फिर से दक्षिण में (95)

खानखाना नहीं चाहता था कि वह फिर से दक्षिण में जावे। वह जानता था कि दक्षिण उसके लिये दो पाटों की चक्की बन चुका है। एक तरफ बादशाह है तो दूसरी तरफ चाँद।

दक्षिण के मोर्चे से एक बुरी खबर आई जिसे सुनकर अकबर थर्रा उठा। दक्षिण ने बलि लेनी शुरू कर दी थी। शहजादा मुराद शराब के नशे में मिरगी आने से मर गया। इस पर अकबर ने शहजादे दानियाल को दक्षिण के लिये नियुक्त किया।

जब दानियाल दक्षिण के लिये रवाना हो गया तो अकबर खानाखाना के डेरे पर हाजिर हुआ और बड़ी चिरौरी, मान-मुनव्वल करके खानखाना से विनती की कि वह भी दानियाल के साथ दक्षिण को जावे और किसी भी कीमत पर शहजादे को फतह दिलवाये।

खानखाना नहीं चाहता था कि वह फिर से दक्षिण में जावे। वह जानता था कि दक्षिण उसके लिये दो पाटों की चक्की बन चुका है। एक तरफ बादशाह है तो दूसरी तरफ चाँद। यदि वह किसी एक के साथ हो जाता है तो दूसरे के साथ अन्याय होना निश्चित ही है किंतु भाग्य की विडम्बना को स्वीकार कर खानखाना दक्षिण के लिये रवाना हो गया।

खानखाना शहजादे मुराद पर तो सख्ती कर पाता था किंतु अब उसे दानियाल के साथ काम करना था जो कि खानखाना अब्दुर्रहीम का जंवाई तथा जाना का पति था।

-अध्याय 95, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

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