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शिकायत (77)

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शिकायत

अमीरों को सबसे अधिक शिकायत इस बात से थी कि साधारण सिपाही के घर में जन्म लेने वाला रहीम हुमा का पर लगाकर दरबार करता है। भले ही उसका बाप खानखाना के पद तक जा पहुँचा हो किंतु था तो वह मूल रूप से एक साधारण सिपाही ही!

खानखाना का ऐसा ठाठ-बाट, अकूत सम्पदा और उसके दरबार की ऐसी निराली शान देखकर कई दुष्टों की छाती पर साँप लोट गये। कहाँ से लाया खानखाना यह सम्पदा? कहाँ से आये ये सारे साजो-सामान? कहाँ से आये इतने सारे लोग? सब कुछ रहस्यमय था।

ऐसा ठाठ-बाट और ऐसा रूआब तो शहंशाह अकबर के अतिरिक्त और किसी अमीर, उमराव एवं सरदार के पास न था। कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों की छातियां ईर्श्या से दहकने लगीं। शहजादों की नाक में सलवटें पड़नी आरंभ हो गयीं।

उन्हें सबसे अधिक शिकायत इस बात से थी कि साधारण सिपाही के घर में जन्म लेने वाला रहीम हुमा का पर लगाकर दरबार करता है। भले ही उसका बाप खानखाना के पद तक जा पहुँचा हो किंतु था तो वह मूल रूप से एक साधारण सिपाही ही! इस तरह का दरबार करना तो शहजादों को भी नसीब नहीं था। फिर रहीम की ऐसी क्या हैसियत है?

जब आग जलती है तो धुंआ उसकी सूचना चारों ओर फैला ही देता है। जानने में रुचि न रखने वालों को भी आग की सूचना हो जाती है। रहीम के सम्बंध में भी यही हुआ। लोगों की छातियों में जलने वाली आग का धुंआ भी चारों ओर फैलने लगा और एक दिन बादशाह अकबर के महल तक जा पहुँचा।

बादशाह इन खबरों को सुन-सुन कर मुस्कुराता था। एक दिन बहुत से अमीरों ने एक साथ बादशाह के हुजूर में इकट्ठे होकर रहीम की शिकायत की- ‘बादशाह सलामत यह कमजात रहीम आपकी नेक मेहरबानियों को पाकर अपना दिमाग फेर बैठा है। वह आलीशान तख्त पर बैठकर बादशाहों और शहजादों की भांति दरबार लगाता है। लोगों को सोना, चाँदी, कपड़े, रुपये और धान बांटता है।’

– ‘लोगों को सोना, चाँदी, कपड़े, रुपये और धान बांटना कोई गुनाह है क्या?’ बादशाह ने मुस्कुरा कर पूछा।

बादशाह का जवाब सुनकर अमीरों के चेहरे फक पड़ गये। किसी तरह हिम्मत करके एक दरबारी ने कहा- ‘बेशक यह गुनाह नहीं किंतु रहीम इतना माल-असबाब लाया कहाँ से, यह तो जानना चाहिये।’

– ‘तुम्हें क्या लगता है, रहीम ने कहीं चोरी की होगी या डाका डाला होगा।’

– ‘ऐसा लगता तो नहीं किंतु वह बेशुमार दौलत लुटा रहा है।’

– ‘इसके अलावा उसका कोई और गुनाह?’

– ‘हुजूरे आली! वह शहजादों की तरह सिर पर ताज रखता है और ताज पर हुमा का पर भी!’ एक अमीर ने उत्तेजित होकर कहा।

– ‘और?’

– ‘हुजूर मेरी जान बख्शी जाये किंतु सही बात तो यह है कि वह आपकी तरह तख्त पर बैठकर चंवर ढुलवाता है और छत्र तान कर चलता है।’

– ‘तुम्हारी बात सही है, इसका क्या सबूत है तुम्हारे पास?’

– ‘सुबूत देखना है तो अभी बादशाह सलामत स्वयं जहमत फरमायें और रहीम के डेरे पर चलकर स्वयं अपनी आँखों से देख लें।’

– ‘ठीक है। आज ऐसा ही किया जाये।’

कुछ ही देर में बादशाह की सवारी रहीम के डेरे पर थी। खानखाना को इत्तला मिली तो भागता हुआ ड्यौढ़ी पर हाजिर हुआ और अपने सिर से पगड़ी उतार कर हाथी के नीचे बिछाता हुआ बोला- ‘मेरे धन्य भाग जो बादशाह सलामत की नजर इस ओर हुई।’

– ‘खानखाना! हमने तुम्हारे दरबार की बड़ी तारीफ सुनी है, इसलिये हम बिना बुलाये ही तुम्हारा दरबार देखने चले आये।’ बादशाह ने हाथी से उतर कर पगड़ी के कपड़े पर पैर धरते हुए कहा।

– ‘इस गरीबखाने पर आपके पधारने के अलावा यहाँ और कोई तारीफ की बात नहीं है हुजूर। फिर भी आप ने इनायत की ही है तो कुछ न कुछ खास बात जरूर होगी।’

– ‘हमने सुना है तलवार का हुनर दासों को भी स्वामी बना देता है। क्या यह बात सही है खानखाना?’

– ‘नहीं बादशाह सलामत। यह बात सही नहीं है। स्वामिभ्क्ति और स्वामी की कृपा ही दास को स्वामी बना सकती है।’ खानखाना ने शांति से प्रत्युत्तर दिया। बादशाह को रहीम के जवाब से बड़ी तसल्ली हुई

  बादशाह के आदेश से खानखाना ने बादशाह को अपना दरबार दिखाया। उसे देखकर अकबर की आँखें चौंधिया गयीं। वाकई में जगह काबिले तारीफ तो थी ही, रश्क करने लायक भी थी। अकबर खानखाना के तख्त पर जाकर बैठ गया।

रहीम ने उसी क्षण दौड़कर हुमा के पर वाला ताज बादशाह के सिर पर रख दिया और स्वयं बादशाह के ऊपर छत्र तानकर खड़ा हो गया। उसके नौकर भी संकेत पाकर बादशाह पर चंवर ढुलाने लगे और बादशाह सलामत की जय-जयकार करने लगे।

बादशाह ने पूछा- ‘खानखाना! बादशाहों और शहजादों के काम में आने वाली चीजें तुम्हारे यहाँ क्या कर रही हैं?’

– ‘जिल्ले इलाही। मुझे अंदाज था कि एक न एक दिन हजरत यहाँ पधारेंगे। उसी की तैयारी में यह सामान मंगा रखा था। यदि शहजादों और बादशाहों के काम आने वाला यह सामान यहाँ नहीं होता तो मुझे आज अपने मालिक के सामने लज्जित होना पड़ता।

– ‘हम तुम्हारी आवभगत से प्रसन्न हुए खानखाना। आज से यह सब सामान तुम्हें दिया जाता है। हमारे हुक्म से अब तुम ही इसका उपयोग करो।’ यह कहकर बादशाह उठ गया।

-अध्याय 77, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

जाडा महडू (78)

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जाडा महडू

– ‘हुजूर! महाराणा प्रतापसिंह के भाई जगमाल का वकील जाडा महडू आपकी सेवा में हाजिर हुआ चाहता है।’ गुलाम ने राज्य के वकील खानखाना अब्दुर्रहीम से निवेदन किया। उस समय खानखाना अपने निजी दरबार में व्यस्त था।

– ‘जाडा महडू!’ खानखाना के भीतर स्मृतियों का पिटारा खुला। कहाँ सुना यह नाम? कब? अचानक ही उसे जाडा महडू का प्रसंग याद आ गया, जैसे सोते से जाग पड़ा हो, ‘जा उसे ले आ, यहीं ले आ। बड़ा मजेदार आदमी है।’

अब्दुर्रहीम जब मेवाड़ में था तब उसने इस कवि की बड़ी तारीफ सुनी थी। जाडा महडू का वास्तविक नाम आसकरण चारण था। उसके जैसा चाटुकार जमाने में न था। शरीर से बहुत मोटा होने तथा चारणों की महडू शाखा में होने के कारण इसे मेवाड़ में जाडा महडू कहकर पुकारते थे। उन दिनों तो उसे जाडा से रूबरू होने का अवसर नहीं मिला था किंतु अब्दुर्रहीम के मन में जाडा से मिलने की बड़ी इच्छा थी जो आज अनायास ही पूरी हो रही थी।

जब सेवक जाडा महडू को लेने बाहर गया तो खानखाना ने सरकारी कामों को स्थगित करते हुए, दरबार में उपस्थित सभासदों से कहा- ‘तैयार हो जाओ। दरबार में बड़ा भूकम्प आने वाला है।’ खानखाना की बात से दरबारियों को बड़ा अचंभा हुआ। आखिर यह जाडा महडू चीज क्या है जो खानखाना दरबार में भूकम्प आने की भविष्यवाणी कर रहे हैं! पहले तो कभी इसका नाम सुना नहीं!

थोड़ी ही देर में गुलाम, जाडा महडू को लेकर उपस्थित हुआ। ठीक ही कहा था खानखाना ने। दरबार में उसका प्रवेश किसी भूकम्प से कम नहीं था। एक बहुत स्थूल काया ने दरवाजे से ही बादलों की तरह गरजना आरंभ कर दिया-

‘खानखानाँ नवाब रा अड़िया भुज ब्रह्मण्ड,

पूठै तो है चंडिपुर धार तले नव खण्ड।’   [1]

दरबार में बैठे बहुत से लोग समझ नहीं सके कि वह कह क्या रहा था लेकिन खानखाना डिंगल जानता था। उसे जाडा के छंद में बड़ा आनंद आया। जाडा ने अपनी दोनों भुजाओं को हवा में लहराते हुए कहा-

‘खानखानाँ नवाब रै खांडे आग खिवंत,

जलवासा नर प्राजलै तृणवाला जीवंत। ‘[2]

जाडा एक क्षण के लिये ठहरा और अपने फैंफड़ों में वायु भरकर पूरी ताकत से बोला-

खानखानाँ   नवाब हो  मोहि  अचंभो  एह,

मायो किम गिरि मेरु मन साढ़ तिहस्यी देह। ‘ [3]

जाडा ने आगे बढ़ते हुए तीसरा दोहा पढ़ा-

‘खानखानाँ नवाब री आदमगीरी  धन्न,

यह ठकुराई मरु गिर मनी न राई मन्न। ‘ [4]

अब जाडा खानखाना के ठीक निकट पहुंच चुका था। खानखाना ने अपने आसन से खड़े होकर दोनों हाथ आकाश की ओर उठाते हुए कहा-

‘धर जड्डी अंबर जड्डा, जड्डा महडू जोय।

जड्डा नाम अलाह दा, और न जड्डा कोय। ‘[5]

खानखाना की बात सुनकर जाडा आश्चर्य में पड़ गया। उसने पूछा- ‘खानखाना हुजूर! मैंने तो आपको प्रसन्न करने के लिये दोहा पढ़ा। आपने क्यों पढ़ा?’

– ‘जाडा को प्रसन्न करने के लिये।’ खानखाना ने मुस्कुराकर जवाब दिया।

– ‘मैंने तो अपने स्वार्थ से आपको प्रसन्न करना चाहा था। आप मुझे क्यों प्रसन्न करना चाहते थे।’

– ‘मैं अपने स्वार्थ से तुझे प्रसन्न करना चाहता था।’

– ‘मेरा स्वार्थ तो मुझे मालूम है, किंतु आपका स्वार्थ?’

– ‘जब तू अपना स्वार्थ कहेगा तो तुझे मेरा स्वार्थ भी ज्ञात हो जायेगा।’

– ‘मैं अपने मालिक की तरफ से अर्ज लेकर आया हूँ और अकेले में निवेदन करना चाहता हूँ।’

– ‘ठीक है। जब दरबार बर्खास्त हो जाये तो तू निर्भय होकर अपनी बात कहना। बता तुझे कविता का क्या ईनाम दिया जाये?’

– ‘मेरे स्वामी का काम ही मेरा ईनाम होगा।’ जाडा ने जवाब दिया।

– ‘तेरे स्वामी का काम होने लायक होगा तो मैं वैसे ही कर दूंगा। मेरी इच्छा है कि तूने मेरी प्रशंसा में जो दोहे पढ़े हैं, उस हर दोहे के लिये तुझे एक लाख रुपया दिया जाये।’ खानखाना ने कहा।

– ‘खानखाना की बुलंदी सलामत रहे। मैं अपना ईनाम फिर कभी ले लूंगा, फिलहाल तो अपने स्वामी का ही काम किया चाहता हूँ।’ जाडा भी अपनी तरह का एक ही आदमी था। उसकी इच्छा रखने के लिये खानखाना ने दरबार बर्खास्त कर दिया।

– ‘अब बोल। क्या कहता है?’

– ‘हुजूर। प्रतापसिंह उदैपुर राज्य का मालिक बन बैठा है। मेरे स्वामी जगमाल उसके भाई हैं किंतु मेरे स्वामी को उसने कोई जागीर नहीं दी। यदि खानखाना मेहरबानी करें तो मेरे स्वामी उदैपुर की गद्दी पर बैठ सकते हैं। इसके बदले में मेवाड़ शहंशाह अकब्बर की अधीनता स्वीकार कर लेगा।’

– ‘तेरे मालिक को राज्य चाहिये तो मैं बादशाह से कहकर दूसरा राज्य दिलवा दूंगा लेकिन भाईयों में इस तरह का बैर करना और अपनी मातृभूमि शत्रु को सौंप देना उचित नहीं है जाडा।’

– ‘लेकिन बिना कुछ प्रत्युपकार प्राप्त किये बादशाह सलामत मेरे स्वामी को राज्य क्यों देंगे?’

– ‘प्रत्युपकार का जब समय आयेगा तो वह भी प्राप्त कर लिया जायेगा। बोल क्या कहता है?’

– ‘क्या चित्तौड़ का दुर्ग दिलवा देंगे?’ जाडा ने प्रश्न किया।

– ‘प्रताप मर जायेगा किंतु तेरे मालिक को चित्तौड़ में चैन से नहीं बैठने देगा।’

– ‘तो फिर!’

– ‘जहाजपुर का परगना अभी मुगलों के कब्जे में है। तू कहे तो तेरे मालिक को वह परगना मिल सकता है लेकिन एक शर्त पर।’

– ‘सो क्या?’

– ‘तू भाईयों में बैर नहीं बढ़ायेगा और देश को दुश्मनों के हाथ नहीं बेचेगा।’

खानखाना की बात सुनकर जाडा का मुँह काला पड़ गया। उसने गर्दन नीची करके कहा- ‘वचन देता हूँ।’

– ‘तो ठीक है। तू समझ, जहाजपुर तेरे मालिक को मिल गया।’

-अध्याय 78, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] खानखानाँ नवाब की भुजा ब्रह्माण्ड में जा अड़ी है, जिसकी पीठ पर चंडीपुर (अर्थात् दिल्ली) है और जिसकी तलवार की धार के नीचे नवों खण्ड हैं।

[2] खानखानाँ की तलवार से ऐसी आग बरसती है जिससे पानीदार वीर पुरुष तो जल मरते हैं लेकिन घास मुख में लिये (शरण में आये) हुए नहीं जलते।

[3] मुझे यह आश्चर्य होता है कि खानखानाँ का मेरु पर्वत जैसा मन साढ़े तीन हाथ की देह में कैसे समाया है।

[4] खानखानाँ नवाब का औदार्य धन्य है कि मेरु पर्वत जैसे अपने प्रभुत्व को वे मन में राई के बराबर भी नहीं मानते।

[5] धरा बड़ी है, आकाश बड़ा है, महडू शाखा का यह चारण बड़ा है और अल्लाह का नाम बड़ा है। इनके अलावा और कोई बड़ा नहीं है।

चाकर रघुबीर के (79)

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चाकर रघुबीर के

हम चाकर रघुबीर के पटौ लिखौ दरबार। तुलसी हम का होंइगे नर के  मनसबदार।

– ‘महात्मन्! शंहशाह की इच्छा है कि आप उनके दरबार को पवित्र करें।’ शहंशाह अकबर के वकीले मुतलक और काशी के सूबेदार अब्दुर्रहीम खानखाना ने गुंसाईजी से हाथ जोड़कर निवेदन किया।

– ‘खानखानाजी, कैसी बात करते हैं आप? हम तो दास हैं। क्या आप राजपुरुष होकर इतना भी नहीं जानते कि दासों के आने से सम्राटों के दरबार पवित्र नहीं होते।’

– ‘आप दास नहीं, रामभक्त हैं और रामभक्त तो स्वयं रामजी के समान हैं। उनके आगमन से ही दरबार पवित्र होते हैं।’

गुसांईजी ने मुस्कुराकर जवाब दिया-

‘प्रभु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।

तुलसी कहूंँ न राम से साहिब सील निधान।।’

– ‘शहंशाह के दरबार में जाने से किसी तरह का अमंगल नहीं होगा बाबा।’ अब्दुर्रहीम ने धरती पर सिर टिका कर कहा।

गुंसाईजी ने करुणा से अब्दुर्रहीम के सिर पर हाथ रख दिया-

‘राम  नाम  रति  राम गति  राम नाम बिस्वास।

सुमिरत  सुभ मंगल कुसल दुहुँ दिसि तुलसीदास।।’

अब्दुर्रहीम ने निराश होकर राजा टोडरमल की ओर देखा वकीले मुतलक को असफल होता देखकर राजा टोडरमल ने प्रयास किया- ‘शंहशाह अकबर गुणियों की कद्र करने वाले हैं। वहाँ आपका यथोचित आदर सत्कार होगा गुसांईजी। जैसा आप चाहेंगे, वैसा ही सब प्रबंध शासन की ओर से हो जायेगा।’

गुसांईजी ने राजा टोडरमल का अनुरोध अस्वीकार करते हुए उत्तर दिया-

  ‘राम भरोसो  राम बल  राम नाम  बिस्वास।

  सुमिरत सुभ मंगल कुसल मांगत तुलसीदास।।’

– ‘आपने जीवन भर निर्धनता के कष्ट सहे हैं। आपने स्वयं ने भी कहा है- नहीं दरिद्र सम दुख जग माहीं………..।’

– ‘दरिद्र कौन है राजन्?’ गुसांईजी ने टोका तो राजा टोडरमल सहम गये, ‘रामजी के चाकर दरिद्र नहीं होते। दरिद्रता तो तन की अवस्था है, मन की नहीं। क्या मन, तन का दास मात्र है? क्या यह आवश्यक है कि यदि तन दरिद्र हो तो मन भी दरिद्र हो जाये? यदि ऐसा नहीं है तो क्या व्यक्ति केवल तन मात्र है? क्या तन के दरिद्र होने से ही व्यक्ति दरिद्र हो जाता है?’

– ‘क्षमा करें देव! चूक हो गयी। मेरा आशय यह नहीं था। मेरे पास ऐसे शब्द कहाँ हैं जो मैं आपकी मर्यादा के अनुकूल संभाषण कर सकूं।’

– ‘दोष तुम्हारा नहीं है राजन्। दोष तुम्हारे परिवेश का है जिसमें तुम्हें दिन रात रहना पड़ता है। उसी विकृत परिवेश का परिणाम है कि राजपुरुषों की दृष्टि केवल व्यक्तियों के बाहरी स्वरूप में उलझ कर रह जाती है और वे बहुत सी भ्रामक परिभाषाएं गढ़ लेते हैं।’

– ‘गुसांईजी! यदि आप जैसे विवेकी पुरुष शासन में हों तो प्रजा को कई मुश्किलों से छुटकारा मिल सकता है।’

– ‘नहीं! यह सत्य नहीं है। प्रत्येक मनुष्य का अपना धर्म होता है और मनुष्य को अपने धर्म का ही पालन करना चाहिये। भगवान कृष्ण ने कहा है ‘स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मौ भयावहः ।’ शासन चलाना मेरा धर्म नहीं है।’

– ‘शंहशाह चाहते हैं कि आप जैसी विभूती का शेष जीवन आराम से कटे।’ राजा टोडरमल ने हाथ जोड़ दिये।

गुसाईंजी ने नेत्र मूंद कर कहा-

‘करिहौं कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस।

जहाँ तहाँ  दुख  पाइहौ  तबहीं तुलसीदास।।’

– ‘महात्मन्! सम्राट ने आपको यथोचित मनसब देने का भी निश्चय किया है।’ इस बार राजा मानसिंह ने साहस किया।

गुसांईजी राजा मानसिंह की ओर देखकर मुस्कुराये-

  ‘हम चाकर रघुबीर के पटौ लिखौ दरबार।

  तुलसी हम का होंइगे नर के  मनसबदार।’

संध्या वंदन का समय होता देखकर गुसांईजी उठ खड़े हुए। उन्हीं के साथ तीनों राजपुरुष भी गुसांईजी को प्रणाम करके उठ कर खड़े हो गये। वे तीनों आज ही बादशाह अकबर के आदेश से गुसांईजी की सेवामें काशीजी में उपस्थित हुए थे किंतु दिन भर के प्रयास के बाद भी अपने उद्देश्य में असफल रहे थे।

-अध्याय 79, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

हुक्म उदूली (80)

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हुक्म उदूली

जब तुलसीदासजी ने अकबर के दरबार में जाने से मना कर दिया तो अकबर ने इसे अपनी हुक्म उदूली समझा और वह आग-बबूला हो गया।

– ‘उस भिखारी को इतना घमण्ड?’ क्रोध से चीख पड़ा अकबर।

– ‘नहीं जिल्लेइलाही। बाबा को किसी तरह का घमण्ड नहीं। उन्होंने अपनी युवावस्था में ही गृह संसार त्यागकर सन्यास धारण कर लिया था। अब वे फिर से संसारिक मोह माया में फंसना नहीं चाहते।’ खानखाना ने निवेदन किया।

– ‘किंतु यदि बादशाह की हुक्म उदूली इसी तरह होती रही तो रियाया एक दिन मुगलों का हुक्म मानना तो दूर बात सुनना भी बंद कर देगी।’

बादशाह के कोप को देखकर खानखाना सहम गया। आखिर बादशाह के मन में क्या है? क्या करना चाहता है वह?

– ‘हमने आपको काशी का सूबेदार इसलिये नहीं बनाया है कि आप बादशाही हुक्म की तौहीन का समाचार हम तक पहुँचाया करें।’

– ‘क्षमा करें हुजूर! बाबा ने किसी हुक्म की तौहीन नहीं की है। न ही उन्हें किसी तरह का हुक्म दिया गया था।’

– ‘यदि बादशाही हुक्म नहीं सुनाया था तो फिर तुमने उस भिखमंगे से कहा क्या था?

– ‘उन्हें कहा गया था कि बादशाह की ऐसी इच्छा है कि आप उनके दरबार में चलकर मनसब स्वीकार करें।’

– ‘और उसने अस्वीकार कर दिया?’ अकबर क्रोध से फुंकारा।

– ‘हाँ। उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।’

– ‘शब्दों की बाजीगरी से हमें बहलाओ मत खानखाना। बादशाह की इच्छा, बादशाह का प्रस्ताव और बादशाह का हुक्म, ये तीनों बातें एक ही अर्थ रखती हैं।’

खानखाना निरुत्तर हो गया।

– ‘उसे यहाँ पकड़ कर मंगवाओ।’

खानखाना के होश उड़ गये। बादशाह क्या करने को कहता है? कैसे संभव है यह? खानखाना की हिम्मत नहीं हुई कि बादशाह की ओर मुँह उठाकर देख सके। वह चुपचाप धरती में ही दृष्टि गड़ाये रहा।

– ‘तो आप भी बादशाह का हुक्म मानने से मना करते हैं?’

– ‘आप चाहें तो सर कलम कर लें किंतु गुलाम पर हुक्म उदूली की तोहमत न लगायें।’ खानखाना ने किसी तरह हिम्मत करके कहा। उसने आज से पहले बादशाह को अपने ऊपर कुपित होते हुए नहीं देखा था।

– ‘हम जानते हैं कि तुम ही नहीं राजा टोडरमल और राजा मानसिंह भी यह हुक्म नहीं मानेंगे।’

– ‘जिल्ले इलाही जानते हैं कि ये दोनों भी इस गुलाम की तरह मुगलिया तख्त के मजबूत पहरेदार हैं।’

– ‘इसलिये हमने निश्चय किया है कि मुगलिया तख्त के इन पहरेदारों की जगह शहजादे मुराद को इस काम के लिये भेजा जायेगा।’

बादशाह के आदेश से खानखाना सन्न रह गया। वह बादशाह को सलाम बजाकर राजा टोडरमल के दीवानखाने की ओर बढ़ गया। टोडरमल ने राजा मानसिंह, राजा बीरबल और तानसेन को भी अपनी कचहरी में बुलवा लिया। पाँचों राजपुरुषों ने बहुत देर तक माथा पच्ची की किंतु इस समस्या का कोई हल दिखायी नहीं दिया।

एक पखवाड़ा बीतते न बीतते शहजादा मुराद गुसाईंजी को बांधकर आगरा ले आया। पाँचों राजपुरुषों ने गुसाईंजी से मिलने का बहुत प्रयास किया किंतु मुराद ने किसी को भी गुसाईंजी से मिलने की अनुमति नहीं दी। अंत में किसी तरह खानखाना गुसाईंजी तक पहुँचा।

उसने देखा कि कारागार की अंधेरी कोठरी में प्रभूत मात्रा में दिव्य प्रकाश फैला हुआ है। जिसके आलोक में एक भव्य मूर्ति ध्यानमग्न अवस्था में विराजमान है। खानखाना के कदमों की आहट से गुसाईंजी का ध्यान भंग हुआ।

– ‘कौन है?’ गुसाईंजी ने पूछा।

– ‘मैं आपका गुनहगार हूँ बाबा।’ एक आकृति को अपने पैरों में गिरते देखकर गुसाईंजी उठ कर खड़े हो गये। उन्होंने कण्ठ स्वर से पहचाना कि अब्दुर्रहीम है।

– ‘उठो खानखाना।’ गुसाईंजी ने खानखाना को उठा कर छाती से लगा लिया।

– ‘मेरे ही कारण आप इस अवस्था को पहुँचे हैं।’

– ‘कोई किसी के कारण कहीं नहीं पहुँचता मित्र, सब अपने करमों और रामजी की इच्छा से चलायमान हैं।’

दोनों मित्र कारागार की उसी अंधेरी कोठरी में धरती पर बैठ गये। रहीम ने कहा कुछ हरिजस सुनाओ बाबा। प्राणों में बहुत बेचैनी है।

खानखाना के अनुरोध पर गुसाईंजी गाने लगे-

है प्रभु मेरोई सब दोसु।

सीलसिंधु, कृपालु, नाथ अनाथ,  आरत  पोसु।

बेष बचन बिराग मन अब अवगुननि को कोसु।

राम प्रीति प्रतीति पोली,  कपट  करतब  ठोसु।

राग  रंग  कुसंग  हो  सों  साधु संगति रोसु।

चहत केहरि जसहिं सेइ सृगाल  ज्यों  खरगोसु।

संभु सिखवन रसन हूँ नित  राम  नामहिं घोसु।

दंभहू  कलिनाम  कुंभज   सोच  सागर  सोसु।

मोद मंगल मूल अति अनुकूल  निज  निरजोसु।

रामनाम प्रभाव सुनि तुलहिसहु  परम  परितोस।।

-अध्याय 80, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

वानर (81)

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वानर
वानर

आधी रात के बाद सीकरी में हा-हाकार मच गया। जहाँ देखो वहीं लंगूर। महलों, छतों और कंगूरों पर उत्पात मचाते हुए हजारों लंगूर अचानक ही जाने कहाँ से आ गये थे। सैंकड़ों वानर लाल-लाल मुँह के थे तो हजारों काले मुँह के। उनकी लम्बी पूंछों और विकराल दाँतों ने बच्चों और स्त्रियों को ही नहीं हट्टे-कट्टे पुरुषों को भी भय से त्रस्त कर दिया।

देखते ही देखते यह वानर सेना अत्यंत कुपित होकर महलों का सामान इधर से उधर फैंकने लगी। जो कोई साहस करके वानरों को भगाने का प्रयास करता था, वानर सेना उसी को घेर लेती और घूंसों और चपतों से उसकी हालत खराब कर डालती। किसी की कुछ समझ में नहीं आता था कि इन वानरों से कैसे छुटकारा पाया जाये।

निद्रा में खलल पड़ने से बादशाह भी उठ कर बैठ गया। उसने अपनी बंदूक निकाली और वानरों पर गोलियां दागने लगा किंतु यह देाख्कर उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा कि बहुत गोलियां चलाने के बाद भी, एक भी वानर को गोली नहीं लगी।

जाने कितनी देर तक यह उत्पात चलता रहा। आखिर एक वानर बादशाह के हाथ से बंदूक छीनकर ले गया। बादशाह बेबस आदमियों की तरह देखता ही रह गया। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि खानखाना दौड़ता हुआ आ रहा है। उसने कहा- ‘ इन वानरों को रोकना बहुत आवश्यक है जिल्ले इलाही।’

– ‘मगर कैसे? ये तो बन्दूक से भी नहीं मरते!’

– ‘ये बंदूक से नहीं मरेंगे शहंशाहे आलम! इन वानरों का उत्पात रोकने का एक ही उपाय है।’

– ‘तो उपाय करते क्यों नहीं?’

– ‘वह उपाय मेरे वश में नहीं।’

– ‘तो किसके वश में है?’

– ‘वह तो आपके ही वश में है।’

– ‘मैंने उपाय करके देख लिया। इन पर तो बारूद का भी असर नहीं होता।’

– ‘ये क्रुद्ध-विरुद्ध वानर हैं, बारूद से डरने वाले नहीं। ये तो अपने स्वामी के आदेश पर गुसांईजी को मुक्त करवाने आये हैं।’

– ‘कौन गुसांई?’

– ‘वही काशी के बाबा, जिन्हें शहजादे मुराद आपके आदेश से बंदी बना लाये हैं।’

– ‘सच कहते हो?’

– ‘जो आँखों से दिखता है, क्या वह भी सच नहीं है?’

– ‘ठीक है, हम भी उस बाबा को देखेंगे, अभी।’

अकबर उठ कर कारागार को चल पड़ा। खानखाना ने भी बादशाह का अनुसरण किया। थोड़ी ही देर में वे दोनों गुसाईंजी के समक्ष थे।

आगे-आगे अकबर और उसके पीछे-पीछे खानखाना ने कोठरी में प्रवेश किया। एक अद्भुत दृश्य उनके सामने था। अकबर ने देखा, उन्नत भाल पर प्रबल तेजपुंज धारण किये हुए एक गौर वर्ण ब्राह्मण आकाश की ओर हाथ उठाकर गा रहा था-

संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बल बीरा।

जै  जै  हनुमान गुसाईं,  कृपा करहु  गुरुदेव की नाईं।

जाने कैसा आलोक था जो ब्राह्मण के मुखमण्डल से निकल कर पूरी कोठरी में फैल रहा था!

आगंतुकों को देखकर गुसाईंजी ने पाठ रोक दिया।

अकबर ने कहा- ‘ब्राह्मण! जा मैं तुझे स्वतंत्र करता हूँ।’

अकबर का आदेश सुनकर गुसांईजी ने कहा-

‘जो सत बार पाठ करि कोई, छूटहि बंदि महासुख होईं

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा।’[1]

– ‘मैंने सुना है कि तू बड़ा चमत्कारी है और घमण्डी भी।’

– ‘चमत्कारी तो इस सृष्टि को बनाने वाला है सम्राट। हम सब तो उसके संकेत मात्र पर नृत्य करने वाली कठपुतलियाँ हैं। हम अपनी इच्छा से न तो किसी को मनसबदार बना सकते हैं और न कारावास दे सकते हैं।’ एक क्षण रुककर, ‘उमा दारू जोसित की नाईं। सबहि नचावत राम  गुसाईं।’

गुसांईजी ने शांत स्वर से कहा और कारा से बाहर प्रस्थान कर गये। मंत्रमुग्ध सा अकबर उनके पीछे-पीछे आया। कारा से बाहर निकल कर अकबर ने कहा- ‘आप धन्य हैं महात्मा!’

गुसांईजी ने आकाश की ओर देखकर कहा-

‘हौं तो असवार रहौ खर कौ, तेरो ही नाम मोहि गयंद चढ़ायो।’

अकबर ने महल में लौट कर देखा, समस्त वानर महल त्याग कर जा चुके थे।

-अध्याय 81, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने अकबर की जेल से रिहाई के लिये हनुमान चालीसा की रचना की थी।

छत्तीस लाख (82)

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छत्तीस लाख

खानखाना ने उसी समय अपने कोश में से छत्तीस लाख रुपये कवि गंग को प्रदान किये। उस पूरे काल में संभवतः किसी और कवि को इतना बड़ा पुरस्कार नहीं मिला था।

– ‘महाराज जगन्नाथ!’ खानखाना ने अपने दरबार में उपस्थित कवि जगन्नाथ को सम्बोधित करके कहा।

– ‘जी हुजूर!’

– ‘तनिक इस पर पर विचार कीजिये और बताईये कि ये कैसा है?

अच्युतचरण तरंगिणि शशिशेखर-मौलि-मालती माले।

मन  तनु  वितरण-समये   हरता  देया  न मे  हरिता।। [1]

पूरा दरबार कवियों की वाहवाही से गूंज उठा। अब से पहले गंगा मैया पर रहीम ने कोई कविता नहीं पढ़ी थी।

– ‘खानखाना! जब तक कविवर जगन्नाथ आपके पद पर विचार करें, आप इस पद पर गौर फर्मायें।।’ केशवराय ने खड़े होकर जुहार की।

– ‘सुनाइये कविराय। आप भी सुनाईये। हमें मालूम है कि आप हमारी तारीफ की बजाय अपनी तारीफ सुनना अधिक पसंद करेंगे।’ खानखाना ने मुस्कुराकर केवशराय को अनुमति दी।

केशव ने गाया-

अमित  उदार  अति  पाव  विचारि  चारु

जहाँ-तहाँ  आदरियां  गंगाजी  के नीर सों

खलन के घालिबे को, खलक के पालिबे को

खानखानां  एक  रामचन्द्रजी  के तीर सों।।[2]

एक बार फिर पूरा दरबार कवियों की वाहवाही से गूंज उठा।

– ‘खानखाना! अनुमति हो तो हम भी कुछ कहें।’ ये कवि गंग थे।

– ‘आप भी कहें कविवर। आपको कौन रोक सकता हैा!’ खानखाना ने हँस कर कहा।

– ‘तो सुनिए खानखाना। कवि गंग आपकी सेवा में अपना नव रचित छंद प्रस्तुत करता है-

चकित  भँवर रहि गयो  गमन नहिं करत कमलबन

अहि फनि-मनि नहिं लेत तेज नहिं बहत पवन घन।

हँस  सरोवर  तज्यो,  चक्क  चक्की न मिले अति

बहु सुंदरि पद्मिनी,  पुरुष न  चहें  न  करें रति।

खल भलित सेस कवि गंग भनि अतिम तज रवि रथ खस्यो।

खानखान  बैरमसुवन  जि  दिन  कोप  करि  तंग कस्यो।।[3]

कवि गंग ने इतने मधुर स्वर में यह कविता कही कि सुनने वाले मंत्र मुग्ध से कविता के साथ ही बह गये। खानखाना ने कवित्त के भाव, अर्थ और पद लालित्य पर विचार करते हुए उसी समय अपने कोश में से छत्तीस लाख रुपये कविगंग को प्रदान किये। उस पूरे काल में संभवतः किसी और कवि को इतना बड़ा पुरस्कार नहीं मिला था।

-अध्याय 82, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1]  हे गंगा! जब मेरी मृत्यु हो तो तुम्हारे किनारे पर हो। हे माता! मेरी मृत्यु हो तो मुझे विष्णु का सारूप्य न देना, शिव का सारूप्य देना ताकि तुम मेरे सिर और आँखों पर बनी रहो।

[2] यह कविता अब्दुर्रहीम की प्रशंसा में कही गयी है।

[3]  हे खानखाना! बैरम के पुत्र! जिस दिन तून क्रोध करके अपना तूणीर कसा। उस दिन भौंरा चकित होकर कमलवन को जाना भूल गया। सर्पराज अपने फण पर मणि रखना भूल गया और घनी वायु ने अपनी गति कम कर ली। हंस ने सरोवर त्याग दिया और चकवे तथा चकवी ने अपना मिलन बिसार दिया। पुरुषों ने पद्मिनी स्त्रियों के साथ रति करने से मुँह मोड़ लिया। शेषनाग भी व्याकुल हो गये। कवि गंग कहता है कि सूर्य देव का रथ भी अपने मार्ग से विचलित हो गया।

मुख देखे दुःख उपजत (83)

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वृंदावन के गुसाईं के साथ संत कुंभनदास

भारतीय संतों को राजाओं, बादशाहों और धनपतियों से कोई काम नहीं होता था। अकबर इस बात को समझ नहीं पाया। संत कुंभनदास ने अकबर को लिखकर भिजवाया- जिनको मुख देखे दुःख उपजत तिनको करिबे परी सलाम।

– ‘महाराज! बैरामखाँ को सुअन अब्दुर्रहीम महाराज के श्रीचरनन में कोटि-कोटि प्रणाम निवेदन करि रह्यौ। खानखाना ने अपना मस्तक भूमि पर रखकर कहा।

– ‘बिृंदाबन में तुम्हारौ स्वागत है खानखानाजू।’ संत कुंभनदास ने रहीम को धरती से उठाकर गले लगा लिया।

– ‘भौत दिनन ते इच्छा रही संतन के दरसनन की, सो आज पूरी भईं’ अब्दुर्रहीम ने भरे कण्ठ से कहा।

– ‘चहुं ओर तिहारे नाम की बड़ी चर्चा होय है खानखानाजू!’

खानखाना ने दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाते हुए कहा-

‘रहिमन धोखे भाव ते मुख ते निकसै राम।

पावत पूरन परम गति कामादिक कौ धाम।।’

– ‘ऐसे देव दुर्लभ संस्कार कहाँ ते पाये?’

– ‘बाबा रामदास की हमारे कुल पै बड़ी कृपा हती। उन्हिन के प्रताप ते मो जैसे अधम कूं आप जैसे संतन के दर्शन सुलभ हुयि जायं हैं।’

– ‘बाबा रामदास कौ कुल धन्य भयौ, जो सूरा जैसौ सपूत जन्म्यौ। नेत्र ना हते फिर भी हरि गुन गाय-गाय के तर गयौ।’

– ‘महाराज! एक बिनती हती।’

– ‘तुम आदेस करौ खानखानाजू। हमारे लायक जो कछू काम होयगो हम पूरौ करिंगे।’ संत ने प्रसन्न होकर कहा।

– ‘बादसाह की भौतई इच्छा है कि आप जैसे संत उनन के दरबार में रहैं।’

खानखाना का प्रस्ताव पाकर संत चिंता में डूब गये। बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोले- ‘खानखानजू! तुम तौ ठहरे ज्ञानी। जरा तसल्ली ते बिचार कै बताओ कि बादसाह के दरबार में हम भिखारिन कौ कहा काम परौ?’

– ‘बादसाहन के दरबार में यदि गुनी लोग न रहें तो चाण्डाल अपनौ डेरा जमाय लेंगे। जाते बादसाह कौ तौ पतन हौवेगो ही, परजा भी दुख पावेगी।’

– ‘किंतु भैया आग और पानी का कहा मेल? ऊ ठहरौ बादसाह। दिन रात तरवारि चलावै, लोगन कू मारै। हम रहे भिखारी, भीख मांगैं हरि भजन करैं।’

कुंभनदासजी का उत्तर सुनकर दीर्घ साँस छोड़ते हुए खानखाना ने कहा-

 ‘भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघू भूप।

  रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखो तो एकै रूप।।’

खानखाना के मुखमण्डल पर निराशा छा गयी। वह चाहता था कि अकबर के दरबार में कुछ अच्छे संत और विचारवान् लोग रहें किंतु यह एक विचित्र बात थी कि कोई भी संत सत्ता के निकट नहीं जाना चाहता था जिससे अकबर के दरबार में धूर्तों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जाती थी।

– ‘अच्छा एक बात बताऔ, हम अकब्बर के दरबार में चल कै रहैं, ऐसी इच्छा तुम्हारी रही कै अकब्बर की?’

संत के प्रश्न से खानखाना विचार में पड़ गया। बहुत सोच विचार कर

बोला- ‘बादसाह की।’

  – ‘तौ तुम सीकरी जाय कें अकब्बर ते यों कहियौं कि कुंभनदास ने कहलवाई है कि-

भगत कौ कहा सीकरी सों काम!

आवत  जात  पनैहा  टूटी,  बिसरि गयौ हरि  नाम।

जाको मुख देखे दुख उपजत, ताकों करन परी परनाम।

कुंभनदास  लाल  गिरधर  बिन  यह सब झूठौ धाम।

खानखाना संत के चरणों की मिट्ठी सिर से लगाकर उठ गया।

-अध्याय 83, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

हुमा (84)

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हुमा

अब्दुर्रहीम के दरबारी मुल्ला शकेबी ने सिंध विजय पर एक कविता पढ़ी जिसमें कहा गया था- जो हुमा आकाश में उड़ाता था, उसको तूने पकड़ा और जाल से छोड़ दिया। अब्दुर्रहीम ने मुल्ला को एक हजार अशर्फियां इनाम में दीं।

जिस प्रकार बारहमूला काश्मीर का दरवाजा है और जिस प्रकार गढ़ी बंगाल का दरवाजा है ठीक उसी प्रकार सहवान सिंध का दरवाजा है। सिंधु नद[1]  इस देश की जीवन रेखा है। सहवान का विख्यात दुर्ग इसी नदी के तट पर स्थित था। सिंधु नदी इस दुर्ग को तीन तरफ से घेरती थी। दुर्ग एक ऊँचे टीले पर विद्यमान था।

ई. 1590 में अकबर ने खानखाना को कंधार पर आक्रमण करने का आदेश दिया। मुगल साम्राज्य के पैंतालीस बड़े सेनापति उसके साथ भेजे गये। कंधार किसी जमाने में अब्दुर्रहीम के पिता खानखाना बैरामखाँ के अधिकार में था किंतु बाद में ईरान के शाह को प्रदान कर दिया गया था।

अब ईरान का बादशाह कमजोर हो चुका था और उसके लिये कंधार पर पकड़ बनाये रखना मुश्किल होता जा रहा था। दूसरी ओर तूरान का बादशाह कंधार पर आँख गढ़ाये हुए था। इन परिस्थितियों को देखकर अकबर ने कंधार को फिर से मुगलिया सल्तनत में शामिल करने का विचार किया और अब्दुर्रहीम को कंधार के लिये रवाना किया।

मार्ग में अब्दुर्रहीम ने विचार किया कि कंधार जैसे निर्धन देश के लिये अपनी शक्ति और श्रम व्यय करना व्यर्थ है। इससे तो ठठ्ठा पर आक्रमण करना अधिक उचित है। ठठ्ठा विजय के पश्चात् सिंध विजय का मार्ग भी सुगम हो जायेगा, जहाँ से कुछ न कुछ धन अवश्य प्राप्त किया जा सकता है। यह सोचकर अब्दुर्रहीम ठठ्ठा की ओर रवाना हुआ किंतु इसी बीच सिंध से खबर आई कि सहवान के दुर्ग में आग लग गयी है और दुर्ग के भीतर रखा धान व चारा जल कर भस्म हो गया है।

इस पर खानखाना ने अपनी एक सेना जलमार्ग से और एक सेना स्थल मार्ग से भेज कर सहवान को घेर लिया। सिंध पर विजय प्राप्त करना आसान कार्य न था। इसलिये उसने जैसलमेर से रावल भीम और बीकानेर से राव दलपत राठौड़ को भी अपनी मदद के लिये बुलवा लिया।

जब अपना बल पूरा हो गया तो अब्दुर्रहीम ने अपनी फौज रात के अंधेरे में नावों में बैठाकर सहवान के दुर्ग की ओर रवाना कर दी। बहुत सी पैदल सेना हथियार लेकर नदी में उतर गयी। मुगल सेना ने रात भर में दुर्ग को चारों ओर से अच्छी तरह घेर लिया और बड़े तड़के ही तोपों से जलता हुआ बारूद फैंकने लगी।

सिंधियों ने अपना देश बचाने का भरसक प्रयास किया किंतु वे दुर्ग में सुरक्षित होने के बावजूद मुगल सेना के समक्ष बिल्कुल कमजोर साबित हुए। इसका मुख्य कारण यह था कि सिंधी लोग यद्यपि मुसलमान हो गये थे किंतु अब भी वे प्राचीन आर्य पद्धति से ही युद्ध करते थे तथा युद्ध में भी अपनी नैतिकता को बनाये रखते थे जिसके तहत रात्रि में आक्रमण न करना, छल से वार न करना और पीठ पर हथियार न मारना शामिल था। जबकि मुगल सेना प्राचीन आर्य पद्धति में विश्वास नहीं करती थी, वह रात्रि में आक्रमण करने से नहीं हिचकती थी।

विजय प्राप्त करने के लिये मुगल सेना किसी भी सीमा तक छल कर सकती थी। यहाँ तक कि शरण में आये हुए, निहत्थे, कमजोर, रण छोड़कर भागते हुए तथा अंग-भंग हुए शत्रु पर भी वार करती थी। पीठ पर वार करना तो मुगल सेना का परमधर्म था। इस कारण सिंधी वीर होने के बावजूद विजय प्राप्त नहीं कर सके।

सहवान का दुर्ग गिरते देखकर उसका दुर्गपति मिरजा जानी समय रहते वहाँ से निकल गया और ठठ्ठे जा पहुंचा। अब्दुर्रहीम ने राजा टोडरमल के पुत्र धारू को उसके पीछे भेजा। मिर्जा जानी ने धारू को मार गिराया तथा मुगल सेना को काफी नुक्सान पहुँचाया। यह देखकर अब्दुर्रहीम क्रोधित होकर मिरजा जानी के पीछे लग गया।

मिरजा जानी एक किले से दूसरे किले में भागता रहा किंतु खानखाना उसके पीछे लगा रहा। अंत में मिरजा जानी ने विस्तान का किला, सहवान का किला, बीस जंगी नाव और अपनी बेटी अब्दुर्रहीम को समर्पित कर दी। जब मिरजा जानी अब्दुर्रहीम की सेवा में उपस्थित हुआ तो बड़े भारी दरबार का आयोजन किया गया।

इस दरबार में अब्दुर्रहीम के दरबारी मुल्ला शकेबी ने सिंध विजय पर एक कविता पढ़ी जिसमें कहा गया था- ‘जो हुमा[2] आकाश में उड़ा करता था, उसको तूने[3] पकड़ा और जाल से छोड़ दिया।’

इस पर अब्दुर्रहीम ने मुल्ला को एक हजार अशर्फियां इनाम में दीं। मिरजा जानी भी उसी समय एक हजार अशर्फियां निकाल कर मुल्ला को देने लगा। इस पर मुल्ला ने पूछा- ‘खानखाना ने इनाम दिया वह मेरी समझ में आता है किंतु तू क्यों देता है?’

– ‘रहमत खुदा की तुझ पर कि तूने मुझको हुमा कहा। जो गीदड़ कहता तो तेरी जीभ कौन पकड़ लेता? इसी से इनाम देता हूँ।’

अब्दुर्रहीम ने अपने बेटे एरच का विवाह मिरजा जानी की बेटी से कर दिया और दोनों दुर्ग अपने अधिकार में ले लिये।

-अध्याय 84, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] जो नदियाँ अत्यधिक चौड़ी होती हैं, उन्हें प्राचीन काल में नद कहा जाता था। इस समय तक सिंधु नदी काफी क्षीण हो चुकी थी।

[2] एक पक्षी।

[3] रहीम ने।

हसन गंगू (85)

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हसन गंगू

एक दिन उस ब्राह्मण ने हसन गंगू की भाग्य रेखाओं को देखकर बताया कि एक दिन तू इस प्रदेश का राजा बनेगा। उसी ब्राह्मण के निर्देश पर हसन गंगू मुहम्मद बिन तुगलक की सेना में भर्ती हो गया और शीघ्र ही वह दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत का सबसे विश्वस्त आदमी बन गया।

आज जिस भूभाग को महाराष्ट्र के नाम से जाना जाता है, किसी समय उस भूभाग पर देवगिरि नाम का एक अत्यंत प्राचीन राज्य स्थित था। ई. 1306 में अल्लाउदीन खिलजी के गुलाम मलिक काफूर ने देवगिरि के राजा रामचंद्र और उसके परिवार को कैद करके दिल्ली भेज दिया था और देवगिरि को दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया था।

तब से दक्षिण में मुस्लिम शासन का आरंभ हुआ। इसी देवगिरि में हसन गंगू नाम के एक शिया मुसलमान का जन्म हुआ। बड़े होने पर उसने एक ब्राह्मण के यहाँ नौकरी कर ली। एक दिन उस ब्राह्मण ने हसनगंगू की भाग्य रेखाओं को देखकर बताया कि एक दिन तू इस प्रदेश का राजा बनेगा। उसी ब्राह्मण के निर्देश पर हसन गंगू मुहम्मद बिन तुगलक की सेना में भर्ती हो गया और शीघ्र ही वह दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत का सबसे विश्वस्त आदमी बन गया।

ई. 1347 में देवगिरि का सुल्तान मर गया। स्थितियाँ कुछ इस तरह की बनीं कि हसन गंगू हसन अब्दुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमनशाह के नाम से देवगिरि का राजा बन गया और उसने अपने ब्राह्मण स्वामी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिये अपने नवनिर्मित राज्य का नाम बहमनी राज्य रख दिया। अपने उसी पुराने ब्राह्मण स्वामी को हसन ने अपना प्रधानमंत्री बनाया।

हसन गंगू के वंशज एक से बढ़कर एक क्रूर और अत्याचारी सुल्तान हुए तथा उन्होंने अपनी पूरी शक्ति अपने पड़ौसी विजयनगर साम्राज्य को कुचलने में लगाई। ई. 1422 में अहमदशाह बहमनी राज्य का सुल्तान हुआ। वह हसनगंगू की पांचवी पीढ़ी में था। उसने विजयनगर पर आक्रमण करके बीस हजार स्त्री पुरुषों को मौत के घाट उतारा। प्रजा की रक्षा के लिये राजा देवराय को उसकी अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

ई. 1461 में हसन गंगू की सातवीं पीढ़ी मे उत्पन्न हुमायूँ बहमनी राज्य का सुल्तान हुआ। वह क्रूरता की जीती जागती मिसाल था। उसे इतिहास में जालिम हुमायूँ कहा गया है। उसके अमीर जब प्रातः उसे सलाम करने जाते थे तो अपने बच्चों से अंतिम विदा लेकर जाते थे क्योंकि उनके वापिस जीवित लौटने की निश्चितता नहीं थी। वह कुसूरवार को ही नहीं अपितु उसके पूरे परिवार को मौत के घाट उतार देता था।

हसन खाँ गंगू के वंशज पौने दो सौ साल तक बहमनी राज्य पर शासन करते रहे। ई. 1538 में इस वंश के अंतिम सुल्तान कलीमुल्ला शाह की मृत्यु के बाद उसका बेटा इलहमातउल्ला वेश बदल कर मक्का भाग गया। उसके बाद बहमनी राज्य पाँच राज्यों में विभक्त हो गया। पहला राज्य अहमदनगर, दूसरा खानदेश, तीसरा बीजापुर, चौथा बरार और पाँचवा गोलकुण्डा। इन पाँचों राज्यों में मुस्लिम शासक राज्य करने लगे। वे सब के सब अपने आप को बादशाह कहते थे।

-अध्याय 85, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

चाँदबीबी (86)

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चाँदबीबी

हब्शियों से निबटकर मियाँ मंझू ने चाँदबीबी से निबटने की योजना निर्धारित की किंतु उसी समय उसने सुना कि मुगल शहजादा मुराद और खानखाना अब्दुर्रहीम विशाल सेना लेकर अहमद नगर की ओर बढ़ रहे हैं।

सोलहवीं शताब्दी के अंतिम दशक में अहमद नगर अपने सरदारों की आपसी लड़ाई से अत्यंत जर्जर हो चला था। बुरहान निजामशाह की मृत्यु के बाद उसका बेटा इब्राहीम निजामशाह अहमदनगर के तख्त पर बैठा। मात्र चार माह बाद ही वह बीजापुर के बादशाह आदिलखाँ के मुकाबिले में मारा गया।

उस समय इब्राहीम निजामशाह का बेटा बहादुरशाह मात्र डेढ़ वर्ष का था। अतः इब्राहीम की बहिन चाँदबीबी राजकाज चलाने लगी लेकिन मुस्लिम सरदारों को एक औरत का शासन स्वीकार नहीं हुआ। वे चाँद बीबी के विरुद्ध दो धड़ों में विभक्त हो गये।

पहला धड़ा दक्खिनियों का था जिनका नेता मियाँ मंझू था। दूसरा धड़ा हबशियों का था। उनका नेता इखलास खाँ था। दक्खिनियों के नेता मियाँ मंझू ने अहमदनगर में घुसकर इब्राहीम निजामशाह के डेढ़ साल के बेटे बहादुरशाह को उसकी फूफी चाँद बीबी से छीनकर जुनेर के किले में भेज दिया और दौलताबाद में कैद अहमदशाह को बुलाकर तख्त पर बैठा दिया।

उस समय तो हबशी भी मियाँ मंझू के इस काम से सहमत हो गये किंतु बाद में जब उनके सरदार इखलासखाँ को पता लगा कि अहमदशाह राजवंश में से नहीं है तो उसने मियाँ मंझू से झगड़ा किया।

हबशियों ने अहमदशाह के स्थान पर दुबारा से बहादुर शाह को अहमदनगर का सुल्तान बनाने के लिये अहमदनगर को घेर लिया और जुनेर के किलेदार से किले में कैद बहादुरशाह को मांगा। जुनेर का किलेदार मियाँ मंझू का विश्वस्त आदमी था। उसने बहादुरशाह हब्शियों को सौंपने से इन्कार कर दिया।

जब हब्शी किसी भी तरह बहादुरशाह को नहीं पा सके तो उन्होंने अहमदनगर के बाजार से मोती शाह नाम के एक लड़के को पकड़ लिया और घोषणा की कि यह लड़का निजाम के परिवार से है अतः उसे बादशाह बनाया जाता है। कुछ दक्खिनी सरदार भी हब्शियों से आ मिले। इससे दस बारह हजार हब्शी और दक्खिनी घुड़सवार उस बादशाह के साथ हो गये।

इस पर मियाँ मंझू ने गुजरात से शहजादी मुराद[1]  को अहमदनगर बुलवाया। अभी शहजादी मार्ग में ही थी कि हब्शियों में जागीरों और कामों के बंटवारे को लेकर आपस में तलवार चल गयी। बहुत से हब्शी आपस में ही कट कर मर गये। दक्खिनी सरदार हब्शियों की यह हालत देखकर फिर से मियाँ मंझू की सेवा में चले गये। अपने आदमियों को फिर से अपने पास आया देखकर मियाँ मंझू ने हब्शियों पर हमला कर दिया और बहुत से हब्शी मार गिराये। शेष हब्शी जान बचाकर भाग खड़े हुए।

हब्शियों से निबटकर मियाँ मंझू ने चाँदबीबी से निबटने की योजना निर्धारित की किंतु उसी समय उसने सुना कि मुगल शहजादा मुराद और खानखाना अब्दुर्रहीम विशाल सेना लेकर अहमद नगर की ओर बढ़ रहे हैं। मंझू जानता था कि वह मुगल सेना के सामने कुछ घंटे भी नहीं टिक सकेगा। इसलिये उसने अनसारखाँ को खजानों तथा चाँदबीबी की चौकसी पर नियुक्त किया तथा स्वयं बीजापुर, बरार और गोलकुण्डा से सहायता लेने के बहाने से अहमदनगर से बाहर निकल गया।

मंझू के अहमदनगर से बाहर निकलते ही चाँदबीबी ने मुरतिजा निजामशाह के धाभाई मुहम्मदखाँ के साथ मिलकर अनसारखाँ को मार डाला और किले में बहादुर निजामशाह की दुहाई फेर दी।

-अध्याय 86, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] यह शहजादी बुरहान निजामशाह के परिवार से थी।

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