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इतिहास में रजिया सुल्तान का स्थान

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इतिहास में रजिया सुल्तान का स्थान

भारत के मुस्लिम इतिहास में रजिया सुल्तान का स्थान अल्पावधि के शासन के उपरांत भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि इल्तुतमिश या बलबन का। रजिया ने इल्तुतमिश और बलबन की ही तरह कट्टर तुर्की अमीरों पर नकेल कसने में सफलता प्राप्त की।

मध्यकालीन इतिहास में रजिया सुल्तान

भारत के मध्यकाल का इतिहास रजिया सुल्तान के बिना पूरा नहीं होता। जहाँ इतिहास बहुत से दीर्घकालिक सुल्तानों के बारे में बहुत कम जानता है, वहीं रजिया के अल्पकालीन शासन के उपरांत भी इतिहास में रजिया के बारे में बहुत अच्छी जानकारी मिलती है। जन मानस में भी रजिया के सम्बन्ध में बहुत सी बातें व्याप्त हैं। ई.1983 में रजिया पर हिन्दी भाषा में सिनेमा का निर्माण किया गया। ई.2015 में रजिया पर टीवी सीरियल का निर्माण हुआ।

रजिया की कब्रगाह

रजिया की हत्या कैथल में हुई किंतु उसकी कब्रगाह तीन भिन्न स्थानों- कैथल, दिल्ली तथा टोंक में स्थित होने के दावे किये जाते हैं। उसकी वास्तविक कब्रगाह के बारे में काई पुरातात्विक अथवा ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलते हैं। दिल्ली की कब्रगाह तुर्कमान गेट के पास शाहजहां बाद में बुलबुलेखाना में है। कैथल में एक मस्जिद के निकट रजिया तथा अल्तूनिया की कब्रगाहें बताई जाती हैं।

ई.1938 में भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो कैथल आये। उन्होंने कैथल में रजिया की कब्रगाह का दौरा किया तथा उसके जीर्णोद्धार के लिये कुछ राशि भी उपलब्ध कराई। उनके निर्देश पर भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक भी कैथल आये किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने के कारण इस कब्र का जीर्णोद्धार नहीं किया जा सका।

महिलाओं में शासकीय प्रतिभा की कमी नहीं है

भारत के इतिहास में रजिया सुल्तान का स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उसने सिद्ध करके दिखाया कि महिलाओं में शासन करने की प्रतिभा पुरुषों से किसी भी तरह कम नहीं होती।

आज तेरहवीं सदी आज बहुत पीछे छूट चुकी है। उसके बाद भारत में बहुत सी स्त्री शासक हुई हैं जिन्होंने निरंकुश राजतंत्रीय व्यवस्था में तथा लोकशासित प्रजातंत्रीय व्यवस्था में सफलता पूर्वक शासन किया है तथा इस बात को सिद्ध करके दिखाया है कि स्त्रियों में शासन करने की प्रतिभा नैसर्गिक रूप से वैसी ही है जैसी कि पुरुषों में हुआ करती है।

यहाँ तक कि भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा श्रीलंका आदि दक्षिण एशियाई देशों में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। रजिया की विफलता से केवल इतना सिद्ध होता है कि तेरहवीं सदी की मध्यकालीन मानसिकता वाले उस युग की बर्बर राजनीति में स्त्रियों के लिए कोई स्थान नहीं था, वे चाहे कितनी भी योग्य क्यों न हों।

चमकती रहेगी रजिया सितारे की तरह

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में रजिया का स्थान अमर है। सदियां आयेंगी और जायेंगी किंतु रजिया सुल्तान इतिहास में चमकीले सितारे की तरह सदैव चमकती रहेगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मोहनजोदारो की नृत्यांगना – भूमिका

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मोहनजोदारो - bharatkaitihas.com
मोहनजोदारो की नृत्यांगना की भूमिका

मोहनजोदारो की नृत्यांगना भारत की दस हजार साल पुरानी सभ्यता पर लिखा गया एक उपन्यास है। इस उपन्यास में आधारभूत सामग्री के रूप में उस काल का वैदिक साहित्य एवं सैंन्धव पुरातत्व काम में लिया गया है।

शरीर रचना शास्त्र  (Racical Anthropology) की दृष्टि से भारत भूमि पर निवास करने वाली आदिम जातियों के छः समुदाय- नीग्रेटो, प्रोटो-आस्ट्रेलायड, मंगोलायड, भूमध्यसागरीय द्रविड़, पश्चिमी बे्रचीसेफल तथा नोर्डिक बताये गये हैं। सिंधु सभ्यता के नगरों हड़प्पा, मोहेन-जो-दड़ो और चहून्दड़ो से प्रोटो-आस्ट्रेलायड,  भूमध्यसागरीय द्रविड़, मंगोलायड तथा अल्पाइन जाति के अस्थिपंजर प्राप्त हुए हैं।

जबकि भारतभूमि पर आज निवास करने वाले मानव समुदाय में शरीर रचना शास्त्र की दृष्टि से मुख्यतः चार जनसमुदाय उपस्थित हैं- आर्य, द्राविड़, निषाद और किरात।

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यह भी माना जाता है कि नीग्रेटो, प्रोटो-आस्ट्रेलायड, मंगोलायड, भूमध्यसागरीय द्रविड़, पश्चिमी बे्रचीसेफल तथा नोर्डिक आदिम समुदायों से द्राविड़, निषाद और किरात जनजातियों का उद्भव हुआ। इसका अर्थ है कि आर्य जनसमुदाय भारत के आदिम जनसमूह से अनुपस्थित है। उन्हें बाद में किसी अन्य प्रदेश से भारत भूमि में आना बताया जाता है।  आर्य, द्राविड़, निषाद और किरात जनसमुदाय कितने समय से भारत भूमि में निवास करते आये हैं, इस सम्बंध में निर्विवाद रूप से कहा जाना संभव नहीं है। अब तक उपलब्ध समस्त ऐतिहासिक, भाषाशास्त्रिक, पुरातात्त्विक और पौराणिक साक्ष्यों का उपयोग करके भी इन जनसमुदायों के भारत में निवास आरंभ करने की वास्तविक तिथियों का पता नहीं लगाया जा सका है। आज आर्य जनसमुदाय भारत भूमि पर निवास करने वाला सबसे बड़ा जनसमुदाय है। आर्यों के सम्बन्ध में जहाँ कुछ विद्वानों का मत है कि वे किसी अन्य प्रदेश से भारत में आये वहीं बहुत से विद्वानों का मत है कि आर्य जनसमुदाय का उद्भव भारत भूमि पर ही हुआ तथा वे आदिकाल से भारतभूमि पर ही रहते आये हैं। दोनों ही मान्यताओं के पक्ष में प्रबल तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं।

यदि आर्य जाति के प्रागैतिहासिक अस्थिपंजर प्राप्त नहीं हुए हैं तो उसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जहाँ अन्यान्य प्रागैतिहासिक सभ्यताओं में शवाधान की परम्परा थी वहीं आर्य जाति में शवदाह की परम्परा थी।

भारत के पश्चिमोत्तर भाग से प्राप्त सिंधुघाटी सभ्यता को आज सबसे प्राचीन सभ्यता के अवशेष माना जाता है । इससे पूर्व की बस्तियाँ आदिमयुगीन मानी जाती हैं। जिनमें विकसित सभ्यता का अभाव है। पुरातात्विक अवशेष इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि ताम्रपाषाणिक सभ्यताओं से प्राचीन होते हुए भी सिंधु सभ्यता तृतीय कांस्य कालीन तथा अत्यंत विकसित सभ्यता थी।

भूमध्यसागरीय द्राविड़ जनसमुदाय इस सभ्यता का जनक माना जाता है। ब्राहुई भाषा और उनके बोलने वालों के बलूचिस्तान में द्वीपवत् ठहरे हुए मिलने से इस मत का समर्थन किया गया है और कल्पना की गयी है कि बाद में यह समुदाय सिंधु घाटी से समुद्र के किनारे होकर सुदूर दक्षिण की ओर चला गया। जहाँ वह आज भी विद्यमान है।

चूंकि सिंधु सभ्यता आज अपने स्थान पर उपस्थित नही है और उस क्षेत्र में आर्य जाति निवास करती है इसलिये पश्चिमी विद्वानों ने प्राचीन आर्यों पर यह दोष आरोपित किया है कि आर्य असभ्य, बर्बर और लड़ाकू थे, उन्होंने सिंधु सभ्यता का विध्वंस कर दिया।

इस उपन्यास का उद्देश्य सैंधवों और आर्यों के मध्य रहे सम्बन्धों तथा उन परिस्थितियों का विश्लेषण करना है जिनमें सैंधव और आर्य सभ्यतायें एक दूसरे के साथ रहते हुए संघर्ष और समन्वयन के प्रयास कर रही होंगी।

एक तरफ तो पश्चिमी विद्वान आर्यों को असभ्य, बर्बर और लड़ाकू बता रहे हैं तो दूसरी तरफ वेदों की उपस्थिति बता रही है कि सैंधव सभ्यता के समकालिक आर्यों में शुभ और अशुभ कर्मों का पूरा विवेक था जिसके कारण आर्य असभ्य और बर्बर नहीं कहे जा सकते। आर्यों ने वेदों में स्थान-स्थान पर अपने जिन शत्रुओं का उल्लेख किया है, उन्हें अशुभ कर्मों को करने वाला बताया है।

हम यह भी देखते हैं कि आर्यों ने आगे चलकर सैंधवों की बहुत सी मान्यताओं और परम्पराओं को स्वीकार कर लिया। जिनमें नाग पूजा, पशु-पक्षियों की पूजा, लिंग और योनि की पूजा, मूर्तिपूजा तथा बलिप्रथा आदि प्रमुख हैं। उनमें से बहुत सी आज तक प्रचलित हैं। इससे अनुमान किया जा सकता है कि आर्यों ने सैंधवों को नष्ट नहीं किया।

अपितु ये दोनों सभ्यतायें लम्बे समय तक साथ-साथ रहीं। यदि ऐसा नहीं होता तो सैंधवों की बहुत सी बातों को आर्यों ने धार्मिक विश्वास के रूप में नहीं अपनाया होता। इन्हीं रीति-रिवाज़ों के आधार पर कुछ विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि सिंधु सभ्यता के जनक और आर्य एक ही थे, अलग-अलग नहीं थे।

अब तक जो भी ऐतिहासिक, भाषाशास्त्रिक, पुरातात्त्विक और पौराणिक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं उनसे सिंधु सभ्यता वासियों तथा ऋग्वैदिक आर्यों के सम्बंध में यही धारणा बनती है कि सैंधव सभ्यता के निर्माता आर्यों से भिन्न तथा पूर्ववर्ती थे। सैंधव सभ्यता नगरीय थी जबकि आर्य ‘चरवाहों के जन’ थे।

सैंधव सभ्यता मूर्तिपूजक थी जबकि आर्य अमूत्र्त देवताओं के उपासक थे। सैंधव देव-पूजन में जल को अधिक महत्व देते थे जबकि आर्य अग्नि पूजक थे। सैंधव सभ्यता अश्व से अपरिचित थी जबकि आर्य अश्वपालक थे। सैंधव सभ्यता शांतिप्रिय थी जबकि आर्य युद्ध प्रेमी थे। सैंधव सभ्यता लिपि का प्रयोग कर अपने लेख मुद्राओं, आभूषणों, बर्तनों और अन्य सामग्री पर अंकित कर रही थी जबकि आर्य ज्ञान को स्मृति के माध्यम से सुरक्षित रख रहे थे।

सैंधव सभ्यता के प्रसार क्षेत्र के केन्द्र में महानद सिंधु था जबकि वैदिक सभ्यता के भूगोल में महानदी सरस्वती केन्द्रीय भूमिका का निर्वहन कर रही थी। सैंधव सभ्यता चित्रित मृद्भाण्डों वाली सभ्यता है जबकि ऋग्वैदिक आर्यों की बस्तियों से धूसर मृदभाण्ड प्राप्त हुए हैं। सिधु घाटी सभ्यता के प्रसार क्षेत्र से जो भी आर्य सामग्री यथा मृदभाण्ड एवं यज्ञकुण्ड प्राप्त हुए हैं, वे परवर्ती काल के हैं।

 सिंधु सभ्यता की बस्तियाँ बलूचिस्तान, उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत, पंजाब, सिंध, काठियावाड़ तथा पश्चिमी राजस्थान आदि क्षेत्रों से मिली हैं। जबकि वेदों में जिन नदियों का वर्णन आया है उनसे पता चलता है कि ऋग्वेद की रचना अफगानिस्तान और पंजाब तक के विस्तृत प्रदेश में हुई। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की कुभा, सुवास्तु, गोमती एवं क्रुमु तथा पंजाब की शतुद्रि, विपाशा, परुष्णी, असिक्नी एवं वितस्ता नामक नदियों का उल्लेख कई बार हुआ है।

सिंधु तथा सरस्वती का उल्लेख भी पर्याप्त बार हुआ है साथ ही गंगा-यमुना का उल्लेख भी आया है। स्पष्ट है कि वेदों की रचना के प्रारंभिक काल में आर्य हिन्दुकुश पर्वत से गंगा तक फैले हुए थे। पश्चिमी विद्वानों का मानना है कि इसके बाद वैदिक जनों का प्रसार पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण दिशाओं की ओर हुआ।

‘आर्य-जन’ एवं ‘सिंधु-सभ्यता’ के प्रसार क्षेत्र सटे हुए थे तथा ये दोनों सभ्यतायें समकालीन थीं। दोनों सभ्यताओं के रहन-सहन एवं चिंतन में काफी अन्तर था। अतः स्वाभाविक ही था कि दोनों सभ्यताओं में संघर्ष होता। इस संघर्ष का परिणाम भी स्वाभाविक रूप से दो या तीन रूप ले सकता था-(1) दोनों सभ्यताओं में से कम से कम कोई एक सभ्यता नष्ट हो जाये। (2) दोनों सभ्यताओं में से कम से कम कोई एक सभ्यता अपना स्थान परिवर्तित कर ले अथवा (3) दोनों सभ्यताओं में समन्वय स्थापित हो जाये।

प्रकृति का नियम है कि संघर्ष और समन्वयन साथ-साथ चलते हैं। यही आर्यों और सैंधवों के बीच भी हुआ होगा। इसी कारण आर्यों ने सैंधवों को अपने से हीन समझते हुए भी उनकी बहुत सी बातें अपना लीं जो आज भी आर्यों में प्रचलित हैं। यह अनुमान भी सहज ही लगाया जा सकता है कि संघर्ष में सक्षम नहीं होने के कारण सैंधव अपने क्षेत्र से धीरे-धीरे पलायन कर गये और उनके क्षेत्रों पर आर्यों ने अपनी बस्तियाँ बसा लीं। इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि आर्यों ने उन्हें बर्बरता से नष्ट किया। 

आर्यों ने वेदों में स्थान-स्थान पर अपने शत्रुओं का उल्लेख किया है, जिससे पश्चिमी विद्वानों ने उन्हें बर्बर, लड़ाकू और आक्रांता मान लिया है। अनुमान होता है कि आर्यों का संघर्ष बहुकोणीय था। एक तरफ वे पणियों, असुरों और दस्युओं से युद्ध कर रहे थे तो दूसरी ओर उनमें परस्पर संघर्ष भी था। संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में यह संघर्ष देवासुर संग्राम तथा देवताओं के संघर्ष के रूप में वर्णित है।

सैंधव सभ्यता कितनी पुरानी थी तथा कब आरंभ होकर अपने चरम पर पहुँची इस सम्बंध में कोई निश्चित बात नहीं कही जा सकती। इस कार्य में रेडियो कार्बन विधि से किया गया तिथि निर्धारण भी अधिक उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ है। जीवधारियों में कार्बन-14 ग्रहण करने की दर विश्व के सभी क्षेत्रों में सदैव एक सी नहीं रहती।

इसी प्रकार वैदिक सभ्यता कब आरंभ होकर कब अपने चरम पर पहुँची, कुछ भी निश्चित नहीं किया जा सका है। ऋग्वेद को  एक हजार ईसा पूर्व से लेकर पच्चीस हजार ईसा पूर्व तक पुराना माना गया है। सभी विद्वान अपने-अपने समर्थन में प्रबल मत देते हैं दूसरे विद्वान द्वारा प्रस्तुत मत का तो खण्डन करते हैं किंतु अपने मत के समर्थन में दूसरे विद्वानों द्वारा व्यक्त शंका का समाधान नहीं कर पाते हैं।

काल सम्बन्धी प्रश्नों के समुचित उत्तर दे पाना आज भले ही संभव न हो पा रहा हो किंतु यह निश्चित है कि आज से सहस्रों वर्ष पहले का मानव भी उच्च एवं विकसित संस्कृति से परिचित था। सैंधव सभ्यता तथा ऋग्वैदिक आर्य सभ्यता उस काल में महान सभ्यतायें थीं जिनके सम्बन्ध दूर-दूर तक की सभ्यताओं से थे तथा उनमें एक सम्पर्क भाषा भी थी। मेसोपोटामिया में सैंधव व्यापारियों की भाषा का अनुवाद करने के लिये दुभाषियों की भी व्यवस्था की गयी थी।

सिंधु सभ्यता का सम्बन्ध विश्व की तत्कालीन सभ्यताओं से रहा होगा, इसके कई प्रमाण मिलते हैं। ईरान के प्राचीन नगर सूसा तथा ईलम ईसा से 2500 वर्ष पहले भी अस्तित्व में थे। ये दजला-फरात नदियों के किनारे पर बसी मेसोपोटामिया सभ्यता के निकट स्थित हैं। यहाँ से सिंधु सभ्यता की मुहरें पाई गयी हैं। इसी प्रकार मेसोपोटामिया की कुछ मुहरें सिंधु स्थलों से भी प्राप्त हुई हैं। स्पष्ट है कि इन नगरों का सिंधु सभ्यता से सम्बन्ध था। मिश्र के एक पिरामिड से सैंधव गुरिया (माला में पिरोने की मणि) प्राप्त हुई है।

इसी प्रकार भारतीय आर्यों का सम्बन्ध भी विश्व की तत्कालीन सभ्यताओं से होने के पर्याप्त प्रमाण प्राप्त होते हैं। पिरामिड शब्द संस्कृत के ‘परम़्$इदम्’ से साम्य रखता है। इन पिरामिडों का निर्माण फरोह राजाओं द्वारा करवाया गया। फरोह शब्द का साम्य संस्कृत शब्दों-‘परा़$रोह’ से है जिसका अर्थ ‘महानाविक’ होता है।

अनुमान होता है कि मिश्र सभ्यता के फरोह शासक भारतीय आर्य थे जो समुद्र के रास्ते मिश्र पहुँचे। पिरामिडों के निर्माण के बाद मिश्र में ‘हतशेषसुत’ नाम का राजा हुआ। जिसने अपनी राजधानी कर्नाक में विशाल पाषाण मूर्तियाँ, भवन और पिरामिड बनवाये। संस्कृत में हतशेषसुत का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘मर जाने से शेष बचे मनुष्य का पुत्र’ अथवा ‘मरे हुए पुत्रों में से शेष बचा हुआ।’

इस काल में मिश्र का मुख्य देवता ‘रा’ अथवा ‘रे’ (सूर्य) है जो ‘रवि’ शब्द से साम्य रखता है। हम्मूराबी की विधि संहिता एक बेलनाकार पत्थर पर खुदी है जिसमें सम्राट को सूर्य देवता से नियमों को प्राप्त कते हुए दिखाया गया है। ऋग्वेद में सूर्योपासना से सम्बंधित अनेक ऋचायें मिलती हैं। मिश्र के एक पिरामिड से मिट्टी की एक मुद्रा प्राप्त हुई है।

यह लगभग 5000 वर्ष प्राचीन है। इस मुद्रा पर किसी वृक्ष की एक शाखा अंकित है जिसपर दो पक्षी बैठे हैं। एक पक्षी फल खा रहा है और दूसरा पक्षी उसे देख रहा है। मुण्डकोपनिषद में इस रूपक का उल्लेख है जिसके अनुसार इनमे से पहला पक्षी जीव है जो कर्मफल का भोग करता है तथा दूसरा पक्षी ब्रह्म है जो इस भोग का साक्षी है।

एशिया माइनर (वर्तमान टर्की) में स्थित बोगाजकुई से एक शिलालख प्राप्त हुआ है जिसमें मितानी देवों- मित्र, वरुण, इन्द्र तथा नासत्यौ (अश्विनी) के उल्लेख हैं। मितानी जाति भारतीय आर्यों की एक शाखा थी जो भारत से जाकर पश्चिम एशिया में बस गयीथी। इसी लिये इस अभिलेख में आर्य देवताओं का उल्लेख है।

ये देवता वैदिक युग से पूर्व के हैं तथा अविभाजित भारतीय एवं ईरानी आर्यों के सामूहिक देवता हैं। यह अभिलेख ईसा से एक हजार पाँच सौ वर्ष पुराना माना जाता है। अर्थात् इस समय से काफी पहले भी आर्य वहाँ निवास करते रहे होंगे। संभवतः ईसा से पाँच हजार साल पहले भी। बोगाजकुई अभिलेख में जिन देवों का उल्लेख है उनमें मित्र एवं वरूण के लिये ‘इलानि’ (त्रदेवाः) का प्रयोग हुआ है।

इस बहुवचन के प्रयोग से अनुवाद्य मूल में देवताद्वन्द्व की सूचना मिलती है। खत्ती (हित्तिति) शासक शब्बिलुल्यूमा और मितानी (मितन्नी) शासक मत्तिवाजा के बीच एक संधि करने के संदर्भ में ये देवता साक्षी के रूप में उल्लेखित किये गये हैं। संभवतः भारतीय अश्वपालक आर्यों की भी एक बस्ती यहाँ पर थी जिनका मुखिया मत्तिवाजा था, इसीलिये उन आर्यों में प्रचलित मित्र तथा वरुण आदि देवताओं को भी साक्षी के रूप में बुलाया गया था।

बाइबिल तथा इजराइल के इतिहास में सेनापति सिसेरा (शिशिर) की नाजरथ (नवशतरथ, अर्थात् लोहे के नौ सौ रथों वाली) सेना का उल्लेख होता है जो हेरोसेश हगोयम (हर्षस्थ यज्ञम्) नामक स्थान पर पड़ाव डाले हुए रही। इस सेनापति की हत्या यहूदियों ने धोखे से की। विश्व में लोहे का सर्वप्रथम उपयोग भारतीय आर्यों ने ही किया था।

इसी लिये अन्य सभ्यता वालों ने लोहे को आर्यों के नाम पर आयरन (आर्यन) कहकर पुकारा। विशाल लोहे के रथों वाली सेना भारत से ही वहाँ पहुँची थी जिनका पूर्वज ईस्वी पूर्व 1716 में एकोम (एकोअहम्) था। लगभग उसी काल का कांसे का बना एक तरकश ईरान में मिला है जिसपर वरुण, मित्र, इंद्र, पर्जन्य आदि वैदिक देवताओं से सम्बन्धित गाथा को व्यक्त किया गया है। वैदिक ऋषि च्यवन का जीवनवृत्तांत भी इस तूणीर पर उत्कीर्ण है।

आर्यों के परस्पर संघर्ष का विवरण देवों के संघर्ष के रूप में वर्णित है। इसी कारण वरुण ऋक् संहिता के महान् देवता हैं फिर भी उनकी पहचान विवादग्रस्त है। उनके लिये असुर शब्द का भी प्रयोग हुआ है। वे ऋत अर्थात प्रकृति की व्यवस्था के रक्षक हैं, उन्हें ऊरानॉस, आकाश, रात्रिकालीन आकाश अथवा चन्द्रमा भी बताया गया है।

वरुण देवता ईरान में अहुरमज्दा तथा यूनान में ओरनोज के नाम से प्रतिष्ठित हुए। ऋग्वेद में कहा गया है कि अस़ुर शक्ति से सम्पन्न होने के कारण वरुण कुपित होकर मनुष्यों का नाश कर सकता है (ऋग्वेद. 2 . 28 . 7) परन्तु ऋतवान् और घृतवृत होने के कारण वह पापियों के प्रति भी सहृदय हो जाता है और उन्हें क्षमा प्रदान कर देता है (ऋ. 7. 87 . 7)। व्रत पालन और यज्ञ कर्म से वह प्रसन्न रहता है (ऋ. 5 . 85 . 8)।

प्रसन्न होने पर वह सुख समृद्धि देता है (ऋ. 1 . 24 . 9)। ऋग्वेद का सातवाँ मण्डल वरुण स्तोत्रों से भरा पड़ा है। अथवर्ववेद के अनुसार मित्र को श्वेतवर्ण और वरुण को कृष्णवर्ण के पशु की बलि दी जाती है।

ऋग्वेद में एक स्थान पर कहा गया है- मैं पिता असुर (वरुण) का परित्याग कर रहा हूँ, यद्यपि उनके साथ मैं वर्षों तक अति सौहार्द्रभाव से रहा हूँ। अग्नि, वरुण और सोम को अब हट जाना चाहिये। प्रभुता दूसरे के पास जा रही है (ऋ.  10. 124)। इस उद्धरण से अनुमान होता है कि इन्द्र वरुण को अपदस्थ कर देवों का प्रमुख बना था।

वेद में एक ऋचा आती है जिसमें कहा गया है कि इन्द्र ने वरुण को देवत्व प्रदान किया। महाभारत  के शल्य पर्व में उल्लेख है कि पूर्वकल्प में देवताओं ने जाकर वरुण से कहा- ‘इंद्र भय से हमारा त्राण करते रहते हैं। आप जल का अधिपत्य स्वीकार कीजिये ताकि आप भी हमारी रक्षा कर सकें। आपका निवास स्थान भी मकरालय में है।

वरुण ने देवताओं का अनुरोध स्वीकार कर लिया। इसी प्रकार चतुर्थ ब्राह्मण के ‘सवनाम’ नामक पाँचवे काण्ड में उल्लेख है कि एक बार जब वरुण का अभिषक हो रहा था तब तब उसका तेज दूर चला गया। यज्ञ उससे हट गया। संभृत जलों का जो रस उसके अभिषेक में प्रयुक्त हुआ था उससे ही वरुण का तेज नष्ट हुआ। तब वरुण तेज प्राप्ति के लिये देवताओं के साथ संसर्पित हुआ। इस उल्लेख से भी अनुमान होता है कि इंद्र द्वारा अपदस्थ किये जाने के पश्चात् देवताओं ने वरुण को पुनः देवत्व प्रदान किया।

एक वैदिक आख्यायिका के अनुसार वरुण के प्रकोप से प्रजा जीर्ण-शीर्ण होने लगी और श्वांसमात्र को शेष रह गयी तब प्रजापति ने वरुणप्रघास नामक यज्ञ करके प्रजा की चिकित्सा की। प्रजा वरुण-पाश से मुक्त होकर निरोग और निर्मल हुई। ब्रह्मा द्वारा प्रजा को वरुण के पाश से मुक्त करवाने की स्मृति में ऋग्वैदिक काल में वर्षाकाल आरंभ होने पर ”वरुणप्रघास” का आयोजन किया जाता था। (चतुर्थ ब्राह्मण 2. 5 . 2 -2 . 6 . 4) वरुण की पुत्री ‘वारुणि’ अर्थात् सुरा और वरुण के पुत्र ‘बल’ ने असुरों की शक्ति बढ़ायी।

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए इस उपन्यास में वरुण को असुरों के मित्र के रूप में वर्णित किया गया है जिसे वृत्रासुर बंदी बना लेता है। इंद्र वृत्रासुर का वध कर वरुण को मुक्त करवाते हैं। देखा जाये तो पूरे वैदिक वाङ्मय में इन्द्र की सबसे बड़ी उपलब्धि भी यही है।

सिंधु सभ्यता के नगरों के जो नाम इस उपन्यास में प्रयुक्त हुए हैं उन्हें सिंधु सभ्यता के निवासी किन नामों से जानते थे, अब ज्ञात नहीं है। इसलिये उपन्यास में उन नगरों को आज प्रचलित नामों से सम्बोधित किया गया है। मेसोपोटामिया से मिली मोहरों से मेलुह्ह, मगन तथा दिल्मुन नामक नगरों के नाम मिले हैं जो संभवतः सिंधु सभ्यता के प्रमुख नगर थे तथा मेसोपोटामिया के व्यापारी इन नगरों से व्यापारिक सामग्री आयात करते थे। अतः इन नामों का भी यथास्थान प्रयोग किया गया है।

पूर्वैतिहासिक घटनाओं पर आधारित होते हुए भी ‘मोहनजोदारो की नृत्यांगना’ इतिहास नहीं है, उपन्यास है जिसमें उपन्यासकार को कल्पना करने के लिये पूरी स्वतंत्रता उपलब्ध रहती है। इसी कारण ‘मोहनजोदारो की नृत्यांगना’ के समस्त पात्र तथा घटनायें काल्पनिक हैं। उपन्यास का वातावरण वही रखा गया है जिसका आभास सिंधु सभ्यता के नगरों की खुदाई से प्राप्त सामग्री तथा वैदिक वाङ्मय से होता है ताकि पाठक भारत भूमि पर सहस्रों वर्ष पूर्व पुष्पित-पल्लवित होने वाली दो महान् सभ्यताओं के वैभव से परिचय का आनंद उठा सकें। इस कार्य में लेखक को कितनी सफलता मिली है, इसका निर्णय तो सुधि पाठकों को ही करना है। शुभम्।

– भूमिका, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सप्तसिंधु (1)

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सप्तसिंधु

उन दिनों सिंधु, शतुद्रि, विपासा, परुष्णि, असिक्नी, वितस्ता तथा सरस्वती का सम्पूर्ण क्षेत्र सप्त सैंधव अथवा सप्तसिंधु कहलाता था। यह बहुत बाद की बात है कि गंगा-यमुना का क्षेत्र आर्य संस्कृति के प्रसार का केन्द्र बना।

नदियाँ केवल जल लेकर प्रवाहित नहीं होतीं। जल के साथ पर्वतीय खण्ड भी उनके आकर्षण में बंधे चले आते हैं। लगातार होने वाले घर्षण के कारण ये खण्ड शनैः-शनैः रेत में बदलते रहते हैं। बहुत सी रेत समुद्र तक पहुँचने से पहले नदियों के तटों पर जमा होती रहती है। उपजाऊ होने के कारण यह रेत कृषि के लिये उपयोगी होती है।

इस उपजाऊ रेत के कारण ही नदी-तटों पर विश्व की महान सभ्यतायें पनपती हैं। प्रत्येक नदी के जीवन में एक ऐसा समय भी आता है जब इसी रेत के कारण नदियों के तट रेगिस्तान में परिवर्तित हो जाते हैं और नदी को अपने प्रवाह क्षेत्र में परिवर्तन करना पड़ता है। एक तरह से यही रेत मानव सभ्यताओं का भाग्य लिखती है। मानव सभ्यताओं के भाग्य को ही हम इतिहास के रूप में पढ़ते हैं।

 जिन दिनों की यह कथा है उन दिनों भारतवर्ष का पश्चिमी प्रांतर आज की भांति मरूस्थल से पूर्ण रूपेण आच्छादित नहीं हुआ था। तब आज के मरूस्थल के अधिकांश भाग पर हरित जल राशि युक्त[1]  द्रुमकुल्य नामक समुद्र हिलोरें लेता था। द्रुमकुल्य की गरजती, उफनती विशाल लहरें, तटों से टकराकर घनघोर रव[2]  उत्पन्न करती थीं। सिंधु, शतुद्रि,[3]  विपाशा,[4]  परुष्णि,[5]  असिक्नी,[6]  वितस्ता[7]  तथा सरस्वती नामक सात प्रमुख नदियाँ हिमालय से जल लाकर इस समुद्र को सदैव निर्मल जल से आप्लावित[8]  रखती थीं। आज के समुद्रों की भांति द्रुमकुल्य का जल खारा नहीं था। 

हिमालय से निकलने के पश्चात विपाशा, परुष्णि, असिक्नी तथा वितस्ता कुछ दूरी तक स्वतंत्र रूप में प्रवाहित होने के पश्चात् एक-एक करके सिंधु में ही आ मिलती थीं जिससे सिंधु ‘नदी’ न कहलाकर ‘नद’ कहलाता था। आज जहाँ तीर्थराज प्रयाग स्थित हैं, तब वहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम नहीं होता था।

सिंधु की भांति सरस्वती भी एक महानदी थी जो हिमालय से निकलकर अरावली के पश्चिम में पूर्ण रूपेण स्वतंत्र रूप से बहती हुई हरियाणा और राजस्थान को पार करके द्रुमकुल्य सागर तक आती थी। मार्ग में यमुना और शतुद्रि की धारायें भी सरस्वती में आ मिलती थीं। अरावली पर्वत भी तब आज की तरह बूढ़ा नहीं हुआ था।

अरावली पर वर्ष-पर्यंत मेघ छाये रहते थे और निरंतर मूसलाधार वर्षा होती रहती थी। अरावली से निकलने वाली जल धारायें सरस्वती नदी का बलवर्धन करती हुई द्रुमकुल्य से आ मिलती थीं। चर्मण्यवती[9]  का प्रवाह भी तब आज के समान दक्षिण से उत्तर पूर्व की ओर नहीं था।

यह बहुत बाद की बात है जब चर्मण्यवती का प्रवाह उलट जाने से सरस्वती को अपना मार्ग बदलना पड़ा और यमुना सरस्वती को लेकर गंगा के पावन जल में कूद पड़ी। कहते हैं जिस प्रकार यम प्राणियों के प्राण हर लेता है उसी प्रकार यम की बहिन यमुना ने सरस्वती के प्राण हर लिये। यही वह समय था जब सतलज सरस्वती को छोड़कर सिंधु में जा मिली।[10]

अनुमान होता है कि स्वयं सरस्वती की भी कुछ धारायें पश्चिम में मुड़कर सिंधु में जा मिलीं।   यह अभी भविष्य के गर्भ में था जबकि सरस्वती को अल्पजला होते-होते अन्तःसलिला बनकर मरूस्थल में विलीन हो जाना था एवं उसके अवशिष्ट घघ्घर, शर्करा[11]  तथा लवणाद्रि[12]  के रूप में रह जाने थे।

जिस युग की यह कथा है उस युग में सरस्वती नदी द्रुमकुल्य तक पहुँचत-पहुँचते अनेक क्षीण धाराओं में परिवर्तित हो जाती थी। इसके जल से सिंचित इक्षु की कृषि इतनी अधिक उपज देती थी कि सरस्वती का यह दक्षिणी छोर शर्करा के नाम से विख्यात हो चला था। उन दिनों द्रुमकुल्य के भीतर से यत्र-तत्र धरा प्रकट होने लगी थी। जिन पर असुर एवं द्रविड़ बस्तियों का प्रसार होता जा रहा था। दु्रमकुल्य से निकलने वाली धरा कहीं-कही इतनी ऊँची हो गयी थी कि उन पर मरूस्थल प्रकट होने लगा था।

पृथ्वी पर महा-जलप्लावन[13] घटित हुए कई शताब्दियाँ बीत चुकी थीं। प्रबल-प्रतापी देव प्रजा अपने सम्पूर्ण बल और वैभव के साथ जल प्लावन में नष्ट हो चुकी थी। वैवस्वत मनु[14]  ने तब प्रजापति बनकर प्रजा का संगठन किया और मानव संस्कृति की नींव रखी। वैवस्वत प्रजाजन तब सलिलाओं [15] के तटों पर पर्णकुटी [16] बनाकर रहते थे तथा जनों [17] के रूप में संगठित हो चुके थे। आगे चलकर यही वैवस्वत प्रजाजन आर्य कहलाये।

आर्य जन देवों की प्रसन्नता प्राप्ति के लिये भांति-भांति के यज्ञ-हवन करते थे जिनके सुवासित धूम्र से पुण्य सलिलाओं के तट आप्लावित रहते थे। आर्य ऋषि ‘इंद्र’ तथा ‘अग्नि’ को सबसे बड़ा देवता मानते थे तथा उसी रूप में उनकी अराधना करते थे।

सोम[18] की प्राप्ति के लिये आर्य जन सदैव तत्पर रहते थे। सोम उनके लिये हिरण्य[19] और अमृत से भी अधिक मूल्यवान था। सोम का पान कर वे देवों के समान ही शक्ति सम्पन्न हो जाना चाहते थे। मंत्र दृष्टा [20] ऋषियों ने कई ऋचाओं [21] का आह्वान कर उन्हें प्राप्त कर लिया था किंतु वेदों का प्राकट्य अभी भविष्य के गर्भ में था।

यह एक विस्मयकारी बात ही थी कि आर्य जन देवप्रजा के इतिहास को उसी तरह स्मरण करते थे जैसे यह उनका अपना इतिहास हो। आर्यों ने देववाणी संस्कृत को ही अपना लिया था और वे इसी वाणी में व्यवहार करते थे। संभवतः यही कारण था कि वे देव प्रजा के इतिहास को अपना इतिहास समझते थे। देवताओं से उन्हें गौ, अश्व, बीज, हल आदि उत्तम पदार्थ प्राप्त हुए थे। कृषि करने, विमान बनाने, विविध आयुधों का निर्माण एवं उपयोग करने सहित कई विद्यायें उन्हें देवताओं से प्राप्त हुई थीं।

जहाँ असुर, दैत्य तथा दानव आदि प्रजायें उन दिनों प्रस्तर[22] तथा काष्ठ [23] निर्मित अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग कर रहीं थीं, वहीं आर्य जन ताम्र [24] तथा कांस्य [25] के साथ-साथ लौह के अस्त्र-शस्त्रों तथा रथों का उपयोग करते थे। उन दिनों ताम्र को अयस तथा लौह को कृष्ण अयस कहा जाता था। अश्वों, रथों तथा लौह निर्मित आयुधों के कारण आर्यों ने सम्मुख युद्धों में बढ़त प्राप्त कर ली थी जबकि असुर आदि प्रजायें छिपकर हानि पहुँचाने में विश्वास रखती थीं।

इतना होने पर भी आर्यों की रुचि युद्धों में नहीं थी। वे युद्धों से उदासीन रहकर यज्ञ, हवन तथा गौ-चारण [26] में ही रत रहते थे। फिर भी उन्हें युद्ध करने पड़ते थे। आर्य जन यद्यपि कृषि आरंभ कर चुके थे तथापि कृषि में भी उनकी विशेष रुचि नहीं थी क्योंकि कृषि कर्म में निरत होने का अर्थ था, एक स्थान पर स्थायी रूप से बस जाना।

जबकि परम्परागत रूप से आर्य पशुचारण में निरत रहकर नये-नये प्रदेश खोजते रहने में विश्वास रखते थे। इसके उपरांत भी धीरे-धीरे कृषि का विस्तार हो रहा था और सरिताओं के तटों पर आर्यों की बस्तियाँ बस गयी थीं जिन्हें वे जन कहते थे।

आर्य जन प्रकृति के उपासक थे। वे प्रकृति के निकट रहकर प्रकृति के रहस्यों को समझने में लगे हुए थे। उन्होंने असुरों, नागों, और द्रविड़ों की भांति पक्की ईंटों से भवन, पुर एवं दुर्ग बनाने के स्थान पर पर्ण-कुटियों के जनों की स्थापना को ही अधिक श्रेष्ठ माना था।

उन दिनों सिंधु, शतुद्रि, विपासा, परुष्णि, असिक्नी, वितस्ता तथा सरस्वती का सम्पूर्ण क्षेत्र सप्त सैंधव अथवा सप्तसिंधु कहलाता था। यह बहुत बाद की बात है कि गंगा-यमुना का क्षेत्र आर्य संस्कृति के प्रसार का केन्द्र बना। उन दिनों सप्तसिंधु क्षेत्र के ऊपरी भागों में आर्य बस्तियों का प्रसार था जिसका केन्द्र सरस्वती नदी थी तथा निचले क्षेत्रों में द्रविड़ सभ्यता विद्यमान थी जिसका केन्द्र सिंधु नदी थी। आर्यों तथा द्रविड़ों के पश्चिम में असुर प्रजा का निवास था। हिमालय की तराई में यक्ष, गंधर्व, किन्नर तथा किरात आदि अन्यान्य प्रजायें निवास करती थीं।

आर्यों के समान ही एक और प्रबल प्रजा भी तब तक अपनी पर्याप्त शक्ति स्थापित कर चुकी थी। नगों [27] में रहने के कारण यह प्रजा नाग कहलाती थी। नाग मूलतः आर्य प्रजा से ही विलग हुई एक शाखा थी। जहाँ आर्य जन सम्पूर्ण जीवन को कठोर तपस्या में व्यतीत करना श्रेयस्कर मानते थे वहीं नाग प्रजा जीवन के प्रवाह को मंद प्रवाही सलिला के समान व्यतीत करती थी।

नाग तपस्या में तन कसने के स्थान पर प्रकृति का यथा-संभव दोहन कर जीवन को सुखमय और सुविधा-सम्पन्न बनाने में विश्वास रखते थे। आमोद, प्रमोद और रति विलास में उनकी अधिक निष्ठा थी। यही कारण था कि  संस्कृति के उषःकाल [28] में ही आर्यों और नागों ने अलग-अलग मार्ग पकड़ लिये। आर्य यद्यपि नागों की संस्कृति को हेय [29] समझते थे फिर भी वे नागों से द्वेष अथवा वैर नहीं रखते थे।

विंध्याचल से काफी नीचे गहन वनों में रहने वाले वानर तब तक अपनी संस्कृति का निर्माण नहीं कर सके थे और न ही आर्यों से मित्रता स्थापित कर सके थे। यह काफी बाद की बात है कि जिस प्रकार आर्य-प्रजा देव-प्रजा को अपना स्वाभाविक हितैषी मानती थी उसी प्रकार वानर-प्रजा ने भी प्रकृति के अत्यंत निकट रहने वाले आर्यों की संस्कृति को अपनाया तथा उन्हें अपना परम हितैषी समझा।

उन दिनों शर्करा के तट से सिंधु नद तक पहुँचने के दो मार्ग थे। पहला मार्ग जलमार्ग था जो काफी असुविधाजनक और लम्बा था। छोटी नौकाओं से यह मार्ग पार नहीं किया जा सकता था। विशाल प्रवहणों [30] को भी इस मार्ग से सिंधु तक पहुँचने में कई माह लग जाते थे। द्रुमकुल्य के उत्तरी तट पर रहने वाली दोनों प्रमुख सभ्यताओं- असुर तथा द्रविड़ों ने विशाल प्रवहणों का निर्माण कर लिया था जिन पर बैठकर वे दूर-दूर की यात्रायें करते थे।[31]

दूसरा मार्ग, थल-मार्ग था जो अपेक्षाकृत कम लम्बा और कम असुविधाजनक था। इस मार्ग को पार करने के लिये मरूस्थल से होकर गुजरना पड़ता था। तीव्रगामी उष्ट्रों [32] से यह मरूस्थल लगभग एक माह में पार किया जा सकता था। विभिन्न सभ्यताओं के मध्य वाणिज्य-व्यापार करने वाले पणियों के सार्थवाह [33] अधिकांशतः इसी मार्ग को अपनाते थे।

वर्षों से समीप रहने के कारण असुरों तथा द्रविड़ों में पर्याप्त मेल था। सत्य तो यह था कि द्रविड़ असुरों के अनुगत थे तथा युद्धों में उनकी कोई रुचि नहीं थी इसलिये असुरों ने उन्हें अभय दे रखा था। द्रविड़ों को इससे कोई लेना-देना नहीं था कि असुर कैसे रहते हैं, क्या करते हैं और कितने विध्वंसकारी हैं! वे तो इसी में प्रसन्न थे कि असुर द्रविड़ों के पुरों  [34] पर आक्रमण नहीं करते हैं। केवल मद्य-मज्जा पाकर संतुष्ट हो जाते हैं।

– प्रथम अध्याय, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] द्रुमकुल्य का जल हरे रंग का दिखाई देता था। वाल्मिीकि रामायण में उल्लेख है कि भगवान श्रीराम ने अग्निबाण से इस समुद्र का उत्तरी भाग सुखा दिया जिससे मरुस्थल का निर्माण हुआ।

[2]  ध्वनि

[3] सतलज

[4] व्यास

[5]  रावी

[6] चिनाब

[7] झेलम

[8] परिपूर्ण

[9]  चम्बल

[10] नदी पात्रों की पुरातात्त्विक शोधों एवं उपग्रह फोटोग्राफी से इस प्रकार के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं किंतु सूक्ष्मकालक्रम निर्धारित करना कठिन है। महाकवि कालिदास ने भी सरस्वती को अन्तःसलिला कहा है। उपग्रह चित्रों से सरस्वती के पाँच प्राचीन मार्ग मिले हैं। प्रत्येक मार्ग पर यह नदी सहस्रों वर्ष तक बहती रही।

[11] मध्यकाल तक यह नदी राजस्थान के जोधपुर संभाग में बहती थी जिसे हाकड़ा कहा जाता था। मारवाड़ में कहावत है कि इस नदी का पानी मुल्तान चला गया। पाकिस्तान के चोलीस्तान रेगिस्तान में इसके 1000 किलोमीटर लम्बे सूखे नदी तल को हाकड़ा या वाहिन्द कहते हैं। इससे आगे सिन्ध प्रान्त में सिन्ध नदी से पूरब में असके समानान्तर चलने वाले हाकड़ा नदी तल को साकड़ा तथा नारा कहते हैं।

[12] इसका जल लवण युक्त अर्थात् खारा था, इसी से यह लवणाद्रि कहलाती थी। अब इसे लूनी के नाम से जाना जाता है। 

[13] जल प्रलय

[14] मनु अनेक हुए हैं। उनमें से विवस्वान् (सूर्य) का पुत्र ‘वैवस्वत मनु’ कहलाता है। इसी कारण मनु के वंशज ‘सूर्यवंशी’ तथा ‘मनुज’ कहलाये। वैवस्वत मनु इक्कीस प्रजापतियों में से एक था। यम, यमी, यमुना और शनि भी इसी विवस्वान की संतानें थीं।

[15] नदियों

[16] पत्तों की कुटिया

[17] कई ग्रामों का समूह मिलकर एक जन का निर्माण करता था। 

[18] यह एक प्रकार का पेय पदार्थ था। अनुमान होता है कि इसे एक विशिष्ट प्रकार की पर्वतीय लता के रस से बनाया जाता था।  वेदों में सोम को मौजवत कहा गया है जिससे अनुमान होता है कि सोम लतायें मूजवान् पर्वत पर पायी जाती होंगी। समस्त सचर अचर जगत में जो प्राण तत्व है उसे भी सोम कहते हैं। सोम शक्तिदायक और आनंददायक पेय था। ऋग्वेद में इसके सम्बंध में एक ऋचा इस प्रकार मिलती है-

ऊर्ध्व नुनुद्रेअ् वतं त ओजसा दाद्दहाणं चिद् बिभिदुर्वि पवर्तम्।

धमन्ता वाणं मरुतः सुदानवो मदे सोमस्य रण्यनि चक्रिरे ।।

अर्थात् मरुतों ने कूप को ऊपर उठा लिया और अपने मार्ग का अवरोध करने वाले पर्वत का भेदन कर डाला। दानवीर मरुतों ने वाण बजाते हुए सोम से मस्त होकर यजमानों को सुंदर दान दिये।

[19]  स्वर्ण

[20] मंत्र रचने वाले

[21]  वेदमंत्र

[22] पत्थर

[23] लकड़ी

[24] ताम्बा

[25]  कांसा

[26] गाय चराना

[27]  पर्वत

[28] प्रारंभ

[29]  हीन

[30] जलयानों 

[31] सिंधु सभ्यता की उत्तरी राजधानी हड़प्पा से प्राप्त मुहरों में ऐसी नावें दिखाई गई हैं जो समुद्र में लम्बी यात्रायें करने में सक्षम थीं। अनुमान लगाया जाता है कि ये नावें अरब सागर के किनारे-किनारे फारस की खाड़ी से होकर जाती होंगी।

[32] ऊंटों

[33]   व्यापारियों के समूह

[34] नगरों।

मरुस्थल का पथिक (2)

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मरुस्थल का पथिक

मरुस्थल का पथिक प्रतनु इस कार्य के लिये उन्हें पर्याप्त स्वर्ण चुकायेगा किंतु कोई भी सैंधव इतना बड़ा खतरा उठाने को तैयार नहीं हुआ। इस पर भी प्रतनु निराश नहीं हुआ। निराश होना तो उसने जैसे जाना ही नहीं।

अन्ततः वही हुआ जिसका प्रतनु को भय था। उसने कभी नहीं चाहा था इन आकृतियों को देखना किंतु वही भयावह आकृतियाँ सामने से तेज गति से चली आ रही थीं। प्रतनु ने चाहा भले ही हो किंतु चाहने भर से क्या होता है ? होता तो वही है जो नेत्रों के समक्ष घटित होता हुआ दिखाई देता है।

प्रतनु की रक्तवाहिनियों में भय की रेखा सी दौड़ पड़ी। जाने अब क्या हो ? एक साथ कई सारे प्रश्न उसके मन में सर्प की भांति फण उठाकर खड़े हो गये। क्या अब तक का समस्त उपक्रम व्यर्थ चला जायेगा ? क्या यह यात्रा यहीं आकर समाप्त हो जायेगी ? क्या उसके स्वप्न बिना साकार हुए ही सदा-सदा के लिये समाप्त हो जायेंगे ? क्या मोहेन-जो-दड़ो [1] और उसका पशुपति महालय अनदेखे ही रह जायेंगे ? क्या अनदेखी ही रह जायेगी सैंधव सभ्यता की महान नृत्यांगना रोमा और उसकी नृत्यकला ?

जैसे ही शकट [2] ने घनी झाड़ियों का झुरमुट पार किया कि पूर्व दिशा से आती हुई भयावह आकृतियाँ दिखाई दीं। चंद्रमा अभी आकाश में उदित नहीं हुआ था किंतु नक्षत्रों के क्षीण प्रकाश में ही वे भयावह आकृतियाँ प्रतनु को पर्याप्त दूरी होने पर भी दिखाई देने लगीं थीं।

रात्रि के गहन अंधकार में धुंधली छायाओं की तरह आने वाली उन आकृतियों को देखकर सिहर उठा मरुस्थल का पथिक प्रतनु। कौन हो सकते हैं ये लोग ? दानव, दैत्य, असुर, नाग, आर्य या फिर इन सबसे विलग किसी अन्य प्रजा से सम्बन्ध रखने वाले! संख्या में ये लगभग दस-ग्यारह प्रतीत होते हैं।

जो भी हों वे किंतु इतना तो निश्चित है कि उन काली आकृतियों ने प्रतनु के शकट को देख लिया है और वे प्रतनु की ओर ही आ रही हैं। उनकी चाल-ढाल उनके कठोर कर्मा होने घोषणा कर रही है। संभवतः असुर ही हों, क्योंकि इस क्षेत्र में उन्हीं के मिलने की संभावना सर्वाधिक है।

पणि-सार्थों [3] के साथ विचरण करने वाले अनुभवी सैंधवों ने तो बताया था कि इस भीषण ग्रीष्म में असुरों के दल मरुस्थल में विचरण नहीं करते। इन दिनों में वे या तो समुद्र तट पर स्थित असुर बस्तियों में और या फिर सैंधव क्षेत्र के उस पार पर्वतीय शंखला को पार करके वहाँ के उपजाऊ मैदानों में बने अपने पुरों[4] में ही निवास करते हैं।

शीत में जब पणियों के सार्थ मरुस्थल को पार करके पूर्व अथवा पश्चिम की ओर जा रहे होते हैं तभी असुर दल मरूस्थल में सक्रिय होते हैं और घात लगाकर पणि-सार्थो पर हमला करते हैं। इन दिनों में मरूस्थल के मार्ग अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रहते हैं किंतु ग्रीष्म के कारण मरूस्थल ‘रेत के भीषण समुद्र’ की भांति गर्जन करता रहता है जिसके कारण मरूस्थल को पार करना सुगम नहीं है।

शीघ्र ही उन काली आकृतियों ने प्रतनु का शकट आ घेरा। कुल मिलाकर आठ प्राणी हैं वे। अंधेरे में उनके चेहरे तो दिखाई नहीं दिये किंतु प्रतनु ने अनुमान लगाया कि वे असुर हैं। आसुरी भाषा में ही आदेश दिया उन्होंने- ‘इस शकट पर जो कोई भी है शकट छोड़कर नीचे आ जाये तत्काल।’

  – ‘इस शकट पर केवल मैं अकेला ही हूँ।’ प्रतनु ने आसुरी भाषा में ही प्रत्युत्तर दिया। असुरों की भाषा का कुछ-कुछ ज्ञान है प्रतनु को।

  – ‘तू तुरंत शकट छोड़कर नीचे आ जा।’ शकट पर बैठे व्यक्ति द्वारा आसुरी भाषा में प्रत्युत्तर देने के कारण असुरों को आश्चर्य हुआ। असुर तो इस प्रकार के शकटों पर यात्रा करते नहीं। फिर कौन हो सकता है शकट पर बैठा हुआ व्यक्ति! एक असुर ने शकट पर लगे मेष-चर्म को अपने काष्ठ अस्त्र से हटाकर देखा। उन्हें विश्वास नहीं हो पा रहा था कि शकट पर केवल एक ही व्यक्ति है। मेष-चर्म के हट जाने से असुरों की प्रसन्नता का पार न रहा। नक्षत्रों के क्षीण प्रकाश में भुने हुए यव[5] और मधुघट [6] को देखकर वे अपने स्थूल [7] होठों पर जिह्वा घुमाने लगे। असुरों का ध्यान उधर से हटाना आवश्यक हो गया प्रतनु के लिये।

  – ‘किंतु क्यों ? क्यों आ जाऊँ मैं शकट छोड़ कर नीचे ?’ प्रश्न करने का साहस जुटाया प्रतनु ने। प्रतनु कुछ समय चाहता था ताकि वह समझ सके कि इस विपत्ति से कैसे निबटा जा सकता है। असुरों को लगा कि शकट में बैठा व्यक्ति असुर ही है इसीलिये इस तरह निश्शंक होकर बैठा है और निस्संकोच प्रश्न कर रहा है।

  – ‘कौन है तू।’ नायक दिखाई देने वाले असुर ने प्रश्न किया।

  – ‘पथिक हूँ।’

  – ‘असुर, दैत्य या द्रविड़ ?

  – ‘द्रविड़।’

  – ‘आसुरि भाषा क्योंकर जानता है ?’

  – ‘कुछ सम्बन्ध रहा है मेरा असुरों से।’

  – ‘कैसा सम्बन्ध ? रक्त सम्बन्ध ?

  – ‘नहीं। रक्त सम्बन्ध नहीं, मैत्री का सम्बन्ध।’

  – ‘कहाँ ?’

  – ‘अपने पुर में।’

  – ‘पुर कहाँ है तेरा ?’

  – ‘मरूस्थल के पूर्वी छोर पर शर्करा के तट पर।’

  – ‘यहाँ क्या कर रहा है ?’

  – ‘मोहेन-जो-दड़ो जा रहा हूँ।’

  – ‘पण्य के लिये ?’

  – ‘मैं पणि नहीं, शिल्पी हूँ।’

  – ‘तो फिर किस लिये ?’

  – ‘पशुपति के वार्षिकोत्सव में सम्मिलित होने के लिये।’

पशुपति का नाम सुनते ही सारे असुर अपने अस्त्र फैंककर पृथ्वी पर लेट गये और ईशान-कोण [8] की ओर मुँह करके प्रणिपात किया उन्होंने। प्रतनु ने राहत की सांस ली। उसे लगा अब वे उतने घातक सिद्ध नहीं होंगे। प्रणिपात के बाद उठ खड़े हुए वे।

  – ‘सच कहता है ?’ नायक दिखाई देने वाले असुर ने फिर से प्रश्न आरंभ कर दिये।

  – ‘मिथ्या भाषण से क्या लाभ ?’

  – ‘भय नहीं लगता तुझे ?’

  – ‘किससे ?’

  – ‘इस तरह निर्जन मरूस्थल में एकाकी यात्रा करते हुए!’

  – ‘नहीं। मुझे भय नहीं लगता।’ प्रतनु का साहस पूरे विश्वास के साथ लौट आया था।

  – ‘असुरों से भी नहीं!’

  – ‘असुरों से क्यों लगेगा भय ? वे मेरे मित्र हैं।’

संकोच में पड़ गये असुर! पशुपति के निमित्त की जा रही यात्रा में बाधा उत्पन्न करना उचित होगा क्या ? फिर यह मरुस्थल का पथिक तो स्वयं को असुरों का मित्र बता रहा है और आसुरि भाषा भी जानता है। कुछ देर के लिये विवाद उत्पन्न हुआ असुरों के दल में।

इस बात पर तो सारे असुर सहमत थे कि पशुपति के निमित्त जा रहा यह द्रविड़ वध के योग्य नहीं है किंतु इस बात पर विवाद था कि द्रविड़ के शकट पर उपस्थित अन्न, जल और मधु छीनना उचित होगा या नहीं। नायक का कहना था कि इस द्रविड़ की हत्या करना अथवा अन्न, जल और मधु छीनकर मरूस्थल में जीवित छोड़ देना एक जैसा ही है। अंत में उन्होंने निश्चित किया कि द्रविड़ का स्वर्ण छीनकर उसे जाने दिया जाये।

प्रतनु अब भी शकट पर तन कर बैठा था और असुरों के वार्तालाप को सुनता हुआ आगे की रणनीति बना रहा था।

  – ‘तेरे पास जो स्वर्ण है उसे हमें सौंपकर तू जा सकता है द्रविड़।’ असुरों के नायक ने आदेश दिया।

  – ‘मैं कह तो चुका कि मैं पणि नहीं हूँ, शिल्पी हूँ। मेरे पास स्वर्ण नहीं है।’

  – ‘सच कहता है ?’

  – ‘तुम स्वयं देख सकते हो।’

  – ‘ठीक है तू ऐसे ही जा।’

असुरों की इस अप्रत्याशित भलमनसाहत से प्रसन्न होकर प्रतनु ने शकट पर उपस्थित मधुघट उन्हें उपहार में देना चाहा जिसे असुरों ने अस्वीकार कर दिया। आसुरि भाषा में ही उनके प्रति आभार प्रदर्शन कर प्रतनु ने मुक्ति की सांस ली और अपने उष्ट्र [9] को फिर से चलने का संकेत किया। विपुल समय असुरों ने व्यर्थ कर दिया। सोचा तो प्रतनु ने यह था कि आज रात्रि में पर्याप्त दूरी पार कर लेगा क्योंकि पिछली कुछ रात्रियों की अपेक्षा वायु आज असाधारण रूप से शांत थी तथा संध्याकाल से ही वातावरण का ताप भी कम था किंतु प्रतनु के साथ तो ठीक उसका विपरीत होता है जो वह पहले सोच लेता है।

कई रात्रियों से निर्जन[10] मरुवन में निरंतर चल रही इस दीर्घ यात्रा के समापन में अब भी कम से कम तीन रात्रियाँ शेष हैं। मरुस्थल की यात्रा भी कितनी विचित्र है। दिन में सूर्य रश्मियों [11] से बचने के लिये किसी मरूस्थलीय झाड़ी अथवा उष्ट्र-शकट की ओट में विश्राम करो और रात्रि भर नक्षत्रों की गणना करते हुए यात्रा करो।

नक्षत्रों की गणना के साथ-साथ कई तरह की गणनायें करता है मरुस्थल का पथिक शिल्पी प्रतनु। कहीं उष्ट्र-शकट पर विद्यमान जल अगले जलाशय के मिलने से पहले ही तो समाप्त नहीं हो जायेगा! भुना हुआ यव, सिंधु तट पहुँचने से पहले ही तो नहीं चुक जायेगा! कहीं रात्रि में झपकी आ जाने से वह मार्ग तो नहीं भटक जायेगा!

कहीं वायु के कुपित होने से आकाश को आच्छादित करने वाली[12] मृत्तिका[13] नक्षत्रों को तो नहीं ढंक लेगी जिससे रात्रि में उसके लिये दिशा निर्धारण करना कठिन हो जाये। कहीं उसके मोहेन-जो-दड़ो पहुँचने से पहले ही तो वरुण[14]  सिंधु के तट पर नहीं पहुँच जायेगा!

कहीं मार्ग में असुरों का कोई ऐसा दल तो उसे नहीं मिल जायेगा जो उससे जल, यव और शकट छीन कर इस भीषण मरूस्थल में भूख-प्यास से मरने के लिये तड़पता हुआ छोड़ दे। कितनी-कितनी आशंकाओं ने घेर रखा है उसे! बाहर से पूरी तरह आश्वस्त दिखाई देने पर भी भीतर से आशंकित है प्रतनु।

इन आशंकाओं के चलते मरुस्थल का पथिक प्रतनु कई उन चिंताओं से मुक्त है जिनसे कि उसे ग्रस्त होना चाहिये था। उसे ज्ञात ही नहीं कि इस कष्टप्रद यात्रा के कारण उसकी देह कितनी क्षीण हो चुकी है। उसे यह भी ज्ञात नहीं कि सूर्य की प्रखर रश्मियों ने उसकी देह के चर्म को झुलसा कर असुरों जितना काला बना दिया है। उसे यह भी ज्ञात नहीं कि जीवन के सबसे कठिन झंझावातों [15] की ओर वह स्वयं ही तेजी से बढ़ता चला जा रहा है। उसे यह भी ज्ञात नहीं कि फिर कभी वह अपने पुर को लौटेगा भी अथवा नहीं।

प्रतनु को तो इस समय केवल एक ही बात ज्ञात है- यात्रा और यात्रा। एक ऐसी यात्रा जिसका स्वप्न वह बचपन से देखता आ रहा है। एक ऐसी यात्रा जो उसे बहुत पहले कर लेनी चाहिये थी। नहीं जानता था प्रतनु कि इस यात्रा को इसी रूप में होना लिखा था उसके भाग्य में।

विचित्र यात्रा है यह भी। भला ऐसे भी कोई यात्रा करता है मरुस्थल की! यह ठीक है कि विस्तृत मरूस्थल को पार करके पणि-सार्थ पूरे सैंधव प्रदेश में पणिकर्म [16] हेतु विचरण करते हैं जिनके कारण मरूस्थल में कुछ मार्ग बन गये हैं और अब वह पहले की भांति अलंघनीय  [17]नहीं रहा है।

असुरों के दल भी बिना किसी विघ्न के मरूस्थलों में विचरण करते हैं किंतु पणियों और असुरों का आवागमन शीतकाल में ही होता है। वरुण तो मरूस्थल में आता ही नहीं। विकट ग्रीष्म में मरुस्थल पार करने का निश्चय तो साक्षात् मृत्यु को ही आमंत्रित करने जैसा है। कौन करना चाहेगा भला ऐसा!

अनुभवी सैंधवों ने प्रतनु का निषेध किया और कहा कि वह अपने इस विचार को त्याग दे किंतु शिल्पी प्रतनु ने सलाह देने वालों की किंचित् मात्र भी चिंता नहीं की। उसे तो इसी भीषण ग्रीष्म में मरुस्थल पार करना है और वह भी सिंधु के तट पर वरुण के आगमन से पहले। प्रतनु ने असुर-दलों और पणि-सार्थों के साथ कई बार मरूस्थल पार कर चुके अनुभवी व्यक्तियों से आग्रह  किया कि वे उसके साथ चलें और मरुस्थल में उसका मार्ग प्रशस्त करें।

मरुस्थल का पथिक प्रतनु इस कार्य के लिये उन्हें पर्याप्त स्वर्ण चुकायेगा किंतु कोई भी सैंधव इतना बड़ा खतरा उठाने को तैयार नहीं हुआ। इस पर भी प्रतनु निराश नहीं हुआ। निराश होना तो उसने जैसे जाना ही नहीं। कोई साथ नहीं चलना चाहता तो न चले। शिल्पी प्रतनु अकेला ही जायेगा मरुस्थल के पार, मोहेन-जो-दड़ो नगर तक। युवा प्रतनु ने निश्चय किया।

कई वर्षों से एक संकल्प ‘स्वप्न’ बनकर प्रतनु की आंखों में समाया हुआ है। उसे ही साकार होता हुआ देखता है वह दिन रात। प्रतनु चाहता है कि वह विशाल मरुस्थल के उस पार सप्त सैंधवों की उत्तरी राजधानी मोहेन-जो-दड़ो के पशुपति महालय में आयोजित होने वाले वार्षिक समारोह में भाग ले।

मोहेन-जो-दड़ो के उस विख्यात महालय को देखे जिसके निर्माण में प्रतनु के प्रपितामह ने मुख्य शिल्पी के रूप में कार्य किया था। प्रतनु चाहता है कि वह मोहेन-जो-दड़ो के महालय में लगी उन श्रेष्ठ प्रतिमाओं को देखे जिनके निर्माण में सैंधव सभ्यता के श्रेष्ठ शिल्पियों का वर्षों का श्रम छिपा हुआ है।

पिछले दो वर्षों में तो उसका यह संकल्प दृढ़ से दृढ़तर होता चला गया है जब से उसने मोहेन-जो-दड़ो महालय की प्रमुख नृत्यांगना रोमा के अद्भुत सौंदर्य और उसके अनिर्वचनीय नृत्य के बारे में सुना है।

उष्ट्र के वेग के साथ-साथ प्रतनु के मस्तिष्क में गतिमान विचारों में भी तीव्रता आ जाती है। शीत में ही निकलने वाला था प्रतनु मोहेन-जो-दड़ो के लिये किंतु कुछ प्रतिमायें थीं जिन्हें वह लम्बी यात्रा पर जाने से पहले पूरी करना चाहता था। इसी कारण विलम्ब हो गया और ग्रीष्म आ गया। जब तक प्रतनु अधूरी प्रतिमायें पूरी कर पाया, तब तक अंतिम पणि-सार्थ भी जा चुका था।  प्रतनु ने पूर्व में कई बार मरूस्थल पार कर चुके अनुभवी सैंधवों से मोहेन-जो-दड़ो के सही मार्ग की जानकारी प्राप्त की तथा मार्ग में आने वाली संभावित कठिनाइयों का पता लगाया। उनके आधार पर उसने दीर्घ यात्रा की तैयारी की और चल पड़ा ।

सैंधव प्रतनु का पुर पहले मरूस्थल के छोर पर नहीं था। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि पहले उनका पुर सरस्वती नदी के किनारे था और कालीबंगा [18] के नाम से विख्यात था। दूर-दूर तक उस नगर की ख्याति थी। सरस्वती के उपजाऊ तटों पर उन्होंने यव,[19]  धान्य,[20]  कर्पास[21]  और इक्षु [22] के विशाल खेतों का निर्माण किया था। 

कालीबंगा के शिल्पी मृत्तिका के सुंदर आभूषण, खिलौने, गुरिया,[23] चूड़ियाँ और घरेलू उपयोग की विविध सामग्री का निर्माण करते थे जिन्हें पणियों [24] के सार्थ खरीद कर ले जाया करते थे। सप्तसैंधव क्षे़त्र में दूर-दूर बसे सैंधव-पुरों में ही नहीं अपितु नागों, दैत्यों और असुरों की बस्तियों में भी कालीबंगा की सामग्री की बड़ी प्रतिष्ठा थी। 

उसने अपने माता-पिता और अन्य व्यक्यिों से सुना है कि पर्वत प्रदेशों से आये युद्ध-प्रिय आर्यों ने सैंधवों के कई पुरों को तोड़ा। उन्होंने कालीबंगा के विशाल पुर को भी तोड़ डाला। बड़े-बड़े अश्वों पर बैठ कर आये थे वे-‘कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्’ का उद्घोष करते हुए।

लम्बे भालों और धनुषों से छोड़े जाने वाले तीरों के बल पर द्रविड़ों को बहुत ही सरलता से परास्त कर दिया उन्होंने। शांतिप्रिय द्रविड़ उनका प्रतिरोध नहीं कर सके। करते भी कैसे! द्रविड़ों के पास न तो अश्व थे और न अस्त्र-शस्त्र। [25] द्रविड़ों ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि कभी कोई उन पर आक्रमण भी कर सकता है। बात की बात में सैंधवों का कालीबंगा आर्यों के ब्रह्मावर्त में विलीन हो गया।

यव और धान्य खाकर संतुष्ट रहने वाले कला के उपासक द्रविड़ों में युद्ध के प्रति कभी अनुराग ही नहीं रहा। युद्ध तो असुरों और दैत्यों के लिये प्रिय हो सकता है, द्रविड़ों के लिये नहीं। नागों में भी युद्ध-अभियान की परम्परा है किंतु द्रविड़ों ने कभी युद्ध की इच्छा नहीं की। इसी कारण परस्पर युद्धरत रहने वाले असुर, दैत्य और नाग भी कभी द्रविड़ों के पुर पर आक्रमण नहीं करते।

पुर टूट जाने पर प्रतनु के शांति-प्रिय पूर्वज कालीबंगा छोड़कर ऐलाना[26] में आ बसे थे, मरूस्थल के पूर्वी छोर पर जहाँ शर्करा नाम की छोटी सी नदी बहती है। शर्करा के तट पर भी धान्य, यव, कर्पास और इक्षु के विशाल खेत खड़े कर लिये थे चतुर सैंधवों ने। कहते हैं शर्करा सरस्वती की ही छोटी धारा है। अपने पिता से ही जाना प्रतनु ने कि सरस्वती के ऊपरी छोर पर अब आर्यों की बस्तियों का प्रसार हो गया है और द्रविड़ों के पुर नदी के निचले भाग में खिसक आये हैं।

  – ‘इसका अर्थ यह हुआ कि हम आर्यों की ओर से बहकर आने वाला जल पी रहे हैं। अर्थात् हम आर्यों का उच्छिष्ट [27] पी रहे हैं। क्यों पीयें हम उच्छिष्ट!’ प्रतनु के मन में विद्रोह जागता।

  – ‘नदियाँ कभी उच्छिष्ट नहीं होतीं पुत्र! उनमें तो वरुण निवास करता है। वरुण को कौन उच्छिष्ट कर सकता है!’ पिता हँस देते थे प्रतनु की उत्तेजना पर।

  – ‘किंतु वे उस स्थान पर बैठे हैं जहाँ कभी हम रहते थे। हमें प्रतिकार करना चाहिये उनका।’

  – ‘प्रतिकार का अर्थ है रक्तपात और रक्तपात कभी शांति नहीं ला सकता। इससे मातृदेवी कुपित होती हैं।’ पिता स्नेह से समझाते थे किंतु प्रतनु को अच्छी नहीं लगती थी उनकी शांति की बातें।

पुर-वासी बताते हैं कि जिन दिनों उनका पुर कालीबंगा के किनारे स्थित था, उन दिनों प्रतिवर्ष बहुत से नागरिक कालीबंगा से मोहेन-जो-दड़ो जाया करते थे पशुपति का वार्षिकोत्सव देखने। कालीबंगा से मोहेन-जो-दड़ो की दूरी बहुत अधिक थी। फिर भी  प्रतिवर्ष बहुत से सैंधव वहाँ जाते थे। वार्षिकोत्सव के बहुत से रोचक प्रसंग वे वर्ष भर कहते-सुनते थे। जिन्हें सुन-सुनकर प्रतनु के मन में यह संकल्प बचपन से ही बन गया कि एक बार वह भी अवश्य ही मोहेन-जो-दड़ो  जायेगा और पशुपति महालय का वार्षिक समारोह देखेगा।

शकट का एक पहिया छोटे से गढ़े में चले जाने से एक झटका सा लगा जिससे  प्रतनु अपने विचारों के प्रवाह से बाहर आया। वातावरण में शीत बढ़ जाने से एक कंपकंपाहट सी दौड़ गयी उसकी देह में। अपनी देह पर पड़े उत्तरीयक [28] को अच्छी तरह से लपेटा उसने। विचित्र है मरूस्थल का मौसम भी! दिन भर देह को झुलसा देने वाला ताप अपने चरम तक बढ़ता ही जाता है और रात्रि में यही तापक्रम इतना कम हो जाता है कि दांत कड़कड़ा ने लगते हैं।

दोनों की ही चिंता किये बिना ठीक पश्चिम में चलते जाना है उसे। उसने आँख उठाकर उत्तर दिशा में आकाश की ओर देखा, सप्त नक्षत्रों का खटोला[29] उत्तर में चमक रहा है।  सप्त सिंधुओं के प्रतीक यही सप्त नक्षत्र रात्रि में एकमात्र अवलम्ब हैं इस मरुस्थल में दिशा जानने के लिये। ठीक दिशा में जा रहा है वह। आश्वस्त होता है प्रतनु और फिर से उसके विचारों का प्रवाह आरंभ हो जाता है।

प्रतनु के पिता ने प्रतनु को आश्वासन दे रखा था कि कभी अवसर मिला तो वह प्रतनु को इस समारोह  में ले जायेंगे किंतु कठिन काल का निर्णय कुछ और ही था। प्रतनु के पिता अचानक एक दिन सर्प-दंश के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गये और बालक प्रतनु की साध मन में ही रह गयी। वर्ष पर वर्ष व्यतीत होते रहे और शैशव का वह संकल्प युवा प्रतनु के मन में स्वप्न बनकर स्थिर हो गया।

कई वर्ष तो उसे उष्ट्र क्रय करने के लिये पर्याप्त स्वर्ण-भार [30] एकत्र करने में लग गये। एक उष्ट्र योग्य स्वर्ण जुटाने की चाह में रात-रात भर छैनी चलाता रहा है प्रतनु। इसी अभ्यास के कारण प्रतनु की अंगुलियों में जैसे जादू आ बैठा। उसकी छैनी प्रस्तर को छूती भर ही है और एक सुन्दर शिल्प स्वमेय उपस्थित हो जाता है। कैसे कोई प्रस्तर देखते ही देखते प्रतिमा में बदल जाता है, स्वयं प्रतनु भी नहीं जानता।

लोग कहते हैं प्रतनु जैसा शिल्पी द्रविड़ों में अब से पहले कभी नहीं हुआ। इसी ख्याति के कारण दूर-दूर तक जाने वाले पणियों के सार्थ बड़ी संख्या में प्रतनु से प्रतिमायें क्रय करने लगे। इससे एक साथ दो लाभ हुए प्रतनु को। एक तो उसे उष्ट्र क्रय करने के लिये स्वर्ण-भार जुटाने में कम समय लगा और दूसरी ओर उसकी ख्याति विशाल मरुस्थल को पार करके सिंधु के तटों तक पहुँच गयी।

पणियों के साथ विचरण करने वाले सैंधव बताते हैं कि सिंधु के तट पर बसे पुरों में इन दिनों दो ही बातों की धूम है- एक तो मोहेन-जो-दड़ो के पशुपति महालय की प्रधान नृत्यांगना रोमा की नृत्यकला की और दूसरी ऐलाना के शिल्पी प्रतनु की शिल्पकला की। 

विचारों के प्रवाह को अब भी विराम नहीं मिलता यदि पूर्व में सूर्य देव के आगमन के चिह्न न प्रकट होने लगते। प्रतनु ने आज दिन में भी विश्राम नहीं करने का निर्णय लिया। वह शीघ्र से शीघ्र असुरों से दूर हो जाना चाहता है। कौन जाने उनका मन कब बदल जाये। दिन के उजाले में उसने देखा कि बालुका स्तूपों का आकार छोटा हो चला है। ऐसा प्रतीत होता है कि मरूस्थल की सीमा समाप्त होने को है। वनस्पतियों और पक्षियों की आकृतियों में भी काफी परिवर्तन अनुभव कर रहा है वह।

– दूसरा अध्याय, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] सिंधु प्रदेश की दक्षिणी राजधानी जो सिंधु नदी के तट पर स्थित थी। अब यह सिंधु नदी से लगभग साढ़े तीन मील की दूरी पर स्थित है।

[2] पुरातत्ववेत्ता मैके को चहुन्दड़ो में छकड़े के दो खिलौने मिले थे। हड़प्पा में भी पीतल का एक छकड़ा पाया गया। मोहेन-जोदड़ो तथा हड़प्पा से छकड़े के पहिये और तख्ते भी मिले हैं। कुछ ऐसी गाडि़यां भी मिली हैं जिनमें पहिये लगे हुए हैं तथा जानवर जुते हुए हैं।

[3] वाणिज्य कर्म करने वालों के समूह

[4] नगरों।

[5] जौ

[6] शहद का घड़ा

[7] मोटे

[8] उत्तर-पूर्व दिशा। इस स्थान से कैलास पर्वत ईशान-कोण में ही स्थित है।

[9] सैंधव सभ्यता के स्थलों से प्राप्त खिलौनों में ऊँटों की मूर्तियाँ भी हैं।

[10] मनुष्य विहीन

[11] सूर्य किरणों

[12] ढकने वाली

[13] मिट्टी

[14] जल का देवता

[15] आंधियों

[16] व्यापार

[17] जिसे लांघा न जा सके

[18] कालीबंगा का अर्थ होता है काली चूडि़याँ। किसी समय यह नगर सरस्वती के किनारे स्थित था जहाँ सैंधव सभ्यता के पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। पुरातात्विक खुदाई में सभ्यता के तीन स्तर निकले हैं, जो एक दूसरे के ऊपर स्थित हैं। सबसे नीचे का स्तर आज से साढ़े सात हजार वर्ष पूर्व का बताया जाता है। मध्य स्तर आज से पाँच हजार वर्ष पुराना है तथा सबसे ऊपर का स्तर ढाई से तीन हजार वर्ष पुराना है। यहाँ से मिली पुरातात्विक वस्तुओं में मिट्टी से बनी सामग्री की बहुलता है। कालीबंगा के अवशेष उत्तरी राजस्थान में पीलीबंगा के निकट देखे जा सकते हैं। इस नगर के निकट से एक प्राचीन कालीन नदी के प्रवाहित होने के संकेत भी प्राप्त होते हैं। यहाँ से सिंधु कालीन खेत भी मिले हैं जिनमें हल चला हुआ है।

[19] जौ।

[20] चावल।

[21] कपास।

[22] गन्ना।

[23] मिट्टी के मनके ।

[24] पण शब्द से पण्य और पणि शब्दों की व्युत्पत्ति हुई है। पण का अर्थ होता है मुद्रा, पण्य का व्यापार और पणि का अर्थ होता है मुद्रा से व्यापार करने वाला। पणि से ही पणिया और बनिया शब्दों की व्युत्पत्ति हुई।

[25] सिंधु सभ्यता के समस्त प्रमुख स्थलों की खुदाई से अस्त्र-शस्त्र अत्यंत नगण्य मात्रा में प्राप्तहुए हैं। हड़प्पा में ताम्बे की कटारें, भाले, बर्छी, तथा धनुष बाण प्राप्त हुए हैं। अनुमान होता है कि ये हथियार शिकार करने तथा आंतरिक सुरक्षा के काम आते होंगे। अस्त्र-शस्त्रों की न्यूनतम उपस्थिति इस ओर संकेत करती है कि उन्हें अपने शत्रुओं से युद्ध करने की आवश्यकता नहीं थी। ऐसा अनुमान होता है कि पर्वतों की उत्तुंग श्रेणियों, समुद्र की उत्ताल तरंगों और मरूस्थल की दहकती हुई बालू के कारण सिंधु प्रदेश आक्रमणकारियों के भय मुक्त था। इतिहासविदों का अनुमान है कि सिंधुघाटी सभ्यता और मैसोपोटामिया के बीच व्यापारिक सम्बंध थे। बहरीन वस्तुओं के विनिमय का एक बड़ा केन्द्र था। व्यापारी मिट्टी के बर्तन, अनाज, सूती कपड़े, मसाले, पत्थर की मणियाँ, मोती और सुर्मा भारत से ले जाते थे और वहाँ से धातु का सामान लाते थे।

[26] ऐलाना से भी तृतीय कांस्यकालीन सभ्यता के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। यह स्थल जोधपुर संभाग के जालोर जिले में स्थित है। जालोर जिले का यह क्षेत्र मध्यकाल तक सारस्वत क्षेत्र कहलाता था।

[27] झूठन।

[28] शरीर पर ओढ़ने की चद्दर

[29] जिस प्रकार आर्य आकाश के इन सात नक्षत्रों को सप्त ऋषि मण्डल कहकर पुकारते थे, उसी प्रकार सप्त सैंधव प्रदेश में इन सात नक्षत्रों को सप्त सिंधुओं के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा हो, ऐसा मानने में कोई अतिश्योक्ति नहीं हेागी।

[30] सभ्यताओं के विकास के साथ-साथ वस्तु विनिमय का तो प्रचलन तो हुआ ही, साथ ही स्वर्ण की एक निश्चित मात्रा देकर भी मूल्यवान वस्तुओं का क्रय-विक्रय किया जाता रहा। सैंधव सभ्यता से मिट्टी की बनीं मोहरें बड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं। अनुमान होता है कि ये मोहरें मुद्रा के रूप में प्रचलित रही होंगी। बड़ी संख्या में बाट भी प्राप्त हुए हैं। अधिंकाश बाट 16 अथवा उसके गुणज भार के हैं जैसे- 16, 64, 160, 320, 640 आदि। सैंधव वासी स्वर्ण के प्रयोग और उसकी महत्ता से भी भली भांति परिचित थे अतः सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि बहुमूल्य वस्तुओं के विनिमय के लिये स्वर्ण-भार उपयोग में लाया जाता रहा होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता के उपन्यास मोहनजोदारो की नृत्यांगना का द्वितीय अध्याय।

मोहेन-जो-दड़ो (3)

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मोहेन-जो-दड़ो

मोहेन-जो-दड़ो के पशुपति महालय का प्रधान पुजारी किलात सैंधव सभ्यता के महान दार्शनिक कोल्या की सातवीं पीढ़ी का वंशज है। कोल्या सैंधव सभ्यता का अनुभवी पुरोहित, गूढ़ उपदेशक, सुप्रसिद्ध न्यायकर्ता और दृढ़ प्रशासक था।

सिंधु नदी के तट पर स्थित मोहेन-जो-दड़ो! [1] आज से पाँच हजार साल पहले भारत भूमि पर पल्लवित और पुष्पित होने वाली सैंधव सभ्यता का एक प्रमुख और समृद्ध नगर। मोहेन-जो-दड़ो सिंधु तट से कुछ ऊँचाई पर बसा हुआ है ताकि सिंधु में प्रत्येक वर्ष आने वाली बाढ़ से सुरक्षित रह सके।

सिंधु के प्लावन से बचने के लिये नगर को चारों ओर से ईंटों की विशाल प्राचीर से घेर दिया गया है तथा नगर से कुछ ही पूर्व सिंधु नदी पर एक विशाल बांध भी बना दिया गया है।[2] नगर प्राचीर न केवल सिंधु के जल को अपितु वन्य पशुओं को भी नगर में घुसने से रोकती है।

मोहेन-जो-दड़ो की बसावट का प्रमुख आधार हैं यहाँ की चैड़ी और एक दूसरे को समकोण पर काटती हुई साफ-सुथरी सड़कें। [3] ये सड़कें एक दूसरे को जिस स्थान पर काटती हैं वहाँ नगर रक्षकों की चैकियाँ स्थापित हैं। इन चैकियों में अहिर्निश  नगर रक्षकों का सशस्त्र पहरा रहता है।

रात्रि में इन चैकियों पर प्रकाश की भी व्यवस्था रहती है ताकि कोई अपराधी अंधेरे का लाभ उठाकर नागरिकों को कष्ट न पहुँचाये। मोहेन-जो-दड़ो की सफाई व्यवस्था अन्य सैंधव नगरों से काफी उन्नत है। सड़कों के दोनों ओर बनी हुई पक्की नालियाँ ईंटों से ढकी हुई हैं।

जहाँ ये नालियाँ एक दूसरे से समकोण पर मिलती हैं, वहाँ कुछ उथले खड्डे कर दिये गये हैं ताकि नालियों में बहकर आने वाला कचरा उन खड्डों में जमा हो जाये और उसके ऊपर से होकर पानी आगे बहता रहे, नालियों को तोड़कर मार्ग में न फैले। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कचरापात्र रखे हैं। जिन्हें नित्य ही प्रक्षालन-कर्मकारों द्वारा खाली किया जाता है।

नालियों से कुछ हटकर पक्की ईंटों के दो-तीन मंजिला भवन हैं जिनमें विविध व्यवसाय करने वाले सम्पन्न, कला-प्रिय, धर्म-परायण और रुचिवान सैंधव नागरिकों का निवास है। नागरिकों की धर्म-परायणता का परिचय मिलता है नगर में स्थित दैवीय चबूतरों और महालयों से। प्रजनन देवी[4] के मंदिरों के साथ-साथ प्रजनक देव [5] और पशुपति [6] के कई छोटे बड़े महालय नगर की शोभा और श्री में वृद्धि करते हैं।

प्रजनन देवी के मंदिर विविधाकार योनियों की आकृति में बने हैं [7] जिनमें विविधाकर योनियाँ स्थापित हैं। इन योनियों की पूजा मातृशक्ति के प्रतीक के रूप में होती है। कुछ मंदिरों में मातृदेवी की निर्वसन प्रतिमायें भी स्थापित हैं। [8] मातृदेवी ने सिर पर शृंग [9] धारण कर रखे हैं।

किसी-किसी प्रतिमा के सिर पर शृंगों के स्थान पर त्रिशूल तथा किसी-किसी प्रतिमा के सिर पर कुल्हाड़ी बंधी हुई है। कुछ मंदिरों में स्थापति मातृदेवी की दिव्य देह पर पटका, मेखला तथा हार सुशोभित हैं। सैंकड़ों-सहस्रों वर्षों से सैंधव-जन प्रजनन देवी अर्थात् मातृदेवी की पूजा करते आये हैं।

मातृदेवी! जिसने जन्म दिया है न केवल समस्त नर-नारियों को अपितु समस्त पशु-पक्षियों और वनस्पतियों को भी। सम्पूर्ण सृष्टि उसी के गर्भ से निकली है। मातृदेवी के मुख्य मंदिर में मातृदेवी की विशाल प्रतिमा स्थापित है जिसके गर्भ से वनस्पतियों का उत्स हो रहा है तथा चारों ओर विविध पशु-पक्षी तथा नर-नारी नमस्कार की मुद्रा में बैठे हैं जो इस बात के द्योतक हैं कि मातृदेवी न केवल सैंधव-जनों की प्रजनन देवी के रूप में पूजित हैं अपितु वे ही वनस्पतियों एवं पशु-पक्षियों से पूरित इस सम्पूर्ण सृष्टि की आदि देवी-प्रजनन देवी हैं। [10]

प्रजनक देव के मंदिरों में विविधाकार लिंग स्थापित हैं जिनकी पूजा पितृशक्ति के प्रतीक के रूप में होती है। कुछ मंदिरों में स्वयं पशुपति पितृदेव के रूप में स्थापित हैं। पशुपति सिर पर सींग तथा गले में सर्पों की माला धारण किये हुए हैं। [11] पितृदेव के शरीर पर भी किसी तरह के वस्त्र अथवा आभूषण नहीं हैं। ऊँचे कूबड़ वाला वृषभ पशुपति का मुख्य वाहन है जिसके एक सींग पर त्रिशूल तथा दूसरे सींग पर डमरू बंधा हुआ है। पशुपति की विशाल जटायें चारों दिशाओं में उन्मुक्त भाव से लहरा रही हैं जो इस बात की घोषणा करती हुई प्रतीत होती हैं कि पशुपति ही समस्त दिशाओं के स्वामी हैं।

नगर के ठीक मध्य में मोहेन-जो-दड़ो का प्रमुख पशुपति महालय स्थित है जिसमें प्रधान पुजारी किलात रहता है। इसी महालय से सैंधव सभ्यता के दक्षिणी भाग का शासन चलता है। [12] उत्तरी भाग का शासन चलाने के लिये हरियूपिया में अलग से एक और विशाल पशुपति महालय स्थापित किया गया है जिसे सैंधव राज्य की उत्तरी राजधानी कहा जा सकता है। [13]

मोहेन-जो-दड़ो के पशुपति महालय का प्रधान पुजारी किलात सैंधव सभ्यता के महान दार्शनिक कोल्या की सातवीं पीढ़ी का वंशज है। कोल्या सैंधव सभ्यता का अनुभवी पुरोहित, गूढ़ उपदेशक, सुप्रसिद्ध न्यायकर्ता और दृढ़ प्रशासक था। वह विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करता हुआ दीर्घ समय तक सैंधवों की उन्नति में संलग्न रहा। वह परुष्णि नदी के ऊपरी किनारे का रहने वाला था। उसका पुर भी आर्यों द्वारा नष्ट कर दिया गया था। अब वहाँ आर्यों का जन निवास करता है। पशुपति महालय की स्थापना करने से पूर्व उसने विभिन्न प्रांतरों का भ्रमण करके अपने आप को दिव्य अनुभवों से सम्पन्न किया था। उसी ने सैंधवों को एक सुगठित लिपि का निर्माण करके दिया ताकि सैंधव जनों द्वारा संचित ज्ञान केवल मौखिक रूप में नहीं रहे तथा कुछ समय बाद विस्मृत न कर दिया जाये।

कोल्या ने ही सैंधवों को मिट्टी की पट्टियों पर लिखना और पट्टियों को आग में तपाकर सुरक्षित रखना सिखाया। [14] उसने यह कला पश्चिमी प्रांतरों की यात्रा के दौरान श्वेत जाति के लोगों से सीखी थी। [15] कोल्या ने सैंधवों को ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में जितना आगे बढ़ाया, वह सैंधवों में सहस्रों वर्षों तक स्मरण किये जाने के लिये पर्याप्त है। यही कारण है कि कोल्या के पश्चात् उसी के वंशज पशुपति महालय के प्रधान पुजारी होते आये हैं।

पशुपति के प्रमुख महालय से कुछ हटकर विशाल स्नानागर बने हुए हैं जिनमें विशेष पर्वों पर नागरिक एवं पुजारी स्नान करते हैं। यह एक आश्चर्य ही प्रतीत होता है कि वर्ष पर्यन्त प्रवाहित होने वाली विशाल नदी के तट पर स्थित होने के उपरांत भी मोहेन-जो-दड़ो के प्रत्येक घर में एक कुआँ तथा स्नानागार है। सबसे अधिक आश्चर्यजनक तो ये कि नगर में सार्वजनिक उपयोग हेतु भी महालय की ओर से स्नानागार बने हुए हैं। ये स्नानागार न केवल विशाल अण्डाकार कुओं से अपितु विशाल आयताकार जलकुण्डों से भी युक्त हैं। मंदिरों में प्रवेश करने से पूर्व समस्त नागरिकों को इन कुण्डों एवं स्नानागारों में स्नान करके पवित्र होना होता है।

नगर में एक और आश्चर्य है जो देखते ही बनता है। यहाँ का कोई भी भवन मुख्य मार्ग पर नहीं खुलता। समस्त भवन के द्वार गलियों में खुलते हैं और गलियों से निकल कर मुख्य मार्ग तक आना होता है। नगर से बाहर एक ओर कुंभकारों और शिल्पकारों की बस्तियाँ हैं ताकि नागरिकों को आवां से निकलने वाले धुएं और छैनी हथौड़ियों से उत्पन्न होने वाले शोर से व्यवधान न हो। कृषकों और पशुपालकों की बस्तियाँ भी नगर के एक ओर बनी हुई हैं।

नगर से कुछ ही दूर सिंधु मंथर वेग से बह रही है जिसके निर्मल जल में विविध प्रकार की रुपहली मछलियों एवं कोकिल कण्ठी जल-पक्षियों की भरमार है। दिन में सिंधु की तरल तरंगों पर चमकती सूर्य रश्मियाँ और रात्रि में चन्द्रमा की ज्योत्सना सिंधु के सौंदर्य को शत-शत गुणा बढ़ा ही नहीं देतीं अपितु उसे रहस्यमय कांति भी प्रदान कर देती हैं।

सिंधु के दोनों ओर दूर-दूर तक विशाल वन फैले हुए हैं जिनमें विविध प्रकार के पशु-पक्षियों का निवास है जो सिंधु के तट पर पानी पीने के लिये झुण्ड बनाकर आते रहते हैं। मोहेन-जो-दड़ो के नागरिक भी वन्य-उपज प्राप्त करने तथा आखेट खेलने के लिये वनों में जाते रहते हैं। [16] सिंधु के तट पर खड़े इन उदार वनों से मोहेन-जो-दड़ो वासियों की विविध आवश्यकतायें पूरी होती हैं। मोहेन-जो-दड़ो के मछुआरे बड़ी-बड़ी नौकाओं में बैठकर सिंधु के अथाह जल में दूर-दूर तक पाई जाने वाली मछलियाँ पकड़ने जाते हैं। उनके लौटने पर सिंधु तट पर उत्सव का सा दृश्य उपस्थित होता है।[17] 

 सैंधव सभ्यता के कृषकों ने सिंधु के उपजाऊ तटों पर विशाल खेत तैयार कर लिये हैं जिनमें शीतकाल में यव तथा ग्रीष्म काल में कर्पास एवं धान्य बोया जाता है। इक्षु वर्ष भर होता है जिसे विशाल कोल्हुओं में पेर कर इक्षु रस प्राप्त किया जाता है। सैंधवों को यव और इक्षु-रस के योग से निर्मित सुरा तथा फलों से निर्मित विविध प्रकार के आसव भी अत्यंत प्रिय हैं।

ऊषा के आगमन में अभी विलम्ब है किंतु सिंधु में झिलमाने वाले तारामण्डलों की आभा क्षीण हो चली है। सैंधव प्रदेश का विशाल खग-कुल [18] और सिंधु का सम्पूर्ण जल-कुल [19] अभी भी निद्रा में बेसुध है किंतु मोहेन-जो-दड़ो का जन-कुल [20] आज खग-कुल और जल-कुल के निद्रा त्यागने से पहले ही अपनी शैय्याएं त्यागने को तत्पर दिखाई देता है।

यूँ तो नित्य ही सूर्योदय से पहले मोहेन-जो-दड़ो के नागरिक शैय्या त्याग कर अपने नित्य कर्मों में लग जाते है किंतु आज सूर्योदय से काफी पहले ही चहल-पहल आरंभ हो गयी है तो उसका कारण केवल यह नहीं कि आज पशुपति के प्रधान मंदिर का वार्षिकोत्सव है और सूर्योदय से काफी पहले उन्हें सिंधु पूजन के लिये सिंधु तट पर उपस्थित होना है अपितु यह कि मोहेन-जो-दड़ो के नागरिक पूरी रात इस उत्तेजना में सो नहीं सके हैं कि पशुपति महालय की प्रधान देवबाला रोमा और अन्य देवबालायें आज के वार्षिकोत्सव में चन्द्रवृषभ नृत्य करने वाली हैं।

मोहेन-जो-दड़ो वासियों को ही नहीं अपितु दूर-दूर तक बसे सैंधव नगरों एवं राजधानी मोहेनजोदड़ो तक के निवासियों को इस उत्सव की विशेष प्रतीक्षा रहती है। इस उत्सव में सम्मिलित होने के लिये सहस्रों नर-नारी प्रतिवर्ष सैंकड़ों योजन [21] लम्बा मार्ग तय करके मोहेन-जो-दड़ो पहुँचते हैं। सैंधव सभ्यता की राजधानियों मोहेनजोदड़ो एवं हरियूपिया के साथ-साथ अमरी, झूंकरदड़ो, ऐलाना, पेरियानो, चहुन्दड़ो, सुत्कोटड़ा आदि नगरों [22] से भी बड़े-बड़े कलाविद् और गुणीजन मोहेन-जो-दड़ो पहुँचते हैं और बड़े उत्साह से इस उत्सव में भाग लेते हैं। जब से मोहेन-जो-दड़ो पशुपति महालय की प्रधान नृत्यांगना रोमा की ख्याति सैंधव सभ्यता के नगरों में फैली है तब से मोहेन-जो-दड़ो के वैभव, श्री और ख्याति में कई गुणा वृद्धि हो गयी है।

इस बार भी मोहेन-जो-दड़ो में बाहर से आये अतिथियों की धूम-धाम है। इन अतिथियों में वयोवृद्ध कलाकार कला की नवीन ऊँचाइयों को देखने का रोमांच मन में लेकर आये हैं तो कई नगरों से पशुपति महालयों की देवबालायें देवी रोमा के नृत्य की बारीकियों को सीखने और उसे आत्मसात करने की अभिलाषा लेकर आई हैं। सहस्रों नर-नारी तो देवी रोमा की एक झलक पाने की चाव में अपने शकटों पर कई-कई दिनों की यात्रा करके आये हैं। मनचले रूपपिपासु युवकों की भी कमी नहीं जो देवी रोमा की सुंदर देह सम्पदा पर जी भर कर दृष्टिपात करके अपने नेत्रों को धन्य कर लेना चाहते हैं।

बाहर से आये अतिथियों से मोहेन-जो-दड़ो की अतिथिशालायें, महालय और विश्रामालय पूरी तरह से जन आप्लावित [23] हो गये हैं। जिन साधारण जन-गुल्मों [24] को किसी सुरक्षित स्थान में आश्रय लेने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ है, उन्होंने जनपथ के किनारे मुक्त गगन के नीचे ही डेरा डाल दिया है।

मुक्त गगन के नीचे डेरा लगाने वाले इन्हीं अतिथियों के बीच शर्करा-तट से आया युवा शिल्पी प्रतनु भी है। वह कल रात्रि में ही मोहेन-जो-दड़ो पहुँचा था। सौभाग्य से वरुण भी कल ही सिंधु तट पर पहुँचा। यदि प्रतनु को एक दिन भी विलम्ब हो जाता अथवा वरुण एक दिन भी पहले आ जाता तो प्रतनु पशुपति महालय के वार्षिकोत्सव में सम्मिलित होने से वंचित रह जाता।

वह रात्रि में काफी विलम्ब से मोहेन-जो-दड़ो पहुँचा था और पूरे दिन भीगते रहने के कारण काफी थक गया था। अतः अपने लिये उपयुक्त आश्रय नहीं खोज पाया था। वह तो ठीक था कि उत्सव के कारण नगर प्राचीर [25] के कपाट [26] देर रात्रि तक खुले रखे गये थे अन्यथा उसे सम्पूर्ण रात्रि सिन्धु तट पर ही व्यतीत करनी पड़ती।

प्रतनु नहीं जानता था कि वह इतनी प्रसिद्धि पा चुका है कि यदि वह अपना परिचय नगर रक्षकों को देता तो उसके लिये आश्रय की अनुकूल व्यवस्था रात्रि में ही हो जाती। कुछ तो अपनी ख्याति से पूर्णतः परिचित न होने के कारण और कुछ इसलिये भी कि वह स्वाभिमानी और मौजी स्वभाव का व्यक्ति है, किसी से अपने लिये प्रार्थना करना उसके स्वभाव में नहीं है, उसने अपना डेरा जन-सामान्य के साथ मुक्त आकाश के नीचे लगाना ही अधिक उपयुक्त समझा, भले ही सम्पूर्ण रात्रि वरुण से भीगते हुए व्यतीत करनी पड़े।

चकित है शिल्पी मोहेन-जो-दड़ो को देखकर। कोई पुर इतना समृद्ध, इतना विशाल और इतना सुरक्षित हो सकता है, इसकी तो वह कल्पना भी नहीं कर सकता था। उसके पूर्वजों का नगर कालीबंगा ही इसकी स्पर्धा[27] कर सकता था जिसकी समृद्धि और वैभव की कथायें उसने अपने पिता से कई-कई बार सुनी थीं। उसने सुना है कि उत्तरी राजधानी हरियूपिया भी इतना ही समृद्ध, इतना ही उन्न्त और इतना ही सुंदर पुर है।

मोहेन-जो-दड़ो और कालीबंगा के शिल्पियों की कथायें सुनकर ही प्रतनु के मन में शिल्पकला के प्रति अनन्य लगाव प्रकट हुआ। इसी लगाव का परिणाम था कि प्रतनु छैनी और हथौड़े का अप्रतिम [28] मायावी  [29]शिल्पी बन गया। उसने अल्प आयु में ही अपने हस्त-लाघव [30] को इतनी ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया कि देवी रोमा की भांति उसकी भी चर्चा पूरे सप्त सैंधव प्रदेश में होने लगी। यह भी एक संयोग ही है कि यदि देवी रोमा सप्त सैंधव क्षेत्र के ठीक नैऋत्य कोण [31] में सिंधु के किनारे से अपनी सुगंध बिखेर रही हैं तो शिल्पी-प्रतनु सप्त सैंधव सभ्यता के धुर आग्नेय-कोण [32] में सरस्वती नदी की अंतिम शाखा शर्करा के किनारे अपनी दिव्य सुगंध लेकर विकसित हुआ है।

रह-रह कर किशोरावस्था के दिन उसकी आँखों के समक्ष आ खड़े होते हैं। किशोर प्रतनु चाहता था कि वह सहस्रों योजन की कष्टप्रद यात्रा करके मोहेन-जो-दड़ो के पशुपति महालय के वार्षिक उत्सव मे सम्मिलित हो तथा अपने पूर्वजों द्वारा बनाये गये पशुपति महालय को देखकर गर्व का अनुभव करे।

युवा प्रतनु ने चाहा कि वह सौंदर्य की अनन्य प्रतिमा कही जाने वाली नृत्यांगना रोमा के सौंदर्य को निहारे। शिल्पी प्रतनु चाहता है कि वह बहु-विश्रुत [33] सैंधव नृत्यांगना देवी रोमा की सुंदर प्रतिमाओं का निर्माण कर उन्हें वर्तमान और भविष्य की अन्यान्य [34] सभ्यताओं तक पहुँचाये जिससे देवी रोमा के नृत्य कौशल की और प्रतनु के शिल्प कौशल की ख्याति देश और काल की वर्तमान सीमाओं को लांघकर भविष्य के आंगन तक पहुँचे और युगों-युगों तक स्मरण रखी जाये।

प्रतनु के बारे में विख्यात है कि कला उसकी छैनी में बसती है। प्रस्तर खण्ड का स्पर्श करते ही छैनी उसे सुंदर प्रतिमा में बदल देती है। प्रतनु जानता है कि ‘कला’ कभी छैनी में नहीं बसती। ‘कला’ तो शिल्पी के मन, मस्तिष्क और रक्त की प्रत्येक बूंद में बसती है। प्रत्येक क्षण वह ‘कला’ के परिमार्जन[35] और परिष्करण [36]  के बारे में चिंतन करता रहता है।

परंपराओं को स्वीकार करने वाला प्रतनु ‘कला’ के बारे में विचित्र और परस्पर विरोधाभासी विचार रखता है। वह कहता है कि परंपरा से चलने वाली लोककलाओं में निरंतर विकास की संभावना नहीं होती। परंपरा के प्रति समर्पित रहने वाले मनुष्य का पूर्वाग्रह उसके विकास का मार्ग अवरुद्ध कर देता है। ‘कला’ का विकास होता है मनुष्य के तार्किक होने से। श्रद्धा के वशीभूत प्रसूत [37] हुई कला तो मिथ्याचार [38] के अतिरिक्त कुछ भी नहीं।

 ‘कला’ के विलक्षण उपासक प्रतनु की प्रबल मान्यता है कि ‘कला’ वंशानुगत उपलब्धि नहीं है। वह तो व्यक्तिगत होती है। न तो जन्म के साथ कोई व्यक्ति ‘कला’ अपने साथ लेकर आता है और न कोई गुरु किसी शिष्य के मन में ‘कला’ के बीज बो सकता है। ‘कला’ का प्रस्फुटन [39] न तो प्रयास से होता है और न कल्पनाओं के अभ्यास से। अभ्यास और कल्पना ‘कला’ के परिमार्जन के उपकरण हैं किंतु ‘कला’ के  प्राकट्य [40] के हेतु नहीं। ‘कला’ के प्रकटन की प्रक्रिया इतनी सूक्ष्म है कि उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है।

सैंधव सभ्यता के मायावी प्रतिमाकार प्रतनु की प्रबल मान्यता है कि ‘कला’ के प्राकट्य की संभावना ‘संवेदना’ की उच्च भाव-भूमि पर अभाव और आनन्द की विपरीत अनुभूतियों में होती है। यही कारण है कि ‘कला’ को जितना अवलम्ब[41] कल्पना का होता है उससे कहीं अधिक आश्रय साक्षात् [42] का होता है। कल्पना भले ही कितनी ही विचित्र क्यों न हो किंतु साक्षात् का आधार पाये बिना ‘कला’ कभी रमणीय [43] नहीं होती।

प्राप्ति और अप्राप्ति की अनुभूति, कल्पना का नहीं ‘साक्षात्’ का विषय है। प्रकृति प्रदत्त संवेदना की भाव-भूमि पर साक्षात् के बिम्बों के अभाव में केवल कल्पना कुक्कुटों से जन्मी ‘कला’ विशेषज्ञों और मर्मज्ञों के लिये भले ही समीक्ष्य एवं स्तुत्य बन जाये किंतु ‘कला’ के वास्तविक उपभोक्ता अर्थात साधारण जन के लिये वह उपयोगी नहीं बनती। इसीलिये प्रतनु चाहता है कि वह देवी रोमा जैसे विलक्षण साक्ष्य का उपयोग करके अपने शिल्प को इतनी ऊँचाई पर पहुँचा दे जहाँ ‘कला’ भी स्वयं को धन्य समझने लगे। प्राप्त करना चाहता है वह ‘कला’ के चरम को। देखना चाहता है वह ‘कला’ की उस ऊँचाई को जो अब तक अव्यक्त और अप्रकट है।

युवा प्रतनु चाहता तो सामान्य दिनों में भी मोहेन-जो-दड़ो आकर देवी रोमा का साक्षात्कार कर सकता था किंतु उसने सामान्य दिनों को नहीं चुनकर वार्षिकोत्सव के अवसर पर मोहेन-जो-दड़ो आने का निर्णय लिया तो इसके पीछे भी एक कारण है। सैंधव वासियों का यह वार्षिक समारोह मातृदेवी को प्रसन्न करने के लिये आयोजित किया जाता है जिसमें चन्द्रवृषभ नृत्य का आयोजन होता है। इस नृत्य में पशुपति महालयों की नृत्यांगनायें मातृदेवी के रूप में अर्थात् निर्वसना अवस्था में नृत्य करती हैं। [44]

प्रतनु, देवी रोमा के इसी रूप की प्रतिमायें बनाना चाहता है। सौंदर्य अपने चरम उत्कर्ष के साथ निरूपित हो, ऐसी आकांक्षा है प्रतिमाकार प्रतनु की। वस्त्रों में ढंके सौंदर्य का कैसा निरूपण और कैसा परीक्षण! प्रच्छन्नता का निरूपण तो कल्पना कपोतों की सृजना करना मात्र है। कल्पना मिश्रित भावुकता का लिजलिजा उत्कीर्णन।

ऐलाना से मोहेन-जो-दड़ो तक की दीर्घ यात्रा से श्रांत और क्लांत है प्रतनु किंतु उसके मन में उत्साह का सागर लहरा रहा है। वह भी पथ पर डेरा डाले पथिकों के साथ ही नित्यकर्मों से निवृत्त होने में शीघ्रता कर रहा है। प्रतनु चाहता है कि आयोजन स्थल पर शीघ्र पहुँचे ताकि वह आगे की पंक्तियों में स्थान पा सके जहाँ से वह आयोजन को बिना किसी व्यवधान के देख सके।

प्रतनु चाहे तो उसे विशिष्ट जनों के लिये निर्धारित स्थल पर भी जगह मिल सकती है किंतु नीरस विशिष्ट जनों के मध्य बैठकर आयोजन देखने में आनंद नहीं आता प्रतनु को। वह चाहता है कि वह साधारण कहे और समझे जाने वाले सैंधवों के मध्य बैठकर उनकी रस भरी अनुकूल-प्रतिकूल टिप्पणियों को सुनते हुए कला का रसास्वादन करे। प्रतनु का मत है कि वास्तविक कलानुरागी तो साधारण कहा और समझा जाने वाला बहुसंख्यक समाज है जो अपना मत व्यक्त करते समय किसी लाभ हानि का गणित नहीं करता और न ही वह किसी शैली की विशिष्टता के सम्बन्ध में पूर्वाग्रह से ग्रस्त होता है। उसे तो जो अच्छा लगा, अच्छा कहा और जो अच्छा नहीं लगा बिना किसी संशय के बुरा कहा।

– अध्याय तीन, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] मोहेन-जो-दड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख नगर था। भारत की स्वतंत्रता से पूर्व 1922 ईस्वी में सिंधप्रांत में इसके अवशेषों का पता लगा था। अनुमान किया जाता है कि मोहेन-जो-दड़ो सिंधु साम्राज्य के दक्षिणी हिस्से की राजधानी थी। सिंधु साम्राज्य की उत्तरी राजधानी हड़प्पा पंजाब में रावी नदी के किनारे स्थित थी।अब ये दोनों ही स्थल पाकिस्तान में हैं।

[2] मोहेन-जो-दड़ो की खुदाई में एक बांध के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

[3] मोहेनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त मुख्य सड़क दस मीटर चौड़ी तथा 400 मीटर लम्बी है।

[4] मोहेन-जो-दड़ो तथा हड़प्पा आदि की खुदाई में बड़ी संख्या में छल्ले मिले हैं। ऐसे छल्ले कालीबंगा तथा बलूचिस्तान से भी पाये गये। ये छल्ले पत्थर, चीनी मिट्टी तथा सीप के बने हुए है तथा आधा इंच से लेकर चार इंच तक बड़े हैं। अधिकांश इतिहासकारों ने इन छल्लों को स्त्री योनि माना है जिनकी पूजा मातृशक्ति के रूप में बड़े पैमाने पर प्रचलित थी। भारत के अनेक स्थलों से भी मौर्यकालीन योनियाँ प्राप्त हुई हैं। इनके भीतर नग्न मातृदेवी की मूर्तियाँ अंकित हैं।

[5] मोहेन-जोदड़ो तथा हड़प्पा की खुदाई में बड़ी संख्या में लिंग प्राप्त हुए हैं। ये लिंग साधारण पत्थर, लाल पत्थर, नीले सैण्डस्टोन, चीनी मिट्टी तथा सीप आदि सामग्री से बने हुए हैं। ये देा प्रकार के हैं- फैलिक और बीटल्स। फैलिक लिंगों का शीर्ष भाग गोल है तथा वीटल्स लिंगों का शीर्ष भाग नुकीला है। कुछ लिंग तो इतने छोटे हैं कि उन्हें जेब में रखकर ले जाया जा सकता है तथा कुछ लिंग चार फुट तक ऊंचे हैं। उन दिनों लिंग पूजा सिंधु प्रदेश के अतिरिक्त मिस्र, यूनान और रोम आदि देशों में प्रचलित थी। ऋग्वेद में लिंग पूजा अथवा शिश्न पूजा का उल्लेख एक-दो अवसरों पर ही हुआ है तथा वहाँ भी इसे अनार्यों की ही पूजा दर्शाया गया है।

[6] पुरातत्ववेत्ता मैके को सिन्धु प्रदेश में एक मुद्रा मिली थी। इसके मध्य भाग में एक नग्नशरीरी व्यक्ति योगमुद्रा में बैठा है। इस योगी के तीन मुख है। इसके शीश पर त्रिशूल के समान कोई वस्तु है। योगी के बांई और एक गैंडा और एक भैंसा है तथा दाईं ओर एक हाथी और एक व्याघ्र हैं। सम्मुख एक हरिण है। योगी के ऊपर 6 शब्द लिखे हुए हैं। विद्वानों का विचार है कि यह चित्र शिव का है। शिव योगीश्वर हैं, त्रिशूलधारी हैं तथा पशुपति हैं। शिव का सम्बंध तीन की संख्या से है, वे त्र्यम्बक तथा त्रिनेत्र कहे जाते है। सिंध वासियों के लिये वे त्रिमुख थे। इस मुद्रा में ऊर्ध्व लिंग भी बना हुआ है।

[7] इस आकृति के पाँच मंदिर इराक में तथा एक मंदिर सीरिया में प्राप्त हुआ है। ये मंदिर सिंधुसभ्यता के समकालिक हैं तथा ईसा से 4000 से 3500 वर्ष पुराने माने जाते हैं। इक्षिणी ईराक के ओबेद नामक स्थान पर निंहुरसग देवी का मंदिर मिला है। यह दो ऊंची दीवारों से घिरा है तथा इसका रूप योनि के समान है।

[8] मोहेन-जो-दड़ो, हड़प्पा तथा चहुन्दड़ो आदि स्थलों की खुदाई में बड़ी संख्या में मिट्टी की बनी हुई नारी मूर्तियाँ निकली हैं इनमें से अधिकांश नग्न प्रायः हैं। कुछ मूर्तियों की कमर में पटका और मेखला तथा गले में हार सुशोभित हैं। ये मातृदेवी की मूर्तियाँ हैं। ऐसी मूर्तियाँ प्राचीन एशिया माइनर, मेसोपोटामिया, सीरिया, फिलीस्तीन, क्रीट, साइरस ,मिस्र आदि देशों से भी प्राप्त हुई हैं।

[9] सींग

[10] सिंधु सभ्यता में मातृदेवी का अंकन कई प्रकार से किया गया। कुछ मूर्तियों में वह स्तनपान करा रही है। एक मूर्ति में देवी के गर्भ से एक वृक्ष निकलता हुआ दिखाया गया है। मैके को एक मुद्रा मिली थी जिसमें एक वृक्ष के नीचे एक नारी अंकित है। यह चित्र वनस्पति जगत् की अधीश्वरी का ही है। इस प्रकार की कल्पना प्राचीन बैबिलोन और क्रीट आदि देशों में भी की गयी थी। मोहेन-जो-दड़ो से प्राप्त एक मूर्ति में देवी के शीश पर एक पक्षी पंख फैलाये बैठा है। मातृदेवी के कुछ अंकन पशुओं के साथ भी मिले हैं।

[11] सिंधु प्रदेश से प्राप्त चीनी मिट्टी की एक मुद्रा में एक योगासीन व्यक्ति के सम्मुख दो नाग बैठे दिखाये गये हैं। एक-एक नाग पार्श्व में बैठे हैं। एक मुद्रा में एक व्यक्ति को नाग की पूजा करते हुए दिखाया गया है। एक ताबीज पर चबूतरे पर लेटे हुए नाग का अंकन किया गया है। नागों के अन्य अंकन भी मिले हैं।

[12] मोहेन-जो-दड़ो से एक गढ़ी प्राप्त हुई है जो 20 से 40 फुट तक ऊंची एक कृत्रिम पहाड़ी पर स्थित है। इसके चारों ओर 43 फुट चौड़ा एक बांध बना हुआ है। इस गढ़ी के बाहर पक्की मीनारें भी बनी हुई हैं। गढ़ी के भीतर 39 फुट लम्बा, 23 फुट चौड़ा तथा 8 फुट गहरा स्नानकुण्ड बना हुआ है। कुण्ड में जाने के लिये ईंटों की पक्की सीढि़यां बनी हुई हैं। कुण्ड का धरातल पक्की ईंटों से बना है, फर्श व दीवारों की जुड़ाई जिप्सम से की गई है तथा बाहर की ओर बिटुमिन से प्लास्टर किया गया है। कुण्ड के चारों ओर बरामदे हैं तथा बरामदों के पीछे कक्ष हैं। एक कक्ष में कुआँ भी मिला है। इन कक्षों के ऊपर एक और मंजिल बनी हुई थी। इस स्नानागार के पश्चिम में 150 फुट गुणा 75 फुट का एक भण्डार गृह मिला है। स्नानकुण्ड के उत्तर-पूर्व में 230 फुट लम्बा और 78 फुट चौड़ा राजप्रासाद भी मिला है। जिसकी दीवारें पौने सात फुटतक मोटी हैं। इसमें कई बरामदे कई कक्ष तथा स्नानागार मिले हैं। निकट ही एक और विशाल प्रासाद मिला है जो 230 फुट लम्बा और 115 फुट चौड़ा है इसमें दो आंगन, भण्डारागार तथा अनुचरों के छोटे कक्ष मिले हैं।

[13] हड़प्पा में भी एक गढ़ी के ध्वंसावशेष मिले हैं। यह लगभग समानान्तर चतुर्भुज के आकार की थी जो उत्तर से दक्षिण की ओर 460 गज लम्बी और पूर्व से पश्चिम की ओर 215 गज चौड़ी थी। इस समय भी इसकी ऊंचाई 45 से 50 फुट है।

[14] सिंधु सभ्यता के विभिन्न स्थलों की खुदाई में चीनी मिट्टी तथा सोप स्टोन से बनीं विभिन्न प्रकार की मुद्रायें प्राप्त हुई हैं। इन मुद्राओं पर अंकित लेखों को अब तक नहीं पढ़ा जा सका है। साधारण मिट्टी से बनी मुद्रायें भी बड़ी संख्या में मिली हैं। इन पर विभिन्न चित्र एवं संकेताक्षर अंकित हैं।एक मुद्रा पर तीन मुख वाला योगी अंकित है। इसके ऊपरी भाग में 6 अक्षर लिखे हुए हैं। विद्वानों के अनुसार सिंधु सभ्यता की लिपि चित्र प्रधान थी और उसमें 400 वर्ण थे। इस लिपि में वर्णों के साथ-साथ संकेतात्मक चित्रों का भी प्रयोग हुआ है। इस लिपि के अनेक संकेतात्मक चिन्ह भारतवर्ष की प्राचीनतम आहत मुद्राओं पर भी मिलते हैं। दक्षिण भारत में आज भी बहुत से स्त्री-आभूषणों पर इस तरह के संकेताक्षर अंकित किये जाने का प्रचलन है।

[15] मैसोपोटामिया के एक शहर से सिंधु सभ्यता की मोहरें बड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं। हड़प्पा में मक्खी की आकृति की एक गुरिया (मणि अथवा मनका) मिली है, ऐसी ही एक गुरिया मिस्र के एक पिरामिड से भी मिली है। ये इस बात का प्रमाण हैं कि सिंधु सभ्यता का सम्पर्क समकालिक सभ्यताओं से था।

[16] हड़प्पा से प्राप्त मिट्टी की एक मुद्रा पर शिकार का दृश्य अंकित है। मुद्रा के अग्रभाग पर बने एक मचान पर एक व्यक्ति बैठा हुआ है तथा वह मचान के नीचे स्थित एक बाघ पर आक्रमण की मुद्रा में है।मिट्टी की ही एक अन्य मुद्रा पर मानव-पशु युद्व का भयंकर चित्र अंकित है। एक ओर एक नग्न पुरूष है तो दूसरी ओर दो व्याघ्र। पुरूष अपने सिर पर शिरस्त्राण धारण किये हुए है तथा ब्याघ्रों के मुख पर क्रोध के भाव अंकित हैं। इस दृश्य को देखकर रोम के मानव-पशु द्वन्द्वों का स्मरण होता है।

[17] चहुन्दड़ो से प्राप्त एक मृदा पात्र पर एक मछुए का चित्र अंकित है। वह एक बांस पर जाल लपेटे हुए जा रहा है। उसके पैरों के समीप एक मछली और एक कछुआ अंकित हैं। मछली पकड़ने की कुछ कंटियां भी मिली हैं। मैके के अनुसार प्राचीन संसार में कोई कंटियां इनकी बराबरी नहीं कर सकतीं।

[18] आकाश में गमन करने वाले जीव

[19] जल में निवास करने वाले जीव

[20] मानव समुदाय

[21] भारत में दूरी नापने की प्राचीन इकाई, दो मील का एक कोस तथा चार कोस का एक योजन होता था। लीलावती के अनुसार बत्तीस हजार हाथ की दूरी का एक योजन होता था।

[22] इस सभ्यता के स्थल बलूचिस्तान, सिंध, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उत्खनित किये जा चुके हैं। इन समस्त स्थलों से सिंधुघाटी सभ्यता अथवा उसकी समकालिक सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो तृतीय कांस्य कालीन सभ्यता से साम्य रखते हैं।

[23] परिपूर्ण।

[24] नागरिकों के समूह।

[25] जब से मानव ने घुमक्कड़ स्वभाव त्याग कर एक स्थान पर रहना आरंभ किया तभी से मानव बस्ती के चारों ओर एक सुरक्षा दीवार खड़ी की जाने लगी। बाद में इसी सुरक्षा दीवार ने नगर प्राचीर अथवा परकोटे का रूप ले लिया। ताकि शत्रु अचानक ही नगर में प्रवेश न कर सके। उन्नीसवीं शताब्दी में वायुयान की खोज के साथ ही नगर प्राचीर का महत्व समाप्त हो गया।

[26] द्वार, नगर परकोटे के द्वार रात्रि में बंद कर दिये जाने की परम्परा थी।

[27] प्रतियोगिता, होड़।

[28] अनुपम, अद्वितीय।

[29] चमत्कारी।

[30] हाथ का कौशल।

[31] दक्षिण-पश्चिम।

[32] दक्षिण-पूर्व।

[33] विख्यात।

[34] दूसरी-तीसरी, नई-नई।

[35] मांज कर चमकाना अथवा अभ्यास से चमकाना।

[36] शुद्धि करना।

[37] जन्मी हुई।

[38] झूठ आचरण।

[39] अंकुरण।

[40] प्रकटीकरण।

[41] सहारा।

[42] सामने दिखाई देने वाली वस्तु।

[43] सुंदर।

[44] सिंधु सभ्यता के विभिन्न स्थलों पर की गई खुदाई में बड़ी संख्या में मृण्मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इनमें नारी प्रायः नग्न रूप में ही प्रदर्शित की गई है। इनमें नर्तकियों, देवदासियों और उपासिकाओं की मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में हैं। इतिहासकारों का अनुमान है कि सिंधु प्रदेश के मंदिरों और पूजा गृहों से कुछ उपासिकायें और देवदासियाँ सम्बंधित रहती थीं। मोहेन-जो-दड़ो में पीतल की बनी हुई नर्तकियाँ मिली हैं।

दिव्य पूजन (4)

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दिव्य पूजन

दिव्य पूजन की अंतिम प्रार्थना से पूर्व पद्म पत्रों पर रखे सहस्रों दीप सिंधु में प्रवाहित कर दिये गये। सिंधु की अनंत लहरों पर लहराते-इठलाते सहस्रों ज्योतिर्पुन्ज। ये मिट्टी और यव-चूर्ण से बने दीप नहीं, सैन्धव लोगों द्वारा अपने मन के अंधियारे को हटाने के घोषणा पत्र हैं।

सूर्योदय अब भी नहीं हुआ था जब नगर के विशाल स्नानागारों में पवित्र होकर सहस्रों नर-नारी सिंधु पूजन [1] के लिये उपस्थित हुए। धूप, दीप,[2] पुष्प, और दिव्य वनस्पतियों से सिंधु माता का पूजन किया गया तथा सिंधु माता से प्रार्थनायें की गयीं।

 प्रार्थनायें! जो कण्ठों से नहीं उर की अतल गहराइयों से आती हैं। प्रार्थनायें! जिनका उत्स भय, आकांक्षाओं और कामनाओं में है। प्रार्थनायें! जिन्हें उदार सिंधु सहस्रों वर्षों से स्वीकार करती आई है! प्रार्थनायें जो ऊध्र्वगामी हैं और उच्च लोकों तक पहुँचकर वरदानों के रूप में पुनः पृथ्वी तक लौट कर आती हैं। प्रार्थनायें! जो सहस्रों कण्ठों से एक साथ उच्चारित होती हैं-

 – हे माता सिंधु! आप दिव्य लोकों से लाये जल के साथ जीवन लेकर आती हैं। आपके द्वारा लाये गये दिव्य जलों के प्रताप से ही यह धरा यव, धान्य इक्षु और कर्पास से सदैव आपूरित रहती है।

 – हे यवदायिनी! धान्य दायिनी! संतति दायिनी सिंधु! आप सहस्रों-सहस्र वर्षों तक इसी तरह दिव्य जल के साथ प्रवाहित होती रहें। आप के ही दिव्य जलों के प्रताप से अदृश्य लोकों में रहने वाली प्रजनन देवी और पशुपति धरा पर विविधरूपा सृष्टि की रचना करते हैं।

 – हे दिव्यजलों को धारण करने वाली देवी सिंधु! आपके दिव्य जलों की उपस्थिति के कारण ही इक्षु और मधु में माधुर्य है। कर्पास में शुभ्रता है। यव और धान्य में प्राणदायिनी शक्ति का आविर्भाव है।

 – हे वरुण पुत्री! आपके द्वारा लाये गये इस दिव्य जल को हमारे देवगण और पितृगण आदि काल से पान करते आये हैं। सहस्रों-सहस्र वर्षों तक हमारी संततियों को आप अपना दिव्य जल प्रदान करती रहें।

 – हे माता! आपके जलों की शक्ति हमारे वृषभों के कूबड़ में संचित रहती है। हे देवी! आप ही के भय से शत्रु हम पर आक्रमण नहीं करते और अग्नि हमें नहीं जलाता।

 – हे कृपामयी! यह आप ही के दिव्य जलों का प्रताप है कि समस्त जलचर, थलचर, नभचर और उभयचर हमारे अनुकूल बने हुए हैं।

 – हे देवी! आप युगों-युगों तक दिव्य जल को धारण करें और सभी प्रकार की मृत्युओं को हमारी ओर आने से रोकें।

 – हे देवी! जिस प्रकार आपने समस्त सागरों को अपने जल से समृद्ध कर रखा है उसी प्रकार आप हमें तथा हमारी संततियों को निरंतर सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करें।

दिव्य पूजन की अंतिम प्रार्थना से पूर्व पद्म पत्रों पर रखे सहस्रों दीप सिंधु में प्रवाहित कर दिये गये। सिंधु की अनंत लहरों पर लहराते-इठलाते सहस्रों ज्योतिर्पुन्ज। ये मिट्टी और यव-चूर्ण से बने दीप नहीं, सैन्धव लोगों द्वारा अपने मन के अंधियारे को हटाने के घोषणा पत्र हैं। सिंधु में दीप प्रवाहित करते समय माता सिंधु के दिव्य पूजन हेतु आज की अंतिम प्रार्थना की गयी-

 – हे पयस्विनी! हम श्रद्धा पूर्वक ये दीप आप को अर्पित करते हैं। जो कुछ भी कलुषित है, बुरा है, उसे हमसे दूर करें और जो कुछ भी श्रेष्ठ है, वरणीय है उसे आप हमें प्रदान करें। देवी आप हमें पातकों से बचायें और हमें अपने दिव्य जल की भांति निर्मल करें। आपको नमस्कार! नमस्कार! नमस्कार!

भले ही श्रद्धा और विश्वास से प्रसूत होती हैं प्रार्थनायें किंतु प्रतनु को बहुत पसंद हैं। कुछ देर के लिये ही सही प्रार्थनायें मनुष्य को अहंकार से दूर कर अपनी अपूर्णताओं और निर्बलताओं के बारे में सोचने का अवसर देती हैं। प्रार्थनायें मनुष्य को बताती हैं कि जो कुछ उसने प्राप्त किया है उसमें उसका अपना चमत्कार नहीं, प्रकृति का उदार भाव है। वह भी हाथ जोड़कर प्रार्थनाओं की तरलता और निर्मलता को अपने उर में अनुभव करता है एवं शीश झुकाकर उदार प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता है। 

सिंधु पूजन के बाद आरंभ हुआ देव प्रतिमाओं के अभिषेक और पूजन का अनुपम अनुष्ठान। समस्त नर-नारी नगर में स्थित महालयों में फैल गये। सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ ही प्रधान महालय के विशाल ताम्र-घण्ट पर विशाल काष्ठ का आघात हुआ और समस्त महालयों में अभिषेक एवं पूजा का अनुष्ठान आरंभ हुआ।

सैंकड़ों घण्ट, घड़ियाल और शंख एक साथ बज उठे। चारों दिशाओं से आती मंगल ध्वनियों के बीच प्रधान पुजारी किलात के नेतृत्व में सैंकड़ों पुजारियों ने यत्न पूर्वक समस्त दैवीय विधानों के अनुसार प्रजनन देवी और प्रजनक देव का अभिषेक एवं पूजन का अनुष्ठान सम्पन्न करवाया।

मोहेन-जो-दड़ो के समस्त महालयों में स्थापित देव-प्रतिमाओं को एक साथ सप्त सैंधव- सिंधु, वितस्ता, असिक्नी, परुष्णि, विपासा, शतुद्रि और सरस्वती के पवित्र जलों से अभिषेक किया गया। मुख्य मातृदेवी-महालय एवं मुख्य पशुपति-महालय में स्थापित प्रतिमाओं को मधु, दुग्ध और उत्तम कोटि के फलों के रस से भी अभिषिक्त किया गया।

समस्त देव प्रतिमाओं को पत्र, पुष्प, और विशिष्ट वनस्पतियों से सजाया गया तथा उन्हें नवीन शृंग धारण करवाये गये। देव प्रतिमाओं के सम्मुख श्रेष्ठ खाद्य- यव, धान्य, इक्षु, फल, दुग्ध, मधु, आसव, पर्क एवं सुरा अर्पित किये गये।

विविध प्रांतरों से आये नर-नारी अपने प्रदेश के श्रेष्ठ पदार्थ मातृदेवी एवं पशुपति को अर्पित करने के लिये लाये थे। शीघ्र ही मोहेन-जो-दड़ो के समस्त महालय इस उत्तम सामग्री से आप्लावित हो गये। बहुत से नर-नारियों ने तो इस अवसर पर अपना सर्वस्व अर्पित करने के भाव से शरीर पर धारण किये हुए वस्त्र, आभूषण और अपने केश भी देवताओं को अर्पित कर दिये।

मंदिरों के बाहर शंख, कौड़ी, घोंघे, हस्तिदंत, मृत्तिका,  शृंग, विविध रंगों के प्रस्तरों, स्वर्ण, रजत, ताम्र एवं कांस्य आदि विविध सामग्री से निर्मित आभूषण, रक्त गोमेद, हरित अमेजन तथा वैदूर्य के ढेर लग गये। [3] मंदिरों में चढ़ाई गयी विपुल सामग्री पुजारियों द्वारा श्रद्धालु नागरिकों में प्रसाद के रूप में वितरित कर दी गयी। अनुष्ठान विधान का अंतिम भाग थी बलि। देवी को प्रसन्न करने के लिये चैड़े फल के खाण्डे से अज अर्पित किये गये। [4] इस अनुष्ठान के पूरा होने तक दोपहर हो चली।

– अध्याय 4, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] मोहेन-जो-दड़ो में बड़ी संख्या में सामूहिक उपयोग के स्नानागार, घर-घर में बने कुएँ तथा विशाल जलकुण्डों की उपस्थिति इस ओर संकेत करती है कि सिंधु सभ्यता में पवित्र स्नान और जल पूजा का विशेष महत्व था। प्रत्येक धार्मिक अवसर पर स्नान करने की परम्परा थी और इसे पुजारियों द्वारा विशेष अनुष्ठान के रूप में करवाया जाता होगा। आज भी दक्षिण भारत के रामेश्वरम् में स्थित विशाल सेतुबंध शिवालय में पवित्र स्नान करवाने की परम्परा है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को पुजारियों द्वारा छोटे-छोटे जल कुण्डों के पवित्र जल से स्नान करवाया जाता है। इस अनुष्ठान में श्ऱद्धालु व्यक्ति सपरिवार मंदिर की परिक्रमा करता हुआ विभिन्न कुण्डों का जल अपने ऊपर डालता जाता है तथा पुजारी मंत्र बोलते हैं। आज जो लोग सिंधी समुदाय के नाम से जाने जाते हैं, उनमें झूलेलाल की पूजा होती है। झूलेलाल वरूण देवता के अवतार माने जाते हैं। ई.1947 से पूर्व सिंधी समुदाय इसी क्षेत्र में रहता था।

[2] खुदाई में मातृदेवी की कुछ ऐसी मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं जिनके ऊर्ध्व भाग धूप-दीप के धूम्र से काले हो गये थे। कुछ मुद्राओं पर स्तंभ के ऊपर दीपिका और नीचे अग्नि जलती हुई प्रदर्शित की गयी है।

[3] इतिहासकारों की मान्यता है कि सिंधु सभ्यता के लोग सोना मैसूर से, चांदी मद्रास, बिहार और उड़ीसा से, ताम्बा अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान और अरब से मंगवाते होंगे। लाल गोमेद राजस्थान, कश्मीर और काठियावाड़ से मंगवाया जाता होगा। हरा अमेजन नीलगिरि की पहाडि़यों में मिलता था। वैदूर्य अफगानिस्तान के बदख्शाँ प्रांत से आता होगा। लाल और नील स्फटिक दक्षिणी पठार, बिहार और उड़ीसा से मिलता होगा।सिंधुवासी धातुओं को गलाना जानते थे। मोहन-जो-दड़ो में ताम्बे का गला हुआ एक ढेर मिला है। धातुओं के साथ-साथ वे शंख, सीप, घोंघा, हाथीदांत आदि के काम में भी निपुण थे। सिंधुवासियों ने ताम्बे में 6 से 13 प्रतिशत टिन मिलाकर काँसा बनाया।

[4] मोहेन-जो-दड़ो से प्राप्त एक मुद्रा पर एक बकरा बना हुआ है, उसके पीछे एक व्यक्ति चौड़े फल वाला हथियार लिये हुए खड़ा है। दूसरी मुद्रा में एक वृक्ष के नीचे देवी खड़ी है, उसके समीप एक बकरा भी खड़ा है। हड़प्पा में पुरातत्ववेत्ता दयाराम साहनी को बैल, घोड़ा, भेड़ आदि अनेक पशुओं की हड्डियों का ढेर मिला था। अनुमान किया जाता है कि उस स्थान पर पशुओं की सामूहिक बलि दी गयी थी।

अदृश्य नृत्यांगना (5)

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अदृश्य नृत्यांगना

अदृश्य नृत्यांगना रोमा! जो पशुपति महालय की मुख्य नृत्यांगना है। रोमा! जो सद्यः यौवना है। रोमा! जो कला की  अधिष्ठात्री है। रोमा! जो नृत्यविधा में देवलोक की बहुविश्रुत अप्सराओं और अनजाने पर्वतीय प्रदेशों में नृत्यरत गांधर्वियों से अधिक निष्णात है।

चन्द्रवृषभ समारोह में बड़ी संख्या में दर्शकों की उपस्थिति होने से इसका आयोजन महालय के स्थायी पाण्डाल में नहीं होता। [1] अतः पशुपति महालय परिसर में वनस्पति की सहायता से अस्थायी वितान निर्मित किया जाता है। इस समय दर्शक-पाण्डाल नर-नारियों से पूरी तरह आप्लावित हो चुका है।

फिर भी नर-नारियों का प्रवाह है कि पाण्डाल में आता ही चला जा रहा है। उनमें स्पर्धा है आगे बैठने की। दूर से वे देवी रोमा का नृत्य ढंग से नहीं देख पायेंगे। इस कारण शांतिप्रिय सैंधवों में भी विवाद हो रहा है। हर कोई अपने तर्कों से यह सिद्ध करने में जुटा हुआ है कि वही क्यों आगे बैठने का अधिकारी है। वातावरण में उमस के साथ-साथ विवाद, उत्तेजना और प्रतीक्षा के कारण दर्शकों के माथे पर स्वेद बिंदु छलक आये हैं।

वार्षिक समारोह के विशाल नृत्य-आयोजन हेतु पशुपति महालय के विशाल परिसर क्षेत्र में अस्थाई नृत्य मण्डप और पाण्डालों की रचना की गयी है। दर्शकों के बैठने की व्यवस्था तीन पाण्डालों में की गयी है। अति विशिष्ट दर्शकों के लिये नृत्य मण्डप के दक्षिण पार्श्व में तथा विशिष्ट जनों के लिये वाम पार्श्व में एक-एक लघु पाण्डाल बनाया गया है।

सामान्य जन के लिये नृत्य मण्डप के ठीक सामने विशाल पाण्डाल की रचना की गयी है। प्रतिवर्ष ऐसा ही किये जाने की परम्परा है। पिछले कुछ वर्षों से अंतर आया है तो केवल इतना कि नृत्य-मण्डप तथा पाण्डालों के आकार प्रतिवर्ष बढ़ते ही जा रहे हैं। इस वर्ष नृत्यांगनाओं के लिये निर्मित ‘नृत्य-मण्डप’ की रचना कूर्माकृति[2] में तथा दर्शकों के लिये निर्मित पाण्डालों की रचना मत्स्याकृतियों[3] में की गयी है। ताकि दर्शक बिना किसी व्यवधान के नृत्य का आनंद ले सकें।

मण्डप और पाण्डालों की छतें वनस्पतियों के तनों, टहनियों और पत्तियों से निर्मित की गयी हैं ताकि एक साथ उपस्थित होने वाले विशाल जनसमुदाय के शरीरों से निकलने वाली ऊष्मा के कारण पाण्डालों में गर्मी न हो जाये तथा धूप और वर्षा से भी भली भांति बचाव हो सके।

जन सामान्य के पाण्डाल में भूमि पर स्वच्छ मृदा बिछाई गयी है तथा विशिष्ट जनों के पाण्डालों में प्रस्तर एवं मृदा के कतिपय ऊँचे और समतल स्तूपों का निर्माण किया गया है। उन पर गिरिपुष्पक[4]  का लेप किया गया है तथा ऊपर शुभ्र कर्पास से निर्मित विष्टर [5] बिछाये गये हैं। विशिष्ट जनों की सुविधा के लिये कोमल उपाधानों [6] का भी प्रबंध किया गया है ताकि वे थकान अनुभव करने पर सहारा ले सकें।

पाण्डाल में बेचैनी बढ़ती जा रही है। अभी जाने कितना विलम्ब और है नृत्य आरंभ होने में! बालकों को इस बीच भूख लग चली है और वे माताओं से आग्रह कर रहे हैं कि उन्हें खाने को दिया जाये। चतुर मातायें भुने हुए यव, इक्षुरस में पकाये हुए शालि [7] अपने साथ लेकर आई हैं। जिन्हें पाकर शिशु संतुष्ट हो रहे हैं।

काफी देर से प्रतीक्षा करते रहने के कारण कुछ-कुछ भूख बड़ों को भी लग चली है। मंदिरों में अभिषेक पूर्ण होने के बाद जिसे जो कुछ शीघ्रता में मिल सका वही उदरस्थ [8] करके वह पाण्डाल की ओर दौड़ा चला आया है, इस आशंका में कि कहीं उसे पीछे न बैठना पड़े किंतु पर्याप्त शीघ्रता करने के उपरांत भी बहुत से नागरिकों को पीछे ही बैठने के लिये विवश होना पड़ा है।

जैसे ही सूर्य देव ने आकाश के ठीक मध्य में अपना स्थान ग्रहण किया, प्रधान पशुपति महालय के विशाल ताम्रघण्ट पर काष्ठ का प्रहार हुआ और मृदंग वादक मयाला ने मृदंग पर पहली थाप दी। उसी के साथ सहस्रों घुंघरू एक साथ झन्कृत हो उठे। ये सारे व्यापार इतनी शीघ्रता से और एक साथ हुए कि यह कहा नहीं जा सकता कि सूर्यदेव पहले मध्याकाश में अवस्थित हुए कि ताम्रघण्ट पर काष्ठ का प्रहार पहले हुआ कि मयाला ने मृदंग पर थाप पहले दी कि सहस्रों घुंघरू पहले झन्कृत हुए।

मयाला की लम्बी और पतली अंगुलियाँ विद्युत की गति से मृदंग पर आघात करती हैं। मृदंग का जादूगर है मयाला। [9] संगीत जैसे उसकी अंगुलियों में बसा है। अंगुलियों का स्पर्श हुआ नहीं कि मृदंग जैसे जीवित होकर बैठ जाती है-

थक्किट धिक्क्टि थोंक्क्टि नक्टि तथक्टि

धिद्धिक्क्टि थों थोंक्टि नंनाक्टि तत्ताथक्क्टि क्टिंक्टिं

द्धि द्ध धि कि ट क्टिक्टि। थों थों थों थों क्टि क्टि

कि कि नं नाँ नाँ क्टि क्टि क्टि। ततत्त तथक्क्टि किटक्टिक्टि।

मृदंग की ध्वनि सुनकर पाण्डाल में बैठे नर-नारियों में नवीन चेतना का संचार हुआ। रोते हुए बालक चुप हो गये। समझदार सतर्क होकर बैठ गये। विशिष्ट जनों ने अपनी नीरस चर्चाओं को बीच में ही विराम दे दिया और जन-सामान्य के पाण्डाल में स्थान को लेकर हो रहे विवाद थम गये।

विद्युत की सी चपल गति के साथ पशुपति महालय के विशाल प्रांगण में वार्षिकोत्सव का नृत्य आरंभ हुआ। [10] झांझ, मृदंग, शंख और नूपुरों की मिश्रित ध्वनियों से साम्य बैठाती हुई सैंकड़ों देवबालायें शुभ्र हंसिनियों की भांति पंक्तिबद्ध होकर महालय के विशाल आगार से निकलने लगीं।

श्वेत कपर्दिकाओं एवं रजत आभूषणों से सजी देवबालायें सैंधव बालाओं की भांति नहीं अपितु देवांगनाओं अथवा गांधर्वियों की भांति शोभा पा रही हैं। उन्होंने अपनी क्षीण और रमणीय श्याम देहों पर शुभ्र कर्पास से बने दुकूल और कोमल अंगों पर उज्ज्वल रजत से निर्मित आभूषण धारण कर रखे हैं। उनके शीश पर पक्षियों के शुभ्र पंखों से निर्मित सींग सुशोभित हैं। [11]

नृत्यांगनाओं के श्वेत परिधान और विपुल वेग के कारण देखने वालों को भ्रम हुआ कि मुक्त गगन में क्रीड़ा करते हुए शुभ्र कपासी मेघ अचानक उड़ते हुए पाण्डाल में उतर आये हैं। क्षण भर को ऐसा भी आभास हुआ मानो सिंधु में क्रीड़ा करते श्वेत जल-कुक्कुटों के झुण्ड उड़ते हुए चले आ रहे हैं किंतु शीघ्र ही दर्शकों ने जान लिया कि ये न तो शुभ्र कपासी मेघ हैं और न जल-कुक्कुटों के झुण्ड, ये तो पशुपति महालय की नृत्यागंनायें हैं जिनकी प्रतीक्षा में वे घण्टों से यहाँ बैठे हैं।

इन शुभ्र वसना सैंधव-बालाओं ने मंच का एक वलय पूर्ण किया ही था कि विद्युत की तरह लहराती हुई नृत्यांगना रोमा मंच पर अवतरित हुईं। यदि दर्शक देख पाते तो देखते- यह नृत्यांगना रोमा नहीं, हंसिनियों के बीच स्वयं सौंदर्य ही देह धर आया है। रोमा के शीश, मस्तक, कर्ण, कण्ठ, कटि, बाहु, और करतल-पृष्ठों से लेकर जंघाओं और पैरों में पीत-अयस से निर्मित विविध आभूषण सुशोभित हैं। [12]

उसके सुचिक्कण वर्तुलों, पुष्ट नितम्बों और क्षीण कटि के डमरू मध्य पर भी पीत-आभूषण आवेष्टित हैं जिनकी आभा से रोमा नृत्यांगनाओं के उस विशाल गुल्म में भी यदि दिखाई देती तो सरलता से अलग से पहचानी जा सकती किंतु यह कैसा चमत्कार है कि रोमा मंच पर नृत्यरत है और दर्शक उसकी उपस्थिति को अनुभव करते हुए भी उसे देख नहीं पा रहे। 

सैंकड़ों नर-नारी अदृश्य नृत्यांगना रोमा को न देख पाने की उत्तेजना में अपने-अपने स्थान पर खड़े हो गये हैं। वे लाख प्रयास करते हैं किंतु उन्हें रोमा दिखाई नहीं दे रही। कहाँ है रोमा ? इनमें से कौनसी है रोमा ? कैसे पहचाना जा सकता है उसे ? इनमें से तो कोई भी नृत्यांगना मातृदेवी के वेश में दिखाई नही देती ?

अधिकांश नर-नारी एक दूसरे से यही प्रश्न कर रहे हैं। कोई कह रहा है एक दिव्य दीप शिखा है जो श्वेत मेघों के मध्य तड़ित के सदृश्य प्रकट होती है और क्षण भर में विलुप्त हो जाती है, वही रोमा है। कोई कह रहा है कि श्वेत परिधानों से युक्त नृत्यांगनाओं के मध्य पीत अयस से विभूषित नृत्यांगना ही रोमा है। उनमें स्पृहा है अदृश्य नृत्यांगना रोमा को शीघ्र से शीघ्र देख लेने की।

अदृश्य नृत्यांगना रोमा! जो पशुपति महालय की मुख्य नृत्यांगना है। रोमा! जो सद्यः यौवना है। रोमा! जो कला की  अधिष्ठात्री है। रोमा! जो नृत्यविधा में देवलोक की बहुविश्रुत अप्सराओं और अनजाने पर्वतीय प्रदेशों में नृत्यरत गांधर्वियों से अधिक निष्णात है। रोमा! जो सौंदर्य का उमड़ता हुआ सागर है। रोमा! जो युवा हृदयों की साम्राज्ञी है। रोमा! जो सैंधव प्रदेश का गौरव है। वही रोमा किंचित्-मात्र आभूषणों को धारण कर अपने सम्पूर्ण कला वैभव के साथ नृत्य मण्डप में उपस्थित है। नितांत निर्वसना! [13] मातृदेवी के वेश में।

तत् थई। धिक थई तत् थई।

झांझ, मृदंग शंख और नूपूरों की मिश्रित ध्वनियों के तीव्र होते जाने के साथ रोमा के अंगों में जैसे नवीन स्फुरण का संचार हो रहा है। सैंधव समुदाय विस्फरित नेत्रों से देख रहा है एक तड़ित् शिखा को जो पशुपति को नमन करती हुई इधर से उधर लहरा रही है।

जैसे-जैसे नृत्य आगे बढ़ रहा है, सैंधव समाज की बेचैनी और उत्तेजना में वृद्धि हो रही है। सामान्य और विशिष्ट समाज के साथ-साथ शिल्पी प्रतनु भी निराशा के पंक में उतरता सा चला जा रहा है। क्या यही देखने की अभिलाषा में कई शत योजन की यात्रा करके प्रतनु कालीबंगा से यहाँ तक सम्मोहित सा खिंचा चला आया है ?

पराजय सी अनुभव करता है वह अपने मन में। अपने समस्त तर्क उसे वायु में विलीन होते दिखाई देते हैं। क्या-क्या कहता रहा है वह कला से कल्पना और साक्षात् के सम्बन्ध के विषय में! यह कल्पना अथवा श्रद्धा का विषय नहीं है कि रोमा नृत्यमण्डप में नृत्यलीन है किंतु यह कैसा साक्षात है ? क्या इस साक्षात् के आधार पर प्रतनु अपनी शिल्पकला को चरम तक पहुँचाने में सफल हो सकेगा ? क्या इस साक्षात् का उत्कीर्णन वह अपने शिल्प में कर सकेगा ?

 व्यक्ति सदैव यही सोचता आया है कि सत्य वही है जिसे वह अपने तर्कों से सिद्ध कर सकता है, जिसे वह दूसरों से मनवा सकता है। इसके विपरीत जीवन में ऐसे क्षण भी आते हैं जब सत्य उन समस्त तर्कों और मान्यताओं से आगे निकलकर खड़ा हो जाता है जिन्हें अपनी मेधा पर गर्व करने वाला, अपने तार्किक होने का दंभ रखने वाला व्यक्ति, अपने जैसे ही दूसरे व्यक्तियों को चमत्कृत करने के उद्देश्य से गढ़ता है।

तभी उसे ज्ञात होता है कि अपने अनुकूल होने वाला तर्क ही सदैव सत्य के रूप में परिभाषित नहीं होता। जिस प्रकार कला ना-ना विधि प्रकट होकर भी अप्रकट ही रहती है वैसे ही सत्य भी बार-बार प्रकट होकर भी अप्रकट ही रहता है। ठीक ऐसे ही एक नवीन उद्घाटित सत्य से परिचय हो रहा है आज शिल्पी प्रतनु का। नृत्यांगना चक्षुओं के सामने नृत्यलीन है किंतु साक्षात नहीं होती।

अचानक दर्शकों के पाण्डाल में शोर उठा जिसे सुनकर प्रतनु अपने मन में से निकल कर बाहर आया। सहस्रों दृष्टियों को जैसे किसी माया से एक साथ बांध दिया गया हो। उन मायाबिद्ध दृष्टियों का अनुसरण करती हुई प्रतनु की दृष्टि भी नृत्य मण्डप तक पहुँची। प्रतनु के नेत्र खुले के खुले ही रह गये।

उसने देखा- मयाला की अंगुलियाँ सम पर पहुँच कर विश्राम पा चुकी हैं और नृत्यांगना रोमा नत मस्तक हो सबका अभिवादन कर रही है। जहाँ सैंधव-समुदाय को संतोष की श्वांस लेनी चाहिये थी वहीं आकर  सैंधव समुदाय श्वांस लेना भूला। सौंदर्य के सहस्रों समुद्र अपने एक-एक अंग में लिये खड़ी नृत्यांगना रोमा अभिवादन की मुद्रा में थी। उसके सुकोमल, सुचिक्कण, मनोहारी और रमणीय अंगों पर स्वेद धारायें फूट पड़ी थीं। ऐसा प्रतीत होता था मानो रोमा के अंगों के स्पर्श की अभिलाषा में ‘वरुण’ स्वेद  के रूप में प्रकट हुआ है।

पशुपति को समर्पित इस अद्भुत नृत्यमयी स्तुति के पश्चात् रोमा और उसकी सखियों ने पारंपरिक चन्द्रवृषभ [14] नृत्य आरंभ किया। भूदेवी को गर्भवती बनाने वाले चन्द्रवृषभ की भूमिका में स्वयं किलात उपस्थित हुआ। अपने शीश पर बंधे दीर्घाकाय पशु-शृंग तथा पीठ पर बंधे सुकोमल कर्पास के ऊँचे कूबड़ को हिलाता हुआ वह अद्भुत तीव्रता से पद संचालन कर रहा था।

वाद्यों के साथ लय बैठाते हुए, अत्यंत लाघव के साथ उठते रोमा के पद, अनुपम लालित्य के साथ हंस-ग्रीवा के सदृश्य लहरातीं उसकी भुजायें और विविध मेखलाओं तथा नूपुरों से निकलती सुमधुर ध्वनियाँ ऐसी प्रतीत होती थीं मानो आज सैंधवों के इतिहास में कला के नवीन पृष्ठ रचे जा रहे हों। जिन्हें पढ़कर शताब्दियों-सहस्राब्दियों तक गौरवान्वित होते रहेंगे सैंधव वंशज।

उल्लास से नृत्यलीन मातृदेवी के गर्भाधान का दृश्य पूरे कौशल के साथ दर्शाया गया। चंद्र वृषभ ने  अनुनय-विनय से मातृदेवी को प्रसन्न करना चाहा किंतु मातृदेवी ने उसका अनुरोध अस्वीकार कर दिया। चंद्रवृषभ ने मातृदेवी को ना-ना प्रकार के प्रलोभन दिये किंतु मातृदेवी ने उनकी ओर देखा तक नहीं। चंद्रवृषभ कुपित हुआ और मातृदेवी पर आघात करने दौड़ा किंतु मातृदेवी भयभीत नहीं हुई।

अंत में चंद्रवृषभ अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुआ और पशुपति के रूप में दिखाई दिया। मातृदेवी अपना समस्त गर्व त्यागकर पशुपति के सम्मुख विनीत हुई। पशुपति ने सृष्टि की रचना हेतु मातृदेवी को गर्भधारण होने का आदेश दिया जिसे मातृदेवी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पशुपति पुनः चंद्रवृषभ के स्वरूप में उपस्थित हुए।

दोनों दिव्य शक्तियों ने अनन्त काल तक ना-ना प्रकार से रमण किया। अन्ततः मातृदेवी गर्भवती हुईं। कोटि-कोटि नदी-पर्वत, वनस्पति, पशु-पक्षी, सर्प-मत्स्य, मृग-सिंह, नर-नारी प्रकट हुए। मातृदेवी धन्य हो उठी।

सहस्रों नर नारियों के साथ प्रतनु की कामना भी पूरी हुई। हाँ! यही अभिलाषा लेकर तो आया था वह, सैंकड़ों योजन की यात्रा का कष्ट उठाकर। कला और सौंदर्य के इसी मिश्रण के दर्शन करना चाहता था वह। जिसे अपने शिल्प में उतार सके, एक-एक भाव भंगिमा के साथ।

चकित और सम्भ्रमित है सम्पूर्ण सैंधव समाज। रोमा की माता अलोला भी वर्षों तक इस उत्सव के अवसर पर नृत्य करती रही है और वही रोमा की नृत्य गुरु भी रही है किंतु स्वयं अलोला में यह बात कहाँ थी जो कला की इस अद्भुत अधिष्ठात्री में है।

– अध्याय 5, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] मोहेन-जो-दड़ो में विशाल स्नानागार के निकट 80 फुट लम्बा और 80 फुट चौड़ा एक भवन प्राप्त हुआ है। इस भवन की छत 20 स्तंभों के ऊपर टिकी थी। फर्श पर अनेक स्थानों पर चौकियां पड़ी थीं। इतिहासकारों का अनुमान है कि इस भवन का उपयोग धर्म-चर्चा करने, हाट लगाने अथवा अन्य समारोह आदि सार्वजनिक कार्य के लिये किया जाता होगा।

[2] कछुए की आकृति।

[3] मछलियों की आकृतियाँ।

[4] बिटुमिन अथवा डामर। मोहेन-जोदड़ो के स्नानागार के तल में बिटुमिन का लेप लगा हुआ है।

[5] बिस्तर।

[6] तकियों।

[7] गन्ने का रस में पके हुए चावल

[8] पेट में डालकर

[9] मोहेन-जो-दड़ो की खुदाई में बांसुरी, तन्त्रीयुक्त वीणा तथा चमड़े से बनने बाले कई तरह के वाद्ययंत्र प्राप्त हुए हैं।

[10] हड़प्पा से प्राप्त एक मुद्रा में समारोह का दृश्य है। मनुष्यों के झुण्ड के बीच में एक मनुष्य ढोल बजा रहा है। दूसरी मुद्रा में एक स्त्री ढोल को अपनी बगल में दबाये है। एक अन्य मुद्रा में एक मनुष्य ढोल बजा रहा है तथा उसके सम्मुख कुछ अन्य मनुष्य नृत्य कर रहे हैं। कहीं कहीं वीणा के चित्र भी मिले हैं।

[11] मोहेन-जो-दड़ो से मिली एक मूर्ति में मातृदेवी के सिर पर बत्तख बैठी हुई दिखाई गयी है। चहुन्दड़ो से प्राप्त कुछ मूर्तियों में स्त्रियों के सिर पर सींग दिखाये गये हैं जिन्हें वे अपने हाथ से पकड़े हुए हैं।

[12] विभिन्न स्थलों की खुदाई में प्राप्त सोने, चांदी, पीतल, ताम्बा आदि धातुओं के आभूषणों, गुरियों, मुद्राओं, खिलौनों और बर्तनों को देखने से प्रकट होता है कि सैन्धव स्वर्णकारों ने अपने काम में काफी निपुणता प्राप्त कर ली थी। मोहेन-जो-दड़ो में पीतल की बनी हुई नर्तकियाँ मिली हैं। वे हाथ में कड़े और गले में हँसुली पहने हुए हैं। सोने और चांदी का प्रयोग बहुधा आभूषण बनाने में हुआ है। कंठाहार, कड़े, भुजबंद, अंगूठियां, तथा माला में पिरोने की गुरियां मिली हैं।

[13] मोहेन-जोदड़ो से एक नर्तकी की मूर्ति मिली है। वह नग्न रूप में नृत्य कर रही है। नर्तकी के सिर का जूट दाहिने कन्धे पर लटका हुआ है। मूर्ति के हाथ और पैर आनुपातिक रूप से बड़े हैं। बायाँ पैर सामने की ओर झुका हुआ है और दाहिना हाथ दाहिनी कमर पर रखा हुआ है। बायाँ हाथ लटका हुआ है जिसमें कन्धे से कलाई तक चूडि़यों से आभूषित है। दाहिने हाथ में केवल दो चूडि़याँ कोहुनी से कुछ ऊपर हैं और दो चूडि़याँ कलाई पर हैं। पैर कुछ आगे की ओर बढ़े हुए हैं जिससे स्पष्ट होता है कि वह पैर से ताल दे रही है। कुछ विद्वानों का मत है कि यह एक देवदासी की मूर्ति है।

[14] जिस-जिस क्षेत्र से अस्थि, हस्तिदंत, मिट्टी तथा पत्थर से निर्मित मातृदेवी की नग्न मूर्तियाँ मिली हैं, उस क्षेत्र से लम्बे घुमावदार सींगों से युक्त एक वृषभ सिर भी मिलता है। माना जाता है कि यह चन्द्र वृषभ का सिर है, जो भूदेवी को गर्भवती बनाता है तथा मरकर भी पुनर्जीवित हो उठता है।

सभा (6)

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सभा

सभा में साम-गायन के साथ-साथ विभिन्न यज्ञ भी निर्विघ्न रूप से होते हैं। पुरुषों के साथ जन की समस्त स्त्रियों को इस सभा में भाग लेना अनिवार्य है। अशक्त और रोगी प्रजा को सभा से अनुपस्थित रहने की अनुमति है।

शुभ्र हिम से आच्छादित शिखरों की सघन शृंखला ने चारों ओर घूम कर एक दुर्ग की आकृति बना ली है जिसके मध्य उपजाऊ मृदा युक्त भूमि का अच्छा विस्तार है। हिमयुक्त शिखरों पर नृत्यरत प्रातःकालीन सूर्य रश्मियों से पूरा लोक दिव्य आभा से आपूरित है। पर्वतीय शिखरों तथा परुष्णि के विस्तृत तटों पर खड़े देवदारु, अश्वत्थ,[1]  उदुम्बर,[2]  न्यग्रोध,[3]  कर्कंधु, [4] किंशुक, [5] शमी, [6] शाल्मलि, [7] हरिद्र, [8] बदर, [9] प्लक्ष, [10] पीतशाल,[11]  बिल्व, खदिर, [12] शिंशिपा, [13]  कार्श्मर्य, [14] पलाश,[15] विकंकत [16] आदि वृक्षों को स्पर्श करके आने वाला शीतल,सुगंधित और मंद वायु, वैवस्वत् मनु-पुत्रों के जीवन में क्षण-क्षण नवीन उत्साह का संचरण करता हुआ प्रतीत होता है।

सूर्य रश्मियों से तप्त होकर पिघलने वाला ‘हिम’ जल में परिवर्तित होकर विभिन्न धाराओं के रूप में बहता हुआ समतल पर पहुँचते-पहुँचते एक स्थूल प्रवाह में आकर मिल रहा है। यह प्रवाह समतल में कुछ और आगे चलकर जब हिम-शृंखलाओं की पहुँच से पर्याप्त दूर होने लगता है तब तक कई और स्थूल धारायें इसमें आ मिलती हैं और एक विशाल सलिला में परिवर्तित हो जाती हैं।

इसी पुण्य सलिला को वैवस्वत मनु-पुत्र परुष्णि कहकर वंदन करते हैं। पुण्य सलिला परुष्णि के तट पर वैवस्वत् मनु-पुत्रों का विशाल जन स्थित है जो ‘तृत्सु,-जन’ के नाम से विख्यात है। इस जन में दस विश हैं। प्रत्येक विश में दस ग्राम हैं तथा प्रत्येक ग्राम में दस कुल हैं।

प्रत्येक कुल में कई परिवार हैं तथा परिवारों में प्रपितामह से लेकर पितामह, पिता, पुत्र, पौत्र एवं प्रपौत्रों की पाँच-छः पीढ़ियाँ रहती हैं। सदस्यों की दृष्टि से तो यह एक सम्पन्न जन है ही, धन-धान्य, गौ तथा अश्वादि पालित पशुओं की दृष्टि से भी यह एक शक्तिशाली जन है।

इस जन के आर्य मुख्यतः गौ-चारण और अश्व पालन में ही अपना दिवस व्यतीत करते हैं। कुछ आर्यों ने व्रीही [17] तथा यव के खेतों का निर्माण कर लिया है तो कुछ आर्य विविध शिल्प विद्यायें सीखकर अस्त्र-शस्त्रों तथा लौह-रथों के निर्माण में संलग्न हैं। जन के समस्त कुल एवं परिवार वनस्पति अवशेषों और मृत्तिका से निर्मित शालाओं में रहते हैं।

इन पर्ण शालाओं के चारों ओर पंचवटी [18] बनाई गयी हैं। आर्य ललनाओं ने बड़े ही परिश्रम से पर्णशालाओं के बाहर उलप, काश, कुश, तृण, दर्भ, मुंज, दूर्वा, शष्प, शाद, बल्बज, वीरण तथा शुम्बल आदि घासें लगाई हैं। [19] कहीं-कहीं कुमुद, पुष्कर तथा पुंडरीक पुष्पों के कुंज बनाये गये हैं।

यह सही है कि मनु के पूर्वज देव प्रजा के थे। वे अमरावती के भव्य प्रासादों में निवास करते थे किंतु जल प्लावन में विशाल देव लोक के भव्य प्रासादों के नष्ट होने के बाद वैवस्वत मनु और उनकी प्रजा ने भव्य प्रासादों को त्यागकर पर्ण निर्मित कुटियाओं को ही अपने लिये श्रेयस्कर माना।

प्रजापति मनु का मानना था कि उन भव्य प्रासादों में सोम पीकर मदमत्त हुए विलासी देवों ने अप्सराओं के संयोग से आसुरि भाव प्राप्त कर लिया था। इसी कारण उन्हें नष्ट हो जाना पड़ा। इसीलिये पक्की ईंटों के विशाल प्रासाद बनाने को आर्य प्रजा आसुरि कर्म समझती है।

तृत्सु जन तथा निकट ही स्थित भरत, जह्नु अनु और भृगु जनों में प्रत्येक प्रकार की संपत्ति ‘व्यक्ति’ अथवा परिवार द्वारा धारण न की जाकर ‘जन’ द्वारा संधारित होती है। इसलिये जन में असुरों और द्रविड़ों की भांति पण्य की प्रथा नहीं है। प्रत्येक आर्य जो कुछ भी उत्पादित अथवा अर्जित करता है उसे बलि के रूप में यज्ञ में प्रदान कर देता है और यज्ञ के पश्चात् प्रत्येक परिवार को यथेष्ट बलिभाग प्राप्त होता है जिससे सब का निर्वहन होता है।

इस समय आर्य-जन ‘सभा’ में संलग्न है। उषा के आगमन के साथ नित्य ही मनुपुत्रों की इस सभा का आयोजन होता है जिसमें मंत्रदृष्टा-ऋषि ‘ऋचाओं’ के दर्शन करते हैं और उन्हें पृथ्वी पर आने का आह्वान करते हैं। सभा में साम-गायन के साथ-साथ विभिन्न यज्ञ भी निर्विघ्न रूप से होते हैं। पुरुषों के साथ-साथ जन की समस्त स्त्रियों को इस सभा में भाग लेना अनिवार्य है। अशक्त और रोगी प्रजा को सभा से अनुपस्थित रहने की अनुमति है। साथ ही वे स्त्री-पुरुष भी सभा से अनुपस्थित रहते हैं जिन्हें उस दिन जन की गौओं और अश्वों को दूर्वा चराने के लिये जाना होता है।

सभा के अंतिम भाग में उपनिषद् का आयोजन होता है जिसमें कोई भी स्त्री-पुरुष अपनी जिज्ञासा प्रकट कर सकता है। मंत्रदृष्टा ऋषिगण प्रत्येक जिज्ञासा का समाधान करते हैं। आज की उपनिषद् में महत्वपूर्ण विमर्श हुआ।

गोप [20] सुरथ ने अपने हृदय में उत्पन्न जिज्ञासा को ऋषियों के समक्ष प्रकट किया- ‘हे ऋषि वृन्द! अग्नि कितने हैं ? सूर्य कितने हैं ? उषा कितने हैं और जल कितने हैं ? हे ज्ञानियों मैं आपसे स्पर्धा का वचन नहीं बोल रहा हूँ, अपने विशेष ज्ञान के लिये पूछ रहा हूँ। जब मैं आपसे पूछ रहा होता हूँ तो सूर्य ईश्वर से पूछ रहा होता है।’ [21]

आर्य सुरथ की जिज्ञासा सुनकर ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने नेत्र बंद किये और फिर उसी स्थिति में बोले- ‘एक ही अग्नि है, वह बहुत प्रकार से प्रज्वलित हुआ है। एक ही सूर्य विश्व भर पर प्रकाशित है। एक ही उषा इस सबको प्रकाशित कर रहा है। यह सब एक ही प्रकार का वैभव है।’[22]

ऋषि उग्रबाहु ने कहा- ‘अग्नि सहस्र सिरों वाला है। वह सकल जगत का निर्माता है और सब ओर से प्रकृति का वरण करता है। वह दसों इंद्रियों के भोग एवं कर्म क्षेत्र से परे है। संसार में सर्वत्र उसी की दर्शन-शक्ति और गति-शक्ति कार्य कर रही है।’ [23]

ऋषि नारायण ने कहा- ‘वही सब कुछ है। वही मोक्ष का स्वामी है। अन्न से बढ़ने वालों का भी स्वामी है।’ [24]

ऋषि पत्नी अदिति ने कहा- ‘अग्नि ही ऋतुओं को प्रकट करने वाले प्रकाश एवं तेज से युक्त है।’ [25]

ऋषि पर्जन्य ने समाधिस्थ अवस्था में उच्चरित किया- ‘विद्वान व्यक्ति जिस यज्ञ को पुरुषार्थ रूपी अग्नि से प्रकट करते हैं उस यज्ञ में वसन्त ऋतु घृत के समान, ग्रीष्म ऋतु जलती लकड़ी के समान और शरद् ऋतु हवि के समान होता है। ऋतुओं के ब्रह्माण्ड में ही सवंत्सर यज्ञ होते हैं। जैसे घृत से अग्नि अधिक दीप्त होता है उसी भांति वसन्त के अनन्तर ग्रीष्म तीव्र हो जाता है। शरत् फलदायी होने के करण हवि के समान है।’ [26]

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने कहा- ‘अग्नि से ही ऋचाएं तथा साम उपजे हैं। वही छंदों की रचना करता है।’ [27]                

ऋषि उग्रबाहु बोले- ‘अग्नि ने ही विराट रूप धारण करके भूमि को सृजा और उसके बाद ना-ना शरीर उत्पन्न किये।

ऋषि पत्नी अदिति ने इस मंत्र को आगे बढ़ाया- ‘सकल जगत् को अपने में आहुतिवत् लेने वाले यज्ञरूप अग्नि से तृप्तिदायक, सर्व सेचक, वर्धक, प्राणदाता अन्न, घृत, मधु, जल, दुग्ध इत्यादि उपजे हुए हैं। अग्नि ही उन प्राणियों को भी बनाने वाला है जो वायु में उड़ने वाले हैं, वन में रहने वाले सिंह आदि और जो ग्राम के गौ, भैंस आदि पशु हैं।’ [28]

ऋषि पर्जन्य ने भी अन्य ऋषियों के इस मत का समर्थन किया- ‘अग्नि से अश्व पैदा हुए तथा उसी ने वे पशु भी उत्पन्न किये जिनके जबड़ों में दांत हैं। उससे गौ आदि पशु भी उत्पन्न हुए।’ [29]

गोप सुरथ ने पुनः जिज्ञासा प्रकट की- ‘ऋषि वृन्द! मैं ऐसा सोचता हूँ कि वायु अग्नि का सहायक है वह अग्नि के प्रभाव से युक्त होकर वरुण को बांध कर अंतरिक्ष में ले आता है। अग्नि उस वरुण को प्राणियों के हित के लिये पुनः आकाश से नीचे धकेल देता है।’

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आर्य सुरथ का समर्थन किया- ‘हे आर्यो! जैसे अग्नि जल को पीकर मेघ के अंक रूप जलबिंदुओं की वर्षा द्वारा औषधि आदि पदार्थों को पुष्ट करके सब की रक्षा करता है, वैसे ही हे असंख्यात् कर्मों के करने वाले शूरवीरो! तुम लोग भी सब रोग और धर्म के विरोधी दुष्ट शत्रुओं को नाश करने वाले होकर इस जगत की रक्षा करने वाले बनो। [30]

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने अपनी ऋचा पूरी की ही थी कि पूषा तीव्र गति से भागती हुई आई और सभा से क्षमा याचना करती हुई बोली- ‘हे आर्यो! सभा में विघ्न उपस्थित करने के लिये क्षमा चाहती हूँ किंतु आपात् काल में ऐसा करना क्षम्य माना गया है।’

  – ‘क्या हुआ आर्ये ?’ सभा में उपस्थित लगभग सभी वैवस्वत एक साथ बोल उठे।

  – ‘असुर ‘जन’ की समस्त गौओं को हांककर ले जा रहे हैं।’

  – ‘किस दिशा से आये असुर और किस दिशा को गये ?’ गोप सुरथ ऋषियों को प्रणाम करके तत्काल उठ खड़े हुए।

  – ‘आर्य अतिरथ और आर्य सुनील आज जन की समस्त गौओं को परुष्णि के तट पर दक्षिण में स्थित दूर्वा चराने ले गये थे। मैं भी उनके साथ थी। वहीं असुरों का विशाल समूह अचानक झाड़ियों की ओट से प्रकट हुआ और बल पूर्वक गौओं को हाँक कर ले गया। आर्य अतिरथ और आर्य सुनील शस्त्र लेकर असुरों के पीछे गये हैं और मुझे यहाँ सूचना देने के लिये भेजा है। उन्होंने कहा है कि गोप सुरथ समस्त आर्यों को रथों और अश्वों सहित लेकर आयें क्योंकि असुर बड़ी संख्या में एकत्र होकर आये हैं।’

सभा तत्काल विसर्जित कर दी गयी। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने समस्त आर्यों का आह्वान किया कि वे गविष्टि [31] के लिये प्रस्तुत हों। ऋषिश्रेष्ठ के आह्वान पर समस्त आर्य पुरुषों ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र धारण किये। जन के समस्त वृद्धों और बालकों को जन के मध्य में एकत्र किया गया तथा कुछ बलिष्ठ आर्यों एवं जन की समस्त युवतियों को उनकी रक्षा पर तैनात किया गया ताकि असुर पीछे से जन पर आक्रमण करें तो उनका सामना किया जा सके।

– अध्याय 6, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] पीपल।

[2] गूलर।

[3] बड़

[4] घुमची अथवा गुंजा की बेल

[5] ढाक।

[6] खेजड़ी

[7] सेमर अथवा सेमल, रुईदार वृक्ष

[8] पीतचंदन।

[9] बेर।

[10] पाकर वृक्ष, यह पीपल प्रजाति का वृक्ष है।

[11] विजयसार नामक वृक्ष।

[12] कत्था अथवा खैर।

[13] शीशम।

[14] गंभारी नामक औषधीय वृक्ष।

[15] ढाक।

[16] कण्टकारी नामक वृक्ष।

[17] चावल।

[18] पीपल, वट, बेल, हरड़ और अशोक नामक पाँच वृक्षों के समूह को पंचवटी कहते हैं। कुछ संदर्भ मौलश्री को भी पंचवटी में बताते हैं।

[19] ऋग्वैदिक काल में उलप, काश, कुश, तृण, दर्भ मुंज, दूर्वा शष्प, शाद बल्बज, वीरण, शुम्बल आदि घासें पाई जाती थीं। दर्भ को भूरिमूल, सहस्रपर्ण तथा शतकांड भी कहा गया है। मुंज छाने के काम आती थी। तृण का चढ़ाइ्र पर उगना कहा गया है। शाद हरी मैदानी घास थी। शुम्बल सुगंधित घास थी। दूर्वा के फूलों का भी उल्लेख मिलता है।

[20] गायों की रक्षा के लिये नियुक्त मुख्य योद्धा।

[21] कत्यग्नयः कति सूर्यासः कत्युषासः कत्यु स्विदापः। नोपस्पिजं वः पितरो वदामि प्रच्छामि वः कवयो विद्मने कम्।

[22] एक स्वाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विवमनु प्रभूतः। एक वोषाः सर्वमिदं विभात्येकं वा इदं विबभूव र्सम्।

[23]सहस्रशीर्षा पुरूषः सहस्राक्षः सहस्र पात्। स भूतिं विश्वतो वृत्यात्यतिष्ठद्दशंगुलम्।

[24] पुरूष एवेदं सर्व यद्भूतंयच्च भात्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यद्न्नेनातिरोहति।

[25] प्रजानन्नग्ने तव शेनिमृत्वियमिळयास्पदे घृतवन्तमासदः। आ ते चिकित्र उषसामिवेतयोअ्रेयसः सूर्यस्येव रश्मयः।।

[26] यत्पूयषेण हुविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसन्तो अस्यासीदार्ज्ये ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः।

[27] तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचःसामानि जज्ञिरे। छन्दासि जज्ञिरे स्माद्यजुस्तस्मादजायत।।

[28] तस्माद्यज्ञात्वर्सहुतः सम्भृत पृषदाज्यम्। पशुन्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्रु ये।।

[29] तस्मादश्चा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः।।

[30] अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः। प्रावो वाजेषु वाजिनम।।

[31] गौओं को शत्रुओं से छुड़वाने के निमित्त जो युद्ध किया जाता था उसे गविष्टि कहते थे।

गविष्टि (7)

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गविष्टि

गविष्टि के समय आर्यों का नेतृत्व करने वाले ‘गोप’ आर्य सुरथ ने ऋषियों को आश्वस्त करते हुए दुंदुभि को नमस्कार किया और दुंदुभि का आह्वान करते हुए कहा- ‘हे दुंदुभि! तू हमारे शत्रुओं के विरुद्ध घोष कर। हमें बल दे।’

ऋषि पत्नी अदिति ने यज्ञ शाला में स्थापित दुंदुभि उठाकर ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा के मंगलमय हाथों में रखी। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने दुंदुभि को मस्तक से लगाते हुए इंद्र का आह्वान किया-‘ हे इन्द्र हमारे पशुओं को हमें वापस दो। हमारी दुन्दुभि हमारे संकेत पर बार-बार घोष करती है। हमारे नेता अश्वारूढ़ होकर एकत्र होते हैं। हे इन्द्र हमारे रथारूढ़ योद्धा विजयी हों।’[1]

ऋषि पर्जन्य ने दुंदुभि पर स्वस्तिक अंकित करते हुए प्रार्थना की- हे दुंदुभि! पृथ्वी और आकाश दोनों को तू अपनी ध्वनि से भर दे जिससे स्थावर और जंगम दोनों तेरे घोष को जान जायें। तू जो इन्द्र और देवों का सहचर है, हमारे शत्रुओं को दूर भगा दे।’ [2]

गविष्टि के समय आर्यों का नेतृत्व करने वाले ‘गोप’ आर्य सुरथ ने ऋषियों को आश्वस्त करते हुए दुंदुभि को नमस्कार किया और दुंदुभि का आह्वान करते हुए कहा- ‘हे दुंदुभि! तू हमारे शत्रुओं के विरुद्ध घोष कर। हमें बल दे। दुष्टों को भयभीत करते हुए शब्द कर। जिन्हें हमें दुःख पहुँचाने में ही सुख मिलता है, उन्हें भगा दे। तू इन्द्र की मुष्टि है, हमें दृढ़ कर।’ [3]

ऋषि उग्रबाहु ने ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा से दुंदुभि लेकर तुमुल शब्द उत्पन्न किया जो चारों दिशाओं में व्याप्त हो गया।

इसी के साथ गोप सुरथ और उनके आर्य वीरों ने अपने अश्वों और रथों को असुरों के प्रस्थान की दिशा में हाँक दिया। असुरों का दल गौओं को हाँकता हुआ अधिक दूर नहीं गया था कि आर्य अश्वारोहियों ने उसे जा घेरा। आर्य अतिरथ और आर्य सुनील भी असुरों के पीछे जाते हुए उन्हें मार्ग में ही मिल गये। असुरों को अनुमान था कि आर्य अश्वारोही शीघ्र ही उन्हें आ घेरेंगे। अतः वे असावधान नहीं थे। हरित तृण और निर्मल जल से सेवित गौओं को असुरों के चंगुल में छटपटाते हुए देखकर आर्यवीरों का रक्त खौल उठा किंतु अभी उचित अवसर न जानकर उन्होंने तत्काल असुरों पर आक्रमण नहीं किया।

आर्य अश्वारोहियों का दल कृष्णायस [4] कवच एवं शिरस्त्राण धारण किये हुए होने के कारण सुरक्षित था तथा लौह-खड्ग धारण किये हुए होने के कारण काष्ठ एवं प्रस्तरों के शस्त्र धारण करने वाले पदाति असुरों की तुलना में काफी बलशाली था फिर भी इस समय उनकी संख्या असुरों की अपेक्षा काफी कम थी इसलिये उन्होंने असुरों पर सीधा आक्रमण न करके उनके मार्ग को अवरूद्ध करना ही अधिक उचित समझा। वे चाहते थे कि रथों पर सवार आर्य धनुर्धरों के आ पहुँचने तक असुरों को अटकाया जाये। तब आर्यों की संख्या पर्याप्त हो जायेगी और असुर उनका सामना करने की स्थिति में नहीं रह जायेंगे।

असुरों का नायक कृष्णवर्ण की स्थूल काया का स्वामी था। निरंतर मांस भक्षण और रक्तपान करने के कारण उसका चेहरा अत्यंत विकराल जान पड़ता था जिस पर धूर्तता के भाव दूर से ही दिखाई पड़ते थे। मस्तक पर सींग धारण कर लेने के कारण वह और भी क्रूर प्रतीत होता था। आर्य सुरथ ने दूर से ही पहचान लिया था असुर नायक विरूपाक्ष को। आर्य सुरथ और असुर विरूपाक्ष पहले भी युद्ध क्षेत्र में एक-दूसरे का सत्कार कर चुके हैं।

  – ‘क्यों आर्य! गौएं छुड़ा ले जाने आया है ?’ व्यंग्य किया विरूपाक्ष ने। अश्वारोही आर्यों की बहुत कम संख्या को लक्षित करके उसका हौंसला बढ़ गया प्रतीत होता था।

  – ‘नहीं असुर विरूपाक्ष! तुझे पुरोहित जानकर गौएं दान करने के उद्देश्य से आया हूँ।’ असुर की ही व्यंजना में उत्तर दिया आर्य सुरथ ने।

  – ‘क्या खूब कही तूने! आर्य सुरथ, कितना अच्छा हो यदि दुष्ट आर्य हम शक्तिशाली असुरों को अपना पुरोहित नियुक्त कर लें। तब तुझे अग्नि को प्रसन्न करने के लिये यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रहेगी।’

दोनों नायकों की रोचक व्यंजनायें सुनकर असुरों का दल थम सा गया था। उनके मध्य में घिरी हुई गौएं अपने पुराने स्वामियों को देखकर शांत हो गयी थीं। उन्हें नियंत्रित करने मे अब असुरों को श्रम नहीं करना पड़ रहा था।

  – ‘असुरगण यदि दस्युकर्म त्याग दें तो आर्यजन उन्हें अपना दास घोषित कर सकते हैं विरूपाक्ष।’

  – ‘हा-हा! असुर और दास!! अग्नि पूजक आर्यों के दास!!!’ अट्टहास किया विरूपाक्ष ने।

  – ‘अग्नि तो इस सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है विरूपाक्ष। तुम्हारा भी।’

  – ‘और वरुण ? वरुण नहीं है इस सृष्टि का स्वामी ?’

  – ‘असुरों द्वारा पूज्य वरुण को इन्द्र ने देवपद प्रदान कर दिया है। अब तेरा यह उपालंभ उचित नही।’

  – ‘किंतु कब ? कब किया इन्द्र ने वरुण को देवत्व प्रदान ? जब इन्द्र ने वरुण के मित्र वृत्र का वध कर दिया ? अब इस देवपद का क्या लाभ है आर्य सुरथ ?’ क्रोध से विरूपाक्ष के नथुने फड़कने लगे।

  – ‘ इन्द्र को वृथा दोष देना उचित नहीं है विरूपाक्ष। स्वयं त्वष्टा ने वृत्र के शत्रु इन्द्र की वृद्धि के लिये यज्ञ करवाया था।’ आर्य सुरथ ने हँसकर कहा और उनके साथ समस्त आर्यवीर भी हँस पड़े।

  – ‘पाखण्डी हो तुम सब! त्वष्टा ने इन्द्र की वृद्धि के लिये नहीं, अपितु इन्द्र के शत्रु और अपने पुत्र वृत्र की वृद्धि के लिये यज्ञ करवाया था किंतु धूर्तता वश पाखण्डी ऋषियों ने उसका उच्चारण बदल कर मंत्र को दूषित कर दिया।’ [5] विरूपाक्ष आर्य सुरथ के व्यग्ंय से तिलमिला कर रह गया।

  – ‘मिथ्या प्रलाप मत कर विरूपाक्ष। जिन ऋषियों को तू बलपूर्वक उठाकर ले गया था, वे पाखण्डी क्यों कर हुए ? क्या वृत्र के लिये यह उचित था कि वह वरुण को बांध कर रखता ? ऋषिगण इस कार्य में वृत्र की सहायता कैसे कर सकते थे! त्रुटि वृत्र की थी। एक तो उसने वरुण को बांध लिया और जब इन्द्र वरुण को मुक्त करवाने के लिये आया तो वृत्र इन्द्र का भी नाश करने को तत्पर हो गया।’

  – ‘झूठ बोलता है तू। वृत्र ने वरुण को बांधा नहीं था, केवल अपने स्थान पर स्थिर कर दिया था।’

  – ‘एक ही अर्थ है इन दोनों बातों का। वरुण के स्थिर हो जाने से नदियों में जल का प्रवाह अवरूद्ध हो गया। वर्षा बंद हो गयी। समस्त प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी।’

– ‘समस्त प्रजा से तेरा क्या आशय ? यह असुरों का आपसी विवाद था। देवों को इसमें कूदने की क्या आवश्यता थी ? सत्य तो यह है कि इंद्र को असुरों के पुर तोड़कर पुरंदर की उपाधि धारण करने की कामना थी ताकि कोई अन्य देव इंद्रपद प्राप्त करने के लिये उससे स्पर्धा न कर सके।’

  – ‘कैसे हो गया यह असुरों का आपसी विवाद ? यदि अग्नि से उत्पन्न वरुण असुरों का मित्र हो गया तो क्या वह किसी अन्य प्राणी के लिये उपलब्ध नहीं रहेगा ?’

  – ‘वरुण तुम्हारा दास नहीं है।’

  – ‘हाँ। असुर वरुण आर्यों का दास नहीं है। अब वह आर्यों द्वारा पूज्य देव है।’

दोनों नायकों का वार्तालाप व्यंजना को त्यागकर युद्ध आरंभ की घोषणा तक पहुँचा ही था कि रथाति आर्यों का दल आ पहुँचा। उनके तीक्ष्ण शरों ने देखते ही देखते असुरों का संहार आरंभ कर दिया। असुर प्रस्तर और अस्थियों से निर्मित भोथरे अस्त्र-शस्त्रों से आर्यों का सामना करने की स्थिति में नहीं थे।

उनकी विजय तो उसी स्थिति में हो सकती थी जब शत्रु या तो असावधान हो या फिर बहुत ही कम संख्या में। असुरों के काले शरीरों से रक्त की धारायें छूटने लगीं और वे तेजी से घटने लगे। अनेक असुर प्राण लेकर भाग छूटे। गोप सुरथ बड़ी देर तक सघन वन प्रांतर में विरूपाक्ष को ढूंढते रहे किंतु वह गौओं तथा वृक्षों की ओट लेकर भाग जाने में सफल रहा।

गौओं को अपने संरक्षण में लेकर आर्य योद्धाओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र परुष्णि के पावन जल में प्रक्षालित किये और स्वयं भी स्नान आदि से निवृत्त होकर गौओं तथा अश्वों को हरित तृण एवं निर्मल जल से संतुष्ट किया। जब आर्य वीर गौओं को लेकर अपने ‘जन’ पहुँचे तब तक सूर्यदेव ने अपना रथ पश्चिम दिशा में काफी दूर तक हाँक दिया था।

– अध्याय 7, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से आई है-

आमूरज प्रत्यावर्तयेमाः केतुमद्दुन्दुभिर्वा वदीति।

समश्सपर्णाश्चरन्ति नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु। 6.47.31

[2] ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से आई है-

उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरूत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत्।

स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून्।। 6. 47.29

[3] ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से आई है-

आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निः ष्टनिहि दुरिता बाधमानः।

अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीळयस्व।। 6.47.30

[4] लौह।

[5] त्वष्टा ने अपने पुत्र वृत्र की वृद्धि के लिये एक यज्ञ करवाया। इसमें मंत्रपाठ ‘इन्द्रशत्रुर्व। र्धस्व’ किया जाना था। अर्थात् इन्द्र के शत्रु (वृत्र) की वृद्धि हो। इसमें इन्द्रशत्रुपद के अन्त में उदात्त स्वर हैं, ऋत्विजों ने इसके आदि में उदात्त रखकर इसका पाठ इस प्रकार किया- ‘इन्द्र।शत्रुर्वर्धस्व’। जिससे इसका अर्थ हो गया- ‘शत्रु इन्द्र की वृद्धि हो।’ पाणिनीय शिक्षा में एक श्लोक में इस आख्यायिका का उल्लेख मिलता है, जिसमें कहा गया है कि मंत्र के दूषित उच्चारण से उत्पन्न अर्थ यजमान का नाश कर देता है- ‘दुष्टो मन्त्रः स्वरतो वर्णतो वा, मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह। स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात्।।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता के उपन्यास मोहनजोदारो की नृत्यांगना का सप्तम् अध्याय।

पुरोडाश (8)

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पुरोडाश

इन्द्र ने अग्नि और सोम का आह्वान करके कहा कि तुम तो मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ। तुम क्यों इस दस्यु को बढ़ावा देते हो। इन्द्र ने अग्नि और सोम को प्रसन्न करने के लिये ‘एकादशकपाल पुरोडाश’ का निर्वपन किया।

संध्याकाल में परुष्णि के पावन तट पर आर्यों की सभा पुनः जुड़ी। प्रातः अचानक ही गविष्टि आयोजित हो जाने से बहुत से विमर्श अपूर्ण रह गये थे। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा चाहते थे कि जो ऋचायें अधूरी रह गयी थीं उन्हें पूरा कर लिया जाये तथा आज प्रकट हुई ऋचाओं को भलिभांति समझ लिया जाये किंतु विमर्श के सूत्र पुनः जुड़ ही नहीं सके। गविष्टि में जाने से पीछे रह गये आर्य, विशेषकर आर्य ललनायें और बालक जानना चाहते थे कि गविष्टि में क्या-कुछ हुआ! आर्य वीरों ने गोप सुरथ के नेतृत्व में दुष्ट असुरों का दमन किस प्रकार किया!

ऐसे अवसरों पर आर्य अतिरथ किसी को बोलने का अवसर नहीं देते। शौर्य प्रदर्शन के अवसरों के साथ-साथ शौर्य प्रदर्शन के सविस्तार वर्णन के अवसर भी कोई उनसे छीन नहीं सकता। अतः आर्य अतिरथ ने ही आर्यवीरों के असुरों के दल तक पहुँचने और गोप सुरथ के नेतृत्व में असुरों से गौओं को मुक्त करवाने तक का समस्त विवरण सविस्तार कह सुनाया। आर्य अतिरथ के कहने का ढंग इतना निराला और रुचिकर है कि सदैव गंभीर रहने वाले ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा को भी हँसी आ जाती है।

  – ‘इस प्रकार आर्य वीरों ने असुरों के शृंग तोड़ डाले, कपाल फोड़ डाले और उनकी पूंछें पकड़ कर उन्हें फिर से मकरालय[1] की ओर धकेल दिया।’ आर्य अतिरथ ने गविष्टि का विवरण पूरा किया। आर्य वीरों के पराक्रम का वर्णन करते समय उनकी शिराओं का रक्त पूरी गति से दौड़ने लगता है।

  – ‘अग्नि से उत्पन्न होकर भी वरुण असुर क्यों हो गया ऋषिश्रेष्ठ!’ आर्या पूषा ने प्रश्न किया।

  – ‘असुरों का संग देवों की प्रवृत्ति को भी दूषित कर डालता है और दूषित प्रवृत्ति देवों को भी असुर बना देती है पुत्री। असुरों के संग रहने के कारण देव होने पर भी वरुण में आसुरि प्रवृत्तियों ने जन्म ले लिया। बाद में जब वरुण ने असुरों के प्रभाव से मुक्त होना चाहा तो असुर वृत्र ने वरुण को बंदी बना लिया । इस पर देवताओं ने वरुण को असुरों के प्रभाव से मुक्त करके पुनः देवत्व प्रदान किया और वरुण अपनी आसुरि शक्तियों का उपयोग ऋत संचालन में करने लगे।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आर्या पूषा की शंका का समाधान किया।

  – ‘त्वष्टा [2] और इन्द्र में क्या विवाद उत्पन्न हो गया था ऋषिवर कि इन्द्र ने उसके दोनों पुत्रों विश्वरूप और वृत्र का वध कर दिया! आर्या सुषोमा ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘देवशिल्पी त्वष्टा  के दोनों पुत्र विश्वरूप और वृत्र असुर हो गये थे। इसी कारण  इन्द्र को उनका वध करना पड़ा।’ ऋषिश्रेष्ठ ने उत्त्तर दिया।

  – ‘मैंने सुना है ऋषिवर कि इन्द्र को विश्वरूप तथा वृत्र से दीर्घ काल तक संघर्ष करना पड़ा।’ आर्या सुषोमा ने पुनः जिज्ञासा व्यक्त की।

आर्या सुषोमा की जिज्ञासा सुनकर ऋषिश्रेष्ठ मुस्कुराकर बोले- ‘मैं जानता हूँ पुत्री कि आर्या पूषा और तुम्हारी रुचि प्राचीन आख्यानों को जानने में अधिक रहती है। इसीसे तुम दोनों बार-बार प्रश्न करती हो। मैं तुम दोनों की इस प्रवृत्ति की प्रशंसा करता हूँ। सद्भाव पूर्वक प्रकट की गयी जिज्ञासा न केवल अपना अपितु अन्य श्रोताओं का भी उपकार करती है।’

इतना कहकर ऋषिश्रेष्ठ ने नेत्र बंद कर लिये। ऐसा लगता था मानो वे किसी गहन चिंतन में डूब गये हों। कुछ क्षण पश्चात् नेत्र खोलकर बोले-

  – ‘यह बहुत प्राचीन आख्यायिका है। [3] जलप्लावन से सहस्रों वर्ष पूर्व। तब तक देव जाति अपने पराक्रम के चरम पर नहीं पहुँची थी। देवों में तब अनेक नयी व्यवस्थायें बन रही थीं। फिर भी प्रकृति की अधिकतर शक्तियाँ इन्द्र के पास ही थीं। इस कारण कई देवता इन्द्र से वैमनस्य मानते थे। उनमें से त्वष्टा भी एक था। उसके पुत्र विश्वरूप के तीन सिर और तीन मुख थे। विश्वरूप एक मुख से सोमपान करता था तो दूसरे मुख से सुरा पीता था। तीसरे मुख से वह अन्न का भक्षण करता था। प्रजापति ने सोम देवों के लिये, सुरा असुरों के लिये तथा अन्न मनुष्यों के लिये बनाया था किंतु तीनों ही पदार्थों का भक्षण करके विश्वरूप असीमित शक्तिशाली और स्वेच्छाचारी हो गया। जिससे प्रजापति की बनाई व्यवस्था नष्ट होने लगी। इसलिये इन्द्र ने उस गर्वित विश्वरूप के तीनों सिर काट डाले।

विश्वरूप का सोमपायी मुख कटते ही कपिंजल [4] बन गया। इसलिये कपिंजल सोम के समान ही भूरा होता है। सुरा पीने वाला मुख कलविंक [5] बन गया। वह मद्यमत्त की ही तरह कहता रहता है-कः इव ? [6] विश्वरूप का तीसरा अन्नभक्षी मुख तीतर बन गया। उसमें घृत और मधु की बूंदें अंकित रहती हैं।

विश्वरूप के तीनों मुख कट जाने से त्वष्टा कुपित हुआ। कैसे मेरे पुत्र को मार डाला इन्द्र ने ? कुपित त्वष्टा ने इन्द्र का आह्वान किये बिना ही सोम का आहरण किया। सोम जैसे चुवाया हुआ था वैसे ही बिना इन्द्र के भी रहा। अर्थात् बिना इन्द्र की सहायता के भी सोम अपने सात्त्विक रूप में बना रहा।

यह देखकर इन्द्र ने सोचा कि इससे तो मुझे सोम से वंचित कर दिया जायेगा। अतः इन्द्र ने द्रोणकलश में रखे सोम का बलपूर्वक भक्षण कर लिया। त्वष्टा द्वारा इन्द्र का आह्वान किये बिना ही इन्द्र द्वारा बलपूर्वक पिये जाने से सोम कुपित हो गया और उसने इन्द्र को आहत किया। मुख को छोड़कर इन्द्र के जितने भी प्राण छिद्र थे, उन सबमें से सोम बाहर आने लगा।

इन्द्र की नाक से बाहर निकला हुआ सोम सिंह बन गया। जो सोम कानों से बहा, वह भेड़िया बन गया। जो सोम वाक् और प्राण से बहा, वह शार्दूल प्रधान श्वापद बन गया। इन्द्र ने तीन बार थूका उससे कुवल,[7] कर्कन्धु[8]  तथा बदर [9] बना। शरीर से सोम के बह जाने के उपरांत इन्द्र सर्वथा क्षीण हो गया तथा लड़खड़ाता हुआ अपने घर गया तब अश्विनों ने उसकी चिकित्सा की।

जब त्वष्टा को ज्ञात हुआ कि इन्द्र ने सोम पान कर लिया तो वह और भी कुपित हो गया। कैसे बिना बुलाये इन्द्र ने सोम को ग्रहण कर लिया ? त्वष्टा ने द्रोण कलश में बचे हुए सोम को यह कह कर यज्ञ में प्रवाहित किया कि इन्द्र शत्रु तुम बढ़ो। बहता हुआ सोम अग्नि में पहुँच कर वृत्र के रूप में प्रकट हुआ। उसे सब विद्यायें, यश, अन्न एवं वैभव प्राप्त हुए।

वह लुढ़कता हुआ उत्पन्न हुआ इससे वृत्र कहलाया। वह बिना पैरों के हुआ इसलिये अहि कहलाया। दनु और दनायु उसके माता पिता हुए इसलिये वह दनुज कहलाया। क्रोध से भरे हुए त्वष्टा के कोप से इन्द्र को बचाने के लिये ऋषियों ने मंत्रजाप में त्रुटि कर दी जिससे मंत्र का अर्थ ‘इंद्र के शत्रु तुम बढ़ो’ के स्थान पर ‘शत्रु इन्द्र तुम बढ़ो’ हो गया। इससे इन्द्र का बल बढ़ गया।

अपने पिता के आदेश पर ‘वृत्र’ द्युलोक और पृथ्वी के बीच में जो कुछ भी है, उस सब को आच्छादित करके सो गया। वृत्र ने पूर्व और पश्चिम में समुद्रों को समेट लिया और उतना ही अन्न खाने लगा। उसे पूर्वाह्न में देवता अन्न देते थे, मध्याह्न में मनुष्य और अपराह्ण में पितर। वृत्र द्वारा वरुण को बंदी बना लिये जाने से चारों ओर हा-हा कार मच गया। वनस्पतियाँ सूख गयीं। नदियों ने प्रवाहित होना बंद कर दिया। पशु-पक्षी, देव, मानव सब कष्ट पाने लगे।

इस पर इन्द्र ने अग्नि और सोम का आह्वान करके कहा कि तुम तो मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ। तुम क्यों इस दस्यु को बढ़ावा देते हो। इन्द्र ने अग्नि और सोम को प्रसन्न करने के लिये ‘एकादशकपाल पुरोडाश’ का निर्वपन किया। [10] इस यज्ञ से ही इन्द्र ने इन्द्रत्व प्राप्त किया। जिससे अग्नि और सोम इन्द्र की ओर हो गये। उनके साथ अन्य देवता भी इन्द्र की ओर आ गये।

इन्द्र ने विष्णु से प्रार्थना की- ‘मैं वृत्र पर वज्र का प्रहार करूंगा, आप मेरे निकट खड़े रहना।’

विष्णु ने कहा- ‘अच्छी बात है। मैं तुम्हारे पास रहूँगा, तुम प्रहार करो।’

इससे पहले कि इन्द्र वृत्र पर प्रहार कर पाता, वृत्र ने विशाल आकार धारण करके इन्द्र को निगल लिया। इस पर बृहस्पति की प्रेरणा से देवताओं ने इन्द्र को वृत्र के पेट से बाहर निकाला। इन्द्र की प्रार्थना पर विष्णु ने वज्र में प्रवेश किया। इस बार जब इन्द्र ने वज्र उठाया तो वृत्र डर गया। वृत्र ने कहा- ‘मुझे मारो मत, मैं तुम्हें अपना पराक्रम देता हूँ।’ इन्द्र रुक गया और वृत्र ने ‘यजुष्’ [11] इन्द्र को प्रदान कर दिया।

इन्द्र ने दुबारा वज्र उठाया तो वृत्र ने कहा- ‘मुझे मारो मत, मैं अपना ऋक् [12] तुमको देता हूँ।’ जब इन्द्र ने तीसरी बार वज्र उठाया तो उसने अपना ‘साम’ [13] भी इन्द्र को दे दिया।

इस प्रकार इन्द्र को समस्त विद्या, यश, अन्न और समस्त वैभव की प्राप्ति हो गयी और वृत्र खाली घड़े के समान रह गया। पुत्र को निर्बल हुआ देखकर वृत्र की माता तिरछी होकर उसके ऊपर छा गयी तथा अनेक कालेय वृत्र की सहायता को आ गये।

इस पर देवों ने साकमेध [14] का आयोजन किया। अग्नि तीक्ष्ण बाणों के रूप में प्रकट हुआ। सोम और सविता ने वृत्र को मारने के लिये इंद्र को तीक्ष्ण प्रेरणा प्रदान की। सरस्वती ने कहा-‘मारो-मारो।’ पुष्टि के देवता पूषा ने वृत्र को कसकर पकड़ लिया। विष्णु ने बताया कि वृत्र को लौह, काष्ठ तथा बांस से निर्मित तथा किसी भी ऐसे पदार्थ से निर्मित अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारा जा सकता जो सूखी अथवा गीली हो। इसे न दिन में मारा जा सकता है न रात्रि में।

इस पर जब दिवस और रात्रि के मध्य संध्या काल उपस्थित हुआ तो इन्द्र ने अग्नि की ब्रह्मशक्ति और अपनी क्षम शक्ति से वज्र को समुद्र के फेन में लपेट कर व्रत्र पर प्रहार किया जिससे वृत्र तथा उसकी माता के दो टुकडे़ हो गये। कालेय भाग कर समुद्र में छिप गये।

इन्द्र के प्रहार से आहत वृत्र सड़ांध के साथ सब दिशाओं से समुद्र की ओर बहने लगा। इससे समुद्रों में जल का स्तर फिर से बढ़ गया। [15] वृत्र के सौम्य भाग से चन्द्रमा बन गया और आसुरि भाग से समस्त प्राणियों का उदर। इसी कारण प्रत्येक प्राणी उदर रूपी वृत्र के लिये बलिहरण करता है और अन्न भक्षण करना चाहता है। 

वृत्र के मरने पर मरूतों ने संगीत का आयोजन किया किंतु वज्र के फेन में लिपटे हुए होने से इन्द्र को वृत्र की मृत्यु का पता नहीं चला और इन्द्र डर कर अनुष्टप में छिप गया। अग्नि, हिरण्यस्तूप तथा बहती उसे ढूंढने निकले। अग्नि ने इन्द्र को ढूंढ लिया। देवताओं ने बारह पात्रों में आहरण किया हुआ पुरोडाश इन्द्र को समर्पित किया।

इन्द्र ने कहा कि वृत्र पर वज्र के प्रहार से मेरे समस्त अंग शिथिल हो गये हैं, इसलिये इस पुरोडाश से मेरी तृप्ति नहीं होती। जिस वस्तु से मेरी तृप्ति हो वही वस्तु मुझे दो। देवताओं ने विचार किया कि सोम के बिना इन्द्र तृप्त नहीं होगा। देवताओं के आह्वान पर सोम रात्रि में चन्द्रमा के साथ आया और जल तथा वनस्पतियों में समा गया।

गायों ने उन वनस्पतियों का भक्षण करके तथा सोमयुक्त जलपान करके सोम का सम्भरण किया। देवताओं ने गौओं से सोम प्राप्त करके उसे इन्द्र को प्रदान किया। इन्द्र ने कहा मुझे इससे भी तृप्ति नहीं होती, मुझे उबाला हुआ दो। अंत में अमावस्या को दही और उबले हुए दूध को मिलाकर सान्नय्य याग किया गया जिससे इन्द्र तृप्त हुआ और नवीन बल धारण करके प्रकट हो गया।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आख्यायिका पूरी की।

ऋषिश्रेष्ठ के इस वक्तव्य के साथ ही समस्त आर्य आख्यायिका के काल से निकल कर वर्तमान में लौटे। यद्यपि बहुत सारे प्रश्न अब भी शेष थे जिनका समाधान होना चाहिये था किंतु अत्यधिक समय व्यतीत हो जाने के भय से किसी ने कोई प्रश्न पूछना उचित नहीं समझा। फिर भी गोप सुरथ ने अपनी जिज्ञासा प्रकट कर ही दी- ‘ऋषिश्रेष्ठ! क्या इसी घटना के बाद से मित्र को सोम से वंचित किया गया ?’

  – ‘हाँ! सदैव वरुण के साथ रहने वाले ‘मित्र’ ने वृत्र के साथ हुए युद्ध में यह कहकर देवताओं की कोई सहायता नहीं की कि मैं तो सबका मित्र हूँ । अतः वृत्र और त्वष्टा के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करूंगा। इसी कारण देवताओं ने मित्र को सोम से वंचित कर दिया।’ [16]

सोम वर्षण करता हुआ चन्द्रमा आकाश के ठीक मध्य में आ गया था। अतः आर्यों ने सभा का समापन किया।

– अध्याय 8, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] समुद्र।

[2] विश्वकर्मा का एक नाम त्वष्टा भी है।

[3] यह आख्यायिका ऋग्वगेद, चतुर्थ ब्राह्मण तथा अन्य ग्रंथों में कुछ अंतर के साथ प्राप्त होती है।

[4] बटेर।

[5] गौरैया

[6] कौन है, कौन है ?

[7] गूलर।

[8] घुमची, घुँघची अथवा गुंजा।

[9] बेर।

[10] चतुर्थ ब्राह्मण (1. 6.)

[11] यज्ञ।

[12] पूजा, स्तवन।

[13] वाक्चातुर्य से आकर्षित करने की क्षमता।

[14] साकमेध का अर्थ होता है साथ-साथ मिलकर बढ़ना या संगति करना।

[15] ऋग्वेद में लिखा है कि वृत्र रंभाती हुई गायों के समान समुद्र की ओर बढ़ चला। (ऋ. 1. 84. 3)

[16] तृतीय ब्राह्मण : (पवित्रच्छेदन-1. 1. 3) ऋग्वेद तथा अन्य संहिताओं में मित्र और वरुण का उल्लेख एक साथ हुआ है। ऐसा माना जाता है कि मित्र का अर्थ है दिन और वरुण का अर्थ है रात्रि। इसी से मित्रावरुण को ऋत् अर्थात् प्रकृति की व्यवस्था का देवता कहा जाता है। मित्र का एक अर्थ सूर्य भी होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सोम एक शीतल पेय है इस कारण उसका सम्बंध चन्द्रमा से है और सूर्य को उससे वंचित किया गया है।

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