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यातुधान (16)

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यातुधान

गुहा द्वार पर पाँच यातुधान पहरा दे रहे थे किंतु वे पूरी तरह असावधान थे। उन्हें इस बात की कल्पना भी नहीं थी कि इस निविड़ पर्वत प्रदेश में कोई प्राणी उनके कार्य में विघ्न उपस्थित करने के लिये आ सकता है।

दिन भर के श्रांत-क्लांत गोप सुरथ परुष्णि के जल में निमज्जित होकर थकान दूर करने के उपक्रम में अपनी पर्णकुटी के बाहर विश्राम की अवस्था में विराजमान हैं। शरीर के साथ-साथ मस्तिष्क को विश्राम देने के लिये वे इस समय समस्त वैचारिक प्रवाह को विराम देना चाहते हैं फिर भी मस्तिष्क है कि आज की सभा की ओर बार-बार चला जाता है।

आज ऋषि पर्जन्य ने संगीत चर्चा में शकुनि पक्षी की तुलना कर्करी वाद्य [1]  से की थी। ऋषि पर्जन्य सचमुच ही सामगायान और ध्वनियों के विशारद हैं तभी तो वे संगीत ध्वनियों की तुलना विभिन्न प्रकार की सामग्रियों, यहाँ तक कि पशु-पक्षियों द्वारा उत्पन्न ध्वनियों से भी कर लेते हैं। कितनी सुन्दर ऋचा कही ऋषि पर्जन्य ने-

” हे शकुनि पक्षी! जब तू बोल तब मंगल ही बोल, जब तू चुप बैठा रह तब हमारे प्रति शुभ विचारों को रख और जब तू उड़ तब कर्करी के समान मधुर वचन बोल जिससे हम भद्र संतति से सम्पन्न होकर यज्ञ में पूर्ण रूप से तेरी प्रशंसा करें।” [2]

धन्य हैं ऋषि पर्जन्य जिन्होंने आर्य ऋषियों के सामगायन की तुलना मरूतों के अद्भुत वाण [3] से की- ”मरूत का वाण सुनहले रथों में स्थित सोभरियों [4] के गान से ध्वनित होता है। महान् सुजात मरूत जो गौ की सन्तति हैं। हमें अन्न भोग और कृपा से समृद्ध करें। [5]

गोप सुरथ का चिंतन प्रवाह आगे बढ़ता है- और तो और ऋषि पर्जन्य ने तो पर्णकुटियों में विद्यमान उलूखलों [6] की तुलना दुंदुभि से कर डाली। वाह क्या उत्तम उपमा है-”हे उलूखल! यदि तू प्रत्येक गृह में विद्यमान है तो इस वैदिक कर्म में उसी प्रकार प्रभूत ध्वनि युक्त शब्द कर जिस प्रकार विजयी पुरुष की दुन्दुभि [7] शब्द किया करती है।” [8]

इसी समय आर्य पूषन ने आकर उनके चिंतन में बाधा उत्पन्न की- ‘आर्य सुरथ!’

  – ‘क्या बात है आर्य! आपकी श्वांस अनियंत्रित क्यों है ? कहीं दूर से भागे चले आ रहे हैं क्या ?’ आर्य सुरथ ने खड़े होकर वृद्ध पूषन की अभ्यर्थना की एवं बैठने के लिये आसन दिया।’

  – ‘हाँ आर्य।’ अपनी अनियंत्रित श्वांसों पर नियंत्रण पाते हुए वृद्ध पूषन ने आसन ग्रहण किया।

  – ‘किस प्रयोजन से आपको भाग कर आना पड़ा है आर्य ? क्या आप अश्व नहीं ले गये थे अपने साथ?

  – ‘नहीं मैं आज पैदल ही किंचित ऊँचाई तक विचरण के लिये चला गया था। निश्चय तो और आगे जाने का था किंतु मार्ग से ही भाग कर आना पड़ा।’

  – ‘ऐसा क्या हुआ आर्य ?’

  – ‘ठीक उत्तर में स्थित पर्वतीय कंदरा में मैंने एक साथ कई यतियों [9] को किसी उपक्रम में संलग्न देखा।’

  – ‘कैसा उपक्रम आर्य ?’

  – ‘भय के कारण अधिक समय तक मैं वहाँ ठहर नहीं सका। इसीसे कुछ ठीक से कुछ समझ नहीं पाया किंतु अनुमान होता था कि वे किसी अनुष्ठान की तैयारी में संलग्न हैं।’

  – ‘क्या केवल यति ही थे ?’

  – ‘नहीं, केवल यति नहीं, लगभग पचास यातुधान [10] भी वहाँ उपस्थित थे। वह तो ठीक हुआ कि मेरी दृष्टि दूर से ही उन पर पड़ गयी। अनुमान होता है कि उन्होंने भी मुझे देख लिया था किंतु उस समय मैं ऊँचाई पर था और वे नीचे थे, इसीसे मुझे पकड़ नहीं सके।’

  – ‘इन यातुधानों को कोई और स्थान नहीं मिलता! कितनी बार तो हम उन्हें पकड़कर

दण्डित कर चुके हैं किंतु आर्य-जनों के निकट आने में इन्हें कोई संकोच अथवा लज्जा नहीं आती। असुरों की यही सबसे बड़ी बुराई है कि जो निश्चय वे एक बार कर लेते हैं उसे सरलता से त्यागते नहीं।’ चिंतित दिखाई दिये गोप सुरथ।

सुरथ इस तथ्य से अवगत हैं कि यातुधानों में दिन के प्रकाश में सम्मुख होकर लड़ने का बल नहीं किंतु रात्रि के अंधकार में उनकी शक्ति का जैसे अपरिमेय विस्तार हो जाता है। इस समय उन के विरुद्ध कुछ करना ठीक नहीं। प्रातःकाल की सभा का स्थगन करके आर्यवीरों को यातुधानों के विरुद्ध अभियान पर ले जाना होगा। आर्य पूषन से मंत्रणा करके यही निश्चय किया आर्य सुरथ ने।

अमावस्या होने के कारण आज चंद्रदेव पूरी तरह से अनुपस्थित थे किंतु अंतरिक्ष के नक्षत्र उज्ज्वल हिमकणों की भांति आकाश में इधर-उधर बिखरे पड़े थे। उनका मंद प्रकाश तीव्र वेग से बहती परुष्णि के जल में घुलकर तरल रजत का निर्माण कर रहा था। समस्त आर्य जन निद्रा देवी के अंक में निश्चिंत होकर विश्राम कर रहे थे। रात्रि के दो प्रहर बीते होंगे कि आर्य सुनील के घोष ने परुष्णि के तट पर व्याप्त नीरवता को भंग किया।

  – ‘सावधान आर्य जन। निद्रा त्याग कर तत्काल सचेत हो जायें।’ आर्य सुनील का आह्वान सुनकर समस्त स्त्री-पुरुष शीघ्रता पूर्वक अपनी-अपनी पर्ण कुटी से बाहर आये।

  – ‘क्या हुआ आर्य सुनील ?’

  – ‘भगिनी पूषा अपनी कुटी में नहीं हैं।’

  – ‘क्या कोई पशु उठा ले गया ?’ एक साथ कई स्वर उभरे।

  – ‘संभवतः कोई पशु ही जन में घुस आया हो किंतु इस अंधकार में तो उसको खोज पाना लगभग असंभव सा होगा।’ आर्या लोपामुद्रा ने चिंता व्यक्त की।

नहीं-नहीं यह किसी पशु का कार्य नहीं है। गोप सुरथ तत्काल समस्त परिस्थिति को समझ गये किंतु उन्होंने माताओं में भय व्याप्त न हो इस कारण अपनी बात अधूरी ही छोड़ दी। उन्होंने तत्काल आधे आर्य वीरों को शस्त्र धारण कर और अश्वारूढ़ होकर अपने पीछे आने के आदेश दिये और आधे आर्य वीरों को आर्य विश्रुत के नेतृत्व में जन की सुरक्षा पर नियत कर दिया।

उन्होंने वयोवृद्ध आर्य पूषन से अनुरोध किया कि वे समस्त आर्यों का पथ प्रदर्शन करें तथा वहाँ ले चलें जहाँ उन्होंने संध्याकाल में यतियों और यातुधानों को देखा था। सघन अंधकार और दुर्गम पर्वत पथ के उपरांत भी आर्य दल वेग से अश्व फैंकता हुआ यातुधानों की गुहा तक पहुँचा। वयोवृद्ध आर्य पूषन इस आयु में भी पूर्ण कौशल से अश्व का संचालन कर लेते हैं। इस कारण आर्यों को लगभग अर्द्धशत हल की दूरी पार करने में अधिक समय नहीं लगा।

गुहा द्वार पर पाँच यातुधान पहरा दे रहे थे किंतु वे पूरी तरह असावधान थे। उन्हें इस बात की कल्पना भी नहीं थी कि इस निविड़ पर्वत प्रदेश में कोई प्राणी उनके कार्य में विघ्न उपस्थित करने के लिये आ सकता है। बात की बात में आर्य वीरों ने पाँचों यातुधानों के मस्तक धड़ से अलग कर दिये। गुहा के भीतर वामाचार में संलग्न यतियों और यातुधानों को गुहाद्वार पर हुए रक्तपात का अनुमान नहीं हो सका। आर्य सुरथ के नेतृत्व में समस्त आर्यवीर अश्वारूढ़ अवस्था में ही गुहा में पैठ गये।

यह एक विशाल गुहा थी जिसके ठीक मध्य में गौ-रक्त से चक्र का निर्माण किया गया था। चक्र के केन्द्र में प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित थी जो मद्य, पशु-चर्बी तथा शुष्क काष्ठ मिलने पर सहस्रों जिह्वाएं पसार कर लपलपा उठती थी। सम्पूर्ण गुहा में मद्य एवं पशु चर्बी के जलने की तीव्र गंध व्याप्त थी।

समस्त यति रक्त-चक्र को घेर कर बैठे थे। प्रत्येक यति के पृष्ठ भाग पर एक यातुधान तथा एक यातुधानी नग्न खड्ग लिये खड़े थे। गुहा में उपस्थित किसी भी प्राणी ने किसी तरह का वस्त्र अथवा चर्म धारण नहीं कर रखा था किंतु शीश पर भयंकर दीख पड़ने वाले पशु-शृंग लगे हुए थे। उनकी अमंगल देह लपलपाती अशुभ ज्वालाओं के प्रकाश में अत्यंत भयावह दिखाई देती थी।

यतियों का प्रमुख  कुलिक काले पहाड़ के समान स्थूल देह पर गौ-रक्त का लेपन कर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके बैठा था। उसके गले में नरमुण्डों की माला पड़ी थी। जैसे-जैसे वह अशुभ-मंत्र बोलता हुआ मद्य गटकता जाता था उसके मद्यघूर्णित नेत्र और अधिक चैड़े होकर फैलते जाते थे जिनमें अग्नि की ज्वालाओं का हिलता हुआ प्रतिबिम्ब ऐसा प्रतीत होता था मानो अग्नि की ज्वालायें उसके नेत्रों से निःसृत होकर चक्र के मध्य तक पहुँच रही हैं।

एक ओर कुछ यातुधान मेष, अज और गौ लिये खड़े थे। जैसे-जैसे आवश्यकता होती जाती थी वे पशुओं का वध करके उनका मांस यतियों को देते जाते थे। विपुल चर्बी से युक्त मेष-मांस को अशुभ मंत्रों के उच्चारण के साथ अग्नि में झौंका जा रहा था तथा अज एवं गौ का कोमल मांस सुरा में भिगो कर अशुभवेशधारी यतियों द्वारा भक्षण किया जा रहा था। कुलिक मांस भक्षण न करके केवल मद्यपान ही कर रहा था। उसे अशुभ अनुष्ठान के अंत में दी जाने वाली महाबलि ही ग्रहण करनी थी।

अशुभ मंत्रों के उच्चारण का एक भाग पूर्ण हो जाने पर कुलिक ने यतियों को खड़े होने का संकेत किया। समस्त यातुधान और यातुधानियाँ अपने अस्त्र फैंककर रक्त-चक्र के पास सिमट आये और विभिन्न पशुओं की खोपड़ियों में मद्य लेकर अग्नि के चारों ओर चक्कर लगाते हुए नाचने लगे। वे बड़ा ही भयावह चीत्कार कर रहे थे।

नृत्यलीन यातुधान और यातुधानियाँ अपनी अशुभ देहों का परस्पर घर्षण करते हुए अत्यंत अशुभ और अश्लील चेष्टायें करने लगे। अग्नि की लपटों से उत्पन्न प्रकाश में इन अमंगल वेशधारी प्राणियों की प्रतिछचयाएं भी गुहा की चट्टानों पर नृत्य करने लगीं। ऐसा प्रतीत होता था मानो यातुधानों के इस अशुभ अनुष्ठान में भाग लेने के लिये कुछ अशरीरी जीव चट्टानों पर उभर आये हों।

जैसे-जैसे कुलिक के अशुभ मंत्रों का उच्चारण तीव्र होता जा रहा था, यतियों और यातुधानों का नृत्य भी जोर पकड़ता जा रहा था। कुछ ही क्षणों में वे सब अमंगल देहधारी, निर्लज्ज, और वीभत्स प्राणी मैथुन योग से नृत्य करते हुए महाबलि को होश में लाने का प्रयास करने लगे। सुरा के प्रभाव से बहुत से अशुभ काम-कीट सुध-बुघ खोकर लुढ़कने लगे। अब कुलिक ने महाबलि का भोग लगाने का निर्णय लिया। जो यातुधान और यातुधानी अब भी मूर्च्छित होने से बचे हुए थे, उन्होंने महाबलि की तैयारी में कुलिक का सहयोग किया।

कुलिक के संकेत पर एक यातुधान ने महाबलि पर रखा मेष चर्म हटाकर उस पर सुरा फैंकी। सुरा का शीतल स्पर्श पाकर पूषा की मूच्र्छा भंग हुयी। वह तो स्वस्थ अवस्था में रात्रि के प्रथम प्रहर में अपनी पर्ण कुटी में शैय्यागत हुई थी। उसे यह ज्ञात नहीं था कि कब और कैसे यातुधानों का दल उसे मूर्च्छित कर यहाँ ले आया था। स्वयं को अपनी पर्णकुटी में पाने के स्थान पर इस अकल्पित भयावह स्थल पर देखकर उसके मुँह से चीख निकल गयी और वह घबरा कर उठ खड़ी हुई। उसने देखा उसकी देह पर कोई वस्त्र नहीं है। वह जैसे खड़ी हुई थी वैसे ही नीचे बैठ गयी।

कुलिक ने निरावरण पूषा को पकड़ने के लिये हाथ बढ़ाया ही था कि ठीक उसी समय आर्य सुरथ के अश्व ने गुहा में प्रवेश किया। यातुधानों को विश्वास नहीं हुआ कि आर्ययोद्धा इस गुहा तक चले आयेंगे। वे अपने अपने खड्गों की ओर लपके। यति भी अपनी काष्ठ निर्मित गदायें लेकर आर्यों के प्रतिरोध को सन्नद्ध हो गये। क्षण भर में गुहा का दृश्य परिवर्तित हो गया। यातुधानों का वीभत्स-चीत्कार, अमंगल-हुंकार में बदल गया।

  – ‘यहाँ क्या कर रहा है पाखण्डी कुलिक ?’ आर्य सुरथ ने कुलिक को ललकारा।

  – ‘तेरे अग्नि को असुर बना रहा हूँ आर्य। जैसे इन्द्र ने वृत्र को असुर से देव बनाया था। हा-हा-हा। देख! यह देख! तेरा अग्नि अब सोम और घृत को त्याग कर मद्य और गौमांस ग्रहण कर रहा है। अब यह असुर हो गया सुरथ। अब यह तेरा नहीं रहा। मेरा हो गया। मैंने अग्नि के मुख को चीर कर उसमें मद्य और गौमांस भर दिया। तेरा पूज्य अग्नि अपवित्र हो गया।’ विक्षिप्त महिष की भांति डकराया कुलिक।’

  – ‘व्यर्थ प्रलाप मत कर लिंगोपासक! मैंने तुझे पहले भी चेतावनी दी थी कि परुष्णि के निकट दिखाई दिया तो शिरोच्छेद कर दूंगा तेरा।’ [11]

  – ‘कायर सुरथ! एक-दो बार नहीं बीसियों बार मैं तेरी परुष्णि के निकट आया हूँ। हर बार तूने यही कहा है कि शिरोच्छेद कर दूंगा किंतु आज तक मुझे स्पर्श नहीं कर सका तू। हा-हा-हा! कायर किसी का शिरोच्छेद नहीं कर सकते। हा-हा-हा!’ वीभत्स अट्टास किया कुलिक ने।

  – ‘तुझे मैंने यति समझ कर हर बार प्राणदान दिया है। असुरों का ही सही किंतु तू पुरोहित है इस कारण मैंने तेरा वध नहीं किया किंतु दुष्ट कुलिक! मुझे सचमुच ही तेरा शिरोच्छेद करना पड़ेगा ताकि तेरी अमंगली छाया से परुष्णि के कूल त्रस्त न हांे।’ आर्य सुरथ ने गहन गंभीर मेघ की भांति गर्जना की।

  – ‘तो फिर आ, बढ़ आगे। शिरोच्छेद कर मेरा। हा-हा-हा! तू तो क्या, यदि आर्यों के समस्त जन सम्मिलित होकर आयें तो भी मेरा शिरोच्छेद नहीं कर सकते।’ कुलिक ने पशु सींगों से बना त्रिशूल हवा में नचाया।

  – ‘दुष्टमति कुलिक! कर्पास के गोले को उड़ाने के लिये उनचास मरूतों की आवश्यकता नहीं है। मैं अकेला ही तेरे लिये पर्याप्त हूँ।’  आर्य सुरथ ने सम्पूर्ण शक्ति से खड्ग कुलिक पर प्रहार किया जिसे कुलिक ने अपने अस्थि निर्मित त्रिशूल पर रोक लिया।

खड्ग टकराने लगे। भयानक संघर्ष छिड़ गया। दुष्ट यातुधान शत्रु को सिर पर चढ़ आया देखकर मद्य के प्रभाव से उबर आये थे और यथाशक्ति शस्त्र संचालन कर रहे थे। मद्य के प्रभाव से मूर्च्छित यातुधान भी होश में आ-आकर शस्त्र फैंकने लगते थे। भयंकर जटाजूट धारी यति भी उनका भरपूर साथ दे रहे थे। अवसर पाते ही पूषा ने अपने वस्त्र धारण कर लिये।

आर्यवीरों की संख्या कम थी किंतु वे अश्व पर आरूढ़ थे और उनके अस्त्र-शस्त्र भी धातु से निर्मित थे। दोनों दलों के उद्देश्य में भी अंतर था। आर्यवीर प्राणों का मोह त्याग कर लड़ रहे थे और यातुधान प्राणों के मोह में। अतः यातुधान धीरे-धीरे छीजने लगे। उनकी अमंगल हुंकारों का स्थान फिर से चीत्कारों ने ले लिया था।

जिस समय गुहा में  अंतिम यातुधान का शिरोच्छेद किया गया, उषा गगन पथ से उतर कर धरा पर विचरण करने लगा था। पातकी कुलिक यातुधानों की ओट लेकर अपने कुछ यतियों सहित गुहा से भाग निकलने में सफल हो गया। आर्यवीर भगिनी पूषा को ले अपने जन की ओर लौटे।

– अध्याय 16, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] कर्करि एक प्रकार का तंत्री वाद्य था जो वैदिक काल में प्रचलित था।

[2] ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से आई है- आवदंस्त्वं शकुने भद्रमा वद तूष्णीमासीनः सुमतिं चिकिद्धि नः। यदुत्पतन्वदसि कर्करिर्यथा बृहद् वदेम विदथे सुवीराः।। ( 2.  43. 3)

[3] आदि काल से लेकर वैदिक काल तक आर्यों में वीणा का प्रचलन नहीं हुआ था। तब वाण नामक तंत्री यंत्र काम में आता था जिसका स्वरूप बहुत कुछ वीणा से मिलता था।अथर्ववेद में एक ऋचा में कहा गया है- को अस्मिन्रेतो न्यदिधात्त्न्तुरा तायतामिति। मेधां को अस्मिन्न्ध्यौहत्को को बाणं को नृतो दधौ।। अर्थात् किसने मनुष्य में रेत (वीर्य) रखा जिससे उसकी सन्तति बढ़ती जाये, किसने मनुष्य में मेधा स्थापित की, किसने इसे वाण और नृत्य दिये ?

[4] ‘सोभरि’ मंत्र पढ़ने वाले ऋषि को कहते हैं।

[5] ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से आई है-गोभिर्वाणो अज्यते सोभरीणां रथे कोशे हिरण्ये। गोबंधवः सुजातास इषे भुजे महान्तो नः स्परसे नु।। ( 8.  20. 8)

[6] कूटने की मूसल।

[7] दुन्दुभि एक अवनद्ध वाद्य अर्थात् चमड़े से ढंका हुआ वाद्य था।

[8] ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से आई है-यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे। इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः।। ( 1.28.5)

[9] यति शब्द का उल्लेख ऋग्वेद ( 8. 3. 9), तैत्तरीय संहिता ( 6. 2. 7. 5), काठक संहिता ( 8. 5), एतरेय ब्राह्मण ( 35. 2), कौषीतकी उपनिषद् ( 3. 1), अथर्ववेद ( 2. 5. 3) और ताण्ड्य महाब्राह्मण ( 8. 1. 4) में हुआ है। इन संदर्भों के अनुसार यति इन्द्र के शत्रु थे। उन्हें मानवों ने इन्द्र की सहायता से समाप्त किया और उनके शरीर श्रृगालों को खाने के लिये फैंक दिये।

[10] जो अदृश्य उपाय से दूसरे को भ्रम में डाल दे, उसे यातुधान कहते हैं। इसीलिये कालांतर में मायावी राक्षसों को यातुधान कहा गया। जादूगर शब्द की उत्पत्ति भी यातुधान से ही हुई।

[11] ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है कि हमारे धार्मिक समारोह यज्ञ में ‘शिश्नदेव’ न आने पायें। यूरोपीय इतिहासकारों ने शिश्नदेव का अर्थ लिंगोपासक करके द्रविड़ बताया है और कहा है कि द्रविड़ लोग आर्य भूमि में उपद्रव करने इतनी दूर से आते थे, यज्ञ में बाधा डालते थे, अतः ऋग्वेद में आई एक ऋचा में इन्हीं के प्रवेश का विरोध है। ऐसा प्रतीत होता है कि यूरोपीय इतिहासकारों ने लिंगोपासना के आधार पर इन अवांछित लोगों को द्रविड़ मान लिया है जबकि यहाँ यह संकेत असुरों अथवा दैत्यों के लिये भी हो सकता है। रावण भी लिंगोपासक था और सदैव अपने साथ लिंग रखता था। वह द्रविड़ नहीं था, असुर अथवा दैत्य था।

मायावी सरोवर (17)

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मायावी सरोवर

शर्करा के तट से सिंधु नद के विशाल तट तक। मोहेन-जो-दड़ो से नागों के इस अनजाने पुर तक। न कहीं ऐसा देखा, न कहीं ऐसा सुना। लगता था सम्पूर्ण उपवन मायावी विद्या से निर्मित है। ईशान कोण में स्थित मायावी सरोवर से ही आरंभ किया प्रतनु ने।

सूर्योदय हुए काफी विलम्ब हो चुका था जब प्रतनु की आँख खुली। निर्ऋति उसके पास बैठी उसके उठने की ही प्रतीक्षा कर रही थी। कल देर रात्रि तक चलते रहने के कारण वह काफी थक गया था, इस कारण इस समय भी बेसुध होकर पड़ा था। निर्ऋति और उसके साथ की युवतियों ने ही इस लघु प्रासाद में उसके आहार एवं विश्राम की व्यवस्था की थी।

वे ढेर सारा मधु, दुग्ध, और कई तरह के फल आहार के लिये ले आईं। कुछ फल तो ऐसे थे जिनसे प्रतनु पूर्व में परिचित नहीं था। उन्हें खाकर प्रतनु ने परम संतुष्टि का अनुभव किया। ऐसी संतुष्टि अपने जीवन में प्रतनु ने पहले कभी अनुभव नहीं की थी। पर्याप्त श्रम और भरपेट आहार के बाद प्रगाढ़ निद्रा का आना स्वाभाविक था। प्रतनु काफी विलम्ब तक सोता रहा।

सूर्य को आकाश में काफी चढ़ आया देखकर तथा उपवन के पक्षियों को उच्च स्वर में संवादरत देखकर प्रतनु को संकोच हुआ। अपरिचित स्थान पर आश्रय पाये हुए अतिथि को इतने विलम्ब तक नहीं सोना चाहिये। जब वह उपवन के सरोवर में स्नान करने के लिये गया तो आश्चर्य हुआ उसे। रात्रि में दिखाई देने वाली रक्षक युवतियाँ कहीं दिखाई नहीं दीं। साधारण नाग-सेविकाओं की संख्या भी काफी कम थी।

प्रतनु के स्नानादि से निवृत्त होने तक निर्ऋति उसकी सेवा में उपस्थित रही। आहार के लिये रात्रि की ही भांति कुछ दिव्य फल, दुग्ध तथा मधु आदि देकर बिना कुछ कहे निर्ऋति जाने कहाँ चली गयी और उसके स्थान पर हिन्तालिका उसकी सेवा में नियत हो गयी। प्रतनु ने निर्ऋति के स्थान पर हिन्तालिका को आया देखकर पूछा- ‘ तुम्हारी सखि निर्ऋति कहाँ गयी ? तुम कहाँ रहीं रात्रि भर ?’

  – ‘क्यों, क्या रात्रि में मुझे तुम्हारे साथ रहना चाहिये था ?’ हिन्तालिका ने मुस्कान बिखेरते हुए कहा।

  – ‘नहीं-नहीं! मेरा आशय यह नहीं था।’

  – ‘तो फिर क्यों पूछ रहे थे कि मैं रात्रि में कहाँ रही!’

हिन्तालिका की बात का कोई उत्तर नहीं सूझा प्रतनु को। उसने मौन साध लिया।

  – ‘रुष्ट हो गये पथिक!’

  – ‘ नहीं, रुष्ट तो नहीं हुआ।’

  – ‘तो फिर मौन क्यों धारण कर लिया है।’

  – ‘विचार कर रहा हूँ कि अगला प्रश्न पूछूँ अथवा नहीं!’

  – ‘यदि पूछगो नहीं तो जानोगे कैसे ?’

  – ‘जान तो मैं कुछ पूछने पर भी नहीं पाऊंगा। फिर भी तुम्हारे संतोष के लिये पूछ लेता हूँ। क्या तुम बताना चाहोगी कि निर्ऋति कहाँ गयी हैं ?’

  – ‘रानी मृगमंदा की सेवा में।’

  – ‘क्या मैं रानी मृगमंदा के दर्शन कर सकता हूँ।’

  – ‘अवश्य कर सकते हो पथिक।’

  – ‘कब ?’

  – ‘जब रानी मृगमंदा चाहेंगी तब।’

  – ‘रानी मृगमंदा कब चाहेंगी ?’

  – ‘संभवतः शीघ्र ही।’

  – ‘तुम्हें कैसे ज्ञात ?’

  – ‘निर्ऋति यही व्यवस्था करने तो गयी है कि तुम रानी मृगमंदा के दर्शन यथाशीघ्र कर सको।’

काफी समय ऐसे ही व्यतीत हो गया किंतु निर्ऋति लौट कर नहीं आई। प्रतीक्षा को अत्यंत दीर्घ हुआ जानकर थकान हो आई प्रतनु को। समय व्यतीत करने के उद्देश्य से उसने हिन्तालिका के समक्ष प्रस्ताव रखा कि जब तक निर्ऋति आये तब तक उपवन की छटा ही देख ली जाये। हिन्तालिका ने अतिथि के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

शर्करा के तट से सिंधु नद के विशाल तट तक। मोहेन-जो-दड़ो से नागों के इस अनजाने पुर तक। न कहीं ऐसा देखा, न कहीं ऐसा सुना। लगता था सम्पूर्ण उपवन मायावी विद्या से निर्मित है। ईशान कोण में स्थित मायावी सरोवर से ही आरंभ किया प्रतनु ने। यह लघु सरोवर विशाल वापिका [1] के ही सदृश दिखाई देता है जिसके निर्मल जल तक पहुँचने के लिये श्वेत स्फटिक के सोपान हैं।

चारों दिशाओं में रक्ताभ विद्रुम से निर्मित कलात्मक तोरण सुशोभित हैं। चारों कोणों में अष्टकोणीय दीपाधार रखे हैं जिनपर रक्त-अयस निर्मित मनोहारी स्त्री प्रतिमायें स्थापित हैं। वस्तुतः ये प्रतिमायें हीं दीप का कार्य करती हैं जिनके वक्ष स्थल में स्नेहक [2] भरा हुआ है और अंतरिक्ष की ओर प्रणाम की मुद्रा में उठे हस्तयुगल दीप की मायावी वर्तिकायें [3] हैं। इन्हीं वर्तिकाओं से निकलने वाले प्रकाश में विगत रात्रि में प्रतनु ने इस सरोवर की उपस्थिति का आभास किया था।

उपवन के पूर्वी भाग में भांति-भांति के पुष्पों की क्यारियाँ संवारी गयी हैं। प्रतनु ने सैंधव प्रदेश में यव, धान्य, कर्पास और ईक्षु के विशाल खेत तो देखे थे किंतु केवल पुष्पों के खेत उसने यहीं देखे थे जिनके चारों ओर विशाल वृक्ष खड़े थे। हिन्तालिका ने बताया कि आकाश में गर्व से सिर उठाये मद्यसेवित पुरुषों के समान झूमने वाली पंक्तियाँ अशोक की हैं।

प्रतनु ने देखा कि पुन्नाग, [4] शिरीष, अरिष्ट, [5] चंपक, [6] बकुल [7] तथा मल्लिका [8] के अलग-अलग कुंज बहुत ही भव्य दिखाइ्र देते हैं। कुटज,[9]  कुन्द, [10] और सिंधुवार [11] के पुष्पों की क्यारियों की छटा अलग ही है। श्वेत स्फटिक से निर्मित चैकियों को घेर कर खड़े करवीर  [12] के झाड़ों की सुगंध तो मन-मस्तिष्क पर छा जाने वाली है।

उपवन के आग्नेय कोण [13] में वर्तुलाकार घूमने वाले एक विशाल यंत्र को देखकर विस्मित रह गया प्रतनु। एक कूप पर काष्ठ का विशाल चक्र लगा हुआ था जिस पर बहुत लम्बी रज्जु बंधी हुई थी। दो रज्जुओं पर अयस के लघु घट बंधे हुए थे। इन यंत्रों का उद्देश्य समझ नहीं पाया प्रतनु।

हिन्तालिका ने बताया कि जब यह चक्र घुमाया जाता है तो रज्जुओं पर बंधे घट कूप में जाते हैं और वहाँ से जल भरकर बाहर आ जाते हैं। जब चक्र से लिपटी रज्जुओं से बंधे ये घट चक्र के उच्चतम बिन्दु तक पहुँचते हैं तो वहाँ से पुनः नीचे लौटने लगते हैं। इसी क्षण उनकी दिशा बदल जाने के कारण वे स्वतः खाली हो जाते हैं। घटों से निःसृत जल नालिका में प्रवाहित होने लगता है।

इस विवर में कोई नदी अथवा जल-प्रपात नहीं होने से कूप से ही जल प्राप्त किया जाता है। ईशान कोण में बने सरोवर में इसी यंत्र के माध्यम से जल पहुँचाया जाता है। सरोवर से लघु जल वितरिकायें निकलती हैं जिनसे होकर जल उपवन की क्यारियों और वृक्षों तक पहुँचता है।

उपवन की ऐसी जल व्यवस्था को देखकर प्रतनु के आश्चर्य का पार न था। सैंधव प्रदेश के पुर नदी-तटों पर स्थित होने से वहाँ इस तरह के कूपों की आवश्यकता नहीं होती। न ही यव, धान्य, और कर्पास आदि के खेतों में अलग से जल पहुँचाने की आवश्यकता होती है। खेतों की जल सम्बन्धी आवश्यकता का कार्य केवल वरुण देव की कृपा पर छोड़ दिया गया है जो अपने मेघ-रथों में बैठकर आते हैं और खेतों में जल बरसाते हैं।

इसी वरुण को लेकर कितने युद्ध हो चुके हैं असुरों और देवों में। जब असुर वृत्र वरुण को बंधक बनाने में सक्षम हो गया तब देवों के बलशाली नायक इंद्र ने वृत्र का ही वध कर दिया। तब से तो दोनों संस्कृतियों के बीच की शत्रुता स्थायी हो गयी। महाप्लावन के पश्चात् देवलोक नष्ट हो गया किंतु वह शत्रुता आर्यों और असुरों के मध्य स्थानांतरित हो गयी। यहाँ तक कि उसका प्रसार अन्य सभ्यताओं तक भी हो गया। आज आर्य-जन भी सैंधवों से इस लिये वैमनस्य रखते हैं कि सैंधव देवों की भांति अग्नि को न पूजकर असुरों की भांति वरुण को पूजते हैं।

  – ‘एक मायावी दृश्य देखोगे ?’ हिन्तालिका ने प्रतनु के विचारों का प्रवाह भंग किया।

  – ‘मायावी दृश्य ?

  – ‘हाँ मायावी दृश्य। देखो उधर देखो।’ हिन्तालिका ने प्रतनु से ईशान कोण में देखने का संकेत किया।

आश्चर्य से स्तंभित और निर्वाक् होकर रह गया प्रतनु। उसे अपने नेत्रों पर विश्वास नहीं हुआ। कुछ क्षण पहले जिस सरोवर में उसने नीलमणि सदृश अतुल जलराशि को लहराते देखा था। वह पूरी तरह रिक्त था और कुछ भीमकाय नाग पाताल फोड़कर सरोवर के पैंदे में से प्रकट हो रहे थे। उनके हाथों में भांति-भांति के अस्त्र-शस्त्र थे।

  – ‘कौन लोग हैं ये ? कहाँ से चले आ रहे हैं ? विचलित हो उठा प्रतनु।’

  – ‘ये नाग प्रहरी हैं, हमारे अनुचर।’

  – ‘क्या ये सरोवर के जल में रहते हैं ?’

  – ‘सरोवर के जल में नहीं। सरोवर के नीचे बने विवर में। इन्हें आपात्काल के लिये हर क्षण सन्नद्ध रखा जाता है ताकि किसी शत्रु का आक्रमण होने पर इनकी सेवायें तत्काल ली जा सकंे।’

  – ‘क्या कोई आपात् काल उपस्थित हो गया है ?’

  – ‘नहीं कोई आपात्काल नहीं, इन्हें तो मैंने तुम्हारे मनोरंजन के लिये उपस्थित किया है।’

  – ‘तुम तो मेरे साथ वार्तालाप में संलग्न हो। फिर तुमने कैसे इन्हें यहाँ उपस्थित होने का आदेश दिया हिन्तालिका ?’

  – ‘इन्हें सांकेतिक आदेश दिया जाता है। इस चक्र पर बंधी गोपनीय रज्जु के माध्यम से।’ हिन्तालिका ने चकक्राधार पर बंधी एक क्षीण किंतु मजबूत रज्जु को हिलाकर दिखाते हुए कहा- ‘जब इस रज्जु को हिलाया जाता है तब सरोवर के नीचे बने गोपनीय विवर में सांकेतिक घण्टिकायें स्वतः ही बज उठती हैं। जिन्हें सुनकर नाग प्रहरी विवर में बने चक्र को घुमाते हैं जिससे सरोवर का समस्त जल तुरंत नालिकाओं में प्रवाहित हो जाता है और सरोवर का तल एक तरफ हट जाता है। कुछ ही क्षणों में नाग प्रहरी प्रकट हो जाते हैं। पुर के भीतर अचानक घुस आये शत्रु को ये नाग प्रहरी सरलता से अपने अधीन कर लेते हैं।’

  – ‘तुमने मुझे इस गोपनीय व्यवस्था का भेद दिया है। यदि मैं ही तुम्हारा शत्रु होऊं तो तुम्हारी यह व्यवस्था निरर्थक सिद्ध हो जायेगी।’

  – ‘हमारे शत्रु इतने सुकोमल नहीं हैं। वे अत्यंत कठोर दृढ़ और बलशाली हैं। यही कारण है कि हमें अपने शत्रुओं की पहचान है।’

  – ‘कौन हैं तुम्हारे शत्रु ?’

  – ‘गरूड़! इसी पर्वतीय क्षेत्र में उनके बहुत से पुर हैं। शताब्दियों से नागों और गरूड़ों में वैर रहा है।  वे ही अवसर पाकर हम पर आक्रमण करते रहते हैं। उन्हीं से बचने के लिये हमने इस मायावी पुर की व्यवस्था की है।’

  – ‘क्यों ? क्या नाग प्रजा सम्मुख युद्ध में गरुड़ों का सामना नहीं कर सकती ?’

  – ‘अवश्य कर सकती है किंतु हम शांति चाहते हैं। युद्ध को व्यर्थ, हेय और अनिष्टकारक समझते हैं।’

  – ‘युद्ध को व्यर्थ, हेय और अनिष्टकारक समझना तो शत्रु को प्रबल बनाने जैसा है।’ असमंजस में पड़ गया प्रतनु। कहने को तो उसने कह दिया किंतु ठीक यही चिंतन तो सैंधववासियों का भी है। वे भी तो युद्ध को सर्वथा त्याज्य समझते हैं।

  – ‘तुम्हारा कथन सही है किंतु हमारा मानना है कि किसी भी उपाय से यदि युद्ध से बचा जा सकता है तो उससे बचना चाहिये।’

  – ‘यदि गरुड़ तुम्हें अधीन बनाना चाहें तब भी क्या नाग-प्रजा युद्ध से बचने के लिये उनकी अधीनता स्वीकार कर लेगी ?’

  – ‘नहीं! सदा से स्वतंत्र रहे नाग किसी के आधीन होकर नहीं रह सकते। ऐसी स्थिति में हम युद्ध करना और रणक्षेत्र में जूझ मरना अधिक श्रेयस्कर समझते हैं। तुम नहीं जानते पथिक! गरुड़ों से होने वाले युद्धों में शताब्दियों से कितने नागों ने अपने प्राण गंवाये हैं।’

विचित्र था नागों का यह चिंतन किंतु प्रतनु को अच्छा लग रहा था। सैंधव भी युद्धों को निरर्थक समझते हैं, युद्धों से बचना चाहते हैं किंतु कितना अंतर है दोनों में! सैंधव सम्मुख युद्ध से बचने के लिये शत्रु की प्रतीकात्मक अधीनता स्वीकार कर लेते हैं। शत्रु का प्रतिरोध नहीं करते। तभी तो सैंधवों ने अस्त्र-शस्त्र नहीं बनाये।

संभवतः यही कारण है कि असुर सैंधवों को अपना शत्रु नहीं मानते तथा आक्रमण नहीं करते किंतु यह भी तो हो सकता है कि सैंधवों ने असुरों की अधिकांश बातों को स्वीकार कर लिया है इसलिये वे मित्रवत् आचरण करते हैं। यह भी संभव है कि असुर आर्यों को प्रबल शत्रु जानकर उनमें ही इतने उलझे हुए रहते हैं कि वे बलहीन सैंधवों की ओर देखने की आवश्यकता नहीं समझते। फिर भी असुर जब चाहे सैंधवों के पुरों में घुस ही आते हैं तथा मांस एवं मद्य पाये बिना पुनः नहीं लौटते।

  – ‘रुक क्यों गये पथिक ?’ हिन्तालिका ने प्रतनु के विचारों का प्रवाह भंग किया।

  – ‘क्या तुम मुझे सदैव पथिक कह कर ही सम्बोधित करोगी।’

  – ‘तुम ही बताओ क्या कह कर सम्बोधित करूं ?’

  – ‘प्रतनु कह सकती हो तुम मुझे।’

  – ‘प्रतनु!’ दोहराया हिन्तालिका ने।

  – ‘ हाँ प्रतनु।’

  – ‘प्रतनु का अर्थ क्या होता है ?’

  – ‘क्या हिन्तालिका का कोई अर्थ होता है ?’ प्रतनु ने उलट कर प्रश्न किया।

  – ‘इस पर्वतीय प्रदेश में ताड़ सदृश एक क्षीणकाय वृक्ष होता है जिसे हिन्ताल कहते हैं, मैं बचपन में बहुत क्षीणकाय थी इसलिये मेरा नाम हिन्तालिका रखा रखा गया। अब बताओ प्रतनु का क्या अर्थ होता है?’

आश्चर्य में पड़ गया प्रतनु। सैंधवों और नागों की दो नितांत भिन्न और असंपृक्त संस्कृतियाँ होते हुए भी नाम रखने के पीछे का चिंतन बिल्कुल एक जैसा था। जहाँ हिन्तालिका का अर्थ भी क्षीणकाय था वहीं प्रतनु का भी तो यही अर्थ था। प्रतनु हिन्तालिका को कुछ उत्तर देता इससे पहले ही निर्ऋति ने आकर बाधा दी- ‘चलिये पथिक महाशय, रानी मृगमंदा ने आपको स्मरण किया है।’

– अध्याय 17, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] बावड़ी।

[2] तेल

[3] बत्ती

[4] एक बड़ा सदाबहर वृक्ष, जायफल

[5] रीठे का पेड़

[6] चम्पा

[7] मौलसिरी

[8] बेला

[9] इंद्रयव, कुरैया का वृक्ष

[10] जूही के समान श्वेत पुष्पों वाला पौधा।

[11] निर्गुण्डी।

[12] श्वेत कनेर के समान पुष्पों वाली झाड़ी

[13] पूर्व और दक्षिण दिशाओं के मध्य स्थित कोण

विचित्र स्वप्न (18)

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विचित्र स्वप्न

ऋषिश्रेष्ठ ने विचित्र स्वप्न देखा कि एक वृक्ष है जिसकी शाखा पर दो पक्षी बैठे हैं। पहला पक्षी फल खा रहा है और दूसरा पक्षी देख रहा है। हर काल खण्ड में पहला पक्षी ही फल खा रहा है। जबकि किसी भी काल खण्ड में दूसरा पक्षी कुछ नहीं खा रहा।

पर्ण शैय्या पर लेटते ही ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने अपने नेत्र बंद कर लिये। जाने क्यों आज उन्हें निद्रा नहीं आ रही! आर्या स्वधा के प्रश्नों ने उन्हें विचलित कर दिया है। क्या सचमुच भविष्य इतना भयावह होगा! क्या भविष्य की उस भयावहता को आमंत्रित करने में उनकी भी कोई जिम्मेदारी निश्चित की जायेगी! यदि भविष्य बुरा है तो क्या उसके लिये वर्तमान उत्तरदायी नहीं है!

ऋषि श्रेष्ठ के मस्तिष्क पटल पर विभिन्न प्रकार के विचार दृश्यमान होकर आरोहित एवं तिरोहित होने लगे। एक द्वंद्व है जो भीषण झंझावात की तरह उनके मन-मस्तिष्क को मथे दे रहा है। काफी देर तक वे अपने भीतर के संघर्ष को जीतने का प्रयास करते रहे। इसी चेष्टा में जाने कब उनकी आँख लगी और विचारों की शृंखला चित्रित होकर विचित्र स्वप्न में मूर्तिमान होने लगी।

उन्होंने देखा कि वे स्वयं अंतरिक्ष में उड़े जा रहे हैं। उड़ते-उड़ते भविष्य लोक में जा पहुँचे हैं। यह कौनसा लोक है, वे विचार करते हैं। भविष्य के नाम से तो कोई लोक नहीं ! भविष्य तो काल का प्रवाह मात्र है। उसमें घटित होने वाली घटनायें किसी लोक में सुरक्षित नहीं रहतीं कि उन्हें जब चाहे काल की पर्त उखाड़ कर देख लिया जाये।

निश्चित ही यह भविष्य लोक नहीं भूत लोक है। यहाँ तो वही सब-कुछ घटित हो रहा है जिसे वह पहले भी देख चुके हैं। थोड़ा और उड़ने पर उन्होंने देखा कि यह न तो भविष्य लोक है और न भूत लोक ही। वे तो वर्तमान में ही विचरण कर रहे हैं। कैसा भ्रम है यह! टूटता क्यों नहीं!

ऋषिश्रेष्ठ ने देखा कि तीनों लोकों में उन्होंने एक ही दृश्य को बार -बार घटित होते हुए देखा है। एक वृक्ष है जिसकी शाखा पर दो पक्षी बैठे हैं। पहला पक्षी फल खा रहा है और दूसरा पक्षी, पहले पक्षी से लिपटा हुआ है। हर काल खण्ड में पहला पक्षी ही फल खा रहा है। जबकि किसी भी काल खण्ड में दूसरा पक्षी कुछ नहीं खा रहा।

ऋषिश्रेष्ठ को लगा कि वे इस दृश्य से अच्छी तरह परिचित हैं। बार-बार वे यही दृश्य देखते रहे हैं। नहीं-नहीं। बार-बार नहीं। वे तो आज तक केवल यही दृश्य देखते रहे हैं। यही तो वह दृश्य है जिससे उनकी आँखें कभी हटती नहीं। किंतु इस दृश्य का अर्थ क्या है ? विचलित हो उठते हैं ऋषिश्रेष्ठ।

मस्तिष्क से सम्मोहन की काई हटती है। ऋषिश्रेष्ठ के नेत्र खुलते हैं। वे किसी अन्य लोक में नहीं, वे तो अपनी पर्णशाला में, अपनी शैय्या पर हैं। अभी कुछ ही दिवस पूर्व तो प्रातःकालीन सभा में उन्होंने जीव और ब्रह्म का निरूपण दो कालजयी पक्षियों के रूपक में बांधकर किया था।

जीव और ब्रह्म उन दो पक्षियों के समान हैं जो एक ही वृक्ष पर बैठे हैं किंतु उनमें भेद यह है कि जीव रूपी पक्षी कर्म रूपी वृक्ष पर उत्पन्न फल का भक्षण करता है जबकि ब्रह्म कर्म और उसके फल दोनों से निर्लिप्त रहता है।[1] रूपक पर मनन करते हुए सम्मोहन की काई पुनः मस्तिष्क पर छा जाती है।

ऋषिश्रेष्ठ पुनः अपने आप को उन्हीं तीनों लोकों में विचरण करता हुआ पाते हैं। पता नहीं वे भूत, भविष्य अथवा वर्तमान के किस कालखण्ड में हैं! इस बार ऋषि ने देखा कि सोम रहित यज्ञों की आहुतियों से समस्त देवगण क्षीण हो गये हैं। असुर से देव बने वरुण में पुनः आसुरि भाव प्रकट होने लगा है।

ऋषि ने देखा कि ईक्ष्वाकु अंबरीष पुत्र प्राप्ति के लिये देवों की स्तुति कर रहा है किंतु देवगण उसे पुत्र देने में असमर्थ हैं। ऋषि वशिष्ठ अंबरीष को पुत्र प्राप्ति के लिये वरुण की उपासना करने के लिये कह रहे हैं। इक्ष्वाकु अंबरीष के आह्वान पर वरुण प्रकट हुआ है। अपने समक्ष प्रकट हुए वरुण से अंबरीष ने पुत्र प्रदान करने की प्रार्थना की है। वरुण ने ईक्ष्वाकु अंबरीष को पुत्र प्राप्ति का अनुष्ठान तो बताया है किंतु अनुष्ठान से उत्पन्न होने वाले पुत्र को ही बलिभाग के रूप में मांग लिया है।[2]

ऋषि सौम्यश्रवा ने देखा कि पुत्र का मुँह देखने के लोभ में अंबरीष ने वरुण की शर्त स्वीकार कर ली है। जब वरुण को ज्ञात हुआ कि अंबरीष की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया है तो वह बलिभाग लेने के लिये उपस्थित हो गया है। अंबरीष ने वरुण से प्रार्थना की है कि वह उसके पुत्र की बलि न ले किंतु वरुण अपने हठ पर दृढ़ है। वह बार-बार अंबरीष के पास आता है और बलिभाग की मांग करता है। अंबरीष किसी न किसी उपाय से वरुण को बार-बार लौटा रहा है।

ऋषि सौम्यश्रवा ने देखा कि अंबरीष का पुत्र रोहित सोलह वर्ष का हो गया है। वरुण फिर अंबरीष के समक्ष प्रकट होकर बलिभाग मांग रहा है। रोहित ने वरुण को अपने पिता अंबरीष से झगड़ते हुए सुन लिया है। रोहित ने अपने पिता से कहा है कि वह एक यज्ञ करना चाहता है जिसमें वरुण को यज्ञ पशु बनाकर विष्णु को बलिभाग देगा। इस पर तो वरुण और भी क्रुद्ध हो गया है।

ऋषि सौम्यश्रवा ने देखा कि वरुण के कोप से बचने के लिये अंबरीष ने रोहित को गहन वन प्रांतर में छिपा दिया है। वहां उसकी भेंट ऋषि अजीगर्त तथा उसके परिवार से हुई है। ऋषि परिवार को आश्चर्य हुआ है कि किस कारण से अल्पवयस् आर्य कुमार वन प्रांतर में आ छिपा है।

रोहित आद्योपरांत समस्त विवरण ऋषि परिवार को सुनाता है जिसे सुनकर ऋषि परिवार को रोहित पर करुणा आई है। ऋषि अजीगर्त के तीन पुत्र हैं- शुनःपुच्छ, शुनःशेप और शुनोलांगूल। मध्यम पुत्र शुनःशेप रोहित की ही वयस् का है। उसने अपने पिता अजीगर्त से अनुरोध किया है कि क्यों नहीं मैं रोहित के स्थान पर यज्ञबलि बनकर वरुण को संतुष्ट करूं ! पिता ने जो कि ऋषि है, रोहित के प्राणों की रक्षा के लिये अपने पुत्र को यज्ञपशु बनने की अनुमति दे दी है।

अब ऋषि सौम्यश्रवा ने देखा कि शुनःशेप वरुण से प्रार्थना कर रहा है कि वह रोहित के स्थान पर मेरी बलि ले क्योंकि रोहित अपने पिता का एक ही पुत्र है जबकि मेरे दो भाई और भी हैं। वरुण ने शुनःशेप का अनुरोध स्वीकार कर लिया है।

रोहित शुनःशेप को लेकर अपने पिता अंबरीष के पास आता है और कहता है कि शुनःशेप रोहित के स्थान पर यज्ञपशु बनने के लिये तैयार है। आर्य श्रेष्ठ अंबरीष ने ऋषिकुमार शुनःशेप का प्रस्ताव यह कहकर अस्वीकार कर दिया है कि इससे कहीं अधिक श्रेयस्कर तो यह है कि मैं अपने ही पुत्र की बलि देकर वरुण को संतुष्ट करूं। इस पर ऋत्विज विश्वामित्र, जमदाग्नि, वसिष्ठ तथा अयास्य अंबरीष को समझा रहे हैं कि अग्नि की कृपा से कोई न कोई हल निकल आयेगा और बिना नरबलि के ही यज्ञ संपन्न होगा।

अतः यज्ञ आरंभ किया जाये। ऋषि सौम्यश्रवा ने देखा कि ईक्ष्वाकुओं के पुरोहित वसिष्ठ यज्ञ के होता बने हैं। विश्वामित्र, जमदाग्नि और अयास्य आदि ऋत्विज मंत्रोच्चार के साथ आहुतियाँ दे रहे हैं। ईक्ष्वाकु अंबरीष ने सौ गौएं ऋषि अजीगर्त को अर्पित कीं हैं। शुनःशेप को बलियूप से बांध दिया गया है। यज्ञ की बढ़ती हुई अग्नि को देखकर लाल वस्त्रों से बंधा शुनःशेप कातर हो उठा है किंतु वरुण को करुणा नहीं आई है।

यज्ञ मण्डप में अग्नि की प्रबल लपटों के बीच ऋषि सौम्यश्रवा ने देखा कि अभिषेचनीय एकाह सोमयाग[3] में नरपशु[4] का आलंभन[5] करने के लिये कोई ऋषि तैयार नहीं हुआ है। रोहित के कल्याणार्थ ऋषि अजीगर्त स्वयं अपने हाथों से अपने पुत्र का आलंभन करने के लिये खड़े हुए हैं। अंबरीष ने ऋषि अजीगर्त को सौ गौएं और प्रदान कीं हैं। जन्मदाता पिता को ही पुत्र की मृत्यु का आह्वान करते देख शुनःशेप चीत्कार करने लगा है।

विश्वामित्र ने शुनःशेप के प्राणों को बचाने के लिये अपने पुत्र मधुच्छंदा को आज्ञा दी है कि वह यज्ञ पशु बन जाये। मधुच्छंदा के अस्वीकार कर देने पर ऋषिश्रेष्ठ ने अपने अन्य पुत्रों का आह्वान किया है किंतु कोई भी ऋषिपुत्र अपने प्राण देने पर सहमत नहीं हुआ है। इस पर क्रुद्ध विश्वामित्र ने अपने पुत्रों को श्राप दिया है कि वे भी वसिष्ठ के पुत्रों की तरह चाण्डाल बनकर एक सहस्र वर्ष तक पृथ्वी पर कुत्तों का मांस खायें।

विश्वामित्र, वसिष्ठ, जमदाग्नि तथा अयास्य आदि समस्त ऋत्विज करुणा से विगलित हो प्रजापति, अग्नि, सविता, वरुण तथा इंद्र से शुनःशेप के प्राणों की रक्षा के लिये प्रार्थना कर रहे हैं। ऋषि विश्वामित्र के आदेश से स्वयं शुनःशेप भी प्रजापति, अग्नि, सविता, वरुण, विश्वदेव, उषा, इंद्र तथा अश्विनीकुमारों की बार-बार स्तुति कर रहा है।

ऋषि सौम्यश्रवा ने देखा कि शुनःशेप के आह्वान पर अग्नि आदि नौ देव प्रकट हुए हैं। अग्नि ने शुनःशेप को ओज प्रदान किया है। इन्द्र ने शुनःशेप को हिरण्यमय रथ दिया है। समस्त देवों को द्रवित हुआ देखकर वरुण का आसुरि भाव स्वयं नष्ट हो गया है। उसने शुनःशेप को दीर्घायु होने का वरदान देकर बलियूप से मुक्त कर दिया है।

ऋषि सौम्यश्रवा ने देखा कि शुनःशेप तो बलियूप से मुक्त हो गया है, रोहित के भी प्राण बच गये हैं किंतु आर्यों के शांत जीवन में भयानक हलचल मच गयी है। एक अत्यंत वीभत्स प्रसंग आर्यों के समक्ष उत्पन्न हो गया है। एक ओर तो ऋषि विश्वामित्र के पुत्र स्वयं को वीभत्स श्राप से ग्रस्त हुआ जानकर पिता को घृणा और क्रोध से देख रहे हैं और दूसरी ओर शुनःशेप भी अपने पिता से विरक्त हो चुका है। पिता और पुत्रों के मध्य ऐसी घृणा, ऐसा वैमनस्य और ऐसा दृष्टि विनिमय आर्यों में पहले कभी नहीं देखा गया।

यज्ञ यूप से मुक्त हुए शुनःशेप को ऋषि अजीगर्त ने गले लगाना चाहा है तो शुनःशेप ने उन्हें अपना पिता मानने से अस्वीकार कर दिया है। उसने कहा है कि आपने मेरे बदले में दो सौ गौएं प्राप्त कर ली हैं अब आप मेरे पिता नहीं रहे। ऋषि अजीगर्त कहते हैं कि मैंने अंबरीष के पुत्र की प्राणरक्षा के लिये तेरी बलि देने का निश्चय किया न कि गौओं की प्राप्ति के लोभ से। इस पर शुनःशेप ऋत्विजों से ही प्रश्न कर रहा है कि आप ही बतायें कि मेरे पिता कौन हैं जबकि जनक ने अपने हाथों से मुझे बलियूप से बांध दिया हो और मेरे वध के लिये कुठार लेकर प्रस्तुत हुआ हो ?

शुनःशेप के प्रश्न पर ऋषियों में विवाद छिड़ गया है। ऋषियों का मानना है कि गौओं के बदले शुनःशेप को प्राप्त करने के कारण अंबरीष ही शुनःशेप का पिता है। शुनःशेप अंबरीष को यह कह कर पिता मानने से अस्वीकार कर देता है कि अंबरीष ने उसे पालन हेतु नहीं प्राप्त किया था अपितु बलि देने के लिये क्रय किया था।

ऋषि सौम्यश्रवा ने देखा कि शुनःशेप पुनः ऋिषियों से कह रहा है कि विश्वामित्र ने मंत्र देकर, अग्नि ने ओज देकर और इंद्र ने हिरण्यमय रथ देकर मेरे प्राणों की रक्षा की है। इनमें से किसी एक को वह अपना पिता स्वीकार कर सकता है किंतु इनमें से पिता होने का वास्तविक अधिकारी कौन है ? अंत में वसिष्ठ ने निर्णय दिया है कि मंत्र से ही शुनःशेप के प्राण बचे हैं इसलिये मंत्रदृष्टा विश्वामित्र ही शुनःशेप के पिता होने के अधिकारी हैं। शुनःशेप विश्वामित्र के अंक में जाकर बैठ गया है।

ऋषि सौम्यश्रवा के मानस पटल से सम्मोहन की काई पुनः तिरोहित होती है। वे छटपटा कर नेत्र खोल देते हैं। यह कैसा स्वप्न है! इसका क्या अर्थ है! यह भूत है कि भविष्य! उनके समस्त प्रश्न अनुत्तरित हैं। पर्णशाला के बाहर तरुशाखाओं पर पक्षी चहचहाने लगे हैं। पृथ्वी पर उषा का आगमन हो चुका है।

– अध्याय 18, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] मिश्र के एक पिरामिड से मिट्टी की एक मुद्रा प्राप्त हुई है। यह लगभग 5000 वर्ष प्राचीन है। इस मुद्रा पर किसी वृक्ष की एक शाखा अंकित है जिस पर दो पक्षी बैठे हैं। एक पक्षी फल खा रहा है और दूसरा पक्षी उसे देख रहा है। मुण्डकोपनिषद के तीसरे मुण्डक के प्रथम खण्ड में भी इसी तरह का एक वर्णन है जिसमें कहा गया है कि सुन्दर पंखों वाले, साथ रहने वाले दो सहचर पक्षी समान वृक्ष पर रहते हैं, उनमें से एक स्वादिष्ट फल खाता है और दूसरा बिना खाये देखता रहता है। इनमें से पहला पक्षी जीव है जो कर्मफल का भोग करता है तथा दूसरा पक्षी ब्रह्म है जो इस भोग का साक्षी है।

[2] यह आख्यान ऋग्वेद ;1. 24 . 12. 13, 1. 24 – 30, 2. 2. 4. 20, 5. 2. 7, 6. 15. 47, 9.3), ऐतरेय ब्राह्मण (5/13-18), बाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड 61.1 – 24, 62.1-28), ब्रह्मपुराण (150।-, 104।-), महाभारत (दानधर्म पर्व, 93.21 – 145,94) आदि ग्रंथों में कुछ अंतर के साथ प्राप्त होता है।

[3] पशुबलि युक्त यज्ञ में पशुबलि देते समय किया जाने वाला कर्मकाण्ड।

[4] बलि-पशु रूपी नर।

[5] वध।

अमल-धवल प्रासाद (19)

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अमल-धवल प्रासाद

प्रतनु ने विशाल अमल-धवल प्रासाद में प्रवेश किया। मोहेन-जो-दड़ो के जिस विशाल और समृद्ध पशुपति महालय को देखकर प्रतनु ने दांतो तले अंगुलि दबा ली थी, वह महालय इस प्रासाद की भव्यता और विशालता के सामने कुछ भी नहीं था। प्रासाद के गगनोन्नत तोरण द्वार में प्रवेश करने के पश्चात् प्रतनु को विस्तृत प्रांगण दिखाई पड़ा। शीत-श्वेत-सुचिक्कण स्फटिक से निर्मित प्रांगण की धरती पर प्रतनु के पांव फिसले पड़ रहे हैं। बहुत संभल कर चलना पड़ रहा है प्रतनु को अन्यथा किसी भी क्षण गिर पड़ने का भय है।

अमल-धवल प्रासाद के प्रांगण को पार करके वह मण्डप सदृश भवन में पहुँचा। मण्डप का नयनाभिराम शिल्प अकल्पनीय, अवर्णनीय और अचिंतनीय है। इस गोलाकर भवन की भित्तियाँ एक विशाल वर्तुलाकार कक्ष का निर्माण कर रही हैं वहीं उसकी छत ऊपर से निरंतर संकीर्ण होते जाते स्फटिक वलयों से निर्मित है।

प्रतनु ने अनुमान किया कि बाहर से दिखाई देने वाले शिखर का आधार यही मण्डप है। इस विशाल मण्डल की समाप्ति हुई एक और भव्य मण्डप में। इसकी भव्यता प्रथम मण्डप की अपेक्षा सहस्र गुणा अधिक है। मण्डप की वलयाकार भित्तियों के आधार भाग में विभिन्न पशु-पक्षियों की प्रतिमायें उत्कीर्ण हैं। कुछ प्रतिमाओं में उत्कीर्ण पशु-पक्षी प्रतनु ने पहले कभी नहीं देखे हैं, न ही उनके बारे में कुछ सुना है।

मण्डप की वलयाकार भित्तियों के मध्य भाग में निर्मित प्रतिमायें नाग प्रजा के भोग-विलास, समृद्धि और आनंद की परिचायक हैं। अनेक प्रतिमाओं में नाग स्त्री-पुरुष विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र बजाते हुए दर्शाये गये हैं। हिन्तालिका और निर्ऋति ने इन वाद्ययंत्रों का परिचय प्रतनु को दिया। इनमें से कई वाद्ययंत्र ऐसे थे जिनके बारे में प्रतनु ने पहली बार जाना था। कई तरह के सुषिर वाद्य। जिन्हें प्रतनु ने सैंधवों के पास नहीं देखा था। तत् वाद्यों की तो भरमार ही थी। अवनद्ध वाद्यों की भी कोई गिनती नहीं थी। जाने

कौन-कौन से वाद्य! घनवाद्यों में भी कई विचित्र वाद्य उत्कीर्ण किये गये थे। इनका अंकन इतनी कुशलता से किया गया था मानो अभी रंगशाला जीवित हो उठेगी और समस्त वाद्य एक साथ बज उठेंगे।

प्रतनु ने देखा कि विभिन्न मुद्राओं में नृत्यरत नाग स्त्री-पुरुषों के अंग-प्रत्यंग नृत्य भंगिमओं से एकाकार हो गये प्रतीत होते हैं। कितनी ही तरह के नृत्य, कितनी ही तरह की मुद्रायें, कितनी ही तरह की भाव-भंगिमायें, कोई पार ही नहीं है। कुछ नाग युगल मिथुनावस्था में उत्कीर्ण हैं। मिथुन की भी शत-शत भंगिमायें।

कहीं कोई नाग अपनी प्रेयसी को अंक में लिये बैठा है तो कहीं किसी नाग कन्या के अंगों से सौंदर्य का झरना ही फूटा पड़ रहा है। कुछ मिथुन मूर्तियों में उत्कीर्ण नाग युगलों का अधोभाग सर्प की पुच्छ के सदृश उत्कीर्ण किया गया है। कामक्रीड़ा और मनोविनोद में संलग्न इन प्रतिमाओं को देखकर नागों के जीवन में छाये उल्लास, उमंग और रंगों का अनुमान लगाना कितना सहज है। शताब्दियों से गरुड़ों से जूझते आ रहे नाग इतने प्रसन्न और उल्लसित कैसे रह लेते हैं! प्रतनु ने अपने आप से प्रश्न किया।

एक स्फटिक पट्टिका पर नागकन्याओं को सरोवर में स्नान करते हुए अंकित किया गया है। अनेक नागकन्याओं के मध्य घिरी हुई मदमत्त हस्तिनी सी उल्लसित और निर्भय दिखाई देने वाली एक नागकन्या अपनी सुवलयाकार गौरांग भुजाओं से जलराशि को आकाश में उछाल रही है।

आकाश में उछले हुए जलबिन्दुओं को देखती हुई नागकन्या अपने मत्स्याकार नेत्रों को इस प्रकार आकाश की ओर उठाये हुए है मानो कोई मीन युगल आकाश से टपकने वाले स्वाति-जल की अभिलाषा में मुख खोले खड़ा हो। नागकन्याओं की केशराशि में अटके हुए जलबिंदु ऐसे जान पड़ते हैं मानो अब टपके, अब टपके।

जलराशि को आकाश में उछालने के क्रम में आकाश में ऊपर को उठी गौरांग भुजाओं के मध्य दो सुविस्तृत सुचिक्कण वलयों पर आ बैठे जलबिन्दु ऐसे दिखाई देते हैं मानो उनमें गौरांग देह के स्पर्श हेतु प्रतिस्पर्धा मची हो। नागकन्या के क्षीण कटि प्रदेश का कुछ भाग जल से बाहर निकला हुआ है। जलराशि के झीने आवरण में अंकित मनोहारी नाभि सृष्टि के सृजन केन्द्र की भांति प्रतीत होती है। नीचे का भाग नीलमणि जलराशि में डूबा हुआ है।

  – ‘किसकी प्रतिमा है यह ?’ प्रतनु ने निकट खड़ी निऋति से प्रश्न किया।

  – ‘नाग कन्याओं के जल विहार की।’ निर्ऋति ने मुस्कुराकर उत्तर दिया।

  – ‘केन्द्र में उत्कीर्ण नागकन्या कौन है ?’

  – ‘यह तो मैं हूँ। इतना भी नहीं पहचान सकते!’ हिन्तालिका बोली।

  – ‘नहीं-नहीं यह तो मैं हूँ। शिल्पी ने मेरा ही अंकन किया है।’ निर्ऋति ने कहा। दोनों नागकन्यायें एक दूसरे को भेदभरी मुस्कान से देख रही हैं, यह देखकर प्रतनु ने अनुमान किया कि यह प्रतिमा इन दोनों में से किसी की नहीं है। यह सही है कि निर्ऋति और हिन्तालिका अनुपम सुंदरियाँ हैं किंतु इनकी तुलना प्रतिमा में अंकित सौंदर्य से नहीं हो सकती। किंतु मुखाकृति ? विस्मय में पड़ गया प्रतनु!

प्रतिमा की मुखाकृति कुछ-कुछ निर्ऋति से और कुछ-कुछ हिन्तालिका से मिल रही है। सचमुच ही यह तो इन दोनों में से ही किसी की प्रतिमा है किंतु किसकी ? नहीं-नहीं यह प्रतिमा इन दोनों में किसी से मेल नहीं खाती। हो न हो यह रानी मृगमंदा की प्रतिमा हो किंतु इसे ये दोनों अपनी क्यों बता रही हैं। कोई न कोई रहस्य अवश्य है किंतु क्या ? समझ नहीं सका प्रतनु।

  – ‘किस संशय में पड़ गये पथिक ?’

  – ‘सोच रहा हूँ कि क्या दो युवतियों की एक ही प्रतिमा बन सकती है।’ प्रतनु का संशय सुनकर दोनों नागकन्यायें खिलखलाकर हँस पड़ी।

  – ‘केवल दो युवतियों की ही नहीं, एक युवती और भी है जो इस प्रतिमा को अपनी बताती है।’ निऋति ने भेदभरी मुस्कान अपनी बड़ी-बड़ी आंखों में छिपा कर कहा।

  – ‘तीसरी युवती कौन सी है ?’

  – ‘वह स्वयं ही आपसे कहेगी कि यह प्रतिमा उसकी है।’ निऋति ने प्रतनु को आगे बढ़ने का संकेत किया।

– अध्याय 19, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

आर्य सुरथ का चिंतन (20)

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आर्य सुरथ का चिंतन

जनपदों की संगठित शक्ति न केवल असुरों से अपनी रक्षा करने में समर्थ होगी अपितु असुरों का दमन भी कर सकेगी। इन्हीं विचारों में डूबते उतरते जाने कब गोप सुरथ की आँख लगी और आर्य सुरथ का चिंतन कब समाप्त हुआ, उन्हें पता ही नहीं चला।

दिन भर के संग्राम के पश्चात् जहाँ अन्य आर्य गाढ़ी निद्रा में सोये हुए हैं, गोप सुरथ को नींद नहीं आ रही। आज के अग्निहोत्र में असुरों ने अचानक आक्रमण कर विध्वंस मचाया। जाने कहाँ से वे अकस्मात् प्रकट हुए और अग्निहोत्र में पशुओं का रक्त डाल कर अट्टहास करने लगे।

आज से पहले तक असुर छिपकर ही आर्यों को हानि पहुँचाते रहे हैं। आर्य सुरथ की स्मृति में यह पहला अवसर था जब रक्त पिपासु असुरों का दल आर्यवीरों के भय की चिंता न करके जन तक चला आया था। इस दुःसाहस का क्या अर्थ है ? क्या उनकी संख्या और बल इतने बढ़ गये है कि अब उन्हें आर्यों से सम्मुख युद्ध करने में भी संकोच नहीं होता।

गोप सुरथ के मस्तिष्क में विचारों की आँधी सी उमड़ रही है। असुरों के बढ़ते दुःसाहस और शत्रु-भाव को लेकर चिंतित हैं वे। कैसे किया जाये इनका दमन ? इनके कारण किसी समय जन पर बड़ा संकट आ सकता है।

जब एक बार वैमनस्य उत्पन्न हो जाता है तो उसे समाप्त करना प्रायः संभव नहीं होता। एक ही प्रजापति की संतान होने के उपरांत भी दुष्ट असुर, देव प्रजा से अकारण वैमनस्य रखते थे। जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया देवों और असुरों का यह वैर पुष्ट होता गया जिसके कारण सहस्रों वर्षों तक देवासुर संग्राम चलते रहे। इन संग्रामों के कारण असुरों को भले ही कुछ लाभ नहीं हुआ किंतु देव प्रजा का बल निरंतर क्षीण होता रहा।

इतिहास के कई प्राचीन पृष्ठ खुल रहे हैं गोप सुरथ के विचारों में। प्रजा को संत्रास देने के लिये जब असुर वृत्र ने वरुण को बांध लिया तो प्रजा की रक्षा के लिये इन्द्र ने वृत्र को मारकर वरुण को असुरों के प्रभाव से मुक्त करवाया और उसे देवत्व प्रदान दिया। तब देवों ने भी पुरानी बातों को भूलकर वरुण को अपना मित्र घोषित किया था किंतु वरुण पुत्र ‘बल’ और वरुण पुत्री वारुणि [1] ने देवों से वैमनस्य समाप्त नहीं किया। बल और वारुणि के प्रभाव से असुरों का अधर्म और भी बढ़ गया।

महा-जलप्लावन के बाद जब देव प्रजा अपने सम्पूर्ण बल और वैभव के साथ समाप्त हो गयी तब मृत्यु के मुख में जाने से शेष रहे वैवस्वत मनु ने प्रजापति बनकर मनुष्य समाज का निर्माण किया। कम से कम तब तो असुरों को अपना वैरभाव और दुराचरण त्याग देने चाहिये थे।

देव नहीं रहे हैं किंतु उनके अंशों से उत्पन्न मनुष्यों से भी असुरों ने उसी प्रकार का शत्रु भाव बनाये रखा है। वे अकस्मात् आक्रमण करके गौओं का वध कर देते हैं। सोम उजाड़ देते हैं। स्त्रियों और बालकों को उठा ले जाते हैं और उनकी बलि चढ़ा देते हैं। उन्हीं के कारण मनुपुत्रों को अपने ग्रामों का संयोजन कर जनों का निर्माण करना पड़ा है।

समस्या केवल असुरों की ही नहीं है। आर्य कुल परस्पर भी प्रतिद्वंद्विता रखने लगे हैं। वे अपना सम्पूर्ण बल एकत्र करके असुरों का दमन करने के स्थान पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। कुछ समझ नहीं पाते आर्य सुरथ। क्या अंत है इस समस्या का! मनु ने प्रजा का संगठन करते समय कभी नहीं सोचा होगा कि उनके वंशज परस्पर युद्धों में लग जायेंगे और असुरों को अपनी मन-मानी करने का अवकाश मिल जायेगा।

आर्य सुरथ ने सुना है कि सिंधु के निचले तटों पर स्थित दिल्मुन, मगन तथा मेलुह्ह [2] आदि पुरों में भी असुरों का प्रभाव बढ़ने लगा है। उनमें सुरा और मांस भक्षण का प्रचलन बढ़ गया है। पणियों के प्रभाव से उनमें हिरण्य संचय करने और वस्तुओं के क्रय-विक्रय करने की संस्कृति का खूब प्रसार हो गया है।

उन्होंने विशाल भवनों का निर्माण करके बड़े-बड़े पुर स्थापित कर लिये हैं। सैंधव अग्नि की पूजा नहीं करते। न ही यज्ञादि श्रेष्ठ कर्मों में उनकी रुचि है। वे असुरों की ही भांति अग्नि को नहीं वरुण को सबसे बड़ा देवता समझते हैं। वे भी असुरों की भांति अपने शीश पर शृंग धारण करते हैं।

प्रजापति के स्थान पर प्रजननदेव की पूजा करते हैं। गौओं के स्थान पर ऊंचे कूबड़ वाले वृषभों की पूजा करते हैं। आर्य सुरथ ने तो यह भी सुना है कि वे आसुरि प्रवृत्ति के विशाल आयोजन करते हैं जिनमें सैंधव स्त्रियाँ सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र होकर नृत्य करती हैं।

बेचैनी के कारण शैय्या त्याग कर उठ खड़े होते हैं आर्य सुरथ। उन्होंने तो यहाँ तक सुना है कि सैंधवों ने स्त्रियों की नग्न प्रतिमायें बनाकर उनका पूजन प्रारंभ कर दिया है। उनके अधर्म का अंत यहाँ तक ही नहीं हो जाता। वे तो शिश्न और योनि की भी पूजा करने लगे हैं। शिश्न और योनियों का अभिषेक सरिताओं के पवित्र जल, मधु और गौओं के दुग्ध से करने लगे हैं।

व्यथित हो उठते हैं आर्य सुरथ। प्रजापति मनु ने जो स्वप्न देखा था, क्या वह मानव सभ्यता के इस प्रथम चरण में ही नष्ट हो जायेगा! प्रजापति ने चाहा था कि सम्पूर्ण सैंधव क्षेत्र में आर्य प्रजा का प्रसार हो। जहाँ-जहाँ तक दिशाओं की सीमा है, वहाँ-वहाँ तक ऋचाओं की मंगल ध्वनियाँ गूंजें और सम्पूर्ण पृथ्वी-लोक, अंतरिक्ष-लोक और द्यु-लोक यज्ञ धूम्र से आप्लावित हो जायें।

देवताओं को निरंतर सोम और बलिभाग प्राप्त होता रहे ताकि परिपुष्ट और संतुष्ट देवता मानवों के कल्याण हेतु प्रकृति को मानवों के अनुकूल रखें। क्या हुआ उस मंगल कामना का! सोम नष्ट हो चुका है। देवता क्षीण हो गये हैं। अनाचार और व्यभिचार बढ़ रहे हैं। असुर तेजी से अपनी प्रजा का प्रसार कर रहे हैं।

यदि यही स्थिति रही तो सम्पूर्ण सप्तसैंधव क्षेत्र एक दिन असुरों, यातुधानों, दैत्यों, दानवों, दस्युओं और द्रविड़ों से आप्लावित हो जायेगा। आर्यों को पैर धरने के लिये भी स्थान उपलब्ध नहीं रहेगा। तब हर प्रकार से पुष्ट और बलिष्ठ हुए शत्रु आर्यों के समूल विनाश के लिये आतुर हो उठेंगे। तब उनके वेग को रोक सकना आर्यों के लिये संभव नहीं रह जायेगा।

क्या करें गोप सुरथ! क्या उन्हें भी इंद्र की तरह असुरों के संहार के लिये सैन्य संगठित करनी होगी! क्या उन्हें भी प्रजापति बनकर नवीन प्रजा की रचना करनी होगी! क्या वे भी वैवस्वत मनु की तरह जीवन भर युद्ध की विभीषिकाओं से जूझते रहेंगे!

कुछ न कुछ तो करना ही होगा। आर्यों के विशृंखलित जन इन दस्युओं का उच्छेदन करने में समर्थ नहीं हैं। इन्हें संगठित होना होगा। जिस प्रकार प्रजापति मनु ने इन्हें जन के रूप में संगठित किया था उसी प्रकार मैं इन्हें जनपदों में संगठित करूंगा।

जनपदों की संगठित शक्ति न केवल असुरों से अपनी रक्षा करने में समर्थ होगी अपितु असुरों का दमन भी कर सकेगी। इन्हीं विचारों में डूबते उतरते जाने कब गोप सुरथ की आँख लगी और आर्य सुरथ का चिंतन कब समाप्त हुआ, उन्हें पता ही नहीं चला।

– अध्याय 20, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] सुरा।

[2] मेसोपोटामिया के विभिन्न स्थलों से कीलाक्षर लिपि में लिखी हुई मृत्पट्टिकायें मिली हैं जिनमें वहां के व्यापारियों द्वारा तीन देशों- दिल्मुन, मगन तथा मेलुह्ह से हस्तिदांत, ताम्बे की सामग्री, काली लकड़ी, लाल पत्थर तथा मणिये (माला में पिरोने के मनके) आयात किये जाने का उल्लेख है।

ये प्रदेश सूर्याेदय के देश, साफ-सुथरे नगरों वाले तथा लोकोत्तर स्वर्ग के रूप में वर्णित हैं। इस आधार पर इन प्रदेशों की पहचान सिंधु सभ्यता के नगरों से की गयी है। सिंधु सभ्यता के प्रमुख तीन नगर हड़प्पा, कालीबंगा और मोहेन-जो-दड़ो के रूप में पहचाने गये हैं।

अतः संभव है कि दिल्मुन, मगन तथा मेलुह्ह सिंधु सभ्यता के यही तीन नगर रहे हों। यूरोपीय विद्वान अल्चिन ने संस्कृत शब्द ‘म्लेच्छ’ से मेलुह्ह का साम्य माना है। म्लेच्छ का अर्थ होता है-अनार्य। पर्याप्त संभव है कि उस काल के आर्य मोहेन-जो-दड़ो को मेलुह्ह के नाम से जानते हों।

रानी मृगमंदा (21)

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रानी मृगमंदा

प्रतनु ने धरती पर घुटने टेककर रानी मृगमंदा का अभिवादन किया। प्रतनु ने अनुभव किया कि इस पूरे वार्तालाप में रानी मृगमंदा एक भी शब्द नहीं बोली है। हिन्तालिका और निर्ऋति ही उसकी तरफ से प्रश्न पूछती रही हैं।

अमल-धवल प्रासाद के केन्द्रीय कक्ष में प्रवेश करते ही प्रकाश से आंखें चुंधिया गयीं प्रतनु की। कुछ क्षण तक तो वह कुछ भी नहीं देख सका। धीरे-धीरे दृष्टि ने कक्ष के आलोक में स्थिर रहने योग्य क्षमता उत्पन्न कर ली। प्रतनु ने देखा कि विविध मणि-मुक्ताओं से भली-भांति सुसज्जित कक्ष के मध्य भाग में प्रकाश का अथाह सागर हिलोरें मार रहा है जिसकी दिप-दिप करती आभा-उर्मियों के कारण कक्ष में प्रवेश करने वाले की आंखें चैंधिया जाती हैं।

कुछ ही क्षणों में प्रतनु को और स्पष्ट दिखाई देने लगा। उसने देखा कि कक्ष के मध्य भाग में श्वेत परिधानों से आवेष्टित एक गौरांग नागकन्या श्वेत स्फटिक के सिंहासन पर सुशोभित है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसकी सम्पूर्ण देह से दिव्य ज्योत्सना झर-झर कर निःसृत हो रही है जिसके कारण कक्ष में इतना तीव्र प्रकाश है। नागकन्या के अंग-प्रत्यंग में समाया सौंदर्य सम्पूर्ण देह को ऐसी दिव्य छवि प्रदान कर रहा है मानो वह स्त्री देह न होकर सौंदर्य का अमल-धवल प्रासाद ही हो।

शर्करा के तट पर आने वाले पणियों के सार्थवाहों से प्रतनु ने सुन रखा था कि भूमण्डल पर स्थित समस्त प्रजाओं में नागकन्यायें सर्वाधिक सुंदर हैं। वे शीश पर फण तथा मुकुट, कानों में वलयाकार कुण्डल तथा अपने अलसाये नेत्रों में कज्जल धारण किये रहती हैं। उनकी सुवर्ण देह से निःसृत कमल पुष्पों की सुगंध पूरे वातावरण को आप्त किये रहती है।

कृशोदर और क्षीण कटि के मध्य में स्थित नाभि इस भांति सुशोभित रहती है मानो सौंदर्य के सागर में त्रिवलयी भंवर पड़ा हो। उनके मनोहारी, स्थूल और उन्नत स्तन प्रदेश पर विराजमान मणि-मेखलायें इस तरह दोलायमान रहती हैं मानो दो उन्न्त पर्वतों के मध्य श्वेत जलराशि से युक्त सलिलायें प्रवाहित होती हों। वे महामणियों से अलंकृत, विविध प्रकार के आभूषणों से शोभायमान, मधुर वचन बोलने वाली नागकन्यायें अत्यंत शिष्ट, रमणीय और मधुर दृष्टि वाली होती हैं।

प्रतनु को लगा कि जिस पणि ने उसके समक्ष नागकन्याओं के सौंदर्य का वर्णन किया था, उस पणि ने अवश्य ही इसी नागकन्या को देखा होगा। संभ्रमित, संकुचित और हतप्रभ सा प्रतनु सौंदर्य के उस अमल धवल प्रासाद की ओर निर्निमेष नेत्रों से ताकता ही रह गया।

उसे इस तरह चकराया हुआ जानकर निर्ऋति ने कहा- ‘हमारी रानी मृगमंदा को प्रणाम करो पथिक।’

  – ‘नहीं जानता कि नागों की रानी को किस तरह अभिवादन करना चाहिये!’ प्रतनु ने शीश झुका कर कहा।

  – ‘जिस प्रकार तुम अपनी रानी को अभिवादन करते हो।’ हिन्तालिका ने कहा।

  – ‘हम सैंधवों की कोई रानी नहीं है।’

  – ‘राजा तो होगा!’

  – ‘नहीं हम सैंधवों का कोई राजा भी नहीं है।’

  – ‘युद्ध और शांतिकाल में प्रजा का नेतृत्व कौन करता है ?’

  – ‘हम सैंधवों में युद्ध की परम्परा नहीं है।’

  – ‘शत्रु से रक्षा कैसे होती है ?’

  – ‘हमारा कोई शत्रु नहीं है।’

  – ‘यह कैसे संभव है ? प्रत्येक प्रजा का कोई न कोई शत्रु अवश्य होता है। तुम्हारे पड़ौस में किस प्रजा का निवास है ?’

  – ‘ असुर प्रजा का ? कुछ दूरी पर आर्य भी रहते हैं।’

  – ‘जिस प्रजा के पड़ौस में असुर निवास करते हों और उस प्रजा का कोई शत्रु न हो, यह तो अनहोनी सी बात है। असुर तो अकारण ही सबके शत्रु हैं।’

  – ‘असुर नागों और आर्यों के शत्रु हो सकते हैं किंतु सैंधवों से उनकी मित्रता है।’

  – ‘चलो मान लिया कि सैंधवों का कोई शत्रु नहीं है, सैंधवों में युद्ध परम्परा भी नहीं है किंतु शांति काल में भी तो उनका नेतृत्व कोई न कोई अवश्य करता होगा।’ हिन्तालिका ने प्रश्न किया।

  – ‘पशुपति महालय का प्रमुख पुजारी ही सैंधवों में सर्वपूज्य होता है किंतु वह प्रजा का नेतृत्व नहीं करता।’

  – ‘पुर की व्यवस्था कौन करता है ?’ निर्ऋति ने पूछा।

  – ‘पुर की व्यवस्था सम्बन्धी आदेश भी पशुपति महालय के प्रधान पुजारी द्वारा दिये जाते हैं।’

  – ‘जिस प्रकार तुम पशुपति महालय के प्रधान पुजारी को अभिवादन करते हो, उसी प्रकार रानी मृगमंदा को भी प्रणाम करो।’ निर्ऋति ने कहा।

प्रतनु ने धरती पर घुटने टेककर रानी मृगमंदा का अभिवादन किया। प्रतनु ने अनुभव किया कि इस पूरे वार्तालाप में रानी मृगमंदा एक भी शब्द नहीं बोली है। हिन्तालिका और निर्ऋति ही उसकी तरफ से प्रश्न पूछती रही हैं। मृगमंदा के संकेत पर हिन्तालिका ने प्रतनु को मृगमंदा के समक्ष रखे श्वेत स्फटिक आसन पर बैठने के का संकेत किया।

  – ‘आप हमारे पुर में किस आशय से आये हैं ?’ मृगमंदा का स्वर-माधुर्य प्रतनु को भीतर तक स्पर्श कर गया।

  – ‘मैं आया नहीं हूँ आपकी अनुचरियों द्वारा लाया गया हूँ।’

  – ‘निर्ऋति और हिन्तालिका मेरी अनुचरी नहीं, सखियाँ हैं। इन्होंने मुझे सूचित किया है कि आप इस निर्जन पर्वतीय प्रदेश में एकाकी विचरण कर रहे थे ?’

  – ‘क्या इस सम्पूर्ण पर्वतीय प्रदेश पर नागों का आधिपत्य है ?’ प्रतनु ने मृगमंदा के प्रश्न का उत्तर न देकर उलट कर प्रश्न किया।

  – ‘यह तो हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं! ‘

  – ‘किस प्रश्न का ?’

  – ‘आप किस आशय से इस निर्जन पर्वतीय प्रदेश में विचरण कर रहे थे ?’

  – ‘आप किस अधिकार से मुझसे प्रत्येक प्रश्न के प्रत्युत्तर की अपेक्षा रखती हैं ?’ रानी मृगमंदा के समक्ष जिस प्रकार के प्रश्न प्रतनु से लगातार किये जा रहे थे, वे प्रतनु को उचित नहीं लग रहे थे।

  – ‘आप हमारे अतिथि हैं, आपकी कुशल-क्षेम और यहाँ आने का आशय जानना हमारा कत्र्तव्य है।’ रानी मृगमंदा ने स्मित हास्य के साथ कहा।

  – ‘विभिन्न्न लोकों को देखने की आशा लेकर दीर्घ यात्रा पर निकला हूँ।’ प्रतनु को कोई समुचित उत्तर नहीं सूझ रहा था। पीड़ा की एक लहर उसके समूचे अस्तित्व को चीरती हुई सी उभर आई। कैसे बता सकता है वह कि उसे सैंधवों की राजधानी से निष्कासित किया गया है! अपनी ही मातृभूमि से निष्कासित व्यक्ति दूसरों के पुर में क्योंकर रहने का अधिकार प्राप्त कर सकता है!

  – ‘कौन-कौन से लोक देख चुके हैं अब तक ?’

  – ‘सैंधव प्रदेश से निकल कर विभिन्न पर्वतीय और वन्य प्रांतरों को देखता हुआ सबसे पहले इसी लोक तक पहुँचा हूँ।’

  – ‘इस लोक में आपका स्वागत है पथिक। आप जितने समय तक रहना चाहें यहाँ रह सकते हैं किंतु हमारा नियम है कि हमारेे तीन प्रश्नों का समुचित उत्तर दे सकने में सक्षम व्यक्ति ही इस पुर में अतिथि की तरह रह सकता है।’

  – ‘कौन से तीन प्रश्न ? जो अभी पूछे गये हैं! ‘

  – ‘नहीं! वे प्रश्न तो अभी पूछे जाने हैं ?’

  – ‘यदि मैं उन प्रश्नों के समुचित उत्तर न दे सकूं तो ?’

  – ‘तो आपको इस पुर में अनुचरों की भांति निवास करना होगा।’

  – ‘विचित्र है आपका नियम! मैंने आपके प्रश्नों के समुचित उत्तर दिये तो अतिथि अन्यथा अनुचर!’

  – ‘इसमें विचित्र कुछ भी नहीं है। विद्वानों को अतिथि बनाना हमारा गौरव है। मूर्खों को अतिथि के स्थान पर अनुचर बनाना ही श्रेयस्कर है। आपको यह भी ज्ञात होना चाहिये कि इस पुर में अतिथि बने रहने के कई लाभ हैं।’

  – ‘क्या-क्या लाभ हैं ?’

  – ‘अतिथि के रूप में आप वह सब-कुछ प्राप्त कर सकेंगे जिसकी आप इच्छा करेंगे।’ मुस्कुराकर कहे गये रानी मृगमंदा के कथन पर निर्ऋति और हिन्तालिका भी मंद-मंद मुस्कुराने लगीं।’

  – ‘तो पूछिये आपके तीनों प्रश्न। मैं तैयार हूँ।’ ”सब-कुछ” शब्दों के वास्तविक अर्थ का अनुमान लगाने का प्रयास करता हुआ प्रतनु रानी मृगमंदा द्वारा पूछे जाने वाले तीन प्रश्नों का सामना करने के लिये तैयार हो गया।

  – ‘अपने प्रश्न आपके समक्ष रखने से पहले मैं बताना चाहूंगी कि पूर्व में भी ये प्रश्न मैं कई पुरुषों के समक्ष रख चुकी हूँ किंतु आज तक कोई भी पुरुष मेरे प्रश्नों का समुचित उत्तर नहीं दे सका। वे सभी पुरुष इस समय हमारे अनुचर बनकर हमारी सेवा में नियुक्त हैं। यदि आप अनुचर नहीं बनना चाहते हैं तो इसी समय पुर छोड़कर जाने के लिये स्वतंत्र हैं।’ रानी मृगमंदा ने चेतावनी दी।

  – ‘भय का वर्णन भय के वास्तविक कारण से अधिक भयावह होता है। आप भय का वर्णन कर मुझे भयभीत करने में अपनी ऊर्जा व्यय न करें। कृपा कर प्रश्न पूछें।’ किंचित् शुष्क हो आया प्रतनु। वैसे भी उसे किसी भी कथोपकथन की विस्तृत भूमिका में कभी रुचि नहीं रहती। अधिक विस्तृत भूमिका स्थिति को स्पष्ट करने के स्थान पर स्थिति को अधिक रहस्यमय बना डालती है।

  – ‘तो सुनिये पहला प्रश्न। संसार में प्राणियों के अंगों को विभूषित करने वाला सुवर्ण किस प्रकार उत्पन्न हुआ है ? यदि आप विद्वान हैं तो मुझे बतायें।’

प्रश्न सुनकर क्षण भर के लिये विचारमग्न हो गया प्रतनु। उसने विचार किया कि युवती के, उसमें भी सुंदर युवती के प्रश्नों का उत्तर उसके मन के अनुकूल होना चाहिये। तभी वह सत्य माना जाता है। सुंदर युवती से तर्क कर विवाद उत्पन्न करने में लाभ नहीं हैं। अतः इस अवसर पर नागकन्या के मनोनुकूल उत्तर दिया जाना उचित है न कि तर्क और विवाद को बढ़ावा देने वाला।

उसने मुस्कुराते हुए कहा- ‘ मेरु पर्वत के शिखर भाग पर किसी समय देवताओं और गरुड़ के मध्य अमृत के लिये भयंकर युद्ध हुआ था। तब नागों के शत्रु कपिल वर्ण वाले गरुड़ ने अपनु चंचु के आघात से समस्त देवताओं को क्षत-विक्षत कर दिया। गरुड़ द्वारा चंचु के आघातों से त्रस्त देवताओं को दुखी देखकर इन्द्र ने अपना वज्र गरुड़ पर फैंक मारा। वह वज्र पर्वत के समान उस भयंकर गरुड़ के बाँये पंख पर गिरा। जिससे उसके बायें पंख का कुछ भाग कट कर भूमि पर गिर गया। समस्त प्राणियों के शरीर का भूषण सुवर्ण उसी से बना हुआ है।[1]  हे कमलनेत्री! यदि आप मेरे उत्तर से संतुष्ट हैं तो दूसरा प्रश्न पूछें। अन्यथा मैं अनुचर बनने को तैयार हूँ।’

प्रतनु का उत्तर सुनकर चकित रह गयी रानी मृगमंदा। यह युवक तो सचमुच ही बुद्धिमान है। जब से यह मृगमंदा के समक्ष उपस्थित हुआ है तब से ही अत्यंत संतुलित और सारगर्भित संभाषण करता रहा है और इस समय भी इसने नागों की रानी को प्रसन्न करने के लिये गरुड़ के पराजय की कथा कितनी कुशलता से तैयार कर ली है और वह भी बिना कोई समय गंवाये। ऐसा तो केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही कर सकता है किंतु यह उसके प्रश्न का समुचित उत्तर नहीं।

  – ‘बुद्धिमान पथिक! मैं आपके उत्तर से प्रसन्न तो हूँ किंतु यह मेरे प्रश्न का समुचित उत्तर नहीं है। यदि समुचित उत्तर जानते हो तो बताओ।’

  – ‘विशालाक्षि! मैं नहीं जानता कि आपके इस प्रश्न का सही उत्तर क्या है किंतु इस सम्बन्ध में जो कुछ भी मुझे ज्ञात है उसका वर्णन मैं आपके समक्ष करता हूँ। जिस हिमालय पर्वत पर आपका विवर रूपी पुर स्थित है उसी महापर्वत पर यहाँ से सहस्रों योजन दूर माल्यवान, गंधमादन, नील तथा निषध नामक पर्वत खड़े हैं।

उनके मध्य में महामेरु नामक पर्वत है। वहीं जंबूरस नामक नदी है। इस नदी के किनारे जम्बू नामक शाश्वत वृक्ष है। इसी वृक्ष के कारण यह समस्त भू प्रदेश जम्बू द्वीप कहलाता है। इस वृक्ष के फलों का परिमाण आठ सौ इकसठ अरन्ति बताया जाता है। जब वृक्ष से जम्बू फलों का पतन होता है तो वे भारी ध्वनि उत्पन्न करते हैं।

इन्हीं फलों का रस एक नदी बनकर फैलता है। यह नदी मेरु तथा जम्बू वृक्ष की परिक्रमा करती हुई हिमालय से उतर कर पृथ्वी लोक में प्रवेश करती है। वहीं जाम्बूनद नामका कनक होता है जो समस्त प्राणियों का भूषण है। यह शक्रवधू के समान रक्तिम आभा वाला होता है।’ [2]

प्रतनु का उत्तर नागकन्या को समुचित जान पड़ा। यद्यपि नागों ने जम्बू वृक्ष को देखा नहीं है किंतु परम्परा से नागों में सुवर्ण उत्पत्ति के सम्बन्ध में यही मान्यता रही है।

  – ‘मैं आपके उत्तर से संतुष्ट हूँ। अब मेरे दूसरे प्रश्न के लिये तैयार हो जाओ पथिक। जिस पर्वतीय प्रदेश में जम्बू नामक वृक्ष पाया जाता है वहाँ कौन-कौन सी प्रजायें निवास करती हैं ? शेष, वासुकि तथा तक्षक आदि नाग किस स्थान पर निवास करते हैं ? यदि आप विद्वान हैं और मेरे प्रश्न का उत्तर जानते हैं तो बतायें।’

  – ‘उन्नत पीन पयोधरों से सम्पन्न सुंदरी! नागों के भुवन विन्यास के अनुसार हैमवत वर्ष पर राक्षस, पिशाच और यक्ष रहते हैं। हेमकूट वर्ष पर अप्सराओं सहित गंधर्व रहते हैं। शेष, वासुकि तथा तक्षक आदि नाग निषध वर्ष में रहते हैं। महावर्ष पर तैंतीस देव भ्रमण करते हैं। नील पर्वतों पर सिद्ध और ब्रह्मर्षि रहते हैं। श्वेत पर्वत दैत्यों और दानवों का वासस्थान है।’ [3]

  – ‘तुम्हें नागों के भुवन विन्यास की जानकारी क्योंकर है पथिक ?’

  – ‘सैंधव पुरों में असुरों तथा पणियों का आवागमन होता रहता है। उन्हीं के द्वारा जल, थल, नभ और पर्वतीय प्रदेशों में रहने वाली प्रजाओं की जानकारी सैंधवों को प्राप्त होती रहती है। मैंने भी अपने पुर में आने वाले पणियों से यह जानकारी प्राप्त की है। यदि आप मेरे दूसरे उत्तर से भी संतुष्ट हों तो अपना तीसरा प्रश्न पूछें अन्यथा मैं आपका अनुचर बनने को तैयार हूँ।’

  – ‘मेरा तीसरा प्रश्न आपके द्वारा इस कक्ष में प्रवेश करने से पूर्व देखी गयी नागकन्याओं के जल-विहार की प्रतिमा के सम्बन्ध में है। मैं कहती हूँ कि उसके मध्य भाग में स्थित नागकन्या के रूप में मेरी प्रतिमा का उत्कीर्णन किया गया है। निर्ऋति कहती है कि यह निर्ऋति की प्रतिमा है, हिन्तालिका कहती है कि यह हिन्तालिका की प्रतिमा है। आपको  बताना है कि वह प्रतिमा किसकी है।’

मृगमंदा का तीसरा प्रश्न सुनकर चक्कर में पड़ गया प्रतनु। इस बात में कुछ न कुछ भेद अवश्य है। श्वेत स्फटिक पर उत्कीर्णित जलविहार दृश्यांकन प्रतिमा उसके नेत्रों में घूम गयी। उसने ध्यान किया कि मध्य भाग की प्रतिमा जिस प्रकार निर्ऋति और हिन्तालिका से साम्य रखते हुए भी उनमें से किसी की भी प्रतीत नहीं होती, उसी प्रकार रानी मृगमंदा की मुखाकृति से साम्य रखते हुए भी वह प्रतिमा रानी मृगमंदा की नहीं कही जा सकती। कोई न कोई भेद इसमें अवश्य है। प्रतनु का मस्तिष्क कुछ निर्णय नहीं ले पाया।

  – ‘किस विचार में पड़ गये पथिक! तुम चाहो तो उस प्रतिमा को एक बार और देख सकते हो।’ निर्ऋति ने अपने चंचल नेत्र विशेष मुद्रा में दोलायमान करते हुए कहा।

  – ‘क्या इस प्रश्न का उत्तर तत्काल देना आवश्यक है ?’

  – ‘आप चाहें तो कुछ दिन का समय दिया जा सकता है।’ रानी मृगमंदा ने प्रतनु का साहस वर्द्धन करते हुए कहा।

  – ‘तब तक मैं यहाँ किस रूप में रहूंगा, अतिथि के रूप में अथवा अनुचर के रूप में ?’

  – ‘तब तक आप हमारे अघोषित अतिथि के रूप में रह सकेंगे।’ रानी मृगमंदा ने स्मित हास्य के साथ कहा और प्रकाश तथा सौंदर्य का झरना सा छोड़ती हुई उठ खड़ी हुई।

– अध्याय 21, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] स्कंदपुराण के श्रीमाल माहात्म्य में आये एक वर्णन में एक पर्वतीय विवर का उल्लेख है जिसमें नागकन्या इषुमति को ब्राह्मण कुण्डपा स्वर्ण की उत्पत्ति का यही कारण बताता है।

[2] वायुप्रोक्त महापुराण, उपोद्घात पाद छियालीसवाँ अध्याय-भुवन विन्यास (श्लोक संख्या 21 से 30)

[3] वायुप्रोक्त महापुराण, उपोद्घात पाद छियालीसवां अध्याय-भुवन विन्यास (श्लोक संख्या 33 से 35)

जनपदों की ओर (22)

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जनपदों की ओर

आर्य सुरथ ने अपनी बात पूरी करते-करते अनुभव किया कि अब आर्यों को जन से जनपदों की ओर ले जाने का समय आ गया है। लघु जनों की अपेक्षा वृहद् जनपदों में ही आर्य प्रजा सुरक्षित रह सकती है।

गोप सुरथ ने सभा में अपना मंतव्य प्रस्तुत किया- ‘जिस प्रकार समस्त आर्य प्रजा परिवार में, परिवार कुल में, कुल ग्राम में, ग्राम विश में तथा विश जन में संगठित हैं उसी प्रकार जन, जनपद में संगठित हों और जनपद महाजनपद में संगठित हों। संगठित जनपद एवं महाजनपद एक दूसरे को रक्षण एवं सहयोग देते हुए असुरों, यातुधानों, दैत्यों, दानवों तथा द्रविड़ों का प्रतिरोध करें। उनकी अनाचार प्रवृत्तियों को प्रसारित होने से रोकें। उनका बल क्षीण करें। उन्हें कुमार्ग छोड़कर सद्मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करें।’

  – ‘और यदि वे सद्मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित न हों तो ?’ आर्य पूषण ने प्रश्न किया।

  – ‘तो जनपदों और महाजनपदों की संगठित शक्ति उन्हें सद्मार्ग पर चलने के लिये विवश करे।’ गोप सुरथ के स्वर में किंचित् उत्तेजना थी।

  – ‘और यदि विवश न कर सकें तो ?’ ये आर्य सुनील हैं जो आर्य सुरथ के सबसे बड़े प्रशंसक और अनुयायी हैं। उन्हें आर्य सुरथ की योजनायें विस्मयकारी एवं व्यवस्थायें अनुकरणीय लगती हैं किंतु आर्य सुनील का स्वभाव है कि जब तक उन्हें किसी योजना अथवा व्यवस्था का सम्पूर्ण आशय समझ में नहीं आ जाता वे उसे स्वीकार नहीं करते।

  – ‘तो बलपूर्वक उनका शिरोच्छेद करें।’ गोप सुरथ ने बिना किसी संशय के समाधान किया।

  – ‘हाँ, यही उपाय उचित है।’ आर्य अतिरथ ने आर्य सुरथ की योजना का स्वागत किया।

  – ‘किंतु यह तो हिंसा हुई। जिसके लिये ऋषिजन एवं आप स्वयं भी सदैव वर्जना करते रहते हैं।’ आर्य सुनील ने शंका व्यक्त की।

  – ‘बड़ी हिंसा को रोकने के लिये यदि छोटी हिंसा आवश्यक हो जाये तो छोटी हिंसा करके बड़ी हिंसा रोक लेनी चाहिये। हिंसा को प्रत्येक स्थिति में त्याज्य मानकर हिंस्रक व्यक्तियों अथवा हिंस्रक पशुओं को निर्भय घूमने देना उचित नहीं है। ऐसा करके तो हम छोटी हिंसा से बचकर बड़ी हिंसा को आमंत्रित कर रहे हैं।’

– ‘क्या किसी बड़ी हिंसा की आशंका निकट है।’ ऋषि पर्जन्य ने चिंता व्यक्त की।

  – ‘यदि निकट नहीं है तो दूर भी नहीं है।’

  – ‘इसका क्या अर्थ हुआ आर्य सुरथ।’ आर्या पूषा ने प्रश्न किया। यातुधानों के चंगुल से छूटने के बाद आर्या पूषा कई दिनों तक रुग्ण रही हैं किंतु इधर कुछ दिनों से वे पुनः स्वस्थ होकर सभा-समिति में भाग लेने लगी हैं।

  – ‘आप सब देख रहे हैं कि चारों ओर असुर, यातुधान, दैत्य और दानव तेजी से फैलते जा रहे हैं। असुरों ने सोम को नष्ट कर दिया है। असुरों के प्रभाव में व्रात्य, द्रविड़, यक्ष, गंधर्व, विद्याधर, किरात, निषाद तथा अन्य संस्कृतियाँ भी दूषित होती जा रही हैं। उनमें माँस भक्षण, गौ वध, सुरापान और वामाचार तेजी से पनप रहा है। यहाँ तक कि नाग और गरुड़ आदि आर्य प्रजायें भी आसुरी संस्कृति के प्रभाव में आकर अग्निहोत्र का परित्याग कर रही हैं। बहुत सी प्रजाओं में नग्न नारी प्रतिमाओं के पूजन का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। यहाँ तक कि कतिपय आर्य जन भी आसुरी प्रलोभनों में घिर कर अग्निहोत्र की अवहेलना कर रहे हैं। यदि आसुरि प्रवृत्तियों का प्रसार निरंतर होता रहा तो आर्यों के लिये हल भर भी भूमि नहीं बचेगी। जिस अग्निहोत्र को वैवस्वत मनु ने अपने प्रबल प्रताप और उद्योग से बचाया था वह नष्ट हो जायेगा। अग्निहोत्र के अभाव में देवताओं का बल क्षीण होगा। आप सब विचार करें कि तब यह पृथ्वी कैसी होगी! ‘

  – ‘आर्य सुरथ की चिंता उचित है।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने समर्थन किया।

  – ‘मैंने तो यह भी सुना है आर्य कि सैंधव जन अश्वत्थ आदि वनस्पतियों के पूजन में अज [1] एवं अरुणोपल [2] आदि पशु-पक्षिओं की भी बलि चढ़ाने लगे हैं। [3] निश्चय ही असुरों के प्रभाव में आकर उन्होंने यह कुमार्ग अपनाया है।’ आर्या समीची ने कहा।

  – ‘हमारे पूर्वजों ने उद्घोष किया था- कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्। [4] इसलिये हमारा यह कर्त्तव्य हो जाता है कि हम आर्य तथा आर्येतर प्रजाओं को पापाचार की ओर जाने से रोकें।’ ऋषि अग्निबाहु ने भी आर्य सुरथ का समर्थन किया।’

  – ‘आर्य होने का अर्थ श्रेष्ठ हो जाना है। जो विहित कत्र्तव्य का पालन करता है, निषिद्ध एवं निंद्य आचरण नहीं करता, शिष्टाचार का पालन करता है, वह आर्य है।’ [5] ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने ‘आर्य’ शब्द को व्याख्यायित किया।

  – ‘आर्य प्रजा की अपेक्षा आर्येतर प्रजाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि होती है, इसका क्या कारण है ऋषिवर।’ आर्य सुमंगल ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘भोग विलास की प्रवृत्ति और काम में आसक्ति।’ ऋषि अग्निबाहु ने आर्य सुमंगल की जिज्ञासा का समाधान किया।

  – ‘अत्यंत महत्वपूर्ण चिंता व्यक्त की है आर्य सुमंगल ने और अत्यंत ही समुचित कारण बताया है ऋषिवर अग्निबाहु ने। मैं स्वयं भी इस पर चिंतन करता रहा हूँ। कितना परिश्रम करना पड़ा था आर्यों को जब उन्होंने इन्द्र की सहायता से यतियों को समाप्त कर शृगालों के समक्ष डाल दिया था। सहस्रों की संख्या में यति यमलोक पहुँचाये गये थे किंतु अब ये फिर से इतनी बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं जैसे यमलोक का द्वार तोड़कर एक साथ ही धरित्री पर लौट आये हों। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने व्यथित स्वर में कहा।

  – ‘प्राणी में दूषित प्रवृत्तियों का प्रादुर्भाव क्यों होता है ऋषिश्रेष्ठ ? क्यों नहीं आर्यों की भांति अन्य प्रजाओं में श्रेष्ठ संस्कार स्वतः उत्पन्न होते ?’ आर्य पूषण ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘आर्य पूषण! यह सृष्टि अंधकार से उत्पन्न हुई है, प्रकाश से नहीं। इसलिये अंधकार स्वतः उत्पन्न हो जाता है। प्रकाश के लिये तप करना होता है आर्य।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने समाधान किया।

  – ‘आर्यों में यदि श्रेष्ठ आचरण प्रकट हुए हैं तो उनके पीछे ऋषियों की तपस्या छिपी है।’ गोप सुरथ ने कहा।

  – ‘आर्येतर प्रजाओं ने ऋषि परम्परा का ही विकास नहीं किया तब उनमें तपस्या कहाँ से आती! प्रकाश कहाँ से आता! ‘ ऋषि पत्नी अम्बा अदिति ने अपना विचार कहा। वे बहुत देर से मौन रहकर आज की सभा में हो रहे विचार मंथन को सुन रहीं थीं।

  – ‘मद्य, मांस और मैथुन को त्याग पाना उन प्रजाओं के लिये सरल नहीं है आर्ये। इसके लिये उन्हें दीर्घ अभ्यास की आवश्यकता होगी। तभी वे शुभकर्मों की ओर प्रवृत्त होंगे।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने कहा।

  – ‘कौन करायेगा उन्हें अभ्यास ?’ आर्या स्वधा ने पूछा।

  – ‘हम करायेंगे पुत्री। हम उन्हें आर्य बनायेंगे।’ अम्बा अदिति ने स्नेह से आर्या स्वधा के शीश पर हाथ रखकर कहा।

  – ‘किंतु कैसे ?’

  – ‘अपने शस्त्रों से।’ अम्बा अदिति कुछ कहें, इससे पूर्व आर्य अतिरथ ने बात पूरी की।

  – ‘नहीं। शस्त्रों से किसी भी प्रजा की संस्कृति का परिमार्जन नहीं किया जा सकता। संस्कृति का परिमार्जन होता है शास्त्रों से। संस्कृति का परिमार्जन शीघ्र सम्पादित होने वाली प्रक्रिया नहीं है। शत-शत वर्षों तक हमें इसी प्रयास में संलग्न रहना होगा। ऋतुयें आयेंगी और जायेंगी। पीढ़ियाँ बदलेंगी। परिस्थितियाँ बदलेंगी किंतु हमारा यह यज्ञ चलता रहेगा। हम संसार को आर्य बनाने के लिये अपनी आहुतियाँ देते रहेंगे।’ गोप सुरथ का गहन गंभीर स्वर इस प्रकार जान पड़ता था मानो शताब्दियों के अंतराल से बोल रहे हों।

  – ‘जिस प्रकार वैवस्वत मनु ने प्रजापति बनकर प्रजा की रचना की, उसी प्रकार हमें भी प्रजापति बनना होगा। आर्य प्रजा का विस्तार करना होगा। इसके लिये हमें नये प्रजापतियों की आवश्यकता होगी।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने गोप सुरथ की योजना को स्पष्ट किया।

– ‘तब तो इतने विशाल यज्ञ को संपादित करने के लिये हमें बहुत बड़ी संख्या में श्रेष्ठ ब्रह्मा, श्रेष्ठ प्रचेता, श्रेष्ठ दक्ष, और श्रेष्ठ मनुओं की आवश्यकता होगी।’ आर्य पूषण ने अनुमान लगाते हुए कहा।’

  – ‘नहीं। इस यज्ञ के लिये हमें युगानुकूल मार्ग अपनाना होगा। हर युग में श्रेष्ठ ब्रह्मा, श्रेष्ठ प्रचेता, श्रेष्ठ दक्ष, और श्रेष्ठ मनुओं का उपलब्ध हो पाना कौन जाने संभव हो पाये अथवा नहीं। इतने सारे याज्ञिकों की उपस्थिति आगे चलकर परस्पर वैमनस्य और वर्चस्व के संघर्ष में बदल सकती है। व्यवस्था ऐसी करनी होगी जिसमें कम से कम अपवाद उत्पन्न हों। हम भूत के अनुभव, वर्तमान के संकट और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विन्यास का निर्माण करेंगे।’ गोप सुरथ ने उसी प्रकार अतल गहराई से आते स्वर में कहा।

अभिभूत हैं आर्य सुनील आर्य सुरथ की इस योजना पर। कितनी दूर तक की विचार लेते हैं वे। निश्चय ही वे ऐसा कर सकने में समर्थ भी हैं। निश्यच ही आर्य सुरथ शीघ्र ही कोई बड़ा अभियान आरंभ करने वाले हैं जिसमें आर्य सुनील को भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करना होगा। आर्य सुनील ने अनुमान किया।

आर्य अतिरथ को इस तरह की बातें पसंद नहीं। कैसा परिमार्जन और कैसा यज्ञ! अत्यंत स्पष्ट मार्ग को भी विद्वान जन इतना दुष्कर क्यों बना देते हैं! समस्या है पापाचार को नष्ट करने की। सीधी और स्पष्ट बात है कि पापियों को नष्ट कर दो, पापाचार भी स्वतः नष्ट हो जायेगा किंतु नहीं! आर्य अतिरथ की तो सुनता ही कौन है! हुँह! यज्ञ करेंगे! आर्य अतिरथ मन ही मन झल्लाये किंतु बोले कुछ नहीं।

  – ‘अपनी योजना को समिति के समक्ष स्पष्ट करें आर्य।’ ऋषि पर्जन्य ने वार्तालाप को पुनः मूल बिन्दु पर लाते हुए प्रश्न किया।

  – ‘मेरी योजना यह है कि जिस प्रकार कुल का मुखिया कुलपति, ग्राम का मुखिया ग्रामणी और विश का मुखिया विशप अथवा विशपति होता है उसी प्रकार जन का भी मुखिया होना चाहिये।’

  – ‘जन का मुखिया किस लिये ? आर्य पूषन ने प्रश्न किया।

  – ‘सम्पूर्ण जन के सम्बन्ध में निर्णय ले सकने के लिये।’

  – ‘सम्पूर्ण जन के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिये समिति की व्यवस्था कर रखी है आर्यों ने। समिति सामूहिक रूप से जो निर्णय लेती है, उसमें समस्त प्रजा की सम्मति होती है। वे निर्णय समस्त आर्यों के हित के लिये गये होते हैं। एक व्यक्ति द्वारा लिये गये निर्णय गलत भी हो सकते हैं।’

  – ‘जन का मुखिया बनाने का अर्थ यह नहीं है कि समिति समाप्त कर दी जाये। समिति वर्तमान की ही तरह कार्य करती रहे तथा उसके द्वारा जो नीति निर्धारित की जाये, मुखिया द्वारा उसी नीति के आधार पर जन के हित में त्वरित निर्णय लिये जायें।’

  – ‘इसका क्या लाभ होगा ?’

  – ‘वर्तमान में आर्य ‘जन’ के रूप में संगठित हैं। एक जन का दूसरे जन से कोई सम्पर्क नहीं है। हमें यह व्यवस्था करनी होगी कि जब असुर किसी एक जन पर आक्रमण करें तो अन्य आर्य जन उसकी सहायता के लिये तत्काल उपलब्ध हों। आर्य जनों के रक्षण के साथ-साथ असुरों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाने के लिये भी आर्यों के समस्त जनों को जनपद के रूप में संगठित किया जाना आवश्यक है। जब जनपद कोई निर्णय लेना चाहेगा तब यह संभव नहीं रह जायेगा कि समस्त जनों की समिति बुलाई जा सके। विभिन्न जन अपने-अपने मुखिया के माध्यम से जनपद में अपनी बात कह सकेंगे।’

आर्य सुरथ ने अपनी बात पूरी करते-करते अनुभव किया कि अब आर्यों को जन से जनपदों की ओर ले जाने का समय आ गया है। लघु जनों की अपेक्षा वृहद् जनपदों में ही आर्य प्रजा सुरक्षित रह सकती है।

  – ‘क्या जनपद द्वारा लिये गये निर्णय को सभी जनों द्वारा स्वीकार किया जाना आवश्यक होगा ?’ आर्य पूषन ने प्रश्न किया।

  – ‘हाँ जनपद का निर्णय सभी जनों को समान रूप से स्वीकार करना होगा।

  – ‘इसका अर्थ यह हुआ कि जनपद बनने के बाद जन अपनी स्वतंत्रता खो देंगे!’

  – ‘नहीं, वे अपनी स्वतंत्रता खोयेंगे नहीं। जनपद द्वारा जो निर्णय लिया जायेगा, उसमें समस्त जनों की सम्मति सम्मिलित रहेगी।’

  – ‘किंतु यह तो आवश्यक नहीं कि समस्त जन किसी विषय पर एक ही सम्मति रखते हों। उनमें असहमति भी हो सकती है ?’ आर्य पूषन ने आशंका व्यक्त की।

  – ‘ऐसी स्थिति में यह देखा जायेगा कि कितने जन उस निर्णय से सहमत हैं। यदि सम्मति रखने वाले जनों की संख्या अधिक हुई तो वह निर्णय असम्मति रखने वाले जन को भी मानना होगा।’ आर्य सुरथ ने जवाब दिया।

  – ‘यही तो मैं कह रहा हूँ आर्य कि जनपद के निर्माण से जन अपनी स्वतंत्रता खो देंगे।’ आर्य पूषन ने पुनः आशंका व्यक्त की।

  – ‘नहीं, वे अपनी स्वतंत्रता खोयेंगे नहीं, किंतु कुछ मामलों में उनकी स्वतंत्रता सीमित अवश्य हो जायेगी।’

  – ‘आर्य जन अपनी स्वतंत्रता सीमित क्यों करना चाहेंगे ?’

  – ‘संगठन के निर्माण के लिये व्यक्तिगत स्वातंत्र्य को सीमित करना ही होता है। वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए संगठन का निर्माण आवश्यक है। अन्यथा हमें अपनी स्वतंत्रता असुरों के हाथों नष्ट हो जाने के लिये प्रस्तुत रहना चाहिये।’ 

देर रात्रि तक नवीन संगठन के निर्माण और उसके लिये किये जाने वाले उपायों पर विचार-विमर्श चलता रहा। जब गगन की कृत्तिका [6] पूरी आभा के साथ प्रकाशवान् हो उठी और नीहारिकाओं [7] के महाविशाल चक्रों की दिशायें कुछ मुड़ी हुई सी प्रतीत होने लगीं तो समिति का विसर्जन हुआ।

– अध्याय 22, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] बकरा।

[2] मुर्गा।

[3] मोहेन-जो-दड़ो से प्राप्त एक मुहर में एक वृक्ष को पशु बलि चढ़ाने का दृश्य है।

[4] सारे संसार को श्रेष्ठ बनाओ।

[5] कर्तव्यमाचरन् कार्यमकर्तव्यमनाचरन्। तिष्ठता प्रकृताचारे स वा आर्य इति स्मृतः।

[6] सत्ताईस नक्षत्रों में से तीसरा नक्षत्र।

[7] आकाशगंगा।

तीसरा प्रश्न (23)

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तीसरा प्रश्न

प्रतनु रानी मृगमंदा के तीसरे प्रश्न का उत्तर पा चुका है। वह दबे पांव अपने प्रासाद में लौट आया। तीसरा प्रश्न अनायास ही सुलझ गया था।

नागों के इस विवर में अघोषित अतिथि के रूप में रहते हुए प्रतनु को कई दिन हो गये हैं। अघोषित अतिथि के रूप में वह विविध प्रकार का आनंद भोग रहा है किंतु रानी मृगमंदा के दर्शन उस भेंट के पश्चात् पुनः नहीं पा सका है। अनन्य सुंदरी और कमनीय मृगमंदा का रूप-लावण्य रह-रह कर उसकी आंखों में कौंध जाता है। इसी कौंध के बीच उसे कभी-कभी नृत्यांगना रोमा का चेहरा भी दिखाई दे जाता है।

प्रतनु को लगता है कि यदि नृत्यांगना रोमा यहाँ होती तो अवश्य ही रानी मृगमंदा के प्रश्न का उत्तर दे चुकी होती। वह स्वयं कई बार जाकर उस प्रतिमा को देख चुका है किंतु प्रतिमा का रहस्य लगातार गहराता ही जा रहा है। किसकी हो सकती है यह प्रतिमा! यही प्रश्न उसे दिन रात उद्विग्न किये रहता है।

किसी सामान्य व्यक्ति के लिये तो यह प्रश्न निःसंदेह कठिन होता किंतु वह तो स्वयं शिल्पी है। सैंधव सभ्यता का सुविख्यात और निष्णात शिल्पी जिसने केवल एक ही प्रतिमा का निर्माण कर सैंधवों की राजधानी मोहेन-जो-दड़ो में कौतूहल उत्पन्न कर दिया था।

उसकी बनाई केवल एक प्रतिमा को देखकर पशुपति महालय का प्रधान पुजारी किलात इतना भयभीत हो गया था कि उसने प्रतनु को दो वर्ष के लिये राजधानी से ही निष्कासित कर दिया। उसी एक प्रतिमा को देखकर सर्वांग सुंदरी नृत्यांगना रोमा उस के प्रति आसक्त हो गयी थी। आज उसी अप्रतिम शिल्पी की ऐसी दशा! वह इतना भर बता पाने में समर्थ नहीं कि सामने दिखाई देने वाली प्रतिमा इन तीन यौवनाओं में से किसकी है!

बार-बार सोचता है प्रतनु। ऐसा क्यों है! यह प्रतिमा उसे उन तीनों यौवनाओं की तरह दिखाई देती है किंतु उसे इन तीनों में से किसी की भी प्रतिमा नहीं कहा जा सकता। प्रतनु जब भी प्रतिमा का मिलान उनमें से किसी एक से करना चाहता है तो प्रतिमा उससे साम्य रखते हुए भी उसकी प्रतीत नही होती। कैसी जटिल प्रहेलिका है यह! प्रतनु इस विषय पर जितना-जितना सोचता जाता है, उतना ही अधिक उलझता जाता है।

इसी प्रहेलिका का हल पाने की उधेड़-बुन में लगा प्रतनु अतिथि प्रासाद से बाहर आ गया है। संभवतः उपवन की स्वस्थ वायु उसके मस्तिष्क को चैतन्य करे। इस मायावी विवर की मायावी सृष्टि में हर वस्तु उसके लिये प्रहेलिका का रूप ले लेती है। अपने प्रासाद से निकल कर जब वह आग्नेय कोण में स्थित जल यंत्र तक पंहुचा तो उसने देखा कि मृगमंदा के अनुचर यंत्र को चला रहे हैं।

वर्तुलाकार घूमने वाली रज्जुओं से बंधे रिक्त अयस-पात्र कूप के भीतर पहुँच कर जब पुनः लौटकर बाहर आते हैं तो ऊँचाई पर पहुँच कर निर्मल जल की धार छोड़ते हैं। इस क्रम के निरंतर चलने से निर्मित जल की मोटी धारा नालिका में पहुँच कर ईशान कोण के मायावी सरोवर की दिशा में प्रवाहित होने लगती है। जल राशि से उत्पन्न श्वेत फेन जल से पहले ही सरोवर तक पहुँच जाना चाहते हैं।

नालिका में तीव्रता से बहे जा रहे श्वेत फेन का पीछा करता हुआ प्रतनु मायावी सरोवर तक जा पहुँचा। जैसे ही उसने दृष्टि ऊपर उठाई तो आश्चर्य से जड़ हो कर रह गया। उसने देखा कि संसार के समस्त क्रियाकलापों से पूरी तरह निरपेक्ष, पूरी तरह मुक्त और पूरी तरह र्निद्वंद्व रानी मृगमंदा अपनी सखियों के साथ मायावी सरोवर में जलविहार में संलग्न है।

रानी मृगमंदा और उसकी सखियाँ जल-कुररियों  [1]की भांति सरोवर के एक कोण से दूसरे कोण तक तैरती हुई एक दूसरे से आगे निकल जाने की स्पर्धा कर रही हैं। रानी मृगमंदा की गति असाधारण रूप से तीव्र है। उसकी सखियाँ बार-बार उससे पीछे छूट जाती हैं।

प्रतनु को लगा कि जिस प्रकार रात्रि के समय स्वच्छ नील आकाश में तैरता हुआ चंद्रमा अन्य नक्षत्रों को पीछे छोड़ता हुआ चला जाता है उसी प्रकार रानी मृगमंदा अपनी सखियों को लगातार पीछे छोड़कर सरोवर के एक कोण से दूसरे कोण तक पहुँच जाती है। निऋति, हिन्तालिका और अन्य सखियाँ पराजय स्वीकार नहीं करना चाहतीं। वे रानी मृगमंदा पर नियम भंग करने का आरोप लगाती हैं। रानी मृगमंदा फिर से उन्हें ललकारती है और फिर से वही स्पर्धा आरंभ हो जाती है। फिर रानी मृगमंदा आगे निकल जाती है।

जल किल्लोल में संलग्न इन नागकन्याओं को देखकर प्रतनु को स्फटिक पर उत्कीर्ण प्रतिमा का स्मरण हो आया। कुछ-कुछ इसी तरह का दृश्य तो है वह। अचानक जैसे प्रतनु के मस्तिष्क रूपी आकाश में चेतना की विद्युत कौंधी। इस कौंध से उत्पन्न नवीन आलोक में प्रतनु ने जो कुछ देखा वही तो, ठीक वही तो वह इतने दिन से खोज रहा था।

हुआ यह कि सरोवर के कोण पर फिर से सर्वप्रथम पहुँचने के उल्लास में रानी मृगमंदा ने अंजुरि में जल भर कर अपनी दोनों बाहुएं ऊँची कीं और ढेर सारा जल आकाश में उछाल दिया। नीलमणि जल के सहस्रों बिंदु आकाश में छितरा गये। मानो किसी वृक्ष से सहस्रों पक्षी एक साथ आकाश में उड़ गये हों।

प्रतनु को प्रतीत हुआ कि आकाश में छितरा गये जलबिन्दु रूपी पक्षियों की फड़फड़हट सुनकर आकाश में उठी दोनों बाहुओं के मध्य स्थित सुवलय रूपी पक्षी भी अचानक कसमसा कर नींद से जाग पड़े और भयभीत हो अपने चंचु उठाकर आकाश में ताकने लगे।

नीचे गिरते जल बिंदुओं को देख रहे निर्ऋति के नेत्र इस प्रकार स्थित हो गये मानो दो मत्स्य आकाश से गिरने वाले स्वाति जल को ग्रहण करने के लिये प्रस्तुत हों। गिरते हुए जल बिन्दुओं को अंजुरि में भर लेने के प्रयास में हिन्तालिका की देह कटि प्रदेश तक जल से बाहर निकल आई। उसके क्षीण कटि प्रदेश पर सुशोभित नाभि के तीनों वलय जल के झीने आवरण को त्याग कर स्पष्ट दिखाई देने लगे।

यही तो, ठीक यही रहस्य तो प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है प्रतनु इतने दिनों से। प्रतनु के मुख पर स्मित मुस्कान दिखाई देने लगी। श्वेत स्फटिक पर उत्कीर्ण प्रतिमा का रहस्य खुल चुका है। प्रतनु रानी मृगमंदा के तीसरे प्रश्न का उत्तर पा चुका है। वह दबे पांव अपने प्रासाद में लौट आया। तीसरा प्रश्न अनायास ही सुलझ गया था।

उसी रात प्रतनु रानी मृगमंदा की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने मृगमंदा को बताया कि श्वेत स्फटिक प्रतिमा पर उत्कीर्ण प्रतिमा का मुख रानी मृगमंदा का है किंतु नेत्र निर्ऋति के हैं। दोनों बाहुएं हिन्तालिका की हैं किंतु उनके मध्य स्थित सुवलय रानी मृगमंदा के हैं। क्षीण कटि प्रदेश निऋ्र्रति का है किंतु उस पर उत्कीर्ण त्रिवलीय नाभि हिन्तालिका की है।

प्रतनु का उत्तर सुनकर रानी मृगमंदा आश्चर्य से जड़ रह गयी। जाने कितने पुरुष अब तक इस प्रश्न का उत्तर न दे पाने के कारण अनुचर बनकर रानी मृगमंदा की सेवा में संलग्न हैं किंतु यह पहला पुरुष है जिसने प्रतिमा के रहस्य को तोड़ा है। निश्चय ही प्रतनु प्रतिबंध [2] जीत चुका है।

रानी मृगमंदा ने उसी क्षण प्रतनु को अपना अतिथि घोषित किया और स्वयं अनुचरी के रूप में प्रतनु की सेवा में प्रस्तुत हो पूछने लगी कि वह अपने विलक्षण अतिथि को किस सेवा से संतुष्ट कर सकती है!

– अध्याय 23, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] मादा क्रौंच, एक जलचर पक्षी।

[2] शर्त।

राजन् (24)

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राजन्

मैं वैवस्वत मनुपुत्र सुरथ, आर्य प्रजा के कल्याण के लिये और आर्य जनपदों को संगठित करने के लिये जनपति अर्थात् राजन् होना स्वीकार करता हूँ।

आज प्रातःकालीन अग्निहोत्र के तत्काल पश्चात् विशेष समिति का आयोजन किया गया है। इस अवसर पर निकटवर्ती आर्य जनों से भी अतिथियों को आमंत्रित किया गया है। देवों के निमित्त अग्नि में पूर्णाहुति देने के बाद ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा अपने आसन से उठ खड़े हुए। उनके सुदीर्ध श्वेत श्मश्रु शीतल, मंद और सुगंधित वायु में लहराने लगे।

उन्होंने अपने समक्ष बैठे आर्य स्त्री-पुरुषों पर दृष्टिपात किया और गहन-गंभीर वाणी में आर्य सुरथ को सम्बोधित करके कहने लगे- ‘आर्य सुरथ! जिस प्रकार देवों ने अपनी रक्षा के निमित्त इन्द्र को अपना राजा स्वीकार किया था उसी प्रकार ‘तृत्सु-जन’ अपनी रक्षा के लिये आपको अपना जनपति बनाना चाहता हैं। जनपति उसी को बनाया जाना चाहिये जो जनपति होने के योग्य हो। गोप के रूप में आपने जन को श्रेष्ठ सेवायें दी हैं। आप हर तरह से जनपति होने के योग्य हैं। क्या आप जनपति बनना स्वीकार करते हैं ?’

  – ‘हाँ ऋषिश्रेष्ठ! यदि ‘तृत्सु-जन की प्रजा मेरे अधीन होना चाहती है तो मैं प्रजा के हित के लिये जनपति बनना स्वीकार करता हूँ।’

  – ‘आपके अधीन होने से पहले प्रजा आपसे कुछ प्रश्नों के उत्तर जानना चाहती है।’

  – ‘मैं प्रजा के प्रश्नों का उत्तर देने के लिये प्रस्तुत हूँ ऋषिश्रेष्ठ।’

  – ‘आर्य! प्रजा जानना चाहती है कि जब प्रजा आपके अधीन हो जायेगी तब क्या आप प्रजापति बनकर उसी प्रकार अपनी प्रजा का रक्षण, पालन और पोषण करेंगे जिस प्रकार माता अपनी संतान का रक्षण, पालन और पोषण करती है ?’

  – ‘हाँ ऋषिवर! यदि प्रजा हृदय से मेरी अधीनता स्वीकार करती है तो मैं उसी प्रकार प्रजा का रक्षण, पालन और पोषण करूंगा जिस प्रकार माता अपनी संतान का रक्षण, पालन और पोषण करती है।’ गोप सुरथ ने शांत स्वर में उत्तर दिया।

  – ‘वत्स! प्रजा आपसे वचन चाहती है कि आप सदैव व्यक्तिगत स्वार्थ को त्यागकर प्रजा के हित में अपने आप को समर्पित करेंगे। प्रजा का हित ही आपका सर्वोपरि धर्म होगा।’

– ‘ऋषिश्रेष्ठ! प्रजा को ऐसे वीर पुरुष के आदेशों का पालन करना चाहिये जो शर-बाण हाथ में लेकर आदेश दे तथा मन, शक्ति एवं वाणी से प्रजा का पालन करे। [1] यदि प्रजा मेरे आदेशों का पालन करने को तत्पर है तो मैं वचन देता हूँ कि मैं अपने स्वार्थ को त्यागकर प्रजा का पालन करूंगा। प्रजा का हित ही मेरा सर्वोपरि धर्म होगा।’

 – ‘पुत्र! प्रजा मेरे माध्यम से आपको यह कहना चाहती है कि यदि आपके अधीन रहकर प्रजा दुःखी रहेगी तो आप नर्क के अधिकारी होंगे।’

  – ‘ऋषिवर! मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं यथाशक्ति प्रजा को सुखी करने का उपाय करूँगा। यदि मेरे प्रमाद के कारण प्रजा दुखी होती है तो अग्नि मुझे नर्क प्रदान करे।’

  – ‘हे वीर! प्रजा यदि आपके प्रमाद के कारण पापाचार की तरफ प्रवृत्त होती है तो आप भी उस पापाचार के भागी होंगे और यदि आपकी अनुगत होकर प्रजा शुभ आचरण की ओर प्रवृत्त होती है तो प्रजा के मंगल आपको भी प्राप्त होंगे। इसी प्रकार आपके सुकृत्य और कुकृत्य स्वतः ही प्रजा को प्राप्त हो जायेंगे।’

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ! मैं सदैव सुकृत्य करके प्रजा को शुभ आचरण की ओर प्रवृत्त करने का प्रयास करूंगा।’

  – ‘आर्य सुरथ! प्रजापति बनकर आप निरंकुश आचरण नहीं करेंगे। समिति की सम्मति से ही आप प्रजा का अनुशासन करेंगे।’

  – ‘मैं प्रजा के अनुशासन में रह कर ही प्रजा का अनुशासन करूंगा।’

  – ‘उचित है आर्य! हम समिति में आपको जन के प्रजापति का उच्च स्थान देते हैं। आज से आप इस जन के प्रजापति हैं। ‘तृत्सु-जन’ के समस्त परिवार, कुल, गा्रम और विश आपकी प्रजा होने के कारण आपके अधीन हैं। जन आपको राजन् कहकर सम्बोधित करेगा।’

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा की घोषणा के साथ ही आर्यवीरों ने शंख और सिंही से मंगल ध्वनि उत्पन्न की। प्रजा ने राजन् सुरथ की जय-जयकार की। बड़ी संख्या में घण्ट, घड़ियाल और नगाड़े बजने लगे। मंगलमय तुमुल नाद से चारों दिशायें व्याप्त हो गयीं। ऋषिवर पर्जन्य ने आगे बढ़कर राजन् सुरथ के भाल पर रक्तचंदन का तिलक अंकित किया। आर्य ललनाओं ने राजन् सुरथ पर पुष्पवर्षा की।

मंगल ध्वनि के विराम पा जाने के पश्चात् राजन् सुरथ प्रजा को सम्बोधित करने के लिये उठ खड़े हुए। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा एवं समस्त ऋषियों को प्रणाम करने के पश्चात् उन्होंने प्रजा की ओर अभिवान की मुद्रा में शीश झुकाया। राजन् सुरथ के मुखमण्डल पर इस समय दिव्य ओज विराजमान था।

उन्होने एक दृष्टि समक्ष उपस्थित आर्य जन पर डाली और कहा- ‘मैं वैवस्वत मनुपुत्र सुरथ, आर्य प्रजा के कल्याण के लिये और आर्य जनपदों को संगठित करने के लिये जनपति अर्थात् ‘राजन्’ होना स्वीकार करता हूँ। आप सबकी समिति [2] से मैं जन की शक्ति को संगठित करने के लिये कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। मैं ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा से प्रार्थना करता हूँ कि वे जन का पुरोहित होना स्वीकार करें। पुरोहित होने के नाते उनका कत्र्तव्य होगा कि वे जन तथा जनपति के कल्याण के निमित्त यज्ञ आदि शुभ कर्मों का संपादन करें और करवायें। शांति काल में वे जन तथा जनपति दोनों का मार्ग दर्शन करें तथा उन्हें सदाचरण के लिये प्रेरित करें। युद्ध का अवसर उपस्थित होने पर वे युद्ध भूमि में रहकर देवों को संतुष्ट करें तथा जन तथा जनपति की सफलता के लिये दैवीय सहायता प्राप्त करें।’

  – ‘राजन्!  जन तथा जनपति के कल्याण के लिये मैं पुरोहित होना स्वीकार करता हूँ।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने स्वीकरोक्ति प्रदान की।

  – ‘मैं जन की शक्ति के विस्तार के लिये आर्य सुनील को जन का ‘सेनप’ नियुक्त करता हूँ। सेनापति होने के नाते उनका कत्र्तव्य होगा कि वे आर्य वीरों को युद्धकौशल प्रदान करें। वे राजन् के अनुशासन में रहकर शत्रुओं से जन का रक्षण करें।’

  – ‘मैं जन के रक्षण हेतु राजन् सुरथ का अनुशासन स्वीकार करता हूँ।’ आर्य सुनील ने स्वीकृति प्रदान की।

  – ‘राजन् की सहायता के लिये ग्राम का अनुशासन करने वाले-ग्रामणी, रथ हाँकने वाले-सूत, रथ बनाने वाले-रथकार और काष्ठ, मृदा, प्रस्तर, ताम्र, कांस्य तथा लौह आदि सामग्री से विभिन्न वस्तुएं बनाने वाले-कर्मार को जन का ‘रत्नी’ नियुक्त किया जाता है। समस्त रत्नी राजन् के आदेश प्राप्त होने पर तत्काल उपस्थित होंगे। ग्रामणी जब राजन् के समक्ष उपस्थित होगा तो वह प्रजा का प्रतिनिधित्व करेगा। वह प्रजा की आवश्यकतायें और समस्याएं राजन् के समक्ष रखेगा और जब वह प्रजा के मध्य होगा, तब वह राजन् के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेगा। प्रजा तक राजाज्ञा पहुँचाने का कार्य ग्रामणी ही करेगा।’

समिति में उपस्थित समस्त ग्रामणी, सूत, रथकार और कर्मारों ने जन के हित के लिये राजन् का ‘रत्नी’ हो जाना स्वीकार कर लिया। क्षण भर विराम देकर राजन् सुरथ ने फिर से अपना उद्बोधन आरंभ किया- ‘असुरों के विरुद्ध सैन्य अभियानों का संचालन सुचारू रूप से करने तथा जन को विस्तार देकर जनपद का निर्माण करने के लिये हमें कुछ नवीन कर्मारों की आवश्यकता होगी।

इसके लिये हमें पुरप, [3] स्पश [4] और दूत नियुक्त करने होंगे। असुरों के विरुद्ध युद्ध अभियान के समय जन को सुरक्षित रखने का कार्य ‘पुरप’ का होगा। असुरों की गतिविधियों का समय रहते पता लगाकर राजन् को सूचित करने का कार्य ‘स्पश’ का  होगा। युद्ध काल उपस्थित होने पर राजन्, जन और सैन्य के बीच संवाद एवं सूचनाओं का आदान प्रदान करने तथा शत्रु के साथ संधि-विग्रह के संदेश पहुँचाने का कार्य ‘दूत’ द्वारा किया जायेगा।’

अपनी बात पूरी करने से पूर्व राजन् सुरथ कुछ क्षण के लिये रुके और स्त्रियों की ओर दृष्टिपात करके बोले- ‘एक बात और है जो विशेष रूप से मैं इस अवसर पर आर्य ललनाओं से कहना चाहता हूँ,। दीर्घ काल से मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि आर्य ललनायें शिशुओं के पालन-पोषण एवं गौरस आदि के कार्य में संलग्न रहने के कारण सभा एवं समितियों से विमुख रहने लगी हैं। यह प्रवृत्ति उचित नहीं है।

स्वायंभू प्रजापति वैवस्वत मनु ने स्त्री और पुरुष दोनों को प्रजा का एक-एक नेत्र बताया है। यह निश्चित है कि जिस प्रजा का एक नेत्र अंधकार में हो, वह प्रजा उन्नति के स्थान पर अवनति के मार्ग पर चल पड़ती है। स्त्रियों को गुहाचरंति [5] की प्रवृत्ति न अपना कर सभावती [6] ही बने रहना होगा। आर्य प्रजा के कल्याण के लिये यह अत्यंत आवश्यक है।’

  – ‘हे जितेन्द्रिय नायक! तेजस्वी पुरुष! आप दुष्ट लोगों का नाश करने वाले बनें। सूर्य के समान तेजस्वी बनें। प्रजाजनों से मधुर वचन बोलने वाले बनें। आप लक्ष्य संधान कर हमारे अबंधुओं को, हमारे विपरीत चलने वालों को तथा हमारा नाश करने को तत्पर शत्रुओं को दबा दें।’[7] पुरोहित सौम्यश्रवा ने खड़े होकर राजन को आशीर्वाद दिया।

– अध्याय 8, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] मनो न येषु हवनेषु तिग्मं विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता। आ यः शर्याभिस्तुविनृम्णो अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तौ। (ऋ. 10. 61. 4)

[2] आगे चलकर यह शब्द सम्मति में बदल गया।

[3] आगे चलकर यह पद दुर्गपति में बदल गया।

[4] गुप्तचर, अंग्रेजी भाषा के स्पाई शब्द की उत्पत्ति इसी शब्द से हुई है।

[5] गुफा में रहने वाली।

[6] सभा में भाग लेने वाली।

[7] अयमग्निर्वध्रश्वस्य वृत्रहा सनकात्प्रेद्धो नमसोपवाक्यः। स नो अजामीँरुत वा विजामीनभि तिष्ठ शर्धतो वाध्यश्व।। (ऋ. 10 . 69. 12/20)

घोषित अतिथि (25)

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घोषित अतिथि

रानी मृगमंदा का घोषित अतिथि बन जाने के बाद प्रतनु को नागों के पुर में विशेष अधिकार प्राप्त हो गये। अब वह कहीं भी बिना रोक-टोक जा सकता था। प्रतनु ने अनुभव किया कि न केवल रानी मृगमंदा और उसकी सखियाँ अपितु समस्त नाग अनुचर, सैनिक एवं प्रहरी भी प्रतनु को विशेष सम्मान देते हैं।

नागों के इस पुर में रहते हुए प्रतनु ने देखा कि नाग प्रजा ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सैंधवों से कहीं अधिक उन्नति की है। किसी प्रजा का व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन इतना सुसंगठित हो सकता है, इसकी तो सैंधवों ने अभी कल्पना भी नहीं की है। प्रतनु ने सूक्ष्मता से नागों की जीवन शैली का अवलोकन किया।

नागों के पास सैंधवों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ बीज, काष्ठ हल एवं अश्व उपलब्ध हैं। सैंधव तो खेत में स्वयं हल को खींचते हैं किंतु नाग अपने हलों को वृषभ तथा अश्वों की सहायता से खींचते हैं। प्रतनु ने अपने पिता से सुना था कि आर्यों के पास अश्व नामक  दृढ़ पशु है जिसपर बैठकर उन्होंने कालीबंगा को ध्वस्त किया था। उसी अश्व को नागों के पास देखकर वह आश्चर्य चकित था।

प्रतनु ने अनुभव किया कि सैंधवों की अपेक्षा नागों ने शिल्प, स्थापत्य, संगीत, नृत्य एवं ललित आदि कलाओं में अधिक कौशल अर्जित किया ही है, नागों की सामाजिक एवं शासकीय व्यवस्था भी श्रेष्ठ है। अपनी प्रजा को शत्रुओं से बचाने के लिये नागों ने युद्ध कला में जो कौशल अर्जित किया है, वह नागों का सर्वाधिक विलक्षण गुण है।

प्रतनु को ज्ञात हुआ कि जिस विवर को उसने अब तक देखा है वह तो नागों का एक लघु दुर्ग मात्र है जिसे नागों के राजा की सुरक्षा के लिये इस तरह बनाया गया है कि किसी शत्रु की दृष्टि उस पर न पड़ सके। पहले नागों का राजा  इस दुर्ग में न रहकर नाग प्रजा के साथ प्राचीन पुर में स्थित अपने प्रासाद में रहता था किंतु पिछले राजा ‘नागराज कर्कोटक’ के समय गरुड़ों ने छल से प्रासाद में प्रवेश करके नागराजा की हत्या कर दी थी।

उसके बाद इस विवर में गुप्त दुर्ग का निर्माण किया गया। इस विवर तक पहुँचने के मार्ग इतने दुर्गम हैं कि सहसा तो कोई शत्रु यहाँ तक पहुँच ही नहीं सकता। यदि कोई शत्रु विवर के बाहरी प्रवेश द्वार तक पहुँच ही जाये तो भी प्रवेश द्वार से राजप्रासाद तक पहुँचने तक के मार्ग में इस तरह के गुप्त यंत्र लगाये गये हैं कि शत्रु के प्रवेश की सूचना दुर्ग के प्रत्येक रक्षक को स्वतः हो जाती है और शत्रु बंदी बना लिया जाता है।

विवर दुर्ग में स्थित राजप्रासाद से नागों के पुर तक पहुँचने के लिये भी गोपनीय मार्ग बना हुआ है। इस मार्ग पर भी गोपनीय यंत्र लगे हुए हैं जो अवांछित व्यक्ति के प्रवेश की सूचना राजप्रासाद के रक्षकों तक पहुँचा देते हैं। नागों की रक्षण व्यवस्था देखकर प्रतनु को आश्चर्य हुआ। नागों ने अपने शत्रु से छिपने के लिये ही नहीं अपितु शत्रु का प्रतिरोध करने के भी विशेष प्रबंध कर रखे हैं। अश्वारूढ़ नाग सैनिकों को तलवार चलाते हुए देखकर तो आश्चर्य से दांतो में अंगुली दबा ली प्रतनु ने।

यद्यपि नाग इसे लघु दुर्ग कहते हैं किंतु प्रतनु को यह अत्यंत विशाल प्रतीत होता था। प्रतनु ने अनुमान किया कि यदि यह लघु दुर्ग है तो नागों का मुख्य पुर कितना विशाल होगा! इस विशाल दुर्ग में प्रतनु के पथ प्रदर्शन के लिये हिन्तालिका अथवा निर्ऋति सदैव उसकी सेवा में उपस्थित रहती थीं।

उन्होंने ही प्रतनु को बताया था कि नागराज कर्कोटक के कोई पुत्र नहीं था इसलिय नागराज की हत्या हो जाने के बाद नागों ने नागराज की पुत्री राजकुमारी मृगमंदा को अपनी रानी चुन लिया है। हिन्तालिका और निर्ऋति रानी मृगमंदा की ही लघु भगिनियां हैं किंतु रानी की सेवा में सखि और अनुचरी की भांति रहती हैं ताकि रानी के साथ किसी तरह का छल न हो सके। रानी मृगमंदा युवती हो जाने पर भी अब तक अविवाहित है।

हिन्तालिका और निर्ऋति ने प्रतनु को बताया कि रानी मृगमंदा ने प्रण किया है कि वह अपने से अधिक बुद्धिमान और योग्य पुरुष से विवाह करेगी और वही पुरुष नागों का अगला राजा होगा। नाग प्रजा के नियम के अनुसार नाग युवतियाँ शत्रु प्रजा को छोड़कर किसी भी प्रजा के युवक से विवाह कर सकती है किंतु रानी होने के कारण रानी मृगमंदा को किसी नाग युवक से ही विवाह करना होगा क्योंकि नागों के नियम के अनुसार नागों का राजा नाग ही हो सकता है, अन्य प्रजा से आया हुआ व्यक्ति नहीं।

  – ‘यदि रानी मृगमंदा किसी नागेतर [1] युवक से विवाह कर ले तो ?’ हिन्तालिका की बात सुनकर प्रतनु ने प्रश्न किया।

  – ‘क्या सैंधव पथिक ने रानी मृगमंदा को वरण [2] करने का निश्चय कर लिया है ?’ हिन्तालिका ने मुस्कुराते हुए पूछा।

प्रतनु पहले से ही जानता था कि उसके प्रश्न के उत्तर के रूप में एक नया प्रश्न उसके सामने आयेगा किंतु अब वह पहले की भांति हिन्तालिका और निर्ऋति के प्रश्नों से घबराता नहीं है। अतः बोला- ‘ ऐसा ही समझ लो।’

  – ‘तो मृगमंदा नागों की रानी नहीं रह सकेगी। उसके स्थान पर किसी अन्य को नागों का राजा बनाया जायेगा तथा रानी मृगमंदा को या तो उस युवक के साथ नागों का पुर त्याग कर जाना होगा या फिर सामान्य प्रजा के रूप में रहना होगा।’

  – ‘तो ठीक है, रानी मृगमंदा को मेरे साथ सप्तसैंधव प्रदेश चलने के लिये तैयार रहना चाहिये।’ प्रतनु ने मुस्कुराकर कहा।

  – ‘क्या सचमुच ऐसा भयानक विचार आपके मस्तिष्क में है पथिक!’ हिन्तालिका ने प्रतनु के हास्य का उत्तर हास्य से ही दिया।

  – ‘इसमें भयानक होने की क्या बात है ? क्या मैं रानी मृगमंदा के योग्य नहीं ?’

प्रतनु केवल परिहास कर रहा था किंतु हिन्तालिका उसका प्रश्न सुनकर गंभीर हो गयी। उसका पूरा चेहरा प्रश्नवाचक मुद्रा में तन गया प्रतीत होता था।

  – ‘क्या रानी मृगमंदा ने आपसे ऐसा कोई प्रस्ताव किया है ?’

  – ‘नहीं तो, क्यों ?’ इस बार चैंकने की बारी प्रतनु की थी।

  – ‘आपको संभवतः ज्ञात नहीं कि हम तीनों बहिनों ने प्रतिज्ञा कर रखी है कि हम तीनों एक ही पुरूष से विवाह करेंगी और उस पुरुष का चुनाव बड़ी बहिन होने के नाते रानी मृगमंदा करेंगी। यदि रानी मृगमंदा ने आपको चुन लिया है तो आपको मुझसे और हिन्तालिका से भी विवाह करना होगा।

  – ‘यदि ऐसी बात है तो मुझे रानी मृगमंदा से विवाह करने का निश्चय त्यागना होगा।’ मंद हास्य के साथ प्रतनु ने अपनी बात कही। वह पुनः परिहास पर उतर आया था।

  – ‘क्यों ? क्या मैं और निर्ऋति आपको अच्छी नहीं लगतीं ?’

प्रतनु ने अनुभव किया कि यह चर्चा हास्य की परिधि से बाहर निकलकर गंभीर होती जा रही है। अतः विनोद त्याग कर बोला- ‘तुम और निर्ऋति भी मुझे उतनी ही अच्छी लगती हो जितनी कि रानी मृगमंदा किंतु मैं तो यह सब तुमसे परिहास में कह रहा था। मेरा कोई विचार नहीं है कि मैं रानी मृगमंदा से विवाह करूँ। न ही रानी मृगमंदा ने इस विषय में मुझसे कुछ कहा है।’

  – ‘यदि रानी मृगमंदा आपके साथ विवाह का प्रस्ताव रखें तो भी आप मना कर देंगे?’

  – ‘हाँ! मैं उनसे विवाह के लिये मना कर दूंगा ?’

  – ‘क्यों ?’

  – ‘क्योंकि मैं प्रतिज्ञाबद्ध हूँ।’

  – ‘कैसी प्रतिज्ञा ?’

  – ‘प्रतिशोध की प्रतिज्ञा।’

  – ‘प्रतिशोध! कैसा प्रतिशोध ?’

प्रतनु नहीं चाहता था कि मोहेन-जो-दड़ो में उपस्थित हो गये अप्रिय प्रसंग को वह हिन्तालिका अथवा किसी अन्य से कहे किंतु जब एक बार प्रसंग छिड़ ही गया तो उसने मोहेन-जो-दड़ो के वार्षिकोत्वस से लेकर नृत्यांगना रोमा की प्रतिमा बनाने, पशुपति महालय के पुजारी द्वारा सैंधव राजधानी से निष्कासित किये जाने तथा रोमा के अभिसार और प्रणय निवेदन करने व प्रतनु द्वारा देवी रोमा को किलात के चंगुल से मुक्त करवाने का प्रण करने तक की सारी घटनायें कह डालीं।

प्रतनु का प्रत्युत्तर सुनकर हिन्तालिका आश्चर्य से मौन हो गयी। उसे इस बात पर विश्वास करना काफी कठिन हो गया कि इस क्षीण काया में सिमटा शिल्पी एक सम्पूर्ण सत्ता से टकराने और उससे प्रतिशोध लेने का संकल्प कर सकता है। उसने प्रतनु के विवरण पर कोई टिप्पणी नहीं की। एक बात वह अनुभव करती थी कि अत्यंत सामान्य दिखाई देने वाला यह युवक अत्यंत प्रतिभावान है। इसका सबसे बड़ा कमजोर पक्ष यह है कि यह युद्धकला से अनभिज्ञ है। फिर भी कौन जाने यह सचमुच ही एक दिन अपने संकल्प पूरे कर ले! काफी देर तक वह प्रतनु को नागों का दुर्गम विवर दुर्ग दिखाती रही।

– अध्याय 25, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] नाग के अतिरिक्त।

[2] विवाह हेतु चुनना

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