रतनसिंह अपने मेड़तिया सरदारों सहित वीरगति को प्राप्त हुए। सोनगरा सरदार रामदास, झाला सरदार ओझा, परमार गोकुलदास, चौहान मानक चंद्र तथा चौहान चन्द्रभान सहित सैंकड़ों सेनानायक अपने आदमियों सहित युद्धभूमि में तिल-तिल कर कट मरे।

वीर हसनखाँ मेवाती ने तलवार के वो जौहर दिखाये कि बाबर को दिन में तारे दिखाई देने लगे। वह अपने दस हजार आदमियों सहित युद्ध क्षेत्र में कट मरा। इब्राहीम लोदी का बेटा महमूद लोदी भी युद्ध भूमि में ही मारा गया। इस युद्ध में वह अपनी पुरानी शत्रुता भुला कर सांगा की ओर से लड़ा था।

इसी बीच राणा सांगा सिर में तीर लग जाने से बुरी तरह जख्मी हो गया। झाला अज्जा ने राणा के प्राण बचाने के लिये राणा के राजकीय चिह्न उठाकर अपने सिर पर धर लिये। बाबर की सेना झाला अज्जा को ही राणा समझकर सरमरांगण में उसकी ओर चढ़ दौड़ी। वीर झाला स्वामी के प्राणों की रक्षा के लिये रणभूमि में ही टुकड़े-टुकड़े होकर गिर गया। भारत का इतिहास स्वामी के प्राणों की रक्षा के लिये अपना जीवन न्यौछावर कर देने वाले वीर झाला जैसे सेवकों की गाथाओं से भरा पड़ा है।

मूर्च्छित राणा को उसके सरदार युद्ध के मैदान से उठा कर ले गये और बसुआ[3]  के पास की पहाड़ियों में जाकर छिप गये। जब राणा को होश आया तो उसने अपने आदमियों को फटकारा- ‘जब तक फरगाना से आया शत्रु जीवित है तब तक चित्तौड़ लौट जाने में तुमको लाज नहीं आती? क्यों तुम मेरे और अपने प्राण लेकर युद्धभूमि से भाग आये? चलो फिर वहीं चलो। शत्रु को मारो या फिर स्वयं मर मिटो। यदि हम इस तरह चित्तौड़ लौटे तो हमारी स्त्रियां हमारा उपहास उड़ायेंगी। हमें कायर और भगोड़ा कहेंगी।’

सरदारों ने राणा को बताया कि युद्ध समाप्त हो चुका है और बाबर के सैनिक ढूंढ-ढूंढ कर हिन्दू सैनिकों को मार रहे हैं। ऐसी स्थिति में मुट्ठी भर सैनिकों को साथ लेकर बाबर के सामने जाना ठीक नहीं है। जब सेना फिर से इकट्ठी हो जायेगी तब बाबर से निबट लिया जायेगा।

राणा ने सरदारों की बात नहीं मानी। वह फिर से रणभूमि में जाने की जिद्द करने लगा। राणा का प्रण देखकर कुछ धोखेबाज सरदारों ने उसे मार्ग में जहर दे दिया जिससे राणा की मृत्यु हो गयी और हिन्दुस्थान पर बाबर का अधिकार हो गया।

खानुआ का मैदान मार लेने के बाद बाबर ने अपने सिपाहियों से कहा कि जो सिपाही काफिरों के जितने सिर काट कर लायेगा, उसे सोने की उतनी ही अशर्फियां दी जायेंगी। मुगल सिपाही भागती हुई हिन्दू सेना के पीछे लग गये। अशर्फियों के लालच में हर सिपाही ज्यादा से ज्यादा सिर काटना चाहता था।

कुछ ही दिनों में भारत की सड़कों पर विचित्र नजारा देखने को मिला। हजारों मंगोल और अफगान सिपाही अपने घोड़ों पर हिन्दुओं के कटे हुए सिरों को ऐसे बांधकर ले जाते हुए दिखाई दिये मानो तरबूज अथवा मटकियां बेचने के लिये ले जाये जा रहे हों।

लोग इन दृश्यों को देखकर कांप उठे। वे अपने घरों को छोड़कर जंगलों में जा छिपे। मंगोलों और अफगानों ने वहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। बाबर ने उसी पहाड़ी पर इन कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाईं जिस पर कुछ दिन पहले तक राणा की सेना पड़ाव डाले हुए थी। हर मीनार को ठोकरों से गिरा कर बाबर ने प्रपितामह तैमूर की आत्मा की शांति के लिये दुआएं मांगीं।

इस भयानक नर संहार को देखकर गुरुनानक देव की आत्मा हा-हा कार कर उठी उन्होंने लिखा-

”खुरासान  खसमाना  किया,  हिंदुस्तान  डराया

 आप दोष न दईं करना जम कर मुगल  चढ़ाया

 ऐनी मार पई करलाणे,  तैं की दरद न आया?”[4]

लाखों हिन्दुओं के सिरों को अपनी ठोकर से गिराकर बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की।[5] उसने सचमुच हिन्दुओं पर गाज गिराई। पूरे 331 वर्ष तक बाबर के वंशज यह उपाधि धारण करते रहे।

-अध्याय 20, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] कर्नल टाड ने बाबर के सैनिकों को अर्धसभ्य लिखा है।

[2] सेना का अग्र भाग।

[3] यह स्थान जयपुर जिले में है।

[4] अर्थात् हे परमात्मन्! तू ने खरासान अर्थात् बाबर के देश को तो सुरक्षित रखा और हिन्दुस्थान को भयाक्रांत कर दिया। यहाँ इतना अत्याचार हुआ कि सारी मानवता त्राहिमाम कर उठी, किंतु हे कृपा करने वाले! तेरा मन नहीं पसीजा?

[5] गाजी का अर्थ होता है बिजली गिराने वाला। जब 1857 में अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को दिल्ली के लाल किले से बेदखल करके रंगून भेज दिया, तब बाबर के वंशजों ने इस उपाधि को धारण करना बंद किया।

बैरमबेग (21)

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बैरमबेग

चांदनी के उजाले में पहली ही नजर में बादशाह को चालीसवाँ सिपाही जंच गया। सचमुच ही वह रात बैरमबेग की थी। उसके बुद्धि चातुर्य से हुमायूँ ने मात्र तीन सौ सिपाहियों के बल पर उसी रात फतह हासिल कर ली।

बाबर अपना टूटे हुए दिल में नाउम्मीदियों का समुद्र भर कर ट्रांसआक्सियाना से अफगानिस्तान लौटा था। उसे लगता था कि अपने बाप दादाओं की जमीन से उसे सिवाय अपमान और धोखे के कुछ नहीं मिला था लेकिन वह नहीं जानता था कि इस बार वह बदख्शां से ऐसा कीमती हीरा अपने साथ ले जा रहा है जो एक दिन उसके वंशजों का भाग्य बदल देगा। यह कीमती हीरा बैरमबेग[1]  था जो बाबर की सेना में शामिल होकर अपना भाग्य आजमाने के लिये बदख्शां छोड़कर बाबर के साथ हो लिया था।

बैरमबेग अपना भाग्य आजमाने के लिये बाबर के साथ बदख्शां अफगानिस्तान और अफगानिस्तान से हिन्दुस्थान आया लेकिन बाबर के समक्ष उसे अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिला। हिन्दुस्थान में आकर बाबर एक के बाद एक लड़ाईयाँ जीतता रहा किंतु बैरमबेग बाबर के लिये सामान्य सिपाही की तरह  लड़ता रहा।

बाबर की मृत्यु के बाद ई. 1526 में हुमायूँ हिन्दुस्तान का बादशाह हुआ। बैरामबेग तब भी इतिहास के नेपथ्य में बना रहा। इतिहास के पन्नों में बैरमबेग का पहली बार उल्लेख तब होता है जब हूमायूँ ई. 1535 में गुजरात के बादशाह सुल्तान बहादुर को चार महीने से चांपानेर के दुर्ग में घेर कर बैठा हुआ था। 

एक दिन जब सेना किले के मुख्य दरवाजे पर जोर आजमाइश कर रही थी, हुमायूँ ने कुछ मामूली सिपाहियों को अपने साथ लिया और घोड़े पर चढ़कर चांपानेर किले का चक्कर लगाया। हुमायूँ किले के ऊँचे परकोटे को देखकर हैरान था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस दुर्ग में वह कैसे घुसे! एक स्थान पर उसने देखा कि दुर्ग की दीवार मात्र साठ गज ऊँची है। हुमायूँ ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि किले की दीवार पर एक-एक गज की ऊँचाई से खूंटियाँ गाढ़ी जायें।

किले के भीतर के सैनिकों का सारा ध्यान उस समय किले के मुख्य दरवाजे पर था, इसलिये वे किले के पिछवाड़े में होने वाली आकस्मिक कार्यवाई को जान नहीं सके। जब खूंटियाँ गढ़ चुकीं तो हुमायूँ ने सैनिकों को उपर चढ़ने का आदेश दिया। उस समय तक रात हो चुकी थी।

हुमायूँ के सिपाही एक-एक करके खूंटियों पर चढ़ने लगे। जब उनतालीस सैनिक खूंटियों पर चढ़ चुके तो हुमायूँ ने चालीसवें सिपाही को रुकने का संकेत किया और स्वयं खूंटी पर चढ़ने लगा। चालीसवाँ सिपाही बैरमबेग था। भाग्यलक्ष्मी ने उस पर प्रसन्न होने के लिये मानो वही रात, वही समय और वही स्थान चुना था!

जब हुमायूँ ने बैरमबेग को रुकने का संकेत किया तो बैरमबेग ने प्रतिवाद किया- ‘बादशाह सलामत! जब तक सबसे पहला सैनिक किले में न कूद जाये और जब तक मैं किले की दीवार पर चढ़कर आपको आवाज न दूँ तब तक आपको खूंटी पर नहीं चढ़ना चाहिये।’ बादशाह ने चालीसवें सिपाही की बात मान ली। बैरमबेग खूंटियों पर चढ़ता हुआ परकोटे पर पहुँच गया। वहाँ से उसने संकेत किया कि बादशाह सलामत खूंटी पर चढ़ सकते हैं।

बादशाह ने किले में आकर पहली बार उस अनजाने सिपाही पर भरपूर नजर डाली। चांदनी के उजाले में पहली ही नजर में बादशाह को चालीसवाँ सिपाही जंच गया। सचमुच ही वह रात बैरमबेग की थी। उसके बुद्धि चातुर्य से हुमायूँ ने मात्र तीन सौ सिपाहियों के बल पर उसी रात फतह हासिल कर ली।

किला हाथ में आते ही हुमायूँ ने जीत का बड़ा भारी जलसा किया। अपने दादा उमरशेख की भांति वह भी एक अय्याश आदमी था। सुरा और सुंदर स्त्रियाँ उसकी कमजोरी थीं। कहना आवश्यक न होगा कि साधारण सिपाही की हैसियत रखने वाले बैरमबेग को इस जलसे के दौरान अमीर का दर्जा मिल गया। अब वह बेरमबेग के स्थान पर बैराम खाँ कहलाने लगा।

-अध्याय 21, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] तुर्की भाषा में ‘बेग’ का अर्थ होता है सरदार और ‘खां’ माने बादशाह ।

विषपान (22)

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विषपान

मीरा ने दासी के हाथ से प्याला लेकर विषपान किया और हंस कर बोली जब राणाजी कहते हैं कि यह गिरिधर गोपालजी का चरणामृत है तो असत्य नहीं कहते हैं। यदि विष होता तो मैं जीवित थोड़े ही रहती।

राणा सांगा की सारी आशंकायें सही सिद्ध हुई थीं। वह स्वयं युद्ध भूमि से लौट कर फिर कभी चित्तौड़ नहीं आया। उसके बाद रतनसिंह मेवाड़ का राणा हुआ किंतु वह भी बूंदी के राजा सूरजमल के हाथों मारा गया। उसके बाद मात्र चौदह वर्ष का दुर्बुद्धि बालक विक्रमादित्य मेवाड़ का राणा हुआ। उसने अपनी सेवा में सात हजार पहलवान नियुक्त कर लिये जिनके बल पर वह हर समय छिछोरपना करता रहता था और अपने सरदारों की हँसी उड़ाया करता था।

विक्रमादित्य ने मेवाड़ का शासन हाथ में आते ही अपनी बड़ी भौजाई मीरांबाई पर अत्याचार करने आरंभ किये। जब तक सांगा जीवित था और उसके बाद रत्नसिंह जीवित था, तब तक तो विक्रमादित्य का साहस मीरांबाई की ओर हाथ बढ़ाने का नही हुआ किंतु अब बात दूसरी थी। अब वह महाराणा था और जो चाहे सो कर सकता था।

उसने मीरांबाई के महल से गिरधर गोपाल का विग्रह चोरी करवा लिया और उसे जमीन में गड़वा दिया। उसके बाद दासी को बुलवाकर कहा- ‘यह प्याला उस भिखमंगी को ले जा कर देना और कहना की राणाजू ने तेरे किशन गोपालजी को अपने कक्ष में बुला लिया है और उनका चरणामृत भिजवाया है।’ दासी कांपते हाथों से प्याला लेकर महल से बाहर हो गयी।

दासी ने किसी तरह साहस करके मीरांबाई के महल में प्रवेश किया। भय के मारे उसके नेत्र मुंदे पड़ते थे। पैर लड़खड़ाते थे और हाथों का प्याला लगातार कांपता था। फिर भी उसे स्वामी के आदेश का पालन तो करना ही था।

– ‘लो कुंवरानीजी।’ किसी तरह रुंधे कण्ठ से दासी ने कहा और प्याला मीरांबाई के हाथों में रख दिया।

– ‘क्या है यह?’

– ‘महाराणा ने भिजवाया है और कहलवाया है कि राणाजू ने आपके किशन गोपालजी को अपने कक्ष में बुला लिया है और उनका चरणामृत भिजवाया है।’

– ‘क्या कहती है? गिरिधर गोपाल तो अपने मंदिर में विराजमान हैं।’ मीरांबाई ने अचंभित होकर कहा।

  दासी ने मंदिर में जाकर देखा, गिरिधर गोपाल जी अपने स्थान पर विराजमान हैं। उनके अधरों पर वही मुरली धरी है जिसे अभी-अभी वह राणा के महल में देख आयी थी। दासी बुरी तरह डर गयी। यह क्या माया है। गिरिधर गोपाल को तो राणा ने अपने महल के पिछवाड़े की भूमि में गढ़वा दिया है। फिर ये यहाँ कैसे हो सकते हैं?

प्याला अभी तक दासी के हाथों में था। उसने कहा- ‘जानती हैं इसमें क्या है?’

– ‘तू ही तो कह रही है कि गिरिधर गोपाल का चरणामृत है।’

– ‘नहीं कुंवरानीजी, इसमें हलाहल भरा है। मेरेे सामने राणाजी ने भरा है, वे चाहते हैं कि आप इसे पी लें।’ बात पूरी करते करते दासी रो पड़ी।

– ‘अच्छा! ला इधर दे।’ मीरां ने प्याला दासी के हाथ से ले लिया और एक ही साँस में पी गयी।

– ‘अरे रे! यह क्या गजब किया आपने, इसमें सचमुच ही विष है।’ दासी चिल्लायी। उसका रंग पीला पड़ गया।

– ‘जब राणाजी कहते हैं कि यह गिरिधर गोपालजी का चरणामृत है तो असत्य नहीं कहते हैं। यदि विष होता तो मैं जीवित थोड़े ही रहती।’ मीरां ने हँस कर कहा।

दासी जितने भयभीत हृदय और कम्पित पैरों के साथ आयी थी, उससे भी अधिक भयभीत हृदय और कम्पित पैरों से लौट गयी।

महाराणा ने सुना तो उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने कहा- ‘अच्छा तो एक काम और कर। यह मुक्ताहार उसके पास ले जा। उससे कहना राणा ने तेरे गिरधर गोपाल ले लिये, इसके बदले में यह मुक्ताहार भिजवाया है।’

– ‘किंतु अन्नदाता गिरिधर गोपाल तो वहाँ अपने स्थान पर ही विराजमान हैं।’ दासी ने भय कम्पित वाणी से निवेदन किया।

– ‘बकवास है यह सब।’

दासी मुक्ताहार की मंजूषा लेकर फिर से कुंवरानी मीरां के महल की ओर चली।

– ‘अब क्या लाई है?’ मीरां ने हँस कर पूछा।

– ‘यह मुक्ताहार है, राणाजू ने आपके लिये भिजवाया है।’

– ‘अच्छा ला पहना दे।’ मीरांबाई ने दासी से कहा।

दासी ने मंजूषा खोली। अंदर मुक्ताहार नहीं था, वहाँ तो भयानक विषधर फन काढ़े बैठा था। दासी ने भय से मंजूषा फैंक दी।

– ‘क्या करती है?’ मीरां ने दासी को टोका।

– ‘इसमें मुक्ताहार नहीं, भयानक विषधर है।’

– ‘अरी नहीं! जाने तुझे क्या हो गया है। विष और विषधर के अतिरिक्त तुझे कुछ सूझता ही नहीं। देख तो कहाँ है विषधर? यह तो मुक्ताहार ही है।’ मीरां ने विषधर उठाकर गले में डाल लिया।

दासी ने देखा, मीरां के गले में सचमुच ही उज्जवल मोतियों का हार जगमगा रहा था। वह बेसुध होकर एक ओर लुढ़क गयी। उसी रात मीरां अपने सेवकों के साथ चित्तौड़ के महल त्यागकर वृंदावन के लिये रवाना हो गयी।

-अध्याय 22, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

कर्मनासा (23)

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कर्मनासा

कुदरत ने मध्य एशियाई मंगोलों का भाग्य उनके पुण्यकर्मों से नहीं उनकी खूनी ताकत से लिखा था किंतु हुमायूँ की आधी खूनी ताकत तो हिन्दुस्तान की आबोहवा ने खत्म कर दी थी और बची-खुची ताकत कर्मनासा ने नष्ट कर दी।

जहाँ एक ओर भाग्यलक्ष्मी बैराम खाँ पर मेहरबान हुई वहीं दूसरी ओर हुमायूँ के उन पुण्यकर्मों के नष्ट होने का समय आ गया था, जिनके कारण वह बादशाह बना था। इसलिये प्रारब्ध ने उसे कर्मनासा नदी की ओर खींचना आरंभ किया।

 जिन दिनों हुमायूँ चांपानेर के दुर्ग में रंगरेलियां मनाने में व्यस्त था, उन्हीं दिनों खबर आई कि बादशाह को गुजरात में व्यस्त जानकर बंगाल और बिहार में शेरखा नामका पठान उत्पात मचा रहा है। उसने सहसराम, रोहतास और चुनार के दुर्ग हथिया लिये हैं। हुमायूँ ने इन समाचारों की कोई परवाह नहीं की और वह राजधानी आगरा के लिये रवाना हो गया। राजधानी में सरदारों ने हुमायूँ को मजबूर किया कि वह शेरखा को दण्डित करने के लिये बंगाल पर आक्रमण करे।

हुमायूँ को रंगरेलियां मनाने, दावतें करने और सरदारों को खिलअतें बांटने के अलावा कुछ सूझता नहीं था फिर भी कर्मनासा नदी उसे खींच रही थी अतः अमीरों के दबाव में उसने बंगाल की ओर प्रस्थान किया। बादशाह को आया जानकर शेरखा अपने बेटे जलालखाँ को चुनार दुर्ग में छोड़कर बंगाल भाग गया। हुमायूँ ने बैरामखाँ को चुनार दुर्ग पर चढ़ाई करने भेजा।

चुनार दुर्ग की प्राकृतिक बनावट ऐसी है कि इस दुर्ग को शेरखा जैसे प्रबल बैरी से हस्तगत करना सरल न था। छः माह तक भी जब कोई बात नहीं बनी तो बैरामखाँ ने एक चाल चली। उसने अपने एक अफ्रीकी गुलाम लड़के को खूब सारा धन देकर उसका विश्वास अर्जित किया। अफ्रीकी गुलाम बैराम खाँ की योजना पर काम करने को तैयार हो गया। बैराम खाँ ने अफ्रीकी गुलाम को कोड़ों से इतना पीटा कि उसकी खाल उधड़ गयी। इसके बाद अफ्रीकी गुलाम को चुनार के किले की ओर धकेल दिया।

जलाल खाँ के सिपाहियों को अफ्रीकी गुलाम की हालत पर दया आ गयी। उन्होंने उसे किले में प्रवेश दे दिया। अफ्रीकी गुलाम कुछ दिन किले में रहकर और किले का सारा नक्शा और हाल-चाल जानकर किले से भाग आया। उसने बैराम खाँ को बताया कि नदी की ओर से किले में घुसना आसान है। बैरामखाँ ने अपने तोपखाने को नावों में रखवाया और एक रात अचानकर हमला बोल दिया। जलाल खाँ की सेना घुटने टेकने पर मजबूर हो गयी। बैरामखाँ ने शेरखा के तोपचियों के हाथ काट लिये।

चुनार पर अधिकार होने के बाद हुमायूँ फिर से विलासिता में डूब गया। अवसर पाकर शेर खाँ ने बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत कर ली। इधर हुमायूँ अपनी रंगरलियों में व्यस्त हो गया और उधर उसके भाई मिर्जा हिन्दाल ने जिसे हुमायूँ ने बिहार में तैनात किया था, उत्तरी बिहार शेरखा को सौंप दिया और चुपके से आगरा पहुँच कर अपने आप को बादशाह घोषित कर दिया। यह समाचार पाकर हुमायूँ आगरा की ओर लौटा। उसने अपने पाँच हजार सैनिक बंगाल की सुरक्षा के लिये छोड़ दिये और जल्दी से जल्दी आगरा पहुँचने की उतावली में मुख्य मार्ग[1]  से आगरा की ओर चला।

अमीरों ने हुमायूँ को मना किया कि वह इस मार्ग से न जाये क्योंकि इस मार्ग पर शत्रु सेना उसे आसानी से घेर लेगी किंतु प्रारब्ध अपना खेल खेल रहा था। कर्मनासा नदी उसे अपनी ओर खींच रही थी। कहा जाता है कि इस नदी में नहाने वाले के समस्त पुण्यकर्म नष्ट हो जाते हैं, इसीलिये इसे कर्मनासा कहा जाता है। हालांकि कुदरत ने मध्य एशियाई मंगोलों का भाग्य उनके पुण्यकर्मों से नहीं उनकी खूनी ताकत से लिखा था किंतु हुमायूँ की आधी खूनी ताकत तो हिन्दुस्तान की आबोहवा ने खत्म कर दी थी और बची-खुची ताकत कर्मनासा ने नष्ट कर दी।

जब शेरखा को यह समाचार मिला कि हुमायूँ आगरा लौट रहा है तो वह हुमायूँ के पीछे लग गया। जब हुमायूँ गंगाजी को पार करके कर्मनासा के किनारे पहुँचा तो शेरखा ने हुमायूँ को घेर लिया। हुमायूँ तीन माह तक सिर पर हाथ धर कर चौसा में बैठा रहा। कर्मनासा में नहाकर उसकी सारी खूनी ताकत खत्म हो चुकी थी। उसके सरदारों ने कहा कि आगे बढ़कर शेरखा पर हमला करे किंतु हुमायूँ की हिम्मत नहीं हुई तब तक वर्षा आरंभ हो गयी जिससे हुमायूँ का तोपखाना किसी काम का न रहा। शेरखा को इसी परिस्थिति की प्रतीक्षा थी।

एक रात जब भारी वर्षा हो रही थी, शेरखा ने अचानक तीन ओर से हुमायूँ पर आक्रमण किया। हुमायूँ के आठ हजार सैनिक मार दिये गये। बाकी के सैनिक जान बचाकर भाग गये। हुमायूँ की बेगमें और लड़कियाँ भी मारी गयीं। कुछ बेगमें शेरखा के हाथ लग गयीं। खूनी ताकत के नष्ट हो जाने से हुमायूँ बुरी तरह परास्त हुआ। जिन तोपों और बंदूकों के बल पर बाबर ने बड़े से बड़े शत्रु को परास्त कर दिया था। हुमायूँ उनमें से एक भी तोप और बंदूक नहीं चला सका।

मारे डर के वह कर्मनासा की ओर न भागकर गंगाजी की ओर भागा और घोड़े सहित नदी में कूद गया। घोड़ा कुछ दूर तक हुमायूँ को लेकर नदी में आगे बढ़ा किंतु अपने स्वामी को मंझधार में छोड़कर डूब गया। एक भिश्ती ने किसी तरह हुमायूँ की जान बचाई। बाबर ने हिन्दुस्थान का जो राज पानीपत, खानवा और चंदेरी के मैदानों में प्राप्त किया था, हुमायूँ ने वह राज कर्मनासा के किनारे खो दिया।

चौसा में परास्त होकर हुमायूँ पीछे फिरा किंतु भोजपुर के भईया गाँव में एक बार फिर उसका सामना शेरखा की सेना से हुआ और वहाँ भी वह परास्त हो गया। हुमायूँ फिर पीछे मुड़ा। कन्नौज के पास एक बार फिर उसने शेरखा से मात खाई। हुमायूँ लगातार हारता रहा और आगरा की तरफ भागता रहा। अपनी इस पलायन यात्रा में उसने अनुभव किया कि यदि बैरामखाँ जैसा स्वामिभक्त सेवक न होता तो वह आगरा कभी न पहुँच पाता।

शेरखा हुमायूँ के पीछे लगा रहा और हुमायूँ को आगरा से लाहौर की तरफ भाग जाना पड़ा। लाहौर में भी वह अपने भाई कामरान के भय से टिक नहीं सका और सिंध की ओर भागने के लिये मजबूर हुआ। सिंध के मरुस्थल में भटकता हुआ वह शेख अली अम्बर जामी का मेहमान हुआ।

जब उसकी दृष्टि शेख अली अम्बर की बेटी हमीदा बानू पर पड़ी तो एक बार फिर उसकी खूनी ताकत कसमसाई और वह हमीदा बानू के पीछे लग गया। हमीदाबानू उस समय मात्र चौदह साल की थी और वह हुमायूँ के भाई हिन्दाल की मुँहबोली बहिन था।

हमीदा बानू ने कहा कि उसके हाथ मुश्किल से ही हुमायूँ के गले तक पहुंच सकते हैं लेकिन हुमायूँ अपनी जिद पर अड़ा रहा। शेख अली अम्बर ने मजबूर होकर हमीदाबानू का विवाह हुमायूँ के साथ कर दिया। एक साल बाद इसी हमीदाबानू के गर्भ से अकबर का जन्म हुआ।

-अध्याय 23, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] अब यह मार्ग ग्राण्ड ट्रंक रोड कहलाता है।

जाके प्रिय न राम बैदेही (24)

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जाके प्रिय न राम बैदेही

युवा संन्यासी ने लिखा- जाके प्रिय न राम बैदेही। तजिए ताहि  कोटि  बैरी  सम  जद्यपि  परम  सनेही। तज्यौ पिता  प्रहलाद,  बिभीषन  बंधु  भरत  महतारी। बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनितनि भये मुद मंगल कारी।

जिस अयोध्या को मीर बाकी जला कर क्षार कर गया था और भगवान श्रीराम के जन्म स्थल पर स्थित विशाल देवालय को नष्ट करके मस्जिद बना गया था, कई वर्ष पश्चात् उसी अयोध्या में एक युवा संन्यासी ने काशी से आकर डेरा जमाया। एक बार बचपन में भी वह अपने गुरु नरहरि के साथ सूकरखेत से चलकर यहाँ आया था। तब यहाँ जन्मभूमि पर रामलला का विशाल देवालय स्थित था।

इस बार भी वह रामजन्म भूमि के दर्शनों की लालसा अपने मन में लेकर आया था किंतु रामलला के देवालय के स्थान पर मसीत[1]  देखकर उसने अपने करम ठोंक लिये। वह अपने नेत्रों से जल की धारा बहाता हुआ नित्य प्रतिदिन सरयू में स्नान करता और यह अनुभव करता कि एक दिन इसी नदी के पावन जल में उसके इष्ट देव ने भी निमज्जन किया था।

वह अयोध्या की मिट्टी में लोटता और अनुभव करता कि एक दिन इसी रज में उसके स्वामी के चरण अंकित हुए थे। संध्या होने पर वह अयोध्या के नागरिकों से कुछ मांग लाता और उन्हें खाकर मस्जिद में पड़ा रहता।[2]  कभी रात्रि में वह आकाश की ओर दृष्टि उठाता और कल्पना करता कि एक दिन इन चाँद तारों ने उसके स्वामी को इसी व्योम से निहारा होगा तो वह आनंद विभोर हो उठता किंतु जब मसीत की ओर देखता तो उसकी छाती कष्ट से भर जाती।

युवा संन्यासी ने कुछ दिनों तक अयोध्याजी में ही रहकर रामजी के गुणगान करने का निर्णय किया। वह घंटों सरयू के जल में कटि तक डूब कर कीर्तन करता और फिर रामलला की जन्मभूमि की ओर मुँह करके भजन गाता रहता। बहुत से लोग सरयू के तट पर खड़े होकर इन भजनों को भोजपत्रों पर लिख लेते। संध्याकाल में सरयू की स्तुति के साथ इन स्तुतियों को भी गाया जाने लगा जिन्हें सुनने के लिये विशाल जनसमुदाय एकत्र हो जाता।

कुछ ही दिनों में संन्यासी की गायी हुई स्तुतियों और भजनों की चर्चा दूर-दूर तक फैल गयी। इससे संन्यासी के दर्शनों के लिये दूर दूर से भक्तगण आने लगे। एक दिन दो घुड़सवार संन्यासी की सेवा में उपस्थित हुए। उन्होंने संन्यासी से पूछा- ‘क्या काशी के पण्डित श्री तुलसीदासजी आप ही हैं?’

– ‘हूँ तो भांग का पौधा किंतु रामजी के प्रताप से तुलसी कहाता हूँ। कुछ दिनों काशी में भी अवश्य रहा हूँ किंतु मैं वहाँ का पण्डित हूँ यह तो नहीं कह सकता।’ संन्यासी ने अत्यंत कोमल कण्ठ से उत्तर दिया।

घुड़सवारों ने इतना सुनते ही संन्यासी के चरणों की रज माथे से लगाई और एक पत्र सन्यासी के चरणों में रख दिया। उन्हें अपनी स्वामिनी की ओर से ऐसा ही करने का आदेश था।

– ‘तुम लोग कौन हो भाई और इस भांग के पौधे से क्या चाहते हो?’ संन्यासी ने पत्र हाथ में लेकर कहा।

– ‘हम चित्तौड़ की कुंवरानी मीरां के सेवक हैं महाराज। उन्होंने ही वृंदावन से यह पत्र आपकी सेवा में भिजवाया है।’ एक घुड़सवार ने जवाब दिया।

संन्यासी ने पत्र खोला तो दंग रह गया। विचित्र पत्र था यह भी। किसी ने बहुत ही सुंदर बनावट के अक्षरों में लिखा था-

”स्वस्ति श्री तुलसी  कुलभूषन, दूषन हरन गोसाईं।

बारहिं बार प्रनाम करहु, अब हरहु सोग समुदायी।

घर के स्वजन हमारे जेते  सबन्ह  उपाधि  बढ़ाई।

साधु-संग अरु भजन करत मोहि देत कलेस महाई।

मेरे मात-पिता के सम हौ, हरि भक्तह्न  सुखदाई।

हमको कहा उचित करिबो है, सौ लिखिए समुझाई।” [3]

संन्यासी ने उसी समय कागज, कलम और दवात मंगा कर पत्र का जवाब लिखा-

”जाके प्रिय न राम बैदेही।

तजिए ताहि  कोटि  बैरी  सम  जद्यपि  परम  सनेही।

तज्यौ पिता  प्रहलाद,  बिभीषन  बंधु  भरत  महतारी।

बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनितनि भये मुद मंगल कारी।

नाते  नेह  राम  के मनिअत  सुहृद सुसेव्य जहाँ  लौं।

अंजन कहा  आँखि जौ  फूटै, बहुतक  कहौं  कहाँ लौं।

तुलसी  सो  सब भांति  परमहित  पूज्य प्राण तें प्यारो।

जासो   होय   सनेह  रामपद   एतो  मतो  हमारो।।”

-अध्याय 24, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] मस्जिद

[2] मांग के खाइबो अरु मसीत को सोइबो।

[3] ऐसी मान्यता है कि यह पद मीरांबाई द्वारा तुलसीदासजी को सम्बोधित करके लिखा गया था।

लशकर गेब (25)

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लशकर गेब

अचानक उसने देखा कि दुश्मन की सेना के पीछे से एक लश्कर प्रकट हुआ। बात ही बात में वह लश्कर टिड्डी दल की तरह दुश्मन पर छा गया। हुमायूँ ने अपने आदमियों से पूछा कि यह क्या लशकर गेब  है ?

 कन्नौज से हुमायूँ और बैरामखाँ की सेनायें अलग हो गयीं थीं। जब हुमायूँ आगरा की ओर भाग रहा था तो शेरखा की सेना का ध्यान उस ओर से हटाने के लिये बैरामखाँ संभल की तरफ बढ़ा तथा उसने लखनौर के राजा मित्रसेन की शरण ली। जब शेरखा को यह ज्ञात हुआ तो उसने अपने आदमी लखनौर भेजे और बैरामखाँ को बुलावा भेजा।

जब शेरखा के आदमी बैरामखाँ को शेरखा के सामने लाये तब शेरखा ने भरी मजलिस में खड़े होकर बड़ी गरमजोशी से बैरामखाँ का स्वागत करते हुए कहा- ‘जो इखलास रखता है, वह खता नहीं करता।’[1]

बैरामखाँ ने भी तपाक से जवाब दिया- ‘हाँ! जो इखलास रखेगा, वह खता नहीं करेगा।’

बैरामखाँ का उत्तर सुनकर शेरखा का मुँह उतर गया। फिर भी उसने बैरामखाँ की बड़ी आवभगत की और सम्मान सहित छोड़ दिया। उसके जाने के बाद शेरखा ने अपने दरबारियों से कहा कि जब बैरामखाँ ने यह कहा कि जो इखलास रखेगा वह खता नहीं करेगा, मैं तभी समझ गया था कि यह हमसे मेल नहीं करेगा।

जब गुजरात के सुल्तान महमूद को मालूम हुआ कि बैरामखाँ हुमायूँ से बिछड़ गया है, तो उसने भी अपने आदमी बैरामखाँ को लाने के लिये भेजे। बैरामखाँ चाहता था कि वह किसी भी तरह अपने आदमियों के साथ सुरक्षित रूप से हुमायूँ से जा मिले जो कि इस समय सिंध में था। इसलिये बैरामखाँ महमूद के आदमियों के साथ गुजरात आ गया।

महमूद ने भी उसकी बहुत आवभगत की और कई तरह के प्रलोभन दिये किंतु बैरामखाँ ने महमूद का एक भी प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और एक दिन उससे मक्का जाने के लिये छुट्टी मांगी। महमूद जानता था कि बैरामखाँ यहाँ से सीधा हुमायूँ के पास जायेगा किंतु उसने बैरामखाँ को रोका नहीं।

जिस समय बैरामखाँ हुमायूँ के पास पहुँचा उस समय हुमायूँ की सेना सिंध में भक्कर के सुल्तान महमूद से उलझी हुई थी। भक्कर के सिंधियों ने मुगल सेना की हालत खराब कर रखी थी। कई दिनों की लड़ाई के चलते हुमायूँ के पास बहुत कम सैनिक रह गये थे और वह किसी तरह अपने आप को जंग के मैदान में टिकाये हुए था। संयोग से बैरामखाँ सीधे रणक्षेत्र में ही पहुँचा। इतना समय नहीं था कि बैरामखाँ हुमायूँ से मिल पाता। इसलिये वह सीधे ही युद्ध में कूद पड़ा।

जिस समय बैरामखाँ युद्ध में कूदा उस समय हुमायूँ की हालत बहुत नाजुक हो गयी थी और ऐसा लग रहा था कि कुछ ही देर में हुमायूँ की पराजय हो जायेगी। सुबह से ही उसके बहुत से सैनिक मारे गये थे। अमीरों ने हूमायूँ को सलाह दी कि वह मैदान छोड़कर सुरक्षित निकल जाये किंतु वह मृत्यु निश्चित जानकर भी लड़ता रहा।

अचानक उसने देखा कि दुश्मन की सेना के पीछे से एक लश्कर प्रकट हुआ। बात ही बात में वह लश्कर टिड्डी दल की तरह दुश्मन पर छा गया। हुमायूँ ने अपने आदमियों से पूछा कि यह क्या लशकर गेब  है ?[2] हुमायूँ के आदमी कुछ जवाब नहीं दे सके। लेकिन इस लश्कर को देखकर वे दूने उत्साह से तलवार चलाने लगे।

बाद में मालूम हुआ कि वह लशकर गेब नहीं बैराम खाँ आ पहुँचा था और सीधा ही मैदाने जंग में कूद पड़ा था। जब बादशाह की सेना को मालूम हुआ कि बैराम खाँ है तो सब खुशी से चिल्ला उठे। सूरज डूबने से पहले युद्ध का पासा पलट चुका था। मुगल सेना ने मोर्चा मार लिया।

बैरमबेग के लौट आने की खुशी में हुमायूँ ने सचमुच बैरम[3]  मनाया और उसके स्वागत में एक विशाल भोज का आयोजन किया। इस अवसर पर हुमायूँ ने कहा कि बेरमबेग सचमुच अपने नाम के अनुकूल आचरण करने वाला है। वह जहाँ भी जाता है वहीं जश्न मनाया जाता है। इसके बाद जब भी बेरमबेग किसी जंग से लौटकर आता तो हूमायूँ उसके स्वागत में उत्सव मनाता।

-अध्याय 25, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] जो विश्वास बनाये रखता है वह धोखा नहीं करता।

[2] देवमाया।

[3] तुर्की भाषा में बैरम का अर्थ होता है- ‘उत्सव।

खानका (26)

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खानका

एक दिन दोनों बादशाहों ने शिकार खेलने के बाद चोगानबाजी और कबलअंदाजी की। उस दिन बैरमबेग को खानका का खिताब दिया गया।

हिन्दुस्थान से अपना दाना-पानी उठ गया जानकर हुमायूँ हिन्दुस्थान छोड़कर कंधार की ओर रवाना हुआ। हुमायूँ का भाई कामरान उसका रास्ता रोककर बैठ गया। वह नहीं चाहता था कि हुमायूँ सही सलामत हिन्दुस्थान से बाहर जा सके। मंझला भाई अस्करी भी कामरान के षड़यंत्र में शामिल हो गया।

बैरामखाँ के गुप्तचर जी बहादुर को इस षड़यंत्र की खबर लग गयी। बैरामखाँ ने कामरान के षड़यंत्र को विफल कर दिया। उसने हुमायूँ को सलाह दी कि इस समय मिर्जा अस्करी आसानी से पकड़ में आ सकता है उसका खून कर देना चाहिये लेकिन हुमायूँ ने बाबर को दिये हुए वचन का पालन किया कि वह कभी भी अपने भाईयों की जान नहीं लेगा इसलिये उसने अस्करी को खुला छोड़ दिया।

मिर्जा अस्करी परले दरजे का मक्कार था। जान बख्श दिये जाने पर भी उसने हुमायूँ का बुरा किया और हुमायूँ के अमीरों को रिश्वत देकर अपनी ओर मिला लिया। हुमायूँ के बहुत से सैनिकों और अमीरों ने अस्करी को ताकतवर जानकर हुमायूँ का साथ छोड़ दिया और अस्करी की सेवा में चले गये।

ऐसे कठिन समय में भी बैरामखाँ ने इखलास[1]  बनाये रखा और हुमायूँ के साथ ही रहा। कामरान से जान बचाने के लिये हुमायूँ हमीदाबानू को घोड़े पर बैठाकर भाग खड़ा हुआ। इस समय उसके पीछे केवल बैरामखाँ और उसके सिपाही ही थे। बैरामखाँ हुमायूँ को कामरान के चंगुल से निकाल कर कंधार ले गया।

बैरामखाँ की मदद से हुमायूँ तो किसी तरह कामरान के फंदे से बच निकला किंतु एक साल का अकबर पीछे छूट गया।[2]  असकरी ने वह बालक कामरान को सौंप दिया। जब हुमायूँ को कामरान के भय से कांधार भी छोड़ देना पड़ा तो कामरान बालक को अपने साथ कांधार ले गया।

बैरामखाँ हुमायूँ को लेकर ईरान चला गया और वहाँ के शासक तुहमास्प से शरण मांगी। तुहमास्प ने कहा कि यदि तुम्हारा बादशाह शिया हो जाये तो उसे वह सब कुछ मिल सकता है जो वह चाहता है और यदि वह तुहमास्प की बात नहीं मानेगा तो उसे बलपूर्वक शिया बनाया जायेगा। बैरामखाँ तुहमास्प की बातें सुनकर घबराया नहीं। उसने शाह की बातों का धैर्य पूर्वक सामना किया और विश्वास दिलाया कि वह अपने बादशाह को आपकी बातें मानने के लिये राजी करेगा किंतु आपको भी मेरे बादशाह की बातें मानने के लिये तैयार रहना चाहिये।

बैरामखाँ जानता था कि फारस के शाह की बातें हुमायूँ से मनवाना आसान न होगा किंतु फिर भी उसने हिम्मत नहीं छोड़ी। बैरामखाँ ने दोनों बादशाहों के बीच में पड़कर संधि करवाई और येन-केन प्रकरेण हुमायूँ का बादशाहों जैसा रुतबा बनाये रखा बैरामखाँ के व्यवहार से प्रसन्न होकर शाह ने उसी समय भोजन के 1200 थाल और नौ घोड़े भेंट किये। इनमें से तीन घोड़े हुमायूँ के लिये, एक घोड़ा बड़े अमीर बैरामखाँ बहादुर के लिये तथा पाँच घोड़े हुमायूँ के अन्य सरदारों के लिये थे।

बैरामखाँ के प्रयत्नों से हुमायूँ शिया हो गया। उसने शियाओं जैसा लम्बा लबादा पहन लिया और हसरत अली के मजार की यात्रा पर गया। इसके बदले में बैरामखाँ ने तुहमास्प से हुमायूँ के लिये तुहमास्प की बेटी, बारह हजार घुड़सवार और शाह के अंगरक्षक दल के दो हजार विशेष सैनिक मांगे। तुहमास्प ने बैरामखाँ की सारी शर्तें स्वीकार कर लीं।

दोनों बादशाहों ने मिलकर कई दिनों तक जंगलों में शिकार खेला और बहुत से जानवर मारे। एक दिन दोनों बादशाहों ने चोगानबाजी[3] और कबलअंदाजी[4] की। उस दिन बैरमबेग को खानका[5]  का खिताब दिया गया।

-अध्याय 26, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] विश्वास।

[2] अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को अमरकोट सिंध के थारपारकर जिले में राणा वीरसाल के महल में हमीदा बानू के पेट से हुआ।

[3] घोड़े पर बैठकर गेंद खेलना। आजकल इसे पोलो कहते हैं।

[4] निशाने उड़ाना। आजकल इसे शूटिंग कहते हैं।

 [5] बैरमबेग को बैरामखाँ तो बहुत पहले से ही कहा जाने लगा था किंतु बादशाह की ओर से उसे यह उपाधि अब प्रदान की गयी।

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