भूमिका – रजिया सुल्तान पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ई-बुक रजिया सुल्तान की भूमिका दी गई है जिसमें इस पुस्तक के बारे में संक्षिप्त जानकारी लिखी गई है।
तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में जब दिल्ली सल्तनत पर लड़ाका तुर्की कबीले शासन कर रहे थे, एक यतीम शहजादी का दिल्ली के तख्त पर काबिज हो जाना बहुत ही आश्चर्य जनक घटना थी किंतु सख्त इरादों की मलिका रजिया ने उस युग में ऐसा कर दिखाया।
घोड़े पर बैठकर तलवार चलाने वाली सुन्दर औरत को तुर्की अमीर कभी भी दिल्ली के तख्त पर नहीं देखना चाहते थे किंतु दिल्ली की गरीब और निरीह जनता ने उसे दिल्ली की मल्लिका बनाया। यही कारण था कि तुर्की अमीर तब तक रजिया के दुश्मन बने रहे जब तक कि रजिया खत्म नहीं हो गई।
वह अपनी सल्तनत और रियाया की रक्षा करने के लिये तलवार और कलम दोनों चलाना जानती थी। वह युद्ध अभियानों का स्वयं संचालन कर सकती थी। वह तख्त पर बैठकर अमीरों और रियाया पर शासन कर सकती थी। वह दिल्ली की गलियों में घूमकर जनता का विश्वास जीत सकती थी। वह पतली-दुबली सी लड़की, विद्राहियों के विरुद्ध रण में जूझने को तत्पर रहती थी। जब वह घोड़े की पीठ पर बैठती तो घोड़े हवाओं से बातें करने लगते। जब वह अपनी सेनाओं को प्रयाण का आदेश देती तो बड़े-बड़े शत्रु मैदान छोड़कर भाग जाते। उसने मध्यकालीन भारत का इतिहास बदल दिया।
यद्यपि रजिया ने अपने पिता इल्तुतमिश को ही अपना आदर्श माना था तथा उसी के पदचिह्नों पर चलकर वह शासन का संचालन करती थी किंतु कई मामलों में वह अपने पिता से भी दो कदम आगे थी। जिन तुर्की अमीरों के समक्ष इल्तुतमिश तख्त पर बैठने में संकोच करता था, रजिया उन्हीं अमीरों को सख्ती से आदेश देती और उनकी पालना करवाती थी। इल्तुतमिश ने तुर्की अमीरों को खुश करने के लिये हिन्दू जनता पर भयानक अत्याचार किये किंतु रजिया ने अपने अमीरों को निर्देश दिये कि वे हिन्दू रियाया के साथ नर्मी से पेश आयें।
उसने शासन में नये प्रयोग किये तथा अपने अक्तादारों (प्रांतीय शासकों) को उसी प्रकार अंकुश में रखा तथा उनके स्थानांतरण की पद्धति विकसित की जिस प्रकार दो साल बाद मुगलों ने अपने सूबेदारों पर नियंत्रण स्थापित किया तथा हर दो-चार साल में उनके सूबों की बदली की। इस मामले में वह अपने समय से बहुत आगे थी।
रजिया में एक सफल राजा के समस्त गुण विद्यमान थे किंतु दगा, फरेब, जालसाजी और खुदगर्जी से भरे उस युग में रजिया केवल साढ़े तीन साल ही शासन कर सकी। रजिया को लेकर अक्सर उसके सौन्दर्य और प्रेम के किस्से ही इतिहास में हावी हो गये हैं जबकि सुल्तान के रूप में उसके संघर्ष और उपलब्धियां कम दिलचस्प नहीं हैं।
यह पुस्तक रजिया के उन्हीं संघर्षों पर केन्द्रित है और रजिया का वास्तविक इतिहास है जो कि तेरहवीं शताब्दी के भारत के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है।
रजिया सुल्तान का इतिहास उसके पिता शम्सुद्दीन इल्तुतमिश से शुरु होता है। इल्तुतमिश मध्य एशिया में रहने वाले तुर्कों के अल्बारी अथवा इल्बरी कबीले के एक प्रमुख एवं प्रभावशाली व्यक्ति आलम खाँ का प्रतिभाशाली तथा रूपवान पुत्र था। इस कारण उसे अपने पिता की विशेष कृपा तथा वात्सल्य प्राप्त था।
इससे इल्तुतमिश के भाइयों तथा सम्बन्धियों को इल्तुतमिश से ईर्ष्या हो गई और वे उसे नष्ट करने पर तुल गये। उन दिनों मध्य एशिया में बच्चों को चुराकर उन्हें गुलाम बना लेने का कुत्सित व्यापार जोरों पर था। बच्चों को चुराकर उन्हें तस्करों के हाथों बेच दिया जाता था। ये तस्कर उन बच्चों को गुलाम के रूप में बल्ख, बुखारा, मकरान, गोर, गजनी तथा दिल्ली आदि शहरों में धनी लोगों, अमीरों तथा सुल्तानों के महलों में बेच देते थे।
इल्तुतमिश के रिश्तेदार इल्तुतमिश को घर से बहकाकर ले गये और बुखारा जाने वाले घोड़ों के सौदागर के हाथों बेच दिया। घोड़ों के सौदागर ने उसे बुखारा के मुख्य काजी के एक सम्बन्धी को बेच दिया। इसके बाद इल्तुतमिश दो बार और बेचा गया। अन्त में जमालुद्दीन नाम का एक सौदागर इल्तुतमिश को गजनी ले गया।
गजनी के सुल्तान मुहम्मद गौरी के एक नौकर की दृष्टि इल्तुतमिश पर पड़ी। उसने सुल्तान से इल्तुतमिश की प्रशंसा की परन्तु मूल्य का निर्णय न होने से इल्तुतमिश खरीदा नहीं जा सका। कुछ दिनों के उपरान्त इल्तुमिश को भारत लाया गया जहाँ मुहम्मद गौरी के पूर्व गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को दिल्ली में खरीद लिया।
मुहम्मद गौरी ने भारत जीत लेने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का गवर्नर नियुक्त किया। ई.1205 में जब मुहम्मद गौरी ने पंजाब में खोखरों के विरुद्ध अभियान किया तो उसमें इल्तुतमिश ने असाधारण पराक्रम का परिचय दिया। यहाँ से इल्तुतमिश के भाग्य का उदय होना आरम्भ हुआ। उसकी वीरता से प्रसन्न होकर मुहम्मद गौरी ने कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि वह इल्तुतमिश को गुलामी से मुक्त कर दे तथा उसके साथ अच्छा व्यवहार करे। ऐबक ने ऐसा ही किया तथा इल्तुतमिश को गुलामी से मुक्त करके उसे अपनी नौकरी में रख लिया और उसके साथ सौम्य व्यवहार करने लगा।
इल्तुतिमश के गुणों से प्रभावित होकर ऐबक ने उसे ‘सर जानदार’ के पद पर नियुक्त किया तथा बाद में ‘अमीरे शिकार’ बना दिया। वह इल्तुतमिश को सदैव अपने साथ रखने लगा। जब ग्वालियर पर कुतुबुद्दीन का अधिकार स्थापित हो गया तब इल्तुतमिश वहाँ का अमीर नियुक्त किया गया।
इल्तुतमिश ने पूरी निष्ठा के साथ अपने मालिक कुतुबुद्दीन ऐबक की सेवा की जिसके कारण ऐबक उससे पूरी तरह से प्रसन्न हो गया और उसने अपनी पुत्री कुतुब बेगम का विवाह इल्तुतमिश के साथ कर दिया। इस दाम्पत्य से इल्तुतमिश को एक पुत्री प्राप्त हुई जिसका नाम रजिया रखा गया। कुछ दिन बाद इल्तुतमिश को बदायूँ का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया।
कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय इल्तुतमिश बदायूं का गवर्नर था। जिस समय लाहौर के अमीरों ने आरामशाह को ऐबक का उत्तराधिकारी घोषित किया, उस समय दिल्ली का सेनापति अली इस्माइल, दिल्ली के मुख्य काजी के पद पर भी कार्य कर रहा था। उसे लाहौर के अमीरों का यह काम पसंद नहीं आया। इसलिये उसने कुछ अमीरों को अपने साथ मिलाकर, आरामशाह के विरुद्ध षड़यंत्र किया तथा इल्तुतमिश को सुल्तान बनने के लिये आमंत्रित किया। इससे इल्तुतमिश को दिल्ली की सेना एवं अमीरों का विश्वास प्राप्त हो गया।
इल्तुतमिश ने पहले भी कई अवसरों पर अपने रण-कौशल का परिचय दिया था इसलिये सेना तथा अमीर उसकी नेतृत्व प्रतिभा से परिचित थे। सेना का प्रिय तथा विश्वासपात्र बन जाने से इल्तुतमिश की स्थिति सुदृढ़़ हो गई। जब आरामशाह को ज्ञात हुआ कि इल्तुतमिश, सल्तनत पर अधिकार करने के इरादे से दिल्ली आ रहा है तो वह सेना लेकर दिल्ली से बाहर आ गया तथा इल्तुतमिश का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया। इल्तुतमिश ने दिल्ली के बाहर ही आरामशाह से मुकाबला किया तथा उसे परास्त करके दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार अपनी योग्यता एवं भाग्य के बल पर इल्तुतमिश गुलाम से सुल्तान बन गया।
ई.1211 में जिस समय इल्तुतमिश दिल्ली के तख्त पर बैठा, दिल्ली सल्तनत अपने शैशवकाल में थी तथा दिल्ली सल्तनत की नींव पड़े हुए केवल 5 साल का समय ही हुआ था। इसलिये केन्द्रीय सत्ता, अपने अमीरों और सूबेदारों पर अपना नियंत्रण पूरी तरह से नहीं जमा पाई थी। जब इल्तुतमिश दिल्ली के तख्त पर बैठ गया तो पीछे से उसके ही एक अमीर ने बदायूँ पर कब्जा कर लिया। कन्नौज तथा बहराइच के अमीर भी विद्रोह पर उतर आये।
इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत का नये सिरे से निर्माण करने का निर्णय किया। उसने बदायूँ, कन्नौज तथा बहराइच पर आक्रमण करके वहाँ के अक्तादारों (सूबेदारों) का दमन किया। उसने कछार, अवध, तिरहुत, बनारस तथा तराई क्षेत्र के तुर्क-सरदारों एवं हिन्दू-राजाओं को परास्त करके अपने अधीन किया। उसने राजपूत राजाओं का नये सिरे से दमन किया तथा सिंधु नदी के उस पार से लेकर बंगाल की खाड़ी तक अपना राज्य स्थपित कर लिया। उसने पूरे 25 साल तक उत्तर भारत पर शासन किया।
इल्तुतमिश ने जिस दिल्ली सल्तनत का निर्माण किया, वह दीर्घ काल तक बनी रहने वाली सिद्ध हुई। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद इस सल्तनत पर लगभग 300 वर्षों तक तुर्कों के विभिन्न वंशों द्वारा शासन किया गया।
इल्तुतमिश का हरम
उन दिनों सुल्तान के दरबार में तुर्की अमीरों में परस्पर ईर्ष्या, षड़यन्त्र, दगा, फरेब तथा हत्याओं का बोलबाला था। प्रत्येक अमीर चाहता था कि वह अधिक से अधिक सत्ता हासिल करके सुल्तान का खास आदमी बना रहे और अपना घर सोने-चांदी के सिक्कों से भरता रहे। कई बार स्वयं सुल्तान भी कुछ अमीरों के साथ मिलकर दूसरे अमीरों के विरुद्ध षड़यंत्र रचता था और उनकी हत्याएं करवाकर उनका समस्त धन, सम्पत्ति तथा जागीर हड़प लेता था।
सुल्तान के दरबार जैसा दूषित वातावरण लगभग पूरी सल्तनत में बना रहता था और ऐसा ही दुराभिसंधियों से भरा हुआ वातावरण स्वयं सुल्तान के हरम में भी मौजूद रहता था। हरम की स्थिति तो और ज्यादा खराब थी। एक-एक सुल्तान की कई-कई बेगमें होती थीं जो दुनिया के विभिन्न देशों की अमीरजादियां, शहजादियां और रूपवती लौण्डियाएं हुआ करती थीं। वे सुल्तान की निगाह में स्वयं को सुल्तान की वफादार सिद्ध करने के लिये दूसरी बेगमों के विरुद्ध खूनी षड़यंत्र रचा करती थीं।
हालांकि हरम में गैर पुरुषों के आने पर पाबंदी हुआ करती थी तथा हरम में गूंगे, बहरे, कुबड़े तथा हिंजड़े नौकर रखे जाते थे तथापि हरम की बहुत सी औरतों में चरित्र का अभाव रहता था और वे किसी अन्य पुरुष से भी सम्बन्ध बना लेती थीं। जब इस बात का पता हरम की दूसरी औरतों को लग जाता था तो वे उस सम्बन्ध को बढ़ा-चढ़ाकर उसका भाण्डा फोड़ करने में लग जाती थीं।
जब तक इल्तुतमिश एक गुलाम की हैसियत से जीवन यापन करता रहा, उसका कोई हरम नहीं था। जब वह गुलामी से मुक्ति पाकर गवर्नर बन गया, तब उसका हरम बनना आरम्भ हुआ किंतु उसके हरम में साधारण समझी जाने वाली गुलाम लड़कियां ही अधिक थीं। बात में जब वह स्वयं सुल्तान बन गया तो उसका भी एक बहुत बड़ा हरम तैयार हो गया जिसमें ईरान, तूरान, मकरान, बल्ख तथा बुखारा आदि देशों से लाई गई अभिजात्य वर्गीय सुंदर तुर्क और तातार अमीरजादियां भरी हुई थीं।
वे आपस में एक दूसरे को ईर्ष्या की निगाह से देखती थीं और एक दूसरे के खून की प्यासी थीं। उन में से हर कोई चाहती थी कि सुल्तान केवल उसका होकर रहे। इसलिये इल्तुतमिश का हरम हर समय षड़यंत्रों से भरा रहता था। एक बार इल्तुमिश की निगाह तुर्कान नामक एक खूबसूरत लौण्डी पर पड़ी। वह बला की खूबसूरत थी किंतु स्वभाव की बड़ी क्रूर थी। कहा जा सकता है कि वह खूबसूरत बला थी। इल्तुतमिश ने तुर्कान को भी अपने हरम में डाल लिया।
तुर्कान के आते ही हरम में नये सिरे से तूफान मच गया। ईरान, तूरान, मकरान, बल्ख तथा बुखारा की परीजात अमीरजादियों के बीच एक अदनी सी लौण्डी रूप के बल पर सुल्तान की चहेती बनकर सुल्तान के हरम में आ बैठी थी। परीजात अमीरजादियों को हल्के खानदान की लौण्डी अपने बीच किसी भी कीमत पर नहीं सुहाती थी किंतु कोई भी बेगम न तो खुलकर, न दबी जबान से सुल्तान के इस निर्णय का विरोध कर सकती थी।
इसलिये तुर्कान, सुल्तान के महल में जम गई। परीजात अमीरजादियां बात-बात पर तुर्कान से बेअदबी करतीं तथा उसके नीचे खानदान को लेकर फिकरे कसतीं। तुर्कान भी दिल की कोई अच्छी औरत नहीं थी किंतु सुल्तान के महल में बने रहने के लिये यह आवश्यक था कि वह हरम की तमाम परीजात अमीरजादियों को एक साथ अपनी दुश्मन न बनाये। इसलिये मन मार कर रह जाती।
शहजादी रजिया भारत के मुस्लिम शासकों में सबसे अलग चमकता हुआ सितारा है जिसे कट्टरपंथी मुसलमानों ने शासन नहीं करने दिया तथा अकारण ही उसकी हत्या कर दी।
शहजादी रजिया का जन्म
रजिया का जन्म सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक की शहजादी कुतुब बेगम के गर्भ से हुआ था। चूंकि रजिया का जन्म एक शहजादी के पेट से हुआ था, इसलिये न केवल इल्तुतमिश के हरम में अपितु कुतुबुद्दीन के हरम में भी शहजादी रजिया की विशेष स्थिति थी। उसे न केवल हरम में बहुत लाड़-प्यार, नजाकत और शाही सम्मान से पाला गया अपितु सुल्तान के दरबार में भी निर्भय होकर जाने का अधिकार मिला।
रजिया की इस गरिमामय स्थिति के विपरीत, रजिया के सभी भाइयों का जन्म साधारण समझी जाने वाली गुलाम औरतों के पेट से हुआ था। इस कारण शहजादी रजिया के भाई सुल्तान कुतुबुद्दीन के हरम अथवा दरबार में नहीं जा सकते थे। इस कारण उनका लालन-पालन राजकीय परम्पराओं और शानो-शौकत से बहुत दूर साधारण लड़कों की तरह हुआ। जब रजिया पांच साल की हुई तब उसके नाना अर्थात् सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हो गई तथा रजिया के पिता इल्तुतमिश को दिल्ली के तख्त पर बैठने का अवसर मिला।
रजिया की योग्यता
इल्तुतमिश अपने मालिक तथा पूर्व सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक की कृपा से ही तुच्छ गुलाम की जिंदगी से ऊँचा उठता हुआ सुल्तान के सर्वोच्च पद पर पहुँचा था, इसलिये वह कुतुबुद्दीन ऐबक की दौहित्री रजिया से विशेष प्रेम करता था। इल्तुतमिश के भाग्योदय में योग्यता का भी बहुत बड़ा हाथ था इसलिये वह योग्य व्यक्तियों को अधिक पसंद करता था। सौभाग्य से रजिया बुद्धिमती और योग्य लड़की थी, इसलिये सुल्तान के मन में रजिया के प्रति प्रेम कई गुना अधिक हो गया।
इल्तुतमिश ने रजिया की योग्यता को कई बार परखा तथा हर बार रजिया इस परीक्षण में खरी उतरी। रजिया ने शहजादियों की तरह हरम में गुड़ियों से खेलने की बजाय, शहजादों की तरह घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्ध कला सीखी। देखते ही देखते रजिया की बुद्धिमत्ता, रूप-सौंदर्य तथा युद्ध कौशल के किस्से दिल्ली की आम जनता में किंवदन्तियों की तरह फैल गये। सुल्तान के हरम से लेकर दरबार तक रजिया शहजादों की भांति मुक्त विचरण करती।
जब शहजादी रजिया में दुनियादारी की समझ आ गई तब वह अपने पिता इल्तुतमिश के कार्यों में हाथ बंटाने लगी। सुल्तान के युद्ध मोर्चों पर जाने की स्थिति में रजिया ही राजधानी दिल्ली में रहकर शासन संभालने लगी। उसके निर्णय सधे हुए होते थे, कार्यों में स्पष्टता रहती थी तथा वह अनुचरों को आदेश देकर कार्य का परिणाम प्राप्त करने में कुशल थी।
शहजादी रजिया को कार्य करने में आलस्य नहीं आता था और वह कठिन परिस्थिति का सामना भी धैर्य पूर्वक करती थी। इतना सब होने पर भी इल्तुतमिश ने अपने बड़े पुत्र नसीरुद्दीन मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया किंतु भाग्यवश शहजादे नसीरुद्दीन की मृत्यु ई.1229 में इल्तुतमिश के जीवन काल में ही हो गई।
शहजादी रजिया को उत्तराधिकार
ई.1230 में इल्तुतमिश ने ग्वालियर के विरुद्ध अभियान किया। इस दौरान राजधानी की रक्षा का भार शहजादी रजिया की देखरेख में सुल्तान के विश्वासपात्र अमीरों एवं वजीरों को दिया गया। रजिया ने इस जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा और योग्यता से निभाया।
ई.1231 में सुल्तान ग्वालियर के मोर्चे से लौटा। उसने अपनी राजधानी को सुरक्षित पाया तथा उसके प्रबंधन में पहले से भी अधिक सुधार देखा तो सुल्तान खुश हो गया। उसने अपने दरबारियों को बुलाकर उनके सामने ऐलान किया कि- ”मेरे पुत्र जवानी की ऐय्याशी में गर्क हैं और उनमें से कोई भी सुल्तान बनने के लायक नहीं हैं। रजिया ही देश का शासन चलाने योग्य है, और कोई नहीं है।”
इल्तुतमिश ने अपने अमीरों से रजिया को उत्तराधिकारी नियुक्त करने की सहमति प्राप्त की तथा रजिया को अपनी उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इसके बाद रजिया का नाम चांदी के टंका (तुर्की सुल्तानों की मुद्रा) पर खुदवाया जाने लगा। इल्तुमिश के कई लड़के थे, सुल्तान के इस निर्णय से उन लड़कों की माताओं के सीनों पर सांप लोट गये किंतु सुल्तान के निर्णय का विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
स्वयं रजिया का प्रभाव ऐसा था कि सुल्तान के जीवित रहते रजिया की नियुक्ति का विरोध कर पाना किसी के लिये सरल कार्य नहीं था। प्रोफेसर के. ए. निजामी ने लिखा है- ”इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इल्तुतमिश के उत्तराधिकारियों में वह सर्वश्रेष्ठ थी।”
जब तुर्की अमीरों ने मरहूम सुल्तान इल्तुतमिश की इच्छा को नकार दिया तथा शहजादी रजिया को सुल्तान बनाने से मना करके रुकनुद्दीन फीरोजशाह को सुल्तान बना दिया तो नए सुल्तान रुकनुद्दीन फिरोजशाह की माँ शाह तुर्कान का कहर मरहूम सुल्तान इल्तुतमिश की बेगमों एवं शहजादियों पर टूट पड़ा।
शाह तुर्कान का कहर
अब शाह तुर्कान इल्तुतमिश के हरम में पड़ी रहने वाली एक साधारण सी लौंडिया नहीं थी अपितु सुल्तान की माँ थी। शासन की बागडोर उसकी मुट्ठी में थी। शासन की बागडोर हाथ में आते ही शाह तुर्कान ने मदांध होकर इल्तुतमिश की अन्य उच्च-वंशीय विधवाओं तथा बेगमों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। उसने गिन-गिन कर उन अभिजात्य कुलों की शहजादियों से पिछले बैर चुकता किये।
शाह तुर्कान खुलेआम मरहूम सुल्तान इल्तुतमिश की शहजादियों एवं बेगमों को गालियां देती, उन्हें बात-बात पर नीचा दिखाती और खाल खिंचवा लेने की धमकी देती। कुछ ही दिनों में हरम का वातावरण इतना जहरीला हो गया कि उसमें दूसरी बेगमों के लिये रहना मुश्किल हो गया।
जिन बेगमों ने शाह तुर्कान का विरोध करने की हिम्मत की, उनकी ज्यादा दुर्दशा हुई। तुर्कान ने उन बेगमों की हत्या करवा दी। यहाँ तक कि एक दिन इल्तुतमिश के एक पुत्र कुतुबुद्दीन की आंखे फुड़वाकर उसे अंधा कर दिया तथा कुछ दिन बाद उसकी हत्या करवा दी। शाह तुर्कान का कहर दिल्ली सल्तनत की जड़ें हिला सकने के लिए पर्याप्त था। इससे चारों ओर आग लग जाने वाली थी।
सल्तनत के जिन वफादार अमीरों ने शाह तुर्कान के इस कुकृत्य के विरोध में बोलने का साहस किया, तुर्कान ने उनकी भी हत्या करवा दी। इस कारण सुल्तान के हरम तथा दरबार दोनों जगह सुल्तान रुकुनुद्दीन तथा उसकी मां बेगम तुर्कान के विरुद्ध असंतोष भड़क गया।
मंगोलों के हमले
इधर दिल्ली में सुल्तान के महल में यह मारकाट मची हुई थी और उधर भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण आरम्भ हो गए। दिल्ली की सेनाओं ने इन आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया जिसके कारण मंगोलों को मारकर भगा दिया गया परन्तु सल्तनत में आन्तरिक अंशाति बढ़ती चली गई। इस असंतोष की चिन्गारी पहले तो दिल्ली की सड़कों पर और फिर दिल्ली से बाहर निकलकर सल्तनत के दूसरे सूबों में जा पहुंची।
सूबों में विद्रोह
सल्तनत का पूरा वातावरण क्लेशमय हो गया और चारों ओर विरोध की अग्नि भड़क उठी। अयोग्य रुकुनुद्दीन फीरोजशाहतथा घमण्डी शाह तुर्कान इस विरोध को शांत करने में असमर्थ रहे। रुकुनुद्दीन फीरोजशाह का छोटा भाई गियासुद्दीन जो अवध का सूबेदार था, खुले रूप में विद्रोह करने पर उतर आया। उसने बंगाल से दिल्ली जाने वाले राजकोष को छीन लिया तथा भारत के कई बड़े नगरों को लूट लिया। जब ये समाचार मुल्तान, हांसी, लाहौर तथा बदायूं पहुंचे तो वहाँ के प्रांतीय शासक परस्पर समझौता करके रुकुनुद्दीन को गद्दी से उतारने के लिये दिल्ली की ओर चल पड़े।
जब दिल्ली के अमीरों को प्रांतीय सूबेदारों द्वारा सेनाएं लेकर दिल्ली की तरफ कूच करने का समाचार मिला तो वे रजिया को सुल्तान बनाने की सोचने लगे। इस पर शाह तुर्कान ने शहजादी रजिया की हत्या कराने का प्रयत्न किया। रजिया चौकन्नी थी। वह जानती थी कि शाह तुर्कान तथा स्वयं सुल्तान रुकनुद्दीन की तरफ से ऐसा कुत्सित प्रयास किया जा सकता था। इसलिये तुर्कान का षड़यंत्र विफल हो गया और रजिया बच गई। शहजादी रजिया की हत्या का षड़यंत्र असफल रहने पर रुकुनुद्दीन तथा शाह तुर्कान की स्थिति अत्यन्त चिंताजनक हो गई।
जब शाह तुर्कान के अत्याचारों के कारण दिल्ली सल्तनत में चारों ओर असंतोष फैल गया तो राजनीति की चतुर खिलाड़ी शहजादी रजिया ने शाह तुर्कान से पंजा लड़ाने का निश्चय किया। रजिया का दांव उलटा भी पड़ सकता था किंतु रजिया के लिए यह करो या मरो जैसी स्थिति थी।
राजनीति के दांवपेच
किशोरावस्था से ही अपने पिता का राज्यकार्य संभाल रही शहजादी रजिया को भी राजनीति के दांवपेच भलीभांति आ गये थे। वह रुकुनुद्दीन तथा उसकी मां बेगम तुर्कान से अधिक मजबूत राजनीति कर सकती थी। जब उसने सुना कि प्रांतीय सूबेदार दिल्ली पर आक्रमण करने की योजना बना रहे हैं तो उसने निष्क्रिय बैठे रहना उचित नहीं समझा।
उसने प्रांतीय सूबेदारों के दिल्ली पहुंचने से पहले ही दिल्ली के तख्त पर बैठने की योजना बनाई तथा शाह तुर्कान से दो-दो हाथ करने का निश्चय किया।
राजीनति में सौन्दर्य का घालमेल
शहजादी रजिया भी शाह तुर्कान की तरह बला की खूबसूरत थी। वह तुर्कान से अधिक बुद्धिमान थी। इस समय रजिया का यौवन अपने चरम पर था और वह स्वयं भी दैहिक सौन्दर्य की ताकत को अच्छी तरह समझती थी। जबकि तुर्कान अपना यौवन गंवाकर प्रौढ़ावस्था को प्राप्त कर चुकी थी।
शहजादी रजिया के साथ एक अच्छी बात और यह थी कि वह अभी तक अविवाहित थी और बहुत से अमीरों ने विशेषकर युवा अमीरजादों ने रजिया को पाने के ख्वाब पाल रखे थे। रजिया इन सब बातों से अनजान नहीं थी। उसने मन ही मन एक योजना बनाई और अकेली ही उस योजना को अमल में लाने के लिये तैयार हो गई। युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिये उसके पास केवल दो हथियार थे एक तो उसकी बुद्धि और दूसरा उसका दैहिक सौन्दर्य। इन्हीं हथियारों के बल पर रजिया ने अपना भाग्य आजमाने का निश्चय किया।
शहजादी रजिया का दांव
एक शुक्रवार को जब मुसलमान, दिल्ली की जामा मस्जिद में मध्याह्न की नमाज के लिए एकत्रित हो रहे थे, रजिया चुपचाप अपने महल से बाहर निकल पड़ी। उसने भड़काऊ लाल रंग का लिबास पहन रखा था जो नौजवानों को पागल कर देने के लिये काफी था। वह अपनी मोहक अदा के साथ घोड़े पर सवार हुई और आधे मुंह पर नकाब लगाकर अचानक मस्जिद के सामने प्रकट हुई।
उस समय लोग नमाज पढ़कर लौट रहे थे। रजिया ने इन लोगों के समक्ष, शाही तथा मनमोहक अंदाज में शाह तुर्कान के विरुद्ध अभियोग लगाते हुए अपने लिये न्याय की प्रार्थना की। सैंकड़ों मुस्लिम नौजवान शहजादी के के रूप-पाश और मोहक अभिनय के जादू में बंध गये। उन्होंने बेइन्तहा हुस्न की परी रजिया की अभ्यर्थना स्वीकार कर ली।
देखते ही देखते नौजवानों ने शाही महल घेर लिया। रजिया के इस तरह सहायता मांगने की खबर दिल्ली की तंग गलियों में आग की तरफ फैली और हजारों लोग अपने घरों से हथियार लेकर महल की तरफ बढ़ने लगे। बहुत से अमीर तथा अमीरजादे भी अपने सिपाहियों को लेकर रजिया की मदद के लिये पहुंचने लगे।
जब उनकी संख्या कई हजार हो गई तो उनके मन से सुल्तान के सिपाहियों का भय जाता रहा और वे सिपाहियों को धकेल कर महल में घुस गये। सुल्तान के सिपाही भी सुल्तान के प्रति ज्यादा वफादार नहीं थे। महल में घुसी भीड़ ने सुल्तान की माँ शाह तुर्कान को बंदी बना लिया तथा घसीटते हुए महल के बाहर ले लाये। उसके बाद सुल्तान को भी ढूंढ निकाला गया और बंदी बना कर जेल में ठूंस दिया गया।
रजिया का दांव सही बैठा था। सुल्तान के महल पर शहजादी रजिया के चाहने वालों का कब्जा हो गया। 9 नवम्बर 1236 को अपदस्थ सुल्तान रुकुनुद्दीन फीरोजशाह की हत्या कर दी गई। उसी दिन शाह तुर्कान को भी मार डाला गया। इस प्रकार रजिया के लिये मैदान साफ हो गया।
रुकुनुद्दीन फीरोजशाह की हत्या हो जाने के बाद रजिया अपने मरहूम बाप इल्तुतमिश की इच्छा के अनुसार सल्तनत के तख्त पर बैठी। भारतीय इतिहास में उसे रजिया सुल्तान तथा रजिया सुल्ताना कहा गया है।
रजिया सुल्तान के सिर पर छत्र ताना गया, चंवर ढुलाये गये और उसकी विरुदावली गाई जाने लगी। दिल्ली ने बहुत से राजे-महाराजे, चक्रवर्ती सम्राट और सुल्तान देखे थे किंतु उसकी याददाश्त में यह पहली महिला सुल्तान थी। दिल्ली ने रजिया को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
तुर्की अमीरों द्वारा रजिया कोसुल्तान स्वीकार करने के कारण
जिन अमीरों ने आरम्भ में रजिया के उत्तराधिकार का विरोध किया था, उन्हीं अमीरों ने उसे अब सुल्तान स्वीकार कर लिया। ऐसा करने के कई कारण थे-
रुकुनुद्दीन की अयोग्यता
रुकुनुद्दीन फीरोजशाह अयोग्य सुल्तान था। वह शराब पीने के बाद या तो औरतों से घिरा हुआ रहता था या फिर हाथी पर चढ़कर दिल्ली की सड़कों पर सोने की अशर्फियां बांटता फिरता था। शासन के काम में रुचि नहीं लेने के कारण शासन व्यवस्था बिगड़ रही थी।
शाह तुर्कान का निम्न वंश में जन्म
सुल्तान रुकुनुद्दीन की अयोग्यता के कारण शासन का काम उसकी माता शाह तुर्कान के हाथों में था। तुर्कान निम्न समझे जाने वाले वंश में जन्मी थी जिसके अनुशासन में काम करना तुर्की अमीरों को सहन नहीं होता था।
बेगमों तथा अमीरों की हत्या
शाह तुर्कान ने हरम की कुछ बेगमों तथा सल्तनत के अमीरों की हत्या करवाकर चारों ओर असंतोष का वातावरण तैयार दिया था। उसने शहजादे कुतुबुद्दीन को भी आँखें फुड़वाकर उसे मरवा दिया।
रजिया की हत्या का प्रयास
शाह तुर्कान ने शहजादी रजिया की हत्या का प्रयत्न किया। रजिया, मरहूम सुल्तान इल्तुतमिश की प्रिय पुत्री थी। उसी को सुल्तान द्वारा अपना वारिस घोषित किया गया था। उसमें कई गुण थे जिनके कारण इल्तुतमिश के कुछ स्वामिभक्त अमीर रजिया को आदर की दृष्टि से देखते थे। शाह तुर्कान की निकृष्ट चेष्टा से कुछ अन्य अमीरों की सहानुभूति भी रजिया के साथ हो गई।
विकल्प का अभाव
शाह तुर्कान को बन्दी बना लेने के उपरान्त अमीरों के पास इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचा था कि वे रुकुनुद्दीन को तख्त से उतारकर रजिया को तख्त पर बैठा दें। अन्यथा रुकुनुद्दीन उन्हें मरवा डालता।
इल्तुतमिश की इच्छा-पूर्ति
शहजादी रजिया को तख्त पर बैठाकर तुर्की अमीर, मुसलमान रियाया के समक्ष यह प्रदर्शित करना चाहते थे कि ऐसा करके मरहूम सुल्तान इल्तुतमिश की इच्छा पूरी की जा रही है। क्योंकि सुल्तान इल्तुतमिश ने रजिया को ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।
कमालुद्दीन जुनैदी से अमीरों की ईर्ष्या
बहुत से तुर्की अमीर, वजीर कमालुद्दीन जुनैदी से ईर्ष्या करते थे जो स्वयं को सर्व-शक्ति-सम्पन्न बनाने का प्रयत्न कर रहा था। तुर्की अमीरों को भय था कि यदि रजिया को सुल्तान नहीं बनाया गया तो जुनैदी दिल्ली के तख्त पर अधिकार कर लेगा। अतः अमीरों ने जुनैदी से निबटने के लिये रजिया को दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया।
रजिया सुल्तानकी कठिनाइयाँ
यहाँ तक तो सब ठीक रहा था किंतु रजिया के भाग्य की कठिनाइयां अभी समाप्त नहीं हुई थीं। तख्त पर बैठ जाने मात्र से ही कुछ होने-जाने वाला नहीं था। तख्त को बनाये रखना, उसे प्राप्त करने से भी अधिक कठिन था। रजिया का आगे का मार्ग अत्यन्त कठिन था। उसकी प्रमुख कठिनाइयाँ निम्नलिखित थीं-
रजिया सुल्तान को आंशिक समर्थन
रजिया की पहली कठिनाई यह थी कि उसे केवल कुछ युवा तुर्कों और दिल्ली के सामान्य नागरिकों का सहयोग प्राप्त था। सल्तनत का प्रधान वजीर जुनैदी तथा वे तुर्क सरदार जो रुकुनुद्दीन फीरोजशाह को तख्त से हटा कर अपनी इच्छानुसार सुल्तान चुनना चाहते थे, रजिया का विरोध करने के लिए प्रयत्नशील हो गये। सल्तनत के प्रांतीय शासक भी इन विरोधी अमीरों का पक्ष लेकर नये सुल्तान से विद्रोह करने पर उतर आये।
प्रतिद्वन्द्विता की सम्भावना
इल्तुतमिश के कुछ पुत्र अभी जीवित थे जिनके अनेक समर्थक अमीर भी मौजूद थे। उनके द्वारा रजिया के विरुद्ध विद्रोह किये जाने की पूरी आशंका थी।
राजपूतों के विद्रोह की आशंका
दिल्ली के शासन में आंतरिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होते ही राजपूतों ने अपने खोये हुए राज्य फिर से प्राप्त करने के प्रयास आरम्भ कर दिये तथा रणथम्भौर पर घेरा डाल दिया।
रजिया सुल्तान का स्त्री होना
तुर्की अमीर, कट्टर सुन्नी थे। उन्हें एक औरत के अधीन रहकर काम करना सहन नहीं था। इसलिये वे रजिया को राजपद के लिए सर्वथा अनुपयुक्त समझते थे। इब्नबतूता, एसामी, फरिश्ता, निजामुद्दीन, बदायूनीं आदि मुस्लिम इतिहासकारों ने भी रजिया के स्त्री होने के कारण उसके आचरण को निंदनीय ठहराया है।
इन कठिनाइयों का निस्तारण किये बिना रजिया दिल्ली पर शासन नहीं कर सकती थी। तेरहवीं सदी के तुर्की भारत में रजिया सुल्तान किसी आश्चर्य से कम नहीं थी। उस युग में कोई स्त्री शायद ही सुल्तान होने जैसा दुस्साहस भरा जोखिम उठा सकती थी। वह युद्ध प्रिय थी तथा उसे शासन चलाने का अच्छा अनुभव था। सम्भवतः पिता की अंतिम इच्छा के कारण भी वह सुल्तान बनने की भावना से परिपूर्ण थी।
उसने अपने नाना तथा पिता के राजदरबार में उपस्थित रहने के दौरान यह अच्छी तरह समझ लिया था कि सुल्तान को किस तरह दिखना चाहिये, किस तरह उठना-बैठना और चलना चाहिये, तथा किस तरह अमीरों, वजीरों और आम रियाया से पेश आना चाहिये। वह राजत्व के इस सिद्धांत को भी समझती थी कि सुल्तान को धीर-गंभीर एवं आदेशात्मक जीवन शैली का निर्वहन करते हुए भी प्रसन्नचित्त, उदार तथा दयालु होना चाहिये। उसमें यह भावना भी कूट-कूट कर भरी हुई थी कि हुक्म उदूली करने वालों से सख्ती से निबटना चाहिये। सुल्तान का ओहदा, सल्तनत के दूसरे अमीरों से कितना अधिक ऊपर और दिव्य है, इसमें भी वह भली-भांति समझती थी।
सुल्तान बनते ही रजिया ने पर्दे का परित्याग कर दिया। वह स्त्रियों के वस्त्र त्यागकर पुरुषों के सामन कुबा (कोट) और कुलाह (टोपी) धारण करके जनता के सामने आने लगी। इतना ही नहीं, वह पुरुष अमीरों की तरह षिकार खेलने भी जाती।
वह परिपक्व और प्रभावषाली सुल्तान की भांति राजसभा तथा सैनिक शिविर में जाकर राज्य के कार्यों को स्वयं देखने लगी। वह स्वयं सेना का संचालन करने लगी और युद्धों में भाग लेने लगी। उसने अपनी योग्यता तथा शासन क्षमता से समस्त अमीरों एवं जनता को प्रभावित किया।
वह योग्य तथा प्रतिभा-सम्पन्न सुल्तान थी। उसमें अपने विरोधियों का सामना करने तथा अपने साम्राज्य को सुदृढ़़ बनाने की इच्छाशक्ति भी थी। मिनाजुद्दीन सिराज ने रजिया के गुणों की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। उसने लिखा है- ”वह महान षासिका, बुद्धिमान, ईमानदार, उदार, षिक्षा की पोषक, न्याय करने वाली, प्रजापालक तथा युद्धप्रिय थी….. उसमें वे सभी गुण थे जो एक राजा में होने चाहिये …… (किंतु स्त्री होने के कारण) ये सब गुण किस काम के थे?
रजिया सुल्तान का शासन उस काल के सुल्तानों की तुलना में काफी अच्छा था। औरत होने के कारणवह इस्लाम के बल पर शासन नहीं कर सकती थी। उसे अपने मित्रों एवं शत्रुओं के बीच संतुलन स्थापित करना था। यह कार्य उसने बड़ी सूझबूझ से किया।
रजिया सुल्तान का शासन
अमीरों की पुनर्नियुक्ति
रजिया ने राजपक्ष को सुदृढ़ बनाने के लिये उच्च पदों का पुनः वितरण किया। उसने ख्वाजा मुहाजबुद्दीन को वजीर, एतिगीन को अमीरे हाजिब तथा ऐबक बहूत को सेनाध्यक्ष बनाया। अक्तादारों (प्रांतीय सूबेदारों) के पदों पर भी नये अधिकारी नियुक्त किये।
कबीर खां अयाज को लाहौर का तथा अल्तूनिया को तबरहिंद (भटिण्डा) का अक्तादार (सूबेदार) बनाया। कुछ दिनों बाद जब सेनाध्यक्ष की मृत्यु हो गई तो उसके स्थान पर कुतुबुद्दीन हसन गोरी को नायब ए लष्कर बनाया। इस प्रकार लखनौती से देवल तक के भारत ने रजिया की अधीनता स्वीकार कर ली।
सुल्तान पद की गरिमा की स्थापना
दिल्ली सल्तनत की स्थापना विचित्र परिस्थितियों में हुई थी। पहला सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक, मुहम्मद गौरी का जेर खरीद गुलाम था तथा सल्तनत के बहुत से अमीरों में से एक अमीर मात्र था। भाग्यवष मुहम्मद गौरी ने उसे भारत का गवर्नर नियुक्त किया था और भाग्यवष ही वह सुल्तान बन गया था किंतु उसने कभी भी सुल्तान होने का दावा नहीं किया, न ही कभी अपने नाम का खुतबा पढ़वाया।
उसका उत्तराधिकारी इल्तुतमिश, कुतुबुद्दीन ऐबक का जेर खरीद गुलाम था। वह भी सल्तनत के बहुत से अमीरों में से एक था। भाग्यवष ही उसे कुतुबुद्दीन ऐबक का उत्तराधिकारी होने का अवसर मिला। वह अपने समकक्ष अमीरों के सामने सुल्तान के तख्त पर बैठने में झैंपता था।
रजिया के सुल्तान बनने से इस बात का खतरा उत्पन्न हो गया था कि सल्तनत में सुल्तान का पद कम महत्वपूर्ण हो जाये तथा इल्तुतमिश द्वारा गठित चालीस गुलामों का मण्डल अथवा अन्य तुर्की अमीर सल्तनत पर हावी हो जायें किंतु रजिया ने सुल्तान के पद को हर हालत में सबसे ऊपर तथा महत्वपूर्ण बनाये रखा। रजिया पहली सुल्तान थी जिसने पूरे आत्मविष्वास के साथ स्वयं को सुल्तान की तरह पेश किया।
एक बार शुक्रवार की नमाज अदा करने के बाद रजिया सुल्तान ने कहा था- ”यदि मैंने पुरुषों से अच्छा कार्य नहीं किया हो तो भी इतना तो है कि मैंने सुल्तान के पद को महत्वपूर्ण बनाये रखा।”
नूरुद्दीन का दमन
रजिया के तख्त पर बैठते ही नूरुद्दीन नामक एक तुर्क रजिया का घोर विरोधी हो गया। उसने दिल्ली के निकट गंगा-यमुना के दोआब में निवास करने वाले करमत तथा इस्लामिया मुसलमानों को सुल्तान के विरुद्ध भड़काया जिससे उन्होंने बगावत का झण्डा बुलंद कर दिया। वे हजारों की संख्या में दिल्ली के निकट इकट्ठे होने लगे।
उनका इरादा रजिया से उसका तख्त छीनकर किसी इस्लामिया मुसलमान को दिल्ली के तख्त पर बैठाने का था। मार्च 1237 में इन लोगों ने एक साथ दो दिषाओं से जामा मस्जिद पर आक्रमण किया। उन्हें विष्वास था कि रजिया भी अवश्य ही इस समय मस्जिद में नमाज पढ़ रही होगी।
इन लोगों ने मस्जिद में उपस्थित सुन्नी मुसलमानों को मौत के घाट उतारना आरम्भ कर दिया। रजिया सम्भवतः उस समय मस्जिद में नहीं थी किंतु जैसे ही उसे इस हमले की जानकारी हुई, उसने अपने सैनिकों के साथ मस्जिद पहुंचकर करमत तथा इस्लामिया मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। दिल्ली की जनता के लिये एक औरत सुल्तान का इस तेजी से कार्य करना किसी चमत्कार से कम नहीं था। बहुत से लोग रजिया के प्रशंसक बन गये। बाद में करमत एवं इस्लामिया मुसलमानों के इलाकों में सेना भेजकर उनके ठिकाने नष्ट करवाये गये।
विद्रोहियों का दमन
तुर्क अमीरों में सबसे पहले मरहूम सुल्तान इल्तुतमिश तथा रुकुनुद्दीन फीरोजशाह के प्रधान वजीर रहे मुहम्मद जुनैदी ने बगावत का झण्डा खड़ा किया और बदायूं, मुल्तान, झांसी तथा लाहौर के गर्वनरों से जा मिला। चूंकि रजिया को दिल्ली की जनता ने तथा दिल्ली के अमीरों ने तख्त पर बैठाया था तथा बदायूं, मुल्तान, झांसी और लाहौर के गर्वनरों से कोई सहमति नहीं ली गई थी इसलिये वे सरलता से विद्रोह करने के लिये तैयार हो गये तथा अपनी-अपनी सेनाएं लेकर दिल्ली की ओर चल पड़े।
उनका लक्ष्य रजिया के स्थान पर इल्तुतमिश के छोटे पुत्र बहराम को सुल्तान बनाना था। रजिया के लिये यह परीक्षा की घड़ी थी किंतु उसने हिम्मत से काम लिया तथा प्रांतपतियों की संयुक्त सेनाओं से लड़ने के लिये दिल्ली नगर से बाहर निकलकर अपना सैनिक शिविर स्थापित किया। उसने कूटनीति से काम लेते हुए ईजुद्दीन सलारी और ईजुद्दीन कबीर खां को अपनी तरफ मिला लिया तथा मलिक सैफुद्दीन कूची और उसके भाई फखर्रूद्दीन को पकड़कर मरवा दिया।
निजामुलमुल्क जुनैदी रजिया से बचने के लिये सिरमूर की पहाड़ियों में भाग गया जहाँ उसकी भी मृत्यु हो गई। इस प्रकार रजिया ने विद्रोहियों का सफलता पूर्वक दमन किया। पंजाब, बंगाल तथा सिंध के गवर्नरों ने उसके आधिपत्य को स्वीकार कर लिया।
मिनहाजुद्दीन सिराज ने लिखा है- ”लखनौती से लेकर देवल तथा दमरीला तक सभी मल्लिकों एवं अमीरों ने आज्ञाकारिता एवं वयश्ता प्रदर्शित की।”
रणथंभौर दुर्ग से तुर्क सेना की निकासी
इल्तुतमिश के मरने की सूचना मिलते ही रणथम्भौर के पुराने चौहान शासकों ने तुर्क सेना को रणथंभौर दुर्ग में घेर लिया था। रुकनुद्दीन ने चौहानों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की। रजिया की भी ऐसी स्थिति नहीं थी कि वह हिन्दू राजाओं से उलझे। इसलिये उसने एक सेना रणथंभौर के लिये रवाना की जिसे आदेश दिया गया कि राजपूतों से समझौता करके, दुर्ग में घिरी हुई तुर्क सेना को सुरक्षित निकाल लिया जाये।
रजिया की सेना ने ऐसा ही किया, दुर्ग में घिरे तुर्कों को सुरक्षित निकाल लिया गया तथा रणथंभौर पर चौहानों का अधिकार हो गया। रजिया की इस कार्यवाही को अधिकांश तुर्की अमीरों ने पसंद नहीं किया।
ग्वालियर दुर्ग से तुर्क सेना की निकासी
जियाउद्दीन जुनैदी, ग्वालियर का प्रांतपति था तथा वह सल्तनत के भूतपूर्व वजीर निजामुलमुल्क जुनैदी का रिश्तेदार था। ई.1238 में जियाउद्दीन जुनैदी ने रजिया के विरुद्ध विद्रोह की योजना तैयार की। जब रजिया को इस बात की जानकारी हुई तो उसने बरन के सूबेदार को आदेश दिये कि जुनैदी को बंदी बनाकर दिल्ली भेजा जाये।
बरन के सूबेदार ने ग्वालियर पहुंचकर जनैदी को बंदी बना लिया तथा दिल्ली के लिये रवाना कर दिया किंतु मार्ग में ही जुनैदी लापता हो गया। अमीरों को आशंका हुई कि रजिा सुल्तान ने ही उसका वध करवाया है। इससे तुर्की अमीरों में रजिया के विरुद्ध घृणा तथा संदेह का वातावरण बढ़ने लगा। वे रजिया की ओर से शंकित होकर गुप्त रूप से विद्रोह की तैयारियां करने लगे।
इसी बीच नरवर के शासक यजवपाल ने ग्वालियर पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। यहाँ भी तुर्क सेना दुर्ग में फंस गई। इस पर रजिया ने और सेना भेजकर तुर्क सैनिकों को ग्वालियर के दुर्ग से निकलवाया और दुर्ग हिन्दुओं को सौंप दिया। तुर्की अमीरों ने रजिया की यह कार्यवाही भी पसंद नहीं की।
मंगोलों के विरुद्ध कार्यवाही करने से इन्कार
जब चंगेज खां भारत पर चढ़कर आया था, तब दिल्ली सल्तनत पर इल्तुतमिश का अधिकार था। उसने चंगेज खां के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की। चंगेजखां कुछ दिन तक भारत में लूटपाट मचाकर वापस लौट गया। रजिया के समय सल्तनत की पश्चिमी सीमा पर जलालुद्दीन मंगबरनी के प्रतिनिधि हसन करलुग का अधिकार था।
जब मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया तब उसने मंगोलों के विरुद्ध रजिया से सहायता की अपील की किंतु रजिया ने भी अपने पिता इल्तुतमिश की नीति पर चलने का निर्णय लिया तथा मंगोलों के विरुद्ध कार्यवाही करने से इन्कार कर दिया। इस पर कुछ अमीरों ने रजिया के विरुद्ध विष-वमन करना आरम्भ कर दिया।
रजिया सुल्तान का शासन – ज्ञान-विज्ञान की अभिवृद्धि के प्रयास
कुछ इतिहासकारों के अनुसार रजिया ने दिल्ली में मदरसे, पुस्तकालय, इस्लामी शोध की स्थापना की जिनमें मुहम्मद साहब की शिक्षाओं तथा कुरान का अध्ययन किया जाता था।
तुर्की अमीरों का वर्चस्व समाप्त करने के प्रयास
रजिया ने सुल्तान की प्रतिष्ठा का उन्नयन करने के लिए तुर्कों के स्थान पर अन्य मुसलमानों को ऊँचे पद देने आरम्भ किये जिससे तुर्कों का अहंकार तथा एकाधिकार नष्ट हो जाये और वे राज्य पर अपना प्रभुत्व न जता सकें। रजिया की सेवा में एक अबीसीनियाई सिद्दी (हब्शी) गुलाम जमालुद्दीन याकूत रहता था।
सुल्तान बनने के कुछ दिनों बाद रजिया ने उसे अमीर-ए-आखूर अर्थात् घुड़साल का अध्यक्ष बना दिया। रजिया इस गुलाम को घुड़सवारी करते समय अपने साथ ले जाती। याकूत ने शीघ्र ही सुल्तान का विश्वास जीत लिया। सुल्तान ने याकूत को किसी भी समय सुल्तान के समक्ष उपस्थित होने का अधिकार प्रदान किया। इसी प्रकार रजिया ने अपनी पसंद के योग्य अमीर मलिक हसन गौरी को सेनापति का पद प्रदान किया। ये दोनों नियुक्तियां शीघ्र ही तुर्की अमीरों की आंखों में चुभने लगीं।
रजिया सुल्तान का शासन – प्रजा से सीधा जुड़ाव
रजिया स्वयं घोड़े पर बैठकर दिल्ली की गलियों में निकल जाती और जनता की तकलीफें जानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करती।
रजिया सुल्तान का शासन – हिन्दू रियाया से अच्छा बरताव
रजिया अपने समय से बहुत आगे थी। वह अपने नाना के हरम के भीतर पलकर बड़ी हुई थी तथा इस्लामी शासन व्यवस्था के भीतर जन्मी थी किंतु उसमें अपने नाना और पिता से भी बढ़कर परिपक्वता थी। वह इस्लाम के कट्टर अनुसरण की अपेक्षा सल्तनत की रियाया के सुख-दुख को अधिक महत्व देती थी।
उसका मानना था कि इस्लाम व्यक्तिगत आस्था का विषय है। सुल्तान अथवा सल्तनत के लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह गैर-इस्लामी रियाया को इस्लाम कबूलने के लिये मजबूर करे अथवा उसे तंग करे। एक अवसर पर अपने दरबार में उसने अमीरों और वजीरों को निर्देश दिया कि वे हिन्दू रियाया को तंग न करें। उसने कहा कि स्वयं पैगम्बर मुहम्मद का कथन है कि इस्लाम न मानने वाले मनुष्यों पर ज्यादती न की जाये।
भारतीय मुस्लिम की नियुक्ति
रजिया ने एक भारतीय मुसलमान को अपने दरबार में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया। यह व्यक्ति कुछ दिन पहले ही हिन्दू से मुसलमान बना था। यह नियुक्ति तुर्की अमीरों को पसंद नहीं आई। वे रजिया को शंका की दृष्टि से देखने लगे।
रजिया सुल्तानकी हत्या भारत के मुस्लिम शासन का सबसे दुखद अध्याय है। रजिया सुल्तान मुसलमान होते हुए भी केवल मुसलमानों को अपनी प्रजा नहीं मानती थी। वह दिल्ली के आसपास शासन कर रहे राजपूत शासकों से अच्छे सम्बन्ध बनाकर अपनी सल्तनत में शांति चाहती थी। रजिया की हत्या के पीछे एक बड़ा कारण यह भी था।
रजिया सुल्तान की स्वतंत्र मनोवृत्ति तथा हिन्दुओं के प्रति उसकी सहानुभूति को तुर्की अमीर सहन नहीं कर सके। उनकी नजरों में अब भी रजिया एक औरत मात्र थी। जिसे भोगा ही जा सकता था, उसका शासन किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता था।
रजिया दिल्ली की जनता के सहयोग से सुल्तान बनी थी जिसमें अमीरों की बहुत कम भूमिका थी। इसलिये वे रजिया के स्थान पर ऐसे व्यक्ति को सुल्तान बनाना चाहते थे जो उनके प्रति कृतज्ञ रहे तथा अमीरों के हाथ की कठपुतली बनकर रहे। जब रजिया ने एक भारतीय मुसलमान को अपने दरबार में उच्च पद दिया तो तुर्की अमीर रजिया के दुश्मन हो गये। थोड़े ही समय में चारों ओर विद्रोह के झण्डे बुलंद हो गये और रजिया का पतन आरम्भ हो गया।
शम्सी तुर्क सरदारों का षड्यन्त्र
कुछ प्रान्तीय शासकों के मन में यह संदेह उत्पन्न होने लगा कि रजिया शम्सी तुर्क सरदारों की शक्ति का उन्मूलन करना चाहती है। अतः वे आत्मरक्षा के लिए षड्यन्त्र रचने लगे और विद्रोह की तैयारियां करने लगे। पंजाब के गवर्नर कबीर खाँ अयाज ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया। रजिया उसका दमन करने के लिये एक सेना लेकर आगे बढ़ी।
अयाज ने उसका सामना किया किंतु अधिक देर तक नहीं टिक सका और परास्त होकर पीछे की ओर अर्थात् चिनाव नदी की ओर भागा। कबीर खां के दुर्भाग्य से चिनाव नदी पर मंगोलों का सैन्य शिविर लगा हुआ था जो पंजाब में लूट-मार मचाते घूम रहे थे। मंगोलों से डरकर कबीर खां को रजिया की तरफ आना पड़ा तथा बिना शर्त रजिया के पैरों में गिरकर माफी मांगनी पड़ी।
रजिया ने उसे माफ कर दिया तथा उससे लाहौर छीनकर केवल मुल्तान उसके अधिकार में रहने दिया। कबीरखां की इस भयावह पराजय के बाद भी सल्तनत में षड्यंन्त्र तथा विद्रोह की अग्नि शांत नहीं हुई। अब तुर्क प्रांतपतियों ने दिल्ली के अमीरों की सहायता से सल्तनत पर अधिकार करने की योजना बनाई।
इन विद्रोही तुर्क अमीरों का नेता इख्तियारूद्दीन एतिगीन था। विद्रोहियों ने बड़ी सावधानी तथा सतर्कता के साथ कार्य करना आरम्भ किया। इन लोगों ने योजना बनाई कि बजाय इसके कि वे दिल्ली पर आक्रमण करें, रजिया को दिल्ली से बाहर खींचा जाये क्योंकि आम रियाया के समर्थन के चलते, दिल्ली में रजिया की स्थिति काफी मजबूत थी।
मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया द्वारा विद्रोह
भटिण्डा के गर्वनर मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया और रजिया की परवरिश, सुल्तान कुतुबुद्दीन के महलों में साथ-साथ हुई थी और दोनों बचपन के मित्र थे। जब अल्तुनिया ने युवावस्था में प्रवेश किया तो वह रजिया के प्रति अनुरक्त हो गया। उसने कई बार रजिया के समक्ष अपने प्रेम का प्रदर्शन किया किंतु रजिया ने हर बार हँसकर टाल दिया था। जब रजिया सुल्तान बन गई तो अल्तूनिया की चाहत और अधिक बढ़ गई।
वह रजिया से निकाह करके न केवल अपने पुराने प्रेम को हासिल करना चाहता था अपितु इस वैवाहिक सम्बन्ध के माध्यम से सल्तनत पर कब्जा करने का ख्वाब भी देखा करता था। रजिया, अल्तूनिया के प्रस्तावों को टाल भले ही रही थी किंतु उसने अल्तूनिया के विरुद्ध कोई सख्ती नहीं दिखाई थी। इस कारण अल्तूनिया की उम्मीदें जीवित बनी रहीं किंतु जब उसने सुना कि रजिया अपने हब्शी गुलाम याकूत की मुहब्बत में खोई हुई है तो उसका दिल टूट गया। थोड़े ही दिनों में उसकी निराशा नाराजगी में बदल गई और उसने बगावत का झण्डा बुलंद करने का निश्चय किया।
जब रजिया पंजाब के गवर्नर कबीर खां अयाज का दमन करके दिल्ली लौट रही थी, तब मार्ग में ही उसे सूचना मिली कि अल्तूनिया ने बगावत कर दी है। इस समय उत्तर भारत भयानक गर्मी से उबल रहा था तथा इसके साथ ही रमजान का महीना होने से मुस्लिम सैनिकों के रोजे चल रहे थे किंतु रजिया ने तुरंत कार्यवाही करने का निर्णय लिया और वह विशाल सेना लेकर भटिण्डा की ओर बढ़ गई।
जब वह भटिण्डा पहुंची, तब दूसरे सूबों के प्रांतपति भी अपनी सेनाएं लेकर अल्तूनिया की सहायता के लिये आ गये। अल्तूनिया ने बड़ी चतुराई से अपने कुछ लोगों को सुल्तान के दल में शामिल कर दिया और जब रजिया भटिण्डा पहुंची, तब पूर्व में निर्धारित योजना के अनुसार उन लोगों ने याकूत से गाली-गलौच करके उसे झगड़ा करने के लिये उकसाया। जब याकूत ने इन लोगों का विरोध किया तो उन लोगों ने याकूत को वहीं घेर कर मार डाला गया।
याकूत की मृत्यु से अपने ही सैन्य शिविर में रजिया की स्थिति कमजोर हो गई किंतु उसने हिम्मत से काम लिया तथा स्वयं तलवार लेकर दुश्मनों का सामना करने को उद्धत हुई किंतु धोखे, फरेब और जालसाजी के उस युग में रजिया का कोई सच्चा सहायक नहीं था। याकूत मारा जा चुका था तथा पुराना प्रेमी मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया बागी हो गया था।
इसलिये अप्रेल 1240 में रजिया बंदी बना ली गई। सूबेदारों की संयुक्त सेनाओं ने रजिया अल्तूनिया को समर्पित कर दी। अल्तूनिया ने रजिया को भटिण्डा के किला मुबारक में बंद कर दिया। विद्रोहियों ने इल्तुतमिश के छोटे पुत्र बहरामशाह को तख्त पर बैठा दिया। मिनहाजुद्दीन सिराज के अनुसार रजिया ने 3 वर्ष, 6 माह, 6 दिन राज्य किया।
रजिया सुल्तान की हत्या
रजिया भले ही बंदी बना ली गई थी तथा उसका पूरा भविष्य अंधकार में दिखाई दे रहा था किंतु उसने एक बार फिर भाग्य आजमाने का फैसला किया। अल्तूनिया अब भी रजिया के साथ कठोर व्यवहार नहीं कर रहा था। रजिया हर शुक्रवार को राजसी ठाठ-बाट के साथ हाजीरतन मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ती तथा अल्तूतनिया प्रतिदिन रजिया से मिलने के लिये आता। रजिया ने उसकी आंखों में अपने लिये वही पहले जैसा प्यार देखा।
रजिया ने अल्तूनिया पर अपने रूप का जादू इस्तेमाल करने का निश्चय किया। रजिया ने अल्तूनिया के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तथा उससे कहा कि रजिया से विवाह करके वह हिन्दुस्थान का सुल्तान बन सकता है। अल्तूनिया इस प्रस्ताव से सहमत हो गया और अगस्त 1240 में उसने रजिया को कारागार से मुक्त करके उसके साथ निकाह कर लिया।
अब अल्तूनिया और रजिया एक सेना लेकर दिल्ली के तख्त पर अधिकार करने के लिए दिल्ली की ओर बढ़े। मलिक इज्जुद्दीन सालारी तथा मलिक कराकश आदि कुछ अमीर भी उनसे आ मिले। अक्टूबर 1240 में दोनों पक्षों की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ परन्तु नये सुल्तान बहरामशाह की सेना ने अल्तूनिया को परास्त कर दिया।
रजिया और अल्तूनिया युद्ध के मैदान से भाग निकले किंतु 13 अक्टूबर 1240 को कैथल के निकट जाटों ने अल्तूनिया तथा रजिया को पकड़ लिया और उनका माल-असबाब लूटकर रजिया सुल्तान की हत्या हत्या कर दी। अल्तूनिया भी मारा गया। इस प्रकार रजिया सुल्तान का सदा के लिये अंत हो गया। एक अन्य मत के अनुसार रजिया तथा अल्तूनिया को पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा बहराम के आदेश से दिल्ली में ही मारा गया।
दिल्ली में तुर्कमान गेट पर उसका मकबरा बताया जाता है। इस मकबरे को राजी व साजी का मकबरा कहा जाता है तथा कहा जाता है कि साजी, रजिया की बहिन थी किंतु इतिहास में इसका उल्लेख नहीं मिलता।
रजिया सुल्तानकी असफलता के लिए स्वयं रजिया बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं थी। अपितु तुर्की अमीरों की संकुचित दृष्टि एवं स्थार्थपरक राजनीति ने रजिया सुल्तान को सफल नहीं होने दिया।
यद्यपि रजिया सुल्तान इल्तुतमिश के उत्तराधिकारियों में सर्वाधिक योग्य तथा राजपद के सर्वाधिक उपयुक्त थी परन्तु दूषित राजनीतिक वातावरण में वह शासन चलाने में असफल रही तथा लगभग साढ़े तीन साल बाद ही उसका पतन हो गया।
रजिया सुल्तानकी असफलता के कारण
रजिया सुल्तान का स्त्री होना
मध्यकालीन इतिहासकारों ने रजिया की विफलता का प्रधान कारण उसका स्त्री होना बताया है। इस्लाम में मान्यता है कि पैगम्बर मुहम्मद ने कहा था कि- ”स्त्री संसार में सबसे अमूल्य एवं पवित्र वस्तु है किंतु जो लोग स्त्री को अपना शासक बनायेंगे, उन्हें कभी मानसिक शांति प्राप्त नहीं होगी। इस मान्यता ने रजिया को मुसलमान-प्रजा का आदर का पात्र नहीं बनने दिया।
रजिया सुल्तानकी स्वातंत्र्य-प्रियता
रजिया ने पर्दे का त्याग करके, औरतों के कपड़ों का त्याग करके तथा पुरुषों के कपड़े धारण करके तुर्की अमीरों के अहंकार को गहरी चोट पहुँचाई थी। तलवार को ही योग्यता का एकमात्र आधार मानने वाले तुर्की अमीर, एक औरत के अधीन रहकर काम करने को तैयार नहीं हुए। यदि वह पुरुष होती तो निश्चय ही अधिक सफल हुई होती क्योंकि तब याकूत के प्रेम का अपवाद नहीं फैला होता और इस आधार पर जुनैदी आदि तुर्की अमीरों ने उसका विरोध करने का दुस्साहस नहीं किया होता।
चालीस गुलामों का असहयोग
इल्तुतमिश ने शासन कार्य चलाने के लिये चालीस गुलामों का एक मण्डल तैयार किया था। चालीस गुलामों के इस मण्डल ने सुल्ताना को अपने हाथों की कठपुतली बनाना चाहा किंतु रजिया ने उनका अंकुश स्वीकार नहीं किया तथा स्वयं अपने विवेक से काम किया। इसलिये चालीस गुलामों ने सुल्तान से सहयोग करने की बजाय उसका विरोध किया। उन्होंने रजिया के सुल्तान पद पर रहते हुए भी रजिया के भाई बहराम को सुल्तान घोषित कर दिया किंतु उनमें स्वयं में एकता नहीं थी, इसलिये वे बहराम को सुल्तान के पद पर नहीं बैठा सके।
तुर्की अमीरों का स्वार्थ
रजिया की असफलता का दूसरा कारण तुर्की अमीरों का स्वार्थ तथा उनका शक्तिशाली होना बताया है। दिल्ली सल्तनत में तुर्की अमीरों का प्रभाव इतना अधिक था कि सुल्तान के लिये उनसे विरोध करके शासन करना अत्यन्त दुष्कर कार्य था। रजिया ने तुर्कों की शक्ति को एक सीमा तक घटा दिया। रजिया ने बड़ी सतर्कता के साथ अमीरों के प्रतिद्वन्द्वी दलों को संगठित करना आरम्भ किया परन्तु इसके लिये समय की आवश्यकता थी जो दुर्भाग्यवश उसे नहीं मिल सका।
रजिया सुल्तानकी स्वेच्छाचारिता
रजिया ने अपने विपक्षियों पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त स्वेच्छाचारिता तथा निरंकुश शासन स्थापित करने का प्रयत्न किया। तुर्की अमीरों ने ऐबक के शासन काल से ही राज्य की सारी शक्ति अपने हाथों में कर ली थी। वे एक स्त्री सुल्तान के स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन को सहन नहीं कर सके। उन्होंने रजिया के स्वेच्छाचारी शासन को समाप्त करके ही दम लिया।
याकूत के प्रति अनुराग
सुल्तान बनने पर रजिया ने अबीसीनियाई हब्शी गुलाम जमालुद्दीन याकूत को अमीर-ए-आखूर अर्थात् घुड़साल का अध्यक्ष बना दिया। रजिया इस गुलाम को घुड़सवारी करते समय अपने साथ ले जाती। याकूत को किसी भी समय सुल्तान के समक्ष उपस्थित होने का अधिकार दिया गया। इस कारण लोगों में रजिया सुल्तान और याकूत के प्रेम का अपवाद प्रचलित हो गया।
यह बात स्वयं को उच्च रक्तवंशी मानने वाले तुर्की अमीरों को पसन्द नहीं आयी। वे अमीरजादे जो सुल्तान से विवाह करने का स्वप्न देखते थे, उन्हें याकूत को लेकर सुनाई पड़ने वाले किस्सों से बहुत चोट पहुंची। अब वे ही रजिया के विरोधी हो गये। इससे रजिया का विरोध बड़ी तेज गति से बढ़ने लगा। अन्त में अमीरों तथा सरदारों ने उसके शासन को समाप्त कर दिया।
जनता के सहयोग का अभाव
यद्यपि दिल्ली की जनता ने ही रजिया को दिल्ली के तख्त पर बैठाया था किंतु जब उन्हें पता लगा कि उन्होंने ऐसा करके इस्लाम की शिक्षाओं के विपरीत कार्य किया है, तो वही जनता अब सुल्तान की विरोधी हो गई। हिन्दू प्रजा का सहयोग तथा समर्थन प्राप्त करना वैसे भी असम्भव था क्योंकि तुर्की शासक, विधर्मी तथा विदेशी थे।
इल्तुतमिश के वयस्क पुत्रों का जीवित रहना
इल्तुतमिश के वयस्क पुत्रों का जीवित रहना रजिया के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ। उनसे षड्यन्त्रकारियों को सम्बल तथा प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। षड्यन्त्रकारी इन शहजादों की आड़ में रजिया पर प्रहार करने लगे। अंत में इन्हीं शहजादों में से एक बहरामशाह ने राज्य पर अधिकार कर लिया।
केन्द्रीय सरकार की दुर्बलता
रजिया की विफलता का एक कारण यह बताया जाता है कि अभी तक भारत में तुर्की साम्राज्य का शैशव काल था। इस कारण केन्द्रीय सरकार, प्रांतपतियों को अपने पूर्ण नियंन्त्रण में नहीं कर पाई थी। स्थानीय हिन्दू सरदारों के निरन्तर विद्रोह होते रहने के कारण सुल्तानों को इन प्रांतपतियों को पर्याप्त मात्रा में सैनिक एवं प्रशासकीय अधिकार देने पड़ते थे। अतः विरोधियों द्वारा इन प्रांतपतियों से सांठ-गांठ कर लेने पर केन्द्रीय सरकार उन्हें ध्वस्त नहीं कर पाती थी।
रजिया सुल्तानका मूल्यांकन उसके शासनकाल की अवधि अथवा सामरिक सफलताओं से नहीं अपितु मध्यकालीन परिस्थितियों में दिखाए गए साहस एवं धैर्य से किया जा सकता है।
प्रथम स्त्री सुल्तान
रजिया भारत की प्रथम स्त्री सुल्तान थी। यद्यपि विदेशों में रजिया सुल्तान के पूर्व भी स्त्रियां तख्त पर बैठ चुकी थीं परन्तु भारत में अब तक तख्त पर बैठने का सौभाग्य तथा गौरव रजिया को ही प्राप्त हुआ। रजिया के बाद चांद बीबी दक्षिण भारत में सुल्तान बनी जो मुगलों की राज्यलिप्सा की भेंट चढ़ गई।
सुल्तानोचित गुण-सम्पन्नता
रजिया योग्य तथा प्रतिभा-सम्पन्न स्त्री थी। अपने पिता के जीवन काल में ही वह अपनी योग्यता का परिचय दे चुकी थी। इसी से उसके पिता ने अपने पुत्रों की उपेक्षा करके उसी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। रजिया में सुल्तानोचित गुण विद्यमान थे।
अनुकूल परिस्थितियों में वह सफल शासक सिद्ध हुई होती, परन्तु तत्कालीन वातावरण उसके विपरीत था। जिन संकटों और षड़यंत्रों में वह तख्त पर बैठी थी, उनमें किसी भी शासक का नष्ट हो जाना संभव था। रजिया ने धैर्य तथा साहस के साथ उनका सामना किया और समस्त विपक्षियों पर विजय प्राप्त करके अपने पिता के साम्राज्य को सुरक्षित रखा।
उच्च-कोटि की सैनिक योग्यता
रजिया में उच्च कोटि की सैनिक योग्यता तथा संगठन की अद्भुत क्षमता थी। इसी से वह रण क्षेत्र में अपने विपक्षियों के विरुद्ध सफलता प्राप्त कर पाती थी। अपने शासन के प्रारंभिक काल में वह समस्त विद्रोहियों का दमन करने में सफल रही।
कूटनीतिज्ञ
रजिया न केवल एक कुशल राजनीतिज्ञ वरन् बहुत बड़ी कूटनीतिज्ञ भी थी। जहाँ शक्ति तथा बल से कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती थी, वहाँ वह कूटनीति से काम लेती थी। अपनी कूटनीति के बल पर ही वह अपने विपक्षियों के संघ को भंग कर सकी थी और उन पर विजय प्राप्त कर सकी थी। कूटनीति के बल पर ही वह अल्तूनिया के कारागार से स्वयं को मुक्त करने में सफल रही थी।
स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश
रजिया ने सुल्तान की शक्ति को बढ़ाया तथा उसे स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश बनाया। वह दिल्ली की प्रथम सुल्तान थी जिसने अमीरों तथा मल्लिकों को शासन की इच्छानुसार कार्य करने के लिए विवश किया। उसने तुर्की अमीरों को सुल्तान के अधीन होने का अहसास करवाया। उसने तुर्की अमीरों के वर्चस्व को तोड़ने के लिये याकूत जैसे अबीसीनियाई हब्शी को उच्च पद दिया।
रजिया की दुर्बलताएँ
कुछ इतिहासकार रजिया के पतन के लिये उसकी दुर्बलताओं को जिम्मेदार ठहराते हैं जो कि उचित नहीं है। रजिया का पतन उसकी दुर्बलताओं के कारण नहीं वरन् कट्टर मुसलमानों की असहिष्णुता के कारण हुआ था। फिर भी इतिहासकारों ने उस पर यह आरोप लगाया है कि उसमें स्त्री-सुलभ दुर्बलताएं थीं। याकूत से उसका अनुराग उत्पन्न होना तथा अल्तूनिया से विवाह कर लेना उसकी दुर्बलताओं के प्रमाण हैं। हमारे विचार में इन दोनों ही घटनाओं से रजिया की दुर्बलता प्रकट नहीं होती। रजिया सुल्तान का मूल्यांकन तत्कालीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए।
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