छोटे सरकार की सवारी निकलने वाली है। उसे देखने के लिये सैंकड़ों बाशिंदे रास्ते के दोनों ओर जमा हैं। जब सवारी निकल जाये तो लोग भी निकल जायेंगे और हम भी।
बड़ी-बड़ी मूंछों और लम्बी दाढ़ियों वाले चार दैत्याकार कहार शाही पालकी को अपने मजबूत कंधों पर उठाये हुए तेजी से नगर की सड़कों पर भागे चले जा रहे थे।
शाही पालकी के आगे-आगे भाग रहे चोबदार और पालकी के बराबर चल रहे घुड़सवार सैनिकों की उपस्थिति से लगता था कि निश्चित ही शाही परिवार का कोई महत्वपूर्ण सदस्य पालकी में सवार है किंतु पालकी पर चारों ओर अत्यंत सावधानी से पर्दा पड़ा होने से यह अनुमान लगा पाना संभव नहीं था कि पालकी में कोई पुरुष है अथवा स्त्री और उनकी संख्या कितनी है।
दैत्याकार कहार प्रत्येक कदम इस सावधानी से रखते थे कि उनका पैर किसी ऊँची-नीची जगह पर न पड़ जाये और पालकी के भीतर बैठी शाही सवारी को किसी तरह की असुविधा न हो। अचानक पालकी रुक गयी और कहारों ने दम साधने के लिये पालकी को सावधानी से नीचे रख दिया। पालकी के आगे चलने वाले चोबदार और साथ चलने वाले घुड़सवार सिपाही भी अपने घोड़ों से नीचे उतर पड़े।
– ‘क्या बात है मुहम्मद, तुम लोग रुक क्यों गये?’ भीतर से एक बारीक किंतु दृढ़ आवाज में प्रश्न पूछा गया।
– ‘……..।’ कहारों के नेता मुहम्मद से कोई जवाब देते नहीं बना। वह घबराकर अपने साथियों का मुँह देखने लगा।
– ‘तुमने जवाब नहीं दिया। सामने कोई मुश्किल है क्या? सड़क पर इतना शोर क्यों हो रहा है?’
– ‘सुलताना बीबी! छोटे सरकार की सवारी निकलने वाली है। उसे देखने के लिये सैंकड़ों बाशिंदे रास्ते के दोनों ओर जमा हैं। जब सवारी निकल जाये तो लोग भी निकल जायेंगे और हम भी।’ पालकी के साथ चल रहे वृद्ध घुड़सवार फिरोजखाँ ने जवाब दिया। वह सुलताना चाँद बीबी का मुँह लगा विश्वस्त सिपाही था और उस समय से चाँद बीबी की सेवा में था जब बुरहान निजामशाह के महलों में उसका जन्म हुआ था। इतना ही नहीं, वृद्ध फिरोज अपने साथियों में कुछ अधिक अक्लमंद भी माना जाता था। इससे उसी ने जवाब देने का साहस किया।
– ‘छोटे सरकार! कौन छोटे सरकार?’ सुलताना बीबी ने पूछा।
– ‘सुलताना! मथुरा के राजा किसनजी की सवारी जा रही है, वे ही छोटे सरकार हैं।’
– ‘क्या मथुरा देश का राजा हमारे अहमदनगर में आया हुआ है?
– ‘नहीं सुलताना बीबी! मथुरा में अब कोई राजा नहीं है। अब तो वहाँ मुगल बादशाह अकब्बर की हुकूमत है। किसनजी तो हजारों साल पहले मथुरा का राजा था जिसे हिन्दू रियाया आसमानी फरिश्ता मानकर उसकी इबादत करती है। उसी फरिश्ते की सवारी जा रही है, गाजे-बाजे के साथ।
– ‘उनकी सवारी कहाँ जा रही है फिरोज मियाँ?’
– ‘आज हिन्दुओं की देवझूलनी एकादशी है। इनमें मान्यता है कि आज के दिन फरिश्तों के बुतों को उनके मंदिर से निकाल कर किसी तालाब या नदी तक ले जाते हैं और भगवान को नहला कर तालाब या नदी के किनारे झूला खिलाते हैं।’
थोड़ी ही देर में गाजे-बाजे की आवाज पालकी तक भी पहुँचने लगी और सड़क का कोलाहल बढ़ गया।
– ‘फिरोज मियाँ!’
– ‘हाँ सरकार।’
– ‘आपने हिन्दुओं के फरिश्ते को छोटे सरकार कहा, सो क्यों?’
– ‘सुलताना बीबी! अहमदनगर की सुलताना होने के कारण आप बड़ी सरकार हैं तो फिर मथुरा का राजा किसनजी तो छोटे सरकार ही हुआ।’ बुद्धिमान वृद्ध ने सफेद बालों से भरा हुआ सिर पालकी की ओर झुका कर पलकें झपकाते हुए उत्तर दिया।
गाजो-बाजों और सामूहिक स्वरों में गाये जाने वाले कीर्तन की आवाज बिल्कुल स्पष्ट हो चली थी। पर्दे के भीतर बैठी चाँद देर तक सुमधुर कीर्तन को सुनती रही। ऐसा संगीत उसने आज से पहले कभी नहीं सुना था। शब्द भी क्या थे जैसे आदमियों के कण्ठों से नहीं आसमानी जीवों के कण्ठों से निकल रहे हों। लगता था जैसे किसी ने शब्दों में सुगंध भर दी थी जिनकी महक से चारों ओर का वातारण महकने लगा था-
भजन सुनकर चाँद आपे में नहीं रही। वह अचानक पालकी का पर्दा उठाकर बाहर निकल आई। उसके शरीर पर बुर्का नहीं था। एक बिजली सी चमकी और लगा जैसे दिन में ही चाँद निकल आया। देखने वालों की आँखें चुंधिया गयीं। पूनम का जो चाँद आसमान के रहस्यमयी पर्दों में से निकलता था आज पालकी के पर्दों में से प्रकट हुआ। कहार, चोबदार और घुड़सवार हड़बड़ाकर एक दूसरे का मुँह देखने लगे।
– ‘हमारे साथ आइये फिरोज मियाँ। आज हम छोटे सरकार को देखेंगे।’ अपनी शाही मर्यादा भुलाकर चाँद किसनजी की सवारी की तरफ दौड़ पड़ी।
बूढ़ा फिरोज, चोबदार और दूसरे सैनिक सुलताना के पीछे दौड़ पड़े। चाँद अपने होश में न थी। वह बदहवासों की तरह भगवान कृष्ण की सवारी की तरफ भागी। आगे-आगे कीमती कपड़ों में सजी-धजी एक मुस्लिम औरत और उसक पीछे सिपाहियों और चोबदारों को इस तरह भाग कर आते हुए देख कर भगवान कृष्ण की शोभायात्रा में चल रहे लोग डर कर पीछे हट गये। चाँद आगे बढ़ती रही और मार्ग स्वतः खाली हो गया। गाजे-बाजे बंद हो गये और भगवान की सवारी रुक गयी।
ठीक भगवान के झूले के सामने जाकर चाँद खड़ी हो गयी और आँखें फाड़-फाड़ कर भगवान के विग्रह को निहारने लगी। उसने पलक तक नहीं गिरायी। चाँद को लगा कि किसनजी का बुत उसे अपनी ओर खींच रहा है। उसके मन में विचारों की आंधी उमड़ पड़ी।
क्या यही है वह साहब सिरताज! नन्द जू का पूत? जिसने रुक्मनी और द्रौपदी की लाज रखी? मैं भी तो एक औरत हूँ, क्या यह मेरी लाज रखेगा? क्या सचमुच ही यह कोई आसमानी फरिश्ता है? ऐसी क्या बात है इसमें? यह मुझे अपनी ओर क्यों खींच रहा है ? क्या बुत किसी इंसान को खींच सकता है? क्या इसमें वाकई कोई आसमानी ताकत है?
चाँद सुलताना को अपने बीच देखकर भक्तों ने सवारी वहीं रोक दी। जब बहुत देर तक सुलताना बुत बनी हुई, अपलक होकर भगवान को निहारती रही तो उसके सिपाहियों में बेचैनी फैल गयी। वृद्ध फिरोज ने साहस करके पूछा- ‘यदि सुलताना का हुकुम हो तो हम लोग पालकी यहीं ले आयें?’
सुलताना जैसे किसी अदृश्य लोक से निकल कर फिर से धरती पर आयी। क्या कमाल की बात है? अभी-अभी तो यहाँ कोई नहीं था। कहाँ चले गये थे ये लोग और फिर अचानक कहाँ से आ गये?
किसी से कुछ न कहकर चाँद फिर से पालकी की ओर मुड़ी। तब तक कहार पालकी लेकर वहीं पहुँच चुके थे। भक्तों ने चाहा कि जब सुलताना की पालकी निकल जाये तो भगवान की सवारी को आगे बढ़ायें किंतु सुलताना ने कहा कि ये बड़े सरकार हैं, पहले इनकी सवारी आगे बढ़ेगी उसके बाद छोटे सरकार की यानि हमारी सवारी जायेगी।
पूरा आकाश भगवान मुरली मनोहर और सुलताना बीबी की जय-जयकार से गूंज उठा। भक्तों ने अबीर गुलाल और पुष्पों की वर्षा करके उस क्षण को सदैव के लिये स्मरणीय बना दिया।
सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार करने के बाद ई. 1591 में अकबर ने दक्षिण भारत के अहमदनगर, खानदेश, बीजापुर, बरार और गोलकुण्डा राज्यों पर अधिकार करने की नीयत से अपने दूत इन राज्यों को भिजवाये और उनसे राजस्व की मांग की। इस पर खानदेश के सुल्तान राजा अलीखाँ ने तो अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली किंतु शेष राज्यों ने अकबर को इन्कार भिजवा दिया।
इस पर ई. 1593 में अकबर ने शहजादा दानियाल को दक्षिण भारत के राज्यों पर विजय प्राप्त करने तथा उन्हें अपने साम्राज्य में शामिल करने के लिये भेजा। शहजादे की सेवा में खानखाना को नियुक्त किया गया। बादशाह ने दानियाल से पहले शहजादा मुराद को भी इसी काम के लिये भेज रखा था। यह निश्चित था कि दोनांे शहजादे दक्षिण में पहुँच कर शत्रु से लड़ने के बजाय आपस में लड़ेंगे।
बादशाह को अपनी भूल का शीघ्र ही अनुमान हो गया। उसने दानियाल को वापस बुला लिया और शहजादा मुराद इसी काम पर बना रहा। मुराद एक नम्बर का धोखेबाज, घमण्डी, स्वार्थी तथा अविश्वसनीय आदमी था। उसका नाम भले ही मुराद था किंतु वास्तव में तो वह पूरा नामुराद था। वह किसी से भी सीधे मुँह बात नहीं करता था। दूसरी ओर खानखाना स्वतंत्र प्रवृत्ति का और अपने निर्णय स्वयं लेने वाला आदमी था। इस प्रकार दो विपरीत प्रवृत्तियों के स्वामी एक साथ रख दिये गये। यदि मुराद बेर की झाड़ी था तो खानखाना केले का वृक्ष।
दिल्ली से आगरा पहुँचने पर खानखाना को परिवर्तन की जानकारी मिली। इस विपरीत नियुक्ति से खानखाना ने जान लिया कि चाहे जो हो, बेर की कंटीली झाड़ी केले के हरे भरे पेड़ को विक्षत करके रहेगी किंतु नियुक्ति की अदला बदली बीच मार्ग में और परिस्थितियों के वश हुई थी इसलिये खानखाना बादशाह से कुछ न कह सका और आगरा से अपनी सेना लेकर भेलसा होता हुआ उज्जैन पहुँचा।
उधर मुराद गुजरात में खानखाना का रास्ता देख रहा था। जब उसने सुना कि खानखाना मालवा चला गया है तो वह बहुत आग बबूला हुआ। उसने खानखाना को चिट्ठी भिजवाई और ऐसा करने का कारण पूछा।
खानखाना ने जवाब भिजवाया कि खान देश का सुल्तान राजा अलीखाँ भी बादशाही फौज के साथ हो जायेगा। मैं उसको लेकर आता हूँ तब तक आप गुजरात में शिकार खेलें। शहजादा इस जवाब को सुनकर और भी भड़का और अकेला ही गुजरात से दक्षिण को चल दिया। खानखाना यह समाचार पाकर अपना तोपखाना, फीलखाना[1] और लाव-लश्कर उज्जैन में ही छोड़कर शहजादे के पीछे भागा।
अहमदनगर से तीस कोस उत्तर में चाँदोर के पास खानखाना शहजादे की सेवा में प्रस्तुत हुआ किंतु शहजादे ने खानखाना से मुलाकात करने से इन्कार कर दिया। खानखाना दो दिन तक मुराद के आदमियों से माथा खपाता रहा। अंत में मुराद ने खानखाना को अपने पास बुलाया और बड़ी बेरुखी से पेश आया। सलाम भी ढंग से नहीं लिया।
इस पर खानखाना और उसके आदमियों ने लड़ाई से हाथ खींच लिया। मुराद इतने नीच स्वभाव का आदमी था कि शहबाजखाँ कंबो और सादिक खाँ आदि अन्य मुगल सेनापति भी मुराद से हाथ खींच बैठे।
जब मुराद और खानखाना की सम्मिलित सेनाओं ने अहमदनगर से आधा कोस पहले पड़ाव डाला तो बहुत से स्थानीय जमींदार, व्यापारी और सेनापति आदि शहजादे और खानखाना से रक्षापत्र लेने के लिये आये। शहजादे और खानखाना ने अहमदनगर के प्रमुख लोगों को अभय दे दिया और कहा कि यदि चाँद बीबी लड़ने के लिये नहीं आयेगी तो नगर पर हमला नहीं किया जायेगा। मुगल सिपाहियों को शहर में लूट मचाने की मनाही कर दी गयी।
इधर तो शहजादा मुराद और खानखाना अदमदनगर को अभय प्रदान कर रहे थे और उधर दुष्ट शहबाजखाँ कंबो बिना शहजादे से अनुमति लिये चुपके से अहमदनगर के भीतर प्रविष्ट हो गया। उसके अनुशासन हीन और लालची सिपाहियों ने शहर में लूटपाट आरंभ कर दी।
जब खानखाना को यह समाचार ज्ञात हुआ तो वह किसी तरह शहर में प्रविष्टि हुआ और अपार परिश्रम करके मुगलिया सिपाहियों को लूटपाट करने से रोक कर बाहर लाया किंतु तब तक शहर में काफी नुक्सान हो चुका था। इससे शहरवालों का विश्वास मुगल सेनापतियों पर से हट गया और चाँदबीबी ने अहमदनगर के दरवाजे बंद करके मुगलों का सामना करने का निर्णय लिया।
दूसरे दिन मुराद ने अहमद नगर को घेर लिया। चाँद बीबी की ओर से शाहअली तथा अभंगरखाँ मोर्चे पर आये किंतु लड़ाई में हार कर पीछे हट गये। मुगलों की फूट अब खुलकर सामने आ गयी। जब चाँदबीबी के सिपाही हार कर भाग रहे थे तो मुगल सेनापति एक दूसरे से यह कह कर लड़ने लगे कि तू उनके पीछे जा – तू उनके पीछे जा किंतु कोई नहीं गया और चाँद बीबी के आदमी फिर से किले में सुरक्षित पहुँच गये।
अगले दिन मुगल सेनापतियों ने विचार किया कि यहाँ मुगलों की तीन बड़ी फौजें हैं- पहली मुराद की, दूसरी शहबाजखाँ कंबो की और तीसरी खानखाना की। इन तीनों में से एक किले पर घेरा डाले, दूसरी किले पर हमला करे तथा तीसरी सेना रास्तों को रोके किंतु यह योजना कार्यरूप नहीं ले सकी। मुराद युद्ध की योजना इस तरह से बनाता था कि विजय का श्रेय किसी भी तरह से खानखाना अथवा शहबाजखाँ कंबो न ले सके। इन योजनाओं को सुनकर खानखाना तो चुप हो जाता था और शहबाजखाँ उन योजनाओं का विरोध करने लगता था। इससे एक भी योजना कार्यरूप नहीं ले सकी।
मुराद के आदमियों ने मुराद को समझाया कि खानखाना इस लड़ाई को इस तरह चलाना चाहता है कि जीत का सेहरा शहजादे के सिर पर न बंध कर खानखाना के सिर पर बंधे। इस पर मुराद ने मुगल सेना का एक थाना कायम किया और खानखाना को उस पर बैठा दिया ताकि खानखाना अपनी जगह से हिल न सके।
उधर मुराद और उसकी सेना के अत्याचार देखकर चाँदबीबी ने बीजापुर के बादशाह से सहायता मांगी। इस पर अहमद नगर, बीजापुर और गोलकुण्डा ने मिलकर मुगल सेना के विरुद्ध मोर्चा बांधा। बीजापुर का बादशाह इस संयुक्त सेना का सेनापति नियुक्त हुआ। उसके नेतृत्व में साठ हजार घुड़सवारों और त्वरित गति से चलायमान तोपखाने की सेना मुगलों से लड़ने के लिये आयी।
मुराद ने इस सेना के आने से पहले ही अहमदनगर को लेने का विचार किया और खानखाना को बताये बिना अपने डेरे से लेकर किले की दीवार तक पाँच सुरंगें बिछा दीं। मुराद ने जुम्मे की नमाज पढ़ने के बाद इन सुरंगों में आग लगाने का निश्चय किया।
चाँदबीबी को इन सुरंगों का पता चल गया। उसने दो सुरंगों की बारूद तो शुक्रवार दोपहर से पहले ही निकलवा लीं। जब वह तीसरी सुरंग से बारूद निकलवा रही थी तब मुराद ने सुरंगों को आग दिखा दी। इससे किले की पचास गज की दीवार उड़ गयी। किले के भीतर सुरंग खोद रहे लोगों में से कुछ तो मौके पर ही मारे गये और बाकी के भाग खड़े हुए। सुलताना चाँद बीबी फौरन महल से निकली ओर तलवार लेकर वहीं आ खड़ी हुई। उसे देखने के लिये दोनों ओर के सिपाहियों की भीड़ जुट गयी।
उधर शहजादा और उसके अमीर शेष सुरंगों के फटने की प्रतीक्षा करते रहे और इधर चाँद बीबी ने तोपें, बान और बन्दूकें चुनकर रास्ता बंद कर दिया। खानखाना अपने थाने पर चुपचाप बैठा हुआ तमाशा देखता रहा। जब मुराद की फौज धावे के लिये आयी तो चाँद बीबी ने उस पर ऐसे बान और गोले मारे कि मुराद की सेना घबरा कर लौट गयी। चाँदबीबी पूरी रात किले के परकोटे पर खड़ी रही और उसने अपने सामने वह दीवार फिर से बनवा ली।
मुराद ने खानखाना को पूरी तरह से इस युद्ध से अलग रखा था। इसलिये वह पूरी तरह निष्क्रिय बना रहा। इस दौरान वह तभी क्रियाशील हुआ जब उससे कुछ करने के लिये कहा गया।
किले पर अधिकार करने में असफल रहने के बाद मुराद समझ गया कि खानखाना की शक्ति प्राप्त किये बिना अहमदनगर का किला नहीं लिया जा सकता। उसने हार कर खानखाना को बुलाया। खानखाना अपने आदमियों के साथ शहजादे की सेवा में हाजिर हुआ। मुराद ने अन्य दिनों के विपरीत बड़ी लल्लो-चप्पो के साथ खानखाना का स्वागत किया।
– ‘खानखाना! आप तो ईद के चाँद हो गये।’ शहजादे ने अपनी दुष्ट आवाज में नकली मिठास भर कर कहा।
– ‘चाँद तो आप हैं शहजादे जिसका नूर पूरे आकाश को रौशन करता है। मैं तो छोटा सा सितारा हूँ। या यूँ कहिये छोटा सा दिया हूँ जो मुगलिया सल्तनत की किसी अंधेरी कोठरी में टिमटिमाता हँू।’
– ‘खानखाना! यदि मुगलिया सल्तनत के आकाश में बादशाह सलामत सूरज बनकर चमकते हैं तो उस आकाश के चाँद केवल आप ही हो सकते हैं।’
– ‘यदि शहजादे मेरे बारे में ऐसा विचार रखते हैं तो यह मेरा सौभाग्य है। कहिये क्या आदेश है?’
– ‘आप तो जानते हैं खानखाना कि शहंशाह ने इस मोर्चे पर आपकी भी उतनी ही जिम्मेदारी तय की है, जितनी कि मेरी?’
– ‘मैं अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से पहचानता हूँ और जो भी आदेश मुझे दिये गये हैं, उन्हें मैं पूरा कर रहा हूँ।’ खानखाना ने जवाब दिया।
– ‘आपने मुगलिया सल्तनत के लिये इतने युद्ध लड़े हैं, इससे पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ।’
– ‘कैसा नहीं हुआ शहजादे?’
– ‘यही कि आप मोर्चे पर मौजूद हों और फतह हासिल न हो?’
– ‘शहजादे स्वयं सक्षम हैं, वे बड़ी से बड़ी फतह हासिल कर सकते हैं।’ खानखाना ने उदासीन होकर उत्तर दिया।
– ‘सच तो यह है खानखाना कि आपके या आपके पिता मरहूम खानखाना बैरामखाँ के बिना मुगलिया सल्तनत आज तक कोई भी बड़ी लड़ाई नहीं जीत सकी है।’
– ‘यह आपका बड़प्पन है जो इस नाचीज को इतना मान देते हैं। मैं तो मुगलों का अदना सा सिपाही हूँ।’
– ‘हमसे कोई गुस्ताखी हुई है खानखाना?’
– ‘मालिक गुस्ताखी नहीं करते, गुस्ताखी तो गुलाम करते हैं।’
– ‘हम जानते हैं खानखाना कि आप हमसे नाराज हैं।’
– ‘मेरे दुश्मनों ने आपसे यह बात कही होगी, मैं शहंशाह का गुलाम हूँ।’
– ‘हम जानते हैं कि आपसे बातों में भी नहीं जीत पायेंगे किंतु हम चाहते हैं कि अब अहमदनगर पर फतह हासिल हो।’
– ‘मुगलों को फतह हासिल हो, इससे अच्छी बात और क्या होगी शहजादे?’
– ‘किंतु यह जीत आपके सहयोग के बिना नहीं हो सकती।’
– ‘लेकिन मैं तो पहले से ही आपकी चाकरी में हाजिर हूँ।’
– ‘अच्छा अब आप ही बताईये कि क्या किया जाये?’
– ‘मेरे अकेले के किये कुछ नहीं होगा शहजादे। आप अपने विश्वस्त आदमियों से सलाह करें। जैसी सबकी राय बने, वैसा ही करें।’
खानखाना की उदासीनता से मुराद समझ गया कि खानखाना की नाराजगी आसानी से दूर नहीं होगी। मुराद जैसा कांईयां जमाने भर में न था। उसने भी ठान ली थी कि वह खानखाना के माध्यम से ही अहमदनगर हासिल करेगा। मुराद ने अपने डेरे से सब अमीरों को जाने का संकेत किया और खानखाना को वहीं ठहरने के लिये कहा।
जब डेरा खाली हो गया तो मुराद ने अपनी पगड़ी उतार कर खानखाना के पैरों में रख दी- ‘मेरी लाज आपके हाथ में है खानखाना।’
खानखाना इस अभिनय से पसीज गया। उसने पगड़ी उठा कर फिर से शहजादे के सिर पर रख दी और उसे वचन दिया कि वह पूरे मनोयोग से यत्न करेगा।
खानखाना चाँद बीबी के बारे में काफी कुछ सुन चुका था और उसका प्रशसंक था। वह कतई नहीं चाहता था कि चाँद बीबी की कुछ भी हानि हो। उसने मुराद से कहा- ‘श्रेष्ठ उपाय तो यह होगा कि बिना रक्तपात किये अहमदनगर हमारी अधीनता स्वीकार कर ले। इससे हमारे आदमियों की भी हानि नहीं होगी और इस समय मुगल सेना को जो धान और चारे की कमी है, उससे भी छुटकारा मिल जायेगा।’
मुराद तो यही चाहता था कि किसी भी तरह अहमदनगर अधीनता स्वीकार कर ले। उसे राजधानी से चले तीन साल हो चले थे और अहमदनगर अब भी दूर की कौड़ी बना हुआ था। वह राजधानी से अधिक दिनों तक दूर नहीं रहना चाहता था।
– ‘क्या यह संभव है?’
– ‘हाँ! यह संभव है। प्रयास करने पर सफलता अवश्य मिलेगी।’
– ‘तो फिर देर किस बात की है। आप आज ही अहमदनगर से बात कीजिये।’
– ‘यदि शहजादे की अनुमति हो तो मैं शहंशाह की ओर से दूत बनकर चाँद सुलताना की सेवा में जाऊँ और उसे किसी तरह राजी करूँ।’
कहने की आवश्यकता नहीं कि मुराद ने खानखाना को तुरंत ही स्वीकृति प्रदान कर दी।
शहजादे की अनुमति पाकर खानखाना स्वयं मुगलों की ओर से चाँदबीबी के सम्मुख उपस्थित हुआ। इससे उसके एक साथ दो उद्देश्य पूरे हो गये। एक तो खानखाना फिर से इस अभियान के केंद्र में आ गया और दूसरा यह कि चाँदबीबी को देख पाने की उसकी साध पूरी हो गयी। वह जब से अहमदनगर की सीमा में आया था तब से चाँद की बुद्धिमत्ता और कृष्ण भक्ति की बातें सुनता रहा था।
बिना पिता, बिना भाई और बिना पुत्र के संरक्षण में एकाकी महिला का राजकाज चलाना स्वयं अपने आप में ही एक बड़ी बात थी तिस पर चारों ओर शत्रुओं की रेलमपेल। खानखाना को लगा इस साहसी और अद्भुत महिला को अवश्य देखना चाहिये।
खानखाना अपने पाँच सवारों को लेकर दुर्ग में दाखिल हुआ। ऊँचे घोड़े पर सवार, लम्बे कद और पतली-दुबली देह का खानखाना दूर से ही दिखाई देता था। चाँद सुलताना के आदमी उसे सुलताना के महल तक ले गये। चाँद ने खानखाना के स्वागत की भारी तैयारियां कर रखी थीं। उसने शाही महलों को रंग रोगन और बंदनवारों से सजाया।
रास्तों पर रंग-बिरंगी पताकाएं लगवाईं तथा महलों की ड्यौढ़ी पर खड़े रहकर गाजे बाजे के साथ खानखाना की अगुवाई की। अहमदनगर के अमीर, साहूकार और अन्य प्रमुख लोग भी खानखाना की अगुवाई के लिये उपस्थित हुए। जब खानखाना शाही महलों में पहुँचा तो उस पर इत्र और फूलों की वर्षा की गयी।
बुर्के की ओट से चाँद ने खानखाना को तसलीम किया। खानखाना ने एक भरपूर दृष्टि अपने आसपास खड़े लोगों पर डाली और किंचित मुस्कुराते हुए कहा-
‘रहिमन रजनी ही भली, पिय सों होय मिलाप।
खरो दिवस किहि काम को, रहिबो आपुहि आप।’
वहाँ खड़े तमाम लोग खानखाना की इस रहस्य भरी बात को सुनकर अचंभे में पड़ गये। वे नहीं जान सके कि खानखाना ने ऐसा क्या कहा जो बुर्के के भीतर मुस्कान की शुभ्र चांदनी खिली और उसकी महक खानखाना तक पहुँच गयी! सुलताना ने लोक रीति के अनुसार खानखाना का आदर-सत्कार करके अपने महल के भीतरी कक्ष में पधारने का अनुरोध किया।
खानखाना की इच्छानुसार एकांत हो गया। अब केवल दो ही व्यक्ति वहाँ थे, एक तो खानखाना और दूसरी ओर पर्दे की ओट में बैठी चाँद। खानखाना ने पर्दे की ओर देखकर हँसते हुए कहा-
‘रहिमन प्रीति सराहिए, मिले होत रंग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून।’
– ‘खानखाना! यदि पहेलियाँ ही बुझाते रहेंगे तो हमारी समझ में कुछ नहीं आयेगा।’ चाँद की बारीक और मधुर आवाज कक्ष में फैल गयी।
– ‘सुलताना! मैंने कहा कि उसी प्रेम की सराहना की जानी चाहिये, जब दो व्यक्ति मिलें और अपना-अपना रंग त्याग दें। जैसे चूने और हल्दी को मिलाने पर हल्दी अपना पीलापन त्याग देती है और चूना अपनी सफेदी त्याग देता है।’
– ‘मैं अब भी नहीं समझी।’
– ‘सुलताना, जब तक आप पर्दे में रहेंगी तब तक मैं कैसे जानंूगा कि हल्दी ने अपना रंग त्याग कर चूने का रंग स्वीकार कर लिया है।’
इस बार चाँद खानखाना का संकेत समझ गयी। वह पर्दे से बाहर निकल आयी। बचपन से वह खानखाना के बारे में सुनती आयी है। खानखाना की वीरता, दयालुता और दानवीरता के भी उसने कई किस्से सुने हैं। उसने यह भी सुना है कि खानखाना मथुरा के फरिश्ते किसनजी की तारीफ में कविता करता है।
जिस दिन से चाँद ने किसनजी की सवारी के दर्शन किये हैं उस दिन से चाँद के मन में खानखाना से मिलने की इच्छा तीव्र हो गयी है। वह उनसे मिलकर किसनजी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी लेना चाहती थी। आज वह अवसर अनायास ही उसे प्राप्त हो गया था। उसे अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हुआ कि एक दिन वह इस तरह खानखाना के सामने बेपर्दा होकर खड़ी होगी।
चाँद को पर्दे से बाहर आया देखकर खानखाना ने हँसकर कहा-
‘रहिमन प्रीति न कीजिये जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांकें तीन।’
– ‘इसका क्या अर्थ है कविराज?’ सुलताना ने हँस कर पूछा। उसे अब पहिले का सा संकोच न रह गया था।
– ‘सुलताना! मैं चाहूंगा कि संधि के सम्बन्ध में जो भी बात हो, दिल से हो, निरी शाब्दिक नहीं हो।’
– ‘आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं खानखाना।’ चाँद ने हँस कर कहा।
– ‘तुम पर विश्वास है इसीलिये कहता हूँ। ध्यान से सुनना-
रहिमन छोटे नरन सों बैर भलो ना प्रीति।
काटे चाटे स्वान के, दौऊ भांति विपरीत।’
चाँद को समझ नहीं आया कि खानखाना ने ऐसा क्यांे कहा? वह चुपचाप खानखाना को ताकती रही।
– ‘कुछ बोलो चाँद?’
– ‘खानखाना! हमारी समझ में कुछ नहीं आया।’ चाँद ने कहा।
चाँद की बेचैनी देखकर खानखाना मुस्कुराया-
‘रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहि।
जै जानत ते कहत नहि, कहत ते जानत नाहि।’
खानखाना की अत्यंत गूढ़ और रहस्य भरी बातों से चाँद के होश उड़ गये। जाने खानखाना क्या कहता था, जाने वह क्या चाहता था?
खानखाना उसकी दुविधा समझ गया। उसने कहा- ‘ओछे व्यक्तियों से न दुश्मनी अच्छी होती है और न दोस्ती। जैसे कुत्ता यदि दुश्मन बनकर काट खाये तो भी बुरा और यदि दोस्त होकर मुँह चाटने लगे तो भी बुरा।’
– ‘क्या मतलब हुआ इस बात का?’
– ‘मैं अपने स्वामी मुराद की ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। वह भी एक ऐसा ही ओछा इंसान है। मतलब आप स्वयं समझ सकती हैं।’
खानखाना की बात सुनकर चाँद और भी दुविधा में पड़ गयी। उसका मुँह उतर गया। कुछ क्षण पहले जो वह खानखाना को सरल सा इंसान समझे बैठी थी, वह भावना तिरोहित हो गयी। उसे लगा कि उसका पाला एक रहस्यमय इंसान से पड़ा है जिससे पार पाना संभवतः आसान न हो।
– ‘और दूसरे दोहे में आपने क्या कहा?’
– ‘दूसरे दोहे में मैंने कहा कि जो बातें हमारी सामर्थ्य से बाहर हैं, वे कहने सुनने की नहीं हैं। क्योंकि जो जानते हैं वे कहते नहीं हैं और जो कहते हैं, वे जानते नहीं हैं।’
– ‘इस बात का क्या मतलब हुआ?’
– ‘इसका अर्थ यह हुआ कि जो बात मैंने तुम्हें अपने स्वामी के बारे में बताई है वह मेरी सामर्थ्य के बाहर की बात है। उसे कभी किसी और के सामने कदापि नहीं कहा जाये।’
– ‘खानखाना मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि आप क्या कह रहे हैं और आप मेरे लिये क्या संदेश लाये हैं।’ चाँद के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं।
– ‘ठहरो चाँद! इस तरह उतावली न हो। मैंने तुम्हारे बारे में बहुत सुना है। इसी से मैं तुम पर विश्वास करके दिल खोलकर अपनी बात कहता हूँ। मुराद एक धूर्त इंसान है इसलिये मैं जान बूझ कर स्वयं तुमसे संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। मैं तो तुम्हें केवल यह चेतावनी दे रहा था कि मैं जिस स्वामी की ओर से संधि करने आया हूँ, वह विश्वास करने योग्य नहीं है। चूंकि वह बहुत शक्तिशाली है, इसलिये वह शत्रुता करने योग्य भी नहीं है। मैंने ऐसा इसलिये कहा ताकि तुम्हारे मन में किसी तरह का भ्रम न रहे और तुम बाद में किसी परेशानी में न पड़ जाओ। तुम साहसी हो, बुद्धिमती हो, स्वाभिमानी हो, भगवान कृष्णचंद्र पर भरोसा करने वाली हो किंतु तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि तुम्हारा पाला किसी इंसान से नहीं अपितु शैतान से पड़ा है।’
– ‘यह तो मैं उसी समय देख चुकी हूँ जब मुगल सैनिकों ने नगर में घुस कर विश्वासघात किया। कृपया बताईये कि मैं मुराद से संधि करूं या नहीं?’
– ‘संधि तो तुम्हें करनी होगी किंतु सावधान भी रहना होगा।’
– ‘अर्थात्?’
– ‘यदि तुम संधि नहीं करोगी तो मुराद यहाँ से तब तक नहीं हिलेगा जब तक कि अहमदनगर उसके अधीन न हो जाये। संधि करने से तुम्हें यह लाभ होगा कि मुराद अपनी सेना लेकर अहमदनगर से चला जायेगा। और सावधान इसलिये रहना होगा कि यदि मुराद संधि भंग करे तो तुम तुरंत कार्यवाही करने की स्थिति में रहो।’
– ‘संधि का क्या प्रस्ताव तैयार किया है आपने?’
– ‘मेरा प्रस्ताव यह है कि बराड़ का वह प्रदेश जो बराड़ के अंतिम बादशाह तफावलखाँ के पास था और जिसे इन दिनों मुरतिजा निजामशाह ने दाब रखा है वह तो शहजादा मुराद ले ले और बाकी का राज्य माहोर के किले से चोल बन्दर तक और परेंड़े से दौलताबाद के किले और गुजरात की सीमा तक अहमदनगर के अधिकार में रहे।’
– ‘इससे मुझे क्या लाभ होगा?’
– ‘बरार अहमदनगर का मूल हिस्सा नहीं है। वह तो मुरतिजा ने तफावल खाँ से छीना था। यदि यह क्षेत्र तुम्हारे हाथ से निकल भी जाता है तो भी तुम्हारा मूल राज्य सुरक्षित रहेगा।’
– ‘क्या शहजादा मुराद इस बात को स्वीकार कर लेगा?’
– ‘हालांकि शहजादे की नजर पूरे अहमदनगर राज्य पर है किंतु फिलहाल उसे बराड़ से संतोष कर लेने के लिये मनाना मेरा काम है।’
– ‘और उसके बाद।’
– ‘बाद की बाद में देखी जायेगी। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलेंगी। हो सकता है बादशाह द्वारा मुराद को वापस बुला लिया जाये और यह पूरा काम मेरे अकेले के जिम्मे छोड़ दिया जाये या फिर हम दोनों के ही स्थान पर कोई और आये। यह भी हो सकता है कि तब तक तुम्हारी सैनिक शक्ति में इजाफा हो जाये और तुम मुगल सल्तनत से लोहा ले सकने की स्थिति में आ जाओ।’
– ‘क्या मुझे शहजादे के सामने पेश होना होगा?’
– ‘नहीं, तुम मुरतिजा को अपनी ओर से शहजादे की सेवा में भेज सकती हो।’
खानखाना की बातों ने चाँद के हृदय में नयी आशा का संचार किया। उसने अनुभव किया कि खानखाना उतना रहस्यमय नहीं था, जितना उसे लगा था। वे रहस्यमयी बातें उसने अवश्य ही चाँद का दिल टटोलने के लिये कहीं थीं ताकि वह चाँद की तरफ से पूरी तरह आश्वस्त हो सके। सुलताना ने खानखाना का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
– ‘यदि राजनीति की बात पूरी हो गयी हों तो मेरी एक और अर्ज स्वीकार करिये।’
– ‘तुम्हारी इच्छा पूरी करके मुझे प्रसन्नता होगी।’
– ‘खानखाना! भले ही आप दुश्मन के सिपहसालार हैं और उसकी ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर आये हैं किंतु मैं आपको अपना दुश्मन नहीं दोस्त मानती हूँ। इसी से मैं आप से अपने दिल के सारे भेद कहती हूँ लेकिन अपने दिल की कोई भी बात मैं आपसे कहूँ इससे पहले मैं आपकी मंजूरी चाहती हूँ।’
– ‘तुम्हें अपनी कोई भी बात मुझे कहने के लिये किसी मंजूरी की जरूरत नहीं है चाँद। तुम बिना किसी रंज के अपनी बात कहो।’
– ‘खानखाना! मैं इस मुल्क की सुलताना जरूर हूँ किंतु वास्तव में तो मैं एक ऐसी औरत हूँ जिसके सिर पर किसी का साया नहीं है, न बाप का, न भाई का, न किसी और का। इससे मैं अपने आप को बहुत कमजोर और बेसहारा महसूस करती हूँ। आपसे मिलकर ऐसा लगा जैसे अचानक मेरे सिर पर मजबूत साया हो गया है। मैंने जब से होश संभाला है तब से चारों ओर दगा़ और खून-खराबे का ही मंजर देखा है। आप को देखकर पहली बार ऐसा लगा कि संसार में विश्वास भी कोई चीज है। आपसे रूबरू होकर मैं अपने को उसी प्रकार का सुकून महसूस करती हूँ जिस प्रकार मथुरा के राजा किसनजी को देखकर करने लगी थी। जब तक आप दक्षिण में हैं, तब तक मैं सब ओर से बेफिक्र हूँ। कृपा करके मुझे ऐसा ज्ञान दीजिये जिससे यदि आप दक्षिण में न हों तब भी मुझे अपना मार्ग मिलता रहे।’
बात पूरी करते-करते चाँद का गला भर आया और उसने सिर झुका लिया।
चाँद की यह दशा देखकर खानखाना के मन में बड़ी करुणा उपजी। उन्होंने कहा- ‘पूछो चाँद, तुम जो चाहो वही पूछो। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर दूंगा।’
– ‘किसी देश का सुल्तान कैसे सुरक्षित रह सकता है?’ चाँद ने पूछा।
खानखाना की सीधी सपाट बात सुनकर चाँद की आँखों में आँसू आ गये। किसी तरह अपने आप को संभाल कर बोली- ‘आप ज्ञानी हैं, इसी से इतने उदासीन हैं और बड़ी-बड़ी बातें कहते हैं किंतु मैं अज्ञानी हूँ, मैं आपकी तरह संतोषी नहीं हो सकती।
खानखाना उठ खड़ा हुआ। चाँद ने सिर पर दुपट्टा लेकर खानखाना को तसलीम कहा और आँखों में आँसू भरकर बोली- ‘खानखाना! इस मायूस औरत की तसल्ली के लिये फिर कभी और भी पधारें। मेरा मन नहीं भरा।’
चाँद पर्दे की ओट में चली गयी। खानखाना को लगा कि श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का निश्छल चाँद जो कुछ क्षण पहले तक कक्ष में उजाला किये हुए था, अचानक बादलों की ओट में चला गया।
[1] जिस व्यक्ति का व्यय बढ़ जाता है, जिस व्यक्ति का उद्यम घट जाता है और जो राजा अपने मन में निष्ठुरता धारण कर लेता है, वे उसी प्रकार जीवित नहीं रहते जिस प्रकार कम जल में मछली जीवित नहीं रह सकती।
[2] तीन प्रकार से किसी व्यक्ति के हितैषी अथवा शत्रु होने की पहचान हो सकती है, या तो आदमी उसके अधीन हो जाये, या उसके पड़ौस में बस जाये या फिर उससे हमारा कोई काम पड़ जाये।
[3] संसार में कोई भी व्यक्ति यह दृष्टि लेकर जन्म नहीं लेता। शत्रुता, प्रेम, आदत और यश होते होते ही होते हैं।
[4] अपनी सम्पत्ति के अतिरिक्त विपत्ति में कुछ भी काम नहीं आता। जिस प्रकार यदि कमल के पास जल नहीं हो तो कमल का मित्र सूर्य भी कमल का उपकार नहीं कर पाता। यहाँ तक कि मित्र होने पर भी सूर्य कमल को जला डालता है।
[5] अपने मन की व्यथा किसी से नहीं कहनी चाहिये। लोग उस व्यथा को सुनकर प्रसन्न होंगे, व्यथा को कोई नहीं बांटेगा।
[6] सामर्थ्य शाली बाज जब अपना पंख खो देता है तो वह किसी काम का नहीं रहता। उसे कोई नहीं खरीदता। ऐसे बाज को परमात्मा ही भोजन देते हैं।
[7] संसार में हर समय मृत्यु का संगीत बजता रहता है। इस संसार में भला सदा के लिये कौन रह सका है!
[8] यह निष्प्क्ष होकर कही गयी बात है कि तलवार का वास्तविक मालिक वही है जो उसका उपयोग कर सके।
[9] समय पर किये गये कार्य के समान लाभकारी कुछ भी नहीं है तथा समय पर चूक जाने से बड़ी हानि कोई नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति के हृदय को समय की चूक सालती रहती है।
[10] इच्छा रहित हो जाने से चिंता से भी छुटकारा मिल जाता है और मन को किसी की परवाह नहीं रहती। जिन्हें कुछ नहीं चाहिये वे बादशाहों के भी बादशाह हैं।
[11] अनेक औषधियां देने से भी व्याधि पीछा नहीं छोड़ती। केवल ईश्वर ही वास्तविक सहारा है जिसके बल पर पशु-पक्षी भी वन में पूर्णतः निरोग होकर बसते हैं।
राजधानी से निकलने के बाद तीन साल बीत जाने पर भी शहजादा मुराद बादशाह अकबर को एक भी विजय की सूचना नहीं भेज पा रहा था इससे मुराद की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। जब खानखाना ने अहमदनगर की सुलताना चाँद बीबी की ओर से प्राप्त प्रस्ताव मुराद के समक्ष रखा कि यदि मुराद अहमदनगर से चला जाये तो चाँद उसे बरार का समस्त क्षेत्र दे सकती है तो मुराद ने अकस्मात् हाथ आये इस विशाल क्षेत्र को लेने से गुरेज नहीं किया और उसने संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।
इस संधि के हो जाने पर सुलताना ने खानखाना का बड़ा आभार व्यक्त किया। संधि हो जाने के बाद जब खानखना जालना के लिये रवाना होने लगा तो चाँद ने उसके सम्मान में बड़ा दरबार किया। अहमदनगर के अमीरों ने खानखाना को नजराने पेश किये और उसके प्रति बड़ा आभार व्यक्त किया।
खानखाना को गये हुए अभी कुछ ही दिन बीते होंगे कि मुराद ने संधि तोड़ दी और बराड़ से आगे बढ़कर पाटड़ी में भी अपना अमल कर लिया। इस पर दक्षिण के राजाओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिखायी देने लगा। उन्हें लगा कि इस विपदा से अकेले रहकर मुकाबला नहीं किया जा सकता। इसके लिये उन्हें एकजुट होकर प्रयास करना पड़ेगा।
चाँद सुलताना ने अपने विश्वस्त सेनापति सुहेलखाँ को मुगलों का रास्ता रोकने के लिये लिखाँ आदिलशाह और कुतुबशाह ने भी अपनी-अपनी सेनाएं भेज दीं। उस वक्त मुराद शाहपुर में और खानखाना जालना में था। जब खानखाना को ये सारे समाचार मिले तो वह शहजादे के पास आया और उसे वचन भंग करने के लिये भला बुरा कहा। शहजादा उस समय तो खानखाना से कुछ नहीं बोला किंतु उसने मन ही मन खानखाना से पीछा छुड़ाने का निश्चय कर लिया।
मुराद स्वयं तो शाहपुर में ही बैठा रहा और उसने अपने आदमियों के साथ शहबाजखाँ कंबो, खानदेश के जागीरदार राजा अलीखाँ रूमी तथा खानखाना अब्दुर्रहीम को सुहेलखाँ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा। मुराद के आदमियों ने मुराद के कहे अनुसार युद्ध की कपट पूर्ण व्यूह रचना की जिसका भेद बहुत कम आदमियों को मालूम था।
पहर भर दिन चढ़ने के बाद युद्ध शुरू हुआ। मुराद की योजनानुसार खानखाना की सेना को इस प्रकार नियोजित किया गया कि वह शत्रु सेना के तोपखाने की सीधी चपेट में आ जाये। खानखाना के गुप्तचरों को इस बात का पता नहीं चल सका। खानदेश के राजा अलीखाँ रूमी को जब इस बात का ज्ञान हुआ कि मुराद ने खानखाना को तोपखाने की चपेट में रखा है तो उसके होश उड़ गये। उसने अपने विश्वस्त आदमियों से कहा- ‘दोस्तो! मरने का दिन आ गया। आओ! मेरे पीछे आओ।’
अलीखाँ और उसके विश्वस्त आदमी अपना जीवन खतरे में डालकर तोपों की सीधी मार में खड़े खानखाना को बचाने के लिये दौड़ पड़े। उन्हें ऐन वक्त पर अपना स्थान छोड़ दौड़कर जाते हुए देखकर मुराद के आदमी गुस्से से चिल्लाने लगे कि धोखेबाज अलीखाँ शत्रु की शरण में जा रहा है।
राजा अलीखाँ ने उनकी परवाह नहीं की और किसी तरह खानखाना के पास जा पहुँचा। उसने कहा- ‘खानखाना! आपके मित्रों ने आपके साथ दगा की है। आपको जानबूझ कर ऐसी जगह रखा गया है। सारी आतशबाजी आपके बराबर चुनी हुई है। अभी उसमें आग दी जाती है। इस वास्ते जो आप दाहिनी ओर मुड़ जावें तो ठीक होगा।’
खानखाना तो तुरंत अपने आदमियों के सहारे उसी ओर मुड़ गया और राजा अलीखाँ रूमी उसके स्थान पर डट गया। जैसे ही खानखाना वहाँ से हटा, गनीम की तोपों को आग दिखाई गयी और सारा आकाश धुएँ से भर गया। यहाँ तक कि सूर्यदेव भी उस धुएँ से ढंक गये। कुछ पता नहीं चला कि कौन जीवित रहा और कौन मर गया। शत्रु की फौज राजा अलीखाँ को खानखाना समझ कर उस पर चढ़ बैठी। किसी को शत्रु मित्र की पहचान न रही। सब अमीर आपस में कट मरे। राजा अलीखाँ का भी काम तमाम हो गया। मुगलों की बड़ी भारी क्षति हुई। राजा जगन्नाथ अपने चार हजार सिपाहियों सहित मारा गया।
धुआँ छंटने पर खानखाना ने फिर से उसी स्थान पर धावा किया जिस स्थान पर उसने राजा अलीखाँ को छोड़ा था किंतु राजा अलीखाँ नहीं मिला। इसी दौरान रात हो गयी और दोनों ओर की सेनाएं अपनी-अपनी जीत समझ कर सारी रात रणक्षेत्र में खड़ी रहीं। कोई भी घोड़े की पीठ से नहीं उतरा।
दक्खिनी तो यह समझते रहे कि हमने खानखाना को मार डाला है और मुगल सेना यह समझती रही कि शत्रु पराजित हो कर भाग गया है। यह भाग्य अथवा प्रारब्ध का ही यत्न था कि जिस खानखाना को मार डालने के लिये उसके स्वामी ने षड़यंत्र रचा था, उसी खानखाना को बचाने के लिय सेवकों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये।
सुबह होने पर खानखाना ने अपना नक्कारा बजाया और अपना नरसिंगा फूंका जिसे सुनकर मुगल सेना के जो सिपाही युद्ध से भाग कर इधर-उधर छिपे हुए थे, खानखाना से आ मिले। खानखाना ने किसी तरह राजा अलीखाँ के क्षत-विक्षत शव को ढूंढ निकाला। उस समय खानखाना और उसके आदमियों के पास कुल सात हजार सवार रह गये थे जबकि शत्रु सैन्य में पच्चीस हजार घुड़सवार मौजूद थे। इस पर दौलतखाँ लोदी ने खानखाना से कहा- ‘यदि मैं तोपखाने या हाथियों के सामने चढ़ कर जाऊंगा तो शत्रु तक पहुँचने से पहले ही मारा जाऊंगा इसलिये पीठ पीछे से धावा करता हूँ।’
इस पर खानखाना ने दौलतखाँ लोदी से कहा- ‘जो तू ऐसा करेगा तो दिल्ली का नाम डुबोवेगा।’
– ‘नाम को जीवित रखकर क्या करना है? यदि मैं जीवित रहा तो फिर से सौ दिल्लियाँ बसा लूंगा।’ यह कह कर दौलतखाँ आगे बढ़ गया।
दौलतखाँ लोदी के नौकर सैयद कासिम को खानखाना की नीयत पर शक हो गया। उसने दौलतखाँ के कान में फुसफुसा कर कहा- ‘खानखाना आपको मरवा डालने के लिये ऐसा कह रहा है।’
दौलतखाँ लोदी ने खानखाना की टोह लेने के लिये पूछा- ‘इतना बता दो खानखाना! यदि हार हो जावे और मैं किसी तरह शत्रु के हाथों से बचकर वापिस आऊँ तो आप कहाँ मिलेंगे?’
– ‘लोथों के नीचे।’ खानखाना ने जवाब दिया। इस जवाब से संतुष्ट होकर दौलतखाँ लोदी शत्रुओं पर धावा बोलने के लिये चला गया।
खानखाना समझ गया कि उसकी नीयत पर शक किया जा रहा है। मुगलों का संशय मिटाने के लिये उस दिन खानखाना ने ऐसी लड़ाई की कि मुराद और उसके सलाहकार दांतों तले अंगुली दबाकर देखने के सिवाय कुछ न कर सके। शत्रु पक्ष का सेनापति सुहेलखाँ विशाल सेना का स्वामी होने के बावजूद खानखाना की छोटी सेना से परास्त हो गया। खानखाना यह चमत्कार करने का पुराना जादूगर था। इसी जादू के बल पर वह मुगल सल्तनत का खानखाना बना था।
विजय प्राप्त होने पर खानखाना ने उस दिन पचहत्तर लाख रुपये और अपनी समस्त अन्य सम्पत्ति अपने सैनिकों में लुटा दी। दक्खिनियों के चालीस हाथी और तोपखाना खानखाना के हाथ लगे जो उसने मुराद को सौंप दिये।
उस शाम मुगल सेना में चारों ओर विजय का उत्सव था। सिपाही छक कर शराब पीते थे और रक्कासाओं के साथ नगाड़ों की धुन पर घण्टों नाचते थे किंतु शायद ही कोई जान सका कि विजयी सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीमखाँ अपने डेरे में मुँह पर कपड़ा बांध कर जार-जार रो रहा था। उसके पास राजा अलीखाँ रूमी का क्षत-विक्षत शव रखा था। राजा अली खाँ बेर-केर के विपरीत संग के कारण मौत के उस विकराल मुँह में चला गया था, जहाँ से उसे लौटा कर लाना किसी के वश में नहीं था, यहाँ तक कि खानखाना के वश में भी नहीं।
शहजादा मुराद खानखाना के नियंत्रण से छुटकारा पाना चाहता था। उसने अकबर से खानखाना की शिकायत की कि वह चांद बीबी से मिल गया है। इस शिकायत पर खानखाना की दक्षिण से वापसी हो गई। मुराद तो यही चाहता था।
यह बड़ी भारी विजय थी जिसके कारण पूरा दक्खिन काँप उठा था। जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधने तथा खानखाना से छुटकार पाने की फिराक में लगे शहजादे मुराद ने भागते हुए दक्खिनियों के पीछे अपना कोई लश्कर नहीं भेजा अन्यथा दक्खिनियों की बड़ी भारी हानि होती। खानखाना तो वैसे भी नहीं चाहता था कि इस शत्रु फौज का और अधिक नुक्सान हो।
सुहेलखाँ पर विजय प्राप्त करके खानखाना फिर से जालना को लौट गया। जब परनाला और गावील के दुर्ग मुराद के हाथ लग गये तो उसने अपने सलाहकार सादिकखाँ के कहने से खानखाना को लिखा कि अब अवसर है कि चलकर अहमदनगर ले लें।
मुराद का पत्र पाकर खानखाना के होश उड़ गये। उसे अनुमान तो था कि शहजादा अपने वचन से फिरेगा किंतु इतनी शीघ्र फिरेगा, इसका अनुमान खानखाना को न था। बहुत सोच विचार कर खानखाना ने मुराद को लिखा कि अभी तो यही उचित है कि इस वर्ष बराड़ में रहकर यहाँ के किलों को फतह करें और जब यह देश पूर्ण रूप से दब जाये तो दूसरे देशों पर जायें।
इस लिखित जवाब से मुराद को खानखाना के विरुद्ध मजबूत प्रमाण मिल गया। उसने खानखाना का पत्र ढेर सारे आरोपों के साथ बादशाह अकबर को भिजवा दिया। उसमें प्रमुख शिकायत यह थी कि खानखाना बादशाह से दगा करके चाँद बीबी से मिल गया।
शहजादे का पत्र पाकर अकबर खानखाना पर बड़ा बिगड़ा। उसने खानखाना को दक्खिन से लाहौर में तलब किया और खानखाना की जगह शेख अबुल को दक्षिण का सेनापति बनाकर भेज दिया।
जब खानखाना लाहौर में अकबर की सेवा में उपस्थित हुआ तो अकबर ने उसकी ड्यौढ़ी बंद करवा दी।[1] खानखाना निरंतर शहजादे की अप्रसन्नता, सादिकखाँ की शत्रुता और अपनी बेगुनाही के बारे में तरह-तरह से अर्ज करता रहा। जब कई माह बीत गये और कोई परिणाम नहीं निकला तो एक दिन खानखाना ने अंतिम प्रयास करने का निर्णय लिया और एक कवित्त लिखकर अकबर को भिजवाया-
अकबर इस कवित्त को पढ़कर पसीज गया। उसने खानखाना को अपने समक्ष बुलवाया।
जब खानखाना बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ तो बादशाह ने पूछा- ‘खानखाना! दक्षिण फतह का क्या उपाय है?’
– ‘यदि बादशाह सलामत शहजादे मुराद को वहाँ से हटा कर युद्ध की समस्त जिम्मेदारी मुझे सौंप दें तो दक्षिण पर फतह की जा सकती है।’
खानखाना का जवाब सुनकर अकबर का चेहरा फक पड़ गया। उसे अनुमान नहीं था कि खानखाना भरे दरबार में शहजादे पर तोहमत लगायेगा। इसके बाद उसने खानखाना से कोई बात नहीं की और खानखाना को अपने मन से उतार कर फिर से उसकी ड्यौढ़ी बंद कर दी।
जब अकबर लाहौर से आगरा के लिये रवाना हुआ तो खानखाना तथा खानेआजम कोका को भी आगरा के लिये कूच करने का आदेश दिया गया। मार्ग में अम्बाला पहुंचने पर खानखाना की पत्नी माहबानूं बीमार पड़ गयी। माहमबानू अकबर की धाय की पुत्री थी और खानेआजम कोका की सगी बहिन थी। अकबर ने माहबानंू की देखभाल के लिये खानखाना और खाने आजम दोनों को अम्बाला में ही रुकने की अनुमति दी और स्वयं आगरा चला गया। कुछ दिन बाद माहबानूं मर गयी।
भाग्य का पहिया उलटा घूमना आरंभ हो गया था। अब तक अब्दुर्रहीम को संसार में मिलता ही रहा था किंतु माहबानूं की मृत्यु के साथ अब्दुर्रहीम से नित्य प्रति दिन कुछ न कुछ छिन जाने का सिलसिला आरंभ हो गया था। माहबानूं को अम्बाला में ही दफना कर रहीम आगरा चला आया।
[1] बादशाह के खास अमीरों को बादशाह के महलों में ड्यौढ़ी पर हाजिर होने का अधिकार होता था। जब बादशाह किसी अमीर से नाराज हो जाता था तो उसका यह अधिकार छीन लिया जाता था।
[2] कभी ऐसा था कि हार का भी व्यवघान असह्य था और कुछ ऐसी हवा चली कि वे हार छाती पर पहाड़ हो गये हैं और ऐसी स्थिति में चुपचाप सहना ही एक मात्र विकल्प रह गया है।
– ‘हुजूर! महाराणा अमरसिंह का चारण आपकी सेवा में हाजिर हुआ चाहता है।’ पहरेदार ने खानखाना को सूचना दी।
– ‘उसे यहीं ले आ।’ खानखाना ने आज्ञा दी।
चारण मुजरा करके चुपचाप खड़ा हो गया। खानखाना उस समय कुछ लिख रहा था। इसलिये वह मुजरा स्वीकार करके फिर से अपने काम में लग गया। खानखाना को व्यस्त देखकर चारण चुपचाप खड़ा रह गया। जब चारण काफी देर तक नहीं बोला तो खानखाना ने चारण की तरफ देखा चारण ने फिर से मुजरा कर दिया किंतु बोला कुछ नहीं।
खानखाना ने फिर से मुजरा स्वीकार किया और अपने काम में लग गया। तीसरी बार फिर यही हुआ। जब खानखाना ने सिर ऊपर उठाया तो चारण ने फिर से मुजरा कर दिया।
– ‘अरे कमबख्त बोलता क्यों नहीं? क्या महाराणा ने मुजरे दिखाने के लिये भेजा है?’ खानखाना ने हैरान होकर पूछा।
– ‘मेरे स्वामी की आज्ञा है कि जब तक खानखाना स्वयं बोलने के लिये न कहें, मैं कुछ भी न बोलूं।’
– ‘अच्छा तो बोल। मैं तुझे बोलने की आज्ञा देता हूँ।’
[1] चौहान वंशीय हाड़ा, कच्छवाहे और राठौड़ महलों में विश्राम कर रहे हैं। खानखाना से कहना कि हम सिसोदिये तो वनचर हुए फिर रहे हैं। तंवरों से दिल्ली गयी, राठौड़ों से कन्नौज गया क्या खानखानाओं को राणाओं के लिये अब भी स्वतंत्रता दिखायी देती है?
[2] यह धरती रहेगी, धर्म रहेगा। खुरासान देश से आया हुआ यह बादशाह मिट जायेगा। इसलिये हे राणा अमरसिंह! विश्वंभर पर विश्वास रखो।
खानखाना नहीं चाहता था कि वह फिर से दक्षिण में जावे। वह जानता था कि दक्षिण उसके लिये दो पाटों की चक्की बन चुका है। एक तरफ बादशाह है तो दूसरी तरफ चाँद।
दक्षिण के मोर्चे से एक बुरी खबर आई जिसे सुनकर अकबर थर्रा उठा। दक्षिण ने बलि लेनी शुरू कर दी थी। शहजादा मुराद शराब के नशे में मिरगी आने से मर गया। इस पर अकबर ने शहजादे दानियाल को दक्षिण के लिये नियुक्त किया।
जब दानियाल दक्षिण के लिये रवाना हो गया तो अकबर खानाखाना के डेरे पर हाजिर हुआ और बड़ी चिरौरी, मान-मुनव्वल करके खानखाना से विनती की कि वह भी दानियाल के साथ दक्षिण को जावे और किसी भी कीमत पर शहजादे को फतह दिलवाये।
खानखाना नहीं चाहता था कि वह फिर से दक्षिण में जावे। वह जानता था कि दक्षिण उसके लिये दो पाटों की चक्की बन चुका है। एक तरफ बादशाह है तो दूसरी तरफ चाँद। यदि वह किसी एक के साथ हो जाता है तो दूसरे के साथ अन्याय होना निश्चित ही है किंतु भाग्य की विडम्बना को स्वीकार कर खानखाना दक्षिण के लिये रवाना हो गया।
खानखाना शहजादे मुराद पर तो सख्ती कर पाता था किंतु अब उसे दानियाल के साथ काम करना था जो कि खानखाना अब्दुर्रहीम का जंवाई तथा जाना का पति था।
जब खानखाना दक्षिण में पहुँचा तो दानियाल ने उसे सबसे पहले अहमदनगर पर ही घेरा डालने के आदेश दिये। शहजादे के आदेश से खानखाना ने अहमदनगर को घेर लिया। एक रात जब खानखाना अपने डेरे में बैठा हुआ कुछ लिखा-पढ़ी कर रहा था तो उनकी नजर अचानक एक काले साये पर पड़ी जो चोरी से खानखाना के डेरे में आ घुसा था।
खानखाना ने तुरंत तलवार खींच ली और नकाबपोश की तरफ झपटा। नकाबपोश को अनुमान नहीं था कि खानखाना उसे देख चुका है इसलिये पहले तो वह सहम कर पीछे हटा फिर अगले ही क्षण उसने अपने मुँह से नकाब हटा दिया। खानखाना की आँखें आश्चर्य से फटी रह गयीं।
वह नकाबपोश और कोई नहीं अहमदनगर की सुल्ताना चाँद थी। खानखाना चाँद का यह दुस्साहस देखकर दंग रह गया।
– ‘तसलीम हुजूर!’ चाँद ने हँस कर कहा।
– ‘तुम इस तरह यहाँ! तुम्हें पता नहीं तुम्हारी जान को खतरा हो सकता है?’ खानखाना ने चिंतित होकर कहा।
चाँद फिर हँसी, उसने धीमी आवाज में कहा-
‘सदा नगारा कूच का बाजत आठों जाम।
रहिमन या जग आइ कै, को करि रहा मुकाम।’
– ‘क्या चाहती हो?’
-‘वाह हुजूर! यह भी ठीक रही। जब आप हमारी ड्योढ़ी पर पधारे थे तब हमनें तो पलक पांवड़े बिछाकर हुजूर का ख़ैरमक़दम किया था। आज जब हमारी बारी आयी है तो पूछते हैं कि क्या चाहती हो?’
– ‘लेकिन मैं दिन के उजाले में सबके सामने आया था और तुम इस रात में चोरों की तरह आयी हो।’
चाँद ने मुस्कुरा कर कहा-
‘रहिमन रजनी ही भली, पिय सों होय मिलाप।
खरो दिवस किहि काम को, रहिबो आपुहि आप।’
चाँद की इस बात से खानखाना निरुत्तर हो गया और लज्जित होकर बोला- ‘आइये। तशरीफ रखिये।’
चाँद निःसंकोच उसी आसन पर जाकर बैठ गयी जिस आसन पर कुछ देर पहले खानखाना बैठा हुआ था।
– ‘कहिये क्या सेवा करूँ।’ खानखाना ने मुँह रूखा करके पूछा।
– ‘आप तो मुझे केवल इतना बता दें कि जब संधि की शर्तों के अनुसार मैं बराड़ पर अपना अधिकार त्याग चुकी हूँ, तब किस खुशी में आपकी सेनाओं ने फिर से अहमदनगर का रुख किया है?’
– ‘मैंने तो उसी समय तुम्हें चेता दिया था कि संधि का कोई अर्थ नहीं है, वह तो मुराद को उस समय अहमदनगर से दूर ले जाने की चेष्टा मात्र थी।’
– ‘तो अब दानियाल को किस तरह दूर ले जायेंगे?’
– ‘रहिमन चाक कुम्हार को मांगे, दिया न देइ। छेद में डंडा डारि कै, चहै नाँद लै लेइ।। ‘[1]
– ‘अर्थात्?’
– ‘इसका अर्थ ये कि तुम्हें फिर से युद्ध का मार्ग छोड़कर युक्ति का मार्ग पकड़ना होगा।’
– ‘कैसी युक्ति?’
– ‘संधि की युक्ति।’
– ‘क्या यह स्थायी समाधान होगा?’
– ‘रहिमन भेषज के किए, काल जीति जो जात। बड़े-बड़े समरथ भए, तौ न कोउ मरि जात। ‘[2]
– ‘ठीक है। संधि का प्रस्ताव बताइये।’
– ‘यदि अहमदनगर को बचाना चाहती है तो बहादुर निजाम[3] को मेरे हवाले कर दे।’
– ‘खानखाना???’ चीख पड़ी चाँद। उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि खानखाना अपने मुँह से ऐसी बात निकालेगा।
– ‘घबराओ मत सुलताना। मैं निजाम को बादशाह अकबर की सेवा में यह कहकर हाजिर करूंगा कि अहमद नगर का निजाम आपकी अधीनता स्वीकार करता है और इसके बदले में अपने राज्य की सुरक्षा चाहता है।’
– ‘उसके बाद!’
– ‘उसके बाद बहादुर निजाम शाह को मैं वापिस सुरक्षित अहमदनगर लाऊंगा और तुम्हें सौंप दूंगा।’
– ‘दगा़ हुई तो?’
– ‘मुगलिया राजनीति का तो आधार ही दगा़ है। तू चाहे तो मेरी बात मान, तू चाहे तो मत मान।’
– ‘लेकिन इसका अर्थ तो यही हुआ कि अहमदनगर मुगलों के अधीन हो जायेगा।’
– ‘जिस प्रकार उत्तर भारत के राजपूत राजाओं ने अपने राज्य और प्रजा की सुरक्षा के लिये मुगलिया सल्तनत की अधीनता स्वीकार कर ली है, उसी प्रकार यदि दक्षिणी राज्यों के राजा और सुलतान भी मुगलिया सल्तनत का प्रभुत्व स्वीकार कर ले तो वे अपने राज्य और प्रजा दोनों की सुरक्षा कर सकते हैं। समय को पहचानो चाँद! इस समय मुगलिया आंधी चल रही है। इस आंधी में दक्षिण के राज्य तिनके की भी सामर्थ्य नहीं रखते। जो भी इस आंधी का मार्ग रोकने का साहस करेगा, वह तिनके की तरह उड़ जायेगा।’
– ‘और हमारी स्वतंत्रता! उसका कोई अर्थ नहीं होता।’
– ‘जब मौका लगेगा तो सारे के सारे राज्य फिर से अपनी-अपनी खोई हुई स्वतंत्रता प्राप्त कर ही लेंगे।’
– ‘एक शर्त पर मैं बहादुर निजाम शाह को आपके हवाले कर सकती हूँ।’
– ‘कैसी शर्त?’
– ‘आप बहादुर निजाम शाह को अपने साथ यह समझ कर ले जायेंगे कि आप किसी और को नहीं, चाँद को ले जा रहे हैं।’
– ‘मंजूर है।’
इसके बाद भी बड़ी देर तक दोनों में बातें होती रहीं। जब सारी बातें विस्तार से तय हो गयीं तो चाँद उठ खड़ी हुई।
– ‘हुजूर का हुक्म हो तो मैं अब जाऊँ?’
– ‘जो हुक्म से आया नहीं, वह हुक्म से जायेगा क्या?’ खानखाना ने हँस कर कहा।
– ‘मेरे आदमी आपके डेरे से एक फर्लांग दूर खड़े हैं। मुझे वहाँ तक पहुँचाने की जहमत उठाइये। उसके बाद मैं चली जाऊंगी।’
– ‘चलिये।’ खानखाना ने हँस कर कहा।
चाँद ने अपना नकाब फिर से मुँह पर लपेट लिया। खानखाना ने उसी समय दो घोड़े मंगवाये। थोड़ी ही देर में दोनों घोड़े अपने सवारों को लेकर गहन अंधकार में विलीन हो गये।
[1] यदि कुम्हार चाक से मांगे तो चाक उसे एक छोटा सा दीपक तक न दे किंतु कुम्हार यदि चाक की हलक में डण्डा डालकर घुमा दे तो चाक उसे बड़ी से बड़ी नांद दे देता है। अर्थात् दुष्ट व्यक्ति के सामने अनुनय का कोई अर्थ नहीं है। उसे तो दण्डित ही किया जाना चाहिये।
[2] यदि दवा और उपचार से मृत्यु को टाला जा सकता तो धरती पर बहुत से सामर्थ्यवान हुए हैं, वे कभी भी न मरते।
[3] बहादुर निजाम चाँद के भाई मरहूम निजाम का बेटा था। इससे चाँद उसकी बुआ लगती थी। चूंकि बहादुर निजाम बालक था इसलिये उसके स्थान पर चाँद ही शासन का काम देखती थी और इसी अधिकार से सुलताना कहलाती थी।
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