Home Blog Page 188

खप जासी खुरसाण (94)

0

– ‘हुजूर! महाराणा अमरसिंह का चारण आपकी सेवा में हाजिर हुआ चाहता है।’ पहरेदार ने खानखाना को सूचना दी।

– ‘उसे यहीं ले आ।’ खानखाना ने आज्ञा दी।

चारण मुजरा करके चुपचाप खड़ा हो गया। खानखाना उस समय कुछ लिख रहा था। इसलिये वह मुजरा स्वीकार करके फिर से अपने काम में लग गया। खानखाना को व्यस्त देखकर चारण चुपचाप खड़ा रह गया। जब चारण काफी देर तक नहीं बोला तो खानखाना ने चारण की तरफ देखा चारण ने फिर से मुजरा कर दिया किंतु बोला कुछ नहीं।

खानखाना ने फिर से मुजरा स्वीकार किया और अपने काम में लग गया। तीसरी बार फिर यही हुआ। जब खानखाना ने सिर ऊपर उठाया तो चारण ने फिर से मुजरा कर दिया।

– ‘अरे कमबख्त बोलता क्यों नहीं? क्या महाराणा ने मुजरे दिखाने के लिये भेजा है?’ खानखाना ने हैरान होकर पूछा।

– ‘मेरे स्वामी की आज्ञा है कि जब तक खानखाना स्वयं बोलने के लिये न कहें, मैं कुछ भी न बोलूं।’

– ‘अच्छा तो बोल। मैं तुझे बोलने की आज्ञा देता हूँ।’

– ‘हुजूर! महाराणा ने कहलवाया है-

हाड़ा कूरम राव बड़, गोखाँ जोख करंत।

कहियो खानखानाँ ने, बनचर हुआ फिरंत।।

तुबंरा सु दिल्ली गई, राठौड़ा कनवज्ज।

राणपयं पै खान ने वह दिन दीसे अज्ज।।’[1]

चारण की बात सुनकर खानखाना सोच में पड़ गया। कुछ देर बाद जब वह अपने विचारों से बाहर निकला तो उसने कहा- ‘अपने महाराणा से कहना-

धर रहसी रहसी धरम, खप जासी खुरसाण।

अमर विसंभर ऊपराँ राखो नहचो राण। ‘[2]

चारण इस महान् आत्मा को नमस्कार करके भलीभांति नतमस्त होकर चला गया।

-अध्याय 94, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] चौहान वंशीय हाड़ा, कच्छवाहे और राठौड़ महलों में विश्राम कर रहे हैं। खानखाना से कहना कि हम सिसोदिये तो वनचर हुए फिर रहे हैं। तंवरों से दिल्ली गयी, राठौड़ों से कन्नौज गया क्या खानखानाओं को राणाओं के लिये अब भी स्वतंत्रता दिखायी देती है?

[2] यह धरती रहेगी, धर्म रहेगा। खुरासान देश से आया हुआ यह बादशाह मिट जायेगा। इसलिये हे राणा अमरसिंह! विश्वंभर पर विश्वास रखो।

फिर से दक्षिण में (95)

0

खानखाना नहीं चाहता था कि वह फिर से दक्षिण में जावे। वह जानता था कि दक्षिण उसके लिये दो पाटों की चक्की बन चुका है। एक तरफ बादशाह है तो दूसरी तरफ चाँद।

दक्षिण के मोर्चे से एक बुरी खबर आई जिसे सुनकर अकबर थर्रा उठा। दक्षिण ने बलि लेनी शुरू कर दी थी। शहजादा मुराद शराब के नशे में मिरगी आने से मर गया। इस पर अकबर ने शहजादे दानियाल को दक्षिण के लिये नियुक्त किया।

जब दानियाल दक्षिण के लिये रवाना हो गया तो अकबर खानाखाना के डेरे पर हाजिर हुआ और बड़ी चिरौरी, मान-मुनव्वल करके खानखाना से विनती की कि वह भी दानियाल के साथ दक्षिण को जावे और किसी भी कीमत पर शहजादे को फतह दिलवाये।

खानखाना नहीं चाहता था कि वह फिर से दक्षिण में जावे। वह जानता था कि दक्षिण उसके लिये दो पाटों की चक्की बन चुका है। एक तरफ बादशाह है तो दूसरी तरफ चाँद। यदि वह किसी एक के साथ हो जाता है तो दूसरे के साथ अन्याय होना निश्चित ही है किंतु भाग्य की विडम्बना को स्वीकार कर खानखाना दक्षिण के लिये रवाना हो गया।

खानखाना शहजादे मुराद पर तो सख्ती कर पाता था किंतु अब उसे दानियाल के साथ काम करना था जो कि खानखाना अब्दुर्रहीम का जंवाई तथा जाना का पति था।

-अध्याय 95, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

नकाब में चाँद (96)

0

जब खानखाना दक्षिण में पहुँचा तो दानियाल ने उसे सबसे पहले अहमदनगर पर ही घेरा डालने के आदेश दिये। शहजादे के आदेश से खानखाना ने अहमदनगर को घेर लिया। एक रात जब खानखाना अपने डेरे में बैठा हुआ कुछ लिखा-पढ़ी कर रहा था तो उनकी नजर अचानक एक काले साये पर पड़ी जो चोरी से खानखाना के डेरे में आ घुसा था।

खानखाना ने तुरंत तलवार खींच ली और नकाबपोश की तरफ झपटा। नकाबपोश को अनुमान नहीं था कि खानखाना उसे देख चुका है इसलिये पहले तो वह सहम कर पीछे हटा फिर अगले ही क्षण उसने अपने मुँह से नकाब हटा दिया। खानखाना की आँखें आश्चर्य से फटी रह गयीं।

वह नकाबपोश और कोई नहीं अहमदनगर की सुल्ताना चाँद थी। खानखाना चाँद का यह दुस्साहस देखकर दंग रह गया।

– ‘तसलीम हुजूर!’ चाँद ने हँस कर कहा।

– ‘तुम इस तरह यहाँ! तुम्हें पता नहीं तुम्हारी जान को खतरा हो सकता है?’ खानखाना ने चिंतित होकर कहा।

चाँद फिर हँसी, उसने धीमी आवाज में कहा-

‘सदा नगारा  कूच का  बाजत  आठों  जाम।

रहिमन या जग आइ कै, को करि रहा मुकाम।’

– ‘क्या चाहती हो?’

-‘वाह हुजूर! यह भी ठीक रही। जब आप हमारी ड्योढ़ी पर पधारे थे तब हमनें तो पलक पांवड़े बिछाकर हुजूर का ख़ैरमक़दम किया था। आज जब हमारी बारी आयी है तो पूछते हैं कि क्या चाहती हो?’

– ‘लेकिन मैं दिन के उजाले में सबके सामने आया था और तुम इस रात में चोरों की तरह आयी हो।’

चाँद ने मुस्कुरा कर कहा-

‘रहिमन रजनी ही भली,  पिय सों होय मिलाप।

खरो दिवस किहि काम को, रहिबो आपुहि आप।’

चाँद की इस बात से खानखाना निरुत्तर हो गया और लज्जित होकर बोला- ‘आइये। तशरीफ रखिये।’

चाँद निःसंकोच उसी आसन पर जाकर बैठ गयी जिस आसन पर कुछ देर पहले खानखाना बैठा हुआ था।

– ‘कहिये क्या सेवा करूँ।’ खानखाना ने मुँह रूखा करके पूछा।

– ‘आप तो मुझे केवल इतना बता दें कि जब संधि की शर्तों के अनुसार मैं बराड़ पर अपना अधिकार त्याग चुकी हूँ, तब किस खुशी में आपकी सेनाओं ने फिर से अहमदनगर का रुख किया है?’

– ‘मैंने तो उसी समय तुम्हें चेता दिया था कि संधि का कोई अर्थ नहीं है, वह तो मुराद को उस समय अहमदनगर से दूर ले जाने की चेष्टा मात्र थी।’

– ‘तो अब दानियाल को किस तरह दूर ले जायेंगे?’

– ‘रहिमन चाक कुम्हार को मांगे, दिया न देइ। छेद में डंडा डारि कै, चहै नाँद लै लेइ।। ‘[1]

– ‘अर्थात्?’

– ‘इसका अर्थ ये कि तुम्हें फिर से युद्ध का मार्ग छोड़कर युक्ति का मार्ग पकड़ना होगा।’

– ‘कैसी युक्ति?’

– ‘संधि की युक्ति।’

– ‘क्या यह स्थायी समाधान होगा?’

– ‘रहिमन भेषज के किए, काल जीति जो जात। बड़े-बड़े समरथ भए, तौ न कोउ मरि जात। ‘[2]

– ‘ठीक है। संधि का प्रस्ताव बताइये।’

– ‘यदि अहमदनगर को बचाना चाहती है तो बहादुर निजाम[3]  को मेरे हवाले कर दे।’

– ‘खानखाना???’ चीख पड़ी चाँद। उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि खानखाना अपने मुँह से ऐसी बात निकालेगा।

– ‘घबराओ मत सुलताना। मैं निजाम को बादशाह अकबर की सेवा में यह कहकर हाजिर करूंगा कि अहमद नगर का निजाम आपकी अधीनता स्वीकार करता है और इसके बदले में अपने राज्य की सुरक्षा चाहता है।’

– ‘उसके बाद!’

– ‘उसके बाद बहादुर निजाम शाह को मैं वापिस सुरक्षित अहमदनगर लाऊंगा और तुम्हें सौंप दूंगा।’

– ‘दगा़ हुई तो?’

– ‘मुगलिया राजनीति का तो आधार ही दगा़ है। तू चाहे तो मेरी बात मान, तू चाहे तो मत मान।’

– ‘लेकिन इसका अर्थ तो यही हुआ कि अहमदनगर मुगलों के अधीन हो जायेगा।’

– ‘जिस प्रकार उत्तर भारत के राजपूत राजाओं ने अपने राज्य और प्रजा की सुरक्षा के लिये मुगलिया सल्तनत की अधीनता स्वीकार कर ली है, उसी प्रकार यदि दक्षिणी राज्यों के राजा और सुलतान भी मुगलिया सल्तनत का प्रभुत्व स्वीकार कर ले तो वे अपने राज्य और प्रजा दोनों की सुरक्षा कर सकते हैं। समय को पहचानो चाँद! इस समय मुगलिया आंधी चल रही है। इस आंधी में दक्षिण के राज्य तिनके की भी सामर्थ्य नहीं रखते। जो भी इस आंधी का मार्ग रोकने का साहस करेगा, वह तिनके की तरह उड़ जायेगा।’

– ‘और हमारी स्वतंत्रता! उसका कोई अर्थ नहीं होता।’

– ‘जब मौका लगेगा तो सारे के सारे राज्य फिर से अपनी-अपनी खोई हुई स्वतंत्रता प्राप्त कर ही लेंगे।’

– ‘एक शर्त पर मैं बहादुर निजाम शाह को आपके हवाले कर सकती हूँ।’

– ‘कैसी शर्त?’

– ‘आप बहादुर निजाम शाह को अपने साथ यह समझ कर ले जायेंगे कि आप किसी और को नहीं, चाँद को ले जा रहे हैं।’

– ‘मंजूर है।’

इसके बाद भी बड़ी देर तक दोनों में बातें होती रहीं। जब सारी बातें विस्तार से तय हो गयीं तो चाँद उठ खड़ी हुई।

– ‘हुजूर का हुक्म हो तो मैं अब जाऊँ?’

– ‘जो हुक्म से आया नहीं, वह हुक्म से जायेगा क्या?’ खानखाना ने हँस कर कहा।

– ‘मेरे आदमी आपके डेरे से एक फर्लांग दूर खड़े हैं। मुझे वहाँ तक पहुँचाने की जहमत उठाइये। उसके बाद मैं चली जाऊंगी।’

– ‘चलिये।’ खानखाना ने हँस कर कहा।

चाँद ने अपना नकाब फिर से मुँह पर लपेट लिया। खानखाना ने उसी समय दो घोड़े मंगवाये। थोड़ी ही देर में दोनों घोड़े अपने सवारों को लेकर गहन अंधकार में विलीन हो गये।

-अध्याय 96, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]    यदि कुम्हार चाक से मांगे तो चाक उसे एक छोटा सा दीपक तक न दे किंतु कुम्हार यदि चाक की हलक में डण्डा डालकर घुमा दे तो चाक उसे बड़ी से बड़ी नांद दे देता है। अर्थात् दुष्ट व्यक्ति के सामने अनुनय का कोई अर्थ नहीं है। उसे तो दण्डित ही किया जाना चाहिये।

[2] यदि दवा और उपचार से मृत्यु को टाला जा सकता तो धरती पर बहुत से सामर्थ्यवान हुए हैं, वे कभी भी न मरते।

[3] बहादुर निजाम चाँद के भाई मरहूम निजाम का बेटा था। इससे चाँद उसकी बुआ लगती थी। चूंकि बहादुर निजाम बालक था इसलिये उसके स्थान पर चाँद ही शासन का काम देखती थी और इसी अधिकार से सुलताना कहलाती थी।

नियति के मोहरे (97)

0

मुगलिया राजनीति तथा दक्खिन की शिया राजनीति के बीच खानखाना तथा चांद बीबी नियति के मोहरे बन कर रह गए थे।

उधर सुलताना ने और इधर खानखाना ने योजना के अनुसार जल्दी-जल्दी सियासी मोहरे इधर से उधर किये। सुलताना ने अभंगखाँ हबशी को पंद्रह हजार घुड़सवारों सहित किले से बाहर निकाल कर चित्तार की तरफ से दानियाल पर आक्रमण करने भेजा तथा चीतेखाँ हबशी को किले की आंतरिक सुरक्षा के लिये नियुक्त किया।

खानखाना ने दानियाल से अनुमति लेकर चाँद से संधि की बात चलाई। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बुरहानपुर के लिये रवाना हुआ जहाँ अकबर स्वयं डेरा डाले हुए था और युद्ध की समस्त प्रगति पर निगाह रख रहा था।

इधर खानखाना अपने सियासी मोहरों के घर बदल रहा था और उधर नियति अपने मोहरों के घर तेजी से बदलने में लगी हुई थी। इधर खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बुरहानपुर के लिये रवाना हुआ और उधर राजू दखनी ओर अम्बरचम्पू हबशी ने शाहअली के बेटे मुर्तिजा निजामशाह को अहमदनगर का स्वामी घोषित करके बादशाही थानों पर धावा बोल दिया।

खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बादशाह की सेवा में हाजिर हुआ और चाँद सुलताना का संदेश पढ़कर सुनाया कि यदि बादशाह अहमदनगर राज्य की सुरक्षा करे तो चाँद मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लेगी।

बादशाह चाँद सुलताना के पत्र और बहादुर निजामशाह को अपनी सेवा में देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने दानियाल का विवाह खानखाना की बेटी जाना बेगम से करने की घोषणा की और पूरी तरह संतुष्ट होकर आगरा लौट गया।

अभंगखाँ हबशी जो स्वयं को चाँद सुलताना का विश्वसनीय आदमी बताते हुए थकता नहीं था, उसने चित्तार पहुँच कर अपना इरादा बदल लिया और अपने डेरों में खुद आग लगाकर जुनेर के किले को भाग गया। चाँद ने यह समाचार सुना तो सिर पीटकर रह गयी लेकिन जब चाँद सुलताना ने मुर्तिजा निजामशाह, राजू दखनी और अम्बरचम्पू को पूरी तरह नालायकी पर उतरा हुआ देखा तो उसने सोचा कि यह ठीक ही हुआ जो अभंगखाँ जुनेर चला गया।

चाँद ने अपने किलेदार चीतेखाँ हबशी से विचार विमर्श किया कि इन बदली हुई परिस्थितयों में बेहतर है कि किला दानियाल को सौंप दिया जाये और राजकीय कोष तथा राज्य सामग्री लेकर जुनेर के किले को चला जाये ताकि वहाँ हमारी सुरक्षा अधिक अच्छी तरह से हो सके।

चीतेखाँ हबशी ने यह बात सुनते ही सबको यह कहना आरंभ कर दिया कि चाँद सुलताना तो मुगलों से मिल गयी है और उनको किला सौंपती है। चीतेखाँ ने  किले से बाहर नियुक्त दक्खिनियों से सम्पर्क किया और उनके लिये किले के गुप्त मार्ग खोल दिये। जब दक्खिनी किले में प्रवेश कर गये तो हबशी भी उनसे जा मिले। इन लोगों ने मिलकर उसी दिन चाँद सुलताना की हत्या कर दी।

जब खानखाना बुरहानपुर से बहादुर निजामशाह को लेकर अहमदनगर लौटा तो उसने मार्ग में चाँद की हत्या का समाचार सुना। इस समाचार को सुनकर खानखाना के दुःख का पार न रहा। उसके मुँह से बरबस ही निकला- ‘रहिमन मनहिं लगाहि के, देखि लेहु किन कोय। नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय। ‘[1]

-अध्याय 97, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  कोई किसी से भी प्रेम करले, उससे क्या होता है? मनुष्य के वश में क्या है? जो कुछ है नारायण की इच्छा के अधीन है।

बंदूक में शराब (98)

0

एक तरफ चाँद के नहीं रहने से और दूसरी तरफ मुराद के मर जाने से खानखाना सभी तरह की दुविधाओं से बाहर निकल आया था और वह दक्षिण में जबर्दस्त दबाव बना रहा था। खानखाना के पुत्र एरच ने भी पिता का बहुत साथ दिया और मलिक अम्बर जैसे दुर्दांत शत्रु को वह लगातार पीटता जा रहा था। उधर शहजादा दानियाल, अपने श्वसुर अब्दुर्रहीम और साले ऐरच के मजबूत हाथों में दक्खिन का अभियान सौंप कर स्वयं शराब में डूब गया।

अकबर को जब दानियाल के बारे में तरह-तरह के समाचार मिलने लगे तो उसने दानियाल को लिखा कि वह आगरा आ जाये। दानियाल कतई नहीं चाहता था कि वह बादशाह के सामने जाये। वहाँ जाने से उसकी शराब और मौज-मस्ती में विघ्न पड़ जाने की पूरी-पूरी संभावना थी।

अतः उसने बादशाह को पत्र भिजवाया कि खानखाना एक नम्बर का हरामखोर है। उस पर दृष्टि रखने के लिये मेरा दक्षिण में ही रहना आवश्यक है। इस पर अकबर ने उसे वापिस पत्र भिजवाया और लिखा कि मैं जानता हूँ कि हरामखोर कौन है! तू शराब पीने के लिये ही मेरे से दूर रहना चाहता है। खानखाना तेरी तरह से शराब नहीं पीता। तेरी तरह से झूठ नहीं बोलता। न ही तेरी तरह विश्वस्त सेवकों पर मिथ्या दोषारोपण करता है। तू फौरन आगरा चला आ अन्यथा भविष्य में तुझसे कोई सम्बंध नहीं रखूंगा।

इस पर भी दानियाल आगरा नहीं गया। अकबर ने क्रोधित होकर खानखाना को बहुत भला-बुरा लिखा कि तेरे रहते हुए भी दानियाल मौत के मुँह में जा रहा है। यदि दानियाल की शराब पर पाबंदी न लगायी तो मुझसा बुरा कोई नहीं होगा।

खानखाना ने दानियाल पर पहरा बैठा दिया और किसी को भी शहजादे के डेरे में शराब ले जाने की मनाही कर दी। इस पर भी दानियाल की चापलूसी में लगे हुए नमक हराम लोग बंदूक की नालियों में तेज शराब भरकर ले जाते और दानियाल को पिलाते। खानखाना इस बात को नहीं जान सका और एक दिन दानियाल अत्यधिक शराब पीकर मर गया।

जब खानखाना को मालूम हुआ कि शराब भीतर कैसे पहुँचाई जाती थी तो उसने नमक हराम लोगों को मृत्युदण्ड दिया लेकिन जाने वाला जा चुका था। उसे किसी तरह नहीं लौटाया जा सकता था।

दानियाल की मृत्यु से सबसे बड़ा कहर खानखाना पर ही टूटा था। उसकी बेटी जाना बेगम विधवा हो गयी। जाना बेगम ने दानियाल के शव के साथ ही मर जाने की चेष्टा की किंतु खानखाना ने किसी तरह बेटी को ऐसा करने से रोका।

जाना बेगम ने अपने पिता के कहने से जान तो नहीं दी किंतु उसने सदा-सदा के लिये फटे हुए, मैले-कुचैले कपड़े पहन लिये। पत्नी की मृत्यु के बाद खानखाना पर यह दूसरा कहर था। उससे बेटी का मुँह देखा नहीं जाता था। वह अंदर से टूटने लगा।

-अध्याय 98, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

तैमूर की समाधि (99)

0

मुराद के बाद दानियाल के मरने की खबर पाकर बादशाह का मन हर उस वस्तु से उचाट हो गया जो उसके आस-पास थी। उसके चेहरे का खुरदुरापन उसके मन में उतर आया था। वह मन की शांति प्राप्त करना चाहता था किंतु उसका कोई उपाय नहीं सूझता था।

उसने मक्का जाने का निश्चय किया किंतु उस युग में एक बादशाह के लिये मक्का तक के मार्ग में पड़ने वाले समस्त राज्यों को जीते बिना अपनी सेना लेकर वहाँ तक पहुँचना संभव नहीं था और बिना सेना के जाने का अर्थ उसी गति को प्राप्त हो जाने जैसा था जिस गति को बैरामखाँ प्राप्त हुआ था। बहुत सोच-विचार के उपरांत अकबर ने तूरान जाने का इरादा किया जहाँ उसके पूर्वज तैमूर लंग की समाधि बनी हुई थी।

यद्यपि तूरान तक पहुँच पाना भी अत्यंत कठिन था तथापि उतना कठिन नहीं जितना कि मक्का तक पहुँच पाना। फिर भी इस योजना को सल्तनत की पूरी सामर्थ्य झौंके बिना कार्यान्वित किया जाना संभव नहीं था। अतः अकबर ने दक्षिण से खानखाना अब्दुर्रहीम को, बंगाल से राजा मानसिंह को तथा लाहौर से कूलचीखाँ को आगरा बुलवाया और आगरा बुलवाने का प्रयोजन भी लिख भेजा।

राजा मानसिंह तथा कूलचीखाँ तो बादशाह का आदेश मिलते ही अपनी-अपनी सेनायें लेकर आगरा के लिये रवाना हो गये किंतु खानखाना अपने स्थान से एक इंच भी नहीं हिला।

बादशाह अकबर तथा उसके शहजादों के दुर्व्यहार और छलपूर्ण आचार विचार को देखकर खानखाना के मन में मुगल साम्राज्य की अभिवृद्धि हेतु पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया था। लम्बे समय से खानखाना यह अनुभव कर रहा था कि मुगल शहजादे यदि राजद्रोह भी करते हैं तो क्षमा कर दिये जाते हैं जबकि दूसरे अमीरों के बारे में मिथ्या शिकायतें मिलने पर भी अकबर अमीरों के साथ कठोरता से निबटता है।

जब से मुराद के प्रकरण में अकबर ने खानखाना की ड्यौढ़ी बंद की थी तभी से खानखाना मन ही मन अकबर से नाराज था। पुत्री के शोक ने भी उसे तोड़ डाला था। अब वह कोई लड़ाई न तो लड़ना चाहता था और न जीतना चाहता था।

इन सब कारणों से भी बढ़कर, सबसे बड़ा कारण यह था कि तैमूर लंग की समाधि में खानखाना की कोई रुचि नहीं थी। अतः उसने बादशाह को प्रत्युत्तर भिजवाया-

‘बादशाह सलामत को जानना चाहिये कि मन की शांति तो तभी मिलेगी जब अशांति के वास्तविक कारण को जानकर उसे दूर करने के उपाय किये जायेंगे। यदि वह संभव न हो तो निरीह और कमजोर प्राणियों पर दया करने और उनकी सेवा करने से भी मन की शांति प्राप्त की जा सकती है। बादशाह सलामत को यह भी जानना चाहिये कि आपकी रियाया आपके कुल में पैदा हुए तैमूर बादशाह के बारे में उतनी श्रद्धा नहीं रखती जितनी कि आपमें रखती है क्योंकि रियाया का मानना है कि आपके पूर्वज तैमूर लंग के जमाने में हिंदुस्थान की रियाया पर बहुत अत्याचार हुए हैं। इससे यदि आप तैमूर बादशाह की समाधि के दर्शनों के लिये तूरान जायेंगे तो आपकी रियाया को आपके बारे में संदेह होगा। जिसका खामियाजा आपके उत्तराधिकारियों को भुगतना पड़ेगा। बेहतर होगा कि आप इस इरादे को त्याग ही दें। मैं इस समय दक्षिण का मोर्चा किसी और के भरोसे छोड़कर आपकी सेवा में उपस्थित नहीं हो सकता हूँ। जब कभी दक्षिण में शांति स्थापित होगी तब आप मुझे जो भी आदेश देंगे, प्राण रहते पूरा करूंगा। मेरा विचार तो यही है, आगे आप बादशाह हैं, जैसा कहेंगे, मैं वही करूंगा।’

इस कार्य में खानखाना की रूचि न देखकर और इतना स्पष्ट इन्कार देखकर अकबर के मन का उत्साह जाता रहा। उसने तूरान जाने का निश्चय त्याग दिया।

-अध्याय 99, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

विद्रोही (100)

0

अकबर के तीन शहजादों में से दो छोटे शहजादे मुराद और दानियाल अत्यधिक शराब पीकर मर चुके थे। तीसरा तथा सबसे बड़ा शहजादा सलीम भी अत्यधिक शराब पीकर न केवल खुद मौत के कगार पर जा खड़ा हुआ था अपितु अपने बुरे दोस्तों की सोहबत में अपने बाप अकबर तथा पूरी मुगलिया सल्तनत को मौत के कगार पर खींच कर ले जा रहा था।

अकबर के बाद वही मुगलिया सल्तनत का उत्तराधिकारी हो सकता था किंतु बुरे आदमियों की संगत के कारण उसका दिमाग विकृत हो चला था। उसे बादशाह बनने की बड़ी शीघ्रता थी। वह अकबर के जीते जी उसकी सारी सम्पत्ति तथा राज्य पर अधिकार करना चाहता था किंतु अकबर इस अयोग्य, धोखेबाज, शराबी और अय्याश शहजादे को बादशाह नहीं बनाना चाहता था।]

ई. 1591 में जब अकबर गंभीर रूप से बीमार पड़ा तब अवसर पाकर सलीम ने बादशाह के भोजन में विष मिलवा दिया किंतु किसी तरह अकबर बच गया। जब अकबर मामले की तह तक गया तो उसका सारा संदेह सलीम पर ही गया। उसने सदैव के लिये सलीम को अपनी दृष्टि से च्युत कर दिया।

सलीम की इस दुष्टता से अकबर के जीवन में चारों ओर निराशा छा गयी। उसने हिन्दू नरेशों को अपनी सल्तनत का रक्षक नियुक्त कर कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों से तो अपने राज्य की रक्षा कर ली थी किंतु कुल में ही जन्मा कुपुत्र, अकबर के सीने में जहर बुझी कटारी की तरह गढ़ गया। उससे निजात पाने का कोई उपाय नहीं था।

अंत में अकबर ने सलीम के पुत्र खुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया। खुसरो के प्रति आसक्ति और अपने प्रति उपेक्षा देखकर सलीम बादशाह से खुल्लमखुल्ला विद्रोह करने पर उतारू हो गया।

जब सलीम को मेवाड़ नरेश अमरसिंह के विरुद्ध अभियान के लिये भेजा गया तो वह मेवाड़ न जाकर अजमेर में ही अपना डेरा जमा कर बैठ गया। उन्हीं दिनों अजमेर के सूबेदार शहबाजखाँ कम्बो की मृत्यु हो गयी। सलीम ने अवसर मिलते ही शाही खजाने के एक करोड़ रुपये तथा शहबाजखाँ की निजी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया।

उन्हीं दिनों सलीम को ज्ञात हुआ कि इस समय अकबर असीरगढ़ के मोर्चे पर है तथा आगरा के किले में राजकीय कोष के दो करोड़ रुपये रखे हुए हैं। सलीम ने उस कोष को हथियाने के लिये अजमेर से आगरा की ओर प्रयाण किया किंतु किलेदार और कोषाध्यक्ष की सतर्कता के कारण सलीम उस कोष को हाथ नहीं लगा सका।

इसके बाद सलीम यमुना पार करके प्रयाग चला गया और उसने अपने आप को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर अपना दरबार जमा लिया। कुछ ही दिनों बाद उसे बिहार से भी शाही कोष के तीस लाख रुपये छीनने का अवसर मिल गया। शाही कोष से छीने गये लगभग डेढ़ करोड़ रुपये के बल पर सलीम ने तीस हजार सिपाही इकट्ठे कर लिये।

सलीम के विद्रोह के समाचार सुनकर अकबर असीरगढ़ का मोर्चा छोड़कर आगरा आया। जब सलीम को ज्ञात हुआ कि अकबर आगरा आ गया है तो सलीम ने प्रचारित किया कि वह भी अपने पिता की अभ्यर्थना करने के लिये आगरा जायेगा। वास्तव में तो उसका निश्चय अकबर को कैद करके स्वयं बादशाह बनने का था। 

सलीम अपने तीस हजार सिपाही लेकर चारों तरफ लूटमार करता हुआ आगरा की ओर बढ़ा। अकबर सलीम के इरादों को भांप गया। उसने अपने आदमियों के माध्यम से उसे कहलवाया कि यदि वह अपनी सेना को भंग करके प्रयाग लौट जाये तो उसे क्षमा कर दिया जायेगा।

पिता की यह उदारता देखकर सलीम ने अपनी सेना प्रयाग को लौटा दी और अकबर से कहलवाया कि मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत होना चाहता हूँ। अकबर ने सलीम को अपनी सेवा में उपस्थित होने की अनुमति दे दी। आगरा आकर सलीम बादशाह के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोया। उसका यह भाव देखकर अकबर ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसे बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बनाकर बंगाल जाने के आदेश दिये तथा अपना खास तातार गुलाम उसकी सेवा में नियुक्त कर दिया।

इलाहाबाद लौटकर सलीम पुनः मक्कार आदमियों से घिर गया और उसने बंगाल जाने से मना कर दिया। वह प्रयाग में नित्य दरबार आयोजित करके लोगों को मनसब और जागीरें बांटने लगा। इस समस्या का अंत न आता देखकर अकबर ने खानखाना को दक्षिण से बुलाने का विचार किया किंतु दक्षिण में खानखाना की सफलताओं को देखते हुए उसे वहाँ से हटाया जाना उचित नहीं था इसलिये बहुत सोच-विचार के उपरांत अकबर ने अबुल फजल को आगरा बुलवाया।

-अध्याय 100, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

कहर (101)

0

– ‘आसमान से कहर बरपा है जिल्ले इलाही।’ तातार गुलाम ने भय से कांपते हुए कहा।

– ‘क्या है कमजात? क्यों आसमान से कहर बरपाता है? तुझे शहजादे की सेवा में भेजा था, वहाँ से भाग आया क्या?’ गुलाम की बात सुनकर अकबर को चिंता तो हुई किंतु उसने अपने स्वर को मुलायम ही बनाये रखा।

– ‘मुझे भाग ही आना पड़ा हुजूर।’

– ‘अच्छा बता, क्यों भाग आया?’

– ‘शहजादे ने आपके नेक दिल गुलाम हर फन मौला अबुल फजल का कत्ल करवा दिया है।’

– ‘क्या बकता है पाजी?’ गुलाम की बात सुनकर अकबर सन्न रह गया और उत्तेजना में अपने स्थान से उठ कर खड़ा हो गया।

– गुलाम की गुस्ताखी मुआफ हो आका। आपका हुक्म था कि जैसे ही कोई खास बात मालूम हो, मैं तुरंत आपकी सेवा में हाजिर हो जाऊँ। आपके हुक्म की तामील में ही मैं यह समाचार पाकर वहाँ से भाग आया हूँ।’

– ‘कब और कहाँ हुआ यह?’

– ‘कोई बीस दिन हो गये हुजूर, नरवर में।’

– ‘किसने हलाक किया?’

– ‘ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला ने हुजूर।’

गुलाम का जवाब सुनकर अकबर दहल गया। यह जानकर अकबर की निराशा का पार न था कि सलीम वीरसिंह बुंदेला से जा मिला है!

सलीम इस हद तक आगे बढ़ जायेगा, अकबर ने इसकी तो कल्पना भी नहीं की थी। अबुल फजल अकबर का अनन्य मित्र था। वह शहंशाह का खास आदमी माना जाता था। उसकी ख्याति पूरी सल्तनत में सबसे बुद्धिमान आदमी के रूप में थी। अकबर ने उससे अपनी समस्याओं का समाधान जानने के लिये उसे दक्षिण के मोर्चे से बुलवाया था किंतु सलीम ने उसकी हत्या करवाकर समस्याओं को खतरनाक मुकाम तक पहुँचा दिया था। अबुल फजल की मौत और बेटे की बेवफाई से अकबर शोक के गहन सागर में डूब गया। काफी देर तक वह चुपचाप महल की छत की ओर ताकता रहा। बहुत देर बाद वह अपने विचारों की आंधी में से बाहर निकला।

– ‘यह शमां गुल कर दे।’ अकबर ने तातार गुलाम को आदेश दिया। उसके स्वर में शोक और कष्ट का लावा बह रहा था।

शहंशाह का हुक्म पाकर गुलाम ने शमां बुझा दी।

– ‘और यह भी।’ अकबर ने दूसरी शमां की ओर संकेत किया।

गुलाम ने दूसरी शमां भी बुझा दी।

– ‘महल की सारी शमाएं बुझा दे और सारे दरवाजे बंद करके बाहर खड़ा रह। जब तक मैं न बुलाऊँ, किसी को भीतर न आने देना।’

तातार गुलाम स्वामी के आदेशों की अक्षरशः पालना करने के लिये महल के दरवाजे बंद करके बाहर जाकर खड़ा हो गया। उसे मालूम न था कि पूरे तीन दिन तक उसे बुत की तरह वहीं खड़े रहना होगा।

जब रियाया को मालूम हुआ कि बादशाह शमाएं बुझाकर तथा मुँह पर कपड़ा लपेट कर अपने महल में बंद हो गया है तो आगरा में हड़कम्प मच गया। कोई न जान सका कि आखिर ऐसा क्या हो गया है जो बादशाह इतना गमगीन है। लोग अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार अनुमान लगाने लगे।

तीन दिन बाद जब अकबर अपने महलों से बाहर निकला तो उसने दो फरमान एक साथ जारी किये। पहला ये कि वीरसिंह को जहाँ भी पाया जाये मार डाला जाये तथा दूसरा ये कि शहजादे सलीम को आगरा में तलब किया जाये।

-अध्याय 101, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

सुलह (102)

0

अकबर की यह हालत देखकर सलीमा बेगम ने पिता-पुत्र के मध्य सुलह करवाने का विचार किया। वह अकबर से अनुमति लेकर इलाहाबाद गयी और सलीम को समझा बुझा कर आगरा ले आयी।

सलीम अपने बाप की यह दुर्दशा देखकर उसके पैरों पर गिर पड़ा और अपने अपराधों के लिये पश्चाताप करने लगा। अकबर ने अबुल फजल के गम को भुला दिया और सलीम को उठाकर छाती से लगा लिया। सलीम ने अपने सात सौ सत्तर हाथी और बारह हजार स्वर्ण मुद्रायें बादशाह को भेंट कीं।

इस बार अकबर ने सलीम से कहा कि वह यदि बंगाल नहीं जाना चाहता है तो मेवाड़ पर अभियान करके अपने पूर्वजों की भांति यश लाभ करे। सलीम ने अकबर की बात मान ली और मेवाड़ के लिये रवाना हो गया। अभी वह आगरा से निकल कर फतहपुर सीकरी तक ही गया था कि उसका मन फिर से बदल गया। उसने अकबर को कहलवाया कि मैं महाराणा के विरुद्ध अभियान करने में स्वयं को असक्षम मानता हूँ अतः मुझे प्रयाग जाने दिया जाये। अकबर ने सलीम को नितांत निकम्मा जानकर उसकी यह प्रार्थना भी स्वीकार कर ली।

प्रयाग पहुँच कर सलीम ने फिर से अपने को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया और दरबार लगाने लगा। वह अत्यधिक शराब पीने लगा। एक दिन शराब के नशे में धुत्त होकर उसने रानी मानबाई को कोड़ों से इस कदर पीटा कि ग्लानि वश मानबाई ने जहर खा लिया। मानबाई की मौत से राजा मानसिंह जो अब तक सलीम का सबसे बड़ा हितैषी था, सलीम का शत्रु हो गया।

तातार गुलाम ने मानबाई की आत्महत्या का पूरा प्रकरण अकबर को लिखकर भेजा, सलीम ने तातार गुलाम की जीवित अवस्था में ही खाल खिंचवा ली। जब एक नौकर ने इसका विरोध किया तो सलीम ने शराब पीकर उसे इतना पीटा कि पिटाई के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गयी।

एक दिन सलीम की निगाह अपने पिता अकबर के एक और खास नौकर पर पड़ी। जाने क्यों सलीम को उसे देखते ही इतना क्रोध आया कि उसे पीट-पीट कर नपुंसक बना दिया।

इन सारे समाचारों के मिलने पर अकबर ने सलीम के सुधरने की आशा त्यागकर सलीम के सत्रह वर्षीय पुत्र खुसरो पर ही अपना ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया। खुसरो आमेर नरेश मानसिंह की बहिन का पुत्र और खाने आजम मिर्जा कोका का दामाद था। इसलिये ये दोनों भी अकबर की योजना से सहमत हो गये तथा खुसरो को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने तथा सलीम को दण्डित करने के उपाय करने लगे।

अकबर ने भले ही सलीम को राज्याधिकार से वंचित करने तथा खुसरो को शासन पर स्थापित करने का निर्णय ले लिया किंतु प्रारब्ध ने सलीम और खुसरो के भाग्यों में कुछ और ही लिखा था। अभी खुसरो को शासन पर स्थापित करने की योजना पर विचार चल ही रहा था कि अकबर की माता हमीदाबानू की मृत्यु हो गयी।

सलीम अपनी दादी के मरने का समाचार पाकर बादशाह की मातमपुरसी के लिये आगरा आया और सीधे दरबार में ही हाजिर हुआ। अकबर ने दरबार में तो सलीम से कुछ नहीं कहा किंतु जब महल में उसे अकबर के सामने लाया गया तो अकबर ने खींचकर एक तमाचा सलीम के मुँह पर मारा तथा उसे स्नानागार में बंद कर दिया। राजा शालिवाहन को सलीम पर कड़ी निगरानी रखने तथा उसका मानसिक उपचार करने के लिये कहा गया।

उस दिन जब अकबर ने दर्पण में अपना चेहरा देखा तो वह बुरी तरह चौंक उठा। उसे दर्पण में अपने चेहरे के स्थान पर बैरामखाँ का चेहरा दिखायी दिया। उसे लगा कि सलीम ने अकबर के विरुद्ध नहीं अपितु वर्षों बाद फिर किसी अकबर ने बैरामखाँ के विरुद्ध विद्रोह किया है।

इसके बाद अकबर फिर कभी दर्पण नहीं देख सका और बुरी तरह से बीमार पड़ गया। शाही हकीम ने पूरा जोर लगाया किंतु उसे बादशाह की बीमारी पकड़ में नहीं आयी। वह जो भी दवा करता था, वह अकबर पर विष जैसा कार्य करती थी।

राजा शालिवाहन ने पूरे दस दिन तक सलीम को स्नानागार में बंद रखा तथा इस दौरान उसे शराब की एक बूंद भी पीने को नहीं दी। दस दिन बाद जब राजा शालिवाहन ने सलीम को स्नानागार से बाहर निकाला तो सलीम ने पूरी दुनिया ही बदली हुई पायी।

-अध्याय 102, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

पहरे दर पहरे (103)

0

– ‘शहजादे!’ एक फुसफुसाहट सी सलीम के कानों में पड़ी। उसने इधर-उधर देखा किंतु कोई दिखाई नहीं दिया। बाहर शाम घिर आई थी तथा कमरे में इतना कम प्रकाश था कि उसमें कुछ भी स्पष्ट देखना संभव नहीं था।

– ‘इधर देखो, इधर।’ सलीम ने फिर दृष्टि घुमाई किंतु कुछ भी दिखायी नहीं दिया।

– ‘इधर पर्दे के पीछे देखो शहजादे।’ फुसफुसाहट दुबारा उभरी। सलीम के कमजोर शरीर में इतनी जान नहीं रही थी कि वह बिना सहारे के स्वयं चल कर पर्दे तक जा सके। दस दिन से शराब की एक बूंद भी नहीं मिली थी। उसे आज ही स्नानागार से बाहर निकाला गया था। इस सब के बावजूद अज्ञात भय ने सलीम को पर्दे तक जाने के लिये विवश किया।

– ‘कौन हो तुम?’ पर्दे के पीछे छिपे हुए आदमी को देखकर सलीम ने पूछा।

– ‘ शश्श्श्………..। धीरे बोलो शहजादे किसी ने सुन लिया तो अनर्थ हो जायेगा।’ पर्दे के पीछे छिपे हुए व्यक्ति ने शहजादे के होठों पर हाथ रख दिया।

– ‘लेकिन तुम हो कौन और क्या चाहते हो?’ सलीम ने पूछा।

– ‘मैं आपके विश्वस्त मित्र उमराव रामसिंह कच्छवाहे का सेवक हूँ।’

– ‘तुम यहाँ छिपकर क्यों खड़े हो?’

– ‘क्योंकि मैं राजा शालिवाहन का पहरा तोड़कर चुपके से यहाँ पहुँचा हूँ।’

– ‘तो क्या कमरे के बाहर अब भी शालिवाहन का पहरा है?’

– ‘हाँ।’

– ‘तो तुम पहरा तोड़ कर क्यों आये, क्या तुम्हें अनुमति नहीं दी गयी?’

– ‘मैंनेअनुमति मांगी ही नहीं।’       

– ‘लेकिन क्यों?’

– ‘क्योंकि मैं आपसे गुप्त वार्तालाप करने की इच्छा रखता हूँ।’

– ‘कैसा गुप्त वार्तालाप?’

– ‘मेरे स्वामी ने मुझे आदेश दिया है कि मैं उनका संदेश आप तक पहुँचाऊँ।’

– ‘कैसा संदेश?’

– ‘मेरे स्वामी ने कहलवाया है कि बादशाह सलामत बुरी तरह से बीमार हैं, ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र दे लेकिन स्थिति बहुत खराब है। किसी भी समय कुछ भी हो सकता है।’

– ‘लेकिन यह बात मुझे छुप कर क्यों बताई जा रही है?’

– ‘क्योंकि बादशाह की बीमारी की बात बहुत गुप्त रखी जा रही है और केवल कुछ ही लोग जानते हैं।’

– ‘लेकिन क्यों?’

– ‘क्योंकि राजा मानसिंह और खाने आजम कोका नहीं चाहते कि यह समाचार आप तक पहुँचे।’

– ‘क्यों?’

– ‘क्योंकि राजा मानसिंह और खाने आजम कोका, बादशाह सलामत की इच्छानुसार शहजादे खुसरो को हिन्दुस्थान का ताज सौंपने की तैयारियों में लगे हुए हैं।’

– ‘तो फिर तुम मुझे यह सब क्यों बता रहे हो?’

– ‘शहजादे! समझने का प्रयास कीजिये। मैं आपके मित्र कच्छवाहा सरदार रामसिंह का सेवक हूँ। राजा मानसिंह का नहीं।’

– ‘रामसिंह क्या चाहता है?’

– ‘मेरे स्वामी आपको आगरा के तख्त पर बैठा हुआ देखना चाहते हैं।’

– ‘क्यों?’

– ‘यह तो वही जानें, मैं तो उनका संदेशवाहक मात्र हूँ।’

– ‘बादशाह सलामत की इच्छा के विरुद्ध रामसिंह मुझे किस तरह आगरा का ताज सौंपेगा?’

– ‘उन्होंने एक योजना तैयार की है। जिस तरह बादशाह सलामत के चारों ओर राजा मानसिंह का पहरा है, उसी तरह महलों के बाहर मेरे स्वामी रामसिंह ने अपना पहरा बैठा दिया है। उनके सिपाही बड़ी संख्या में फतहपुर सीकरी तथा आगरा के चारों ओर सिमट आये हैं। यदि मानसिंह ने आपको गिरफ्तार किया तो भी वह आपको महल से बाहर नहीं ले जा सकेगा।’

– ‘लेकिन उसने मेरी इस महल के भीतर हत्या कर दी तो?’

– ‘नहीं। राजा मानसिंह हिन्दू है, वह अपने बहनोई की हत्या कदापि नहीं करेगा।’

– ‘लेकिन अब मानबाई तो मर चुकी है और इस बात को लेकर वह मुझसे कई बार झगड़ा भी कर चुका है।’

– ‘फिर भी वह किसी भी सूरत में आपकी हत्या का प्रयास नहीं करेगा और न ही किसी और को करने देगा।’

– ‘लेकिन उसने मुझे कैद किया तो?’

– ‘ऐसी सूरत में मेरे स्वामी रामसिंह अपने आदमियों सहित महलों में प्रवेश करेंगे और आपको मुक्त करवाने का प्रयास करेंगे।’

– ‘अच्छा ठीक है। मुझे क्या करना है?’

– ‘आपको किसी तरह बादशाह सलामत तक पहुँचना है।’

– ‘इसमें क्या कठिनाई है? मैं अभी बादशाह सलामत की सेवा में जाता हूँ।’

– ‘बादशाह सलामत के महल के चारों ओर राजा मानसिंह का कड़ा पहरा है। वह आपको किसी भी हालत में बादशाह तक नहीं पहुँचने देगा।’

– ‘तो फिर?’

– ‘आप सलीमा बेगम से मिलने का प्रयास कीजिये और उनके माध्यम से बादशाह तक पहुंचिये।’

– ‘लेकिन मैंने सुना है कि सलीमा बेगम तो पहले से ही मुझ पर खफा हैं। क्या मैं अपनी माता मरियम उज्जमानी के माध्यम से वहाँ पहुँचूं?’

– ‘नहीं यह उचित नहीं होगा। महारानी जोधाबाई कभी भी बादशाह सलामत के निश्चय के विरुद्ध एक भी शब्द अपने मुँह से नहीं निकालेंगी।’

– ‘तो फिर?’

– ‘मेरे स्वामी ने सुझाव भिजवाया है कि आप सलीमा बेगम के माध्यम से प्रयास कीजिये।’

– ‘ठीक है। मैं ऐसा ही करूंगा लकिन मान लो कि मैं किसी तरह बादशाह सलामत के पास पहुँच गया और उन्होंने मुझे ताज सौंपने के स्थान पर खुसरो को ही बादशाह बनाने की जिद्द बनाये रखी तो?’

– ‘ऐसी स्थिति में हो सकता है कि हमें बादशाह सलामत को गिरफ्तार करना पड़े।’

– ‘क्या रामसिंह मेरे लिये बादशाह सलामत से विद्रोह करेगा?’

– ‘उनकी इच्छा तो नहीं है किंतु आवश्यक हुआ तो यह भी करना पड़ेगा।’

पर्दे के पीछे छिपे हुए रहस्यमय व्यक्ति की बात पूरी हुई ही थी कि राजा शालिवाहन ने कक्ष में प्रवेश किया। सलीम चुपचाप पर्दे के पास से हट गया।

-अध्याय 103, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

- Advertisement -

Latest articles

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...