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पहरे दर पहरे (103)

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– ‘शहजादे!’ एक फुसफुसाहट सी सलीम के कानों में पड़ी। उसने इधर-उधर देखा किंतु कोई दिखाई नहीं दिया। बाहर शाम घिर आई थी तथा कमरे में इतना कम प्रकाश था कि उसमें कुछ भी स्पष्ट देखना संभव नहीं था।

– ‘इधर देखो, इधर।’ सलीम ने फिर दृष्टि घुमाई किंतु कुछ भी दिखायी नहीं दिया।

– ‘इधर पर्दे के पीछे देखो शहजादे।’ फुसफुसाहट दुबारा उभरी। सलीम के कमजोर शरीर में इतनी जान नहीं रही थी कि वह बिना सहारे के स्वयं चल कर पर्दे तक जा सके। दस दिन से शराब की एक बूंद भी नहीं मिली थी। उसे आज ही स्नानागार से बाहर निकाला गया था। इस सब के बावजूद अज्ञात भय ने सलीम को पर्दे तक जाने के लिये विवश किया।

– ‘कौन हो तुम?’ पर्दे के पीछे छिपे हुए आदमी को देखकर सलीम ने पूछा।

– ‘ शश्श्श्………..। धीरे बोलो शहजादे किसी ने सुन लिया तो अनर्थ हो जायेगा।’ पर्दे के पीछे छिपे हुए व्यक्ति ने शहजादे के होठों पर हाथ रख दिया।

– ‘लेकिन तुम हो कौन और क्या चाहते हो?’ सलीम ने पूछा।

– ‘मैं आपके विश्वस्त मित्र उमराव रामसिंह कच्छवाहे का सेवक हूँ।’

– ‘तुम यहाँ छिपकर क्यों खड़े हो?’

– ‘क्योंकि मैं राजा शालिवाहन का पहरा तोड़कर चुपके से यहाँ पहुँचा हूँ।’

– ‘तो क्या कमरे के बाहर अब भी शालिवाहन का पहरा है?’

– ‘हाँ।’

– ‘तो तुम पहरा तोड़ कर क्यों आये, क्या तुम्हें अनुमति नहीं दी गयी?’

– ‘मैंनेअनुमति मांगी ही नहीं।’       

– ‘लेकिन क्यों?’

– ‘क्योंकि मैं आपसे गुप्त वार्तालाप करने की इच्छा रखता हूँ।’

– ‘कैसा गुप्त वार्तालाप?’

– ‘मेरे स्वामी ने मुझे आदेश दिया है कि मैं उनका संदेश आप तक पहुँचाऊँ।’

– ‘कैसा संदेश?’

– ‘मेरे स्वामी ने कहलवाया है कि बादशाह सलामत बुरी तरह से बीमार हैं, ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र दे लेकिन स्थिति बहुत खराब है। किसी भी समय कुछ भी हो सकता है।’

– ‘लेकिन यह बात मुझे छुप कर क्यों बताई जा रही है?’

– ‘क्योंकि बादशाह की बीमारी की बात बहुत गुप्त रखी जा रही है और केवल कुछ ही लोग जानते हैं।’

– ‘लेकिन क्यों?’

– ‘क्योंकि राजा मानसिंह और खाने आजम कोका नहीं चाहते कि यह समाचार आप तक पहुँचे।’

– ‘क्यों?’

– ‘क्योंकि राजा मानसिंह और खाने आजम कोका, बादशाह सलामत की इच्छानुसार शहजादे खुसरो को हिन्दुस्थान का ताज सौंपने की तैयारियों में लगे हुए हैं।’

– ‘तो फिर तुम मुझे यह सब क्यों बता रहे हो?’

– ‘शहजादे! समझने का प्रयास कीजिये। मैं आपके मित्र कच्छवाहा सरदार रामसिंह का सेवक हूँ। राजा मानसिंह का नहीं।’

– ‘रामसिंह क्या चाहता है?’

– ‘मेरे स्वामी आपको आगरा के तख्त पर बैठा हुआ देखना चाहते हैं।’

– ‘क्यों?’

– ‘यह तो वही जानें, मैं तो उनका संदेशवाहक मात्र हूँ।’

– ‘बादशाह सलामत की इच्छा के विरुद्ध रामसिंह मुझे किस तरह आगरा का ताज सौंपेगा?’

– ‘उन्होंने एक योजना तैयार की है। जिस तरह बादशाह सलामत के चारों ओर राजा मानसिंह का पहरा है, उसी तरह महलों के बाहर मेरे स्वामी रामसिंह ने अपना पहरा बैठा दिया है। उनके सिपाही बड़ी संख्या में फतहपुर सीकरी तथा आगरा के चारों ओर सिमट आये हैं। यदि मानसिंह ने आपको गिरफ्तार किया तो भी वह आपको महल से बाहर नहीं ले जा सकेगा।’

– ‘लेकिन उसने मेरी इस महल के भीतर हत्या कर दी तो?’

– ‘नहीं। राजा मानसिंह हिन्दू है, वह अपने बहनोई की हत्या कदापि नहीं करेगा।’

– ‘लेकिन अब मानबाई तो मर चुकी है और इस बात को लेकर वह मुझसे कई बार झगड़ा भी कर चुका है।’

– ‘फिर भी वह किसी भी सूरत में आपकी हत्या का प्रयास नहीं करेगा और न ही किसी और को करने देगा।’

– ‘लेकिन उसने मुझे कैद किया तो?’

– ‘ऐसी सूरत में मेरे स्वामी रामसिंह अपने आदमियों सहित महलों में प्रवेश करेंगे और आपको मुक्त करवाने का प्रयास करेंगे।’

– ‘अच्छा ठीक है। मुझे क्या करना है?’

– ‘आपको किसी तरह बादशाह सलामत तक पहुँचना है।’

– ‘इसमें क्या कठिनाई है? मैं अभी बादशाह सलामत की सेवा में जाता हूँ।’

– ‘बादशाह सलामत के महल के चारों ओर राजा मानसिंह का कड़ा पहरा है। वह आपको किसी भी हालत में बादशाह तक नहीं पहुँचने देगा।’

– ‘तो फिर?’

– ‘आप सलीमा बेगम से मिलने का प्रयास कीजिये और उनके माध्यम से बादशाह तक पहुंचिये।’

– ‘लेकिन मैंने सुना है कि सलीमा बेगम तो पहले से ही मुझ पर खफा हैं। क्या मैं अपनी माता मरियम उज्जमानी के माध्यम से वहाँ पहुँचूं?’

– ‘नहीं यह उचित नहीं होगा। महारानी जोधाबाई कभी भी बादशाह सलामत के निश्चय के विरुद्ध एक भी शब्द अपने मुँह से नहीं निकालेंगी।’

– ‘तो फिर?’

– ‘मेरे स्वामी ने सुझाव भिजवाया है कि आप सलीमा बेगम के माध्यम से प्रयास कीजिये।’

– ‘ठीक है। मैं ऐसा ही करूंगा लकिन मान लो कि मैं किसी तरह बादशाह सलामत के पास पहुँच गया और उन्होंने मुझे ताज सौंपने के स्थान पर खुसरो को ही बादशाह बनाने की जिद्द बनाये रखी तो?’

– ‘ऐसी स्थिति में हो सकता है कि हमें बादशाह सलामत को गिरफ्तार करना पड़े।’

– ‘क्या रामसिंह मेरे लिये बादशाह सलामत से विद्रोह करेगा?’

– ‘उनकी इच्छा तो नहीं है किंतु आवश्यक हुआ तो यह भी करना पड़ेगा।’

पर्दे के पीछे छिपे हुए रहस्यमय व्यक्ति की बात पूरी हुई ही थी कि राजा शालिवाहन ने कक्ष में प्रवेश किया। सलीम चुपचाप पर्दे के पास से हट गया।

-अध्याय 103, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

हुमायूँ की तलवार (104)

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अभी सूरज निकलने में कुछ समय था जब सलीमा बेगम ने अपनी लौण्डी सहित बादशाह सलामत के कक्ष में प्रवेश किया। सलीमा बेगम ने अपना पूरा बदन बुर्के में छिपा रखा था किंतु उसके मुँह से कपड़ हटा हुआ था। जबकि लौण्डी के चेहरे पर कपड़ा पड़ा हुआ था।

सलीमा बेगम को देखकर कच्छवाहा पहरेदार चिंता में पड़ गया। क्या करे? क्या न करे? इससे पहले कभी भी ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई थी। उसमें इतना साहस न था कि सलीमा बेगम का मार्ग रोके या उससे कुछ पूछने का साहस करे। सलीमा बेगम के प्रवेश पर उसे कोई आपत्ति भी नहीं थी। उसे आपत्ति थी उसकी बुर्केदार लौण्डी से। राजा मानसिंह का आदेश था कि किसी को भी चेहरा छुपा कर बादशाह के पास जाने की अनुमति न दी जाये।

इधर पहरेदार उचित अनुचित के ही विचार में फंसा हुआ था और उधर सलीमा बेगम अपनी लौण्डी सहित बादशाह के कक्ष में प्रवेश कर गयी। पहरेदार ने सतर्क होकर अपने साथी को दौड़ाया कि जाकर राजा मानसिंह को सूचित कर दे।

– ‘इस नेक सुबह के नेक उजाले में कनीज खुदाबंद से बादशाह सलामत की तंदरुस्ती की दुआ करती है।’ सलीमा बेगम ने बादशाह को जागा हुआ देखकर तसलीम किया।

अकबर के जर्द चेहरे पर मुर्दानी छायी हुई थी और कमजोरी के कारण उसका पूरा बदन काँप रहा था। उसकी आँखें गढ़ों में धंस गयी थीं और बालों का रंग मिट्टी में सनी सफेद सन जैसा हो गया था।

– ‘बेगम! सुबह भले ही नेक हो किंतु उसके उजाले में पहले की सी नेकी न रही।’ बादशाह ने काँपते हुए शब्दों में सलीमा बेगम का अभिवादन स्वीकार किया।

– ‘दिल मायूस न करें शहंशाह। सुबह के उजाले में नेकी न रही तो क्या हुआ, दुनिया आपकी नेकी के उजाले से रौशन है।’

– ‘आप शाइरा हैं। उम्मीदों को जगाये रख सकती हैं किंतु हमारी तो सारी उम्मीदें ही खत्म हो गयीं।’

– ‘परवरदिगार! रियाया को अभी आपसे काफी उम्मीदें हैं।’

– ‘लेकिन हम किससे उम्मीद करें?’

– ‘अपनों से। बादशाह सलामत, उम्मीदें अपनों से ही की जाती हैं।’

– ‘लेकिन जो अपने थे, वे सब तो एक-एक करके हमें छोड़ते जा रहे हैं। बादशाह सलामत हुमायूँ हमें छोड़ गये। वालिदा हमीदाबानंू हमें छोड़ गयीं। खान बाबा बैरामखाँ ने हमें छोड़ दिया। हमारे नवरत्नों में से अबुल फजल, राजा टोडरमल और मियाँ तानसेन हमें छोड़ गये। शहजादे मुराद और दानियाल हमें छोड़ गये। और भी जाने कौन-कौन हमें छोड़ दें। इससे तो अच्छा है कि अब दुनिया से हमारी विदाई हो जाये।’

– ‘कायनात में आपकी सलामती की दुआ मांगने वालों की अब भी कमी नहीं है बादशाह सलामत।’

– ‘हाँ! उनकी कमी नहीं है। आप हैं, शाह बेगम मरियम उज्जमानी हैं, खानखाना अब्दुर्रहीम हैं लेकिन फिर भी जाने क्यों हर वक्त ऐसा लगता है कि जिसे हमारी सलामती की सबसे ज्यादा दुआ मांगनी चाहिये थी, वह तो खुद ही हमारी जान ले लेना चाहता है।’

– ‘आपका इशारा किस ओर है, शहंशाह?’

– ‘आप अच्छी तरह जानती हैं। शेखूबाबा से हमने कितना प्रेम किया! क्या उसका फर्ज नहीं था कि आज वो हमारा सहारा बनता?’

– ‘शेखूबाबा ने कुछ नादानियां की हैं जिल्ले इलाही किंतु वे आपके शहजादे हैं, क्षमा के योग्य हैं।’

– ‘क्षमा के योग्य हैं? आखिर कितनी बार क्षमा के योग्य हैं?’

– ‘राजा शालिवाहन के उपचार से उनका रोग दूर हो गया है और वे हर तरह से स्वस्थ होकर आपकी सेवा में हाजिर होने का इंतजार कर रहे हैं।’

– ‘बेगम! आप जानती हैं कि हमने शेखू बाबा का मुँह न देखने की कसम खाई है।’

– ‘जो रहमदिल बादशाह अपनी पूरी रियाया को औलाद मानकर उसके गुनाह माफ करता है, क्या वह अपनी औलाद पर रहम न कर सकेगा?’

– ‘जब किसी को रहम की जरूरत हो तो रहम करूं?’ बादशाह खीझ पड़ा।

– ‘यह भी ठीक रही बादशाह सलामत! एक ओर तो आप शेखू बाबा का मुँह भी नहीं देखना चाहते और दूसरी ओर उनसे रहम की दरख्वास्त भी चाहते हैं आखिर वे अपनी बात कहंे भी तो कैसे………?’

सलीमा बेगम की बात पूरी भी न हो पायी थी कि राजा मानसिंह ने कक्ष में प्रवेश किया। उसे देखते ही सलीमा बेगम का ईरानी चेहरा और भी सफेद हो गया। उसे समझ में नहीं आया कि क्या करे।

ठीक उसी समय सलीमा बेगम की लौण्डी ने अपने मुँह पर से पर्दा उठाया और आगे बढ़कर बादशाह के पास रखी म्यान में से तलवार खींच कर अपने हाथ में ले ली। लौण्डिया को तलवार खींचते देखकर राजा मानसिंह ने भी अपनी म्यान से तलवार खींची और लौण्डिया की ओर लपका किंतु उसका चेहरा पहचान कर उसकी ओर जाने के स्थान पर बादशाह की शैय्या के निकट जाकर खड़ा हो गया।

यह सब इतनी शीघ्रता से हुआ कि कोई कुछ नहीं समझ सका।

सलीमा बेगम ने चीख कर कहा- ‘शेखू बाबा!’

– ‘शेखू बाबा! कहाँ है शेखू बाबा?’ बूढ़े बादशाह ने काँपती हुई आवाज में चिल्लाकर पूछा। उसने उठने का प्रयास किया किंतु उठ न सका।

– ‘मैं यहाँ हूँ बादशाह सलामत।’ लौण्डी ने चीखकर कहा और अपना बुर्का उतार कर फैंक दिया।

– ‘तुमने यह तलवार क्यों उठायी? यह क्या बदसलूकी है?’

– ‘अपने पुरखों की तलवार उठाना बदसलूकी नहीं होती बादशाह सलामत। इस तलवार पर जितना आपका हक है, उतना ही मेरा भी है।’

– ‘इस चंगेजी तलवार को हाथ लगाने योग्य नहीं है तू। ला इसे इधर दे।’

– ‘अब आप बूढ़े और कमजोर हो गये हैं, अब आपको इसकी जरूरत नहीं रही। बड़े बादशाह हुजूर हुमायूँ की यह तलवार अब मेरे पास ही रहने दीजिये।’

– ‘मैं तेरे दिल की हसरत को जानता हूँ लेकिन तू इतना जान ले कि हाथ में तलवार पकड़ने लेने भर से तख्त और ताज हासिल नहीं हो जाते।’

– ‘जानता हूँ, अच्छी तरह से जानता हूँ कि तख्त और ताज कैसे हासिल होते हैं। इसलिये आपसे दरख्वास्त करता हूँ कि अब यह ताज भी मेरे सिर पर रख दें और आप इसके भार से मुक्त हो जायें।’ सलीम ने अकबर की पगड़ी की ओर संकेत करते हुए कहा।

– ‘यह पाक चीज तुम्हारे सिर पर नहीं, शहजादे खुसरो के सिर पर रखी जायेगी।’

– ‘क्यों? क्या मैं चंगेजी खानदान का नहीं? क्या मेरी रगों में तैमूर लंग का खून नहीं?’

– ‘शहजादे खुसरो में भी ये सब खूबियां हैं।’

– ‘लेकिन खुसरो और इस पगड़ी के बीच मैं खड़ा हूँ।’

– ‘तुम्हें हटा दिया जायेगा।’ अकबर ने गुस्से से काँपते हुए कहा।

– ‘कहीं ऐसा न हो कि हटाने वालों को हटना पड़े।’

– ‘तुम्हारी जुबान खींच ली जायेगी गुस्ताख। अकबर बीमार भले ही है किंतु मरा नहीं है।’

– ‘मेरी जुबान खींची गयी तो जिस खुसरो को आप मोहरा बनाकर मुझे शिकस्त दिया चाहते हैं, उसके बदन पर एक इंच चमड़ी भी न बचेगी।’

– ‘ऐसी बात कहने से पहले इतना तो सोच कि वह तेरी औलाद है!’

– ‘आप भी मेरे बारे में कुछ कहने से पहले यही सोचें तो बेहतर होगा जिल्ले इलाही।’

– ‘मैं चाहूं तो इसी समय मानसिंह तेरा सिर कलम कर दे।’

– ‘लेकिन सिर मानसिंह के बदन पर भी नहीं बचेगा। मेरे खैरख्वाह रामसिंह कच्छवाहे ने चारों ओर से महल को घेर रखा है। मानसिंह मेरी तरफ बढ़कर तो देखे।’ सलीम ने चालाक चीते की तरह गुर्राकर कहा और अपने हाथ की तलवार तेजी से हवा में घुमायी।

अकबर ने सिर पकड़ लिया। नहीं जीत सकता वह इस लड़ाई में। जाने कैसी लड़ाई है यह! उसे लगा कि उसकी साँस डूब रही है। आँखों के सामने अंधेरा सा छाता जा रहा है। पूरे बदन पर चींटियां सी रेंग रही हैं। सलीमा ने चौंक कर बादशाह की ओर देखा और चीखती हुई सी बोली- ‘जिल्ले इलाही! संभालिये अपने आप को।’

अकबर ने सलीम और अपने जीवन दोनों से मायूस होकर सलीमा बेगम व मानसिंह की ओर देखा बैरामखाँ और अब्दुर्रहीम के बाद जिन दो शरीरों में अकबर के प्राण बसते थे वे दोनों ही उसके सामने खड़े थे। अकबर के एक संकेत पर वे अपने प्राण दे सकते थे किंतु लाख चाह कर भी वे वह नहीं कर सकते थे जिससे अकबर को शांति मिले। सच पूछो तो उस क्षण स्वयं अकबर भी नहीं जानता था कि क्या करने से उसके मन को शांति मिलेगी।

अचानक डूबती हुई सांसें कुछ स्थिर हुईं। अकबर को लगा कि शरीर में अचानक ही चेतना लौट आयी है। आँखों से फिर दिखाई देने लगा है। कक्ष के बिम्ब अचानक ही बहुत स्पष्ट हो चले हैं। वह समझ गया कि यह बुझते हुए चिराग़ की अंतिम रौशनी है जो चिराग़ के बुझने से पहले एक बार अपनी पूरी चमक दिखाना चाहती है। उसने मानसिंह को संकेत किया कि पगड़ी उठाये। मानसिंह ने पगड़ी उठाकर अकबर के हाथों में रख दी।

– ‘मेरी हसरत तो अधूरी रह गयी सलीमा बेगम! तुम्हारी ही हसरत पूरी हो। आओ शहजादे मेरे पास आओ।’

मानसिंह ने आश्चर्यचकित होकर बादशाह की ओर देखा। सलीम आगे बढ़कर ठीक बादशाह के पलंग तक पहुंच गया। बादशाह ने काँपते हुए हाथों से अपनी पगड़ी सलीम के माथे पर रख दी।

– ‘आज से तुम्हारा बादशाह यही है मानसिंह। इसकी रक्षा करना।’ अपनी बात पूरी करके बूढ़ा बादशाह एक ओर को लुढ़क गया।

-अध्याय 104, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

असार संसार (105)

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जिस दिन अकबर सलीम के सिर पर अपनी पगड़ी रखकर एक ओर को लुढ़क गया था उसके बाद वह कभी भी नये सूरज का उजाला नहीं देख सका। वह छः दिन तक बेहोश रहा। सातवें दिन आधी रात के लगभग अकबर के प्राण पंखेरू उड़ गये। राजा मानसिंह अपने आदमियों को लेकर महल से बाहर हो गया और जाते समय खुसरो को भी अपने साथ छिपा कर ले गया। कच्छवाहे रामसिंह ने आगरा का चप्पा-चप्पा खोज मारा किंतु खुसरो उसके हाथ नहीं लगा।

बादशाह के मरते ही सलीम ने सबसे पहले शाही कोष को अपने अधिकार में लेने का काम किया। अकबर आगरा के किले में तीस करोड़ रुपया छोड़ कर मरा था। मानसिंह ने किले की किसी चीज को हाथ नहीं लगाया था, इससे वे रुपये बिना किसी बाधा के सलीम के हाथ लग गये।

बादशाह की मौत के ठीक आठवें दिन सलीम नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से आगरा के तख्त पर बैठा। पहले ही दिन उसने कई राजाज्ञाएं प्रसारित कीं जिनमें दो राजाज्ञाएं प्रमुख थीं, पहली ये कि मानसिंह बंगाल के लिये प्रस्थान कर जाये तथा दूसरी ये कि जैसे भी हो शहजादे खुसरो को कैद करके मेरे सामने लाया जाये।

राजा मानसिंह की तीन पीढ़ियों ने अकबर की तन मन से सेवा की थी। राजा मानसिंह की बुआ और बहिन भी अकबर तथा सलीम को ब्याही गयीं थीं। राजा भगवानदास तथा राजा मानसिंह ने अकबर के लिये बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीती थीं। अकबर की मृत्यु से एक क्षण पहले तक मानसिंह मुगल सल्तनत का सबसे मजबूत कंधा गिना जाता था किंतु नियति के चक्र ने सलीम को बादशाह बना दिया था जो मानसिंह का घोर विरोधी था। जहाँगीर के हाथों अपमानित होकर राजा मानसिंह वृद्धावस्था में अपना टूटा हुआ दिल लेकर बंगाल के लिये प्रस्थान कर गया।

आज वर्षों बाद उसे गुसांईजी के वे शब्द स्मरण हो आये थे, जो उन्होंने मानसिंह द्वारा महाराणा पर कोप करने की बात सुनकर कहे थे- ‘बंधु द्रोह भयानक पाप है राजन्। मनुष्य को इस पातक से बचने के लिये प्राण देकर भी प्रयास करना चाहिये। जो अबंधु है, जो रिपु है, जो हरिविमुख हैै, उस पर कोप करने की सामर्थ्य और इच्छा पैदा करो। जो बंधु है, निरीह है, शरण में आया हुआ है, प्रेम, प्रीत और दया का पात्र है, उससे वैर कैसा? यदि मनुष्य के मन में स्वबंधु, स्वजाति, स्वधर्म और स्वराष्ट्र के प्रति अपनत्व नहीं होगा, वह प्राणि मात्र में ईश्वर के दर्शन कैसे कर सकेगा? अभी भी समय है राजन्! अपनी त्रुटियों का प्रतिकार करो। अपने बंधुओं को गले लगाओ अन्यथा जीवन में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा।’

सचमुच ही बंधुओं से वैर करके तथा अबंधुओं से प्रीत जोड़ कर क्या पाया था उसने? अपमान! तिरस्कार!! निष्कासन!!! स्वयं अपनी दुर्दशा और अपने बंधुओं की दुर्दशा। अपने धर्म की दुर्दशा और अपने राष्ट्र की दुर्दशा। महाराणा तो अपना उज्जवल चरित्र इतिहास को सौंप कर एकलिंग की सेवा में जा पहुँचा था किंतु स्वयं मानसिंह…….?

राज्य की खातिर उसने अपनी बहिन-बेटियाँ शत्रुओं को ब्याह दीं। कुल पर कलंक लिया और दास होकर भी जीवन भर राजा कहलाने का भ्रम पाला।

अपनी दशा देखकर मानसिंह की आँखों में आँसू आ गये और आत्मा चीत्कार कर उठी। हाय! किन विधर्मियों और शत्रुओं की दासता में जीवन बिताया….. किंतु अब पश्चाताप् करने से क्या होने वाला था। शरीर के खेत से काल रूपी चिड़िया उम्र का दाना चुगकर कभी की फुर्रर्रर्र… हो चुकी थी। जीवन के दिन अब बचे ही कितने थे?

बंगाल पहुँचने के कुछ ही दिनों पश्चात् राजा मानसिंह की मृत्यु हो गयी। वह भग्न हृदय लेकर इस असार संसार से सदा-सर्वदा के लिये प्रस्थान कर गया।

-अध्याय 105, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

भाग्य की विडम्बना (106)

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खुसरो आगरा से निकल कर दिल्ली होते हुए लाहौर की ओर भागा। अपने बारह हजार आदमी लेकर वह सिक्खों के गुरु अर्जुनदेव की शरण में पहुँचा। अर्जुनदेव ने उसे बादशाह होने का आशीर्वाद दिया। जब यह समाचार जहाँगीर को मिला तो उसकी रूह काँप गयी। वह स्वयं सेना लेकर लाहौर गया।

भैंरोंवाल[1]  के निकट पिता पुत्र की सेनाओं में घमासान हुआ। खुसरो के कई हजार आदमी मारे गये। अंत में वह मैदान छोड़कर काबुल के लिये भाग खड़ा हुआ। उसका कोष जहाँगीर के हाथ लग गया। जब खुसरो अत्यंत शीघ्रता में चिनाब पार कर रहा था, तब उसकी नावें जहाँगीर के आदमियों ने पकड़ लीं।

जहाँगीर ने अपने बाप अकबर तथा अपने बेटे खुसरो से वैमनस्य का पूरा हिसाब अपने बाप के चहेते खुसरो से ही चुकता करने का निश्चय किया। उसने खुसरो के खास मित्रों को जीवित ही गधे और बैल की खालों में सिलवा दिया। उसके सैंकड़ों साथियों को एक मील लम्बी सूली पर कतार में लटका दिया। इसके बाद खुसरो को हाथी पर बैठा कर लटकते हुए शवों की कतारों के बीच से ले जाया गया। उससे कहा गया कि अपने हर आदमी की लाश के सामने रुके और झुक कर उसका सलाम कुबूल करे। इसके बाद खुसरो की आँखें फोड़ कर उसे कारागार में डाल दिया जहाँ पंद्रह साल बाद रहस्यमय परिस्थितियों में उसकी मृत्यु हो गयी।

खुसरो से निबटने के बाद जहाँगीर गुरु अर्जुन देव की ओर बढ़ा। जहाँगीर पहले से ही इस बात के लिये खफा़ था कि गुरु ने अपनी पुत्री का विवाह जहाँगीर के मित्र चंदूशाह के बेटे से करने से मना कर दिया था[2]  लेकिन अकबर के डर के कारण जहाँगीर कुछ कर नहीं पाया था। अब बदला लेने का अच्छा मौका हाथ लगा जानकर उसने गुरु को आदेश दिया कि राज्यद्रोही को आशीर्वाद देने के जुर्म में आप दो लाख रुपये का जुर्माना भरिये। गुरु ने कहा कि मैं तो साधु हूँ। मुझे तेरी सत्ता से कोई लेना देना नहीं है। जो भी मेरी शरण में आयेगा, उसे मैं आशीर्वाद दूंगा। जहाँगीर ने गुरु को कैद कर लिया तथा तरह-तरह की यातनायें दीं। अंत में एक दिन उन्हें बुरी तरह से तड़पा-तड़पा कर मार डाला।[3]  गुरु ने अत्याचारी जहाँगीर के हाथों मौत स्वीकार कर ली किंतु जुर्माना नहीं भरा।

यह भाग्य की ही विडम्बना थी कि जिस खुसरो को अकबर ने ताज देना चाहा था उसे तो अपने मित्रों सहित कारागार में मौत मिली और जिस सलीम को अकबर दर-दर का भिखारी बनाना चाहा था, वह पूरी शानो शौकत के साथ मुगलिया तख्त पर बैठकर अकबर के आदमियों को मौत के मुँह में पहुंचाता रहा।

-अध्याय 106, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] लाहौर के पास। अब पाकिस्तान में है।

[2] चंदूशाह लाहौर का दीवान था और वह गुरु की अथाह सम्पत्ति को हड़पने के लिये अपने बेटे का विवाह गुरु की बेटी से करना चाहता था।

[3] कुछ इतिहासकारों का मत है कि गुरू को नदी में डुबोकर मारा गया।

खानखाना की चिंता (107)

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इधर खानखाना अपने दामाद दानियाल के मर जाने तथा अपनी बेटी के शोक में डूब जाने के दोहरे कहर से जर्जर हो चला था और उधर अकबर तथा सलीम के बीच घट रहे घटनाक्रम से उसकी चिंतायें दिन दूनी और रात चौगुनी होती जाती थीं।

आगरा से जिस तरह के समचार मिल रहे थे उनसे खानखाना समझ गया कि अब जीवन में बुरे दिनों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जायेगी। अंत में एक दिन वह भी आया जब बादशाह अकबर की मृत्यु होने, सलीम के तख्त पर बैठने तथा खुसरो की आँखें फोड़ी जाकर कैद में डाले जाने के समाचार भी खानखाना तक पहुँचे।

जब गुरु अर्जुन देव की हत्या होने का समाचार खानखाना तक पहुँचा तो खानखाना इस अत्याचार की सूचना से काँप उठा। खानखाना को दिल्ली और आगरा छोड़े हुए बारह साल बीत चले थे। इस बीच वहाँ सब कुछ बदल गया था। खानखाना के लगभग सभी पुराने मित्र या तो मृत्यु को प्राप्त हो गये थे या फिर उनका पहले का सा रुतबा न रहा था।

जहाँगीर से भी उसका सम्पर्क कई वर्षों से नहीं रहा था। ऐसी स्थिति मेें जबकि जहाँगीर अकबर के विश्वस्त व्यक्तियों को चुन-चुन कर अपने मार्ग से हटा रहा था, खानखाना को समझ में नहीं आ रहा था कि वह नये बादशाह को मुजरा करने के लिये आगरा जाये या बादशाह की तरफ से किसी आदेश के आने की प्रतीक्षा करे!

एक दिन खानखाना इसी चिंता में डूबा हुआ था कि द्वारपाल ने आकर निवेदन किया- ‘बादशाह के संदेश वाहक मुकर्रबखाँ खानखाना की सेवा में हाजिर होना चाहते हैं।’ खानखाना ने मुकर्रबखाँ को अपने डेरे में आने की अनुमति दे दी। मुकर्रबखाँ ने खानखाना को शाही आदेश थमाया।

बादशाह ने लिखा था- ‘बादशाह सलामत खानखाना की सेवाओं से प्रसन्न हैं तथा उसे उसी ओहदे और रुतबे पर बनाये रखने की मंजूरी देते हैं जिस ओहदे और रुतबे पर उसे मरहूम बादशाह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने तैनात किया था। बादशाह सलामत यह भी आदेश देते हैं कि खानखाना उसी मेहनत और खैरख्वाही से दक्षिण विजय का काम करता रहे जो वह अब तक करता रहा है।’

खानखाना ने इस दरियादिली के लिये बादशाह सलामत नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के प्रति अहसानमंद रहने तथा जीवन पर्यंत बादशाह के प्रति वफादार बने रहने का वचन दिया।

इसके बाद मुकर्रबखाँ ने खानखाना को एक और आदेश थमाया जिसे पढ़कर खानखाना की रूह काँप गयी। बादशाह ने मरहूम शहजादे दानियाल के समस्त पुत्रों को बादशाह सलामत की रहबरी में आगरा भेजने का हुक्म दिया था ताकि उनकी बेहतर बेहतर परवरिश और बेहतर तालीम का इंतजाम हो सके।

खानखाना जानता था कि दानियाल के बाद उसके बेटे ही जाना बेगम के जीवन का आधार बने हुए थे। यदि वे भी बादशाह ने छीन लिये तो जाना बेगम के जीवन में पूरी तरह अंधेरा छा जायेगा। खानखाना ने बहुत प्रकार से मुकर्रबखाँ को समझाने का प्रयास किया किंतु मुकर्रबखाँ अपनी बात पर अड़ा रहा कि बादशाह सलामत के आदेश की पालना हो अन्यथा इसे विद्रोह माना जायेगा।

जब कोई उपाय नहीं बचा तो खानखाना ने रोती-बिलखती जाना बेगम की गोद से उसके बेटों को छीनकर मुकर्रबखाँ को सौंप दिये।

-अध्याय 107, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

समंद और फतूह (108)

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बेटी जाना की तसल्ली के लिये खानखाना ने मुकर्रब खाँ के साथ ही आगरा जाने का विचार किया। वह चाहता था कि चाहे जैसे भी हो, जाना के बेटों को लौटा लाये।

खानखाना पूरी तैयारी के साथ जहाँगीर के सामने उपस्थित हुआ। वह इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था। उसने मोतियों के दो हार, ढेर सारे माणिक, तलवारें तथा तीन लाख रुपये जहाँगीर के पैरों में रख दिये और स्वयं भी जहाँगीर के पैरों में गिर पड़ा। जहाँगीर ने अपने गुरु को अपने पैरों में से उठा कर अपनी छाती से लगाकर, कृपा पूर्वक उसका माथा चूमते हुए कहा-

– ‘खानखाना! आप बादशाह के अतालीक होने के सम्मान से विभूषित हैं। इसलिये अब आपकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।’

– ‘मैं बादशाह सलामत की हर ख्वाहिश पूरी करने के लिये स्वयं को  आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ ।’

– ‘हमारी हसरत है कि दो साल में पूरा दक्खिन हमारी सल्तनत में शुमार हो।’

– ‘मैं जान देकर भी बादशाह सलामत की ख्वाहिश पूरी करूंगा।’

– ‘तुम्हें हमसे क्या मदद चाहिये?’

– ‘बारह हजार घुड़सवार और उनके खर्चे के लिये दस लाख रुपये मिल जायें तो मैं दो साल में यह कार्य पूरा कर दूं। यदि ऐसा न करूं तो मुझे बादशाह का गुनहगार माना जाये।’

– ‘यह सहायता मंजूर की जाती है। और क्या चाहते हैं?’

– ‘यदि बादशाह सलामत प्रसन्न हों तो मैं अपनी बेटी जाना बेगम के पुत्रों को अपने साथ ले जाना चाहता हूँ।’

– ‘क्यों, क्या तुम्हें हम पर भरोसा नहीं?’

– ‘भरोसे की न कहें, आप सिर मांग लें तो हाजिर है। इन बच्चों के सहारे जाना अपनी जिंदगी के दिन काट लेगी।’

– ‘ठीक है तुम उन्हें अपने साथ ले जा सकते हो।’

जहाँगीर जैसा मक्कार जमाने में न था। वह कतई नहीं चाहता था कि दानियाल के बेटे खानखाना के पास रहें क्योंकि उसकी निगाह में खानखाना किसी भी तरह विश्वास करने योग्य न था। वह कभी भी सलीम के विरुद्ध विद्रोह करके शहजादे दानियाल के पुत्रों को मुगलिया तख्त पर बैठाने का षड़यंत्र रच सकता था किंतु इस समय जहाँगीर को खानखाना की जरूरत थी। वह खानखाना को प्रसन्न देखना चाहता था, इसलिये उसने खानखाना को दानियाल के पुत्र अपने साथ ले जाने की अनुमति दे दी।

जहाँगीर ने खानखाना को ईरान के शाह से प्राप्त समन्द नामक घोड़ा, फतूह नाम का हाथी तथा बीस अन्य हाथी भी उसकी विदाई में उपहार के तौर पर दिये। समंद और फतूह आगरा की सेना में सर्वश्रेष्ठ घोड़ा और सर्वश्रेष्ठ हाथी माने जाते थे। इस उपहार के माध्यम से जहाँगीर खानखाना को जता देना चाहता था कि यदि खानखाना जहाँगीर के अनुकूल रहा तो उस पर बादशाही कृपा हर तरह से बनी रहेगी। जिस समय खानखाना ने पुनः दक्षिण के लिये कूच किया तो बादशाह ने खासा हाथी, सिरोपाव, जड़ाऊ तलवार और पेटी प्रदान किये।

इतना सब हो जाने पर भी जहाँगीर को संतोष नहीं हुआ। खानखाना के चले जाने के बाद जहाँगीर ने शहजादा परवेज को भी दक्षिण की ओर रवाना किया तथा स्वयं आगरा से चलकर अजमेर में आकर बैठ गया। जहाँगीर ने शहजादे को पच्चीस लाख रुपये दिये और मुगलिया सल्तनत के लगभग तमाम विश्वस्त सेनापति भी उसके अधीन करके उसके साथ भेजे। लगभग दो सौ मनसबदार, एक हजार अहदी और कई हजार सैनिकों की विशाल कुमुक लेकर परवेज दक्षिण में पहुँचा। उसने खानखाना को प्रसन्न करने के लिये बादशाह की ओर से हाथी, घोड़े, जड़ाऊ हथियार और अन्य उपहार प्रदान किये। खानखाना ने एक लाल और दो मोती बादशाह को भिजवाये। बादशाह ने इन रत्नों की कीमत बीस हजार रुपये लगायी।

जब यह सारी सेना दक्षिण में पहुँची तो दक्षिण में बड़ी भारी बेचैनी फैली। अब तक तो खानखाना लगभग सभी राज्यों से किसी न किसी प्रकार की संधि करके दक्षिण में शांति बनाये हुए था किंतु विशाल मुगल कुमुक को देखकर दक्खिनियों को इन संधियों पर विश्वास न रहा और वे इकठ्ठे होकर संघर्ष की तैयारी करने लगे।

खानखाना अपनी बात से गिरना नहीं चाहता था इसलिये उसने बादशाह को लिखा कि और कुमुक न भेजी जाये किंतु दूसरी ओर शहजादा परवेज और अन्य सेनापतियों ने ज्यादा से ज्यादा कुमुक की मांग रखी। बादशाह ने और कुमुक भिजवा दी।

सैंकड़ों सेनापतियों और हजारों सेनानायकों के एक ही स्थान पर एकत्रित हो जाने से उनमें मतभेद होने लगा। प्रत्येक मामले पर वे अलग-अलग राय बनाकर बैठ जाते। कोई भी किसी से सहमत नहीं होता था। सबकी राय भिन्न होती थी और सब के सब अपनी ही बात को सही मानते थे। स्थितियाँ खानखाना के हाथ से निकल गयीं।

परवेज ने उनके किसी भी सुझाव को स्वीकार नहीं किया। इस सब का परिणाम यह रहा कि जब परवेज ने बालाघाट पर चढ़ाई की तो दक्खिनियों ने मुगलों की रसद रोक दी जिससे बड़ी संख्या में हाथी, घोड़े और ऊंट मारे गये। अपनी सेना का जीवन बचाने के लिये परवेज को अपमान जनक शर्तों पर संधि करनी पड़ी। अहमदनगर का किला भी मुगलों के हाथ से निकल गया।

शहजादा परवेज, खानेजहाँ लोदी तथा अन्य समस्त सेनापतियों ने इस पराजय का ठीकरा खानखाना के माथे पर फोड़ दिया। उन्होंने बादशाह को लिखा कि यह पराजय और बदनामी खानखाना की कुटिलता से हुई है। बादशाह खानखाना पर बहुत बिगड़ा। इस पर खानखाना ने बादशाह को लिखा कि मुझे दक्षिण से हटाकर दरबार में बुला लिया जाये। जहाँगीर ने ऐसा ही किया और खानेजहाँ को दक्षिण का सारा जिम्मा सौंप दिया।

-अध्याय 108, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

दक्षिण में आग (109)

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खानखाना के दक्षिण से हटते ही दक्खिनियों के हौंसले बुलंद हो गये। वे एक जुट होकर खानेजहाँ लोदी में कसकर मार लगाने लगे। सल्तनत का विश्वस्त सेनापति अब्दुल्लाखाँ खानेजहाँ की सहायता के लिये भेजा गया किंतु वह हार कर गुजरात भाग आया। खाने आजम कोका भी बुरी तरह परास्त हुआ।

रामदास कच्छवाहा और मानसिंह भी पीट दिये गये। फीरोज जंग भी मोर्चा छोड़कर गुजरात भाग आया। अली मरदानखाँ पकड़ा गया। शहजादा परवेज बुरहानपुर से बाहर ही नहीं निकल सका। मुगल सेनायें हर तरफ आग से घिर गयीं। स्थिति यह हो गयी कि मुगल जहाँ भी जाते थे, अपने आप को दक्खिनियों से घिरा हुआ पाते थे।

यह सब देखकर जहाँगीर की आँखें खुलीं। वह समझ गया कि पिछले अठारह साल से खानखाना दक्षिण में शांति बनाये बैठा था, वह किसी और के वश की बात नहीं। खानखाना के शत्रुओं ने खानखाना के विरुद्ध जो शिकायतें की थीं उनकी वास्तविकता जहाँगीर के सामने आ गयी। उसने खानखाना को प्रसन्न करना आरंभ किया।

खानखाना का मनसब बढ़ाकर छः हजारी कर दिया। उसके बेटे एरच को तीन हजारी मनसब तथा शाहनवाजखाँ की उपाधि दी। खानखाना के नौकर फरेन्दूखाँ को ढाई हजारी जात, खानखाना के मित्र राजा बरसिंह को चार हजारी जात तथा रायमनोहर को एक हजारी जात का मनसब दिया।

खानखाना ने दक्षिण में पहुँच कर फिर से अपने मित्रों को एकत्र किया और पुरानी संधियों को पुनर्जीवित कर दिया। धीरे-धीरे आग बुझने लगी और मुगलों के हाथ से निकल गये समस्त पुराने क्षेत्र फिर से अधिकार में आ गये। इन सब दक्खिनियों से खानखाना ने कीमती रत्न प्राप्त करके जहाँगीर को भिजवाये।

तीन माणिक, एक सौ तीन मोती, सौ याकूत, दो जड़ाऊ फरसे, मोतियों और याकूतों की जड़ी हुई किलंगी, जड़ाऊ झरझरी, जड़ाऊ तलवार, जड़ाऊ भुजबंद, हीरे की अंगूठी, मखमल की तरकश, पंद्रह हाथी तथा एक ऐसा घोड़ा भी इस भेंट में शामिल था जिसकी गर्दन के बाल धरती तक लटकते थे।

खानखाना के पुत्र शाहनवाजखाँ ने भी अपनी ओर से पाँच हाथी तथा तीन सौ अनुपम वस्त्र बादशाह को भेंट किये। जहाँगीर इस भेंट को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। वह समझ गया कि दक्षिण में आग बुझ चुकी है।

-अध्याय 109, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

ऊदाराम ब्राह्मण (110)

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दक्षिण में इस तरह की शांति देखकर खानेजहाँ लोदी की छाती पर साँप लोट गया। वह कतई नहीं चाहता था कि बादशाह इस बात को देखे कि जिस मोर्चे पर खानेजहाँ असफल हो गया, वहाँ किसी और ने सफलता के झण्डे गाढ़ दिये। वस्तुतः मुगलिया सल्तनत की स्थापना से लेकर उसके अंत तक मुगल सेनापतियों और अमीर-उमरावों में यह प्रतिस्पर्धा अपने चरम पर बनी रही कि जीत का श्रेय मेरे ही नाम लिखा जावे।

खानेजहाँ ने जहाँगीर को फिर से खानखाना के विरुद्ध भड़काया कि जब तक खानखाना दक्षिण में रहेगा, कभी भी पूरा दक्षिण मुगलों के अधीन नहीं होगा। खानखाना दक्षिण में अपनी आवश्यकता जतलाकर बादशाह की कृपा का पात्र बने रहना चाहता है तथा इस बहाने से बादशाह से दूर रह कर सत्ता का वास्तविक सुख भोग रहा है।

वह दक्षिण में जो भी लूट करता है, अपने बेटों और सिपाहियों में बांट देता है। इसलिये उसके सिपाही मुगलिया सल्तनत के प्रति वफादार न होकर खानखाना के प्रति वफादार हैं। यदि मुझे वहाँ जाने दिया जाये तो दो साल में ही समूचा दक्षिण जहाँगीर के अधीन हो जायेगा।

जहाँगीर फिर से खानेजहाँ की बातों में आ गया और उसने खानेजहाँ को बहुत सी सेना तथा रुपया देकर दक्षिण के लिये रवाना कर दिया। जोधपुर का राजा सूरसिंह भी राजपूतों की सेना सहित उसके साथ भेजा गया।

खानेजहाँ को फिर से दक्षिण में आया देखकर दक्खिनियों में असंतोष तथा बेचैनी फूट पड़ी। उन्होंने मलिक अम्बर के नेतृत्व में खानखाना के बेटे शहनवाजखाँ के डेरे पर आक्रमण किया। शहनवाजखाँ और उसके भाई दाराबखाँ ने दो घड़ी तक ऐसी जर्बदस्त तलवार चलाई कि देखने वालों की आँखें पथरा गयीं। दक्खिनी मोर्चा छोड़कर कोसों दूर तक भागते चले गये।

जब दक्षिण में पुनः शांति स्थापित हो गयी तो जहाँगीर ने परवेज के स्थान पर खुर्रम को दक्षिण में नियुक्त किया। खुर्रम ने खानखाना और उसके बेटों से प्रार्थना की कि अब चाहे जो भी हो सम्पूर्ण दक्षिण मुगलिया सल्तनत में शामिल किया जाये। खानखाना ने कहा कि यदि ऊदाराम ब्राह्मण को तीन हजारी मनसब दिला दिया जाये तो इस काम को किया जाना संभव है।

ऊदाराम ब्राह्मण दक्खिनियों में उन दिनों बड़ी धाक रखता था। वह मलिक अम्बर की सेवा में नियुक्त था। मलिक अम्बर की वास्तविक ताकत ऊदाराम ही था। वह अत्यंत वीर, वचनों का धनी और व्यवहार कुशल सेनापति था। खानखाना ने अकबर के जमाने में ऊदाराम को वचन दिया था कि यदि ऊदाराम मलिक अम्बर को छोड़कर खानखाना की सेवा में आ जाये तो उसे तीन हजारी मनसब दिलवाया दिया जायेगा।

ऊदाराम ने खानखाना की शर्त स्वीकार भी कर ली थी किंतु खानखाना अपना वचन पूरा कर सके इससे पहले ही अकबर की मृत्यु हो गयी और उसके बाद तो स्वयं खानखाना को ही दक्षिण से हटा लिया गया था। इस पर ऊदाराम खानखाना का शत्रु होकर घूमता था। अब अवसर आया तो खानखाना ने अपने पुराने वचन को पूरा करने की ठानी।

खुर्रम ने जहाँगीर से कहकर ऊदाराम को तीन हजारी जात और पंद्रह हजारी सवार का मनसब दिलवा दिया। ऊदाराम को खानखाना की सेवा में गया जानकर मलिक अम्बर के हौंसले पस्त हो गये। उसने अपने समस्त किलों की चाबियाँ खुर्रम को भिजवा दीं। यह वही मलिक अम्बर था जिसके कारनामों के कारण चिंतित अकबर ने कई रातें जागते हुए बिताई थीं। मलिक अम्बर को मुगलों की शरण में गया हुआ देखकर दक्षिण के तमाम सरदार शहजादे खुर्रम की सेवा में हाजिर हो गये।

यह सफलता पाकर खुर्रम खानखाना के दोनों बेटों शहनवाजखाँ तथा दाराबखाँ के साथ तमाम दक्षिणी सरदारों को लेकर जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। जहाँगीर ने इस सफलता से प्रसन्न होकर खुर्रम पर मोती जवाहर निछावर किये। उसे तीस हजारी मनसब और दरबार में कुरसी पर बैठने का अधिकार दिया। खुर्रम ने भरे दरबार में बादशाह से अनुरोध किया कि दरबार में कुर्सी पर बैठने का यदि कोई वास्तविक हकदार है तो वह ऊदाराम ब्राह्मण है।

-अध्याय 110, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

कहर दर कहर (111)

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खानखाना ने जहाँगीर को हीरे की एक खान समर्पित की जो खानखाना के बेटे अमरूल्लाह ने खानदेश के जमींदार पनजू से छीनी थी। जहाँगीर ने अत्यंत प्रसन्न होकर खानखाना का खिताब सात हजारी मनसब और सात हजारी सवार कर दिया। ये वे क्षण थे जब जहाँगीर अपने जीवन में खानखाना पर सर्वाधिक प्रसन्न हुआ। इसके बाद खानखाना के जीवन में फिर ऐसा अवसर न आया।

जहाँगीर हर तरह से खानखाना को प्रसन्न किया चाहता था और उससे निकटता दर्शाना चाहता था। इसलिये उसने इस अवसर पर खानखाना के बेटे दाराबखाँ को नादरी का खिलअत दिया[1]  तथा खानखाना को सलाह देते हुए कहा- ‘हमने सुना है कि इन दिनों शाहनवाजखाँ बहुत शराब पीता है। उसे कहो कि वह इस तरह अपने को नष्ट न करे।’

जब जहाँगीर खानखाना को यह सलाह दे रहा था तब अचानक ही उसका हाथ अपने गालों पर चला गया। यह वही गाल था जिस पर एक दिन अकबर ने सलीम को शराब न पीने की नसीहत के साथ जोरदार तमाचा मारा था।

जब खानखाना बादशाह से विदा लेकर बुरहानपुर पहुँचा तो उसने पाया कि शाहनवाज अत्यधिक शराब पीने से मरणासन्न है। खानखाना ने बेटे का बहुत इलाज करवाया किंतु एक दिन मौत उसे खींचकर ले ही गयी। पत्नी माहबानो तथा दामाद दानियाल की मृत्यु के बाद खानखाना पर यह तीसरा कहर था।

जहाँगीर को जब यह समाचार मिला तो उसने खानखाना को सहानुभूति का संदेश भेजा। जहाँगीर और कुछ तो खानखाना का भला नहीं कर सकता था किंतु इतना प्रबंध उसने अवश्य किया कि खानखाना अपने बेटों और पोतों की तरक्की होते हुए देखकर प्रसन्न हो सके।

जहाँगीर ने खानखाना के दूसरे बेटे दाराबखाँ का ओहदा बढ़ाकर पाँच हजारी मनसब कर दिया। शाहनवाजखाँ की सूबेदारी के सारे क्षेत्र दाराबखाँ को दे दिये। खानखाना के तीसरे पुत्र रहमानदाद को दो हजारी जात और सात सौ सवारों का मनसब दिया। शाहनवाज के पुत्र मनुचहर को दो हजारी जात तथा एक हजारी सवार का मनसब दिया और शाहनवाज के दूसरे पुत्र तुगरल को एक हजारी जात और पाँच सौ सवार का मनसब दिया। खानखाना अपने कुनबे को इस तरह आगे बढ़ता देखकर प्रसन्न हुआ किंतु यह प्रसन्नता कुछ ही दिनों के लिये थी।

मलिक अम्बर ने भले ही मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी किंतु ऊदाराम ब्राह्मण के हाथ से निकल जाने के कारण वह खानखाना से बहुत नाराज रहता था और उससे बदला लेने की योजनायें बनाता रहता था। एक दिन अवसर पाकर उसने खानखाना के तीसरे बेटे रहमानदाद को मार डाला। खानखाना पर फिर से विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। मुगलों की सेवा में वह अपने कुनबे की भेंट चढ़ाता जा रहा था। सियासत का यह घिनौना चेहरा देखकर खानखाना सकते में था। खानखाना की सेना में मलिक अम्बर का खौफ छा गया।

-अध्याय 111, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  नादरी बिना बाहों की कमरी होती थी जो जामे के ऊपर पहनी जाती थी। इसे बिना बादशाह की अनुमति के कोई नहीं पहिन सकता था।

जौहर (112)

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जौहर

पूरी मुगल सेना में हड़कम्प मचा हुआ था। जिसे देखो वही कुछ न कुछ नवीन सूचना बांटने में लगा हुआ था। जितने मुँह उतनी बातें। कोई कहता था कि खानखाना मलिक अम्बर के सामने समर्पण करने जा रहा है। कोई कहता था कि खानखाना ने जौहर करने का फैसला किया है। हालांकि जौहर हिन्दू स्त्रियों द्वारा किया जाता था न कि मुसलमान पुरुषों द्वारा।

कोई कहता था कि बादशाह की कुमुक अहमदाबाद तक आ गयी है, इसलिये खानखाना उस कुमुक की प्रतीक्षा तक चुपचाप बैठा है। इतनी सारी बातों के बावजूद कोई भी सैनिक यह कहने की स्थिति में नहीं था कि इन सारी बातों में से कौन सी बात सही है।

इन चर्चाओं को विराम तभी लगा जब शाम के समय खानखाना ने पूरी फौज को एकत्र कर आधिकारिक रूप से घोषणा की कि यदि एक माह के भीतर बादशाही कुमुक नहीं आती है तो खानखाना के सिपाहियों को जौहर करने के लिये तैयार रहना चाहिये। आगे का निर्णय सिपाहियों को करना था कि उनमें से कौन खानखाना का साथ निभाना चाहता है और कौन मोर्चा छोड़कर भागना चाहता है।

हालांकि यह सभी जानते थे कि खानखाना की सेना अपने शत्रुओं और लुटेरों से इस कदर घिर गयी है कि मोर्चे पर से निकल भागना किसी के लिये संभव नहीं है। यहाँ तक कि स्वयं खानखाना के लिये भी नहीं। यदि ऐसा हो पाता तो खानखाना जौहर करने की घोषणा ही क्यों करता!

जब मलिक अम्बर रहमानदाद को मारने में सफल हो गया और दाराब खाँ लाख चाहकर भी मलिक अम्बर को नहीं पकड़ सका तो मलिक अम्बर के हौंसले बुलंद हो गये। उधर उसे यह खबर भी मिली कि बादशाह स्वयं तो कश्मीर में जा बैठा है और उसके दूसरे अमीर-उमराव कोट कांगड़े की लड़ाई में बुरी तरह फंस गये हैं। यह सूचना पाकर मलिक अम्बर ने खुल्लमखुल्ला बगावत कर दी।

मलिक अम्बर ने खुर्रम के साथ की हुई सारी संधियों को तोड़ डाला। उसे देखकर दूसरे दक्खिनियों ने भी मुगलों से विद्रोह कर दिया। खानखाना बहुत प्रयास करता था किंतु वह मलिक को दबा नहीं पाता था। शहनवाजखाँ और रहमानदाद के न रहने से खानखाना की ताकत बहुत घट गयी थी।

खानखाना ने बादशाह को बहुत सी चिठ्ठियाँ भिजवाईं कि कुछ सेना भिजवाई जाये किंतु बादशाह की ओर से कोई जवाब नहीं आया। ऐसा नहीं था कि बादशाह तक चिठ्ठियाँ पहुँची नहीं, चिठ्ठियाँ पहुँची किंतु बादशाह उनका जवाब देने की स्थिति में नहीं रहा था। मेवाड़, कश्मीर और कोट कांगड़े में सेनाएं इस कदर उलझ गयीं थीं कि किसी भी तरह से खानखाना को कुमुक भिजवाया जाना संभव नहीं था। यही कारण था कि जहाँगीर खानखाना को जवाब भिजवाने की बजाय चुप लगा जाना ही अधिक उचित समझ रहा था।

उधर दक्खिनियों ने खानखाना को खदेड़ना आरंभ किया और उसका पीछा करते हुए बुरहानपुर तक चले आये। बुरहानपुर में खानखाना बुरी तरह घिर गया। दक्खिनियों ने रसद की आपूर्ति काट दी। जिससे मुगल सेना के पशु घास और चारे के अभाव में मरने लगे। यहाँ तक कि आदमियों के भी भूखों मरने की नौबत आ गयी।

एक-एक करके सारे प्रदेश हाथ से निकलते जा रहे थे और मुगल सिपाहियों की संख्या घटती जा रही थी। खाने-पीने का सुभीता न देखकर बहुत से सिपाही खानखाना को छोड़कर दक्खिनियों से जा मिले थे। मुगलों की घटती हुई ताकत को देखकर लुटेरों की फौज मुगल सेना के चारों ओर इकट्ठी हो गयी। ये लुटेरे मौका पाते ही मुगलों के डेरे में घुस जाते और उनका माल-असबाब लूट कर भाग खड़े होते।

इस तरह सब काता-कूता कपास होते हुए देखकर खानखाना का मस्तिष्क सुन्न हो जाता था। वह एक ऊँची टेकरी पर घोड़ा खड़ा करके उस पर चढ़कर अपनी बूढ़ी आँखों से घण्टों तक उत्तर दिशा की ओर ताका करता था और किसी भी क्षण कुमुक आने की उम्मीद करता था किंतु वहाँ से कुमुक तो दूर किसी पत्र तक का जवाब नहीं आया।

साठ हजार दक्खिनियों का मुकाबला मुगलों के छः-सात हजार सिपाही किसी भी तरह नहीं कर सकते थे। एक जमाना वह भी था जब खानखाना मुठ्ठी भर सिपाहियों को लेकर मुजफ्फरखाँ जैसे प्रबल शत्रु से जा भिड़ा था और उसके छक्के छुड़ा दिये थे किंतु वक्त के थपेड़ों ने खानखाना के शरीर और मन में इतना दम न छोड़ा था। यहाँ तक कि बराड़ और खानदेश भी उसके हाथ से निकल गये। ये वे क्षेत्र थे जिन्हें खानखाना ने सत्रह साल पहले अपने अधीन किया था।

स्थितियाँ जब एक-दम असह्य हो गयीं तो खानखाना ने जहाँगीर को अंतिम पत्र लिखा कि यदि एक माह में आगरा से कुमुक नहीं भेजी गयी तो मेरे पास हिन्दू वीरों की तरह जौहर करने के अतिरिक्त और कोई उपाय न बचेगा। मैं अपने हरम की औरतों को आग में जला कर स्वयं अपने बेटों-पातों और सिपाहियों सहित शत्रु से जूझता हुआ मृत्यु को प्राप्त होऊंगा। मुगलिया सल्तनत को यही मेरी अंतिम सहायता होगी। शत्रुओं के हाथों अपमानित होने की अपेक्षा तो रण में जूझते हुए मर जाना अधिक श्रेयस्कर है।

खानखाना का पत्र पाकर जहाँगीर के हाथों से तोते उड़ गये। वह एकदम से बेचैन हो उठा। उसने तुरंत ही अपना संदेशवाहक खानखाना को दौड़ाया कि खुर्रम के आने से पहले कोई कदम न उठाये। उसने कोट कांगड़ा के मोर्चे पर फतह हासिल होने का जश्न मना रहे खुर्रम को संदेश भिजवाया कि जिस तरह तुम्हारे दादा जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने किसी जमाने में खानेआजम कोका को गुजरातियों के शिकंजे से छुड़ाया था, तुम भी उसी तरह तेज गति से बुरहानपुर पहुँच कर खानखाना को छुड़ाओ और यह शुभ समाचार मुझे तुरंत ही भिजवाओ।

जहाँगीर ने अपनी स्वयं की भी लगभग सारी सेना कोकाखाँ के साथ दक्खिन के मोर्चे पर भिजवा दी। खुर्रम ताबड़तोड़ कूच करता हुआ बुरहानपरु पहुँचा। उसने दक्खिनियों में कसकर मार लगाई और खानखाना को उनके शिकंजे से बाहर निकाला। खुर्रम की प्रबलता देखकर मलिक अम्बर ने पुनः दीनता दिखाते हुए मुगलों के अधिकार वाले पुराने क्षेत्र खुर्रम को समर्पित कर दिये।

-अध्याय 112, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

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