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प्लावन (39)

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प्लावन

यह एक सुखद संयोग ही था कि आर्यों को इतना ऊँचा और विशाल बालुका स्तूप मिल गया था अन्यथा इस प्लावन में उनका नष्ट हो जाना निश्चित था।

कुभा, सुवास्तु क्रुमु, तथा गोमती आदि नदी-तटों को पीछे छोड़कर चतुरंगिणी पुनः सिंधु-नद के तट पर लौट आयी। असुरों के विरुद्ध उसका अभियान पूरा हो गया था। अधिकांश असुर अपना क्षेत्र छोड़कर पर्वतों के उस पार पलायन कर गये थे। कुछ असुर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष युद्धों में मारे भी गये थे।

सिंधुनद के तट से चतुरंगिणी ने परुष्णि के लिये मार्ग न पकड़ कर सिंधु-नद के साथ-साथ दक्षिण दिशा में चलना आरंभ किया। इस मार्ग में सैंधवों के कई पुर स्थित हैं। आर्यों का अनुमान था कि सैंधव उनका स्वागत नहीं करेंगे तो प्रतिरोध भी नहीं कर सकेंगे। जब चतुरंगिणी ने लघु सैंधव पुरों को जा घेरा तो आर्यों का अनुमान सत्य सिद्ध हुआ। सैंधवों ने शस्त्र उठाने के स्थान पर चतुरंगिणी को औत्सुक्य, भय और चिंता के साथ देखा। क्या चाहते हैं शत्रु आर्य!

सैंधवों ने अब से पहले केवल असुर सैनिकों को देखा था। महिष और उष्ट्र पर आरूढ़ असुरों के दल बिना किसी पूर्व सूचना के सैंधव पुरों में प्रवेश कर जाते थे तथा तब तक संतुष्ट नहीं होते थे जब तक मद्य, आसव और मज्जा यथेष्ट मात्रा में नहीं पा जाते थे। यह प्रथम अवसर था जब वे आर्य सैन्य को देख रहे थे।

यह भी प्रथम अवसर था जब वे किसी सैन्य को कुछ भी नहीं मांगते हुए देख रहे थे। इतना ही नहीं सैंधवों के लिये तो यह भी प्रथम अवसर था कि वे किसी सैन्य को महिष, वृषभ अथवा उष्ट्र पर आरूढ़ न देखकर बिल्कुल नये प्राणी ‘अश्व’ पर देख रहे थे।

‘अश्व’ नामक नवीन पशु पर बैठकर आने वाली आर्य सेना सैंधवों के लिये हर प्रकार से विचित्र थी। ‘हस्ति’ सैंधव क्षेत्र के वनों में प्रचुर संख्या में थे किंतु वे केवल भार वहन के काम आते थे। सैंधवों ने हस्तियों को इस नवीन भूमिका में प्रथम बार ही देखा था। आर्यों के रथ बहुत कुछ उनके शकटों जैसे थे किंतु इन रथों को देखकर सैंधवों को भय लगता था।

जहाँ सैंधवों और असुरों के शकट काष्ठ निर्मित थे, वहीं आर्यों के रथ कृष्णायस निर्मित थे। आर्यों के अस्त्र-शस्त्र भी असुरों के अस्त्र-शस्त्रों की अपेक्षा अधिक बड़े और अधिक भय उत्पन्न करने वाले थे। एक और विचित्र बात भी थी जो सैंधवों ने आश्चर्य के साथ देखी, कोई भी आर्य सैनिक अपने शीश पर शृंग धारण नहीं किये हुए था।

जब चतुरंगिणी ने सैंधवों के किसी भी पुर में बलपूर्वक प्रवेश नहीं किया, न ही किसी तरह का आक्रमण किया और न ही असुरों की तरह किसी तरह की मांग रखी तो सैंधवों के आश्चर्य का पार न रहा। उन्हें समझ में नहीं आया कि जिन आर्यों को वे कठिन शत्रु मानते आये हैं, वे आर्य किसी तरह का शत्रु भाव न रख कर केवल मैत्री का संदेश देने उनके पुर तक क्यों आये हैं! और संदेश भी कैसा, लेश मात्र भी समझ में नहीं आने वाला। वास्तव में ये आर्य चाहते क्या हैं सैंधवों से!

सिंधु के दीर्घ तटों पर स्थित सैंधव-पुरों को चतुरंगिणी एक ही संदेश देती चली जा रही है- आर्यों ने असुरों को पर्वत पार के विकट मरुस्थल में धकेल दिया है। असुरों की संस्कृति हेय है, वह अनुसरण करने योग्य नहीं है। सैंधव-जन असुरों की विकृत संस्कृति का अनुसरण न करें। अन्यथा वे भी शनैः-शनैः असुर सभ्यता में विलीन हो जायेंगे।

जिस उच्च संस्कृति का निर्माण उनके पूर्वजों ने किया है उसकी रक्षा करें। नग्न स्त्रियों की प्रतिमाओं को पूजना बंद करें, मांस तथा मदिरा का सेवन बंद करें। देव प्रतिमाओं को पशु-पक्षियों की बलि चढ़ाना बंद करें तथा अनाचार के स्थान पर सदाचार को अपनायें। सैंधव-जन आर्यों के इस संदेश को समझें और उस पर आचरण करें। अन्यथा यह विशाल चतुरंगिणी उन्हें भी असुरों की भांति मरुस्थल में धकेल देगी।

क्यों चाहते हैं आर्य ऐसा! शताब्दियों से सैंधव असुरों से ही मित्रभाव मानते और रखते आये हैं। इन्हीं आर्यों ने उनकी प्राचीन राजधानी कालीबंगा का पुर तोड़ा था। इतने अंतराल पश्चात् यह मित्रता कैसी! यह संदेश कैसा! कहीं न कहीं, कुछ न कुछ और भी अभिप्रेत है जिसे आर्य स्पष्ट रूप से नहीं बता रहे। चकित सैंधव आर्यों के संदेश को न तो स्वीकार कर पाते हैं और न अस्वीकार। नितांत मौन रहकर केवल आगे जाती हुई चतुरंगिणी को शंकित हृदय से विदाई देते हैं। आर्य सैन्य भी उनकी स्वीकरोक्ति की प्रतीक्षा किये बिना आगे बढ़ जाता है। आर्य सैन्य का अभीष्ट तो बस यही है कि यह संदेश अधिक से अधिक सैंधव पुरों तक पहुँचे।

सेनप सुनील ने अनुभव किया कि भले ही सैंधव आर्यो की चतुरंगिणी को चकित, शंकित और भयभीत दृष्टि से देख रहे हैं, भले ही यह यात्रा असुरों पर किये गये अभियान जैसी आक्रामक नहीं है किंतु यह भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध हो रही है जितना कि असुरों के विरुद्ध किया गया अभियान। निःसंदेह राजन् सुरथ की दृष्टि दूर भविष्य में भी जाती है।

उन्होंने ही असुर भूमि से लौटते हुए प्रस्ताव किया था कि पुनः लौटने से पहले सिंधु-तटों पर स्थित पुरों की यात्रा की जाये। जबकि आर्य सैनिक अपने जन को लौटने के लिये उतावले हो रहे थे।कितने प्रभावी ढंग से तब राजन् सुरथ ने आर्यवीरों को इस यात्रा के महत्व और उसकी आवश्यकता को समझाया था-द्रविड़ों से सम्पर्क करना आवश्यक है।

वे दीर्घ काल से असुरों के प्रति मित्रभाव और आर्यों के प्रति शत्रु भाव रखते आये हैं। असुरों के ही समान वे सिर पर शृंग धारण करते हैं, निर्वस्त्र प्रतिमायें बनाकर उनकी पूजा करते हैं, मांस तथा मद्य का सेवन करते हैं, देव-प्रतिमाओं को पशु-पक्षियों की बलि चढ़ाते हैं, शिश्न और योनि पूजन करते हैं। धीरे-धीरे वे स्वयं भी असुर होते जाते रहे हैं।

आज वे युद्ध से उदासीन हैं किंतु कालांतर में वे असुरों के प्रभाव से आर्यों के विरुद्ध आक्रामक भी हो सकते हैं। असुरों और सैंधवों की संगठित शक्ति का सामना करना आर्यों के लिये अत्यंत कठिन होगा।

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा, सेनप सुनील, आर्य अतिरथ, आर्य सुमति तथा अन्य प्रमुख आर्य वीरों ने समिति आयोजित कर राजन् सुरथ की योजना पर विस्तार से विचार विमर्श किया। उन्हें लगा कि राजन् सुरथ का प्रस्ताव हर तरह से उचित है। उन सब की भी बड़ी इच्छा थी कि वे उस द्रविड़ सभ्यता को अपनी आँखों से देखें जिसकी उन्नत पुर व्यवस्था का वर्णन वे शैशव काल से सुनते आये हैं। केवल एक ही बाधा उन्हें इस कार्य में दिखायी देती थी कि चतुरंगिणी को लम्बी यात्रा करनी पड़ेगी।

इस बीच में पिशाचों के क्षेत्र भी मिल सकते हैं। यदि पिशाचों से भेंट हुई तो उनसे भी निबटना अनिवार्य होगा किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ था। सिंधु तट पर स्थित पुरों के मध्य पणि-सार्थों के निरंतर आवागमन से बने मार्ग के कारण चतुरंगिणी को इस यात्रा में अपेक्षाकृत बहुत कम समय लगा। पिशाचों के क्षेत्र सिंधु से कुछ हटकर थे इससे आर्यों को उनसे भी नहीं उलझना पड़ा।

विचारों में डूबे राजन् सुरथ अश्व को पूरे वेग से फैंकते हुए अपने साथियों से बहुत आगे निकल आये हैं। केवल सेनप सुनील ही किसी तरह अपने अश्व को उनके पीछे लगाये हुए हैं। राजन् सुरथ के साथ सदैव यही होता है, जब भी वे विचारों की धारा में बहते हैं तो उन्हें अपने आस-पास का भान ही नहीं रहता। यह यात्रा इतनी महत्वपूर्ण सिद्ध होगी, इसका अनुमान तो स्वयं उन्हें भी नहीं था।

अच्छा हुआ जो सैंधव-क्षेत्र की यात्रा का निर्णय ले लिया अन्यथा यदि एक बार चतुरंगिणी परुष्णि के तट पर पहुँच जाती तो उसे पुनः संगठित कर सिंधु तट तक लाना विपुल कठिन होता। राजन् सुरथ को प्रजापति मनु का स्मरण बारम्बार हो आता है। इन्हीं सब कठिनाइयों के मध्य वैवस्वत मनु ने प्रजा को संगठित किया होगा!

अश्व पर बैठे-बैठे पीठ दुखने लगी तो आर्य सुरथ ने घने वृक्ष के नीचे अश्व को रोक लिया और नीचे उतर कर वृक्ष के तने से पीठ लगाकर बैठ गये। उन्होंने देखा कि भगवान् भुवन भास्कर पश्चिम दिशा में नीचे झुक गये हैं, संध्या होने में अभी विलम्ब है किंतु आकाश में श्यामवर्णी मेघों के संचरण के कारण अंधेरा समय से पूर्व ही घिर आया है।

  – ‘राजन्। हमारे स्पश की सूचना के अनुसार सैंधवों के दक्षिण प्रदेश की राजधानी मेलुह्ह यहाँ से निकट ही है।’ सेनप सुनील भी राजन् सुरथ के साथ अपने अश्व से उतर पड़े।

मेलुह्ह! चैंक पड़े राजन् सुरथ। सैंधवों की राजधानी मेलुह्ह! इसी नगर को तो लौट रहा था शिल्पी प्रतनु! उस दिन जिससे निर्जन वन में अचानक भेंट हुई थी। मेलुह्ह का नाम सुनकर अचानक उस निर्वस्त्र शिल्पी का स्मरण हो आया राजन् सुरथ को। क्या हुआ होगा उस सैंधव युवक का! क्या उसने पुरोहित किलात से प्रतिशोध ले लिया होगा!

क्या उसे नृत्यांगना प्राप्त हो गयी होगी! क्या उस शिल्पी से उनकी पुनः भेंट हो सकेगी! क्या उस विलक्षण नृत्यांगना से भी मिलना हो सकेगा! कैसी होगी वह सैंधव नृत्यांगना जिसका विशद वर्णन उस शिल्पी ने किया था! रोमांच की एक लहर सी दौड़ गयी राजन् सुरथ की देह में।

  – ‘कितने समय में हम वहाँ पहुँच सकते हैं ?’

  – ‘संभवतः कल मध्याह्न के पश्चात किसी भी समय।’

  – ‘फिर आज का पड़ाव, वह कितनी दूर है अभी!’

  – ‘अधिक दूर नहीं है राजन्। हम रात्रि शिविर के ठीक निकट पहुँच गये हैं। हमारे स्पश और सैनिकों की अग्रिम टुकड़ी का ध्वज अश्व पर चढ़कर देखने से दिखायी दे रहा है।’

  – ‘ठीक है। कल प्रातः हम किंचित् शीघ्र प्रस्थान करेंगे ताकि सूर्यास्त से पूर्व मेलुह्ह पहुँच जायें।’ आर्य सुरथ ने अपने स्थान से उठते हुए कहा।

अश्व पर पुनः आरूढ़ होते हुए राजन् सुरथ ने देखा कि कृष्णवर्णी सघन जलद आकाश में चारों ओर से घिर आये हैं। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने कई माह पहले ही आज की तिथि निश्चित कर रखी है, जिस दिन सूर्य को छठे नक्षत्र ‘आद्र्रा’ में प्रवेश करना है। अतः संध्या के पश्चात् किसी भी समय वर्षा होगी। ऋषिश्रेष्ठ के अनुसार इस बार अधिकतर नक्षत्रों का योग वर्षाकारक है। अतः विपुल वर्षा होना संभावित है।

इससे पहले कि चतुरंगिणी अपने शिविर में पहुँचती, वर्षा आरंभ हो गयी। थोड़ी देर में चारों ओर जल ही जल दिखाई देने लगा। लगता था पूरा का पूरा समुद्र मेघों पर आरूढ़ होकर आकाश तक चढ़ आया है। वर्षा के कारण कोई नहीं सो सका। दो प्रहर रात्रि व्यतीत होने के पश्चात् आकाश से गिरती जल धारायें हिमवृष्टि में बदल गयीं।

विकट शीत हो जाने से सैनिकों के दाँत किटकिटाने लगे। मनुष्य तो मनुष्य चतुरंगिणी के अश्व और हस्ति भी विचलित हो गये। इससे पहले चतुरंगिणी को इतनी विकट वर्षा का समना नहीं करना पड़ा था।

 रात्रि के तीसरे प्रहर में सेनप सुनील ने राजन् सुरथ के शिविर में प्रवेश किया- ‘असमय व्यवधान के लिये क्षमा करें राजन्! स्पश सूचना लाया है कि सिंधु का जल तीव्र गति से ऊपर उठ रहा है। कदाचित प्लावन होने को है। हमें सावधान रहना होगा।’

  – ‘प्लावन! इस समय सिंधु में प्लावन हुआ तो बहुत विनाशकारी होगा आर्य। यह तो सम्पूर्ण चतुरंगिणी को नष्ट कर देगा। हमारे सैनिक, अश्व और हस्ति बह जायेंगे। रथ एवंअस्त्र-शस्त्र नष्ट हो जायेंगे।’ सेनप सुनील की बात सुनकर सन्न रह गये सुरथ। वे तो केवल वृष्टि के सम्बन्ध में ही चिंता करते रहे थे, प्लावन की ओर तो उनका ध्यान ही नहीं गया था।

  – ‘इस विकट परिस्थिति में हमारे लिये क्या आदेश है राजन् ?’

  – ‘क्या ऋषिश्रेष्ठ को सूचित किया है आर्य! ‘

  – ‘हाँ, उन्हें सूचना दी जा चुकी है।’

  – ‘क्या कहते हैं ऋषिश्रेष्ठ ?’

  – ‘उन्होंने मुझे आपको सूचित करने के लिये कहा है।’

  – ‘ठीक है। समस्त सैनिकों को सावधान करें और जितनी शीघ्रता संभव हो, उतनी शीघ्रता के साथ सिंधु तट से दूर हटना आरंभ करें। सैनिकों से कहें कि शिविर को इसी तरह लगा रहने दें। केवल पशुओं, रथों और अस्त्र-शस्त्रों को अपने साथ लें।’

चतुरंगिणी ने सिंधु तट से दूर खिसकना आरंभ किया ही था कि वृष्टि बंद हो गयी। यह रात्रि का अंतिम प्रहर था। सूर्योदय होने तक आर्य वाहिनी सिंधु तट से कुछ दूरी पर स्थित एक ऊँचे और विशाल टीले पर पहुँच गयी। इस बीच अवकाश पाकर सैन्य ने तट से शिविर भी हटा लिया।

यद्यपि वृष्टि बंद हो गयी किंतु सिंधु के जलस्तर में वृद्धि होती रही। जान पड़ता था कि सिंधु के उद्गम पर अथवा सिंधु की किसी सहायक नदी में वर्षा का विपुल जल आने से सिंधु में प्लावन आया था। उचित समय पर निर्णय लिया था राजन् सुरथ ने। मध्याह्न होने तक ‘सिंधु’ नद अथवा नदी न रहकर जलधि में परिवर्तित हो गयी।

ऊँचे स्तूप पर स्थित चतुरंगिणी चारों ओर जल से घिर गयी। यह एक सुखद संयोग ही था कि आर्यों को इतना ऊँचा और विशाल बालुका स्तूप मिल गया था अन्यथा इस प्लावन में उनका नष्ट हो जाना निश्चित था।

जहाँ तक दृष्टि जाती थी, वहाँ तक केवल जल ही जल दिखायी देता था। आगे बढ़ना तब तक के लिये असंभव हो गया जब तक अग्नि वरुण को परास्त न कर दे। राजन् सुरथ को लगा वरुण ने कुछ दिनों के लिये चतुरंगिणी को बंदी बना लिया है।

– अध्याय 39, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेलुह्ह (40)

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मेलुह्ह

  – ‘वह जो भित्ती दिखायी दे रही है, वही मेलुह्ह पुर की प्राचीर है। लगभग एक प्रहर में हम वहाँ होंगे। हमारे स्पश आज प्रातः ही वहाँ पहुँच गये थे। किसी भी क्षण वे हमें लौटते हुए मिलेंगे।’ सेनप सुनील ने अपना अश्व आर्य सुरथ के अश्व के बराबर लाते हुए कहा। लगभग पूरे एक पक्ष तक प्लावन से घिरे रहने के पश्चात् आज ही चतरंगिणी मेलुह्ह के लिये प्रस्थान कर पायी थी।

  – ‘आपको उस सैंधव शिल्पी का स्मरण है आर्य ?’ राजन् सुरथ ने अपने अश्व की गति कम कर ली ताकि वार्तालाप में सुगमता रहे।

  – ‘कौन, वह जो निर्वस्त्र अवस्था में मिला था! ‘

  – ‘हाँ, वही। वह मेलुह्ह का ही रहने वाला तो था। आपको क्या लगता है, क्या उसने पुजारी से प्रतिशोध ले लिया होगा ?’

  – ‘यह तो वहाँ पहुँच कर ही ज्ञात……….।’

सेनप सुनील की बात अधूरी रह गयी। अचानक पश्चिम दिशा से शलभों [1] का विशाल समूह उड़ता हुआ ठीक उनके ऊपर आ गया। कोटि-कोटि शलभ। कहाँ से आये होंगे इतने सारे शलभ एक साथ!

  – ‘बचिये राजन् इन विकराल शलभों से बचिये।’ सेनप सुनील अश्व से नीचे कूद गये। उन्होंने राजन् सुरथ के चारों ओर भुजाओं का घेरा बना लिया। भुजाओं का यह क्षीण वलय किसी भी अर्थ में राजन् की सुरक्षा करने में समर्थ नहीं था। फिर भी इसके अतिरिक्त और कोई उपाय भी तो नहीं था। शलभों ने आकाश को पूरी तरह आच्छादित कर लिया जिससे चारों ओर अंधकार छा गया। राजन् सुरथ भी अश्व त्याग कर धरित्री पर आ गये।

  – ‘ऐसे नहीं आर्य। ऐसे रक्षा नहीं होगी। अपना उत्तरीय उतार कर उससे शरीर ढकिये और धरित्री पर बैठ जाइये।’ राजन् ने सेनप सुनील को आदेश दिया। 

कुछ ही समय में उन्हें ज्ञात हो गया कि ये शलभ उन्हें हानि पहुँचाये बिना आगे बढ़ रहे हैं। जब पूरा समूह उनके सिर के ऊपर से होता हुआ पूर्व की ओर चला गया तो पुनः प्रकाश हुआ। राजन् सुरथ के मस्तक पर चिंता की रेखायें थीं। ये शलभ तो जहाँ भी जायेंगे उस क्षेत्र की वनस्पति को नष्ट कर देंगे। उस क्षेत्र की प्रजा का जीवन संकट में पड़ जायेगा। चिंतित राजन् पुनः अश्व पर आरूढ़ होकर कुछ दूर ही चले होंगे कि सामने से एक स्पश आता हुआ दिखायी दिया। उसने अश्व से नीचे उतर कर राजन् का अभिवादन किया।

  – ‘क्या समाचार हैं आर्य ?’ राजन् ने स्पश के अभिवान का उत्तर देकर पूछा।

  – ‘बड़ी असमंजस की स्थिति है राजन्।’

  – ‘असमंजस! कैसा असमंजस! स्पष्ट कहो आर्य।’

  – ‘सम्पूर्ण पुर रिक्त है। कहीं कोई प्राणी नहीं है। श्वान और विडाल [2] भी दिखायी नहीं देते। गृद्धों [3] और शृगालों [4] के समूह मांस के लोथ खींच-खींच कर खा रहे हैं।’

  – ‘क्या किसी सैन्य ने आक्रमण किया था पुर पर ?’

  – ‘सैन्य आक्रमण के चिह्न दिखायी नहीं देते। फिर भी एक भी अक्षत शव देखने को नहीं मिला। गृद्धों ने सभी शवों को पूरी तरह चीर-फाड़ दिया है।’

  – ‘किंतु पुर के श्वान, मार्जार [5] और अन्य पशु। वे कैसे मारे गये होंगे ?’

  – ‘सम्पूर्ण पुर प्लावन में बह गया लगता है। भवनों में गीली रेत तथा शैवाल [6] जमा है और उनमें मज्जूक [7] तथा चिच्चिक [8] बोल रहे हैं। अधिक संभावना तो यही है कि पुरवासी प्लावन में डूब जाने से मरे होंगे।’

  – ‘निःसंदेह यही हुआ होगा।’ आर्य सुरथ ने शोक से सिर हिलाया।

  – ‘इसका अर्थ है कि अब आगे बढ़ने का कोई लाभ नहीं है!’ सेनप सुनील ने पूछा।

  – ‘हाँ आर्य। यहाँ से आगे जाना निरर्थक है।’ स्पश ने उत्तर दिया।

  – ‘नहीं-नहीं हम वहाँ अवश्य जायेंगे। आप ऐस करें आर्य। चतुरंगिणी को यहीं से लौट जाने के आदेश दें। हम पुर तक होकर आते हैं।’ राजन् सुरथ ने अपने अश्व को आगे बढ़ाते हुए कहा।

चैंक पड़े सेनप सुनील और स्पश दोनों ही। राजन् सुरथ का स्वर अचानक ही विकृत हो आया था। क्या हुआ राजन् को! लगता है उन्हें सैंधव पुर के नष्ट हो जाने की सूचना पाकर व्यथा हुई है! सेनप सुनील ने अपना अश्व राजन् के पीछे लगा दिया। स्पश चतुरंगिणी को रोकने का कार्य उन्होंने स्पश पर छोड़ दिया।

राजन् सुरथ ने अपने अश्व की गति असाधारण रूप से तीव्र कर ली। कुछ ही देर में वे मेलुह्ह के मुख्य द्वार पर थे। पुर में प्रवेश करते ही उनका सामना गृद्धों तथा शृगालों के समूह और शवों की दुर्गंध से हुआ। चारों ओर मृत्यु के चिह्न दिखायी देते थे। ऐसा लगता था जैसे कोई नदी नहीं अपितु हस्तियों का विशाल समूह पुर को रौंद कर निकल गया है।

क्या हुआ होगा शिल्पी और उसकी नृत्यांगना का! क्या वे दोनों भी प्लावन में बह गये होंगे! कहाँ गया होगा उनका स्वामी किलात! राजन् सुरथ ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते थे, त्यों-त्यों उनकी उत्तेजना बढ़ती जाती थी। अचानक उनके अश्व ने ठोकर खायी। राजन् सुरथ ने झुक कर देखा पंक [9] से सनी हुई एक प्रस्तर प्रतिमा अश्व के पैरों में पड़ी है। वे अश्व की पीठ त्याग कर नीचे उतर आये और प्रतिमा को सीधे खड़ा किया। संभवतः किसी नृत्यांगना की प्रतिमा है।

पंक से सनी हुई यह प्रतिमा राजन् सुरथ को विलक्षण सी लगी। उन्होंने पास के खड्ड में एकत्र जल से प्रतिमा को धोया। पंक का आवरण हटते ही एक अत्यंत भव्य और सुंदर शिल्प निकल आया। इतनी सुंदर प्रतिमा! किस की हो सकती है यह! कहीं यह वही प्रतिमा तो नहीं जिसका उल्लेख शिल्पी प्रतनु ने किया था। लगती तो वही है, यह नृत्यरत प्रतीत होती है किंतु ……….किंतु यह प्रतिमा खण्डित क्यों हैं ? एक प्रश्न प्लावन के जल की भांति उनके मस्त्ष्कि में वलय बनाता हुआ तेजी से घूमने लगा।

– अध्याय 40, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] टिड्डी।

[2] बिल्ली।

[3] गीध।

[4] गीदड़।

[5] बिल्ली।

[6] काई।

[7] मेंढक।

[8] सूक्ष्म जंतु जो ची-ची की ध्वनि करता है।

[9] कीचड़।

मणिपर्यंक (41)

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मणिपर्यंक

चक्रवर्ती सम्राट सुरथ को लगा वे सिंधु की स्तुति नहीं कर रहे, वे तो शिल्पी प्रतनु को अर्घ्य दे रहे हैं जो नृत्यांगना रोमा के साथ सिंधु तट पर बिछे इतिहास के मणिपर्यंक पर सदा-सर्वदा के लिये शैय्यासीन हो गया है।

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने यज्ञकुण्ड में आहुति देकर अपने विशाल नेत्र खोले। आज दीर्घकाल के पश्चात् असुरों के भय से पूर्णतः मुक्त होकर आर्य-जन पुनः प्रातः कालीन अग्निहोत्र में उपस्थित है।

‘तृत्सु,-जन’ के नाम से विख्यात इस जन के साथ-साथ भरत, जह्नु अनु और भृगु जनों के राजन् ऋषिगण एवं प्रजाजन भी उपस्थित हैं। सबके लिये यथेष्ट बलिभाग की व्यवस्था की गयी है। दीर्घकाल के पश्चात् यह सब पुनः देखने को मिला है। यद्यपि आर्य सोम को पुनः प्राप्त नहीं कर सके हैं किंतु आर्य चतुरंगिणी द्वारा चारों दिशाओं में विजय पताका फहराने के कारण आर्यों के मुखमण्डल पर दिव्य आभा विराजमान है।

  – ‘हे राजन्! आपके उद्यम से सम्पूर्ण सप्तसिंधु क्षेत्र में आर्य प्रजा स्थापित हो गयी है। प्रजापति मनु ने प्रजा को संगठित करने का जो कार्य आरंभ किया था उसे हमने आपके नेतृत्व में पूरा किया है। सेना एवं प्रजा को सन्मार्ग पर चलाने वाले राजन्! आपका सैन्य बलशाली एवं ज्ञानवान् है, वह शत्रु को नष्ट करने में समर्थ है। उसके सहयोग से आप ऐश्वर्यवान होकर खूब चमकें।’ [1] ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने राजन् को संबोधित किया।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ! शत्रु पर विजय राजा प्राप्त नहीं करता। जिस राजा का सैन्यबल प्रबल होता है, वह सैन्यबल राजा से सहयोग कर राजा की कीर्ति को प्रदीप्त करता है। अतः इस सफलता का श्रेय आर्यों की प्रबल चतुरंगिणी को जाता है न कि मुझे।’

  – ‘हे राजन्। हमें ऐसे व्यक्ति को अपना राजा बनाना चाहिये जो महान् तेजस्वी, सम्मानित, शत्रुहंता एवं संग्राम में रथ को संभालने में प्रवीण हो। संग्राम में शस्त्रविहीन होने पर शत्रु को वैसे ही पछाड़े जैसे सिंह भैंसों को पछाड़ देता है। आप में ये सब गुण विद्यमान हैं। अतः आप ही इस श्रेय को प्राप्त करने के अधिकारी हैं।’ [2]

  – ‘महात्मन्! मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ।’

  – ‘हे मनुपुत्र! तृत्सु, भरत, जह्नु अनु और भृगु नामक पाँच जनों से निर्मित यह आर्य जनपद आपको चक्रवर्तिन की उपाधि प्रदान करता है। हे आर्य! आज से आपको इस सम्पूर्ण जनपद की रक्षा करनी है। पवित्र नदियों का जल हाथ में लेकर संकल्प लीजिये कि मैं चक्रवर्ती सम्राट बन कर आर्यों की रक्षा उसी प्रकार करूंगा जैसे एक पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है।’ ऋषिश्रेष्ठ ने कुछ जलबिन्दु राजन् के करतल पर रखे।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ आपकी और पंचजन की आज्ञा से मैं आर्यों का चक्रवर्ती सम्राट होना स्वीकार करता हूँ।’

  – ‘हे राजन्। सम्पूर्ण आर्य क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली नदियाँ हमारे लिये पूज्य हैं। अतः  अग्नि पूजन के साथ हमें इन पवित्र सरिताओं की भी स्तुति करनी चाहिये।’

पवित्र सरिताओं का जल करतल में लेकर राजन् सुरथ ने नेत्र बंद कर लिये तथा उच्च स्वर में उच्चारित किया- ‘हे गंगे, यमुने, सरस्वति, शुतुद्रि, परुष्णि! मैं आपकी स्तुति करता हूँ। आप इसे स्वीकार करें। असिक्नी के साथ मरुद्वृधे, वितस्ता, आर्जिकीये तथा सुषोमा इसे सुनें। हे सिंधु ! आप अपने प्रवाह के प्रथम चरण में तृष्टामा, सुसर्तु रसा, श्वेत्या तथा कुभा के साथ गोमती से मिलने तथा मेहत्नु के साथ क्रुमु से मिलने के लिये एक ही रथ में जाती हैं। आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें।[3]

चक्रवर्ती सम्राट सुरथ जिस नदी का नाम उच्चारित करते जाते थे, उस नदी-तट का दृश्य उनके नेत्रों के समक्ष घूम जाता था। आर्यों की विशाल चतुरंगिणी के साथ की गयी नदी तटों की प्रत्येक यात्रा उनके स्मृति-पटल पर उभर आयीं। कितनी-कितनी स्मृतियाँ एक-एक सरिता के साथ जुड़ी हुईं थीं!

ये नदियाँ ही उनके संघर्ष की साक्षी रही हैं। इन नदियों ने ही धरित्री पर जीवन को रचा है। इन्हीं ने मनष्य को संघर्ष करने का बल दिया है। सचमुच ये नदियाँ ही हैं जिनके जल से मनुष्य जन्म लेता है और फिर अंत में उन्हीं में विलीन हो जाता है।

जैसे ही उन्होंने सिंधु का नाम उच्चारित किया, उनके नेत्रों में शिल्पी प्रतनु की छवि प्रकट हुई। उसके साथ ही प्रकट हुआ मेलुह्ह और वह विलक्षण-खण्डित प्रतिमा।

उन्हें लगा वे सिंधु की स्तुति नहीं कर रहे, वे तो शिल्पी प्रतनु को अर्घ्य दे रहे हैं जो नृत्यांगना रोमा के साथ सिंधु तट पर बिछे इतिहास के मणिपर्यंक पर सदा-सर्वदा के लिये शैय्यासीन हो गया है। आर्य सुरथ ने नेत्र खोले, ऋषिश्रेष्ठ अग्नि को पूर्णाहुति अर्पित कर रहे थे- ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते। [4]

– अध्याय 41, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] यत्ते मनुर्यदनीकं सुमित्रः समीधे अग्ने तदिदं नवीयः । स रेवच्छोच स गिरो जुषस्व स वाजेदर्षि स इह श्रवो धाः।। (ऋ. 10. 69. 3)

[2] असमातिं नितोशनं त्वेषं निययिनं रथम्। भजे रथस्य सत्यतिम्।। यो जनान्महिषाँ इवातितस्थौ पवीरवान्। उतापवीरवान्युधा।। (ऋ. 10. 61. 2- 3)

[3] इमं मे गंगे यमुने सरस्वति शुतद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या। असिक्न्या मरुद्वृधेविस्तयाऽऽर्जीकीये शृणुह्या सुषोमया। तृष्टामया प्रथमंयातत्रे सजूःसुसर्त्वा रसया श्वेत्या त्या। त्वं सिंधो कुभया गामतीं क्रुभुं मेहल्वा सरथं याभिरीयसे। (ऋ. 10. 75.  5-6)।

[4] वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण निकलता है किंतु इस पूर्ण के उस पूर्ण में से निकलने के पश्चात् भी जो कुछशेष बचता है वह भी पूर्ण ही है ( बृहदारण्यक प्प् . 3 . 19 )।

प्रस्तावना – चित्रकूट का चातक

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प्रस्तावना - चित्रकूट का चातक
प्रस्तावना - चित्रकूट का चातक

प्रस्तावना – चित्रकूट का चातक पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट चातक की पृष्ठभूमि स्पष्ट की गई है।

अब्दुर्रहीम खानखाना की पहचान आज के भारत में एक ‘संत-कवि’ की है। इसीलिये हिन्दू उन्हें रहीमदासजी कहते हैं। विगत चार सौ वर्षों से वे करोड़ों हिन्दी भाषी भारतीयों के लिये श्रद्धा के पात्र हैं। वे दर्शन और नीति के प्रकाण्ड पण्डित माने जाते हैं।

यद्यपि उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, फारसी और डिंगल आदि भाषाओं में उस युग की प्रचलित पद्धतियों में सब तरह के काव्य की रचना की है किंतु उनकी विलक्षण प्रतिभा उनके दोहों में देखने को मिलती है। उनके दोहे आम भारतीय के मन में नैतिकता और उत्साह भरने का काम करते हैं तथा जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

अब्दुर्रहीम खानखाना का उल्लेख कहीं-कहीं अपने समय के महान दानवीर पुरुष के रूप में, कहीं-कहीं अकबर के सेनापति के रूप में तथा कहीं-कहीं गोस्वामी तुलसीदासजी के मित्र के रूप में भी होता है किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि आज जिस रहीम को केवल कवि के रूप में पहचाना जा रहा है, उसका अतीत किसी और रूप में भी अपनी स्वर्णिम पहचान रखता है।

रहीम का यह अतीत इतिहास के पन्नों में उसी तरह दब कर रह गया है जैसे राख की ढेरी में रक्त-तप्त अंगारा दब जाता है। वह दिखाई तो नहीं देता किंतु उसमें आँच बनी रहती है।

चार सौ साल की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद यदि आज इतिहास के पन्नों को टटोल कर देखें तो उनमें रहीम चमकीले हीरे की तरह अलग से दिखाई देता है। एक ऐसा हीरा जो अपनी ही आभा से जगमग करता है, एक ऐसा हीरा जिसने खुद अपने आप को तराश कर चमकने योग्य बनाया है, एक ऐसा हीरा जिसका सही मोल आज तक न तो इतिहासकार लगा पाये और न हिन्दी साहित्य के समालोचक।

संभवतः इसलिये कि उस युग में एक सिपाही का कवि हो जाना कितनी बड़ी बात थी इसका अनुमान लगा पाना आज की परिस्थितियों में संभव नहीं है। कारण कुछ भी हो सकते हैं किंतु यह सत्य है कि रहीम के लिये उनकी अपनी ही वाणी कितनी सच हुई- ‘रहिमन हीरा कब कहै लाख हमारो मोल!’

आज कितने लोग यह जानते हैं कि जिस मुगलिया सल्तनत के किस्सों से भारतीय इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं, भारत में उस मुगलिया सल्तनत का भवन अब्दुर्रहीम खानखाना के पिता खानखाना बैरामखाँ और स्वयं अब्दुर्रहीम ने खड़ा किया था। आज कितने लोग जानते हैं कि अब्दुर्रहीम खानखाना ने अपनी ‘करुण कोमल कवियोचित वाणी’ के बल पर कठोर मुगल शासकों के हृदयों में सुकोमल मानवीय भावों को जगाने का प्रयास किया!

जिससे निरंकुश मुगलिया शासन के बोझ तले सिसकती हुई त्रस्त हिन्दू जनता को मुस्लिम शासकों के अत्याचारों से राहत मिली! इसका प्रमाण यह है कि अकबर, जहाँगीर और फिर शाहजहाँ रहीम के प्रत्यक्ष सम्पर्क में रहे। इन शासकों के काल में हिन्दुओं पर उतने अत्याचार नहीं हुए जितने कि उनसे पूर्ववर्ती बाबर तथा पश्चवर्ती औरंगजेब के शासन काल में हुए।

इस बात पर विवाद हो सकता है कि रहीम द्वारा पहुँचायी गयी राहत कितनी थी किंतु यह जितनी भी थी, थी तो सही! रेगिस्तान में खड़ी एक हरी झाड़ी ही समस्त जीवों का ध्यान खींचती है। वह विषमतम परिस्थितियों के बीच जीवन की उपस्थिति की घोषणा तो करती ही है!

फिर रहीम तो स्वयं अपने आप में एक पूरा का पूरा उद्यान थे जिसमें बैठकर कुछ दिन ही सही, हिन्दू जाति ने प्रेम की मीठी बयार का अनुभव तो किया! रहीम के दोहों ने लाखों हिन्दुओं को अपनी दुरावस्था पर सोचने और जीवन को सही दिशा में ले जाने के लिये प्रेरित किया। यहाँ तक कि हिन्दुओं के सूर्य कहे जाने वाले मेवाड़ी महाराणाओं को भी उन्होंने कर्तव्य पथ दिखाया। भले ही इसके बदले में रहीमदासजी को मुगल बादशाहों के कोप का भाजन बनना पड़ा।

सत्य के लिये सर्वस्व का त्याग करने वाले और उसकी कीमत अपने पुत्रों और पौत्रों के मस्तकों से चुकाने वाले इस इतिहास पुरुष का चरित्र तो पठन-पाठन के योग्य है ही, साथ ही उनके पिता बैरामखाँ का विपरीत जीवन चरित्र भी सुधि पाठकों के लिये पठनीय और मननीय हो सकता है जो उस काल की परिस्थितियों और परम्पराओं की जीती जागती कहानी कहता है।

यहाँ यह विचार करने योग्य है कि जहाँ  बैरामखाँ अपने समय में हिन्दुओं का सबसे बड़ा शत्रु था वहीं उसका पुत्र रहीम हिन्दू जाति का रक्षक बना और चार सौ साल बीत जाने पर भी हिन्दू जाति की श्रद्धा का पात्र बना हुआ है।

इस उपन्यास की कथा इन्हीं पिता-पुत्र के चारों ओर घूमती है। इन दोनों के चरित्र में पर्याप्त अंतर है। जहाँ बैरामखाँ अपने स्वामी के लिये बिना अच्छे-बुरे का विचार किये निर्दोष प्रजा को विधर्मी मानकर अत्याचार पर अत्याचार करता चला जाता है, शत्रु राजाओं की हत्या करता चला जाता है, वहीं अब्दुर्रहीम मुगल बादशाहों का खानखाना होते हुए भी अपनी स्वतंत्र चेता बुद्धि से शुचि और अशुचि का पर्याप्त विचार करता है।

अकबर के समस्त शत्रुओं के विरुद्ध अभियानों में भी वह शत्रु-अशत्रु में भेद करता है। अकबर के जिन शत्रुओं को रहीम गलत नहीं मानता, उनके विरुद्ध वह अपने मन में दया का भाव रखता है। इस अंतर का परिणाम इन्हीं दोनों के जीवन में देखा जा सकता है। जहाँ रहीम के प्राणों की रक्षा उसके शत्रु भी अपने प्राण देकर करते हैं, वहीं दूसरी ओर बैरामखाँ के मित्र भी बैरामखाँ के प्राण लेने के लिये उद्धत रहते हैं। इन पिता पुत्र के जीवन चरित्र को देखकर एक उक्ति का स्मरण होता है-

भले बुरेन के होत हैं, बदल जात हैं बंस।

हिरनाकुस के हरिभजन उग्रसेन के कंस।।

बैरामखाँ अंत तक विदेशी बना रहता है जबकि उसका पुत्र रहीम पूरी तरह भारतीयता के रंग में रंग जाता है। यही कारण है कि अपने ऊपर विपत्ति आने पर बैरामखाँ मक्का के लिये प्रस्थान करता है तो दूसरी ओर अब्दुर्रहीम विपत्ति आने पर चित्रकूट में प्रवास करता है। संभवतः इसीलिये भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र ने रहीमदासजी और उनके जैसे मुस्लिम भक्तों की सेवाओं का मूल्यांकन इन शब्दों में किया-

”इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन्ह हिन्दू वारिये।”

 रहीमदासजी से मेरा परिचय मेरे पिताजी ने करवाया था जब मैं केवल पांच-छः वर्ष का बालक ही था। तभी से रहीमदास मेरे मन के आंगन में श्रद्धा के पीपल बन कर खड़े हैं। इस हिसाब से मैं विगत पैंतीस वर्षों से रहीमदासजी के साथ जिया हूँ। जबकि बैरामखाँ से मेरा परिचय इतिहास की पुस्तकों ने करवाया है।

मेरा मन रहीमदासजी को लिखने में जितना रमा है, वैसी अनुभूति बैरामखाँ को लिखते समय नहीं हुई फिर भी बैरामखाँ इतिहास का ऐसा पात्र है जो परस्पर विपरीत चारित्रिक गुण-दोषों की मौजूदगी के कारण स्वयं मुखरित है।

भारतीय इतिहास में रहीम रूपी अमूल्य हीरा किस खान से प्रकट हुआ? और कब यह ‘मुसलमान हरिजन’ शताब्दियों की सीमायें लांघकर कोटि-कोटि भारतवासियों की श्रद्धा का पात्र बन गया? यह उपन्यास इन्हीं प्रश्नों का जवाब ढूंढने की चेष्टा है।

रहीम रूपी हीरे की वास्तविक खान की खोज करते हुए हमें मध्य एशिया के इतिहास में तो प्रवेश करना ही पड़ता है, साथ ही प्राचीन पश्चिमोत्तर चीन में बसने वाली हूण और यू-ची जातियों के इतिहास में भी झांकना पड़ता है। इतना ही नहीं घनघोर आश्चर्य तो तब होता है जब हम इतिहास की गहराई में पर्याप्त उतर चुकने के बाद स्वयं को भारत के पौराणिक खजाने में खड़ा पाते हैं।

यही कारण है कि एक ओर तो उपन्यास के आरंभ में राजा ययाति के आख्यान को स्थान मिला है तो दूसरी ओर मध्य एशियाई आक्रांता- चंगेजखाँ और तैमूरलंग भी मौजूद हैं। ताकि पाठक उस घनघोर अंधेरे से भी भली भांति परिचित हो सकें जिसे चीर कर रहीम रूपी दिव्य नक्षत्र उदित हुआ था।

ऐतिहासिक उपन्यास के लेखन में जैसी दुविधा हुआ करती है, उसका सामना मुझे भी करना पड़ा है। यद्यपि मैंने कथा के प्रवाह में औपन्यासिकता और ऐतिहासिकता दोनों की सुगंध को बचाये रखने का प्रयास किया है फिर भी यदि किसी प्रसंग में दोनों में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता अनुभव हुई है तो वहाँ मैंने औपन्यासिक चमत्कारिता का अवलम्बन त्याग कर इतिहास के मूल तथ्यों को बचाया है। मेरे इसी आग्रह के कारण इतिहास ने स्वयं आगे बढ़कर उपन्यास की रक्षा की है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो इतिहास और उपन्यास एक दूसरे का अनुपूरक बन गये हैं।

उस युग के सामाजिक एवं अध्यात्मिक वातावरण को उपन्यास में यथाशक्ति उकेरने का प्रयास किया गया है। इस कारण मीरां बाई, गोस्वामी तुलसीदास, रामदास, भक्त सूरदास, कुंभनदास आदि संतों के उन प्रसंगों को भी उपन्यास में स्थान मिला है जो बैरामखाँ तथा अब्दुर्रहीम के काल से सम्बंध रखते हैं तथा उस युग की वास्तविक तस्वीर प्रदर्शित करते हैं।

मेरे पिता श्री गिरिराज प्रसादजी गुप्ता ने इस उपन्यास के विषय में मुझे पग-पग पर अत्यंत बहुमूल्य परामर्श देकर मेरा बहुत हित साधा है, उनके प्रति विपुल कृतज्ञता अर्पित करता हूँ। मुझे लगता है कि जैसे यह उपन्यास उन्हीं की परिकल्पना थी जिसका बीज उन्होंने मेरे मन में मेरी पाँच वर्ष की आयु में बोया था, वही बीज सुपल्लवित और सुपोषित होकर उपन्यास के रूप में पुष्पित हो गया है।

मैंने लेखकीय धर्म का निर्वहन बिना किसी पूर्वाग्रह के किया है किंतु वास्तविक निर्णय तो सुधि पाठक ही करेंगे कि मैं इस कार्य में कितना सफल रहा! पाठकों से अपेक्षा रहेगी कि वे इस बात का निर्णय चार सौ वर्ष पुरानी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करेंगे। सुधि पाठक इस उपन्यास का आनंद उठायेंगे और उपन्यास में रह गयी कमियों के लिये मुझे क्षमा करेंगे, ऐसी आशा है।

(प्रस्तावना – चित्रकूट का चातक, ऐतिहासिक उपन्यास, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित )

इंसानी खून का रंग (1)

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इंसानी खून का रंग

इस उपन्यास की कहानी हमें बताती है कि इंसानी खून का रंग किस तरह मानव को मानवता का दुश्मन बनाकर उसे दानवता की ओर ले जाता है।

संसार में इंसानी खून का रंग हर जगह लाल है किंतु उसकी ताकत हर जगह अलग है। जब इंसानी खून की ताकत जोर मारती है तो इंसान, इंसान नहीं रहता, हैवान बन जाता है। वह दूसरों का सर्वस्व छीनने और मौत का नंगा नाच देखने के लिये उतावला हो जाता है। छटपटाती हुई लाशें उसे खिलौनों के समान सुख देती हैं।

मौत का करुण क्रंदन उसे मधुर संगीत जैसा लगता है और बहता हुआ इंसानी खून उसे आनंद की बहती हुई नदी के समान दिखाई देता है। यही कारण है कि संसार में अब तक करोड़ों बेगुनाह इंसानों का खून इंसानी हैवानियत के हाथों बह चुका है और उसका बहना आज भी जारी है।

यह कहानी इंसानी खून के हैवानियत भरे कारनामों के बोझ तले सिसकते इतिहास के पन्नों से आरंभ होती है।

इस उपन्यास की कहानी हमें बताती है कि इंसानी खून का रंग किस तरह मानव को मानवता का दुश्मन बनाकर उसे दानवता की ओर ले जाता है। इस उपन्यास के किरदार काल्पनिक कहानियों के किरदार नहीं हैं अपितु भारत के इतिहास के सबसे क्रूर किरदार हैं जिन्होंने भारत भूमि को अपनी तलवार के जोर पर सैंकड़ों साल तक आंसू बहाने पर मजबूर कर दिया।

-अध्याय 1, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

चन्द्रवंशी राजा ययाति (2)

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चन्द्रवंशी राजा ययाति को श्राप

हिन्दुओं में मान्यता है कि चन्द्रवंशी राजा ययाति के बेटे ‘तुरू’ के वंशज आगे चलकर ‘तुर्क’ कहलाये। कई पुराणों में राजा ययाति की कथा मिलती है। इस कथा का सर्वप्रथम उल्लेख महाभारत में हुआ है जिसके अनुसार राजा ययाति के दो विवाह हुए। पहला विवाह दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से और दूसरा विवाह असुरराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से हुआ था।

देवयानी परम कलहकारिणी और दुष्ट स्वभाव की स्त्री थी। सौतिया डाह के कारण देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से राजा की शिकायत की। शुक्राचार्य ने कुपित होकर राजा ययाति को भयंकर शाप दिया जिससे राजा का यौवन नष्ट हो गया। इंसानी खून ने जोर मारा। वह असमय ही बूढ़ा नहीं होना चाहता था। अभी वह भोग विलास से तृप्त नहीं हुआ था।

शापग्रस्त राजा अपने महल में लौट कर आया। उसके बाल सफेद हो गये थे और चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयीं थीं। यह अयाचित, अनपेक्षित और आकस्मिक विपत्ति थी। उसने देवयानी के बड़े पुत्र यदु को अपने पास बुलाया और अपने शाप की पूरी कहानी बताकर कहा- ‘देखो! मैं शाप के कारण बूढ़ा हो गया हूँ किन्तु अभी भोग विलास की मेरी लालसा मिटी नहीं है। तुम मेरे बेटे हो। मेरी इच्छा को पूरा करना तुम्हारा धर्म है। मेरा बुढ़ापा तुम ले लो और अपना यौवन मुझे दे दो। जब भोग विलास से मेरा मन भर जायेगा तो मैं तुम्हारा यौवन तुम्हें लौटा दूंगा।’

यदु ने पिता का तिरस्कार करते हुए कहा- ‘पिताजी! बुढ़ापा किसी भी तरह से अच्छा नहीं हैं। सुंदर स्त्रियाँ बूढ़े आदमी का तिरस्कार करती हैं इसलिये मैं आपका बुढ़ापा नहीं ले सकता।’

राजा कुपित हो गया। उसने कहा- ‘तू मेरे हृदय से उत्पन्न हुआ है फिर भी अपना यौवन मुझे नहीं देता! मैं तुझे और तेरी संतान को राज्य के अधिकार से वंचित करता हूँ।’

यदु से निराश होकर राजा ने देवयानी के दूसरे पुत्र तुर्वसु को बुलाया। तुर्वसु ने भी पिता की बात मानने से मना कर दिया। राजा फिर कुपित हुआ। उसने तुर्वसु को शाप दिया- ‘पिता का तिरस्कार करने वाले दुष्ट! जा! तू मांस भोजी, दुराचारी और वर्णसंकर म्लेच्छ हो जा।’

देवयानी के पुत्रों के बाद शर्मिष्ठा के पुत्रों की बारी आई। शर्मिष्ठा के दोनों बड़े पुत्रों द्रह्यु और अनु ने भी पिता को अपना यौवन देने से मना कर दिया। राजा ने उन्हें भी भयानक शाप दिये। शर्मिष्ठा के तीसरे पुत्र पुरू ने पिता की इच्छा जानकर कहा-‘पिताजी आप मेरा यौवन ले लें।’

राजा प्रसन्न हुआ। उसने पुरू का यौवन लेकर उसे अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। राजा के शेष पुत्र राजा को त्याग कर चले गये।

 कहते हैं राजा ययाति के शाप से तुर्वसु की संतानें यवन हुईं। उसके वंशज धरती पर दूर-दूर तक फैल गये जो तुर्कों के नाम से जाने गये। ययाति के पुत्र अनु से म्लेच्छ उत्पन्न हुए। अनुमान है कि ‘अनु’ के वंशज इतिहास में ‘हूंग-नू’ अथवा हूण कहलाये।

-अध्याय 2, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

लाओ शंग (3)

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लाओ शंग - www.bharatkaitihas.com
लाओ शंग का काल्पनिक चित्र

लाओ शंग ने यू-ची राजा को मार डाला तथा उसकी खोपड़ी निकलवाकर अपने महल में ले गया। उसके बाद लाओ-शंग ने जीवन भर उसी खोपड़ी में पानी पिया।

चीन के उत्तर में मंगोलिया का विशाल रेगिस्तान है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में इस क्षेत्र में कई बर्बर जातियाँ निवास करती थीं। इन बर्बर जातियों का प्रसार पश्चिमी भाग में फैली सीक्यांग पर्वतमाला तक था। मंगोलिया के गोबी प्रदेश में यू-ची नामक एक प्राचीन जाति निवास करती थी। इसके पड़ौस में अत्यंत बर्बर और भयानक लड़ाका जाति रहती थी जिन्हें हूण कहा जाता था।

पश्चिमी इतिहासकारों की मान्यता है कि तुर्कों के पूर्वज यही हूण थे जिनका मूल नाम ‘हूंग-नू’ था। मूल रूप से यह एक चीनी जाति थी। ये लोग देखने में तो लम्बे, चौड़े, गोरे और सुंदर चेहरे वाले थे किंतु स्वभाव से अत्यंत बर्बर, आक्रमणकारी और हिंसक प्रवृत्ति वाले थे। इनकी खूनी ताकत का मुकाबला संसार की कोई दूसरी जाति नहीं कर सकती थी।

चीन की भौगोलिक बनावट उसे दो भागों में बांटती है- मुख्य प्रदेश तथा बाहरी प्रदेश। जहाँ चीन के मुख्य प्रदेश में सभ्यता का तेजी से विकास हुआ और उसने विश्व को सर्वप्रथम कागज, छापाखाना, पहिए वाली गाड़ी, बारूद, क्रॉस बो, दिशा सूचक यंत्र और चीनी मिट्टी के बर्तन दिये वहीं चीन के बाहरी इलाकों में रहने वाली बर्बर जातियाँ कई सौ सालों तक असभ्य बनी रहीं।

ईसा से चार सौ साल पहले भीतरी चीन में चओ राजवंश अपने चरम पर था और अगले सौ साल में उसका सामंती शासन पूरी तरह समाप्त हो गया। इसके बाद चीन के एकीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हान राजवंश के नेतृत्व में चीन के एकीकरण का काम पूरा हो गया और चीन सभ्यता के नवीन विकास की ओर बढ़ गया।

यह सब भारत से गये बौद्ध धर्म के कारण संभव हुआ लेकिन बाहरी चीन इन सब प्रभावों और परिवर्तनों से भी बिल्कुल अछूता रहा जिसके कारण हूण जाति नितांत असभ्य और बर्बर बनी रही। संभवतः राजा ययाति के शाप के कारण वे अब तक मलिन और हिंसक बने हुए थे।

ई. पू. 174 से ई.पू. 160 तक लाओ शंग हूणों का राजा हुआ। वह बर्बरता की जीती जागती मिसाल था। एक बार उसने यू-ची जाति पर आक्रमण कर दिया। यू-ची लोगों ने हूणों का सामना किया किंतु शीघ्र ही यूचियों के पैर उखड़ गये। लाओ शंग ने यू-ची राजा को मार डाला तथा उसकी खोपड़ी निकलवाकर अपने महल में ले गया। उसके बाद लाओ-शंग ने जीवन भर उसी खोपड़ी में पानी पिया।

-अध्याय 3, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

बगदाद के खलीफा (4)

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बगदाद के खलीफा

तुर्की गुलामों द्वारा खलीफाओं के तख्त उलट दिए गए तथा तुर्की गुलाम स्वयं बगदाद के खलीफा बन गए। इस्लाम के इतिहास में बगदाद के खलीफा बड़े प्रसिद्ध हुए।

यू-ची गोबी प्रदेश छोड़कर नान-शान प्रदेश में चले गये किंतु यहाँ भी हूणों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। 140 ई.पू. में हूणों की वू-सुन शाखा के राजकुमार ने नान-शान प्रदेश पर आक्रमण कर दिया। यू-ची एक बार पुनः परास्त होकर ता-हिया (बैक्ट्रिया) की ओर भाग गये।

हूणों ने जब एक बार पश्चिम की ओर सरकना आरंभ किया तो वे सरकते ही चले गये। जब वे ईरान पहुँचे तो उनमें ईरानियों का खून भी शामिल हो गया किंतु उनके खून की मूल तासीर बची रही। उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं आया। हूंग-नू जाति में उत्पन्न हुए ‘तुरू’ अथवा ‘तुर्क’ नाम के आदमी से इनकी एक शाखा तुर्कों के नाम से विख्यात हुई

जब अरब के मुसलमानों ने मध्य ऐशियाई देशों पर आक्रमण किया तो तुर्कों ने अरबों का भारी विरोध किया किंतु अरबवाले मध्य एशिया पर अधिकार जमाने में सफल हो गये। उनके प्रभाव से आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में तुर्कों ने भी मुसलमान होना आरंभ कर दिया।

तुर्कों के मुसलमान हो जाने के बाद दुनिया में इस्लाम का प्रसार बहुत तेजी से हुआ। तुर्कों की खूनी ताकत को देखते हुए अरब के खलीफाओं ने उन्हें अपना अंगरक्षक नियुक्त किया। नौवीं-दसवीं शताब्दी में ये तुर्क इतने ताकतवर हो गये कि बगदाद और बुखारा में इन्होंने अपने स्वामियों के तखते पलट दिये और उनके स्थान पर स्वयं खलीफा बन गये।

इन नये खलीफाओं ने 1453 ईस्वी में कुस्तुन्तुनिया पर अधिकार जमा लिया जो उन दिनों व्यापार का बड़ा केन्द्र था। इससे यूरोप वालों के लिये पूर्व का स्थल मार्ग बन्द हो गया और यूरोप वालों को नये जल मार्गों की खोज करनी पड़ी। वास्कोडिगामा और कोलम्बस की खोजें उसी अभियान के परिणाम हैं।

कहा जाता है कि अरबवासी इस्लाम को मक्का और मदीना से कार्डोवा तक लाये, ईरानियों ने उसे बगदाद तक पहुँचाया और तुर्क उसे बगदाद से दिल्ली ले आये। इस प्रकार अरब के मुसलमानों ने जो काम आरम्भ किया उसे तुर्कों ने पूरा किया।

-अध्याय 4, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

भारत पर मुस्लिम आक्रमण (5)

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भारत पर मुस्लिम आक्रमण

भारत पर मुस्लिम आक्रमण ऐसे समय में हुए जब भारत का वैभव अपने चरम पर था किंतु भारत भूमि छोटे-छोटे राज्यों में बंटी हुई थी।

ई. 712 में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया। वह पहला मुस्लिम आक्रांता था जिसने भारत की भूमि पर पैर रखा था। उसने सिंध के राजा दाहिर सेन को मार डाला तथा राज परिवार के सदस्यों की नृशंस हत्याएं कीं। हिन्दू प्रजा पर उसने ऐसे-ऐसे अत्याचार किये कि हूणों की याद एक बार फिर से ताजा हो उठी किंतु इस बार हिंदुओं के पास समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त, कुमार गुप्त तथा स्कंदगुप्त जैसे प्रबल प्रतापी सम्राट नहीं थे जो इस अत्याचारी का मार्ग रोक सकते।

हजारों स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ और वे जीवित ही आग में झौंक दी गयीं। बच्चों को लोहे की जंजीरों से बांध कर गुलाम बनाया गया। पुरुषों को तड़पा-तड़पा कर मारा गया। जाने कितने ही लोग हाथियों के पैरों तले कुचल दिये गये। कितनों को अधमरा करके नदियों में फैंक दिया गया।

अधमरे मनुष्यों एवं शवों को खाने के लिये गिद्धों के झुण्ड सिंध की पावन धरा पर मण्डराने लगे। विपुल मात्रा में मांस की गंध पाकर जंगलों से गीदड़ और भेड़िये निकल आये। कुत्ते भी मनुष्यों से अपनी स्वाभाविक मित्रता भूलकर भरी दोपहरी में जीवित मनुष्यों का मांस नोचने लगे। चूहे-बिल्ली तक नरभक्षी हो गये।

सिंध को पैरों तले रौंदकर वह खूनी दरिंदा वन्य पशुओं की तरह डकराता हुआ फिर से अपनी जन्म भूमि को लौट गया। वह अपने साथ अपार सोना, चांदी, हाथी, घोड़े, गुलाम, बच्चे और औरतें ले गया।

मुहम्मद बिन कासिम का बचा हुआ काम पूरा करने का बीड़ा महमूद गजनवी ने उठाया। वह गजनी का रहने वाला था। 1000 ईस्वी से 1027 ईस्वी तक उसने भारत पर सत्रह आक्रमण किये। उसने जब भारत पर पहला आक्रमण किया तो पंजाब के प्रबल प्रतापी महाराजा जयपाल ने विशाल सेना लेकर उसका रास्ता रोका।

दुर्दांत गजनवी ने महाराजा जयपाल को युद्ध के मैदान में जीवित ही पकड़ लिया और उनकी बड़ी दुर्गति की। महाराजा के गले में पड़ा मोतियों का हार खींचते हुए गजनवी ने कहा- ‘गुलामों और काफिरों को मोती नहीं पहनना चाहिये।’ महाराजा के सामने ही राज-महिषियों की दुर्गति की गयी। बहुत सी राजकन्याओं ने आग में कूद कर प्राण तज दिये। ये भीषण दृष्य देखकर महाराजा जयपाल को इतनी ग्लानि हुई कि वे जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर गये।

गजनवी ने अपने आक्रमणों में कई लाख हिन्दुओं की हत्या की। भारत से अपार धन लूटा। लोगों को गुलाम बनाया और उस काल में सर्वप्रसिद्ध सोमनाथ का मंदिर तोड़ा। मथुरा को नष्ट कर दिया। नगरकोट के प्रसिद्ध मंदिर को लूटा। यद्यपि इतिहास में सोमनाथ आक्रमण को ही अधिक स्थान मिला है किंतु नगरकोट देवी के मंदिर की लूट इतनी बड़ी थी कि इस मंदिर से मिले धन को उठा कर ले जाने के लिये गजनवी के हजारों ऊँट भी कम पड़ गये। इतना सब करने के बाद भी गजनवी पूरी तरह से भारत में इस्लाम न फैला सका।

महमूद गजनवी का बचा हुआ कार्य मुहम्मद गौरी ने अपने हाथ में लिया। वह गौर देश का रहने वाला था। 1178 ईस्वी से 1206 ईस्वी तक उसने भारत पर पच्चीस आक्रमण किये। दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान को हराकर उसने भारत में मुस्लिम राज्य की नींव रखी।

मुहम्मद गौरी ने भारतवर्ष की अपार सम्पत्ति को हड़प लिया जिससे देश की जनता एक साथ ही व्यापक स्तर पर निर्धन हो गयी। मुहम्मद गौरी के गुलामों और सैनिकों ने पूरे देश में भय और आतंक का वातावरण बना दिया। हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया। हजारों-लाखों ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिये गये।

स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया। मंदिर एवं पाठशालायें ध्वस्त करके मस्जिदों में परिवर्तित कर दी गयीं। दिल्ली का विष्णुमंदिर जामा मस्जिद में बदल दिया गया। धार, वाराणसी उज्जैन, मथुरा, अजयमेरू, जाल्हुर की संस्कृत पाठशालायें ध्वस्त करके रातों रात मस्जिदें खड़ी कर दी गयीं।

अयोध्या, नगरकोट और हरिद्वार जैसे तीर्थ जला कर राख कर दिये गये। बौद्ध धर्म तो हूणों के हाथों पहले ही पराभव को प्राप्त हो चुका था किंतु इस बार हिन्दू धर्म का ऐसा पराभव देखकर जैन साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल, श्रीलंका तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गये। पूरे देश में हाहाकार मच गया।

भारतवर्ष पर वो कहर ढाया गया कि भारत के इतिहास की धारा ही कुण्ठित हो गयी। हिन्दू क्षत्रियों का समस्त गौरव नष्ट हो गया। स्थान-स्थान पर मुस्लिम गवर्नर नियुक्त हो गये। भारत भूमि की हजारों वर्षों से चली आ रही स्वतंत्रता समाप्त हो गयी।

-अध्याय 5, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

रक्त और मांस का पिण्ड (6)

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रक्त और मांस का पिण्ड

दिलम बोल्डक के तुर्क बादशाह ने रक्त और मांस का पिण्ड लेकर पैदा होने वाले इस इस अजीब शैतानी बालक का नाम रखा- चंगेजखाँ।

1155 ईस्वी की एक सुबह। ओमन नदी का शांत जल प्रतिदिन की भांति अपनी मंथर गति से प्रवाहित हो रहा था। उसके निर्मल जल में सहस्रों रूपहली मछलियाँ और जलमुर्गियाँ अठखेलियां कर रही थीं। कोटि-कोटि सूर्य-रश्मियां जब ओमन नदी के जल को स्पर्श करतीं तो नदी का जल चमक उठता।

नदी के तट पर उग आई घास के फूलों पर मण्डराने वाली रंग-बिरंगी तितलियाँ नदी के जल में अपनी बड़ी-बड़ी मूंछों को भिगोतीं और उन पर लगा मकरंद साफ करतीं। नदी तट पर खड़े विशाल वृक्षों पर बैठे पक्षियों के झुण्ड भी तितलियों का अनुकरण करते और आकाश में लम्बी सी उड़ान भरकर नदी के जल में चोंच डुबों कर फिर से अपने वृक्षों पर आ बैठते।

जब हरिणों के झुण्ड पानी पीने के लिये नदी तट तक आते तो चंचल तितलियाँ और नटखट पक्षी उनकी पीठों पर सवारी गांठते तथा दूर तक उनके साथ जाकर पुनः अपने स्थान पर लौट आते। शैतान लंगूर भी उनका साथ देने में पीछे नहीं रहते।

जब कभी कोई खूंखार पशु जंगल से निकल कर नदी के तट तक आता तो तितलियाँ सहम जातीं। पक्षियों की कतारें घनघोर शब्द करके उड़ जातीं तथा बंदर वृक्षों की सबसे ऊँची शाखाओं पर जा बैठते। घबराहट भरे उन क्षणों में शिशु पक्षी घबरा कर पंख फड़फड़ाते और अपनी माताओं के लौटने तक चीखते चिल्लाते रहते।

ओमन नदी के तट पर इस तरह की प्रातः न जाने कितने लाख वर्षों से इसी प्रकार होती आयी थी और प्रकृति का यह व्यापार भी न जाने कब से इसी प्रकार चला आता था। आज की सुबह भी अपने नियमित क्रम के अनुसार ही हुई थी किंतु जैसे ही सूर्यदेव प्राची से निकल कर आग्नेय दिशा में स्थित हुए, ठीक उसी समय ओमन के तट पर बसे दिलम बोल्डक शहर के दुर्ग की दीवारें एक गगनभेदी चीख से थर्रा गयीं।

जब यह चीख ओमन नदी के तटों पर पहुँची तो तितलियाँ घबराकर फूलों का आश्रय छोड़ भाग खड़ी हुईं। पेड़ों से पक्षियों की कतारें भयातुर होकर चीत्कार करती हुई आकाश में बहुत ऊँचाई तक उड़ गयीं। वानर समुदाय अपनी शैतानियाँ छोड़कर पेड़ों की सबसे ऊँची शाखाओं पर जा बैठा। ओमन के जल में अठखेलियां करने वाली मछलियाँ तक घबरा कर नदी के तल में जा छिपीं।

जाने यह किस दुर्दांत पशु की चीख थी! ऐसी चीख न तो ओमन के तटों पर और न दिलम बोल्डक दुर्ग के भीतर इससे पहले कभी सुनाई दी थी। भयानक चीख के थोड़ी ही देर बाद दिलम बोल्डक दुर्ग का द्वार खुला और कुछ दासियाँ चीखती हुई बाहर निकलीं। वे सब चिल्लाती जा रही थीं कि बेगम की कोख से शैतान का जन्म हुआ है। थोड़ी ही देर में दुर्ग के मुख्य द्वार पर शहरवासियों की भीड़ जमा हो गयी। भीड़ जानना चाहती थी कि आखिर माजरा क्या है?

अपने प्रश्न के जवाब में जो कुछ भी उन्होंने सुना, उससे उनकी रूह कांप गयी। क्या वाकई बेगम के पेट से किसी शैतान का जन्म हुआ था? जो कुछ उन्हें बताया गया था, उसके अनुसार तो ऐसा ही हुआ था। बेगम के पेट से जन्म लेने वाले बालक ने अपनी आंखें खोलने से पहले भयंकर चीत्कार किया था जिससे दुर्ग की मोटी दीवारें तक थर्रा उठी थीं। इतना ही नहीं जब दासियों ने उस बालक की बंद मुट्ठियों को खोला तो वे भय के मार कांप उठीं। बालक की चौड़ी हथेलियों में घने बाल थे और उनमें खून तथा मांस के लोथड़े भरे हुए थे।

दिलम बोल्डक के तुर्क बादशाह ने रक्त और मांस का पिण्ड लेकर पैदा होने वाले इस इस अजीब शैतानी बालक का नाम रखा- चंगेजखाँ। तुर्कों की यह शाखा तुर्क की छठी पीढ़ी में पैदा होने वाले मुगलखाँ नामके अमीर से चली थी जिसके नाम पर तुर्कों की यह शाखा ‘मुगल’ कहलाती थी। चूंकि ये लोग मंगोलिया से चलकर दिलम बोल्डक आये थे इस कारण उन्हें ‘मंगोल’ भी कहा जाता था।

उस समय तक तुर्कों की अधिकांश शाखाओं ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था किंतु यह शाखा इस्लाम की कट्टर शत्रु बनी हुई थी। तुर्कों की सारी शाखाओं में कुल मिलाकर जितनी खूनी ताकत थी, उस ताकत का आधे से अधिक हिस्सा कुदरत ने इस अकेली मुगल शाखा के नाम लिख दिया था। इस कारण मंगोलों में एक से बढ़कर एक अत्याचारी पैदा हुआ। चंगेजखाँ उसी की चरम परिणति थी।

चंगेजखाँ कहने को तो इंसानी बालक ही था किंतु वास्तव में वह खूनी ताकत का एक अजीब करिश्मा था। वह अपनी भाग्य-रेखाओं पर खून और मांस रखकर पैदा हुआ था इसलिये वह जीवन भर एक खूनी दरिंदा बना रहा।

चंगेजखाँ पहला मुगल था जिसने मंगोलों को संगठित करके एक विशाल सेना खड़ी की और उसके बल पर लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा। उसने नदियों में इतना रक्त बहाया कि ओमन ही नहीं, उसके मार्ग में आने वाली समस्त नदियों में बहने वाले जल का रंग लाल हो गया था। पूरा मध्य एशिया उसके नाम से थर्राता था।

उसके क्रूर कारनामे दूर-दूर तक फैल गये। वह जहाँ भी जाता था मौत का नंगा नाच दिखाता था। उसकी सेना जिस जंगल से गुजरती थी वह जंगल पशु-पक्षियों से खाली हो जाता था। उसने भारत, रूस और चीन के कई प्रदेशों में अपना आतंक जमाया। अपने बाप-दादों की भांति वह भी इस्लाम का कट्टर शत्रु था।

जब चंगेजखाँ अफगानिस्तान की बामियान घाटी में स्थित काफिरिस्तान पहुँचा तो वह यहाँ के नैसर्गिक सौंदर्य और मानव सौंदर्य को देखकर आश्चर्य चकित रह गया। अफगानिस्तान में इस्लाम के आगमन से पहले काफिरिस्तान को नूरिस्तान के नाम से पुकरा जाता था।

कहा जाता है कि जब सिकन्दर भारत में घायल होकर यूनान को भाग रहा था तो उसने बामियान क्षेत्र पर अपना अधिकार बनाये रखने के लिये अपनी सेना का एक हिस्सा यहीं छोड़ दिया था। हजारों यूनानी सैनिक अपने परिवारों सहित यहीं बस गये। नीली आँखों और लाल बालों के कारण यूनानी लोग अफगानिस्तान के मूल लोगों से काफी अलग दिखाई देते थे। उनके देह सौंदर्य के कारण ही अफगानिस्तान के लोग उनके क्षेत्र को नूरिस्तान कहते थे।

जब अफगानिस्तान में इस्लाम का प्रसार हुआ तो नूरिस्तान के लोगों ने इस्लाम को मानने से मना कर दिया। इस्लाम के अनुयायी नूरिस्तान के बहादुर लोगों को परास्त नहीं कर सके, न ही अन्य किसी तरह से उन्हें इस्लाम कबूल करवा सके। हार-थक कर इस्लाम के अनुयायियों ने इस क्षेत्र का नाम बदलकर काफिरिस्तान कर दिया।

काफिरिस्तान के सुंदर इंसानों को मारने में चंगेजखाँ को बड़ा आनंद आया। नीली आँखों और लाल बालों वाले इंसानों की भयाक्रांत चीखें उसके तन-मन में आनंद भर देतीं। वह उन्हें तड़पा-तड़पा कर मारने लगा। बहादुर होने पर भी यूनानी लोग चंगेजखाँ के सैनिकों की क्रूरता का सामना नहीं कर सके। हजारों स्त्री-पुरुष और बच्चे प्राण बचाने के लिये पहाड़ों में भाग गये। चंगेजखाँ ने उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर मौत के घाट उतारा।

काफिरिस्तान से निबट कर चंगेजखाँ ने बामियान घाटी में ही बसे सुर्ख शहर को जा घेरा। सुर्ख शहर की प्राकृतिक बनावट तथा दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी थी कि उस पर कोई भी सेना बाहर से आक्रमण करके अधिकार नहीं कर सकती थी चाहे शत्रु सेना सौ वर्षों तक ही शहर को घेर कर क्यों न बैठी रहे।

सुर्ख के राजा को नित्य नये विवाह करने का शौक था इसलिये वह चंगेजखाँ जैसे दुर्दांत शत्रु की परवाह किये बिना अपना विवाह करने के लिये कहीं और चला गया तथा शहर को राजकुमारी के भरोसे छोड़ गया। सुर्ख शहर की राजकुमारी अद्वितीय सुंदरी थी तथा विवाह के योग्य भी। उसे अपने पिता का इस तरह चले जाना अच्छा नहीं लगा। उसने चंगेजखाँ को गुप्त संदेश भिजवाया कि यदि चंगेजखाँ उसे अपनी रानी बना ले तो वह शहर पर उसका अधिकार करवा देगी।

चंगेजखाँ ने राजकुमारी की शर्त स्वीकार कर ली। राजकुमारी ने चंगेजखाँ के आदमियों को वह पहाड़ी बता दी जहाँ से सुर्ख शहर को पानी मिलता था। चंगेजखाँ ने पानी का प्रवाह रोक दिया। पानी न मिलने के कारण सुर्ख शहर में हाहाकार मच गया और सुर्ख की सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा। सुर्ख पर अधिकार करते ही चंगेजखाँ ने राजकुमारी के महल को छोड़कर शेष शहर में कत्ले आम का आदेश दिया। चंगेजखाँ की वहशी सेना ने कई दिन तक शहर में कहर बरपाया किंतु राजकुमारी का महल लूट, हत्या और बलात्कार से बचा रहा।

 एक दिन शाम के समय राजकुमारी को चंगेजखाँ का संदेश मिला- ‘कल सवेरे फौज कूच करेगी। आप बाहर आ जाइये।’ राजकुमारी सफर के लिये तैयार होकर बाहर आ गयी। फौज पंक्तिबद्ध होकर प्रस्थान के लिये तैयार खड़ी थी। चंगेजखाँ राजकुमारी के स्वागत में उठ कर खड़ा हुआ।

राजकुमारी दोनों बाहें फैलाकर आगे बढ़ी किंतु उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा जब उसने चंगेजखाँ के आदेश को सुना। वह अपने सैनिकों से कह रहा था- ‘प्रत्येक सिपाही इस दुष्टा के सिर पर एक पत्थर मारे। जो अपने बाप की नहीं हुई वह मेरी क्या होगी?’

चंगेजखाँ के आदेश का पालन हुआ। राजकुमारी चीख मार कर नीचे गिर पड़ी। थोड़ी देर बाद उसकी लोथ ही वहाँ रह गयी। राजकुमारी के महल की ईंट से ईंट बजा दी गयी। चंगेजखाँ की सेना लूट-खसोट और कत्ले-आम के नये अध्याय लिखने के लिये आगे चल पड़ी। पीछे छोड़ गयी सुर्ख शहर के खण्डहर जो आज भी चंगेजखाँ के क्रूर कारनामों और राजकुमारी के पितृद्रोह की कहानी सुनाने के लिये मौजूद हैं।

जब चंगेजखाँ अपनी सेना के साथ बामियान की घाटी में एक पहाड़ी क्षेत्र से होकर निकला तो उसने एक अद्भुत दृश्य देखा उसने देखा कि एक पहाड़ी से सट कर दो विशाल बुत खड़े हैं जो बहुत दूर से दिखाई पड़ते हैं। चंगेजखाँ ने अपना घोड़ा उसी और मोड़ लिया। निकट पहुँचने पर उसने पाया कि इन विशाल बुतों के पास छोटे-छोटे हजारों बुत बिखरे पड़े हैं।

सारे के सारे बुत बुरी तरह से टूटे हुए हैं। यहाँ तक कि दोनों विशाल बुतों की आँखें और नाक भी टूटी हुई हैं। इतना ही नहीं उसने उन पहाड़ियों में बनी हुई हजारों गुफाओं को भी देखा जो पत्थरों को काटकर बनाई गयी थीं। इन गुफाओं की दीवारों पर भी हजारों बुत खड़े थे किंत सब के सब टूटे हुए थे। इस अद्भुत दृश्य को देखकर उसकी आँखें हैरानी से फैल गयीं। कहाँ से आये इतने सारे बुत! किसने बनायीं हजारों गुफायें!

दरअसल चंगेजखाँ उन पहाड़ियों में पहुँच गया था जहाँ उसके पहुँचने से लगभग सवा हजार साल पहले बौद्ध भिक्षुओं ने हजारों पहाड़ियों को काटकर विशाल बौद्ध मठों का निर्माण किया था तथा एक पहाड़ी के बाहरी हिस्से को काटकर भगवान बुद्ध की दो विशाल मूर्तियाँ बनाईं थीं।

इन मूर्तियों के ऊपर विशाल मेहराबों का निर्माण किया गया था। मेहराबों में भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र से सम्बन्धित कई रंगीन चित्र भी बनाये थे। भिक्षुओं ने आसपास की पहाड़ियों को काटकर हजारों गुफाओं का निर्माण भी किया था तथा उनमें सुंदर मूर्तियों का उत्कीर्णन किया था।

जब चंगेजखाँ ने इन मूर्तियों और गुफाओं को देखा तो उसके आश्चर्य का पार न रहा। वह बुतों की विशालता से भी अधिक हैरान इस बात पर था कि दोनों बुत ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी तरह सलामत थे किंतु उनकी आँखों और नाक को किसी ने तोड़ दिया था। दोनों विशाल बुतों के आसपास हजारों की संख्या में अन्य बुतों को भी भग्न अवस्था में देखकर वह आश्चर्य चकित रह गया था। आखिर किसने बनाया होगा इन्हें? और फिर क्यों तोड़ डाला होगा? कौन लोग रहे होंगे वे!

चंगेजखाँ ने स्थानीय लोगों को पकड़ कर मंगवाया और उनसे इन बुतों को बनाने वालों और उनको तोड़ने वालों के बारे में पूछा। चंगेजखाँ को बताया गया कि इन्हें सवा हजार साल पहले भारत से आये बुत-परस्त बौद्ध-दरवेशों ने बनाया था किंतु जब अफगानिस्तान में इस्लाम का प्रसार हुआ तो बुत-शिकनों ने इन बुतों को तोड़-तोड़ कर आग में झौंक दिया।

हजारों अलंकृत गुफाओं को भी उसी समय तहस-नहस किया गया तथा पहाड़ियों में उकेरा गया वह सारा शिल्प नष्ट कर दिया गया जो बौद्ध-दरवेशों की छैनियों से निकला था। इन दो बड़े बुतों को पूरी तरह नष्ट न करके केवल इनकी आँखें और नाक तोड़ दीं ताकि इस बात की यादगार बनी रहे कि कभी यहाँ इतने विशाल बुत थे।

स्थानीय लोगों की बात सुनकर क्रोध से चीख पड़ा वह! उसे उन लोगों पर तो क्रोध था ही जो संसार में सुंदर बुत बनाने का काम करते हैं किंतु उससे भी अधिक क्रोध उसे उन लोगों पर था जिन्होंने इन बुतों को चंगेजखाँ के वहाँ पहुँचने से पहले ही तोड़ डाला था। आखिर यह कार्य उसे अपने हाथों से करना चाहिये था।

कितना आनंद आता इन बुतों को तोड़ने में! वह तो इन बुतों को भी इस क्रूरता के साथ तोड़ता कि ये बुत भी नीली आँखों और लाल बालों वाले इंसानों की तरह चीखने लगते! क्यों किया गया उसे इस आनंद से वंचित! उसने मन ही मन संकल्प किया कि वह इन बुतों को बनाने वालों और तोड़ने वालों, दोनों को दण्डित करेगा। वे न सही उनकी औलादें ही सही।

-अध्याय 6, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

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