प्रतनु ने विशाल अमल-धवल प्रासाद में प्रवेश किया। मोहेन-जो-दड़ो के जिस विशाल और समृद्ध पशुपति महालय को देखकर प्रतनु ने दांतो तले अंगुलि दबा ली थी, वह महालय इस प्रासाद की भव्यता और विशालता के सामने कुछ भी नहीं था। प्रासाद के गगनोन्नत तोरण द्वार में प्रवेश करने के पश्चात् प्रतनु को विस्तृत प्रांगण दिखाई पड़ा। शीत-श्वेत-सुचिक्कण स्फटिक से निर्मित प्रांगण की धरती पर प्रतनु के पांव फिसले पड़ रहे हैं। बहुत संभल कर चलना पड़ रहा है प्रतनु को अन्यथा किसी भी क्षण गिर पड़ने का भय है।
अमल-धवल प्रासाद के प्रांगण को पार करके वह मण्डप सदृश भवन में पहुँचा। मण्डप का नयनाभिराम शिल्प अकल्पनीय, अवर्णनीय और अचिंतनीय है। इस गोलाकर भवन की भित्तियाँ एक विशाल वर्तुलाकार कक्ष का निर्माण कर रही हैं वहीं उसकी छत ऊपर से निरंतर संकीर्ण होते जाते स्फटिक वलयों से निर्मित है।
प्रतनु ने अनुमान किया कि बाहर से दिखाई देने वाले शिखर का आधार यही मण्डप है। इस विशाल मण्डल की समाप्ति हुई एक और भव्य मण्डप में। इसकी भव्यता प्रथम मण्डप की अपेक्षा सहस्र गुणा अधिक है। मण्डप की वलयाकार भित्तियों के आधार भाग में विभिन्न पशु-पक्षियों की प्रतिमायें उत्कीर्ण हैं। कुछ प्रतिमाओं में उत्कीर्ण पशु-पक्षी प्रतनु ने पहले कभी नहीं देखे हैं, न ही उनके बारे में कुछ सुना है।
मण्डप की वलयाकार भित्तियों के मध्य भाग में निर्मित प्रतिमायें नाग प्रजा के भोग-विलास, समृद्धि और आनंद की परिचायक हैं। अनेक प्रतिमाओं में नाग स्त्री-पुरुष विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र बजाते हुए दर्शाये गये हैं। हिन्तालिका और निर्ऋति ने इन वाद्ययंत्रों का परिचय प्रतनु को दिया। इनमें से कई वाद्ययंत्र ऐसे थे जिनके बारे में प्रतनु ने पहली बार जाना था। कई तरह के सुषिर वाद्य। जिन्हें प्रतनु ने सैंधवों के पास नहीं देखा था। तत् वाद्यों की तो भरमार ही थी। अवनद्ध वाद्यों की भी कोई गिनती नहीं थी। जाने
कौन-कौन से वाद्य! घनवाद्यों में भी कई विचित्र वाद्य उत्कीर्ण किये गये थे। इनका अंकन इतनी कुशलता से किया गया था मानो अभी रंगशाला जीवित हो उठेगी और समस्त वाद्य एक साथ बज उठेंगे।
प्रतनु ने देखा कि विभिन्न मुद्राओं में नृत्यरत नाग स्त्री-पुरुषों के अंग-प्रत्यंग नृत्य भंगिमओं से एकाकार हो गये प्रतीत होते हैं। कितनी ही तरह के नृत्य, कितनी ही तरह की मुद्रायें, कितनी ही तरह की भाव-भंगिमायें, कोई पार ही नहीं है। कुछ नाग युगल मिथुनावस्था में उत्कीर्ण हैं। मिथुन की भी शत-शत भंगिमायें।
कहीं कोई नाग अपनी प्रेयसी को अंक में लिये बैठा है तो कहीं किसी नाग कन्या के अंगों से सौंदर्य का झरना ही फूटा पड़ रहा है। कुछ मिथुन मूर्तियों में उत्कीर्ण नाग युगलों का अधोभाग सर्प की पुच्छ के सदृश उत्कीर्ण किया गया है। कामक्रीड़ा और मनोविनोद में संलग्न इन प्रतिमाओं को देखकर नागों के जीवन में छाये उल्लास, उमंग और रंगों का अनुमान लगाना कितना सहज है। शताब्दियों से गरुड़ों से जूझते आ रहे नाग इतने प्रसन्न और उल्लसित कैसे रह लेते हैं! प्रतनु ने अपने आप से प्रश्न किया।
एक स्फटिक पट्टिका पर नागकन्याओं को सरोवर में स्नान करते हुए अंकित किया गया है। अनेक नागकन्याओं के मध्य घिरी हुई मदमत्त हस्तिनी सी उल्लसित और निर्भय दिखाई देने वाली एक नागकन्या अपनी सुवलयाकार गौरांग भुजाओं से जलराशि को आकाश में उछाल रही है।
आकाश में उछले हुए जलबिन्दुओं को देखती हुई नागकन्या अपने मत्स्याकार नेत्रों को इस प्रकार आकाश की ओर उठाये हुए है मानो कोई मीन युगल आकाश से टपकने वाले स्वाति-जल की अभिलाषा में मुख खोले खड़ा हो। नागकन्याओं की केशराशि में अटके हुए जलबिंदु ऐसे जान पड़ते हैं मानो अब टपके, अब टपके।
जलराशि को आकाश में उछालने के क्रम में आकाश में ऊपर को उठी गौरांग भुजाओं के मध्य दो सुविस्तृत सुचिक्कण वलयों पर आ बैठे जलबिन्दु ऐसे दिखाई देते हैं मानो उनमें गौरांग देह के स्पर्श हेतु प्रतिस्पर्धा मची हो। नागकन्या के क्षीण कटि प्रदेश का कुछ भाग जल से बाहर निकला हुआ है। जलराशि के झीने आवरण में अंकित मनोहारी नाभि सृष्टि के सृजन केन्द्र की भांति प्रतीत होती है। नीचे का भाग नीलमणि जलराशि में डूबा हुआ है।
– ‘किसकी प्रतिमा है यह ?’ प्रतनु ने निकट खड़ी निऋति से प्रश्न किया।
– ‘नाग कन्याओं के जल विहार की।’ निर्ऋति ने मुस्कुराकर उत्तर दिया।
– ‘केन्द्र में उत्कीर्ण नागकन्या कौन है ?’
– ‘यह तो मैं हूँ। इतना भी नहीं पहचान सकते!’ हिन्तालिका बोली।
– ‘नहीं-नहीं यह तो मैं हूँ। शिल्पी ने मेरा ही अंकन किया है।’ निर्ऋति ने कहा। दोनों नागकन्यायें एक दूसरे को भेदभरी मुस्कान से देख रही हैं, यह देखकर प्रतनु ने अनुमान किया कि यह प्रतिमा इन दोनों में से किसी की नहीं है। यह सही है कि निर्ऋति और हिन्तालिका अनुपम सुंदरियाँ हैं किंतु इनकी तुलना प्रतिमा में अंकित सौंदर्य से नहीं हो सकती। किंतु मुखाकृति ? विस्मय में पड़ गया प्रतनु!
प्रतिमा की मुखाकृति कुछ-कुछ निर्ऋति से और कुछ-कुछ हिन्तालिका से मिल रही है। सचमुच ही यह तो इन दोनों में से ही किसी की प्रतिमा है किंतु किसकी ? नहीं-नहीं यह प्रतिमा इन दोनों में किसी से मेल नहीं खाती। हो न हो यह रानी मृगमंदा की प्रतिमा हो किंतु इसे ये दोनों अपनी क्यों बता रही हैं। कोई न कोई रहस्य अवश्य है किंतु क्या ? समझ नहीं सका प्रतनु।
– ‘किस संशय में पड़ गये पथिक ?’
– ‘सोच रहा हूँ कि क्या दो युवतियों की एक ही प्रतिमा बन सकती है।’ प्रतनु का संशय सुनकर दोनों नागकन्यायें खिलखलाकर हँस पड़ी।
– ‘केवल दो युवतियों की ही नहीं, एक युवती और भी है जो इस प्रतिमा को अपनी बताती है।’ निऋति ने भेदभरी मुस्कान अपनी बड़ी-बड़ी आंखों में छिपा कर कहा।
– ‘तीसरी युवती कौन सी है ?’
– ‘वह स्वयं ही आपसे कहेगी कि यह प्रतिमा उसकी है।’ निऋति ने प्रतनु को आगे बढ़ने का संकेत किया।
जनपदों की संगठित शक्ति न केवल असुरों से अपनी रक्षा करने में समर्थ होगी अपितु असुरों का दमन भी कर सकेगी। इन्हीं विचारों में डूबते उतरते जाने कब गोप सुरथ की आँख लगी और आर्य सुरथ का चिंतन कब समाप्त हुआ, उन्हें पता ही नहीं चला।
दिन भर के संग्राम के पश्चात् जहाँ अन्य आर्य गाढ़ी निद्रा में सोये हुए हैं, गोप सुरथ को नींद नहीं आ रही। आज के अग्निहोत्र में असुरों ने अचानक आक्रमण कर विध्वंस मचाया। जाने कहाँ से वे अकस्मात् प्रकट हुए और अग्निहोत्र में पशुओं का रक्त डाल कर अट्टहास करने लगे।
आज से पहले तक असुर छिपकर ही आर्यों को हानि पहुँचाते रहे हैं। आर्य सुरथ की स्मृति में यह पहला अवसर था जब रक्त पिपासु असुरों का दल आर्यवीरों के भय की चिंता न करके जन तक चला आया था। इस दुःसाहस का क्या अर्थ है ? क्या उनकी संख्या और बल इतने बढ़ गये है कि अब उन्हें आर्यों से सम्मुख युद्ध करने में भी संकोच नहीं होता।
गोप सुरथ के मस्तिष्क में विचारों की आँधी सी उमड़ रही है। असुरों के बढ़ते दुःसाहस और शत्रु-भाव को लेकर चिंतित हैं वे। कैसे किया जाये इनका दमन ? इनके कारण किसी समय जन पर बड़ा संकट आ सकता है।
जब एक बार वैमनस्य उत्पन्न हो जाता है तो उसे समाप्त करना प्रायः संभव नहीं होता। एक ही प्रजापति की संतान होने के उपरांत भी दुष्ट असुर, देव प्रजा से अकारण वैमनस्य रखते थे। जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया देवों और असुरों का यह वैर पुष्ट होता गया जिसके कारण सहस्रों वर्षों तक देवासुर संग्राम चलते रहे। इन संग्रामों के कारण असुरों को भले ही कुछ लाभ नहीं हुआ किंतु देव प्रजा का बल निरंतर क्षीण होता रहा।
इतिहास के कई प्राचीन पृष्ठ खुल रहे हैं गोप सुरथ के विचारों में। प्रजा को संत्रास देने के लिये जब असुर वृत्र ने वरुण को बांध लिया तो प्रजा की रक्षा के लिये इन्द्र ने वृत्र को मारकर वरुण को असुरों के प्रभाव से मुक्त करवाया और उसे देवत्व प्रदान दिया। तब देवों ने भी पुरानी बातों को भूलकर वरुण को अपना मित्र घोषित किया था किंतु वरुण पुत्र ‘बल’ और वरुण पुत्री वारुणि [1] ने देवों से वैमनस्य समाप्त नहीं किया। बल और वारुणि के प्रभाव से असुरों का अधर्म और भी बढ़ गया।
महा-जलप्लावन के बाद जब देव प्रजा अपने सम्पूर्ण बल और वैभव के साथ समाप्त हो गयी तब मृत्यु के मुख में जाने से शेष रहे वैवस्वत मनु ने प्रजापति बनकर मनुष्य समाज का निर्माण किया। कम से कम तब तो असुरों को अपना वैरभाव और दुराचरण त्याग देने चाहिये थे।
देव नहीं रहे हैं किंतु उनके अंशों से उत्पन्न मनुष्यों से भी असुरों ने उसी प्रकार का शत्रु भाव बनाये रखा है। वे अकस्मात् आक्रमण करके गौओं का वध कर देते हैं। सोम उजाड़ देते हैं। स्त्रियों और बालकों को उठा ले जाते हैं और उनकी बलि चढ़ा देते हैं। उन्हीं के कारण मनुपुत्रों को अपने ग्रामों का संयोजन कर जनों का निर्माण करना पड़ा है।
समस्या केवल असुरों की ही नहीं है। आर्य कुल परस्पर भी प्रतिद्वंद्विता रखने लगे हैं। वे अपना सम्पूर्ण बल एकत्र करके असुरों का दमन करने के स्थान पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। कुछ समझ नहीं पाते आर्य सुरथ। क्या अंत है इस समस्या का! मनु ने प्रजा का संगठन करते समय कभी नहीं सोचा होगा कि उनके वंशज परस्पर युद्धों में लग जायेंगे और असुरों को अपनी मन-मानी करने का अवकाश मिल जायेगा।
आर्य सुरथ ने सुना है कि सिंधु के निचले तटों पर स्थित दिल्मुन, मगन तथा मेलुह्ह [2] आदि पुरों में भी असुरों का प्रभाव बढ़ने लगा है। उनमें सुरा और मांस भक्षण का प्रचलन बढ़ गया है। पणियों के प्रभाव से उनमें हिरण्य संचय करने और वस्तुओं के क्रय-विक्रय करने की संस्कृति का खूब प्रसार हो गया है।
उन्होंने विशाल भवनों का निर्माण करके बड़े-बड़े पुर स्थापित कर लिये हैं। सैंधव अग्नि की पूजा नहीं करते। न ही यज्ञादि श्रेष्ठ कर्मों में उनकी रुचि है। वे असुरों की ही भांति अग्नि को नहीं वरुण को सबसे बड़ा देवता समझते हैं। वे भी असुरों की भांति अपने शीश पर शृंग धारण करते हैं।
प्रजापति के स्थान पर प्रजननदेव की पूजा करते हैं। गौओं के स्थान पर ऊंचे कूबड़ वाले वृषभों की पूजा करते हैं। आर्य सुरथ ने तो यह भी सुना है कि वे आसुरि प्रवृत्ति के विशाल आयोजन करते हैं जिनमें सैंधव स्त्रियाँ सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र होकर नृत्य करती हैं।
बेचैनी के कारण शैय्या त्याग कर उठ खड़े होते हैं आर्य सुरथ। उन्होंने तो यहाँ तक सुना है कि सैंधवों ने स्त्रियों की नग्न प्रतिमायें बनाकर उनका पूजन प्रारंभ कर दिया है। उनके अधर्म का अंत यहाँ तक ही नहीं हो जाता। वे तो शिश्न और योनि की भी पूजा करने लगे हैं। शिश्न और योनियों का अभिषेक सरिताओं के पवित्र जल, मधु और गौओं के दुग्ध से करने लगे हैं।
व्यथित हो उठते हैं आर्य सुरथ। प्रजापति मनु ने जो स्वप्न देखा था, क्या वह मानव सभ्यता के इस प्रथम चरण में ही नष्ट हो जायेगा! प्रजापति ने चाहा था कि सम्पूर्ण सैंधव क्षेत्र में आर्य प्रजा का प्रसार हो। जहाँ-जहाँ तक दिशाओं की सीमा है, वहाँ-वहाँ तक ऋचाओं की मंगल ध्वनियाँ गूंजें और सम्पूर्ण पृथ्वी-लोक, अंतरिक्ष-लोक और द्यु-लोक यज्ञ धूम्र से आप्लावित हो जायें।
देवताओं को निरंतर सोम और बलिभाग प्राप्त होता रहे ताकि परिपुष्ट और संतुष्ट देवता मानवों के कल्याण हेतु प्रकृति को मानवों के अनुकूल रखें। क्या हुआ उस मंगल कामना का! सोम नष्ट हो चुका है। देवता क्षीण हो गये हैं। अनाचार और व्यभिचार बढ़ रहे हैं। असुर तेजी से अपनी प्रजा का प्रसार कर रहे हैं।
यदि यही स्थिति रही तो सम्पूर्ण सप्तसैंधव क्षेत्र एक दिन असुरों, यातुधानों, दैत्यों, दानवों, दस्युओं और द्रविड़ों से आप्लावित हो जायेगा। आर्यों को पैर धरने के लिये भी स्थान उपलब्ध नहीं रहेगा। तब हर प्रकार से पुष्ट और बलिष्ठ हुए शत्रु आर्यों के समूल विनाश के लिये आतुर हो उठेंगे। तब उनके वेग को रोक सकना आर्यों के लिये संभव नहीं रह जायेगा।
क्या करें गोप सुरथ! क्या उन्हें भी इंद्र की तरह असुरों के संहार के लिये सैन्य संगठित करनी होगी! क्या उन्हें भी प्रजापति बनकर नवीन प्रजा की रचना करनी होगी! क्या वे भी वैवस्वत मनु की तरह जीवन भर युद्ध की विभीषिकाओं से जूझते रहेंगे!
कुछ न कुछ तो करना ही होगा। आर्यों के विशृंखलित जन इन दस्युओं का उच्छेदन करने में समर्थ नहीं हैं। इन्हें संगठित होना होगा। जिस प्रकार प्रजापति मनु ने इन्हें जन के रूप में संगठित किया था उसी प्रकार मैं इन्हें जनपदों में संगठित करूंगा।
जनपदों की संगठित शक्ति न केवल असुरों से अपनी रक्षा करने में समर्थ होगी अपितु असुरों का दमन भी कर सकेगी। इन्हीं विचारों में डूबते उतरते जाने कब गोप सुरथ की आँख लगी और आर्य सुरथ का चिंतन कब समाप्त हुआ, उन्हें पता ही नहीं चला।
[2] मेसोपोटामिया के विभिन्न स्थलों से कीलाक्षर लिपि में लिखी हुई मृत्पट्टिकायें मिली हैं जिनमें वहां के व्यापारियों द्वारा तीन देशों- दिल्मुन, मगन तथा मेलुह्ह से हस्तिदांत, ताम्बे की सामग्री, काली लकड़ी, लाल पत्थर तथा मणिये (माला में पिरोने के मनके) आयात किये जाने का उल्लेख है।
ये प्रदेश सूर्याेदय के देश, साफ-सुथरे नगरों वाले तथा लोकोत्तर स्वर्ग के रूप में वर्णित हैं। इस आधार पर इन प्रदेशों की पहचान सिंधु सभ्यता के नगरों से की गयी है। सिंधु सभ्यता के प्रमुख तीन नगर हड़प्पा, कालीबंगा और मोहेन-जो-दड़ो के रूप में पहचाने गये हैं।
अतः संभव है कि दिल्मुन, मगन तथा मेलुह्ह सिंधु सभ्यता के यही तीन नगर रहे हों। यूरोपीय विद्वान अल्चिन ने संस्कृत शब्द ‘म्लेच्छ’ से मेलुह्ह का साम्य माना है। म्लेच्छ का अर्थ होता है-अनार्य। पर्याप्त संभव है कि उस काल के आर्य मोहेन-जो-दड़ो को मेलुह्ह के नाम से जानते हों।
प्रतनु ने धरती पर घुटने टेककर रानी मृगमंदा का अभिवादन किया। प्रतनु ने अनुभव किया कि इस पूरे वार्तालाप में रानी मृगमंदा एक भी शब्द नहीं बोली है। हिन्तालिका और निर्ऋति ही उसकी तरफ से प्रश्न पूछती रही हैं।
अमल-धवल प्रासाद के केन्द्रीय कक्ष में प्रवेश करते ही प्रकाश से आंखें चुंधिया गयीं प्रतनु की। कुछ क्षण तक तो वह कुछ भी नहीं देख सका। धीरे-धीरे दृष्टि ने कक्ष के आलोक में स्थिर रहने योग्य क्षमता उत्पन्न कर ली। प्रतनु ने देखा कि विविध मणि-मुक्ताओं से भली-भांति सुसज्जित कक्ष के मध्य भाग में प्रकाश का अथाह सागर हिलोरें मार रहा है जिसकी दिप-दिप करती आभा-उर्मियों के कारण कक्ष में प्रवेश करने वाले की आंखें चैंधिया जाती हैं।
कुछ ही क्षणों में प्रतनु को और स्पष्ट दिखाई देने लगा। उसने देखा कि कक्ष के मध्य भाग में श्वेत परिधानों से आवेष्टित एक गौरांग नागकन्या श्वेत स्फटिक के सिंहासन पर सुशोभित है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसकी सम्पूर्ण देह से दिव्य ज्योत्सना झर-झर कर निःसृत हो रही है जिसके कारण कक्ष में इतना तीव्र प्रकाश है। नागकन्या के अंग-प्रत्यंग में समाया सौंदर्य सम्पूर्ण देह को ऐसी दिव्य छवि प्रदान कर रहा है मानो वह स्त्री देह न होकर सौंदर्य का अमल-धवल प्रासाद ही हो।
शर्करा के तट पर आने वाले पणियों के सार्थवाहों से प्रतनु ने सुन रखा था कि भूमण्डल पर स्थित समस्त प्रजाओं में नागकन्यायें सर्वाधिक सुंदर हैं। वे शीश पर फण तथा मुकुट, कानों में वलयाकार कुण्डल तथा अपने अलसाये नेत्रों में कज्जल धारण किये रहती हैं। उनकी सुवर्ण देह से निःसृत कमल पुष्पों की सुगंध पूरे वातावरण को आप्त किये रहती है।
कृशोदर और क्षीण कटि के मध्य में स्थित नाभि इस भांति सुशोभित रहती है मानो सौंदर्य के सागर में त्रिवलयी भंवर पड़ा हो। उनके मनोहारी, स्थूल और उन्नत स्तन प्रदेश पर विराजमान मणि-मेखलायें इस तरह दोलायमान रहती हैं मानो दो उन्न्त पर्वतों के मध्य श्वेत जलराशि से युक्त सलिलायें प्रवाहित होती हों। वे महामणियों से अलंकृत, विविध प्रकार के आभूषणों से शोभायमान, मधुर वचन बोलने वाली नागकन्यायें अत्यंत शिष्ट, रमणीय और मधुर दृष्टि वाली होती हैं।
प्रतनु को लगा कि जिस पणि ने उसके समक्ष नागकन्याओं के सौंदर्य का वर्णन किया था, उस पणि ने अवश्य ही इसी नागकन्या को देखा होगा। संभ्रमित, संकुचित और हतप्रभ सा प्रतनु सौंदर्य के उस अमल धवल प्रासाद की ओर निर्निमेष नेत्रों से ताकता ही रह गया।
उसे इस तरह चकराया हुआ जानकर निर्ऋति ने कहा- ‘हमारी रानी मृगमंदा को प्रणाम करो पथिक।’
– ‘नहीं जानता कि नागों की रानी को किस तरह अभिवादन करना चाहिये!’ प्रतनु ने शीश झुका कर कहा।
– ‘जिस प्रकार तुम अपनी रानी को अभिवादन करते हो।’ हिन्तालिका ने कहा।
– ‘हम सैंधवों की कोई रानी नहीं है।’
– ‘राजा तो होगा!’
– ‘नहीं हम सैंधवों का कोई राजा भी नहीं है।’
– ‘युद्ध और शांतिकाल में प्रजा का नेतृत्व कौन करता है ?’
– ‘हम सैंधवों में युद्ध की परम्परा नहीं है।’
– ‘शत्रु से रक्षा कैसे होती है ?’
– ‘हमारा कोई शत्रु नहीं है।’
– ‘यह कैसे संभव है ? प्रत्येक प्रजा का कोई न कोई शत्रु अवश्य होता है। तुम्हारे पड़ौस में किस प्रजा का निवास है ?’
– ‘ असुर प्रजा का ? कुछ दूरी पर आर्य भी रहते हैं।’
– ‘जिस प्रजा के पड़ौस में असुर निवास करते हों और उस प्रजा का कोई शत्रु न हो, यह तो अनहोनी सी बात है। असुर तो अकारण ही सबके शत्रु हैं।’
– ‘असुर नागों और आर्यों के शत्रु हो सकते हैं किंतु सैंधवों से उनकी मित्रता है।’
– ‘चलो मान लिया कि सैंधवों का कोई शत्रु नहीं है, सैंधवों में युद्ध परम्परा भी नहीं है किंतु शांति काल में भी तो उनका नेतृत्व कोई न कोई अवश्य करता होगा।’ हिन्तालिका ने प्रश्न किया।
– ‘पशुपति महालय का प्रमुख पुजारी ही सैंधवों में सर्वपूज्य होता है किंतु वह प्रजा का नेतृत्व नहीं करता।’
– ‘पुर की व्यवस्था कौन करता है ?’ निर्ऋति ने पूछा।
– ‘पुर की व्यवस्था सम्बन्धी आदेश भी पशुपति महालय के प्रधान पुजारी द्वारा दिये जाते हैं।’
– ‘जिस प्रकार तुम पशुपति महालय के प्रधान पुजारी को अभिवादन करते हो, उसी प्रकार रानी मृगमंदा को भी प्रणाम करो।’ निर्ऋति ने कहा।
प्रतनु ने धरती पर घुटने टेककर रानी मृगमंदा का अभिवादन किया। प्रतनु ने अनुभव किया कि इस पूरे वार्तालाप में रानी मृगमंदा एक भी शब्द नहीं बोली है। हिन्तालिका और निर्ऋति ही उसकी तरफ से प्रश्न पूछती रही हैं। मृगमंदा के संकेत पर हिन्तालिका ने प्रतनु को मृगमंदा के समक्ष रखे श्वेत स्फटिक आसन पर बैठने के का संकेत किया।
– ‘आप हमारे पुर में किस आशय से आये हैं ?’ मृगमंदा का स्वर-माधुर्य प्रतनु को भीतर तक स्पर्श कर गया।
– ‘मैं आया नहीं हूँ आपकी अनुचरियों द्वारा लाया गया हूँ।’
– ‘निर्ऋति और हिन्तालिका मेरी अनुचरी नहीं, सखियाँ हैं। इन्होंने मुझे सूचित किया है कि आप इस निर्जन पर्वतीय प्रदेश में एकाकी विचरण कर रहे थे ?’
– ‘क्या इस सम्पूर्ण पर्वतीय प्रदेश पर नागों का आधिपत्य है ?’ प्रतनु ने मृगमंदा के प्रश्न का उत्तर न देकर उलट कर प्रश्न किया।
– ‘यह तो हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं! ‘
– ‘किस प्रश्न का ?’
– ‘आप किस आशय से इस निर्जन पर्वतीय प्रदेश में विचरण कर रहे थे ?’
– ‘आप किस अधिकार से मुझसे प्रत्येक प्रश्न के प्रत्युत्तर की अपेक्षा रखती हैं ?’ रानी मृगमंदा के समक्ष जिस प्रकार के प्रश्न प्रतनु से लगातार किये जा रहे थे, वे प्रतनु को उचित नहीं लग रहे थे।
– ‘आप हमारे अतिथि हैं, आपकी कुशल-क्षेम और यहाँ आने का आशय जानना हमारा कत्र्तव्य है।’ रानी मृगमंदा ने स्मित हास्य के साथ कहा।
– ‘विभिन्न्न लोकों को देखने की आशा लेकर दीर्घ यात्रा पर निकला हूँ।’ प्रतनु को कोई समुचित उत्तर नहीं सूझ रहा था। पीड़ा की एक लहर उसके समूचे अस्तित्व को चीरती हुई सी उभर आई। कैसे बता सकता है वह कि उसे सैंधवों की राजधानी से निष्कासित किया गया है! अपनी ही मातृभूमि से निष्कासित व्यक्ति दूसरों के पुर में क्योंकर रहने का अधिकार प्राप्त कर सकता है!
– ‘कौन-कौन से लोक देख चुके हैं अब तक ?’
– ‘सैंधव प्रदेश से निकल कर विभिन्न पर्वतीय और वन्य प्रांतरों को देखता हुआ सबसे पहले इसी लोक तक पहुँचा हूँ।’
– ‘इस लोक में आपका स्वागत है पथिक। आप जितने समय तक रहना चाहें यहाँ रह सकते हैं किंतु हमारा नियम है कि हमारेे तीन प्रश्नों का समुचित उत्तर दे सकने में सक्षम व्यक्ति ही इस पुर में अतिथि की तरह रह सकता है।’
– ‘कौन से तीन प्रश्न ? जो अभी पूछे गये हैं! ‘
– ‘नहीं! वे प्रश्न तो अभी पूछे जाने हैं ?’
– ‘यदि मैं उन प्रश्नों के समुचित उत्तर न दे सकूं तो ?’
– ‘तो आपको इस पुर में अनुचरों की भांति निवास करना होगा।’
– ‘विचित्र है आपका नियम! मैंने आपके प्रश्नों के समुचित उत्तर दिये तो अतिथि अन्यथा अनुचर!’
– ‘इसमें विचित्र कुछ भी नहीं है। विद्वानों को अतिथि बनाना हमारा गौरव है। मूर्खों को अतिथि के स्थान पर अनुचर बनाना ही श्रेयस्कर है। आपको यह भी ज्ञात होना चाहिये कि इस पुर में अतिथि बने रहने के कई लाभ हैं।’
– ‘क्या-क्या लाभ हैं ?’
– ‘अतिथि के रूप में आप वह सब-कुछ प्राप्त कर सकेंगे जिसकी आप इच्छा करेंगे।’ मुस्कुराकर कहे गये रानी मृगमंदा के कथन पर निर्ऋति और हिन्तालिका भी मंद-मंद मुस्कुराने लगीं।’
– ‘तो पूछिये आपके तीनों प्रश्न। मैं तैयार हूँ।’ ”सब-कुछ” शब्दों के वास्तविक अर्थ का अनुमान लगाने का प्रयास करता हुआ प्रतनु रानी मृगमंदा द्वारा पूछे जाने वाले तीन प्रश्नों का सामना करने के लिये तैयार हो गया।
– ‘अपने प्रश्न आपके समक्ष रखने से पहले मैं बताना चाहूंगी कि पूर्व में भी ये प्रश्न मैं कई पुरुषों के समक्ष रख चुकी हूँ किंतु आज तक कोई भी पुरुष मेरे प्रश्नों का समुचित उत्तर नहीं दे सका। वे सभी पुरुष इस समय हमारे अनुचर बनकर हमारी सेवा में नियुक्त हैं। यदि आप अनुचर नहीं बनना चाहते हैं तो इसी समय पुर छोड़कर जाने के लिये स्वतंत्र हैं।’ रानी मृगमंदा ने चेतावनी दी।
– ‘भय का वर्णन भय के वास्तविक कारण से अधिक भयावह होता है। आप भय का वर्णन कर मुझे भयभीत करने में अपनी ऊर्जा व्यय न करें। कृपा कर प्रश्न पूछें।’ किंचित् शुष्क हो आया प्रतनु। वैसे भी उसे किसी भी कथोपकथन की विस्तृत भूमिका में कभी रुचि नहीं रहती। अधिक विस्तृत भूमिका स्थिति को स्पष्ट करने के स्थान पर स्थिति को अधिक रहस्यमय बना डालती है।
– ‘तो सुनिये पहला प्रश्न। संसार में प्राणियों के अंगों को विभूषित करने वाला सुवर्ण किस प्रकार उत्पन्न हुआ है ? यदि आप विद्वान हैं तो मुझे बतायें।’
प्रश्न सुनकर क्षण भर के लिये विचारमग्न हो गया प्रतनु। उसने विचार किया कि युवती के, उसमें भी सुंदर युवती के प्रश्नों का उत्तर उसके मन के अनुकूल होना चाहिये। तभी वह सत्य माना जाता है। सुंदर युवती से तर्क कर विवाद उत्पन्न करने में लाभ नहीं हैं। अतः इस अवसर पर नागकन्या के मनोनुकूल उत्तर दिया जाना उचित है न कि तर्क और विवाद को बढ़ावा देने वाला।
उसने मुस्कुराते हुए कहा- ‘ मेरु पर्वत के शिखर भाग पर किसी समय देवताओं और गरुड़ के मध्य अमृत के लिये भयंकर युद्ध हुआ था। तब नागों के शत्रु कपिल वर्ण वाले गरुड़ ने अपनु चंचु के आघात से समस्त देवताओं को क्षत-विक्षत कर दिया। गरुड़ द्वारा चंचु के आघातों से त्रस्त देवताओं को दुखी देखकर इन्द्र ने अपना वज्र गरुड़ पर फैंक मारा। वह वज्र पर्वत के समान उस भयंकर गरुड़ के बाँये पंख पर गिरा। जिससे उसके बायें पंख का कुछ भाग कट कर भूमि पर गिर गया। समस्त प्राणियों के शरीर का भूषण सुवर्ण उसी से बना हुआ है।[1] हे कमलनेत्री! यदि आप मेरे उत्तर से संतुष्ट हैं तो दूसरा प्रश्न पूछें। अन्यथा मैं अनुचर बनने को तैयार हूँ।’
प्रतनु का उत्तर सुनकर चकित रह गयी रानी मृगमंदा। यह युवक तो सचमुच ही बुद्धिमान है। जब से यह मृगमंदा के समक्ष उपस्थित हुआ है तब से ही अत्यंत संतुलित और सारगर्भित संभाषण करता रहा है और इस समय भी इसने नागों की रानी को प्रसन्न करने के लिये गरुड़ के पराजय की कथा कितनी कुशलता से तैयार कर ली है और वह भी बिना कोई समय गंवाये। ऐसा तो केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही कर सकता है किंतु यह उसके प्रश्न का समुचित उत्तर नहीं।
– ‘बुद्धिमान पथिक! मैं आपके उत्तर से प्रसन्न तो हूँ किंतु यह मेरे प्रश्न का समुचित उत्तर नहीं है। यदि समुचित उत्तर जानते हो तो बताओ।’
– ‘विशालाक्षि! मैं नहीं जानता कि आपके इस प्रश्न का सही उत्तर क्या है किंतु इस सम्बन्ध में जो कुछ भी मुझे ज्ञात है उसका वर्णन मैं आपके समक्ष करता हूँ। जिस हिमालय पर्वत पर आपका विवर रूपी पुर स्थित है उसी महापर्वत पर यहाँ से सहस्रों योजन दूर माल्यवान, गंधमादन, नील तथा निषध नामक पर्वत खड़े हैं।
उनके मध्य में महामेरु नामक पर्वत है। वहीं जंबूरस नामक नदी है। इस नदी के किनारे जम्बू नामक शाश्वत वृक्ष है। इसी वृक्ष के कारण यह समस्त भू प्रदेश जम्बू द्वीप कहलाता है। इस वृक्ष के फलों का परिमाण आठ सौ इकसठ अरन्ति बताया जाता है। जब वृक्ष से जम्बू फलों का पतन होता है तो वे भारी ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
इन्हीं फलों का रस एक नदी बनकर फैलता है। यह नदी मेरु तथा जम्बू वृक्ष की परिक्रमा करती हुई हिमालय से उतर कर पृथ्वी लोक में प्रवेश करती है। वहीं जाम्बूनद नामका कनक होता है जो समस्त प्राणियों का भूषण है। यह शक्रवधू के समान रक्तिम आभा वाला होता है।’ [2]
प्रतनु का उत्तर नागकन्या को समुचित जान पड़ा। यद्यपि नागों ने जम्बू वृक्ष को देखा नहीं है किंतु परम्परा से नागों में सुवर्ण उत्पत्ति के सम्बन्ध में यही मान्यता रही है।
– ‘मैं आपके उत्तर से संतुष्ट हूँ। अब मेरे दूसरे प्रश्न के लिये तैयार हो जाओ पथिक। जिस पर्वतीय प्रदेश में जम्बू नामक वृक्ष पाया जाता है वहाँ कौन-कौन सी प्रजायें निवास करती हैं ? शेष, वासुकि तथा तक्षक आदि नाग किस स्थान पर निवास करते हैं ? यदि आप विद्वान हैं और मेरे प्रश्न का उत्तर जानते हैं तो बतायें।’
– ‘उन्नत पीन पयोधरों से सम्पन्न सुंदरी! नागों के भुवन विन्यास के अनुसार हैमवत वर्ष पर राक्षस, पिशाच और यक्ष रहते हैं। हेमकूट वर्ष पर अप्सराओं सहित गंधर्व रहते हैं। शेष, वासुकि तथा तक्षक आदि नाग निषध वर्ष में रहते हैं। महावर्ष पर तैंतीस देव भ्रमण करते हैं। नील पर्वतों पर सिद्ध और ब्रह्मर्षि रहते हैं। श्वेत पर्वत दैत्यों और दानवों का वासस्थान है।’ [3]
– ‘तुम्हें नागों के भुवन विन्यास की जानकारी क्योंकर है पथिक ?’
– ‘सैंधव पुरों में असुरों तथा पणियों का आवागमन होता रहता है। उन्हीं के द्वारा जल, थल, नभ और पर्वतीय प्रदेशों में रहने वाली प्रजाओं की जानकारी सैंधवों को प्राप्त होती रहती है। मैंने भी अपने पुर में आने वाले पणियों से यह जानकारी प्राप्त की है। यदि आप मेरे दूसरे उत्तर से भी संतुष्ट हों तो अपना तीसरा प्रश्न पूछें अन्यथा मैं आपका अनुचर बनने को तैयार हूँ।’
– ‘मेरा तीसरा प्रश्न आपके द्वारा इस कक्ष में प्रवेश करने से पूर्व देखी गयी नागकन्याओं के जल-विहार की प्रतिमा के सम्बन्ध में है। मैं कहती हूँ कि उसके मध्य भाग में स्थित नागकन्या के रूप में मेरी प्रतिमा का उत्कीर्णन किया गया है। निर्ऋति कहती है कि यह निर्ऋति की प्रतिमा है, हिन्तालिका कहती है कि यह हिन्तालिका की प्रतिमा है। आपको बताना है कि वह प्रतिमा किसकी है।’
मृगमंदा का तीसरा प्रश्न सुनकर चक्कर में पड़ गया प्रतनु। इस बात में कुछ न कुछ भेद अवश्य है। श्वेत स्फटिक पर उत्कीर्णित जलविहार दृश्यांकन प्रतिमा उसके नेत्रों में घूम गयी। उसने ध्यान किया कि मध्य भाग की प्रतिमा जिस प्रकार निर्ऋति और हिन्तालिका से साम्य रखते हुए भी उनमें से किसी की भी प्रतीत नहीं होती, उसी प्रकार रानी मृगमंदा की मुखाकृति से साम्य रखते हुए भी वह प्रतिमा रानी मृगमंदा की नहीं कही जा सकती। कोई न कोई भेद इसमें अवश्य है। प्रतनु का मस्तिष्क कुछ निर्णय नहीं ले पाया।
– ‘किस विचार में पड़ गये पथिक! तुम चाहो तो उस प्रतिमा को एक बार और देख सकते हो।’ निर्ऋति ने अपने चंचल नेत्र विशेष मुद्रा में दोलायमान करते हुए कहा।
– ‘क्या इस प्रश्न का उत्तर तत्काल देना आवश्यक है ?’
– ‘आप चाहें तो कुछ दिन का समय दिया जा सकता है।’ रानी मृगमंदा ने प्रतनु का साहस वर्द्धन करते हुए कहा।
– ‘तब तक मैं यहाँ किस रूप में रहूंगा, अतिथि के रूप में अथवा अनुचर के रूप में ?’
– ‘तब तक आप हमारे अघोषित अतिथि के रूप में रह सकेंगे।’ रानी मृगमंदा ने स्मित हास्य के साथ कहा और प्रकाश तथा सौंदर्य का झरना सा छोड़ती हुई उठ खड़ी हुई।
[1] स्कंदपुराण के श्रीमाल माहात्म्य में आये एक वर्णन में एक पर्वतीय विवर का उल्लेख है जिसमें नागकन्या इषुमति को ब्राह्मण कुण्डपा स्वर्ण की उत्पत्ति का यही कारण बताता है।
[2] वायुप्रोक्त महापुराण, उपोद्घात पाद छियालीसवाँ अध्याय-भुवन विन्यास (श्लोक संख्या 21 से 30)
[3] वायुप्रोक्त महापुराण, उपोद्घात पाद छियालीसवां अध्याय-भुवन विन्यास (श्लोक संख्या 33 से 35)
आर्य सुरथ ने अपनी बात पूरी करते-करते अनुभव किया कि अब आर्यों को जन से जनपदों की ओर ले जाने का समय आ गया है। लघु जनों की अपेक्षा वृहद् जनपदों में ही आर्य प्रजा सुरक्षित रह सकती है।
गोप सुरथ ने सभा में अपना मंतव्य प्रस्तुत किया- ‘जिस प्रकार समस्त आर्य प्रजा परिवार में, परिवार कुल में, कुल ग्राम में, ग्राम विश में तथा विश जन में संगठित हैं उसी प्रकार जन, जनपद में संगठित हों और जनपद महाजनपद में संगठित हों। संगठित जनपद एवं महाजनपद एक दूसरे को रक्षण एवं सहयोग देते हुए असुरों, यातुधानों, दैत्यों, दानवों तथा द्रविड़ों का प्रतिरोध करें। उनकी अनाचार प्रवृत्तियों को प्रसारित होने से रोकें। उनका बल क्षीण करें। उन्हें कुमार्ग छोड़कर सद्मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करें।’
– ‘और यदि वे सद्मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित न हों तो ?’ आर्य पूषण ने प्रश्न किया।
– ‘तो जनपदों और महाजनपदों की संगठित शक्ति उन्हें सद्मार्ग पर चलने के लिये विवश करे।’ गोप सुरथ के स्वर में किंचित् उत्तेजना थी।
– ‘और यदि विवश न कर सकें तो ?’ ये आर्य सुनील हैं जो आर्य सुरथ के सबसे बड़े प्रशंसक और अनुयायी हैं। उन्हें आर्य सुरथ की योजनायें विस्मयकारी एवं व्यवस्थायें अनुकरणीय लगती हैं किंतु आर्य सुनील का स्वभाव है कि जब तक उन्हें किसी योजना अथवा व्यवस्था का सम्पूर्ण आशय समझ में नहीं आ जाता वे उसे स्वीकार नहीं करते।
– ‘तो बलपूर्वक उनका शिरोच्छेद करें।’ गोप सुरथ ने बिना किसी संशय के समाधान किया।
– ‘हाँ, यही उपाय उचित है।’ आर्य अतिरथ ने आर्य सुरथ की योजना का स्वागत किया।
– ‘किंतु यह तो हिंसा हुई। जिसके लिये ऋषिजन एवं आप स्वयं भी सदैव वर्जना करते रहते हैं।’ आर्य सुनील ने शंका व्यक्त की।
– ‘बड़ी हिंसा को रोकने के लिये यदि छोटी हिंसा आवश्यक हो जाये तो छोटी हिंसा करके बड़ी हिंसा रोक लेनी चाहिये। हिंसा को प्रत्येक स्थिति में त्याज्य मानकर हिंस्रक व्यक्तियों अथवा हिंस्रक पशुओं को निर्भय घूमने देना उचित नहीं है। ऐसा करके तो हम छोटी हिंसा से बचकर बड़ी हिंसा को आमंत्रित कर रहे हैं।’
– ‘क्या किसी बड़ी हिंसा की आशंका निकट है।’ ऋषि पर्जन्य ने चिंता व्यक्त की।
– ‘यदि निकट नहीं है तो दूर भी नहीं है।’
– ‘इसका क्या अर्थ हुआ आर्य सुरथ।’ आर्या पूषा ने प्रश्न किया। यातुधानों के चंगुल से छूटने के बाद आर्या पूषा कई दिनों तक रुग्ण रही हैं किंतु इधर कुछ दिनों से वे पुनः स्वस्थ होकर सभा-समिति में भाग लेने लगी हैं।
– ‘आप सब देख रहे हैं कि चारों ओर असुर, यातुधान, दैत्य और दानव तेजी से फैलते जा रहे हैं। असुरों ने सोम को नष्ट कर दिया है। असुरों के प्रभाव में व्रात्य, द्रविड़, यक्ष, गंधर्व, विद्याधर, किरात, निषाद तथा अन्य संस्कृतियाँ भी दूषित होती जा रही हैं। उनमें माँस भक्षण, गौ वध, सुरापान और वामाचार तेजी से पनप रहा है। यहाँ तक कि नाग और गरुड़ आदि आर्य प्रजायें भी आसुरी संस्कृति के प्रभाव में आकर अग्निहोत्र का परित्याग कर रही हैं। बहुत सी प्रजाओं में नग्न नारी प्रतिमाओं के पूजन का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। यहाँ तक कि कतिपय आर्य जन भी आसुरी प्रलोभनों में घिर कर अग्निहोत्र की अवहेलना कर रहे हैं। यदि आसुरि प्रवृत्तियों का प्रसार निरंतर होता रहा तो आर्यों के लिये हल भर भी भूमि नहीं बचेगी। जिस अग्निहोत्र को वैवस्वत मनु ने अपने प्रबल प्रताप और उद्योग से बचाया था वह नष्ट हो जायेगा। अग्निहोत्र के अभाव में देवताओं का बल क्षीण होगा। आप सब विचार करें कि तब यह पृथ्वी कैसी होगी! ‘
– ‘आर्य सुरथ की चिंता उचित है।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने समर्थन किया।
– ‘मैंने तो यह भी सुना है आर्य कि सैंधव जन अश्वत्थ आदि वनस्पतियों के पूजन में अज [1] एवं अरुणोपल [2] आदि पशु-पक्षिओं की भी बलि चढ़ाने लगे हैं। [3] निश्चय ही असुरों के प्रभाव में आकर उन्होंने यह कुमार्ग अपनाया है।’ आर्या समीची ने कहा।
– ‘हमारे पूर्वजों ने उद्घोष किया था- कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्। [4] इसलिये हमारा यह कर्त्तव्य हो जाता है कि हम आर्य तथा आर्येतर प्रजाओं को पापाचार की ओर जाने से रोकें।’ ऋषि अग्निबाहु ने भी आर्य सुरथ का समर्थन किया।’
– ‘आर्य होने का अर्थ श्रेष्ठ हो जाना है। जो विहित कत्र्तव्य का पालन करता है, निषिद्ध एवं निंद्य आचरण नहीं करता, शिष्टाचार का पालन करता है, वह आर्य है।’ [5] ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने ‘आर्य’ शब्द को व्याख्यायित किया।
– ‘आर्य प्रजा की अपेक्षा आर्येतर प्रजाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि होती है, इसका क्या कारण है ऋषिवर।’ आर्य सुमंगल ने जिज्ञासा व्यक्त की।
– ‘भोग विलास की प्रवृत्ति और काम में आसक्ति।’ ऋषि अग्निबाहु ने आर्य सुमंगल की जिज्ञासा का समाधान किया।
– ‘अत्यंत महत्वपूर्ण चिंता व्यक्त की है आर्य सुमंगल ने और अत्यंत ही समुचित कारण बताया है ऋषिवर अग्निबाहु ने। मैं स्वयं भी इस पर चिंतन करता रहा हूँ। कितना परिश्रम करना पड़ा था आर्यों को जब उन्होंने इन्द्र की सहायता से यतियों को समाप्त कर शृगालों के समक्ष डाल दिया था। सहस्रों की संख्या में यति यमलोक पहुँचाये गये थे किंतु अब ये फिर से इतनी बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं जैसे यमलोक का द्वार तोड़कर एक साथ ही धरित्री पर लौट आये हों। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने व्यथित स्वर में कहा।
– ‘प्राणी में दूषित प्रवृत्तियों का प्रादुर्भाव क्यों होता है ऋषिश्रेष्ठ ? क्यों नहीं आर्यों की भांति अन्य प्रजाओं में श्रेष्ठ संस्कार स्वतः उत्पन्न होते ?’ आर्य पूषण ने जिज्ञासा व्यक्त की।
– ‘आर्य पूषण! यह सृष्टि अंधकार से उत्पन्न हुई है, प्रकाश से नहीं। इसलिये अंधकार स्वतः उत्पन्न हो जाता है। प्रकाश के लिये तप करना होता है आर्य।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने समाधान किया।
– ‘आर्यों में यदि श्रेष्ठ आचरण प्रकट हुए हैं तो उनके पीछे ऋषियों की तपस्या छिपी है।’ गोप सुरथ ने कहा।
– ‘आर्येतर प्रजाओं ने ऋषि परम्परा का ही विकास नहीं किया तब उनमें तपस्या कहाँ से आती! प्रकाश कहाँ से आता! ‘ ऋषि पत्नी अम्बा अदिति ने अपना विचार कहा। वे बहुत देर से मौन रहकर आज की सभा में हो रहे विचार मंथन को सुन रहीं थीं।
– ‘मद्य, मांस और मैथुन को त्याग पाना उन प्रजाओं के लिये सरल नहीं है आर्ये। इसके लिये उन्हें दीर्घ अभ्यास की आवश्यकता होगी। तभी वे शुभकर्मों की ओर प्रवृत्त होंगे।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने कहा।
– ‘कौन करायेगा उन्हें अभ्यास ?’ आर्या स्वधा ने पूछा।
– ‘हम करायेंगे पुत्री। हम उन्हें आर्य बनायेंगे।’ अम्बा अदिति ने स्नेह से आर्या स्वधा के शीश पर हाथ रखकर कहा।
– ‘किंतु कैसे ?’
– ‘अपने शस्त्रों से।’ अम्बा अदिति कुछ कहें, इससे पूर्व आर्य अतिरथ ने बात पूरी की।
– ‘नहीं। शस्त्रों से किसी भी प्रजा की संस्कृति का परिमार्जन नहीं किया जा सकता। संस्कृति का परिमार्जन होता है शास्त्रों से। संस्कृति का परिमार्जन शीघ्र सम्पादित होने वाली प्रक्रिया नहीं है। शत-शत वर्षों तक हमें इसी प्रयास में संलग्न रहना होगा। ऋतुयें आयेंगी और जायेंगी। पीढ़ियाँ बदलेंगी। परिस्थितियाँ बदलेंगी किंतु हमारा यह यज्ञ चलता रहेगा। हम संसार को आर्य बनाने के लिये अपनी आहुतियाँ देते रहेंगे।’ गोप सुरथ का गहन गंभीर स्वर इस प्रकार जान पड़ता था मानो शताब्दियों के अंतराल से बोल रहे हों।
– ‘जिस प्रकार वैवस्वत मनु ने प्रजापति बनकर प्रजा की रचना की, उसी प्रकार हमें भी प्रजापति बनना होगा। आर्य प्रजा का विस्तार करना होगा। इसके लिये हमें नये प्रजापतियों की आवश्यकता होगी।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने गोप सुरथ की योजना को स्पष्ट किया।
– ‘तब तो इतने विशाल यज्ञ को संपादित करने के लिये हमें बहुत बड़ी संख्या में श्रेष्ठ ब्रह्मा, श्रेष्ठ प्रचेता, श्रेष्ठ दक्ष, और श्रेष्ठ मनुओं की आवश्यकता होगी।’ आर्य पूषण ने अनुमान लगाते हुए कहा।’
– ‘नहीं। इस यज्ञ के लिये हमें युगानुकूल मार्ग अपनाना होगा। हर युग में श्रेष्ठ ब्रह्मा, श्रेष्ठ प्रचेता, श्रेष्ठ दक्ष, और श्रेष्ठ मनुओं का उपलब्ध हो पाना कौन जाने संभव हो पाये अथवा नहीं। इतने सारे याज्ञिकों की उपस्थिति आगे चलकर परस्पर वैमनस्य और वर्चस्व के संघर्ष में बदल सकती है। व्यवस्था ऐसी करनी होगी जिसमें कम से कम अपवाद उत्पन्न हों। हम भूत के अनुभव, वर्तमान के संकट और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विन्यास का निर्माण करेंगे।’ गोप सुरथ ने उसी प्रकार अतल गहराई से आते स्वर में कहा।
अभिभूत हैं आर्य सुनील आर्य सुरथ की इस योजना पर। कितनी दूर तक की विचार लेते हैं वे। निश्चय ही वे ऐसा कर सकने में समर्थ भी हैं। निश्यच ही आर्य सुरथ शीघ्र ही कोई बड़ा अभियान आरंभ करने वाले हैं जिसमें आर्य सुनील को भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करना होगा। आर्य सुनील ने अनुमान किया।
आर्य अतिरथ को इस तरह की बातें पसंद नहीं। कैसा परिमार्जन और कैसा यज्ञ! अत्यंत स्पष्ट मार्ग को भी विद्वान जन इतना दुष्कर क्यों बना देते हैं! समस्या है पापाचार को नष्ट करने की। सीधी और स्पष्ट बात है कि पापियों को नष्ट कर दो, पापाचार भी स्वतः नष्ट हो जायेगा किंतु नहीं! आर्य अतिरथ की तो सुनता ही कौन है! हुँह! यज्ञ करेंगे! आर्य अतिरथ मन ही मन झल्लाये किंतु बोले कुछ नहीं।
– ‘अपनी योजना को समिति के समक्ष स्पष्ट करें आर्य।’ ऋषि पर्जन्य ने वार्तालाप को पुनः मूल बिन्दु पर लाते हुए प्रश्न किया।
– ‘मेरी योजना यह है कि जिस प्रकार कुल का मुखिया कुलपति, ग्राम का मुखिया ग्रामणी और विश का मुखिया विशप अथवा विशपति होता है उसी प्रकार जन का भी मुखिया होना चाहिये।’
– ‘जन का मुखिया किस लिये ? आर्य पूषन ने प्रश्न किया।
– ‘सम्पूर्ण जन के सम्बन्ध में निर्णय ले सकने के लिये।’
– ‘सम्पूर्ण जन के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिये समिति की व्यवस्था कर रखी है आर्यों ने। समिति सामूहिक रूप से जो निर्णय लेती है, उसमें समस्त प्रजा की सम्मति होती है। वे निर्णय समस्त आर्यों के हित के लिये गये होते हैं। एक व्यक्ति द्वारा लिये गये निर्णय गलत भी हो सकते हैं।’
– ‘जन का मुखिया बनाने का अर्थ यह नहीं है कि समिति समाप्त कर दी जाये। समिति वर्तमान की ही तरह कार्य करती रहे तथा उसके द्वारा जो नीति निर्धारित की जाये, मुखिया द्वारा उसी नीति के आधार पर जन के हित में त्वरित निर्णय लिये जायें।’
– ‘इसका क्या लाभ होगा ?’
– ‘वर्तमान में आर्य ‘जन’ के रूप में संगठित हैं। एक जन का दूसरे जन से कोई सम्पर्क नहीं है। हमें यह व्यवस्था करनी होगी कि जब असुर किसी एक जन पर आक्रमण करें तो अन्य आर्य जन उसकी सहायता के लिये तत्काल उपलब्ध हों। आर्य जनों के रक्षण के साथ-साथ असुरों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाने के लिये भी आर्यों के समस्त जनों को जनपद के रूप में संगठित किया जाना आवश्यक है। जब जनपद कोई निर्णय लेना चाहेगा तब यह संभव नहीं रह जायेगा कि समस्त जनों की समिति बुलाई जा सके। विभिन्न जन अपने-अपने मुखिया के माध्यम से जनपद में अपनी बात कह सकेंगे।’
आर्य सुरथ ने अपनी बात पूरी करते-करते अनुभव किया कि अब आर्यों को जन से जनपदों की ओर ले जाने का समय आ गया है। लघु जनों की अपेक्षा वृहद् जनपदों में ही आर्य प्रजा सुरक्षित रह सकती है।
– ‘क्या जनपद द्वारा लिये गये निर्णय को सभी जनों द्वारा स्वीकार किया जाना आवश्यक होगा ?’ आर्य पूषन ने प्रश्न किया।
– ‘हाँ जनपद का निर्णय सभी जनों को समान रूप से स्वीकार करना होगा।
– ‘इसका अर्थ यह हुआ कि जनपद बनने के बाद जन अपनी स्वतंत्रता खो देंगे!’
– ‘नहीं, वे अपनी स्वतंत्रता खोयेंगे नहीं। जनपद द्वारा जो निर्णय लिया जायेगा, उसमें समस्त जनों की सम्मति सम्मिलित रहेगी।’
– ‘किंतु यह तो आवश्यक नहीं कि समस्त जन किसी विषय पर एक ही सम्मति रखते हों। उनमें असहमति भी हो सकती है ?’ आर्य पूषन ने आशंका व्यक्त की।
– ‘ऐसी स्थिति में यह देखा जायेगा कि कितने जन उस निर्णय से सहमत हैं। यदि सम्मति रखने वाले जनों की संख्या अधिक हुई तो वह निर्णय असम्मति रखने वाले जन को भी मानना होगा।’ आर्य सुरथ ने जवाब दिया।
– ‘यही तो मैं कह रहा हूँ आर्य कि जनपद के निर्माण से जन अपनी स्वतंत्रता खो देंगे।’ आर्य पूषन ने पुनः आशंका व्यक्त की।
– ‘नहीं, वे अपनी स्वतंत्रता खोयेंगे नहीं, किंतु कुछ मामलों में उनकी स्वतंत्रता सीमित अवश्य हो जायेगी।’
– ‘आर्य जन अपनी स्वतंत्रता सीमित क्यों करना चाहेंगे ?’
– ‘संगठन के निर्माण के लिये व्यक्तिगत स्वातंत्र्य को सीमित करना ही होता है। वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए संगठन का निर्माण आवश्यक है। अन्यथा हमें अपनी स्वतंत्रता असुरों के हाथों नष्ट हो जाने के लिये प्रस्तुत रहना चाहिये।’
देर रात्रि तक नवीन संगठन के निर्माण और उसके लिये किये जाने वाले उपायों पर विचार-विमर्श चलता रहा। जब गगन की कृत्तिका [6] पूरी आभा के साथ प्रकाशवान् हो उठी और नीहारिकाओं [7] के महाविशाल चक्रों की दिशायें कुछ मुड़ी हुई सी प्रतीत होने लगीं तो समिति का विसर्जन हुआ।
प्रतनु रानी मृगमंदा के तीसरे प्रश्न का उत्तर पा चुका है। वह दबे पांव अपने प्रासाद में लौट आया। तीसरा प्रश्न अनायास ही सुलझ गया था।
नागों के इस विवर में अघोषित अतिथि के रूप में रहते हुए प्रतनु को कई दिन हो गये हैं। अघोषित अतिथि के रूप में वह विविध प्रकार का आनंद भोग रहा है किंतु रानी मृगमंदा के दर्शन उस भेंट के पश्चात् पुनः नहीं पा सका है। अनन्य सुंदरी और कमनीय मृगमंदा का रूप-लावण्य रह-रह कर उसकी आंखों में कौंध जाता है। इसी कौंध के बीच उसे कभी-कभी नृत्यांगना रोमा का चेहरा भी दिखाई दे जाता है।
प्रतनु को लगता है कि यदि नृत्यांगना रोमा यहाँ होती तो अवश्य ही रानी मृगमंदा के प्रश्न का उत्तर दे चुकी होती। वह स्वयं कई बार जाकर उस प्रतिमा को देख चुका है किंतु प्रतिमा का रहस्य लगातार गहराता ही जा रहा है। किसकी हो सकती है यह प्रतिमा! यही प्रश्न उसे दिन रात उद्विग्न किये रहता है।
किसी सामान्य व्यक्ति के लिये तो यह प्रश्न निःसंदेह कठिन होता किंतु वह तो स्वयं शिल्पी है। सैंधव सभ्यता का सुविख्यात और निष्णात शिल्पी जिसने केवल एक ही प्रतिमा का निर्माण कर सैंधवों की राजधानी मोहेन-जो-दड़ो में कौतूहल उत्पन्न कर दिया था।
उसकी बनाई केवल एक प्रतिमा को देखकर पशुपति महालय का प्रधान पुजारी किलात इतना भयभीत हो गया था कि उसने प्रतनु को दो वर्ष के लिये राजधानी से ही निष्कासित कर दिया। उसी एक प्रतिमा को देखकर सर्वांग सुंदरी नृत्यांगना रोमा उस के प्रति आसक्त हो गयी थी। आज उसी अप्रतिम शिल्पी की ऐसी दशा! वह इतना भर बता पाने में समर्थ नहीं कि सामने दिखाई देने वाली प्रतिमा इन तीन यौवनाओं में से किसकी है!
बार-बार सोचता है प्रतनु। ऐसा क्यों है! यह प्रतिमा उसे उन तीनों यौवनाओं की तरह दिखाई देती है किंतु उसे इन तीनों में से किसी की भी प्रतिमा नहीं कहा जा सकता। प्रतनु जब भी प्रतिमा का मिलान उनमें से किसी एक से करना चाहता है तो प्रतिमा उससे साम्य रखते हुए भी उसकी प्रतीत नही होती। कैसी जटिल प्रहेलिका है यह! प्रतनु इस विषय पर जितना-जितना सोचता जाता है, उतना ही अधिक उलझता जाता है।
इसी प्रहेलिका का हल पाने की उधेड़-बुन में लगा प्रतनु अतिथि प्रासाद से बाहर आ गया है। संभवतः उपवन की स्वस्थ वायु उसके मस्तिष्क को चैतन्य करे। इस मायावी विवर की मायावी सृष्टि में हर वस्तु उसके लिये प्रहेलिका का रूप ले लेती है। अपने प्रासाद से निकल कर जब वह आग्नेय कोण में स्थित जल यंत्र तक पंहुचा तो उसने देखा कि मृगमंदा के अनुचर यंत्र को चला रहे हैं।
वर्तुलाकार घूमने वाली रज्जुओं से बंधे रिक्त अयस-पात्र कूप के भीतर पहुँच कर जब पुनः लौटकर बाहर आते हैं तो ऊँचाई पर पहुँच कर निर्मल जल की धार छोड़ते हैं। इस क्रम के निरंतर चलने से निर्मित जल की मोटी धारा नालिका में पहुँच कर ईशान कोण के मायावी सरोवर की दिशा में प्रवाहित होने लगती है। जल राशि से उत्पन्न श्वेत फेन जल से पहले ही सरोवर तक पहुँच जाना चाहते हैं।
नालिका में तीव्रता से बहे जा रहे श्वेत फेन का पीछा करता हुआ प्रतनु मायावी सरोवर तक जा पहुँचा। जैसे ही उसने दृष्टि ऊपर उठाई तो आश्चर्य से जड़ हो कर रह गया। उसने देखा कि संसार के समस्त क्रियाकलापों से पूरी तरह निरपेक्ष, पूरी तरह मुक्त और पूरी तरह र्निद्वंद्व रानी मृगमंदा अपनी सखियों के साथ मायावी सरोवर में जलविहार में संलग्न है।
रानी मृगमंदा और उसकी सखियाँ जल-कुररियों [1]की भांति सरोवर के एक कोण से दूसरे कोण तक तैरती हुई एक दूसरे से आगे निकल जाने की स्पर्धा कर रही हैं। रानी मृगमंदा की गति असाधारण रूप से तीव्र है। उसकी सखियाँ बार-बार उससे पीछे छूट जाती हैं।
प्रतनु को लगा कि जिस प्रकार रात्रि के समय स्वच्छ नील आकाश में तैरता हुआ चंद्रमा अन्य नक्षत्रों को पीछे छोड़ता हुआ चला जाता है उसी प्रकार रानी मृगमंदा अपनी सखियों को लगातार पीछे छोड़कर सरोवर के एक कोण से दूसरे कोण तक पहुँच जाती है। निऋति, हिन्तालिका और अन्य सखियाँ पराजय स्वीकार नहीं करना चाहतीं। वे रानी मृगमंदा पर नियम भंग करने का आरोप लगाती हैं। रानी मृगमंदा फिर से उन्हें ललकारती है और फिर से वही स्पर्धा आरंभ हो जाती है। फिर रानी मृगमंदा आगे निकल जाती है।
जल किल्लोल में संलग्न इन नागकन्याओं को देखकर प्रतनु को स्फटिक पर उत्कीर्ण प्रतिमा का स्मरण हो आया। कुछ-कुछ इसी तरह का दृश्य तो है वह। अचानक जैसे प्रतनु के मस्तिष्क रूपी आकाश में चेतना की विद्युत कौंधी। इस कौंध से उत्पन्न नवीन आलोक में प्रतनु ने जो कुछ देखा वही तो, ठीक वही तो वह इतने दिन से खोज रहा था।
हुआ यह कि सरोवर के कोण पर फिर से सर्वप्रथम पहुँचने के उल्लास में रानी मृगमंदा ने अंजुरि में जल भर कर अपनी दोनों बाहुएं ऊँची कीं और ढेर सारा जल आकाश में उछाल दिया। नीलमणि जल के सहस्रों बिंदु आकाश में छितरा गये। मानो किसी वृक्ष से सहस्रों पक्षी एक साथ आकाश में उड़ गये हों।
प्रतनु को प्रतीत हुआ कि आकाश में छितरा गये जलबिन्दु रूपी पक्षियों की फड़फड़हट सुनकर आकाश में उठी दोनों बाहुओं के मध्य स्थित सुवलय रूपी पक्षी भी अचानक कसमसा कर नींद से जाग पड़े और भयभीत हो अपने चंचु उठाकर आकाश में ताकने लगे।
नीचे गिरते जल बिंदुओं को देख रहे निर्ऋति के नेत्र इस प्रकार स्थित हो गये मानो दो मत्स्य आकाश से गिरने वाले स्वाति जल को ग्रहण करने के लिये प्रस्तुत हों। गिरते हुए जल बिन्दुओं को अंजुरि में भर लेने के प्रयास में हिन्तालिका की देह कटि प्रदेश तक जल से बाहर निकल आई। उसके क्षीण कटि प्रदेश पर सुशोभित नाभि के तीनों वलय जल के झीने आवरण को त्याग कर स्पष्ट दिखाई देने लगे।
यही तो, ठीक यही रहस्य तो प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है प्रतनु इतने दिनों से। प्रतनु के मुख पर स्मित मुस्कान दिखाई देने लगी। श्वेत स्फटिक पर उत्कीर्ण प्रतिमा का रहस्य खुल चुका है। प्रतनु रानी मृगमंदा के तीसरे प्रश्न का उत्तर पा चुका है। वह दबे पांव अपने प्रासाद में लौट आया। तीसरा प्रश्न अनायास ही सुलझ गया था।
उसी रात प्रतनु रानी मृगमंदा की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने मृगमंदा को बताया कि श्वेत स्फटिक प्रतिमा पर उत्कीर्ण प्रतिमा का मुख रानी मृगमंदा का है किंतु नेत्र निर्ऋति के हैं। दोनों बाहुएं हिन्तालिका की हैं किंतु उनके मध्य स्थित सुवलय रानी मृगमंदा के हैं। क्षीण कटि प्रदेश निऋ्र्रति का है किंतु उस पर उत्कीर्ण त्रिवलीय नाभि हिन्तालिका की है।
प्रतनु का उत्तर सुनकर रानी मृगमंदा आश्चर्य से जड़ रह गयी। जाने कितने पुरुष अब तक इस प्रश्न का उत्तर न दे पाने के कारण अनुचर बनकर रानी मृगमंदा की सेवा में संलग्न हैं किंतु यह पहला पुरुष है जिसने प्रतिमा के रहस्य को तोड़ा है। निश्चय ही प्रतनु प्रतिबंध [2] जीत चुका है।
रानी मृगमंदा ने उसी क्षण प्रतनु को अपना अतिथि घोषित किया और स्वयं अनुचरी के रूप में प्रतनु की सेवा में प्रस्तुत हो पूछने लगी कि वह अपने विलक्षण अतिथि को किस सेवा से संतुष्ट कर सकती है!
मैं वैवस्वत मनुपुत्र सुरथ, आर्य प्रजा के कल्याण के लिये और आर्य जनपदों को संगठित करने के लिये जनपति अर्थात् राजन् होना स्वीकार करता हूँ।
आज प्रातःकालीन अग्निहोत्र के तत्काल पश्चात् विशेष समिति का आयोजन किया गया है। इस अवसर पर निकटवर्ती आर्य जनों से भी अतिथियों को आमंत्रित किया गया है। देवों के निमित्त अग्नि में पूर्णाहुति देने के बाद ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा अपने आसन से उठ खड़े हुए। उनके सुदीर्ध श्वेत श्मश्रु शीतल, मंद और सुगंधित वायु में लहराने लगे।
उन्होंने अपने समक्ष बैठे आर्य स्त्री-पुरुषों पर दृष्टिपात किया और गहन-गंभीर वाणी में आर्य सुरथ को सम्बोधित करके कहने लगे- ‘आर्य सुरथ! जिस प्रकार देवों ने अपनी रक्षा के निमित्त इन्द्र को अपना राजा स्वीकार किया था उसी प्रकार ‘तृत्सु-जन’ अपनी रक्षा के लिये आपको अपना जनपति बनाना चाहता हैं। जनपति उसी को बनाया जाना चाहिये जो जनपति होने के योग्य हो। गोप के रूप में आपने जन को श्रेष्ठ सेवायें दी हैं। आप हर तरह से जनपति होने के योग्य हैं। क्या आप जनपति बनना स्वीकार करते हैं ?’
– ‘हाँ ऋषिश्रेष्ठ! यदि ‘तृत्सु-जन की प्रजा मेरे अधीन होना चाहती है तो मैं प्रजा के हित के लिये जनपति बनना स्वीकार करता हूँ।’
– ‘आपके अधीन होने से पहले प्रजा आपसे कुछ प्रश्नों के उत्तर जानना चाहती है।’
– ‘मैं प्रजा के प्रश्नों का उत्तर देने के लिये प्रस्तुत हूँ ऋषिश्रेष्ठ।’
– ‘आर्य! प्रजा जानना चाहती है कि जब प्रजा आपके अधीन हो जायेगी तब क्या आप प्रजापति बनकर उसी प्रकार अपनी प्रजा का रक्षण, पालन और पोषण करेंगे जिस प्रकार माता अपनी संतान का रक्षण, पालन और पोषण करती है ?’
– ‘हाँ ऋषिवर! यदि प्रजा हृदय से मेरी अधीनता स्वीकार करती है तो मैं उसी प्रकार प्रजा का रक्षण, पालन और पोषण करूंगा जिस प्रकार माता अपनी संतान का रक्षण, पालन और पोषण करती है।’ गोप सुरथ ने शांत स्वर में उत्तर दिया।
– ‘वत्स! प्रजा आपसे वचन चाहती है कि आप सदैव व्यक्तिगत स्वार्थ को त्यागकर प्रजा के हित में अपने आप को समर्पित करेंगे। प्रजा का हित ही आपका सर्वोपरि धर्म होगा।’
– ‘ऋषिश्रेष्ठ! प्रजा को ऐसे वीर पुरुष के आदेशों का पालन करना चाहिये जो शर-बाण हाथ में लेकर आदेश दे तथा मन, शक्ति एवं वाणी से प्रजा का पालन करे। [1] यदि प्रजा मेरे आदेशों का पालन करने को तत्पर है तो मैं वचन देता हूँ कि मैं अपने स्वार्थ को त्यागकर प्रजा का पालन करूंगा। प्रजा का हित ही मेरा सर्वोपरि धर्म होगा।’
– ‘पुत्र! प्रजा मेरे माध्यम से आपको यह कहना चाहती है कि यदि आपके अधीन रहकर प्रजा दुःखी रहेगी तो आप नर्क के अधिकारी होंगे।’
– ‘ऋषिवर! मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं यथाशक्ति प्रजा को सुखी करने का उपाय करूँगा। यदि मेरे प्रमाद के कारण प्रजा दुखी होती है तो अग्नि मुझे नर्क प्रदान करे।’
– ‘हे वीर! प्रजा यदि आपके प्रमाद के कारण पापाचार की तरफ प्रवृत्त होती है तो आप भी उस पापाचार के भागी होंगे और यदि आपकी अनुगत होकर प्रजा शुभ आचरण की ओर प्रवृत्त होती है तो प्रजा के मंगल आपको भी प्राप्त होंगे। इसी प्रकार आपके सुकृत्य और कुकृत्य स्वतः ही प्रजा को प्राप्त हो जायेंगे।’
– ‘ऋषिश्रेष्ठ! मैं सदैव सुकृत्य करके प्रजा को शुभ आचरण की ओर प्रवृत्त करने का प्रयास करूंगा।’
– ‘आर्य सुरथ! प्रजापति बनकर आप निरंकुश आचरण नहीं करेंगे। समिति की सम्मति से ही आप प्रजा का अनुशासन करेंगे।’
– ‘मैं प्रजा के अनुशासन में रह कर ही प्रजा का अनुशासन करूंगा।’
– ‘उचित है आर्य! हम समिति में आपको जन के प्रजापति का उच्च स्थान देते हैं। आज से आप इस जन के प्रजापति हैं। ‘तृत्सु-जन’ के समस्त परिवार, कुल, गा्रम और विश आपकी प्रजा होने के कारण आपके अधीन हैं। जन आपको राजन् कहकर सम्बोधित करेगा।’
ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा की घोषणा के साथ ही आर्यवीरों ने शंख और सिंही से मंगल ध्वनि उत्पन्न की। प्रजा ने राजन् सुरथ की जय-जयकार की। बड़ी संख्या में घण्ट, घड़ियाल और नगाड़े बजने लगे। मंगलमय तुमुल नाद से चारों दिशायें व्याप्त हो गयीं। ऋषिवर पर्जन्य ने आगे बढ़कर राजन् सुरथ के भाल पर रक्तचंदन का तिलक अंकित किया। आर्य ललनाओं ने राजन् सुरथ पर पुष्पवर्षा की।
मंगल ध्वनि के विराम पा जाने के पश्चात् राजन् सुरथ प्रजा को सम्बोधित करने के लिये उठ खड़े हुए। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा एवं समस्त ऋषियों को प्रणाम करने के पश्चात् उन्होंने प्रजा की ओर अभिवान की मुद्रा में शीश झुकाया। राजन् सुरथ के मुखमण्डल पर इस समय दिव्य ओज विराजमान था।
उन्होने एक दृष्टि समक्ष उपस्थित आर्य जन पर डाली और कहा- ‘मैं वैवस्वत मनुपुत्र सुरथ, आर्य प्रजा के कल्याण के लिये और आर्य जनपदों को संगठित करने के लिये जनपति अर्थात् ‘राजन्’ होना स्वीकार करता हूँ। आप सबकी समिति [2] से मैं जन की शक्ति को संगठित करने के लिये कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। मैं ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा से प्रार्थना करता हूँ कि वे जन का पुरोहित होना स्वीकार करें। पुरोहित होने के नाते उनका कत्र्तव्य होगा कि वे जन तथा जनपति के कल्याण के निमित्त यज्ञ आदि शुभ कर्मों का संपादन करें और करवायें। शांति काल में वे जन तथा जनपति दोनों का मार्ग दर्शन करें तथा उन्हें सदाचरण के लिये प्रेरित करें। युद्ध का अवसर उपस्थित होने पर वे युद्ध भूमि में रहकर देवों को संतुष्ट करें तथा जन तथा जनपति की सफलता के लिये दैवीय सहायता प्राप्त करें।’
– ‘राजन्! जन तथा जनपति के कल्याण के लिये मैं पुरोहित होना स्वीकार करता हूँ।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने स्वीकरोक्ति प्रदान की।
– ‘मैं जन की शक्ति के विस्तार के लिये आर्य सुनील को जन का ‘सेनप’ नियुक्त करता हूँ। सेनापति होने के नाते उनका कत्र्तव्य होगा कि वे आर्य वीरों को युद्धकौशल प्रदान करें। वे राजन् के अनुशासन में रहकर शत्रुओं से जन का रक्षण करें।’
– ‘मैं जन के रक्षण हेतु राजन् सुरथ का अनुशासन स्वीकार करता हूँ।’ आर्य सुनील ने स्वीकृति प्रदान की।
– ‘राजन् की सहायता के लिये ग्राम का अनुशासन करने वाले-ग्रामणी, रथ हाँकने वाले-सूत, रथ बनाने वाले-रथकार और काष्ठ, मृदा, प्रस्तर, ताम्र, कांस्य तथा लौह आदि सामग्री से विभिन्न वस्तुएं बनाने वाले-कर्मार को जन का ‘रत्नी’ नियुक्त किया जाता है। समस्त रत्नी राजन् के आदेश प्राप्त होने पर तत्काल उपस्थित होंगे। ग्रामणी जब राजन् के समक्ष उपस्थित होगा तो वह प्रजा का प्रतिनिधित्व करेगा। वह प्रजा की आवश्यकतायें और समस्याएं राजन् के समक्ष रखेगा और जब वह प्रजा के मध्य होगा, तब वह राजन् के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेगा। प्रजा तक राजाज्ञा पहुँचाने का कार्य ग्रामणी ही करेगा।’
समिति में उपस्थित समस्त ग्रामणी, सूत, रथकार और कर्मारों ने जन के हित के लिये राजन् का ‘रत्नी’ हो जाना स्वीकार कर लिया। क्षण भर विराम देकर राजन् सुरथ ने फिर से अपना उद्बोधन आरंभ किया- ‘असुरों के विरुद्ध सैन्य अभियानों का संचालन सुचारू रूप से करने तथा जन को विस्तार देकर जनपद का निर्माण करने के लिये हमें कुछ नवीन कर्मारों की आवश्यकता होगी।
इसके लिये हमें पुरप, [3] स्पश [4] और दूत नियुक्त करने होंगे। असुरों के विरुद्ध युद्ध अभियान के समय जन को सुरक्षित रखने का कार्य ‘पुरप’ का होगा। असुरों की गतिविधियों का समय रहते पता लगाकर राजन् को सूचित करने का कार्य ‘स्पश’ का होगा। युद्ध काल उपस्थित होने पर राजन्, जन और सैन्य के बीच संवाद एवं सूचनाओं का आदान प्रदान करने तथा शत्रु के साथ संधि-विग्रह के संदेश पहुँचाने का कार्य ‘दूत’ द्वारा किया जायेगा।’
अपनी बात पूरी करने से पूर्व राजन् सुरथ कुछ क्षण के लिये रुके और स्त्रियों की ओर दृष्टिपात करके बोले- ‘एक बात और है जो विशेष रूप से मैं इस अवसर पर आर्य ललनाओं से कहना चाहता हूँ,। दीर्घ काल से मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि आर्य ललनायें शिशुओं के पालन-पोषण एवं गौरस आदि के कार्य में संलग्न रहने के कारण सभा एवं समितियों से विमुख रहने लगी हैं। यह प्रवृत्ति उचित नहीं है।
स्वायंभू प्रजापति वैवस्वत मनु ने स्त्री और पुरुष दोनों को प्रजा का एक-एक नेत्र बताया है। यह निश्चित है कि जिस प्रजा का एक नेत्र अंधकार में हो, वह प्रजा उन्नति के स्थान पर अवनति के मार्ग पर चल पड़ती है। स्त्रियों को गुहाचरंति [5] की प्रवृत्ति न अपना कर सभावती [6] ही बने रहना होगा। आर्य प्रजा के कल्याण के लिये यह अत्यंत आवश्यक है।’
– ‘हे जितेन्द्रिय नायक! तेजस्वी पुरुष! आप दुष्ट लोगों का नाश करने वाले बनें। सूर्य के समान तेजस्वी बनें। प्रजाजनों से मधुर वचन बोलने वाले बनें। आप लक्ष्य संधान कर हमारे अबंधुओं को, हमारे विपरीत चलने वालों को तथा हमारा नाश करने को तत्पर शत्रुओं को दबा दें।’[7] पुरोहित सौम्यश्रवा ने खड़े होकर राजन को आशीर्वाद दिया।
रानी मृगमंदा का घोषित अतिथि बन जाने के बाद प्रतनु को नागों के पुर में विशेष अधिकार प्राप्त हो गये। अब वह कहीं भी बिना रोक-टोक जा सकता था। प्रतनु ने अनुभव किया कि न केवल रानी मृगमंदा और उसकी सखियाँ अपितु समस्त नाग अनुचर, सैनिक एवं प्रहरी भी प्रतनु को विशेष सम्मान देते हैं।
नागों के इस पुर में रहते हुए प्रतनु ने देखा कि नाग प्रजा ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सैंधवों से कहीं अधिक उन्नति की है। किसी प्रजा का व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन इतना सुसंगठित हो सकता है, इसकी तो सैंधवों ने अभी कल्पना भी नहीं की है। प्रतनु ने सूक्ष्मता से नागों की जीवन शैली का अवलोकन किया।
नागों के पास सैंधवों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ बीज, काष्ठ हल एवं अश्व उपलब्ध हैं। सैंधव तो खेत में स्वयं हल को खींचते हैं किंतु नाग अपने हलों को वृषभ तथा अश्वों की सहायता से खींचते हैं। प्रतनु ने अपने पिता से सुना था कि आर्यों के पास अश्व नामक दृढ़ पशु है जिसपर बैठकर उन्होंने कालीबंगा को ध्वस्त किया था। उसी अश्व को नागों के पास देखकर वह आश्चर्य चकित था।
प्रतनु ने अनुभव किया कि सैंधवों की अपेक्षा नागों ने शिल्प, स्थापत्य, संगीत, नृत्य एवं ललित आदि कलाओं में अधिक कौशल अर्जित किया ही है, नागों की सामाजिक एवं शासकीय व्यवस्था भी श्रेष्ठ है। अपनी प्रजा को शत्रुओं से बचाने के लिये नागों ने युद्ध कला में जो कौशल अर्जित किया है, वह नागों का सर्वाधिक विलक्षण गुण है।
प्रतनु को ज्ञात हुआ कि जिस विवर को उसने अब तक देखा है वह तो नागों का एक लघु दुर्ग मात्र है जिसे नागों के राजा की सुरक्षा के लिये इस तरह बनाया गया है कि किसी शत्रु की दृष्टि उस पर न पड़ सके। पहले नागों का राजा इस दुर्ग में न रहकर नाग प्रजा के साथ प्राचीन पुर में स्थित अपने प्रासाद में रहता था किंतु पिछले राजा ‘नागराज कर्कोटक’ के समय गरुड़ों ने छल से प्रासाद में प्रवेश करके नागराजा की हत्या कर दी थी।
उसके बाद इस विवर में गुप्त दुर्ग का निर्माण किया गया। इस विवर तक पहुँचने के मार्ग इतने दुर्गम हैं कि सहसा तो कोई शत्रु यहाँ तक पहुँच ही नहीं सकता। यदि कोई शत्रु विवर के बाहरी प्रवेश द्वार तक पहुँच ही जाये तो भी प्रवेश द्वार से राजप्रासाद तक पहुँचने तक के मार्ग में इस तरह के गुप्त यंत्र लगाये गये हैं कि शत्रु के प्रवेश की सूचना दुर्ग के प्रत्येक रक्षक को स्वतः हो जाती है और शत्रु बंदी बना लिया जाता है।
विवर दुर्ग में स्थित राजप्रासाद से नागों के पुर तक पहुँचने के लिये भी गोपनीय मार्ग बना हुआ है। इस मार्ग पर भी गोपनीय यंत्र लगे हुए हैं जो अवांछित व्यक्ति के प्रवेश की सूचना राजप्रासाद के रक्षकों तक पहुँचा देते हैं। नागों की रक्षण व्यवस्था देखकर प्रतनु को आश्चर्य हुआ। नागों ने अपने शत्रु से छिपने के लिये ही नहीं अपितु शत्रु का प्रतिरोध करने के भी विशेष प्रबंध कर रखे हैं। अश्वारूढ़ नाग सैनिकों को तलवार चलाते हुए देखकर तो आश्चर्य से दांतो में अंगुली दबा ली प्रतनु ने।
यद्यपि नाग इसे लघु दुर्ग कहते हैं किंतु प्रतनु को यह अत्यंत विशाल प्रतीत होता था। प्रतनु ने अनुमान किया कि यदि यह लघु दुर्ग है तो नागों का मुख्य पुर कितना विशाल होगा! इस विशाल दुर्ग में प्रतनु के पथ प्रदर्शन के लिये हिन्तालिका अथवा निर्ऋति सदैव उसकी सेवा में उपस्थित रहती थीं।
उन्होंने ही प्रतनु को बताया था कि नागराज कर्कोटक के कोई पुत्र नहीं था इसलिय नागराज की हत्या हो जाने के बाद नागों ने नागराज की पुत्री राजकुमारी मृगमंदा को अपनी रानी चुन लिया है। हिन्तालिका और निर्ऋति रानी मृगमंदा की ही लघु भगिनियां हैं किंतु रानी की सेवा में सखि और अनुचरी की भांति रहती हैं ताकि रानी के साथ किसी तरह का छल न हो सके। रानी मृगमंदा युवती हो जाने पर भी अब तक अविवाहित है।
हिन्तालिका और निर्ऋति ने प्रतनु को बताया कि रानी मृगमंदा ने प्रण किया है कि वह अपने से अधिक बुद्धिमान और योग्य पुरुष से विवाह करेगी और वही पुरुष नागों का अगला राजा होगा। नाग प्रजा के नियम के अनुसार नाग युवतियाँ शत्रु प्रजा को छोड़कर किसी भी प्रजा के युवक से विवाह कर सकती है किंतु रानी होने के कारण रानी मृगमंदा को किसी नाग युवक से ही विवाह करना होगा क्योंकि नागों के नियम के अनुसार नागों का राजा नाग ही हो सकता है, अन्य प्रजा से आया हुआ व्यक्ति नहीं।
– ‘यदि रानी मृगमंदा किसी नागेतर [1] युवक से विवाह कर ले तो ?’ हिन्तालिका की बात सुनकर प्रतनु ने प्रश्न किया।
– ‘क्या सैंधव पथिक ने रानी मृगमंदा को वरण [2] करने का निश्चय कर लिया है ?’ हिन्तालिका ने मुस्कुराते हुए पूछा।
प्रतनु पहले से ही जानता था कि उसके प्रश्न के उत्तर के रूप में एक नया प्रश्न उसके सामने आयेगा किंतु अब वह पहले की भांति हिन्तालिका और निर्ऋति के प्रश्नों से घबराता नहीं है। अतः बोला- ‘ ऐसा ही समझ लो।’
– ‘तो मृगमंदा नागों की रानी नहीं रह सकेगी। उसके स्थान पर किसी अन्य को नागों का राजा बनाया जायेगा तथा रानी मृगमंदा को या तो उस युवक के साथ नागों का पुर त्याग कर जाना होगा या फिर सामान्य प्रजा के रूप में रहना होगा।’
– ‘तो ठीक है, रानी मृगमंदा को मेरे साथ सप्तसैंधव प्रदेश चलने के लिये तैयार रहना चाहिये।’ प्रतनु ने मुस्कुराकर कहा।
– ‘क्या सचमुच ऐसा भयानक विचार आपके मस्तिष्क में है पथिक!’ हिन्तालिका ने प्रतनु के हास्य का उत्तर हास्य से ही दिया।
– ‘इसमें भयानक होने की क्या बात है ? क्या मैं रानी मृगमंदा के योग्य नहीं ?’
प्रतनु केवल परिहास कर रहा था किंतु हिन्तालिका उसका प्रश्न सुनकर गंभीर हो गयी। उसका पूरा चेहरा प्रश्नवाचक मुद्रा में तन गया प्रतीत होता था।
– ‘क्या रानी मृगमंदा ने आपसे ऐसा कोई प्रस्ताव किया है ?’
– ‘नहीं तो, क्यों ?’ इस बार चैंकने की बारी प्रतनु की थी।
– ‘आपको संभवतः ज्ञात नहीं कि हम तीनों बहिनों ने प्रतिज्ञा कर रखी है कि हम तीनों एक ही पुरूष से विवाह करेंगी और उस पुरुष का चुनाव बड़ी बहिन होने के नाते रानी मृगमंदा करेंगी। यदि रानी मृगमंदा ने आपको चुन लिया है तो आपको मुझसे और हिन्तालिका से भी विवाह करना होगा।
– ‘यदि ऐसी बात है तो मुझे रानी मृगमंदा से विवाह करने का निश्चय त्यागना होगा।’ मंद हास्य के साथ प्रतनु ने अपनी बात कही। वह पुनः परिहास पर उतर आया था।
– ‘क्यों ? क्या मैं और निर्ऋति आपको अच्छी नहीं लगतीं ?’
प्रतनु ने अनुभव किया कि यह चर्चा हास्य की परिधि से बाहर निकलकर गंभीर होती जा रही है। अतः विनोद त्याग कर बोला- ‘तुम और निर्ऋति भी मुझे उतनी ही अच्छी लगती हो जितनी कि रानी मृगमंदा किंतु मैं तो यह सब तुमसे परिहास में कह रहा था। मेरा कोई विचार नहीं है कि मैं रानी मृगमंदा से विवाह करूँ। न ही रानी मृगमंदा ने इस विषय में मुझसे कुछ कहा है।’
– ‘यदि रानी मृगमंदा आपके साथ विवाह का प्रस्ताव रखें तो भी आप मना कर देंगे?’
– ‘हाँ! मैं उनसे विवाह के लिये मना कर दूंगा ?’
– ‘क्यों ?’
– ‘क्योंकि मैं प्रतिज्ञाबद्ध हूँ।’
– ‘कैसी प्रतिज्ञा ?’
– ‘प्रतिशोध की प्रतिज्ञा।’
– ‘प्रतिशोध! कैसा प्रतिशोध ?’
प्रतनु नहीं चाहता था कि मोहेन-जो-दड़ो में उपस्थित हो गये अप्रिय प्रसंग को वह हिन्तालिका अथवा किसी अन्य से कहे किंतु जब एक बार प्रसंग छिड़ ही गया तो उसने मोहेन-जो-दड़ो के वार्षिकोत्वस से लेकर नृत्यांगना रोमा की प्रतिमा बनाने, पशुपति महालय के पुजारी द्वारा सैंधव राजधानी से निष्कासित किये जाने तथा रोमा के अभिसार और प्रणय निवेदन करने व प्रतनु द्वारा देवी रोमा को किलात के चंगुल से मुक्त करवाने का प्रण करने तक की सारी घटनायें कह डालीं।
प्रतनु का प्रत्युत्तर सुनकर हिन्तालिका आश्चर्य से मौन हो गयी। उसे इस बात पर विश्वास करना काफी कठिन हो गया कि इस क्षीण काया में सिमटा शिल्पी एक सम्पूर्ण सत्ता से टकराने और उससे प्रतिशोध लेने का संकल्प कर सकता है। उसने प्रतनु के विवरण पर कोई टिप्पणी नहीं की। एक बात वह अनुभव करती थी कि अत्यंत सामान्य दिखाई देने वाला यह युवक अत्यंत प्रतिभावान है। इसका सबसे बड़ा कमजोर पक्ष यह है कि यह युद्धकला से अनभिज्ञ है। फिर भी कौन जाने यह सचमुच ही एक दिन अपने संकल्प पूरे कर ले! काफी देर तक वह प्रतनु को नागों का दुर्गम विवर दुर्ग दिखाती रही।
नाग कुमारियों ने आज तूर्य [1] का आयोजन किया था। रानी मृगमंदा ने शिल्पी प्रतनु को भी इसमें सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया। सैंधवों में तूर्य आयोजित करने की परम्परा नहीं है इस कारण प्रतनु के लिये इस तरह का आयोजन देखने का पहला ही अवसर था।
रानी मृगमंदा ने बताया कि तूर्य समारोह में नागकन्यायें अपना पति चुनती हैं, इस कारण तूर्य में भाग लेने के लिये दूर-दूर तक बसे नाग विवरों से नाग दम्पत्ति अपनी विवाह योग्य कन्याओं को लेकर आते हैं। विवाह के इच्छुक नाग युवकों को तो वर्ष भर तूर्य की प्रतीक्षा रहती है।
तूर्य में नाग राजकुमारी ही मुख्य नृत्यांगना होती है इस कारण रानी मृगमंदा, निऋति अथवा हिन्तालिका में से कोई भी मुख्य नृत्यांगना हो सकती है किंतु निऋिति ने प्रतनु को बताया था कि अतिथि प्रतनु के सम्मान में इस बार के तूर्य में रानी मृगमंदा स्वयं मुख्य नृत्यांगना के रूप में नृत्य करेगीं।
रानी मृगमंदा के प्रासाद के निकट स्थित उपवन में तूर्य का आयोजन किया गया था। सूर्योदय के साथ ही तूर्यनाद हुआ। पांचों वाद्य- नगाड़ा, तंत्री, झांझ, तुरही और शंख एक साथ बज उठे। रानी मृगमंदा पार्वती के अलंकारिक वेश में उपवन के मध्य में प्रकट हुई और विशिष्ट मुद्रा में अंग संचालन करते हुए भगवान शिव को अघ्र्य प्रदान करने लगी।
इस समय रानी मृगमंदा का शृंगार देखते ही बनता था। उसने सिर से पैरों तक विभिन्न प्रकार की दिव्य वनस्पतियों से सज्जा कर रखी थी। रानी मृगमंदा की देह पर सजे विविध रंगों के मनोहारी पुष्पों की गंध सम्पूर्ण वातावरण को सुगंधित बनाये दे रही थी। उसके अंग-अंग से ज्योत्सना की धारायें फूट रहीं थीं। नाग कन्या का ऐसा उद्दाम रूप अब से पहले प्रतनु ने नहीं देखा था।
अर्घ्य पूर्ण होते ही तूर्य वादन रूक गया और नागस्वरम् से उत्पन्न स्वरलहरी वातावरण में सुगंधित वायु की तरह प्रसारित हो गयी। अब रानी मृगमंदा ने शिव-नृत्य आरंभ किया। मृगमंदा ने यह नृत्य पूर्वी पर्वतीय प्रदेश से आये एक व्रात्य [2] से सीखा था। नृत्यरत पार्वती को भगवान शिव की प्रतीक्षा में संलग्न दिखाया गया था।
आकाश में काली-काली घटायें छा गयीं किंतु भगवान शिव कैलास पर नहीं लौटे। विरहणी पार्वती के रूप में रानी मृगमंदा ने अनेक भाव-भंगिमायें बनाकर दिखायीं। संगीत वादकों ने पार्वती के विरह को प्रदर्शित करने के लिये बांसुरी का अत्यंत मार्मिक उपयोग किया। पार्वती के विरही भाव को चरम तक पहुँचाने के लिये नागफनी और दुर्दुर का भी बहुत सुंदर प्रयोग किया गया।
नभ में स्थित घन घनघोर गर्जन करने लगे, तड़ित चमकने लगी और देखते ही देखते बड़ी-बड़ी बूंदें गिरने लगीं । बादलों की गर्जना उत्पन्न करने के लिये नाग वादकों ने घनवाद्यों का तथा पर्वतों पर गिरने वाली बड़ी-बड़ी बूंदों के प्रहार से उत्पन्न ध्वनि के लिये मृदंग का उपयोग किया। बादलों के घनघोर गर्जन के साथ ही गयासुर डकराने लगा। जिसे सुनकर पार्वती भयभीत होने लगीं। गयासुर के कठोर कर्कश गर्जन के लिये एक साथ कई विशाल ढोल बजाये गये।
हुड्डुक, बंशी तथा मृदंग की स्वरलहरी के साथ त्रिलोकीनाथ शिव प्रकट हुए। प्रतनु ने देखा कि निऋति भगवान शिव के वेश में प्रकट हुई। उसकी नृत्य गति देखते ही बनती थी। शिव के आने पर पार्वती के उपालंभों का क्रम आरंभ हुआ। रुष्ट पार्वती ने भगवान शिव की अभ्यर्थना नहीं की और मुँह फेर कर बैठ गयी।
पार्वती को रिझाने के लिये शिव ने कई उपक्रम किये। किंतु पार्वती रुष्ट ही रही। पार्वती की आवाज के लिये करताल तथा खोलवाद्यों का और शिव की आवाज के लिये पाँच मृदंगों का प्रयोग किया गया। पार्वती के रुष्ट बने रहने पर शिव कृत्रिम क्रोध के साथ उठ खड़े हुए और विशिष्ट मुद्रा में ताण्डव करने लगे। नेपथ्य से कृत्रिम क्रोध के भाव उत्पन्न करने वाले शब्द उभरने लगे-
किड़किड़ान किड़किड़ान किड़किड़ान
धांधी किट धिधि किट धान धान
तत्तड़ान तत्तड़ान तत्तड़ान ।
धू धू किट धू धू किट धमधम धान धान।
तत्तड़ान तत्तड़ान तत्तड़ान तत्तड़ान्।
शिव के कृत्रिम ताण्डव को देखकर पार्वती को हँसी आ गयी और वे प्रसन्न होकर शिव के वाम भाग में सुशोभित हो गयीं। शिव-पार्वती को प्रसन्न मुद्रा में विराजमान हुआ देखकर नाग कन्यायें उनकी अभ्यर्थना के लिये उपस्थित हुईं। इस सामूहिक नृत्य का नेतृत्व हिन्तालिका कर रही थी। अंत में शिव की अभ्यर्थना आरंभ हुई और शिव-पार्वती समस्त नागकन्याओं को मनवांछित वर प्राप्ति का आशीर्वाद देकर अदृश्य हो गये।
अब तूर्य का दूसरा भाग आरंभ हुआ। इस भाग में नागकन्यायें एक-एक करके नृत्य के लिये प्रस्तुत हुईं। जो नागयुवक उस नागकन्या से विवाह के इच्छुक होते वे भी उस नागकन्या के साथ नृत्य के लिये आगे बढ़ते। जो युवक उस नर्तकी के साथ नृत्य करने में असमर्थ रहते, वे पुनः अपने स्थान पर जा कर बैठ जाते।
जिस युवक का नृत्य नागकन्या को पसंद आता, उसी युवक के गले में वह पुष्पाहार डाल देती। कुछ नाग कन्याएं और नाग युवक नृत्य में भाग न लेकर बाहर ही अपने युगल बना रहे थे। चारों ओर उल्लास ही उल्लास बिखरा हुआ था। प्रतनु ने बहुत दिन बाद ऐसा उत्सवमय वातावरण देखा था। उसे मोहेन-जोदड़ो के पशुपति महालय के वार्षिकोत्सव का स्मरण हो आया। रोमा का स्मरण हो आने से उसका मन भीगा-भीगा सा हो गया।
रानी मृगमंदा पार्वती का वेश त्यागकर दर्शक दीर्घा में प्रतनु के निकट आ बैठी। इस समय नाग युगलों का नृत्य अपने चरम पर था। रानी मृगमंदा ने परिचारिका को संकेत किया और परिचारिका ने एक वाद्ययंत्र रानी मृगमंदा को लाकर दिया। प्रतनु ने इस तरह का वाद्ययंत्र पहले कभी नहीं देखा था। अत्यंत बारीक और तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न कर रहा था यह। रानी मृगमंदा सुध-बुध खोकर वाद्ययंत्र संचालित कर रही थी, अचानक नेत्र खोलकर बोली- ‘आप बजायेंगे ?
– ‘क्या है यह ?
– ‘इसे नहीं जानते ?’
– ‘नहीं। पहले कभी देखा नहीं।’
– ‘जब चिच्चिक वृषारव के प्रत्युत्तर में बोलता है, तब अरण्यानी आघाटि की भांति ध्वनि करता हुआ पूजित होता है।” [3] रानी मृगमंदा ने मुस्कुरा कर कहा।
– ‘क्या अर्थ हुआ इसका!’ रानी मृगमंदा की रहस्यभरी बात प्रतनु समझ नहीं सका।
– ‘इसका अर्थ यह हुआ कि चिच्चिक और वृषारव के परस्पर संवाद को सुनकर वन के देवता इतने प्रसन्न होते हैं मानो उनका पूजन हो रहा हो और तब वन के देवता जो ध्वनि उत्पन्न करते हैं वैसी ध्वनि आघाटि [4]नामक इस वाद्ययंत्र में से निकलती है।’
– ‘चिच्चिक और वृषारव परस्पर क्या संवाद करते हैं ?’
– ‘वही जो इस समय नृत्य कर रहे युवक-युवतियाँ कर रहे हैं।’
– ‘ये तो कोई संवाद नहीं कर रहे, केवल नृत्य कर रहे है।’
– ‘नहीं! ये केवल नृत्य नहीं कर रहे। नृत्य के माध्यम से संवाद कर रहे हैं।’
– ‘क्या मैं जान सकता हूँ कि वे क्या संवाद कर रहे है।’
– ‘जब चिच्चिक कहता है कि वृषारव तुम कितना अच्छा गाती हो, क्या मैं भी तुम्हें गीत सुनाऊँ! वृषारव कहती है कि हाँ मैं गाती तो हूँ किंतु तुम्हारे जितना सुंदर नहीं गाती हूँ। इसलिये तुम मुझे अपना गीत अवश्य सुनाओ। इसपर चिच्चिक कहता है कि मैं तुम्हें गीत तब सुनाऊँगा जब तुम भी मेरे साथ गाओ। वृषारव चिच्चिक की बात मान लेती है और दोनों मिलकर गाते हैं। ठीक यही तो इस समय नाग युवक-युवतियाँ एक-दूसरे से कह रहे हैं।’
– ‘अच्छा! एक बात बताओ, तुमने कहा कि जब चिच्चिक वृषारव के प्रत्युत्तर में बोलता है तो अरण्यानि प्रसन्न होते हैं। क्या इन युवक-युवतियों के परस्पर संवाद से भी अरण्यानि प्रसन्न होते हैं! ‘
– ‘केवल अरण्यानि ही क्यों, सभी देवता प्रसन्न होते हैं। स्वयं शिव-पार्वती प्रसन्न होकर इन्हें आशीर्वाद देते हैं। क्या मैं भी आपसे एक बात पूछूँ!’
– ‘हाँ पूछो!’
– ‘क्या आपने कभी चिच्चिक वृषारव संवाद किया है ?’
– ‘हाँ!’ प्रतनु ने मुस्कुराकर उत्तर दिया।
– ‘कहाँ ? अपने पुर में ?’
– ‘नहीं।’
– ‘तो ?’
– ‘राजधानी मोहेन-जो-दड़ो में।’
– ‘कितनी बार ?’
– ‘केवल एक बार।’
– ‘किससे।’
– ‘एक सैंधव नृत्यांगना से।’
– ‘क्या अरण्यानि प्रसन्न हुए।’
– ‘पता नहीं।’
– ‘क्या भविष्य में उससे पुनः चिच्चिक वृषारव संवाद होने की संभावना है ?’
– ‘कह नहीं सकता।’
– ‘आपके मन में अभिलाषा है ?’
– ‘हाँ है।’
– ‘कोई और वृषारव आपसे संवाद करना चाहे तो क्या आप उसके लिये चिच्चिक बनेंगे।’
– ‘कह नहीं सकता।’
– ‘अर्थात् कर भी सकते हैं और नहीं भी! ‘
– ‘हाँ! किंतु आप मुझसे इतने सारे प्रश्न क्यों कर रही हैं! प्रतिबंध के अनुसार मैं सारे प्रश्नों के उत्तर दे चुका हूँ।’
– ‘घबराओ मत अतिथि। ये प्रश्न किसी प्रतिबंध के साथ नहीं जुड़े हुए हैं।’ रानी मृगमंदा ने हँस कर कहा और आघाटि बजाने में व्यस्त हो गयी। सामने मैदान में अधिकांश नाग युवतियाँ अपनी पसंद के युवकों के साथ युगल बना चुकी थीं और अब वे मत्त होकर दुगुने उल्लास से नृत्य कर रही थीं।
– ‘क्या आप मेरे साथ नृत्य करेंगे शिल्पी ?’ अचानकर रानी मृगमंदा ने आघाटि बजाना रोक कर प्रतनु के सामने प्रस्ताव रखा।
– ‘किंतु मैं तो एक शिल्पी हूँ।’
– ‘तो क्या शिल्पी के लिये नृत्य करना वर्जित है ?’
– ‘नहीं वर्जित तो नहीं, किंतु मुझे नृत्य करना आता ही नहीं। इसी से संकोच होता है।’
– ‘एक कलाकार के लिये दूसरी कला को अपनाने में संकोच कैसा ? चलो उठो, तुम्हे नृत्य करना मैं सिखाऊंगी।’ रानी मृगमंदा ने हाथ पकड़कर उठा ही दिया प्रतनु को।
एक दिन उसे भी नृत्य करना पडे़गा, ऐसा तो प्रतनु ने कभी नहीं सोचा था। उसने तो आज तक केवल शिल्पकला की ही साधना की थी। नृत्यकला से तो उसका इतना ही सम्बन्ध था कि वह उसे देख सकता था, उसकी प्रशंसा कर सकता था। इससे अधिक कुछ नहीं किंतु आज नृत्यकला से उसका सजीव सम्बन्ध स्थापित होने जा रहा था।
रानी मृगमंदा को फिर से नृत्य हेतु उपस्थित हुआ जानकर नाग युवक-युवतियों का उत्साह दुगुना हो गया। तूर्ण में जैसे नवीन उल्लास आ गया। निऋति और हिन्तालिका भी रानी मृगमंदा की सहायता के लिये आगे आयीं। डगमगाते पदों से रानी मृगमंदा का अनुसरण करता हुआ प्रतनु काफी देर तक झिझकता ही रहा।
जाने क्यों बार-बार उसे लगता रहा कि वह नृत्य करने के लिये नहीं बना है। उसे तो बस छैनी-हथौड़ी से लेना-देना है किंतु साथ ही यह विचार भी मस्तिष्क में चक्कर काट रहा था कि यदि वह नृत्य करना सीख जाये तो रोमा कितना प्रसन्न होगी! फिर यह भी तो पर्याप्त संभव है कि नृत्यकला शिल्पकला के परिमार्जन में सहायक सिद्ध हो।
नृत्यरत रोमा की प्रतिमा संभवतः और भी श्रेष्ठ बनी होती यदि स्वयं प्रतिमाकार को नृत्यकला की बारीकियों का ज्ञान होता। अतः प्रतनु प्रयास करने लगा कि रानी मृगमंदा द्वारा बताई जा रही मुद्राओं का वह कुशलता के साथ अनुसरण करे किंतु उसके पद संचालन में आत्मविश्वास का अभाव बना ही रहा।
शिल्पी बार-बार त्रुटि कर रहा था और बार-बार बताने पर भी न तो नृत्य भंगिमा का और न मुद्रा का अनुसरण कर पा रहा था। फिर भी रानी मृगमंदा ने साहस नहीं छोड़ा, वह शिल्पी का उत्साह बढ़ाती रही। निऋति और हिन्तालिका भी पर्याप्त सहायता कर रही थीं। शिल्पी का अभ्यास जारी रहा।
अन्त्ततः वह क्षण आया जिसकी प्रतीक्षा रानी मृगमंदा, निऋति और हिन्तालिका पर्याप्त धैर्य के साथ कर रही थीं। शिल्पी के पैर थरथराये और उसे लगा कि उसके पैरों ने नये ढंग से धरा पर रखे जाने की कला सीख ली है। कुछ और समय बीतने पर हस्त संचालन और पद संचालन में भी साम्य होने लगा।
रानी मृगमंदा, निऋति और हिन्तालिका के लिये इतना पर्याप्त था। कुछ देर के विश्राम के पश्चात् रानी मृगमंदा ने वादकों को पुनः संकेत किया। पटह, तन्त्री, झांझ, तुरही, और बांसुरी फिर से बज उठे। रानी मृगमंदा ने शिल्पी की बांह पकड़ी और बहुत ही साधारण रीति से पद संचालित करते हुए नृत्य करने लगी।
इस बार रानी मृगमंदा से साम्य बैठाने में शिल्पी को अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ा। जब नृत्य तीव्र होने लगा तो निऋति और हिन्तालिका भी आ गयीं। तीनों नाग राजकुमारियों के साथ नृत्य करते हुए शिल्पी की देह में मानो किसी नर्तक की आत्मा आ बैठी। थोड़ी देर के लिये वह भूल ही गया कि वह तो शिल्पी है, केवल छैनी हथौड़ी के लिये बना है।
शिल्पी के चारों ओर अलौकिक आनंद की स्वर्णिम रश्मियाँ प्रवाहित हो रही थीं। इस आनंद का अनुभव उसे आज से पूर्व कभी नहीं हुआ था। प्रतनु को लगा कि वह अपने स्थूलत्व को त्याग कर तरल हो गया है। किसी पक्षी की भांति मुक्त गगन में उड़ रहा है अथवा वायु में गमन करने वाले किसी अदृश्य शटक पर सवार होकर दिशाओं के मंगलमय उत्स को प्राप्त कर रहा है।
उस क्षण उसे किसी का स्मरण नहीं हुआ, यहाँ तक कि रोमा का भी नहीं। जब वह निज अस्तित्व ही विस्मृत किये हुए था तो विश्व के अन्य उपक्रमों को कैसे स्मरण कर पाता! आनंदित होकर नृत्य करता हुआ प्रतनु इस समय केवल इतना ही अनुभव कर रहा था कि वह जन्मजात नर्तक है और युगों से इसी तरह तीनों राजकुमारियों के साथ नृत्यलीन है।
[1] तूर्य शब्द का प्रयोग अलग-अलग काल में अलग-अलग वाद्यों के समूह के लिये किया जाता था। रामायण काल में तूर्य में शंख, दुंदुभि तथा बांसुरी आदि का उपयोग होता था। पाणिनी की अष्टाध्यायी में वीणा वाद्य का तूर्य में विशेष महत्व दिखाया गया है। इस काल में तूर्य में पटह, तन्त्री, झांझ, तुरही तथा शंख का प्रयोग होता था। इस कारण इसे पंच शब्द भी कहा गया है। बाद में इसका उपयोग सेना के प्रस्थान के समय तथा युद्ध के अवसरों पर होने लगा। राजाओं के आगमन की सूचना देने तथा उनका स्वागत करने में भी तूर्य का उपयोग होने लगा। जातक साहित्य में तुरीय का प्रयोग तूर्य के रूप में होता है। पंचागिक में तत्, वितत्, अवनद्ध, घन और सुषिर वाद्यों को तूर्य में रखा गया है। वात्सयायन के कामसूत्र में तूर्य विभिन्न वाद्य समूहों के लिये प्रयुक्त हुआ है। वात्सयायन काल में तूर्य मनोरंजन प्रधान था और यह भावी जीवन का आधार भी था। स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से तूर्य में भाग लेते थे। इस समूहगान में प्रयास किया जाता था कि दोनों समूहों का एकीकरण हो जाये। इस एकीकरण के साथ ही मण्डली का मुखिया अपनी कन्या का विवाह उसी संगीतज्ञ के साथ कर देता था जो उस मण्डली में सर्वश्रेष्ठ होता था। यह कहना कठिन है कि वैदिक काल में तूर्य का आयोजन किया जाता था अथवा नहीं किंतु विवाह आरंभ काल से सार्वजनिक समारोह के रूप में होते आये हैं इसलिये अनुमान किया जाता है कि इस काल में भी तूर्य जैसा कोई आयोजन अवश्य होता होगा। इस आयोजन से मिलता-जुलता वैवाहिक आयोजन आज भी दक्षिणी राजस्थान की भीलएवं गरासिया आदि जन जातियों में होता है।
[2] व्रात्य आर्यों का वह दल था जो जलप्लावन के पश्चात् मनु के साथ पायमेरू से त्रिविष्टप होते हुए हिमालय से नीचे नहीं उतर कर पूर्व में आगे बढ़ा और यक्ष सभ्यता के सम्पर्क में आया। इसी कारण ब्रात्यों में वैदिक कर्मकाण्ड के प्रति रुझान नहीं था। वे आर्य भाषा जानते थे किंतु उनका रहन-सहन आर्यों से भिन्न था। वे यज्ञ में विश्वास नहीं करते थे तथा उनकी वेशभूषा भी अलग थी। व्रात्यों का देवता एकव्रात्य था। अथर्ववेद में ब्रात्यकाण्ड में एकव्रात्य को तप करते हुए दिखाया गया है। वह एक वर्ष के लिये निश्चल खड़ा है। उसके सात प्राण, सात अपान और सात व्यान हैं। आर्य देवता उसके अनुचर हैं और उसके पीछे चलते हैं। इस वर्णन से वह रुद्र का प्रतिरूप लगता है। नीले पेट और लाल कमर से वह महादेव लगता है। व्रात्यों के अन्य देवता उग्र, रुद्र, भव, शर्व, पशुपति और ईशान हैं। वर्तमान में ये सारे नाम भगवान शिव के माने जाते हैं। चूंकि आर्य, नाग और व्रात्य आर्यों की ही विभिन्न शाखायें थीं इसलिये उनमें सम्पर्क होना स्वाभाविक प्रक्रिया थी। स्वयंभू प्रजापति मनु की पत्नी इला एक गांधर्वी थी।
[3] चिच्चिक एक सूक्ष्म जंतु है जो ची ची की ध्वनि निकालता है। वृषारव दूसरा सूक्ष्म जंतु है, जिसका दूसरा नाम झिल्ली है। अरण्यानी अरण्य के देवता को कहते हैं। ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से मिलती है-वृषारवाय वदते यदुपावति चिच्चिकः आघाटिभिरिव धावयन्न्रण्यानिर्महीयते (10. 146. 2)
हम पर गरुड़ों का आक्रमण हुआ है। गरुड़ सैन्य ने रात्रि के अंधकार में दुर्ग तोड़ लिया है। सैंकड़ों गरुड़ दुर्ग में प्रवेश कर गये है। जाने कैसे उन्हें दुर्ग के गुप्त मार्ग का ज्ञान हुआ।
प्रातः होने में अभी पर्याप्त समय शेष था, जब प्रतनु की निद्रा विचित्र कोलाहल के कारण भंग हो गयी। प्रतनु ने अनुभव किया कि उसके कक्ष के बाहर बहुत सारे व्यक्ति कोलाहल करते हुए इधर-उधर दौड़े चले जा रहे हैं। उनके स्वर में उत्तेजना है तथा उनके भागते चले जाने से उनके शस्त्रों का भी शब्द उत्पन्न हो रहा है।
प्रतनु अपनी शैय्या त्याग कर उठ खड़ा हुआ। दीपाधार में स्नेहक की अत्यल्प मात्रा देखकर उसने अनुमान लगाया कि सूर्योदय होने में अधिक का विलम्ब नहीं है। उसने कक्ष से बाहर आकर देखा कि सैंकड़ों नाग विभिन्न दिशाओं से प्रकट होकर दुर्ग के मध्य में स्थित रानी मृगमंदा के प्रासाद को घेर रहे हैं।
– ‘क्या हुआ प्रहरी ?’ प्रतनु ने कक्ष से बाहर खड़े नाग से पूछा। प्रतनु ने देखा कि इस समय प्रहरी के स्थान पर पाँच नाग सैनिकों का गुल्मपति कंकोल पहरे पर खड़ा है।
– ‘हम पर गरुड़ों का आक्रमण हुआ है। गरुड़ सैन्य ने रात्रि के अंधकार में दुर्ग तोड़ लिया है। सैंकड़ों गरुड़ दुर्ग में प्रवेश कर गये है। जाने कैसे उन्हें दुर्ग के गुप्त मार्ग का ज्ञान हुआ।’ गुल्मपति कंकोल ने उत्तर दिया।
आश्चर्य से जड़ रह गया प्रतनु। इतने दुर्गम और गुप्त दुर्ग को तोड़ लेने वाला शत्रु सचमुच ही कितना प्रबल होगा!
– ‘नागों के पास इस संकट से निकलने का क्या उपाय है ?’ प्रतनु ने पुनः कंकोल से प्रश्न किया।
– ‘ऐसी स्थिति में रानी को सुरक्षित रूप से दुर्ग से बाहर ले जाने का प्रयास करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।’
– ‘क्यों ? क्या नाग सैन्य गरुड़ सैन्य का प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं है ?’
– ‘इस समय प्रश्न सक्षमता का नहीं स्थिति का है। युद्ध के मैदान में सन्नद्ध अथवा दुर्ग को घेर कर खड़े शत्रु से लड़ना उतना कठिन नहीं होता जितना दुर्ग में अचानक घुस आये शत्रु से निबटने में। इस समय शत्रु का बल बहुत बढ़ा हुआ है। वह अचानक चढ़ कर आया है। हमें उसके वास्तविक बल और शक्ति के केन्द्र का अनुमान नहीं है।’
एक बार फिर आश्चर्य से जड़ होकर रह गया प्रतनु। केवल पाँच सैनिकों के साधारण गुल्मपति को भी सामरिक नीति का इतना अच्छा ज्ञान है। सचमुच ही नागों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
– ‘तो क्या रानी मृगमंदा को दुर्ग से बाहर ले जाया जा चुका है ?’
– ‘नहीं! रानी ने दुर्ग छोड़ने से मना कर दिया है।’
– ‘क्यों ?’
– ‘रानी ने सैनिकों को आदेश दिया है कि प्राण रहते दुर्ग शत्रु को अर्पित नहीं किया जाये। वे स्वयं भी खड्ग लेकर नाग सैनिकों का नेतृत्व एवं उत्साहवर्धन कर रही हैं।’
प्रतनु के विस्मय का कोई पार नहीं है। पुष्पों से भी अधिक कोमलांगी रानी मृगमंदा हाथ में खड्ग लेकर शत्रु का सामना कर रही है! सचमुच नागों और सैंधवों में कितना अंतर है! धन्य है रानी मृगमंदा! सौंदर्य ऐसा कि धरती भर की प्रजाओं की रमणियों के सौंदर्य को फीका कर दे! कोमलता ऐसी कि पुष्प-पांखुरियों को भी पीछे छोड़ दे और संकल्प ऐसा कि खड्ग हाथ में लेकर समरांगण में उतर पड़े!
– ‘संकट की इस विकट घड़ी में तुम अपनी रानी की रक्षा के लिये नहीं जाओगे ?’ प्रतनु ने पुनः गुल्मपति से प्रश्न किया।
– ‘मैं जाना तो अवश्य चाहता हूँ किंतु आप हमारे अतिथि हैं। आपको अकेला छोड़कर नहीं जा सकता। हमारी रानी की ऐसी ही आज्ञा है।’
– ‘क्या आज्ञा है तुम्हारी रानी की ?’
– ‘जैसे ही रानी मृगमंदा को सूचना दी गयी कि शत्रु ने दुर्ग का गुप्त मार्ग भेद कर अंदर प्रवेश कर लिया है, वैसे ही वे खड्ग हाथ में लेकर शत्रु से निबटने के लिये उद्धत हो गयीं तथा तत्काल अपनी अनुचरियों को यहाँ भेजकर कहलावाया कि यदि अतिथि जाग रहे हों तो उन्हें समय रहते सुरक्षित मार्ग से दुर्ग से बाहर पहुँचा दिया जाये किंतु यदि निद्रालीन हों तो अत्यंत आवश्यक होने से पहले उन्हें जगाया न जाये किंतु किसी भी स्थिति में अतिथि को अकेला और असुरक्षित न छोड़ा जाये।’
– ‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कंकोल कि मैं इस समय नागों के कुछ काम आ सकूँ!’
– ‘आपात् काल में अतिथि का रक्षण करना हमारा कत्र्तव्य है, न कि अतिथि के प्राण खतरे में डालकर उनसे अपना रक्षण करवाना। आप चाहें तो मैं तथा मेरे सैनिक आपको दुर्ग से बाहर सुरक्षित स्थान पर छोड़ आयें।’
– ‘नहीं-नहीं। मैं इतना कृतघ्न नहीं कि अपने शरण दाता को आपात् काल में जानकर स्वयं प्राणों का मोह लेकर भाग खड़ा होऊँ। मैं भी नागों के आतिथ्य का प्रतिमूल्य चुकाऊँगा सैनिक। तुम मेरे लिये खड्ग का प्रबंध करो।’
– ‘अविनय क्षमा करें श्रीमन्! रक्षण कला में प्रवीण हुए बिना शत्रु के सम्मुख जाना आत्मघात से अधिक कुछ नहीं है।’
– ‘तो फिर मैं क्या करूँ ? कैसे सहायता करूँ नागों की!’
– ‘यदि आप कुछ करना ही चाहते हैं तो जिस कार्य में आप प्रवीण हैं, उसी कार्य से हमारा हित साधन करें।’
– ‘क्या छैनी और हथौड़ी इस समय नागों की कोई सहायता कर सकती है ?’
– ‘क्यों नहीं कर सकती! यदि क्षतिग्रस्त गुप्त मार्ग को फिर से बंद कर दिया जाये तो और अधिक संख्या में शत्रु के आगमन को रोका जा सकता है। इस समय दुर्ग में शिल्पी नहीं हैं इसलिये हमारे सैनिक ध्वस्त मार्ग पर भित्ति बनकर खड़े हैं। जैसे ही गरुड़ों के आघात से आगे के नाग सैनिक गिरते हैं, उनका स्थान नये सैनिक ले लेते हैं इस कारण हमारे सैनिकों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।’
प्रतनु ने कंकोल के शब्दों का अर्थ लगाया। कंकोल का प्रस्ताव ऐसा था जैसे बहती हुई नदी में रेत का पुल बनाना। समक्ष युद्ध में सन्नद्ध गरुड़ सैनिकों एवं उनके प्रबल आघात से जूझ रहे नाग सैनिकों के मध्य भित्ति खड़ी करना क्या कोई सरल बात है!
– ‘तुम्हारे कहने का अर्थ है कि आगे की पंक्ति में लड़ रहे नाग सैनिकों के पीछे एक भित्ति खड़ी करके दुर्ग का मार्ग बंद कर दिया जाये! इससे तो आगे की पंक्ति में लड़ रहे नाग सैनिकों का सम्पर्क पीछे खड़े सैनिकों से टूट जायेगा! ‘
– ‘बिल्कुल ठीक समझे आप! ‘
– ‘किन्तु इससे तो प्रथम पंक्ति में लड़ रहे सैनिकों को हम जीवित ही मृत्यु के मुख में धकेल देंगे!’
– ‘मृत्यु के मुख में तो वे वैसे भी हैं किंतु इस प्रयास से हम अन्य नाग सैनिकों को मृत्यु के मुख में जाने से रोक सकते हैं। इस कार्य मे चरिष्णु [1]आपकी सहायता कर सकते हैं।’
– ‘चरिष्णु क्या ?’
– ‘ चरिष्णु यंत्र की सहायता से हम दूर रहकर शत्रु पर प्रस्तरों की वर्षा कर सकते हैं। जैसे ही चरिष्णु प्रस्तरों की वर्षा आरंभ करेगा वैसे ही शत्रु चरिष्णु की प्रहारक परिधि से बाहर जाने के लिये पीछे हटेगा। हमारे सैनिक उन्हें धकेलते हुए और आगे जाकर खड़े हो जायेंगे। इससे इस समय जो संघर्ष दुर्ग की प्राचीर पर हो रहा है, वह कुछ समय के लिये दुर्ग की प्राचीर से दूर होने लगेगा। यही वह समय होगा जब हम दुर्ग के ध्वस्त मार्ग पर फिर से भित्ति बनाकर शत्रु के प्रवेश को रोक सकते हैं। यदि एक बार शत्रु सैन्य का प्रवाह टूट जाये तो भीतर घुस आये शत्रु को खोजकर मारा जा सकता है।’ गुल्मपति कंकोल ने अपनी बात पूरी की।
प्रतनु को लगा कि योजना दुष्कर होने पर भी असंभव नहीं है। प्रयास तो किया ही जा सकता है। प्रयास करने के अतिरिक्त और उपाय भी क्या है! ऐसे विषम क्षण में वह अपने आश्रयदाता को छोड़कर पलायन तो नहीं कर सकता! प्रतनु ने अपना लक्ष्य निर्धारित किया और कंकोल से तत्काल कतिपय शिल्प उपकरणों एवं सहायता हेतु सैनिकों का प्रबंध करने को कहा।
तुरंत रानी मृगमंदा तक सूचना भिजवाई गयी। रानी मृगमंदा अतिथि प्रतनु को किसी प्रकार के खतरे में नहीं डालना चाहती थी किंतु प्रतनु के आग्रह को देखते हुए वह इस योजना पर कार्य करने को तैयार हो गयी। वह स्वयं तलवार लेकर दुर्ग की प्राचीर के क्षतिग्रस्त भाग पर आकर खड़ी हो गयी और अपने सैनिकों का मार्गदर्शन करने लगी।
तत्काल चार चरिष्णु दुर्ग की क्षतिग्रस्त भित्ति पर चढ़ाये गये और वहाँ से शत्रु सैन्य पर प्रस्तरों की वर्षा होने लगी। प्रस्तरों की प्रहारक परिधि में न केवल शत्रु सैन्य अपितु कुछ नाग सैनिक भी आ गये किंतु नाग सैनिकों ने इसकी चिंता नही की और वे शत्रु को धकेलते हुए आगे हटा ले गये। प्रतनु के लिये यह परीक्षा की घड़ी थी।
उसने सैनिकों की सहायता से विशाल प्रस्तर खण्ड एक दूसरे के ऊपर रखते हुए भित्ति बनानी आरंभ की। गरुड़ों को धकेल कर आगे ले गये नाग सैनिकों का सम्पर्क पीछे खड़े नागों से टूट गया। चरिष्णु की प्रहारक परिधि के भीतर सुरक्षित भाग को चिन्हित करने तथा दुर्ग से बाहर निकल कर संघर्ष कर रहे नाग सैनिकों से निबटने में गरुड़ों को अधिक समय नहीं लगने वाला था। इससे पहले कि गरुड़ फिर से दुर्ग की सीमा तक आ धमकें प्रतनु को भित्ती खींच देनी थी।
गरुड़ों को नागों की योजना समझ में आ गयी। अब वे भित्ति के पूर्ण होने से पूर्व पुनः दुर्ग में प्रवेश करने के लिये तेजी से चरिष्णु की प्रहारक परिधि के मध्य सुरक्षित भाग को चिह्नित करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उधर नाग सैनिकों के हाथों में खड्ग तीव्रता से संचालित हो रहे थे और इधर प्रतनु के हाथों में शिल्प उपकरण। आज ही तो प्रतनु के समस्त कौशल का परीक्षण होना था।
संघर्ष के इन अपरिचित क्षणों में शिल्पी प्रतनु ने जैसे कला की नयी परिभाषा प्राप्त की। उसे लगा कि रोमा जैसी रमणीय बाला के अंग लास्य एवं सौंदर्य का प्रस्तरों में उत्कीर्णन शिल्पविद्या का सर्वोच्च बिन्दु नहीं था। रानी मृगमंदा, हिन्तालिका और निर्ऋति के जलविहार के छद्म शिल्पांकन का रहस्य तोड़ देना भी शिल्पविद्या के ज्ञान का चरम नहीं था।
शिल्पविद्या का चरम बिन्दु तो आज ही खोजा और पाया जाना है। छाती पर चढ़कर आये शत्रु से अपनी और अपने हितैषियों के रक्षण की सामथ्र्य ही तो कला की सार्थकता का प्रमाण है। इसी कारण वह कला की चरम बिंदु भी है। प्रतनु की कला में यह सामथ्र्य है अथवा नहीं, आज इसी का तो परीक्षण है। जैसे भी हो, प्रतनु को इस परीक्षण में सफल होकर ही दिखाना है। रानी मृगमंदा के आतिथ्य का इससे अधिक श्रेष्ठ प्रतिदान और क्या हो सकता है!
प्रतनु ने देखा कि उसके निकट ही सैनिक वेश में उपस्थित रानी मृगमंदा अत्यंत गंभीर मुद्रा में अपने सैनिकों को समरांगण में जूझता हुआ और एक-एक करके मृत्यु के मुख में समाता हुआ देख रही है। वह चिंतित भाव से एक दृष्टि अपने सैनिकों पर डालती है तो दूसरी दृष्टि तीव्रता से चलते हुए प्रतनु के हाथों पर डालती है।
यदि गरुड़ सैन्य भित्ति के पूर्ण होने से पूर्व दुर्ग तक आ जाता है तो उसे रोकने के लिये कुछ नाग सैनिक और बाहर भेजने पड़ेंगे। प्रतनु नहीं चाहता कि अब और नाग सैनिक मारे जायें। उसने एक विशाल प्रस्तर शिला की ओर देखा तथा अपनी सहायता कर रहे नाग सैनिकों को संकेत किया। लगभग पचास सैनिक उस प्रस्तर को भित्ति की तरफ धकेलने लगे।
नागों को तीव्र गति से नष्ट करता हुआ गरुड़ सैन्य दुर्ग के अत्यंत समीप आ पहुँचा। ऐसा नहीं था कि नाग सैन्य कमजोर सिद्ध हो रहे थे किंतु यह ऐसा युद्ध था जिसमें उन्हें कम से कम संख्या में रहकर ही अपने शत्रु की गति को रोकना था। वे संख्या में बहुत कम थे और गरुड़ों की संख्या बहुत अधिक थी।
गरुड़ सैनिक किसी भी क्षण दुर्ग में प्रवेश करने की स्थिति में आ गये। अब भित्ति उस ऊँचाई तक पहुँच गयी थी जहाँ से दुर्ग के भीतर के नागों को बाहर नहीं भेजा जा सकता था। प्रतनु ने अनुमान लगाया कि यदि गरुड़ों के पहुँचने से पूर्व यह विशाल प्रस्तर शिला वांछित स्थल तक पहुँच गयी तो प्रतनु का समस्त उद्योग सफल हो जायेगा अन्यथा गरुड़ सैन्य का दुर्ग में धंस जाना निश्चित है। यदि एक बार गरुड़ सैन्य फिर से दुर्ग में धंस गया तो उसे बाहर धकेलना लगभग असंभव हो जायेगा। गरुड़ सैन्य समुद्र की लहरों के समान लहरा रहा था।
प्रतनु को लगा कि इस समय समस्त संघर्ष का केन्द्र वही बन गया है। उसने सैनिकों को ललकारा, बस थोड़ी सी शक्ति और लगाओ! शीघ्रता करो! रानी मृगमंदा और स्वयं प्रतनु भी प्रस्तर शिला को धकेलने में सहायता करने लगे। पचास के लगभग गरुड़ सैनिक दौड़ते हुए दुर्ग की परिधि तक आ पहुँचे।
प्रतनु को लगा कि यह उद्यम व्यर्थ हो गया किंतु जैसे ही गरुड़ों ने दुर्ग की भित्ति के रिक्त भाग में अपने आप को धंसाया ठीक उसी समय नाग सैनिकों द्वारा धकेली जाती हुयी विशाल प्रस्तर शिला ढलान पाकर स्वयं ही तेजी से लुढ़ककर भित्ति के खाली स्थान पर पहुँच गयी।
प्रस्तर शिला के नीचे आकर गरुड़ सैनिक पिस कर चूर्ण बन गये। ठीक समय पर दैवीय सहायता प्राप्त हो जाने से प्रतनु ने राहत की सांस ली। अब भित्ति को शिलाखण्डों से भरकर अभेद्य बना देना प्रतनु जैसे चतुर शिल्पी के लिये अधिक कठिन कार्य नहीं था।
नाग सैनिकों ने उत्साह से भरकर जयघोष किया- ‘रानी मृगमंदा की जय! शिल्पी प्रतनु की जय! दुर्ग में घुस चुके गरुड़ सैनिकों को संध्या होने से पूर्व ही खोज-खोजकर मार दिया गया।
रानी मृगमंदा का प्रस्ताव सुनकर गुल्मपति चौंका था किंतु अब समय आ गया था जब प्रतनु के विरुद्ध कुछ न कुछ बोलना आवश्यक था। अतः उसने रानी मृगमंदा से अनुमति मांगी कि उसे भी कुछ बोलने का अवसर दिया जाये।
शत्रुओं के हाथ में लगभग जा चुके दुर्ग को पुनः हस्तगत करने के पश्चात रानी मृगमंदा ने नाग गुल्मपतियों को अपने दुर्ग के मध्य में स्थित अपने प्रासाद में बुलाया। शिल्पी प्रतनु को भी इस अवसर पर विशेष रूप से आमंत्रित किया गया।
नागों ने यह पहली बार देखा था कि घनघोर कठिन परिस्थिति में भी उनके मुखिया ने दुर्ग त्यागने के स्थान पर दुर्ग में रहकर ही अपने सैनिकों का नेतृत्व किया। रानी मृगमंदा ने स्त्री होते हुए भी पुरुष मुखिया की अपेक्षा कहीं अधिक साहस का परिचय दिया था। इसी प्रकार शिल्पी प्रतनु ने अतिथि होते हुए भी अपने प्राणों का मोह त्याग कर अदम्य साहस प्रदर्शित किया तथा युद्धरत सैनिकों के मध्य भित्ति का निर्माण कर शत्रु सैन्य का प्रवाह अवरूद्ध कर दिया।
नाग-गुल्मपतियों ने एक स्वर से रानी मृगमंदा और शिल्पी प्रतनु की प्रशंसा की और दुर्ग को बचा लेने का श्रेय उन्हीं दोनों को दिया। नाग गुल्मपतियों ने निश्चित किया कि शत्रु के पराभव के उपलक्ष में अगले पूर्ण चँद्र को दुर्ग में विजयोत्सव मनाया जाये।
रानी मृगमंदा ने विजयोत्सव मनाये जाने की स्वीकृति प्रदान की तथा नाग-गुल्मपतियों के समक्ष किंचित् नतमस्तक हो अपना प्रस्ताव रखा- ‘मेरा गुल्मपतियों से आग्रह है कि अगले पूर्ण चँद्र तक वे अपना नया राजा चुन लें क्योंकि मैं विजयोत्सव के दिन ही शिल्पी प्रतनु से विवाह करना चाहती हूँ।’
– ‘किंतु नाग-प्रजा के नियमानुसार नागों की रानी को किसी नाग युवक से ही विवाह करना होता है।’ गुल्मपति प्रमद ने रानी को टोका।
– ‘मैं नागों के नियम जानती हूँ तभी तो आपसे नया राजा चुनने को कह रही हूँ। चूंकि प्रतनु नाग नहीं हैं, इसलिये वे नागों के राजा नहीं हो सकते। इस कारण मैं सिंहासन का परित्याग कर दूंगी तथा शिल्पी प्रतनु के साथ उनके प्रांतर को चली जाऊँगी।’
– ‘किंतु पुत्री हम तो आपको ही अपनी रानी के रूप में देखते रहना चाहते हैं। आप हमारे अंतिम राजा कर्कोटक की प्रतिभासम्पन्न पुत्री हैं। आपके अतिरिक्त किसी और का नेतृत्व हमसे सहज ही स्वीकार नहीं होगा।’ वृद्ध गुल्मपति श्वेत केशीय ने रानी मृगमंदा के प्रस्ताव से असहमत होते हुए कहा।
– ‘तब तो मुझे जीवन भर अविवाहित रहना होगा। क्योंकि नागों के नियम के अनुसार तो मेरा विवाह होते ही मेरा पति नागों का राजा बन जायेगा।’
– ‘किंतु आप यदि किसी नाग युवक से विवाह करेंगी तो भी आप और आपके पति मिलकर नाग प्रजा का नेतृत्व कर सकते हैं।’ गुल्मपति तक्षक ने सुझाव दिया।
– ‘आप भूल रहे हैं मातुल तक्षक कि नाग कन्याओं को अपनी इच्छानुसार पति वरण करने का अधिकार है। जो अधिकार साधारण नागकन्याओं को शत-शत वर्षों से प्राप्त है, क्या मुझे उस अधिकार से वंचित रखा जायेगा ?’ रानी मृगमंदा ने स्मित हास्य के साथ गुल्मपति तक्षक का विरोध किया।
– ‘रानी मृगमंदा उचित ही तो कहती हैं। हम किसी नागकन्या को उसके सहज अधिकार से वंचित नहीं कर सकते।’ गुल्मपति वासुकि ने रानी मृगमंदा का समर्थन किया।
– ‘हम रानी मृगमंदा को शिल्पी प्रतनु के साथ विवाह करने से नहीं रोक सकते किंतु साथ ही यह भी चाहते हैं कि रानी मृगमंदा का नेतृत्व हमें उपलब्ध रहे। ये दोनों कार्य एक साथ नहीं हो सकते।’ युवा गुल्मपति प्रमद ने अपना मत व्यक्त किया।
– ‘क्यों नहीं हो सकते ? यदि रानी मृगमंदा शिल्पी प्रतनु को अपना पति चुनती हैं तो शिल्पी प्रतनु को ही नागों का अगला राजा मानने में क्या हानि है ?’ गुल्मपति कंकोल ने अपना मत दिया।’
– ‘किंतु नागों का राजा केवल नाग ही हो सकता है। अतिथि प्रतनु नाग नहीं हैं। उन्हें नागों का राजा नहीं बनाया जा सकता।’ गुल्मपति प्रमद ने गुल्मपति कंकोल के प्रस्ताव का विरोध किया।
– ‘माना कि शिल्पी प्रतनु नाग नहीं हैं किंतु वे विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं। उन्होंने संकट काल में नागों की सहायता की है और ऐसा करके वे स्वयं को नागों का सबसे बड़ा हितैषी सिद्ध कर चुके हैं।’ कंकोल ने अपना विचार दृढ़ता से प्रकट किया।
– ‘मेरे मत में गुल्मपति कंकोल ठीक कहते हैं। विलक्षण प्रतिभा के धनी और नागों के हितैषी शिल्पी प्रतनु को यदि रानी मृगमंदा अपना पति चुनती हैं तो नाग प्रजा भी उन्हें अपना राजा बना सकती है।’ गुल्मपति विमद ने अपना मत व्यक्त किया।
– ‘किंतु यह नागों की सहस्रों वर्षों से चली आ रही परम्परा के प्रतिकूल है।’ गुल्मपति प्रमद ने पुनः इस प्रस्ताव का विरोध किया।
गुल्मपति प्रमद किशोरावस्था से यह साध मन में पाले हुए था कि वह राजकुमारी मृगमंदा से विवाह करेगा और समय आने पर स्वतः ही नागों का राजा बन जायेगा। वह कई बार एवं कई प्रकार से राजकुमारी मृगमंदा के समक्ष प्रणय निवेदन कर चुका था। रानी मृगमंदा ने यद्यपि कभी भी प्रमद का प्रस्ताव स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया किंतु कभी अस्वीकृति का भाव भी प्रकट नहीं किया था।
जब अचानक ही नागराज कर्कोटक की हत्या हो गयी और मृगमंदा नागों की रानी हो गयी तो रानी ने घोषणा करवाई कि जो कोई भी उसके प्रश्नों का प्रत्युत्तर दे सकेगा, उसी से रानी विवाह करेगी। प्रमद ने रानी मृगमंदा के अटपटे प्रश्नों का प्रत्युत्तर देने का भी प्रयास किया था किंतु वह दो प्रश्नों का उत्तर देने के बाद तीसरे प्रश्न का उत्तर ढूंढ पाने में असमर्थ रहा था।
गुल्मपति होने के कारण रानी मृगमंदा ने उसे अनुचर नहीं बनाया था। प्रमद ने उस शिल्पी को भी ढूंढने का प्रयास किया था जिसने उस रहस्यमयी प्रतिमा का निर्माण किया था किंतु प्रमद को केवल इतना ही ज्ञात हो सका कि रानी मृगमंदा ने इस प्रतिमा का निर्माण किसी अज्ञात मायावी शिल्पी से करवाया था। उस शिल्पी के बारे में कोई भी नहीं जानता था कि वह कौन था और कहाँ से आकर कहाँ चला गया था!
एक दिन जब गुल्मपति को यह ज्ञात हुआ कि एक सैंधव युवक ने रानी मृगमंदा के तीनों प्रश्नों के उत्तर दे दिये हैं तो उसकी रही सही आशा पर भी पानी फिर गया था। फिर भी उसके मन में आशा की एक किरण अब भी उजाला किये हुए थी कि संभवतः सैंधव युवक से विवाह करके रानी मृगमंदा नाग प्रजा की रानी होने का अधिकार न त्यागना चाहे और प्रमद से ही विवाह कर ले किंतु आज के इस वार्तालाप से तो आशा की अंतिम किरण पर तुषारापात होता हुआ सा लग रहा था। इसी कारण वह नागों के नियम में शैथिल्य का विरोध कर रहा था।
प्रमद को इस तथ्य का ज्ञान हो गया था कि रानी मृगमंदा और दोनों राजकुमारियाँ सैंधव शिल्पी प्रतनु से अनुराग रखती हैं तथा उससे विवाह करने को उत्सुक हैं। इसलिये रानी मृगमंदा में प्रमद की विशेष रूचि नहीं रह गयी थी। इस समय तो वह यही सोच रहा था कि रानी मृगमंदा और उसकी दोनों भगिनियाँ शिल्पी प्रतनु के साथ विवाह करके नागों का पुर छोड़ कर जाना चाहती है तो अच्छा ही है। इससे वह नागों के सिंहासन पर अपना अधिकार मजबूती के साथ प्रस्तुत कर सकेगा किंतु नियम शिथिल किया गया तो यह संभव नहीं हो पायेगा।
गुल्मपति कंकोल के प्रस्ताव पर गुल्मपतियों में दीर्घ समय तक वाद-विवाद होता रहा। अंत में वे प्रतनु के साथ रानी मृगमंदा के परिणय की स्थिति में प्रतनु को नागों का नया राजा चुनने तथा नागों के नियम शिथिल करने पर सहमत हो गये। गुल्मपति प्रमद इस निर्णय से अप्रसन्न होकर अपने स्थान पर उठ कर खड़ा हो गया। उसने चेतावनी दी कि गुल्मपतियों को यह अधिकार नहीं है कि वे नाग प्रजा के बनाये हुए नियमों को अमान्य कर सकें। इसलिये वह नाग प्रजा से ही इसका निर्णय करवायेगा।
रुष्ट प्रमद प्रासाद से बाहर जाने को तत्पर हो गया तो प्रतनु ने उससे रुकने का आग्रह किया। वह अब तक नितांत मौन धारण करके गुल्मपतियों और रानी मृगमंदा के संवाद को सुन रहा था। रानी मृगमंदा का प्रस्ताव सुनकर गुल्मपति चौंका था किंतु अब समय आ गया था जब प्रतनु के विरुद्ध कुछ न कुछ बोलना आवश्यक था। अतः उसने रानी मृगमंदा से अनुमति मांगी कि उसे भी कुछ बोलने का अवसर दिया जाये।
रानी मृगमंदा द्वारा अनुमति दिये जाने के पश्चात् प्रतनु ने कहा- ‘ मैं अत्यंत विनय के साथ क्षमा याचना करते हुए कहना चाहता हूँ कि यह सत्य है कि मैंने रानी मृगमंदा के तीन जटिल प्रश्नों के संतोषप्रद उत्तर दिये थे किंतु उस समय मेरे समक्ष यह प्रतिबंध नहीं रखा गया था कि उन प्रश्नों का उत्तर देने के पश्चात् मुझे अनिवार्यतः रानी मृगमंदा से विवाह करना होगा। न ही इस सम्बन्ध में रानी मृगमंदा ने मुझसे आज तक स्वीकृति प्राप्त की है। यही कारण है कि रानी मृगमंदा नहीं जानतीं कि मैं उनसे विवाह करने को उत्सुक हूँ भी अथवा नहीं। उचित तो यही होता कि रानी मृगमंदा मुझसे विचार विमर्श करके ही अपना मंतव्य आप सबके समक्ष रखतीं।’
– ‘तो क्या रानी मृगमंदा से विवाह करने में आपको कोई आपत्ति है ?’ वृद्ध गुल्मपति श्वेत केशीय ने पूछा।
– ‘आपत्ति नहीं विवशता है। अन्यथा रानी मृगमंदा से विवाह करना तो मेरे जैसे तुच्छ शिल्पी और अज्ञात पथिक के लिये परम सौभाग्य की बात है।’ प्रतनु ने प्रत्युत्तर दिया।
– ‘किंतु शिल्पी आपके समक्ष कैसी विवशता है ?’
– ‘मैंने सैंधव देश की देव-नृत्यांगना रोमा को वचन दिया है कि मैं दो वर्ष के पश्चात् मोहेन-जो-दड़ो लौटूंगा तथा अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिकार लूंगा। उस वचन के अनुसार मुझे यहाँ से प्रस्थान करना होगा ताकि मैं सिंधु तट पर वरुण के आगमन से पूर्व मोहेन-जो-दड़ो पहुँच सकूं।’ प्रतनु ने शर्करा तट से प्रस्थान करने से लेकर किलात द्वारा मोहेन-जो-दड़ो से निकाले जाने तक की सारी कथा गुल्मपतियों को कह सुनाई।
रानी मृगमंदा के आश्चर्य और क्षोभ का पार न रहा। वह अपनी ही धुन में, एक ही दिशा में सोचती रही। उसने यह पता लगाने का प्रयास नहीं किया कि प्रतनु भी उससे विवाह करना चाहता है अथवा नहीं। वह तो यह मानकर चल रही थी कि प्रतनु भी उससे अनुराग रखता है। अन्यथा वह गुल्मपतियों के समक्ष यह प्रस्ताव कदापि न रखती।
प्रतनु की बात सुनकर गुल्मपति प्रमद शांत होकर अपने स्थान पर बैठ गया। आशा की अंतिम किरण जो अभी कुछ क्षण पूर्व बुझ गयी थी वह फिर से चैतन्य हो गयी। भाग्य ने फिर से रानी मृगमंदा और नागों का सिंहासन उसकी झोली में आ गिरने के उपक्रम प्रस्तुत कर दिये थे।
बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला। वृद्ध गुल्मपति श्वेत केशीय ने दीर्घ मौन को भंग किया- ‘हमारे लिये आपकी क्या आज्ञा है रानी ? आदेश हो तो राजाज्ञा भंग करने के अपराध में शिल्पी प्रतनु को बंदी बनाया जाये अथवा उन्हें इसी समय दण्डित किया जाये! ‘
– ‘नहीं-नहीं! न तो हमने ऐसी कोई आज्ञा दी है कि हम शिल्पी प्रतनु से विवाह करेंगी और न ही हम अपने अतिथि को किसी भी कार्य के लिये विवश करेंगी। ऐसे परम सम्मानित अतिथि तो सौभाग्य से ही प्राप्त होते हैं। हमें तो गर्व होना चाहिये कि हमने ऐसे व्यक्ति के अतिथि सत्कार का अवसर प्राप्त किया जो एक संकटग्रस्त रानी के लिये अपने प्राण तक संकट में डालने को प्रस्तुत है तथा अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिकार करने के लिये नाग लोक का राजपद और नाग रानी से विवाह का प्रलोभन भी त्यागने में सक्षम है। हम इन्हें कैसे बंदी बना सकते हैं और कैसे दण्डित कर सकते हैं! ये स्वतंत्र हैं। जब तक चाहें, नाग लोक में रह सकते हैं और जब जहाँ जाना चाहें, जा सकते हैं।’
एक बहुत बड़ा भार था जिसे शिल्पी प्रतनु कई दिनों से अपने सिर पर अनुभव कर रहा था, आज वह भार यकायक हल्का हो गया था। नहीं जानता था प्रतनु कि जिस भार को वह अपने सिर से उतरा हुआ मान रहा है, वह भार शत-शत गुणा होकर रानी मृगमंदा और समस्त नाग प्रजा के सिर पर जा चढ़ा है।
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