मुगलिया राजनीति तथा दक्खिन की शिया राजनीति के बीच खानखाना तथा चांद बीबी नियति के मोहरे बन कर रह गए थे।
उधर सुलताना ने और इधर खानखाना ने योजना के अनुसार जल्दी-जल्दी सियासी मोहरे इधर से उधर किये। सुलताना ने अभंगखाँ हबशी को पंद्रह हजार घुड़सवारों सहित किले से बाहर निकाल कर चित्तार की तरफ से दानियाल पर आक्रमण करने भेजा तथा चीतेखाँ हबशी को किले की आंतरिक सुरक्षा के लिये नियुक्त किया।
खानखाना ने दानियाल से अनुमति लेकर चाँद से संधि की बात चलाई। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बुरहानपुर के लिये रवाना हुआ जहाँ अकबर स्वयं डेरा डाले हुए था और युद्ध की समस्त प्रगति पर निगाह रख रहा था।
इधर खानखाना अपने सियासी मोहरों के घर बदल रहा था और उधर नियति अपने मोहरों के घर तेजी से बदलने में लगी हुई थी। इधर खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बुरहानपुर के लिये रवाना हुआ और उधर राजू दखनी ओर अम्बरचम्पू हबशी ने शाहअली के बेटे मुर्तिजा निजामशाह को अहमदनगर का स्वामी घोषित करके बादशाही थानों पर धावा बोल दिया।
खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बादशाह की सेवा में हाजिर हुआ और चाँद सुलताना का संदेश पढ़कर सुनाया कि यदि बादशाह अहमदनगर राज्य की सुरक्षा करे तो चाँद मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लेगी।
बादशाह चाँद सुलताना के पत्र और बहादुर निजामशाह को अपनी सेवा में देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने दानियाल का विवाह खानखाना की बेटी जाना बेगम से करने की घोषणा की और पूरी तरह संतुष्ट होकर आगरा लौट गया।
अभंगखाँ हबशी जो स्वयं को चाँद सुलताना का विश्वसनीय आदमी बताते हुए थकता नहीं था, उसने चित्तार पहुँच कर अपना इरादा बदल लिया और अपने डेरों में खुद आग लगाकर जुनेर के किले को भाग गया। चाँद ने यह समाचार सुना तो सिर पीटकर रह गयी लेकिन जब चाँद सुलताना ने मुर्तिजा निजामशाह, राजू दखनी और अम्बरचम्पू को पूरी तरह नालायकी पर उतरा हुआ देखा तो उसने सोचा कि यह ठीक ही हुआ जो अभंगखाँ जुनेर चला गया।
चाँद ने अपने किलेदार चीतेखाँ हबशी से विचार विमर्श किया कि इन बदली हुई परिस्थितयों में बेहतर है कि किला दानियाल को सौंप दिया जाये और राजकीय कोष तथा राज्य सामग्री लेकर जुनेर के किले को चला जाये ताकि वहाँ हमारी सुरक्षा अधिक अच्छी तरह से हो सके।
चीतेखाँ हबशी ने यह बात सुनते ही सबको यह कहना आरंभ कर दिया कि चाँद सुलताना तो मुगलों से मिल गयी है और उनको किला सौंपती है। चीतेखाँ ने किले से बाहर नियुक्त दक्खिनियों से सम्पर्क किया और उनके लिये किले के गुप्त मार्ग खोल दिये। जब दक्खिनी किले में प्रवेश कर गये तो हबशी भी उनसे जा मिले। इन लोगों ने मिलकर उसी दिन चाँद सुलताना की हत्या कर दी।
जब खानखाना बुरहानपुर से बहादुर निजामशाह को लेकर अहमदनगर लौटा तो उसने मार्ग में चाँद की हत्या का समाचार सुना। इस समाचार को सुनकर खानखाना के दुःख का पार न रहा। उसके मुँह से बरबस ही निकला- ‘रहिमन मनहिं लगाहि के, देखि लेहु किन कोय। नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय। ‘[1]
एक तरफ चाँद के नहीं रहने से और दूसरी तरफ मुराद के मर जाने से खानखाना सभी तरह की दुविधाओं से बाहर निकल आया था और वह दक्षिण में जबर्दस्त दबाव बना रहा था। खानखाना के पुत्र एरच ने भी पिता का बहुत साथ दिया और मलिक अम्बर जैसे दुर्दांत शत्रु को वह लगातार पीटता जा रहा था। उधर शहजादा दानियाल, अपने श्वसुर अब्दुर्रहीम और साले ऐरच के मजबूत हाथों में दक्खिन का अभियान सौंप कर स्वयं शराब में डूब गया।
अकबर को जब दानियाल के बारे में तरह-तरह के समाचार मिलने लगे तो उसने दानियाल को लिखा कि वह आगरा आ जाये। दानियाल कतई नहीं चाहता था कि वह बादशाह के सामने जाये। वहाँ जाने से उसकी शराब और मौज-मस्ती में विघ्न पड़ जाने की पूरी-पूरी संभावना थी।
अतः उसने बादशाह को पत्र भिजवाया कि खानखाना एक नम्बर का हरामखोर है। उस पर दृष्टि रखने के लिये मेरा दक्षिण में ही रहना आवश्यक है। इस पर अकबर ने उसे वापिस पत्र भिजवाया और लिखा कि मैं जानता हूँ कि हरामखोर कौन है! तू शराब पीने के लिये ही मेरे से दूर रहना चाहता है। खानखाना तेरी तरह से शराब नहीं पीता। तेरी तरह से झूठ नहीं बोलता। न ही तेरी तरह विश्वस्त सेवकों पर मिथ्या दोषारोपण करता है। तू फौरन आगरा चला आ अन्यथा भविष्य में तुझसे कोई सम्बंध नहीं रखूंगा।
इस पर भी दानियाल आगरा नहीं गया। अकबर ने क्रोधित होकर खानखाना को बहुत भला-बुरा लिखा कि तेरे रहते हुए भी दानियाल मौत के मुँह में जा रहा है। यदि दानियाल की शराब पर पाबंदी न लगायी तो मुझसा बुरा कोई नहीं होगा।
खानखाना ने दानियाल पर पहरा बैठा दिया और किसी को भी शहजादे के डेरे में शराब ले जाने की मनाही कर दी। इस पर भी दानियाल की चापलूसी में लगे हुए नमक हराम लोग बंदूक की नालियों में तेज शराब भरकर ले जाते और दानियाल को पिलाते। खानखाना इस बात को नहीं जान सका और एक दिन दानियाल अत्यधिक शराब पीकर मर गया।
जब खानखाना को मालूम हुआ कि शराब भीतर कैसे पहुँचाई जाती थी तो उसने नमक हराम लोगों को मृत्युदण्ड दिया लेकिन जाने वाला जा चुका था। उसे किसी तरह नहीं लौटाया जा सकता था।
दानियाल की मृत्यु से सबसे बड़ा कहर खानखाना पर ही टूटा था। उसकी बेटी जाना बेगम विधवा हो गयी। जाना बेगम ने दानियाल के शव के साथ ही मर जाने की चेष्टा की किंतु खानखाना ने किसी तरह बेटी को ऐसा करने से रोका।
जाना बेगम ने अपने पिता के कहने से जान तो नहीं दी किंतु उसने सदा-सदा के लिये फटे हुए, मैले-कुचैले कपड़े पहन लिये। पत्नी की मृत्यु के बाद खानखाना पर यह दूसरा कहर था। उससे बेटी का मुँह देखा नहीं जाता था। वह अंदर से टूटने लगा।
मुराद के बाद दानियाल के मरने की खबर पाकर बादशाह का मन हर उस वस्तु से उचाट हो गया जो उसके आस-पास थी। उसके चेहरे का खुरदुरापन उसके मन में उतर आया था। वह मन की शांति प्राप्त करना चाहता था किंतु उसका कोई उपाय नहीं सूझता था।
उसने मक्का जाने का निश्चय किया किंतु उस युग में एक बादशाह के लिये मक्का तक के मार्ग में पड़ने वाले समस्त राज्यों को जीते बिना अपनी सेना लेकर वहाँ तक पहुँचना संभव नहीं था और बिना सेना के जाने का अर्थ उसी गति को प्राप्त हो जाने जैसा था जिस गति को बैरामखाँ प्राप्त हुआ था। बहुत सोच-विचार के उपरांत अकबर ने तूरान जाने का इरादा किया जहाँ उसके पूर्वज तैमूर लंग की समाधि बनी हुई थी।
यद्यपि तूरान तक पहुँच पाना भी अत्यंत कठिन था तथापि उतना कठिन नहीं जितना कि मक्का तक पहुँच पाना। फिर भी इस योजना को सल्तनत की पूरी सामर्थ्य झौंके बिना कार्यान्वित किया जाना संभव नहीं था। अतः अकबर ने दक्षिण से खानखाना अब्दुर्रहीम को, बंगाल से राजा मानसिंह को तथा लाहौर से कूलचीखाँ को आगरा बुलवाया और आगरा बुलवाने का प्रयोजन भी लिख भेजा।
राजा मानसिंह तथा कूलचीखाँ तो बादशाह का आदेश मिलते ही अपनी-अपनी सेनायें लेकर आगरा के लिये रवाना हो गये किंतु खानखाना अपने स्थान से एक इंच भी नहीं हिला।
बादशाह अकबर तथा उसके शहजादों के दुर्व्यहार और छलपूर्ण आचार विचार को देखकर खानखाना के मन में मुगल साम्राज्य की अभिवृद्धि हेतु पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया था। लम्बे समय से खानखाना यह अनुभव कर रहा था कि मुगल शहजादे यदि राजद्रोह भी करते हैं तो क्षमा कर दिये जाते हैं जबकि दूसरे अमीरों के बारे में मिथ्या शिकायतें मिलने पर भी अकबर अमीरों के साथ कठोरता से निबटता है।
जब से मुराद के प्रकरण में अकबर ने खानखाना की ड्यौढ़ी बंद की थी तभी से खानखाना मन ही मन अकबर से नाराज था। पुत्री के शोक ने भी उसे तोड़ डाला था। अब वह कोई लड़ाई न तो लड़ना चाहता था और न जीतना चाहता था।
इन सब कारणों से भी बढ़कर, सबसे बड़ा कारण यह था कि तैमूर लंग की समाधि में खानखाना की कोई रुचि नहीं थी। अतः उसने बादशाह को प्रत्युत्तर भिजवाया-
‘बादशाह सलामत को जानना चाहिये कि मन की शांति तो तभी मिलेगी जब अशांति के वास्तविक कारण को जानकर उसे दूर करने के उपाय किये जायेंगे। यदि वह संभव न हो तो निरीह और कमजोर प्राणियों पर दया करने और उनकी सेवा करने से भी मन की शांति प्राप्त की जा सकती है। बादशाह सलामत को यह भी जानना चाहिये कि आपकी रियाया आपके कुल में पैदा हुए तैमूर बादशाह के बारे में उतनी श्रद्धा नहीं रखती जितनी कि आपमें रखती है क्योंकि रियाया का मानना है कि आपके पूर्वज तैमूर लंग के जमाने में हिंदुस्थान की रियाया पर बहुत अत्याचार हुए हैं। इससे यदि आप तैमूर बादशाह की समाधि के दर्शनों के लिये तूरान जायेंगे तो आपकी रियाया को आपके बारे में संदेह होगा। जिसका खामियाजा आपके उत्तराधिकारियों को भुगतना पड़ेगा। बेहतर होगा कि आप इस इरादे को त्याग ही दें। मैं इस समय दक्षिण का मोर्चा किसी और के भरोसे छोड़कर आपकी सेवा में उपस्थित नहीं हो सकता हूँ। जब कभी दक्षिण में शांति स्थापित होगी तब आप मुझे जो भी आदेश देंगे, प्राण रहते पूरा करूंगा। मेरा विचार तो यही है, आगे आप बादशाह हैं, जैसा कहेंगे, मैं वही करूंगा।’
इस कार्य में खानखाना की रूचि न देखकर और इतना स्पष्ट इन्कार देखकर अकबर के मन का उत्साह जाता रहा। उसने तूरान जाने का निश्चय त्याग दिया।
अकबर के तीन शहजादों में से दो छोटे शहजादे मुराद और दानियाल अत्यधिक शराब पीकर मर चुके थे। तीसरा तथा सबसे बड़ा शहजादा सलीम भी अत्यधिक शराब पीकर न केवल खुद मौत के कगार पर जा खड़ा हुआ था अपितु अपने बुरे दोस्तों की सोहबत में अपने बाप अकबर तथा पूरी मुगलिया सल्तनत को मौत के कगार पर खींच कर ले जा रहा था।
अकबर के बाद वही मुगलिया सल्तनत का उत्तराधिकारी हो सकता था किंतु बुरे आदमियों की संगत के कारण उसका दिमाग विकृत हो चला था। उसे बादशाह बनने की बड़ी शीघ्रता थी। वह अकबर के जीते जी उसकी सारी सम्पत्ति तथा राज्य पर अधिकार करना चाहता था किंतु अकबर इस अयोग्य, धोखेबाज, शराबी और अय्याश शहजादे को बादशाह नहीं बनाना चाहता था।]
ई. 1591 में जब अकबर गंभीर रूप से बीमार पड़ा तब अवसर पाकर सलीम ने बादशाह के भोजन में विष मिलवा दिया किंतु किसी तरह अकबर बच गया। जब अकबर मामले की तह तक गया तो उसका सारा संदेह सलीम पर ही गया। उसने सदैव के लिये सलीम को अपनी दृष्टि से च्युत कर दिया।
सलीम की इस दुष्टता से अकबर के जीवन में चारों ओर निराशा छा गयी। उसने हिन्दू नरेशों को अपनी सल्तनत का रक्षक नियुक्त कर कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों से तो अपने राज्य की रक्षा कर ली थी किंतु कुल में ही जन्मा कुपुत्र, अकबर के सीने में जहर बुझी कटारी की तरह गढ़ गया। उससे निजात पाने का कोई उपाय नहीं था।
अंत में अकबर ने सलीम के पुत्र खुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया। खुसरो के प्रति आसक्ति और अपने प्रति उपेक्षा देखकर सलीम बादशाह से खुल्लमखुल्ला विद्रोह करने पर उतारू हो गया।
जब सलीम को मेवाड़ नरेश अमरसिंह के विरुद्ध अभियान के लिये भेजा गया तो वह मेवाड़ न जाकर अजमेर में ही अपना डेरा जमा कर बैठ गया। उन्हीं दिनों अजमेर के सूबेदार शहबाजखाँ कम्बो की मृत्यु हो गयी। सलीम ने अवसर मिलते ही शाही खजाने के एक करोड़ रुपये तथा शहबाजखाँ की निजी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया।
उन्हीं दिनों सलीम को ज्ञात हुआ कि इस समय अकबर असीरगढ़ के मोर्चे पर है तथा आगरा के किले में राजकीय कोष के दो करोड़ रुपये रखे हुए हैं। सलीम ने उस कोष को हथियाने के लिये अजमेर से आगरा की ओर प्रयाण किया किंतु किलेदार और कोषाध्यक्ष की सतर्कता के कारण सलीम उस कोष को हाथ नहीं लगा सका।
इसके बाद सलीम यमुना पार करके प्रयाग चला गया और उसने अपने आप को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर अपना दरबार जमा लिया। कुछ ही दिनों बाद उसे बिहार से भी शाही कोष के तीस लाख रुपये छीनने का अवसर मिल गया। शाही कोष से छीने गये लगभग डेढ़ करोड़ रुपये के बल पर सलीम ने तीस हजार सिपाही इकट्ठे कर लिये।
सलीम के विद्रोह के समाचार सुनकर अकबर असीरगढ़ का मोर्चा छोड़कर आगरा आया। जब सलीम को ज्ञात हुआ कि अकबर आगरा आ गया है तो सलीम ने प्रचारित किया कि वह भी अपने पिता की अभ्यर्थना करने के लिये आगरा जायेगा। वास्तव में तो उसका निश्चय अकबर को कैद करके स्वयं बादशाह बनने का था।
सलीम अपने तीस हजार सिपाही लेकर चारों तरफ लूटमार करता हुआ आगरा की ओर बढ़ा। अकबर सलीम के इरादों को भांप गया। उसने अपने आदमियों के माध्यम से उसे कहलवाया कि यदि वह अपनी सेना को भंग करके प्रयाग लौट जाये तो उसे क्षमा कर दिया जायेगा।
पिता की यह उदारता देखकर सलीम ने अपनी सेना प्रयाग को लौटा दी और अकबर से कहलवाया कि मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत होना चाहता हूँ। अकबर ने सलीम को अपनी सेवा में उपस्थित होने की अनुमति दे दी। आगरा आकर सलीम बादशाह के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोया। उसका यह भाव देखकर अकबर ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसे बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बनाकर बंगाल जाने के आदेश दिये तथा अपना खास तातार गुलाम उसकी सेवा में नियुक्त कर दिया।
इलाहाबाद लौटकर सलीम पुनः मक्कार आदमियों से घिर गया और उसने बंगाल जाने से मना कर दिया। वह प्रयाग में नित्य दरबार आयोजित करके लोगों को मनसब और जागीरें बांटने लगा। इस समस्या का अंत न आता देखकर अकबर ने खानखाना को दक्षिण से बुलाने का विचार किया किंतु दक्षिण में खानखाना की सफलताओं को देखते हुए उसे वहाँ से हटाया जाना उचित नहीं था इसलिये बहुत सोच-विचार के उपरांत अकबर ने अबुल फजल को आगरा बुलवाया।
– ‘आसमान से कहर बरपा है जिल्ले इलाही।’ तातार गुलाम ने भय से कांपते हुए कहा।
– ‘क्या है कमजात? क्यों आसमान से कहर बरपाता है? तुझे शहजादे की सेवा में भेजा था, वहाँ से भाग आया क्या?’ गुलाम की बात सुनकर अकबर को चिंता तो हुई किंतु उसने अपने स्वर को मुलायम ही बनाये रखा।
– ‘मुझे भाग ही आना पड़ा हुजूर।’
– ‘अच्छा बता, क्यों भाग आया?’
– ‘शहजादे ने आपके नेक दिल गुलाम हर फन मौला अबुल फजल का कत्ल करवा दिया है।’
– ‘क्या बकता है पाजी?’ गुलाम की बात सुनकर अकबर सन्न रह गया और उत्तेजना में अपने स्थान से उठ कर खड़ा हो गया।
– गुलाम की गुस्ताखी मुआफ हो आका। आपका हुक्म था कि जैसे ही कोई खास बात मालूम हो, मैं तुरंत आपकी सेवा में हाजिर हो जाऊँ। आपके हुक्म की तामील में ही मैं यह समाचार पाकर वहाँ से भाग आया हूँ।’
– ‘कब और कहाँ हुआ यह?’
– ‘कोई बीस दिन हो गये हुजूर, नरवर में।’
– ‘किसने हलाक किया?’
– ‘ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला ने हुजूर।’
गुलाम का जवाब सुनकर अकबर दहल गया। यह जानकर अकबर की निराशा का पार न था कि सलीम वीरसिंह बुंदेला से जा मिला है!
सलीम इस हद तक आगे बढ़ जायेगा, अकबर ने इसकी तो कल्पना भी नहीं की थी। अबुल फजल अकबर का अनन्य मित्र था। वह शहंशाह का खास आदमी माना जाता था। उसकी ख्याति पूरी सल्तनत में सबसे बुद्धिमान आदमी के रूप में थी। अकबर ने उससे अपनी समस्याओं का समाधान जानने के लिये उसे दक्षिण के मोर्चे से बुलवाया था किंतु सलीम ने उसकी हत्या करवाकर समस्याओं को खतरनाक मुकाम तक पहुँचा दिया था। अबुल फजल की मौत और बेटे की बेवफाई से अकबर शोक के गहन सागर में डूब गया। काफी देर तक वह चुपचाप महल की छत की ओर ताकता रहा। बहुत देर बाद वह अपने विचारों की आंधी में से बाहर निकला।
– ‘यह शमां गुल कर दे।’ अकबर ने तातार गुलाम को आदेश दिया। उसके स्वर में शोक और कष्ट का लावा बह रहा था।
शहंशाह का हुक्म पाकर गुलाम ने शमां बुझा दी।
– ‘और यह भी।’ अकबर ने दूसरी शमां की ओर संकेत किया।
गुलाम ने दूसरी शमां भी बुझा दी।
– ‘महल की सारी शमाएं बुझा दे और सारे दरवाजे बंद करके बाहर खड़ा रह। जब तक मैं न बुलाऊँ, किसी को भीतर न आने देना।’
तातार गुलाम स्वामी के आदेशों की अक्षरशः पालना करने के लिये महल के दरवाजे बंद करके बाहर जाकर खड़ा हो गया। उसे मालूम न था कि पूरे तीन दिन तक उसे बुत की तरह वहीं खड़े रहना होगा।
जब रियाया को मालूम हुआ कि बादशाह शमाएं बुझाकर तथा मुँह पर कपड़ा लपेट कर अपने महल में बंद हो गया है तो आगरा में हड़कम्प मच गया। कोई न जान सका कि आखिर ऐसा क्या हो गया है जो बादशाह इतना गमगीन है। लोग अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार अनुमान लगाने लगे।
तीन दिन बाद जब अकबर अपने महलों से बाहर निकला तो उसने दो फरमान एक साथ जारी किये। पहला ये कि वीरसिंह को जहाँ भी पाया जाये मार डाला जाये तथा दूसरा ये कि शहजादे सलीम को आगरा में तलब किया जाये।
अकबर की यह हालत देखकर सलीमा बेगम ने पिता-पुत्र के मध्य सुलह करवाने का विचार किया। वह अकबर से अनुमति लेकर इलाहाबाद गयी और सलीम को समझा बुझा कर आगरा ले आयी।
सलीम अपने बाप की यह दुर्दशा देखकर उसके पैरों पर गिर पड़ा और अपने अपराधों के लिये पश्चाताप करने लगा। अकबर ने अबुल फजल के गम को भुला दिया और सलीम को उठाकर छाती से लगा लिया। सलीम ने अपने सात सौ सत्तर हाथी और बारह हजार स्वर्ण मुद्रायें बादशाह को भेंट कीं।
इस बार अकबर ने सलीम से कहा कि वह यदि बंगाल नहीं जाना चाहता है तो मेवाड़ पर अभियान करके अपने पूर्वजों की भांति यश लाभ करे। सलीम ने अकबर की बात मान ली और मेवाड़ के लिये रवाना हो गया। अभी वह आगरा से निकल कर फतहपुर सीकरी तक ही गया था कि उसका मन फिर से बदल गया। उसने अकबर को कहलवाया कि मैं महाराणा के विरुद्ध अभियान करने में स्वयं को असक्षम मानता हूँ अतः मुझे प्रयाग जाने दिया जाये। अकबर ने सलीम को नितांत निकम्मा जानकर उसकी यह प्रार्थना भी स्वीकार कर ली।
प्रयाग पहुँच कर सलीम ने फिर से अपने को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया और दरबार लगाने लगा। वह अत्यधिक शराब पीने लगा। एक दिन शराब के नशे में धुत्त होकर उसने रानी मानबाई को कोड़ों से इस कदर पीटा कि ग्लानि वश मानबाई ने जहर खा लिया। मानबाई की मौत से राजा मानसिंह जो अब तक सलीम का सबसे बड़ा हितैषी था, सलीम का शत्रु हो गया।
तातार गुलाम ने मानबाई की आत्महत्या का पूरा प्रकरण अकबर को लिखकर भेजा, सलीम ने तातार गुलाम की जीवित अवस्था में ही खाल खिंचवा ली। जब एक नौकर ने इसका विरोध किया तो सलीम ने शराब पीकर उसे इतना पीटा कि पिटाई के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गयी।
एक दिन सलीम की निगाह अपने पिता अकबर के एक और खास नौकर पर पड़ी। जाने क्यों सलीम को उसे देखते ही इतना क्रोध आया कि उसे पीट-पीट कर नपुंसक बना दिया।
इन सारे समाचारों के मिलने पर अकबर ने सलीम के सुधरने की आशा त्यागकर सलीम के सत्रह वर्षीय पुत्र खुसरो पर ही अपना ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया। खुसरो आमेर नरेश मानसिंह की बहिन का पुत्र और खाने आजम मिर्जा कोका का दामाद था। इसलिये ये दोनों भी अकबर की योजना से सहमत हो गये तथा खुसरो को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने तथा सलीम को दण्डित करने के उपाय करने लगे।
अकबर ने भले ही सलीम को राज्याधिकार से वंचित करने तथा खुसरो को शासन पर स्थापित करने का निर्णय ले लिया किंतु प्रारब्ध ने सलीम और खुसरो के भाग्यों में कुछ और ही लिखा था। अभी खुसरो को शासन पर स्थापित करने की योजना पर विचार चल ही रहा था कि अकबर की माता हमीदाबानू की मृत्यु हो गयी।
सलीम अपनी दादी के मरने का समाचार पाकर बादशाह की मातमपुरसी के लिये आगरा आया और सीधे दरबार में ही हाजिर हुआ। अकबर ने दरबार में तो सलीम से कुछ नहीं कहा किंतु जब महल में उसे अकबर के सामने लाया गया तो अकबर ने खींचकर एक तमाचा सलीम के मुँह पर मारा तथा उसे स्नानागार में बंद कर दिया। राजा शालिवाहन को सलीम पर कड़ी निगरानी रखने तथा उसका मानसिक उपचार करने के लिये कहा गया।
उस दिन जब अकबर ने दर्पण में अपना चेहरा देखा तो वह बुरी तरह चौंक उठा। उसे दर्पण में अपने चेहरे के स्थान पर बैरामखाँ का चेहरा दिखायी दिया। उसे लगा कि सलीम ने अकबर के विरुद्ध नहीं अपितु वर्षों बाद फिर किसी अकबर ने बैरामखाँ के विरुद्ध विद्रोह किया है।
इसके बाद अकबर फिर कभी दर्पण नहीं देख सका और बुरी तरह से बीमार पड़ गया। शाही हकीम ने पूरा जोर लगाया किंतु उसे बादशाह की बीमारी पकड़ में नहीं आयी। वह जो भी दवा करता था, वह अकबर पर विष जैसा कार्य करती थी।
राजा शालिवाहन ने पूरे दस दिन तक सलीम को स्नानागार में बंद रखा तथा इस दौरान उसे शराब की एक बूंद भी पीने को नहीं दी। दस दिन बाद जब राजा शालिवाहन ने सलीम को स्नानागार से बाहर निकाला तो सलीम ने पूरी दुनिया ही बदली हुई पायी।
– ‘शहजादे!’ एक फुसफुसाहट सी सलीम के कानों में पड़ी। उसने इधर-उधर देखा किंतु कोई दिखाई नहीं दिया। बाहर शाम घिर आई थी तथा कमरे में इतना कम प्रकाश था कि उसमें कुछ भी स्पष्ट देखना संभव नहीं था।
– ‘इधर देखो, इधर।’ सलीम ने फिर दृष्टि घुमाई किंतु कुछ भी दिखायी नहीं दिया।
– ‘इधर पर्दे के पीछे देखो शहजादे।’ फुसफुसाहट दुबारा उभरी। सलीम के कमजोर शरीर में इतनी जान नहीं रही थी कि वह बिना सहारे के स्वयं चल कर पर्दे तक जा सके। दस दिन से शराब की एक बूंद भी नहीं मिली थी। उसे आज ही स्नानागार से बाहर निकाला गया था। इस सब के बावजूद अज्ञात भय ने सलीम को पर्दे तक जाने के लिये विवश किया।
– ‘कौन हो तुम?’ पर्दे के पीछे छिपे हुए आदमी को देखकर सलीम ने पूछा।
– ‘ शश्श्श्………..। धीरे बोलो शहजादे किसी ने सुन लिया तो अनर्थ हो जायेगा।’ पर्दे के पीछे छिपे हुए व्यक्ति ने शहजादे के होठों पर हाथ रख दिया।
– ‘लेकिन तुम हो कौन और क्या चाहते हो?’ सलीम ने पूछा।
– ‘मैं आपके विश्वस्त मित्र उमराव रामसिंह कच्छवाहे का सेवक हूँ।’
– ‘तुम यहाँ छिपकर क्यों खड़े हो?’
– ‘क्योंकि मैं राजा शालिवाहन का पहरा तोड़कर चुपके से यहाँ पहुँचा हूँ।’
– ‘तो क्या कमरे के बाहर अब भी शालिवाहन का पहरा है?’
– ‘हाँ।’
– ‘तो तुम पहरा तोड़ कर क्यों आये, क्या तुम्हें अनुमति नहीं दी गयी?’
– ‘मैंनेअनुमति मांगी ही नहीं।’
– ‘लेकिन क्यों?’
– ‘क्योंकि मैं आपसे गुप्त वार्तालाप करने की इच्छा रखता हूँ।’
– ‘कैसा गुप्त वार्तालाप?’
– ‘मेरे स्वामी ने मुझे आदेश दिया है कि मैं उनका संदेश आप तक पहुँचाऊँ।’
– ‘कैसा संदेश?’
– ‘मेरे स्वामी ने कहलवाया है कि बादशाह सलामत बुरी तरह से बीमार हैं, ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र दे लेकिन स्थिति बहुत खराब है। किसी भी समय कुछ भी हो सकता है।’
– ‘लेकिन यह बात मुझे छुप कर क्यों बताई जा रही है?’
– ‘क्योंकि बादशाह की बीमारी की बात बहुत गुप्त रखी जा रही है और केवल कुछ ही लोग जानते हैं।’
– ‘लेकिन क्यों?’
– ‘क्योंकि राजा मानसिंह और खाने आजम कोका नहीं चाहते कि यह समाचार आप तक पहुँचे।’
– ‘क्यों?’
– ‘क्योंकि राजा मानसिंह और खाने आजम कोका, बादशाह सलामत की इच्छानुसार शहजादे खुसरो को हिन्दुस्थान का ताज सौंपने की तैयारियों में लगे हुए हैं।’
– ‘तो फिर तुम मुझे यह सब क्यों बता रहे हो?’
– ‘शहजादे! समझने का प्रयास कीजिये। मैं आपके मित्र कच्छवाहा सरदार रामसिंह का सेवक हूँ। राजा मानसिंह का नहीं।’
– ‘रामसिंह क्या चाहता है?’
– ‘मेरे स्वामी आपको आगरा के तख्त पर बैठा हुआ देखना चाहते हैं।’
– ‘क्यों?’
– ‘यह तो वही जानें, मैं तो उनका संदेशवाहक मात्र हूँ।’
– ‘बादशाह सलामत की इच्छा के विरुद्ध रामसिंह मुझे किस तरह आगरा का ताज सौंपेगा?’
– ‘उन्होंने एक योजना तैयार की है। जिस तरह बादशाह सलामत के चारों ओर राजा मानसिंह का पहरा है, उसी तरह महलों के बाहर मेरे स्वामी रामसिंह ने अपना पहरा बैठा दिया है। उनके सिपाही बड़ी संख्या में फतहपुर सीकरी तथा आगरा के चारों ओर सिमट आये हैं। यदि मानसिंह ने आपको गिरफ्तार किया तो भी वह आपको महल से बाहर नहीं ले जा सकेगा।’
– ‘लेकिन उसने मेरी इस महल के भीतर हत्या कर दी तो?’
– ‘नहीं। राजा मानसिंह हिन्दू है, वह अपने बहनोई की हत्या कदापि नहीं करेगा।’
– ‘लेकिन अब मानबाई तो मर चुकी है और इस बात को लेकर वह मुझसे कई बार झगड़ा भी कर चुका है।’
– ‘फिर भी वह किसी भी सूरत में आपकी हत्या का प्रयास नहीं करेगा और न ही किसी और को करने देगा।’
– ‘लेकिन उसने मुझे कैद किया तो?’
– ‘ऐसी सूरत में मेरे स्वामी रामसिंह अपने आदमियों सहित महलों में प्रवेश करेंगे और आपको मुक्त करवाने का प्रयास करेंगे।’
– ‘अच्छा ठीक है। मुझे क्या करना है?’
– ‘आपको किसी तरह बादशाह सलामत तक पहुँचना है।’
– ‘इसमें क्या कठिनाई है? मैं अभी बादशाह सलामत की सेवा में जाता हूँ।’
– ‘बादशाह सलामत के महल के चारों ओर राजा मानसिंह का कड़ा पहरा है। वह आपको किसी भी हालत में बादशाह तक नहीं पहुँचने देगा।’
– ‘तो फिर?’
– ‘आप सलीमा बेगम से मिलने का प्रयास कीजिये और उनके माध्यम से बादशाह तक पहुंचिये।’
– ‘लेकिन मैंने सुना है कि सलीमा बेगम तो पहले से ही मुझ पर खफा हैं। क्या मैं अपनी माता मरियम उज्जमानी के माध्यम से वहाँ पहुँचूं?’
– ‘नहीं यह उचित नहीं होगा। महारानी जोधाबाई कभी भी बादशाह सलामत के निश्चय के विरुद्ध एक भी शब्द अपने मुँह से नहीं निकालेंगी।’
– ‘तो फिर?’
– ‘मेरे स्वामी ने सुझाव भिजवाया है कि आप सलीमा बेगम के माध्यम से प्रयास कीजिये।’
– ‘ठीक है। मैं ऐसा ही करूंगा लकिन मान लो कि मैं किसी तरह बादशाह सलामत के पास पहुँच गया और उन्होंने मुझे ताज सौंपने के स्थान पर खुसरो को ही बादशाह बनाने की जिद्द बनाये रखी तो?’
– ‘ऐसी स्थिति में हो सकता है कि हमें बादशाह सलामत को गिरफ्तार करना पड़े।’
– ‘क्या रामसिंह मेरे लिये बादशाह सलामत से विद्रोह करेगा?’
– ‘उनकी इच्छा तो नहीं है किंतु आवश्यक हुआ तो यह भी करना पड़ेगा।’
पर्दे के पीछे छिपे हुए रहस्यमय व्यक्ति की बात पूरी हुई ही थी कि राजा शालिवाहन ने कक्ष में प्रवेश किया। सलीम चुपचाप पर्दे के पास से हट गया।
अभी सूरज निकलने में कुछ समय था जब सलीमा बेगम ने अपनी लौण्डी सहित बादशाह सलामत के कक्ष में प्रवेश किया। सलीमा बेगम ने अपना पूरा बदन बुर्के में छिपा रखा था किंतु उसके मुँह से कपड़ हटा हुआ था। जबकि लौण्डी के चेहरे पर कपड़ा पड़ा हुआ था।
सलीमा बेगम को देखकर कच्छवाहा पहरेदार चिंता में पड़ गया। क्या करे? क्या न करे? इससे पहले कभी भी ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई थी। उसमें इतना साहस न था कि सलीमा बेगम का मार्ग रोके या उससे कुछ पूछने का साहस करे। सलीमा बेगम के प्रवेश पर उसे कोई आपत्ति भी नहीं थी। उसे आपत्ति थी उसकी बुर्केदार लौण्डी से। राजा मानसिंह का आदेश था कि किसी को भी चेहरा छुपा कर बादशाह के पास जाने की अनुमति न दी जाये।
इधर पहरेदार उचित अनुचित के ही विचार में फंसा हुआ था और उधर सलीमा बेगम अपनी लौण्डी सहित बादशाह के कक्ष में प्रवेश कर गयी। पहरेदार ने सतर्क होकर अपने साथी को दौड़ाया कि जाकर राजा मानसिंह को सूचित कर दे।
– ‘इस नेक सुबह के नेक उजाले में कनीज खुदाबंद से बादशाह सलामत की तंदरुस्ती की दुआ करती है।’ सलीमा बेगम ने बादशाह को जागा हुआ देखकर तसलीम किया।
अकबर के जर्द चेहरे पर मुर्दानी छायी हुई थी और कमजोरी के कारण उसका पूरा बदन काँप रहा था। उसकी आँखें गढ़ों में धंस गयी थीं और बालों का रंग मिट्टी में सनी सफेद सन जैसा हो गया था।
– ‘बेगम! सुबह भले ही नेक हो किंतु उसके उजाले में पहले की सी नेकी न रही।’ बादशाह ने काँपते हुए शब्दों में सलीमा बेगम का अभिवादन स्वीकार किया।
– ‘दिल मायूस न करें शहंशाह। सुबह के उजाले में नेकी न रही तो क्या हुआ, दुनिया आपकी नेकी के उजाले से रौशन है।’
– ‘आप शाइरा हैं। उम्मीदों को जगाये रख सकती हैं किंतु हमारी तो सारी उम्मीदें ही खत्म हो गयीं।’
– ‘परवरदिगार! रियाया को अभी आपसे काफी उम्मीदें हैं।’
– ‘लेकिन हम किससे उम्मीद करें?’
– ‘अपनों से। बादशाह सलामत, उम्मीदें अपनों से ही की जाती हैं।’
– ‘लेकिन जो अपने थे, वे सब तो एक-एक करके हमें छोड़ते जा रहे हैं। बादशाह सलामत हुमायूँ हमें छोड़ गये। वालिदा हमीदाबानंू हमें छोड़ गयीं। खान बाबा बैरामखाँ ने हमें छोड़ दिया। हमारे नवरत्नों में से अबुल फजल, राजा टोडरमल और मियाँ तानसेन हमें छोड़ गये। शहजादे मुराद और दानियाल हमें छोड़ गये। और भी जाने कौन-कौन हमें छोड़ दें। इससे तो अच्छा है कि अब दुनिया से हमारी विदाई हो जाये।’
– ‘कायनात में आपकी सलामती की दुआ मांगने वालों की अब भी कमी नहीं है बादशाह सलामत।’
– ‘हाँ! उनकी कमी नहीं है। आप हैं, शाह बेगम मरियम उज्जमानी हैं, खानखाना अब्दुर्रहीम हैं लेकिन फिर भी जाने क्यों हर वक्त ऐसा लगता है कि जिसे हमारी सलामती की सबसे ज्यादा दुआ मांगनी चाहिये थी, वह तो खुद ही हमारी जान ले लेना चाहता है।’
– ‘आपका इशारा किस ओर है, शहंशाह?’
– ‘आप अच्छी तरह जानती हैं। शेखूबाबा से हमने कितना प्रेम किया! क्या उसका फर्ज नहीं था कि आज वो हमारा सहारा बनता?’
– ‘शेखूबाबा ने कुछ नादानियां की हैं जिल्ले इलाही किंतु वे आपके शहजादे हैं, क्षमा के योग्य हैं।’
– ‘क्षमा के योग्य हैं? आखिर कितनी बार क्षमा के योग्य हैं?’
– ‘राजा शालिवाहन के उपचार से उनका रोग दूर हो गया है और वे हर तरह से स्वस्थ होकर आपकी सेवा में हाजिर होने का इंतजार कर रहे हैं।’
– ‘बेगम! आप जानती हैं कि हमने शेखू बाबा का मुँह न देखने की कसम खाई है।’
– ‘जो रहमदिल बादशाह अपनी पूरी रियाया को औलाद मानकर उसके गुनाह माफ करता है, क्या वह अपनी औलाद पर रहम न कर सकेगा?’
– ‘जब किसी को रहम की जरूरत हो तो रहम करूं?’ बादशाह खीझ पड़ा।
– ‘यह भी ठीक रही बादशाह सलामत! एक ओर तो आप शेखू बाबा का मुँह भी नहीं देखना चाहते और दूसरी ओर उनसे रहम की दरख्वास्त भी चाहते हैं आखिर वे अपनी बात कहंे भी तो कैसे………?’
सलीमा बेगम की बात पूरी भी न हो पायी थी कि राजा मानसिंह ने कक्ष में प्रवेश किया। उसे देखते ही सलीमा बेगम का ईरानी चेहरा और भी सफेद हो गया। उसे समझ में नहीं आया कि क्या करे।
ठीक उसी समय सलीमा बेगम की लौण्डी ने अपने मुँह पर से पर्दा उठाया और आगे बढ़कर बादशाह के पास रखी म्यान में से तलवार खींच कर अपने हाथ में ले ली। लौण्डिया को तलवार खींचते देखकर राजा मानसिंह ने भी अपनी म्यान से तलवार खींची और लौण्डिया की ओर लपका किंतु उसका चेहरा पहचान कर उसकी ओर जाने के स्थान पर बादशाह की शैय्या के निकट जाकर खड़ा हो गया।
यह सब इतनी शीघ्रता से हुआ कि कोई कुछ नहीं समझ सका।
सलीमा बेगम ने चीख कर कहा- ‘शेखू बाबा!’
– ‘शेखू बाबा! कहाँ है शेखू बाबा?’ बूढ़े बादशाह ने काँपती हुई आवाज में चिल्लाकर पूछा। उसने उठने का प्रयास किया किंतु उठ न सका।
– ‘मैं यहाँ हूँ बादशाह सलामत।’ लौण्डी ने चीखकर कहा और अपना बुर्का उतार कर फैंक दिया।
– ‘तुमने यह तलवार क्यों उठायी? यह क्या बदसलूकी है?’
– ‘अपने पुरखों की तलवार उठाना बदसलूकी नहीं होती बादशाह सलामत। इस तलवार पर जितना आपका हक है, उतना ही मेरा भी है।’
– ‘इस चंगेजी तलवार को हाथ लगाने योग्य नहीं है तू। ला इसे इधर दे।’
– ‘अब आप बूढ़े और कमजोर हो गये हैं, अब आपको इसकी जरूरत नहीं रही। बड़े बादशाह हुजूर हुमायूँ की यह तलवार अब मेरे पास ही रहने दीजिये।’
– ‘मैं तेरे दिल की हसरत को जानता हूँ लेकिन तू इतना जान ले कि हाथ में तलवार पकड़ने लेने भर से तख्त और ताज हासिल नहीं हो जाते।’
– ‘जानता हूँ, अच्छी तरह से जानता हूँ कि तख्त और ताज कैसे हासिल होते हैं। इसलिये आपसे दरख्वास्त करता हूँ कि अब यह ताज भी मेरे सिर पर रख दें और आप इसके भार से मुक्त हो जायें।’ सलीम ने अकबर की पगड़ी की ओर संकेत करते हुए कहा।
– ‘यह पाक चीज तुम्हारे सिर पर नहीं, शहजादे खुसरो के सिर पर रखी जायेगी।’
– ‘क्यों? क्या मैं चंगेजी खानदान का नहीं? क्या मेरी रगों में तैमूर लंग का खून नहीं?’
– ‘शहजादे खुसरो में भी ये सब खूबियां हैं।’
– ‘लेकिन खुसरो और इस पगड़ी के बीच मैं खड़ा हूँ।’
– ‘तुम्हें हटा दिया जायेगा।’ अकबर ने गुस्से से काँपते हुए कहा।
– ‘कहीं ऐसा न हो कि हटाने वालों को हटना पड़े।’
– ‘तुम्हारी जुबान खींच ली जायेगी गुस्ताख। अकबर बीमार भले ही है किंतु मरा नहीं है।’
– ‘मेरी जुबान खींची गयी तो जिस खुसरो को आप मोहरा बनाकर मुझे शिकस्त दिया चाहते हैं, उसके बदन पर एक इंच चमड़ी भी न बचेगी।’
– ‘ऐसी बात कहने से पहले इतना तो सोच कि वह तेरी औलाद है!’
– ‘आप भी मेरे बारे में कुछ कहने से पहले यही सोचें तो बेहतर होगा जिल्ले इलाही।’
– ‘मैं चाहूं तो इसी समय मानसिंह तेरा सिर कलम कर दे।’
– ‘लेकिन सिर मानसिंह के बदन पर भी नहीं बचेगा। मेरे खैरख्वाह रामसिंह कच्छवाहे ने चारों ओर से महल को घेर रखा है। मानसिंह मेरी तरफ बढ़कर तो देखे।’ सलीम ने चालाक चीते की तरह गुर्राकर कहा और अपने हाथ की तलवार तेजी से हवा में घुमायी।
अकबर ने सिर पकड़ लिया। नहीं जीत सकता वह इस लड़ाई में। जाने कैसी लड़ाई है यह! उसे लगा कि उसकी साँस डूब रही है। आँखों के सामने अंधेरा सा छाता जा रहा है। पूरे बदन पर चींटियां सी रेंग रही हैं। सलीमा ने चौंक कर बादशाह की ओर देखा और चीखती हुई सी बोली- ‘जिल्ले इलाही! संभालिये अपने आप को।’
अकबर ने सलीम और अपने जीवन दोनों से मायूस होकर सलीमा बेगम व मानसिंह की ओर देखा बैरामखाँ और अब्दुर्रहीम के बाद जिन दो शरीरों में अकबर के प्राण बसते थे वे दोनों ही उसके सामने खड़े थे। अकबर के एक संकेत पर वे अपने प्राण दे सकते थे किंतु लाख चाह कर भी वे वह नहीं कर सकते थे जिससे अकबर को शांति मिले। सच पूछो तो उस क्षण स्वयं अकबर भी नहीं जानता था कि क्या करने से उसके मन को शांति मिलेगी।
अचानक डूबती हुई सांसें कुछ स्थिर हुईं। अकबर को लगा कि शरीर में अचानक ही चेतना लौट आयी है। आँखों से फिर दिखाई देने लगा है। कक्ष के बिम्ब अचानक ही बहुत स्पष्ट हो चले हैं। वह समझ गया कि यह बुझते हुए चिराग़ की अंतिम रौशनी है जो चिराग़ के बुझने से पहले एक बार अपनी पूरी चमक दिखाना चाहती है। उसने मानसिंह को संकेत किया कि पगड़ी उठाये। मानसिंह ने पगड़ी उठाकर अकबर के हाथों में रख दी।
– ‘मेरी हसरत तो अधूरी रह गयी सलीमा बेगम! तुम्हारी ही हसरत पूरी हो। आओ शहजादे मेरे पास आओ।’
मानसिंह ने आश्चर्यचकित होकर बादशाह की ओर देखा। सलीम आगे बढ़कर ठीक बादशाह के पलंग तक पहुंच गया। बादशाह ने काँपते हुए हाथों से अपनी पगड़ी सलीम के माथे पर रख दी।
– ‘आज से तुम्हारा बादशाह यही है मानसिंह। इसकी रक्षा करना।’ अपनी बात पूरी करके बूढ़ा बादशाह एक ओर को लुढ़क गया।
जिस दिन अकबर सलीम के सिर पर अपनी पगड़ी रखकर एक ओर को लुढ़क गया था उसके बाद वह कभी भी नये सूरज का उजाला नहीं देख सका। वह छः दिन तक बेहोश रहा। सातवें दिन आधी रात के लगभग अकबर के प्राण पंखेरू उड़ गये। राजा मानसिंह अपने आदमियों को लेकर महल से बाहर हो गया और जाते समय खुसरो को भी अपने साथ छिपा कर ले गया। कच्छवाहे रामसिंह ने आगरा का चप्पा-चप्पा खोज मारा किंतु खुसरो उसके हाथ नहीं लगा।
बादशाह के मरते ही सलीम ने सबसे पहले शाही कोष को अपने अधिकार में लेने का काम किया। अकबर आगरा के किले में तीस करोड़ रुपया छोड़ कर मरा था। मानसिंह ने किले की किसी चीज को हाथ नहीं लगाया था, इससे वे रुपये बिना किसी बाधा के सलीम के हाथ लग गये।
बादशाह की मौत के ठीक आठवें दिन सलीम नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से आगरा के तख्त पर बैठा। पहले ही दिन उसने कई राजाज्ञाएं प्रसारित कीं जिनमें दो राजाज्ञाएं प्रमुख थीं, पहली ये कि मानसिंह बंगाल के लिये प्रस्थान कर जाये तथा दूसरी ये कि जैसे भी हो शहजादे खुसरो को कैद करके मेरे सामने लाया जाये।
राजा मानसिंह की तीन पीढ़ियों ने अकबर की तन मन से सेवा की थी। राजा मानसिंह की बुआ और बहिन भी अकबर तथा सलीम को ब्याही गयीं थीं। राजा भगवानदास तथा राजा मानसिंह ने अकबर के लिये बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीती थीं। अकबर की मृत्यु से एक क्षण पहले तक मानसिंह मुगल सल्तनत का सबसे मजबूत कंधा गिना जाता था किंतु नियति के चक्र ने सलीम को बादशाह बना दिया था जो मानसिंह का घोर विरोधी था। जहाँगीर के हाथों अपमानित होकर राजा मानसिंह वृद्धावस्था में अपना टूटा हुआ दिल लेकर बंगाल के लिये प्रस्थान कर गया।
आज वर्षों बाद उसे गुसांईजी के वे शब्द स्मरण हो आये थे, जो उन्होंने मानसिंह द्वारा महाराणा पर कोप करने की बात सुनकर कहे थे- ‘बंधु द्रोह भयानक पाप है राजन्। मनुष्य को इस पातक से बचने के लिये प्राण देकर भी प्रयास करना चाहिये। जो अबंधु है, जो रिपु है, जो हरिविमुख हैै, उस पर कोप करने की सामर्थ्य और इच्छा पैदा करो। जो बंधु है, निरीह है, शरण में आया हुआ है, प्रेम, प्रीत और दया का पात्र है, उससे वैर कैसा? यदि मनुष्य के मन में स्वबंधु, स्वजाति, स्वधर्म और स्वराष्ट्र के प्रति अपनत्व नहीं होगा, वह प्राणि मात्र में ईश्वर के दर्शन कैसे कर सकेगा? अभी भी समय है राजन्! अपनी त्रुटियों का प्रतिकार करो। अपने बंधुओं को गले लगाओ अन्यथा जीवन में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा।’
सचमुच ही बंधुओं से वैर करके तथा अबंधुओं से प्रीत जोड़ कर क्या पाया था उसने? अपमान! तिरस्कार!! निष्कासन!!! स्वयं अपनी दुर्दशा और अपने बंधुओं की दुर्दशा। अपने धर्म की दुर्दशा और अपने राष्ट्र की दुर्दशा। महाराणा तो अपना उज्जवल चरित्र इतिहास को सौंप कर एकलिंग की सेवा में जा पहुँचा था किंतु स्वयं मानसिंह…….?
राज्य की खातिर उसने अपनी बहिन-बेटियाँ शत्रुओं को ब्याह दीं। कुल पर कलंक लिया और दास होकर भी जीवन भर राजा कहलाने का भ्रम पाला।
अपनी दशा देखकर मानसिंह की आँखों में आँसू आ गये और आत्मा चीत्कार कर उठी। हाय! किन विधर्मियों और शत्रुओं की दासता में जीवन बिताया….. किंतु अब पश्चाताप् करने से क्या होने वाला था। शरीर के खेत से काल रूपी चिड़िया उम्र का दाना चुगकर कभी की फुर्रर्रर्र… हो चुकी थी। जीवन के दिन अब बचे ही कितने थे?
बंगाल पहुँचने के कुछ ही दिनों पश्चात् राजा मानसिंह की मृत्यु हो गयी। वह भग्न हृदय लेकर इस असार संसार से सदा-सर्वदा के लिये प्रस्थान कर गया।
खुसरो आगरा से निकल कर दिल्ली होते हुए लाहौर की ओर भागा। अपने बारह हजार आदमी लेकर वह सिक्खों के गुरु अर्जुनदेव की शरण में पहुँचा। अर्जुनदेव ने उसे बादशाह होने का आशीर्वाद दिया। जब यह समाचार जहाँगीर को मिला तो उसकी रूह काँप गयी। वह स्वयं सेना लेकर लाहौर गया।
भैंरोंवाल[1] के निकट पिता पुत्र की सेनाओं में घमासान हुआ। खुसरो के कई हजार आदमी मारे गये। अंत में वह मैदान छोड़कर काबुल के लिये भाग खड़ा हुआ। उसका कोष जहाँगीर के हाथ लग गया। जब खुसरो अत्यंत शीघ्रता में चिनाब पार कर रहा था, तब उसकी नावें जहाँगीर के आदमियों ने पकड़ लीं।
जहाँगीर ने अपने बाप अकबर तथा अपने बेटे खुसरो से वैमनस्य का पूरा हिसाब अपने बाप के चहेते खुसरो से ही चुकता करने का निश्चय किया। उसने खुसरो के खास मित्रों को जीवित ही गधे और बैल की खालों में सिलवा दिया। उसके सैंकड़ों साथियों को एक मील लम्बी सूली पर कतार में लटका दिया। इसके बाद खुसरो को हाथी पर बैठा कर लटकते हुए शवों की कतारों के बीच से ले जाया गया। उससे कहा गया कि अपने हर आदमी की लाश के सामने रुके और झुक कर उसका सलाम कुबूल करे। इसके बाद खुसरो की आँखें फोड़ कर उसे कारागार में डाल दिया जहाँ पंद्रह साल बाद रहस्यमय परिस्थितियों में उसकी मृत्यु हो गयी।
खुसरो से निबटने के बाद जहाँगीर गुरु अर्जुन देव की ओर बढ़ा। जहाँगीर पहले से ही इस बात के लिये खफा़ था कि गुरु ने अपनी पुत्री का विवाह जहाँगीर के मित्र चंदूशाह के बेटे से करने से मना कर दिया था[2] लेकिन अकबर के डर के कारण जहाँगीर कुछ कर नहीं पाया था। अब बदला लेने का अच्छा मौका हाथ लगा जानकर उसने गुरु को आदेश दिया कि राज्यद्रोही को आशीर्वाद देने के जुर्म में आप दो लाख रुपये का जुर्माना भरिये। गुरु ने कहा कि मैं तो साधु हूँ। मुझे तेरी सत्ता से कोई लेना देना नहीं है। जो भी मेरी शरण में आयेगा, उसे मैं आशीर्वाद दूंगा। जहाँगीर ने गुरु को कैद कर लिया तथा तरह-तरह की यातनायें दीं। अंत में एक दिन उन्हें बुरी तरह से तड़पा-तड़पा कर मार डाला।[3] गुरु ने अत्याचारी जहाँगीर के हाथों मौत स्वीकार कर ली किंतु जुर्माना नहीं भरा।
यह भाग्य की ही विडम्बना थी कि जिस खुसरो को अकबर ने ताज देना चाहा था उसे तो अपने मित्रों सहित कारागार में मौत मिली और जिस सलीम को अकबर दर-दर का भिखारी बनाना चाहा था, वह पूरी शानो शौकत के साथ मुगलिया तख्त पर बैठकर अकबर के आदमियों को मौत के मुँह में पहुंचाता रहा।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...