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अमंगल की आशंका (36)

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अमंगल की आशंका

अमंगल की आशंका पुरवासियों के मन में घर कर गयी है। यदि मातृदेवी गर्भवती न हुई तो! वह एक क्षुद्र शिल्पी से कैसे गर्भवती होना स्वीकार करेगी!

मोहेन-जो-दड़ो वासी एक बार फिर उत्तेजित हैं। इस बार युवकों की अपेक्षा बड़े बूढ़ों में अधिक बेचैनी है। देवी रोमा द्वारा प्रचारित घोषणा के एक दिन बाद स्वामी किलात ने भी पुर में आज्ञा प्रचारित की है कि पशुपति महालय के वार्षिक आयोजन में इस बार शिल्पी प्रतनु चन्द्रवृषभ बनकर मातृदेवी को गर्भवती बनायेंगे।

क्षुब्ध हैं बड़े-बूढ़े, एक क्षुद्र युवक मातृदेवी को गर्भवती बनायेगा! केवल इसलिये कि देवदासी ऐसा चाहती है! क्या यह पातक  नहीं है! कहाँ से लायेगा क्षुद्र शिल्पी इतनी शक्ति! मातृदेवी सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन करती है। क्या उसे गर्भवती करने का अनुष्ठान इतना सरल है! महान शक्तियों का पवित्र स्वामी ही मातृदेवी को गर्भवती बनाने की क्षमता रखता है।

बड़े-बूढ़ों की उत्तेजना निराशा का पर्यायवाची मात्र है, तभी तो वे अंत में यह कहकर मौन धारण कर लेते हैं कि किया क्या जा सकता है ? स्वयं स्वामी ने ही यह आज्ञा प्रचारित की है। संभवतः अपनी प्रसन्नता से नहीं, देवी रोमा के विचित्र हठ से रुष्ट होकर। एक अनिष्ट की आशंका घर कर गयी है पुरवासियों के मन में। अब क्या होगा! यदि मातृदेवी गर्भवती न हुई तो! जब वह महापराक्रमी चन्द्रवृषभ के वश में नहीं आती तो एक क्षुद्र शिल्पी से कैसे गर्भवती होना स्वीकार करेगी!

सप्त सिंधुओं के तटों पर स्थित सुदूर पुरों से आने वाले सैंधवों के शटक पिछले कुछ दिनों में बड़ी संख्या में मोहेन-जो-दड़ो में एकत्र हो गये हैं। उन्हें मोहेन-जो-दड़ो में घटित घटनाओं के सम्बन्ध में जानकारी नहीं है किंतु वे पुर के वातावरण में एक विचित्र सा अंतर अनुभव कर रहे हैं। कुछ बातें जन-सामान्य के वाग्विलास में से छन-छन कर अलग-अलग कलेवर में उन तक पहुँच रही हैं। सूचनाओं की इसी तलछट से एक आशंका उनके मन में भी समा गयी है कि कुछ अमंगल घटित हो सकता है।

जिस दिन स्वामी किलात की आज्ञा पुर में प्रचारित हुई उसी संध्या वरुण सिंधु तट पर प्रकट हुआ। वरुण इस बार कतिपय विलम्ब से आया था किंतु अपने शकटों में जाने कितना जल भरकर लाया था! रात्रि के अंतिम प्रहर तक वर्षा होती रही। वर्षा भी कैसी! अत्यंत वेगवती, अत्यंत विकराल!

आरंभ में आकाश से जल की बड़ी-बड़ी बूंदे झरीं जो देखते ही देखते मोटी जल-धाराओं में बदल गयीं। सिंधु वासियों ने आश्चर्य से देखा आकाश से जल बूंदें नहीं, विशाल धारायें निकल कर धरती पर गिर रही हैं। लगता था आकाश मार्ग से सिंधु उतर आई है। नभ और थल तक केवल जल दिखाई देने लगा।

अत्यधिक वर्षा होने से, अन्य पुरों से आकर खुले आकाश के नीचे डेरा जमाये बैठे सैंधवों ने अतिथि शालाओं में शरण लेनी चाही किंतु वे तो पहले से ही पूरी तरह जन-पूरित थे। अतः बाहर से आये सैंधवों ने पुरवासियों से शरण देने का अनुरोध किया। उदार सैंधव नागरिकों ने अपने आवास अतिथियों के लिये खोल दिये। मध्य रात्रि में जलधाराओं का स्थान हिमखण्डों ने ले लिया। विकराल शीत से कंपकंपा उठा मोहेन-जोदड़ो।

यदि अंतिम प्रहर से कुछ पूर्व वर्षा थम न गयी होती तो वार्षिक आयोजन एक दिन के लिये स्थगित करना पड़ता। रात्रि भर वर्षा थमने की प्रतीक्षा में थके हुए नागरिक अतिथि सैंधवों के साथ अपने अलसाये नेत्रों को मसलते हुए, नगर के विशाल स्नानागारों में पवित्र होकर सूर्योदय से पूर्व सिंधु पूजन के लिये उपस्थित हुए।

जो भी सैंधव सिंधु तट पर पहुँचा, उसके आश्चर्य का पार न रहा। उन्होंने सिंधु को घनघोर गर्जन करते हुए पाया। ऐसा लगता था मानो कोई मादा सिंह क्षुब्ध होकर दहाड़ रही हो। वह भयानक वेग से प्रवाहित हो रही थी। उसी से घनघोर शब्द उत्पन्न हो-हो कर चारों दिशायें आप्लावित हो रही थीं।

नक्षत्रों के क्षीण प्रकाश में सिंधु तट का दृश्य देखकर सैंधव समुदाय हतप्रभ रहा गया। आकाश को छू लेने वाली ऊँची तरंगों से आप्लावित सम्पूर्ण सिंधु तट विकराल रूप धारण कर चुका था। लगता था ये तरंगें अभी आगे बढ़कर पुर में प्रवेश कर जायेंगी और सब कुछ बहा ले जायेंगी। भयावह आशंका से सैंधवों के हृदय कांप गये। मातृदेवी ही जानें आज क्या होने को है! क्यों आज रुद्र कुपित होकर अपनी विकराल जटायें फैलाये मोहेन-जोदड़ो तक चला आया है!

किसी तरह धूप, दीप, पुष्प, और दिव्य वनस्पतियों से सिंधु माता का पूजन किया गया। माता सिंधु से सैंधवों की कुशलता और समृद्धि की प्रार्थनायें की गयीं और फिर शंका पूरित हृदयों से नदी में दीप प्रवाहित कर समस्त सैंधव पुनः पुर को लौट आये।

सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ प्रधान महालय के विशाल ताम्र-घण्ट पर काष्ठ का आघात हुआ और महालयों में अभिषेक एवं पूजन अनुष्ठान आरंभ हुआ। सैंकड़ों घण्ट, घड़ियाल और शंख बज उठे। मोहेन-जो-दड़ो के समस्त महालयों में स्थापित देव-प्रतिमाओं को सप्त सिंधुओं के पवित्र जल से अभिषिक्त किया गया।

मुख्य मातृदेवी-महालय एवं मुख्य पशुपति-महालय में स्थापित प्रतिमाओं को मधु, दुग्ध, फलों के रस एवं चन्दन आदि से चर्चित किया गया। समस्त देव प्रतिमाओं को पत्र, पुष्प और वनस्पतियों से सजाया गया, उन्हें नये शृंग धारण करवाये गये। देव प्रतिमाओं के सम्मुख यव, धान्य, इक्षु, फल, दुग्ध, मधु, आसव, पर्क एवं सुरा अर्पित किये गये। चारों दिशाओं से आती मंगल ध्वनियों के बीच सैंकड़ों पुजारियों ने समस्त दैवीय विधान, प्रजनन देवी और प्रजनक देव के अभिषेक, अनुष्ठान एवं पूजन सम्पन्न करवाये।

विविध पुरों से आये नर-नारी अपने साथ कई प्रकार के श्रेष्ठ पदार्थ मातृदेवी एवं पशुपति को अर्पित करने के लिये लाये थे। रात्रि की वर्षा में बहुत सी सामग्री भीग कर खराब  हो गयी किंतु फिर भी जो उत्तम सामग्री बची थी वह भी इतनी विपुल मात्रा में थी कि उसी से मोहेन-जो-दड़ो के समस्त महालय भर गये।

बहुत से नर-नारियों ने शरीर के वस्त्र, आभूषण और केश देवताओं को अर्पित किये। मंदिरों के बाहर शंख, कौड़ी, घोंघे, हस्तिदंत, मृत्तिका, शृंग, स्वर्ण, रजत, ताम्र एवं कांस्य आदि विविध सामग्री से निर्मित आभूषण, गोमेद, अमेजन तथा वैदूर्य के ढेर लग गये। विपुल सामग्री पुजारियों द्वारा  नागरिकों में प्रसाद के रूप में वितरित कर दी गयी। मातृदेवी को चैड़े फल के खाण्डे से अज अर्पित किये गये। इस अनुष्ठान के पूरा होने तक दोपहर हो चली।

होने को तो समस्त अनुष्ठान वैसे ही हो रहे थे जैसे कि हर वर्ष हुआ करते थे किंतु आज किसी भी आयोजन में स्वामी किलात सम्मिलित नहीं हुए। वृद्ध सैंधवों ने आँखे फाड़-फाड़ कर देखा किंतु पशुपति महालय के प्रधान पुजारी किलात किसी भी अनुष्ठान में दिखायी नहीं दिये। समस्त अनुष्ठान महालय के अन्य पुजारी करवा रहे थे। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

बूढ़ों ने इसका एक ही अर्थ लगाया कि स्वामी रुष्ट हैं। जब सैंधवों के संरक्षक, अदृश्य शक्तियों के स्वामी स्वयं महान किलात ही सैंधवों से रुष्ट हो जायें तो सैंधवों का रक्षण कौन करेगा! कहाँ हैं स्वामी किलात! यह प्रश्न सैंकड़ों वृद्ध सैंधवों ने सैंकड़ों अन्य वृद्ध सैंधवों से किया किंतु किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं था। अज्ञात अमंगल की आशंका वृद्ध हृदयों में व्याप्त हो गयी।

– अध्याय 36, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जयघोष (37)

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जयघोष

सेनप सुनील ने पुर की प्राचीर पर खड़े होकर अपना विकराल खड्ग मुक्त भाव से आकाश में लहराया और उच्च स्वर में जयघोष किया- ‘कृण्न्वतो विश्वम् आर्यम्।’ समस्त आर्य वीरों ने सेनप सुनील का जयघोष सुनकर हर्षध्वनि की और जो जहाँ स्थित था, वहीं से उसने अपने शस्त्र हवा में लहराये।

आर्य चतुरंगिणी कई दिनों से असुरों के इस पुर को घेर कर खड़ी थी किंतु असुरों की रक्षण व्यवस्था इतनी प्रबल थी कि आर्य उसे भेद पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। सरस्वती के त्वरित प्रवाह की भांति चलने वाला आर्यों का चतुरंगिणी रूपी नद यहाँ आकर ठहर सा गया था। जिस चतुरंगिणी के प्रवाह में असुरों के शत-शत पुर रेत के ढूह के समान तिरोहित हो गये थे उसी विजयी चतुरंगिणी के समक्ष असुरों का यह पुर दुर्गम चुनौती बनकर खड़ा था।

जैसे ही आर्य सैन्य पुर पर आघात करने के लिये आगे बढ़ता वैसे ही प्राचीर पर खड़े असुर बाणों एवं प्रस्तरों की सघन वर्षा करके उसका मार्ग अवरुद्ध कर देते। विपुल प्रयास करके भी आर्य सैनिक पुर के निकट नहीं पहुँच पाये थे। दिवस पर दिवस व्यतीत होते जा रहे थे किंतु न तो राजन् सुरथ, न सेनप सुनील और न ही आर्य अतिरथ इस कठिनाई से निकलने का कोई मार्ग ढूंढ पा रहे थे।

जन के पुरोहित के रूप में समरांगण में उपस्थित ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा की भी चिंता का कोई पार न था। वे प्रतिदिन अग्नि, इन्द्र, मित्र तथा वरुण आदि देवों का आह्वान कर राजन् सुरथ को विजयी होने का आशीर्वाद देते थे किंतु आशीर्वाद था कि फलीभूत होता दिखायी नहीं देता था।

 क्या इस अभियान पर यहीं विराम लग जायेगा! कठिनाइयों के कितने समुद्र पार करके आर्य वाहिनी इस स्थिति तक पहुँच पायी थी! अब तक तो हर कठिनाई का अंत एक बड़ी सफलता में हुआ था किंतु क्या अब और कोई सफलता आर्यों के भाग्य में नहीं लिखी है! कितना समय तो उन्हें असुरों के विरुद्ध अभियान चलाने के लिये आर्य-जनों से समर्थन एवं सैनिक जुटाने में लग गया था!

यह एक सुखद संयोग ही था कि राजन् सुरथ भरत, जह्नु, अनु और भृगु आदि जिस किसी भी आर्य-जन में अपनी चतुरंगिणी लेकर पहुँचे, उनका उत्साह से स्वागत हुआ। एक भी जन ऐसा नहीं था जिसने आर्य सुरथ की योजना का विरोध किया हो। राजन् सुरथ के प्रयास से प्रत्येक जन ने अपना राजन् बनाया तथा अपने जन के वीरों को अपने राजन् के नेतृत्व में चतुरंगिणी के साथ विदा किया।

प्रत्येक आर्य जन से राजन् सुरथ को कुछ न कुछ अतिरिक्त सहयोग अवश्य मिला। किसी जन से अश्व तो किसी जन से रथ। किसी जन से सैनिक तो किसी जन से अस्त्र-शस्त्र। उसी का परिणाम था कि जैसे-जैसे चतुरंगिणी आगे बढ़ी उसका आकार भी बढ़ता गया था।

जब आर्य सुरथ और सेनप सुनील को विश्वास हो गया कि अब वे असुरों से युद्ध करने में सक्षम हैं तो उन्होंने आर्य भूमि से बाहर निकल कर असुरों के पुरों पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इसी के साथ आरंभ हुआ असुरों को मरुस्थल की ओर धकेलने का महाअभियान। असुरों के पुर टूटते गये और चतरुंगिणी आगे बढ़ती रही। एक के बाद एक सरिता का तट और एक के बाद एक असुरों का पुर। आर्यों की विजय पताका सब ओर फहरायी गयी।

बहुत से आर्यों ने अपनी छाती पर व्रण खाये। बहुत से आर्य-वीरों के अंग भंग हो गये। बहुत से आर्यों ने अपने प्राण गंवाये किंतु असुरों को सप्तसिंधु प्रदेश से खदेड़ने का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहा। सिंधु नद के महाप्रवाह की भांति चतुरंगिणी आगे बढ़ती रही। अब तक कोई आसुरि शक्ति चतुरंगिणी का मार्ग नहीं रोक पायी थी किंतु अस्किनी के तट पर स्थित असुरों का यह दुर्ग अचानक ही चतुरंगिणी का मार्ग रोक कर खड़ा हो गया।

कुछ आर्यवीरों ने राजन् सुरथ को सुझाव दिया कि अब तक पर्याप्त संख्या में असुरों को सप्तसिंधु प्रदेश से निष्कासित किया जा चुका है। अतः इस पुर को छोड़कर चतुरंगिणी पुनः परुष्णि के तट पर स्थित अपने जन को लौट जाये और आर्य जनों को संगठित करने  तथा आर्य-जनपदों की स्थापना करने का कार्य आरंभ किया जाये।

राजन् सुरथ सहमत नहीं हैं इस सुझाव से। उनकी मान्यता है कि यदि असुरों का यह पुर नष्ट नहीं किया जा सका तो अब तक के सारे प्रयास निष्फल हो जायेंगे। जिन असुरों को सप्तसिंधु प्रदेश से बाहर खदेड़ा गया है, वे आर्यों की इस पराजय की सूचना पाकर फिर से लौट आयेंगे। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा और सेनप सुनील को लगा कि राजन् सुरथ ठीक कहते हैं। परिणाम चाहे जो भी हो इस पुर को तो टूटना ही होगा।

कई दिनों के चिंतन के पश्चात् राजन् सुरथ ने एक योजना तैयार की। विगत रात्रि में आयोजित समिति में इस योजना पर विस्तार से चर्चा की गयी। योजना अच्छी थी और सभी को विश्वास था कि यदि कुछ अप्रत्याशित नहीं घटा तो यह सफल रहेगी।

योजना के अनुसार आर्य अतिरथ की हस्ति सेना ऊषा के आगमन से बहुत पहले असुरों के पुर की ओर चल दी। पर्याप्त अंधकार होने के कारण विशालाकाय हस्ति भी दूर से देखे नहीं जा सकते थे। इसलिये यह सैन्य बिना किसी व्यवधान के पुर की ओर चलता ही चला गया। हस्तियों की ओट में अश्वारूढ़ सैन्य था जिसका संचालन स्वयं राजन् सुरथ कर रहे थे।

योजना के अनुसार यदि असुर हस्तियों को पुर तक पहुँचने से पहले ही देख लेते तो भी हस्ति सेना को तब तक बाणों की वर्षा झेलनी थी जब तक कि अश्वारूढ़ सैनिक ठीक प्राचीर के निकट तक नहीं पहुँच जाते। पदाति सैन्य को अश्वसेना के पीछे रखा गया ताकि जब तक अश्वसेना पुर में धंसारा करे तब तक पदाति सैन्य पीछे से पहुँच कर उनकी सहायता के लिये उपलब्ध हो जाये। रथ सैन्य शिविर में रहा तथा यत्र-तत्र अग्नि प्रज्वलित कर यह भ्रम बनाये रहा कि अभी आर्य सैन्य शिविर में ही है।

 आर्य सुरथ की योजना का पहला भाग अक्षरशः सफल रहा था। प्राचीर पर सन्नद्ध असुर सैन्य आर्यों के युद्ध शिविर में प्रज्वलित अग्नि पर ही दृष्टि गड़ाये रहा और अंधकार में तेजी से अग्रसर होते हस्तिसैन्य को नहीं देख पाया। जैसे ही सूर्य की प्रथम किरण धरित्री पर गिरी तो आर्यों के विशाल सैन्य को प्राचीर के ठीक निकट देख कर असुरों का रक्त जम गया। कहाँ से प्रकट हुआ यह विशाल सैन्य! गगन मार्ग से चला आया अथवा धरित्री फोड़ कर निकला! 

असुरों ने पत्थर और बाणों की वर्षा आरंभ की किंतु अश्वारोही आर्यों की टुकड़ी विशालाकाय हस्तियों की ओट में पुर के मुख्य द्वार पर जा अड़ी। आर्य अतिरथ ने हस्तियों की एक पूरी पंक्ति ही मुख्य द्वार पूर हूल दी। विशालाकाय हस्तियों का प्रबल आघात पाकर मुख्य द्वार चरमरा कर टूट गया और आर्य अश्वारोही हहराती लपटों के समान पुर में प्रवेश कर गये। ठीक यही वह समय था जब पदाति सैनिकों की पंक्तियाँ भी पुर में जा पहुँचीं।

पुर का द्वार टूटा हुआ जानकर असुर प्राचीरों से नीचे उतर आये। दोनों पक्षों में घमासान मच गया। दो प्रहर दिवस जाते-जाते असुरों के रक्त तथा मज्जा की कीच से विशाल क्षेत्र सन गया। असुर और अधिक विरोध नहीं कर सके। बचे हुए असुरों ने अपने शस्त्र त्यागकर पराजय स्वीकार कर ली। सेनप सुनील ने पुर की प्राचीर पर खड़े होकर अपना विकराल खड्ग मुक्त भाव से आकाश में लहराया और उच्च स्वर में जयघोष किया- ‘कृण्न्वतो विश्वम् आर्यम्।’

समस्त आर्य वीरों ने सेनप सुनील का जयघोष सुनकर हर्षध्वनि की और जो जहाँ स्थित था, वहीं से उसने अपने शस्त्र हवा में लहराये। आर्य अतिरथ ने अपने विशालाकाय हस्ति पर खड़े होकर आर्यों की सूर्य-पताका लहरायी। चिर-प्रतीक्षित विजय प्राप्त हो चुकी थी। आज की विजय आर्यों के लिये बड़ी विजय थी। इसी के साथ उन्होंने कुभा[1] सुवास्तु [2] तथा क्रुमु [3] के तट असुरों से मुक्त करवा लिये थे।

आर्य सुरथ ने युद्ध में मृत आर्यों का अग्नि संस्कार तथा मृत असुरों का शवाधान करवाया। पराजित असुरों ने आर्य भूमि छोड़कर मरूस्थल के लिये तत्काल प्रस्थान करना स्वीकार कर लिया।

– अध्याय 37, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] काबुल।

[2] स्वात।

[3] कुर्रम।

चन्द्रवृषभ (38)

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चन्द्रवृषभ

भूदेवी को गर्भवती बनाने वाले चन्द्रवृषभ  की भूमिका में शिल्पी प्रतनु यथा समय उपस्थित हुआ। आज उसके लिये कठिन परीक्षा की घड़ी थी।

विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी मोहेन-जोदड़ो वासियों एवं सैंधव प्रदेश के विभिन्न भागों से आये सैंधवों की सुविधा के लिये पशुपति महालय परिसर में विशाल वितान बनाया गया था जो रात्रि में हुई भारी वर्षा के कारण कुछ क्षतिग्रस्त हो गया था किंतु मध्याह्न होने तक चतुर सैंधव कर्मकारों ने उसे पुनः समुचित रूप दे दिया है।

दीर्घ वितान के नीचे अलग-अलग दर्शक दीर्घायें बनायी गयी हैं। अनुष्ठान और पूजनकर्म से निवृत्त होकर सैंधव पाण्डाल में पहुँचने आरंभ हो गये। चंचल शिशुओं, उत्सुक रमणियों और उत्साही युवाओं के साथ चिंतित सैंधव वृद्ध भी मन में आशंकाओं के घुमड़ते घनघोर बादल लेकर आ बैठे। जाने कब क्या अनहोनी घटित हो!

उनके मस्तिष्क में विगत दिनों से उथल-पुथल मचा रही उत्तेजना यहाँ आकर चरम पर पहुँच गयी लगती थी। उन्होंने देखा कि विशिष्ट जनों के लिये बने पाण्डाल में महालयों के पुजारी और पणि आकर बैठ गये हैं। सैंधव सभ्यता के महान् स्वामी किलात के लिये बना आसन रिक्त है।

सूर्य देव अब भी स्थूलकाय कृष्णवर्णी बादलों की ओट में थे। यह ज्ञात करना संभव नहीं था कि इस समय वे आकाश के किस कोण में विराजमान हैं। जब दीर्घ प्रतीक्षा के पश्चात् भी सूर्य देव के दर्शन नहीं हुए तो अनुमान से उन्हें आकाश के ठीक मध्य में स्थित हुआ मानकर पशुपति महालय के विशाल ताम्रघण्ट पर काष्ठ प्रहार किया गया और मृदंग वादक मयाला ने मृदंग पर थाप दी। सहस्रों घुंघरू झन्कृत हो उठे। मयाला की लम्बी और पतली अंगुलियाँ विद्युत की गति से मृदंग पर आघात करने लगीं-

थक्किट     धिक्क्टि     थोंक्क्टि     नक्टि    तथक्टि

धिद्धिक्क्टि  थों   थोंक्टि  नंनाक्टि  त्तताथक्क्टि  किटक्टि

द्धि  द्ध  धि  कि ट क्टिक्टि।  थों थों थों थों  क्टि  क्टि

कि कि नं नाँ नाँ क्टि क्टि क्टि। त्तत्त तथक्क्टि किटक्टिक्टि।

झांझ, मृदंग, शंख और नूपुरों की मिश्रित ध्वनि से साम्य बैठाती हुई सैंकड़ों नृत्यांगनायें पंक्तिबद्ध होकर महालय के विशाल आगार से निकलने लगीं। शुभ्र वसना सैंधव-बालाओं ने मंच का एक वलय पूर्ण किया और विद्युत की तरह लहराती हुई नृत्यांगना रोमा मंच पर अवतरित हुईं।

रोमा के शीश, मस्तक, कर्ण, कण्ठ, कटि, बाहु, और करतल-पृष्ठों से लेकर जंघाओं, पैरों, सुचिक्कण वर्तुलों, पुष्ट नितम्बों और क्षीण कटि के डमरू मध्य में पीत-अयस से निर्मित विविध आभूषण सुशोभित हैं किंतु अभी वह समय नहीं आया जब नृत्यांगना अथवा उसके आभूषण दर्शकों को दिखाई दें । इस पर भी नृत्यांगना की उपस्थिति दर्शकों को चिन्ता के अथाह समुद्र से बाहर खींच लाने में समर्थ सिद्ध हुई।     

सैंधव समुदाय अपनी दुश्चिंताओं को विस्मृत कर केवल और केवल वर्तमान में स्थित हो गया।

पशुपति को समर्पित नृत्यमयी स्तुति के पश्चात् रोमा और उसकी सखियों ने पारंपरिक चन्द्रवृषभ  नृत्य आरंभ किया। भूदेवी को गर्भवती बनाने वाले चन्द्रवृषभ  की भूमिका में शिल्पी प्रतनु यथा समय उपस्थित हुआ। आज उसके लिये कठिन परीक्षा की घड़ी थी। ठीक वैसी ही जब गरुड़ों के आक्रमण के समय उपस्थित हुई थी। ठीक वैसी ही जब पिशाचों से घिर जाने के समय उपस्थित हुई थी। अथवा ठीक वैसी ही जब नग्न अवस्था में ही अचानक आर्य अश्वारोहियों से घिर जाने पर हुई थी।

 देवी रोमा ने प्रतनु से विचार-विमर्श किये बिना घोषणा कर दी कि वह वार्षिक समारोह में तभी नृत्य करेगी जब प्रतनु चंद्रवृषभ के रूप में उपस्थित रहेगा तो संकट में पड़ गया प्रतनु। कहाँ चन्द्रवृषभ नृत्य का निष्णात कलागुरु किलात और कहाँ नृत्यकला से नितांत अनभिज्ञ शिल्पी प्रतनु! कहीं कोई जोड़ ही नहीं।

कैसे कर सकेगा वह सैंधव वासियों को संतुष्ट! क्या वे प्रतनु को चन्द्रवृषभ के रूप में स्वीकार कर पायेंगे!  उसने रोमा से अनुरोध किया कि वह अपनी घोषणा को वापस ले-ले और स्वामी से क्षमा याचना कर ले ताकि जन-सामान्य की सहानुभूति रोमा व प्रतनु के साथ बनी रहे।

हठी रोमा! वह भला कब पीछे मुड़ने वाली थी! उसने प्रतनु की एक न मानी। जो घोषणा हो गयी, सो हो गयी। लाभ हानि की गणना करनी उसे नहीं आती। वह तो बस प्रतनु के साथ ही नृत्य करेगी, अन्य किसी के साथ नहीं। ऐसे संकट में प्रतनु को रानी मृगमंदा की स्मृति हो आयी।

उस दिन जब रानी मृगमंदा ने उसे नृत्यकला सिखाने का हठ कर लिया था, तब बहुत संकोच हुआ था उसे। उसे कब पता था कि नृत्यकला की आवश्यकता तो उसे मोहेन-जो-दड़ो पहुँचते ही  होगी। नागों के उस लोक में रहते हुए, तूर्ण के पश्चात् अन्य अवसरों पर भी प्रतनु ने निऋति और हिन्तालिका के साथ नृत्य किया था जिससे अब उसे नृत्य करने में संकोच नहीं रह गया था। फिर भी नागों के नृत्य करने के ढंग और सैंधवों के नृत्य करने के ढंग में बड़ा अंतर है। चन्द्रवृषभ के लिये तो कठिन अभ्यास आवश्यक है।

प्रतनु ने देवी रोमा से कहा कि जब उसने घोषणा की है तो वही उसे चंद्रवृषभ नृत्य भी सिखाये। रोमा को भला यह कब अस्वीकार था! ‘प्रिय’ को शिष्य के रूप में पाकर तो जैसे वह निहाल हो गयी। उसने नृत्यकला के सारे रहस्य शिथिल करके प्रतनु के समक्ष प्रकट कर दिये। दिन भर के अभ्यास के पश्चात प्रतनु ने अनुभव किया कि यह उतना कठिन नहीं है जितना कि वह समझता रहा है।

वह रोमा द्वारा बतायी गयी मुद्राओं का अनुसरण करने का प्रयास करने लगा। अन्त्ततः वह संध्या भी आ गयी जब वरुण प्राची [1] से प्रकट हुआ। प्रतनु प्राण-पण से अभ्यास में जुटा रहा। उधर आकाश में वरुण घनघोर ताण्डव करते रहे और इधर प्रतनु देवी रोमा से नृत्य की एक-एक मुद्रा सीखता रहा। सृष्टि के समस्त व्यापारों से अनभिज्ञ दोनों प्रणयी यह जान ही नहीं सके कि कब वह काल-रात्रि बीती और कब दिन निकला ।

प्रतनु मंच पर प्रकट हुआ। मन में बरबस प्रवेश कर गये दैन्य को त्याग कर उसने अपने शीश पर बंधे दीर्घकाय शृंग तथा पीठ पर बंधे सुकोमल कर्पास कूबड़ को हिलाया। क्षण भर के लिये उसने मंच पर मातृदेवी के वेश में उपस्थित रोमा को देखा और उसी अद्भुत तीव्रता से पद संचालन करने लगा जिस अद्भुत तीव्रता का परिचय किलात दिया करता था।

सैंधव समुदाय श्वांस रोके बैठा रहा। स्वामी किलात के स्थान पर क्षुद्र शिल्पी चंद्रवृषभ बनकर मातृदेवी को गर्भवती बनाने जा रहा है, कहीं अनिष्ट इसी समय तो नहीं घट जायेगा! जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया, जनसमुदाय आश्वस्त होता गया कि कहीं कुछ अनिष्ट नहीं घट रहा।

अनुरागी प्रतनु को चन्द्रवृषभ के वेश में मंच पर उपस्थित हुआ देखकर रोमा की देह में मानो तड़ित् का संचार हुआ। वह द्रुत गति से वाद्यों के साथ लय बैठाते हुए नृत्य की अत्यंत जटिल मुद्राओं का प्रदर्शन करने लगी। पद लालित्य एवं हस्त लाघव का ऐसा बेजोड़ संगम रोमा के नृत्य में आज से पहले कभी नहीं देखा गया था।

दर्शकों ने अपने हृदय कस कर पकड़ लिये। कलहंसिनी की क्षीण ग्रीवा के सदृश्य लहराती हुई रोमा की भुजायें आठों दिशाओं में आनंद के नवीन वलय निर्मित कर रही थी। नृत्यांगना की देह पर विभूषित मेखलाओं तथा नूपुरों से निकलती हुई सुमधुर ध्वनियाँ संगीत के नवीन प्रमिमान स्थापति कर रही थीं।

उल्लास से नृत्यलीन मातृदेवी के गर्भाधान का दृश्य पूरे कौशल के साथ दर्शाया गया। चंद्रवृषभ ने अनुनय से मातृदेवी को प्रसन्न करना चाहा किंतु मातृदेवी प्रसन्न नहीं हुई। चंद्रवृषभ ने मातृदेवी को ना-ना प्रकार के प्रलोभन दिये किंतु मातृदेवी ने उनकी ओर देखा तक नहीं।

चंद्रवृषभ कुपित हुआ और अपने विशाल शृंगों से मातृदेवी पर आघात करने दौड़ा किंतु मातृदेवी भयभीत नहीं हुई, उसने चन्द्रवृषभ का सिर काट दिया। चंद्रवृषभ अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुआ और पशुपति के रूप में दिखाई दिया। मातृदेवी अपना समस्त गर्व त्यागकर पशुपति के सम्मुख विनीत हुई। पशुपति ने सृष्टि की रचना हेतु मातृदेवी को गर्भवती होने का आदेश दिया जिसे मातृदेवी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

मंच पर नृत्यलीन नृत्यांगनाओं के गुल्म में क्षण भर को अदृश्य रह कर पशुपति प्रजनक देव के रूप में तथा मातृदेवी प्रजनन देवी के रूप में प्रकट हुए। जैसे ही प्रजनन देवी ने प्रजनक देव के साथ रमण के लिये पहला पद आगे बढ़ाया, ठीक उसी क्षण नृत्यांगना रोमा लड़खड़ा कर मंच पर गिर गयी। सैंधवों को जैसे काठ मार गया। यह कैसा व्यवधान था! स्वयं रोमा भी कुछ समझ न सकी। उसने उठने का प्रयास किया किंतु उसके पैरों ने जैसे कार्य करना बंद कर दिया। विपुल प्रयास करने पर भी वह खड़ी न हो सकी।

मातृदेवी के गर्भाधान का अनुष्ठान अपूर्ण रह गया। सृष्टि के निर्माण हेतु दोनों आद्यशक्तियाँ रमण न कर सकीं। मातृदेवी गर्भवती नहीं हुईं। मातृदेवी के गर्भ से नदी-पर्वत, वनस्पति, पशु-पक्षी, सर्प-मत्स्य, मृग-सिंह, नर-नारी प्रकट नहीं हुए। सैकड़ों सैंधव अपने स्थान पर खड़े होकर उत्तेजना से चिल्लाने लगे।

महान शक्तियों के स्वामी किलात ही मातृदेवी को गर्भवती कर सकते हैं। एक क्षुद्र सैंधव द्वारा मातृदेवी को गर्भवती बनाने का प्रयास पातक है। तभी तो आज चन्द्रवृषभ मातृदेवी को गर्भवती नहीं बना सका। स्वामी किलात कहाँ हैं ? उन्हें बुलाओ, वे ही मातृदेवी को गर्भवती बना सकते हैं। यदि मातृदेवी गर्भवती नहीं हुई तो सम्पूर्ण सैंधव सभ्यता नष्ट हो जायेगी।

प्रतनु ने चन्द्रवृषभ का सिर उतार कर एक तरफ रख दिया और रोमा को उठाने का प्रयास करने लगा। रोमा के पैरों में लेशमात्र भी शक्ति नहीं रही। उसके पैर मिट्टी के लोथ की तरह निर्जीव हो गये थे। शिल्पी का मन हा-हा-कार कर उठा। क्या वह कठिन परीक्षण में असफल सिद्ध होने जा रहा था!

अचानक मंच के मध्य पर विकरा वेशधारी किलात प्रकट हुआ। उसे देखते ही रोष से चिल्लाते हुए सैंकड़ों कण्ठ मौन हो गये। सैंधव सभ्यता का महान स्वामी किलात उनके मध्य उपस्थित था, जो उन्हें सर्वनाश से बचा सकता था। अब उन्हें किसी बात का भय नहीं था। जो उत्साही युवक किलात के स्थान पर शिल्पी द्वारा नृत्य किये जाने के पक्ष में थे, उन्हें अपनी भूल पर पश्चाताप था।

बड़े-बूढ़ों का कहना सत्य था, मातृदेवी को केवल महान स्वामी ही गर्भवती बना सकता है। प्रतनु ने देखा, किलात के चेहरे पर क्रूर मुस्कान खेल रही है। वह विजय गर्व से अपनी स्थूल गर्दन को पूरी तरह उन्नत करके खड़ा है। किलात ने उच्च स्वर में आदेश दिया- ‘दोनों पापियों को बंदी बना लिया जाये।’

  – ‘महान् स्वामी किलात की जय।’ सैंकड़ों कण्ठों से निकला हुआ जयघोष दूर-दूर तक फैल गया। नगर रक्षकों ने आगे बढ़कर शिल्पी प्रतनु और महालय की प्रमुख नृत्यांगना रोमा को रस्सियों में जकड़ लिया।

  – ‘पापियों को दण्ड दो। मातृदेवी की मर्यादा भंग करने वालों को दण्ड मिलना ही चाहिये।’ सहस्रों कण्ठ फिर से चिल्लाने लगे। चारों और रोष का लावा फूट पड़ा।

राजनीति के चतुर खिलाड़ी किलात ने परख लिया कि यही वह अवसर है जब अपने शत्रु पर भरपूर वार किया जाये। अपनी दोनों भुजायें हवा में उठाकर उसने सैंधवों को शांत होने का संकेत किया और बोला- ‘मातृदेवी को पातकी शिल्पी की बलि चाहिये।’

क्षण भर के लिये पाण्डाल में सन्नाटा छा गया। अचानक एक वृद्ध सैंधव चिल्लाया- ‘मातृदेवी यदि पातकी की बलि चाहती हैं तो फिर देर किस बात की है!’

  – ‘हाँ-हाँ, मातृदेवी को प्रसन्न करने के लिये पातकी शिल्पी की बलि चढ़ा देना ही उचित है।’ सहस्रों कण्ठों ने प्रौढ़ सैंधव का समर्थन किया।

ठीक उसी समय सैंधवों ने देखा कि महालय की वृद्धा दासी वश्ती मंच पर खड़ी हो कर सैंधवों को सम्बोधित करके चिल्ला रही है किंतु उसकी आवाज लोगों तक पहुँच नहीं पा रही। दासी की बात सुनने के लिये सैंधव समुदाय मौन हो गया। दासी वश्ती बुरी तरह हांफती हुई बोली- ‘सत्य वह नहीं है जो आप लोगों को बताया गया है। सत्य कुछ और ही है। यदि आप सत्य जानना चाहते हैं तो मेरे साथ महालय में चलिये और सत्य के दर्शन अपनी आँखों से कर लीजिये।’

  – ‘मिथ्या प्रलाप करती है यह वृद्धा दासी। रक्षको! इसे भी बंदी बना लो।’ स्वामी किलात ने उच्च स्वर में कहा। नगर रक्षक रस्सियाँ लेकर आगे बढ़े।

  – ‘नहीं-नहीं वृद्धा की बात सुने बिना उसे बंदी बनाया जाना उचित नहीं है।’ अनेक सैंधव चिल्ला उठे। नगर रक्षक वहीं ठहर गये।’

  – ‘मैं कहता हूँ, बंदी बना लो इस विक्षिप्त दासी को।’ किलात ने फिर नगर रक्षकों को निर्देश दिया।

  – ‘नहीं! वृद्धा की बात सुने बिना इसे बंदी नहीं बनाया जा सकता।’ अनेक युवक कूद कर मंच पर जा चढ़े, बोलो माता, आप क्या कहना चाहती हैं, किस सत्य के दर्शन करवाना चाहती हैं ?

  – ‘स्वामी किलात ने नृत्यांगना रोमा के साथ छल किया है। अभिचार किया है उस पर।’

  – ‘छल! अभिचार!’ सैंकड़ों लोग एक साथ चिल्लाये।

  – ‘हाँ-हाँ, छल! अभिचार! आप चलिये मेरे साथ। आपको विश्वास हो जायेगा।’

  – ‘हाँ-हाँ, चलकर देखना चाहिये, वृद्धा क्या दिखाना चाहती है!’ एक युवा सैंधव ने वृद्धा का समर्थन किया।

किलात का श्यामवर्णी चेहरा पूरी तरह काला पड़ गया। कुछ युवकों ने उसे घेर लिया ताकि वह भाग नहीं सके। मातृदेवी के वेश में अनावृत्त पड़ी रोमा लज्जा और संकोच से धरती में गढ़ी जा रही थी। प्रतनु ने उसे अपना उत्तरीय प्रदान किया जिसे रोमा ने अपनी देह पर लपेट लिया। कुछ युवकों ने नृत्यांगना रोमा को सहारा दिया। रोमा ने देखा कि इस बार वह किंचित् प्रयास से उठकर खड़ी हो गयी है। क्या चमत्कार है यह! कहीं वश्ती सत्य ही तो नहीं कह रही! कहीं स्वामी किलात ने किसी तरह का अभिचार तो नहीं किया था उस पर! सहस्रों सैंधव नर-नारी वृद्धा वश्ती के पीछे चल पड़े।

सैंधवों ने पशुपति महालय में जाकर देखा तो उनके नेत्र विस्फरित हो गये। शिल्पी प्रतनु द्वारा दो वर्ष पहले बनायी गयी प्रतिमा के दोनों पाँव टूटे पड़े हैं। चारों ओर रक्त, लालपुष्प, लालचूर्ण, यव, मद्य आदि अभिचार सामग्री बिखरी पड़ी है। लगता था जैसे रात्रि भर कोई यहाँ मलिन अनुष्ठान करता रहा है।

– ‘नहीं ऽ ऽ ऽ ऽ!’ अपनी खण्डित प्रतिमा को देखते ही अदम्य पीड़ा से चीख पड़ी रोमा। यह कैसा दण्ड है स्वामी! दण्डित करना था तो आप मुझे करते! इस प्रतिमा से तो आपकी कोई शत्रुता नहीं थी! यह प्रतिमा तो सैंधवों की शिल्पकला के चरम पर पहुँचने की घोषणा थी,, युगो-युगों तक स्मरण रखी जाने वाली कला प्रतिरूप थी।

तुमने इसे नष्ट कर दिया! ऐसा क्यों किया स्वामी!’ रोमा विक्षिप्त होकर प्रलाप कर उठी। जिस अदम्य पीड़ा को वह इस समय अनुभव कर रही थी, इतनी पीड़ा तो उसे मंच पर लड़खड़ा कर गिरते समय भी नहीं हुई थी। वह धरती पर गिर गयी और फूट-फूट कर रोने लगी।

परिस्थितियों को परिवर्तित हुआ देखकर नगर रक्षकों ने शिल्पी प्रतनु के बंधन खोल दिये। वह धरती पर गिरी हुई रोमा को चुप करने का प्रयास करने लगा किंतु रोमा लगातार करुण क्रंदन किये जा रही थी। सैंधववासी हत्बुद्धि हो उसे देखने लगे।

रुदन के कारण रोमा की हिचकियाँ बंध गयी। विपुल देर तक रुदन करते रहने के पश्चात् वह पुनः खड़ी हुई और किलात को सम्बोधित करके कहने लगी- ‘दुष्ट किलात तू कैसा स्वामी है! तू तो निर्मम वधिक है। तू सैंधवों का रक्षक कैसे हो सकता है! मुझ पर अभिचार करके और शिल्पी प्रतनु की बलि चढ़ाने का प्रयास करके तूने एक नहीं कई अपराध किये हैं। अपनी वासना की पूर्ति के लिये तूने दो प्रणयी आत्माओं के साथ छल किया है, उन्हें अलग करने की कुत्सित चेष्टा की है। मुझसे नृत्यकला छीनी है।     

सैंधवों का शिल्प-गौरव नष्ट किया है। मातृदेवी के गर्भाधान का अनुष्ठान भंग किया है। युगों-युगों से चला आ रहा विश्वास तोड़ा है। तू सैंधवों का संरक्षक नहीं तू तो उन्हें नष्ट करने वाला पिशाच है।’

रोमा का प्रलाप रुकने का नाम नहीं लेता था। ऐसा लगता था मानो वर्षों से संचित पीड़ा आज उसके रोम-रोम से निकल कर बह जाना चाहती हो।

  – ‘अपनी जिस शक्ति पर तुझे इतना अभिमान है, उस शक्ति के कारण ही तू नष्ट हो जायेगा। नष्ट हो जायेगी तेरी समस्त सत्ता जिसमें दो प्रणयी आत्माओं को मिलने नहीं दिया जाता। नष्ट हो जायेगा यह मोहेन-जो-दड़ो जहाँ कलाकारों से उनकी कला छीन ली जाती है। नष्ट हो जायेगी सैंधव सभ्यता, जहाँ नारी को निर्वस्त्र कर नृत्य करने पर विवश किया जाता है।

नष्ट हो जायेंगे चहुन्दड़ो, पेरियानो, सुत्कोटड़ा झूंकरदड़ो, अमरी और ऐलाना, जहाँ से प्रतिवर्ष सहस्रों की संख्या में नागरिक निर्वसना देवबालाओं का नृत्य देखने आते हैं। सैंधव सभ्यता के समस्त पुरों में शृगाल, श्वान और चमगादड़ नृत्य करेंगे। जिस मातृदेवी के साथ तूने अपघात किया है वह मातृदेवी छोड़ेगी नहीं तुझे। मातृदेवी के कोप से सप्त सिंधुओं का जल सैंधव सभ्यता के प्रत्येक नगर में जा घुसेगा और सारी सभ्यता मिट्टी के टीलों में बदल जायेगी।

यह एक प्रणयी आत्मा का श्राप है, एक नृत्यांगना का श्राप है। जा तू नष्ट हो जा, अपने समस्त वैभव और अपनी शक्तियों के साथ। जा नष्ट हो जा अपने समस्त दंभ और अपनी सत्ता के साथ।’ 

किलात पर घृणायुक्त दृष्टि डालकर रोमा ने मुँह फेर लिया और शिल्पी प्रतनु का हाथ पकड़ कर बोली- ‘आओ शिल्पी हम कहीं और चलें। यह पुर तुम्हारे रहने के योग्य नहीं।’ किलात के भ्रष्ट हो जाने से वह धर्म के बंधन से मुक्त हो गयी थी। अब उसके प्रत्यर्पण के लिये शिल्पी को स्वर्णभार अर्पित करने की आवश्यकता नहीं रही थी। रोमा को जाते हुए देखकर सैंधवों की चेतना जैसे लौट आयी।

  – ‘किलात ने सैंधवों के साथ छल किया है। किलात के कारण ही मातृदेवी के गर्भाधान का अनुष्ठान अधूरा रह गया। किलात को दण्ड मिलना चाहिये।’ सैंकड़ों सैंधव युवकों ने किलात को घेर लिया।

  – ‘मातृदेवी को शिल्पी की नहीं किलात की बलि चाहिये। एक युवक चिल्लाया।’

  – ‘हाँ-हाँ, मातृदेवी को किलात की बलि चाहिये।’ सैंकड़ों कण्ठ एक साथ चिल्लाये।

किलात ने जो सोचा था, उसका ठीक विपरीत हो गया था। स्थिति उसके हाथ से निकल गयी थी। सैंकड़ों सैंधव महान् किलात की बलि देने के लिये आतुर होकर चिल्ला रहे थे- ‘स्वामी को अभी ले चलो, मातृदेवी महालय में। इसने मातृदेवी को गर्भवती नहीं होने दिया, मातृदेवी इसकी बलि लेकर ही संतुष्ट होंगी।’

कुछ युवकों ने किलात को पशु की तरह धकेल दिया और उसे मातृदेवी के मुख्य मंदिर की ओर ले चले। अभी वे कुछ ही दूर चल पाये होंगे कि सामने से कुछ नगर रक्षक दौड़ते हुए आये। ये वे नगर रक्षक थे जो नगर प्राचीर के बाहर नियुक्त रहते हैं। वे अत्यंत वेग से दौड़े चले आ रहे थे। भय से सफेद पड़े हुए उनके चेहरे बता रहे थे कि उन्होंने साक्षात् मृत्यु के ही दर्शन कर लिये हैं।

  – ‘सावधान नागरिको! रुक जाओ, आगे मत जाओ। सिंधु का जल अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहा है। सिंधु किसी भी क्षण प्राचीर तोड़कर पुर में प्रवेश कर सकती है। तुरंत सुरक्षित स्थान पर चले जाओ अन्यथा . . . ।’ नगर रक्षक अपनी बात पूरी कह भी नहीं पाया था कि उनके पीछे सिंधु का जल उत्ताल तरंगों पर उछलता-कूदता वहीं आ पहुँचा।

समस्त सैंधव स्वामी किलात को छोड़कर विपरीत दिशा में मुड़े किंतु सिंधु तो जैसे रोमा का आह्वान पाकर ही पुर में घुसी थी! एक प्रबल हुंकार के साथ सिंधु की गगनचुम्बी लहरें आगे बढ़ीं और समस्त सैंधवों को अपनी लपेट में ले लिया।

विपुल जल के वलय में घिर गये प्रतनु ने किसी तरह रोमा को पकड़ा किंतु इस प्रयास में वह बहुत सारा जल पी गया। उसने देखा, रोमा जल में डुबकिया लेने लगी है। प्रतनु के अपने फैंफड़ों में भी जल समाता जा रहा था। कुछ ही क्षणों में उसकी आँखों में अंधेरा उतर आया। क्षण भर के लिये प्रतनु को रानी मृगमंदा, निर्ऋति और हिन्तालिका का स्मरण हो आया।

वह जल के तीव्र वेग में बहा चला जा रहा था रोमा अब भी उसकी पकड़ में थी। उसने रोमा की देह के चारों ओर अपने बाहु कसकर लपेट लिये किंतु कुछ ही क्षणों बाद उसकी पकड़ रोमा की कलाई से शिथिल हो गयी। अब चारों ओर केवल जल ही जल दिखायी देता था। सिंधु के जल से उत्पन्न सैंधव सिंधु में ही समा गये प्रतीत होते थे।

– अध्याय 38, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] पूर्व दिशा।

प्लावन (39)

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प्लावन

यह एक सुखद संयोग ही था कि आर्यों को इतना ऊँचा और विशाल बालुका स्तूप मिल गया था अन्यथा इस प्लावन में उनका नष्ट हो जाना निश्चित था।

कुभा, सुवास्तु क्रुमु, तथा गोमती आदि नदी-तटों को पीछे छोड़कर चतुरंगिणी पुनः सिंधु-नद के तट पर लौट आयी। असुरों के विरुद्ध उसका अभियान पूरा हो गया था। अधिकांश असुर अपना क्षेत्र छोड़कर पर्वतों के उस पार पलायन कर गये थे। कुछ असुर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष युद्धों में मारे भी गये थे।

सिंधुनद के तट से चतुरंगिणी ने परुष्णि के लिये मार्ग न पकड़ कर सिंधु-नद के साथ-साथ दक्षिण दिशा में चलना आरंभ किया। इस मार्ग में सैंधवों के कई पुर स्थित हैं। आर्यों का अनुमान था कि सैंधव उनका स्वागत नहीं करेंगे तो प्रतिरोध भी नहीं कर सकेंगे। जब चतुरंगिणी ने लघु सैंधव पुरों को जा घेरा तो आर्यों का अनुमान सत्य सिद्ध हुआ। सैंधवों ने शस्त्र उठाने के स्थान पर चतुरंगिणी को औत्सुक्य, भय और चिंता के साथ देखा। क्या चाहते हैं शत्रु आर्य!

सैंधवों ने अब से पहले केवल असुर सैनिकों को देखा था। महिष और उष्ट्र पर आरूढ़ असुरों के दल बिना किसी पूर्व सूचना के सैंधव पुरों में प्रवेश कर जाते थे तथा तब तक संतुष्ट नहीं होते थे जब तक मद्य, आसव और मज्जा यथेष्ट मात्रा में नहीं पा जाते थे। यह प्रथम अवसर था जब वे आर्य सैन्य को देख रहे थे।

यह भी प्रथम अवसर था जब वे किसी सैन्य को कुछ भी नहीं मांगते हुए देख रहे थे। इतना ही नहीं सैंधवों के लिये तो यह भी प्रथम अवसर था कि वे किसी सैन्य को महिष, वृषभ अथवा उष्ट्र पर आरूढ़ न देखकर बिल्कुल नये प्राणी ‘अश्व’ पर देख रहे थे।

‘अश्व’ नामक नवीन पशु पर बैठकर आने वाली आर्य सेना सैंधवों के लिये हर प्रकार से विचित्र थी। ‘हस्ति’ सैंधव क्षेत्र के वनों में प्रचुर संख्या में थे किंतु वे केवल भार वहन के काम आते थे। सैंधवों ने हस्तियों को इस नवीन भूमिका में प्रथम बार ही देखा था। आर्यों के रथ बहुत कुछ उनके शकटों जैसे थे किंतु इन रथों को देखकर सैंधवों को भय लगता था।

जहाँ सैंधवों और असुरों के शकट काष्ठ निर्मित थे, वहीं आर्यों के रथ कृष्णायस निर्मित थे। आर्यों के अस्त्र-शस्त्र भी असुरों के अस्त्र-शस्त्रों की अपेक्षा अधिक बड़े और अधिक भय उत्पन्न करने वाले थे। एक और विचित्र बात भी थी जो सैंधवों ने आश्चर्य के साथ देखी, कोई भी आर्य सैनिक अपने शीश पर शृंग धारण नहीं किये हुए था।

जब चतुरंगिणी ने सैंधवों के किसी भी पुर में बलपूर्वक प्रवेश नहीं किया, न ही किसी तरह का आक्रमण किया और न ही असुरों की तरह किसी तरह की मांग रखी तो सैंधवों के आश्चर्य का पार न रहा। उन्हें समझ में नहीं आया कि जिन आर्यों को वे कठिन शत्रु मानते आये हैं, वे आर्य किसी तरह का शत्रु भाव न रख कर केवल मैत्री का संदेश देने उनके पुर तक क्यों आये हैं! और संदेश भी कैसा, लेश मात्र भी समझ में नहीं आने वाला। वास्तव में ये आर्य चाहते क्या हैं सैंधवों से!

सिंधु के दीर्घ तटों पर स्थित सैंधव-पुरों को चतुरंगिणी एक ही संदेश देती चली जा रही है- आर्यों ने असुरों को पर्वत पार के विकट मरुस्थल में धकेल दिया है। असुरों की संस्कृति हेय है, वह अनुसरण करने योग्य नहीं है। सैंधव-जन असुरों की विकृत संस्कृति का अनुसरण न करें। अन्यथा वे भी शनैः-शनैः असुर सभ्यता में विलीन हो जायेंगे।

जिस उच्च संस्कृति का निर्माण उनके पूर्वजों ने किया है उसकी रक्षा करें। नग्न स्त्रियों की प्रतिमाओं को पूजना बंद करें, मांस तथा मदिरा का सेवन बंद करें। देव प्रतिमाओं को पशु-पक्षियों की बलि चढ़ाना बंद करें तथा अनाचार के स्थान पर सदाचार को अपनायें। सैंधव-जन आर्यों के इस संदेश को समझें और उस पर आचरण करें। अन्यथा यह विशाल चतुरंगिणी उन्हें भी असुरों की भांति मरुस्थल में धकेल देगी।

क्यों चाहते हैं आर्य ऐसा! शताब्दियों से सैंधव असुरों से ही मित्रभाव मानते और रखते आये हैं। इन्हीं आर्यों ने उनकी प्राचीन राजधानी कालीबंगा का पुर तोड़ा था। इतने अंतराल पश्चात् यह मित्रता कैसी! यह संदेश कैसा! कहीं न कहीं, कुछ न कुछ और भी अभिप्रेत है जिसे आर्य स्पष्ट रूप से नहीं बता रहे। चकित सैंधव आर्यों के संदेश को न तो स्वीकार कर पाते हैं और न अस्वीकार। नितांत मौन रहकर केवल आगे जाती हुई चतुरंगिणी को शंकित हृदय से विदाई देते हैं। आर्य सैन्य भी उनकी स्वीकरोक्ति की प्रतीक्षा किये बिना आगे बढ़ जाता है। आर्य सैन्य का अभीष्ट तो बस यही है कि यह संदेश अधिक से अधिक सैंधव पुरों तक पहुँचे।

सेनप सुनील ने अनुभव किया कि भले ही सैंधव आर्यो की चतुरंगिणी को चकित, शंकित और भयभीत दृष्टि से देख रहे हैं, भले ही यह यात्रा असुरों पर किये गये अभियान जैसी आक्रामक नहीं है किंतु यह भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध हो रही है जितना कि असुरों के विरुद्ध किया गया अभियान। निःसंदेह राजन् सुरथ की दृष्टि दूर भविष्य में भी जाती है।

उन्होंने ही असुर भूमि से लौटते हुए प्रस्ताव किया था कि पुनः लौटने से पहले सिंधु-तटों पर स्थित पुरों की यात्रा की जाये। जबकि आर्य सैनिक अपने जन को लौटने के लिये उतावले हो रहे थे।कितने प्रभावी ढंग से तब राजन् सुरथ ने आर्यवीरों को इस यात्रा के महत्व और उसकी आवश्यकता को समझाया था-द्रविड़ों से सम्पर्क करना आवश्यक है।

वे दीर्घ काल से असुरों के प्रति मित्रभाव और आर्यों के प्रति शत्रु भाव रखते आये हैं। असुरों के ही समान वे सिर पर शृंग धारण करते हैं, निर्वस्त्र प्रतिमायें बनाकर उनकी पूजा करते हैं, मांस तथा मद्य का सेवन करते हैं, देव-प्रतिमाओं को पशु-पक्षियों की बलि चढ़ाते हैं, शिश्न और योनि पूजन करते हैं। धीरे-धीरे वे स्वयं भी असुर होते जाते रहे हैं।

आज वे युद्ध से उदासीन हैं किंतु कालांतर में वे असुरों के प्रभाव से आर्यों के विरुद्ध आक्रामक भी हो सकते हैं। असुरों और सैंधवों की संगठित शक्ति का सामना करना आर्यों के लिये अत्यंत कठिन होगा।

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा, सेनप सुनील, आर्य अतिरथ, आर्य सुमति तथा अन्य प्रमुख आर्य वीरों ने समिति आयोजित कर राजन् सुरथ की योजना पर विस्तार से विचार विमर्श किया। उन्हें लगा कि राजन् सुरथ का प्रस्ताव हर तरह से उचित है। उन सब की भी बड़ी इच्छा थी कि वे उस द्रविड़ सभ्यता को अपनी आँखों से देखें जिसकी उन्नत पुर व्यवस्था का वर्णन वे शैशव काल से सुनते आये हैं। केवल एक ही बाधा उन्हें इस कार्य में दिखायी देती थी कि चतुरंगिणी को लम्बी यात्रा करनी पड़ेगी।

इस बीच में पिशाचों के क्षेत्र भी मिल सकते हैं। यदि पिशाचों से भेंट हुई तो उनसे भी निबटना अनिवार्य होगा किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ था। सिंधु तट पर स्थित पुरों के मध्य पणि-सार्थों के निरंतर आवागमन से बने मार्ग के कारण चतुरंगिणी को इस यात्रा में अपेक्षाकृत बहुत कम समय लगा। पिशाचों के क्षेत्र सिंधु से कुछ हटकर थे इससे आर्यों को उनसे भी नहीं उलझना पड़ा।

विचारों में डूबे राजन् सुरथ अश्व को पूरे वेग से फैंकते हुए अपने साथियों से बहुत आगे निकल आये हैं। केवल सेनप सुनील ही किसी तरह अपने अश्व को उनके पीछे लगाये हुए हैं। राजन् सुरथ के साथ सदैव यही होता है, जब भी वे विचारों की धारा में बहते हैं तो उन्हें अपने आस-पास का भान ही नहीं रहता। यह यात्रा इतनी महत्वपूर्ण सिद्ध होगी, इसका अनुमान तो स्वयं उन्हें भी नहीं था।

अच्छा हुआ जो सैंधव-क्षेत्र की यात्रा का निर्णय ले लिया अन्यथा यदि एक बार चतुरंगिणी परुष्णि के तट पर पहुँच जाती तो उसे पुनः संगठित कर सिंधु तट तक लाना विपुल कठिन होता। राजन् सुरथ को प्रजापति मनु का स्मरण बारम्बार हो आता है। इन्हीं सब कठिनाइयों के मध्य वैवस्वत मनु ने प्रजा को संगठित किया होगा!

अश्व पर बैठे-बैठे पीठ दुखने लगी तो आर्य सुरथ ने घने वृक्ष के नीचे अश्व को रोक लिया और नीचे उतर कर वृक्ष के तने से पीठ लगाकर बैठ गये। उन्होंने देखा कि भगवान् भुवन भास्कर पश्चिम दिशा में नीचे झुक गये हैं, संध्या होने में अभी विलम्ब है किंतु आकाश में श्यामवर्णी मेघों के संचरण के कारण अंधेरा समय से पूर्व ही घिर आया है।

  – ‘राजन्। हमारे स्पश की सूचना के अनुसार सैंधवों के दक्षिण प्रदेश की राजधानी मेलुह्ह यहाँ से निकट ही है।’ सेनप सुनील भी राजन् सुरथ के साथ अपने अश्व से उतर पड़े।

मेलुह्ह! चैंक पड़े राजन् सुरथ। सैंधवों की राजधानी मेलुह्ह! इसी नगर को तो लौट रहा था शिल्पी प्रतनु! उस दिन जिससे निर्जन वन में अचानक भेंट हुई थी। मेलुह्ह का नाम सुनकर अचानक उस निर्वस्त्र शिल्पी का स्मरण हो आया राजन् सुरथ को। क्या हुआ होगा उस सैंधव युवक का! क्या उसने पुरोहित किलात से प्रतिशोध ले लिया होगा!

क्या उसे नृत्यांगना प्राप्त हो गयी होगी! क्या उस शिल्पी से उनकी पुनः भेंट हो सकेगी! क्या उस विलक्षण नृत्यांगना से भी मिलना हो सकेगा! कैसी होगी वह सैंधव नृत्यांगना जिसका विशद वर्णन उस शिल्पी ने किया था! रोमांच की एक लहर सी दौड़ गयी राजन् सुरथ की देह में।

  – ‘कितने समय में हम वहाँ पहुँच सकते हैं ?’

  – ‘संभवतः कल मध्याह्न के पश्चात किसी भी समय।’

  – ‘फिर आज का पड़ाव, वह कितनी दूर है अभी!’

  – ‘अधिक दूर नहीं है राजन्। हम रात्रि शिविर के ठीक निकट पहुँच गये हैं। हमारे स्पश और सैनिकों की अग्रिम टुकड़ी का ध्वज अश्व पर चढ़कर देखने से दिखायी दे रहा है।’

  – ‘ठीक है। कल प्रातः हम किंचित् शीघ्र प्रस्थान करेंगे ताकि सूर्यास्त से पूर्व मेलुह्ह पहुँच जायें।’ आर्य सुरथ ने अपने स्थान से उठते हुए कहा।

अश्व पर पुनः आरूढ़ होते हुए राजन् सुरथ ने देखा कि कृष्णवर्णी सघन जलद आकाश में चारों ओर से घिर आये हैं। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने कई माह पहले ही आज की तिथि निश्चित कर रखी है, जिस दिन सूर्य को छठे नक्षत्र ‘आद्र्रा’ में प्रवेश करना है। अतः संध्या के पश्चात् किसी भी समय वर्षा होगी। ऋषिश्रेष्ठ के अनुसार इस बार अधिकतर नक्षत्रों का योग वर्षाकारक है। अतः विपुल वर्षा होना संभावित है।

इससे पहले कि चतुरंगिणी अपने शिविर में पहुँचती, वर्षा आरंभ हो गयी। थोड़ी देर में चारों ओर जल ही जल दिखाई देने लगा। लगता था पूरा का पूरा समुद्र मेघों पर आरूढ़ होकर आकाश तक चढ़ आया है। वर्षा के कारण कोई नहीं सो सका। दो प्रहर रात्रि व्यतीत होने के पश्चात् आकाश से गिरती जल धारायें हिमवृष्टि में बदल गयीं।

विकट शीत हो जाने से सैनिकों के दाँत किटकिटाने लगे। मनुष्य तो मनुष्य चतुरंगिणी के अश्व और हस्ति भी विचलित हो गये। इससे पहले चतुरंगिणी को इतनी विकट वर्षा का समना नहीं करना पड़ा था।

 रात्रि के तीसरे प्रहर में सेनप सुनील ने राजन् सुरथ के शिविर में प्रवेश किया- ‘असमय व्यवधान के लिये क्षमा करें राजन्! स्पश सूचना लाया है कि सिंधु का जल तीव्र गति से ऊपर उठ रहा है। कदाचित प्लावन होने को है। हमें सावधान रहना होगा।’

  – ‘प्लावन! इस समय सिंधु में प्लावन हुआ तो बहुत विनाशकारी होगा आर्य। यह तो सम्पूर्ण चतुरंगिणी को नष्ट कर देगा। हमारे सैनिक, अश्व और हस्ति बह जायेंगे। रथ एवंअस्त्र-शस्त्र नष्ट हो जायेंगे।’ सेनप सुनील की बात सुनकर सन्न रह गये सुरथ। वे तो केवल वृष्टि के सम्बन्ध में ही चिंता करते रहे थे, प्लावन की ओर तो उनका ध्यान ही नहीं गया था।

  – ‘इस विकट परिस्थिति में हमारे लिये क्या आदेश है राजन् ?’

  – ‘क्या ऋषिश्रेष्ठ को सूचित किया है आर्य! ‘

  – ‘हाँ, उन्हें सूचना दी जा चुकी है।’

  – ‘क्या कहते हैं ऋषिश्रेष्ठ ?’

  – ‘उन्होंने मुझे आपको सूचित करने के लिये कहा है।’

  – ‘ठीक है। समस्त सैनिकों को सावधान करें और जितनी शीघ्रता संभव हो, उतनी शीघ्रता के साथ सिंधु तट से दूर हटना आरंभ करें। सैनिकों से कहें कि शिविर को इसी तरह लगा रहने दें। केवल पशुओं, रथों और अस्त्र-शस्त्रों को अपने साथ लें।’

चतुरंगिणी ने सिंधु तट से दूर खिसकना आरंभ किया ही था कि वृष्टि बंद हो गयी। यह रात्रि का अंतिम प्रहर था। सूर्योदय होने तक आर्य वाहिनी सिंधु तट से कुछ दूरी पर स्थित एक ऊँचे और विशाल टीले पर पहुँच गयी। इस बीच अवकाश पाकर सैन्य ने तट से शिविर भी हटा लिया।

यद्यपि वृष्टि बंद हो गयी किंतु सिंधु के जलस्तर में वृद्धि होती रही। जान पड़ता था कि सिंधु के उद्गम पर अथवा सिंधु की किसी सहायक नदी में वर्षा का विपुल जल आने से सिंधु में प्लावन आया था। उचित समय पर निर्णय लिया था राजन् सुरथ ने। मध्याह्न होने तक ‘सिंधु’ नद अथवा नदी न रहकर जलधि में परिवर्तित हो गयी।

ऊँचे स्तूप पर स्थित चतुरंगिणी चारों ओर जल से घिर गयी। यह एक सुखद संयोग ही था कि आर्यों को इतना ऊँचा और विशाल बालुका स्तूप मिल गया था अन्यथा इस प्लावन में उनका नष्ट हो जाना निश्चित था।

जहाँ तक दृष्टि जाती थी, वहाँ तक केवल जल ही जल दिखायी देता था। आगे बढ़ना तब तक के लिये असंभव हो गया जब तक अग्नि वरुण को परास्त न कर दे। राजन् सुरथ को लगा वरुण ने कुछ दिनों के लिये चतुरंगिणी को बंदी बना लिया है।

– अध्याय 39, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेलुह्ह (40)

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मेलुह्ह

  – ‘वह जो भित्ती दिखायी दे रही है, वही मेलुह्ह पुर की प्राचीर है। लगभग एक प्रहर में हम वहाँ होंगे। हमारे स्पश आज प्रातः ही वहाँ पहुँच गये थे। किसी भी क्षण वे हमें लौटते हुए मिलेंगे।’ सेनप सुनील ने अपना अश्व आर्य सुरथ के अश्व के बराबर लाते हुए कहा। लगभग पूरे एक पक्ष तक प्लावन से घिरे रहने के पश्चात् आज ही चतरंगिणी मेलुह्ह के लिये प्रस्थान कर पायी थी।

  – ‘आपको उस सैंधव शिल्पी का स्मरण है आर्य ?’ राजन् सुरथ ने अपने अश्व की गति कम कर ली ताकि वार्तालाप में सुगमता रहे।

  – ‘कौन, वह जो निर्वस्त्र अवस्था में मिला था! ‘

  – ‘हाँ, वही। वह मेलुह्ह का ही रहने वाला तो था। आपको क्या लगता है, क्या उसने पुजारी से प्रतिशोध ले लिया होगा ?’

  – ‘यह तो वहाँ पहुँच कर ही ज्ञात……….।’

सेनप सुनील की बात अधूरी रह गयी। अचानक पश्चिम दिशा से शलभों [1] का विशाल समूह उड़ता हुआ ठीक उनके ऊपर आ गया। कोटि-कोटि शलभ। कहाँ से आये होंगे इतने सारे शलभ एक साथ!

  – ‘बचिये राजन् इन विकराल शलभों से बचिये।’ सेनप सुनील अश्व से नीचे कूद गये। उन्होंने राजन् सुरथ के चारों ओर भुजाओं का घेरा बना लिया। भुजाओं का यह क्षीण वलय किसी भी अर्थ में राजन् की सुरक्षा करने में समर्थ नहीं था। फिर भी इसके अतिरिक्त और कोई उपाय भी तो नहीं था। शलभों ने आकाश को पूरी तरह आच्छादित कर लिया जिससे चारों ओर अंधकार छा गया। राजन् सुरथ भी अश्व त्याग कर धरित्री पर आ गये।

  – ‘ऐसे नहीं आर्य। ऐसे रक्षा नहीं होगी। अपना उत्तरीय उतार कर उससे शरीर ढकिये और धरित्री पर बैठ जाइये।’ राजन् ने सेनप सुनील को आदेश दिया। 

कुछ ही समय में उन्हें ज्ञात हो गया कि ये शलभ उन्हें हानि पहुँचाये बिना आगे बढ़ रहे हैं। जब पूरा समूह उनके सिर के ऊपर से होता हुआ पूर्व की ओर चला गया तो पुनः प्रकाश हुआ। राजन् सुरथ के मस्तक पर चिंता की रेखायें थीं। ये शलभ तो जहाँ भी जायेंगे उस क्षेत्र की वनस्पति को नष्ट कर देंगे। उस क्षेत्र की प्रजा का जीवन संकट में पड़ जायेगा। चिंतित राजन् पुनः अश्व पर आरूढ़ होकर कुछ दूर ही चले होंगे कि सामने से एक स्पश आता हुआ दिखायी दिया। उसने अश्व से नीचे उतर कर राजन् का अभिवादन किया।

  – ‘क्या समाचार हैं आर्य ?’ राजन् ने स्पश के अभिवान का उत्तर देकर पूछा।

  – ‘बड़ी असमंजस की स्थिति है राजन्।’

  – ‘असमंजस! कैसा असमंजस! स्पष्ट कहो आर्य।’

  – ‘सम्पूर्ण पुर रिक्त है। कहीं कोई प्राणी नहीं है। श्वान और विडाल [2] भी दिखायी नहीं देते। गृद्धों [3] और शृगालों [4] के समूह मांस के लोथ खींच-खींच कर खा रहे हैं।’

  – ‘क्या किसी सैन्य ने आक्रमण किया था पुर पर ?’

  – ‘सैन्य आक्रमण के चिह्न दिखायी नहीं देते। फिर भी एक भी अक्षत शव देखने को नहीं मिला। गृद्धों ने सभी शवों को पूरी तरह चीर-फाड़ दिया है।’

  – ‘किंतु पुर के श्वान, मार्जार [5] और अन्य पशु। वे कैसे मारे गये होंगे ?’

  – ‘सम्पूर्ण पुर प्लावन में बह गया लगता है। भवनों में गीली रेत तथा शैवाल [6] जमा है और उनमें मज्जूक [7] तथा चिच्चिक [8] बोल रहे हैं। अधिक संभावना तो यही है कि पुरवासी प्लावन में डूब जाने से मरे होंगे।’

  – ‘निःसंदेह यही हुआ होगा।’ आर्य सुरथ ने शोक से सिर हिलाया।

  – ‘इसका अर्थ है कि अब आगे बढ़ने का कोई लाभ नहीं है!’ सेनप सुनील ने पूछा।

  – ‘हाँ आर्य। यहाँ से आगे जाना निरर्थक है।’ स्पश ने उत्तर दिया।

  – ‘नहीं-नहीं हम वहाँ अवश्य जायेंगे। आप ऐस करें आर्य। चतुरंगिणी को यहीं से लौट जाने के आदेश दें। हम पुर तक होकर आते हैं।’ राजन् सुरथ ने अपने अश्व को आगे बढ़ाते हुए कहा।

चैंक पड़े सेनप सुनील और स्पश दोनों ही। राजन् सुरथ का स्वर अचानक ही विकृत हो आया था। क्या हुआ राजन् को! लगता है उन्हें सैंधव पुर के नष्ट हो जाने की सूचना पाकर व्यथा हुई है! सेनप सुनील ने अपना अश्व राजन् के पीछे लगा दिया। स्पश चतुरंगिणी को रोकने का कार्य उन्होंने स्पश पर छोड़ दिया।

राजन् सुरथ ने अपने अश्व की गति असाधारण रूप से तीव्र कर ली। कुछ ही देर में वे मेलुह्ह के मुख्य द्वार पर थे। पुर में प्रवेश करते ही उनका सामना गृद्धों तथा शृगालों के समूह और शवों की दुर्गंध से हुआ। चारों ओर मृत्यु के चिह्न दिखायी देते थे। ऐसा लगता था जैसे कोई नदी नहीं अपितु हस्तियों का विशाल समूह पुर को रौंद कर निकल गया है।

क्या हुआ होगा शिल्पी और उसकी नृत्यांगना का! क्या वे दोनों भी प्लावन में बह गये होंगे! कहाँ गया होगा उनका स्वामी किलात! राजन् सुरथ ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते थे, त्यों-त्यों उनकी उत्तेजना बढ़ती जाती थी। अचानक उनके अश्व ने ठोकर खायी। राजन् सुरथ ने झुक कर देखा पंक [9] से सनी हुई एक प्रस्तर प्रतिमा अश्व के पैरों में पड़ी है। वे अश्व की पीठ त्याग कर नीचे उतर आये और प्रतिमा को सीधे खड़ा किया। संभवतः किसी नृत्यांगना की प्रतिमा है।

पंक से सनी हुई यह प्रतिमा राजन् सुरथ को विलक्षण सी लगी। उन्होंने पास के खड्ड में एकत्र जल से प्रतिमा को धोया। पंक का आवरण हटते ही एक अत्यंत भव्य और सुंदर शिल्प निकल आया। इतनी सुंदर प्रतिमा! किस की हो सकती है यह! कहीं यह वही प्रतिमा तो नहीं जिसका उल्लेख शिल्पी प्रतनु ने किया था। लगती तो वही है, यह नृत्यरत प्रतीत होती है किंतु ……….किंतु यह प्रतिमा खण्डित क्यों हैं ? एक प्रश्न प्लावन के जल की भांति उनके मस्त्ष्कि में वलय बनाता हुआ तेजी से घूमने लगा।

– अध्याय 40, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] टिड्डी।

[2] बिल्ली।

[3] गीध।

[4] गीदड़।

[5] बिल्ली।

[6] काई।

[7] मेंढक।

[8] सूक्ष्म जंतु जो ची-ची की ध्वनि करता है।

[9] कीचड़।

मणिपर्यंक (41)

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मणिपर्यंक

चक्रवर्ती सम्राट सुरथ को लगा वे सिंधु की स्तुति नहीं कर रहे, वे तो शिल्पी प्रतनु को अर्घ्य दे रहे हैं जो नृत्यांगना रोमा के साथ सिंधु तट पर बिछे इतिहास के मणिपर्यंक पर सदा-सर्वदा के लिये शैय्यासीन हो गया है।

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने यज्ञकुण्ड में आहुति देकर अपने विशाल नेत्र खोले। आज दीर्घकाल के पश्चात् असुरों के भय से पूर्णतः मुक्त होकर आर्य-जन पुनः प्रातः कालीन अग्निहोत्र में उपस्थित है।

‘तृत्सु,-जन’ के नाम से विख्यात इस जन के साथ-साथ भरत, जह्नु अनु और भृगु जनों के राजन् ऋषिगण एवं प्रजाजन भी उपस्थित हैं। सबके लिये यथेष्ट बलिभाग की व्यवस्था की गयी है। दीर्घकाल के पश्चात् यह सब पुनः देखने को मिला है। यद्यपि आर्य सोम को पुनः प्राप्त नहीं कर सके हैं किंतु आर्य चतुरंगिणी द्वारा चारों दिशाओं में विजय पताका फहराने के कारण आर्यों के मुखमण्डल पर दिव्य आभा विराजमान है।

  – ‘हे राजन्! आपके उद्यम से सम्पूर्ण सप्तसिंधु क्षेत्र में आर्य प्रजा स्थापित हो गयी है। प्रजापति मनु ने प्रजा को संगठित करने का जो कार्य आरंभ किया था उसे हमने आपके नेतृत्व में पूरा किया है। सेना एवं प्रजा को सन्मार्ग पर चलाने वाले राजन्! आपका सैन्य बलशाली एवं ज्ञानवान् है, वह शत्रु को नष्ट करने में समर्थ है। उसके सहयोग से आप ऐश्वर्यवान होकर खूब चमकें।’ [1] ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने राजन् को संबोधित किया।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ! शत्रु पर विजय राजा प्राप्त नहीं करता। जिस राजा का सैन्यबल प्रबल होता है, वह सैन्यबल राजा से सहयोग कर राजा की कीर्ति को प्रदीप्त करता है। अतः इस सफलता का श्रेय आर्यों की प्रबल चतुरंगिणी को जाता है न कि मुझे।’

  – ‘हे राजन्। हमें ऐसे व्यक्ति को अपना राजा बनाना चाहिये जो महान् तेजस्वी, सम्मानित, शत्रुहंता एवं संग्राम में रथ को संभालने में प्रवीण हो। संग्राम में शस्त्रविहीन होने पर शत्रु को वैसे ही पछाड़े जैसे सिंह भैंसों को पछाड़ देता है। आप में ये सब गुण विद्यमान हैं। अतः आप ही इस श्रेय को प्राप्त करने के अधिकारी हैं।’ [2]

  – ‘महात्मन्! मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ।’

  – ‘हे मनुपुत्र! तृत्सु, भरत, जह्नु अनु और भृगु नामक पाँच जनों से निर्मित यह आर्य जनपद आपको चक्रवर्तिन की उपाधि प्रदान करता है। हे आर्य! आज से आपको इस सम्पूर्ण जनपद की रक्षा करनी है। पवित्र नदियों का जल हाथ में लेकर संकल्प लीजिये कि मैं चक्रवर्ती सम्राट बन कर आर्यों की रक्षा उसी प्रकार करूंगा जैसे एक पिता अपने पुत्र की रक्षा करता है।’ ऋषिश्रेष्ठ ने कुछ जलबिन्दु राजन् के करतल पर रखे।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ आपकी और पंचजन की आज्ञा से मैं आर्यों का चक्रवर्ती सम्राट होना स्वीकार करता हूँ।’

  – ‘हे राजन्। सम्पूर्ण आर्य क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली नदियाँ हमारे लिये पूज्य हैं। अतः  अग्नि पूजन के साथ हमें इन पवित्र सरिताओं की भी स्तुति करनी चाहिये।’

पवित्र सरिताओं का जल करतल में लेकर राजन् सुरथ ने नेत्र बंद कर लिये तथा उच्च स्वर में उच्चारित किया- ‘हे गंगे, यमुने, सरस्वति, शुतुद्रि, परुष्णि! मैं आपकी स्तुति करता हूँ। आप इसे स्वीकार करें। असिक्नी के साथ मरुद्वृधे, वितस्ता, आर्जिकीये तथा सुषोमा इसे सुनें। हे सिंधु ! आप अपने प्रवाह के प्रथम चरण में तृष्टामा, सुसर्तु रसा, श्वेत्या तथा कुभा के साथ गोमती से मिलने तथा मेहत्नु के साथ क्रुमु से मिलने के लिये एक ही रथ में जाती हैं। आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें।[3]

चक्रवर्ती सम्राट सुरथ जिस नदी का नाम उच्चारित करते जाते थे, उस नदी-तट का दृश्य उनके नेत्रों के समक्ष घूम जाता था। आर्यों की विशाल चतुरंगिणी के साथ की गयी नदी तटों की प्रत्येक यात्रा उनके स्मृति-पटल पर उभर आयीं। कितनी-कितनी स्मृतियाँ एक-एक सरिता के साथ जुड़ी हुईं थीं!

ये नदियाँ ही उनके संघर्ष की साक्षी रही हैं। इन नदियों ने ही धरित्री पर जीवन को रचा है। इन्हीं ने मनष्य को संघर्ष करने का बल दिया है। सचमुच ये नदियाँ ही हैं जिनके जल से मनुष्य जन्म लेता है और फिर अंत में उन्हीं में विलीन हो जाता है।

जैसे ही उन्होंने सिंधु का नाम उच्चारित किया, उनके नेत्रों में शिल्पी प्रतनु की छवि प्रकट हुई। उसके साथ ही प्रकट हुआ मेलुह्ह और वह विलक्षण-खण्डित प्रतिमा।

उन्हें लगा वे सिंधु की स्तुति नहीं कर रहे, वे तो शिल्पी प्रतनु को अर्घ्य दे रहे हैं जो नृत्यांगना रोमा के साथ सिंधु तट पर बिछे इतिहास के मणिपर्यंक पर सदा-सर्वदा के लिये शैय्यासीन हो गया है। आर्य सुरथ ने नेत्र खोले, ऋषिश्रेष्ठ अग्नि को पूर्णाहुति अर्पित कर रहे थे- ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते। [4]

– अध्याय 41, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] यत्ते मनुर्यदनीकं सुमित्रः समीधे अग्ने तदिदं नवीयः । स रेवच्छोच स गिरो जुषस्व स वाजेदर्षि स इह श्रवो धाः।। (ऋ. 10. 69. 3)

[2] असमातिं नितोशनं त्वेषं निययिनं रथम्। भजे रथस्य सत्यतिम्।। यो जनान्महिषाँ इवातितस्थौ पवीरवान्। उतापवीरवान्युधा।। (ऋ. 10. 61. 2- 3)

[3] इमं मे गंगे यमुने सरस्वति शुतद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या। असिक्न्या मरुद्वृधेविस्तयाऽऽर्जीकीये शृणुह्या सुषोमया। तृष्टामया प्रथमंयातत्रे सजूःसुसर्त्वा रसया श्वेत्या त्या। त्वं सिंधो कुभया गामतीं क्रुभुं मेहल्वा सरथं याभिरीयसे। (ऋ. 10. 75.  5-6)।

[4] वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण निकलता है किंतु इस पूर्ण के उस पूर्ण में से निकलने के पश्चात् भी जो कुछशेष बचता है वह भी पूर्ण ही है ( बृहदारण्यक प्प् . 3 . 19 )।

प्रस्तावना – चित्रकूट का चातक

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प्रस्तावना - चित्रकूट का चातक
प्रस्तावना - चित्रकूट का चातक

प्रस्तावना – चित्रकूट का चातक पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट चातक की पृष्ठभूमि स्पष्ट की गई है।

अब्दुर्रहीम खानखाना की पहचान आज के भारत में एक ‘संत-कवि’ की है। इसीलिये हिन्दू उन्हें रहीमदासजी कहते हैं। विगत चार सौ वर्षों से वे करोड़ों हिन्दी भाषी भारतीयों के लिये श्रद्धा के पात्र हैं। वे दर्शन और नीति के प्रकाण्ड पण्डित माने जाते हैं।

यद्यपि उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, फारसी और डिंगल आदि भाषाओं में उस युग की प्रचलित पद्धतियों में सब तरह के काव्य की रचना की है किंतु उनकी विलक्षण प्रतिभा उनके दोहों में देखने को मिलती है। उनके दोहे आम भारतीय के मन में नैतिकता और उत्साह भरने का काम करते हैं तथा जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

अब्दुर्रहीम खानखाना का उल्लेख कहीं-कहीं अपने समय के महान दानवीर पुरुष के रूप में, कहीं-कहीं अकबर के सेनापति के रूप में तथा कहीं-कहीं गोस्वामी तुलसीदासजी के मित्र के रूप में भी होता है किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि आज जिस रहीम को केवल कवि के रूप में पहचाना जा रहा है, उसका अतीत किसी और रूप में भी अपनी स्वर्णिम पहचान रखता है।

रहीम का यह अतीत इतिहास के पन्नों में उसी तरह दब कर रह गया है जैसे राख की ढेरी में रक्त-तप्त अंगारा दब जाता है। वह दिखाई तो नहीं देता किंतु उसमें आँच बनी रहती है।

चार सौ साल की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद यदि आज इतिहास के पन्नों को टटोल कर देखें तो उनमें रहीम चमकीले हीरे की तरह अलग से दिखाई देता है। एक ऐसा हीरा जो अपनी ही आभा से जगमग करता है, एक ऐसा हीरा जिसने खुद अपने आप को तराश कर चमकने योग्य बनाया है, एक ऐसा हीरा जिसका सही मोल आज तक न तो इतिहासकार लगा पाये और न हिन्दी साहित्य के समालोचक।

संभवतः इसलिये कि उस युग में एक सिपाही का कवि हो जाना कितनी बड़ी बात थी इसका अनुमान लगा पाना आज की परिस्थितियों में संभव नहीं है। कारण कुछ भी हो सकते हैं किंतु यह सत्य है कि रहीम के लिये उनकी अपनी ही वाणी कितनी सच हुई- ‘रहिमन हीरा कब कहै लाख हमारो मोल!’

आज कितने लोग यह जानते हैं कि जिस मुगलिया सल्तनत के किस्सों से भारतीय इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं, भारत में उस मुगलिया सल्तनत का भवन अब्दुर्रहीम खानखाना के पिता खानखाना बैरामखाँ और स्वयं अब्दुर्रहीम ने खड़ा किया था। आज कितने लोग जानते हैं कि अब्दुर्रहीम खानखाना ने अपनी ‘करुण कोमल कवियोचित वाणी’ के बल पर कठोर मुगल शासकों के हृदयों में सुकोमल मानवीय भावों को जगाने का प्रयास किया!

जिससे निरंकुश मुगलिया शासन के बोझ तले सिसकती हुई त्रस्त हिन्दू जनता को मुस्लिम शासकों के अत्याचारों से राहत मिली! इसका प्रमाण यह है कि अकबर, जहाँगीर और फिर शाहजहाँ रहीम के प्रत्यक्ष सम्पर्क में रहे। इन शासकों के काल में हिन्दुओं पर उतने अत्याचार नहीं हुए जितने कि उनसे पूर्ववर्ती बाबर तथा पश्चवर्ती औरंगजेब के शासन काल में हुए।

इस बात पर विवाद हो सकता है कि रहीम द्वारा पहुँचायी गयी राहत कितनी थी किंतु यह जितनी भी थी, थी तो सही! रेगिस्तान में खड़ी एक हरी झाड़ी ही समस्त जीवों का ध्यान खींचती है। वह विषमतम परिस्थितियों के बीच जीवन की उपस्थिति की घोषणा तो करती ही है!

फिर रहीम तो स्वयं अपने आप में एक पूरा का पूरा उद्यान थे जिसमें बैठकर कुछ दिन ही सही, हिन्दू जाति ने प्रेम की मीठी बयार का अनुभव तो किया! रहीम के दोहों ने लाखों हिन्दुओं को अपनी दुरावस्था पर सोचने और जीवन को सही दिशा में ले जाने के लिये प्रेरित किया। यहाँ तक कि हिन्दुओं के सूर्य कहे जाने वाले मेवाड़ी महाराणाओं को भी उन्होंने कर्तव्य पथ दिखाया। भले ही इसके बदले में रहीमदासजी को मुगल बादशाहों के कोप का भाजन बनना पड़ा।

सत्य के लिये सर्वस्व का त्याग करने वाले और उसकी कीमत अपने पुत्रों और पौत्रों के मस्तकों से चुकाने वाले इस इतिहास पुरुष का चरित्र तो पठन-पाठन के योग्य है ही, साथ ही उनके पिता बैरामखाँ का विपरीत जीवन चरित्र भी सुधि पाठकों के लिये पठनीय और मननीय हो सकता है जो उस काल की परिस्थितियों और परम्पराओं की जीती जागती कहानी कहता है।

यहाँ यह विचार करने योग्य है कि जहाँ  बैरामखाँ अपने समय में हिन्दुओं का सबसे बड़ा शत्रु था वहीं उसका पुत्र रहीम हिन्दू जाति का रक्षक बना और चार सौ साल बीत जाने पर भी हिन्दू जाति की श्रद्धा का पात्र बना हुआ है।

इस उपन्यास की कथा इन्हीं पिता-पुत्र के चारों ओर घूमती है। इन दोनों के चरित्र में पर्याप्त अंतर है। जहाँ बैरामखाँ अपने स्वामी के लिये बिना अच्छे-बुरे का विचार किये निर्दोष प्रजा को विधर्मी मानकर अत्याचार पर अत्याचार करता चला जाता है, शत्रु राजाओं की हत्या करता चला जाता है, वहीं अब्दुर्रहीम मुगल बादशाहों का खानखाना होते हुए भी अपनी स्वतंत्र चेता बुद्धि से शुचि और अशुचि का पर्याप्त विचार करता है।

अकबर के समस्त शत्रुओं के विरुद्ध अभियानों में भी वह शत्रु-अशत्रु में भेद करता है। अकबर के जिन शत्रुओं को रहीम गलत नहीं मानता, उनके विरुद्ध वह अपने मन में दया का भाव रखता है। इस अंतर का परिणाम इन्हीं दोनों के जीवन में देखा जा सकता है। जहाँ रहीम के प्राणों की रक्षा उसके शत्रु भी अपने प्राण देकर करते हैं, वहीं दूसरी ओर बैरामखाँ के मित्र भी बैरामखाँ के प्राण लेने के लिये उद्धत रहते हैं। इन पिता पुत्र के जीवन चरित्र को देखकर एक उक्ति का स्मरण होता है-

भले बुरेन के होत हैं, बदल जात हैं बंस।

हिरनाकुस के हरिभजन उग्रसेन के कंस।।

बैरामखाँ अंत तक विदेशी बना रहता है जबकि उसका पुत्र रहीम पूरी तरह भारतीयता के रंग में रंग जाता है। यही कारण है कि अपने ऊपर विपत्ति आने पर बैरामखाँ मक्का के लिये प्रस्थान करता है तो दूसरी ओर अब्दुर्रहीम विपत्ति आने पर चित्रकूट में प्रवास करता है। संभवतः इसीलिये भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र ने रहीमदासजी और उनके जैसे मुस्लिम भक्तों की सेवाओं का मूल्यांकन इन शब्दों में किया-

”इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन्ह हिन्दू वारिये।”

 रहीमदासजी से मेरा परिचय मेरे पिताजी ने करवाया था जब मैं केवल पांच-छः वर्ष का बालक ही था। तभी से रहीमदास मेरे मन के आंगन में श्रद्धा के पीपल बन कर खड़े हैं। इस हिसाब से मैं विगत पैंतीस वर्षों से रहीमदासजी के साथ जिया हूँ। जबकि बैरामखाँ से मेरा परिचय इतिहास की पुस्तकों ने करवाया है।

मेरा मन रहीमदासजी को लिखने में जितना रमा है, वैसी अनुभूति बैरामखाँ को लिखते समय नहीं हुई फिर भी बैरामखाँ इतिहास का ऐसा पात्र है जो परस्पर विपरीत चारित्रिक गुण-दोषों की मौजूदगी के कारण स्वयं मुखरित है।

भारतीय इतिहास में रहीम रूपी अमूल्य हीरा किस खान से प्रकट हुआ? और कब यह ‘मुसलमान हरिजन’ शताब्दियों की सीमायें लांघकर कोटि-कोटि भारतवासियों की श्रद्धा का पात्र बन गया? यह उपन्यास इन्हीं प्रश्नों का जवाब ढूंढने की चेष्टा है।

रहीम रूपी हीरे की वास्तविक खान की खोज करते हुए हमें मध्य एशिया के इतिहास में तो प्रवेश करना ही पड़ता है, साथ ही प्राचीन पश्चिमोत्तर चीन में बसने वाली हूण और यू-ची जातियों के इतिहास में भी झांकना पड़ता है। इतना ही नहीं घनघोर आश्चर्य तो तब होता है जब हम इतिहास की गहराई में पर्याप्त उतर चुकने के बाद स्वयं को भारत के पौराणिक खजाने में खड़ा पाते हैं।

यही कारण है कि एक ओर तो उपन्यास के आरंभ में राजा ययाति के आख्यान को स्थान मिला है तो दूसरी ओर मध्य एशियाई आक्रांता- चंगेजखाँ और तैमूरलंग भी मौजूद हैं। ताकि पाठक उस घनघोर अंधेरे से भी भली भांति परिचित हो सकें जिसे चीर कर रहीम रूपी दिव्य नक्षत्र उदित हुआ था।

ऐतिहासिक उपन्यास के लेखन में जैसी दुविधा हुआ करती है, उसका सामना मुझे भी करना पड़ा है। यद्यपि मैंने कथा के प्रवाह में औपन्यासिकता और ऐतिहासिकता दोनों की सुगंध को बचाये रखने का प्रयास किया है फिर भी यदि किसी प्रसंग में दोनों में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता अनुभव हुई है तो वहाँ मैंने औपन्यासिक चमत्कारिता का अवलम्बन त्याग कर इतिहास के मूल तथ्यों को बचाया है। मेरे इसी आग्रह के कारण इतिहास ने स्वयं आगे बढ़कर उपन्यास की रक्षा की है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो इतिहास और उपन्यास एक दूसरे का अनुपूरक बन गये हैं।

उस युग के सामाजिक एवं अध्यात्मिक वातावरण को उपन्यास में यथाशक्ति उकेरने का प्रयास किया गया है। इस कारण मीरां बाई, गोस्वामी तुलसीदास, रामदास, भक्त सूरदास, कुंभनदास आदि संतों के उन प्रसंगों को भी उपन्यास में स्थान मिला है जो बैरामखाँ तथा अब्दुर्रहीम के काल से सम्बंध रखते हैं तथा उस युग की वास्तविक तस्वीर प्रदर्शित करते हैं।

मेरे पिता श्री गिरिराज प्रसादजी गुप्ता ने इस उपन्यास के विषय में मुझे पग-पग पर अत्यंत बहुमूल्य परामर्श देकर मेरा बहुत हित साधा है, उनके प्रति विपुल कृतज्ञता अर्पित करता हूँ। मुझे लगता है कि जैसे यह उपन्यास उन्हीं की परिकल्पना थी जिसका बीज उन्होंने मेरे मन में मेरी पाँच वर्ष की आयु में बोया था, वही बीज सुपल्लवित और सुपोषित होकर उपन्यास के रूप में पुष्पित हो गया है।

मैंने लेखकीय धर्म का निर्वहन बिना किसी पूर्वाग्रह के किया है किंतु वास्तविक निर्णय तो सुधि पाठक ही करेंगे कि मैं इस कार्य में कितना सफल रहा! पाठकों से अपेक्षा रहेगी कि वे इस बात का निर्णय चार सौ वर्ष पुरानी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करेंगे। सुधि पाठक इस उपन्यास का आनंद उठायेंगे और उपन्यास में रह गयी कमियों के लिये मुझे क्षमा करेंगे, ऐसी आशा है।

(प्रस्तावना – चित्रकूट का चातक, ऐतिहासिक उपन्यास, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित )

इंसानी खून का रंग (1)

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इंसानी खून का रंग

इस उपन्यास की कहानी हमें बताती है कि इंसानी खून का रंग किस तरह मानव को मानवता का दुश्मन बनाकर उसे दानवता की ओर ले जाता है।

संसार में इंसानी खून का रंग हर जगह लाल है किंतु उसकी ताकत हर जगह अलग है। जब इंसानी खून की ताकत जोर मारती है तो इंसान, इंसान नहीं रहता, हैवान बन जाता है। वह दूसरों का सर्वस्व छीनने और मौत का नंगा नाच देखने के लिये उतावला हो जाता है। छटपटाती हुई लाशें उसे खिलौनों के समान सुख देती हैं।

मौत का करुण क्रंदन उसे मधुर संगीत जैसा लगता है और बहता हुआ इंसानी खून उसे आनंद की बहती हुई नदी के समान दिखाई देता है। यही कारण है कि संसार में अब तक करोड़ों बेगुनाह इंसानों का खून इंसानी हैवानियत के हाथों बह चुका है और उसका बहना आज भी जारी है।

यह कहानी इंसानी खून के हैवानियत भरे कारनामों के बोझ तले सिसकते इतिहास के पन्नों से आरंभ होती है।

इस उपन्यास की कहानी हमें बताती है कि इंसानी खून का रंग किस तरह मानव को मानवता का दुश्मन बनाकर उसे दानवता की ओर ले जाता है। इस उपन्यास के किरदार काल्पनिक कहानियों के किरदार नहीं हैं अपितु भारत के इतिहास के सबसे क्रूर किरदार हैं जिन्होंने भारत भूमि को अपनी तलवार के जोर पर सैंकड़ों साल तक आंसू बहाने पर मजबूर कर दिया।

-अध्याय 1, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

चन्द्रवंशी राजा ययाति (2)

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चन्द्रवंशी राजा ययाति - www.bharatkaitihas.com
चन्द्रवंशी राजा ययाति को श्राप

हिन्दुओं में मान्यता है कि चन्द्रवंशी राजा ययाति के बेटे ‘तुरू’ के वंशज आगे चलकर ‘तुर्क’ कहलाये। कई पुराणों में राजा ययाति की कथा मिलती है। इस कथा का सर्वप्रथम उल्लेख महाभारत में हुआ है जिसके अनुसार राजा ययाति के दो विवाह हुए। पहला विवाह दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से और दूसरा विवाह असुरराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से हुआ था।

देवयानी परम कलहकारिणी और दुष्ट स्वभाव की स्त्री थी। सौतिया डाह के कारण देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से राजा की शिकायत की। शुक्राचार्य ने कुपित होकर राजा ययाति को भयंकर शाप दिया जिससे राजा का यौवन नष्ट हो गया। इंसानी खून ने जोर मारा। वह असमय ही बूढ़ा नहीं होना चाहता था। अभी वह भोग विलास से तृप्त नहीं हुआ था।

शापग्रस्त राजा अपने महल में लौट कर आया। उसके बाल सफेद हो गये थे और चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयीं थीं। यह अयाचित, अनपेक्षित और आकस्मिक विपत्ति थी। उसने देवयानी के बड़े पुत्र यदु को अपने पास बुलाया और अपने शाप की पूरी कहानी बताकर कहा- ‘देखो! मैं शाप के कारण बूढ़ा हो गया हूँ किन्तु अभी भोग विलास की मेरी लालसा मिटी नहीं है। तुम मेरे बेटे हो। मेरी इच्छा को पूरा करना तुम्हारा धर्म है। मेरा बुढ़ापा तुम ले लो और अपना यौवन मुझे दे दो। जब भोग विलास से मेरा मन भर जायेगा तो मैं तुम्हारा यौवन तुम्हें लौटा दूंगा।’

यदु ने पिता का तिरस्कार करते हुए कहा- ‘पिताजी! बुढ़ापा किसी भी तरह से अच्छा नहीं हैं। सुंदर स्त्रियाँ बूढ़े आदमी का तिरस्कार करती हैं इसलिये मैं आपका बुढ़ापा नहीं ले सकता।’

राजा कुपित हो गया। उसने कहा- ‘तू मेरे हृदय से उत्पन्न हुआ है फिर भी अपना यौवन मुझे नहीं देता! मैं तुझे और तेरी संतान को राज्य के अधिकार से वंचित करता हूँ।’

यदु से निराश होकर राजा ने देवयानी के दूसरे पुत्र तुर्वसु को बुलाया। तुर्वसु ने भी पिता की बात मानने से मना कर दिया। राजा फिर कुपित हुआ। उसने तुर्वसु को शाप दिया- ‘पिता का तिरस्कार करने वाले दुष्ट! जा! तू मांस भोजी, दुराचारी और वर्णसंकर म्लेच्छ हो जा।’

देवयानी के पुत्रों के बाद शर्मिष्ठा के पुत्रों की बारी आई। शर्मिष्ठा के दोनों बड़े पुत्रों द्रह्यु और अनु ने भी पिता को अपना यौवन देने से मना कर दिया। राजा ने उन्हें भी भयानक शाप दिये। शर्मिष्ठा के तीसरे पुत्र पुरू ने पिता की इच्छा जानकर कहा-‘पिताजी आप मेरा यौवन ले लें।’

राजा प्रसन्न हुआ। उसने पुरू का यौवन लेकर उसे अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। राजा के शेष पुत्र राजा को त्याग कर चले गये।

 कहते हैं राजा ययाति के शाप से तुर्वसु की संतानें यवन हुईं। उसके वंशज धरती पर दूर-दूर तक फैल गये जो तुर्कों के नाम से जाने गये। ययाति के पुत्र अनु से म्लेच्छ उत्पन्न हुए। अनुमान है कि ‘अनु’ के वंशज इतिहास में ‘हूंग-नू’ अथवा हूण कहलाये।

-अध्याय 2, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

लाओ शंग (3)

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लाओ शंग का काल्पनिक चित्र

लाओ शंग ने यू-ची राजा को मार डाला तथा उसकी खोपड़ी निकलवाकर अपने महल में ले गया। उसके बाद लाओ-शंग ने जीवन भर उसी खोपड़ी में पानी पिया।

चीन के उत्तर में मंगोलिया का विशाल रेगिस्तान है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में इस क्षेत्र में कई बर्बर जातियाँ निवास करती थीं। इन बर्बर जातियों का प्रसार पश्चिमी भाग में फैली सीक्यांग पर्वतमाला तक था। मंगोलिया के गोबी प्रदेश में यू-ची नामक एक प्राचीन जाति निवास करती थी। इसके पड़ौस में अत्यंत बर्बर और भयानक लड़ाका जाति रहती थी जिन्हें हूण कहा जाता था।

पश्चिमी इतिहासकारों की मान्यता है कि तुर्कों के पूर्वज यही हूण थे जिनका मूल नाम ‘हूंग-नू’ था। मूल रूप से यह एक चीनी जाति थी। ये लोग देखने में तो लम्बे, चौड़े, गोरे और सुंदर चेहरे वाले थे किंतु स्वभाव से अत्यंत बर्बर, आक्रमणकारी और हिंसक प्रवृत्ति वाले थे। इनकी खूनी ताकत का मुकाबला संसार की कोई दूसरी जाति नहीं कर सकती थी।

चीन की भौगोलिक बनावट उसे दो भागों में बांटती है- मुख्य प्रदेश तथा बाहरी प्रदेश। जहाँ चीन के मुख्य प्रदेश में सभ्यता का तेजी से विकास हुआ और उसने विश्व को सर्वप्रथम कागज, छापाखाना, पहिए वाली गाड़ी, बारूद, क्रॉस बो, दिशा सूचक यंत्र और चीनी मिट्टी के बर्तन दिये वहीं चीन के बाहरी इलाकों में रहने वाली बर्बर जातियाँ कई सौ सालों तक असभ्य बनी रहीं।

ईसा से चार सौ साल पहले भीतरी चीन में चओ राजवंश अपने चरम पर था और अगले सौ साल में उसका सामंती शासन पूरी तरह समाप्त हो गया। इसके बाद चीन के एकीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हान राजवंश के नेतृत्व में चीन के एकीकरण का काम पूरा हो गया और चीन सभ्यता के नवीन विकास की ओर बढ़ गया।

यह सब भारत से गये बौद्ध धर्म के कारण संभव हुआ लेकिन बाहरी चीन इन सब प्रभावों और परिवर्तनों से भी बिल्कुल अछूता रहा जिसके कारण हूण जाति नितांत असभ्य और बर्बर बनी रही। संभवतः राजा ययाति के शाप के कारण वे अब तक मलिन और हिंसक बने हुए थे।

ई. पू. 174 से ई.पू. 160 तक लाओ शंग हूणों का राजा हुआ। वह बर्बरता की जीती जागती मिसाल था। एक बार उसने यू-ची जाति पर आक्रमण कर दिया। यू-ची लोगों ने हूणों का सामना किया किंतु शीघ्र ही यूचियों के पैर उखड़ गये। लाओ शंग ने यू-ची राजा को मार डाला तथा उसकी खोपड़ी निकलवाकर अपने महल में ले गया। उसके बाद लाओ-शंग ने जीवन भर उसी खोपड़ी में पानी पिया।

-अध्याय 3, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

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