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स्तब्ध परमात्मा (7)

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स्तब्ध परमात्मा

इंसान की खूनी ताकत अपने ही जैसे दूसरे इंसानों का खून बहता हुआ देखकर पैशाचिक अट्टहास करती थी और अपने ही बनाये हुए पुतले की क्रूरता को देखकर स्तब्ध परमात्मा पूरी तरह मौन एवं अदृश्य था।

चंगेजखाँ पहला मंगोल था जिसने भारत पर आक्रमण किया। उन दिनों दिल्ली पर मुहम्मद गौरी के गुलाम के गुलाम, अर्थात् कुतुबुद्दीन के गुलाम इल्तुतमिश का शासन था। जब 1221 ईस्वी में चंगेजखाँ पंजाब तक चढ़ आया तो इल्तुतमिश ने चंगेजखाँ से कहलवाया कि वह जो काम करने भारत आया है वह काम तो मैं पहले से ही कर रहा हूँ।

इसलिये चंगेजखाँ किसी और देश में जाकर तबाही मचाये, हिन्दुस्थान के लिये तो मैं अकेला ही काफी हूँ। साथ ही उसने चंगेजखाँ को बहुत सारी घूस भिजवाई ताकि वह हिन्दुस्तान छोड़ कर चला जाये। कहना अनिवार्य न होगा कि इस घूस में सोना-चांदी भर ही नहीं था अपितु हजारों गुलाम और हाथी- घोड़ों के साथ हजारों निरीह लोगों के शव भी थे। यह विचित्र घूस देखकर चंगेजखाँ प्रसन्न हुआ और खुशी खुशी हिन्दुस्तान से बाहर हो गया।

मंगोल इस्लाम के शत्रु थे और भारत पर चूंकि उन दिनों इस्लामी शासकों का अधिकार था इसलिये उन्हें दण्ड देने के लिये चंगेजखाँ के बाद भी मंगोलों ने भारत पर बड़े-बड़े आक्रमण किये। हर आक्रमण में लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा, उन्हें गुलाम बनाया, स्त्रियों और बच्चों को पशुओं की तरह बांध कर अपने साथ मध्य एशिया ले गये। अपने आक्रमणों में उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई भेद नहीं किया क्योंकि उनके लिये हिन्दू और मुसलमान दोनों ही बराबर के शत्रु थे।

चंगेजखाँ के बीस साल बाद मंगोल नेता तायर लाहौर तक चढ़ आया। लाहौर का शासक राजधानी छोड़कर भाग खड़ा हुआ। तायर ने हजारों नर-नारियों को मौत के घाट उतार कर लाहौर को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। 1285 ईस्वी में मंगोलों ने तिमूर खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया।

उसने दिल्ली के सुल्तान बलबन के पुत्र मुहम्मद को मार दिया। 1292 ईस्वी में मंगोलों ने हुलागू के पोते उलूग के नेतृत्व में भारत को रौंदा। दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने अपनी बेटी का विवाह मंगोल नेता उलूग के साथ कर दिया और उन्हें भारत में ही बस जाने की अनुमति दे दी। मंगोल दिल्ली के निकट मंगोलपुरी बसाकर रहने लगे। आज भी दिल्ली में स्थित इस इलाके को मुगलपुरा कहा जाता है।

1299 ईस्वी में कुतलग ख्वाजा के नेतृत्व में फिर से मंगोल दिल्ली पर चढ़ आये। जब 1303 ईस्वी में तार्गी के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया तो भारतीय इतिहास का सबसे शक्तिशाली सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी राजधानी दिल्ली से भागकर सिरी के दुर्ग में जा छिपा। 1328 ईस्वी में जब मंगोल फिर से तमोशिरीन के नेतृत्व में बदायूँ तक आ पहुँचे तो सुल्तान मुदम्मद बिन तुगलक ने उन्हें बड़ी भारी घूस देकर अपना पीछा छुड़ाया।

अपने प्रत्येक आक्रमण में मंगोलों ने भारत को बुरी तरह से रौंदा। जो भी उनके सामने आया उसे लूटा-खसोटा और उसका सर्वस्व हरण करके मौत के घाट उतार दिया। गाँव के गाँव जला दिये। फसलें उजाड़ दीं, तालाब तोड़ दिये। कुओं में गायों का खून डाल दिया। पशु-पक्षियों को जीवित ही भून कर खा गये। स्त्रियों का सतीत्व हरण किया। हजारों स्त्री-पुरुष और बालकों को गुलाम बनाकर अपने साथ ले गये और उन्हें तरह-तरह की यातनायें दीं।

उन दिनों उत्तरी भारत में ऐसा कोई दिन नहीं होता था जब किसी न किसी गाँव में इन मंगोलों का खूनी नाच नहीं होता था। शांतिप्रिय, सहिष्णु और निर्धन भारतवासी दिन प्रतिदिन और अधिक निर्धन, असहाय और लाचार होते जाते थे। इंसान की खूनी ताकत अपने ही जैसे दूसरे इंसानों का खून बहता हुआ देखकर पैशाचिक अट्टहास करती थी और परमात्मा अपने ही बनाये हुए पुतले की क्रूरता को देखकर स्तब्ध था।

-अध्याय 7, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

लंगड़ा दैत्य (8)

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लंगड़ा दैत्य

समरकंद से एक लाख घुड़सवारों की सेना लेकर एक लंगड़ा दैत्य भारत की ओर चल पड़ा है। वह सिंधु नदी पार कर चुका है और कुछ दिनों में पंजाब पहुँचने वाला है। वह जिस गाँव से गुजरता है, उस गाँव में किसी को जीवित नहीं छोड़ता।

दीना ने भरी दुपहरी में अपने सिर से घास का गठ्ठर धम्म से नीचे फैंका और चीख कर बोला- ‘माँऽऽऽऽऽऽ!’

उसकी चीख पूरे आंगन में फैल गयी। आंगन के नीम पर बैठे पक्षी भयाक्रांत हो, फड़फड़ा कर उड़ गये। उनकी तीखी चीखों से आकाश भर गया। कौने में खड़ी कजरी[1] ने अचकचा कर लड़ामनी[2]  में से मुँह बाहर निकाला और भयाकुल नेत्रों से दीना की ओर ताकने लगी।

– ‘क्या है बेटा? क्यों चीख रहा है?’ दीना की माँ ने सहम कर पूछा। वह दीना की चीख सुनकर सिर की चुन्नी संभालती हुई दुकड़िया[3]  में से निकल कर बाहर आ गयी थी। उसके पीछे-पीछे दीना की नवब्याहता लिछमी भी थी।

– ‘ लगंड़ा दैत्य आ रहा है। हमें भाग चलना होगा अभी, इसी समय!’

– ‘कौन लंगड़ा दैत्य! किसकी बात कर रहा है तू? माँ ने पूछा।

– ‘क्या बात है? इतनी जोर से क्यों चीख रहा है? तू दुपहरी में ही क्यों लौट आया खेतों से?’ दीना के पिता चौधरी संतराम पिछवाड़े में बंधी भैंसों की सानी[4]  करना छोड़कर आंगन में आ गये।

आजकल बरसात बहुत जोरों से हो रही है। इस कारण पशु चरने के लिये खेतों में नहीं जा पा रहे हैं। उन्हें लड़ामनी में ही पाठा नीरा जा रहा है।[5]  डंगरों की सेवा टहल के लिये ही चौधरी संतराम इस समय घर में हैं अन्यथा वे भी दीना की तरह खेत पर होते।

– ‘पिताजी! समरकंद से एक लाख घुड़सवारों की सेना लेकर एक लंगड़ा दैत्य भारत की ओर चल पड़ा है। वह सिंधु नदी पार कर चुका है और कुछ दिनों में पंजाब पहुँचने वाला है। वह जिस गाँव से गुजरता है, उस गाँव में किसी को जीवित नहीं छोड़ता।’ दीना उत्तेजित था और बुरी तरह से हांफ रहा था। वह पूरे रास्ते दौड़ता हुआ आया था।

– ‘लंगड़ा दैत्य चाहता क्या है? वह ऐसा क्यों कर रहा है?’ दीना की माँ ने पूछा।

– ‘यह तो मुझे नहीं पता, न ही यह सब बताने का वक्त उन लोगों के पास था।’

– ‘किन लोगों के पास? किनकी बात कर रहा है तू?’ दीना की माँ ने फिर सवाल किया।

– ‘वे ही जो घोड़ों पर बैठे हुए भागे चले जा रहे थे।’

– ‘कौन लोग घोड़ों पर बैठ कर भागे जा रहे थे?’

-‘ मैं नहीं जानता कौन लोग थे वो! जब हम खेतों पर काम कर रहे थे तो बीस-पच्चीस घुड़सवारों की एक टोली पश्चिम से घोड़े दौड़ाती हुई आई थी। वे लोग बुरी तरह से डरे हुए थे। उन्होंने ही हमें बताया कि वे लंगड़े दैत्य तैमूर के भय से जान बचाकर भाग रहे हैं।’

– ‘देखो बेटा, तनिक तसल्ली से बैठो और मुझे ढंग से सारी बात बताओ।’ चौधरी संतराम बेटे की व्याकुलता देखकर चिंतित हो गये।

– ‘यह समय तसल्ली का नहीं है पिताजी। जितनी जल्दी हो सके गाँव छोड़कर भाग चलना होगा।’

– ‘लेकिन पुत्तर अपना गाँव छोड़कर हम जायेंगे कहाँ? हमारे खेतों और ढोर-डंगरों की देखभाल कौन करेगा?’ दीना की माँ ने प्रतिवाद किया।

– ‘वह सब तो मैं नहीं जानता। लेकिन आप ही बताइये यदि लंगड़े दैत्य ने यहाँ पहुँच कर हम सब को मार दिया तब हमारे खेतों और ढोर-डंगरों की देखभाल कौन करेगा!’

– ‘लेकिन वह हमें क्यों मारेगा! हमने उसका क्या बिगाड़ा है? यदि वह हिन्दुस्थान का राज्य चाहता है तो दिल्ली के सुल्तान से लड़े। पंजाब के किसानों से उसका क्या बैर है?’ दीना की माँ ने बिफर कर पूछा।

– ‘उसका बैर पंजाब के किसानों से नहीं है। उसका बैर तो हिन्दुस्थान के प्रत्येक आदमी से है। जो कोई भी उसके मार्ग में आयेगा उसे वह मार डालेगा। वह गाँव के गाँव जला रहा है। कुओं और तालाबों में गायें काटकर फैंक रहा है। खेतों में आग लगा रहा है। वह कहता है कि वह धरती से कुफ्र मिटाने आया है।’

बेटे की बात सुनकर वृद्ध संतराम सिर पकड़ कर जमीन पर बैठ गये। उनके मुँह से केवल इतना ही निकला- ‘हे राम!’

– ‘सत्यानाश जाये इन खूनी हत्यारों का। आदमी को भला ऐसे मारा जाता है क्या?’ बेटे की बात सुनकर वृद्धा का चेहरा सफेद पड़ गया, मानो किसी ने पूरा खून निचोड़ लिया हो।

– ‘देर करना ठीक नहीं है, हमें निकल चलना चाहिये।’ दीना ने घास का गठ्ठर उठाकर आंगन में बंधी गाय के सामने फैंक दिया। वह आने वाली विपत्ति से बेखबर घास की ओर ताकती हुई रस्सा तुड़ाने की चेष्टा कर रही थी। 

– ‘लेकिन हम जायेंगे कहाँ?’ दीना की नवविवाहिता पत्नी लिछमी ने चुन्नी की ओट में से मंद स्वर में प्रश्न किया।

– ‘कोई हम अकेले तो नहीं जायेंगे! जहाँ पूरा गाँव जायेगा, वहीं हम भी जायेंगे।’ दीना ने लिछमी की ओर देखे बिना ही कहा।

– ‘तो फिर गाँव को इकट्ठा कर चौपाल पर। सब बैठ कर सलाह करेंगे।’ बूढ़े संतराम ने बेटे को आज्ञा दी।

दीना भरी दुपहरी में पूरे ‘लक्खी दा जोड़’ गाँव में घूम गया। कहते हैं कि किसी जमाने में लक्खी नाम के बणजारे ने यहाँ से होकर गुजरते समय अपने काफिले के लिये एक जोहड़[6]  खुदवाया था जो बाद में लक्खी दा जोड़[7]  कहलाने लगा। बहुत बाद में जब यहाँ गाँव बसना आरंभ हुआ तब गाँव का नाम भी ‘लक्खी दा जोड़’ पड़ गया।

दीना का संदेश पाकर बात की बात में लोग गाँव की चौपाल पर आ जुड़े। क्या बूढ़े, क्या बच्चे, क्या आदमी और क्या औरतें, सब के सब भागते हुए चले आये। सब के आने पर चौपाल जुड़ी।

चौधरी संतराम ने बिना किसी भूमिका के सब को आने वाली मुसीबत की संक्षिप्त जानकारी दी। हालांकि तब तक गाँव का बच्चा-बच्चा जान चुका था कि एक लंगड़ा दैत्य सिंधु नदी पार करके कत्ले-आम मचाता हुआ इसी ओर आ रहा है। वह जीवित ही आदमियों को आग में फैंक देता है। उसके सिपाही छोटे-छोटे बच्चों को भाले की नोक पर टांक लेते हैं। जो भी पशु-पक्षी दिखायी देता है उसे भून कर खा जाते हैं। वह लाखों गायों का वध कर चुका है …..।

आये दिन गाँव वाले आक्रांताओं के आक्रमण की बातें सुनते थे किंतु इस बार लंगड़े दैत्य के कारनामे सुनकर उनकी छाती दहल गयी। माताओं ने सहम कर अपने दुध मुंहे बच्चों को छाती से चिपका लिया और नवौढ़ायें ऐसे मुर्झा गयीं जैसे पाला मारने पर कमलिनियाँ कुम्हला जाती हैं।

बड़े-बूढ़ों ने कहा, सब लोगों को तत्काल ही गाँव छोड़ कर पूर्व की ओर प्रस्थान कर देना चाहिये और दूर इलाकों में जाकर शरण लेनी चाहिये ताकि खूनी दरिंदे से बचा जा सके।

युवक बड़े-बूढ़ों की बात से सहमत नहीं हुए। उनका विचार था कि पलायन के पश्चात तिल-तिल कर मरने की अपेक्षा शत्रु का सामना करके सम्मुख मृत्यु का वरण अधिक श्रेष्ठ है।

सब लोगों की बात सुनकर चौधरी संतराम ने फैसला सुनाया- ‘जो लोग गाँव छोड़ कर जाना चाहते हैं वे जा सकते हैं और जो लोग गाँव में रहकर शत्रु का सामना करना चाहते हैं, वे गाँव में ही रह सकते हैं।’

– ‘और चौधरी तुम! तुम क्या करोगे?’ लाला कनछेदीलाल ने पूछा। वह चौधरी संतराम का बालसखा था।

-‘हाँ-हाँ चौधरी, तुम क्या करोगे?’ बहुत से लोग एक साथ बोल पड़े। वे जानना चाहते थे कि आखिर चौधरी अपने लिये क्या निर्णय लेता है।

– ‘मैं……मैं क्या करूंगा! मुझे नहीं पता कि मैं क्या करूंगा! जैसे दीना कहेगा वैसे ही करूंगा।’

– ‘बोल दीना क्या कहता है?’ लोगों की दृष्टि दीना की ओर घूम गयी।

– ‘मेरा यह विचार है कि बापू आप लोगों के साथ सारे परिवार को लेकर चला जाये और मैं यहाँ रहकर गाँव के ढोर डंगरों को बचाने का प्रयास करूं।’

– ‘नहीं-नहीं! यह कैसे हो सकता है! मैं तो कहता हूँ कि दीना गाँव छोड़कर आप लोगों के साथ जाये और मैं गाँव में रहकर ढोर-डंगरों की देखभाल करूं।’ बेटे का साहस देखकर बूढ़े संतराम की छाती गर्व से फूल गयी।

– ‘गाँव के चौधरी को अकेला छोड़कर हम अपनी जान बचाकर भाग जायें, यह अन्याय कैसे होगा!’ गाँव के कुछ लोग चौधरी की बात का विरोध करने के लिये उठ खड़े हुए।

– ‘गाँव के ढोर-डंगरों को रब[8]  के हवाले किया जाये और सब के साथ जहाँ भी चलें एक साथ चलें। जान बची तो ढोर डंगर फिर मिल जायेंगे।’ लाला कनछेदी लाल ने सुझाव दिया।

– ‘इन ढोर-डंगरों से हमारे जीवन की डोरी बंधी हुई है। जब ये हमारे सुख के साथी हैं तो दुःख में इन्हें त्याग कर चले जाना उचित नहीं है।’ चौधरी संतराम ने इस विचार का विरोध किया।

– ‘यदि ऐसा ही है तो ढोर-डंगरों को साथ लेकर चला जाये।’ भजनीराम ने सुझाव दिया।

– ‘नहीं! ढोर-डंगरों को साथ लेकर भागना संभव नहीं है। हत्यारे तो घोड़ों पर हैं और हम गाय-भैंसों को टोरते हुए ले जायेंगे!’ संतराम ने प्रतिवाद किया।

– ‘तुम पंच लोग यहाँ बैठकर विचार ही करते रहना। तब तक लंगड़ा दैत्य आकर हम सबको खा जायेगा। फिर उसी से पूछ लेना कि हम क्या करें!’ जग्गा ने तैश में आकर कहा।

– ‘क्यों जग्गा, तुझे क्या फिकर है? वह भी लंगड़ा है और तू भी। इस हिसाब से तो वह तेरा भाई हुआ।’ एक नौजवान ने फिकरा कसा और सब के सब ठठा कर हँस पड़े। जग्गू का चेहरा क्रोध और अपमान से तमतमा गया।

लोग असमंजस में थे। क्या किया जाये! सबकी अलग-अलग राय थी कोई एक विचार ठहरता ही नहीं था।

– ‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सब यहाँ रहकर दुश्मन का मुकाबला करें?’ लिछमी ने चुन्नी की ओट करके सहमते हुए कहा। यह उसका पहला मौका था जब वह बड़े-बूढ़ों के सामने बोल रही थी, वह भी खुले आम चौपाल पर लेकिन वह जानती थी कि कुछ मौके ऐसे होते हैं जब छोेटे-बड़े के बीच कोई दीवार नहीं रह जाती। उसकी दृष्टि में यह मौका भी ऐसा ही था।

लिछमी की बात सुनकर सबने उस ओर आँखें घुमायीं। औरतों की तरफ से पहली बार आवाज आयी थी। वे चौपाल पर नहीं आती थीं और चौपाल पर बोलने का साहस भी किसी में नहीं था लेकिन आज गाँव की सारी औरतें चौपाल पर मौजूद थीं केवल उन सेठानियों को छोड़कर जो सामान्यतः घरों से बाहर नहीं निकलती थीं।

– ‘यहाँ रहकर शत्रु का मुकाबला करने का मतलब जानती हो तुम!’ चौधरी संतराम ने अपनी पतोहू को टोका।

– ‘ठीक ही तो कहती है यह। चूहों की तरह भागते हुए मरने से तो शेर की तरह मुकाबला करते हुए मरना ठीक है।’ चौधराइन ने अपनी बहू का समर्थन किया।

– ‘जीवित ही आग में कूद पड़ना तो शेर हो जाने की निशानी नहीं होती!’ चौधरी ने चौधराइन की ओर तमतमा कर देखा

– ‘लेकिन दुश्मन को देखकर दुम दबा कर भाग जाना तो चूहे होने की निशानी होती है!’ ऐसा पहली बार हुआ था जब चौधराइन ने चौधरी को जवाब दिया था, वह भी सबके सामने।

– ‘मैं देख रहा हूँ कि अब यह चौपाल न रहकर घर की पंचायत हो गयी। तुम लोग अपने झगड़े में सबको मरवा दोगे। मैं तो कहता हूँ कि समय रहते भाग चलो, नहीं तो लंगड़ा दैत्य हम सबको आकर दबोच लेगा।’ जग्गा चौपाल के लम्बे विचार विनिमय से तंग आ गया था। संभवतः उसे लंगड़े दैत्य का भय सबसे अधिक सता रहा था।

– ‘अरे जग्गा! तू एक काम कर। अपनी लाठी उठा और जहाँ तेरा सींग समाये वहीं भाग जा। क्योंकि तुझे भागने में वक्त भी ज्यादा लगेगा।’ चौधरी ने आँखें तरेर कर कहा।

– ‘हाँ-हाँ जाता हूँ। जहाँ मेरा सींग समाये वहीं जाता हूँ लेकिन कहे देता हूँ कि यदि तुम भी पूंछ उठाकर नहीं भागे तो मेरा नाम भी जग्गा से बदलकर कुत्ता रख देना।’ जग्गा अपनी लाठी का सहारा लेकर सचमुच उठ खड़ा हुआ और चौपाल से रवाना हो गया।

– ‘आगे नाथ न पीछे पगहा लेकिन चिंता तो देखो इनकी!’ किसी नौजवान ने फिकरा कसा तो एक बार फिर चौपाल पर ठहाके गूंज उठे। क्षण भर को वे भूल गये कि किस भयावह परिस्थिति में वे यहाँ एकत्रित हुए हैं।

– ‘तो फिर क्या कहते हो तुम लोग! गाँव में ही मोरचा लगाना है कि गाँव छोड़कर जाना है?’ जग्गा की तरफ से लोगों का ध्यान हटाने के लिये चौधरी संतराम फिर से मूल प्रश्न पर आये।

– ‘अजी करना क्या है, ऐसी की तैसी उस लंगड़े दैत्य की। जब लिछमी भाभी लड़ मरने को तैयार हैं तो हमने भी कोई चूड़ियाँ नहीं पहन रखी हैं।’ युवकों ने जोश में भर कर जवाब दिया।

– ‘लेकिन तुम्हारी लिछमी भाभी ने तो चूड़ियाँ पहन ही रखी हैं।’ बूढ़े चौधरी ने हँस कर कहा।

– ‘रब इसकी चूड़ियाँ सलामत रखे। मैं वारी जावां। मेरी बहू केवल लिछमी नहीं दुर्गा भी है। देखना लंगड़े दैत्य को तो एक हुंकार में समाप्त कर देगी।’ चौधराइन ने लिछमी को गले से लगा लिया।

थोड़ी देर पहले की निराशा तिरोहित हो गयी। पूरे गाँव में नवीन जोश उछालें लेने लगा। लोग लाठी, बल्लम, मूसल और मुग्दर संभालने लगे। तय हुआ कि गाँव के चारों ओर बनी हुई मिट्टी की दीवार को ऊँचा किया जाये ताकि मोरचा बांधने में आसानी रहे।

घर-घर से फावड़े, कुदाली और तसले निकल आये। बात की बात में खाई खुदने लगी। मिट्टी की दीवार ऊँची कर दी गयी। बीच-बीच में चौकियाँ बनाई गयीं जिन पर बड़ी मात्रा में पत्थर और तीर कमान जुटाये गये। स्त्री, पुरुष और बच्चे धनुष से निशाना साधने का अभ्यास करने लगे। जो स्त्रियाँ तीर कमान नहीं साध सकती थीं वे मूसल, मुग्दर और भाले घुमाने लगीं। एक माह में ‘लक्खी दा जोड़’ छोटे से दुर्ग में बदल गया।

कुछ ही दिनों में उन्होंने घायल लोगों के एक समूह को पश्चिम की ओर से भाग कर आते देखा उनकी आँखों में दहशत भरी हुई थी और उनके कटे अंगों से खून टपक रहा था। बहुत से लोग बैलगाड़ियों में बैठे थे तो बहुत से ऐसे भी थे जो ऊंटों, बैलों और भैंसों पर चढ़े हुए थे। जब बदन पर अंग ही सलामत नहीं थे तब कपड़ों की बात करना तो व्यर्थ ही था।

सामान्य दिनों में तो वे लोग संभवतः दो कदम भी नहीं चल पाते किंतु साक्षात् मौत से आँख मिला लेने के बाद वे इस दुरावस्था में भी दौड़ रहे थे। वे खून का ऐसा दरिया पार करके आये थे जिसका वर्णन करना उनके वश में नहीं था। वे मौत के अलंघ्य पर्वत को पार करके आये थे किंतु वे स्वयं नहीं जानते थे कि उन्होंने उस पर्वत को कैसे लांघा था! इन लोगों ने बड़ी खौफनाक बातें गाँववालों को बतायीं।

उन लोगों ने बताया कि तैमूर लंगड़े की सेना आंधी की गति से आगे बढ़ रही है और मार्ग में आने वाली हर चीज को तोड़-फोड़ और जला रही है। उसके लिये इंसानों और पशुओं में कोई अंतर नहीं है। ‘लक्खी दा जोड़’ वालों ने उन घायलों के अंगों पर दवाई लगाई, खाना खिलाया, पानी पिलाया और उनसे अनुरोध किया कि वे लोग इसी गाँव में रुक जायें किंतु लंगड़े दैत्य का खौफ उन्हें कहीं भी रुकने की अनुमति नहीं दे रहा था। भीगी आँखों से ‘लक्खी दा जोड़’ वालों ने उन्हें विदा किया।

अगले ही दिन घायल लोगों का एक और समूह गाँव से होकर गुजरा। फिर तो पीड़ा से कराहते और चीखते हुए लोगों के काफिले लगातार दिखाई देने लगे। गाँव वाले इन काफिलों को देखकर दहल उठे। हर शाम को वे चौपाल पर जुड़ते और आगे की योजना पर विचार करते। कई लोगों का उत्साह भंग हो गया, वे अपने परिवारों और ढोर-डंगरों के साथ इन काफिलों के साथ चल दिये।

चौधरी संतराम और उनका परिवार गाँव नहीं छोड़ने के निर्णय पर अडिग था। चौधरी के परिवार के साथ गाँव के सैंकड़ों और भी परिवार थे जो जान बचाकर भाग जाने की अपेक्षा लंगड़े दैत्य की सेना से दो-दो हाथ करके मृत्यु का वरण करना अधिक श्रेयस्कर समझते थे, सो वे गाँव में बने रहे।

अंततः वह दिन भी आ पहुँचा जब तैमूर की सेना ‘लक्खी दा जोड़’ गाँव की सीमा पर आ धमकी। उस दिन सूर्योदय के साथ ही पश्चिम दिशा में बहुत सारी धूल उड़ती हुई दिखायी दी। ‘लक्खी दा जोड़’ गाँव के लोगों ने सोचा कि कोई बड़ा काफिला तैमूर से बच कर भागता हुआ आ रहा है किंतु उनका अनुमान गलत साबित हुआ। थोड़ी ही देर में हजारों घोड़ों ने ‘लक्खी दा जोड़’ को घेर लिया। गाँव वाले तीर कमान लेकर मिट्टी की दीवार पर चढ़ गये और दीवार पर बनी ओट में से तीर, पत्थर और लकड़ियाँ फैंकने लगे।

मध्य एशिया से उठे जिस विशाल और शक्तिशाली अंधड़ के सामने ईरान, तूरान और अफगानिस्तान तिनके के समान ढह गये, जिसका कहर ख्वारिज्म, मैसोपोटामिया, रूम और रूस पर चक्रवाती तूफान बन कर टूटा था, उस प्रबल तैमूर लंग की सेना के सामने ‘लक्खी दा जोड़’ क्या था? संभवतः इतना भी नहीं जितना कि हाथी के मुकाबले में चींटा हुआ करती है।

मंगोल सैनिकों की पहली तीर वर्षा में ही ‘लक्खी दा जोड़’ गाँव के वीर दीवार से नीचे आ गिरे। देखते ही देखते कच्ची दीवार ढह गयी और मंगोल सैनिकों के घोड़े गाँव में घुस गये। ‘लक्खी दा जोड़’ वालों ने तीर कमान छोड़कर तलवारें खींचीं। जब मरना ही है तो भागते हुए क्यों? शत्रु को मारते हुए क्यों नहीं?

‘लक्खी दा जोड़’ वालों का दुस्साहस देखकर तैमूर लंग कुपित हुआ। इन तुच्छ कीटों की यह मजाल कि तैमूर लंग की प्रबल आंधी का रास्ता रोकने का साहस करें! आखिर क्या ताकत है ‘लक्खी दा जोड़’ के इन मक्खी-मच्छरों में? क्यों नहीं वे तैमूरलंग के भय से चीखते-चिल्लाते और अपना सिर पीटते हुए गाँव खाली करके भाग जाते!

लंगड़ा दैत्य स्वयं भाला हाथ में लेकर अपने सिपाहियों के साथ दुस्साहसी लोगों का शिकार करने के लिये निकल पड़ा। उसके लिये यह युद्ध न था, शिकार भर था। बात की बात में उसने लाशों के ढेर लगा दिये। ‘लक्खी दा जोड़’ के लोग जानते थे कि यदि हमें अंग-भंग करके छोड़ दिया गया तो हम तड़प-तड़प कर मरेंगे। इसलिये हम प्राण-पण से मैदान में टिके रहें ताकि जब तक हम शत्रु को मार सकें मारें और फिर अंत में स्वयं भी जीवित न बचकर मृत्यु का वरण करें।

चौधरी संतराम और उनका पूरा परिवार तलवार हाथ में लेकर लड़ रहा था। बड़ी विचित्र और बेमेल लड़ाई थी यह। एक ओर चौधरी संतराम और उनके साथी पैदल थे तो दूसरी ओर मंगोल सिपाही घोड़ों पर! एक ओर चौधरी संतराम के अकुशल योद्धा थे तो दूसरी ओर कई लड़ाइयों में अपनी तलवार का कहर ढा चुके क्रूर मंगोल सिपाही। ‘लक्खी दा जोड़’ वाले मरने के लिये लड़ रहे थे तो मंगोल सिपाही मारने के लिये।

एक मंगोल सिपाही चौधरी संतराम की बहू लिछमी की तरफ दौड़ा। वह लिछमी को जीवित ही पकड़ना चाहता था। लिछमी का ध्यान दूसरे सिपाही की ओर था। अचानक ही लाला कनछेदीलाल की दृष्टि उस ओर पड़ी तो लाला ने मंगोल सिपाही के इरादे को भांप लिया।

लाला ने जोर से चिल्लाकर लिछमी को चेताया और स्वयं भी तलवार लेकर उस ओर दौड़ा। तब तक लिछमी पहले वाले सिपाही से निबट चुकी थी। वह पीछे पलटकर सिंहनी की तरह उछली और तलवार का ऐसा भरपूर वार किया कि मंगोल सिपाही की गर्दन एक ओर लटक गयी। लिछमी को ऐसा करारा वार करते देखकर ‘लक्खी दा जोड़’ वालों में नया जोश भर गया। क्षण भर बाद ही लिछमी और लाला कनछेदी लाल के शव भूमि पर पड़े थे।

‘लक्खी दा जोड़’ वालों के लिये मृत्यु पहले से ही कुछ मायने नहीं रखती थी किंतु अब लिछमी और लाला कनछेदी लाल के बलिदान को देखकर तो वे जैसे पागल हो उठे। तलवार उनके हाथ में ऐसे नाचने लगी मानो वे सब किसान, पशुपालक अथवा व्यापारी न होकर मृत्यु के चिरदूत हों।

किसानों और पशुपालकों के घरों की औरतों ने इस अंदाज में तलवार चलाना आरंभ किया जैसे वे नित्य ही खेतों में धारदार हँसुए से घास अथवा फसल काटती हैं। और तो और लाला कनछेदी लाल के घर की जिन श्रेष्ठि ललनाओं ने कभी पानी के कलश तक उठाने का श्रम नहीं किया था और जिनके हाथों में चूड़ों के भी निशान अंकित हो जाते थे, उन ललित कोमलांगी श्रेष्ठि ललनाओं ने भी तलवार के वो हाथ दिखाये कि मंगोलों ने दांतों तले अंगुली दबा ली। चंगेजखाँ को भी सोचना पड़ा कि यह शिकार नहीं था, युद्ध था।

थोड़ी ही देर में शवों के ढेर लग गये। मंगोल सैनिकों ने हाथ में तलवार लेकर आई कितनी ही स्त्रियों को पकड़ कर उनके स्तन काट दिये और उनके कपड़े फाड़ कर उन्हें निर्वस्त्र कर दिया किंतु उन वीरांगनाओं ने अपने आपको मंगोलों के हवाले नहीं किया। वे मृत्यु आने तक रण में जूझती रहीं। वे शरीर और प्राण गंवाने को तैयार थीं किंतु अपना सतीत्व नहीं। अंतिम सांस तक उनका यही प्रयास रहा कि किसी तरह एक भी मंगोल को मार सकें और जीवित ही मंगोलों की पकड़ में न आयें।

कहा नहीं जा सकता कि चौधरी संतराम और दीना किन परिस्थितियों में और कब बलिदान हुए किंतु इतना निश्चित था कि सूर्यदेव के आकाश मध्य में पहुँचने से पूर्व ही ‘लक्खी दा जोड़’ का प्रत्येक स्त्री-पुरुष और बच्चा मौत के घाट उतर गया। इतने पर भी मंगोल सैनिकों की तलवार रुकी नहीं। आदमियों से निबट कर वे पशुओं की ओर बढ़े। युद्ध से थककर उन्हें भूख लग आयी थी। देखते ही देखते उन्होंने घरों में आग लगा दी और जीवित पशुओं को उस आग में झौंकने लगे।

थोड़ी ही देर में मनुष्यों की चीखों के स्थान पर पशुओं की डकराहटों से गाँव की गलियाँ और चौबारे भर गये। लंगड़े दैत्य की सेना ने पेट भर कर पशु-मांस खाया और सुस्ताने के लिये जहाँ-तहाँ पसर गये। आगे जाने की उन्हें कोई जल्दी नहीं थी क्योंकि उन्हें तो जीवन भर यही काम करना था।

-अध्याय 8, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] गाय का नाम

[2] पशुओं के चारा खाने की हौदी।

[3] इतना बड़ा कमरा जिसमें दो कड़ियों वाली छत लगी हो।

[4] कटे हुए सूखे चारे में आटे अथवा ग्वार की चूरी का घोल मिलाना सानी कहलाता है।

[5] हरा चारा खिलाया जा रहा है।

[6]  तालाब

[7] लक्खी बणजारे का तालाब

[8] परमात्मा

मृतकों के नगर (9)

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मृतकों के नगर

कई महीनों तक दिल्ली में किसी पक्षी तक ने पर नहीं मारा फिर बेबस आदमी का तो कहना ही क्या था। चीलों, गिद्धों एवं सियारों को भी मृतकों के नगर साफ करने में कई महीने लग गए।

यह तो नहीं कहा जा सकता कि इतिहास की वह कौनसी तिथि थी जब मंगोलों ने इस्लाम स्वीकार किया किंतु इस शाखा में उत्पन्न हुआ तैमूर लंगड़ा इस्लाम का अनुयायी था। उसके बाप-दादे मध्य एशिया में छोटे-मोटे जागीरदार हुआ करते थे जो अमीर कहलाते थे। तैमूर लंगड़ा अपने खानदान में पहला बादशाह हुआ किंतु वह बादशाह न कहलाकर अपने बाप-दादों की तरह मिर्जा ही कहलाता था जिसका अर्थ होता है अमीर का बेटा।

उसका वास्तविक नाम तैमूर था किंतु एक बार युद्ध में घायल हो जाने से वह कुछ लंगड़ाकर चलता था इसलिये हिन्दुस्थान में वह तैमूर लंगड़े के नाम से जाना जाता था। उसका जन्म समरकन्द से पचास मील दक्षिण में मावरा उन्नहर के कैच नामक स्थान पर हुआ था। वह स्वभाव से झगड़ालू और नीच किस्म का इंसान था।

अपने क्रूर कारनामों के कारण यह लंगड़ा दैत्य इतिहास में खूनी पृष्ठ लिखने में अपना सानी नहीं रखता। तेतीस वर्ष की आयु में वह समरकंद का शासक हुआ। शीघ्र ही उसने फारस, ख्वारिज्म, मैसोपोटामिया और रूस के कुछ इलाकों पर अधिकार कर लिया।

जहाँ तैमूर के पूर्वज भारत पर इसलिये चढ़ाई करते रहे क्योंकि भारत पर इस्लामी शासकों का शासन था और तैमूर के पूर्वज इस्लाम को नष्ट करना चाहते थे, वहीं तैमूर ने भारत पर इसलिये आक्रमण करने का निश्चय किया ताकि वह भारत से हिन्दुओं का सफाया करके तथा इस्लाम की वृद्धि करके कुछ पुण्य अर्जित कर सके।

24 सितम्बर 1398 को तैमूर लंगड़े ने सिन्ध नदी को पार करके भारत में प्रवेश किया। उसकी सेना में बरानवे हजार घुड़सवार थे। भारत में उसने मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार किया। उसने पाकपटन, दिपालपुर, भटनेर, सिरसा और कैथल होते हुए दिल्ली का मार्ग पकड़ा। नगरों में आग लगाता हुआ, फसलें जलाता हुआ, मनुष्यों की हत्यायें करता हुआ और उन्हें पशुओं के समान बंदी बनाता हुआ वह निर्विरोध आगे बढ़ता रहा।

पंजाब में रहने वाले एक लाख हिन्दुओं को बन्दी बनाकर वह दिल्ली पहुँचा और वहाँ उनका सामूहिक वध कर दिया। इसके बाद उसने दिल्ली में प्रवेश किया। दिल्ली में उन दिनों तुगलक वंश के उत्तराधिकारी सत्ता प्राप्ति के लिये नंगे नाच रहे थे। उन्हें प्रजापालन और प्रजा की रक्षा जैसे कामों से कोई लेना-देना नहीं था।

जिस समय तैमूर लंगड़ा अपने एक लाख घुड़सवार लेकर दिल्ली के दरवाजे पर पहुँचा, उस समय दिल्ली निकम्मे सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद के शासन में थी। उस निकम्मे सुल्तान ने अपने प्राणों की रक्षा के आश्वासन के बदले में दिल्ली के दरवाजे तैमूर के लिये खोल दिये।

तीन दिन तक तैमूर लंगड़े ने दिल्ली में कत्ले-आम करवाया। लाखों स्त्रियों के साथ बलात्कार किया गया। लाखों हिन्दुओं के सिर काटकर उनके ऊंचे ढेर लगा दिये गये और उनके धड़ हिँसक पशु-पक्षियों के लिये छोड़ दिये गये। दिल्ली मृतकों का शहर हो गया। कत्ले आम पूरा होने के बाद तैमूर ने कहा मैं ऐसा नहीं करना चाहता था किंतु अल्लाह का ऐसा ही आदेश था इसलिये यह सब अल्लाह की मर्जी से हुआ है। अल्लाह को धन्यवाद देने के लिये वह हरिद्वार पहुँचा।

हरिद्वार में भी उसने दिल्ली वाला कारनामा दोहराया तथा नगर को हिन्दुओं से रहित करके गंगाजी के प्रत्येक घाट पर गौ वध करवाया। इसके बाद उसने जम्मू पहुंच कर वहाँ के हिन्दू राजा से जबरन इस्लाम कबूल करवाया। 19 मार्च 1399 को उसने पुनः अपने देश जाने के लिये सिन्धु नदी को पार किया। तब तक वह कई लाख हिन्दुओं का वध कर चुका था। चारों ओर मृतकों के नगर दिखाई देने लगे।

उसने कितनी गायों की हत्यायें कीं तथा कितने मंदिर जला कर राख कर दिये, उनकी गिनती करने के लिये कोई जीवित नहीं बचा। उसने अपने मार्ग में पड़ने वाले समस्त नगरों और गाँवों को उजाड़ दिया। लाखों पुरुषों, स्त्रियों तथा बच्चों की हत्या कर दी।

लंगड़े दैत्य ने कत्ल किये गये मनुष्यों की खोपड़ियों से जगह-जगह पर पिरामिड सजाये और उन पर खड़े होकर पैशाचिक अट्टहास किये। निर्दोष इंसानों का खून बहाकर जश्न मनाये। उसने केवल उन्हीं को जीवित छोड़ा जो मुसलमान बन गये लेकिन जान बचाने के लिये मुसलमान बन जाने वालों का मौत ने पीछा तब भी नहीं छोड़ा।

लाखों शवों के सड़ने से सम्पूर्ण उत्तरी भारत में प्लेग और अकाल फैल गये। बचे खुचे आदमी यहाँ तक कि पशु-पक्षी तक उनकी चपेट में आकर काल कलवित हो गये। कई महीनों तक दिल्ली में किसी पक्षी तक ने पर नहीं मारा फिर बेबस आदमी का तो कहना ही क्या था। चीलों, गिद्धों एवं सियारों को भी मृतकों के नगर साफ करने में कई महीने लग गए।

-अध्याय 9, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

खूनी ताकतों का संगम (10)

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खूनी ताकतों का संगम

इस प्रकार बाबर की धमनियों में मध्य ऐशिया की दो खूनी ताकतों का संगम हो गया था। इन खूंखार आक्रांताओं में से एक का नाम चंगेज खाँ और दूसरे का नाम तैमूर लंग था।

तैमूर लंगड़े का चौथा वंशज मिर्जा उमर शेख अपने बाप-दादों की तरह परम असंतोषी जीव था। वह फरगना[1]  का शासक था किंतु वह अपने छोटे राज्य और अल्प साधनों से संतुष्ट नहीं था। अपने बड़े भाई अहमद मिर्जा से उसकी जानी दुश्मनी थी। अहमद मिर्जा समरकंद और बुखारा का शासक था। उमरशेख का विवाह कुतलुगनिगार खानम नामक औरत से हुआ था जो कुख्यात मंगोल आक्रांता चंगेजखान की तेरहवीं पीढ़ी में थी।

उमर शेख और कुतलुगनिगार खानम के कुल आठ संतानें हुई जिनमें बाबर सबसे बड़ा था। इस प्रकार बाबर की धमनियों में मध्य ऐशिया की दो खूनी ताकतों का संगम हो गया था। इन खूंखार आक्रांताओं में से एक का नाम चंगेज खाँ और दूसरे का नाम तैमूर लंग था।

उमर शेख बहुत रंगीन तबियत का आदमी था और सदा मौज मस्ती में डूबा रहता था। एक दिन जब उमर शेख कबूतर उड़ा रहा था तो उसके ऊपर मकान आ गिरा और उसी समय उसकी मृत्यु हो गयी। बाप की आकस्मिक मौत के कारण मात्र ग्यारह साल चार महीने का बाबर फरगना का शासन हुआ। वह अकाल प्रौढ़ बालक था और अपने बाप-दादाओं से भी बढ़कर महत्वाकांक्षी और दुस्साहसी था। उसकी खूनी ताकत का अनुमान लगाना कठिन था।

उमर शेख के मरते ही बाबर के दो सगे दुश्मनों ने अलग-अलग दिशाओं से फरगना पर आक्रमण कर दिया। इनमें से एक तो बाबर का सगा ताऊ अहमद मिर्जा था और दूसरा बाबर का सगा मामा महमूद खाँ था। बाबर की दादी ऐसान दौलत बेगम ने बाबर को सब विपत्तियों से बचाया जिसके कारण बाबर के दुश्मन मैदान छोड़कर भाग गये।

बाबर ने दो बार समरकंद पर अधिकार किया और दोनों बार ही समरकंद उसके हाथ से निकल गया। यहाँ तक कि समरकंद के चक्कर में फरगना भी उसके हाथ से निकल गया। समरकंद के नये शासक शैबानी खाँ ने बाबर को गिरफ्तार कर लिया। बाबर ने अपनी बहिन का विवाह अपने शत्रु शैबानीखाँ से करके कैद से मुक्ति पायी और बे-घरबार हो कर पहाड़ों में भाग गया।

पूरे तीन साल तक वह अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ पहाड़ों और जंगलों में भटकता फिरा। उसके घोड़े मर गये, जूते फट गये और वह दाने-दाने को मोहताज हो गया। वह मीलों दूर तक नंगे पाँव पैदल चलकर किसी गाँव तक जाता। भीख मांग कर रोटी खाता और जान बचाने के लिये फिर से जंगलों में जा छिपता।

दुनिया में कोई उसका मददगार न था, इसलिये वह दुनिया की दो क्रूरतम प्रबल ताकतों को वारिस होने के बावजूद भी किसी को अपना नाम तक नहीं बताता था। उसके मुट्ठी भर साथी ही उसके बारे में जानते थे कि वह कौन था और कहाँ रहता था!

-अध्याय 10, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]   इसे अब खोकन्द कहते हैं।

दिखकाट की बुढ़िया (11)

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दिखकाट की बुढ़िया

दिखकाट की बुढ़िया ने पूरी रात जागकर बाबर को देवभूमि भारत की सम्पन्नता और तैमूर लंग की क्रूरता के किस्से सुनाये। इन किस्सों को सुनकर बाबर के आश्चर्य का पार न रहा।

– ‘यह कौनसा गाँव है?’ पहले नौजवान ने अपने माथे पर छलक आये पसीने को अपने सिर की पगड़ी के कपड़े से पौंछते हुए प्रश्न किया। काफी देर तक चलते रहने के बाद वे किसी गाँव तक पहुँचे थे।

– ‘दिखकाट।’ नौजवान के हमउम्र साथी ने जवाब दिया।

– ‘क्या यह गाँव भी हमारे अब्बा हुजूर की जागीर में था?’ पहले नौजवान ने फिर प्रश्न किया।

– ‘आपके पिता को यह गाँव आपके दादा हुजूर से जागीर में मिला था।’

– ‘तब तो इस गाँव पर हमारा सबसे अधिक अधिकार बनता है।’

– ‘बेशक! यह आपकी पुश्तैनी जागीर का गाँव है लेकिन अब इस बात को करने से क्या लाभ है? किसी ने सुन लिया तो नाहक परेशानी में पड़ेंगे।’

– ‘क्या इस गाँव में ऐसा कोई परिवार नहीं है जो हमारे पिता के प्रति वफादारी रखता हो।’

 -‘मैंने सुना है कि यहाँ के गाँव का मुखिया आपके पिता का विश्वस्त जागीरदार था।’

– ‘क्या हमें वहाँ से कोई मदद मिल सकती है?’

– ‘कैसी मदद?’

– ‘कोई भी मदद, जिसकी भी जरूरत पड़ जाये।’ पहले नौजवान ने फिर अपनी पगड़ी से माथा पौंछा। उसका चेहरा धूप की गर्मी से लाल हो आया था।

– ‘यह तो मुखिया से मिलकर ही जाना जा सकता है। आप कहें तो मैं वहाँ होकर आऊँ?’ दूसरे नौजवान ने पूछा।

– ‘नहीं! तुम अकेले मत जाओ। हम भी साथ चलेंगे।’

– ‘तो क्या तुम अपना वास्तविक परिचय उन्हें दे दोगे।’

– ‘वह तो वहाँ जाकर ही देखा जायेगा।’

– ‘तो फिर ठीक है, चलो।’

किसी तरह पूछते हुए दोनों नौजवान मुखिया के घर तक पहुंचे। घर के बाहर एक अत्यधिक उम्र की बुढ़िया ऊँटों को चारा डाल रही थी। उसके चेहरे की झुर्रियों से एक जाल सा बन गया था जिसके कारण उसकी सही शक्ल का अनुमान लगाना संभव नहीं रह गया था। उसके हाथ-पांव कांपते थे फिर भी वह काम में लगी हुई थी। दोनों नौजवान बुढ़िया को सलाम करके चुपचाप खड़े हो गये।

– ‘क्या है? क्या चाहते हो? बुढ़िया के पोपले मुँह में एक भी दांत नहीं था फिर भी उसकी वाणी बिल्कुल स्पष्ट और मुखर थी। नौजवानों ने अनुमान लगाया कि बुढ़िया की आंखों में भी पूरी रौशनी थी।

– ‘परदेशी हैं, बड़ी दूर से चलकर आ रहे हैं और पास में खाने को कुछ भी नहीं है।’ पहले नौजवान ने जवाब दिया।

– ‘यहाँ क्या सराय समझ कर आये हो?’ बुढ़िया ने तुननकर जवाब दिया।

– ‘हमने सुना कि मुखिया का परिवार काफी दयालु है। राहगीरों को रोटी देता है।’

– ‘तो तुमने गलत सुना है। मुखिया का परिवार तो खुद भूखों मर रहा है। तुम्हें रोटी कहाँ से खिलाये?’

– ‘क्या हम मुखिया से मिल सकते हैं?’

– ‘क्यों नहीं मिल सकते। गले में फंदा लगाकर इस ऊँट की गर्दन से झूल जाओ, कुछ ही क्षणों में वहीं पहुँच जाओगे, जहाँ मुखिया गया है।’

– ‘ओह! तो ये बात है?’

– ‘इसमें ओह की क्या बात है, तुमने रोटी खानी है?’

– ‘हाँ।’

– ‘तो लकड़ियाँ चीरकर देनी होंगी।’ बुढ़िया ने लकड़ियों के ढेर की ओर संकेत करते हुए कहा।

लकड़ियों का विशाल ढेर देखकर दोनों नौजवानों की रूह काँप गयी। फिर भी उस समय उन्हें रोटियों की इतनी सख्त आवश्यकता थी कि उन्होंने इस प्रस्ताव को भी खुदा की नियामत समझा।

– ‘लकड़ियाँ तो चीर देंगे किंतु पहले रोटी खाकर।’

– ‘रोटियाँ खाकर भाग गये तो?’

– ‘और लकड़ियाँ चीर कर भी रोटियाँ न मिलीं तो?’

– ‘पूरी लकड़ियाँ चीरनी होंगी। बोलो तैयार हो?’

– ‘भरपेट रोटियाँ खिलानी होंगी। बोलो तैयार हो।’

दिखकाट की बुढ़िया को दोनों नौजवानों पर तरस आ गया। उसने उन दोनों को भरपेट रोटियाँ खिलाईं। जब रोटियाँ खाकर नौजवानों ने कुल्हाड़ी उठाई तो बुढ़िया को उन पर फिर दया आ गयी।

-‘कुछ देर आराम कर लो, तब तक सूरज भी ढल जायेगा। उसके बाद लकड़ियाँ चीर देना लेकिन देखना, चकमा देकर भाग न जाना।’

दोनों नौजवान वहीं कंटीली झाड़ियों की ओट में कुछ भूमि साफ करके लेट गये। जब सूरज ढल गया तो वे लकड़ियाँ चीरने के काम पर जुटे।

– ‘यह बुढ़िया कितने बरस की होगी?’ पहले नौजवान ने कुल्हाड़ी चलाते हुए प्रश्न किया।

– ‘कोई अस्सी साल की तो होगी।’ दूसरे नौजवान ने जवाब दिया।

– ‘अरे नहीं, नब्बे से क्या कम होगी।’

– ‘कुछ भी कहो, बुढ़िया है बहुत खुर्रांट।’

– ‘वो कैसे?’

– ‘आधा सेर आटे के बदले इतनी सारी लकड़ियाँ जो चिरवा रही है।’

– ‘मुझे तो लगता है कि बुढ़िया बहुत दयालु है।’

– ‘वो कैसे?’

– ‘यदि दयालु नहीं होती तो हमें इतनी देर गये तक काम पर नहीं लगाये रहती। अवश्य ही वह हमें शाम का खाना भी खिलाकर भेजेगी।’

दूसरे नौजवान की बात सुनकर पहला नौजवान खिलखिला कर हँस पड़ा।

– ‘अरे नासपीटो! दो मन लकड़ी चीरने के बदले मैं तुम्हें जनम भर रोटियाँ खिलाऊंगी।’ दिखकाट की बुढ़िया जाने कब इन दोनों के पीछे आकर खड़ी हो गयी थी और उनकी बातें सुन रही थी। दोनों नौजवान खिसियाकर चुप हो गये। बुढ़िया को लगा कि नौजवान नाराज हो गये।

– ‘अच्छा चलो। तुम ढंग से लकड़ियाँ चीर दो तो मैं तुम्हें शाम की रोटियाँ भी खिलाऊंगी।’ बुढ़िया ने उन दोनों को मनाते हुए कहा।

लकड़ियाँ चीरते-चीरते सचमुच काफी देर हो गयी। बुढ़िया ने अपने वायदे के अनुसार दोनों को रात की भी रोटी खिलायी और रात हो गयी जानकर वहीं रुक जाने को कहा।

दोनों नौजवान तो यही चाहते थे। वे रात को बुढ़िया के यहीं ठहर गये। जब वे रात का खाना खाने बैठे तो दिखकाट की बुढ़िया ने पूछा- ‘अच्छा एक बात बताओ। तुम दोनों कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो?’

बुढ़िया का प्रश्न सुनकर दोनों नौजवान सकते में आ गये। यही वह प्रश्न था जिससे वे बचना चाहते थे और जिसका जवाब वे किसी को नहीं देना चाहते थे। फिर भी दयालु मेजबान को कुछ न कुछ जवाब तो देना ही था।

– देखो! फालतू के सवाल मत करो। क्या हमने तुमसे पूछा कि तुम कितने साल की हो और कब से जी रही हो?’ दूसरे नौजवान ने खींसे निपोरते हुए कहा।

– ‘अरे तो इसमें नाराज होने की क्या बात है? तुमने नहीं पूछा तो क्या हुआ? मैं खुद ही बता देती हूँ कि मैं एक सौ ग्यारह साल की हूँ और इतने ही साल से जी रही हूँ।’

– ‘क्या वाकई में तू एक सौ ग्यारह साल की है?’ पहले नौजवान ने पूछा।

– ‘हाँ मैं एक सौ ग्यारह साल की हूँ, मुझे अच्छी तरह याद है कि जब समरकंद का अमीर तैमूर अपनी सेना लेकर हिन्दुस्थान गया था तो मैं बहुत छोटी बच्ची थी। मेरा बाप अमीर के साथ हिन्दुस्थान गया था और मेरे लिये बहुत सी चीजें लेकर आया था। अब तुम बताओ कि तुम कौन हो और कहाँ जा रहे हो?’

– ‘हम पहाड़ियों के पीछे के गाँवों से आयें हैं और रोजगार की तलाश में जा रहे हैं।’ पहले नौजवान ने जवाब दिया। अमीर तैमूर का जिक्र बातों में आया जानकर उसे अच्छा लगा था।

– ‘यहाँ कहाँ रोजगार मिलेगा तुम्हें?’

– ‘तो फिर कहाँ जायें, कहाँ मिलेगा रोजगार?’

– किसी बादशाह की सेना में जाकर भर्ती हो जाओ।’

– ‘क्या समरकंद के शाह शैबानीखाँ के यहाँ?’ पहले नौजवान ने व्यंग्य से प्रश्न किया।

– ‘क्यों शैबानीखाँ के यहाँ क्यों? अमीर तैमूर के वंश में बहुत से बादशाह हैं, उन्हीं में से किसी के यहाँ भर्ती हो जाओ और कभी मौका लगे तो हिन्दुस्थान अवश्य जाओ।’

– ‘क्यों? हिन्दुस्थान क्यों?’ बुढ़िया की बात से नौजवानों को प्रसन्नता हुई थी किंतु वे अपनी प्रसन्नता को छुपाये रखना चाहते थे।

– ‘अरे मूर्खो! हिन्दुस्थान में इतना सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात हैं कि तुम्हारी सारी भुखमरी जाती रहेगी। हिन्दुस्थान पर हमला करने का माद्दा केवल तैमूरी बादशाहों में है। और किसी का बूता नहीं जो हिन्दुस्थान की ओर आँख कर सके।’

– ‘और यदि मैं कहूँ कि मैं खुद तैमूरी बादशाह हूँ तो, तो क्या कहेगी तू?’ पहले नौजवान ने उत्तेजित होकर कहा।

– ‘तब तो तू यह भी कहेगा कि तू फरगना और समरकंद का अमीर है।’ बुढ़िया ने जोर से हँसते हुए कहा।

– ‘हाँ-हाँ! मैं फरगना और समरकंद का अमीर जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर हूँ।’ पहले नौजवान ने और भी उत्तेजित होकर कहा।

– ‘क्या कहता है?’ बुढ़िया सहम गयी।

– ‘हाँ मैं सच कहता हूँ।’

– ‘मुझे विश्वास नहीं होता।’

– ‘क्यों? क्यों नहीं होता विश्वास? क्या इस गाँव का मुखिया मेरे मरहूम पिता अमीर उमरशेख का खास आदमी नही था।

– ‘था।’

– ‘तो फिर तुझे मुझ पर विश्वास क्यों नहीं होता?’

– ‘मुझे तुझ पर तो विश्वास होता है किंतु अपनी तकदीर पर विश्वास नहीं होता। इतना बड़ा तैमूरी बादशाह, मेरी झौंपड़ी में।’

– ‘मैं बड़ा था, अब नहीं हूँ किंतु फिर से बनना चाहता हूँ।’

– ‘मैं बादशाह की क्या खिदमत कर सकती हूँ?’ बुढ़िया ने सहम कर पूछा।

– ‘बड़े दादा हुजूर अमीर तैमूर के हिन्दुस्थान फतह के जो भी किस्से तू जानती है, सब मुझे सुना।’

दिखकाट की बुढ़िया ने पूरी रात जागकर बाबर को देवभूमि भारत की सम्पन्नता और तैमूर लंग की क्रूरता के किस्से सुनाये। इन किस्सों को सुनकर बाबर के आश्चर्य का पार न रहा। उसने मन ही मन संकल्प किया कि एक दिन वह भी देवभूमि पर आक्रमण करेगा और अपने प्रपितामह की ही तरह लाखों काफिरों और गायों का वध करेगा। उसे पूरा भरोसा था कि उसके बुरे दिन हमेशा नहीं रहेंगे।

-अध्याय 11, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

फिर से बादशाही (12)

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फिर से बादशाही

फिर से बादशाही मिलने के बाद बाबर ने एक बार फिर से अपने बाप-दादों के राज्य पर अधिकार करने का प्रयत्न किया और ईरान के शाह से सहायता मांगी।

भाग्य ने बाबर की शीघ्र ही फिर से सुधि ली। जब बाबर के शत्रु शैबानी खाँ ने कुन्दुज के शासक खुसरो शाह को हरा कर उसकी सेना भंग कर दी तो खुसरो शाह के चार हजार सैनिक पहाड़ों में छिपे हुए बाबर से आ मिले। यहीं से बाबर की खूनी ताकत ने फिर से जोर मारा।

भाग्य से हाथ आयी सेना का बाबर ने जमकर उपयोग किया और तत्काल ही काबुल पर आक्रमण कर दिया। शीघ्र ही काबुल, गजनी और उनसे लगते हुए बहुत सारे क्षेत्र बाबर के अधीन आ गये। बाबर ने भाग्य को अपने अनुकूल जानकर पूर्वजों की उपाधि मिर्जा का त्याग कर दिया और बादशाह की उपाधि धारण की।

फिर से बादशाही मिलने के बाद बाबर ने एक बार फिर से अपने बाप-दादों के राज्य पर अधिकार करने का प्रयत्न किया और ईरान के शाह से सहायता मांगी। ईरान के शाह ने शर्त रखी कि यदि बाबर सुन्नी मत त्याग कर शिया हो जाये तो उसे ईरान की सेना मिल जायेगी।

बाबर की महत्वाकांक्षा ने बाबर को ईरान के शाह की बात मान लेने के लिये मजबूर किया और बाबर सुन्नी से शिया हो गया। इस अहसान का बदला चुकाने के लिये ईरान का शाह बड़ी भारी सेना लेकर बाबर की मदद के लिये आ गया। उसकी सहायता से बाबर ने समरकंद, बुखारा, फरगाना, ताशकंद, कुंदुज और खुरासान फिर से जीत लिये। यह पूरा क्षेत्र ट्रान्स ऑक्सियाना कहलाता था और इस सारे क्षेत्र में सुन्नी रहते थे।

ईरान के शाह के साथ हुई संधि के अनुसार बाबर के लिये आवश्यक था कि वह ट्रान्स ऑक्सियाना के लोगों को शिया बनाये किंतु ट्रान्स ऑक्सियाना के निवासियों को यह मंजूर नहीं हुआ। जिसका परिणाम यह हुआ कि ईरान के शाह की सेना के जाते ही लोगों ने बाबर को वहाँ से मार भगाया।

 अब मध्य एशिया में बदख्शां ही एकमात्र ऐसा प्रदेश रह गया जिस पर बाबर का अधिकार था। इस एक प्रदेश के भरोसे बाबर ट्रान्स ऑक्सियाना में बना नहीं रह सकता था। उसने बदख्शां को खान मिर्जा नाम के आदमी की देखरेख में देकर ट्रान्स ऑक्सियाना छोड़ दिया। अपने बाप-दादों की जमीन से हमेशा के लिये नाता टूट जाने से उसका दिल बुरी तरह टूट गया था। वह बुरी तरह सिर धुनता हुआ अफगानिस्तान लौट आया।

ट्रान्सऑक्सियाना के हाथ से निकल जाने पर बाबर ने अपना ध्यान अपनी अफगान प्रजा पर केंद्रित किया। बाबर के अधिकार में जो इलाका था उसमें यूसुफजाई जाति के लोग बड़ी संख्या में रहते थे। ये लोग बड़े झगड़ालू, विद्रोही और हद दर्जे तक बर्बर थे। वे किसी भी तरह के अनुशासन में रहने की आदी नहीं थे तथा किसी भी बादशाह को कर नहीं देना चाहते थे। बाबर ने उन्हें बलपूर्वक कुचलना चाहा किंतु इस कार्य में उसे सफलता नहीं मिली। पहाड़ी और अनुपजाऊ क्षेत्र होने के कारण बाबर इस क्षेत्र से इतनी आय भी नहीं जुटा पाया जिससे उसका गुजारा हो सके।

जीवन भर की लड़ाइयों के चलते तुर्क, मंगोल, ईरानी, उजबेग और अफगानी लोग बाबर के खून के प्यासे हो गये थे इस कारण यह आवश्यक था कि उसके पास एक विशाल सेना रहे किंतु सेना को चुकाने के लिये वेतन का प्रबंध हो पाना अफगानिस्तान में रहते हुए संभव नहीं था। एक सौ ग्यारह साल की बुढ़िया से उसने भारत की सम्पन्नता और तैमूर के भारत आक्रमण की जो कहानियाँ सुनीं थीं वे अब भी उसके अवचेतन में घर बनाये हुए बैठी थीं। इसलिये इस बार उसने देवभूमि भारत में अपना भाग्य आजमाने का निर्णय लिया।

इन सब से भी बढ़कर एक और चीज थी जो उसे अफगानिस्तान में चैन से बैठने नहीं दे रही थी। वह थी उसकी खूनी ताकत। आखिर उसके खून में चंगेजखाँ और तैमूर लंगड़े का सम्मिलित खून ठाठें मार रहा था! जो क्रूरता की सारी सीमायें पार कर नई मिसाल स्थापित करना चाहता था।

-अध्याय 12, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

कराकूयलू (13)

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कराकूयलू

तुर्कों की कई प्रबल शाखायें हुई जिन्होंने अलग-अलग स्थानों पर अपने राज्य कायम किये। जो ‘तुर्क’ तुर्किस्तान से आकर ईरान में बस गये थे, उन्हें तुर्कमान कहा जाता था। तुर्कमानों का जो कबीला काली बकरियां चराता था वह कराकूयलू कहलाता था।

तुर्की भाषा में ‘करा’ काले को कहते हैं, ‘कूय’ माने बकरी और ‘लू’ का अर्थ होता है- वाले। इस प्रकार काली बकरियों वाले कराकूयलू कहलाये। सफेद बकरियां चराने वाले उनके भाई आककूयलू कहलाते थे। तुर्कों के कराकूयलू तथा आककूयलू कबीले अजरबैजान में निवास करते थे जो रूम और रूस की सीमाओं पर स्थित है।

कराकूयलू वंश की कई शाखायें थीं जिनमें से एक प्रमुख शाखा थी- ‘बहारलू’। मुगल अमीर तैमूर लंगड़े के समय में बहारलू शाखा में अली शकरबेग नाम का आदमी हुआ जिसके पास हमदान, देनूर और गुर्दिस्तान के इलाके जागीर में थे। यह जागीर ‘अलीशकर बेग की विलायत’ कहलाता था। अलीशकर बेग इतना नामी आदमी था कि जब इस क्षेत्र से तुर्कमानों का राज्य चला गया तब भी यह क्षेत्र अलीशकर बेग की विलायत कहलाता रहा।

अलीशकर बेग का बेटा पीरअली हुआ। उसने अपनी बहिन का विवाह तूरान के शाह महमूद मिरजा से कर दिया और इस नाते वह शाह का अमीर हो गया। यहीं से बहारलू खानदान मुगल खानदान से जुड़ा। महमूद मिरजा फरगना के उसी मुगल शासक उमरशेख का बड़ा भाई था जिस उमरशेख के बेटे बाबर ने हिन्दुस्थान में मुगल शासन की नींव रखी।

तूरान से महमूद मिरजा का राज्य खत्म होने के बाद पीरअली खुरासान चला गया। खुरासान के अमीरों ने पीरअली को शक्तिशाली समझ कर और आने वाले समय में अपने लिये प्रबल प्रतिद्वंद्वी जानकर उसकी हत्या कर दी। पीरअली का बेटा यारबेग हुआ। वह ईरान में रहता था। जब ईरान का वह क्षेत्र आककूयलू शाखा के हाथों से निकल गया तो यारबेग भाग कर बदख्शां आ गया और बदख्शां के कुन्दुज नामक शहर में रहने लगा। बदख्शां उस समय उमरशेख के बाप अबू सईद के अधीन था।

जब उमरशेख बदख्शां का शासक हुआ था तब यारबेग कुन्दुज में ही रहता था। यारबेग के बेटे सैफ अली ने बदख्शां की सेना में नौकरी कर ली। सैफअली का बेटा बैरमबेग उमरशेख के बेटे बाबर की सेना में शामिल हो गया। जब 1513 ईस्वी में बाबर अंतिम बार बदख्शां से अफगानिस्तान के लिये रवाना हुआ तो कराकायलू शाखा का यह चिराग़ भी अपना भाग्य आजमाने के लिये बाबर के साथ लग लिया।

-अध्याय 13, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

देवभूमि की ओर (14)

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देवभूमि की ओर

बाबर ने अपनी सात सौ तोपों को गाड़ियों पर रखवाया। और सेना को हिन्दुस्तान की ओर कूच करने का आदेश दिया। सैंकड़ों गाड़ियों को देवभूमि भारत की ओर बढ़ते हुए देखकर बाबर की खूनी ताकत हिलोरें लेने लगी।

बाबर को अपनी खूनी ताकत पर पूरा भरोसा था जिसके बल पर वह अपना भाग्य नये सिरे से लिख सकता था। वह यह भी जानता था कि भाग्य उसका पूरा साथ दे रहा है। यह भाग्य ही था जिसके कारण उन्हीं दिनों बाबर की दोस्ती उस्ताद अली नामक एक तुर्क से हुई उस्ताद अली कमाल का आदमी था।

उसे बंदूक बनाने की कला आती थी और वह कुछ अन्य तरह का विस्फोटक जखीरा भी बनाना जानता था। बाबर ने उसकी बड़ी आवभगत की और उसकी मदद से अपने लिये नये तरह का असला तैयार किया। कुछ ही समय बाद बाबर ने एक और ऐसा चमत्कारी आदमी ढूंढ निकाला। इसका नाम मुस्तफा था। उसे तोप बनाना और उसे सफलता पूर्वक चलाना आता था। बाबर ने इन दोनों आदमियों की सहायता से अपने लिये एक शक्तिशाली तोपखाने का गठन किया।

गोला-बारूद, बंदूकों और तोपखाने की शक्ति हाथ में आ जाने के बाद बाबर ने अपनी योजना पर तेजी से काम किया। उसने अपने आदमी पूरे अफगानिस्तान और मध्य एशिया में फैला दिये जिन्होंने घूम-घूम कर प्रचार करवाया कि बाबर फिर से सुन्नी हो गया है और वह बहुत शीघ्र ही हिन्दुस्तान की बेशुमार दौलत लूटने के लिये हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने जा रहा है। हिन्दुस्तान से मिलने वाला सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात और खूबसूरत औरतें बाबर के सिपाहियों में बांटी जायेंगी।

सैंकड़ों साल से बाबर के पूर्वज मध्य एशियाई बर्बर लड़ाकों की सेना लेकर हिन्दुस्तान पर हमला बोलते आये थे। उनके सैनिक जब हिन्दुस्तान से लौटते तो उनकी जेबें बेशुमार दौलत से भरी रहतीं। सोने-चांदी की अशर्फियाँ, हीरे-जवाहरात और कीमती आभूषण उन्हें लूट में मिलते थे।

प्रत्येक सैनिक के पास दस-बीस से लेकर सौ-दौ सौ तक की संख्या में गुलाम होते थे जो बहुत ऊँचे दामों में मध्य एशिया के बाजारों में बिका करते थे। हिन्दुस्तान से लूटी गयी औरतें उनके हरम में शामिल रहती थीं। हिन्दुस्तान से लौटे हुए सैनिकों का सब ओर बहुत आदर होता था क्योंकि वे सैनिक कई-कई काफिरों को मारकर अपने लिये जन्नत में जगह सुरक्षित कर चुके होते थे और उनके घरों में हिन्दुस्थानी लौण्डियाएं काम करती थीं।

चंगेजखाँ और तैमूरलंग के समय के किस्से अब भी मध्य एशियाई देशों में बहुत चाव से कहे और सुने जाते थे। जब उन लोगों ने सुना कि बाबर फिर से सुन्नी हो गया है और बहुत बड़ी सेना लेकर हिन्दुस्तान पर हमला करने जा रहा है तो मध्य एशिया के बेकार नौजवानों ने बाबर की सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया।

बेशुमार दौलत और खूबसूरत औरतों के लालच में वे अपने घर-बार छोड़ कर अफगानिस्तान के लिये रवाना हो गये। जिन युवकों को उनके स्वजनों ने अनुमति नहीं दी वे भी रातों के अंधेरे में अपने घरों से भाग लिये। ये नौजवान रास्तों में नाचते-गाते और जश्न मनाते हुए अफगानिस्तान की ओर चले। देखते ही देखते बाबर की सेना में पच्चीस हजार सैनिक हो गये।

गोला-बारूद, बंदूकों और तोपखाने से सुसज्जित पच्चीस हजार सैनिकों को देखकर बाबर की छाती घमण्ड से फूल गयी। वह जानता था कि इन पच्चीस हजार सैनिकों की ताकत उसके पूर्वज तैमूर के बरानवे हजार अश्वारोही सैनिकों से कहीं अधिक है।

बाबर ने अपनी सात सौ तोपों को गाड़ियों पर रखवाया। उस्ताद अली को सेना के दाहिनी ओर तथा मुस्तफा को सेना के बायीं ओर तैनात करके स्वयं सेना के केन्द्र में जा खड़ा हुआ। इसके बाद उसने सेना को हिन्दुस्तान की ओर कूच करने का आदेश दिया। सैंकड़ों गाड़ियों को देवभूमि की ओर बढ़ते हुए देखकर बाबर की खूनी ताकत हिलोरें लेने लगी।

आज उसमें इतनी शक्ति थी कि वह दुनिया की किसी भी सामरिक शक्ति से सीधा लोहा ले सकता था। देवभूमि भारत को रौंदने का बरसों पहले देखा गया सपना शीघ्र ही पूरा होने वाला था।

-अध्याय 14, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

कोहिनूर (15)

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कोहिनूर

हुमायूँ ने बड़े जोर-शोर से बाप का स्वागत किया और लूट में प्राप्त हजारों कीमती पत्थरों के साथ कोहिनूर हीरा भी भेंट किया। बाबर ने इस करामाती हीरे के बड़े किस्से सुने थे। उसे अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हुआ कि एक दिन वह खुद इस हीरे का मालिक होगा!

बाबर ने भारत पर चार आक्रमण किये। उसका पहला आक्रमण ई.1519 में बाजोर[1] पर हुआ। बाजोर में उसने जमकर कत्ले आम किया ताकि भारत में उसकी क्रूरता के किस्से उसी प्रकार फैल जायें जैसे कि तैमूरलंग के बारे में फैल गये थे। इसके बाद उसने भेरा और खुशाब पर भी हमला किया। भारी तबाही मचाकर वह यहीं से काबुल लौट गया। उसी साल उसने खैबर दर्रे के रास्ते से भारत में प्रवेश कर पेशावर पर हमला किया किंतु बदख्शां में उपद्रवों की सूचना मिलने पर वह पुनः लौट गया।

ई.1520 में उसने पुनः बाजौर, भेरा, सियालकोट और सैयदपुर पर आक्रमण किया लेकिन कांधार में उपद्रव होने की सूचना पाकर वह फिर से अफगानिस्तान लौट गया। ई.1524 में उसने तीसरी बार भारत पर आक्रमण किया और लगभग पूरा पंजाब हथिया लिया।

नवम्बर 1925 में वह आगे बढ़ा तथा बदख्शां से अपने बेटे हुमायूँ को भी बुला लिया। हुमायूँ बड़ा भारी लश्कर लेकर आया। यह समाचार पाकर दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के लालची अमीर बाबर की तरफ जा मिले। बाबर की सेना में पचास हजार सैनिक हो गये।

दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी एक लाख सैनिक और एक हजार हाथियों के साथ बाबर का मार्ग रोक कर पानीपत के मैदान में खड़ा हो गया। अपनी फौज से दुगुनी शत्रु फौज को देखकर बाबर की खूनी ताकत घबराई नहीं। वह दूने जोश से पानीपत की ओर बढ़ा।

बाबर ने तुलुगमा पद्धति का प्रयोग किया जिसमें सेना के किसी भी अंग को युद्ध के मैदान से निकाल कर शत्रु सेना के दायें अथवा बायें हिस्से पर अचानक हमला बोला जा सकता है। जब इब्राहीम लोदी की सेना तीन ओर से घिर गयी तब बाबर की तोपों ने आग उगलना आरंभ कर दिया। इब्राहीम लोदी के बीस हजार सैनिक आधे दिन में ही धराशायी हो गये और शेष मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।

ग्वालिअर का राजा वीर विक्रमाजीत अपने हिन्दू वीरों के साथ दिल्ली की मदद करने के लिये आया था। वह अंत तक मैदान में बना रहा और अपने साथियों सहित वीरगति को प्राप्त हुआ। इब्राहीम लोदी भी युद्ध के मैदान में ही मारा गया। दिल्ली पर मंगोलों का अधिकार हो गया। बाबर ने हुमायूँ को आगरा भेज दिया और स्वयं दिल्ली चला गया।

कुछ दिन बाद बाबर अपने बेटे हुमायूँ से मिलने आगरा गया। हुमायूँ ने बड़े जोर-शोर से बाप का स्वागत किया और लूट में प्राप्त हजारों कीमती पत्थरों के साथ कोहिनूर हीरा भी भेंट किया। बाबर ने इस करामाती हीरे के बड़े किस्से सुने थे। उसे अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हुआ कि एक दिन वह खुद इस हीरे का मालिक होगा।

इस जीत के बाद हिन्दुस्तान में अब तक लूटी गयी बेशुमार दौलत का बंटवारा किया गया। फरगा़ना, खुरासान, काशगर और ईरान से आये सिपाहियों को सोने-चांदी के आभूषण और बर्तन दिये गये। कीमती का़लीन, हीरे, जवाहरात, दास-दासी भी सिपाहियों की हैसियत के अनुसार बांटे गये।

मक्का, मदीना, समरकन्द और हिरात जैसे तीर्थस्थानों को अमूल्य भेंटें भेजी गयीं। काबुल के प्रत्येक स्त्री-पुरुष और बच्चे को चांदी का एक-एक सिक्का भिजवाया गया। प्रत्येक सैनिक और शिविर रक्षक से लेकर निकृष्ट से निकृष्ट व्यक्ति तक को लूट का भाग प्राप्त हुआ।

बाबर ने दिल्ली, आगरा और ग्वालियर से लूटी गयी अपार संपदा को इतने खुले हाथों से अपने साथियों में बांटा कि उसके अपने पास कुछ न रहा। उसके लोग उसे मजाक में कलंदर कहने लगे। यहाँ तक कि दुनिया का सबसे बड़ा हीरा कोहिनूर भी उसने अपने पास न रखकर हुमायूँ को दे दिया जो अब हुमायूँ की पगड़ी में जगमगा रहा था।

-अध्याय 15, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] यह पंजाब में था। अब पाकिस्तान में चला गया है।

काले पन्ने (16)

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काले पन्ने

पूरे चार सौ सालों से सैंकड़ों हिन्दू नरेश और लाखों हिन्दू वीर अपने आराध्य की जन्मभूमि को फिर से प्राप्त करने के लिये प्राणों की आहुतियाँ दे रहे हैं। इन युद्धों में मीरबाकी के बहुत से शिलालेख नष्ट हो गये किंतु इतिहास के काले पन्ने मीरबाकी की क्रूरताओं के किस्से आज तक कहते हैं

बाबर के सेनापति मीरबाकी के मन में हसरत थी कि वह हिन्दुस्तान में ऐसा कुछ करे जिससे सदियों तक उसका नाम इतिहास में याद रखा जाये। उसने अपने आदमियों से सलाह मशवरा किया कि ऐसा क्या किया जाये? कुछ लोगों ने सलाह दी कि जिस तरह चंगेजखाँ और तैमूरलंग ने खून की नदियाँ बहाकर इतिहास में अपनी जगह बनाई, उसी प्रकार मीरबाकी को हिन्दुस्तान में चंगेजखाँ और तैमूरलंग से भी अधिक खून की नदियाँ बहा देनी चाहिये।

मीरबाकी को यह सुझाव अच्छा तो लगा किंतु इस काम के लिये विशाल सैन्य शक्ति की आवश्यकता थी और वह सैन्य शक्ति बाबर से मिल सकती थी। यदि बाबर से सेना लेकर वह काफिरों को मारता तो उसका श्रेय बाबर के नाम ही लिखा जाता। इसलिये मीरबाकी ने इस प्रस्ताव को छोड़ दिया।

मीरबाकी के आदमियों में एक बूढ़ा और अनुभवी अमीर था। उसने मध्य ऐशिया में कई सैन्य अभियान किये थे। उसने मीरबाकी को सलाह दी कि यदि हिन्दुस्थान में सबसे बड़े कुफ्र को तोड़ा जाये तो संभवतः इतिहास में उसे सदियों तक याद रखा जायेगा। मीरबाकी को यह सलाह जंच गयी।

उसने पता लगवाया कि हिन्दुस्थान में सबसे बड़ा धार्मिक स्थल कौनसा है। उसके आदमियों ने पता लगाया कि हिन्दू लोग अयोध्या के राजा रामचंद्र को भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं। अयोध्या में जिस स्थान पर उसका जन्म हुआ था वहाँ बड़ा विशाल मंदिर बना हुआ है जिसमें रामचंद्र के बुत की पूजा होती है। यूं तो हिन्दुस्थान में एक से एक बड़े मंदिर हैं किंतु भगवान का जन्मस्थल होने के कारण यह हिन्दुस्थान का सबसे आला दर्जे का मंदिर माना जाता है।

मीरबाकी बाबर से आज्ञा लेकर कुफ्र मिटाने के लिये अयोध्या की ओर चला। जब भाटी नरेश महताब सिंह तथा हँसवर नरेश रणविजयसिंह को मीरबाकी के इरादों का पता चला तो वे भी मीरबाकी का मार्ग रोकने के लिये उससे पहिले अयोध्या पहुँच गये। उनका नेतृत्व हँसवर के राजगुरु देवीदान पांडे ने किया।

सबसे पहले राजगुरु ने ही अपने आप को देवचरणों में अर्पित किया और वह तलवार हाथ में लेकर मीरबाकी के सैनिकों पर ऐसे टूट पड़ा जैसे सिंह भेड़ों के झुण्ड पर टूट पड़ता है। मीरबाकी इस ब्राह्मण की तलवार को देखकर थर्रा गया। मीरबाकी का साहस न हुआ कि वह तलवार हाथ में लेकर सम्मुख युद्ध के लिये मैदान में आये। उसने छिपकर देवीदान पांडे को गोली मारी। तब तक देवीदान मीरबाकी के सात सौ सैनिकों को यमलोक पहुँचा चुका था।[1] 

राजगुरु का बलिदान देखकर महाराजा महताबसिंह और महाराजा रणविजयसिंह की आँखों में खून उतर आया। वे सिंह गर्जन करते हुए म्लेच्छ सेना को घास की तरह काटने लगे। अब तलवारों और बंदूकों से काम चलता न देखकर मीरबाकी ने तोपों का सहारा लिया। एक लाख चौहत्तर हजार  हिन्दू सैनिक अपने आराध्य देव की जन्मभूमि के लिये बलिदान हो गये।[2]

मीरबाकी ने हिन्दूसेना से निबट कर तोपों का मुँह श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की ओर कर दिया। कुछ ही दिनों में मंदिर नेस्तनाबूद हो गया। मंदिर के मलबे से मीरबाकी ने अपने सैनिकों से उसी स्थान पर विशाल गुम्बदाकार मस्जिद का निर्माण करवाया और उसका नाम रखा बाबरी मस्जिद। मीरबाकी ने अपने आप को इतिहास में अमर कर देने के उद्देश्य से उस मस्जिद के सामने बहुत से शिलालेख लगवाये जो सैंकड़ों साल तक मीरबाकी के खूनी कारनामों की कहानी कहते रहे और हिन्दू इन शिलालेखों को पढ़-पढ़ कर आठ-आठ आँसू बहाते रहे।[3] 

मीरबाकी और बाबर तो कुछ सालों बाद इस दुनिया से चले गये किंतु हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच विष का इतना विशाल वृक्ष लगा गये जिसकी हवा के गर्म झौंके सैंकड़ों साल से आज तक हिन्दुओं को झुलसा रहे हैं। पूरे चार सौ सालों से सैंकड़ों हिन्दू नरेश और लाखों हिन्दू वीर अपने आराध्य की जन्मभूमि को फिर से प्राप्त करने के लिये प्राणों की आहुतियाँ दे रहे हैं। इन युद्धों में मीरबाकी के बहुत से शिलालेख नष्ट हो गये किंतु इतिहास के काले पन्ने मीरबाकी की क्रूरताओं के किस्से आज तक कहते हैं।

-अध्याय 16, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] तुजुक बाबरी में इस संख्या का उल्लेख किया गया है।

[2] अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम ने लखनऊ गजट में यही संख्या दी है।

[3] ऐसा एक शिलालेख आज भी मौजूद है।

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