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सभा (6)

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सभा

सभा में साम-गायन के साथ-साथ विभिन्न यज्ञ भी निर्विघ्न रूप से होते हैं। पुरुषों के साथ जन की समस्त स्त्रियों को इस सभा में भाग लेना अनिवार्य है। अशक्त और रोगी प्रजा को सभा से अनुपस्थित रहने की अनुमति है।

शुभ्र हिम से आच्छादित शिखरों की सघन शृंखला ने चारों ओर घूम कर एक दुर्ग की आकृति बना ली है जिसके मध्य उपजाऊ मृदा युक्त भूमि का अच्छा विस्तार है। हिमयुक्त शिखरों पर नृत्यरत प्रातःकालीन सूर्य रश्मियों से पूरा लोक दिव्य आभा से आपूरित है। पर्वतीय शिखरों तथा परुष्णि के विस्तृत तटों पर खड़े देवदारु, अश्वत्थ,[1]  उदुम्बर,[2]  न्यग्रोध,[3]  कर्कंधु, [4] किंशुक, [5] शमी, [6] शाल्मलि, [7] हरिद्र, [8] बदर, [9] प्लक्ष, [10] पीतशाल,[11]  बिल्व, खदिर, [12] शिंशिपा, [13]  कार्श्मर्य, [14] पलाश,[15] विकंकत [16] आदि वृक्षों को स्पर्श करके आने वाला शीतल,सुगंधित और मंद वायु, वैवस्वत् मनु-पुत्रों के जीवन में क्षण-क्षण नवीन उत्साह का संचरण करता हुआ प्रतीत होता है।

सूर्य रश्मियों से तप्त होकर पिघलने वाला ‘हिम’ जल में परिवर्तित होकर विभिन्न धाराओं के रूप में बहता हुआ समतल पर पहुँचते-पहुँचते एक स्थूल प्रवाह में आकर मिल रहा है। यह प्रवाह समतल में कुछ और आगे चलकर जब हिम-शृंखलाओं की पहुँच से पर्याप्त दूर होने लगता है तब तक कई और स्थूल धारायें इसमें आ मिलती हैं और एक विशाल सलिला में परिवर्तित हो जाती हैं।

इसी पुण्य सलिला को वैवस्वत मनु-पुत्र परुष्णि कहकर वंदन करते हैं। पुण्य सलिला परुष्णि के तट पर वैवस्वत् मनु-पुत्रों का विशाल जन स्थित है जो ‘तृत्सु,-जन’ के नाम से विख्यात है। इस जन में दस विश हैं। प्रत्येक विश में दस ग्राम हैं तथा प्रत्येक ग्राम में दस कुल हैं।

प्रत्येक कुल में कई परिवार हैं तथा परिवारों में प्रपितामह से लेकर पितामह, पिता, पुत्र, पौत्र एवं प्रपौत्रों की पाँच-छः पीढ़ियाँ रहती हैं। सदस्यों की दृष्टि से तो यह एक सम्पन्न जन है ही, धन-धान्य, गौ तथा अश्वादि पालित पशुओं की दृष्टि से भी यह एक शक्तिशाली जन है।

इस जन के आर्य मुख्यतः गौ-चारण और अश्व पालन में ही अपना दिवस व्यतीत करते हैं। कुछ आर्यों ने व्रीही [17] तथा यव के खेतों का निर्माण कर लिया है तो कुछ आर्य विविध शिल्प विद्यायें सीखकर अस्त्र-शस्त्रों तथा लौह-रथों के निर्माण में संलग्न हैं। जन के समस्त कुल एवं परिवार वनस्पति अवशेषों और मृत्तिका से निर्मित शालाओं में रहते हैं।

इन पर्ण शालाओं के चारों ओर पंचवटी [18] बनाई गयी हैं। आर्य ललनाओं ने बड़े ही परिश्रम से पर्णशालाओं के बाहर उलप, काश, कुश, तृण, दर्भ, मुंज, दूर्वा, शष्प, शाद, बल्बज, वीरण तथा शुम्बल आदि घासें लगाई हैं। [19] कहीं-कहीं कुमुद, पुष्कर तथा पुंडरीक पुष्पों के कुंज बनाये गये हैं।

यह सही है कि मनु के पूर्वज देव प्रजा के थे। वे अमरावती के भव्य प्रासादों में निवास करते थे किंतु जल प्लावन में विशाल देव लोक के भव्य प्रासादों के नष्ट होने के बाद वैवस्वत मनु और उनकी प्रजा ने भव्य प्रासादों को त्यागकर पर्ण निर्मित कुटियाओं को ही अपने लिये श्रेयस्कर माना।

प्रजापति मनु का मानना था कि उन भव्य प्रासादों में सोम पीकर मदमत्त हुए विलासी देवों ने अप्सराओं के संयोग से आसुरि भाव प्राप्त कर लिया था। इसी कारण उन्हें नष्ट हो जाना पड़ा। इसीलिये पक्की ईंटों के विशाल प्रासाद बनाने को आर्य प्रजा आसुरि कर्म समझती है।

तृत्सु जन तथा निकट ही स्थित भरत, जह्नु अनु और भृगु जनों में प्रत्येक प्रकार की संपत्ति ‘व्यक्ति’ अथवा परिवार द्वारा धारण न की जाकर ‘जन’ द्वारा संधारित होती है। इसलिये जन में असुरों और द्रविड़ों की भांति पण्य की प्रथा नहीं है। प्रत्येक आर्य जो कुछ भी उत्पादित अथवा अर्जित करता है उसे बलि के रूप में यज्ञ में प्रदान कर देता है और यज्ञ के पश्चात् प्रत्येक परिवार को यथेष्ट बलिभाग प्राप्त होता है जिससे सब का निर्वहन होता है।

इस समय आर्य-जन ‘सभा’ में संलग्न है। उषा के आगमन के साथ नित्य ही मनुपुत्रों की इस सभा का आयोजन होता है जिसमें मंत्रदृष्टा-ऋषि ‘ऋचाओं’ के दर्शन करते हैं और उन्हें पृथ्वी पर आने का आह्वान करते हैं। सभा में साम-गायन के साथ-साथ विभिन्न यज्ञ भी निर्विघ्न रूप से होते हैं। पुरुषों के साथ-साथ जन की समस्त स्त्रियों को इस सभा में भाग लेना अनिवार्य है। अशक्त और रोगी प्रजा को सभा से अनुपस्थित रहने की अनुमति है। साथ ही वे स्त्री-पुरुष भी सभा से अनुपस्थित रहते हैं जिन्हें उस दिन जन की गौओं और अश्वों को दूर्वा चराने के लिये जाना होता है।

सभा के अंतिम भाग में उपनिषद् का आयोजन होता है जिसमें कोई भी स्त्री-पुरुष अपनी जिज्ञासा प्रकट कर सकता है। मंत्रदृष्टा ऋषिगण प्रत्येक जिज्ञासा का समाधान करते हैं। आज की उपनिषद् में महत्वपूर्ण विमर्श हुआ।

गोप [20] सुरथ ने अपने हृदय में उत्पन्न जिज्ञासा को ऋषियों के समक्ष प्रकट किया- ‘हे ऋषि वृन्द! अग्नि कितने हैं ? सूर्य कितने हैं ? उषा कितने हैं और जल कितने हैं ? हे ज्ञानियों मैं आपसे स्पर्धा का वचन नहीं बोल रहा हूँ, अपने विशेष ज्ञान के लिये पूछ रहा हूँ। जब मैं आपसे पूछ रहा होता हूँ तो सूर्य ईश्वर से पूछ रहा होता है।’ [21]

आर्य सुरथ की जिज्ञासा सुनकर ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने नेत्र बंद किये और फिर उसी स्थिति में बोले- ‘एक ही अग्नि है, वह बहुत प्रकार से प्रज्वलित हुआ है। एक ही सूर्य विश्व भर पर प्रकाशित है। एक ही उषा इस सबको प्रकाशित कर रहा है। यह सब एक ही प्रकार का वैभव है।’[22]

ऋषि उग्रबाहु ने कहा- ‘अग्नि सहस्र सिरों वाला है। वह सकल जगत का निर्माता है और सब ओर से प्रकृति का वरण करता है। वह दसों इंद्रियों के भोग एवं कर्म क्षेत्र से परे है। संसार में सर्वत्र उसी की दर्शन-शक्ति और गति-शक्ति कार्य कर रही है।’ [23]

ऋषि नारायण ने कहा- ‘वही सब कुछ है। वही मोक्ष का स्वामी है। अन्न से बढ़ने वालों का भी स्वामी है।’ [24]

ऋषि पत्नी अदिति ने कहा- ‘अग्नि ही ऋतुओं को प्रकट करने वाले प्रकाश एवं तेज से युक्त है।’ [25]

ऋषि पर्जन्य ने समाधिस्थ अवस्था में उच्चरित किया- ‘विद्वान व्यक्ति जिस यज्ञ को पुरुषार्थ रूपी अग्नि से प्रकट करते हैं उस यज्ञ में वसन्त ऋतु घृत के समान, ग्रीष्म ऋतु जलती लकड़ी के समान और शरद् ऋतु हवि के समान होता है। ऋतुओं के ब्रह्माण्ड में ही सवंत्सर यज्ञ होते हैं। जैसे घृत से अग्नि अधिक दीप्त होता है उसी भांति वसन्त के अनन्तर ग्रीष्म तीव्र हो जाता है। शरत् फलदायी होने के करण हवि के समान है।’ [26]

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने कहा- ‘अग्नि से ही ऋचाएं तथा साम उपजे हैं। वही छंदों की रचना करता है।’ [27]                

ऋषि उग्रबाहु बोले- ‘अग्नि ने ही विराट रूप धारण करके भूमि को सृजा और उसके बाद ना-ना शरीर उत्पन्न किये।

ऋषि पत्नी अदिति ने इस मंत्र को आगे बढ़ाया- ‘सकल जगत् को अपने में आहुतिवत् लेने वाले यज्ञरूप अग्नि से तृप्तिदायक, सर्व सेचक, वर्धक, प्राणदाता अन्न, घृत, मधु, जल, दुग्ध इत्यादि उपजे हुए हैं। अग्नि ही उन प्राणियों को भी बनाने वाला है जो वायु में उड़ने वाले हैं, वन में रहने वाले सिंह आदि और जो ग्राम के गौ, भैंस आदि पशु हैं।’ [28]

ऋषि पर्जन्य ने भी अन्य ऋषियों के इस मत का समर्थन किया- ‘अग्नि से अश्व पैदा हुए तथा उसी ने वे पशु भी उत्पन्न किये जिनके जबड़ों में दांत हैं। उससे गौ आदि पशु भी उत्पन्न हुए।’ [29]

गोप सुरथ ने पुनः जिज्ञासा प्रकट की- ‘ऋषि वृन्द! मैं ऐसा सोचता हूँ कि वायु अग्नि का सहायक है वह अग्नि के प्रभाव से युक्त होकर वरुण को बांध कर अंतरिक्ष में ले आता है। अग्नि उस वरुण को प्राणियों के हित के लिये पुनः आकाश से नीचे धकेल देता है।’

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आर्य सुरथ का समर्थन किया- ‘हे आर्यो! जैसे अग्नि जल को पीकर मेघ के अंक रूप जलबिंदुओं की वर्षा द्वारा औषधि आदि पदार्थों को पुष्ट करके सब की रक्षा करता है, वैसे ही हे असंख्यात् कर्मों के करने वाले शूरवीरो! तुम लोग भी सब रोग और धर्म के विरोधी दुष्ट शत्रुओं को नाश करने वाले होकर इस जगत की रक्षा करने वाले बनो। [30]

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने अपनी ऋचा पूरी की ही थी कि पूषा तीव्र गति से भागती हुई आई और सभा से क्षमा याचना करती हुई बोली- ‘हे आर्यो! सभा में विघ्न उपस्थित करने के लिये क्षमा चाहती हूँ किंतु आपात् काल में ऐसा करना क्षम्य माना गया है।’

  – ‘क्या हुआ आर्ये ?’ सभा में उपस्थित लगभग सभी वैवस्वत एक साथ बोल उठे।

  – ‘असुर ‘जन’ की समस्त गौओं को हांककर ले जा रहे हैं।’

  – ‘किस दिशा से आये असुर और किस दिशा को गये ?’ गोप सुरथ ऋषियों को प्रणाम करके तत्काल उठ खड़े हुए।

  – ‘आर्य अतिरथ और आर्य सुनील आज जन की समस्त गौओं को परुष्णि के तट पर दक्षिण में स्थित दूर्वा चराने ले गये थे। मैं भी उनके साथ थी। वहीं असुरों का विशाल समूह अचानक झाड़ियों की ओट से प्रकट हुआ और बल पूर्वक गौओं को हाँक कर ले गया। आर्य अतिरथ और आर्य सुनील शस्त्र लेकर असुरों के पीछे गये हैं और मुझे यहाँ सूचना देने के लिये भेजा है। उन्होंने कहा है कि गोप सुरथ समस्त आर्यों को रथों और अश्वों सहित लेकर आयें क्योंकि असुर बड़ी संख्या में एकत्र होकर आये हैं।’

सभा तत्काल विसर्जित कर दी गयी। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने समस्त आर्यों का आह्वान किया कि वे गविष्टि [31] के लिये प्रस्तुत हों। ऋषिश्रेष्ठ के आह्वान पर समस्त आर्य पुरुषों ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र धारण किये। जन के समस्त वृद्धों और बालकों को जन के मध्य में एकत्र किया गया तथा कुछ बलिष्ठ आर्यों एवं जन की समस्त युवतियों को उनकी रक्षा पर तैनात किया गया ताकि असुर पीछे से जन पर आक्रमण करें तो उनका सामना किया जा सके।

– अध्याय 6, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] पीपल।

[2] गूलर।

[3] बड़

[4] घुमची अथवा गुंजा की बेल

[5] ढाक।

[6] खेजड़ी

[7] सेमर अथवा सेमल, रुईदार वृक्ष

[8] पीतचंदन।

[9] बेर।

[10] पाकर वृक्ष, यह पीपल प्रजाति का वृक्ष है।

[11] विजयसार नामक वृक्ष।

[12] कत्था अथवा खैर।

[13] शीशम।

[14] गंभारी नामक औषधीय वृक्ष।

[15] ढाक।

[16] कण्टकारी नामक वृक्ष।

[17] चावल।

[18] पीपल, वट, बेल, हरड़ और अशोक नामक पाँच वृक्षों के समूह को पंचवटी कहते हैं। कुछ संदर्भ मौलश्री को भी पंचवटी में बताते हैं।

[19] ऋग्वैदिक काल में उलप, काश, कुश, तृण, दर्भ मुंज, दूर्वा शष्प, शाद बल्बज, वीरण, शुम्बल आदि घासें पाई जाती थीं। दर्भ को भूरिमूल, सहस्रपर्ण तथा शतकांड भी कहा गया है। मुंज छाने के काम आती थी। तृण का चढ़ाइ्र पर उगना कहा गया है। शाद हरी मैदानी घास थी। शुम्बल सुगंधित घास थी। दूर्वा के फूलों का भी उल्लेख मिलता है।

[20] गायों की रक्षा के लिये नियुक्त मुख्य योद्धा।

[21] कत्यग्नयः कति सूर्यासः कत्युषासः कत्यु स्विदापः। नोपस्पिजं वः पितरो वदामि प्रच्छामि वः कवयो विद्मने कम्।

[22] एक स्वाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विवमनु प्रभूतः। एक वोषाः सर्वमिदं विभात्येकं वा इदं विबभूव र्सम्।

[23]सहस्रशीर्षा पुरूषः सहस्राक्षः सहस्र पात्। स भूतिं विश्वतो वृत्यात्यतिष्ठद्दशंगुलम्।

[24] पुरूष एवेदं सर्व यद्भूतंयच्च भात्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यद्न्नेनातिरोहति।

[25] प्रजानन्नग्ने तव शेनिमृत्वियमिळयास्पदे घृतवन्तमासदः। आ ते चिकित्र उषसामिवेतयोअ्रेयसः सूर्यस्येव रश्मयः।।

[26] यत्पूयषेण हुविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसन्तो अस्यासीदार्ज्ये ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः।

[27] तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचःसामानि जज्ञिरे। छन्दासि जज्ञिरे स्माद्यजुस्तस्मादजायत।।

[28] तस्माद्यज्ञात्वर्सहुतः सम्भृत पृषदाज्यम्। पशुन्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्रु ये।।

[29] तस्मादश्चा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः।।

[30] अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः। प्रावो वाजेषु वाजिनम।।

[31] गौओं को शत्रुओं से छुड़वाने के निमित्त जो युद्ध किया जाता था उसे गविष्टि कहते थे।

गविष्टि (7)

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गविष्टि

गविष्टि के समय आर्यों का नेतृत्व करने वाले ‘गोप’ आर्य सुरथ ने ऋषियों को आश्वस्त करते हुए दुंदुभि को नमस्कार किया और दुंदुभि का आह्वान करते हुए कहा- ‘हे दुंदुभि! तू हमारे शत्रुओं के विरुद्ध घोष कर। हमें बल दे।’

ऋषि पत्नी अदिति ने यज्ञ शाला में स्थापित दुंदुभि उठाकर ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा के मंगलमय हाथों में रखी। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने दुंदुभि को मस्तक से लगाते हुए इंद्र का आह्वान किया-‘ हे इन्द्र हमारे पशुओं को हमें वापस दो। हमारी दुन्दुभि हमारे संकेत पर बार-बार घोष करती है। हमारे नेता अश्वारूढ़ होकर एकत्र होते हैं। हे इन्द्र हमारे रथारूढ़ योद्धा विजयी हों।’[1]

ऋषि पर्जन्य ने दुंदुभि पर स्वस्तिक अंकित करते हुए प्रार्थना की- हे दुंदुभि! पृथ्वी और आकाश दोनों को तू अपनी ध्वनि से भर दे जिससे स्थावर और जंगम दोनों तेरे घोष को जान जायें। तू जो इन्द्र और देवों का सहचर है, हमारे शत्रुओं को दूर भगा दे।’ [2]

गविष्टि के समय आर्यों का नेतृत्व करने वाले ‘गोप’ आर्य सुरथ ने ऋषियों को आश्वस्त करते हुए दुंदुभि को नमस्कार किया और दुंदुभि का आह्वान करते हुए कहा- ‘हे दुंदुभि! तू हमारे शत्रुओं के विरुद्ध घोष कर। हमें बल दे। दुष्टों को भयभीत करते हुए शब्द कर। जिन्हें हमें दुःख पहुँचाने में ही सुख मिलता है, उन्हें भगा दे। तू इन्द्र की मुष्टि है, हमें दृढ़ कर।’ [3]

ऋषि उग्रबाहु ने ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा से दुंदुभि लेकर तुमुल शब्द उत्पन्न किया जो चारों दिशाओं में व्याप्त हो गया।

इसी के साथ गोप सुरथ और उनके आर्य वीरों ने अपने अश्वों और रथों को असुरों के प्रस्थान की दिशा में हाँक दिया। असुरों का दल गौओं को हाँकता हुआ अधिक दूर नहीं गया था कि आर्य अश्वारोहियों ने उसे जा घेरा। आर्य अतिरथ और आर्य सुनील भी असुरों के पीछे जाते हुए उन्हें मार्ग में ही मिल गये। असुरों को अनुमान था कि आर्य अश्वारोही शीघ्र ही उन्हें आ घेरेंगे। अतः वे असावधान नहीं थे। हरित तृण और निर्मल जल से सेवित गौओं को असुरों के चंगुल में छटपटाते हुए देखकर आर्यवीरों का रक्त खौल उठा किंतु अभी उचित अवसर न जानकर उन्होंने तत्काल असुरों पर आक्रमण नहीं किया।

आर्य अश्वारोहियों का दल कृष्णायस [4] कवच एवं शिरस्त्राण धारण किये हुए होने के कारण सुरक्षित था तथा लौह-खड्ग धारण किये हुए होने के कारण काष्ठ एवं प्रस्तरों के शस्त्र धारण करने वाले पदाति असुरों की तुलना में काफी बलशाली था फिर भी इस समय उनकी संख्या असुरों की अपेक्षा काफी कम थी इसलिये उन्होंने असुरों पर सीधा आक्रमण न करके उनके मार्ग को अवरूद्ध करना ही अधिक उचित समझा। वे चाहते थे कि रथों पर सवार आर्य धनुर्धरों के आ पहुँचने तक असुरों को अटकाया जाये। तब आर्यों की संख्या पर्याप्त हो जायेगी और असुर उनका सामना करने की स्थिति में नहीं रह जायेंगे।

असुरों का नायक कृष्णवर्ण की स्थूल काया का स्वामी था। निरंतर मांस भक्षण और रक्तपान करने के कारण उसका चेहरा अत्यंत विकराल जान पड़ता था जिस पर धूर्तता के भाव दूर से ही दिखाई पड़ते थे। मस्तक पर सींग धारण कर लेने के कारण वह और भी क्रूर प्रतीत होता था। आर्य सुरथ ने दूर से ही पहचान लिया था असुर नायक विरूपाक्ष को। आर्य सुरथ और असुर विरूपाक्ष पहले भी युद्ध क्षेत्र में एक-दूसरे का सत्कार कर चुके हैं।

  – ‘क्यों आर्य! गौएं छुड़ा ले जाने आया है ?’ व्यंग्य किया विरूपाक्ष ने। अश्वारोही आर्यों की बहुत कम संख्या को लक्षित करके उसका हौंसला बढ़ गया प्रतीत होता था।

  – ‘नहीं असुर विरूपाक्ष! तुझे पुरोहित जानकर गौएं दान करने के उद्देश्य से आया हूँ।’ असुर की ही व्यंजना में उत्तर दिया आर्य सुरथ ने।

  – ‘क्या खूब कही तूने! आर्य सुरथ, कितना अच्छा हो यदि दुष्ट आर्य हम शक्तिशाली असुरों को अपना पुरोहित नियुक्त कर लें। तब तुझे अग्नि को प्रसन्न करने के लिये यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रहेगी।’

दोनों नायकों की रोचक व्यंजनायें सुनकर असुरों का दल थम सा गया था। उनके मध्य में घिरी हुई गौएं अपने पुराने स्वामियों को देखकर शांत हो गयी थीं। उन्हें नियंत्रित करने मे अब असुरों को श्रम नहीं करना पड़ रहा था।

  – ‘असुरगण यदि दस्युकर्म त्याग दें तो आर्यजन उन्हें अपना दास घोषित कर सकते हैं विरूपाक्ष।’

  – ‘हा-हा! असुर और दास!! अग्नि पूजक आर्यों के दास!!!’ अट्टहास किया विरूपाक्ष ने।

  – ‘अग्नि तो इस सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है विरूपाक्ष। तुम्हारा भी।’

  – ‘और वरुण ? वरुण नहीं है इस सृष्टि का स्वामी ?’

  – ‘असुरों द्वारा पूज्य वरुण को इन्द्र ने देवपद प्रदान कर दिया है। अब तेरा यह उपालंभ उचित नही।’

  – ‘किंतु कब ? कब किया इन्द्र ने वरुण को देवत्व प्रदान ? जब इन्द्र ने वरुण के मित्र वृत्र का वध कर दिया ? अब इस देवपद का क्या लाभ है आर्य सुरथ ?’ क्रोध से विरूपाक्ष के नथुने फड़कने लगे।

  – ‘ इन्द्र को वृथा दोष देना उचित नहीं है विरूपाक्ष। स्वयं त्वष्टा ने वृत्र के शत्रु इन्द्र की वृद्धि के लिये यज्ञ करवाया था।’ आर्य सुरथ ने हँसकर कहा और उनके साथ समस्त आर्यवीर भी हँस पड़े।

  – ‘पाखण्डी हो तुम सब! त्वष्टा ने इन्द्र की वृद्धि के लिये नहीं, अपितु इन्द्र के शत्रु और अपने पुत्र वृत्र की वृद्धि के लिये यज्ञ करवाया था किंतु धूर्तता वश पाखण्डी ऋषियों ने उसका उच्चारण बदल कर मंत्र को दूषित कर दिया।’ [5] विरूपाक्ष आर्य सुरथ के व्यग्ंय से तिलमिला कर रह गया।

  – ‘मिथ्या प्रलाप मत कर विरूपाक्ष। जिन ऋषियों को तू बलपूर्वक उठाकर ले गया था, वे पाखण्डी क्यों कर हुए ? क्या वृत्र के लिये यह उचित था कि वह वरुण को बांध कर रखता ? ऋषिगण इस कार्य में वृत्र की सहायता कैसे कर सकते थे! त्रुटि वृत्र की थी। एक तो उसने वरुण को बांध लिया और जब इन्द्र वरुण को मुक्त करवाने के लिये आया तो वृत्र इन्द्र का भी नाश करने को तत्पर हो गया।’

  – ‘झूठ बोलता है तू। वृत्र ने वरुण को बांधा नहीं था, केवल अपने स्थान पर स्थिर कर दिया था।’

  – ‘एक ही अर्थ है इन दोनों बातों का। वरुण के स्थिर हो जाने से नदियों में जल का प्रवाह अवरूद्ध हो गया। वर्षा बंद हो गयी। समस्त प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी।’

– ‘समस्त प्रजा से तेरा क्या आशय ? यह असुरों का आपसी विवाद था। देवों को इसमें कूदने की क्या आवश्यता थी ? सत्य तो यह है कि इंद्र को असुरों के पुर तोड़कर पुरंदर की उपाधि धारण करने की कामना थी ताकि कोई अन्य देव इंद्रपद प्राप्त करने के लिये उससे स्पर्धा न कर सके।’

  – ‘कैसे हो गया यह असुरों का आपसी विवाद ? यदि अग्नि से उत्पन्न वरुण असुरों का मित्र हो गया तो क्या वह किसी अन्य प्राणी के लिये उपलब्ध नहीं रहेगा ?’

  – ‘वरुण तुम्हारा दास नहीं है।’

  – ‘हाँ। असुर वरुण आर्यों का दास नहीं है। अब वह आर्यों द्वारा पूज्य देव है।’

दोनों नायकों का वार्तालाप व्यंजना को त्यागकर युद्ध आरंभ की घोषणा तक पहुँचा ही था कि रथाति आर्यों का दल आ पहुँचा। उनके तीक्ष्ण शरों ने देखते ही देखते असुरों का संहार आरंभ कर दिया। असुर प्रस्तर और अस्थियों से निर्मित भोथरे अस्त्र-शस्त्रों से आर्यों का सामना करने की स्थिति में नहीं थे।

उनकी विजय तो उसी स्थिति में हो सकती थी जब शत्रु या तो असावधान हो या फिर बहुत ही कम संख्या में। असुरों के काले शरीरों से रक्त की धारायें छूटने लगीं और वे तेजी से घटने लगे। अनेक असुर प्राण लेकर भाग छूटे। गोप सुरथ बड़ी देर तक सघन वन प्रांतर में विरूपाक्ष को ढूंढते रहे किंतु वह गौओं तथा वृक्षों की ओट लेकर भाग जाने में सफल रहा।

गौओं को अपने संरक्षण में लेकर आर्य योद्धाओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र परुष्णि के पावन जल में प्रक्षालित किये और स्वयं भी स्नान आदि से निवृत्त होकर गौओं तथा अश्वों को हरित तृण एवं निर्मल जल से संतुष्ट किया। जब आर्य वीर गौओं को लेकर अपने ‘जन’ पहुँचे तब तक सूर्यदेव ने अपना रथ पश्चिम दिशा में काफी दूर तक हाँक दिया था।

– अध्याय 7, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से आई है-

आमूरज प्रत्यावर्तयेमाः केतुमद्दुन्दुभिर्वा वदीति।

समश्सपर्णाश्चरन्ति नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु। 6.47.31

[2] ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से आई है-

उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरूत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत्।

स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून्।। 6. 47.29

[3] ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से आई है-

आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निः ष्टनिहि दुरिता बाधमानः।

अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीळयस्व।। 6.47.30

[4] लौह।

[5] त्वष्टा ने अपने पुत्र वृत्र की वृद्धि के लिये एक यज्ञ करवाया। इसमें मंत्रपाठ ‘इन्द्रशत्रुर्व। र्धस्व’ किया जाना था। अर्थात् इन्द्र के शत्रु (वृत्र) की वृद्धि हो। इसमें इन्द्रशत्रुपद के अन्त में उदात्त स्वर हैं, ऋत्विजों ने इसके आदि में उदात्त रखकर इसका पाठ इस प्रकार किया- ‘इन्द्र।शत्रुर्वर्धस्व’। जिससे इसका अर्थ हो गया- ‘शत्रु इन्द्र की वृद्धि हो।’ पाणिनीय शिक्षा में एक श्लोक में इस आख्यायिका का उल्लेख मिलता है, जिसमें कहा गया है कि मंत्र के दूषित उच्चारण से उत्पन्न अर्थ यजमान का नाश कर देता है- ‘दुष्टो मन्त्रः स्वरतो वर्णतो वा, मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह। स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात्।।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता के उपन्यास मोहनजोदारो की नृत्यांगना का सप्तम् अध्याय।

पुरोडाश (8)

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पुरोडाश

इन्द्र ने अग्नि और सोम का आह्वान करके कहा कि तुम तो मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ। तुम क्यों इस दस्यु को बढ़ावा देते हो। इन्द्र ने अग्नि और सोम को प्रसन्न करने के लिये ‘एकादशकपाल पुरोडाश’ का निर्वपन किया।

संध्याकाल में परुष्णि के पावन तट पर आर्यों की सभा पुनः जुड़ी। प्रातः अचानक ही गविष्टि आयोजित हो जाने से बहुत से विमर्श अपूर्ण रह गये थे। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा चाहते थे कि जो ऋचायें अधूरी रह गयी थीं उन्हें पूरा कर लिया जाये तथा आज प्रकट हुई ऋचाओं को भलिभांति समझ लिया जाये किंतु विमर्श के सूत्र पुनः जुड़ ही नहीं सके। गविष्टि में जाने से पीछे रह गये आर्य, विशेषकर आर्य ललनायें और बालक जानना चाहते थे कि गविष्टि में क्या-कुछ हुआ! आर्य वीरों ने गोप सुरथ के नेतृत्व में दुष्ट असुरों का दमन किस प्रकार किया!

ऐसे अवसरों पर आर्य अतिरथ किसी को बोलने का अवसर नहीं देते। शौर्य प्रदर्शन के अवसरों के साथ-साथ शौर्य प्रदर्शन के सविस्तार वर्णन के अवसर भी कोई उनसे छीन नहीं सकता। अतः आर्य अतिरथ ने ही आर्यवीरों के असुरों के दल तक पहुँचने और गोप सुरथ के नेतृत्व में असुरों से गौओं को मुक्त करवाने तक का समस्त विवरण सविस्तार कह सुनाया। आर्य अतिरथ के कहने का ढंग इतना निराला और रुचिकर है कि सदैव गंभीर रहने वाले ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा को भी हँसी आ जाती है।

  – ‘इस प्रकार आर्य वीरों ने असुरों के शृंग तोड़ डाले, कपाल फोड़ डाले और उनकी पूंछें पकड़ कर उन्हें फिर से मकरालय[1] की ओर धकेल दिया।’ आर्य अतिरथ ने गविष्टि का विवरण पूरा किया। आर्य वीरों के पराक्रम का वर्णन करते समय उनकी शिराओं का रक्त पूरी गति से दौड़ने लगता है।

  – ‘अग्नि से उत्पन्न होकर भी वरुण असुर क्यों हो गया ऋषिश्रेष्ठ!’ आर्या पूषा ने प्रश्न किया।

  – ‘असुरों का संग देवों की प्रवृत्ति को भी दूषित कर डालता है और दूषित प्रवृत्ति देवों को भी असुर बना देती है पुत्री। असुरों के संग रहने के कारण देव होने पर भी वरुण में आसुरि प्रवृत्तियों ने जन्म ले लिया। बाद में जब वरुण ने असुरों के प्रभाव से मुक्त होना चाहा तो असुर वृत्र ने वरुण को बंदी बना लिया । इस पर देवताओं ने वरुण को असुरों के प्रभाव से मुक्त करके पुनः देवत्व प्रदान किया और वरुण अपनी आसुरि शक्तियों का उपयोग ऋत संचालन में करने लगे।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आर्या पूषा की शंका का समाधान किया।

  – ‘त्वष्टा [2] और इन्द्र में क्या विवाद उत्पन्न हो गया था ऋषिवर कि इन्द्र ने उसके दोनों पुत्रों विश्वरूप और वृत्र का वध कर दिया! आर्या सुषोमा ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘देवशिल्पी त्वष्टा  के दोनों पुत्र विश्वरूप और वृत्र असुर हो गये थे। इसी कारण  इन्द्र को उनका वध करना पड़ा।’ ऋषिश्रेष्ठ ने उत्त्तर दिया।

  – ‘मैंने सुना है ऋषिवर कि इन्द्र को विश्वरूप तथा वृत्र से दीर्घ काल तक संघर्ष करना पड़ा।’ आर्या सुषोमा ने पुनः जिज्ञासा व्यक्त की।

आर्या सुषोमा की जिज्ञासा सुनकर ऋषिश्रेष्ठ मुस्कुराकर बोले- ‘मैं जानता हूँ पुत्री कि आर्या पूषा और तुम्हारी रुचि प्राचीन आख्यानों को जानने में अधिक रहती है। इसीसे तुम दोनों बार-बार प्रश्न करती हो। मैं तुम दोनों की इस प्रवृत्ति की प्रशंसा करता हूँ। सद्भाव पूर्वक प्रकट की गयी जिज्ञासा न केवल अपना अपितु अन्य श्रोताओं का भी उपकार करती है।’

इतना कहकर ऋषिश्रेष्ठ ने नेत्र बंद कर लिये। ऐसा लगता था मानो वे किसी गहन चिंतन में डूब गये हों। कुछ क्षण पश्चात् नेत्र खोलकर बोले-

  – ‘यह बहुत प्राचीन आख्यायिका है। [3] जलप्लावन से सहस्रों वर्ष पूर्व। तब तक देव जाति अपने पराक्रम के चरम पर नहीं पहुँची थी। देवों में तब अनेक नयी व्यवस्थायें बन रही थीं। फिर भी प्रकृति की अधिकतर शक्तियाँ इन्द्र के पास ही थीं। इस कारण कई देवता इन्द्र से वैमनस्य मानते थे। उनमें से त्वष्टा भी एक था। उसके पुत्र विश्वरूप के तीन सिर और तीन मुख थे। विश्वरूप एक मुख से सोमपान करता था तो दूसरे मुख से सुरा पीता था। तीसरे मुख से वह अन्न का भक्षण करता था। प्रजापति ने सोम देवों के लिये, सुरा असुरों के लिये तथा अन्न मनुष्यों के लिये बनाया था किंतु तीनों ही पदार्थों का भक्षण करके विश्वरूप असीमित शक्तिशाली और स्वेच्छाचारी हो गया। जिससे प्रजापति की बनाई व्यवस्था नष्ट होने लगी। इसलिये इन्द्र ने उस गर्वित विश्वरूप के तीनों सिर काट डाले।

विश्वरूप का सोमपायी मुख कटते ही कपिंजल [4] बन गया। इसलिये कपिंजल सोम के समान ही भूरा होता है। सुरा पीने वाला मुख कलविंक [5] बन गया। वह मद्यमत्त की ही तरह कहता रहता है-कः इव ? [6] विश्वरूप का तीसरा अन्नभक्षी मुख तीतर बन गया। उसमें घृत और मधु की बूंदें अंकित रहती हैं।

विश्वरूप के तीनों मुख कट जाने से त्वष्टा कुपित हुआ। कैसे मेरे पुत्र को मार डाला इन्द्र ने ? कुपित त्वष्टा ने इन्द्र का आह्वान किये बिना ही सोम का आहरण किया। सोम जैसे चुवाया हुआ था वैसे ही बिना इन्द्र के भी रहा। अर्थात् बिना इन्द्र की सहायता के भी सोम अपने सात्त्विक रूप में बना रहा।

यह देखकर इन्द्र ने सोचा कि इससे तो मुझे सोम से वंचित कर दिया जायेगा। अतः इन्द्र ने द्रोणकलश में रखे सोम का बलपूर्वक भक्षण कर लिया। त्वष्टा द्वारा इन्द्र का आह्वान किये बिना ही इन्द्र द्वारा बलपूर्वक पिये जाने से सोम कुपित हो गया और उसने इन्द्र को आहत किया। मुख को छोड़कर इन्द्र के जितने भी प्राण छिद्र थे, उन सबमें से सोम बाहर आने लगा।

इन्द्र की नाक से बाहर निकला हुआ सोम सिंह बन गया। जो सोम कानों से बहा, वह भेड़िया बन गया। जो सोम वाक् और प्राण से बहा, वह शार्दूल प्रधान श्वापद बन गया। इन्द्र ने तीन बार थूका उससे कुवल,[7] कर्कन्धु[8]  तथा बदर [9] बना। शरीर से सोम के बह जाने के उपरांत इन्द्र सर्वथा क्षीण हो गया तथा लड़खड़ाता हुआ अपने घर गया तब अश्विनों ने उसकी चिकित्सा की।

जब त्वष्टा को ज्ञात हुआ कि इन्द्र ने सोम पान कर लिया तो वह और भी कुपित हो गया। कैसे बिना बुलाये इन्द्र ने सोम को ग्रहण कर लिया ? त्वष्टा ने द्रोण कलश में बचे हुए सोम को यह कह कर यज्ञ में प्रवाहित किया कि इन्द्र शत्रु तुम बढ़ो। बहता हुआ सोम अग्नि में पहुँच कर वृत्र के रूप में प्रकट हुआ। उसे सब विद्यायें, यश, अन्न एवं वैभव प्राप्त हुए।

वह लुढ़कता हुआ उत्पन्न हुआ इससे वृत्र कहलाया। वह बिना पैरों के हुआ इसलिये अहि कहलाया। दनु और दनायु उसके माता पिता हुए इसलिये वह दनुज कहलाया। क्रोध से भरे हुए त्वष्टा के कोप से इन्द्र को बचाने के लिये ऋषियों ने मंत्रजाप में त्रुटि कर दी जिससे मंत्र का अर्थ ‘इंद्र के शत्रु तुम बढ़ो’ के स्थान पर ‘शत्रु इन्द्र तुम बढ़ो’ हो गया। इससे इन्द्र का बल बढ़ गया।

अपने पिता के आदेश पर ‘वृत्र’ द्युलोक और पृथ्वी के बीच में जो कुछ भी है, उस सब को आच्छादित करके सो गया। वृत्र ने पूर्व और पश्चिम में समुद्रों को समेट लिया और उतना ही अन्न खाने लगा। उसे पूर्वाह्न में देवता अन्न देते थे, मध्याह्न में मनुष्य और अपराह्ण में पितर। वृत्र द्वारा वरुण को बंदी बना लिये जाने से चारों ओर हा-हा कार मच गया। वनस्पतियाँ सूख गयीं। नदियों ने प्रवाहित होना बंद कर दिया। पशु-पक्षी, देव, मानव सब कष्ट पाने लगे।

इस पर इन्द्र ने अग्नि और सोम का आह्वान करके कहा कि तुम तो मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ। तुम क्यों इस दस्यु को बढ़ावा देते हो। इन्द्र ने अग्नि और सोम को प्रसन्न करने के लिये ‘एकादशकपाल पुरोडाश’ का निर्वपन किया। [10] इस यज्ञ से ही इन्द्र ने इन्द्रत्व प्राप्त किया। जिससे अग्नि और सोम इन्द्र की ओर हो गये। उनके साथ अन्य देवता भी इन्द्र की ओर आ गये।

इन्द्र ने विष्णु से प्रार्थना की- ‘मैं वृत्र पर वज्र का प्रहार करूंगा, आप मेरे निकट खड़े रहना।’

विष्णु ने कहा- ‘अच्छी बात है। मैं तुम्हारे पास रहूँगा, तुम प्रहार करो।’

इससे पहले कि इन्द्र वृत्र पर प्रहार कर पाता, वृत्र ने विशाल आकार धारण करके इन्द्र को निगल लिया। इस पर बृहस्पति की प्रेरणा से देवताओं ने इन्द्र को वृत्र के पेट से बाहर निकाला। इन्द्र की प्रार्थना पर विष्णु ने वज्र में प्रवेश किया। इस बार जब इन्द्र ने वज्र उठाया तो वृत्र डर गया। वृत्र ने कहा- ‘मुझे मारो मत, मैं तुम्हें अपना पराक्रम देता हूँ।’ इन्द्र रुक गया और वृत्र ने ‘यजुष्’ [11] इन्द्र को प्रदान कर दिया।

इन्द्र ने दुबारा वज्र उठाया तो वृत्र ने कहा- ‘मुझे मारो मत, मैं अपना ऋक् [12] तुमको देता हूँ।’ जब इन्द्र ने तीसरी बार वज्र उठाया तो उसने अपना ‘साम’ [13] भी इन्द्र को दे दिया।

इस प्रकार इन्द्र को समस्त विद्या, यश, अन्न और समस्त वैभव की प्राप्ति हो गयी और वृत्र खाली घड़े के समान रह गया। पुत्र को निर्बल हुआ देखकर वृत्र की माता तिरछी होकर उसके ऊपर छा गयी तथा अनेक कालेय वृत्र की सहायता को आ गये।

इस पर देवों ने साकमेध [14] का आयोजन किया। अग्नि तीक्ष्ण बाणों के रूप में प्रकट हुआ। सोम और सविता ने वृत्र को मारने के लिये इंद्र को तीक्ष्ण प्रेरणा प्रदान की। सरस्वती ने कहा-‘मारो-मारो।’ पुष्टि के देवता पूषा ने वृत्र को कसकर पकड़ लिया। विष्णु ने बताया कि वृत्र को लौह, काष्ठ तथा बांस से निर्मित तथा किसी भी ऐसे पदार्थ से निर्मित अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारा जा सकता जो सूखी अथवा गीली हो। इसे न दिन में मारा जा सकता है न रात्रि में।

इस पर जब दिवस और रात्रि के मध्य संध्या काल उपस्थित हुआ तो इन्द्र ने अग्नि की ब्रह्मशक्ति और अपनी क्षम शक्ति से वज्र को समुद्र के फेन में लपेट कर व्रत्र पर प्रहार किया जिससे वृत्र तथा उसकी माता के दो टुकडे़ हो गये। कालेय भाग कर समुद्र में छिप गये।

इन्द्र के प्रहार से आहत वृत्र सड़ांध के साथ सब दिशाओं से समुद्र की ओर बहने लगा। इससे समुद्रों में जल का स्तर फिर से बढ़ गया। [15] वृत्र के सौम्य भाग से चन्द्रमा बन गया और आसुरि भाग से समस्त प्राणियों का उदर। इसी कारण प्रत्येक प्राणी उदर रूपी वृत्र के लिये बलिहरण करता है और अन्न भक्षण करना चाहता है। 

वृत्र के मरने पर मरूतों ने संगीत का आयोजन किया किंतु वज्र के फेन में लिपटे हुए होने से इन्द्र को वृत्र की मृत्यु का पता नहीं चला और इन्द्र डर कर अनुष्टप में छिप गया। अग्नि, हिरण्यस्तूप तथा बहती उसे ढूंढने निकले। अग्नि ने इन्द्र को ढूंढ लिया। देवताओं ने बारह पात्रों में आहरण किया हुआ पुरोडाश इन्द्र को समर्पित किया।

इन्द्र ने कहा कि वृत्र पर वज्र के प्रहार से मेरे समस्त अंग शिथिल हो गये हैं, इसलिये इस पुरोडाश से मेरी तृप्ति नहीं होती। जिस वस्तु से मेरी तृप्ति हो वही वस्तु मुझे दो। देवताओं ने विचार किया कि सोम के बिना इन्द्र तृप्त नहीं होगा। देवताओं के आह्वान पर सोम रात्रि में चन्द्रमा के साथ आया और जल तथा वनस्पतियों में समा गया।

गायों ने उन वनस्पतियों का भक्षण करके तथा सोमयुक्त जलपान करके सोम का सम्भरण किया। देवताओं ने गौओं से सोम प्राप्त करके उसे इन्द्र को प्रदान किया। इन्द्र ने कहा मुझे इससे भी तृप्ति नहीं होती, मुझे उबाला हुआ दो। अंत में अमावस्या को दही और उबले हुए दूध को मिलाकर सान्नय्य याग किया गया जिससे इन्द्र तृप्त हुआ और नवीन बल धारण करके प्रकट हो गया।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आख्यायिका पूरी की।

ऋषिश्रेष्ठ के इस वक्तव्य के साथ ही समस्त आर्य आख्यायिका के काल से निकल कर वर्तमान में लौटे। यद्यपि बहुत सारे प्रश्न अब भी शेष थे जिनका समाधान होना चाहिये था किंतु अत्यधिक समय व्यतीत हो जाने के भय से किसी ने कोई प्रश्न पूछना उचित नहीं समझा। फिर भी गोप सुरथ ने अपनी जिज्ञासा प्रकट कर ही दी- ‘ऋषिश्रेष्ठ! क्या इसी घटना के बाद से मित्र को सोम से वंचित किया गया ?’

  – ‘हाँ! सदैव वरुण के साथ रहने वाले ‘मित्र’ ने वृत्र के साथ हुए युद्ध में यह कहकर देवताओं की कोई सहायता नहीं की कि मैं तो सबका मित्र हूँ । अतः वृत्र और त्वष्टा के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करूंगा। इसी कारण देवताओं ने मित्र को सोम से वंचित कर दिया।’ [16]

सोम वर्षण करता हुआ चन्द्रमा आकाश के ठीक मध्य में आ गया था। अतः आर्यों ने सभा का समापन किया।

– अध्याय 8, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] समुद्र।

[2] विश्वकर्मा का एक नाम त्वष्टा भी है।

[3] यह आख्यायिका ऋग्वगेद, चतुर्थ ब्राह्मण तथा अन्य ग्रंथों में कुछ अंतर के साथ प्राप्त होती है।

[4] बटेर।

[5] गौरैया

[6] कौन है, कौन है ?

[7] गूलर।

[8] घुमची, घुँघची अथवा गुंजा।

[9] बेर।

[10] चतुर्थ ब्राह्मण (1. 6.)

[11] यज्ञ।

[12] पूजा, स्तवन।

[13] वाक्चातुर्य से आकर्षित करने की क्षमता।

[14] साकमेध का अर्थ होता है साथ-साथ मिलकर बढ़ना या संगति करना।

[15] ऋग्वेद में लिखा है कि वृत्र रंभाती हुई गायों के समान समुद्र की ओर बढ़ चला। (ऋ. 1. 84. 3)

[16] तृतीय ब्राह्मण : (पवित्रच्छेदन-1. 1. 3) ऋग्वेद तथा अन्य संहिताओं में मित्र और वरुण का उल्लेख एक साथ हुआ है। ऐसा माना जाता है कि मित्र का अर्थ है दिन और वरुण का अर्थ है रात्रि। इसी से मित्रावरुण को ऋत् अर्थात् प्रकृति की व्यवस्था का देवता कहा जाता है। मित्र का एक अर्थ सूर्य भी होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सोम एक शीतल पेय है इस कारण उसका सम्बंध चन्द्रमा से है और सूर्य को उससे वंचित किया गया है।

अद्भुत प्रतिमा (9)

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अद्भुत प्रतिमा

कहाँ से आई यह अद्भुत प्रतिमा यहाँ ? किसने बनाया इसे ? क्या सैंधवों में भी कोई इतना निष्णात शिल्पी है! देव शिल्पी त्वष्टा और दानव शिल्पी मय के बारे में तो सुना है उन्होंने किंतु सैंधवों में तो कोई इतना निष्णात शिल्पी आज तक नहीं हुआ!

मोहेन-जो-दड़ो पशुपति देवालय के वार्षिक समारोह को कोई एक माह का समय व्यतीत हुआ होगा कि एक दिन सूर्योदय के साथ ही मोहेन-जो-दड़ो में कोलाहल मच गया। जन-जन की जिह्वा पर यही बात थी कि पशुपति महालय की प्रधान नृत्यांगना देवी रोमा मातृदेवी के वेश में पुर के ठीक मध्य में आकर खड़ी हो गयी हैं।

वे किसी से संभाषण नहीं कर रहीं अपितु नृत्य-मुद्रा में मौन धारण किये हुए खड़ी हैं। मोहेन-जो-दड़ो वासी यह समझने में असमर्थ हैं कि किस आशय से देवी रोमा ने यह किया है! जिसने भी सुना वही देवी रोमा को देखने के लिये दौड़ पड़ा। हाँ! ठीक सुना उसने। यह तो देवी रोमा ही हैं, मातृदेवी के वेश में।

ठीक वैसी ही दिखाई दे रही हैं जैसी पशुपति के वार्षिकोत्सव में दिखाई दे रही थीं। लगता है अभी मयाला अपनी मृदंग पर थाप देगा और देवी रोमा अपना वही अद्भुत अविस्मरणीय नृत्य आरंभ कर देंगी और दर्शकों की देख सकने की क्षमता से बाहर हो जायेंगी।

देवी रोमा के चरणों के पास रखी मिट्टी की पट्टिका पर यह आदेश उत्कीर्ण है- ‘सावधान! न तो कोई नागरिक मेरे निकट आये और न मुझे स्पर्श करे।’

नागरिकों की अच्छी खासी भीड़ एकत्र हो चली है। नगर प्रहरियों ने पशुपति महालय के प्रधान पुजारी किलात को सूचित किया। किलात को विश्वास नहीं हुआ प्रहरियों की बात पर।

  – ‘क्या कहते हो ? भला ऐसा भी कहीं संभव है ?’

  – ‘हमारा विश्वास करें स्वामी! यह मिथ्या सूचना नहीं है। हमने अपने नेत्रों से देखा है देवी रोमा को मातृदेवी के वेश में नगर के मध्य मुख्य मार्ग पर खड़े हुए।’

  – ‘क्या चाहती हैं वह ?’

  – ‘यह तो ज्ञात नहीं स्वामी। वे कुछ बोलती नहीं, न किसी को निकट आने देती हैं।’

  – ‘हमें मार्ग दिखाओ। हम स्वयं वहाँ चलकर देखेंगे।’

जब किलात अपने स्थूल वृषभ पर सवार होकर नगर के मुख्य चैराहे पर पहुँचा तब तक सूर्य का प्रकाश अच्छी तरह फैल चुका था। चैराहे पर उपस्थित विशाल मानव समुदाय किलात के आगमन की ही प्रतीक्षा कर रहा था। सैंधवों ने श्रद्धा से मस्तक अवनत कर पुजारी किलात को मार्ग दिया। आश्चर्य से जड़ रह गया किलात।

यह तो सचमुच ही नृत्यांगना रोमा है। पशुपति महालय के वार्षिकोत्सव में मातृदेवी का वेश धारण करने से मना करने वाली रोमा इस वेश में क्यों कर यहाँ आ खड़ी हुई है ? यदि रोमा को कोई असंतोष था तो उसने कहा क्यों नहीं! इस तरह प्रतिरोध दर्शाने की क्या आवश्यकता थी। इसकी ढिठाई तो देखो! कैसे मेरे समक्ष नेत्र खोलकर खड़ी है।

  – ‘देवी रोमा! इस कौतुक का क्या आशय है ?’ किंचित दूर से ही सम्बोधित किया किलात ने किंतु देवी रोमा ने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया।

  – ‘देवी रोमा! यदि तुम्हें कोई असंतोष है तो अपने असंतोष का कारण मुझसे कहो।’ रोमा की ओर से कोई प्रत्युत्तर न आया देखकर किलात ने अपना प्रश्न दोहराया किंतु रोमा की ओर से फिर भी कोई उत्तर नहीं आया। कहीं यह प्रतिमा तो नहीं! अचानक किलात को संदेह हुआ। निःसंदेह यह प्रतिमा ही है। तभी तो हिलती-डुलती भी नहीं। किलात ने निकट जाकर उसे स्पर्श किया। यह तो सचमुच ही प्रतिमा है। अब तो किलात सहित उपस्थित समस्त सैंधव समुदाय के आश्चर्य का पारावार न रहा।

कहाँ से आई यह अद्भुत प्रतिमा यहाँ ? किसने बनाया इसे ? क्या सैंधवों में भी कोई इतना निष्णात शिल्पी है! देव शिल्पी त्वष्टा और दानव शिल्पी मय के बारे में तो सुना है उन्होंने किंतु सैंधवों में तो कोई इतना निष्णात शिल्पी आज तक नहीं हुआ! देव प्रजा तो कब की नष्ट हो चुकी, पुर में इन दिनों कोई दानव भी दिखाई नहीं दिया। फिर कहाँ से आई यह प्रतिमा ? क्या माया है यह ? क्या किसी ने आकाश मार्ग से यहाँ उतारा है इसे ?

प्रतिमा को पशुपति महालय में पहुँचाने का आदेश देकर किलात अपने वृषभ पर पुनः सवार हुआ। प्रासाद पहुँच कर उसने अपने सेवकों को बुलाया और आदेश दिया कि पूरे नगर में यह राजाज्ञा प्रचारित की जाये कि जिस किसी ने इस प्रतिमा का निर्माण किया है वह पशुपति महालय के मुख्य पुजारी के समक्ष आज ही उपस्थित हो।

पुर में प्रचारित होती हुई आज्ञा को सुनकर आनंदित हुआ प्रतनु। अपने आप को प्रकट करने का यही उचित अवसर है। प्रातःकाल से ही वह पुरवासियों द्वारा व्यक्त की जा रहीं भांति-भांति की प्रतिक्रियाओं का आनंद उठाता रहा है।

उस दिन पशुपति के वार्षिकोत्सव में रोमा को देखकर आश्चर्य से जड़ रह गया था प्रतनु! रूप के इस सागर को कैसे अपने शिल्प में बांध सकेगा वह! उसने रोमा का बिम्ब अपने नेत्रों में स्थिर कर लिया। प्रतनु ने अपने नगर लौट जाने के स्थान पर मोहेन-जो-दड़ो में रहकर ही रोमा की अद्भुत प्रतिमा बनाने का निर्णय लिया। पशुपति के प्रधान महालय के मुख्य शिल्पी वितनु को अभी मोहेन-जो-दड़ो वासी भूले नहीं थे।

प्रतनु ने अपने प्रपितामह वितनु का परिचय देकर नगर में एक गृहस्थ के यहाँ कुछ माह ठहरने की अनुमति प्राप्त कर ली। इस सैंधव परिवार से प्रतनु के प्रपितामह का निकट का सम्बन्ध रहा था। अतः प्रतनु के आगमन से प्रसन्नता ही हुई उसे। सैंधव सद्गृहस्थ ने शिल्पी प्रतनु की भी चर्चा सुन रखी थी किंतु प्रतनु के अनुरोध पर उसने किसी को नहीं बताया कि उसका अतिथि कौन है।

शिल्पी प्रतनु के अनुरोध पर सद्गृहस्थ ने छैनी हथौड़ी तथा एक गुप्त स्थान का भी प्रबंध कर दिया था। वहीं रहकर प्रतनु ने नृत्यांगना रोमा की प्रतिमा का शिल्पांकन किया। सैंधव सद्गृहस्थ इस असाधारण अतिथि को पाकर प्रसन्न था। लगभग एक मास के विकट परिश्रम से प्रतनु ने रोमा की यह प्रतिमा तैयार कर ली और कल रात्रि में जब चंद्रमा को उदित नहीं होना था, उसने अवसर पाकर उसी सद्गृहस्थ के सहयोग से रोमा की प्रतिमा को पुर के प्रमुख चैराहे पर स्थापित कर दिया था।

जिस समय नृत्यांगना रोमा अद्भुत प्रतिमा की कथा सुनकर पशुपति महालय पहुँची उस समय किलात अकेला बैठा हुआ प्रतिमा को ही निहार रहा था। नृत्यांगना को आया देखकर उठ खड़ा हुआ किलात- ‘आओ रोमा! देखो तो किसी शिल्पी ने तुम्हारी कितनी जीवंत प्रतिमा बना डाली है।’

प्रतिमा को देखकर रोमा आश्चर्य के सागर में डूब गयी। उसे लगा वह प्रतिमा नहीं देख रही है, दर्पण देख रही है। कितना जीवंत, कितना अद्भुत अंकन है एक-एक अंग का! एक-एक भाव का! एक-एक नृत्य मुद्रा का! यदि स्पर्श नहीं करो तो पता ही नहीं लगता कि यह प्रतिमा है। इसी लिये समस्त पुरवासी भ्रम में पड़ गये थे इसे देखकर। यहाँ तक कि स्वामी किलात भी।

  – ‘क्या इस प्रतिमा का शिल्पी कभी तुमसे मिला है ?’

  – ‘नहीं स्वामी! कभी नहीं।’

  – ‘तो फिर इसने इतनी कुशलता पूर्वक तुम्हारे अंगों के लास्य को कैसे प्रतिमा में ढाल दिया ?’ प्रतिमा के स्थूल वर्तुल-युगल पर हाथ फिराते हुए प्रश्न किया किलात ने।

  – ‘पता नहीं स्वामी। लगता है शिल्पी पशुपति महालय के वार्षिक उत्सव में उपस्थित था।’ किलात के हाथों को प्रतिमा पर घूमते देखकर रोमा का मुख लज्जा से  आरक्त हो आया।

  – ‘किंतु केवल उत्सव में देख लेने भर से तुम्हारे सौंदर्य का इतना वास्तविक निरूपण कैसे कर सका होगा वह ? अवश्य ही उसने तुम्हें इस अवस्था में एक से अधिक बार देखा है।’ किलात के चेहरे पर एक आदिम पिपासा नृत्य कर रही थी। उसके हाथ अब भी प्रतिमा पर थे।

रोमा की इच्छा हुई कि वह खींच कर किलात को एक हाथ जमाये किंतु किलात उसका स्वामी है और वह क्रीत दासी से अधिक कुछ भी नहीं। कैसे कर सकती है वह यह अधम कृत्य!

  – ‘नहीं स्वामी! मैं इतनी निर्लज्ज नहीं।’

  – ‘इसमें निर्लज्जता की क्या बात है ? महालय की नृत्यांगनाओं के लिये अपनी प्रतिमा बनवाने का तो कोई निषेघ नहीं। यह तो तुम्हारा नैसर्गिक अधिकार है।’

किलात की बात का उत्तर नहीं दिया रोमा ने। वह उस अप्रकट शिल्पी के बारे में सोचने लगी। सत्य ही कितना निष्णात होगा इसका शिल्पी! रोमा की इच्छा हुई कि वह उस अनजाने शिल्पी को एक बार देखे जिसने इतने कौशल से उसकी प्रतिमा का निर्माण किया है। उसकी प्रशंसा करे उसके कौशल के लिये किंतु धिक्कृत भी करे इस निर्लज्जता के लिये।

कैसे उसने बिना अनुमति लिये उसकी निर्वसन देह का शिल्पांकन किया ? निश्चय ही वह पशुपति के वार्षिकोत्सव में उपस्थित रहा होगा किंतु देवीक अनुष्ठान की बात और है। तब तो वह मातृदेवी के रूप में थी किंतु यहाँ वह प्रतिमा में है। भले ही उसे मातृदेवी के रूप में ही दिखाया गया है किंतु यह उसकी देह का निर्लज्ज प्रदर्शन है।

मातृदेवी के रूप में सजी रोमा को किलात बलपूर्वक स्पर्श नहीं कर सकता था किंतु प्रतिमा में बैठी रोमा को किलात बिना किसी संकोच के स्पर्श कर सकता है।

इससे पहले कि किलात प्रतिमा की प्रशंसा के उपक्रम से रोमा से कुछ और निर्लज्ज शब्द कहता, अनुचर ने आकर सूचना दी कि शिल्पी प्रतनु उनकी सेवा में उपस्थित होना चाहता है। किलात ने शिल्पी को यहीं ले आने के आदेश दिये। शीघ्र ही प्रतनु किलात की सेवा में उपस्थित हो गया।

प्रतनु ने जानुओं के बल बैठकर पुजारी किलात और नृत्यांगना रोमा को प्रणाम निवेदित किया। प्रतनु को देखकर विश्वास नहीं हुआ किलात को। किलात की कल्पना थी कि इस प्रतिमा का शिल्पी किसी अत्यंत मायावी व्यक्ति के रूप में उसके सामने उपस्थित होगा किंतु यह तो अत्यंत साधारण सैंधव युवक था।

  – ‘तुमने इस प्रतिमा का निर्माण किया है ?

  – ‘हाँ स्वामी! मैंने ही इस प्रतिमा का निर्माण किया है।’

  – ‘किस उद्देश्य से ?’

  – ‘कला को नवीन ऊँचाई प्रदान करने के उद्देश्य से। देवी रोमा के सौंदर्य को सदैव के लिये अमर कर देने के उद्देश्य से। सैंधव सभ्यता की श्रेष्ठता का संदेश असुरों, दैत्यों, दानवों और नागों की सभ्यताओं तक पहुँचाने के उद्देश्य से।’

  – ‘क्या नाम है तुम्हारा ?

  – ‘प्रतनु। लोग मुझे शिल्पी प्रतनु कहते हैं।’

  – ‘कहाँ के निवासी हो ? पहले तो कभी नहीं देखा तुम्हें!’ नाम सुना हुआ सा लगा किलात को।

  – ‘सैंधव हूँ। पहले हमारा पुर सरस्वती के किनारे था किंतु आर्यों द्वारा तोड़ दिये जाने के बाद अब शर्करा के तट पर हम लोगों ने नवीन पुर बना लिया।’

  – ‘सरस्वती नदी के किनारे कौनसा पुर था तुम्हारा ?’

  – ‘कालीबंगा।’

  – ‘शिल्पी वितनु का नाम सुना है तुमने ?’

  – ‘हाँ। वे मेरे प्रपितामह थे।’

  – ‘तुम्हें पता है मोहेन-जो-दड़ो से उनका क्या सम्बन्ध था ?’

  – ‘हाँ। वे इस महालय के प्रधान शिल्पी थे।’

  – ‘निश्चय ही तुम शिल्पी वितनु के प्रपौत्र हो तथा उसके प्रपौत्र होने के योग्य हो। क्या तुमने यह कला शिल्पी वितनु से सीखी थी ?’

  – ‘नहीं! मैंने तो उन्हें देखा ही नहीं। मुझे शिल्प का ज्ञान पिता ने दिया।’

  – ‘देवी रोमा! तुम्हें इस युवक का आभार व्यक्त करना चाहिये। इसी चतुर सैंधव ने तुम्हारी इतनी सुंदर प्रतिमा बनाई है।’ किलात ने रोमा को सम्बोधित करके कहा।

  – ‘आप सब कलाओं के पारखी हैं स्वामी। इनकी प्रशंसा तो आप ही कर सकेंगे किंतु मैं आपके समक्ष इनके विरुद्ध अभियोग प्रस्तुत करने की अनुमति चाहती हूँ।’

  – ‘अभियोग! कैसा अभियोग ?’ चैंक पड़े प्रतनु और किलात दोनों ही।

  – ‘इन्होंने मुझसे बिना अनुमति प्राप्त किये मेरे शरीर की निर्वसना प्रतिमा बनाई है। क्या इससे मेरी मर्यादा भंग नहीं होती ?’

  – ‘निर्वसना प्रतिमा बनाने से मर्यादा कैसे भंग होगी! मातृदेवी की सहस्रों निर्वसना प्रतिमाओं का निर्माण कर चुका हूँ मैं अब तक। क्या उससे मातृदेवी की मर्यादा भंग हो गयी ?’

  – ‘मातृदेवी को लोग अलग दृष्टि से देखते हैं। मैं साधारण नारी हूँ, मुझे देखने के  लिये समाज के पास अलग दृष्टि है। तुमने तुच्छ स्वार्थ के लिये मेरा अपमान किया है।’

  – ‘मैंने यह प्रतिमा समाज की उन्नति के उद्देश्य से बनाई है। किसी व्यक्तिगत लाभ के विचार से नहीं।’

  – ‘किंतु क्या तुम बिना अनुमति प्राप्त किये किसी स्त्री की निर्वसन प्रतिमा बना दोगे ?’

  – ‘किसी स्त्री की नहीं केवल पशुपति महालय की नृत्यांगना रोमा की। जो कला की अधिष्ठात्री देवी हैं और पूरे समाज को उनकी कला की प्रशंसा करने का अधिकार प्राप्त है।’

  – ‘क्यों ? क्या महालय की नृत्यांगना होने भर से मेरे वे समस्त अधिकार नष्ट हो गये जो एक सामान्य सैंधव नारी को प्राप्त हैं ?’ क्रोध और क्षोभ से आँखें भर आईं रोमा की।

वह तो स्वयं ही इस प्रथा के विरुद्ध थी कि वार्षिकोत्सव में प्रमुख नृत्यांगना निर्वसना होकर नृत्य करे किंतु पुजारी किलात का आदेश था कि यह नृत्य रोमा नहीं मातृदेवी द्वारा किया जायेगा और वह भी पशुपति की प्रसन्नता के लिये। इस लिये नृत्यांगना को मातृदेवी के वेश में ही नृत्य करना होगा।

पीढ़ियों से यही होता आया है। एक ही दिन की तो बात है इसलिये जैसे-तैसे निभा लेती है रोमा किंतु उसकी निर्वसन देह का ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन होगा ऐसा तो उसने सोचा ही नहीं था। इस प्रदर्शन के बाद क्या अंतर रह गया था पशुपति महालय की प्रमुख नृत्यांगना और पुर की साधारण गणिकाओं में!

  – ‘इस ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया देवी! अनजाने में हो गये इस अपराध के लिये मैं क्षमा याचना करता हूँ, देवी रोमा से भी और स्वामी किलात से भी।’

  – ‘केवल क्षमा मांगने भर से कुछ नहीं होगा। इसका दण्ड भोगना होगा युवक।’ रोमा का क्रोध अभी ठण्डा नहीं हुआ था।

  – ‘मैं सहर्ष प्रस्तुत हूँ देवी। आप जो दण्ड देंगी मैं उसे शिरोधार्य करूंगा।’

  – ‘दण्ड देने का अधिकार मुझे नहीं स्वामी को है।’ रोमा की आँखों से आँसू टपक पड़े।

  – ‘तुम्हें इसी समय मोहेन-जो-दड़ो छोड़ने के आदेश दिये जाते हैं।’ जाने कैसे बिना सोचे-समझे किलात ने दण्ड सुना दिया। सिहर कर रह गया प्रतनु मानो प्रचण्ड शीत का प्रहार हुआ हो। इतना कठोर दण्ड! सैंधव सभ्यता के अद्भुत शिल्पी प्रतनु का ऐसा घनघोर अपमान! कहाँ तो वह देवी रोमा की प्रतिमा का निर्माण करके देश और काल की सीमाओं को लांघकर भविष्य के द्वार खटखटाने का स्वप्न संजोये हुए था और कहाँ वह वर्तमान द्वारा ठुकराया जा रहा था!

आघात रोमा को भी हुआ। यह कैसा दण्ड है! ऐसा तो नहीं चाहा था रोमा ने! समझ नहीं पा रही थी वह कि कैसे परिष्कार करे इस दण्ड का।

  – ‘क्या मैं भविष्य में कभी भी मोहेन-जो-दड़ो में प्रवेश नहीं कर सकूंगा ?’ अपने आवेश पर नियंत्रण रखने का यथाशक्ति प्रयास करते हुए प्रतनु ने प्रश्न किया। वह प्रश्न किलात से कर रहा था किंतु देख रोमा की ओर रहा था।

जाने क्या था प्रतनु की दृष्टि में कि रोमा को अपना हृदय विदीर्ण होकर बिखरता हुआ सा प्रतीत हुआ। क्षण भर में ही उसके चिंतन-प्रवाह की दिशा बदल गयी। क्यों उसने इस निर्दोष शिल्पी के विरुद्ध अभियोग प्रस्तुत किया किलात के समक्ष ? इससे श्रेष्ठ तो यह होता कि वह स्वयं ही निबट लेती अनजाने पुर से आये इस युवा और अद्भुत शिल्पी से।

क्यों भूल गयी रोमा उस क्षण कि किलात की दृष्टि में खोट है ? जिसकी अपनी दृष्टि में खोट हो वह रोमा को क्या न्याय दे सकता है! वह तो स्वयं भोगना चाहता है रोमा को। क्यों भूल गयी वह कि इस युवा शिल्पी के रूप में रोमा को विश्वस्त सहायक मिल सकता था जो किलात से रोमा की रक्षा करता!

शर प्रत्यंचा का आघात पाकर छूट चुका था। उसे लौटाया नहीं जा सकता था। अपने ही बनाये जाल में फंस गयी रोमा। यदि वह किलात से शिल्पी प्रतनु के लिये क्षमा दान की याचना करती है तो किलात उलट कर रोमा पर आरोप लगायेगा कि रोमा ने ही अपनी निर्वसना प्रतिमा बनवाकर मोहेन-जो-दड़ो के मुख्य चैराहे पर लगवाई ताकि वह प्रसिद्धि प्राप्त कर सके।

महालय की नृत्यांगना होने के उपरांत भी उसका यह कम गणिकाओं द्वारा किये जाने योग्य कर्म की श्रेणी में आता था। महालय के नियम भंग करने का अर्थ था जीवन भर अंधेरे कक्ष में कैद। अभी तक तो वह जैसे तैसे अपने शील की रक्षा करती आयी है किंतु नगर वासियों की दृष्टि से दूर अंधेरे कक्ष में बंद रोमा को भोगने से किलात को कौन रोक सकेगा! किसी को पता भी नहीं चलेगा कि महालय के किस अंधेरे कूप अथवा कक्ष में पड़ी रोमा किस प्रकार सड़ रही है!

किलात का इष्ट तो बिना कुछ किये ही सध जायेगा। नगर जनों की आंखों से ओझल रोमा के साथ किलात क्या कुछ नहीं करेगा! अब तक अतृप्त रहीं उसकी समस्त पिपासायें शांत करने में फिर कौन बाधक हो सकेगा ? रोमा ने देखा किलात और प्रतनु दोनों ही उसकी ओर ताक रहे हैं।

  – ‘युवक के प्रश्न का उत्तर दो रोमा!’ किलात ने टोका उसे।

  – ‘किस प्रश्न का स्वामी ?’

  – ‘क्या यह अब कभी मोहेन-जो-दड़ो में प्रवेश नहीं कर सकेगा ?’

  – ‘न्याय आपने किया है स्वामी! दण्ड की अवधि भी आपको ही निर्धारित करनी है।’

  – ‘मेरा मत है कि सैंधव होने के कारण और इसके वंश का मोहेन-जो-दड़ो से प्राचीन सम्बन्ध होने के कारण शिल्पी प्रतनु को सदैव के लिये नगर से निष्कासित नहीं किया जाना चाहिये। दो वर्ष का निर्वासन पर्याप्त है। इस बीच वह सप्त सिंधुओं के पवित्र जल में स्नान करके अपने दुष्कर्म का प्रायश्चित कर सकता है। प्रतनु चाहे तो वह आज अथवा कल नगर छोड़कर प्रस्थान कर सकता है।’

दो वर्ष! यह भी कोई कम समय नहीं होता! रोमा को लगा कि सदैव के लिये निष्कासित करना और दो वर्ष के लिये निष्कासित करना एक ही बात है। एक बार नगर से निष्कासित एवं प्रताड़ित शिल्पी मोहेन-जो-दड़ो छोड़ कर गया तो फिर लौट कर नहीं आयेगा।

शिल्पी प्रतनु की आंखें अपमान, क्रोध और क्षोभ की ज्वाला में धधकती हुई सी प्रतीत हुईं रोमा को।  रोमा में उन आंखों का सामना करने का साहस नहीं रहा। उसने सिर झुका लिया। प्रतनु ने जानुओं पर बैठ कर किलात का अभिवादन किया और कक्ष से बाहर हो गया। रोमा ने चाहा कि वह दौड़ कर शिल्पी के पांवों से लिपट जाये और उसे नगर छोड़कर न जाने के लिये कहे किंतु वह न कुछ कहने की स्थिति में थी न कुछ करने की।

शिल्पी प्रतनु के जाने के बाद रोमा ने भी किलात का अभिवादन किया और अपने कक्ष की ओर चल पड़ी। उसने लगभग दौड़ते हुए अपने कक्ष तक का मार्ग पार किया। कक्ष में पहुँच कर रोमा ने अपनी वृद्धा परिचारिका को बुलाकर कहा कि महालय से बाहर जा रहे लम्बे युवक का पीछा करे, जो है तो द्रविड़ किंतु असुर जैसा दिखाई देता है। उसने कानों में बड़े कुण्डल पहन रखे हैं। दासी चुपचाप पता लगाये कि वह किस भवन में निवास कर रहा है और बिना कोई समय खोये तुरंत लौट कर सूचना दे।

वृद्धा दासी वश्ती ने जीवन के कई वसंत देखे थे। वह रोमा की माँ अलोला की भी प्रमुख अनुचरी थी। रोमा को उसने गोदी में खिलाया था, इसलिये वह रोमा पर पुत्रीवत् ही स्नेह रखती थी। पशुपति महालयों की नृत्यांगनाओं की दुर्दशा की जितनी जानकारी उसे थी उतनी तो स्वयं नृत्यांगनाओं को भी न थी।

उसकी आंखों से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता था। उसने महालय के उन समस्त अंधकूपों को देखा था जिसमें अवज्ञाकारिणी नृत्यांगनायें अपने जीवन की अंतिम श्वांसें गिनती थीं। वश्ती को ज्ञात था कि किलात रोमा पर आसक्त है किंतु रोमा इस विषय पर किलात की निरंतर उपेक्षा करके अपने लिये संकट उत्पन्न करती रही है।

नगर में आज प्रातः घटित घटनाओं से भी वह भली भांति परिचित है। दासी ने तुरंत अनुमान कर लिया कि असुरों के समान दिखाई देने वाले जिस अपरिचित सैंधव युवक के पीछे उसे भेजा जा रहा है, उसका सम्बन्ध आज की घटनाओं से होना चाहिये।

महालय से अधिक दूर नहीं जाना पड़ा दासी को। असुरों की तरह लम्बे डग भरता हुआ क्षीणकाय सैंधव युवक उसे मुख्य वीथि में ही दिखाई पड़ गया। युवक का चेहरा बता रहा था कि महालय में उसके और किलात के बीच प्रिय संवाद नहीं हुए हैं। वश्ती ने युवक से कोई संवाद नहीं किया।

केवल उसके पीछे चलती रही और तब तक चलती रही जब तक कि वह युवक एक आवास में प्रवेश नहीं कर गया। जब काफी देर तक युवक पुनः उस आवास से बाहर नहीं निकला तो वश्ती को विश्वास हो गया कि युवक इसी भवन में अपना डेरा जमाये हुए है। वश्ती पुनः महालय की ओर लौट पड़ी।

वश्ती ने लौट कर रोमा को सूचित किया कि शिल्पी प्रतनु महालय के पृष्ठ भाग की संकुचित वीथी में ही एक सैंधव सद्गृहस्थ का अतिथि है। रोमा ने क्षण भर विचार किया और फिर से वृद्धा वश्ती को दौड़ा दिया प्रतनु के निवास तक -‘ माता वश्ती! मैंने कभी तुम्हें कष्ट नहीं दिया किंतु आज दे रही हूँ। तुम्हें एक बार फिर वहाँ तक जाना होगा। तुम जाकर शिल्पी प्रतनु से कहो कि वह आज मोहेन-जो-दड़ो छोड़कर न जाये। आज रात मेरी प्रतीक्षा करे। मैं स्वयं उससे मिलने आऊंगी।’

वश्ती बचपन से रोमा की सेवा करती आई है। आज से पहले उसने रोमा को इतना व्यथित, इतना उद्वेलित कभी नहीं देखा था। अवश्य ही कहीं कोई गंभीर बात हुई है। क्या उस अपरिचित युवक पर कोई विपदा आ गयी है! दासी ने सोचा कि रोमा से कुछ पूछे किंतु प्रश्न पूछ कर रोमा के कष्ट को बढ़ाना उचित न जानकर वह चुपचाप प्रतनु के निवास की ओर चल पड़ी।

– अध्याय 9, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अग्निहोत्र (10)

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अग्निहोत्र

इस समय आर्य-जन प्रातःकालीन अग्निहोत्र की तैयारी में संलग्न हैं। ऋषिगण चारों दिशाओं का वंदन कर रहे हैं। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने पूर्व दिशा को नमस्कार करते हुए कहा- ‘प्रकाश दायिनी पूर्व दिशा का अधिपति सूर्य है। इसकी बाणरूप रश्मियाँ समस्त बंधनों से रहित करने वाली हैं। जगत की रक्षा करने वाले सूर्य को हमारा नमस्कार है। जो अज्ञानी हमसे द्वेष रखते हैं वे परम प्रतापी सूर्य की दाढ़ में हैं अतः हम किसी से वैर न रखें।’ [1]

  – ‘समृद्धि दायिनी दक्षिण दिशा का स्वामी इन्द्र है जो कीट-पतंगों के समान कुटिल मार्ग पर चलने वाले दुष्टों का नाश करता है। ऐसे इंद्र को हमारा नमस्कार है। जो अज्ञानी हमसे द्वेष रखते हैं वे परम प्रतापी इंद्र की दाढ़ में हैं अतः हम किसी से वैर न रखें।’ [2] ऋषि नारायण ने दक्षिण दिशा को नमस्कार करते हुए कहा।

  – ‘वैराग्य दायिनी पश्चिम दिशा का स्वामी वरुण है जो सर्पादि विषधारी प्राणियों से रक्षा करने वाला है। ऐसे वरुण को हमारा नमस्कार है। जो अज्ञानी हमसे द्वेष रखते हैं वे परम प्रतापी वरुण की दाढ़ में हैं अतः हम किसी से वैर न रखें।’ [3] ऋषि उग्रबाहु ने पश्चिम दिशा को नमस्कार करते हुए कहा।

  – ‘शांति दायिनी उत्तर दिशा का स्वामी सोम है जो स्वयं उत्पन्न होने वाले रोगों से रक्षा करने वाला है। ऐसे सोम को हमारा नमस्कार है। जो अज्ञानी हमसे द्वेष रखते हैं वे परम प्रतापी सोम की दाढ़ में हैं अतः हम किसी से वैर न रखें।’[4] ऋषि पर्जन्य ने उत्तर दिशा को नमस्कार करते हुए कहा।

दिशाओं को नमन करने के पश्चात् देवताओं को प्रणाम आरंभ हुआ।

  – ‘जिन्होंने स्वयं को दिव्य बनाया और हमारे लिये दिव्य वातावरण बनने हेतु स्वयं का उत्सर्ग किया, उन देवपुरुषों को नमन।’[5] ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने देवों को प्रथम नमस्कार किया।

  – ‘जिन्होंने स्वयं को जीता और सत्प्रवृत्तिा संवर्धन में प्राणपण से संलग्न रहे, उन महाप्राणों को नमन्।’[6] आर्य सुरथ ने भी नतमस्तक हो देवों को नमस्कार किया।

  – ‘जो मूढ़ता और अनीति से जूझने की सामथ्र्य प्रदान करते हैं, उन महारुद्रों को नमन्।’[7] आर्य पूषन ने देवों को नमन करते हुए कहा।

  – ‘जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं उन आदित्यों को नमन।’ [8]आर्य सुनील ने देवों को नमस्कार किया।

  – ‘संतानों को सुसंस्कार और स्नेह देने वाली मातृशक्तियों को नमन।’ [9]ऋषिपत्नी अदिति ने मातृशक्तियों को नमस्कार किया।

  – ‘जिन्हें दुर्बलता से लगाव नहीं और जो उद्दण्डता को सहन नहीं करते, उन महाशक्तिशाली देवों को नमन।’[10] ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने पुनः देवों को नमस्कार किया।

दिशाओं और देवों को नमस्कार कर ऋषिगणों ने अहोरात्र प्रज्वलित रहने वाली अग्नि की वंदना की।

  – ‘हे अग्नि! हमें ऊपर उठना सिखायें।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने दोनों बाहु आकाश में उठाकर अग्नि का आह्वान किया।

  – ‘हे अग्नि! हमें प्रकाश से भर दें।’ ऋषिवर नारायण ने अग्निदेव से करबद्ध प्रार्थना की।

  – ‘हे अग्नि! हमें आपके अनुरूप बनने तथा दूसरों को अपने अनुरूप बनाने की क्षमता प्रदान करें।’ आर्य सुरथ ने अग्नि से प्रार्थना की।

– ‘हे अग्नि! हम भी आपकी भांति सुगंधि और प्रकाश बाँटने लगें।’ आर्या पूषा ने प्रार्थना की।

  – ‘ऊँ अग्ने नय सुपथा राये, अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयष्ठां ते नम उक्तिं विधेम्।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा के साथ सबने उच्चारित किया।

अग्नि का आह्वान पूर्ण हुआ ही था कि आर्या मेधा और आर्या द्युति लगभग भागती हुई यज्ञशाला में उपस्थित हुईं। उन्हें रिक्त हस्त आया देखकर ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने पूछा- ‘क्या बाता है आर्या! आप सोम नहीं लाईं! अग्नि का आह्वान हो चुका है। हम आहुतियाँ आरंभ करने वाले हैं।’

  – ‘ऋषिवर! हमने सोम का बहुत आह्वान किया किंतु वह प्रकट नहीं हुआ।’ आर्या मेधा ने अत्यंत विनम्र शब्दों में निवेदन किया।

  – ‘क्यों ? कल संध्या काल में ही तो हमने परुष्णि के तट पर सोम की अभ्यर्थना-वंदना की थी। कल तक तो सोम वहाँ उपस्थित था। एक ही रात्रि में सोम विलुप्त कैसे हो गया ?’

  – ‘परुष्णि के तट पर कुछ सोम वल्लरियाँ कुचली हुई पड़ी हैं और सम्पूर्ण तट सोम से विहीन है।’

  – ‘किसने किया यह दुष्कर्म ?’ कई आर्य एक साथ बोल उठे। उनके स्वर में क्षोभ और उद्विग्नता स्पष्ट अनुभव की जा सकती थी।

  – ‘ऋषिवर नारायण! आप अहोरात्र में समिधा प्रतिष्ठित कर घृत, मधु, व्रीहि और दिव्य वनस्पतियों की आहुतियाँ आरंभ कीजिये। हम आर्य सुरथ और आर्य सुनील के साथ सोम की खोज में जाते हैं तथा यथाशीघ्र लौटने का प्रयास करते हैं। तब तक आप यज्ञ आरंभ रखें।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आर्य सुरथ और आर्य सुनील को अपने साथ आने का आदेश देते हुए कहा।

ऋषि नारायण ने चिंतित नेत्रों से व्याकुल आर्य समुदाय को देखा और आहुतियाँ आरंभ कीं। यज्ञशाला से बाहर निकलते हुए ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा भी कम उद्विग्न नहीं दिखाई दे रहे थे।

ऋषि सौम्यश्रवा और दोनों आर्यवीरों ने परुष्णि के तट पर जाकर देखा। परुष्णि का सोम विहीन तट सम्पूर्ण श्री खोकर अत्यंत अमंगलकारी दिखाई दे रहा था। यत्र-तत्र सोम वल्लरियाँ कुचली हुई पड़ी थीं। सूक्ष्मता से निरीक्षण करने पर परुष्णि के नम तट पर असुरों के पदचिह्न भी दिखाई दिये।

  – ‘निश्चित ही यह दुष्कर्म पापी असुरों ने किया है। ये रहे उनके पदचिह्न।’ आर्य सुरथ ने ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा को एक स्थल पर बने पदचिह्न दिखाये।

  – ‘ये वृहत् पदचिह्न असुरों के अतिरिक्त किसी और प्राणी के हो ही नहीं सकते।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आर्य सुरथ के मत से सहमत होते हुए कहा।

  – ‘अब क्या होगा आर्य ?’ असुरों ने तो सम्पूर्ण सोम नष्ट कर दिया। आर्य सुनील ने चिंता व्यक्त की।

  – ‘सोम के अभाव में हमारे यज्ञ अपूर्ण रह जायेंगे।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा के मुखमण्डल पर चिंता की रेखायें और स्पष्ट हो आयीं।

सोम की तत्क्षण उपलब्धि का कोई उपाय नहीं था। निकटतम जन भी यहाँ से कई योजन दूर था जहाँ से सोम मंगवाने में दस-पंद्रह दिन लग जाना स्वाभाविक था। आज की पूर्णाहुति कैसे होगी! इसी प्रश्न पर विचार करते हुए ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा और दोनों आर्य वीर यज्ञ शाला को लौटे।

अंत में यह निश्चित किया गया कि अग्नि को सोम अर्पित करने में असमर्थ रहने के लिये अग्नि से क्षमा याचना की जाये तथा सोम के साथ दी जाने वाली आहुतियाँ घृत से दी जायें। दैनिक आहुतियों का क्रम विधिवत् पूर्ण कर चिंतित एवं व्यथित स्वरों से आर्यों ने पूर्णाहुति दी-

  – ‘ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवावशिष्यते। स्वाहा। ऊँ सर्वं वै पूर्णग्वं स्वाहा।’

– अध्याय 10, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] प्राचीदिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः। तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दघ्मः ।

[2] दक्षणिादिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः। तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दघ्मः

[3] प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाक् रक्षितान्नमिषवः। तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दघ्मः ।

[4] उदीचीदिक् सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः। तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दघ्मः।

[5] सर्वेभ्यो देवपुरुषेभ्यो नमः।

[6] सर्वेभ्यो महाप्राणेभ्यो नमः।

[7] सर्वेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः।

[8] सर्वेभ्यो आदितेभ्यो नमः।

[9] सर्वेभ्यो मातृशक्तिभ्यो नमः।

[10] सर्वेभ्यो देवशक्तिभ्यो नमः।

अभिसार (11)

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अभिसार

गगन मण्डल में सप्त सिंधुओं का प्रतिनिधत्व कर रहे सप्त नक्षत्र अब अपने पुर को जाने को लालायित थे किंतु यही सोचकर अटके हुए थे कि अभिसार पूर्ण होने से पहले चल देना उचित नहीं होगा।

शुक्ल पक्ष की प्रथमा का क्षीण चंद्र अल्प समय आकाश में उपस्थित रह कर प्रस्थान कर चुका है। नक्षत्रों का मंद प्रकाश मोहेन-जो-दड़ो को थपकियाँ देता हुआ निद्रा के वशीभूत किये हुए है। केवल नगर प्रहरियों ने ही निद्रा का अनुशासन स्वीकार नहीं किया है फिर भी उनके अंग विश्रांति के कारण शिथिल हो चले हैं जिससे वे उतने सजग नहीं रहे हैं जितना कि उन्हें होना चाहिये।

पशुपति महालय के पृष्ठभाग में स्थित संकुचित वीथी में इस समय निविड़ अंधकार छाया हुआ है। इसी अंधकार की ओट लेकर दो काली छायाऐं प्रहरियों की दृष्टि से अपने आप को बचाती हुई तीव्र कदमों से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ी चली जा रही हैं।

पक्की ईंटों से निर्मित एक बड़े भवन के समक्ष रुककर दासी वश्ती ने धीरे से अर्गला [1] बजाई। शिल्पी प्रतनु ने द्वार खोला और बिना कुछ बोले पीछे हट गया। असमय आये इन अतिथियों की प्रतीक्षा वह पर्याप्त व्यग्रता से कर रहा था किंतु अतिथियों की अभ्यर्थना में उसने एक भी शब्द नहीं कहा। दासी वश्ती भवन के बाहर ही बनी एक लघु चैकी पर बैठ गयी और नृत्यांगना रोमा ने भवन में प्रवेश किया।

कक्ष में दीपक प्रज्वलित था जिसकी वर्तिका अत्यंत क्षुद्र हो जाने के कारण दीपक से निःसृत आलोक दीपक के आस-पास ही सिमट कर रह गया था। रोमा के कक्ष में आ जाने से जैसे उसे बल मिला। उसका आलोक स्वतः तीव्र हो उठा।

  – ‘कुछ बोलोगे नहीं शिल्पी!’ अपने ऊपर से श्याम अंशुक हटाते हुए रोमा ने प्रश्न किया।

  – ‘क्या बोलूँ ? कुछ शेष रह गया है क्या अब भी ?’

  – ‘यह तो पूछो कि अतिथि के आगमन का प्रयोजन क्या है ?’

  – ‘सामथ्र्यवान अतिथियों के आगमन का कारण नहीं पूछा जाता।’

  – ‘क्रोधित हो ?’

  – ‘क्रोधित हो सकूं , अकिंचन की इतनी सामथ्र्य नहीं।’

  – ‘मैं समझ सकती हूँ , आपका रोष अकारण नहीं है किंतु सत्य मानो शिल्पी मेरा आशय यह कदापि नहीं था कि आपको राजधानी से निष्कासित कर दिया जाये।’

  – ‘जो भी रहा हो आपका आशय किंतु परिणाम सामने है, उसे तो नहीं नकारा जा सकता।’

  – ‘यही तो, यही तो चिंता का विषय है शिल्पी।’

  – ‘पशुपति महालय की प्रधान नृत्यांगना, सैंधव सभ्यता की अनिंद्य-अप्रतिम सुंदरी, सर्व-भावेन सामथ्र्यवान महादेवी रोमा को चिंतित होना शोभा नहीं देता।’

  – ‘देखो शिल्पी समय बहुत अल्प है। मुझे बहुत सी बातें कहनी और सुननी हैं। मेरी प्रार्थना है कि आप अपना रोष त्याग दें।’

  – ‘आपकी इच्छा ही सर्वोपरि है देवी। यही क्या कम गौरव है मेरे लिये कि इस सघन अंधकार से युक्त रात्रि में पुरवासियों की दृष्टि से छिपकर केवल मेरे लिये आपने यहां आने का कष्ट किया है। कहिये क्या आज्ञा है ?’

  – ‘यह सब औपचारिकतायें त्यागनी होंगी शिल्पी। मेरा दुर्भाग्य है कि मेरा परिचय आपसे इन परिस्थितियों में हुआ। यदि आपने पूर्व में ही मुझसे सम्पर्क कर लिया होता तो आज यह प्रसंग उत्पन्न न हुआ होता।’

  – ‘मेरी त्रुटि यही है कि मैंने कौतुक के उद्देश्य से यह सब किया और महालय की महिमा को उपेक्षित कर दिया। उसी की परिणति इन परिस्थितियों में हुई।’

  – ‘जो हुआ, अशोभनीय हुआ। अब आपका क्या विचार है ?’

  – ‘विचार का तो अवकाश ही नहीं रहा! अब तो प्रातः होते ही राजधानी छोड़कर चल देना होगा।’

  – ‘कहाँ जाओगे ? अपने पुर ?’

  – ‘कहाँ जाऊँगा यह तो मुझे भी ज्ञात नहीं किंतु इतना निश्चित है कि अपने पुर नहीं जाऊंगा।’

  – ‘क्यों ?’

  – ‘लोक अपवाद लेकर स्वजनों के बीच नहीं जाया जा सकता।’

  – ‘अपवाद के परिमार्जन का क्या उपाय है ?’

  – ‘मैं नहीं जानता।’

– ‘जब उपाय ही नहीं जानते तो अपवाद का परिमार्जन करोगे कैसे ?’

  – ‘संभवतः न कर पाऊँ।’

  – ‘तो अपने पुर कभी नहीं लौटोगे ?’

  – ‘संभवतः ऐसा ही हो।’

  – ‘यह तो उचित नहीं होगा।’

  – ‘जो अब तक हुआ है उचित तो वह भी नहीं था किंतु वह भी होकर ही रहा।’

  – ‘अभी तक रुष्ट हो।’

  – ‘रुष्ट स्वजनों से हुआ जाता है।’

  – ‘मेरा अनुरोध है कि आप मुझे भी स्वजन समझें।’

  – ‘किस सम्बन्ध से ?’

  – ‘आत्मीयता के सम्बन्ध से।’

  – ‘मैं तो किंचित भी आत्मीयता अनुभव नहीं कर रहा।’ अत्यंत रूखा हो आया प्रतनु। उसे नृत्यांगना का सारा व्यवहार बड़ा विचित्र जान पड़ रहा था।

  – ‘आज आत्मीयता अनुभव नहीं कर रहे हो। कल करोगे।’

  – ‘तो कल ही आपको स्वजन भी समझूंगा किंतु आत्मीयता का कारण तो स्पष्ट हो।’

  – ‘आत्मीयता का कोई कारण नहीं होता शिल्पी। आत्मीयता तो स्वयं ही कारण है और स्वयं ही परिणाम।’

  – ‘मेरा हृदय अभी इतना विकसित नहीं हो सका है देवी कि मैं अकारण ही आत्मीयता का अनुभव करने लगूं।’

  – ‘कला साधक होने के सम्बन्ध से भी हमारे बीच आत्मीयता हो सकती है शिल्पी।’

कहने को तो उसने कह दिया किंतु समझ नहीं पा रही थी रोमा। कैसे कहे इस स्वाभिमानी, हठी, रुष्ट और दृढ़ शिल्पी से अपने हृदय की बात। वह किसी भी संवाद को संवेदना के स्तर तक पहुँचने ही नहीं दे रहा। कक्ष में कुछ क्षण इसी तरह नीरवता व्याप्त रही। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। अचानक ध्यान आया रोमा को। शिल्पी अपना रोष त्यागे भी तो क्योंकर ? रोमा ने अभी तक न तो कोई क्षमा याचना की और न खेद ही प्रकट किया। वह अपने स्थान से उठकर शिल्पी के पैरों पर गिर पड़ी। इस अप्रत्याशित उपक्रम को समझ नहीं पाया प्रतनु। घबरा कर बोला- ‘यह क्या करती हैं देवी ?’

  – ‘जो मुझे सबसे पहले करना चाहिये था। आपसे क्षमा हेतु अनुनय करती हूँ।’

प्रतनु ने रोमा को बाहुमूल से पकड़ कर उठाया। बाहु के ऊष्ण स्पर्श से प्रतनु के भीतर जैसे कहीं कुछ पिघला। प्रतनु ने अपने शरीर में हल्का कंपन्न अनुभव किया। अपने आप से ही लज्जित हो गया वह। क्यों वह इतनी कठोरता से व्यवहार कर रहा है! क्या प्रस्तर छीलते-छीलते वह स्वयं भी प्रस्तरवत् हो गया है!

क्या वह एक रमणीय स्त्री की अनुनय को भी सम्मान नहीं दे सकता। नहीं-नहीं, कलाकार को इतनी शुष्कता शोभा नहीं देती। अतः अपने कण्ठ को भरसक कोमल बनाकर बोला- ‘क्षमा हेतु अनुनय करने की आवश्यकता नहीं। मैं आपसे किंचित मात्र भी रुष्ट नहीं हूँ। यहाँ आने का और कोई प्रयोजन हो तो कहें। रात्रि बहुत हो चली है यदि प्रहरियों ने देख लिया तो एक और अपवाद उत्पन्न हो जायेगा। आप महालय गमन करें।’

  – ‘क्षमा याचना के अतिरिक्त भी यहाँ आने का कारण है। वही निवेदन करना चाहती हूँ, कर सकेंगे मेरे निवेदन की रक्षा ?’

  – ‘शक्ति रहते पीछे नहीं हटूंगा।’

  – ‘मेरा निवेदन यह है कि आप दो वर्ष बाद फिर राजधानी लौट कर आयें।’

  – ‘किस प्रयोजन से ?’

  – ‘अपने अपवाद के परिमार्जन के लिये।’

  – ‘आप जानती हैं अपवाद के परिमार्जन का उपाय ?’

  – ‘अपवाद के परिमार्जन का उपाय तो नहीं जानती किंतु इतना जानती हूँ कि जहाँ रोग उत्पन्न होता है, औषध भी वहीं उपलब्ध होती है। इस अपवाद का आरोपण राजधानी मोहेन-जो-दड़ो में हुआ है अतः परिमार्जन भी यहीं हो सकता है।’

प्रतनु को लगा कि अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है। अब भी संसार में प्रतनु के लिये प्रकाश है जो उसका मार्ग प्रशस्त कर सकता है। प्रतनु ने यह भी अनुभव किया कि उसके समक्ष खड़ी स्त्री नितांत दर्शनीय देवदासी अथवा नितांत कमनीय नृत्यांगना अथवा नितांत रमणीय सैंधवी नहीं है। वह असाधारण वैदुष्य की स्वामीनी है। क्यों नहीं सोच सका शिल्पी प्रतनु यह बात पहले कि जहाँ रोग जन्म लेता है वहीं उसकी औषधि भी होती है। प्रकृति का यही नियम है।

प्रतनु ने अपने हृदय में नृत्यांगना के प्रति नवीन भाव के संचरण का अनुभव किया। यह काल्पनिक आकर्षण नहीं था, जो उसके हृदय में मोहेन-जो-दड़ो आने से पहले केवल रोमा के नृत्य और सौंदर्य की ख्याति को सुनकर उपजा था। यह रूप जनित आकर्षण भी नहीं था जो पशुपति उत्सव में रोमा को देखकर उपजा था। यह तो कोई और ही नवीन भाव था। संभवतः यह आत्मीयता का भाव है जो प्रत्युपकार की भावना से उपजता है। प्रतनु ने अनुमान किया।

  – ‘किस सोच में पड़ गये शिल्पी ?’

  – ‘सोच रहा हूँ आपके उपकार से कैसे उऋण हो पाऊंगा ?’

  – ‘अपकार को उपकार न कहें शिल्पी।’

  – ‘कभी-कभी व्यक्ति उपकार को अपकार और अपकार को उपकार मान बैठता है।’

– ‘वस्तुतः आपने मेरा अपकार नहीं उपकार ही किया है। मुझे जीवन जीने का नवीन लक्ष्य प्रदान किया है।’

  – ‘आप बतायें कि कैसे मैं आपका प्रत्युपकार कर सकूंगा ?

  – ‘दो वर्ष की अवधि बीतने पर वह प्रसंग भी उपस्थित हो जायेगा शिल्पी। मैं आपकी प्रतीक्षा करूंगी।’

  – ‘क्या उसके सम्बन्ध में कुछ भी जान सकता हूँ ?’

  – ‘हाँ। वही निवेदन करने तो मैं आयी थी। वस्तुतः मेरे यहाँ आने के स्वार्थ का मन्तव्य भी वही है जो मुझे यहाँ तक खींच लाया है।’

  – ‘आज्ञा करें।’

  – ‘किलात मुझपर कुदृष्टि रखे हुए है। उससे त्राण चाहती हूँ। आप सहायक होंगे ?’

  – ‘यह कैसी बात हुई ?’

  – ‘बात विचित्र है किंतु सत्य भी है कि सम्पूर्ण राजधानी में मुझे किलात से त्राण दिलवा सकने योग्य एक भी प्राणी दिखाई नहीं देता। किलात से विदा होते समय आपके चेहरे की दृढ़ता को देखा तो मुझे लगा कि आप मेरी सहायता कर सकते थे किंतु दुर्विपाक से तब तक परिस्थिति हाथ से निकल चुकी थी।’

  – ‘यदि किलात के हृदय में आपके प्रति अनुराग है तो इसमें बुरा क्या है ? महालय की नृत्यांगनाओं का स्वामी तो पुजारी ही होता है। वही उनका प्रथम और अंतिम भोक्ता है।

  – ‘उसने मेरी माता के साथ भी रमण किया है। उस नाते वह मेरा पिता होता है। मैं उसके समक्ष कैसे प्रस्तुत हो सकती हूँ!’

  – ‘महालय की नृत्यांगनाओं के समस्त पारिवारिक सम्बन्ध उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं जिस समय वे पशुपति को अर्पित की जाती हैं। सैंधवों की परम्परा यही है।’

  – ‘सैंधवों की परम्परा कुछ भी क्यों न हो शिल्पी किंतु क्या प्रकृति के बनाये बंधन शिथिल किये जा सकते हैं ? क्या मेरी माता को मेरी माता होने से नकारा जा सकता है ? और यदि ऐसा नहीं किया जा सकता तो किलात के प्रति मेरा समर्पण व्यभिचार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।’

  – ‘देवार्पित बालाओं पर सामान्य लोक के नियम प्रचलित नहीं होते देवी। जिस प्रकार पवित्र वृषभ बिना किसी सम्बन्ध का बन्धन स्वीकार किये गौओं से सृष्टि करता है, उसी प्रकार पशुपति महालय के पुजारी और देवार्पित देवबालायें भी तुच्छ सम्बन्धों से परे होते हैं। शिश्नदेव की संतुष्टि के लिये ही पुजारी देवबालाओं के साथ रमण करता है। उसमें पुजारी की अपनी कोई कामना नहीं होती।’

  – ‘मिथ्या तर्क है यह। मैं क्या जानती नहीं किलात की वासना को!

  – ‘सैंधवों की परम्परा नष्ट करना तो उचित नहीं देवी।’ कहने को तो कह दिया प्रतनु ने किंतु वह स्वयं भी परम्पराओं का कायल केवल इसलिये कभी नहीं रहा कि वे परम्परा हैं। उसकी मान्यता रही है कि परम्पराओं को ग्रहण करने में विवेक का प्रयोग आवश्यक है। समग्र हित हेतु बनी परम्परायें ही अनुकरणीय हैं जबकि स्वार्थ अथवा अज्ञानवश बनायी गयी बुरी परम्परायें सदैव त्याज्य हैं।

  – ‘प्रत्येक परम्परा स्वस्थ ही हो, यह तो आवश्यक नहीं। परम्पराओं का परिमार्जन युग के अनुकूल होते रहना चाहिये। केवल सार्वभौम परम्परायें ही ग्राह्य हैं।’ रोमा के स्वर में उत्तेजना थी।

शिल्पी प्रतनु का मन पिघल कर बहने लगा। उसे लगा सामने रोमा नहीं, प्रतनु के पिता खड़े हैं। उन्हीं को प्रतनु ने जीवन भर साहस के साथ सही और गलत का भेद करते देखा था। पिता ने ही प्रतनु को सिखाया था कि सब कुछ आँख मूंद कर ग्रहण करते जाना कदापि श्रेष्ठ नहीं। उसे विवेक की तुला पर तौला जाना चाहिये। उसे लगा कि नृत्यांगना रोमा जितनी सुंदर है, जितनी कला प्रवीण है उससे कहीं अधिक विदुषी और स्वाभिमानी है। निश्चय ही इस सैंधवी की सहायता करनी चाहिये, किंतु कैसे ?

  – ‘क्या सोचने लगे शिल्पी ?’

  – ‘सोच रहा हूँ कि उपाय क्या है! ‘

  – ‘उपाय है प्रतिरोध। मुझे सामथ्र्य रहते किलात का और उसके बनाये नियमों का प्रतिरोध करना होगा और इस प्रतिरोध में आपको मेरा सहायक बनना होगा।’

  – ‘कैसे कर सकूंगा मैं आपकी सहायता ? मैं तो सूर्योदय से पूर्व ही यहाँ से जा रहा हूँ।’

  – ‘आप दो वर्ष बाद लौटकर आ रहे हैं।’ रोमा ने स्मित हास्य के साथ कहा। क्षण भर पहले की उत्तेजना तिरोहित हो चुकी थी।

  – ‘किंतु दो वर्ष कम तो नहीं होते ? इस बीच आप रक्षण कर सकेंगी अपना ?’ प्रतनु चिंतित दिखाई दिया।

  – ‘प्रश्न मेरे रक्षण का नहीं, प्रश्न किलात के प्रतिरोध का है। वह मैं प्राण देकर भी करूंगी।’

  – ‘किलात से मुक्त होकर किस भाग्यशाली को अपनायेंगी देवी ?’ जाने किस आशा में प्रतनु ने यह प्रश्न कर लिया। वह स्वयं भी इसका कारण ठीक से समझ नहीं पा रहा था।

  – ‘जो सचमुच ही सौभाग्यशाली होगा।’ रोमा ने स्मित वदन होकर कहा।

  – ‘क्या कोई ऐसा सौभाग्यशाली है देवी की दृष्टि में ?’

  – ‘हाँ है। मेरा अनुमान है कि वह सौभाग्यशाली इस समय मेरे समक्ष उपस्थित है।’

अभिभूत होकर रह गया प्रतनु। कैसे! कैसे रोमा ने उसके हृदय से निःसृत मौन प्रार्थना सुन ली! कही यह सहायता के रूप में की जाने वाली सेवा का मूल्य चुकाने का आश्वासन तो नहीं! क्योंकर ? क्योंकर वह प्रतनु के प्रति अनुराग व्यक्त कर रही है ?

अभी तो रोमा ने ठीक से जाना भी नहीं प्रतनु को।

  – ‘क्या मैं जान सकता हूँ कि इस अकिंचन पर यह कृपा क्योंकर की जा रही है ?’   

  – ‘आप अकिंचन नहीं हैं। अद्भुत प्रतिभा, अतुलनीय साहस और आपत्ति में भी नष्ट न होने वाले विवेक के स्वामी हैं।’

  – ‘कैसे अनुमान लगाया आपने ?’

  – ‘मैं अनुमान के आधार पर नहीं, साक्ष्य के आधार पर कह रही हूँ।’

  – ‘साक्ष्य! कैसा साक्ष्य ?’

  – ‘आपके द्वारा बनाई गयी वह प्रतिमा आपकी अद्भुत प्रतिभा, अतुलनीय साहस और कठिन क्षणों में भी नष्ट न होने वाले विवेक का साक्ष्य है। उस एक प्रतिमा को देखकर ही यह अनुमान लगाना सहज हो जाता है कि जो भी आप देखते हैं उसे किस गहराई तक देख सकते हैं………।’ अपना वाक्य अधूरा छोड़कर मुस्कायी वह- ‘………एक बात कहूँ शिल्पी, अपनी प्रतिमा को देखने से पूर्व मैं स्वयं नहीं जानती थी कि मैं इतनी सुंदर हूँ।’

वाक्य पूरा करते-करते श्यामवर्णा सर्वांग सुंदरी के मुख का लावण्य शतगुणित हो गया। शिल्पी प्रतनु औपचारिकता की दूरी को समाप्त कर निकट हो आया रोमा के और अपनी बाँहों में समेटते हुए बोला- ‘अभी भी तुम मेरी बनायी प्रतिमा से कई गुणा अधिक सुंदर हो। इस अगाध सौंदर्य को प्रस्तर खण्ड में उतार पाना किसी शिल्पी के वश की बात नही। यह शिल्प तो अज्ञात शिल्पी ही रच सकता है, जो कभी किसी को दिखाई नहीं देता। जाने कहाँ छिपकर वह सम्पूर्ण सृष्टि के शिल्प में व्यस्त है।’

  – ‘मैंने कहा था ना कि तुम मेरे प्रति आत्मीयता अनुभव करने लगोगे।’

  – ‘हाँ देवी! जो तुमने कहा, सच कहा। यह किंकर आपका अनुगत है।’ भावनाओं के तीव्र प्रवाह में बहा चला जा रहा था प्रतनु।

  – ‘आप किंकर नहीं, मेरे स्वामी हैं।’

  – ‘किस सम्बन्ध से मैं तुम्हारा स्वामी हुआ नृत्यांगना ?’

  – ‘आत्मीयता के सम्बन्ध से आप मेरे स्वामी हुए।’ जैसे दुर्बल लता समर्थ वृक्ष से अनायास ही लिपट जाती है वैसे ही रोमा शिल्पी प्रतनु की देह से लिपट गयी। आत्मीयता की जो यात्रा उन्हें समय के पर्याप्त अंतराल में करनी चाहिये थी, वह यात्रा समय की अत्यल्पता के कारण इतनी शीघ्र इस बिंदु पर पहुँच गयी थी। 

गगन मण्डल में सप्त सिंधुओं का प्रतिनिधत्व कर रहे सप्त नक्षत्र अब अपने पुर को जाने को लालायित थे किंतु यही सोचकर अटके हुए थे कि अभिसार पूर्ण होने से पहले चल देना उचित नहीं होगा।

– अध्याय 11, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] द्वार पर लगी कुण्डी

समिति (12)

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समिति

जन के ठीक मध्य में स्थित यज्ञशाला के निकट ही वृहद पर्णशाला [1] बनी हुई है जिसमें प्रातः कालीन सभा, सांध्यकालीन गोष्ठि [2] तथा विशेष अवसर उपस्थित होने पर समिति [3] का आयोजन होता है। गोधूलि बेला [4] के आगमन में अभी विलम्ब है तथा सूर्य देव की प्रखरता भी अभी कम नहीं हुई है। वृहद पर्णशाला में इस समय तीव्र प्रकाश है तथा कुछ-कुछ गर्मी भी। मध्यान्ह के भोजन के पश्चात समस्त ‘तृत्सु-जन’ आज की समिति में बिना किसी सूचना के उपस्थित हो गया है।

परिस्थिति ही ऐसी थी कि समिति के आयोजन की सूचना देने की आवश्यकता नहीं रही। समस्त आर्य परिवारों ने अनुमान लगा लिया था कि आज समिति का आयोजन होगा। इस कारण आर्य स्त्री-पुरुष आज गौ-चारण के लिये अधिक दूर नहीं गये थे तथा मध्यान्ह पश्चात् ही लौट आये थे। यही कारण है कि आबाल-वृद्ध समस्त आर्य जन समिति में उपस्थित हैं।

क्या ऋषि-मुनि और क्या आर्य पुरुष-ललनायें सब के मुखमण्डल पर एक ही प्रश्न अंकित है। सोम के नष्ट हो जाने पर यज्ञ कैसे होगा! सोम की आहुतियों के अभाव में अग्नि को कैसे संतुष्ट किया जायेगा! इसी समस्या पर विचार करने के लिये आज की अनाहूत समिति का आयोजन हो रहा है। आहूत समितियों एवं अनाहूत समितियों में जो

अन्तर सदैव होता है, उसे आज भी परिलक्षित किया जा सकता है। आहूत समितियों में आर्य स्त्री-पुरुष परस्पर वार्ता में निमग्न रहते हैं, बालवृंद के कोलाहल से पर्णशाला भर जाती है किंतु अनाहूत समितियों का आयोजन अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में होने के कारण अथवा विपत्तिकाल में होने के कारण आद्योपरांत मौन ही अधिक मुखर रहता है। आज भी चारों ओर मौन पसरा हुआ है। अल्पवयस् बालवृंद में भी असाधारण परिस्थितियों को समझने की क्षमता होती है, इसीसे वे अपनी प्रकृति के विपरीत शांत बैठे हैं।

  – ‘समिति आरंभ की जाये।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने अपने दीर्घ श्मश्रुओं पर अंगुंलियाँ फिराते हुए पर्णशाला में व्याप्त मौन को भंग किया।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ! हमें आज के अग्निहोत्र के लिये हव्यवाहक [5] नियुक्त किया गया था किंतु हम अपना कर्तव्य पूर्ण नहीं कर सकीं इससे हमारा मन अत्यंत उद्विग्न है।’ आर्या मेधा और आर्या द्युति ने अपने स्थान पर खड़े होकर अपनी व्यथा व्यक्त की।

  – ‘इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं। दोष मेरा है, मुझे सोम की रक्षा का दायित्व सौंपा गया था किंतु मैं ही अपने प्रमादवश अपने कर्तव्य का ठीक से पालन नहीं कर सका।’ आर्य सुनील के चेहरे पर पश्चाताप के भाव स्पष्ट पढ़े जा सकते थे।

  – ‘यह कितना आश्चर्यकारी है कि असुरों ने रात्रि भर उत्पात किया और हमें किंचित् मात्र भी आभास नहीं हुआ।’ गोप सुरथ ने अपने खड्ग को अपने बाहुओं पर तोलते हुए कहा।

  – ‘असुर मायावी हैं वत्स। रात्रि में उनकी तामसी शक्तियों का वेग प्रबल होता है। वे छल का सहारा लेते हैं, अप्रकट रह कर दुष्कर्म करते हैं ………।’

  – ‘………और आर्यों की असावधानी का लाभ उठाते हैं।’ आर्या समीची ने ऋषिश्रेष्ठ की बात को पूरा किया।’ उत्तेजना के कारण आर्या समीची के कण्ठ की तीक्ष्णता बढ़ गयी। आर्य अतिरथ ने चैंक कर उनकी ओर देखा, भगिनि समीची उनकी भाषा बोल रही हैं।

  – ‘यह पहली बार नहीं हुआ है जब सोम लुप्त हो गया हो।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने विचार विमर्श का विषय असुरों से हटाकर पुनः सोम पर लाते हुए कहा।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ मैंने सुना है कि एक बार पहले भी सोम देवों को त्याग कर जा चुका है।’ आर्य सुमति ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘हाँ। जब असुर वृत्र ने वरुण को बंदी बना लिया तो सोम असुर वृत्र की क्रूरता से भयभीत होकर देवताओं का साथ छोड़कर अंशुमती के तट पर जा छिपा था।’ [6]  सोम का पुरोहित होने के कारण देवगुरु वृहस्पति को भी उसके साथ जाना पड़ा। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आर्य सुमति से सहमति व्यक्त की।

  – ‘यहाँ तक तो ठीक है ऋषिवर किंतु इन्द्र के पुनः-पुनः आह्वान करने पर भी सोम ने पुनः देवों के साथ चलना स्वीकार नहीं किया। इसका क्या कारण था ? क्या सोम देवों से रुष्ट हो गया था ?’ आर्य सत्य ने शंका व्यक्त की।

  – ‘नहीं आर्य! सोम देवों से रुष्ट नहीं हुआ था। उसने समझा कि मायावी वृत्र ही इंद्र का रूप धारण करके आया है। इसलिये वह इंद्र से युद्ध के लिये सन्नद्ध हो गया।’

  – ‘क्या देवगुरु ने सोम को इन्द्र का परिचय नहीं दिया ? वे भी तो सोम के साथ थे।’     

– ‘देवगुरु वृहस्पति ने सोम को इन्द्र का परिचय दिया किंतु सोम यही समझता रहा कि देवगुरु को भ्रम हुआ है। वास्तव में वह इंद्र नहीं वृत्र है। अतः वह इंद्र के साथ चलने को तैयार नहीं हुआ।’  

  – ‘फिर क्या हुआ ऋषिश्रेष्ठ ?’ आर्य सुरथ के चार वर्षीय पुत्र सौभरि ने कथा को रुका हुआ जानकर जिज्ञासा व्यक्त की।

विपत्ति काल होने पर भी बालक सौभरि की तुतलाती वाणी में प्रकट हुई चिंता को लक्ष्य करके समस्त आर्य हँस पड़े। क्षण भर को वे अपनी चिंता भूल गये।

  – ‘फिर यह हुआ बाल-ऋषि सौभरि कि सोम अंशुमती के तट को असुरक्षित जानकर चंद्रमा में जा छिपा।’ ऋषि श्रेष्ठ ने बालक सौभरि की तरह वाणी में तुतलाहट लाकर कहा।

  – ‘वह चंद्रमा में जाकर क्यों छिप गया ? बालक सौभरि को इस नवीन कथा में बड़ा आनंद आ रहा था। उसका बाल-मन चाह रहा था कि वह भी चंद्रमा में जाकर छिप जाये और माता उसे खोजती फिरे। यदि ऐसा हो तो कितना आनंद हो! सौभरि की माता ने उसे चुप रहने के लिये कहा।

  – ‘चंद्रमा के ही सदृश शुक्ल वर्ण होने के कारण सोम सरलता से उसमें छिप गया। सोम के फिर से लुप्त हो जाने पर समस्त देवों की समिति हुई और वे फिर से सोम को खोजने निकल पड़े। अन्ततः देवों ने चन्द्रमा में छिप कर बैठे सोम को देख ही लिया। समस्त देवों ने चन्द्रमा को घेर कर शोर मचाया- देख लिया-देख लिया। इस पर सोम ने अपने शरीर पर भस्म आच्छादित कर लिया और दीर्घकाल तक तीर्थों में रहकर तपस्या की। तप-बल से तेज प्राप्त करके वह आकाश के मध्य भाग में प्रकाशित हुआ तथा स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य स्थित रहकर योग सम्पत्ति से नाना प्रकार के रस स्वरूप को धारण करता हुआ पुनः देवों को प्राप्त हुआ।’ ऋषिश्रेष्ठ ने संक्षेप में सोम की पुनप्र्राप्ति की कथा पूरी की।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ आर्यों को सोम की प्राप्ति कैसे हुई ? आर्या स्वधा ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘महाजलप्लावन के पश्चात आर्य मनु की नौका मनोरवसर्पण [7] पर्वत पर आकर रुकी। वहाँ किसी वनस्पति, पक्षी अथवा पशु आदि किसी भी जीव का चिह्न नहीं था। दीर्घ समय तक देवपुत्र मनु उस विकट पर्वतीय प्रदेश में एकाकी विचरण करते रहे। पायमेरू [8] से कुछ नीचे उतरने पर देवपुत्र मनु ने वहाँ त्रिविष्टप [9] अर्थात् तीन वनस्पतियों के दर्शन किये- कुष्ठ, अश्वत्थ तथा सोम। उन्हीं तीन वनस्पतियों को लेकर मनु सरस्वती के तट पर उतर आये और धरित्री पर यज्ञ आरंभ किया। मनु ने प्रजापति बनकर जब प्रजा की रचना की तब प्रजाजनों का परिचय सोम से करवाया। तब से सोम आर्यों के साथ है।’ क्षण भर के लिये विराम देकर ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने पुनः समिति को सम्बोधित किया-

  – मनुपुत्रो! वही दिव्य सोम आज फिर से विलुप्त हो गया है किंतु इस बार की परिस्थिति भिन्न प्रकार की है। सोम असुरों के भय से लुप्त नहीं हुआ है अपितु असुर ही उसका अपहरण करके ले गये हैं। उन्होंने समस्त सोम वल्लरियों को कुचल कर नष्ट कर दिया है। हमें फिर से सोम को प्राप्त करना होगा।’

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ! सरस्वती से लेकर शतुद्रि, विपासा, परुष्णि, असिक्नी, वितस्ता तथा सिंधु के तटों पर आर्यों के कई जन स्थित हैं। मैं आर्य सुनील तथा कुछ अन्य आर्य वीरों को लेकर दूरस्थ आर्य जनों से सम्पर्क करता हूँ और सोम का पुनः आह्वान कर उसे प्राप्त करने का प्रयास करता हूँ।’ गोप सुरथ ने समिति के समक्ष प्रस्ताव रखा।

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा तथा अन्य ऋषियों ने आर्य सुरथ के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इसके बाद विचार पुनः असुरों के दुष्कृत्य पर आकर केंद्रित हो गया।

  – ‘सोम की प्राप्ति के पश्चात् असुरों के दलन का कोई उपाय किया जाना चाहिये।’ आर्य अतिरथ ने प्रस्ताव रखा।

  – ‘असुरों का दलन सहज नहीं है। वे संख्या में इतने अधिक हैं कि उन्हें नष्ट करने में शताधिक वर्ष लग जायेंगे।’ ऋषि पर्जन्य ने अपना मत प्रस्तुत किया।

  – ‘इसका अर्थ हुआ कि हम सदैव असुरों से त्रस्त रहेंगे। वे मदमत्त महिष की भांति आर्यजनों में प्रवेश कर उत्पात मचाते रहेंगे!’ आर्या स्वधा ने ऋषि पर्जन्य के मत से असहमत होते हुए कहा।

  – ‘ हमें असुरों पर अंकुश लगाने के लिये निरंतर प्रयत्नरत रहना होगा किंतु वर्तमान परिस्थितियों में उनका पूर्ण रूपेण दलन आर्यों के लिये संभव नहीं है।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने ऋषिवर पर्जन्य के मत का समर्थन किया।

  – ‘यदि वर्तमान परिस्थितियाँ आर्यों की अपेक्षा असुरों को बलवान बनाती हैं तो हमें वर्तमान परिस्थितियों को बदलने का प्रयास करना चाहिये।’ आर्या समीची ने अपना मत प्रकट किया।

  – ‘निःसंदेह आर्या समीची का मत स्वागत योग्य है। आर्यों को भावी रणनीति निश्चित करते समय इसी तथ्य पर केंद्रित रहना होगा।’ ऋषि सौम्यश्रवा ने आर्यों का आह्वान किया।

  – ‘किंतु देव यह समय असुरों पर अंकुश लगाने पर विचार-विमर्श का नहीं है। इस समय तो हमें प्रयास करना चाहिये कि शीघ्र से शीघ्र सोम प्राप्त किया जा सके।’ अम्बा अदिति ने कहा। समिति का समापन इसी निश्चय के साथ किया गया।

– अध्याय 12, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] पत्तों से बनी हुई झौंपड़ी

[2] लघु सम्मेलन के लिये ‘गोष्ठि’ शब्द का प्रयोग होता था।

[3] वैदिक साहित्य में सभा और समिति का अनेक स्थानों पर उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद में एक स्थान पर सभा की वार्ता का विषय गायें और उनकी उपयोगिता है (ऋ.  7. 28. 6), दूसरे स्थान पर सभा में होने वाले द्यूत का उल्लेख है (ऋ. 10. 34. 6), अन्य तीसरे स्थान पर अश्व अथवा रथ पर आरूढ़ होकर जाते हुए एक सभासद का उल्लेख है। (ऋ. 8. 4. 9) ऋग्वेद में एक स्थान पर एक राजा समिति के सदस्यों से कहता है कि मैं तुम्हारा विचार और तुम्हारी समिति स्वीकार करता हूँ। अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है। (सभा च समिति श्चावतां प्रजापते दु हितरौ संविधाने। अथर्ववेद-7.12.1)

[4] प्रातःकाल में जब गौएं विचरण हेतु वन को जाती हैं एवं सांयकाल में पुनः ग्राम को लौटती हैं तब उनके पदाघात से धूलिकण वायु में प्रसारित होकर आकाश में छा जाते हैं, इन्हीं दोनों समय को गौधूलि बेला कहा जाता है।

[5] जो लोग यज्ञ हेतु समिधा एवं अन्य सामग्री का प्रबंध करते थे उन्हें हव्यवाहक कहा जाता था।

[6] इस घटना का उल्लेख ऋग्वेद (8.94.100), एतरेय ब्राह्मण (3/14, 1/13, 1/191/4) तथा जैमिनी ब्राह्मण (3/15) में भी हुआ है।

[7] यह हिमालय पर्वत की ऊँची चोटी पर स्थित है।

[8] पामीर।

[9] तिब्बत।

पर्वतीय उपत्यकाओं की ओर (13)

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पर्वतीय उपत्यकाओं की ओर

कितने-कितने विचारों में डूबता-तैरता प्रतनु सिंधु का तट छोड़कर वायव्यकोण में स्थित सुदूर पर्वतीय उपत्यकाओं की ओर अपना उष्ट्र हांके ले जा रहा है।

व्यथित, क्रोधित, लांछित और कुण्ठित है प्रतनु! कहाँ जाये वह! किसे मुँह दिखाये अपना! क्या करेगा प्रतनु अपने पुर लौट कर भी! कोई गौरव-गाथा नहीं उसके पास स्वजनों को सुनाने के लिये। इस तरह प्रताड़ित होकर अपने पुर को लौट जाना श्रेयस्कर नहीं जान पड़ा उसे। जिस उत्साह के बल पर वह विकट मरूस्थल को एकाकी ही लांघ आया था।

वह उत्साह आज नहीं है। क्या आशा और क्या लक्ष्य लेकर लौटे वह अपने पुर को ? दीर्घ यात्रा के पश्चात अपने पुर को लौटने वाले अपने साथ कुछ अर्जित करके लौटते हैं। उसने क्या अर्जित किया है ? लांछन! अपमान! प्रताड़ना! निष्कासन! जन साधारण के समक्ष तो यही अपवाद प्रकट होंगे। किसको बता सकेगा वह कि लांछन और अपमान नहीं, उसने देवी रोमा का विश्वास और प्रेम अर्जित किया है! प्रेम तो वैसे भी सर्वथा गोप्य है।

कितने-कितने विचारों में डूबता-तैरता वह सिंधु का तट छोड़कर वायव्यकोण [1] में स्थित सुदूर पर्वतीय उपत्यकाओं की ओर अपना उष्ट्र हांके ले जा रहा है। चलते-चलते दिन बीत गया। वह स्वयं नहीं समझ पा रहा कि वह इस दिशा में क्यों आगे बढ़ता जा रहा है।

मार्ग में बार-बार आने वाली जलधाराओं के विचार से शकट को उसने मोहेन-जो-दड़ो में ही त्याग दिया है। कौनसे उसे मधु और भुने हुए यव ढोने हैं इस बार जो शकट की आवश्यकता हो। फिर भी उसने कुछ जल लघु-घटों में भरकर उष्ट्र की पीठ पर लटका लिया है। मार्ग में फलों के वृक्ष तो फिर भी मिल जाते हैं किंतु जल तो प्रत्येक स्थान पर नहीं मिलता। कौन जाने उसे कितने मास ऐसे ही चलते रहना पड़े।

आज नहीं तो कल यह विवरण प्रतनु के पुर तक पहुँच ही जायेगा कि उसे राजधानी मोहेन-जो-दड़ो से निष्कासित किया गया है और दो वर्ष तक उसका राजधानी में प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया है। कैसे सामना कर सकेगा वह स्वजनों की व्यंग्य भरी

आंखों का! नहीं, इस दैन्य अवस्था में स्वजनों के बीच जाकर रहने से तो अनजाने व्यक्तियों के बीच चलकर रहना अधिक श्रेयस्कर है। जहाँ कोई कुछ नहीं जानता हो। न उसके सम्बन्ध में न उसके अपवाद के सम्बन्ध में।

प्रतनु ने सुना है कि सिंधु के पश्चिम में स्थित विशाल मैदानों में असुरों के पुर हैं। असुरों की तरफ वह जा सकता है, उनकी भाषा से भी परिचित है वह किंतु उसे असुरों का मदिरा सेवन और मांस भक्षण पसंद नहीं। मदमत्त असुरों का दिन रात झगड़ते रहना भी काफी कष्टदायक है। उनके बीच रहना सुविधाजनक नहीं होगा उसके लिये।

यदि वह सिंधु के तट पर उत्तर की ओर बढ़ता जाता है तो पर्ण-कुटियों से युक्त आर्यों के जन मिलेंगे। आर्य जनों की ओर जाना उसने उचित नहीं जाना। उन्हें तो वह बचपन से ही शत्रु मानता आया है। आर्यों की तरफ जाने का अर्थ है उनका दास बनकर रहना जो कि स्वतंत्रचेता प्रतनु के लिये संभव नहीं। यदि वह उत्तर पश्चिम की पर्वतीय उपत्यकाओं की ओर जाता है तो उसे नागों के पुर मिलेंगे। द्रविड़ों के पुरों से अधिक सम्पन्न किंतु अत्यंत लघु।

उसने नागों के बारे में सुना बहुत है किंतु कभी देखा नहीं उन्हें। क्यों नहीं वह नागों की ओर चले। नागों के पुरों को देखे। सुना है नागों ने शिल्पकला का अच्छा विकास किया है, सैंधवों से भी उन्नत है उनका शिल्प। शिल्प ही क्यों, उसने तो यह भी सुना है कि नागों ने गायन, वादन और नृत्य कलाओं में भी अच्छी उन्नति की है।

प्रतनु के पुर की ओर आने वाले पणि-सार्थों में सम्मिलित सैंधवों से ही सुना है प्रतनु ने कि नागलोक के पुरों का शिल्प और वैभव, नष्ट हो चुके देव लोक से भी अधिक उन्नत है। गायन, वादन एवं नृत्य कलाओं में वे इतने प्रवीण हैं कि यक्षों, गंधर्वों और किन्नरों से स्पर्धा कर सकने में सक्षम हैं।

पशुपति महालय से निकलते समय जो निराशा उसके मन में छाई थी, वह रोमा से हुई भेंट के बाद किसी सीमा तक दूर हो गयी है। कल के नैराश्य का स्थान प्रतिशोध ने ले लिया है। दृढ़ निश्चय कर चुका है प्रतनु इस अपवाद के परिष्कार का। उसकी शिराओं में यशस्वी सैंधवों का रक्त है, इस तरह दैन्य धारण करके जीवित रहने वालों में नहीं है वह।

दो वर्ष! केवल दो वर्ष की ही तो बात है। वह फिर लौटेगा मोहेन-जो-दड़ो को। प्रतिशोध लेगा वह अपने अपमान का। चुनौती देगा वह किलात को और उसकी सम्पूर्ण सत्ता को। क्या समझता है वह स्वयं को! जो कुछ भी वह कह देगा, वही न्याय है ? जो कुछ वह सुना देगा, वही दण्ड है ?

रोमा के प्रति क्रोध नहीं है उसे। वह अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुकी है। उसने भावुकता के वशीभूत होकर अभियोग की बात की और किलात ने चतुराई से अपना कण्टक दूर कर लिया। कोई बात नहीं किलात! दो वर्ष का समय भी कोई अधिक समय नहीं होता। मैं फिर लौटूंगा और भस्मीभूत कर दूंगा तेरी सत्ता को। शकट में बैठे-बैठे ही उसने आवेश से अपनी मुट्ठी हवा में लहराई।

– अध्याय 13, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] उत्तर-पश्चिम दिशा।

गोष्ठी (14)

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गोष्ठी

मंद गति से विचरण करता हुआ निशीथ अंतरिक्ष के मध्य में आ बैठा था। दो प्रहर रात्रि व्यतीत हुई जान कर गोष्ठी विसर्जित की गयी।

परुष्णि के तट पर आर्यों की सांध्यकालीन गोष्ठी जुड़ी है। आर्य सुरथ और आर्य सुनील अन्य आर्यवीरों के साथ सोम की खोज में गये थे किंतु वहाँ से न केवल निष्फल होकर लौटे हैं अपितु अत्यंत चिंताजन्य समाचार लेकर आये हैं।

असुरों ने न केवल परुष्णि के तट से अपितु समस्त पुण्य सलिलाओं के तटों से खोज-खोजकर सोम वल्लरियों को नष्ट कर दिया है और इस जन की भांति अन्य आर्य-जन भी सोम के अभाव में श्री विहीन होकर रह गये हैं। कहीं भी अग्नि को सोम की आहुति नहीं दी जा रही है। सोम पान कर अग्नि एवं अन्य देवों की भाँति परिपुष्ट रहने वाले आर्य सोम के लुप्त हो जाने पर क्षीण बल होकर अत्यंत व्याकुल अवस्था में यत्र-तत्र सोम को खोजते फिर रहे हैं।

आर्य सुरथ यह भी समाचार लाये हैं कि कुछ आर्य-यूथ त्रिविष्टप तथा मनोरवसर्पण तक हो आये हैं किंतु कहीं भी सोम को प्राप्त नहीं किया जा सका है। सोम को नष्ट करने के लिये असुरों ने विशाल व्यूह रचना की। उन्होंने इस दुष्कृत्य में दैत्यों, दानवों, यतियों, राक्षसों, दस्युओं को भी सम्मिलित किया और एक साथ घात लगाकर सोम वल्लरियाँ नष्ट कर दीं।

  – ‘सोमविहीन आर्यों का जीवन कैसा होगा ऋषिवर!’ भय और आशंकाओं से पूरित-कम्पित हृदय से अम्बा अदिति ने प्रश्न किया।

  – ‘सोमविहीन आर्यों का बल हर प्रकार से क्षीण हो जायेगा।’ असुर आदि तामसी प्रजायें आर्यों को और अधिक त्रस्त करेंगी। उनका प्रतिरोध करने के लिये आर्यों में भी तामसी वृत्ति जन्म लेगी और सोम से विमुख हुए यज्ञ में आसुरी कर्मकाण्ड प्रारंभ हो जायेंगे।’ श्रषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा जैसे वर्तमान की सीमा को लांघकर भविष्य के किसी छोर से बोल रहे थे।

भविष्य का भयावह चित्र देखकर अमंगल की आशंका से आर्यों के गात्र रोम कण्टकित हो गये। बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला। अंत में आर्य सुरथ ने ही मौन भंग किया।

  – ‘इस संकट के निवारण का उपाय क्या है ऋषिश्रेष्ठ ?’

  – ‘प्रत्येक संकट का निवारण नहीं होता आर्य। कुछ संकट ऐसे भी होते हैं जो स्थायी रूप से स्थापित हो जाते हैं। यह संकट ऐसा ही है।’

  – ‘आपकी गति तो भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में निर्विघ्न रूप से होती है। क्या आपने भविष्य के गर्भ में इस संकट को सदैव के लिये स्थापति हुआ देखा है ?’

  – ‘हाँ पुत्र! मैंने ध्यानावस्थित अवस्था में प्राणों को देह से विलग करके तीनों कालों की यात्रा की है। मैंने बहुत सी विचित्र बातें भविष्य के गर्भ में देखी हैं।’

  – ‘क्या कहीं सोम दिखाई दिया ऋषिवर ?’ आर्या स्वधा ने व्यग्रता से प्रश्न किया।

  – ‘हाँ पुत्री! मुझे सोम दिखायी दिया।’ ऋषिश्रेष्ठ ने मंद स्मित के साथ कहा।

  – ‘क्या सोम फिर प्रकट होगा देव ?’

  – ‘अब सोम का प्राकट्य किसी वल्लरी में नहीं होगा।’

  – ‘फिर उसे मनुज कैसे प्राप्त करेंगे ?

  – ‘अपने हृदय में।’

  – ‘अपने हृदय में!’

  – ‘हाँ अपने हृदय में। जब-जब मनुष्य सुकृत्य करेगा तब-तब मनुष्य के हृदय में सोम प्रकट होगा और जब-जब मनुष्य आसुरि भाव ग्रहण करेगा, सोम विलुप्त हो जायेगा।’

  – ‘तो क्या अब सोम की आहुति यज्ञ में नहीं दी जा सकेगी ?’

  – ‘अब सोम की आहुति यज्ञ में नहीं मनुष्य के कर्म में होगी। सद्कर्म ही मनुष्य का सबसे बड़ा यज्ञ होगा। समय परिवर्तन शील है। आने वाले युग का यही प्रचलन होगा।’

  – ‘तो क्या अब यज्ञ समाप्त हो जायेंगे ?’

  – ‘यज्ञ समाप्त नहीं होंगे किंतु उनका स्वरूप परिवर्तित हो जायेगा।’

  – ‘कृपया स्पष्ट करके कहिये देव! आप भविष्य के गर्भ में क्या देख रहे हैं ?’

  – ‘मैं देख रहा हूँ कि जो सरस्वती प्रलय काल में मार्कण्डेय ऋषि के पीछे चलते हुए अपने वर्तमान पथ पर प्रवाहित हुई। वही सरस्वती फूटी हुई नौका के समान रेत के समुद्र में विलीन हो रही है।’

  – ‘सरस्वती रेत के समुद्र में विलीन हो रही है!’ आश्चर्य सेे समस्त आर्यों के मुख खुले के खुले रह गये।

  – ‘हाँ भविष्य में सरस्वती के तट निर्जन हो जायेंगे।’

  – ‘किंतु क्यों ?’

  – ‘असुरों के अनाचार बढ़ जाने से चर्मण्यवती अपना प्रवाह बदल कर विपरीत दिशा में बहने लगेगी। चर्मण्यवती से बचने के लिये सरस्वती को भी अपना मार्ग बदलना होगा और इसी प्रयास में वह यमुना में जा कूदेगी। जिस प्रकार यम मनुष्यों के प्राण हर लेता है उसी प्रकार यम-भगिनी यमुना सरस्वती के प्राण हर लेगी।’

  – ‘और द्रुमकुल्य ? उसका क्या होगा ?’

  – ‘द्रुमकुल्य का मधुर जल पथ भ्रष्ट होकर लवण सागर में जा समायेगा और आज जहाँ दु्रमकुल्य है वहाँ भयानक मरूस्थल फैल जायेगा।’

  – ‘क्या एक बार पुनः जलप्लावन होगा ऋषिवर।’

  – ‘जल प्लावन होगा किंतु वैसा नहीं जैसा वैवस्वत मनु के समय में हुआ था। यह प्लावन शनैः-शनैः होगा।’

  – ‘सरस्वती और द्रुमकुल्य के तटों पर निवास करने वाले आर्य जन और ऋषिगणों का क्या होगा ?’

  – ‘जिस प्रकार जलारोहण करने वाले यात्री फूटी हुई नौका का त्याग करके दूसरी नौका में जा बैठते हैं, उसी प्रकार सरस्वती के तटों पर रहने वाले आर्य जन और ऋषिगण सरस्वती के तटों का त्याग करके गंगा और यमुना के तटों पर जा बसेंगे। तब आर्य सप्त सैंधव तक सीमित न रहकर चारों दिशाओं में फैल जायेंगे।’

  – ‘आर्यों के चारों दिशाओं में फैल जाने पर आर्येतर प्रजाओं का क्या होगा ?’

  – ‘उस काल में यक्ष, गंधर्व, किरात और किन्न्र आदि आर्येतर प्रजायें आर्यजनों में ही समाहित हो जायेंगी। अन्य प्रजायें अपना वर्तमान स्वरूप खोकर किसी अन्य रूप में संगठित होंगी।’

  – ‘और उस काल के यज्ञ-हवन कैसे होंगे ?

  – ‘मैंने कहा न पुत्री! उस काल में यज्ञ-हवन के स्थान पर कर्मकाण्ड का प्रसार हो जायेगा। अधिकांश कर्मकाण्ड लोभी ब्राह्मणों द्वारा यजमान का धन अपहरण करने के लिये चलाये जायेंगे। कुछ श्रेष्ठ ब्राह्मण ही ऐसे होंगे जो आर्यों को उचित मार्ग दिखायेंगे। ये श्रेष्ठ ब्राह्मण क्षत्रियों के सहयोग से आर्य संस्कृति का बदला हुआ स्वरूप बनाये रख सकेंगे।’

  – ‘क्षत्रिय! क्षत्रिय कौन ?’

  – ‘आर्य संस्कृति को बचाने के लिये भविष्य में कुछ श्रेष्ठ ब्राह्मण मिलकर एक विशाल यज्ञ करेंगे जिनसे क्षत्रिय-कुलों की उत्पत्ति होगी। [1] ये क्षत्रिय शस्त्रों के बल पर आर्य संस्कृति की रक्षा करेंगे।’

 – ‘तब सत्प्रवृत्ति और देव सम्मत विधि-विधान का क्या होगा ?’

  – ‘सत्प्रवृत्ति और देव सम्मत विधि-विधान शुभकर्मों में समाहित हो जायेंगे। जो श्रेष्ठ जन परोपकार को लक्ष्य बनाकर शुभ कर्म करेंगे, उन्हें शताधिक अश्वमेध यज्ञों का पुण्य प्राप्त हुआ करेगा।’

  – ‘क्या भविष्य में आज की भांति के यज्ञ-हवन होंगे ही नहीं ? यज्ञ विहीन आर्यजनों की कल्पना कर सकना आर्या स्वधा के लिये संभव नहीं हो पा रहा था।

  – ‘होंगे किंतु उनका स्वरूप और लक्ष्य आज की तरह देव संतुष्टि न होकर स्वार्थ पूर्ति मात्र होगा। यज्ञों में आर्यों द्वारा परिश्रम से अर्जित ब्रीहि, शालि मधु, घृत, दुग्ध, पत्र-पुष्प, फल आदि द्रव्यों के स्थान पर पशुओं की बलि दी जायेगी तथा उनकी मज्जा बलिभाग के रूप में देवों, ऋत्विजों और यजमानों को प्राप्त होगी।’

ऐसे वीभत्स यज्ञों की कल्पना से आर्य जन सिहर उठा।

  – ‘ यज्ञ वेदि के निकट पशुवध! यह कैसा यज्ञ होगा देव! बलि भाग के रूप में प्राप्त पशुमज्जा से क्या देवगण संतुष्ट हो पायेंगे ?

  – ‘निर्बल देवगण पशुमज्जा को बलि भाग में पाकर संतुष्ट नहीं होंगे इसीसे उनका बल निरंतर छीजता हुआ एक दिन पूरी तरह समाप्त हो जायेगा। कुछ देव असुरों में परिवर्तित हो जायेंगे अथवा आसुरि प्रवृत्तियों को धारण करने लगेंगे तब आर्य जन देवों के विरुद्ध संगठित होकर नवीन पूजा पद्धतियों को अपनायेंगे। व्रात्यों, द्रविड़ों और असुरों की पूजा पद्धतियाँ ही अधिकतर प्रचलन में आ जायेंगी।’

मंद गति से विचरण करता हुआ निशीथ अंतरिक्ष के मध्य में आ बैठा था। दो प्रहर रात्रि व्यतीत हुई जान कर गोष्ठी विसर्जित की गयी। यह प्रथम अवसर था जब आर्यों की गोष्ठी का विसर्जन भय, आशंका और विचित्र अमंगल कल्पनाओं के बीच हुआ।

– अध्याय 14, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] एक बार ऋषियों ने आबू पर्वत पर विशाल यज्ञ किया। माना जाता है कि वसिष्ठ ऋषि ने इस यज्ञ की अग्नि से चार पुरुषों का निर्माण किया जिनसे प्राचीन भारतीय क्षत्रियों के चार वंश उत्पन्न हुए।

मायावी स्त्रियाँ (15)

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मायावी स्त्रियाँ

प्रतनु के मस्तिष्क में बार-बार यह शंका उत्पन्न हो रही थी कि कहीं ये मायावी स्त्रियाँ उसके नेत्रों पर वस्त्र बांध कर उसे पर्वत से नीचे धकेलने तो नहीं ले जा रहीं। वरुण देव ही जानें क्या माया है ?

कई दिवसों से पर्वत उपत्यकाओं में निरूद्देश्य सा भटकता रहा है प्रतनु। मोहेन-जो-दड़ो से यहाँ तक की दीर्घ यात्रा में उसका उष्ट्र थक कर चूर हो गया है, उसे कुछ विश्राम देना आवश्यक है। अब तक मरू प्रदेश और समतल मैदानों में उष्ट्र पर्याप्त उपयोगी रहा है किंतु प्रर्वतीय प्रदेश में यह नितांत अनुपयोगी है। नागों के पुरों तक पहुँचने के लिये पर्वत शृंखला को पार करना आवश्यक है। निश्चित ही उसे या तो उष्ट्र त्याग देना होगा या फिर पर्वतीय प्रदेश को पार करने का निश्चय त्यागना होगा।

पर्याप्त चिंतन के पश्चात् कुछ दिनों के लिये यहीं विश्राम करने का निर्णय लिया प्रतनु ने। पर्वतों से बहकर आने वाले एक झरने के पास ही उसने सुविधाजनक स्थान देखकर अपने उष्ट्र को बांध दिया है जहाँ उसके लिये पर्याप्त तृण है और स्वयं दिन भर इस पर्वत पर चढ़कर पैदल ही घूमता रहता है।

कौन जाने निकट ही नागों का कोई पुर हो। वन्य पशु उष्ट्र को कभी भी अपना आहार बना सकते हैं। मरूस्थल में हिंस्रक पशुओं का खतरा नहीं था किंतु यह तो पर्वतीय प्रदेश है। यहाँ सिंह एवं व्याघ्र आदि विचरण करते होंगे किंतु भाग्य पर भरोसा करने के अतिरिक्त उपाय ही क्या था!

पर्वतीय उपत्यकाओं में विचरण करते हुए उसे तीन दिन हो गये। पर्वतीय पगडण्डियाँ इस बात की प्रमाण हैं कि इस ओर कोई न कोई स्त्री-पुरुष विचरण करते रहे हैं किंतु जब कई दिनों तक विचरण करने पर भी उसे कोई नाग, असुर, दैत्य, दानव, अथवा आर्य नहीं मिला तो उसने अनुमान लगाया कि यहाँ विचरण करने वाले स्त्री-पुरुष या तो किसी विशेष ऋतु में इस ओर आते हैं अथवा किसी कारण से यह प्रदेश छोड़कर चले गये हैं और अब यह प्रदेश पूर्णतः निर्जन है।

संभव है कि नागों के पुर कुछ और अधिक ऊँचाई पर हों । यदि यात्रा पर आगे बढ़ना है तो उष्ट्र का मोह त्याग देना होगा और यहाँ से पैदल ही चलना होगा। यह विचार कर उसने एक लघु जल घट अपने कंधे पर लटकाया और उष्ट्र को बंधन से मुक्त कर दिया।

दो दिन लगातार ठीक उत्तर की ओर बढ़ता रहा प्रतनु। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता जाता था। पर्वतों की चोटियाँ अधिक नुकीली होती जाती थीं। वनस्पतियाँ भी नितांत अपरिचित हो गयी थीं किंतु पगडण्डियाँ और अधिक स्पष्ट होती जा रही थीं। प्रतनु को विश्वास हो चला था कि एक-दो दिवस में ही उसकी भेंट किसी स्त्री-पुरुष से हो सकती है। संभवतः नागों से ही।

इस समय सूर्य देव पश्चिम में पहुँच चुके थे किन्तु संध्या के आगमन में पर्याप्त समय था फिर भी इस पर्वतीय प्रदेश में पर्याप्त अंधेरा हो चला था। रात्रि विश्राम के लिये कोई उचित स्थान खोजता हुआ प्रतनु बांसों के एक झुरमुट को पार करके थोड़ा ही आगे बढ़ा था कि उसे आसपास किसी के होने का अनुमान हुआ।

यह एक अद्भुत संयोग ही था कि अभी तक उसकी भेंट किसी सिंह अथवा व्याघ्र से नहीं हुई थी। प्रतनु के पीछे की ओर सरसराहट हुई । उसने पीछे घूमकर देखा। एक नहीं, दो नहीं पूरी पाँच स्त्रियाँ उसके पीछे थीं। अब तक तो वे विशाल वृक्षों की ओट में छिपकर चलते रहने के कारण प्रतनु की दृष्टि में नहीं पड़ी थीं किंतु बांसों के विरल झुरमुट के कारण वे अपने आप को प्रतनु की दृष्टि से छिपाने में असमर्थ रहीं थीं। देहयष्टि से वे नागकन्यायें ही ज्ञात होती थीं किंतु उनकी वेशभूषा अत्यंत मायावी जान पड़ती थी।

अपनी उपस्थिति अप्रकट न रही जानकर वे पाँचों नागकन्यायें निःसंकोच प्रतनु के निकट चली आईं।      

  – ‘कौन हो तुम? मेरा पीछा क्यों कर रही हो ?’

  – ‘हम जो भी हैं, तुम इस निर्जन वन में क्या कर रहे हो ?’ उन्होंने प्रतनु के प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर प्रतनु से ही प्रश्न कर लिया। उन्हें निर्भय होकर संवाद करती देखकर प्रतनु को विश्वास हो गया कि ये इसी प्रदेश में वास करती हैं। निश्चय ही वह नागों के किसी पुर के निकट आ पहुँचा है।

  – ‘पथिक हूँ।’ प्रतनु ने उत्तर दिया।’

  – ‘कहाँ की यात्रा पर हो ?

  – ‘ नहीं जानता कि मैं कहाँ की यात्रा पर हूँ।’

  – ‘विचित्र बात है! पथिक हो किंतु यह नहीं जानते के कहाँ की यात्रा पर हो!’

  – ‘जहाँ भी ये पर्वतीय पगडण्डियाँ ले जायेंगी वहीं चला जाऊंगा किंतु आप लोग कौन हैं, अपने बारे में नहीं बताया आपने!’

  – ‘क्या करेंगे हमारे बारे में जानकर ? एक नाग युवती ने रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए कहा तो उसके साथ की अन्य युवतियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं। बहुत दिनों में प्रतनु ने किसी स्त्री की हँसी सुनी थी। रोमा का स्मरण हो आया उसे। यद्यपि प्रतनु ने रोमा को खिलखिलाकर हँसते हुए नहीं सुना था किंतु उसने अनुमान किया कि यदि रोमा खिलखिलाकर हँसती तो ऐसे ही हँसती।

  – ‘बताया नहीं तुमने युवक कि हमारे बारे में जानकर क्या करेंगे आप।’

  – ‘और कुछ नहीं तो इतना तो अवश्य करूंगा ही कि आपसे किसी पुर का मार्ग पूछूंगा।’

  – ‘किस पुर का ? हमारे पुर का ?’ नागकन्याऐं फिर खिलखिलाने लगीं।

  – ‘नहीं, आपके पुर का क्यों ? किसी अन्य पुर का।’

  – ‘अन्य पुरों में हमसे भी अधिक रमणीय युवतियाँ रहती हैं क्या ?’

प्रतनु ने यह तो सुना था कि नागकन्यायें अधिक चंचल होती हैं किंतु परिचय के प्रथम सत्र में ही वे इस तरह उपहास कर सकती हैं, इसका उसे अनुमान न था।

  – ‘मुझे रमणीय युवतियों के पुर का नहीं नागों के किसी भी पुर का मार्ग बता दें तो बड़ी कृपा होगी आपकी।’

  – ‘यदि रमणीय युवतियों के पुर का मार्ग बता दें तो वहाँ नहीं जाओगे युवक? भय लगता है रमणीय स्त्रियों से!’

नागकन्याओं की बात सुनकर प्रतनु को भ्रम हुआ कि हो न हो, ये नाग कन्यायें न होकर किन्नरियाँ हैं जो भोले-भाले युवकों को मधुर वार्ताओं से रिझा कर अपने लोक में ले जाती हैं और बलपूर्वक अपने साथ रखती हैं। ऐसी किन्नरियों और विद्याधरियों की कथायें प्रतनु के पुर में बड़े चाव से कही-सुनी जाती हैं। नहीं-नहीं इनकी देहयष्टि तो नागकन्याओं जैसी ही है। किन्नरियों और विद्याधरियों के प्रदेश तो यहाँ से सहस्रों योजन दूर हिमाच्छादित पर्वत शिखरों पर हैं। यह प्रदेश तो नागों का है। प्रतनु ने देखा, युवतियाँ उसी को लक्ष्य करके हँस रही हैं।

  – ‘किस भ्रम में पड़ गये पथिक ?’ अधिक चंचल जान पड़ने वाली युवती ने प्रश्न किया।

  – ‘नहीं! मुझे किसी का भय नहीं। जब मैं हिंस्रक पशुओं का भय अनुभव नहीं करता तो रमणीय स्त्रियों से कैसा भय! किंतु आपको यह बताना होगा कि आप लोग हैं कौन?’

  – ‘हम लोग नहीं हैं, युवतियाँ हैं, रमणीय युवतियाँ ?’ उस युवती ने फिर से उपहास किया और शेष युवतियाँ फिर से खिलखिलाने लगीं।

  – ‘मैं जानना चाहता हूँ कि आप नागकन्यायें हैं, विद्याधरियाँ हैं, किन्नरियाँ हैं, अप्सरायें हैं ? कौन हैं ?’

  – ‘हम नागकन्यायें हैं पथिक। यहीं निकट ही हमारा पुर है। चलोगे हमारे पुर में ?’

  – ‘यदि आप ले चलेंगी तो अवश्य ही चलूंगा।’

  – ‘भय नहीं लगेगा ?’

  – ‘नहीं! भय कैसा ?’

  – ‘एक बार फिर से विचार कर लो पथिक।’

  – ‘इसमें कैसा विचार! मैं तो स्वयं ही किसी पुर की खोज में हूँ।’

  – ‘तुम्हें नेत्र बंद करके चलना होगा पथिक।’

  – ‘क्यों ?’

  – ‘हमारी रानी की ऐसी ही आज्ञा है।’

  – ‘रानी! रानी क्या ?’

  – ‘रानी नहीं जानते!’

  – ‘नहीं।’

  – ‘राजा तो जानते होंगे ?’

  – ‘हाँ मैंने सुना है कि कुछ प्रजाओं में मुखिया को राजा कहते हैं।’

  – ‘ठीक सुना है तुमने। जब मुखिया पुरुष होता है तो उसे राजा कहते हैं किंतु जब मुखिया स्त्री होती है तो उसे रानी कहते हैं।’

  – ‘कौन है तुम्हारी रानी ?’

  – ‘वह भी हमारी ही तरह रमणीय युवती है।’ फिर से खिलखिलाने लगीं वे सब।

प्रतनु को विश्वास हो गया कि ये मायावी स्त्रियाँ नागकन्यायें नहीं हैं, किन्नरियाँ अथवा विद्याधरियाँ हैं। उसे भुलावे में डालकर अपने साथ ले जाना चाहती हैं। जो भी हों ये! इनके साथ चलने में क्या हानि है ? यदि उसे बिना किसी प्रयास के किन्नर लोक अथवा विद्याधर लोक देखने को मिलता है तो बुरा क्या है ?

नागलोक ही जाया जाये ऐसा तो कोई आवश्यक नहीं। ऐसा विचार कर प्रतनु ने नेत्र बंद कर लिये। एक युवती ने उसके नेत्रों पर अपना वस्त्र बांध दिया और उसका हाथ पकड़ कर बोली- ‘चलिये पथिक महाशय।’ फिर से उनकी सम्मिलित खिलखिलाहट चारों ओर फैल गयी।

युवती के हाथ का स्पर्श पाकर फिर से रोमा का स्मरण हो आया प्रतनु को। कितना अच्छा होता यदि रूप का वह सागर इस निर्जन वन प्रदेश में उसके साथ होता। इन्हीं पर्वतों से शिलाखण्ड लेकर उसकी सहस्रों प्रतिमायें बना डालता वह।प्रतनु ने उस युवती का हाथ कसकर पकड़ लिया और एक-एक कदम बहुत संभाल कर धरने लगा।

उसके मस्तिष्क में बार-बार यह शंका उत्पन्न हो रही थी कि कहीं ये मायावी स्त्रियाँ उसके नेत्रों पर वस्त्र बांध कर उसे पर्वत से नीचे धकेलने तो नहीं ले जा रहीं। वरुण देव ही जानें क्या माया है ? सामान्य तौर पर अदृश्य शक्तियों पर विश्वास न करने वाले प्रतनु को भी आज वरुण देव का स्मरण हो आया।

‘जो होगा, देखा जायेगा’ के भाव से प्रतनु उसी तरह युवती के कोमल हाथ के बंधन में कसा हुआ चलता रहा जैसे विवश भ्रमर अपने लोभ के कारण कमल-पंखुरियों का बंधन स्वीकार कर लेता है।

  – ‘तुम्हारा नाम क्या है बाला ?’

  – ‘बाला नहीं, रमणीय युवती।’

  – ‘हाँ बाला नहीं, रमणीय युवती। नाम क्या है तुम्हारा ?

  – ‘निर्ऋति। स्मरण रख सकोगे!’

  – ‘हाँ-हाँ क्यों नहीं! निर्ऋति।’ दोहराया प्रतनु ने, ‘नाम तो तुम्हारा सुंदर है किंतु इतना कठिन क्यों है ?’

  – ‘इसलिये कि तुम्हारे जैसे पथिक उसे सरलता से स्मरण रख सकें।’ निर्ऋति ने हँसकर प्रत्युत्तर दिया और उसी के साथ समस्त युवतियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

  – ‘निर्ऋति! तुम्हारी सखियों के क्या नाम हैं।’

  – ‘क्या करोगे इस समय उनके नाम जानकर ? तुम्हारी आँखों पर तो वस्त्र बंधा हुआ है तुम्हें कैसे ज्ञात होगा तुम्हें कि मैं किसका क्या नाम बता रही हूँ।’

  – ‘विचित्र है तुम्हारी रानी भी। इस तरह पथिकों को पकड़वा कर बुलाती है।’

  – ‘पकड़वा कर नहीं पथिक। तुम स्वेच्छा से वहाँ जा रहे हो।’

  – ‘क्या नाम है तुम्हारी रानी का ?’

  – ‘तुम स्वयं ही चलकर पूछ लेना।’

  – ‘क्या रानी का नाम बताने का भी निषेध है तुमको ?

  – ‘बहुत उत्सुकता हो रही है पथिक हमारी रानी का नाम जानने की ?’ यह आवाज निर्ऋति की नहीं थी।

  – ‘रानी का नाम न सही, तुम अपना नाम बताओ।’

  – ‘मेरा नाम हिन्तालिका है पथिक। नेत्र खुलने पर पहचान सकोगे कि कौनसी हिन्तालिका है ?’

  – ‘हाँ! तुम्हारी आवाज से मैं तुम्हें पहचान लूंगा।’

  – ‘क्या अब तुम्हें हमारी रानी का नाम जानने की आवश्यकता नहीं रही ?’ निर्ऋति के हास्य से वे सब खिलखिलाने लगीं

  – ‘मैं स्वयं ही पूछ लूंगा। आपको कृपा करने की आवश्यकता नहीं है।’

  – ‘हाँ-हाँ। यही उचित होगा पथिक। तुम रानी मृगमंदा से पूछना कि तुम्हारा नाम क्या है।’ हिन्तालिका की व्यंजना पर वे सब फिर से खिलखिलाने लगीं। सचमुच ही इन्हें बातों से नहीं जीत सकता। प्रतनु ने अनुमान लगाया कि ये युवतियाँ पुरुषों से मुक्त वार्तालाप की अभ्यस्त हैं।

काफी देर तक घुमावदार पगडण्डियों पर चलने के बाद युवतियों ने प्रतनु के नेत्रों से वस्त्र हटाया। किंतु यह क्या ? वस्त्र हटने पर प्रतनु को कुछ भी दिखाई क्यों नहीं दे रहा ?

  – ‘मुझे कुछ भी दिखायी क्यों नहीं दे रहा ?’ प्रतनु का स्वर बता रहा था कि इस समय वह पर्याप्त विचलित है।

– ‘क्योंकि रात्रि हो चुकी है और चंद्रमा अभी उदित नहीं हुआ है।’ उसका हाथ पकड़ कर लाने वाली युवती ने उत्तर दिया।

  – ‘भयभीत मत हो वीर पथिक।’ निर्ऋति ने उपहास किया और फिर से वे सब खिलखिल करने लगीं। गाढ़े अंधेरे में पर्वत शिलाओं से प्रतिध्वनित होकर लौटती हुई खिलखिलाहट प्रतनु को अत्यंत ही रहस्यमय प्रतीत हुई। सचमुच ही भय लगने लगा प्रतनु को। कैसी लीला है यह ? कहीं कोई प्रेतलीला तो नहीं! उसने आकाश की ओर देखा किंतु वहाँ भी कुछ दिखाई नहीं दिया।

  – ‘अंतरिक्ष में नक्षत्र क्यों नहीं दिखाई देते ? प्रतनु ने व्यग्र होकर फिर प्रश्न किया।

  – ‘क्योंकि यहाँ से अंतरिक्ष दिखाई नहीं देता।’

  – ‘क्यों नहीं दिखाई देता अंतरिक्ष ?’

  – ‘क्योंकि इस समय हम एक विवर में हैं।’ [1]

  – ‘विवर!  कैसा विवर ?’

  – ‘पर्वतीय विवर पथिक। इसी विवर से होकर हमारे पुर तक पहुँचा जा सकता है।’

जाने कैसे वे नाग कन्यायें इस अंधेरे में भी पर्याप्त गति से चल पा रही थीं। प्रतनु के लिये इस सघन अंधकार में पैर बढ़ा पाना संभव नहीं हो रहा था। उसने फिर से निर्ऋति का हाथ पकड़ लिया। नागकन्या के कोमल स्पर्श से प्रतनु के शरीर में ऊर्जा लौट आई।  उसे फिर से रोमा का स्मरण हो आया।

  – ‘क्या इस सुरंग में हमें बहुत देर तक चलते रहना होगा ?’

  – ‘काफी देर तक नहीं कुछ देर तक।’

  – ‘तुम लोग यहाँ अकेली ही रहती हो।’

  – ‘हम लोग नहीं हैं, युवतियाँ हैं। रमणीय युवतियाँ।’ निर्ऋति के उपहास पर चारों ओर से फिर वही खिलखिल फूट पड़ी।

  – ‘ठीक है आप जो भी हैं, क्या यहाँ अकेली रहती हैं ?’

  – ‘हम यहाँ नहीं रहतीं, अपने पुर में रहती हैं और वहाँ हम अकेली नहीं रहतीं, रानी मृगमंदा की सेवा में रहती हैं। वहाँ हमारे जैसी और भी बहुत सी युवतियाँ हैं जिन्हें तुम बिना किसी संकोच के ‘लोग’ कह सकते हो।’ फिर वही खिलखिल। खीझ हो आई प्रतनु को। जाने इन्हें इतनी हँसी क्योंकर आती है!

काफी देर तक चलते रहने के बाद सामने से प्रकाश आता हुआ दिखाई दिया। कुछ और आगे चलने पर सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगा। प्रतनु के आश्चर्य का पार न रहा। यह कैसा विचित्र लोक था। जिस विवर से अब वह बाहर निकल रहा था उसकी सीढ़ियाँ रक्ताभ विद्रुम [2] की बनी हुई थीं और द्वार पर्याप्त मजबूत दिखाई देने वाले रक्त अयस [3] का।

विवर से निकलते ही विशाल उपवन था जिसमें इस रात्रि में भी दिन का सा प्रकाश फैला हुआ था। थोड़ी-थोड़ी दूर पर स्फटिक [4] के दीपाधारों पर स्वर्ण निर्मित दीप रखे थे जिनमें दग्ध होते सुगंधित स्नेह से उत्पन्न प्रकाश पूरे उपवन में व्याप्त था। उपवन के एक खण्ड से दूसरे खण्ड में जाने के लिये दीर्घ मार्गों का निर्माण किया गया था जिनके सामने प्रतनु को मोहेन-जो-दड़ो के मार्ग भी तुच्छ जान पड़े। उपवन के मध्य में स्थित उन्नतोदर [5] राजमार्ग एक विशाल एवं अत्यंत भव्य प्रासाद तक विस्तीर्ण था। इस राजमार्ग का अनुसरण करती हुई ही प्रतनु की दृष्टि प्रासाद तक पहुँची।

कुछ तो उपवन में प्रकाशमान दीप और कुछ आकाश से झरती ज्योत्सना, दोनों के मिले जुले प्रभाव से पूरा परिवेश झिलमिल करता हुआ जान पड़ता था। इसी झिलमिल आलोक में प्रासाद का अनूठा शिल्प देखते ही बनता था। सैंधवों की राजधानी मोहेन-जो-दड़ो में भी उसने इतना भव्य प्रासाद नहीं देखा था।

उस प्रासाद को घेर कर चारों ओर लघु प्रासाद बने हुए थे। श्वेत स्फटिक से निर्मित विशाल प्रासाद के बाहर नागकन्याओं का पहरा था जो प्रासादों के द्वार पर बने ऊँचे दीपाधारों के निकट खड्ग धारण करके खड़ी थीं। सम्पूर्ण प्रासाद का बाह्य-शिल्प इतना भव्य और इतना अनूठा था कि शिल्पी प्रतनु को अपना सम्पूर्ण शिल्पज्ञान सारहीन ज्ञात होने लगा। प्रासादों के कलात्मक शिखर अंतरिक्ष में स्थित नक्षत्रों से संभाषण करते हुए प्रतीत होते थे।

उपवन के ईषान [6] कोण में बना सरोवर इस रात्रि में भी स्पष्ट दिखाई देता था। उसके घाट पर बने सोपानों [7] पर खड़ी प्रतिमाओं का शिल्प देखकर तो आंखें चैंधिया गयीं शिल्पी प्रतनु की। उसने देवों के स्वामी इंद्र के अत्यंत रमणीय कानन वन के बारे में सुना था। प्रतनु को लगा कि कानन वन ऐसा ही रहा होगा।

प्रतनु ने देव शिल्पी विश्वकर्मा और दानव शिल्पी मय के भी नाम सुने हैं जो भव्य और मायावी भवन बनाने के लिये जाने जाते थे किंतु नागों ने भी इतने भव्य प्रासादों और अद्भुत पुरों का निर्माण किया है, ऐसा तो उसने सोचा भी नहीं था। इतनी सारी विचित्रताओं के बीच एक विचित्रता अलग से ही ध्यान खींचती थी। सम्पूर्ण उपवन में यहाँ तक कि विशाल प्रासाद के बाहर भी युवतियों का पहरा था, कहीं भी पुरुष प्रतिहार नियुक्त नहीं थे।

– अध्याय 15, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] पर्वतीय छिद्र, सुरंग

[2] लाल मूंगा।

[3] ताम्बा।

[4] एक तरह का श्वेत पारदर्शी पत्थर जिसे बिल्लौरी पत्थर भी कहते हैं। इसकी तुलना आज काम में लिये जाने वाले रायोलाइट पत्थर से की जा सकती है।

[5] बड़े पेट वाला अथवा मध्य में उभरा हुआ

[6] उत्तर-पूर्व दिशाओं के मध्य का कोण।

[7] सीढि़यों।

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