Home Blog Page 189

खानखाना की चिंता (107)

0

इधर खानखाना अपने दामाद दानियाल के मर जाने तथा अपनी बेटी के शोक में डूब जाने के दोहरे कहर से जर्जर हो चला था और उधर अकबर तथा सलीम के बीच घट रहे घटनाक्रम से उसकी चिंतायें दिन दूनी और रात चौगुनी होती जाती थीं।

आगरा से जिस तरह के समचार मिल रहे थे उनसे खानखाना समझ गया कि अब जीवन में बुरे दिनों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जायेगी। अंत में एक दिन वह भी आया जब बादशाह अकबर की मृत्यु होने, सलीम के तख्त पर बैठने तथा खुसरो की आँखें फोड़ी जाकर कैद में डाले जाने के समाचार भी खानखाना तक पहुँचे।

जब गुरु अर्जुन देव की हत्या होने का समाचार खानखाना तक पहुँचा तो खानखाना इस अत्याचार की सूचना से काँप उठा। खानखाना को दिल्ली और आगरा छोड़े हुए बारह साल बीत चले थे। इस बीच वहाँ सब कुछ बदल गया था। खानखाना के लगभग सभी पुराने मित्र या तो मृत्यु को प्राप्त हो गये थे या फिर उनका पहले का सा रुतबा न रहा था।

जहाँगीर से भी उसका सम्पर्क कई वर्षों से नहीं रहा था। ऐसी स्थिति मेें जबकि जहाँगीर अकबर के विश्वस्त व्यक्तियों को चुन-चुन कर अपने मार्ग से हटा रहा था, खानखाना को समझ में नहीं आ रहा था कि वह नये बादशाह को मुजरा करने के लिये आगरा जाये या बादशाह की तरफ से किसी आदेश के आने की प्रतीक्षा करे!

एक दिन खानखाना इसी चिंता में डूबा हुआ था कि द्वारपाल ने आकर निवेदन किया- ‘बादशाह के संदेश वाहक मुकर्रबखाँ खानखाना की सेवा में हाजिर होना चाहते हैं।’ खानखाना ने मुकर्रबखाँ को अपने डेरे में आने की अनुमति दे दी। मुकर्रबखाँ ने खानखाना को शाही आदेश थमाया।

बादशाह ने लिखा था- ‘बादशाह सलामत खानखाना की सेवाओं से प्रसन्न हैं तथा उसे उसी ओहदे और रुतबे पर बनाये रखने की मंजूरी देते हैं जिस ओहदे और रुतबे पर उसे मरहूम बादशाह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने तैनात किया था। बादशाह सलामत यह भी आदेश देते हैं कि खानखाना उसी मेहनत और खैरख्वाही से दक्षिण विजय का काम करता रहे जो वह अब तक करता रहा है।’

खानखाना ने इस दरियादिली के लिये बादशाह सलामत नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के प्रति अहसानमंद रहने तथा जीवन पर्यंत बादशाह के प्रति वफादार बने रहने का वचन दिया।

इसके बाद मुकर्रबखाँ ने खानखाना को एक और आदेश थमाया जिसे पढ़कर खानखाना की रूह काँप गयी। बादशाह ने मरहूम शहजादे दानियाल के समस्त पुत्रों को बादशाह सलामत की रहबरी में आगरा भेजने का हुक्म दिया था ताकि उनकी बेहतर बेहतर परवरिश और बेहतर तालीम का इंतजाम हो सके।

खानखाना जानता था कि दानियाल के बाद उसके बेटे ही जाना बेगम के जीवन का आधार बने हुए थे। यदि वे भी बादशाह ने छीन लिये तो जाना बेगम के जीवन में पूरी तरह अंधेरा छा जायेगा। खानखाना ने बहुत प्रकार से मुकर्रबखाँ को समझाने का प्रयास किया किंतु मुकर्रबखाँ अपनी बात पर अड़ा रहा कि बादशाह सलामत के आदेश की पालना हो अन्यथा इसे विद्रोह माना जायेगा।

जब कोई उपाय नहीं बचा तो खानखाना ने रोती-बिलखती जाना बेगम की गोद से उसके बेटों को छीनकर मुकर्रबखाँ को सौंप दिये।

-अध्याय 107, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

समंद और फतूह (108)

0

बेटी जाना की तसल्ली के लिये खानखाना ने मुकर्रब खाँ के साथ ही आगरा जाने का विचार किया। वह चाहता था कि चाहे जैसे भी हो, जाना के बेटों को लौटा लाये।

खानखाना पूरी तैयारी के साथ जहाँगीर के सामने उपस्थित हुआ। वह इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था। उसने मोतियों के दो हार, ढेर सारे माणिक, तलवारें तथा तीन लाख रुपये जहाँगीर के पैरों में रख दिये और स्वयं भी जहाँगीर के पैरों में गिर पड़ा। जहाँगीर ने अपने गुरु को अपने पैरों में से उठा कर अपनी छाती से लगाकर, कृपा पूर्वक उसका माथा चूमते हुए कहा-

– ‘खानखाना! आप बादशाह के अतालीक होने के सम्मान से विभूषित हैं। इसलिये अब आपकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।’

– ‘मैं बादशाह सलामत की हर ख्वाहिश पूरी करने के लिये स्वयं को  आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ ।’

– ‘हमारी हसरत है कि दो साल में पूरा दक्खिन हमारी सल्तनत में शुमार हो।’

– ‘मैं जान देकर भी बादशाह सलामत की ख्वाहिश पूरी करूंगा।’

– ‘तुम्हें हमसे क्या मदद चाहिये?’

– ‘बारह हजार घुड़सवार और उनके खर्चे के लिये दस लाख रुपये मिल जायें तो मैं दो साल में यह कार्य पूरा कर दूं। यदि ऐसा न करूं तो मुझे बादशाह का गुनहगार माना जाये।’

– ‘यह सहायता मंजूर की जाती है। और क्या चाहते हैं?’

– ‘यदि बादशाह सलामत प्रसन्न हों तो मैं अपनी बेटी जाना बेगम के पुत्रों को अपने साथ ले जाना चाहता हूँ।’

– ‘क्यों, क्या तुम्हें हम पर भरोसा नहीं?’

– ‘भरोसे की न कहें, आप सिर मांग लें तो हाजिर है। इन बच्चों के सहारे जाना अपनी जिंदगी के दिन काट लेगी।’

– ‘ठीक है तुम उन्हें अपने साथ ले जा सकते हो।’

जहाँगीर जैसा मक्कार जमाने में न था। वह कतई नहीं चाहता था कि दानियाल के बेटे खानखाना के पास रहें क्योंकि उसकी निगाह में खानखाना किसी भी तरह विश्वास करने योग्य न था। वह कभी भी सलीम के विरुद्ध विद्रोह करके शहजादे दानियाल के पुत्रों को मुगलिया तख्त पर बैठाने का षड़यंत्र रच सकता था किंतु इस समय जहाँगीर को खानखाना की जरूरत थी। वह खानखाना को प्रसन्न देखना चाहता था, इसलिये उसने खानखाना को दानियाल के पुत्र अपने साथ ले जाने की अनुमति दे दी।

जहाँगीर ने खानखाना को ईरान के शाह से प्राप्त समन्द नामक घोड़ा, फतूह नाम का हाथी तथा बीस अन्य हाथी भी उसकी विदाई में उपहार के तौर पर दिये। समंद और फतूह आगरा की सेना में सर्वश्रेष्ठ घोड़ा और सर्वश्रेष्ठ हाथी माने जाते थे। इस उपहार के माध्यम से जहाँगीर खानखाना को जता देना चाहता था कि यदि खानखाना जहाँगीर के अनुकूल रहा तो उस पर बादशाही कृपा हर तरह से बनी रहेगी। जिस समय खानखाना ने पुनः दक्षिण के लिये कूच किया तो बादशाह ने खासा हाथी, सिरोपाव, जड़ाऊ तलवार और पेटी प्रदान किये।

इतना सब हो जाने पर भी जहाँगीर को संतोष नहीं हुआ। खानखाना के चले जाने के बाद जहाँगीर ने शहजादा परवेज को भी दक्षिण की ओर रवाना किया तथा स्वयं आगरा से चलकर अजमेर में आकर बैठ गया। जहाँगीर ने शहजादे को पच्चीस लाख रुपये दिये और मुगलिया सल्तनत के लगभग तमाम विश्वस्त सेनापति भी उसके अधीन करके उसके साथ भेजे। लगभग दो सौ मनसबदार, एक हजार अहदी और कई हजार सैनिकों की विशाल कुमुक लेकर परवेज दक्षिण में पहुँचा। उसने खानखाना को प्रसन्न करने के लिये बादशाह की ओर से हाथी, घोड़े, जड़ाऊ हथियार और अन्य उपहार प्रदान किये। खानखाना ने एक लाल और दो मोती बादशाह को भिजवाये। बादशाह ने इन रत्नों की कीमत बीस हजार रुपये लगायी।

जब यह सारी सेना दक्षिण में पहुँची तो दक्षिण में बड़ी भारी बेचैनी फैली। अब तक तो खानखाना लगभग सभी राज्यों से किसी न किसी प्रकार की संधि करके दक्षिण में शांति बनाये हुए था किंतु विशाल मुगल कुमुक को देखकर दक्खिनियों को इन संधियों पर विश्वास न रहा और वे इकठ्ठे होकर संघर्ष की तैयारी करने लगे।

खानखाना अपनी बात से गिरना नहीं चाहता था इसलिये उसने बादशाह को लिखा कि और कुमुक न भेजी जाये किंतु दूसरी ओर शहजादा परवेज और अन्य सेनापतियों ने ज्यादा से ज्यादा कुमुक की मांग रखी। बादशाह ने और कुमुक भिजवा दी।

सैंकड़ों सेनापतियों और हजारों सेनानायकों के एक ही स्थान पर एकत्रित हो जाने से उनमें मतभेद होने लगा। प्रत्येक मामले पर वे अलग-अलग राय बनाकर बैठ जाते। कोई भी किसी से सहमत नहीं होता था। सबकी राय भिन्न होती थी और सब के सब अपनी ही बात को सही मानते थे। स्थितियाँ खानखाना के हाथ से निकल गयीं।

परवेज ने उनके किसी भी सुझाव को स्वीकार नहीं किया। इस सब का परिणाम यह रहा कि जब परवेज ने बालाघाट पर चढ़ाई की तो दक्खिनियों ने मुगलों की रसद रोक दी जिससे बड़ी संख्या में हाथी, घोड़े और ऊंट मारे गये। अपनी सेना का जीवन बचाने के लिये परवेज को अपमान जनक शर्तों पर संधि करनी पड़ी। अहमदनगर का किला भी मुगलों के हाथ से निकल गया।

शहजादा परवेज, खानेजहाँ लोदी तथा अन्य समस्त सेनापतियों ने इस पराजय का ठीकरा खानखाना के माथे पर फोड़ दिया। उन्होंने बादशाह को लिखा कि यह पराजय और बदनामी खानखाना की कुटिलता से हुई है। बादशाह खानखाना पर बहुत बिगड़ा। इस पर खानखाना ने बादशाह को लिखा कि मुझे दक्षिण से हटाकर दरबार में बुला लिया जाये। जहाँगीर ने ऐसा ही किया और खानेजहाँ को दक्षिण का सारा जिम्मा सौंप दिया।

-अध्याय 108, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

दक्षिण में आग (109)

0

खानखाना के दक्षिण से हटते ही दक्खिनियों के हौंसले बुलंद हो गये। वे एक जुट होकर खानेजहाँ लोदी में कसकर मार लगाने लगे। सल्तनत का विश्वस्त सेनापति अब्दुल्लाखाँ खानेजहाँ की सहायता के लिये भेजा गया किंतु वह हार कर गुजरात भाग आया। खाने आजम कोका भी बुरी तरह परास्त हुआ।

रामदास कच्छवाहा और मानसिंह भी पीट दिये गये। फीरोज जंग भी मोर्चा छोड़कर गुजरात भाग आया। अली मरदानखाँ पकड़ा गया। शहजादा परवेज बुरहानपुर से बाहर ही नहीं निकल सका। मुगल सेनायें हर तरफ आग से घिर गयीं। स्थिति यह हो गयी कि मुगल जहाँ भी जाते थे, अपने आप को दक्खिनियों से घिरा हुआ पाते थे।

यह सब देखकर जहाँगीर की आँखें खुलीं। वह समझ गया कि पिछले अठारह साल से खानखाना दक्षिण में शांति बनाये बैठा था, वह किसी और के वश की बात नहीं। खानखाना के शत्रुओं ने खानखाना के विरुद्ध जो शिकायतें की थीं उनकी वास्तविकता जहाँगीर के सामने आ गयी। उसने खानखाना को प्रसन्न करना आरंभ किया।

खानखाना का मनसब बढ़ाकर छः हजारी कर दिया। उसके बेटे एरच को तीन हजारी मनसब तथा शाहनवाजखाँ की उपाधि दी। खानखाना के नौकर फरेन्दूखाँ को ढाई हजारी जात, खानखाना के मित्र राजा बरसिंह को चार हजारी जात तथा रायमनोहर को एक हजारी जात का मनसब दिया।

खानखाना ने दक्षिण में पहुँच कर फिर से अपने मित्रों को एकत्र किया और पुरानी संधियों को पुनर्जीवित कर दिया। धीरे-धीरे आग बुझने लगी और मुगलों के हाथ से निकल गये समस्त पुराने क्षेत्र फिर से अधिकार में आ गये। इन सब दक्खिनियों से खानखाना ने कीमती रत्न प्राप्त करके जहाँगीर को भिजवाये।

तीन माणिक, एक सौ तीन मोती, सौ याकूत, दो जड़ाऊ फरसे, मोतियों और याकूतों की जड़ी हुई किलंगी, जड़ाऊ झरझरी, जड़ाऊ तलवार, जड़ाऊ भुजबंद, हीरे की अंगूठी, मखमल की तरकश, पंद्रह हाथी तथा एक ऐसा घोड़ा भी इस भेंट में शामिल था जिसकी गर्दन के बाल धरती तक लटकते थे।

खानखाना के पुत्र शाहनवाजखाँ ने भी अपनी ओर से पाँच हाथी तथा तीन सौ अनुपम वस्त्र बादशाह को भेंट किये। जहाँगीर इस भेंट को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। वह समझ गया कि दक्षिण में आग बुझ चुकी है।

-अध्याय 109, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

ऊदाराम ब्राह्मण (110)

0

दक्षिण में इस तरह की शांति देखकर खानेजहाँ लोदी की छाती पर साँप लोट गया। वह कतई नहीं चाहता था कि बादशाह इस बात को देखे कि जिस मोर्चे पर खानेजहाँ असफल हो गया, वहाँ किसी और ने सफलता के झण्डे गाढ़ दिये। वस्तुतः मुगलिया सल्तनत की स्थापना से लेकर उसके अंत तक मुगल सेनापतियों और अमीर-उमरावों में यह प्रतिस्पर्धा अपने चरम पर बनी रही कि जीत का श्रेय मेरे ही नाम लिखा जावे।

खानेजहाँ ने जहाँगीर को फिर से खानखाना के विरुद्ध भड़काया कि जब तक खानखाना दक्षिण में रहेगा, कभी भी पूरा दक्षिण मुगलों के अधीन नहीं होगा। खानखाना दक्षिण में अपनी आवश्यकता जतलाकर बादशाह की कृपा का पात्र बने रहना चाहता है तथा इस बहाने से बादशाह से दूर रह कर सत्ता का वास्तविक सुख भोग रहा है।

वह दक्षिण में जो भी लूट करता है, अपने बेटों और सिपाहियों में बांट देता है। इसलिये उसके सिपाही मुगलिया सल्तनत के प्रति वफादार न होकर खानखाना के प्रति वफादार हैं। यदि मुझे वहाँ जाने दिया जाये तो दो साल में ही समूचा दक्षिण जहाँगीर के अधीन हो जायेगा।

जहाँगीर फिर से खानेजहाँ की बातों में आ गया और उसने खानेजहाँ को बहुत सी सेना तथा रुपया देकर दक्षिण के लिये रवाना कर दिया। जोधपुर का राजा सूरसिंह भी राजपूतों की सेना सहित उसके साथ भेजा गया।

खानेजहाँ को फिर से दक्षिण में आया देखकर दक्खिनियों में असंतोष तथा बेचैनी फूट पड़ी। उन्होंने मलिक अम्बर के नेतृत्व में खानखाना के बेटे शहनवाजखाँ के डेरे पर आक्रमण किया। शहनवाजखाँ और उसके भाई दाराबखाँ ने दो घड़ी तक ऐसी जर्बदस्त तलवार चलाई कि देखने वालों की आँखें पथरा गयीं। दक्खिनी मोर्चा छोड़कर कोसों दूर तक भागते चले गये।

जब दक्षिण में पुनः शांति स्थापित हो गयी तो जहाँगीर ने परवेज के स्थान पर खुर्रम को दक्षिण में नियुक्त किया। खुर्रम ने खानखाना और उसके बेटों से प्रार्थना की कि अब चाहे जो भी हो सम्पूर्ण दक्षिण मुगलिया सल्तनत में शामिल किया जाये। खानखाना ने कहा कि यदि ऊदाराम ब्राह्मण को तीन हजारी मनसब दिला दिया जाये तो इस काम को किया जाना संभव है।

ऊदाराम ब्राह्मण दक्खिनियों में उन दिनों बड़ी धाक रखता था। वह मलिक अम्बर की सेवा में नियुक्त था। मलिक अम्बर की वास्तविक ताकत ऊदाराम ही था। वह अत्यंत वीर, वचनों का धनी और व्यवहार कुशल सेनापति था। खानखाना ने अकबर के जमाने में ऊदाराम को वचन दिया था कि यदि ऊदाराम मलिक अम्बर को छोड़कर खानखाना की सेवा में आ जाये तो उसे तीन हजारी मनसब दिलवाया दिया जायेगा।

ऊदाराम ने खानखाना की शर्त स्वीकार भी कर ली थी किंतु खानखाना अपना वचन पूरा कर सके इससे पहले ही अकबर की मृत्यु हो गयी और उसके बाद तो स्वयं खानखाना को ही दक्षिण से हटा लिया गया था। इस पर ऊदाराम खानखाना का शत्रु होकर घूमता था। अब अवसर आया तो खानखाना ने अपने पुराने वचन को पूरा करने की ठानी।

खुर्रम ने जहाँगीर से कहकर ऊदाराम को तीन हजारी जात और पंद्रह हजारी सवार का मनसब दिलवा दिया। ऊदाराम को खानखाना की सेवा में गया जानकर मलिक अम्बर के हौंसले पस्त हो गये। उसने अपने समस्त किलों की चाबियाँ खुर्रम को भिजवा दीं। यह वही मलिक अम्बर था जिसके कारनामों के कारण चिंतित अकबर ने कई रातें जागते हुए बिताई थीं। मलिक अम्बर को मुगलों की शरण में गया हुआ देखकर दक्षिण के तमाम सरदार शहजादे खुर्रम की सेवा में हाजिर हो गये।

यह सफलता पाकर खुर्रम खानखाना के दोनों बेटों शहनवाजखाँ तथा दाराबखाँ के साथ तमाम दक्षिणी सरदारों को लेकर जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। जहाँगीर ने इस सफलता से प्रसन्न होकर खुर्रम पर मोती जवाहर निछावर किये। उसे तीस हजारी मनसब और दरबार में कुरसी पर बैठने का अधिकार दिया। खुर्रम ने भरे दरबार में बादशाह से अनुरोध किया कि दरबार में कुर्सी पर बैठने का यदि कोई वास्तविक हकदार है तो वह ऊदाराम ब्राह्मण है।

-अध्याय 110, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

कहर दर कहर (111)

0

खानखाना ने जहाँगीर को हीरे की एक खान समर्पित की जो खानखाना के बेटे अमरूल्लाह ने खानदेश के जमींदार पनजू से छीनी थी। जहाँगीर ने अत्यंत प्रसन्न होकर खानखाना का खिताब सात हजारी मनसब और सात हजारी सवार कर दिया। ये वे क्षण थे जब जहाँगीर अपने जीवन में खानखाना पर सर्वाधिक प्रसन्न हुआ। इसके बाद खानखाना के जीवन में फिर ऐसा अवसर न आया।

जहाँगीर हर तरह से खानखाना को प्रसन्न किया चाहता था और उससे निकटता दर्शाना चाहता था। इसलिये उसने इस अवसर पर खानखाना के बेटे दाराबखाँ को नादरी का खिलअत दिया[1]  तथा खानखाना को सलाह देते हुए कहा- ‘हमने सुना है कि इन दिनों शाहनवाजखाँ बहुत शराब पीता है। उसे कहो कि वह इस तरह अपने को नष्ट न करे।’

जब जहाँगीर खानखाना को यह सलाह दे रहा था तब अचानक ही उसका हाथ अपने गालों पर चला गया। यह वही गाल था जिस पर एक दिन अकबर ने सलीम को शराब न पीने की नसीहत के साथ जोरदार तमाचा मारा था।

जब खानखाना बादशाह से विदा लेकर बुरहानपुर पहुँचा तो उसने पाया कि शाहनवाज अत्यधिक शराब पीने से मरणासन्न है। खानखाना ने बेटे का बहुत इलाज करवाया किंतु एक दिन मौत उसे खींचकर ले ही गयी। पत्नी माहबानो तथा दामाद दानियाल की मृत्यु के बाद खानखाना पर यह तीसरा कहर था।

जहाँगीर को जब यह समाचार मिला तो उसने खानखाना को सहानुभूति का संदेश भेजा। जहाँगीर और कुछ तो खानखाना का भला नहीं कर सकता था किंतु इतना प्रबंध उसने अवश्य किया कि खानखाना अपने बेटों और पोतों की तरक्की होते हुए देखकर प्रसन्न हो सके।

जहाँगीर ने खानखाना के दूसरे बेटे दाराबखाँ का ओहदा बढ़ाकर पाँच हजारी मनसब कर दिया। शाहनवाजखाँ की सूबेदारी के सारे क्षेत्र दाराबखाँ को दे दिये। खानखाना के तीसरे पुत्र रहमानदाद को दो हजारी जात और सात सौ सवारों का मनसब दिया। शाहनवाज के पुत्र मनुचहर को दो हजारी जात तथा एक हजारी सवार का मनसब दिया और शाहनवाज के दूसरे पुत्र तुगरल को एक हजारी जात और पाँच सौ सवार का मनसब दिया। खानखाना अपने कुनबे को इस तरह आगे बढ़ता देखकर प्रसन्न हुआ किंतु यह प्रसन्नता कुछ ही दिनों के लिये थी।

मलिक अम्बर ने भले ही मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी किंतु ऊदाराम ब्राह्मण के हाथ से निकल जाने के कारण वह खानखाना से बहुत नाराज रहता था और उससे बदला लेने की योजनायें बनाता रहता था। एक दिन अवसर पाकर उसने खानखाना के तीसरे बेटे रहमानदाद को मार डाला। खानखाना पर फिर से विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। मुगलों की सेवा में वह अपने कुनबे की भेंट चढ़ाता जा रहा था। सियासत का यह घिनौना चेहरा देखकर खानखाना सकते में था। खानखाना की सेना में मलिक अम्बर का खौफ छा गया।

-अध्याय 111, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  नादरी बिना बाहों की कमरी होती थी जो जामे के ऊपर पहनी जाती थी। इसे बिना बादशाह की अनुमति के कोई नहीं पहिन सकता था।

जौहर (112)

0
जौहर - www.bharatkaitihas.com
जौहर

पूरी मुगल सेना में हड़कम्प मचा हुआ था। जिसे देखो वही कुछ न कुछ नवीन सूचना बांटने में लगा हुआ था। जितने मुँह उतनी बातें। कोई कहता था कि खानखाना मलिक अम्बर के सामने समर्पण करने जा रहा है। कोई कहता था कि खानखाना ने जौहर करने का फैसला किया है। हालांकि जौहर हिन्दू स्त्रियों द्वारा किया जाता था न कि मुसलमान पुरुषों द्वारा।

कोई कहता था कि बादशाह की कुमुक अहमदाबाद तक आ गयी है, इसलिये खानखाना उस कुमुक की प्रतीक्षा तक चुपचाप बैठा है। इतनी सारी बातों के बावजूद कोई भी सैनिक यह कहने की स्थिति में नहीं था कि इन सारी बातों में से कौन सी बात सही है।

इन चर्चाओं को विराम तभी लगा जब शाम के समय खानखाना ने पूरी फौज को एकत्र कर आधिकारिक रूप से घोषणा की कि यदि एक माह के भीतर बादशाही कुमुक नहीं आती है तो खानखाना के सिपाहियों को जौहर करने के लिये तैयार रहना चाहिये। आगे का निर्णय सिपाहियों को करना था कि उनमें से कौन खानखाना का साथ निभाना चाहता है और कौन मोर्चा छोड़कर भागना चाहता है।

हालांकि यह सभी जानते थे कि खानखाना की सेना अपने शत्रुओं और लुटेरों से इस कदर घिर गयी है कि मोर्चे पर से निकल भागना किसी के लिये संभव नहीं है। यहाँ तक कि स्वयं खानखाना के लिये भी नहीं। यदि ऐसा हो पाता तो खानखाना जौहर करने की घोषणा ही क्यों करता!

जब मलिक अम्बर रहमानदाद को मारने में सफल हो गया और दाराब खाँ लाख चाहकर भी मलिक अम्बर को नहीं पकड़ सका तो मलिक अम्बर के हौंसले बुलंद हो गये। उधर उसे यह खबर भी मिली कि बादशाह स्वयं तो कश्मीर में जा बैठा है और उसके दूसरे अमीर-उमराव कोट कांगड़े की लड़ाई में बुरी तरह फंस गये हैं। यह सूचना पाकर मलिक अम्बर ने खुल्लमखुल्ला बगावत कर दी।

मलिक अम्बर ने खुर्रम के साथ की हुई सारी संधियों को तोड़ डाला। उसे देखकर दूसरे दक्खिनियों ने भी मुगलों से विद्रोह कर दिया। खानखाना बहुत प्रयास करता था किंतु वह मलिक को दबा नहीं पाता था। शहनवाजखाँ और रहमानदाद के न रहने से खानखाना की ताकत बहुत घट गयी थी।

खानखाना ने बादशाह को बहुत सी चिठ्ठियाँ भिजवाईं कि कुछ सेना भिजवाई जाये किंतु बादशाह की ओर से कोई जवाब नहीं आया। ऐसा नहीं था कि बादशाह तक चिठ्ठियाँ पहुँची नहीं, चिठ्ठियाँ पहुँची किंतु बादशाह उनका जवाब देने की स्थिति में नहीं रहा था। मेवाड़, कश्मीर और कोट कांगड़े में सेनाएं इस कदर उलझ गयीं थीं कि किसी भी तरह से खानखाना को कुमुक भिजवाया जाना संभव नहीं था। यही कारण था कि जहाँगीर खानखाना को जवाब भिजवाने की बजाय चुप लगा जाना ही अधिक उचित समझ रहा था।

उधर दक्खिनियों ने खानखाना को खदेड़ना आरंभ किया और उसका पीछा करते हुए बुरहानपुर तक चले आये। बुरहानपुर में खानखाना बुरी तरह घिर गया। दक्खिनियों ने रसद की आपूर्ति काट दी। जिससे मुगल सेना के पशु घास और चारे के अभाव में मरने लगे। यहाँ तक कि आदमियों के भी भूखों मरने की नौबत आ गयी।

एक-एक करके सारे प्रदेश हाथ से निकलते जा रहे थे और मुगल सिपाहियों की संख्या घटती जा रही थी। खाने-पीने का सुभीता न देखकर बहुत से सिपाही खानखाना को छोड़कर दक्खिनियों से जा मिले थे। मुगलों की घटती हुई ताकत को देखकर लुटेरों की फौज मुगल सेना के चारों ओर इकट्ठी हो गयी। ये लुटेरे मौका पाते ही मुगलों के डेरे में घुस जाते और उनका माल-असबाब लूट कर भाग खड़े होते।

इस तरह सब काता-कूता कपास होते हुए देखकर खानखाना का मस्तिष्क सुन्न हो जाता था। वह एक ऊँची टेकरी पर घोड़ा खड़ा करके उस पर चढ़कर अपनी बूढ़ी आँखों से घण्टों तक उत्तर दिशा की ओर ताका करता था और किसी भी क्षण कुमुक आने की उम्मीद करता था किंतु वहाँ से कुमुक तो दूर किसी पत्र तक का जवाब नहीं आया।

साठ हजार दक्खिनियों का मुकाबला मुगलों के छः-सात हजार सिपाही किसी भी तरह नहीं कर सकते थे। एक जमाना वह भी था जब खानखाना मुठ्ठी भर सिपाहियों को लेकर मुजफ्फरखाँ जैसे प्रबल शत्रु से जा भिड़ा था और उसके छक्के छुड़ा दिये थे किंतु वक्त के थपेड़ों ने खानखाना के शरीर और मन में इतना दम न छोड़ा था। यहाँ तक कि बराड़ और खानदेश भी उसके हाथ से निकल गये। ये वे क्षेत्र थे जिन्हें खानखाना ने सत्रह साल पहले अपने अधीन किया था।

स्थितियाँ जब एक-दम असह्य हो गयीं तो खानखाना ने जहाँगीर को अंतिम पत्र लिखा कि यदि एक माह में आगरा से कुमुक नहीं भेजी गयी तो मेरे पास हिन्दू वीरों की तरह जौहर करने के अतिरिक्त और कोई उपाय न बचेगा। मैं अपने हरम की औरतों को आग में जला कर स्वयं अपने बेटों-पातों और सिपाहियों सहित शत्रु से जूझता हुआ मृत्यु को प्राप्त होऊंगा। मुगलिया सल्तनत को यही मेरी अंतिम सहायता होगी। शत्रुओं के हाथों अपमानित होने की अपेक्षा तो रण में जूझते हुए मर जाना अधिक श्रेयस्कर है।

खानखाना का पत्र पाकर जहाँगीर के हाथों से तोते उड़ गये। वह एकदम से बेचैन हो उठा। उसने तुरंत ही अपना संदेशवाहक खानखाना को दौड़ाया कि खुर्रम के आने से पहले कोई कदम न उठाये। उसने कोट कांगड़ा के मोर्चे पर फतह हासिल होने का जश्न मना रहे खुर्रम को संदेश भिजवाया कि जिस तरह तुम्हारे दादा जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने किसी जमाने में खानेआजम कोका को गुजरातियों के शिकंजे से छुड़ाया था, तुम भी उसी तरह तेज गति से बुरहानपुर पहुँच कर खानखाना को छुड़ाओ और यह शुभ समाचार मुझे तुरंत ही भिजवाओ।

जहाँगीर ने अपनी स्वयं की भी लगभग सारी सेना कोकाखाँ के साथ दक्खिन के मोर्चे पर भिजवा दी। खुर्रम ताबड़तोड़ कूच करता हुआ बुरहानपरु पहुँचा। उसने दक्खिनियों में कसकर मार लगाई और खानखाना को उनके शिकंजे से बाहर निकाला। खुर्रम की प्रबलता देखकर मलिक अम्बर ने पुनः दीनता दिखाते हुए मुगलों के अधिकार वाले पुराने क्षेत्र खुर्रम को समर्पित कर दिये।

-अध्याय 112, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

आधा सेर कबाब (113)

0

जहाँगीर ने अपने अमीरों से कहा कि मैंने अपना सारा राज्य नूरजहाँ को दे दिया है। अब मुझे क्या चाहिये? कुछ भी तो नहीं, सिवाय एक सेर शराब और आधा सेर कबाब के!

किसी समय ईरान में मिर्जा गयास बेग नामक आदमी रहता था। वह था तो मिर्जाओं के वंश में से किंतु उसकी माली हालत बहुत खराब थी। एक दिन ऐसा भी आया कि घर में ठीक से खाने को न रहा। जब उसने सुना कि मलिक मसूद नामक व्यापारी अपने काफिले के साथ हिन्दुस्थान जा रहा है तो गयास बेग भी उसके साथ हो लिया।

विकट रेगिस्तानी मार्ग में गयास बेग की औरत असमत बेगम ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम मेहरून्निसा रखा गया। ईरान से भारत तक के लम्बे सफर में अनेक बाधायें आयीं। कभी रेतीली आंधियों से मुकाबला हुआ तो कभी डाकुओं से। कभी पीने के पानी की कमी से जूझना पड़ा तो कभी पशुओं की महामारी से। फिर भी किसी तरह यह काफिला हिन्दुस्थान पहुँच गया। मलिक मसूद ने गयास बेग को अकबर के दरबार में नौकरी दिलवा दी।

गयास बेग उद्यमी व्यक्ति था। उसने अपनी सेवा और स्वामिभक्ति से अकबर और उसके सेनापतियों को प्रसन्न कर लिया और उन्नति करता हुआ तीन सौ सवारों का मनसबदार बन गया।

मेहरून्निसा का ईरानी खून हिन्दुस्तान की जलवायु में अच्छा रंग लाया और शीघ्र ही वह एक सुंदर युवती में परिवर्तित हो गयी। एक दिन जब शहजादे सलीम की दृष्टि मेहरून्निसा पर पड़ी तो वह उसे पाने के लिये आतुर हो गया। यह तब की बात है जब मेहरून्निसा ने यौवन की दहलीज पर पहला कदम ही रखा था और उधर सलीम के हरम में औरतों की संख्या आठ सौ से ऊपर जा पहुँची थी।

गयास बेग तथा असमत बेगम की पहुँच सीधे अकबर तथा उसकी बेगमों तक थी इसलिये बिना विवाह किये मेहरून्निसा को पाना संभव नहीं था। सलीम ने अपनी माता तथा अन्य बेगमों से कहा कि मेहरून्निसा का विवाह मुझसे कर दिया जाये किंतु अकबर इस विवाह के लिये राजी नहीं हुआ। सलीम की इच्छा के विपरीत अकबर ने स्वयं रुचि लेकर मेहरून्निसा का विवाह अपने नौकर अलीकुली से कर दिया और सलीम हाथ मलता ही रह गया।

जब सलीम जहाँगीर के नाम से तख्त पर बैठा तो उसके मन में मेहरून्निसा को पाने की ललक फिर से जागी। एक बार मेहरून्निसा के पति अलीकुली ने अकेले ही एक शेर को मारा। इस पर जहाँगीर ने उसे शेर अफगन की उपाधि दी और उसे बर्दवान का फौजदार नियुक्त कर दिया।

जब शेर अफगन बर्दवान पहुँच गया तो जहाँगीर ने बंगाल के सूबेदार कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि शेर अफगन विद्रोह की तैयारियां कर रहा है, इसलिये उस पर निगाह रखी जाये। कुतुबुद्दीन ने शेरअफगन को गिरफ्तार करने का प्रयास किया किंतु इस संघर्ष में दोनों ही मारे गये। शेर अफगन के मारे जाने पर जहाँगीर ने मेहरून्निसा और उसकी बेटी को अपने पास बुलवा लिया। कुछ दिनों बाद जहाँगीर ने मेहरून्निसा से विवाह कर लिया और अपनी नयी बेगम का नाम रखा- नूरमहल।

मेहरून्निसा भाग्य के इस तरह पलटा खाने से बहुत दुखी हुई किंतु शीघ्र ही उसे पता लग गया कि यह उसका अपकर्ष नहीं था अपितु भाग्योत्कर्ष के कारण ही ऐसा हुआ था। वह जितनी सुंदर थी, उससे कहीं अधिक बुद्धिमती थी। वह जितनी कोमलांगी थी, उससे कहीं अधिक कठोर हृदया थी।

वह जितनी मधुर भाषिणी थी उससे कहीं अधिक चतुरा थी। धीरे-धीरे वह जहाँगीर की प्रीतपात्री बन गयी। जहाँगीर उसके सौंदर्य पाश में ऐसा बंधा कि सारे महत्वपूर्ण निर्णय उसी से पूछकर करने लगा। कुछ ही दिनों बाद जहाँगीर को लगने लगा कि उसने मेहरून्निसा को नूरमहल की उपाधि देकर उसके साथ न्याय नहीं किया है इसलिये जहाँगीर ने नूरमहल को नयी उपाधि दी- नूरजहाँ।

कुछ ही दिानों में नूरजहाँ का नूर जहाँगीर के हरम से निकल कर उसके दरबार और पूरे देश में फैलने लगा। उसके पिता मिर्जा गयास बेग को एत्मादुद्दौला की तथा भाई को आसफखाँ की उपाधि मिली। अब वे दोनों बादशाह के दरबार में सर्वप्रमुख व्यक्ति हो गये।

अब नूरजहाँ ही जागीरें, मनसब और उपाधियाँ बाँटने लगी। वह बादशाह का चिह्न धारण करके महल के झरोखे में बैठ जाती। उसने अपने नाम से सिक्के ढलवाये तथा वह विधवा औरत से साम्राज्ञी बन गयी। शाही फरमानों में जहाँगीर के साथ नूरजहाँ का भी नाम लिखा जाने लगा। जिस फरमान में नूरजहाँ का नाम नहीं होता था, उसे राजकीय कर्मचारी नहीं मानते थे।

एक दिन ऐसा भी आया जब जहाँगीर ने अपने अमीरों से कहा कि मैंने अपना सारा राज्य नूरजहाँ को दे दिया है। अब मुझे क्या चाहिये? कुछ भी तो नहीं, सिवाय एक सेर शराब और आधा सेर कबाब के!

-अध्याय 113, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

भेड़िये का बच्चा (114)

0

जहाँगीर के पाँच बेटे थे- खुसरो, परवेज, खुर्रम, जहाँदार और शहरयार। खुसरो पहले ही बादशाह द्वारा आँखें फुड़वाकर मरवाया जा चुका था। अब परवेज ही सबसे बड़ा था और वही बादशाह को सबसे प्रिय था लेकिन नूरजहाँ के भाई आसफ अली की बेटी का विवाह खुर्रम के साथ हो जाने से नूरजहाँ परवेज के पक्ष में न थी जिससे परवेज का प्रभाव घट गया था।

खुर्रम अत्यंत महत्वाकांक्षी, सत्ता लोलुप और दुराग्रही व्यक्ति था। नूरजहाँ का सहारा मिल जाने से अब तक उसी को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन के सर्वाधिक अवसर मिले थे। यही कारण था कि अब तक सर्वाधिक लड़ाईयाँ खुर्रम ने ही लड़ी थीं और सर्वाधिक सफलतायें भी उसी ने अर्जित की थीं।

जब नूरजहाँ ने अपने पेट से उत्पन्न अपने पूर्व पति शेरअफगन की बेटी का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे बेटे शहरयार से कर दिया तो नूरजहाँ की रुचि खुर्रम में न रही। वह चाहती थी कि खुर्रम के स्थान पर शहरयार को सफलतायें प्राप्त हों और वही बादशाह के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित हो लेकिन शहरयार नितांत निकम्मा और अयोग्य आदमी था। जब वह उद्यम ही नहीं करता था तो सफलतायें कहाँ से मिलतीं!

जब खुर्रम बादशाह से बहुत सा मान सम्मान और सेना पाकर दक्षिण को गया और खानखाना को दक्खिनियों के चंगुल से छुड़ाने के बाद एक के बाद एक करके सफलताओं के झण्डे गाढ़ने लगा तो नूरजहाँ को अच्छा नहीं लगा। उसने खुर्रम का प्रभाव घटाने के लिये दिल्ली, आगरा और पंजाब सूबों की सर्वश्रेष्ठ जागीरें शहरयार को प्रदान कर दीं। खुर्रम को बहुत ही घटिया और अनुपजाऊ जागीरें दी गयीं किंतु दक्खिन में होने से उसे इस परिवर्तन का ज्ञान न हो सका।

जब ईरान का शाह अब्बास सफवी कांधार पर चढ़कर आया तो जहाँगीर ने खुर्रम को आदेश भिजवाया कि वह खानखाना को लेकर शाह ईरान का रास्ता रोके तथा कांधार की रक्षा करे।

जब खुर्रम खानखाना को साथ लेकर दक्षिण से पश्चिमी सूबों में आया तो उसे ज्ञात हुआ कि दिल्ली, आगरा और पंजाब सूबों की सर्वश्रेष्ठ जागीरें शहरयार को दे दी गयी हैं तो खुर्रम मांडी में ही ठहर गया और बादशाह को संदेश भिजवाया कि वह वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद कांधार जायेगा।

नूरजहाँ यही चाहती थी कि खुर्रम कोई गलती करे। उसने तत्काल मुगल सेनापतियों को संदेश भिजवाया कि वे खुर्रम को वहीं छोड़कर बादशाह की सेवा में कश्मीर चले आयें तथा बादशाह की ओर से खुर्रम को लिखवाया कि अब खुर्रम यहाँ न आये। मालवे, दक्खन और खानदेश के सूबे उसे इनायत किये जाते हैं, वहीं कहीं जाकर रहे। 

खुर्रम बादशाह के पत्र पाकर और भी भड़क गया। उसने अपने सेनापति सुंदर ब्राह्मण को आदेश दिया कि आगरा पर धावा करे। खानखाना को खुर्रम के साथ देखकर विक्रमाजीत सुंदर ब्राह्मण अपनी सेना लेकर आगरा पर चढ़ दौड़ा। उसने आगरे के कई नामी अमीरों के घर लूट लिये और बहुत सा धन लाकर खुर्रम को अर्पित किया। बादशाह यह समाचार पाते ही आगरा की ओर रवाना हुआ।

खानखाना और उसका पुत्र दाराबखाँ भी खुर्रम के साथ थे। उन्हें भी बादशाह की सेवा में हाजिर होने के आदेश दिये गये किंतु नियति खानखाना के सामने आकर खड़ी हो गयी। एक ओर बादशाह जहाँगीर था जिसके हजार अहसान खानखाना पर थे तो दूसरी ओर शहजादा खुर्रम जो खानखाना के मरहूम बेटे शाहनवाजखाँ की बेटी का पति था। खानखाना दुविधा में फंस गया। वह कोई भी निर्णय लेने की स्थिति में न रहा।

बेटी जाना के विधवा हो जाने के बाद पौत्री ही अब उसके स्नेह का केंद्र थी किंतु जहाँगीर उस यतीम पौत्री के सुख को भी छीन लेना चाहता था। सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़कर खानखाना ने खुर्रम के साथ ही रहना ठीक समझा।

इसी बीच नूरजहाँ के इशारे पर शहरयार ने जहाँगीर से निवेदन किया कि जब खुर्रम कांधार के मोर्चे पर जाने को तैयार नहीं है तो मुझे भेजा जाये। जहाँगीर ने शहरयार को कांधार जाने की अनुमति दे दी। जब कुछ दिनों बाद जहाँगीर को सूचना मिली कि शहरयार हार गया और शाह ईरान ने कांधार पर अधिकार कर लिया तो बादशाह बुरी तरह तिलमिला गया। वह किसी न किसी पर अपना क्रोध उतारने का अवसर ढूंढने लगा। शीघ्र ही उसे यह अवसर प्राप्त हो गया।

जब जहाँगीर ने देखा कि अन्य सेनापति तो खुर्रम को छोड़कर जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हो गये हैं किंतु खानखाना तथा उसके बेटे-पोते खुर्रम के ही साथ हैं तो वह खानखाना पर बड़ा कुपित हुआ। उसने खानखाना को लिखा कि तेरा तो पूरा शरीर ही नमक हरामी से बना हुआ है।

सत्तर वर्ष की उम्र में तूने बादशाह से विद्रोह करके अपना मुँह काला किया तो दूसरों को क्या दोष दूँ? तेरे बाप ने भी अपनी अंतिम अवस्था में मेरे बाप से विद्रोह किया था। तू भी अपने बाप का अनुगामी होकर हमेशा के लिये कलंकित हुआ। भेड़िये का बच्चा आदमियों में बड़ा होकर भी अंत में भेड़िया ही बनता है।’

खानखाना समझ गया कि भाग्य रथ का पहिया उल्टा घूम चुका है। उस आयु में बादशाही कोप को झेल पाना खानखाना के बूते के बाहर की बात थी।

-अध्याय 114, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

दादा-पोते (115)

0

मुगलिया राजनीति की खूनी चौसर पर अब दादा.पोते एक-दूसरे का सिर उतारने के लिए आमने-सामने ख़ड़े थे। एक तरफ था अब्दुर्रहीम खानखाना तो दूसरी ओर उसका पोता मनूंचहर!

खानखाना के समझाने पर खुर्रम ने बादशाह के पास क्षमा याचना की कई अर्जियाँ भिजवाईं किंतु बादशाह ने उन पर कोई विचार नहीं किया। जो भी वकील अर्जी लेकर बादशाह के सामने हाजिर होता था, बादशाह उसी को कैद कर लेता था। नूरजहाँ की सलाह पर जहाँगीर ने बंगाल से परवेज को बुलाया और उसे खुर्रम पर आक्रमण करने के लिये भेजा। परवेज विशाल सेना लेकर खुर्रम तथा खानखाना के पीछे लग गया।

इस समय खुर्रम के पास बीस हजार सिपाही थे जबकि परवेज के पास चालीस हजार सिपाही थे। फिर भी खानखाना का खुर्रम की ओर होना ही जीत की निशानी थी।

जब परवेज चाँद के घाटे से उतर कर मालवे में आया तो खानखाना के मरहूम पुत्र शाहनवाजखाँ का बेटा मनूंचहर खुर्रम का साथ छोड़कर परवेज के पास चला गया। खानखाना के लिये यह बड़ा झटका था। खानखाना की समझ में नहीं आ रहा था कि जीवन के रंगमच पर आखिर ईश्वर ने उसके लिये क्या भूमिका निश्चित की है। वह किसके लिये लड़े और किससे लड़े? यदि युद्ध के मैदान में उसका सामना मनूंचहर से हो गया तो खानखाना क्या करेगा? तलवार उठायेगा या गिरा देगा?

इस नवीन परिस्थिति में खानखाना के लिये एक तरफ खुर्रम और एक तरफ परवेज न रह गये अपिुत उसके लिये तो यह ऐसी लड़ाई हो गयी थी जिसमें एक तरफ उसकी पौत्री थी तो दूसरी ओर पौत्र।

खानखाना पशोपेश में पड़ गया लेकिन फिर भी उसने नियति के निर्णय को स्वीकार कर लिया कि वह जिस स्थान पर खड़ा था, उसी स्थान पर रहे अतः उसने खुर्रम का साथ नहीं छोड़ा। जब परवेज और खुर्रम की सेनाएं आमने-सामने हुई तो खुर्रम की सेना खुर्रम को छोड़कर परवेज से जा मिली। इससे खुर्रम खानखाना तथा दाराबखाँ को अपने साथ लेकर किसी तरह नर्मदा पार करके दक्खिन को भाग गया। दादा-पोते एक-दूसरे का सिर काटने से बच गए।

-अध्याय 115, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

षड़यंत्र (116)

0

– ‘क्या बात है लाल मुहम्मद?’

– ‘हुजूर कहते हुए जुबान कटती है। जान बख्शी जाये तो कुछ हिम्मत करूं।’

– ‘बिना किसी डर के अपनी बात कहो, लाल मुहम्मद। तुम हमारे भरोसेमंद हो।’

शहजादे खुर्रम से आश्वासन पाकर लाल मुहम्मद ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकाली और खुर्रम की ओर बढ़ा दी।

– ‘यह क्या है?’ खुर्रम ने चिट्ठी एक साँस में पढ़ डाली।

– ‘हुजूर! खानखाना का मुखबिर यह चिट्ठी लेकर शहजादे परवेज के पास जाता था। किसी तरह मेरे हाथ पड़ गया।’

– ‘वह मुखबिर कहाँ है?’

– ‘वह मेरे डेरे में कैद है।’

– ‘उसे मेरे सामने हाजिर किया जाये।’

थोड़ी ही देर बाद लाल मुहम्मद, खानखाना के मुखबिर को लेकर खुर्रम के डेरे में हाजिर हुआ।

– ‘क्या तुझे इस चिट्ठी के साथ पकड़ा गया है?’

मुखबिर ने कोई जवाब नहीं दिया।

– ‘सच कह नहीं तो जीभ खींच लूंगा।’

मुखबिर ने इस पर भी जुबान नहीं खोली तो खुर्रम ने तलवार उठाई। यह देखकर मुखबिर खुर्रम के पैरों में गिर पड़ा- ‘मेरी जान बख्शी जाये हुजूर।’

– ‘क्यों बख्शी जाये तेरी जान?’

– ‘मैं तो गुलाम हूँ। कुसूरवार तो कोई और है।’

– ‘तो कुसूरवार का नाम बता।’

– ‘चिट्ठी लिखने वाले का नाम चिट्ठी के नीचे दर्ज है।’

– ‘मैं तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ।’

– ‘जिसका नाम चिट्ठीके नीचे लिखा है, उसी ने मुझे यह चिट्ठी दी थी।’

– ‘खानखाना ने?’

– ‘हाँ हुजूर।’

– ‘सच कहता है?’

– ‘हाँ हुजूर।’

– ‘किसके पास ले जा रहा था?’

– ‘महावतखाँ के पास।’

– ‘लाल मुहम्मद! इस नामुराद को कैद में रख और खानखाना को मेरे सामने हाजिर कर।’

थोड़ी ही देर में खानखाना शहजादे के डेरे में था।

– ‘यह क्या है?’ खुर्रम ने खानखाना की ओर चिट्ठी बढ़ाई।

खानखाना खुर्रम के हाथ से खत लेकर उत्सुकता से पढ़ने लगा।

– ‘हुजूर जरा जोर से पढ़िये ताकि मैं भी सुन सकूं।’ खुर्रम ने व्यंग्य से कहा।

– ‘जो सौ आदमी नजरों में मेरी देखभाल नहीं रखते होते तो बेचैनी से कभी का उड़कर वहाँ पहुँच जाता।’ खानखाना ने पढ़ा।

– ‘यह क्या है शहजादे?’ खानखाना ने खुर्रम से पूछा।

– ‘यही तो हम जानना चाहते हैं हुजूर कि यह क्या है?’ शहजादे के शब्द तल्खी और व्यंग्य से पूरी तरह लबरेज थे।

– ‘जब तक यह पता न लगे कि यह चिट्ठी किसने और किसे लिखी है, तब तक इसके बारे में कोई भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता।’

– ‘अब ज्यादा होशियारी मत दिखाइये खानखाना। यह चिट्ठी आपने लिखी है और दुष्ट महावतखाँ को लिखी है। यह भी जान लीजिये कि आपका जो मुखबिर यह चिट्ठी लेकर महावतखाँ को देने जा रहा था, उसी ने हमें यह सब बताया है।’ अपनी बात पूरी करते-करते खुर्रम की आँखों में खून उतर आया।

– ‘यह सरासर गलत है। मेरे विरुद्ध कोई साजिश हुई है।’

– ‘लाल मुहम्मद! इस बूढ़े शैतान को हथकड़ी-बेड़ी लगा दे और तब तक मत छोड़ जब तक मैं खुद तुझे ऐसा करने का हुक्म न दूँ।’

खुर्रम का ऐसा आदेश सुनकर खानखाना ने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा-

‘रहिमन सीधी चाल सों, प्यादा होत वजीर।

फरजी साह न हुइ सकै, गति टेढ़ी तासीर।’[1]

खर्रुम ने एक न सुनी। उसके आदेश से खानखाना के हाथों में हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ डाल दी गयीं तथा उसे उसी के डेरे में कैद कर दिया गया। थोड़ी ही देर बाद दाराबखाँ को भी हथकड़ियों बेड़ियों सहित खानखाना के डेरे में लाकर बंद किया गया। अपने बूढ़े बाप को इस हालत में देखकर दाराबखाँ फूट-फूट कर रोने लगा। दाराबखाँ ही एकमात्र बेटा था जो अब तक खानखाना का साथ निभा रहा था। खानखाना ने उसे दिलासा देते हुए कहा-

‘रहिमन चुप ह्नै बैठिये देखि दिनन को फेर।

जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं बेर।’

-अध्याय 116, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  सीधे-सीधे चलने वाला प्यादा भी वजीर बन जाता है किंतु टेढ़ी चाल चलने वाला वजीर कभी भी बादशाह नहीं बन सकता। क्योंकि टेढ़ी चाल की तासीर ही ऐसी है।

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...