रहस्यमय संवाद (90)

शहजादे की अनुमति पाकर खानखाना स्वयं मुगलों की ओर से चाँदबीबी के सम्मुख उपस्थित हुआ। इससे उसके एक साथ दो उद्देश्य पूरे हो गये। एक तो खानखाना फिर से इस अभियान के केंद्र में आ गया और दूसरा यह कि चाँदबीबी को देख पाने की उसकी साध पूरी हो गयी। वह जब से अहमदनगर की सीमा में आया था तब से चाँद की बुद्धिमत्ता और कृष्ण भक्ति की बातें सुनता रहा था।

बिना पिता, बिना भाई और बिना पुत्र के संरक्षण में एकाकी महिला का राजकाज चलाना स्वयं अपने आप में ही एक बड़ी बात थी तिस पर चारों ओर शत्रुओं की रेलमपेल। खानखाना को लगा इस साहसी और अद्भुत महिला को अवश्य देखना चाहिये।

खानखाना अपने पाँच सवारों को लेकर दुर्ग में दाखिल हुआ। ऊँचे घोड़े पर सवार, लम्बे कद और पतली-दुबली देह का खानखाना दूर से ही दिखाई देता था। चाँद सुलताना के आदमी उसे सुलताना के महल तक ले गये। चाँद ने खानखाना के स्वागत की भारी तैयारियां कर रखी थीं। उसने शाही महलों को रंग रोगन और बंदनवारों से सजाया।

रास्तों पर रंग-बिरंगी पताकाएं लगवाईं तथा महलों की ड्यौढ़ी पर खड़े रहकर गाजे बाजे के साथ खानखाना की अगुवाई की। अहमदनगर के अमीर, साहूकार और अन्य प्रमुख लोग भी खानखाना की अगुवाई के लिये उपस्थित हुए। जब खानखाना शाही महलों में पहुँचा तो उस पर इत्र और फूलों की वर्षा की गयी।

बुर्के की ओट से चाँद ने खानखाना को तसलीम किया। खानखाना ने एक भरपूर दृष्टि अपने आसपास खड़े लोगों पर डाली और किंचित मुस्कुराते हुए कहा-

‘रहिमन रजनी ही भली, पिय  सों होय  मिलाप।

खरो दिवस किहि काम को, रहिबो आपुहि आप।’

वहाँ खड़े तमाम लोग खानखाना की इस रहस्य भरी बात को सुनकर अचंभे में पड़ गये। वे नहीं जान सके कि खानखाना ने ऐसा क्या कहा जो बुर्के के भीतर मुस्कान की शुभ्र चांदनी खिली और उसकी महक खानखाना तक पहुँच गयी! सुलताना ने लोक रीति के अनुसार खानखाना का आदर-सत्कार करके अपने महल के भीतरी कक्ष में पधारने का अनुरोध किया।

 खानखाना की इच्छानुसार एकांत हो गया। अब केवल दो ही व्यक्ति वहाँ थे, एक तो खानखाना और दूसरी ओर पर्दे की ओट में बैठी चाँद। खानखाना ने पर्दे की ओर देखकर हँसते हुए कहा-

‘रहिमन प्रीति सराहिए, मिले होत रंग दून।

ज्यों जरदी  हरदी  तजै, तजै सफेदी चून।’

– ‘खानखाना! यदि पहेलियाँ ही बुझाते रहेंगे तो हमारी समझ में कुछ नहीं आयेगा।’ चाँद की बारीक और मधुर आवाज कक्ष में फैल गयी।

– ‘सुलताना! मैंने कहा कि उसी प्रेम की सराहना की जानी चाहिये, जब दो व्यक्ति मिलें और अपना-अपना रंग त्याग दें। जैसे चूने और हल्दी को मिलाने पर हल्दी अपना पीलापन त्याग देती है और चूना अपनी सफेदी त्याग देता है।’

– ‘मैं अब भी नहीं समझी।’

– ‘सुलताना, जब तक आप पर्दे में रहेंगी तब तक मैं कैसे जानंूगा कि हल्दी ने अपना रंग त्याग कर चूने का रंग स्वीकार कर लिया है।’

इस बार चाँद खानखाना का संकेत समझ गयी। वह पर्दे से बाहर निकल आयी। बचपन से वह खानखाना के बारे में सुनती आयी है। खानखाना की वीरता, दयालुता और दानवीरता के भी उसने कई किस्से सुने हैं। उसने यह भी सुना है कि खानखाना मथुरा के फरिश्ते किसनजी की तारीफ में कविता करता है।

जिस दिन से चाँद ने किसनजी की सवारी के दर्शन किये हैं उस दिन से चाँद के मन में खानखाना से मिलने की इच्छा तीव्र हो गयी है। वह उनसे मिलकर किसनजी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी लेना चाहती थी। आज वह अवसर अनायास ही उसे प्राप्त हो गया था। उसे अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हुआ कि एक दिन वह इस तरह खानखाना के सामने बेपर्दा होकर खड़ी होगी।

चाँद को पर्दे से बाहर आया देखकर खानखाना ने हँसकर कहा-

‘रहिमन प्रीति न कीजिये जस खीरा ने कीन।

ऊपर से तो दिल मिला,  भीतर फांकें  तीन।’

– ‘इसका क्या अर्थ है कविराज?’ सुलताना ने हँस कर पूछा। उसे अब पहिले का सा संकोच न रह गया था।

– ‘सुलताना! मैं चाहूंगा कि संधि के सम्बन्ध में जो भी बात हो, दिल से हो, निरी शाब्दिक नहीं हो।’

– ‘आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं खानखाना।’ चाँद ने हँस कर कहा।

– ‘तुम पर विश्वास है इसीलिये कहता हूँ। ध्यान से सुनना-

रहिमन छोटे नरन सों बैर भलो ना प्रीति।

काटे चाटे स्वान के, दौऊ भांति विपरीत।’

चाँद को समझ नहीं आया कि खानखाना ने ऐसा क्यांे कहा? वह चुपचाप खानखाना को ताकती रही।

– ‘कुछ बोलो चाँद?’

– ‘खानखाना! हमारी समझ में कुछ नहीं आया।’ चाँद ने कहा।

चाँद की बेचैनी देखकर खानखाना मुस्कुराया-

‘रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहि।

जै जानत ते कहत नहि, कहत ते जानत नाहि।’

खानखाना की अत्यंत गूढ़ और रहस्य भरी बातों से चाँद के होश उड़ गये। जाने खानखाना क्या कहता था, जाने वह क्या चाहता था?

खानखाना उसकी दुविधा समझ गया। उसने कहा- ‘ओछे व्यक्तियों से न दुश्मनी अच्छी होती है और न दोस्ती। जैसे कुत्ता यदि दुश्मन बनकर काट खाये तो भी बुरा और यदि दोस्त होकर मुँह चाटने लगे तो भी बुरा।’

– ‘क्या मतलब हुआ इस बात का?’

– ‘मैं अपने स्वामी मुराद की ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। वह भी एक ऐसा ही ओछा इंसान है। मतलब आप स्वयं समझ सकती हैं।’

खानखाना की बात सुनकर चाँद और भी दुविधा में पड़ गयी। उसका मुँह उतर गया। कुछ क्षण पहले जो वह खानखाना को सरल सा इंसान समझे बैठी थी, वह भावना तिरोहित हो गयी। उसे लगा कि उसका पाला एक रहस्यमय इंसान से पड़ा है जिससे पार पाना संभवतः आसान न हो।

– ‘और दूसरे दोहे में आपने क्या कहा?’

– ‘दूसरे दोहे में मैंने कहा कि जो बातें हमारी सामर्थ्य से बाहर हैं, वे कहने सुनने की नहीं हैं। क्योंकि जो जानते हैं वे कहते नहीं हैं और जो कहते हैं, वे जानते नहीं हैं।’

– ‘इस बात का क्या मतलब हुआ?’ 

– ‘इसका अर्थ यह हुआ कि जो बात मैंने तुम्हें अपने स्वामी के बारे में बताई है वह मेरी सामर्थ्य के बाहर की बात है। उसे कभी किसी और के सामने कदापि नहीं कहा जाये।’

– ‘खानखाना मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि आप क्या कह रहे हैं और आप मेरे लिये क्या संदेश लाये हैं।’ चाँद के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं।

– ‘ठहरो चाँद! इस तरह उतावली न हो। मैंने तुम्हारे बारे में बहुत सुना है। इसी से मैं तुम पर विश्वास करके दिल खोलकर अपनी बात कहता हूँ। मुराद एक धूर्त इंसान है इसलिये मैं जान बूझ कर स्वयं तुमसे संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। मैं तो तुम्हें केवल यह चेतावनी दे रहा था कि मैं जिस स्वामी की ओर से संधि करने आया हूँ, वह विश्वास करने योग्य नहीं है। चूंकि वह बहुत शक्तिशाली है, इसलिये वह शत्रुता करने योग्य भी नहीं है। मैंने ऐसा इसलिये कहा ताकि तुम्हारे मन में किसी तरह का भ्रम न रहे और तुम बाद में किसी परेशानी में न पड़ जाओ। तुम साहसी हो, बुद्धिमती हो, स्वाभिमानी हो, भगवान कृष्णचंद्र पर भरोसा करने वाली हो किंतु तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि तुम्हारा पाला किसी इंसान से नहीं अपितु शैतान से पड़ा है।’

– ‘यह तो मैं उसी समय देख चुकी हूँ जब मुगल सैनिकों ने नगर में घुस कर विश्वासघात किया। कृपया बताईये कि मैं मुराद से संधि करूं या नहीं?’

– ‘संधि तो तुम्हें करनी होगी किंतु सावधान भी रहना होगा।’

– ‘अर्थात्?’

– ‘यदि तुम संधि नहीं करोगी तो मुराद यहाँ से तब तक नहीं हिलेगा जब तक कि अहमदनगर उसके अधीन न हो जाये। संधि करने से तुम्हें यह लाभ होगा कि मुराद अपनी सेना लेकर अहमदनगर से चला जायेगा। और सावधान इसलिये रहना होगा कि यदि मुराद संधि भंग करे तो तुम तुरंत कार्यवाही करने की स्थिति में रहो।’

– ‘संधि का क्या प्रस्ताव तैयार किया है आपने?’

– ‘मेरा प्रस्ताव यह है कि बराड़ का वह प्रदेश जो बराड़ के अंतिम बादशाह तफावलखाँ के पास था और जिसे इन दिनों मुरतिजा निजामशाह ने दाब रखा है वह तो शहजादा मुराद ले ले और बाकी का राज्य माहोर के किले से चोल बन्दर तक और परेंड़े से दौलताबाद के किले और गुजरात की सीमा तक अहमदनगर के अधिकार में रहे।’

– ‘इससे मुझे क्या लाभ होगा?’

– ‘बरार अहमदनगर का मूल हिस्सा नहीं है। वह तो मुरतिजा ने तफावल खाँ से छीना था। यदि यह क्षेत्र तुम्हारे हाथ से निकल भी जाता है तो भी तुम्हारा मूल राज्य सुरक्षित रहेगा।’

– ‘क्या शहजादा मुराद इस बात को स्वीकार कर लेगा?’

– ‘हालांकि शहजादे की नजर पूरे अहमदनगर राज्य पर है किंतु फिलहाल उसे बराड़ से संतोष कर लेने के लिये मनाना मेरा काम है।’

– ‘और उसके बाद।’

– ‘बाद की बाद में देखी जायेगी। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलेंगी। हो सकता है बादशाह द्वारा मुराद को वापस बुला लिया जाये और यह पूरा काम मेरे अकेले के जिम्मे छोड़ दिया जाये या फिर हम दोनों के ही स्थान पर कोई और आये। यह भी हो सकता है कि तब तक तुम्हारी सैनिक शक्ति में इजाफा हो जाये और तुम मुगल सल्तनत से लोहा ले सकने की स्थिति में आ जाओ।’

– ‘क्या मुझे शहजादे के सामने पेश होना होगा?’

– ‘नहीं, तुम मुरतिजा को अपनी ओर से शहजादे की सेवा में भेज सकती हो।’

खानखाना की बातों ने चाँद के हृदय में नयी आशा का संचार किया। उसने अनुभव किया कि खानखाना उतना रहस्यमय नहीं था, जितना उसे लगा था। वे रहस्यमयी बातें उसने अवश्य ही चाँद का दिल टटोलने के लिये कहीं थीं ताकि वह चाँद की तरफ से पूरी तरह आश्वस्त हो सके। सुलताना ने खानखाना का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

– ‘यदि राजनीति की बात पूरी हो गयी हों तो मेरी एक और अर्ज स्वीकार करिये।’

– ‘तुम्हारी इच्छा पूरी करके मुझे प्रसन्नता होगी।’

– ‘खानखाना! भले ही आप दुश्मन के सिपहसालार हैं और उसकी ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर आये हैं किंतु मैं आपको अपना दुश्मन नहीं दोस्त मानती हूँ। इसी से मैं आप से अपने दिल के सारे भेद कहती हूँ लेकिन अपने दिल की कोई भी बात मैं आपसे कहूँ इससे पहले मैं आपकी मंजूरी चाहती हूँ।’

– ‘तुम्हें अपनी कोई भी बात मुझे कहने के लिये किसी मंजूरी की जरूरत नहीं है चाँद। तुम बिना किसी रंज के अपनी बात कहो।’

– ‘खानखाना! मैं इस मुल्क की सुलताना जरूर हूँ किंतु वास्तव में तो मैं एक ऐसी औरत हूँ जिसके सिर पर किसी का साया नहीं है, न बाप का, न भाई का, न किसी और का। इससे मैं अपने आप को बहुत कमजोर और बेसहारा महसूस करती हूँ। आपसे मिलकर ऐसा लगा जैसे अचानक मेरे सिर पर मजबूत साया हो गया है। मैंने जब से होश संभाला है तब से चारों ओर दगा़ और खून-खराबे का ही मंजर देखा है। आप को देखकर पहली बार ऐसा लगा कि संसार में विश्वास भी कोई चीज है। आपसे रूबरू होकर मैं अपने को उसी प्रकार का सुकून महसूस करती हूँ जिस प्रकार मथुरा के राजा किसनजी को देखकर करने लगी थी। जब तक आप दक्षिण में हैं, तब तक मैं सब ओर से बेफिक्र हूँ। कृपा करके मुझे ऐसा ज्ञान दीजिये जिससे यदि आप दक्षिण में न हों तब भी मुझे अपना मार्ग मिलता रहे।’

बात पूरी करते-करते चाँद का गला भर आया और उसने सिर झुका लिया।

चाँद की यह दशा देखकर खानखाना के मन में बड़ी करुणा उपजी। उन्होंने कहा- ‘पूछो चाँद, तुम जो चाहो वही पूछो। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर दूंगा।’

– ‘किसी देश का सुल्तान कैसे सुरक्षित रह सकता है?’ चाँद ने पूछा।

खानखाना ने हँस कर कहा-

-‘खरच बढ्यो, उद्यम घट्यो, नृपति निठुर मन कीन।

 कहु   रहीम   कैसे  जिए,   थोरे  जल  की  मीन।’ [1]

– ‘संसार में हमारा हितैषी कौन है?’ चाँद ने अगला सवाल पूछा।

– ‘रहिमन तीन प्रकार ते, हित अनहित पहिचानि।

   पर बस परे, परोस बस, परे मामिला जानि।’ [2]

– ‘इस संसार में किस पर विश्वास किया जा सकता है?’

– ‘यह रहीम निज संग लै जनमत जगत न कोय।

  बैर, प्रीति, अभ्यास, जस, होत होत ही होय।’ [3]

– ‘विपत्ति में सच्चा सहारा कौन सा है?’

– ‘रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय।

   बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय।’ [4]

– ‘अपने मन की बात किससे कहनी चाहिये?’

– ‘रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय,

   सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय।’ [5]

– ‘यदि बादशाह दर-दर का भिखारी हो जाये तो उसे क्या करना चाहिये?’

– ‘काम न काहू आवई, मोल रहीम न लेई,

  बाजू टूटे बाज को,  साहब  चारा देई।’ [6]

– ‘क्या मृत्यु से बचा जा सकता है?’

– ‘सदा  नगारा  कूच का  बाजत  आठों  जाम।

   रहिमन या जग आइ कै, को करि रहा मुकाम।’[7]

– ‘सच्चा सामर्थ्यवान कौन है?’

– ‘लोहे की न लुहार की, रहिमन कही विचार।

   जो हनि मारे सीस में, ताही की तलवार।’ [8]

– ‘सब से बड़ा लाभ क्या है और सबसे बड़ी हानि क्या है?’

– ‘समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।

   चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।’[9]

– ‘आदमी की चिंताएं कब समाप्त हो जाती हैं?’

– ‘चाह  गयी  चिंता  मिटी,  मनुआ बेपरवाह।

   जिनको कुछ ना चाहिए, वे साहन के साह।’[10]

– ‘खानखाना! मुझे लगता है, मेरे षड़यंत्रकारी अमीर एक दिन मुझे नष्ट कर देंगे। क्या मुझे आपकी शरण मिल सकती है?’

– ‘रहिमन बहु भेषज करत,  ब्याधि  न छाँड़त साथ।

   खग मृग बसत अरोग बन, हरि अनाथ के नाथ।’ [11]

 खानखाना की सीधी सपाट बात सुनकर चाँद की आँखों में आँसू आ गये। किसी तरह अपने आप को संभाल कर बोली- ‘आप ज्ञानी हैं, इसी से इतने उदासीन हैं और बड़ी-बड़ी बातें कहते हैं किंतु मैं अज्ञानी हूँ, मैं आपकी तरह संतोषी नहीं हो सकती।

खानखाना उठ खड़ा हुआ। चाँद ने सिर पर दुपट्टा लेकर खानखाना को तसलीम कहा और आँखों में आँसू भरकर बोली- ‘खानखाना! इस मायूस औरत की तसल्ली के लिये फिर कभी और भी पधारें। मेरा मन नहीं भरा।’

चाँद पर्दे की ओट में चली गयी। खानखाना को लगा कि श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का निश्छल चाँद जो कुछ क्षण पहले तक कक्ष में उजाला किये हुए था, अचानक बादलों की ओट में चला गया।

-अध्याय 90, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  जिस व्यक्ति का व्यय बढ़ जाता है, जिस व्यक्ति का उद्यम घट जाता है और जो राजा अपने मन में निष्ठुरता धारण कर लेता है, वे उसी प्रकार जीवित नहीं रहते जिस प्रकार कम जल में मछली जीवित नहीं रह सकती।

[2] तीन प्रकार से किसी व्यक्ति के हितैषी अथवा शत्रु होने की पहचान हो सकती है, या तो आदमी उसके अधीन हो जाये, या उसके पड़ौस में बस जाये या फिर उससे हमारा कोई काम पड़ जाये।

[3] संसार में कोई भी व्यक्ति यह दृष्टि लेकर जन्म नहीं लेता। शत्रुता, प्रेम, आदत और यश होते होते ही होते हैं।

[4]  अपनी सम्पत्ति के अतिरिक्त विपत्ति में कुछ भी काम नहीं आता। जिस प्रकार यदि कमल के पास जल नहीं हो तो कमल का मित्र सूर्य भी कमल का उपकार नहीं कर पाता। यहाँ तक कि मित्र होने पर भी सूर्य कमल को जला डालता है।

[5]  अपने मन की व्यथा किसी से नहीं कहनी चाहिये। लोग उस व्यथा को सुनकर प्रसन्न होंगे, व्यथा को कोई नहीं बांटेगा।

[6] सामर्थ्य शाली बाज जब अपना पंख खो देता है तो वह किसी काम का नहीं रहता। उसे कोई नहीं खरीदता। ऐसे बाज को परमात्मा ही भोजन देते हैं।

[7] संसार में हर समय मृत्यु का संगीत बजता रहता है। इस संसार में भला सदा के लिये कौन रह सका है!

[8]  यह निष्प्क्ष होकर कही गयी बात है कि तलवार का वास्तविक मालिक वही है जो उसका उपयोग कर सके।

[9]  समय पर किये गये कार्य के समान लाभकारी कुछ भी नहीं है तथा समय पर चूक जाने से बड़ी हानि कोई नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति के हृदय को समय की चूक सालती रहती है।

[10]  इच्छा रहित हो जाने से चिंता से भी छुटकारा मिल जाता है और मन को किसी की परवाह नहीं रहती। जिन्हें कुछ नहीं चाहिये वे बादशाहों के भी बादशाह हैं।

[11] अनेक औषधियां देने से भी व्याधि पीछा नहीं छोड़ती। केवल ईश्वर ही वास्तविक सहारा है जिसके बल पर पशु-पक्षी भी वन में पूर्णतः निरोग होकर बसते हैं।

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