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बादशाह का कोर्ट मार्शल

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बादशाह का कोर्ट मार्शल - bharatkaitihas.com
बादशाह का कोर्ट मार्शल

अठ्ठारह सौ सत्तावन के विद्रोह में बागियों का नेतृत्व करने के लिए अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर पर मुकदमा चलाने का निश्चय किया किंतु चूंकि बादशाह रानी विक्टोरिया की प्रजा नहीं था, इसलिए अंग्रेजी मिलिट्री की अदालत में बादशाह का कोर्ट मार्शल किया गया।

27 जनवरी 1858 को लाल किले के दीवाने खास में बादशाह का कोर्ट मार्शल आरम्भ हुआ। शहजादा जवांबख्त और एक नौकर बादशाह को एक पालकी में बैठाकर दीवाने खास में लाए। इसी दीवाने खास में जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के युग में कम्पनी सरकार के अधिकारी कांपती हुई टांगों से आकर खड़े होते थे और आज कम्पनी सरकार के अधिकारी उन्हीं के वारिस को पकड़कर एक ऐसे अपराध के आरोप में मुकदमा चला रहे थे, जो बहादुरशाह जफर ने किया ही नहीं था।

सर्दियों के कारण बहादुरशाह जफर बहुत बीमार और कमजोर दिखाई दे रहा था, वह थोड़ी-थोड़ी देर में खांसता और पीतल के कटोरे में उल्टियां करने लगता। जब शहजादा जवांबख्त और नौकर बादशाह को पालकी से निकाल कर खड़ा करने लगे तो बादशाह की टांगों में इतना दम नहीं था कि वह खड़ा हो सके। इसलिए लेफ्टिनेंट एडवर्ड ओमैनी ने भी बादशाह को सहारा दिया।

बादशाह को कुछ तकियों के सहारे उस स्थान पर बैठा दिया गया जहाँ किसी बंदी को खड़े रहना होता था। शहजादा जवांबख्त बादशाह के पीछे खड़ा हुआ ताकि वह बादशाह को संभाल सके और उसे बता सके कि कौन व्यक्ति बादशाह से क्या कह रहा है! डकैत की तरह दिखने वाला एक मजबूत अंग्रेज सिपाही एक राइफल लेकर खड़ा हुआ ताकि कम्पनी सरकार का बंदी कहीं भाग न जाए!

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कम्पनी सरकार से बगावत करके बादशाह अब मुजरिम हो गया था, यह जताने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने बादशाह को न तो मोरछल की अनुमति दी और न हुक्के की। कनिष्ठ स्तर के पांच सैनिक अधिकारियों को इस मुकदमे का जज नियुक्त किया गया। केवल कोर्ट मार्शल का अध्यक्ष ब्रिगेडियर शॉवर ही इस बात को जानता था कि किसी भी मुकदमे को कैसे चलाया जाता है! शेष चारों सदस्य नितांत नौसीखिए थे।

दिल्ली का नवनियुक्त कमिश्नर चार्ल्स साण्डर्स, उसकी पत्नी मैटिल्डा साण्डर्स, एडवर्ट वाईबर्ट, दिल्ली गजट का सब-एडीटर जॉर्ज वैगनट्राइबर तथा हैरियट टाइटलर दर्शक दीर्घा में बैठे। कोर्ट मार्शल का अध्यक्ष ब्रिगेडियर शॉवर मुकदमा आरम्भ होने के निर्धारित समय से काफी विलम्ब से आया और उसने सूचित किया कि उसे आगरा जाकर कमाण्ड संभालने का आदेश मिला है, इसलिए कर्नल डॉज कोर्ट मार्शल के अध्यक्ष होंगे। इस तरह के विचित्र वातावरण में बादशाह का कोर्ट मार्शल आरम्भ हुआ।

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जब कर्नल डॉज ने बादशाह से पूछा कि क्या वे अपना अपराध स्वीकार करते हैं तो बादशाह को कुछ समझ में ही नहीं आया कि किसी अपराध की बात की जा रही है। बहादुरशाह जफर की ओर से गुलाम अब्बास नामक एक वकील नियुक्त किया गया था। उसने बादशाह को समझाया कि वह ‘हाँ’ न करे। इस पर बादशाह ने इन्कार में मना कर दिया। इसके बाद बादशाह को एक के बाद एक करके ढेरों कागज दिखाए गए और बादशाह से पूछा गया कि क्या ये उसके दस्तखत हैं? इस पर बादशाह ने मना कर दिया। इसके बाद वे कागज बादशाह को पढ़कर सुनाए जाने लगे। बादशाह उनमें से कुछ कागजों को सुनता और बीच-बीच में ऊंघने लगता। बादशाह को कई गवाहों के बयान सुनाए गए।

बादशाह ने उन सारे गवाहों को झूठा बताया और तकिए पर सिर टिकाकर आराम से बैठ गया। कागजों को दिखाए जाने और पढ़कर सुनाए जाने की लम्बी प्रक्रिया कई दिनों तक चलती रही। शहजादा जवांबख्त भी इन कागजों को सुनने में कोई रुचि नहीं दिखाता था, इसलिए वह प्रायः बादशाह के साथ खड़े नौकर से हंसी-मजाक करने लगता। इस पर एक दिन लेफ्टिनेंट ओमेनी ने जवांबख्त के कोर्ट में आने पर पाबंदी लगा दी।

ओमनी के अनुसार शहजादा जवांबख्त बहुत ही अशिष्ट, अभद्र और असभ्य था। यहाँ बादशाह का कोर्ट मार्शल चल रहा था न कि शाही हरम में होने वाला मुजरा!

जब बहुत दिनों बाद बादशाह का कोर्ट मार्शल पूरा हुआ तो बादशाह ने कोर्ट मार्शल के समक्ष अपनी ओर से उर्दू में एक लिखित शपथपत्र प्रस्तुत किया-

‘मेरा बगावत से कोई सम्बन्ध नहीं था। इस पूरी अवधि में मेरी स्थिति विद्रोही सिपाहियों के हाथों विवश बंदी जैसी थी। मैंने उनसे कई बार प्रार्थना की कि वे यहाँ से चले जाएं किंतु वे नहीं माने। मैं अल्लाह की कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने मिस्टर फ्रेजर या किसी भी यूरोपियन की हत्या करने के आदेश कभी नहीं दिए।

जो आदेश मेरे हस्ताक्षरों और मेरी मुहर के साथ दिखाए जा रहे हैं, वे विद्रोही सैनिकों ने लिखे थे और उन पर बलपूर्वक मुझसे हस्ताक्षर करवाए थे और बलपूर्वक मुझसे खाली लिफाफों पर मुहर लगवाई थी। मुझे बिल्कुल भी मालूम नहीं होता था कि उन लिफाफों में क्या होता था और वे किसे भेजे जा रहे थे।

जब मैं उनकी बात मानने से मना करता तो वे कहते कि वे आपको तख्त से उतारकर मिर्जा मुगल को बादशाह बना देंगे। मैं उनके कब्जे में था और वे जो चाहते थे, मुझसे करवाते थे। यदि मैं उनका कहना नहीं मानता तो वे मुझे तुरंत ही मार डालते। उन्होंने न तो कभी मुझे सलाम किया, न ही कभी मुझे इज्जत दी।

वे दीवाने खास और तस्बीह खाने में जूते पहनकर घुस आते थे। उन सिपाहियों पर भरोसा कैसे कर सकता था जिन्होंने अपने मालिकों को ही मार डाला था। उन बागी सिपाहियों ने जिस प्रकार अपने अंग्रेज मालिकों को मारा, उसी प्रकार मुझे भी कैद कर लिया।

मैं अपनी जिंदगी से इतना तंग आ गया कि मैंने बादशाह का लिबास छोड़कर सूफियों का जोगिया लिबास पहन लिया। मेरे पास न तो काई फौज थी और न कोई खजाना, मैं अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत कैसे कर सकता था। केवल अल्लाह ही मेरा गवाह है और वह जानता है कि जो मैंने लिखा है, केवल वही सच है।’

जे. एफ. हैरियट का कहना था कि- ‘बहादुरशाह जफर निर्दोष नहीं है अपितु कुस्तुंतुनिया से लेकर मक्का, ईरान और लाल किले की दीवारों तक फैले हुए अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी षड़यंत्र का सरगना है तथा वह इस गदर की तैयारी पिछले साढ़े तीन साल से कर रहा था।’

लेफ्टिनेंट ओमेनी सहित लगभग सभी अंग्रेज अधिकारी जानते थे कि हैरियट जो कुछ भी कह रहा है, वह केवल बकवास है। सारे अंग्रेज जानते थे कि बगवात शुरु होने में बहादुरशाह का कोई हाथ नहीं था। वे यह भी जानते थे कि बहादुरशाह ने दिल्ली के अंग्रेजों की जान बचाने की कोशिश की थी और कानपुर के बीबीघर में हुए अंग्रेजों के नरसंहार की खुलकर निंदा की थी। फिर भी वे सब चाहते थे कि बादशाह को फांसी हो!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहादुरशाह का निष्कासन

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बहादुरशाह का निष्कासन

बादशाह का कोर्ट मार्शल चलता रहा। बहादुरशाह ने शुरु-शुरु में तो इसमें कुछ रुचि दिखाई किंतु बाद में ऊबने लगा। संभवतः उसे समझ में आ गया था कि कोर्ट मार्शल का निर्णय पहले ही हो चुका है। यह तो केवल खाना-पूर्ति हो रही है। अंततः मिलिट्री कोर्ट ने घोषित किया कि बहादुरशाह का निष्कासन करके उसे भारत से बर्मा भेज दिया जाए।

27 जनवरी 1858 को आरम्भ हुई बहादुरशाह जफर के मुकदमे की कार्यवाही दो माह तक चलती रही। इस पूरे दौरान तेज सर्दियां पड़ रही थीं जिनके कारण बादशाह जोर-जोर से खांसने एवं कराहने लगता था। जब बादशाह की तबियत बिगड़ जाती तो उस दिन की कार्यवाही बंद करके अगले दिन पर टाल दी जाती।

9 मार्च 1858 को कोर्ट मार्शल अंतिम बार बैठा। उसी दिन शाम को तीन बजे कोर्ट ने अपना निर्णय दे दिया। पांचों सैनिक न्यायाधीशों ने एक स्वर से बहादुरशाह जफर को अपराधी ठहराया। कोर्ट मार्शल के अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे अपराध की सजा मौत होती है किंतु चूंकि विलियम हडसन ने बादशाह को गारण्टी दी थी कि उसे मारा नहीं जाएगा, इसलिए उसे पूरी जिंदगी भारत से बाहर अण्डमान निकोबार या किसी अन्य स्थान पर भेज दिया जाए जिसका निर्णय स्वयं गवर्नर जनरल करेंगे।

इसके अगले दिन अर्थात् 10 मार्च 1858 को अत्याचारी विलियम हडसन लखनऊ में क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा मारा गया। कहा नहीं जा सकता कि विलियम हॉडसन तक इस निर्णय की जानकारी पहुंच पाई थी अथवा नहीं!

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बहादुरशाह जफर के अभियोग का निर्णय सुनाने के बाद सात महीने तक कम्पनी सरकार यह सोचती रही कि बादशाह को भारत की मुख्य भूमि से दूर कहाँ भेजा जाए! गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग बादशाह को अण्डमान भेजकर बदनामी मोल नहीं लेना चाहता था। अंततः सितम्बर 1858 में बर्मा की राजधानी रंगून को बहादुरशाह जफर के निर्वासन के लिए चुना गया। इस प्रकार बहादुरशाह का निष्कासन होना निश्चित हो गया।

चूंकि भारत के पूर्वी हिस्सों में क्रांति की आंच अभी पूरी तरह ठण्डी नहीं हुई थी, इसलिए अंग्रेजों को भय था कि कहीं क्रांतिकारी बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों की जेल से छुड़ाने का प्रयास न करें। इसलिए अनुभवी लेफ्टिनेंट एडवर्ड ओमेनी को यह दायित्व सौंपा गया कि वह स्वयं बादशाह को दिल्ली से लेकर जाए और अपने हाथों से उसे रंगून की जेल में बंद करके आए।

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बादशाह को दिल्ली से निकालने की योजना को पूरी तरह गुप्त रखा गया। बहुत कम अंग्रेज अधिकारियों को बताया गया कि कम्पनी के गवर्नर जनरल ने लाल किले के बादशाह को रंगून भेजने का निर्णय किया है। 7 अक्टूबर 1858 की प्रातः तीन बजे लेफ्टिनेंट ओमेनी ने लाल किले की गंदी कोठरियों में जाकर बहादुरशाह जफर को जगाया और उससे कहा कि वह तैयार होकर बाहर खड़ी बैलगाड़ी में बैठ जाए। लेफ्टिनेंट ओमेनी अपने साथ और भी बहुत सारी बैलगाड़ियां और पालकियां लाया था। उसके पास पूरी सूची थी कि कौन-कौन व्यक्ति इन बैलगाड़ियों और पालकियों में बैठेगा।

बादशाह के साथ अब भी उसके दो जीवित शहजादे रहते थे। इनमें से पंद्रहवें नम्बर का शहजादा जवां बख्त बेगम जीनत महल का बेटा था जिसे जीनत महल ने भारत का बादशाह बनाने के सपने देखे थे। सोलहवें नम्बर का शहजादा मिर्जा शाह अब्बास भी इस समय बादशाह के पास था। वह जफर की एक रखैल मुबारकुन्निसा की अवैध संतान था। इस समय वह 13 साल का था। 

इन दोनों शहजादों को भी अनिवार्य रूप से अपने पिता के साथ निर्वासन में जाने का आदेश हुआ। बादशाह की दो बेगमें भी उसके साथ बैलगाड़ियों में बैठाई गईं। कुछ नौकर, रखैलें और ख्वाजासरा भी शाही परिवार के साथ बैलगाड़ियों में बैठाए गए। जब जफर के परिवार के कुछ अन्य लोगों को ज्ञात हुआ कि शाही परिवार को दिल्ली से बाहर ले जाया जा रहा है तो वे स्वयं अपनी इच्छा से बादशाह के साथ चलने को तैयार हो गए। इस प्रकार शाही काफिले में कुल 31 व्यक्ति हो गए। इन सभी को एक घण्टे के अंदर तैयार करके गाड़ियों में बैठा दिया गया।

शाही काफिले को नौवीं लांसर्स ने घेर लिया। इस सैनिक टुकड़ी में एक घुड़सवार तोपखाना, दो पालकियां और तीन पालकी गाड़ियों का दस्ता था। यह पूरा प्रबंध पूरी तरह से गुप्त रूप से किया गया था। यहाँ तक कि स्वयं बहादुरशाह को भी नहीं बताया गया कि रात के अंधेरे में उन्हें दिल्ली से कहाँ ले जाया जा रहा है!

दिल्ली के कमिश्नर चार्ल्स साण्डर्स की पत्नी ने अपनी सास को लिखे एक पत्र में लिखा- ‘उन्हें जितनी शीघ्रता से रवाना किया जाना संभव था, उतनी शीघ्रता से दिल्ली से रवाना कर दिया गया। स्वयं चार्ल्स साण्डर्स ने इस शाही यात्रा के लिए बैलगाड़ियों, ढंकी हुई पालकियों और मार्ग में लगाए जाने वाले तम्बुओं का गुप्त प्रबंध किया था।’

कमिश्नर स्वयं भी प्रातः तीन बजे उठकर ओमेनी के साथ लाल किले में पहुंच गया था। उसने न केवल यह सुनिश्चत किया कि प्रातः चार बजे तक शाही काफिला लाल किले से रवाना हो जाए अपितु वह स्वयं घोड़े पर बैठकर इस काफिले के साथ यमुनाजी पर नावों को जोड़कर बनाए गए पुल तक गया ताकि वह यह भी सुनिश्चित कर सके कि दिल्ली का कोई व्यक्ति इस शाही काफिले को दिल्ली से जाते हुए तो नहीं देख रहा है!

इस प्रकार 332 साल बाद बाबर के बेटों की भारत से अंतिम विदाई हो गई। बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब ने भारत के लगभग समस्त राजाओं के महलों को लूटकर विपुल सोना, चांदी, हीरे, जवाहर यहाँ तक कि संसार का सबसे बड़ा हीरा भी आगरा और दिल्ली के लाल किलों में जमा कर लिया था किंतु आज वे दोनों ही लाल किले खाली पड़े थे। न उनमें सोना-चांदी बचा था और न उनमें रहने के लिए बाबर का कोई बेटा!

जहाँ तक भारतवासियों का प्रश्न था, उन्हें इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था कि बहादुरशाह का निष्कासन हो या उसके साथ कुछ और हो!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जॉन लॉरेंस

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जॉन लॉरेंस

जॉन लॉरेंस एक ब्रिटिश अधिकारी था जो अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के समय पंजाब प्रांत में चीफ कमिश्नर के पद पर नियुक्त था एवं दिल्ली का प्रशासक नियुक्त किया गया था। उसकी कृपा से ही दिल्ली नष्ट होने से बच पाई। ब्रिटेन के लॉर्ड्स चाहते थे कि दिल्ली को भारत के नक्शे से मिटा दिया जाए!

बादशाह लाल किला छोड़कर चला गया था किंतु लोअर कोर्ट का पूर्व मजिस्ट्रेट थियो मेटकाफ जो अब दिल्ली का सहायक कमिश्नर था, अब भी दिल्ली में था और वह दिल्ली के मकानों और दिल्ली के लोगों पर कहर ढा रहा था। बदले की आग में झुलसा हुआ वह प्रौढ़ अंग्रेज वास्तव में मानसिक रोगी हो गया था। वह दिल्ली के प्रत्येक मकान को तोड़ देना चाहता था और प्रत्येक नागरिक को फांसी के फंदे पर लटका देना चाहता था। रक्त, मृत्यु, अग्नि और विध्वंस ही उनके जीवन की एकमात्र साधना बनकर रह गए थे।

दिल्ली को हारी हुई बगावत का केन्द्र होने की सजा दी जा रही थी। लॉर्ड पामर्सटन तथा कुछ अन्य लॉर्ड्स ने कम्पनी सरकार से मांग की कि दिल्ली को हिंदुस्तान के नक्शे से मिटा दिया जाए। लॉर्ड पामर्सटन ने कम्पनी को भेजे अपने पत्र में लिखा कि हर वह सभ्य इमारत जिसका इस्लामी परम्परा से किंचित् भी सम्बन्ध हो, उसे बिना प्राचीनता या कलात्मकता का सम्मान किए धरती पर ढहा दिया जाना चाहिए।

जब बादशाह बहादुरशाह जफर दिल्ली से रंगून भेज दिया गया तब दिल्ली का प्रशासन पंजाब सरकार के अधीन कर दिया गया। पंजाब का चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस अपनी नौकरी के आरम्भिक दिनों में दिल्ली के सहायक कमिश्नर थियो मेटकाफ के बाप सर थॉमस मेटकाफ के अधीन काम कर चुका था जो कि ईस्वी 1835 तक दिल्ली का कमिश्नर रहा था।

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इसलिए जॉन लॉरेंस थियोफिलस मेटकाफ से स्नेह करता था किंतु वह समझ रहा था कि जब तक मेटकाफ दिल्ली में रहेगा, तब तक दिल्ली की स्थिति को सामान्य नहीं किया जा सकता। इसलिए जॉन लारेंस ने भारत के गर्वनर जनरल लॉर्ड केनिंग को चिट्ठी लिखी कि थियो मैटकाफ को तुरंत दिल्ली से हटाया जाए। उस पर दिल्ली में बड़े पैमाने पर कत्लेआम करने का आरोप है। जॉन लॉरेंस ने लॉर्ड केनिंग को यह भी लिखा कि दिल्ली के अंग्रेज इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं मानो वे हिंदुस्तानियों को जड़ से उखाड़ फैंकने की लड़ाई कर रहे हों।

इस पर कम्पनी सरकार ने थियो मेटकाफ को दिल्ली से हटाकर फतेहपुर का डिप्टी कलक्टर बना दिया। थियो मेटकाफ ने नाराज होकर लम्बी छुट्टी ले ली और वह इंग्लैण्ड चला गया जहाँ से वह कभी लौटकर नहीं आया। इस प्रकार दिल्ली को तीसरे मेटकाफ से छुटकारा मिल गया।

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पंजाब के चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस ने लिखा है- ‘दिल्ली का शासन मेरे हाथ में आते ही मैंने सिविल ऑफीसर्स को आदेश देकर दिल्ली में कत्लेआम रोक दिया और सैंकड़ों निर्दोष लोगों को फांसी पर चढ़ने से बचा लिया। मैटकाफ का दिल्ली में इतना शक्तिशाली हो जाना बहुत ही दुर्भाग्य की बात है। जो भी हो, अब वह इंग्लैण्ड चला गया है।’

जॉन लॉरेंस ने लॉर्ड केनिंग से मांग की कि जिन विद्रोही सिपाहियों ने किसी की भी हत्या नहीं की है तथा भंग कर दी गई टुकड़ियों के जिन सैनिकों ने किसी बगावत में हिस्सा नहीं लिया है, उन्हें क्षमा करके फिर से कम्पनी सरकार की सेवा में ले लिया जाए ताकि वे फिर से जीवन की मुख्य धारा में लौट सकें। ब्रिटिश सांसद डिजराइली ने इंगलैण्ड की संसद में इस मांग का जर्बदस्त समर्थन किया। उसका कहना था कि इससे भारतीयों के दिलों में अंग्रेजों के प्रति घृणा का भाव कम होगा तथा भारत शांत हो जाएगा। दिल्ली एवं कलकत्ता से लेकर लंदन तक में बैठे अधिकांश अंग्रेज इस योजना के पक्षधर नहीं थे। भारत एवं इंग्लैण्ड के अंग्रेजों के कुछ बड़े समूहों ने मांग की कि जामा मस्जिद सहित दिल्ली के समस्त भवनों को नष्ट कर दिया जाए किंतु जॉन लॉरेंस ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया।

जब गवर्नर जनरल केनिंग ने दिल्ली नगर का पूरा परकोटा तथा दोनों पक्षों द्वारा बनाई गई समस्त मोर्चाबंदियों को नष्ट करने के आदेश दिए तो जॉन लॉरेंस ने केनिंग को लिखा कि इस आदेश की पालना नहीं की जा सकती क्योंकि सरकार के पास इतना बारूद नहीं है।

दिसम्बर 1859 में लॉर्ड केनिंग इस बात पर सहमत हो गया कि केवल उन दीवारों को तोड़ा जाए जो लाल किले एवं दिल्ली नगर को आसानी से सुरक्षित बनाती हैं। चांदनी चौक के पूर्वी आधे हिस्से को दरीबा तक तोड़ने की येाजना भी रोक दी गई। फिर भी लाल किले के चारों ओर के बहुत से भवन पूरी तरह धरती पर गिरा दिए गए।

उर्दू के विख्यात कवि मिर्जा गालिब ने लिखा है- ‘मैं तांगे पर सवार होकर जामा मस्जिद से होता हुआ राजघाट दरवाजे तक गया। यह पूरा क्षेत्र एक रेगिस्तान जैसा दिखाई देने लगा है। लोहे की सड़क से कलकत्ता दरवाजे और काबुली दरवाजे तक मैदान साफ हो गया है। पंजाबी कटरा, धोबीवाड़ा, रामजी गंज, सआदत खाँ का कटरा, मुबारक बेगम की हवेली, साहब राम की हवेली और बाग, रामजी दास गोदाम वाले का मकान, इनमें से किसी का कुछ पता नहीं चलता। पूरा शहर रेगिस्तान बन गया है।

……ऐसा लगता है जैसे दिल्ली को ढहाया जा रहा है। दिल्ली के वे मौहल्ले जो 1857 की क्रांति से पहले स्वयं अपने आप में एक नगर जैसे दिखाई देते थे, वे अब अपनी जगह पर नहीं हैं। खास बाजार, उर्दू बाजार, खानम का बाजार पूरी तरह धूल में मिला दिए गए हैं। न कोई मकान मालिक और न कोई दुकानदार बता सकता है कि उनका घर या दुकान किस स्थान पर थे!’

पंजाब का कमिश्नर जॉन लॉरेंस चाहता था कि कलकत्ता और लंदन में बैठे अंग्रेज राजनीतिज्ञ, सिविल सर्विस के अधिकारी एवं सैनिक अधिकारी इस बात को समझें कि भारत की राजनीति में दिल्ली का स्थान कितना महत्वपूर्ण है। इसलिए दिल्ली को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए अपितु उसका नवनिर्माण करके इसे अंग्रेज शक्ति का महत्वपूर्ण स्थल बनाया जाना चाहिए। मद्रास, मुम्बई, कलकत्ता और लाहौर में से कोई भी नगर भारत में इतनी महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं ऐतिहासिक स्थिति नहीं रखता जो स्थिति दिल्ली की रही है।

कलकत्ता और लंदन के अंग्रेज चिल्लाते रहे किंतु जॉन लॉरेंस ने उनकी परवाह नहीं की। उसने दिल्ली को साफ करवाया। मलबे के ढेर उठवाकर बाहर फिंकवाए। मलबे में दबी पड़ी लाशों की अंत्येष्टियां करवाईं। उसने नागरिकों का आह्वान किया कि वे अपने घरों, दुकानों एवं बाजारों को फिर से बना लें। इस प्रकार जॉन लॉरेंस ने दिल्ली को पूर्णतः नष्ट होने से बचा लिया।

 नवम्बर 1858 में भारत से कम्पनी सरकार का शासन समाप्त कर दिया गया और ब्रिटिश क्राउन ने स्वयं भारत का शासन ग्रहण कर लिया। इसी के साथ लाल किला पूरी तरह नेपथ्य में चला गया। भारत पर रानी का शासन होते ही जॉन लॉरेंस ने 1857 की क्रांति के लगभग 24 हजार सैनिकों को फिर से सेवा में ले लिया किंतु अब वे कम्पनी सरकार के सिपाही नहीं थे, अब वे विश्व की सबसे बड़ी हुकूमत की सेना के सिपाही थे जिसे रॉयल आर्मी कहा जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाल किले पर खतरा

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लाल किले पर खतरा

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति को कुचल दिए जाने के बाद अंग्रेज अधिकारियों ने पहले तो दिल्ली को नष्ट करने की योजना बनाई किंतु जब जॉन लॉरेंस ने दिल्ली को बचा लिया तब अंग्रेज अधिकारी लाल किले को गिराने पर उतारू हो गए। लाल किले पर खतरा देखकर चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस ने कुछ अंग्रेज अधिकारियों को दिल्ली से बाहर स्थानांतरित करवा दिया तथा लाल किले को अदृश्य होने से बचा लिया!

दिल्ली अब फिर से अंग्रेजों की थी और अंग्रेज उसे जी-जान से ढहा रहे थे। अंग्रेज जाति यह सहन नहीं कर सकती थी कि भारत के बर्बर लोग दिल्ली की सड़कों पर महान् अंग्रेज जाति का रक्त गिराएं। इसलिए दिल्ली को नष्ट करने का काम आरम्भ हो गया। इसी के साथ लाल किले पर खतरा बढ़ गया।

जिन अंग्रेजों ने आगे चलकर दिल्ली में लुटियन्स जोन, इण्डिया गेट, पार्लियामेंट भवन, वायसराय भवन, सेक्रेटरिएट बिल्डिंग तथा तीनमूर्ति भवन बनवाए, उन्होंने दिल्ली के सैंकड़ों पुराने भवनों सहित लाल किले के भीतर बने अस्सी प्रतिशत भवन तोड़कर नष्ट कर दिए। लाल किले पर खतरा दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा था।

नवम्बर 1858 में जैसे ही कम्पनी सरकार समाप्त हुई और ब्रिटिश क्राउन भारत का नया स्वामी बना, वैसे ही लाल किले को ध्वस्त करने का काम आरम्भ हो गया। सबसे पहले मलिका के हमाम अर्थात् गुसलखाने तोड़े गए।

स्कॉटिश आर्चीटैक्चरल हिस्टोरियन (स्थापत्य इतिहास लेखक) जेम्स फर्ग्यूसन ने लिखा है कि लाल किले के भीतर स्पेन के विशाल शाही महल ‘एस्कोरियल’ से दोगुना क्षेत्र नष्ट कर दिया गया। बाजार के दक्षिण और पूर्व में भवनों के केंद्रीय भाग में जितना भी क्षेत्र था, उस सबको गिरा दिया गया। जो दोनों तरफ लगभग एक हजार फुट था। यहाँ शाही हरम का निवास हुआ करता था। यह स्थान यूरोप के किसी भी शाही महल से दोगुना था।

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जेम्स फर्ग्यूसन ने लिखा है कि मेरे पास लाल किले के जो पुराने देशी नक्शे हैं उनमें चार बाग सेहन दिखाए गए हैं और लगभग तेरह-चौदह अन्य सेहन हैं। इनमें से कुछ विशेष लोगों के लिए और कुछ जनसाधारण के लिए बनाए गए थे किंतु वे कैसे थे, हम कभी नहीं जान पाएंगे क्योंकि अब उनका कोई चिह्न नहीं रह गया है।

लाल किले पर खतरा कितना बड़ा था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जॉर्ज वैगनट्राइबर ने दिल्ली गजट में लिखा है कि सबसे पहले सबसे शानदार महल ढहाए गए, जैसे ‘छोटा रंग महल’! किले के शानदार बागों विशेषकर ‘हयात बख्श बाग’ और ‘महताब बाग’ पूरी तरह नष्ट कर दिए गए ओर वर्ष के अंत में किले का केवल बीस प्रतिशत हिस्सा ही शेष बचा। यमुना की तरफ सफेद संगमरमर की बारादरियां बनी हुई थीं, उन्हें भी नष्ट कर दिया गया। समस्त सुनहरी गुम्बद और संगमरमर की फिटिंग्स वसूली एजेंटों ने उतरवा लीं।

विलियम डैलरिम्पल ने लिखा है- ‘शाहजहाँ ने दिल्ली के लाल किले में तख्ते ताउस के पीछे पर्चिनकारी का एक ऑर्फियस पैनल लगवाया था जिसे सर जोंस ने उखाड़कर टेबल टॉप बनवा लिया। यह टॉप अब भी लंदन के इण्डिया म्यूजियम में मौजूद है।’

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लाल किले के भवनों के नष्ट हो जाने के साथ ही लाल किले के सलातीनों की रहस्यम दुनिया भी गायब हो गईं जिनमें सिसकियों, तन्हाइयों, बदनसीबियों और गुर्बतों के हजारों किस्से पलते थे! जब बहुत से अंग्रेज अधिकारियों ने उस विशाल दीवार को पार करके सलातीनों की कोठरियों को देखा तो वे दंग रह गए! क्या मुगलों के हजारों वंशज ऐसी गंदी और बदबूदार कोठरियों में रहा करते थे! इसे रहना नहीं सड़ना कहना अधिक उचित होगा!

अक्टूबर 1858 में जब तक पंजाब के चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस को दिल्ली का प्रभार सौंपा गया, तब तक लाल किले के भीतर 80 प्रतिशत हिस्से गिराए जा चुके थे। ने भांप लिया कि लाल किले पर खतरा बहुत बड़ा है। इसलिए उसने इस विंध्वस पर रोक लगाई। उसने जामा मस्जिद और लाल किले की दीवारों को यह तर्क देकर तोड़े जाने से बचा लिया कि ये दीवारें भविष्य में अंग्रेजों के भी उतनी ही काम आएंगी जितनी कि अब तक मुसलमानों के काम आती रही हैं। फिर भी तब तक किले के भीतर बने हुए बाजारों, महलों, हवेलियों एवं मकानों में से 80 प्रतिशत भवनों को ढहाया जा चुका था।

हरम के सारे सेहन मिटा डाले गए और उनके स्थान पर ब्रिटिश सिपाहियों के रहने के लिए भद्दी कोठरियों की लम्बी कतारें बना दी गईं। जिन लोगों ने यह भयानक विंध्वस किया, उन्होंने इतना भी नहीं सोचा कि विश्व के सबसे शानदार महल का कोई प्लान या रिकॉर्ड ही सुरक्षित कर लें। अब मुगलों का लाल किला सुरमई रंग की ब्रिटिश कोठरियों का ढांचा बन गया था। नक्कारखाने में जहाँ ढोल और नक्कारे कभी इसुहान और कुस्तुंतुनिया से आने वाले दूतों के आगमन की घोषणा करते थे, वहाँ एक ब्रिटिश स्टाफ सार्जेण्ट का निवास बना दिया गया।

जॉन लॉरेंस के आदेश पर लाल किले के बहुत से भवनों को अंग्रेज अधिकारियों, कर्मचारियों एवं सैनिकों के कार्यालयों एवं आवासीय उपयोग के लिए तैयार किया गया। दीवाने आम ब्रिटिश अधिकारियों का निवास बन गया। बादशाह का निजी प्रवेश द्वार कैंटीन बन गया और रंग महल अंग्रेज फौजियों के मेस में बदल दिया गया। मुमताजमहल को फौजी कैदखाने में बदल दिया गया ओर लाहौरी दरवाजे का नाम बदलकर विक्टोरिया गेट कर दिया गया और उसे किले के अंग्रेज सिपाहियों के लिए बाजार बना दिया गया।

लाल किले के भीतर बने एक सरोवर में लाल पत्थरों से बना हुआ जफर महल ऐसा दिखाई देता था मानो किसी समुद्र में विशाल लाल पक्षी उड़कर आ बैठा हो, उसे अब अंग्रेजी अधिकारियों के लिए स्विमिंग पूल के बीच रेस्ट रूम बन गया। हयातबख्श के बचे हुए हिस्से को पेशाब घरों में बदल दिया गया।

जॉन लॉरेंस की दूरदृष्टि से लाल किला पूरी तरह अदृश्य होने से तो बच गया किंतु लाल किले पर खतरा पूरी तरह दूर नहीं हुआ। किले की बाहरी दीवारें और कुछ महल ही नष्ट होने से बच पाए। लाल किले में काफी कुछ उजड़ गया और काफी कुछ बदल गया, फिर भी लाल किले की बाहरी दीवारें और बहुत से भवन अपने मूल रूप में खड़े थे। जॉन लॉरेंस ने सचमुच ही लाल किले को अदृश्य होने से बचा लिया!

इन दिनों हैरियट टाइटलर लाल किले के भीतर दीवाने आम के पास एक भवन में रहती थी। उसने किले के भीतर के भवनों का एक लैण्डस्केप बनाया ताकि आने वाली पीढ़ियां यह देख सकें कि बहादुरशाह जफर के समय में लाल किला भीतर से कैसा दिखता था! अब यह लैण्ड स्केप उपलब्ध नहीं है किंतु इ.1857 की क्रांति से कुछ दिन पहले ही थियो मेटकाफ ने लाल किले के भीतर का एक लैण्ड स्केप तैयार करवाया था। यह लैण्ड स्केप आज भी ब्रिटिश म्यूजियम की लाइब्रेरी में उपलब्ध है।

मार्च 1859 तक भी जॉर्ज वैगनट्राइबर अपने अखबार दिल्ली गजट में लिख रहा था- ‘किले में अब भी इमारतें उड़ाने का काम चल रहा है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली की जामा मस्जिद

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दिल्ली की जामा मस्जिद

दिल्ली की जामा मस्जिद मूलतः एक हिन्दू मंदिर था जो मुसलमानों के भारत में आने से कई सौ साल पहले से दिल्ली की धरती पर विष्णु भगवान को समर्पित करके बनाया गया था। यह हिन्दू कला, स्थापत्य एवं शिल्प का अनूठा उदाहरण होता। यदि मुसलमानों ने इसे जामा मस्जिद में नहीं बदला होता तो यह आज विश्व के आश्चर्यों में से एक होता। अंग्रेज जामा मस्जिद तो तोड़कर उसे पूरी तरह धूल में मिला देना चाहते थे किंतु जॉन लॉरेंस ने लाल किले की तरह जामा मस्जिद को भी बचा लिया। दिल्ली से मुगलों का नामोनिशान मिटा देना चाहते थे अंग्रेज!

जॉन लॉरेंस के विरोध एवं निरंतर आदेशों के उपरांत भी कुछ जुनूनी अंग्रेज दिल्ली को ढहाते जा रहे थे। अंग्रेजों के मुख्य शत्रु मुगल एवं उनकी कौम के लोग लोग थे। इसलिए अकबराबादी मस्जिद, कश्मीरी कटरा मस्जिद, शेख कलीमुल्लाह जहानाबादी का मकबरा, मौलवी मुहम्मद बाकर का इमामबाड़ा, दरीबे का बड़ा दरवाजा तथा बुलाकी बेगम का मुहल्ला ढहा दिए गए। जामा मस्जिद के चारों ओर का इलाका साफ करके 70 गज चौड़ा मैदान बना दिया गया।

दिल्ली के चार अत्यंत भव्य महल नष्ट कर दिए गए। झज्झर, बहादुरगढ़ और फर्रूखनगर के नवाब तथा वल्लबगढ़ के राजा को फांसी पर चढ़ाने के बाद दिल्ली स्थित उनकी हवेलियों को धूल में मिला दिया गया।

शाहजहाँ की पुत्री जहांआरा द्वारा बनवाई गई कारवां की सराय भी तोड़ डाली गई जिसमें देश-विदेश से आने वाले यात्रियों को ठहराया जाता था। अब इस इमारत के कुछ खण्डहर ही दिखाई पड़ते हैं। शालीमार बाग को खेती के लिए बेच दिया गया। बेगम बाग को क्वीन्स गार्डन में बदल दिया गया।

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चांदनी चौक की पुरानी गली के पश्चिमी छोर पर फतेहपुरी मस्जिद स्थित थी। इसका निर्माण शाहजहाँ की बेगम फतेहपुरी ने ई.1650 में करवाया था। लाल पत्थरों से बनी यह मस्जिद मुगल वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना थी। अंग्रेज़ों ने इस मस्जिद को नीलाम कर दिया। राय लाला चुन्नामल ने इस मस्जिद को 19,000 रुपए में खरीद लिया किंतु उसने इस मस्जिद के मूल स्वरूप को वैसा ही रहने दिया। ई.1877 में भारत सरकार ने फतेहपुरी मस्जिद चार गांवों के बदले में वापस अधिग्रहीत करके मुसलमानों को दे दी। लाला चुन्नामल के वंशज आज भी चांदनी चौक में चुन्नामल हवेली में रहते हैं।

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अंग्रेजों ने अकबराबादी बेगम द्वारा बनवाई गई मस्जिद पूरी तरह नष्ट कर दी। मुसललानों की अधिकतर सम्पत्तियों को चुन्नामल तथा रामजी दास जैसे खत्री मुंशी वर्ग ओर जैन बैंकरों ने खरीद लिया। ये उन लोगों में से थे जिनके पास गदर की आंधी गुजर जाने के बाद भी कुछ धन बचा हुआ था। नील का कटरा में रहने वाले कुछ सेठों ने समय रहते ही अंग्रेजों को एक मुश्त राशि देकर अपने घरों को लुटने एवं नष्ट होने से बचा लिया था। एक अन्य हिन्दू बैंकर ने जीनतुल मसाजिद खरीद ली जो पूरी बगावत के दौरान जिहादी बगावत का मुख्य केन्द्र रही थी। जीनतुल मस्जिद ई.1905 के आसपास वापस मुसलमानों को दिलवाई गई।

जामा मस्जिद पर सिक्ख सेना का अधिकार हो गया। यह मस्जिद ई.1862 में फिर से मुसलमानों को लौटाई गई। गदर फूटने से पहले दिल्ली के मुगलों को मदरसा ए रहीमिया पर बड़ा गर्व था, उसे रामजीदास नामक एक सेठ ने खरीद लिया और गोदाम बना दिया। एडवर्ड कैंपबैल ने लिखा है- ‘दिल्ली की सब दौलत चुन्नामल तथा महेश दास जैसे एक-दो लोगों के कब्जे में है।’

जे.एफ. हैरियट ने बादशाह को फांसी दिलवाने के बहुत प्रयास किए थे किंतु उसकी पत्नी हैरियट टाइटलर को दिल्ली के नष्ट हो जाने पर असीम दुख हुआ। उसने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘दिल्ली अब सचमुच शवों का नगर बन गई है। नगर की चुप्पी मृत्यु जैसी कष्टप्रद है। थोड़े से घर साबुत बचे हैं किंतु वे पूरी तरह खाली पड़े हैं।’

आतताई अंग्रेजों द्वारा दिल्ली में किए जा रहे हिंसा के ताण्डव ने दिल्ली में बहुत कुछ बर्बाद कर दिया किंतु चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस भी जी जान से दिल्ली को बचाने में जुटा रहा। उसके प्रयासों से हिन्दू जनता शांत होकर बैठ गई।

दिल्ली की जनता के मन में अंग्रेजों के प्रति इस गदर से पहले जो नफरत थी, उसमें कोई अंतर नहीं आया किंतु उनके लिए अंग्रेजों का शासन उन मुगलों से बेहतर था इतने कमजोर होकर भी सत्ता का केन्द्र बने रहने का नाटक करते थे। इन कमजोर मुगलों से न उनसे कुछ करते बनता था और न वे सत्ता से विलग होना चाहते थे।

अब हिंदुओं के लिए यही संतोष की बात थी कि सत्ता का केन्द्र दो जीभ वाले विषैले सर्प की बजाए एक जीभ वाले विषैले सर्प के पास आ गया था। हिन्दू जनता इस बात को समझ रही थी कि जो न फरत घृणा और हिंसा अंग्रेजों और मुसलमानों के मन में एक-दूसरे के लिए थी, वैसी नफरत, घृणा और हिंसा हिंदुओं और अंग्रेजों के बीच नहीं थी। इसलिए हिन्दू जनता फिर से अपने घरों और दुकानों को खड़ा करने में जुट गई किंतु दिल्ली के मुसलमान परिवारों की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं लेती थीं।

संभवतः उस काल में पंजाब एवं दिल्ली का चीफ कमिश्नर जॉन लॉरेंस ही एकमात्र अंग्रेज अधिकारी था जो हिन्दुओं के साथ-साथ मुसलमानों की तकलीफों को भी समझता था और उनसे सहानुभूति रखता था किंतु अधिकतर अंग्रेज अधिकारी मुसलमानों को ही बागी मान रहे थे, इसलिए उनके साथ रियायत बरतने को तैयार नहीं थे।

फरवरी 1859 में जॉन लॉरेंस को इंग्लैण्ड भेज दिया गया। इंग्लैण्ड में लॉरेंस का स्वागत नायकों की तरह किया गया। स्वयं महारानी विक्टोरिया ने उसे अपने महल में बुलाकर उसकी सेवाओं की प्रशंसा की। आज भारत के हिन्दू और मुस्लिम भले ही जॉन लॉरेंस की शांति पूर्वक दी गई सेवाओं को याद नहीं रख पाते हों किंतु वास्तविकता यह है कि इस शांति-दूत ने सैंकड़ों निर्दोष भारतीयों को फांसी के फंदों से खींचकर उन्हें जीवन प्रदान किया।

कम्पनी सरकार ने जॉन लॉरेंस को दो हजार पौण्ड की वार्षिक पेंशन स्वीकृत की। महारानी की सरकार ने जॉन लॉरेंस को प्रिवी काउंसलर नियुक्त किया, काउंसिल ऑफ इण्डिया का सदस्य बनाया तथा कई बड़े पदक एवं सम्मान दिए। बैरन एवं सर की उपाधियां उस पर न्यौछावर की गईं। जॉन लॉरेंस को निर्दोष भारतीयों के प्राण बचाने का असीम पुण्य तब प्राप्त हुआ जब जनवरी 1864 में उसे भारत का गवर्नर जनरल एवं वायसराय बना दिया गया।

थियो मेटकाफ को भी ऑर्डर ऑफ बाथ दिया गया किंतु उसका इससे अधिक सम्मान नहीं किया गया। उसने उपेक्षित सा जीवन जिया तथा ई.1883 में केवल 54 साल की उम्र में लंदन में मर गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगलों की दुर्दशा

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मुगलों की दुर्दशा

जो मुगल भारत के स्वामी होने का दावा करते थे, अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के बाद उन मुगलों की दुर्दशा अपने चरम पर पहुंच गई। उनमें से बहुत से तांगा चलाने लगे, जूतियां गांठने लगे और कुछ तो केवल भीख मांगकर खाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सके।

जब अंग्रेजों ने अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति को पूरी तरह कुचल दिया तब लाल किले की चांद सी सूरत वाली औरतें फटे पाजामे पहनकर सड़कों पर घूम रही थीं!

जब विलियम हॉडसन, जॉन निकल्सन तथा जनरल विल्सन दिल्ली को फिर से अपने अधिकार में ले रहे थे तब दिल्ली के हजारों हिन्दू और मुस्लिम परिवार दिल्ली छोड़कर निकटवर्ती जंगलों एवं गांवों में भाग गए थे। जब हॉडसन ने बादशाह को गिरफ्तार कर लिया तथा शहजादों को गोली मार दी तो 22 सितम्बर 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर अपना पूर्ण अधिकार होने की घोषणा कर दी।

इस घटना के कुछ महीनों बाद दिल्ली के परकोटे से बाहर रह रहे हिन्दू परिवारों को अनुमति दे दी गई कि वे फिर से दिल्ली में आकर रह सकते हैं किंतु मुस्लिम परिवारों को दिल्ली में आने की अनुमति नहीं दी गई। अंग्रेजों को अब भी उनसे खतरा अनुभव होता था। इस कारण दिल्ली के मुसलमान परिवार दिल्ली के परकोटे के बाहर झौंपड़ियां डालकर रहते रहे। ये झौंपड़ियां मुगलों की दुर्दशा का जीता-जागता प्रमाण थीं।

मिर्जा गालिब ने लिखा है- ‘पूरे शहर में एक हजार मुसलमान मिलने भी कठिन हैं। और उनमें से एक मैं हूँ। कुछ तो नगर से इतने दूर चले गए हैं कि लगता ही नहीं कि वे कभी यहाँ के निवासी थे। कुछ बहुत अहम लोग नगर के बाहर टीलों पर, छप्परों की झौंपड़ियों में या गड्ढों में निवास करते हैं। उन सुनसान स्थानों में रहने वालों में से अधिकतर वापस आना चाहते है।’

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भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार के विदेश राजनीतिक विभाग की एक पत्रावली में 31 दिसम्बर 1859 का एक एब्सट्रैक्ट ट्रांसलेशन लगा हुआ है जिसमें ‘ए पिटीशन फ्रॉम द मुसलमान्स ऑफ डेल्ही’ का अंग्रेजी भाषा में संक्षिप्त अनुवाद दिया गया है। इसमें कहा गया है कि-

‘ईस्वी 1859 में मुसलमानों ने ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को पत्र भेजकर अनुरोध किया कि मुसलमानों को दिल्ली शहर में अपने घरों में वापस आने दिया जाए। वे बहुत संकट में हैं। उन्हें बलपूर्वक शहर से निकाल दिया गया है। उनके पास न रहने को स्थान है और न जीवन निर्वाह के लिए कोई साधन। सर्दियां आने वाली हैं। दिल्ली के मुसलमानों की मलिका विक्टोरिया से यह इल्तजा है कि हमें इस तकलीफदेह और दयनीय हालत में बेतहाशा सर्दी सहन न करनी पड़े। हमें आशा है कि महारानी विक्टोरिया अन्य दयालु शासकों की तरह दिल्ली के मुसलमानों की गलतियां क्षमा करेंगी तथा उन्हें उनके पुराने घरों में लौटने देंगी। अन्यथा उनके पास भिक्षा मांगने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं होगा।’

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ईस्वी 1860 में महारानी विक्टोरिया की सरकार ने इन मुसलमानों को इस शर्त पर दिल्ली में प्रवेश करने की अनुमति प्रदान की कि वे ब्रिटिश सरकार के प्रति अपनी वफादारी का कोई लिखित प्रमाण या साक्ष्य प्रस्तुत करें। बहुत कम मुसलमान ऐसे थे जिनके पास कम्पनी सरकार के ब्रिटिश अधिकारियों के हाथ से लिखे हुए कोई पत्र, प्रमाणपत्र आदि उपलब्ध थे। अतः बहुत कम मुसलमानों को दिल्ली में प्रवेश करने की अनुमति मिल सकी। जो मुसलमान दिल्ली में नहीं आ सके, उनके घर सरकार ने नीलाम कर दिए।

विलियम डैलरिम्पल ने लिखा है- ‘ई.1860 में दिल्ली से गुजरने वाला एक पर्यटक उन मुरझाए हुए और खानाबदोशों जैसे दिखने वाले वृद्ध मुगलों को देखकर अचंभित रह गया जो अभी तक कुतुब मीनार के बाहर डेरे जमाए हुए थे। दिल्ली के पूर्व चीफ कमिश्नर चार्ल्स साण्डर्स की घमण्डी पत्नी मैटिल्डा साण्डर्स ने लिखा है कि बड़ी संख्या में लोग प्रतिदिन भूख या शरण न होने के कारण मर रहे हैं।’

मुफस्सिलाइट नामक एक समाचार पत्र ने जून 1860 के अंक में लिखा- ‘मुसलामनों के दिल्ली से बाहर रहने का कोई कारण नहीं है, लोग संकट में हैं क्योंकि वे भूखे मर रहे हैं। उन्हें नगर के बाहर निकाल दिया गया है और उनका सब कुछ लूट लिया गया है। हजारों मुसलमान बेघर और बेसरो-सामान घूम रहे हैं। हिन्दू अपनी फर्जी वफादारी पर फूले हुए सड़कों पर अकड़ते घूम रहे हैं। लोगों को अब यह नहीं सोचना चाहिए कि दिल्ली को पर्याप्त सजा नहीं मिली है। जरा उन खाली सड़कों पर जाकर देखें, जहाँ घास उग आई है। ढहा दिए गए घरों पर दृष्टिपात करें और गोलियों के निशानों से छिदे हुए महलों को देखें।’

मिर्जा गालिब ने जनवरी 1862 में अपने एक मित्र को पत्र लिखा- ‘दिल्ली में जो थोड़े बहुत मुसलमान बच गए हैं वे अब या तो कारीगर बन गए हैं, या फिर अंग्रेजों के नौकर। बहादुरशाह जफर की औलादें जो तलवारों के नीचे आने से बच गई हैं, पांच-पांच रुपया महीना पाती हैं। औरतों में जो बूढ़ी हैं, वे कुटनियां हैं और जो जवान हैं, वे तवायफ बन गई हैं।’

दिल्ली की मुगल औरतों के पतन का एक बड़ा कारण यह भी था कि अंग्रेजों को पक्का विश्वास था कि दिल्ली के मुगलों ने विद्रोह के दौरान अंग्रेज औरतों से बलात्कार किए थे। इसलिए जब दिल्ली उनके हाथ में आ गई तो उन्होंने मुगल औरतों को अपने बलात्कार की शिकार बनाया।

हालांकि चार्ल्स साण्डर्स ने जब इस आरोप की जांच की तो अपनी जांच रिपोर्ट में कहा- ‘मुगलों ने किसी भी अंग्रेज औरत के साथ बलात्कार नहीं किया था।’

अतः समझा जा सकता है कि अंग्रेजों की ओर से मुगलों पर यह निराधारा आरोप लगाया गया था किंतु इस मानसिकता के चलते अंग्रेज सिपाही दिल्ली पर कब्जा करने के बाद शाही हरम की तीन सौ बेगमों को उठाकर सैनिक शिविरों में ले गए और उनके साथ बलात्कार किए। बहुत सी औरतें पेट की आग बुझाने के लिए स्वयं ही वेश्यावृत्ति करने के लिए विवश हुई थीं।

जो अंग्रेज स्वयं को न्यायप्रिय एवं सभ्य कहते थे, उन्होंने मुगलों की दुर्दशा करने में मानवता की समस्त सीमाओं को लांघ दिया। गालिब ने अपने एक मित्र को लिखा- ‘आप यहाँ होते तो किले की औरतों को शहर में घूमते-फिरते देखते। चांद की सी उजली सूरतें और मैले कुचैले कपड़े, पाजामों के फटे पांयचे और टूटी-फूटी जूतियां। यही अब उनकी जिंदगी में शेष बचा है!’ मुगलों की दुर्दशा का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुसलमानों का षड़यंत्र

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मुसलमानों का षड़यंत्र

बाबर के बेटे भारत से निकाल दिए गए थे किंतु उनके जाने के बाद भी बरसों-बरस तक 1857 की क्रांति की समीक्षा होती रही। बहुत से अंग्रेज अधिकारियों का निष्कर्ष था कि अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति अंग्रेजों के विरुद्ध मुसलमानों का षड़यंत्र थी!

हालांकि अंग्रेजों द्वारा निकाला गया निष्कर्ष गलत था किंतु इसके पीछे यह धारणा काम कर रही थी कि व्रिदोही सैनिकों ने अजीमुल्ला को अपना प्रधान सेनापति चुना तथा बहादुर शाह जफर को भारत का बादशाह घोषित किया। बेगम हजरत महल की भूमिका ने भी अंग्रेजों को इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया।

अंग्रेजों का आरोप था कि मुसलमानों का षड़यंत्र इसलिए किया गया था कि इसकी आड़ में लाल किला फिर से भारत पर शासन करना चाहता था! हालांकि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दुओं ने अधिक बलिदान दिया था।

रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, ठाकुर कुशालसिंह, जगदीशपुर के जागीरदार कुंवरसिंह आदि सैंकड़ों जागीरदारों एवं हजारों हिन्दू सैनिकों ने स्वयं को राष्ट्रदेवी के चरणों में अर्पित किया था किंतु कानपुर तथा दिल्ली में मुसलमानों ने अंग्रेजों की बर्बरता पूर्वक हत्याएं कीं, इस कारण अंग्रेजों ने इस क्रांति को मुसलमानों का षड़यंत्र माना।

अधिकांश ब्रिटिश लेखकों ने 1857 की क्रांति को सैनिक विद्रोह, बगावत एवं गदर की संज्ञा दी है किंतु ईस्वी 1857-58 में भारत में उपस्थित कुछ अँग्रेज ऐसे थे जिनका मत था कि 1857 की क्रांति जनसाधारण द्वारा की गई असन्तोष की अभिव्यक्ति का एक उदाहरण थी।

ईसाई मिशनरी इस क्रांति को ‘गॉड द्वारा भेजी गई विपत्ति’ कहते थे, क्योंकि कम्पनी प्रशासन ने भारतीय प्रजा को ईसाई नहीं बना कर ‘गॉड’ को नाराज कर दिया था। कुछ अँग्रेज लेखकों ने इसे हिन्दुओं एवं मुसलमानों का ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का षड्यन्त्र बताया है।

सर जेम्स आउट्रम का मत है कि- ‘यह मुसलमानों के षड्यन्त्र का परिणाम था, जो हिन्दुओं की शक्ति के बल पर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे। स्मिथ ने भी इसका समर्थन किया है कि यह भारतीय मुसलमानों का षड्यन्त्र था जो पुनः मुगल बादशाह के नेतृत्व में मुस्लिम सत्ता स्थापित करना चाहते थे।’

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विद्रोह आरम्भ होने के कुछ समय बाद बहादुरशाह जफर की बेगम जीनत महल ने कुछ देशी शासकों को पत्र लिखे, जिनमें उसने मुगल बादशाह की अधीनता में, अँग्रेजों को देश से बाहर निकालने की बात लिखी। अतः जेम्स आउट्रम एवं स्मिथ के कथनों में कुछ सच्चाई प्रतीत होती है।

बहादुरशाह के मुकदमे के जज एडवोकेट जनरल मेजर जे. एफ. हैरियट ने मुकदमे में पेश हुए समस्त दस्तावेजों का अच्छी तरह से अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला- ‘आरम्भ से ही षड्यंत्र सिपाहियों तक सीमित नहीं था और न उनसे वह शुरू ही हुआ था, अपितु इसकी शाखाएं राजमहलों और शहरों में फैली हुई थीं।’

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यह सच है कि 1857 की क्रांति में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों ने अधिक बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था किंतु इस सच्चाई से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस क्रांति में देश के केवल 1/3 मुसलमानों ने भाग लिया था। बड़ी मुस्लिम शक्तियों में केवल अवध की बेगम जीनत महल तथा लाल किले का बादशाह बहादुरशाह ही इस क्रांति में सम्मिलित हुए थे। जबकि व्यापक फलक पर नाना साहब, झांसी की रानी, तात्या टोपे, कुंवरसिंह, अवध तथा बिहार के हिन्दू ताल्लुकेदारों एवं मारवाड़ के सामंतों ने क्रांति का वास्तिविक संचालन किया था। लॉर्ड केनिंग आरम्भ में इसे मुसलमानों द्वारा किया गया षड्यन्त्र मानते थे किंतु बाद में उन्होंने अपनी धारणा बदल ली। उन्होंने भारत सचिव को लिखे एक पत्र में स्वीकार किया- ‘मुझे कोई संदेह नहीं है कि यह विद्रोह ब्राह्मणों और दूसरे लोगों के द्वारा धार्मिक बहानों पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिये भड़काया गया था।’

क्रांति में सम्मिलित विभिन्न तत्वों की गतिविधियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि हिन्दू सेनानायक, विदेशी शासन से मुक्ति के लिये लड़े जिनमें से कुछ राजा एवं जागीरदार अपने राज्य फिर से अंग्रेजों से छीनना चाहते थे किंतु दिल्ली एवं लखनऊ के शासकों के साथ-साथ मुसलमानों के एक बड़े वर्ग ने बहादुरशाह के नेतृत्व में मुगल शासन की पुनर्स्थापना के लिये संघर्ष किया।

मराठा सैनिक नाना साहब और रानी लक्ष्मीबाई के राज्यों की पुनर्स्थापना के लिये लड़े। मेरठ आदि छावनियों के सैनिक अपने धर्म को बचाने की चिंता में लड़े। राजपूत ठिकानों के सैनिक अपने ठिकानेदारों के आदेश से लड़े। अधिकांश क्रांतिकारी सैनिकों ने अँग्रेजी शासन को समाप्त करने के लिये कुछ अँग्रेज अधिकारियों को मार डालना पर्याप्त समझा। उनके पास समस्त अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने की कोई योजना नहीं थी।

इतिहासकार मेलीसन के अनुसार- ‘1857 की क्रांति को ‘भारतीय जागीरदारों द्वारा अपने शासकों के विरुद्ध सामन्ती प्रतिक्रिया थी।’ इस मत को स्वीकार करने में यह आपत्ति है कि राजपूताने, अवध एवं बिहार के कुछ सामन्तों द्वारा संघर्ष में भाग लेने से पूरे विप्लव को सामन्तवादी प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता।

वास्तविकता यह थी कि अँग्रेजों की देशी रियासतों के प्रति नीति के फलस्वरूप अनेक सामन्त अपनी जागीरों से हाथ धो बैठे थे। इन लोगों के मन में अँग्रेजों के प्रति घृणा एवं क्रोध था। ऐसे सामन्तों ने क्रांतिकारियों का साथ देकर क्रांति फैलाने में योगदान दिया।

सर जॉन सीले के अनुसार- ‘1857 की क्रांति पूर्णतः गैर-राष्ट्रीय तथा स्वार्थी सैनिकों का विद्रोह था जिसका न कोई देशी नेतृत्व था और न जनता का सहयोग।’

सर जॉन लॉरेन्स ने ‘इसे केवल विद्रोह बताया और इसका प्रमुख कारण चर्बी वाले कारतूस को माना।’

पी. ई. राबर्ट्स ‘इसे विशुद्ध सैनिक विद्रोह मानते थे।’

वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘यह एक शुद्ध रूप से सैनिक विद्रोह था जो संयुक्त रूप से भारतीय सैनिकों की अनुशासनहीनता और अँग्रेज सैनिक अधिकारियों की मूर्खता का परिणाम था।’

इस प्रकार लगभग समस्त विदेशी इतिहासकार इसे एक सैनिक विद्रोह मानते हैं।

डॉ. ताराचन्द ने लिखा है- ‘यह क्रांति अशक्त वर्गों द्वारा अपनी खोई हुई सत्ता को पुनः प्राप्त करने का अन्तिम प्रयास था। यह वर्ग ब्रिटिश नियन्त्रण से मुक्ति पाना चाहता था, क्योंकि अँग्रेजों की नीतियों से इस वर्ग के लोगों के हितों को हानि पहुँच रही थी।’

ब्रिटेन के प्रसिद्ध राजनेता तथा बाद में प्रधानमंत्री बने बैंजामिन डिजरायली ने 27 जुलाई 1857 को हाउस ऑफ कॉमंस में कहा था- ‘यह आंदोलन एक राष्ट्रीय विद्रोह था न कि सैनिक या सिपाही विद्रोह।’

इतिहासकार ग्रिफिन ने लिखा है- ‘भारत में सन् 1857 की क्रान्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण घटना कभी नहीं घटी।’

रशब्रुक विलियम ने लिखा है- ‘एक रक्त की नदी ने कम से कम उत्तरी भारत में दो जातियों को अलग-अलग कर दिया तथा उस पर पुल बाँधना एक कठिन कार्य ही था।’

डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘सन् 1857 का महान् विस्फोट भारतीय शाासन के स्वरूप और देश के भावी विकास में मौलिक परिवर्तन लाया।’

भारत एवं ब्रिटेन के इतिहासकार एवं राजनीतिज्ञ भले ही 1857 की क्रांति को कुछ भी संज्ञा दें किंतु हमारी दृष्टि में वास्तविकता यह है कि- ‘यह भारतीय इतिहास की सबसे गौरवमयी घटनाओं में से एक थी। इसके क्रांतिकारी युगों तक भारतीयों को स्वाभिमान से जीने एवं स्वतंत्र बने रहने की प्रेरणा देते रहेंगे।’

स्पष्ट है कि यह क्रांति भारत का स्वातंत्र्य समर थी न कि मुसलमानों का षड़यंत्र! इस क्रांति के परिणाम अभूतपूर्व, व्यापक और स्थायी थे जिनमें से एक यह भी था कि लाल किला सदैव के लिए भारत के इतिहास के नेपथ्य में चला गया। यह आश्चर्यजनक ही था कि भारत के अंग्रेज अधिकारी शीघ्र ही इस क्रांति के घावों को भूल गए और फिर से भारतीयों का रक्तपान करने में लग गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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सन् सत्तावन का विप्लव

अठ्ठारह सौ सत्तावन की सैनिक क्रांति को सन् सत्तावन का विप्लव भी कहा जाता है। इस क्रांति के सम्बन्ध में इतिहासकारों की अलग-अलग मान्यताएं हैं। अंग्रेजों के लिए यह बगावत थी तो हिन्दुओं के लिए क्रांति। वीर सावरकर ने कहा यह विद्रोह नहीं था, भारत का प्रथम स्वातंत्र्य समर था!

कांग्रेस का इतिहास लिखने वाले कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया के अनुसार- ‘1857 का महान् आन्दोलन भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था।’

अशोक मेहता ने अपनी पुस्तक द ग्रेट रिवोल्ट में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि- ‘यह एक राष्ट्रीय विद्रोह था।’

पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘यह केवल सैनिक विद्रोह नहीं था। यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था किंतु यह शीघ्र ही जन-विद्रोह के रूप में परिणित हो गया था।’

इंग्लैण्ड के सांसद बैंजामिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इसे ‘राष्ट्रीय विद्रोह’ कहा था।

सुरेन्द्रनाथ सेन ने लिखा हैं- ‘जो युद्ध धर्म के नाम पर प्रारम्भ हुआ था, वह स्वातन्त्र्य युद्ध के रूप में समाप्त हुआ, क्योंकि इस बात में कोई सन्देह नहीं कि विद्रोही, विदेशी शासन से मुक्ति चाहते थे और वे पुनः पुरातन शासन व्यवस्था स्थापित करने के इच्छुक थे, जिसका प्रतिनिधित्व दिल्ली का बादशाह करता था।’

जो विद्वान इसे स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं, उनका तर्क है कि- ‘इस संग्राम में हिन्दुओं और मुसलमानों ने कन्धे-से-कन्धा मिलाकर समान रूप से भाग लिया और इस संग्राम को जनसाधारण की सहानुभूति प्राप्त थी। अतः इसे केवल सैनिक विप्लव या सामन्तवादी प्रतिक्रिया अथवा मुस्लिम षड्यन्त्र नहीं कहा जा सकता।’

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सैनिकों ने विद्रोह आरम्भ किया था और वे अन्त तक लड़ते रहे किन्तु उनके साथ लाखों अन्य लोगों ने भी भाग लिया। इस संग्राम में मरने वालों की संख्या में जनसाधारण की संख्या, सैनिकों की संख्या से अधिक थी। अनेक स्थानां पर जनता ने ही सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रोत्साहित किया तथा जिन लोगों ने या नरेशों ने अँग्रेजों का पक्ष लिया, जनता ने उनका सामाजिक बहिष्कार किया।

जब जनरल ब्लॉक को अपनी सेना के साथ एक नदी पार करनी थी तो किसी नाविक ने उसे नाव नहीं दी। कानपुर के मजदूरों ने अँग्रेजों के लिए काम करने से मना कर दिया। विद्रोह आरम्भ होने के बाद जब उदयपुर का पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल शॉवर्स महाराणा से मिलने उनके महल की ओर जा रहा था, तब आम जनता ने उसे कर्कश स्वरों से धिक्कारा।

जोधपुर में कर्नल मॉकमेसन की हत्या कर दी गई। कोटा में मेजर बर्टन का सिर काट दिया गया तथा महाराजा को विद्रोहियों ने तब तक घेरे रखा, जब तक कि उसने क्रांतिकारी सैनिकों को सहयोग देने का वचन नहीं दिया। कुछ नरेशों ने जनमत के दबाव में आकर, विद्रोहियों को शरण दी। इन तथ्यां के आधार पर शशि भूषण चौधरी ने ‘इसे सामान्य जनता का विद्रोह बताया।’

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डॉ. आर. सी. मजूमदार के अनुसार- ‘सन् सत्तावन का विप्लव राष्ट्रीय युद्ध स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि नागरिकों का विद्रोह अत्यंन्त ही सीमित क्षेत्र में था। देश का अधिकांश भाग इसमें सम्मिलित नहीं हुआ था तथा अधिकांश देशी नरेशों ने अँग्रेजों का साथ दिया था। सिक्ख और गोरखा सेनाओं ने अँग्रेजों की भरपूर सहायता की थी। विप्लव काल में ऐसे उदाहरण भी थे जब भारतीयों ने अपना जीवन खतरे में डालकर अँग्रेज स्त्रियों, पुरुषों व बच्चों की रक्षा की थी। इसीलिये यह विद्रोह न तो राष्ट्रीय था और न स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम था।’

1857 के विप्लव का स्वरूप निर्धारित करते समय यह देखना होगा कि इस संघर्ष में भाग लेने वालों का दृष्टिकोण क्या था! भारतीय क्रांतिकारी, अँग्रेजों को फिरंगी कहते थे क्योंकि वे फॉरेन (वितमपहद) अर्थात् विदेश से आये थे। सारे देश में अँग्रेज विरोधी भावनाएं व्याप्त थीं। समस्त क्रांतिकारियों तथा जनसाधारण का एक ही लक्ष्य था- अँग्रेजों को भारत से निकालना।

तात्या टोपे जहाँ भी गया, सेना तथा जनता ने उसका स्वागत किया तथा रसद आदि से सहायता की। विद्रोहियों को संगठित करने वाला एकमात्र तत्त्व विदेशी शासन को समाप्त करने की भावना ही था। इसके विपरीत अँग्रेज अधिकारी जहाँ भी गये, जनता ने उन्हें धिक्कारा व गालियां दीं। इससे स्पष्ट है कि अँग्रेजों के विरुद्ध रोष राष्ट्र-व्यापी था।

यदि हम तत्कालीन भारतीय साहित्य पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि उस समय का साहित्य भी अँग्रेज विरोधी भावना प्रदर्शित करता है। जिन लोगों ने विप्लव में भाग लिया अथवा विप्लवकारियों को शरण एवं सहायता दी, उनकी प्रशंसा में गीतों की रचना की गई। जिन्होंने अँग्रेजों का साथ दिया, उन्हें कायर कहा गया, सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी कविता ‘बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी’ में ग्वालियर के सिंधिया राजा का नाम ऐसे ही लोगों में रखा है।

कुछ इतिहासकारों ने सन् सत्तावन का विप्लव महत्त्वहीन सिद्ध करने के लिए मत प्रकट किया है कि यह बहुत कम क्षेत्र में फैली। जबकि तथ्य यह है कि यह क्रांति बंगाल, बिहार, पंजाब, दिल्ली, संयुक्त प्रांत, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र एवं दक्षिण भारत सहित भारत के समस्त प्रमुख स्थानों पर घटित हुई।

भारत में इतनी व्यापक क्रांति इससे पहले कभी नहीं हुई थी। इस कारण इस क्रांति के राष्ट्रीय स्वरूप को नकारा नहीं जा सकता। निःसंदेह यह भारत की स्वतंत्रता के लिये लड़ा गया संग्राम था जिसमें देश के लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

इन विचारों से बिल्कुल अलग हटकर ईस्वी 1909 में सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी वीर विनायक दामोदर सावरकर ने इस राष्ट्रव्यापी घटना को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए आयोजित प्रथम संग्राम कहा। इस प्रकार इस क्रांति के सम्बन्ध में अलग-अलग मत स्थापित हो गये हैं। ईस्वी 1957 में स्वतंत्र भारत में 1857 की क्रांति की पहली शताब्दी मनाई गई। इस अवसर पर भारत सरकार की ओर से तथा अन्य शोधकार्ताओं द्वारा इस क्रांति पर पुनः विचार किया गया।

सुरेन्द्रनाथ सेन ने अपनी पुस्तक एटीन फिफ्टी सेवन में लिखा है- ‘यह आन्दोलन एक सैनिक विद्रोह की भांति आरम्भ हुआ किन्तु केवल सेना तक सीमित नहीं रहा। सेना ने भी पूरी तरह विद्रोह में भाग नहीं लिया। इसे मात्र सैनिक विप्लव कहना गलत होगा।’

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की काउ तहसील के भदोही परगने के मुसाई सिंह का जन्म ई.1836 में हुआ था। उसे 1857 की क्रांति में भाग लेने के अपराध में अण्डमान जेल में ठूंस दिया गया। वह 50 वर्ष तक इस जेल में बंद रहा। अंत में ई.1907 में उसे जेल से मुक्त किया गया। उस समय वह 1857 की क्रांति में भाग लेना वाला अंतिम जीवित व्यक्ति था!

इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि सन् सत्तावन का विप्लव भले ही अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया किंतु यह राष्ट्रीय गौरव का विषय था जिस पर हम सदियों तक गर्व करते रह सकते हैं!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाल किले की विफलता

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लाल किले की विफलता

अठ्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति की विफलता वस्तुतः लाल किले की विफलता थी। लाल किले में बैठे बादशाह को शक्ति का स्रोत मानकर क्रांतिकारियों ने उसे अपना नेता चुना किंतु उन्हें पता नहीं था कि लाल किला बिल्कुल लुंज-पुंज और निशक्त है। वह तो विगत लगभग एक सौ साल से अंग्रेजों की पेंशन पर जी रहा है! यही कारण था कि लाल किला क्रांति की देवी को शौर्य-रक्त का अर्पण नहीं कर सका!

अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए 1857 में जो राष्ट्रव्यापी क्रांति हुई, वह सफल क्यों नहीं रही, इसके अगल-अलग कारण बताए गए हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार क्रांति के लिये सम्पूर्ण भारत में 31 मई 1857 का दिन निर्धारित किया गया था। संयोगवश 29 मार्च 1857 को मंगल पाण्डे ने बैरकपुर में विद्रोह कर दिया। इसके कुछ दिनों बाद अंग्रेजों की सबसे बड़ी सैनिक छावनी बैरकपुर क्रांति की ज्वाला में जल उठी।

3 मई 1857 को लखनऊ में भी गाय की चर्बी लगे कारतूसों का उपयोग करने के विषय पर सैनिक विद्रोह हो गया, जिसे अंग्रेजों द्वारा दबा दिया गया। जब यह समाचार मेरठ पहुँचा तो 10 मई 1857 को मेरठ में भी विद्रोह हो गया। इस कारण क्रांति की योजना उसके पूर्णतः आरम्भ होने से पहले ही उजागर हो गई।

इससे अँग्रेजों को संभलने का अवसर मिल गया। मेलीसन ने लिखा है- ‘यदि पूर्व निश्चय के अनुसार 31 मई 1857 को एक साथ समस्त स्थानों पर स्वाधीनता का व्यापक और महान् संग्राम आरम्भ हुआ होता तो कम्पनी के अँग्रेज शासकों के लिए भारत को फिर से विजय कर सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं होता।’

मेरठ और दिल्ली के विद्रोही सैनिकों ने मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को अपना नेता बनाया किन्तु क्रांति और युद्ध जैसे शब्दों से अपरिचित, बूढ़े, निराश और थके हुए बहादुरशाह से सफल सैन्य-संचालन एवं क्रांति के नेतृत्व की आशा करना व्यर्थ था।

सिक्ख और अधिकांश हिन्दू उसे फिर से बादशाह बनाने को तैयार नहीं थे! क्योंकि उउन्हें आशंका थी कि लाल किले की विफलता सम्पूर्ण क्रांति को विफल कर देगी। किंतु ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मुस्लिम सिपाहियों ने उसे जबर्दस्ती अपना नेतृत्व सौंपा। वास्तव में इस गौरवमयी क्रांति की सबसे कमजोर कड़ी बहादुरशाह ही था।

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दिल्ली के अनेक साहूकारों और निकटवर्ती हरियाणा क्षेत्र के सैनिक अधिकारियों ने अंग्रेजों के लिए मुखबरी काने का कार्य किया। उन्हें बादशाह के मुसलमानी राज्य की जगह अँग्रेजों का राज ही अधिक अच्छा लगता था। यहाँ तक कि लाल किले में बैठे बहुत से मुसलमानों ने बादशाह के साथ गद्दारी की जिनमें मिर्जा इलाही बख्श तथा मौलवी रजब अली जैसे गद्दार प्रमुख थे। इस क्रांति में सबसे खराब प्रदर्शन लाल किले का रहा।

लाल किले की विफलता में मुगल हरम की बेगमों का भी बड़ा हाथ था। बादशाह की चहेती बेगम जीनत महल भी बादशाह की जीत नहीं चाहती थी। वह चाहती थी कि बादशाह जल्दी से जल्दी पराजित हो जाए तथा उसके समस्त बड़े शहजादे मारे जाएं ताकि वह अपने बेटे जवांबख्त को बादशाह बनवा सके।

भारत के प्रायः समस्त प्रभावशाली नरेशों ने इस क्रांति का दमन करने में अँग्रेजों का साथ दिया, विशेषतः उन राजाओं ने जिनके राज्य एवं पेंशनें सुरक्षित थे। सिन्धिया के मन्त्री दिनकर राव तथा निजाम के मन्त्री सालारजंग ने अपने-अपने राज्य में क्रांति को फैलने से रोका।

विद्रोह काल में स्वयं लॉर्ड केनिंग ने कहा था- ‘यदि सिन्धिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाये तो मुझे कल ही बिस्तर गोल करना पड़ जाये।’ राजपूताना के लगभग समस्त नरेशों ने अँग्रेजों की भरपूर सहायता की।’

राजपूताना, मैसूर, पंजाब और पूर्वी बंगाल आदि प्रदेशों के लगभग सभी शासक शान्त रहे। इनमें से कोई भी राजा, अँग्रेजों को भगाकर भारत को फिर से मुगलों और मराठों को समर्पित करने का इच्छुक नहीं था। यहाँ तक कि महाराष्ट्र, मध्य भारत और गुजरात का कोई बड़ा शासक क्रांति में सम्मिलित नहीं हुआ। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि भारत के कुछ बड़े राजाओं ने मिलकर अँग्रेजों के विरुद्ध व्यूह-रचना की होती तो अँग्रेजों को भारत छोड़कर चले जाना पड़ता। जिन छोटे नरेशों, सेनापतियों तथा सामन्तों ने क्रांतिकारियों का साथ दिया, वे अलग-अलग रहकर अपने क्षेत्रों में अँग्रेजों से लड़ते रहे। इस कारण अँग्रेजों ने उन्हें एक-एक करके परास्त किया।

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इस क्रांति के समय सिक्खों ने ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया। वे किसी भी कीमत पर मुगल बादशाह का समर्थन करने को तैयार नहीं थे क्योंकि मुगल बादशाहों ने गुरु अर्जुनदेव सिंह, गुरु तेग बहादुर और बंदा बहादुर को बरेहमी से मरवाया था। सिक्ख, उस बंगाल सेना से भी प्रतिशोध लेना चाहते थे जिसने सिक्ख-आंग्ल-युद्धों में अँग्रेजों का साथ दिया था। इन कारणों से सिक्ख, अँग्रेजों के प्रति वफादार रहे।

हालांकि सिक्खों का यह निर्णय बहुत आश्चर्यजनक था क्योंकि अँग्रेजों ने केवल 8 साल पहले ई.1849 में ही सिक्खों के स्वतंत्र राज्य को समाप्त करके ब्रिटिश क्षेत्र में मिलाया था। इस दृष्टि से सिक्खों को अँग्रेजों से बदला लेना चाहिये था किंतु सिक्खों ने अँग्रेजों के लिये दिल्ली और लखनऊ जीतकर सैनिक क्रांति की कमर तोड़ दी। सिक्खों ने इस बात पर भी विचार नहीं किया कि कुछ दिन पहले ही अँग्रेजों ने महाराजा रणजीतसिंह की महारानी जिंदां कौर की वार्षिक पेंशन अचानक 15,000 पौण्ड वार्षिक से घटाकार 1,200 पौण्ड प्रति वर्ष कर दी थी।

इतिहासकारों का आकलन है कि यदि पटियाला, नाभा व जीन्द ने ठीक समय पर अँग्रेजों की सहायता न की होती तो क्रांति का परिणाम कुछ और होता। इसी प्रकार गोरखों ने अपने सेनापति जंग बहादुर की अधीनता में अवध पर आक्रमण करके अँग्रेजों की सहायता की तथा क्रांति को विफल कर दिया। विद्रोही सैनिकों को ठीक तरह से संचालित कर सकने वाला कोई योग्य नेता उपलब्ध नहीं था। नाना साहब, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, आउवा ठाकुर कुशालसिंह, शाहपुरा का शासक लक्ष्मणसिंह, जगदीशपुर का जमींदार कुंवरसिंह जैसे नेता समग्र क्रांति का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं थे।

1857 की सैनिक क्रांति को देश के बहुत से हिस्सों में जनता का समर्थन मिला किंतु कृषक एवं श्रमिक जनता इससे प्रायः उदासीन रही। इस कारण यह क्रान्ति जन-क्रान्ति नहीं बन सकी। अनेक स्थानों पर क्रांतिकारियों ने लूट-पाट मचाकर जनसाधारण की सहानुभूति खो दी।
विद्रोहियों द्वारा जेलों को तोड़ देने से पेशेवर चोर और लुटेरे बाहर निकल आये जिससे अराजकता फैल गई। इस कारण जन-सामान्य ने इस क्रांति को बहुत कम स्थानों पर सहयोग दिया। अँग्रेजी पढ़े लिखे युवकों का इस क्रांति से कोई लेना-देना नहीं था।

क्रांति के प्रत्यक्षदर्शी अंग्रेज अधिकारी एवं लेखक सर जी. ओ. ट्रैवेलियन ने लिखा है- ‘अँग्रेजों के गले काटने की बात सोचने की बजाये वे उनके साथ उच्च न्यायालय में या मजिस्ट्रेटों की कुर्सियों पर बैठने का स्वप्न देख रहे थे। वे पंजाब और नेपाल की राजनीति पर अटकल लड़ाने की बजाय फ्री-प्रेस और मुक्त वाद-विवाद की भलाइयों पर सोच रहे थे और वे वाद-विवाद सभाओं में लच्छेदार अँग्रेजी में व्याख्यान देने का स्वप्न देख रहे थे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दो गज जमीन

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दो गज जमीन

जब अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को लाल किले से निकाल कर भारत की मुख्य भूमि से दूर फैंकने का निश्चय किया तो बहादुर शाह जफर की आखिरी इच्छा भारत भूमि पर दो गज जमीन में गाढ़े जाने के रूप में प्रकट हुई किंतु अब भारत में उसे और उसके वंशजों को दो गज जमीन किसी भी कीमत पर नहीं मिल सकती थी।

हमने इस धारवाहिक की 218वीं कड़ी में बहादुरशाह जफर तथा उसके परिवार को अंग्रेज अधिकारियों द्वारा रात के अंधेरे में बैलगाड़ियों एवं पालकियों में बैठाकर लाल किले से निकाले जाने की चर्चा की थी। एक बार फिर हम बहादुरशाह जफर के काफिले की तरफ चलते हैं जो बड़ी शांति के साथ दिल्ली से रंगून की तरफ बढ़ रहा है।

बैलगाड़ियों एवं पालकियों में यात्रा कर रहा यह काफिला जब कानपुर रेलवे स्टेशन के निकट से होकर गुजरा तो इन लोगों ने जीवन में पहली बार एक ‘ट्रेन’ को देखा जिसमें भाप का इंजन लगा हुआ था और बहुत से लोग ट्रेन में उतर-चढ़ रहे थे। रेल्वे स्टेशन पर एक बैण्ड वादक समूह ‘इंग्लिशमैन’ की धुन बज रहा था।

बादहशाह ने बड़ी हैरत से इस नए उभरते हुए हिंदुस्तान को देखा जो ट्रेन में बैठकर यात्रा कर रहा था और अंग्रेजी बाजा सुन रहा था। उभरते हुए नए भारत में किलों, घोड़ों, तलवारों एवं पालकियों का समय पीछे छूट रहा था और पिस्तौलों से लेकर बम बरसाने वाली तोपों तथा ट्रेनों का समय आ गया था किंतु इस हिंदुस्तान में बाबर के बेटों के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्हें अब रंगून में अपना भविष्य तलाशना था।

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इलाहाबाद में इन लोगों को बैलगाड़ियों एवं पालकियों से उतारकर ‘स्टीमर’ में बैठाया गया। बाबर के इन दुर्भाग्यशाली बेटों ने जीवन में पहली बार भाप से चलने वाला स्टीमर देखा। शाही परिवार को गंगाजी के रास्ते ही कलकत्ता तक ले जाया गया। इस समय अवध का निर्वासित नवाब वाजिद अली शाह तथा मैसूर के शासक टीपू सुल्तान का उत्तराधिकारी भी कलकत्ता में ही नजरबंद किए हुए थे। शाही कैदियों को 4 दिसम्बर 1858 को प्रातः 10 बजे कलकत्ता में एक जंगी जहाज में चढ़ाया गया और वे लोग लेफ्टिनेंट ओमैनी के नेतृत्व में तुरंत बर्मा के लिए चल पड़े। बाबर के बेटों ने पहली बार अंग्रेजों के जंगी जहाज के दर्शन किए। यह इतना विशाल था और इसमें इतने सारे घोड़े, गाय, बैल, मुर्गियां, सूअर तथा इंसान लदे हुए थे जिन्हें देखकर अचम्भा होता था!

जब यह जंगी जहाज रंगून पहुंचा तो लेफ्टीनेंट ओमैनी को यह देखकर खीझ हुई कि भारत से बंदी बनाकर लाए गए बादशाह और उसकी मलिकाओं को देखने के लिए बर्मा के बहुत सारे लोग रंगून के बंदरगाह पर खड़े हुए थे। जाने कैसे इन लोगों को बादशाह को रंगून लाए जाने का समाचार मिल गया था!

इन लोगों को श्वे डागोन नामक एक पगोडा के निकट एक छोटे से मकान में ले जाकर बंद कर दिया गया। कुछ दिनों बाद उन्हें एक अन्य घर में स्थानांतरित कर दिया गया। अब शाही परिवार का जीवन इसी जेल में सीमित था जिसे वे अपना नया महल या नया मकान या नया ठिकाना कह सकते थे!

बहादुरशाह जफर उर्दू का अच्छा शायर था। गालिब, दाग, मोमिन और जौक के सान्निध्य के कारण उसकी कविता उन्हीं कवियों के स्तर की हो गई थी। कुछ अंग्रेज अधिकारियों ने अपनी डायरियों में लिखा है कि जब बहादुरशाह जफर को लाल किले की गंदी कोठरी में बंद कर दिया गया था तब बहादुरशाह जफर जली हुई तीलियों से कविताएं लिखा करता था। जब ई.1857 में भारत का प्रथम स्वातंत्र्य समर लड़ा गया तो उस दौरान दिल्ली में मची अफरा-तफरी में जफर की अधिकांश कविताएं नष्ट हो गईं। उसकी बची हुई कविताओं को ‘कुल्लिया-इ-जफर’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया।

कहते हैं कि एक बार उर्दू जानने वाले एक अंग्रेज ने बहादुरशाह पर व्यंग्य किया-

दम दमे में दम नही अब खैर मांगो जान की,
अय जफर ठण्डी हुयी शमशीर हिन्दुस्तान की।
इस पर बहादुरशाह जफर ने उसे जवाब दिया-
गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की,
तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।

रंगून पहुंचकर भी बहादुरशाह कविताएं लिखता रहा। रंगून में लिखी हुई उसकी एक गजल बहुत प्रसिद्ध हुई। जिसके दो शेर इस प्रकार हैं-

दिन ज़िन्दगी के ख़त्म हुए शाम हो गई,
फैला के पाँव सोएँगे कुंज-ए-मज़ार में।
कितना है बदनसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए,
दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।

रंगून पहुंचने के बाद बहादुरशाह लगभग 5 साल तक जीवित रहा। दुर्भाग्यवश उसे गंभीर पक्षाघात हुआ। कुछ समय बाद उसके शरीर पर दूसरा पक्षाघात हुआ। 6 नवम्बर 1862 को बहादुरशाह जफर के शरीर पर तीसरा पक्षाघात हुआ और 7 नवंबर 1862 को प्रातः 5 बजे रंगून में बाबरी खानदान के आखिरी बादशाह का निधन हो गया! अंग्रेजों ने निश्चय किया कि बहादुरशाह का शव ऐसी जगह दफ़नाया जाए जहाँ कोई उसे ढूंढ न पाए। इसलिए श्वेडागोन पैगोडा के निकट शाम चार बजे उसे चुपचाप दफ़ना दिया गया। उसके साथ ही भारत में दो गज जमीन पाने का सपना भी दफ्न हो गया। जब उसके शव को दफ्न किया गया तब उसके दो शहजादे और एक कर्मचारी मौजूद था।

बहादुरशाह ज़फ़र चाहता था कि उसे दिल्ली के महरौली में दफ़्न किया जाए किंतु अंग्रेजों ने उसकी यह इच्छा पूरी नहीं होने दी। कुछ दिनों में बहादुरशाह ज़फ़र की कब्र के आसपास घास उग गयी और लोग भूल गए कि रंगून में कभी जफर नामक कोई बादशाह रहता था। यह अलग बात है कि भारत, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में आज भी कई सड़कों के नाम बहादुरशाह जफर के नाम पर हैं।

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17 जुलाई 1886 को 94 वर्ष की आयु में रंगून में ही बेगम जीनत महल की मृत्यु हुई। विलियम डेरिम्पल ने अपनी किताब ‘द लास्ट मुग़ल’ में लिखा है- ‘जिस समय बहादुरशाह ज़फ़र की बेगम ज़ीनत महल की मौत हुई, तब तक लोग यह भूल चुके थे कि बहादुरशाह ज़फ़र की कब्र कहाँ थी। इसलिए बेगम के शव को अनुमान से उसी परिसर में एक पेड़ के निकट दफना दिया गया। जीनत महल का एक पोता भी रंगून में मरा। उसे भी अपने दादा-दादी की कब्र के पास दफनाया गया।’

ईस्वी 1905 में मुग़ल बादशाह की कब्र की पहचान और उसे सम्मान देने के लिए रंगून के मुसलमान समुदाय ने आवाज़ उठाई। लगभग दो सालों तक चले आंदोलन के बाद ई.1907 में रंगून की ब्रिटिश सरकार ने बहादुरशाह तथा जीनत महल की कब्रों पर पत्थर लगवाने को स्वीकृति दी। बादशाह की कब्र पर एक पत्थर लगवाया गया जिस पर लिखा गया-

बहादुरशाह, दिल्ली के पूर्व बादशाह, रंगून में 7 नवंबर 1862 में मौत, इस जगह दफ्न किए गए थे।’

इसके बाद फिर से लोग इन कब्रों को भूल गए। ब्रिगेडियर जसबीर सिंह ने लिखा है- ‘ई.1991 में इस इलाके में एक नाले की खुदाई के दौरान ईंटों से बनी एक कब्र मिली जिसमें एक पूरा कंकाल लेटा हुआ था। लोगों का मानना है कि यही बाबर का आखिरी वंशज बहादुरशाह जफर था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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