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तूर्य (26)

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तूर्य

नाग कुमारियों ने आज तूर्य [1] का आयोजन किया था। रानी मृगमंदा ने शिल्पी प्रतनु को भी इसमें सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया। सैंधवों में तूर्य आयोजित करने की परम्परा नहीं है इस कारण प्रतनु के लिये इस तरह का आयोजन देखने का पहला ही अवसर था। 

रानी मृगमंदा ने बताया कि तूर्य समारोह में नागकन्यायें अपना पति चुनती हैं, इस कारण तूर्य में भाग लेने के लिये दूर-दूर तक बसे नाग विवरों से नाग दम्पत्ति अपनी विवाह योग्य कन्याओं को लेकर आते हैं। विवाह के इच्छुक नाग युवकों को तो वर्ष भर तूर्य की प्रतीक्षा रहती है।

तूर्य में नाग राजकुमारी ही मुख्य नृत्यांगना होती है इस कारण रानी मृगमंदा, निऋति अथवा हिन्तालिका में से कोई भी मुख्य नृत्यांगना हो सकती है किंतु निऋिति ने प्रतनु को बताया था कि अतिथि प्रतनु के सम्मान में इस बार के तूर्य में रानी मृगमंदा स्वयं मुख्य नृत्यांगना के रूप में नृत्य करेगीं।

रानी मृगमंदा के प्रासाद के निकट स्थित उपवन में तूर्य का आयोजन किया गया था। सूर्योदय के साथ ही तूर्यनाद हुआ। पांचों वाद्य- नगाड़ा, तंत्री, झांझ, तुरही और शंख एक साथ बज उठे। रानी मृगमंदा पार्वती के अलंकारिक वेश में उपवन के मध्य में प्रकट हुई और विशिष्ट मुद्रा में अंग संचालन करते हुए भगवान शिव को अघ्र्य प्रदान करने लगी।

इस समय रानी मृगमंदा का शृंगार देखते ही बनता था। उसने सिर से पैरों तक विभिन्न प्रकार की दिव्य वनस्पतियों से सज्जा कर रखी थी। रानी मृगमंदा की देह पर सजे विविध रंगों के मनोहारी पुष्पों की गंध सम्पूर्ण वातावरण को सुगंधित बनाये दे रही थी। उसके अंग-अंग से ज्योत्सना की धारायें फूट रहीं थीं। नाग कन्या का ऐसा उद्दाम रूप अब से पहले प्रतनु ने नहीं देखा था।

अर्घ्य पूर्ण होते ही तूर्य वादन रूक गया और नागस्वरम् से उत्पन्न स्वरलहरी वातावरण में सुगंधित वायु की तरह प्रसारित हो गयी। अब रानी मृगमंदा ने शिव-नृत्य आरंभ किया। मृगमंदा ने यह नृत्य पूर्वी पर्वतीय प्रदेश से आये एक व्रात्य [2] से सीखा था। नृत्यरत पार्वती को भगवान शिव की प्रतीक्षा में संलग्न दिखाया गया था।

आकाश में काली-काली घटायें छा गयीं किंतु भगवान शिव कैलास पर नहीं लौटे। विरहणी पार्वती के रूप में रानी मृगमंदा ने अनेक भाव-भंगिमायें बनाकर दिखायीं। संगीत वादकों ने पार्वती के विरह को प्रदर्शित करने के लिये बांसुरी का अत्यंत मार्मिक उपयोग किया। पार्वती के विरही भाव को चरम तक पहुँचाने के लिये नागफनी और दुर्दुर का भी बहुत सुंदर प्रयोग किया गया।

नभ में स्थित घन घनघोर गर्जन करने लगे, तड़ित चमकने लगी और देखते ही देखते बड़ी-बड़ी बूंदें गिरने लगीं । बादलों की गर्जना उत्पन्न करने के लिये नाग वादकों ने घनवाद्यों का तथा पर्वतों पर गिरने वाली बड़ी-बड़ी बूंदों के प्रहार से उत्पन्न ध्वनि के लिये मृदंग का उपयोग किया। बादलों के घनघोर गर्जन के साथ ही गयासुर डकराने लगा। जिसे सुनकर पार्वती भयभीत होने लगीं। गयासुर के कठोर कर्कश गर्जन के लिये एक साथ कई विशाल ढोल बजाये गये।

हुड्डुक, बंशी तथा मृदंग की स्वरलहरी के साथ त्रिलोकीनाथ शिव प्रकट हुए। प्रतनु ने देखा कि निऋति भगवान शिव के वेश में प्रकट हुई। उसकी नृत्य गति देखते ही बनती थी। शिव के आने पर पार्वती के उपालंभों का क्रम आरंभ हुआ। रुष्ट पार्वती ने भगवान शिव की अभ्यर्थना नहीं की और मुँह फेर कर बैठ गयी।

पार्वती को रिझाने के लिये शिव ने कई उपक्रम किये। किंतु पार्वती रुष्ट ही रही। पार्वती की आवाज के लिये करताल तथा खोलवाद्यों का और शिव की आवाज के लिये पाँच मृदंगों का प्रयोग किया गया। पार्वती के रुष्ट बने रहने पर शिव कृत्रिम क्रोध के साथ उठ खड़े हुए और विशिष्ट मुद्रा में ताण्डव करने लगे। नेपथ्य से कृत्रिम क्रोध के भाव उत्पन्न करने वाले शब्द उभरने लगे-

किड़किड़ान   किड़किड़ान   किड़किड़ान

धांधी    किट   धिधि  किट  धान  धान

तत्तड़ान       तत्तड़ान      तत्तड़ान ।

धू धू किट धू धू किट धमधम  धान धान।

तत्तड़ान   तत्तड़ान   तत्तड़ान  तत्तड़ान्।

शिव के कृत्रिम ताण्डव को देखकर पार्वती को हँसी आ गयी और वे प्रसन्न होकर शिव के वाम भाग में सुशोभित हो गयीं। शिव-पार्वती को प्रसन्न मुद्रा में विराजमान हुआ देखकर नाग कन्यायें उनकी अभ्यर्थना के लिये उपस्थित हुईं। इस सामूहिक नृत्य का नेतृत्व हिन्तालिका कर रही थी। अंत में शिव की अभ्यर्थना आरंभ हुई और शिव-पार्वती समस्त नागकन्याओं को मनवांछित वर प्राप्ति का आशीर्वाद देकर अदृश्य हो गये।

अब तूर्य का दूसरा भाग आरंभ हुआ। इस भाग में नागकन्यायें एक-एक करके नृत्य के लिये प्रस्तुत हुईं। जो नागयुवक उस नागकन्या से विवाह के इच्छुक होते वे भी उस नागकन्या के साथ नृत्य के लिये आगे बढ़ते। जो युवक उस नर्तकी के साथ नृत्य करने में असमर्थ रहते, वे पुनः अपने स्थान पर जा कर बैठ जाते।

जिस युवक का नृत्य नागकन्या को पसंद आता, उसी युवक के गले में वह पुष्पाहार डाल देती। कुछ नाग कन्याएं और नाग युवक नृत्य में भाग न लेकर बाहर ही अपने युगल बना रहे थे। चारों ओर उल्लास ही उल्लास बिखरा हुआ था। प्रतनु ने बहुत दिन बाद ऐसा उत्सवमय वातावरण देखा था। उसे मोहेन-जोदड़ो के पशुपति महालय के वार्षिकोत्सव का स्मरण हो आया। रोमा का स्मरण हो आने से उसका मन भीगा-भीगा सा हो गया।

रानी मृगमंदा पार्वती का वेश त्यागकर दर्शक दीर्घा में प्रतनु के निकट आ बैठी। इस समय नाग युगलों का नृत्य अपने चरम पर था। रानी मृगमंदा ने परिचारिका को संकेत किया और परिचारिका ने एक वाद्ययंत्र रानी मृगमंदा को लाकर दिया। प्रतनु ने इस तरह का वाद्ययंत्र पहले कभी नहीं देखा था। अत्यंत बारीक और तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न कर रहा था यह। रानी मृगमंदा सुध-बुध खोकर वाद्ययंत्र संचालित कर रही थी, अचानक नेत्र खोलकर बोली- ‘आप बजायेंगे ?

  – ‘क्या है यह ?

  – ‘इसे नहीं जानते ?’

  – ‘नहीं। पहले कभी देखा नहीं।’

– ‘जब चिच्चिक वृषारव के प्रत्युत्तर में बोलता है, तब अरण्यानी आघाटि की भांति ध्वनि करता हुआ पूजित होता है।” [3] रानी मृगमंदा ने मुस्कुरा कर कहा।

  – ‘क्या अर्थ हुआ इसका!’ रानी मृगमंदा की रहस्यभरी बात प्रतनु समझ नहीं सका।

  – ‘इसका अर्थ यह हुआ कि चिच्चिक और वृषारव के परस्पर संवाद को सुनकर वन के देवता इतने प्रसन्न होते हैं मानो उनका पूजन हो रहा हो और तब वन के देवता जो ध्वनि उत्पन्न करते हैं वैसी ध्वनि आघाटि  [4]नामक इस वाद्ययंत्र में से निकलती है।’

  – ‘चिच्चिक और वृषारव परस्पर क्या संवाद करते हैं ?’

  – ‘वही जो इस समय नृत्य कर रहे युवक-युवतियाँ कर रहे हैं।’

  – ‘ये तो कोई संवाद नहीं कर रहे, केवल नृत्य कर रहे है।’

  – ‘नहीं! ये केवल नृत्य नहीं कर रहे। नृत्य के माध्यम से संवाद कर रहे हैं।’

  – ‘क्या मैं जान सकता हूँ कि वे क्या संवाद कर रहे है।’

  – ‘जब चिच्चिक कहता है कि वृषारव तुम कितना अच्छा गाती हो, क्या मैं भी तुम्हें गीत सुनाऊँ! वृषारव कहती है कि हाँ मैं गाती तो हूँ किंतु तुम्हारे जितना सुंदर नहीं गाती हूँ। इसलिये तुम मुझे अपना गीत अवश्य सुनाओ। इसपर चिच्चिक कहता है कि मैं तुम्हें गीत तब सुनाऊँगा जब तुम भी मेरे साथ गाओ। वृषारव चिच्चिक की बात मान लेती है और दोनों मिलकर गाते हैं। ठीक यही तो इस समय नाग युवक-युवतियाँ एक-दूसरे से कह रहे हैं।’

  – ‘अच्छा! एक बात बताओ, तुमने कहा कि जब चिच्चिक वृषारव के प्रत्युत्तर में बोलता है तो अरण्यानि प्रसन्न होते हैं। क्या इन युवक-युवतियों के परस्पर संवाद से भी अरण्यानि प्रसन्न होते हैं! ‘

  – ‘केवल अरण्यानि ही क्यों, सभी देवता प्रसन्न होते हैं। स्वयं शिव-पार्वती प्रसन्न होकर इन्हें आशीर्वाद देते हैं। क्या मैं भी आपसे एक बात पूछूँ!’

  – ‘हाँ पूछो!’

  – ‘क्या आपने कभी चिच्चिक वृषारव संवाद किया है ?’

  – ‘हाँ!’ प्रतनु ने मुस्कुराकर उत्तर दिया।

  – ‘कहाँ ? अपने पुर में ?’

  – ‘नहीं।’

  – ‘तो ?’

  – ‘राजधानी मोहेन-जो-दड़ो में।’

  – ‘कितनी बार ?’

  – ‘केवल एक बार।’

  – ‘किससे।’

  – ‘एक सैंधव नृत्यांगना से।’

  – ‘क्या अरण्यानि प्रसन्न हुए।’

  – ‘पता नहीं।’

  – ‘क्या भविष्य में उससे पुनः चिच्चिक वृषारव संवाद होने की संभावना है ?’

  – ‘कह नहीं सकता।’

  – ‘आपके मन में अभिलाषा है ?’

  – ‘हाँ है।’

  – ‘कोई और वृषारव आपसे संवाद करना चाहे तो क्या आप उसके लिये चिच्चिक बनेंगे।’

  – ‘कह नहीं सकता।’

  – ‘अर्थात् कर भी सकते हैं और नहीं भी! ‘

  – ‘हाँ! किंतु आप मुझसे इतने सारे प्रश्न क्यों कर रही हैं! प्रतिबंध के अनुसार मैं सारे प्रश्नों के उत्तर दे चुका हूँ।’

  – ‘घबराओ मत अतिथि। ये प्रश्न किसी प्रतिबंध के साथ नहीं जुड़े हुए हैं।’ रानी मृगमंदा ने हँस कर कहा और आघाटि बजाने में व्यस्त हो गयी। सामने मैदान में अधिकांश नाग युवतियाँ अपनी पसंद के युवकों के साथ युगल बना चुकी थीं और अब वे मत्त होकर दुगुने उल्लास से नृत्य कर रही थीं।

  – ‘क्या आप मेरे साथ नृत्य करेंगे शिल्पी ?’ अचानकर रानी मृगमंदा ने आघाटि बजाना रोक कर प्रतनु के सामने प्रस्ताव रखा।

  – ‘किंतु मैं तो एक शिल्पी हूँ।’

  – ‘तो क्या शिल्पी के लिये नृत्य करना वर्जित है ?’

  – ‘नहीं वर्जित तो नहीं, किंतु मुझे नृत्य करना आता ही नहीं। इसी से संकोच होता है।’

  – ‘एक कलाकार के लिये दूसरी कला को अपनाने में संकोच कैसा ? चलो उठो, तुम्हे नृत्य करना मैं सिखाऊंगी।’ रानी मृगमंदा ने हाथ पकड़कर उठा ही दिया प्रतनु को।

एक दिन उसे भी नृत्य करना पडे़गा, ऐसा तो प्रतनु ने कभी नहीं सोचा था। उसने तो आज तक केवल शिल्पकला की ही साधना की थी। नृत्यकला से तो उसका इतना ही सम्बन्ध था कि वह उसे देख सकता था, उसकी प्रशंसा कर सकता था। इससे अधिक कुछ नहीं किंतु आज नृत्यकला से उसका सजीव सम्बन्ध स्थापित होने जा रहा था।

रानी मृगमंदा को फिर से नृत्य हेतु उपस्थित हुआ जानकर नाग युवक-युवतियों का उत्साह दुगुना हो गया। तूर्ण में जैसे नवीन उल्लास आ गया। निऋति और हिन्तालिका भी रानी मृगमंदा की सहायता के लिये आगे आयीं। डगमगाते पदों से रानी मृगमंदा का अनुसरण करता हुआ प्रतनु काफी देर तक झिझकता ही रहा।

जाने क्यों बार-बार उसे लगता रहा कि वह नृत्य करने के लिये नहीं बना है। उसे तो बस छैनी-हथौड़ी से  लेना-देना है किंतु साथ ही यह विचार भी मस्तिष्क में चक्कर काट रहा था कि यदि वह नृत्य करना सीख जाये तो रोमा कितना प्रसन्न होगी! फिर यह भी तो पर्याप्त संभव है कि नृत्यकला शिल्पकला के परिमार्जन में सहायक सिद्ध हो।

नृत्यरत रोमा की प्रतिमा संभवतः और भी श्रेष्ठ बनी होती यदि स्वयं प्रतिमाकार को नृत्यकला की बारीकियों का ज्ञान होता। अतः प्रतनु प्रयास करने लगा कि रानी मृगमंदा द्वारा बताई जा रही मुद्राओं का वह कुशलता के साथ अनुसरण करे किंतु उसके पद संचालन में आत्मविश्वास का अभाव बना ही रहा।

शिल्पी बार-बार त्रुटि कर रहा था और बार-बार बताने पर भी न तो नृत्य भंगिमा का और न मुद्रा का अनुसरण कर पा रहा था। फिर भी रानी मृगमंदा ने साहस नहीं छोड़ा, वह शिल्पी का उत्साह बढ़ाती रही। निऋति और हिन्तालिका भी पर्याप्त सहायता कर रही थीं। शिल्पी का अभ्यास जारी रहा।

अन्त्ततः वह क्षण आया जिसकी प्रतीक्षा रानी मृगमंदा, निऋति और हिन्तालिका पर्याप्त धैर्य के साथ कर रही थीं। शिल्पी के पैर थरथराये और उसे लगा कि उसके पैरों ने नये ढंग से धरा पर रखे जाने की कला सीख ली है। कुछ और समय बीतने पर हस्त संचालन और पद संचालन में भी साम्य होने लगा।

रानी मृगमंदा, निऋति और हिन्तालिका के लिये इतना पर्याप्त था। कुछ देर के विश्राम के पश्चात् रानी मृगमंदा ने वादकों को पुनः संकेत किया। पटह, तन्त्री, झांझ, तुरही, और बांसुरी फिर से बज उठे। रानी मृगमंदा ने शिल्पी की बांह पकड़ी और बहुत ही साधारण रीति से पद संचालित करते हुए नृत्य करने लगी।

इस बार रानी मृगमंदा से साम्य बैठाने में शिल्पी को अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ा। जब नृत्य तीव्र होने लगा तो निऋति और हिन्तालिका भी आ गयीं। तीनों नाग राजकुमारियों के साथ नृत्य करते हुए शिल्पी की देह में मानो किसी नर्तक की आत्मा आ बैठी। थोड़ी देर के लिये वह भूल ही गया कि वह तो शिल्पी है, केवल छैनी हथौड़ी के लिये बना है।

शिल्पी के चारों ओर अलौकिक आनंद की स्वर्णिम रश्मियाँ प्रवाहित हो रही थीं। इस आनंद का अनुभव उसे आज से पूर्व कभी नहीं हुआ था। प्रतनु को लगा कि वह अपने स्थूलत्व को त्याग कर तरल हो गया है। किसी पक्षी की भांति मुक्त गगन में उड़ रहा है अथवा वायु में गमन करने वाले किसी अदृश्य शटक पर सवार होकर दिशाओं के मंगलमय उत्स को प्राप्त कर रहा है।

उस क्षण उसे किसी का स्मरण नहीं हुआ, यहाँ तक कि रोमा का भी नहीं। जब वह निज अस्तित्व ही विस्मृत किये हुए था तो विश्व के अन्य उपक्रमों को कैसे स्मरण कर पाता! आनंदित होकर नृत्य करता हुआ प्रतनु इस समय केवल इतना ही अनुभव कर रहा था कि वह जन्मजात नर्तक है और युगों से इसी तरह तीनों राजकुमारियों के साथ नृत्यलीन है।

– अध्याय 26, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] तूर्य शब्द का प्रयोग अलग-अलग काल में अलग-अलग वाद्यों के समूह के लिये किया जाता था। रामायण काल में तूर्य में शंख, दुंदुभि तथा बांसुरी आदि का उपयोग होता था। पाणिनी की अष्टाध्यायी में वीणा वाद्य का तूर्य में विशेष महत्व दिखाया गया है। इस काल में तूर्य में पटह, तन्त्री, झांझ, तुरही तथा शंख का प्रयोग होता था। इस कारण इसे पंच शब्द भी कहा गया है। बाद में इसका उपयोग सेना के प्रस्थान के समय तथा युद्ध के अवसरों पर होने लगा। राजाओं के आगमन की सूचना देने तथा उनका स्वागत करने में भी तूर्य का उपयोग होने लगा। जातक साहित्य में तुरीय का प्रयोग तूर्य के रूप में होता है। पंचागिक में तत्, वितत्, अवनद्ध, घन और सुषिर वाद्यों को तूर्य में रखा गया है। वात्सयायन के कामसूत्र में तूर्य विभिन्न वाद्य समूहों के लिये प्रयुक्त हुआ है। वात्सयायन काल में तूर्य मनोरंजन प्रधान था और यह भावी जीवन का आधार भी था। स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से तूर्य में भाग लेते थे। इस समूहगान में प्रयास किया जाता था कि दोनों समूहों का एकीकरण हो जाये। इस एकीकरण के साथ ही मण्डली का मुखिया अपनी कन्या का विवाह उसी संगीतज्ञ के साथ कर देता था जो उस मण्डली में सर्वश्रेष्ठ होता था। यह कहना कठिन है कि वैदिक काल में तूर्य का आयोजन किया जाता था अथवा नहीं किंतु विवाह आरंभ काल से सार्वजनिक समारोह के रूप में होते आये हैं इसलिये अनुमान किया जाता है कि इस काल में भी तूर्य जैसा कोई आयोजन अवश्य होता होगा। इस आयोजन से मिलता-जुलता वैवाहिक आयोजन आज भी दक्षिणी राजस्थान की भीलएवं गरासिया आदि जन जातियों में होता है।

[2] व्रात्य आर्यों का वह दल था जो जलप्लावन के पश्चात् मनु के साथ पायमेरू से त्रिविष्टप होते हुए हिमालय से नीचे नहीं उतर कर पूर्व में आगे बढ़ा और यक्ष सभ्यता के सम्पर्क में आया। इसी कारण ब्रात्यों में वैदिक कर्मकाण्ड के प्रति रुझान नहीं था। वे आर्य भाषा जानते थे किंतु उनका रहन-सहन आर्यों से भिन्न था। वे यज्ञ में विश्वास नहीं करते थे तथा उनकी वेशभूषा भी अलग थी। व्रात्यों का देवता एकव्रात्य था। अथर्ववेद में ब्रात्यकाण्ड में एकव्रात्य को तप करते हुए दिखाया गया है। वह एक वर्ष के लिये निश्चल खड़ा है। उसके सात प्राण, सात अपान और सात व्यान हैं। आर्य देवता उसके अनुचर हैं और उसके पीछे चलते हैं। इस वर्णन से वह रुद्र का प्रतिरूप लगता है। नीले पेट और लाल कमर से वह महादेव लगता है। व्रात्यों के अन्य देवता उग्र, रुद्र, भव, शर्व, पशुपति और ईशान हैं। वर्तमान में ये सारे नाम भगवान शिव के माने जाते हैं। चूंकि आर्य, नाग और व्रात्य आर्यों की ही विभिन्न शाखायें थीं इसलिये उनमें सम्पर्क होना स्वाभाविक प्रक्रिया थी। स्वयंभू प्रजापति मनु की पत्नी इला एक गांधर्वी थी।

[3] चिच्चिक एक सूक्ष्म जंतु है जो ची ची की ध्वनि निकालता है। वृषारव दूसरा सूक्ष्म जंतु है, जिसका दूसरा नाम झिल्ली है। अरण्यानी अरण्य के देवता को कहते हैं। ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से मिलती है-वृषारवाय वदते यदुपावति चिच्चिकः आघाटिभिरिव धावयन्न्रण्यानिर्महीयते (10. 146. 2)

[4] 4 झांझ।

गरुड़ों का आक्रमण (27)

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गरुड़ों का आक्रमण

हम पर गरुड़ों का आक्रमण हुआ है। गरुड़ सैन्य ने रात्रि के अंधकार में दुर्ग तोड़ लिया है। सैंकड़ों गरुड़ दुर्ग में प्रवेश कर गये है। जाने कैसे उन्हें दुर्ग के गुप्त मार्ग का ज्ञान हुआ।

प्रातः होने में अभी पर्याप्त समय शेष था, जब प्रतनु की निद्रा विचित्र कोलाहल के कारण भंग हो गयी। प्रतनु ने अनुभव किया कि उसके कक्ष के बाहर बहुत सारे व्यक्ति कोलाहल करते हुए इधर-उधर दौड़े चले जा रहे हैं। उनके स्वर में उत्तेजना है तथा उनके भागते चले जाने से उनके शस्त्रों का भी शब्द उत्पन्न हो रहा है।

प्रतनु अपनी शैय्या त्याग कर उठ खड़ा हुआ। दीपाधार में स्नेहक की अत्यल्प मात्रा देखकर उसने अनुमान लगाया कि सूर्योदय होने में अधिक का विलम्ब नहीं है। उसने कक्ष से बाहर आकर देखा कि सैंकड़ों नाग विभिन्न दिशाओं से प्रकट होकर दुर्ग के मध्य में स्थित रानी मृगमंदा के प्रासाद को घेर रहे हैं।

  – ‘क्या हुआ प्रहरी ?’ प्रतनु ने कक्ष से बाहर खड़े नाग से पूछा। प्रतनु ने देखा कि इस समय प्रहरी के स्थान पर पाँच नाग सैनिकों का गुल्मपति कंकोल पहरे पर खड़ा है।

  – ‘हम पर गरुड़ों का आक्रमण हुआ है। गरुड़ सैन्य ने रात्रि के अंधकार में दुर्ग तोड़ लिया है। सैंकड़ों गरुड़ दुर्ग में प्रवेश कर गये है। जाने कैसे उन्हें दुर्ग के गुप्त मार्ग का ज्ञान हुआ।’ गुल्मपति कंकोल ने उत्तर दिया।

आश्चर्य से जड़ रह गया प्रतनु। इतने दुर्गम और गुप्त दुर्ग को तोड़ लेने वाला शत्रु सचमुच ही कितना प्रबल होगा!

  – ‘नागों के पास इस संकट से निकलने का क्या उपाय है ?’ प्रतनु ने पुनः कंकोल से प्रश्न किया।

  – ‘ऐसी स्थिति में रानी को सुरक्षित रूप से दुर्ग से बाहर ले जाने का प्रयास करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।’

  – ‘क्यों ? क्या नाग सैन्य गरुड़ सैन्य का प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं है ?’

  – ‘इस समय प्रश्न सक्षमता का नहीं स्थिति का है। युद्ध के मैदान में सन्नद्ध अथवा दुर्ग को घेर कर खड़े शत्रु से लड़ना उतना कठिन नहीं होता जितना दुर्ग में अचानक घुस आये शत्रु से निबटने में। इस समय शत्रु का बल बहुत बढ़ा हुआ है। वह अचानक चढ़ कर आया है। हमें उसके वास्तविक बल और शक्ति के केन्द्र का अनुमान नहीं है।’

एक बार फिर आश्चर्य से जड़ होकर रह गया प्रतनु। केवल पाँच सैनिकों के साधारण गुल्मपति को भी सामरिक नीति का इतना अच्छा ज्ञान है। सचमुच ही नागों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

  – ‘तो क्या रानी मृगमंदा को दुर्ग से बाहर ले जाया जा चुका है ?’

  – ‘नहीं! रानी ने दुर्ग छोड़ने से मना कर दिया है।’

  – ‘क्यों ?’

  – ‘रानी ने सैनिकों को आदेश दिया है कि प्राण रहते दुर्ग शत्रु को अर्पित नहीं किया जाये। वे स्वयं भी खड्ग लेकर नाग सैनिकों का नेतृत्व एवं उत्साहवर्धन कर रही हैं।’

प्रतनु के विस्मय का कोई पार नहीं है। पुष्पों से भी अधिक कोमलांगी रानी मृगमंदा हाथ में खड्ग लेकर शत्रु का सामना कर रही है! सचमुच नागों और सैंधवों में कितना अंतर है! धन्य है रानी मृगमंदा! सौंदर्य ऐसा कि धरती भर की प्रजाओं की रमणियों के सौंदर्य को फीका कर दे! कोमलता ऐसी कि पुष्प-पांखुरियों को भी पीछे छोड़ दे और संकल्प ऐसा कि खड्ग हाथ में लेकर समरांगण में उतर पड़े!

  – ‘संकट की इस विकट घड़ी में तुम अपनी रानी की रक्षा के लिये नहीं जाओगे ?’ प्रतनु ने पुनः गुल्मपति से प्रश्न किया।

  – ‘मैं जाना तो अवश्य चाहता हूँ किंतु आप हमारे अतिथि हैं। आपको अकेला छोड़कर नहीं जा सकता। हमारी रानी की ऐसी ही आज्ञा है।’

  – ‘क्या आज्ञा है तुम्हारी रानी की ?’

  – ‘जैसे ही रानी मृगमंदा को सूचना दी गयी कि शत्रु ने दुर्ग का गुप्त मार्ग भेद कर अंदर प्रवेश कर लिया है, वैसे ही वे खड्ग हाथ में लेकर शत्रु से निबटने के लिये उद्धत हो गयीं तथा तत्काल अपनी अनुचरियों को यहाँ भेजकर कहलावाया कि यदि अतिथि जाग रहे हों तो उन्हें समय रहते सुरक्षित मार्ग से दुर्ग से बाहर पहुँचा दिया जाये किंतु यदि निद्रालीन हों तो अत्यंत आवश्यक होने से पहले उन्हें जगाया न जाये किंतु किसी भी स्थिति में अतिथि को अकेला और असुरक्षित न छोड़ा जाये।’

  – ‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कंकोल कि मैं इस समय नागों के कुछ काम आ सकूँ!’

  – ‘आपात् काल में अतिथि का रक्षण करना हमारा कत्र्तव्य है, न कि अतिथि के प्राण खतरे में डालकर उनसे अपना रक्षण करवाना। आप चाहें तो मैं तथा मेरे सैनिक आपको दुर्ग से बाहर सुरक्षित स्थान पर छोड़ आयें।’

  – ‘नहीं-नहीं। मैं इतना कृतघ्न नहीं कि अपने शरण दाता को आपात् काल में जानकर स्वयं प्राणों का मोह लेकर भाग खड़ा होऊँ। मैं भी नागों के आतिथ्य का प्रतिमूल्य चुकाऊँगा सैनिक। तुम मेरे लिये खड्ग का प्रबंध करो।’

  – ‘अविनय क्षमा करें श्रीमन्! रक्षण कला में प्रवीण हुए बिना शत्रु के सम्मुख जाना आत्मघात से अधिक कुछ नहीं है।’

  – ‘तो फिर मैं क्या करूँ ? कैसे सहायता करूँ नागों की!’

  – ‘यदि आप कुछ करना ही चाहते हैं तो जिस कार्य में आप प्रवीण हैं, उसी कार्य से  हमारा हित साधन करें।’

  – ‘क्या छैनी और हथौड़ी इस समय नागों की कोई सहायता कर सकती है ?’

  – ‘क्यों नहीं कर सकती! यदि क्षतिग्रस्त गुप्त मार्ग को फिर से बंद कर दिया जाये तो और अधिक संख्या में शत्रु के आगमन को रोका जा सकता है। इस समय दुर्ग में शिल्पी नहीं हैं इसलिये हमारे सैनिक ध्वस्त मार्ग पर भित्ति बनकर खड़े हैं। जैसे ही गरुड़ों के आघात से आगे के नाग सैनिक गिरते हैं, उनका स्थान नये सैनिक ले लेते हैं इस कारण हमारे सैनिकों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।’

प्रतनु ने कंकोल के शब्दों का अर्थ लगाया। कंकोल का प्रस्ताव ऐसा था जैसे बहती हुई नदी में रेत का पुल बनाना। समक्ष युद्ध में सन्नद्ध गरुड़ सैनिकों एवं उनके प्रबल आघात से जूझ रहे नाग सैनिकों के मध्य भित्ति खड़ी करना क्या कोई सरल बात है!

  – ‘तुम्हारे कहने का अर्थ है कि आगे की पंक्ति में लड़ रहे नाग सैनिकों के पीछे एक भित्ति खड़ी करके दुर्ग का मार्ग बंद कर दिया जाये! इससे तो आगे की पंक्ति में लड़ रहे नाग सैनिकों का सम्पर्क पीछे खड़े सैनिकों से टूट जायेगा! ‘

  – ‘बिल्कुल ठीक समझे आप! ‘

  – ‘किन्तु इससे तो प्रथम पंक्ति में लड़ रहे सैनिकों को हम जीवित ही मृत्यु के मुख में धकेल देंगे!’

  – ‘मृत्यु के मुख में तो वे वैसे भी हैं किंतु इस प्रयास से हम अन्य नाग सैनिकों को मृत्यु के मुख में जाने से रोक सकते हैं। इस कार्य मे चरिष्णु  [1]आपकी सहायता कर सकते हैं।’

  – ‘चरिष्णु क्या ?’

  – ‘ चरिष्णु यंत्र की सहायता से हम दूर रहकर शत्रु पर प्रस्तरों की वर्षा कर सकते हैं। जैसे ही चरिष्णु प्रस्तरों की वर्षा आरंभ करेगा वैसे ही शत्रु चरिष्णु की प्रहारक परिधि से बाहर जाने के लिये पीछे हटेगा। हमारे सैनिक उन्हें धकेलते हुए और आगे जाकर खड़े हो जायेंगे। इससे इस समय जो संघर्ष दुर्ग की प्राचीर पर हो रहा है, वह कुछ समय के लिये दुर्ग की प्राचीर से दूर होने लगेगा। यही वह समय होगा जब हम दुर्ग के ध्वस्त मार्ग पर फिर से भित्ति बनाकर शत्रु के प्रवेश को रोक सकते हैं। यदि एक बार शत्रु सैन्य का प्रवाह टूट जाये तो भीतर घुस आये शत्रु को खोजकर मारा जा सकता है।’ गुल्मपति कंकोल ने अपनी बात पूरी की।

प्रतनु को लगा कि योजना दुष्कर होने पर भी असंभव नहीं है। प्रयास तो किया ही जा सकता है। प्रयास करने के अतिरिक्त और उपाय भी क्या है! ऐसे विषम क्षण में वह अपने आश्रयदाता को छोड़कर पलायन तो नहीं कर सकता! प्रतनु ने अपना लक्ष्य निर्धारित किया और कंकोल से तत्काल कतिपय शिल्प उपकरणों एवं सहायता हेतु सैनिकों का प्रबंध करने को कहा।

तुरंत रानी मृगमंदा तक सूचना भिजवाई गयी। रानी मृगमंदा अतिथि प्रतनु को किसी प्रकार के खतरे में नहीं डालना चाहती थी किंतु प्रतनु के आग्रह को देखते हुए वह इस योजना पर कार्य करने को तैयार हो गयी। वह स्वयं तलवार लेकर दुर्ग की प्राचीर के क्षतिग्रस्त भाग पर आकर खड़ी हो गयी और अपने सैनिकों का मार्गदर्शन करने लगी।

तत्काल चार चरिष्णु दुर्ग की क्षतिग्रस्त भित्ति पर चढ़ाये गये और वहाँ से शत्रु सैन्य पर प्रस्तरों की वर्षा होने लगी। प्रस्तरों की प्रहारक परिधि में न केवल शत्रु सैन्य अपितु कुछ नाग सैनिक भी आ गये किंतु नाग सैनिकों ने इसकी चिंता नही की और वे शत्रु को धकेलते हुए आगे हटा ले गये। प्रतनु के लिये यह परीक्षा की घड़ी थी।

उसने सैनिकों की सहायता से विशाल प्रस्तर खण्ड एक दूसरे के ऊपर रखते हुए भित्ति बनानी आरंभ की। गरुड़ों को धकेल कर आगे ले गये नाग सैनिकों का सम्पर्क पीछे खड़े नागों से टूट गया। चरिष्णु की प्रहारक परिधि के भीतर सुरक्षित भाग को चिन्हित करने तथा दुर्ग से बाहर निकल कर संघर्ष कर रहे नाग सैनिकों से निबटने में गरुड़ों को अधिक समय नहीं लगने वाला था। इससे पहले कि गरुड़ फिर से दुर्ग की सीमा तक आ धमकें प्रतनु को भित्ती खींच देनी थी।

गरुड़ों को नागों की योजना समझ में आ गयी। अब वे भित्ति के पूर्ण होने से पूर्व पुनः दुर्ग में प्रवेश करने के लिये तेजी से चरिष्णु की प्रहारक परिधि के मध्य सुरक्षित भाग को चिह्नित करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उधर नाग सैनिकों के हाथों में खड्ग तीव्रता से संचालित हो रहे थे और इधर प्रतनु के हाथों में शिल्प उपकरण। आज ही तो प्रतनु के समस्त कौशल का परीक्षण होना था।

संघर्ष के इन अपरिचित क्षणों में शिल्पी प्रतनु ने जैसे कला की नयी परिभाषा प्राप्त की। उसे लगा कि रोमा जैसी रमणीय बाला के अंग लास्य एवं सौंदर्य का प्रस्तरों में उत्कीर्णन शिल्पविद्या का सर्वोच्च बिन्दु नहीं था। रानी मृगमंदा, हिन्तालिका और निर्ऋति के जलविहार के छद्म शिल्पांकन का रहस्य तोड़ देना भी शिल्पविद्या के ज्ञान का चरम नहीं था।

शिल्पविद्या का चरम बिन्दु तो आज ही खोजा और पाया जाना है। छाती पर चढ़कर आये शत्रु से अपनी और अपने हितैषियों के रक्षण की सामथ्र्य ही तो कला की सार्थकता का प्रमाण है। इसी कारण वह कला की चरम बिंदु भी है। प्रतनु की कला में यह सामथ्र्य है अथवा नहीं, आज इसी का तो परीक्षण है। जैसे भी हो, प्रतनु को इस परीक्षण में सफल होकर ही दिखाना है। रानी मृगमंदा के आतिथ्य का इससे अधिक श्रेष्ठ प्रतिदान और क्या हो सकता है!

प्रतनु ने देखा कि उसके निकट ही सैनिक वेश में उपस्थित रानी मृगमंदा अत्यंत गंभीर मुद्रा में अपने सैनिकों को समरांगण में जूझता हुआ और एक-एक करके मृत्यु के मुख में समाता हुआ देख रही है। वह  चिंतित भाव से एक दृष्टि अपने सैनिकों पर डालती है तो दूसरी दृष्टि तीव्रता से चलते हुए प्रतनु के हाथों पर डालती है।

यदि गरुड़ सैन्य भित्ति के पूर्ण होने से पूर्व दुर्ग तक आ जाता है तो उसे रोकने के लिये कुछ नाग सैनिक और बाहर भेजने पड़ेंगे। प्रतनु नहीं चाहता कि अब और नाग सैनिक मारे जायें। उसने एक विशाल प्रस्तर शिला की ओर देखा तथा अपनी सहायता कर रहे नाग सैनिकों को संकेत किया। लगभग पचास सैनिक उस प्रस्तर को भित्ति की तरफ धकेलने लगे।

नागों को तीव्र गति से नष्ट करता हुआ गरुड़ सैन्य दुर्ग के अत्यंत समीप आ पहुँचा। ऐसा नहीं था कि नाग सैन्य कमजोर सिद्ध हो रहे थे किंतु यह ऐसा युद्ध था जिसमें उन्हें कम से कम संख्या में रहकर ही अपने शत्रु की गति को रोकना था। वे संख्या में बहुत कम थे और गरुड़ों की संख्या बहुत अधिक थी।

गरुड़ सैनिक किसी भी क्षण दुर्ग में प्रवेश करने की स्थिति में आ गये। अब भित्ति उस ऊँचाई तक पहुँच गयी थी जहाँ से दुर्ग के भीतर के नागों को बाहर नहीं भेजा जा सकता था। प्रतनु ने अनुमान लगाया कि यदि गरुड़ों के पहुँचने से पूर्व यह विशाल प्रस्तर शिला वांछित स्थल तक पहुँच गयी तो प्रतनु का समस्त उद्योग सफल हो जायेगा अन्यथा गरुड़ सैन्य का दुर्ग में धंस जाना निश्चित है। यदि एक बार गरुड़ सैन्य फिर से दुर्ग में धंस गया तो उसे बाहर धकेलना लगभग असंभव हो जायेगा। गरुड़ सैन्य समुद्र की लहरों के समान लहरा रहा था।

प्रतनु को लगा कि इस समय समस्त संघर्ष का केन्द्र वही बन गया है। उसने सैनिकों को ललकारा, बस थोड़ी सी शक्ति और लगाओ! शीघ्रता करो! रानी मृगमंदा और स्वयं प्रतनु भी प्रस्तर शिला को धकेलने में सहायता करने लगे। पचास के लगभग गरुड़ सैनिक दौड़ते हुए दुर्ग की परिधि तक आ पहुँचे।

प्रतनु को लगा कि यह उद्यम व्यर्थ हो गया किंतु जैसे ही गरुड़ों ने दुर्ग की भित्ति के रिक्त भाग में अपने आप को धंसाया ठीक उसी समय नाग सैनिकों द्वारा धकेली जाती हुयी विशाल प्रस्तर शिला ढलान पाकर स्वयं ही तेजी से लुढ़ककर भित्ति के खाली स्थान पर पहुँच गयी।

प्रस्तर शिला के नीचे आकर गरुड़ सैनिक पिस कर चूर्ण बन गये। ठीक समय पर दैवीय सहायता प्राप्त हो जाने से प्रतनु ने राहत की सांस ली। अब भित्ति को शिलाखण्डों से भरकर अभेद्य बना देना प्रतनु जैसे चतुर शिल्पी के लिये अधिक कठिन कार्य नहीं था।

नाग सैनिकों ने उत्साह से भरकर जयघोष किया- ‘रानी मृगमंदा की जय! शिल्पी प्रतनु की जय! दुर्ग में घुस चुके गरुड़ सैनिकों को संध्या होने से पूर्व ही खोज-खोजकर मार दिया गया।

– अध्याय 27, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] ऋग्वेद में शत्रु पर पत्थरों की वर्षा करने के यंत्र के रूप में चरिष्णु का उल्लेख हुआ है।

रानी मृगमंदा का प्रस्ताव (28)

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रानी मृगमंदा का प्रस्ताव

रानी मृगमंदा का प्रस्ताव सुनकर गुल्मपति चौंका था किंतु अब समय आ गया था जब प्रतनु के विरुद्ध कुछ न कुछ बोलना आवश्यक था। अतः उसने रानी मृगमंदा से अनुमति मांगी कि उसे भी कुछ बोलने का अवसर दिया जाये।

शत्रुओं के हाथ में लगभग जा चुके दुर्ग को पुनः हस्तगत करने के पश्चात रानी मृगमंदा ने नाग गुल्मपतियों को अपने दुर्ग के मध्य में स्थित अपने प्रासाद में बुलाया। शिल्पी प्रतनु को भी इस अवसर पर विशेष रूप से आमंत्रित किया गया।

नागों ने यह पहली बार देखा था कि घनघोर कठिन परिस्थिति में भी उनके मुखिया ने दुर्ग त्यागने के स्थान पर दुर्ग में रहकर ही अपने सैनिकों का नेतृत्व किया। रानी मृगमंदा ने स्त्री होते हुए भी पुरुष मुखिया की अपेक्षा कहीं अधिक साहस का परिचय दिया था। इसी प्रकार शिल्पी प्रतनु ने अतिथि होते हुए भी अपने प्राणों का मोह त्याग कर अदम्य साहस प्रदर्शित किया तथा युद्धरत सैनिकों के मध्य भित्ति का निर्माण कर शत्रु सैन्य का प्रवाह अवरूद्ध कर दिया।

नाग-गुल्मपतियों ने एक स्वर से रानी मृगमंदा और शिल्पी प्रतनु की प्रशंसा की और दुर्ग को बचा लेने का श्रेय उन्हीं दोनों को दिया। नाग गुल्मपतियों ने निश्चित किया कि शत्रु के पराभव के उपलक्ष में अगले पूर्ण चँद्र को दुर्ग में विजयोत्सव मनाया जाये।

रानी मृगमंदा ने विजयोत्सव मनाये जाने की स्वीकृति प्रदान की तथा नाग-गुल्मपतियों के समक्ष किंचित् नतमस्तक हो अपना प्रस्ताव रखा- ‘मेरा गुल्मपतियों से आग्रह है कि अगले पूर्ण चँद्र तक वे अपना नया राजा चुन लें क्योंकि मैं विजयोत्सव के दिन ही शिल्पी प्रतनु से विवाह करना चाहती हूँ।’

  – ‘किंतु नाग-प्रजा के नियमानुसार नागों की रानी को किसी नाग युवक से ही विवाह करना होता है।’ गुल्मपति प्रमद ने रानी को टोका।

  – ‘मैं नागों के नियम जानती हूँ तभी तो आपसे नया राजा चुनने को कह रही हूँ। चूंकि प्रतनु नाग नहीं हैं, इसलिये वे नागों के राजा नहीं हो सकते। इस कारण मैं सिंहासन का परित्याग कर दूंगी तथा शिल्पी प्रतनु के साथ उनके प्रांतर को चली जाऊँगी।’

  – ‘किंतु पुत्री हम तो आपको ही अपनी रानी के रूप में देखते रहना चाहते हैं। आप हमारे अंतिम राजा कर्कोटक की प्रतिभासम्पन्न पुत्री हैं। आपके अतिरिक्त किसी और का नेतृत्व हमसे सहज ही स्वीकार नहीं होगा।’ वृद्ध गुल्मपति श्वेत केशीय ने रानी मृगमंदा के प्रस्ताव से असहमत होते हुए कहा।

  – ‘तब तो मुझे जीवन भर अविवाहित रहना होगा। क्योंकि नागों के नियम के अनुसार तो मेरा विवाह होते ही मेरा पति नागों का राजा बन जायेगा।’

  – ‘किंतु आप यदि किसी नाग युवक से विवाह करेंगी तो भी आप और आपके पति मिलकर नाग प्रजा का नेतृत्व कर सकते हैं।’ गुल्मपति तक्षक ने सुझाव दिया।

  – ‘आप भूल रहे हैं मातुल तक्षक कि नाग कन्याओं को अपनी इच्छानुसार पति वरण करने का अधिकार है। जो अधिकार साधारण नागकन्याओं को शत-शत वर्षों से प्राप्त है, क्या मुझे उस अधिकार से वंचित रखा जायेगा ?’ रानी मृगमंदा ने स्मित हास्य के साथ गुल्मपति तक्षक का विरोध किया।

  – ‘रानी मृगमंदा उचित ही तो कहती हैं। हम किसी नागकन्या को उसके सहज अधिकार से वंचित नहीं कर सकते।’ गुल्मपति वासुकि ने रानी मृगमंदा का समर्थन किया।

  – ‘हम रानी मृगमंदा को शिल्पी प्रतनु के साथ विवाह करने से नहीं रोक सकते किंतु साथ ही यह भी चाहते हैं कि रानी मृगमंदा का नेतृत्व हमें उपलब्ध रहे। ये दोनों कार्य एक साथ नहीं हो सकते।’ युवा गुल्मपति प्रमद ने अपना मत व्यक्त किया।

  – ‘क्यों नहीं हो सकते ? यदि रानी मृगमंदा शिल्पी प्रतनु को अपना पति चुनती हैं तो शिल्पी प्रतनु को ही नागों का अगला राजा मानने में क्या हानि है ?’ गुल्मपति कंकोल ने अपना मत दिया।’

  – ‘किंतु नागों का राजा केवल नाग ही हो सकता है। अतिथि प्रतनु नाग नहीं हैं। उन्हें नागों का राजा नहीं बनाया जा सकता।’ गुल्मपति प्रमद ने गुल्मपति कंकोल के प्रस्ताव का विरोध किया।

  – ‘माना कि शिल्पी प्रतनु नाग नहीं हैं किंतु वे विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं। उन्होंने संकट काल में नागों की सहायता की है और ऐसा करके वे स्वयं को नागों का सबसे बड़ा हितैषी सिद्ध कर चुके हैं।’ कंकोल ने अपना विचार दृढ़ता से प्रकट किया।

  – ‘मेरे मत में गुल्मपति कंकोल ठीक कहते हैं। विलक्षण प्रतिभा के धनी और नागों के हितैषी शिल्पी प्रतनु को यदि रानी मृगमंदा अपना पति चुनती हैं तो नाग प्रजा  भी उन्हें अपना राजा बना सकती है।’ गुल्मपति विमद ने अपना मत व्यक्त किया।

  – ‘किंतु यह नागों की सहस्रों वर्षों से चली आ रही परम्परा के प्रतिकूल है।’ गुल्मपति प्रमद ने पुनः इस प्रस्ताव का विरोध किया।

गुल्मपति प्रमद किशोरावस्था से यह साध मन में पाले हुए था कि वह राजकुमारी मृगमंदा से विवाह करेगा और समय आने पर स्वतः ही नागों का राजा बन जायेगा। वह कई बार एवं कई प्रकार से राजकुमारी मृगमंदा के समक्ष प्रणय निवेदन कर चुका था। रानी मृगमंदा ने यद्यपि कभी भी प्रमद का प्रस्ताव स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया किंतु कभी अस्वीकृति का भाव भी प्रकट नहीं किया था।

जब अचानक ही नागराज कर्कोटक की हत्या हो गयी और मृगमंदा नागों की रानी हो गयी तो रानी ने घोषणा करवाई कि जो कोई भी उसके प्रश्नों का प्रत्युत्तर दे सकेगा, उसी से रानी विवाह करेगी। प्रमद ने रानी मृगमंदा के अटपटे प्रश्नों का प्रत्युत्तर देने का भी प्रयास किया था किंतु वह दो प्रश्नों का उत्तर देने के बाद तीसरे प्रश्न का उत्तर ढूंढ पाने में असमर्थ रहा था।

गुल्मपति होने के कारण रानी मृगमंदा ने उसे अनुचर नहीं बनाया था। प्रमद ने उस शिल्पी को भी ढूंढने का प्रयास किया था जिसने उस रहस्यमयी प्रतिमा का निर्माण किया था किंतु प्रमद को केवल इतना ही ज्ञात हो सका कि रानी मृगमंदा ने इस प्रतिमा का निर्माण किसी अज्ञात मायावी शिल्पी से करवाया था। उस शिल्पी के बारे में कोई भी नहीं जानता था कि वह कौन था और कहाँ से आकर कहाँ चला गया था!

एक दिन जब गुल्मपति को यह ज्ञात हुआ कि एक सैंधव युवक ने रानी मृगमंदा के तीनों प्रश्नों के उत्तर दे दिये हैं तो उसकी रही सही आशा पर भी पानी फिर गया था। फिर भी उसके मन में आशा की एक किरण अब भी उजाला किये हुए थी कि संभवतः सैंधव युवक से विवाह करके रानी मृगमंदा नाग प्रजा की रानी होने का अधिकार न त्यागना चाहे और प्रमद से ही विवाह कर ले किंतु आज के इस वार्तालाप से तो आशा की अंतिम किरण पर तुषारापात होता हुआ सा लग रहा था। इसी कारण वह नागों के नियम में शैथिल्य का विरोध कर रहा था।

प्रमद को इस तथ्य का ज्ञान हो गया था कि रानी मृगमंदा और दोनों राजकुमारियाँ सैंधव शिल्पी प्रतनु से अनुराग रखती हैं तथा उससे विवाह करने को उत्सुक हैं। इसलिये रानी मृगमंदा में प्रमद की विशेष रूचि नहीं रह गयी थी। इस समय तो वह यही सोच रहा था कि रानी मृगमंदा और उसकी दोनों भगिनियाँ शिल्पी प्रतनु के साथ विवाह करके नागों का पुर छोड़ कर जाना चाहती है तो अच्छा ही है। इससे वह नागों के सिंहासन पर अपना अधिकार मजबूती के साथ प्रस्तुत कर सकेगा किंतु नियम शिथिल किया गया तो यह संभव नहीं हो पायेगा।

गुल्मपति कंकोल के प्रस्ताव पर गुल्मपतियों में दीर्घ समय तक वाद-विवाद होता रहा। अंत में वे प्रतनु के साथ रानी मृगमंदा के परिणय की स्थिति में प्रतनु को नागों का नया राजा चुनने तथा नागों के नियम शिथिल करने पर सहमत हो गये। गुल्मपति प्रमद इस निर्णय से अप्रसन्न होकर अपने स्थान पर उठ कर खड़ा हो गया। उसने चेतावनी दी कि गुल्मपतियों को यह अधिकार नहीं है कि वे नाग प्रजा के बनाये हुए नियमों को अमान्य कर सकें। इसलिये वह नाग प्रजा से ही इसका निर्णय करवायेगा।

रुष्ट प्रमद प्रासाद से बाहर जाने को तत्पर हो गया तो प्रतनु ने उससे रुकने का आग्रह किया। वह अब तक नितांत मौन धारण करके गुल्मपतियों और रानी मृगमंदा के संवाद को सुन रहा था। रानी मृगमंदा का प्रस्ताव सुनकर गुल्मपति चौंका था किंतु अब समय आ गया था जब प्रतनु के विरुद्ध कुछ न कुछ बोलना आवश्यक था। अतः उसने रानी मृगमंदा से अनुमति मांगी कि उसे भी कुछ बोलने का अवसर दिया जाये।

रानी मृगमंदा द्वारा अनुमति दिये जाने के पश्चात् प्रतनु ने कहा- ‘ मैं अत्यंत विनय के साथ क्षमा याचना करते हुए कहना चाहता हूँ कि यह सत्य है कि मैंने रानी मृगमंदा के तीन जटिल प्रश्नों के संतोषप्रद उत्तर दिये थे किंतु उस समय मेरे समक्ष यह प्रतिबंध नहीं रखा गया था कि उन प्रश्नों का उत्तर देने के पश्चात् मुझे अनिवार्यतः रानी मृगमंदा से विवाह करना होगा। न ही इस सम्बन्ध में रानी मृगमंदा ने मुझसे आज तक स्वीकृति प्राप्त की है। यही कारण है कि रानी मृगमंदा नहीं जानतीं कि मैं उनसे विवाह करने को उत्सुक हूँ भी अथवा नहीं। उचित तो यही होता कि रानी मृगमंदा मुझसे विचार विमर्श करके ही अपना मंतव्य आप सबके समक्ष रखतीं।’

  – ‘तो क्या रानी मृगमंदा से विवाह करने में आपको कोई आपत्ति है ?’ वृद्ध गुल्मपति श्वेत केशीय ने पूछा।

  – ‘आपत्ति नहीं विवशता है। अन्यथा रानी मृगमंदा से विवाह करना तो मेरे जैसे तुच्छ शिल्पी और अज्ञात पथिक के लिये परम सौभाग्य की बात है।’ प्रतनु ने प्रत्युत्तर दिया।

  – ‘किंतु शिल्पी आपके समक्ष कैसी विवशता है ?’

  – ‘मैंने सैंधव देश की देव-नृत्यांगना रोमा को वचन दिया है कि मैं दो वर्ष के पश्चात्  मोहेन-जो-दड़ो लौटूंगा तथा अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिकार लूंगा। उस वचन के अनुसार मुझे यहाँ से प्रस्थान करना होगा ताकि मैं सिंधु तट पर वरुण के आगमन से पूर्व मोहेन-जो-दड़ो पहुँच सकूं।’ प्रतनु ने शर्करा तट से प्रस्थान करने से लेकर किलात द्वारा मोहेन-जो-दड़ो से निकाले जाने तक की सारी कथा गुल्मपतियों को कह सुनाई।

रानी मृगमंदा के आश्चर्य और क्षोभ का पार न रहा। वह अपनी ही धुन में, एक ही दिशा में सोचती रही। उसने यह पता लगाने का प्रयास नहीं किया कि प्रतनु भी उससे विवाह करना चाहता है अथवा नहीं। वह तो यह मानकर चल रही थी कि प्रतनु भी उससे अनुराग रखता है। अन्यथा वह गुल्मपतियों के समक्ष यह प्रस्ताव कदापि न रखती।

प्रतनु की बात सुनकर गुल्मपति प्रमद शांत होकर अपने स्थान पर बैठ गया। आशा की अंतिम किरण जो अभी कुछ क्षण पूर्व बुझ गयी थी वह फिर से चैतन्य हो गयी। भाग्य ने फिर से रानी मृगमंदा और नागों का सिंहासन उसकी झोली में आ गिरने के उपक्रम प्रस्तुत कर दिये थे।

बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला। वृद्ध गुल्मपति श्वेत केशीय ने दीर्घ मौन को भंग किया- ‘हमारे लिये आपकी क्या आज्ञा है रानी ? आदेश हो तो राजाज्ञा भंग करने के अपराध में शिल्पी प्रतनु को बंदी बनाया जाये अथवा उन्हें इसी समय दण्डित किया जाये! ‘

  – ‘नहीं-नहीं! न तो हमने ऐसी कोई आज्ञा दी है कि हम शिल्पी प्रतनु से विवाह करेंगी और न ही हम अपने अतिथि को किसी भी कार्य के लिये विवश करेंगी। ऐसे परम सम्मानित अतिथि तो सौभाग्य से ही प्राप्त होते हैं। हमें तो गर्व होना चाहिये कि हमने ऐसे व्यक्ति के अतिथि सत्कार का अवसर प्राप्त किया जो एक संकटग्रस्त रानी के लिये अपने प्राण तक संकट में डालने को प्रस्तुत है तथा अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिकार करने के लिये नाग लोक का राजपद और नाग रानी से विवाह का प्रलोभन भी त्यागने में सक्षम है। हम इन्हें कैसे बंदी बना सकते हैं और कैसे दण्डित कर सकते हैं!  ये स्वतंत्र हैं। जब तक चाहें, नाग लोक में रह सकते हैं और जब जहाँ जाना चाहें, जा सकते हैं।’

एक बहुत बड़ा भार था जिसे शिल्पी प्रतनु कई दिनों से अपने सिर पर अनुभव कर रहा था, आज वह भार यकायक हल्का हो गया था। नहीं जानता था प्रतनु कि जिस भार को वह अपने सिर से उतरा हुआ मान रहा है, वह भार शत-शत गुणा होकर रानी मृगमंदा और समस्त नाग प्रजा के सिर पर जा चढ़ा है।

– अध्याय 28, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अतिथि की विदाई (29)

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अतिथि की विदाई

अतिथि की विदाई की बात सुनकर रानी मृगमंदा हतप्रभ रह गई। उसे लगा कि रानी मृगमंदा के द्वारा ऩिऋित के माध्यम से दिए गए विवाह का प्रस्ताव सुनकर ही प्रतनु यहाँ से जाना चाहता है।

घटनायें इतनी अप्रत्याशित गति से घटित हुईं कि निर्ऋति प्रतनु के प्रतिज्ञाबद्ध होने तथा सैंधव नृत्यांगना के प्रति अनुरक्त होने की सूचना रानी मृगमंदा को नहीं दे पायी। जब गुल्मपतियों के समक्ष रानी मृगमंदा को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा तो निऋति के पश्चाताप का पार न रहा।

क्यों चूक गयी वह रानी मृगमंदा को समय रहते सूचित करने से कि अतिथि सैंधव हम नागकन्यओं से नहीं वरन् किसी सैंधव नृत्यांगना के प्रति अनुरक्त है! यदि रानी मृगमंदा को समय रहते यह सूचना मिल गयी होती तो उन्हें लज्जित नहीं होना पड़ता, रानी मृगमंदा गुल्मपतियों के समक्ष यह प्रस्ताव ही नहीं रखतीं।

निऋति को इस बात पर भी आश्चर्य और क्षोभ था कि कैसे रानी मृगमंदा ने निऋति और हिन्तालिका से विमर्श किये बिना गुल्मपतियों के समक्ष विवाह करने की घोषणा कर दी! और तो और रानी मृगमंदा ने शिल्पी प्रतनु से भी विमर्श नहीं किया। यह एक लज्जाजनक अध्याय था जो नाग-राजकुल के साथ सदा-सर्वदा के लिये जुड़ गया था।

कहीं इस स्थिति के लिये स्वयं निऋति ही तो उत्तरदायी नहीं! उसने ही कहाँ हिन्तालिका द्वारा दी गयी सूचना पर विश्वास किया था कि शिल्पी प्रतनु सैंधव नृत्यांगना से विवाह करने के लिये फिर से लौट कर सैंधव पुर मोहेन-जो-दड़ो जायेगा! निऋति ने तो सोचा था कि अपने पुर से निष्कासित शिल्पी कुछ भी क्यों न कहे, अब वह लौट कर कहीं नहीं जा सकेगा और प्रस्ताव करने पर नागकुमारियों के साथ विवाह करने के लिये अपनी स्वीकृति दे ही देगा।

जाने कितने समय तक निऋति विचारों के प्रवाह में डूबती-उतरती रही,। उसे तो यह भी पता नहीं चला कि कब सूर्यदेव दक्षिण दिशा को त्यागकर दुर्ग की पश्चिमी प्राचीर पर आ बैठे! एक बार दृष्टि ऊपर उठी तो देखा, कक्ष का प्रकाश धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है। एक अंधेरा है जो न जाने कहाँ-कहाँ से निकल कर कक्ष में समाता जा रहा है।

निऋति ने अनुभव किया कि धुएँ जैसा अंधेरा उसकी नसों में भी भरता जा रहा है। जिससे उसका चिंतन प्रवाह रुद्ध होकर एक ही स्थान पर ठहर सा गया है। क्या सोच रही है वह ? क्या सोचना चाहती है ? उसने अपने आप से प्रश्न किये किंतु उत्तर में केवल धुआँ ही धुआँ दिखाई दिया उसे। सेविका ने दीपाधार पर रखे दीप में स्नेहक भर कर वर्तिका को प्रज्वलित कर दिया किंतु निऋति उसी प्रकार विचारों की अवरुद्ध तरंगों के साथ हिचकोले खाती रही।

जाने कितनी देर तक और यही स्थिति रहती किंतु अचानक रानी मृगमंदा ने निऋति के कक्ष में प्रवेश किया। रानी मृगमंदा काफी उत्तेजित थी और लगभग हांफती हुई चली आ रही थी। अतः कक्ष में प्रवेश करते ही बोलीं- ‘ सुना तुमने निऋति! वह जा रहा है। ऐसे कैसे जा सकता है वह ? क्या हमें कोई अधिकार नहीं उसे रोक सकने का?’

निऋति अपने विचारों में इतनी गहरी उतरी हुई थी कि उसने न तो रानी मृगमंदा का कक्ष में आना लक्ष्य किया और न रानी मृगमंदा के शब्द उसके कानों तक पहुँचे।

निऋति को निश्चल बैठे देखकर रानी मृगमंदा ठिठकी।

  – ‘अब तुम्हें क्या हुआ निऋति ?’

निऋति की ओर से फिर भी कोई उत्तर नहीं आया देखकर रानी मृगमंदा ने उसका स्कंध हिलाया।

  – ‘क्या सोच रही हो निऋति ?’

  – ‘अरे आप कब आयीं ? मुझे तो ज्ञात ही नहीं हुआ।’ निऋति रानी मृगमंदा का स्पर्श पाकर आसन से उठ खड़ी हुई। उसने रानी मृगमंदा का अभिवादन किया और आसन ग्रहण करने का अनुरोध किया।

  – ‘लगता है सूचना तुम तक पहले ही पहुँच गयी है, इसीलिये उदास होकर बैठी हो।’

  – ‘कौनसी सूचना ?’ निऋति ने चैंक कर पूछा।

  – ‘शिल्पी प्रतनु के जाने की सूचना।’

  – ‘क्या! शिल्पी चला गया ?’

  – ‘नहीं अभी गया नहीं किंतु जाना चाहता है।’

  – ‘ कब ? अभी ?’

  – ‘अभी नहीं, कल प्र्रातः होते ही चले जाना चाहता है। तुम रोको उसे निऋति। हिन्तालिका कह रही थी कि वह केवल तुम्हारी ही बात मानता है।’ रानी मृगमंदा ने कातर होकर निऋति के हाथ पकड़ लिये।

  – ‘जाते हुए को कौन रोक सकता है बहिन! फिर वह हमारा लगता ही क्या है ? किस अधिकार से हम उसे यहाँ रोक सकते हैं ?’

  – ‘किस अधिकार से रोक सकते हैं ? किसी भी अधिकार से रोको उसे! हिन्तालिका कह रही थी कि तुम रोक सकती हो उसे।’

  – ‘इस समय कहाँ है वह ?’

  – ‘अतिथि शाला में है। हिन्तालिका उसके पास है।’

  – ‘आप यहाँ बैठें। मैं उसे और हिन्तालिका को यहीं बुलाकर लाती हूँ। हम तीनों मिलकर उसे समझाते हैं।’ निऋति रानी मृगमंदा को वहीं छोड़कर अतिथिशाला की तरफ दौड़ती सी चली गयी। विचारों का एक तीव्र आवेग उसके हृदय में उमड़ आया।

क्या सचमुच वह जा रहा है! क्या किसी भी तरह रोका नहीं जा सकता उसे! अनायास एक दिन वन प्रांतर में विचरण करते हुए मिल जाने वाला अनजान अतिथि क्या इतने दिनों के सानिध्य के पश्चात भी सचमुच अतिथि ही रहा! बात ही बात में रानी मृगमंदा के प्रश्नों के रहस्य को तोड़ कर रख देने वाला यह विलक्षण शिल्पी क्या अपने हृदय पर अनुराग भरी छैनी की एक भी चोट का अनुभव नहीं कर पाया!

रानी मृगमंदा की रक्षा के लिये अपने प्राणों पर खेलकर गरुड़ों का प्रवाह रोक देने वाला दृढ़ सैंधव क्या आज स्वयं ही हमारे प्राणों का हरण करके चला जायेगा! निऋति और हिन्तालिका को शिल्पकला के अनूठे प्रयोगों से परिचित करके क्या आज वह स्वयं ही जीवन से समस्त कलाओं का हरण करके चले जाना चाहता है ?

निऋति को अपनी गति पर नियंत्रण पाना पड़ा। उसने देखा कि हिन्तालिका और शिल्पी प्रतनु इसी ओर आ रहे हैं।

  – ‘कहाँ जा रही हो निऋति ?’ प्रतनु ने पूछा।

  – ‘आपही की सेवा में उपस्थित होने जा रही थी अतिथि महाशय।’ निऋति ने कतिपय रूक्ष स्वर में उत्तर दिया।

  – ‘ किस प्रयोजन से ?’

  – ‘रानी मृगमंदा आपको स्मरण कर रही हैं।’

  – ‘हम तो स्वयं ही रानी मृगमंदा की सेवा में जा रहे हैं।’ हिन्तालिका ने उत्तर दिया।

निऋति उन्हें साथ लेकर अपने कक्ष में पहुँची। रानी मृगमंदा ने अपने स्थान पर खड़े होकर अतिथि का स्वागत किया। बहुत देर तक चारों प्राणी बिल्कुल मौन बैठे रहे। कोई कुछ नहीं बोला। आश्चर्य चकित था प्रतनु भी अपने मौन पर। क्यों नहीं वह कुछ बोल पाता!

इतना तो पूछ ही सकता है कि रानी मृगमंदा किस आशय से उसे स्मरण कर रही थीं! किंतु नहीं प्रतनु की जिह्वा जैसे शब्दों का उच्चारण करना ही भूल गयी। अंत में निऋति ने मौन भंग किया- ‘ हमारी रानी मृगमंदा जानना चाहती हैं कि क्या आपका लौट जाना अत्यंत आवश्यक है ?’

  – ‘हाँ, मेरा जाना अत्यंत आवश्यक है।’ प्रतनु की जिह्वा में जैसे शब्द पुनः लौट आये।

  – ‘हम क्या करें कि आप अपना निर्णय बदल लें ?’

  – ‘आपको ऐसा करने की आवश्यकता ही क्या है ?’

  – ‘प्रश्न आवश्यकता का नहीं इच्छा का है।’

  – ‘आपके लिये यह केवल इच्छा का प्रश्न है जबकि मेरे लिये यह प्रश्न किसी के जीवन मरण से जुड़ा हुआ है।’

  – ‘क्या यह निश्चित है कि आप सैंधव नृत्यांगना रोमा की रक्षा करने में सफल हो जायेंगे ? आप असफल भी तो हो सकते हैं ?’

  – ‘मैं मानता हूँ कि मेरा संकल्प इतना बड़ा है कि संभवतः मैं उसमें सफल नहीं होऊं किंतु क्या मुझे प्रयास भी नहीं करना चाहिये ?’ प्रतनु ने उलट कर प्रश्न किया।

  – ‘क्या लाभ ऐसे प्रयास का जबकि असफलता निश्चित जान पड़ती है।’ निऋति ने हार नहीं मानी।

  – ‘जिस प्रकार सफलता निश्चित नहीं है, उसी प्रकार असफलता भी निश्चित नहीं है किंतु मुख्य बात सफलता और असफलता की नहीं, मुख्य बात है देवी रोमा के दिये गये वचन की, वह मेरी प्रतीक्षा करेंगी। मुझे जाना ही होगा।’

  – ‘मुख्य बात है देवी रोमा को दिये गये वचन की।’ निऋति ने मुँह बिगाड़ कर प्रतनु की नकल की, ‘और हमारे प्रति तुम्हारी कोई मुख्य बात है ही नहीं!’ एक तो वह है जिसके कारण तुम्हें मोहेन-जो-दड़ो से निष्कासित किया गया और एक हम हैं जिन्होंने तुम्हें सिर आँखों पर बिठाया। एक तरफ वो है जो केवल दो घड़ी तुम्हारे साथ रही और एक हम हैं जो इतने दिन से तुम्हारी सेवा कर रही हैं। फिर भी तुम्हारी मुख्य बात नृत्यांगना रोमा के साथ ही रही। तब हमें क्या लाभ हुआ तुमको अपना अतिथि बनाकर ?’

  – ‘मैं मानता हूँ कि मुझे अतिथि बनाकर तुम्हें कोई लाभ नहीं हुआ किंतु निऋति! संसार में लाभ हानि की गणना ही तो मनुष्य को सुख नहीं देती! मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं केवल तुम्हारे साथ ही नहीं अपितु रानी मृगमंदा और हिन्तालिका के साथ भी अन्याय कर रहा हूँ किंतु मेरे सामने और कोई उपाय भी तो नहीं है। मैंने देवी रोमा को जो वचन दिया था, वह यहाँ आने से पहले दिया था। यदि मुझे पता होता कि आगे चलकर ऐसी परिस्थितियाँ मेरे सामने आयेंगी तो मैं देवी रोमा को कोई आश्वासन नहीं देता। इस पर भी यदि तुम कहो कि मुझे यहीं रुक जाना चाहिये और देवी रोमा को अनंत काल तक के लिये प्रतीक्षा करने के लिये छोड़ देना चाहिये तो मैं यहीं रुकने को प्रस्तुत हूँ।’ प्रतनु ने समर्पण कर दिया।

  – ‘नहीं-नहीं! निऋति तुम्हें यह कदापि नहीं कहना चाहिये कि शिल्पी प्रतनु को अतिथि बनाकर हमें कोई लाभ नहीं हुआ। हमने इन्हें किसी लाभ की प्रत्याशा में अतिथि नहीं बनाया था। इसके उपरांत भी शिल्पी प्रतनु ने विपत्ति काल में हम पर कितना बड़ा उपकार किया है, हमें यह भी तो नहीं भूलना चाहिये। मेरा पूरा विश्वास है कि शिल्पी प्रतनु हम से भी उतना ही अनुराग रखते हैं जितना देवी रोमा से। यदि वे यहाँ से चले जाना चाहते हैं तो वह भी कत्र्तव्य के वशीभूत होकर। हमें उनके मार्ग की बाधा नहीं बनना चाहिये।’

इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। मानो रानी मृगमंदा ने निर्णय सुना दिया। हिन्तालिका की आँखों में पानी भर आया। उसने रानी मृगमंदा और अतिथि प्रतनु को प्रणाम किया और वह कक्ष से बाहर चली गयी। निऋति ने भी रोष से पैर पटकते हुए उसका अनुसरण किया। कक्ष में केवल दो प्राणी रह गये।

एक तो शिल्पी प्रतनु और दूसरी रानी मृगमंदा। थोड़ी देर तक दोनों मौन रहे। चुप्पी का एक-एक पल पहाड़ जितना भारी हो जाता है। कई बार मनुष्य को लगता है कि इस पहाड़ को तिल भर सरका देना भी उसके वश में नहीं है।

समय कम था, रानी मृगमंदा को लगा कि चुप्पी का यह पहाड़ यदि आज नहीं खिसका तो फिर कभी नहीं खिसकेगा। अतः किंचित् संकोच के साथ क्षमा याचना करते हुए बोली- ‘ यदि निऋति ने अतिथि की मर्यादा का उल्लंघन किया हो तो मैं उसकी ओर से क्षमा याचना करती हूँ ।’

  – ‘नहीं-नहीं। उसने किसी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। जो कुछ भी वह कह गयी है, प्रेम और राग के वशीभूत होकर ही तो! मैं इतना हृदयहीन तो नहीं जो शब्दों में छिपे प्रेम की ऊष्मा का अनुभव नहीं कर सकूँ! ‘

  – ‘अतिथि यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि हम आपका प्रेम न पा सके।’ रानी मृगमंदा के शब्दों में घनघोर निराशा थी।

  – ‘यह आपका नहीं, मेरा दुर्भाग्य है। मैं ही आप तीनों को न अपना सका।’

  – ‘हमें आप सदैव स्मरण रहेंगे अतिथि।’

  – ‘ मैं भी प्राण रहते आप तीनों की स्मृति अपने से विलग न कर सकूंगा।’

  – ‘सैंधव नृत्यांगना देवी रोमा को हमारा प्रणाम………।’ रानी मृगमंदा का गला  रुंध गया, वह अपनी बात पूरी नहीं कर सकी। अतिथि की विदाई का क्षण सचमुच बहुत पीड़ा दायक है।

– अध्याय 29, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पिशाच (30)

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पिशाच

प्रतनु ने अपने नेत्र पूरी तरह खोल दिये। श्वान-मुखी मादा पिशाच की पूर्णतः निर्वस्त्र वीभत्स देह प्रतनु की देह पर पूरी तरह झुकी हुई थी। उसने अपनी दोनों हथेलियाँ प्रतनु के शरीर पर ही टिका रखी थीं जिससे उसके लटकते हुए वीभत्स स्तन प्रतनु के शरीर को स्पर्श कर रहे थे।

उषा के आगमन के साथ ही रानी मृगमंदा, निर्ऋति तथा हिन्तालिका से विदा लेकर प्रतनु सीधा मोहेन-जो-दड़ो की ओर बढ़ा। उष्ट्र के न होने से उसे यह मार्ग पैदल ही पार करना था। अतः इस बार की यात्रा में समय भी अधिक लगने की संभावना थी।

दीर्घ समय तक नागलोक में निवास करने के कारण प्रतनु उस मार्ग को बिल्कुल भूल चुका था जिस पर चलता हुआ वह मोहेन-जो-दड़ो से यहाँ तक पहुँचा था। फिर भी उसका विचार था कि दिशा का अनुमान करके तथा अतिरिक्त सावधानी रखकर वह पहले की अपेक्षा कुछ न्यूनाधिक समय में मोहेन-जो-दड़ो तक पहुँच सकता था।

प्रारंभ का अधिकतर मार्ग पर्वतीय उपत्यकाओं में था जहाँ कदम-कदम पर नदी नाले और झरने उसके सहचर थे। आगे का मार्ग नितांत मैदानी क्षेत्र में था जहाँ सघन वनावली का प्रसार था। पूरे मार्ग में जल और आहार की कमी नहीं थी। प्रतनु ने अनुभव किया कि इस मार्ग पर दिन में यात्रा करना अधिक सुगम्य था। रात्रि में वन्य पशुओं के खतरे के कारण उसे किसी ऊँचे वृक्ष की स्थूल शाखाओं पर आश्रय लेना पड़ता था। फिर भी वह अपनी यात्रा प्रातः शीघ्र ही आरंभ कर देता था और संध्या समय में विलम्ब तक चलता रहता था।

नागलोक से निकल कर छः दिन तक वह बिना किसी बाधा के चलता रहा। सातवें दिन मध्याह्न के पश्चात घनघोर बादल छा गये और देखते ही देखते मूसलाधार वर्षा होने लगी। चारों ओर से घिर कर आये श्यामवर्णी बादलों ने जैसे क्रोधित होकर उस भू-क्षेत्र को घेर लिया जिससे घनघोर अंधेरा छा गया।

लगता था वरुण अपने बादल रूपी शकटों को पूरी तरह भर कर लाया था और समस्त जल यहीं बरसा देना चाहता था। वर्षा की बूंदो के प्रहार से बचने के लिये सघन वृक्ष को खोजता हुआ प्रतनु मार्ग भटक गया और दिशा बदल कर दक्षिण के स्थान पर पश्चिम में बढ़ गया। ऐसी विकट वर्षा प्रतनु ने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखी थी।

सहस्रों जल धारायें बह निकलीं। जिन्हें पार कर आगे बढ़ना कठिन हो गया। काफी देर तक प्रतनु एक विशाल वृक्ष के नीचे आश्रय लिये रहा। जब वर्षा पूरी तरह थम गयी तो उसने अपनी यात्रा पुनः आरंभ की।

वर्षा थम जाने के बाद भी सूर्यदेव दिखाई नहीं दिये किंतु बादलों से छनकर आने वाले प्रकाश में प्रतनु किसी तरह आगे बढ़ता रहा। रात्रि में भी आकाश की यही स्थिति रही। लगता था चंद्रमा सहित समस्त नक्षत्र वर्षा काल जानकर भीग जाने के भय से गगन विहार के लिये आये ही नहीं। बहुत प्रयास के उपरांत भी जब प्रतनु दिशा निर्धारण करने तथा आगे चल सकने में समर्थ नहीं हुआ तो उसने हार-थक कर एक वट वृक्ष का आश्रय लिया किंतु तब तक वह मार्ग भटक कर काफी दूर तक चल चुका था।

यहाँ मृगमंदा के मायावी उपवन की भांति अशोक, बकुल, चम्पक, शिरीष, पुन्नाग, अरिष्ट तथा कुरबक के वृक्ष नहीं थे। कुरण्ट, नवमालिका, सिन्धुवार और कुन्द पुष्पों के गुल्म भी नहीं थे। यहां करवीर के मनोहारी सुगंधित झाड़ भी नहीं थे जिनके निकट बनी चैकियों पर बैठकर रानी मृगमंदा की अनुचरियाँ नागस्वरम्, वाण, वेणु, मृदंग और आघाटि वादन करतीं थीं। इस निर्जन वन में चारों ओर नीलगिरि, अश्वत्थ और वटवृक्षों की भरमार थी जिनकी सघनता के कारण वन दुरूह हो गया जान पड़ता था।

नीलगिरी का वृक्ष मनुष्य तो मनुष्य पक्षियों तक के आश्रय के लिये भी श्रेयस्कर नहीं होता। अश्वत्थ पर आश्रय लेना उसने उचित नहीं समझा। उसने सुना था कि अश्वत्थ पर अशरीरी जीवों का वास रहता है जो रात्रि में अधिक सक्रिय रहते हैं। वटवृक्ष पर आश्रय करने में दो समस्याएं हैं एक तो वटवृक्ष पर चढ़कर बैठना संभव नहीं दूसरे वट पर सर्प आदि भी आश्रय ले लेते हैं।

सब बातों पर विचार करने के उपरांत प्रतनु ने वटवृक्ष के नीचे ही आश्रय लेना अधिक उचित समझा। कुछ खोजने पर उसे वृक्ष की विशाल जटाओं से बन गयी कोटर जैसी एक आकृति दिखाई दे गयी। उसी कोटर में प्रतनु को छिपकर बैठने के लिये पर्याप्त स्थान मिल गया, जिससे कि प्रतनु के निद्रा में होने पर कोई वन्य पशु अचानक उस पर आक्रमण न कर दे। कोटर में आश्रय लेने से यह लाभ भी हुआ कि वटपत्रों से गिरती बूंदों और शीत से भी प्रतनु का बचाव हो गया। ग्रीष्म होने के कारण उसके साथ रोमयुक्त मेष-चर्म भी नहीं था जो शीत से प्रतनु का बचाव करता।

पर्याप्त रात्रि हो जाने के उपरांत भी वृक्षों पर बैठे पक्षियों की फड़फड़ाहट समाप्त नहीं हो रही थी। सघन वर्षा के कारण कई पक्षी अपने डेरों पर नहीं लौटे थे जिनकी प्रतीक्षा में उनके साथी पक्षी व्याकुल होकर पंख फड़फड़ाते हुए तीव्र शब्द उत्पन्न कर रहे थे। बहुत से पक्षी अपने वृक्षों को ढूंढते हुए एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक उड़ रहे थे। लगता था आज की रात वन सोयेगा नहीं।

प्रतनु ने अनुभव किया कि सर्वत्र व्याप्त निविड़ अंधकार में रह-रह कर उत्पन्न होती पक्षियों की चीखें और उनकी अकुलाहट भरी फड़फड़ाहट ही वातावरण को भयावह बना देने के लिये पर्याप्त थी किंतु यहाँ तो प्रकृति ने भयावहता में अभिवृद्धि के अनेक उपाय रच रखे थे। रह-रह कर वायु के झौंके वृक्षों को झकझोर जाते। वृक्षों की टहनियाँ पवन से रगड़ खाकर सांय-सांय करने लगतीं और वृक्ष-पत्रों पर अटके जल-बिन्दु पर्वतों से बहकर आने वाली जल धाराओं में गिरकर टप-टप की रहस्यमयी ध्वनि उत्पन्न करते।

ऐसे में चिच्चिक और वृषारव भला कैसे पीछे रहते! प्रतनु को रानी मृगमंदा द्वारा नागों के संगीत वाद्ययंत्र आघाटि के सम्बन्ध में कही गयी उक्ति का स्मरण हो आया- ”जब चिच्चिक वृषारव के प्रत्युत्तर में बोलता है, तब अरण्यानी आघाटि की भांति ध्वनि करता हुआ पूजित होता है।”

चिच्चिक और वृषारव तो वही हैं किंतु यहाँ उनके परस्पर संवाद से आघाटि के स्वर उत्पन्न नहीं हो रहे। यहाँ तो वे वन की भयावहता में वृद्धि करने के उपकरण बने हुए हैं।प्रतनु को लगा कि इस समय वन में जो कुछ भी सजीव अथवा निर्जीव रचना उपस्थित है वह पूरे मनोयोग से वन की भयावहता में वृद्धि करने में योग दे रही है।

वन की भयावहता में वृद्धि करने के लिये ही सहस्रों-सहस्र झिंगुर, दादुर और पपीहे शक्ति भर जोर लगाकर चीख रहे हैं। दूर ही कहीं श्रृगालों का गुल्म हुआँ-हुआँ करके चिल्ला रहा है। बीच-बीच में हिंस्रक वन्यपशुओं की चिंघाड़ भी वन को झिंझोड़ रहीं है। अपनी प्रकृति के विरुद्ध प्रतनु को अनजाने भय ने घेर लिया।

आकाश में नक्षत्र उपस्थित होते तो प्रतनु उन्हें ताकते रहकर समय व्यतीत कर सकता था किंतु घनघोर अंधकार के कारण आकाश विकराल कज्जल के वितान में परिवर्तित हो गया प्रतीत होता था जिसके आर-पार कुछ दिखाई नहीं देता था। खद्योतों के उड़-उड़ कर एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक जाने के उपक्रम में यदा-कदा जो क्षीण प्रकाश उत्पन्न होता था उसमें दैत्याकार वृक्ष और भी भयावह दिखाई देते थे।

प्रतनु ने अनुभव किया कि इस वट वृक्ष पर चमगादड़ों का बड़ा डेरा था जो विकराल रात्रि के निविड़ अंधकार से उत्साहित होकर दुगुने-चैगुने वेग से शब्द करती हुई मण्डरा रहीं थीं। चमगादड़ों की भांति उल्लूकों की भी आज बन आई थी, उनके उत्साह का पार न था। वे रह-रह कर अशुभ चीत्कार करते थे। वटवृक्ष की कोटर में बैठा प्रतनु प्रातः होने की प्रतीक्षा में आंखें फाड़-फाड़ कर अपनी चेतना पर हावी होते अंधकार और भय से लड़ता रहा।

पहले की यात्राओं में उष्ट्र उसके साथ रहा था जिससे वह अपने आप को निपट एकाकी एवं असहाय अनुभव नहीं करता था। एकांत के क्षणों में वह मूक पशु भी बहुत बड़ा सम्बल सिद्ध होता था जिससे वह कुछ पूछ तो नहीं सकता था किंतु कुछ कह तो सकता था।

सचमुच ही इस विकट वन की घनघोर अंधेरी रात्रि में प्रतनु को न तो सैंधव नृत्यांगना रोमा, न नागों की रानी मृगमंदा, न निर्ऋति और न हिन्तालिका, किसी का स्मरण नहीं आया। स्मरण आया तो केवल मात्र वह उष्ट्र जिसके अभाव में वह अपने आप को निपट एकाकी, नितान्त असहाय और दयनीय अनुभव कर रहा था। जाने उस उष्ट्र का क्या हुआ होगा! निश्चय ही वह अब तक वन्यपशुओं का भोजन बन चुका होगा।

संभवतः रात्रि के अंतिम प्रहर में अथवा उससे कुछ पूर्व उसकी आँख लगी। जाने कितनी देर तक वह सोता रहा, प्रतनु को अनुमान नहीं हुआ। जब उसकी नींद खुली तो वह विचित्र और भयावह दिखाई देने वाले प्राणियों से घिरा हुआ था। उनके मुख श्वान के सदृश दिखाई देते थे। वे पूर्णतः निर्वस्त्र थे।

उनकी देह कज्जल के सदृश काली और अन्य प्रजाओं की अपेक्षा कहीं अधिक विशाल और पतली थी। सिर के बाल मेष ऊष्ण की भांति अत्यंत पतले, विरल और लम्बे थे तथा घुंघरुओं की तरह वलयकार होकर सिर से ही चिपके हुए थे। उनके हाथों में नुकीले काष्ठ दण्ड थे। [1]  सबसे आगे खड़ा हुआ प्राणी उनका मुखिया जान पड़ता था।

झटके से उठ बैठा प्रतनु। किन लोगों के बीच आ गया वह! कौन हैं ये लोग! उसे घेर कर क्यों खड़े हैं! कहीं ये पिशाच तो नहीं! प्रतनु ने सुना था कि घने एवं दुर्गम वन प्रांतरों में जहाँ अन्य प्रजाओं का आवागमन नहीं है, पैशाचिक प्रजायें रहती हैं। तो क्या वह पिशाचों की भूमि में आ पहुँचा है। प्रतनु ने अनुभव किया कि पीड़ा से उसका हाथ दर्द कर रहा है। संभवतः वीभत्स दिखाई देने वाले श्वान मुखी पिशाचों ने प्रतनु को जगाने के लिये किसी नुकीली चीज से कोंचा था।

प्रतनु को उठा हुआ देखकर वे लोग विचित्र भाषा में चीख-चीख कर बोलने लगे। संभवतः प्रतनु को कुछ आदेश दे रहे थे। प्रतनु नहीं जानता था कि यह कौनसी भाषा है और किस क्षेत्र की प्रजा द्वारा बोली जाती है। प्रतनु ने अनुभव किया कि भले ही वे पिशाच हों अथवा अन्य कोई प्रजा किंतु वे प्रतनु से भयभीत तो किंचित् मात्र भी नहीं हैं। संभवतः इसका कारण यह था कि वीभत्स दिखाई देने वाले प्राणी स्वयं को संख्या बल में अधिक जानकर सुरक्षित अनुभव कर रहे थे।

प्रतनु वटवृक्ष की हवा में लटकती जड़ों में बनी कोटर से बाहर आया। जैसे ही वह कोटर से बाहर निकला, विचित्र और वीभत्स दिखाई देने वाले उन श्वान मुखी पिशाचों ने प्रतनु को कसकर दबोच लिया और उसके हाथ-पैर एक मजबूत लता की सहायता से एक मोटे काष्ठ दण्ड से बांध दिये।

असहाय होकर रह गया प्रतनु। काष्ठ दण्ड को दो पिशाचों ने अपने कंधे पर इस तरह रख लिया मानो मृत-पशु का शव ढोकर ले जा रहे हों। प्रतनु ने विरोध करना चाहा तो पिशाचों के मुखिया ने उसे नुकीली काष्ठ से कोंचा। प्रतनु असह्य पीड़ा से कराह उठा। उसने समझ लिया कि इन वीभत्स प्राणियों का प्रतिरोध करना उसके लिये संभव नहीं।

रास्ते भर पिशाच परस्पर वार्ता में निमग्न रहे थे, एक पल को भी चुप नहीं रहे थे। उनकी कोई बात प्रतनु के पल्ले नहीं पड़ी थी किंतु वे बार-बार मुखिया दिखाई देने वाले पिशाच को टिमोला कह कर पुकार रहे थे। प्रतनु ने अनुमान किया कि या तो उस पिशाच का नाम टिमोला है या फिर ये पिशाच ‘मुखिया’ अथवा ‘राजा’ जैसे किसी शब्द के लिये टिमोला शब्द काम में लाते हैं।

काफी देर तक घुमावदार मार्गों पर चलते रहने के बाद वीभत्स पिशाच अत्यंत सघन वृक्षों से घिरे एक भूखण्ड में पहुँचे, जहाँ उनके जैसे सैंकड़ों पिशाच मौजूद थे। प्रतनु ने अनुमान लगाया कि यह स्थान ही श्वान-मुखी पिशाचों का पुर है। आश्चर्य से जड़ होकर रह गया प्रतनु इस पुर को देखकर।

इस तरह के आवास भी कोई प्रजा अपने निवास के लिये बना सकती है, सोचा भी नहीं जा सकता था। उसने देखा कि सघन वनावली में काष्ट एवं वनस्पति की सहायता से बनी हुई अत्यंत भद्दी झौंपड़ियाँ इधर-उधर छितरी हुई थीं जिनकी छत पृथ्वी से कुछ ही ऊपर उठी हुई थी। इन झौंपड़ियों में कोई भी प्राणी सीधा खड़ा होकर प्रवेश नहीं कर सकता था।

कुछ ही पलों में पूरी बस्ती को सूचना हो गयी कि टिमोला किसी विचित्र प्राणी को बांध कर लाया है। इस सूचना से झौंपड़ियाँ हिलने सी लगीं। प्रतनु ने देखा कि वीभत्स आकृति वाले श्वान मुखी स्त्री, पुरुष और बच्चे झौंपड़ियों से रेंग-रेंग कर बाहर निकलने लगे। थोड़ी ही देर में वे सैंकड़ों की संख्या में प्रतनु को घेर कर खड़े हो गये।

प्रतनु को देखकर वे अत्यंत ही विचित्र ध्वनि उत्पन्न करते थे जो शृगालों की हू-हू से काफी साम्य रखती थी। वीभत्स चेहरे वाले पुरुषों ने प्रतनु के वस्त्रों को कौतूहल से टटोल-टटोल कर फाड़ डाला। थोड़ी ही देर में वह भी पिशाचों की तरह पूरी तरह से निर्वस्त्र था। प्रतनु ने अनुमान लगाया कि अब वह किसी तरह से यहाँ से भाग जाने में सफल हो भी जायेगा तो बिना वस्त्रों के सभ्य समाज में नहीं जा सकेगा।

वीभत्स चेहरों वाली स्त्रियों ने प्रतनु को छूकर देखा। उनके खुरदरे हाथ प्रतनु को अपने कोमल गात पर काँटें जैसे अनुभव हो रहे थे। उनके श्वानमुखी चेहरों से वीभत्सता टपक रही थी। कुछ स्त्रियाँ तो प्रतनु के माँस का आस्वादन करने को इतनी उतावली थीं कि उनकी जिव्हा बाहर निकल आई और उनसे लार टपकने लगी। एक मादा पिशाच ने तो सचमुच ही अपने श्वान जैसे तीक्ष्ण दंत प्रतनु की देह में गड़ा दिये। रक्त के कुछ बिन्दु प्रतनु की कोमल देह पर छलछला आये जिन्हें उस मादा पिशाच ने अत्यंत आतुरता से चाट लिया। अदम्य पीड़ा से चीख पड़ा वह।

प्रतनु के स्वादिष्ट रक्त का स्वाद पाकर तो मादा पिशाच नियंत्रण से बाहर हो गयी। उसने फिर से अपने तीक्ष्ण दंत प्रतनु की देह में गड़ा दिये। अन्य पिशाचों ने उसे बलपूर्वक वहाँ से हटाया। प्रतनु समझ गया कि वह जिन नर-भक्षी पिशाचों के हाथ लग गया है उनसे छुटकारा पाना कठिन है। इनके हाथ लग जाने का अर्थ है साक्षात् मृत्यु को प्राप्त कर लेना।

पिशाचों के बच्चों को तो प्रतनु के रूप में क्रीड़ा की नवीन सामग्री प्राप्त हो गयी प्रतीत होती थी। वे उस पर कंकर, मिट्टी के ढेले और काष्ठ खण्ड उठा-उठा कर फैंकते और प्रतनु के चेहरे पर उत्पन्न होने वाले पीड़ा के भावों को देखकर आनंदित होते। जब तक सूर्य अस्ताचल को नहीं पहुँच गया, यही क्रम चलता रहा। अंत में जब पीड़ा सहन शक्ति से बाहर हो गयी तो प्रतनु मूच्र्छित हो गया।

जाने कब तक मूच्र्छित रहा वह! जब चेतना लौटी तो अपने आप को जीवित पाकर उसे आश्चर्य हुआ। उसने देखा आकाश में चंद्रमा नक्षत्रों सहित विहार करने आ गया था। जिसका क्षीण प्रकाश सघन वृक्षों की पत्तियों से छन-छन कर प्रतनु की निर्वस्त्र देह और देह पर बने व्रणों पर पड़ रहा था। वरुण का कोप शांत हो जाने से यद्यपि आज की रात्रि विगत रात्रि की तरह भयावह नहीं थी किंतु जितने भय और कष्ट में वह आज था आज से पहले किसी भी रात्रि में नहीं रहा था।  अब भी उसके दोनों हाथ और दोनों पैर पूरी मजबूती से काष्ठ दण्ड से बंधे थे, वह अपने स्थान से यव भर भी नहीं हिल सकता था।

प्रतनु ने अनुमान किया कि श्वान-मुखी पिशाचों के लिये वह पशु से अधिक महत्व नहीं रखता था। अंतर था तो केवल इतना कि वे उसे तुरंत न खाकर अवसर विशेष पर अथवा समारोह पूर्वक खाना चाहते थे क्योंकि प्रतनु उनके लिये ऐसा पशु था जिसका मांस उन्हें यदा-कदा ही खाने को मिलता था। यह भी संभव था कि कुछ विशिष्ट पिशाचों द्वारा ही उसका भक्षण किया जाये क्योंकि प्रतनु की देह में इतना मांस उपलब्ध नहीं था जिससे सैंकड़ों पिशाचों का उदर भर सके। संभवतः इसी कारण अब तक उसे मारा नहीं गया था।

प्रतनु का अनुमान सही था। रात्रि भर वह उसी काष्ठ दण्ड से मृत पशु की भांति बंधा रहा। पिशाचों की प्रजा में विशिष्ट महत्व रखने वाले शक्तिशाली टिमोला और उसके साथ हर विपत्ति में साथ रहने वाले कतिपय बलिष्ठ पिशाच ही स्वयं को नर-मांस भक्षण के योग्य समझते थे किंतु अन्य पिशाचों के दांत भी प्रतनु के विशिष्ट मांस पर थे। सारे पिशाच उसके कोमल मांस का स्वाद लेना चाहते थे।

पिशाचों की प्रजा का नियम भी यही था कि जब कोई शिकार पकड़ा या मारा जाता था तो उसे समस्त पिशाच प्रजा अपना भक्ष्य बनाती थी किंतु इस शिकार की बात और थी। इसका सुस्वादिष्ट मांस टिमोला अकेले ही खाना चाहता था किंतु अपने बलिष्ठ अनुचरों को कुपित न कर सकने के कारण वह उन्हें इसमें से कुछ भाग देने को तैयार था किंतु यदि समस्त पिशाच प्रजा साधारण शिकार की तरह प्रतनु को खाने बैठ गयी तो टिमोला और उसके साथियों के हाथ क्या आयेगा!

टिमोला और उसके साथियों ने अन्य पिशाचों का ध्यान प्रतनु की तरफ से हटाने  के लिये अगले दिन एक योजना बनाई। टिमोला ने अपने बलिष्ठ साथियों को वन से अधिक से अधिक संख्या में पशुओं का शिकार करके लाने को कहा ताकि अन्य पिशाचों को उनके भक्षण में लगा कर वे प्रतनु को अपने लिये बचा लें।

दिन का तीसरा प्रहर समाप्ति पर था कि टिमोला के बलिष्ठ साथी अपने मजबूत स्कंधों पर वन्य पशुओं के शव ढो-ढोकर लाने लगे। महिष,[2]  शूकर,[3]  हरिण, शशक [4] आदि वन्य पशुओं को प्रस्तरों और नुकीले काष्ट से मारा गया था। उनकी क्षत-विक्षत देह से रक्त की धारायें बह रही थीं। प्रतनु ने देखा कि कुछ पिशाच विशालाकाय कछुओं को अपनी पीठ पर लादे हुए हैं। कुछ पिशाचों के हाथों में बड़े-बड़े मत्स्य लटकाये हुए हैं तो कुछ के हाथों में कछुओं के बड़े-बड़े अण्डे भी लगे हुए हैं।

बड़ी मात्रा में पशु-मांस और कछुओं के अण्डों को देखकर पिशाचों के पुर में उत्सव का सा वातावरण उत्पन्न हो गया। कुछ बलिष्ठ पिशाच नारियल और ताड़ के ऊँचे वृक्षों पर चढ़ गये और वहां से ढेरों नारियल तोड़-तोड़ कर नीचे फैंकने लगे। कुछ पिशाचों ने ताड़-वृक्षों पर पहले से लटकाये गये विशालाकाय कछुओं के खोलों को सावधानी पूर्वक नीचे उतारा। ये खोल ताड़-रस से पूर्णतः भरे हुए थे।

टिमोला और साथियों ने आज ताड़-रस भी भारी मात्रा में पेड़ों से उतरवाया। यह समस्त सामग्री एक विशाल गड्ढे के पास रख दी गई। शाम होते ही एक गड्ढे में शुष्क काष्ठ खण्ड भरकर अग्नि लगाई गई। सैंकड़ों पिशाच खड्ड में प्रज्वलित अग्नि को घेर कर नाचने और विभिन्न पशुओं के मांस को भून-भून कर खाने लगे। शीघ्र ही ताड़ी अपना प्रभाव पिशाचों पर दिखाने लगी और वे परस्पर गाली-गलौच करते हुए झगड़ने लगे। एक दूसरे के हाथ से मांस खण्ड छीनकर खाते हुए पिशाच अत्यंत वीभत्स और अशुभ दृश्य उत्पन्न कर रहे थे।

पिशाचों ने अपने पैरों में नारियल के खोल बांध रखे थे जिनमें तेज आवाज उत्पन्न करने वाले कंकड़ भरे हुए थे। अचानक कुछ पिशाचों ने गायन आरंभ किया-

ओगराई आयाहि ऽ ऽ ऽ वोईतोया ऽ ऽ  [5]

तोया ऽ ऽ इ ग्रणानोह व्यदा तो या ऽ ऽ इ ।

तोया ऽ ऽ इ नाइहोतासा ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ

त्सा इबा ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ ऽ औहोबा हीं ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ ऽ षी।

पहले तो प्रतनु की समझ में कुछ नहीं आया किंतु कुछ ही क्षणों में कुछ शब्द उसके मानस पटल पर प्रत्यय [6] बनाने लगे। चैंक पड़ा प्रतनु पिशाचों के गायन को सुनकर। ऐसा ही, हाँ ठीक ऐसा ही गायन तो प्रतनु ने नाग कन्याओं के तूर्य आयोजन के समय सुना था। तो क्या नागों और पिशाचों के मध्य किसी प्रकार का सम्पर्क है!

आशा की एक किरण प्रतनु के हृदय में उदित हुई और अगले ही पल बुझ गयी। भला पिशाचों और नागों के मध्य किसी प्रकार का सम्पर्क कैसे हो सकता है! कहाँ नागों की अत्यंत विकसित सभ्यता और कहाँ अत्यंत हीन स्तर पर विद्यमान पिशाच!

जाने कहाँ पिशाचों ने नागों का यह गायन सुना और उसे पैशाचिक शैली में ढालकर अपना लिया। निऋति ने बताया था कि नागों में भी यक्षों, गंधर्वों और आर्यों के समान साम गायन की परम्परा है। कौन जाने पिशाचों ने यह गायन नागों से न सुनकर यक्षों, गंधर्वों अथवा आर्य सामगायकों से सुना हो और उसे स्मरण रख लिया हो।

 प्रतनु ने अनुभव किया कि पिशाचों की नृत्य और गायन कला पूरी तरह अविकसित होने के उपरांत भी पैशाचिक गायन में स्तोभाक्षरों  [7] ‘हाऊ – – –  हाऊ’ और ‘नोनि – – – नोनि’ का प्रयोग बड़े पैमाने पर हुआ है। ठीक वैसे ही जैसा कि सैंधव गायक ‘हुम् ऽ ऽ ऽ हाँ, हुम् ऽ ऽ ऽ हाँ’ तथा  ‘अ ऽ र ऽ र ऽ र ऽ ‘ किया करते हैं।

नागों की अति उन्नत गायन कला में भी ‘सं – – –  नि – ध – – – प – । सं – – –  नि – ध – – – प – ‘ स्तोभाक्षर उपस्थित हैं। यह दूसरी बात है कि सैंधव गायक तथा नाग गायक स्तोभाक्षरों का प्रयोग अत्यल्प मात्रा में करते हैं जबकि पिशाचों में स्तोभाक्षर ही मुख्य गायन पद है तथा साथ ही अत्यंत कर्कश भी। यही कारण है कि पिशाचों के स्तोभाक्षर आनंद के स्थान पर भय में वृद्धि कर रहे हैं।

आग की लपटों में चमकते पिशाचों के श्वान मुख अत्यंत भयावह दिखाई पड़ रहे थे। यह खड्ड प्रतनु से कुछ दूर पड़ता था फिर भी आग के प्रकाश में वहाँ चल रही प्रत्येक गतिविधि प्रतनु को स्पष्ट दिखाई दे रही थी। ऐसा वीभत्स दृश्य प्रतनु ने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था।

जीवन से पूर्णतः निराश हो चले प्रतनु के स्मृति पटल पर शर्करा के तट पर बसा अपना पुर, पुर में रहने वाली अपनी माँ, सिंधु तट पर बसी राजधानी मोहेन-जो-दड़ो, मोहेन-जो-दड़ो में रहने वाली नृत्यांगना रोमा, पर्वतीय प्रदेश में पुष्पित-पल्लवित नागों का विवर, विवर में निवास करने वाली रानी मृगमंदा, निऋति और हिन्तालिका स्थिर प्रतिमाओं की भांति उभरने लगे।

प्रतनु को लगा कि ये सब उपक्रम अब उसके लिये व्यर्थ हो चले हैं। अब कभी वह मोहेन-जो-दड़ो नहीं लौट सकेगा। नृत्यांगना रोमा प्रतीक्षा ही करती रह जायेगी उसकी। न तो वह कभी अपने अपमान का प्रतिकार कर सकेगा और न रोमा को किलात के चंगुल से मुक्त करा सकेगा। उसके निश्चय यहीं तिरोहित हो जायेंगे।

अचानक प्रतनु को अपनी देह पर कोई खुरदरा स्पर्श अनुभव हुआ। उसने घबरा कर नेत्र खोल दिये। भय से प्रतनु का रक्त शिराओं में ही जम गया। उसने देखा कि कोई मादा आकृति उसकी देह पर झुकी हुई है और अपनी थूथन आगे करके श्वानों की भांति कुछ सूंघने का प्रयास कर रही है। प्रतनु को लगा कि यह वही मादा पिशाच है जो दिन में उसका मांस खाने को आतुर थी और जिसे बड़ी कठिनाई से अलग ले जाया गया था। प्रतनु को लगा कि जीवन का अंतिम क्षण आ पहुँचा है।

प्रतनु ने भय से नेत्र बंद कर लिये और अपने माता-पिता को स्मरण करने लगा जिन्हें वह बचपन से ही अत्यंत प्रेम करता आया है। प्रतनु को अपने माता-पिता दो अलग-अलग ध्येयों को पूरा करते हुए जान पड़ते थे। माता उसकी देह का पोषण करती थी और दिवस-रात्रि इसी उपक्रम में लगी रहती थी।

जबकि पिता उसके मस्तिष्क का पोषण करते रहते थे और सदैव उसे नयी-नयी जानकारियाँ देते रहते थे। प्रतनु की तर्क शक्ति, विलक्षण शिल्प प्रतिभा और सृष्टि सम्बन्धी ज्ञान उसके पिता की ही देन थी। आज जीवन के अंतिम क्षणों में उन दोनों की ही दयालु प्रतिमाओं का स्मरण हो आया प्रतनु को।

प्रतनु की देह पर झुकी हुई मादा पिशाच मोएट थी। वह अपने साथियों की दृष्टि बचाकर इस तरफ चली आयी थी। मोएट जानती थी कि टिमोला और उसके साथियों ने आज का सारा आयोजन पिशाचों का ध्यान इस नर मांस की तरफ से हटाने के लिये किया है।

पिछली बार भी ऐसा ही हुआ था। वह तो ठीक था कि मोएट ने टिमोला और उसके साथियों की चाल को समझ लिया था इसलिये वह ताड़-रस पीकर बेसुध नहीं हुई थी और उसने टिमोला के साथ बैठकर नर मांस का आस्वादन किया था। आज भी वह नर मांस के पास इसी आशा में आ बैठी थी कि जब सारे पिशाच बेसुध हो जायेंगे तब टिमोला अपने साथियों के साथ इधर आयेगा। तब वह भी उनके साथ नर-मांस प्राप्त कर सकेगी। नर-मांस को इतने निकट और अकेला देखकर वह स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकी थी किंतु टिमोला के भय से उसका भक्षण न करके गंध से ही तृप्त होने का प्रयास कर रही थी।

जब काफी देर तक प्रतनु को अपनी देह पर दांतों का अनुभव नहीं हुआ तो उसने फिर से नेत्र खोले। मादा पिशाच अब भी उसके निकट बैठी हुई उसकी देह को सूंघ रही थी। प्रतनु को लगा कि जिस प्रकार सैंधव शिशु अपने भोजन की गंध प्राप्त कर आनंदित होते हैं, उसी प्रकार यह नर-भक्षी मादा उसे त्रयम्बक [8] के समान सूंघ-सूंघ कर तृप्ति का अनुभव कर रही है। संभवतः टिमोला के भय से वह प्रतनु की देह में दांत नहीं गड़ा रही है।

प्रतनु ने अपने नेत्र पूरी तरह खोल दिये। श्वान-मुखी मादा पिशाच की पूर्णतः निर्वस्त्र वीभत्स देह प्रतनु की देह पर पूरी तरह झुकी हुई थी। उसने अपनी दोनों हथेलियाँ प्रतनु के शरीर पर ही टिका रखी थीं जिससे उसके लटकते हुए वीभत्स स्तन प्रतनु के शरीर को स्पर्श कर रहे थे।

घृणा से झुरझुरी सी हो आई प्रतनु को। नर-मांस की गंध को पूरी तरह अपने फैंफड़ों में भर लेने के लिये मोएट की थूथन बार-बार विस्तृत और संकुचित हो रही थी। अपने फैंफड़ों को फुला-फुलाकर नरभक्षी मादा पूरी तरह तन्मय होकर प्रतनु की देह को सूंघ रही थी। उसकी समस्त चेतना उसकी घ्राण शक्ति में समा गयी प्रतीत होती थी।

जाने कितनी देर तक यह क्रम और चलता किंतु मोएट को कुछ पिशाचों ने प्रतनु के निकट बैठा हुआ देख लिया। वे अत्यंत अशुभ चीत्कार करते हुए मोएट की ओर दौड़े। मोएट को जाने क्या सूझा, उसने निकट पड़े तीक्ष्ण धार युक्त प्रस्तर से प्रतनु के हाथों का बंधन काट दिया और तेजी से चीत्कार करती हुई सघन वृक्षों के झुरमुट में विलीन हो गयी। मानो कहना चाह रही हो कि यदि मैं इसे नहीं खा सकूंगी तो तुम्हें भी नहीं खाने दूंगी। मोएट के चीत्कार का प्रत्युत्तर चीत्कार से ही देते हुए बीसियों पिशाच उसके पीछे दौड़े।

पिशाचों का चीत्कार सुनकर अग्नि के चारों ओर नाचते-झगड़ते पिशाच कुछ पलों के लिये स्थिर हो गये। उन्होंने समझा कि कोई वन्य पशु आ पहुँचा है। इसलिये वे सब तीक्ष्ण नोक युक्त काष्ठ दण्ड उठाये हुए उसी दिशा में दौड़े जिस दिशा में मादा नरभक्षी का पीछा करते हुए अन्य पिशाच दौड़े थे। अग्नि खड्ड के पास ताड़-रस पीकर बेसुध हुए पिशाच ही रह गये थे।

प्रतनु की देह का पोर-पोर पीड़ा से अवसन्न हो रहा था और उसमें इतनी शक्ति शेष नहीं रही थी कि वह इस अवसर का लाभ उठाये किंतु यदि वह इस समय चूक जाता है तो फिर शायद ही प्राण बचाने का अवसर मिले। व्यतीत होने वाले हर पल के साथ उसकी देह की शक्ति कम ही होनी थी।

यदि कुछ करना है तो अभी अन्यथा कभी नहीं। प्रतनु ने देखा कि पिशाचों की दृष्टि उस पर नहीं हैं। वे अपने ही गुल-गपाड़े में लगे हुए हैं। प्रतनु ने साहस किया और अपने पैरों के बंधन भी खोल डाले। लगातार बंधे रहने के कारण हाथों में शोथ [9] हो आई थी जिससे बंधन खोलने में काफी कठिनाई हुई उसे।

बंधनों से मुक्त होकर प्रतनु ने खड़े होने का उपक्रम किया किंतु पैरों में शोथ हो जाने के कारण खड़ा नहीं हो सका। वह फिर से धरती पर गिर पड़ा। कुछ पल वैसे ही पड़ा रहा। उसने फिर से खड़े होने का प्रयास किया किंतु परिणाम वही रहा। घण्टों तक बंधे रहने के कारण रक्त ने अवरुद्ध होकर पैरों की तरफ प्रवाह ही बंद कर दिया था। प्रतनु फिर से निराश होकर गिर गया। कुछ पलों तक वह घनघोर निराशा के पंक में डूबा हुआ निढाल होकर पड़ा रहा।

कैसी विचित्र स्थिति थी! मस्तिष्क था जो शरीर को बचाना चाहता था किंतु शरीर था कि स्वयं को बचाने के लिये किंचित् भी साथ नहीं दे रहा था। अकेला मस्तिष्क प्राण बचाने में असमर्थ था। प्राण-रक्षा के लिये आवश्यक था कि मस्तिष्क और शरीर दोनों का समन्वय हो किंतु इस स्थिति में मस्तिष्क को ही कोई उपाय करना था, उसी पर यह दायित्व आन पड़ा था कि वह शरीर के अवरोध को दूर करे। अचानक एक उपाय उसके मस्तिष्क में आया। वह खड़ा नहीं हो सकता, भाग नहीं सकता किंतु सर्प की तरह रेंग तो सकता है!

प्राण-रक्षा का यही एक मात्र उपाय बचा था। प्रतनु ने सर्प की तरह रेंगना आरंभ किया। यह उपाय भी सरल सिद्ध नहीं हुआ फिर भी किसी तरह वह कुहनियों के बल घिसटता हुआ रेंगने लगा। उसने पिशाचों के दौड़कर जाने की विपरीत दिशा पकड़ी। वह चाहता था कि पिशाचों के लौट आने से पहले किसी ऐसे स्थान तक पहुँच जाये जहाँ वह अपने आप को कुछ देर तक पिशाचों की दृष्टि से छिपा सके और बाद में पैरों में रक्त प्रवाह आरंभ हो जाने पर वहाँ से यथा शक्ति वेग से भाग जाये।

प्रतनु काफी देर तक घिसटता रहा। अचानक उसने अनुभव किया कि घिसटने के कारण हुए मांसपेशियों के संचालन से पैरों में रक्त संचार होने लगा है और पैरों की शक्ति लौट रही है। उसने फिर से खडे़ होने का प्रयास किया। इस बार वह खड़े होने में सफल हो गया। एक दो कदम डगमगाने के बाद वह चल पाने में भी सक्षम हो गया।

कुछ ही दूर चल पाया होगा प्रतनु कि उसे सामने से श्वानमुखी पिशाचों का समूह लौटता हुआ मिला। चार पिशाचों ने मोएट को कसकर पकड़ रखा था किंतु मोएट थी कि उनके वश में नहीं आ रही थी। इस कारण पिशाचों का सारा ध्यान मोएट की ही तरफ लगा हुआ था। प्रतनु ने पिशाचों से बचने के लिये वृक्षों की ओट ली।

चीत्कार करते हुए पिशाच उसके सामने से निकल गये। प्रतनु ने मन ही मन मादा पिशाच का धन्यवाद ज्ञापित किया जो उसके लिये वरदान सिद्ध हुई थी। पिशाचों की भूमि से दूर जाते हुए प्रतनु के मन से जैसे-जैसे प्राणों का भय दूर होता गया, भोजन और वस्त्रों की चिंता सताने लगी।

– अध्याय 30, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] मोहेन-जो-दड़ो और हड़प्पा से भी पुरानी सभ्यता दक्षिणी बिलोचिस्तान में अनेक स्थानों पर खोद निकाली गयी है जिसे कुल्ली सभ्यता कहते हैं। यहां पर आज तक ब्राहुई भाषा बोली जाती है, जो कि द्रविड़ भाषा परिवार से है। यूनानियों ने इसे गैड्रोसिया अर्थात काले मानवों का देश कहा है। संभव है कि इन लोगों ने ब्राहुई भाषा बाद में सीखी हो।

[2] भैंसा।

[3] सूअर।

[4] खरगोश।

[5] ऋग्वेद में यह गीत ऋचा के रूप में इस प्रकार से मिलता है- अगृ आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये नि होता सत्सि वर्हिषि ( 6. 16. 10)

[6] किसी भी वस्तु का मन में प्रकट होने वाला स्वरूप।

[7] गायन के समय प्रयुक्त होने वाले निरर्थक अक्षर जिनका उपयोग गायन का सौंदर्य बढ़ाने के लिये होता है।

[8] खरबूजे जैसा एक फल जिस पर तीन धारियाँ बनी हुई होती हैं।

[9] सूजन।

अश्वारोहियों से भेंट (31)

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अश्वारोहियों से भेंट

पिशाचों के बीच से पूर्णतः निर्वस्त्र अवस्था में प्राण बचाकर भागे प्रतनु की अश्वारोहियों से भेंट हुई तो प्रतनु को अपने प्राण फिर से संकट में प्रतीत होने लगे।

बाल-बाल बचा प्रतनु। आर्यों का एक अश्वारोही दल काफी तीव्र गति से घोड़े फैंकता हुआ उन्हीं सघन वृक्षों के नीचे आकर रुका जिनकी छाया में प्रतनु विश्राम कर रहा था। वह तो ठीक था कि प्रतनु ने कुछ दूर से ही उन्हें देख लिया था। संख्या में वे छः-सात थे।

तीव्र वेग से संचालित होने के कारण उनके अश्वों के क्षुर मृदा पर प्रचण्ड आघात करते हुए चले आ रहे थे। क्षुरों के आघात से प्रकम्पित हुई मृदा आकाश में विलम्बित होकर एक बड़ा सा गोला बना रही थी। यह गोला दूर से ही उनके चले आने की सूचना दे रहा था। सूर्य रश्मियों का स्पर्श पाकर रह-रह कर चमकते हुए उनके शिरस्त्राण और अस्त्र-शस्त्र धूलि के मोटे आवरण में से भी अपनी विकरालता का परिचय दे रहे थे।

प्रतनु के पास इतना समय नहीं था कि वहाँ से भाग खड़ा होता। ऐसा नहीं था कि पिशाचों द्वारा पकड़े जाने के बाद उसका आत्मविश्वास हिल गया था और अब वह अपरिचित व्यक्तियों का सामना करने में असमर्थ था किंतु इस निर्वसन अवस्था में ग्लानिवश वह किसी के समक्ष उपस्थित होने की स्थिति में नहीं था।

बुद्धि आपात् काल में ऐसे-ऐसे उपाय सुझा देती है जिनके बारे में प्रतनु जैसा व्यक्ति कभी सोच भी नहीं सकता। वह एक नातिदीर्घ [1] वृक्ष पर चढ़ गया। निर्वस्त्र प्रतनु स्वयं को पूरी तरह असहाय पा रहा था। उसे पिशाचों के चंगुल से निकले हुए तीन दिन हो चले थे। उदर पूर्ति हेतु वृक्षों की उदारता फलों के रूप में तथा नदियों की उदारता जल के रूप में उपलब्ध थी किंतु वस्त्र का प्रबंध अब तक नहीं हो पाया था। प्रतनु की इच्छा हुई कि वह इन आर्य अश्वारोहियों के समक्ष उपस्थित होकर उनसे वस्त्र की याचना करे।

याचना! इस विचार से ही सन्न रह गया प्रतनु। याचना का विचार उसके मस्तिष्क में आया कैसे! ठीक है कि प्रतनु बिना पण्य के कर्पास के वस्त्रों का प्रबंध नहीं कर सकता किंतु यदि उसके पास पण्य होते तो भी तो वह किस पणि के पास वस्त्र क्रय करने जाता! वस्त्रों का प्रबंध तो उसे बिना पण्य और बिना याचना के ही करना था। ऐसा ही उसने निश्चय किया था।

प्रतनु ने सोचा था कि किसी पशु को मारकर चर्म प्राप्त कर लेगा। यद्यपि अपने जीवन में उसने किसी पशु का वध नहीं किया था, न ही वह जानता था कि किसी पशु का वध कर पाना और उससे चर्म प्राप्त कर पाना उसके जैसे व्यक्ति के लिये उतना सहज नहीं है जितना वह समझ रहा है तथापि ऐसा विचारने के अतिरिक्त उसके पास उपाय ही क्या था!

लाख चेष्टा करके भी प्रतनु न तो किसी पशु को पकड़ पाया था और न किसी पशु का वध कर पाया था। जब भी वह किसी पशु को देखता तो उसके वध के लिये प्रस्तर उठाता किंतु प्रस्तर का प्रहार करने से पहले ही उसके हाथ कांपने लगते और वह पशु को अपनी पकड़ से दूर जाने तक देखता ही रह जाता। पशु इतने उदार नहीं थे कि अपना चर्म उतार कर स्वयं प्रतनु को दे देते।

पत्तों की ओट से प्रतनु ने देखा कि आर्य अश्वारोहियों ने वल्गायें त्यागकर अश्वों को वृक्षों से बांध दिया। कृष्णायस से बने शिरस्त्राण और भाले वृक्षों के समीप रखकर समस्त आर्य सरिता के जल में उतर पड़े। सरिता को स्पर्श करने से पूर्व उन्होंने वरुण को नमन किया और सरिता का जल अपने नेत्रों और हृदय से लगाया। भली भांति निमज्जित होने के पश्चात् वे सूर्य को अघ्र्य देकर फिर से उन्हीं वृक्षों के नीचे आ बैठे और अश्वों की पीठ पर लदा भुना हुआ यव और मधु निकाल कर भोजन का उपक्रम करने लगे।

भुने हुए यव की गंध और मधु की उपस्थिति देखकर प्रतनु के मुंह में पानी भर आया। प्रतनु को लगा जाने कितने युग व्यतीत हो चले थे भुने हुए यव और मधु ग्रहण किये हुए। प्रतनु ने देखा कि भोजन सामग्री अपने समक्ष रखकर समस्त आर्य अश्वारोही पूर्व दिशा में मुख करके बैठ गये हैं और दोनों हाथ जोड़कर एवं नेत्र बंद करके प्रार्थना कर रहे हैं।

यद्यपि वह आर्यों को मन ही मन अपना शत्रु मानता आया है किंतु आर्यों के मंत्र अच्छे लगे उसे। सधे हुए शब्द, सधी हुई वाणी और सधे हुए भाव। भले ही सैंधवों ने कितनी ही अच्छी प्रार्थनायें बना ली हों किंतु आर्यों के मंत्रों का सा माधुर्य उनमें नहीं।

   – ‘ऊँ शन्नो देवीर भिष्टयेट्टापो भवन्तु पीतये। शंयोरभिस्रवन्तु नः।’ [2] आर्य सुरथ ने जल हाथ में लेकर उसे धरित्री पर छोड़ दिया।

प्रतनु की उपस्थिति से अनभिज्ञ आर्य भोजन ग्रहण करने लगे। उन्हें ज्ञात नहीं था कि कई दिनों से भूखा और निर्वस्त्र प्रतनु टकटकी बांध कर उन्हें देख रहा है अन्यथा पूर्णानन्द के अभिलाषी आर्य पथिक, क्षुधित और पीड़ित प्रतनु को आनंदित किये बिना स्वयं भोजन ग्रहण नहीं करते।

 प्रतनु ने देखा कि आर्य अश्वारोहियों के मुख मण्डल पर सामान्यतः दिखाई देने वाले दर्प के स्थान पर चिंता व्याप्त है।

  – ‘आर्य! मार्ग की विश्रांति के कारण भोजन में तृप्ति देने की क्षमता कई गुणा बढ़ क्यों जाती है ?’ आर्य सुनील ने राजन् सुरथ को सम्बोधित किया।

  – ‘क्योंकि तृप्ति देने की क्षमता भोजन में नहीं अतृप्ति के भाव में होती है।’ राजन् सुरथ ने उत्तर दिया।

  – ‘इसका अर्थ यह हुआ कि यात्रा से अतृप्ति का भाव उत्पन्न होता है! ‘

  – ‘यात्रा से नहीं, यात्रा से उत्पन्न हुई विश्रांति से अतृप्ति का भाव उत्पन्न होता है।

  – ‘इसका अर्थ तो यह भी हुआ कि अभाव में ही भाव का सर्जन होता है।’

  – ‘निःसंदेह! अभाव का अनुभव नहीं हो तो भाव का निर्माण कैसे होगा! किंतु भोजन के समय गरिष्ठ वार्तालाप अनुचित है आर्य।’ राजन् सुरथ ने आर्य सुनील को टोका।

राजन् सुरथ की वर्जना पाकर समस्त आर्य अश्वारोही मौन धारण करके यव और मधु ग्रहण करने लगे। भोजन समाप्ति पर उद्विग्न आर्य सुनील ने पुनः राजन् सुरथ से प्रश्न किया। आर्य सुनील के लिये अधिक समय तक मौन रह पाना संभव नहीं होता- ‘राजन्! जिस प्रकार असुरों ने सोम का हरण कर लिया है, क्या एक दिन वे यव, शालि और मधु का भी हरण कर लेंगे ?’

  – ‘असुरों को रोका नहीं गया तो वे किसी भी सीमा तक जाकर कोई भी अपकृत्य कर सकते हैं आर्य।’ राजन् सुरथ ने उत्तर दिया।

  – ‘असुरों को रोकने के समस्त प्रयास निष्फल सिद्ध हुए हैं। ऐसा क्यों है ?’

  – ‘क्योंकि हमने केवल आसुरी शक्तियों को दमित करना चाहा है, आसुरि प्रवृत्तियों को नहीं।’

  – ‘आसुरि शक्तियों का दमन हम अपने अस्त्र-शस्त्रों से कर सकते हैं किंतु आसुरि प्रवृत्तियों का दमन आर्यों द्वारा किया जाना कैसे संभव है ? चित्त-वृत्ति और स्वभाव तो दैवकृत होते हैं।’ आर्य सुनील के लिये आर्य सुरथ के उत्तर उलझा देने वाले ही होते हैं।

  – ‘आसुरि प्रवृत्तियों के दमन के लिये आवश्यक है असुरों में श्रेष्ठ भावों और श्रेष्ठ प्रवृत्तियों का संचरण करना। हमें आर्यों की सनातन शुचि और विद्या का प्रसार असुरों में भी करना होगा। इसके लिये उनमें ऋषि परम्परा आरंभ करनी होगी।’

  – ‘असुरों में ऋषि परम्परा आरंभ करने के प्रयास महर्षि उषनस् [3] तथा ऋचीक और्व [4] ने भी तो किये थे किंतु श्रेष्ठ ऋषि होने पर भी वे असुरों को कोई श्रेष्ठ परम्परा नहीं दे सके। उसके बाद आर्यों को अपने प्रयास बन्द कर देने पड़े।’ आर्य सुनील ने कहा।

  – ‘कोई भी अकेला प्रयास इस दिशा में पर्याप्त नहीं होगा। आसुरि शक्तियों को शमित करने और आसुरि प्रवृत्तियों को दमित करने के प्रयास साथ-साथ चलाने होंगे। यह एक सतत और दीर्घ काल तक चलने वाली प्रक्रिया है। इसके लिये ही तो हमने आर्यों को संगठित करने का अभियान आरंभ किया है।’ आर्य सुरथ ने प्रत्युत्तर दिया।

  – ‘आर्यों को संगठित करने की आपकी योजना तो मुझे अच्छी लगती है किंतु उसके सफल होने में संदेह दिखायी देता है।’ आर्य सुनील ने आशंका व्यक्त की।

  – ‘ऐसा क्यों आर्य ?’ आर्य सुरथ को किंचित आश्चर्य हुआ। ऐसा आज तक नहीं हुआ था कि आर्य सुनील ने स्पष्ट रूप से उनकी योजना के विफल हो जाने की आशंका व्यक्त की हो।

  – ‘हम लोग जिस किसी भी आर्य-जन में आपकी योजना को लेकर गये हैं, वहाँ किसी भी जन से हमें विशेष समर्थन प्राप्त नहीं हुआ। समस्त आर्य-जन संगठन के विचार का तो स्वागत करते हैं किंतु वे अपनी-अपनी स्वतंत्रता को लेकर चिंतित हैं।’

  – ‘प्रत्येक नये कार्य के आरंभ में कुछ न कुछ कठिनाइयाँ आती ही हैं। यदि हम इन प्रारंभिक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लें तो आगे के मार्ग स्वयं ही खुल जायेंगे।’ राजन् सुरथ ने आर्य वीरों को सांत्वना देते हुए कहा।

  – ‘यदि आर्य जनों ने यही हठ पकड़े रखा तो हमारे समक्ष और कौन सा उपाय रह जायेगा ?’ आर्य अतिरथ ने पूछा।’

  – ‘यदि उन्होंने अपना हठ पकड़े रखा तो उन्हें बलपूर्वक संगठित करना होगा ………।’ राजन् सुरथ ने दृढ़ता पूर्वक उत्तर दिया किंतु वे अपनी बात पूरी करते, उससे पहले ही आर्य अतिरथ बोल पड़े- ‘ यदि अंत में बल का ही उपयोग करना है तो अभी क्यों नहीं! समय व्यर्थ करने का क्या लाभ ?’

आर्य अतिरथ योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन में समय व्यर्थ करने में कम विश्वास करते हैं, तत्काल कार्यवाही करने में उनका अधिक विश्वास है। उनका मानना है कि आर्यों ने असुरों की समस्या को व्यर्थ ही इतना बढ़ा-चढ़ा हुआ मान रखा है। यदि असुरों के विरुद्ध तत्काल सैन्य अभियान छेड़ दिया जाये तो असुरों को सहज में ही नष्ट किया जा सकता है।

आर्य सुरथ ने आर्य अतिरथ की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। उनका ध्यान कहीं और चला गया था। इस समय वे धरती पर रखे जल पात्र में बनती परछाईयों को सचेत होकर देख रहे थे। शीघ्र ही उन्हें विश्वास हो गया कि नाति-दीर्घ वृक्ष पर पत्तों के बीच कोई वानर बैठा है और टकटकी बांध कर उन्हें देखे जा रहा है।

आर्य सुरथ ने दृष्टि ऊपर उठाई। थोड़े से प्रयास के बाद उन्होंने पेड़ पर चढ़े हुए प्रतनु को देख लिया। वानर के स्थान पर निर्वसन मानव को घने पत्तों के बीच छिपा हुआ देखकर आश्चर्य हुआ उन्हें। कौन हो सकता है यह! कहीं कोई असुर या पिशाच तो नहीं! उन्होंने भाला हाथ में लेकर, प्रतनु को नीचे आने के लिये ललकारा।

प्रतनु को लगा कि यदि वह तत्काल वृक्ष से नीचे नहीं उतरा तो निश्चित रूप से आर्य-दल का मुखिया भाले का प्रहार करेगा। वह चुपचाप नीचे उतरने लगा। वृक्ष से नीचे उतरते हुए निर्वसन प्रतनु की ग्लानि का कोई पार नहीं था। जिन प्राणियों ने उसे निर्वसन किया था वह तो स्वयं भी निर्वसन थे, उनमें देह-गोपन का कोई भाव नहीं था।

वे असभ्य और बर्बर थे तथा उनसे प्रतनु की कोई शत्रुता भी नहीं थी किंतु इस समय जिन व्यक्तियों के समक्ष उसे निर्वसन उपस्थित होना पड़ रहा है वे स्वयं निर्वसन नहीं हैं। इनमें देह के गोपन का भाव पूरी तरह परिष्कृत है। इतना ही नहीं, इन्हें तो वह अपना शत्रु मानता आया है। शत्रु के समक्ष इस हेय अवस्था में! प्रतनु के शोक का पार न था। 

वृक्ष से उतरते ही प्रतनु को आर्यों ने अपने तीक्ष्ण शस्त्रों की परिधि में ले लिया।

  – ‘कौन है तू ?’ आर्य सुरथ ने प्रश्न किया।

  – ‘एक पथिक! ‘

  – ‘असुर है ?’

  – ‘सैंधव हूँ।’

  – ‘निर्वस्त्र और भयभीत क्यों है ?’

  – ‘निर्वस्त्र अवश्य हूँ, भयभीत नहीं।’

  – ‘तो यही बता निर्वस्त्र क्यों है ?’

  – ‘परिस्थिति वश।’

  – ‘कैसी परिस्थिति ?’

  – ‘पथ भ्रमित हो पिशाचों की भूमि में पहुँच गया था, उन्हीं पिशाचों ने वस्त्र नष्ट कर दिये। किसी तरह प्राण सुरक्षित लेकर आया हूँ।’

  – ‘वृक्ष पर क्यों चढ़ा हुआ था।’ पथिक को सभ्य समाज से सम्बन्धित जानकर राजन् सुरथ ने उसे वस्त्र प्रदान किया।

  – ‘अपनी हीन अवस्था को शत्रु से छिपाने के लिये।’ प्रतनु ने राजन् सुरथ द्वारा दिया गया वस्त्र सावधानी से देह पर लपेटते हुए कहा। कर्पास निर्मित साधारणवस्त्र को पाकर उसे ऐसा अनुभव हो रहा था मानो बहुत बड़ी सम्पदा हाथ लग गयी हो।

  – ‘शत्रु!’ आर्य सुनील ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘क्या तुम्हारा कोई शत्रु यहाँ भी उपस्थित है ?’ आर्य सुरथ ने सतर्क होते हुए पूछा।

  – ‘हाँ।’

  – ‘कौन है तुम्हारा शत्रु ?

  – ‘आर्य सैंधवों के शत्रु नही हैं क्या ?’

  – ‘आर्यों और सैंधवों के मध्य कोई शत्रुता नही है। आर्य तो किसी के शत्रु नहीं हैं।’

  – ‘क्यों ? क्या आर्य असुरों के शत्रु नहीं हैं ?’

  – ‘तुम्हारी ही बात मान ली जाये तो भी तुम्हें इससे क्या ? तुम तो असुर नहीं हो! ‘

  – ‘आर्य असुरों के शत्रु हैं और सैंधव असुरों के मित्र हैं। इसी से आर्य सैंधवों के शत्रु हैं।’

  – ‘मित्र का शत्रु स्वयं का शत्रु समझा जाये यह व्यक्तिगत व्यवहार में तो उचित है किंतु जब प्रश्न दो प्रजाओं का हो तो यह किंचित् मात्र भी आवश्यक नहीं कि मित्र का शत्रु, अपना भी शत्रु हो।’

  – ‘क्या आर्यों ने सरस्वती के तट पर स्थित सैंधवों के प्राचीन पुर नष्ट नहीं किये ?’

  – ‘तुम मगन [5] की बात कर रहे हो! ‘

  – ‘हाँ। मैं कालीबंगा की ही बात कर रहा हूँ।’

  – ‘कालीबंगा क्या ?’

  – ‘जिसे तुम मगन कहते हो, वह हमारा कालीबंगा था।’

  – ‘क्या तुम मगन के निवासी हो ?’

  – ‘नहीं। मेरे माता-पिता वहाँ के निवासी थे। मेरा जन्म तो शर्करा के तट पर हुआ।’

शर्करा! विचार में पड़ गये आर्य सुरथ। उन्होंने सुना था कि सरस्वती की एक क्षीण शाखा द्रुमकुल्य में विलीन होने से पूर्व शर्करा के नाम से विख्यात है। उसके तट पर ईक्षु के विशाल क्षेत्र हैं। असुरगण उसी शर्करा को हाकरा कहते हैं।

  – ‘देखो युवक! हो सकता है तुम्हारा कथन सही हो किंतु आर्यों और द्रविड़ों के मध्य यदि अतीत में कोई विवाद अथवा यु़द्ध हुआ है तो उसका अर्थ यह कदापि नहीं हो जाता कि प्रत्येक आर्य और प्रत्येक सैंधव भी व्यक्तिशः एक दूसरे के अनिवार्य शत्रु हो गये हैं। हमारी और तुम्हारी कोई शत्रुता नहीं। तुम चाहो तो हम मित्र हो सकते हैं।’

  – ‘यदि मैं अपने पुर और अपनी प्रजा के शत्रुओं से मित्रता स्थापित करूंगा तो मैं पुर और प्रजा से विश्वासघात करूंगा।’

  – ‘विश्वासघात तो उस अवस्था में होता है जब तुम शत्रु से मिलकर अपने पुर और प्रजा को हानि पहुँचाओ। हमसे तुम्हें अथवा तुम्हारे पुर और प्रजा को कोई हानि नहीं होगी। 

प्रतनु को लगा कि आर्यों का मुखिया सही कह रहा है। इस समय आर्यों द्वारा शत्रुता का कोई कृत्य नहीं किया जा रहा है। इस समय वे शत्रु नहीं है अपितु मित्रता के अभिलाषी हैं।

आर्य सुरथ ने अनुभव किया कि यह जो कोई भी हो किंतु आर्यों को हानि पहुँचाने की स्थिति में नहीं है अपितु विपन्न अवस्था में होने के कारण सहायता प्राप्त करने का अधिकारी है। उन्होंने प्रतनु को एक और वस्त्र तथा भोजन प्रदान किया। प्रतनु को भी उनसे वस्त्र और भोजन प्राप्त करना अनुचित नहीं लगा। यदि अनुचित लगा होता तो भी आपात्काल में प्रतनु के समक्ष इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं था।

आर्यों ने प्रतनु की यात्रा का विवरण आदि से अंत तक पूरा सुना। उन्हें यह सैंधव युवक साहसी और बुद्धिमान के साथ-साथ प्रशंसनीय भी जान पड़ा। साहस और बुद्धि के बल पर ही उसने शर्करा के तट से मेलुह्ह [6] तथा नागलोक तक की यात्रा की थी। साहस के बल पर ही उसने गरुड़ों के विरुद्ध नागों की सहायता की थी। इसी अदम्य साहस के बल पर ही वह अपने प्राणों को सुरक्षित लेकर पिशाचों के चंगुल से भाग निकलने में सफल हुआ था।

इस विपन्न अवस्था में भी उसका विवेक पूर्णतः जाग्रत था और वह सैंधवों के पुजारी किलात से प्रतिकार लेने के लिये मेलुह्ह जा रहा था। आर्य प्रजा की ही भांति सैंधवों में भी आत्माभिमान की इतनी उच्च परम्परा है यह जानकर आर्यों को संतोष  हुआ था किंतु साथ ही उन्हें यह जानकर कष्ट भी हुआ कि देव पूजन के नाम पर सैंधवों में इतनी विकृति उपस्थित है।

बहुत समय तक आर्य दल सैंधव प्रतनु से वार्तालाप करता रहा। विचित्र नागलोक का विवरण जानकर आर्यों को सुखद आश्चर्य हुआ। उन्हें यह ज्ञात था कि पश्चिमोत्तर की पर्वत शृंखलाओं में आर्यों से ही निकली दो शाखाओं-नागों और गरुड़ों की बस्तियाँ हैं जिनमें दीर्घ काल से संघर्ष होता आया हैं।

ठीक वैसा ही जैसा आर्यों और असुरों में। नाग अपने विज्ञान के बल पर और गरुड़ अपनी शक्ति के बल पर समरांगण में एक दूसरे के समतुल्य हो जाते हैं। इसी कारण उनमें चिरकाल से कोई परिणामकारी युद्ध नहीं हो पाता। राजन् सुरथ को एक बार पुनः पुष्टि हो गयी कि अब भी वे दोनों प्रजायें संघर्ष रत हैं।

आर्य सुरथ ने प्रस्ताव किया कि यदि प्रतनु चाहे तो आर्यों का एक अश्व उसे दिया जा सकता है किंतु प्रतनु ने आर्यों से और सहायता प्राप्त करने से विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर दिया।

जब प्रतनु अश्वारोहियों से भेंट पूरी करके अपने गंतव्य के लिये पुनः आरंभ हुआ तो उसके मन में राजन् सुरथ के प्रति विनम्रता एवं सम्मान का भाव जाग्रत हो चुका था। विपन्न अवस्था में पड़े अपरिचत सैंधव पथिक के लिये इतना उदार भाव रखने वाले आर्य निश्चित रूप से शत्रुता करने के योग्य नहीं है।

– अध्याय 31, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] कम ऊँचा।

[2] सबको प्रकाशित और सबको आनंदित करने वाले सर्वव्यापी ईश्वर ! मनोवांछित आनन्द और पूर्णानन्द देने के लिये आप हमारे लिये कल्याणकारी हों। हे परमेश्वर! आप हम पर सुख की सदा वृष्टि करें।

[3] शुक्राचार्य ।

[4] शुक्राचार्य की वंश परंपरा में और्व ऋषि हुए। और्व के बहुत बाद में इसी वंश में च्यवन ऋषि हुए। इसी वंश में आगे चलकर जमदग्नि तथा परशुराम आदि श्रेष्ठ ऋषि हुए। मिश्र के पिरामिड से प्राप्त एक मुद्रा पर ऋषि च्यवन की जानकरी मिली है। अनुमानतः 1000 ईस्वी पूर्व के काल का कांसे का बना एक तरकश ईरान में मिला है जिसपर वरुण, मित्र, इंद्र, पर्जन्य आदि वैदिक देवताओं से सम्बन्धित गाथा को व्यक्त किया गया है। वैदिक ऋषि च्यवन का जीवनवृत्तांत भी इस तूणीर पर उत्कीर्ण है।

[5] मेसोपोटामिया के विभिन्न स्थलों से प्राप्त कीलाक्षर लिपि युक्त मृत्पट्टिकाओं में मगन से ताम्बा मंगवाये जाने का उल्लेख है। सैंधव सभ्यता का कालीबंगा नगर राजस्थान के खेतड़ी ताम्र क्षेत्र के अत्यंत निकट था अतः पर्याप्त संभव है कि उस काल में कालीबंगा के धातुकर्मी खेतड़ी से ताम्बा प्राप्त कर उसकी विविध सामग्री तैयार करके अन्य सभ्यताओं को निर्यात करते हों। इसी कारण मगन का साम्य कालीबंगा से किया गया है।

[6] मोहेन-जो-दड़ो।

पुनः मोहेन-जो-दड़ो में (32)

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पुनः मोहेन-जो-दड़ो - www.bharatkaitihas.com
संसार की सबसे प्राचीन धातु निर्मित अश्वारोही प्रतिमा

मोहेन-जो-दड़ो से प्रतनु के निष्कासन की अवधि समाप्त होने में अभी कुछ दिन शेष थे। नियमानुसार वह दो वर्ष से पूर्व पुनः मोहेन-जो-दड़ो में प्रवेश नहीं कर सकता था किंतु उसमें इतना धैर्य नहीं रह गया था कि वह नगर से बाहर रुककर अवधि पूर्ण होने की प्रतीक्षा करे।

जिस समय प्रतनु मोहेन-जो-दड़ो के नगरद्वार पर पहुँचा, वरुण सिंधु तट पर नहीं पहुँचा था किंतु एक-दो दिन में ही उसके सिंधु तट पर पहुँचने की संभावाना थी। वरुण के आगमन पर ही मोहेन-जो-दड़ो के पशुपति महालय में वार्षिक महोत्सव मनाया जाता है जिसमें मातृदेवी को गर्भवती करने के लिये चन्द्रवृषभ नृत्य का आयोजन होता है।

इस समय मोहेन-जो-दड़ो में उसी वार्षिकोत्सव की तैयारियाँ चल रही थीं। दो वर्ष पूर्व के अनेक दृश्य प्रतनु के स्मृति पटल पर सजीव हो उठे। दो वर्ष पूर्व की भांति इस वर्ष भी अनेक सैंधव पुरों से सैंधवों के गुल्म पशुपति महालय के वार्षिक समारोह में भाग लेने के लिये मोहेन-जो-दड़ो पहुँच चुके थे।

मोहेन-जो-दड़ो से प्रतनु के निष्कासन की अवधि समाप्त होने में अभी कुछ दिन शेष थे। नियमानुसार वह दो वर्ष से पूर्व मोहेन-जो-दड़ो में प्रवेश नहीं कर सकता था किंतु उसमें इतना धैर्य नहीं रह गया था कि वह नगर से बाहर रुककर अवधि पूर्ण होने की प्रतीक्षा करे। वह जानना चाहता है कि रोमा कैसी है! इस बीच कुछ अप्रत्याशित तो नहीं घटित हो गया है! अतः उसने पणि का छद्म वेश धारण किया और छद्म नाम से ही नगर में प्रवेश किया।

रोमा तक पहुँचने के लिये प्रतनु को विशेष प्रयास नहीं करना पड़ा। वृद्धा दासी वश्ती उसे पण्य-वीथि [1] में विचरण करती हुई मिल गई। जब उसने वृद्धा वश्ती का अभिवादन किया तो वश्ती पणिवेशधारी प्रतनु को पहचान नहीं सकी। एकांत पाकर प्रतनु ने उसे अपना परिचय दिया।

दो वर्ष पुरानी घटनायें वृद्धा वश्ती के मानस पटल पर सजीव हो उठीं। वश्ती ने मोहेन-जो-दड़ो में व्यतीत हुए दो वर्षों के समस्त समाचार प्रतनु को कह सुनाये। प्रतनु को यह जानकर संतोष हुआ कि रोमा न केवल सुरक्षित है अपितु प्रतनु की ही प्रतीक्षा कर रही है।

वश्ती ने बताया कि किलात और रोमा के बीच का द्वन्द्व अब काफी उग्र रूप ले चुका है। किलात ने रोमा को चेतावनी दी है कि यदि वह किलात के समक्ष समर्पण नहीं करती है तो उसे धर्मद्रोही होने का दण्ड भुगतने के लिये तैयार रहना चाहिये। रोमा ने किलात को वचन दिया है कि वह पशुपति के वार्षिक समारोह के दिन चन्द्रवृषभ आयोजन के पश्चात् किलात के समक्ष समर्पण करेगी।

किलात यह जानकर धैर्य धारण किये हुए है कि पशुपति के वार्षिक समारोह में अब कुछ दिन ही रहे हैं किंतु जैसे-जैसे दिवस व्यतीत होते जाते हैं, रोमा की उद्विग्नता बढ़ती जाती है। उसे विश्वास है कि प्रतनु पशुपति के वार्षिक समारोह तक लौट आयेगा और किलात से रोमा की मुक्ति का कोई न कोई उपाय ढूंढ निकालेगा।

वश्ती की बात सुनकर प्रतनु की शिराओं में रक्त की गति बढ़ गई। उसे लगा कि शिराओं का रक्त न केवल शिराओं से हृदयस्थल तक तीव्र गति से भाग रहा है अपितु उतनी ही तीव्रता से हृदय स्थल से शिराओं तक भी लौट रहा है। अब तक तो सब कुछ अस्पष्ट और धुंधला सा था। लक्ष्य के स्पष्ट नहीं होने से उत्साह भी मृतप्रायः था। अब लक्ष्य स्पष्ट है किंतु लक्ष्य वेधन का उपकरण! वह कहाँ है ?

 प्रतनु जानता है कि लक्ष्य पूर्ति हेतु आशा और उत्साह ही सर्वाधिक वांछित उपकरण हैं। इन्हीं के बल पर वह अब तक के समस्त संघर्ष का परिणाम अपने पक्ष में करता आया है किंतु यह कैसी विकट परिस्थिति है! लक्ष्य समक्ष है, लक्ष्य वेधन हेतु आशा एवं उत्साह रूपी उपकरण भी उपलब्ध है किंतु समय की अत्यल्पता संघर्ष के उपकरण को भोथरा बना रही है।

प्रतनु के आग्रह पर वृद्धा वश्ती पर्याप्त रात्रि व्यतीत हो जाने पर नृत्यांगना रोमा को लेकर उसी भवन में पहुँची जिसमें वह रोमा को दो वर्ष पहले लेकर आई थी। कक्ष में पहुँच कर जब रोमा ने श्वेत कर्पास से निर्मित अंशुक से स्वयं को प्रकट किया तो धक् से रह गया प्रतनु। क्या दो वर्ष सचमुच ही व्यतीत हो गये!

दो वर्ष! कम नहीं होता दो वर्ष का अंतराल। विशेषकर तब जबकि परिचय का अवसर केवल दो घड़ी ही रहा हो। प्रतनु को यह अंतराल दो वर्षों की अवधि से युक्त न लगकर कई युगों की अवधि से आपूरित लगा। क्या-क्या नहीं देखा उसने इन दो वर्षों में! मोहेन-जो-दड़ो से नागों के मायावी विवर तक की यात्रा।

रानी मृगमंदा के अटपटे प्रश्न। रानी मृगमंदा, निर्ऋति तथा हिन्तालिका की मिश्रित प्रतिमा का रहस्य-भंग। रानी मृगमंदा, निर्ऋति तथा हिन्तालिका का सानिध्य। नाग कुमारियों द्वारा तूर्ण का आयोजन और उसमें रानी मृगमंदा द्वारा आघाटि वादन के समय चिच्चिक और वृषारव के परस्पर संवाद के माध्यम से प्रणय निवेदन।

नाग-गरुड़ युद्ध के पश्चात् रानी मृगमंदा द्वारा गुल्मपतियों के समक्ष प्रतनु से विवाह का प्रस्ताव और प्रतनु द्वारा अस्वीकार। रानी मृगमंदा का समर्पण। नागों के विवर से पिशाचों की भूमि और वहाँ मुखिया टिमोला से लेकर मादा पिशाच मोएट। पशुचर्म की आशा में पशुओं पर प्रहार करने के लिये प्रतनु के हाथों में थमे प्रस्तर खण्ड। आर्य अश्वारोहियों से भेंट। समस्त दृश्य प्रतनु के मस्तिष्क में चित्र के सदृश उभर आये।

इन समस्त उपक्रमों में पूरी तरह निरत रहते हुए भी प्रतनु के समक्ष एक ही लक्ष्य रहा है- निर्वासन अवधि के उस पार खड़ी रोमा। रोमा ही उसका एक मात्र लक्ष्य रही है। रोमा के लिये ही वह शर्करा से चलकर पहली बार मोहेन-जो-दड़ो आया था और आज वह पुनः उसी की आशा में दुबारा आया है।

कहाँ-कहाँ भटकता नहीं फिरा है वह रोमा के लिये! जब कभी वह रानी मृगमंदा, निर्ऋति अथवा हिन्तालिका के निकट होता था, उसे रोमा का स्मरण हो आता था। यहाँ तक कि जब मादा पिशाच मोएट ने उसे बंधनमुक्त किया था उस समय भी उसे रोमा का ही स्मरण हो आया था।

आज जबकि पशुपति महालय की प्रधान नृत्यांगना, सैंधव सभ्यता की अनिंद्य-अप्रतिम सुंदरी, सर्व-भावेन सामथ्र्यवान महादेवी रोमा उसके सामने है, उसे रानी मृगमंदा के साथ व्यतीत हुए क्षणों का स्मरण हो रहा है। क्यों होता है ऐसा ? प्रतनु कुछ समझ नहीं पाता।

उसे रोमा द्वारा दो वर्ष पूर्व की भेंट में कहे गये शब्दों का स्मरण हो आया- ‘जहाँ रोग जन्म लेता है वहीं उसकी औषधि भी होती है। प्रकृति का यही नियम है।’ यहीं, इसी रोमा को देखकर तो उसके हृदय में अनुराग का रोग उत्पन्न हुआ था। निश्चय ही रोमा ही उस रोग की औषधि है।

विगत भेंट का एक-एक दृश्य स्मरण हो आया प्रतनु को। रोमा की इसी बात पर तो प्रतनु ने अपने हृदय में नृत्यांगना के प्रति नवीन भाव के संचरण का अनुभव किया था कि जहाँ रोग जन्म लेता है वहीं उसकी औषधि भी होती है। प्रतनु ने यह भी अनुभव किया था कि उस दिन रोमा के लिये उसके मन में उत्पन्न हुआ आकर्षण नितान्त काल्पनिक आकर्षण नहीं था, जो उसके हृदय में मोहेन-जो-दड़ो आने से पहले केवल रोमा के नृत्य और सौंदर्य की ख्याति को सुनकर उपजा था।

वह रूप जनित आकर्षण भी नहीं था जो पशुपति उत्सव में रोमा को देखकर उपजा था। वह तो कोई और ही नवीन भाव था। प्रतनु ने अनुभव किया था कि वह संभवतः आत्मीयता का भाव था जो प्रत्युपकार की भावना से उपजा था।

नहीं-नहीं! गलत सोचा था प्रतनु ने। वह आत्मीयता का भाव तो था किंतु नितान्त प्रत्युपकार की भावना से उत्पन्न नहीं हुआ था। प्रत्युपकार कैसा! प्रत्युपकार तो सकारण है और आत्मीयता अकारण। ठीक ही तो कहा था तब नृत्यांगना रोमा ने- ‘आत्मीयता का कोई कारण नहीं होता। आत्मीयता तो स्वयं ही कारण है और स्वयं ही परिणाम।’ प्रतनु को लगा कि इन दो वर्षों के अंतराल में रोमा द्वारा कहा गया एक-एक शब्द स्वयं-सिद्ध हो गया है।

उस दिन अश्रुपूरित आँखों से रोमा ने यह भी कहा था कि आत्मीयता का अनुभव आज नहीं कर रहे हो किंतु कल करने लगोगे। कितना सही कहा था रोमा ने! उस दिन प्रतनु ने रोमा के प्रति जो कुछ भी अनुभव किया था, उसका कारण भले ही शरण में आई रमणी के प्रति सदाशयता रहा हो अथवा रोमा द्वारा प्रतनु के शिल्प लाघव की प्रशंसा करने के लिये रोमा के प्रति उत्पन्न आभार किंतु उस दिन की आत्मीयता और आज की आत्मीयता में अन्तर है।

वह क्या था जो प्रतनु को मायावी नागलोक के सम्पूर्ण वैभव, रानी मृगमंदा और उसकी सखियों के समर्पित प्रेम से दूर भगा कर यहाँ पुनः मोहेन-जो-दड़ो में खींच लाया था! वह कौनसा आकर्षण था जिसने प्रतनु को पिशाचों के बीच भी प्रत्यक्ष मृत्यु-मुख से निकल भागने के लिये प्रेरित किया था!

क्या यह केवल आत्मीयता का ही भाव था! अथवा कुछ और! आत्मीयता तो उसे रानी मृगमंदा और उसकी सखियों से भी थी। वह भी संभवतः आत्मीयता का ही भाव था जो उसने आर्य अश्वारोहियों के मुखिया के प्रति अनुभव किया था। आत्मीयता जैसा ही कोई भाव उसके मन में अपने उस उष्ट्र के प्रति भी था जो दीर्घ यात्रओं में उसका एकमात्र सहचर रहा था।

यहाँ तक कि आत्मीयता तो उसने क्षण भर के लिये घृणित देह वाली मादा पिशाच मोएट से भी अनुभव की थी जिसने उसे अनायास प्राणदान दिया था। नहीं-नहीं उसके मन में रोमा के प्रति नितांत आत्मीयता नहीं है, कुछ और भी है जो उसे सम्पूर्ण मन प्राण और चेतना के साथ उसे आकर्षित करता है।

प्रतनु ने देखा कि कर्पास अंशुक से विलग होकर रोमा उसी की ओर बढ़ी चली आ रही है। रोमा ने अपनी दोनों भुजायें फैला रखी हैं। वह उन्माद की अवस्था में है। प्रतनु ने भी अपनी भुजायें फैला दीं। अगले क्षण सैंधव सभ्यता की अनिंद्य-अप्रतिम सुंदरी दिव्य नृत्यांगना रोमा उससे ऐसे लिपट गयी जैसे कोई आलम्ब आकांक्षिणी सुकोमल वल्लरी दृढ़ वृक्ष के चारों ओर लिपट जाती है।

जाने कितना समय उसी अवस्था में व्यतीत हो गया। जैसे चंचरीक कमलिनी के प्रणय आग्रह से आबद्ध होकर उसकी सुकोमल पांखुरियों में बेसुध होकर ठहर जाता है, उसी तरह प्रतनु रोमा की भुजाओं में लिपट कर रह गया। दासी वश्ती के खंासने से व्यवधान पाकर वे दोनों प्रणयी, अदृश्य प्रणय लोक से पुनः स्थूल वर्तमान में लौटे।

मौन ही रहा यह अभिसार। दोनों ही ओर से कोई शब्द नहीं, कोई संवाद नहीं। जाने जीवन में ऐसा क्यों होता है कि जब बहुत कुछ बोलने की इच्छा होती है, मनुष्य वहाँ कुछ भी नहीं बोलता! यह भी कितनी विचित्र बात है कि सर्वाधिक प्रभावी संप्रेषण मौन रह कर ही हो पाता है।

शब्द तो सीमित अर्थ ही लिये हुए होते हैं। फिर अभी तक सिंधु सभ्यता उन बहुत सारे शब्दों की रचना कहाँ कर पाई है जिनके माध्यम से मानव मन के सारे भाव संप्रेषित हो जायें! प्रतनु ने अनुभव किया कि सिंधु सभ्यता ही क्या संसार की कोई भी सभ्यता अभी तक बहुत सारे शब्दों से वंचित है। कौन जाने मानव कभी आगे भी पूरे शब्दों की रचना कर पायेगा या नहीं!

– अध्याय 32, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] वह गली जिसमें व्यापार होता हो अर्थात् हाट।

किलात से भेंट (33)

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किलात से भेंट

शिल्पी प्रतनु और नृत्यांगना रोमा ने सावधानी से कई बार काल गणना की और आश्वस्त हो जाने पर कि प्रतनु के निष्कासन की दो वर्ष की अवधि पूर्ण हो गयी है, प्रतनु ने आज ही किलात से भेंट करने का निर्णय लिया। पशुपति महालय के प्रातःकालीन पूजन के पश्चात् प्रतनु किलात की सेवा में उपस्थित हुआ।

किलात का अनुशासन पाकर अनुचर प्रतनु को किलात के कक्ष तक ले गया। प्रतनु ने देखा कि दो वर्ष पहले उसके द्वारा बनायी हुई देवी रोमा की प्रतिमा ज्यों की त्यों कक्ष के उसी कोने में रखी है, जहाँ उसने उसे पिछली बार देखा था। किलात एक ऊँचे आसन पर बैठा हुआ था। प्रतनु ने पृथ्वी पर जानु रखकर पशुपति महालय के प्रधान पुजारी किलात को प्रणिपात किया।

  – ‘युवक तुम्हारे पुनः मोहेन-जो-दड़ो आगमन से मैं प्रसन्न हूँ। तुम जैसे प्रतिभाशाली शिल्पी को मैं इतना कठोर दण्ड नहीं देना चाहता था किंतु देवी रोमा के संतोष के लिये ऐसा करना आवश्यक हो गया था।’ किलात को आशा नहीं थी कि दो वर्ष के पश्चात् यह युवा शिल्पी पुनः मोहेन-जो-दड़ो में लौटकर आयेगा। एक तरह से वह प्रतनु को देखकर चैंका ही था।

  – ‘आप सैंधव सभ्यता के संरक्षक हैं, आप जो भी करें आपके लिये सर्वथा उचित है। जो व्यतीत हो गया है मैं उस पर अब चर्चा नहीं करना चाहता। इस समय तो मैं विशेष प्रयोजन से आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ।’ प्रतनु ने अपने शब्दों को न चाहते हुए  भी कोमल बनाये रखना उचित समझा।

  – ‘यदि मैं तुम्हारे किंचित् भी कार्य आ सकूँ, तो मुझे प्रसन्नता होगी। तुम निर्भय होकर अपना मंतव्य मुझसे कह सकते हो। तुम्हारे प्रपितामह ने सैंधवों की बड़ी सेवा की है।’

  – ‘मैं यही आशा लेकर आपकी सेवा में आया हूँ। मैं स्वामी से प्रार्थना करता हूँ कि पशुपति महालय की मुख्य नृत्यांगना देवी रोमा को मुझे अर्पित कर दिया जाये।’ निःसंकोच होकर प्रतनु ने अपनी बात किलात के समक्ष कही।

  – ‘यह क्या कह रहे हो युवक ? क्या तुम देवी रोमा से रुष्ट हो उससे प्रतिकार लेना चाहते हो ?’

  – ‘नहीं! मैं देवी रोमा से किंचित् भी रुष्ट नहीं। न ही मैं उनसे कोई प्रतिकार लेना चाहता हूँ। मेरा उनसे अनुराग है। इसी कारण उनका प्रत्यर्पण [1] चाहता हूँ। विवाह करूंगा मैं उनसे। ‘

  – ‘क्या तुम्हें पशुपति महालय की नृत्यांगनाओं के प्रत्यर्पण नियमों की जानकारी है ?’

 – ‘मुझे कुछ-कुछ जानकारी है स्वामी।’

  – ‘सर्व प्रथम तो उस देवांगना की स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है, जिसका कि प्रत्यर्पण चाहा जा रहा है। क्या देवी रोमा अपने प्रत्यर्पण के लिये सहमत होंगी ?’

  – ‘देवी रोमा अपने प्रत्यर्पण के लिये सहमत हैं स्वामी।’

  – ‘मिथ्या बोलते हो तुम। रोमा कभी भी तुम्हारे लिये अपने प्रत्यर्पण हेतु प्रस्तुत नहीं हो सकती।’ शिल्पी की बात सुनकर बुरी तरह चैंका किलात।

  – ‘आप चाहें तो देवी से उनकी सहमति की पुष्टि कर सकते हैं।’ किलात के स्वर में उत्तेजना आ जाने पर भी प्रतनु संयत ही बना रहा।

उसी समय किलात ने अपना अनुचर देवी रोमा के आवास की ओर दौड़ाया। किलात को लगा कि वह किसी षड़यंत्र में घिर गया है। यह चतुर शिल्पी अकारण ही रोमा के प्रत्यर्पण की मांग नहीं कर सकता। कहीं न कहीं, कोई न कोई अभिसंधि[2] अवश्य हुई है। संभवतः यही कारण रहा है कि रोमा ने किसी न किसी उपाय से अब तक स्वयं को किलात से दूर बनाये रखा है। अन्यथा पशुपति महालय की किसी भी नृत्यांगना ने इतना दुःसाहस कभी नहीं किया कि वह किलात के एक आदेश पर स्वयं को प्रस्तुत न करे।

  – ‘दासी रोमा स्वामी के चरणों में प्रणाम निवेदन करती है।’ रोमा ने नतजानु हो किलात का अभिवादन किया। रोमा को देखकर किलात अपने विचारों से बाहर आया।

  – ‘देवी! क्या तुम इन्हें पहचानती हो ?’

  – ‘हाँ स्वामी! ये वही शिल्पी प्रतनु हैं जिन्होंने मातृदेवी के वेश युक्त मेरी प्रतिमा का शिल्पांकन किया था।’

  – ‘बिल्कुल ठीक पहचाना तुमने। ये वही शिल्पी हैं किंतु ये तुम्हारे प्रत्यर्पण की मांग कर रहे हैं।’

  – ‘पशुपति महालय की नृत्यांगनाओं के प्रत्यर्पण हेतु निवेदन करना सैंधवों का अधिकार है स्वामी।’ रोमा ने दृष्टि झुकाकर उत्तर दिया।

रोमा का प्रत्युत्तर सुनकर जैसे आकाश से गिरा किलात। उसका अनुमान सही था। इन दोनों के बीच कोई न कोई अभिसंधि अवश्य है।

  – ‘क्या तुम शिल्पी प्रतनु के लिये स्वयं के प्रत्यर्पण हेतु प्रस्तुत हो ?’

  – ‘हाँ स्वामी! प्रत्येक स्त्री के मन में यह अभिलाषा होती है कि वह गृहस्थी बसाये। महालय की नृत्यांगनाओं में कोई विरली ही होती है, जिसे यह अवसर प्राप्त होता है। पशुपति की अनुकम्पा से मुझे यह अवसर मिला है। मैं इस अवसर को खोना नहीं चाहूंगी।’

  – ‘क्या शिल्पी तुम्हारे प्रत्यर्पण के लिये पशुपति महालय को पर्याप्त स्वर्णभार प्रस्तुत कर सकेगा!’

  – ‘हाँ स्वामी! शिल्पी प्रतनु मेरे प्रत्यर्पण के लिये पर्याप्त स्वर्णभार प्रस्तुत कर सकेंगे।’

  – ‘कितना ? कितना स्वर्णभार ?’ किलात को विश्वास ही नहीं हुआ। दो वर्ष के निर्वासन काल में एक शिल्पी कितना स्वर्ण भार जुटा सकता है!

  – ‘आप आदेश करें स्वामी! कितना स्वर्णभार पशुपति के चरणों में अर्पित करना हेागा शिल्पी प्रतनु को मेरे प्रत्यर्पण के लिये!’ रोमा ने दर्प के साथ दृष्टि उठाकर किलात से पूछा। किलात ने अनुभव किया कि यह प्रश्न नहीं है, चुनौती है।

  – ‘किंतु जो प्रश्न शिल्पी प्रतनु द्वारा पूछा जाना चाहिये, वह प्रश्न तुम क्यों पूछ रही हो ? स्वर्णभार शिल्पी द्वारा समर्पित किया जाना है न कि तुम्हारे द्वारा!’

रोमा को इस प्रश्न की आशंका पहले ही थी। इसीलिये उसने रात्रि में ही अपने समस्त स्वर्ण आभूषण शिल्पी प्रतनु के निवास पर पहुँचा दिये थे।

  – ‘प्रश्न भले ही मेरे द्वारा किया गया हो किंतु स्वर्णभार शिल्पी ही अर्पित करेंगे।’ रोमा ने प्रत्युत्तर दिया।

  – ‘ठीक है मैंने माना कि तुम प्रत्यर्पण के लिये प्रस्तुत हो और तुम्हारे प्रत्यर्पण के लिये यह शिल्पी पर्याप्त स्वर्णभार भी पशुपति को समर्पित कर सकता है किंतु प्रत्यर्पण के लिये यही दो बातें पर्याप्त नहीं हैं। महालय के प्रधान पुजारी को भी सहमत करना आवश्यक है कि वह महालय की नृत्यांगना का प्रत्यर्पण करे। शिल्पी प्रतनु ने मेरी सहमति नहीं ली है।’

  – ‘आपकी सहमति के लिये ही तो मैं यहाँ प्रस्तुत हुआ हूँ स्वामी।’ शिल्पी प्रतनु ने शब्दों को विनम्र ही बनाये रखा।

  – ‘किंतु मैं अपनी सहमति देने से मना करता हूँ। अब तुम जा सकते हो युवक।’ किलात ने आवेश से लगभग चीखते हुए अपनी बात पूरी की।

  – ‘किंतु आप देवी रोमा का प्रत्यर्पण करना क्यों नहीं चाहते ?’

  – ‘तुम मुझसे यह प्रश्न नहीं कर सकते युवक। पशुपति महालय के प्रधान पुजारी को क्या करना है और क्या नहीं, इसका निर्णय वे स्वयं लेते हैं और उसका कारण किसी को स्पष्ट नहीं करते।’

  – ‘किंतु जब प्रश्न स्वयं मुझसे ही जुड़ा है तो मुझे सैंधव होने के नाते यह अधिकार है कि मैं यह जान सकूं कि आप देवी रोमा का प्रत्यर्पण केवल मुझे ही नहीं करेंगे अथवा किसी को भी नहीं करेंगे ? ‘

  – ‘मैं तुम्हारे किसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये बाध्य नहीं हूँ।’

  – ‘तो फिर मुझे आपको बाध्य करना होगा।’

  – ‘तुझमें इतनी सामथ्र्य क्योंकर है उद्दण्ड युवक ?’

  – ‘एक सैंधव होने के नाते मेरी यह सामथ्र्य है स्वामी।’ प्रतनु ने निर्भीक होकर उत्तर दिया।

किलात के विस्मय का पार न रहा। शिल्पी के आत्म विश्वास का आधार क्या है। क्या सचमुच यह इतना शक्तिशाली है कि मुझे विवश कर सके! क्या इसे किसी शक्तिशाली संगठन का बल प्राप्त है! अथवा यूँ ही यौवन के प्रवाह में मिथ्या प्रलाप कर रहा है! शिल्पी के चेहरे का दर्प बता रहा है कि कुछ न कुछ शक्ति इसके पास अवश्य है अन्यथा इसका ऐसा साहस कदापि न होता कि मुझे महालय में खड़े होकर चुनौती दे सके। दीर्घ आयु का सेवन कर चुका किलात इतना अनुभव तो रखता ही है कि परिस्थिति की वास्तविकता को समझे।

किलात ने उत्तर दिया- ‘ठीक है युवक! सैंधव होने के नाते तुम्हें अधिकार है कि तुम अपने स्वामी से प्रश्न करो किंतु मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर चन्द्रवृषभ आयोजन के बाद दूंगा।’

  – ‘उचित है स्वामी, मैं चन्द्रवृषभ तक प्रतीक्षा कर लूंगा।’ प्रतनु ने किलात को नतजानु हो प्रणाम किया और महालय से बाहर हो गया। इसी के साथ किलात से भेंट पूरी हुई।

– अध्याय 33, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु प्राप्त करना अथवा देना।

[2] बुरा समझौता, षड़यंत्र, कुचक्र।

नृत्यांगना की घोषणा (34)

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नृत्यांगना की घोषणा

मोहेन-जो-दड़ो के वातावरण में आज सनसनी है। पुरवासियों में इतनी सनसनी और इतनी उत्तेजना तो उस दिन भी नहीं थी जिस दिन देवी रोमा की निर्वसना प्रतिमा किसी अज्ञात शिल्पी ने नगर के मुख्यमार्ग पर लाकर रख दी थी। जिसने भी नृत्यांगना की घोषणा के बारे में सुना अवसन्न रह गया। भला यह कैसे संभव है! ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ!

कैसे देवी रोमा यह घोषणा कर सकती हैं कि वे चन्द्रवृषभ आयोजन में मातृदेवी के रूप में तभी उपस्थित होंगी जब शिल्पी प्रतनु चन्द्रवृषभ के रूप में उपस्थित हो! कैसे संभव है यह! युगों-युगों से पशुपति महालय की मुख्य नृत्यांगना प्रजनक देव को प्रसन्न करने के लिये मातृदेवी बनकर नृत्य करती आयी है और पशुपति महालय के प्रधान पुजारी चन्द्रवृषभ बनकर मातृदेवी को गर्भवती बनाते आये हैं। फिर यह नयी रीत कैसी!

और यह शिल्पी प्रतनु! कौन है शिल्पी प्रतनु! जितने मुँह उतनी बातें! किसी ने कहा शिल्पी प्रतनु कालीबंगा के प्रख्यात शिल्पी वितनु का प्रपौत्र है। किसी ने कहा जिस शिल्पी ने दो वर्ष पहले मातृदेवी के वेश में नृत्यरत देवी रोमा की अद्भुत प्रतिमा बनाई थी, यह वही शिल्पी है। किसी ने कहा कि यह शिल्पी तो शर्करा के तट पर स्थित ऐलाना का सैंधव है जो प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में मातृदेवी की प्रतिमायें बनाकर पणियों को बेचा करता है। किसी ने कहा कि शिल्पी प्रतनु तो सैंधव है ही नहीं, वह तो असुर है।

सुनने वाले इन सब बातों को नकार देते हैं। एक बूढ़े सैंधव ने कहा- ‘अरे भई। तुम सब लोगों की तो मति मारी गयी है। कालीबंगा के जिस शिल्पी वितनु ने कुछ वर्ष मोहेन-जो-दड़ो में रहकर पशुपति तथा मातृदेवी की प्रतिमायें बनायीं थीं वह तो आर्यों के आक्रमण में कालीबंगा में ही मारा गया था। उसके परिवार का तो वर्षों से कुछ पता ही नहीं। उसके पुत्र और पौत्रों के बारे में भी तो कुछ सुनने में आता ?’

पशुपति महालय में काम करने वाली एक सैंधव वृद्धा ने कहा-‘ जाने मोहेन-जो-दड़ो निवासी कब सत्य संभाषण करना सीखेंगे! जिस शिल्पी ने देवी रोमा की निर्वसना प्रतिमा बनाई थी उसे तो स्वामी किलात ने राजधानी से निष्कासित कर दिया था। अब भला वह कैसे फिर से पुर में प्रवेश कर सकता है ?’

एक प्रौढ़ सैंधव जिसने शिल्पी प्रतनु की एक झलक देखी थी, दूसरे सैंधवों को चुनौती देता हुआ बोला- ‘अरे मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यह वही शिल्पी है जिसने दो वर्ष पहले देवी रोमा की प्रतिमा बनायी थी।’

  – ‘किंतु उस शिल्पी को तो स्वयं देवी रोमा ने ही स्वामी किलात के समक्ष अभियोग प्रस्तुत करके पुर से निष्कासित करवाया था। अब भला वे उसके साथ नृत्य करने की घोषणा क्यों करेंगी ? वह भी मातृदेवी के वेश में ?’

प्रौढ़ सैंधव निरुत्तर हो गया। सचमुच, इस बात का क्या अर्थ हो सकता है! यह तो संभव ही नहीं कि निष्कासन की अवधि में देवी रोमा और शिल्पी प्रतनु का कोई सम्पर्क रहा हो। फिर कैसे इन दोनों में मेल हो गया!

जहाँ पुरानी पीढ़ी देवी रोमा की घोषणा से चिंतित है वहीं सैंधव युवकों के रक्त में नवीन उत्साह का संचार हो गया है। वे तो स्वंय ही इस बात के पक्षधर नहीं थे कि बूढ़ा किलात चन्द्रवृषभ नृत्य करने का एकमात्र अधिकारी समझा जाये। क्यों नहीं यह अधिकार सैंधव युवकों को प्राप्त हो जाता!

वर्षों तक प्रयास करने के बाद भी वे इस परम्परा को बदलने में सफल नहीं हो पाये थे किंतु अब स्वयं देवी रोमा ने ही अपनी ओर से घोषणा करके परम्परा को बदल डालने का निश्चय किया है, तो युवकों को लगा, एक अवरुद्ध मार्ग के खुलने का समय आ गया है। उन्होंने रोमा की घोषणा का समर्थन किया।

नगर से आ रही इन सूचनाओं से किलात की चिन्ता का पार नहीं है। उसे पुर में प्रचारित रोमा की घोषणा का पता चल गया है। उसे यह भी ज्ञात हो गया है कि बहुत से नागरिक रोमा की घोषणा का समर्थन कर रहे हैं, उनमें भी विशेषकर सैंधव युवाओं का कहना है कि चन्द्रवृषभ के वेश में हर बार महालय का प्रधान पुजारी ही क्यों उपस्थित हो! क्यों नही यह अवसर युवकों को भी मिले!

कुछ समझ नहीं पाता महान् किलात। क्यों नृत्यांगना रोमा स्वामी-द्रोह पर उतर आयी है! क्यों सैंधव युवक युगों से चली आ रही ‘धर्म-व्यवस्था’ को भंग करने पर उतारू हैं! क्यों एक क्षुद्र शिल्पी ने शर्करा के तट से आकर राजधानी के नागरिक जीवन में हलचल पैदा कर दी है! क्यों उसे अपनी किसी भी ‘क्यों’ का उत्तर नहीं मिल पाता!

किलात ने चाहा था कि वह चन्द्रवृषभ आयोजित होने के पश्चात शिल्पी की शक्ति के वास्तविक केन्द्र का पता लगाकर उससे निबट लेगा किंतु यह तो एक नयी समस्या खड़ी हो गयी। रोमा ने पूरे नगर में यह घोषणा करवा दी कि वह चन्द्रवृषभ आयोजन में तभी उपस्थित होगी जब चन्द्रवृषभ के वेश में किलात नहीं, शिल्पी प्रतनु होगा।

अन्यथा वह नृत्य ही नहीं करेगी। किलात को लगा कि मोहेन-जो-दड़ो वासी भले ही पशुपति महालय के प्रमुख पुजारी किलात में कितनी ही श्रद्धा क्यों न रखते हों, वे देवी रोमा का नृत्य देखने की अभिलाषा नहीं त्याग सकते। इस कारण किलात देवी रोमा के स्थान पर किसी और देवदासी को मातृदेवी की भूमिका में नहीं उतार सकता।

क्या करे स्वामी किलात और क्या न करे ? कोई मार्ग नहीं सूझता। यदि वह शिल्पी प्रतनु को चन्द्रवृषभ के रूप में मातृदेवी के साथ नृत्य करने की स्वीकृति देता है तो अगले वर्ष से अन्य युवक भी चन्द्रवृषभ बनने का अधिकार मांगेगे। यदि वह रोमा की घोषणा को अस्वीकार कर देता है तो युवा सैंधव विद्रोह करने को उतारू हो जायेंगे।

क्या वह शिल्पी को ललकारे कि उसे पुरवासियों के समक्ष नृत्य करके अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनी होगी! तभी उसे पशुपति महालय के वार्षिक आयोजन में मातृदेवी के साथ नृत्य करने दिया जायेगा। नहीं-नहीं! इससे तो एक तुच्छ शिल्पी को महान् किलात की समकक्षता करने का अवसर मिल जायेगा।

सामान्य सैंधव भी सोचने लगेंगे कि महान् किलात को चुनौती दी जा सकती है! यदि नृत्यकला में कहीं युवा शिल्पी ही श्रेष्ठ नर्तक सिद्ध हुआ तो! फिर किलात किस प्रकार सैंधव सभ्यता का प्रमुख पुजारी बना रहा सकेगा! यदि नृत्यांगना और शिल्पी को धर्मद्रोह के अपराध में कारावास में डाल दिया जाये तो!

किलात को लगा कि नृत्यांगना को नहीं तो शिल्पी को तो बंदी बना लेना ही उचित है। यदि इसी समय वह नगर रक्षकों को शिल्पी के आवास पर भेज कर खोज करवाये तो अवश्य ही रोमा के आभूषण उसके निवास से मिल जायेंगे। किलात का अनुमान था कि रोमा ने मुख्य नृत्यांगनाओं द्वारा वर्षों से संचित समस्त आभूषण शिल्पी को दे दिये होंगे ताकि उन्हें पशुपति के समक्ष स्वर्णभार के रूप में अर्पित करके वह रोमा का प्रत्यर्पण करवा ले।

वे आभूषण रोमा के तो नहीं हैं! वे महालय की सम्पत्ति हैं। कितना अच्छा हो कि ये आभूषण शिल्पी के निवास से प्राप्त किये जा सकें। सारी व्याधि स्वतः ही दूर हो जायेगी किंतु . . . . . किंतु यदि किलात का अनुमान मिथ्या निकला तो! किलात का आत्मविश्वास डगमगा गया। यदि रोमा के आभूषण शिल्पी प्रतनु के पास नहीं पाये गये तो!

तब तो नृत्यांगना रोमा और शिल्पी प्रतनु को अच्छा अवसर प्राप्त हो जायेगा। वे दोनों मिलकर पुरवासियों में मेरे विरुद्ध असंतोष फैलाने में सफल हो जायेंगे। फिर क्या किया जाये! अपने आप पर खीझ हो आती है उसे, क्यों अप्रिय क्षणों में वह अपने आप को इतना निर्बल पाता है!

क्यों नहीं है उसे अपनी शक्तियों पर विश्वास! क्यों नहीं वह सामना कर सकता उसके संकेत मात्र पर नत्य करने वाली क्षुद्र नृत्यांगना और छैनी  चलाकर उदर पोषण करने वाले तुच्छ शिल्पी का! क्या सैंधव सभ्यता के महान् पुजारी सर्वशक्तिमान किलात में इतना ही बल है कि कोई भी सैंधव युवक किसी भी पुर से चला आये और उसकी समस्त सत्ता को ललकारने लगे!

क्रोध, खीझ और बेचैनी से मुक्ति पाना चाहता है किलात। वह इन सब बातों का अभ्यस्त नहीं। वह तो केवल संकेत भर करने का अभ्यस्त है। जब-जब जो-जो उसने चाहा तब-तब वो-वो उसे बिना मांगे ही मिल गया किंतु इस बार ऐसा क्यों नहीं है! महान् पुजारी है वह सैंधव सभ्यता का।

महान् पुजारी! हुंह! ये हैं महान पुजारी धर्मात्मा किलात् जो अपनी असीम शक्तियों से सम्पूर्ण सैंधव सभ्यता का संरक्षण करते हैं। महाअसुर-वरुण तथा उनके दोनों नेत्र सूर्य और चन्द्र भी जिसकी आज्ञाओं का अनुसरण करते हैं ऐसे शक्तिशाली महान् किलात की यह दशा कि वह चाहे और उसे न मिले! उसके भीतर का आलोड़न तीव्र हो जाता है, क्या नहीं कर सकता वह!

वह चाहे तो सप्त सिंधुओं में जल प्रवाहित हो और वह न चाहे तो सप्त सिंधु रेत की सरितायें बन कर रह जायें। वह चाहे तो मातृदेवी गर्भवती हो और वह न चाहे तो मातृदेवी गर्भवती न हो। वह चाहे तो रोमा नृत्य करे और वह न चाहे तो रोमा नृत्य न करे। वह चाहे ही क्यों कि रोमा नृत्य करे! प्रसन्नता से उछल ही पड़ा किलात। वह चाहे ही क्यों कि रोमा नृत्य करे! इतनी सी बात उसके मस्तिष्क में पहले क्यों नहीं आयी! केवल इतनी सी बात!

जिस रूप और कला के बल पर उस क्षुद्र नृत्यांगना को इतना अभिमान है कि वह महान् किलात को चुनौती दे सके, वह रूप और कला उसके पास रहें ही क्यों ? क्या किलात से विमुख रहकर वह रूपसम्पन्न और कलायुक्त रह सकती है ? नहीं, कदापि नहीं। उसे त्यागने होंगे रूप और नृत्य। समस्त अभिमान विगलित हो जायेगा उसका। फिर शिल्पी प्रतनु को भी उसकी इच्छा नहीं रह जायेगी। तब वह उन दोनों से एक-एक करके निबट लेगा किंतु . . . . फिर किंतु बीच में आ गया था।

क्यों आ जाता है यह किंतु बार-बार हर समाधान के बीच में! नहीं आने देगा इस किंतु को वह बीच में। फिर उलझ जाता है किलात। उसने तो रोमा का समर्पण चाहा था न कि उसका विनाश। नृत्यांगना को विनष्ट करने में उसकी विजय नहीं है। विजय उससे समर्पण करवाने और उसे भोगने में है। यह तभी संभव है जब उसकी रूप सम्पदा सुरक्षित रहे . . . किंतु उसकी कला! उसे तो नष्ट होना ही चाहिये। नृत्यांगना की शक्ति का वास्तविक केन्द्र उसकी कला में है न कि उसके सौंदर्य में।

ऐसा लगता था कि किलात किसी निर्णय पर पहुंच चुका था, वह भी बिना किसी ‘किंतु’ के। वह आघात करेगा नृत्यांगना की शक्ति के केन्द्र पर। अभिचार [1] का प्रयोग करेगा वह नृत्यांगना पर। शिल्पी द्वारा बनायी गयी वही प्रतिमा रोमा के लिये अभिशाप बन जायेगी जिसके बल पर वह सैंधव प्रजा में रहस्यमयी आकर्षण और कौतूहल का पात्र बना हुआ है।

किलात की आँखों की चमक बढ़ती जा रही है। इससे तो एक साथ दो उद्देश्यों की प्राप्ति होगी। एक ओर तो नृत्यांगना शक्तिहीन होकर स्वयं ही किलात के चरणों में आ गिरेगी और दूसरी ओर शिल्पी प्रतनु स्वयं अपनी ही दृष्टि में अपराधी हो जायेगा। जिस कला पर उन दोनों को इतना अभिमान है, उसी कला के लिये पश्चाताप करेंगे वे।

किंचित् झटके से उठा किलात अपने स्थान से और नृत्यांगना रोमा की मातृदेवी के वेश में खड़ी प्रतिमा पर क्रूर दृष्टि डालता हुआ कक्ष से बाहर निकल गया। उसे इसी समय कई महत्वपूर्ण कार्य निबटाने थे।

– अध्याय 34, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] जादू-टोना, मैली विद्या।

चतुरंगिणी (35)

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चतुरंगिणी

चैथा अंग पदाति सैनिकों का था। यह अंग चतुरंगिणी का सबसे बड़ा और सबसे मुख्य अंग था। शेष अंग एक तरह से इसी अंग की सहायता के लिये संगठित किये गये थे।

राजन् सुरथ ने ऊँची टेकरी पर चढ़कर चतुरंगिणी[1] का अवलोकन किया। चारों दिशायें आर्य सैनिकों से आप्लावित थीं। राजन् सुरथ तथा सेनप सुनील ने आर्य वीरों की चतुरंगिणी सैन्य संयोजित करने में दिवस-निशि परिश्रम किया था। प्रत्येक अंग का मुखिया ऐसे वीर को चुना गया था जो उस अंग के लिये सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ था। चारों अंगों के मुखियाओं को सेनप सुनील के अधीन रखा गया था।

पहला अंग हस्ति सैनिकों का था। इस अंग के सैनिक हस्ति पर आरूढ़ होकर सबसे आगे चलते थे तथा युद्ध के मैदान में सबसे पहले धंसते थे। आर्य अतिरथ को इसी अंग का मुखिया बनाया गया था। इस अंग को पुर पर आक्रमण के लिये विशेष रूप से दक्ष किया गया था।

युद्ध क्षेत्र में भारी सैनिक सामग्री ढोने का काम भी इसी अंग को दिया गया था। हस्ति सैन्य के लिये गहन वन प्रांतर में रहने वाली प्रजाओं से हस्ति प्राप्त करने में आर्यों को सर्वाधिक समय लगा था। फिर भी बहुत कम प्रशिक्षित हस्ति उपलब्ध हो पाये थे। इसक उपरांत भी जब हस्ति सैन्य सब तरह से सुसज्जित होकर चतुरंगिणी में सम्मिलित हुआ तो आर्य वीरों का मनोबल काफी बढ़ गया।

दूसरा अंग रथाति सैनिकों का था। इस अंग में हस्ति दल की अपेक्षा अधिक सैनिक थे। ये सैनिक रथ में बैठे रहने के कारण शत्रु-सैन्य के मध्य धंसने में विशेष रूप से उपयोगी थे। सैनिकों के लिये धनुष, बाण, असि तथा तूणीर आदि ढोने का काम भी इसी अंग पर छोड़ा गया था। तीसरा अंग अश्वारूढ़ सैनिकों का था।

यह अंग सर्वाधिक तीव्र वेग से चल सकने में सक्षम होने के कारण शत्रु सैन्य पर अचानक धावा करने में विशेष उपयोगी था। युद्ध क्षेत्र में युद्ध सम्बन्धी सूचनायें एक अंग से दूसरे अंग तक पहुँचाने का कार्य भी इसी अंग को प्रदान किया गया था। समस्त प्रमुख आर्य वीर इसी अंग में सम्मिलित किये गये थे। चैथा अंग पदाति सैनिकों का था। यह अंग चतुरंगिणी का सबसे बड़ा और सबसे मुख्य अंग था। शेष अंग एक तरह से इसी अंग की सहायता के लिये संगठित किये गये थे।

राजन् सुरथ की योजना यह थी कि चतुरंगिणी को साथ लेकर सबसे पहले अन्य आर्य-जनों की यात्रा की जाये और उन जनों के आर्यवीरों को चतुरंगिणी में सम्मिलित किया जाये। इससे जनों में एक्य-सूत्र [2] स्वतः ही स्थापित हो जायेगा और वे कालांतर में एक आर्य जनपद में बंध जायेंगे।

जो आर्यजन इस चतुरंगिणी का विरोध करें उनसे समरांगण में निबटा जाये। जब चतुरंगिणी में सैनिकों की विपुल संख्या हो जाये तब यह चतुरंगिणी असुरों के पुरों पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट करे तथा असुरों को सरिताओं के तट से दूर मरुस्थल की ओर धकेल दे। आर्य सुरथ ने यह भी योजना बनाई थी कि जैसे-जैसे सप्त सिंधु क्षेत्र की सलिलाओं के  पवित्र तट असुरों से मुक्त होते जायें वैसे-वैसे उन क्षेत्रों में आर्य जन स्थापित किये जायें ताकि असुर पुनः उन क्षेत्रों में प्रवेश न करें। 

ऋषियों, ऋषिपत्नियों तथा अन्य आर्यों ने राजन् सुरथ और सेनप सुनील के इस विशेष सैन्य संगठन को देखकर मुक्तकण्ठ से सराहना की। निश्चित् ही उनका उपक्रम और उनकी योजना अद्भुत है। सुसंगठित सैन्यशक्ति एवं सुनियोजित रणनीति ही प्रबल असुरों को सरिताओं के तट से दूर निर्जन मरुस्थल में धकेल सकती है।

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आगे बढ़कर राजन् सुरथ के मस्तक पर तिलक अंकित किया और सिर पर अक्षत [3] डालकर आर्य सैन्य की विजय कामना की। दुंदुभि के तुमल नाद के साथ चतुरंगिणी ने अपने दिव्य शस्त्रों का संचालन किया। सूर्य रश्मियों में चमकते हुए अस्त्र-शस्त्रों को देखकर लगता था जैसे सहस्रों सूर्य एक साथ निकल आये हैं। शस्त्र संचालन करते हुए ही चतुरंगिणी ने प्रस्थान किया।

सबसे आगे दो अश्व चल रहे थे जिन पर राजन् सुरथ तथा सेनप सुनील आरूढ़ थे। उनके दोनों पार्श्वों में दो सैनिक पीतवर्णी  [4] ध्वज लेकर चल रहे थे। आर्या पूषा ने इस ध्वज में पीत पृष्ठ भूमि पर श्वेत रंग से सूर्य अंकित किया था। उनके पीछे एक रथ था जिसमें जन के पुरोहित ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा विराजमान थे। उनके एक ओर हस्ति पर आरूढ़ आर्य अतिरथ तथा दूसरी ओर आर्य सुमति चल रहे हैं। उनके पीछे सबसे पहले हस्ति सैन्य, उसके पश्चात् अश्व सैन्य, उसके पीछे रथ सैन्य और सबसे अंत में पद सैन्य पंक्ति बद्ध होकर चली।

राजन् सुरथ की योजना हर तरह से सोच-विचार कर बनायी गयी थी। प्रत्येक संभावित समस्या का हल पहले से ही खोजने का प्रयास किया गया था। सैनिकों के लिये भोजन सामग्री जुटाने के लिये पहले से ही अन्य सैनिक निर्धारित कर दिये गये थे ताकि अन्य सैनिक निंश्चित रह कर युद्ध में सन्नद्ध रह सकें।

चतुरंगिणी को विदा देने आये तृत्सु-जन के रत्नियों, वृद्धों, ऋषियों, आर्य ललनाओं और बालकों ने अपने मन में नवीन चेतना, नवीन उत्साह, नवीन संभावनायें और नवीन कल्पनाओं को अंकुरित होते हुए अनुभव किया। स्वजनों को युद्ध क्षेत्र के लिये प्रस्थान करते हुए देखकर विछोह का कष्ट भी उनके शंका पूरित हृदयों में था किंतु इसके लिये वे अपने आप को कई दिवस पूर्व तैयार कर चुके थे। मंथर गति से आगे बढ़ती हुई चतुरंगिणी अपने पीछे धूलि का बड़ा सा वृत्त छोड़ती हुई नेत्रों से ओझल हो गयी तो आर्य स्त्री-पुरुष फिर से अपनी पर्णशालाओं को लौटे।

राजन् सुरथ उनके लिये भी एक बड़ा कार्य छोड़ गये थे। राजन् की अनुपस्थिति में जन की सुरक्षा के विशेष प्रबंध किये गये थे। वृद्ध पूषण को पुरप नियुक्त करके उन्हें जन के रक्षण का भार दिया गया था। पुरप की सहायता के लिये एक लघु सैन्य भी जन में रखा गया था।

जब तक यह चतुरंगिणी पुनः लौट कर आये, आर्यों को पुरप पूषण के नेतृत्व में जन के चारों ओर दीर्घ भित्ति का निर्माण करके एक पुर का निर्माण करना था। वृद्ध आर्यों ने अनुभव किया कि वे पुर निर्माण की नवीन परम्परा को स्वीकार करने जा रहे थे। एक ऐसी परम्परा जो आर्यों की नहीं थी, असुरों की थी किंतु इसे स्वीकार कर लेना वर्तमान समय की आवश्यकता थी।

– अध्याय 35, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] जिस सेना में पैदल सैनिकों के साथ हाथी, घोड़े तथा रथों पर सवार सैनिक हों उसे चतुरंगिणी अर्थात् चार अंगों वाली सेना कहते हैं।

[2] एकता का सूत्र।

[3] न टूटा हुआ चावल।

[4] पीले रंग का।

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