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जसोदा बार बार भाखै (74)

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जसोदा-बार-बार-भाखै

जसोदा बार बार भाखै । है कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहि राखै।

अकबर ने शहजादा मुराद का विवाह खानखाना अब्दुर्रहीम के साले खाने-आजम मिर्जा अजीज कोका की बेटी से करना निश्चित किया। शहजादे मुराद के विवाह में भाग लेने के लिये अकबर ने मुगलिया सल्तनत के लगभग सभी बड़े अमीर, उमराव और सेनापतियों को पंजाब में बुलवाया जहाँ वह अपने विशाल लाव-लश्कर सहित डेरा डाले हुए था।

अकबर ने इस मौके पर खानखाना को भी पत्र लिखकर बुलाया था कि यदि गुजरात में शांति हो गयी हो तो वह शहजादे के विवाह में शरीक होने के लिये चला आये। खानखाना सांडनी पर बैठकर पन्द्रह दिन की ताबड़तोड़ यात्रा करता हुआ पंजाब पहुँचा जहाँ बादशाह का लश्कर पड़ाव डाले हुए था। पंजाब में शहजादे का विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद अकबर खानखाना को अपने साथ सीकरी ले आया था। उनके साथ बहुत से अमीर उमराव भी आ गये थे जो अब तक सीकरी में ही पड़ाव डाले हुए बैठे थे।

अकबर ने कहने को तो दिल्ली को अपनी राजधानी बना रखा था किंतु वह दिल्ली के स्थान पर फतहपुर सीकरी में अधिक रहता था। चौमासे में अक्सर वह शाम के समय आगरा आ जाता और देर रात तक अपने आदमियों के साथ यमुनाजी के तट पर जमा रहता।

सायंकालीन दरबार में वह शासन और राजनीति की बातें अत्यंत आवश्यक होने पर ही किया करता था। अन्यथा यह समय उसके रागरंग और मनोविनोद के लिये निर्धारित था। उसने उज्जैन के परम पराक्रमी महाराजा विक्रमादित्य के अनुसरण पर अपने दरबार में भी नवरत्नों की नियुक्ति की थी।

इन रत्नों में कवि, लेखक, गवैये, संगीतकार और अन्य विद्वान शामिल थे। सांयकालीन दरबार का आयोजन मुख्य रूप से नवरत्नों के सानिध्य में समय व्यतीत करने के लिये किया जाता था। इन नवरत्नों को भी उसने अलग-अलग उपाधियों से नवाज रखा था। आज के इस सांयकालीन दरबार का आयोजन मुख्यतः संगीत सम्राट तानसेन के गायन के लिये किया गया था।

जब बहुत देर तक राग अलापने के बाद तानसेन ने सितार एक तरफ रखा तो दरबारी फिर से विचारों की दुनिया से बाहर निकल कर वर्तमान में लौटे। आज के गायन में तानसेन ने सूरदासजी का पद गाया था-

 ”जसोदा बार बार भाखै।

 है कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहि राखै।”

अकबर ने तानसेन से इस पद का अर्थ करने को कहा। तानसेन ने पद का अर्थ इन शब्दों में किया- ‘मैया यशोदा बार-बार अर्थात् पुनः-पुनः यह पुकार लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!’

इस पर अकबर ने फैजी की ओर देखा फैजी ने कहा- ‘यशोदा बार-बार अर्थात् रो-रोकर यह रट लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!’

– ‘राजा बीरबल! आप क्या कहते हैं?’ अकबर ने बीरबल से पूछा।

– ‘शहंशाह! इस पद का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है किंतु मेरे साथी समझ नहीं पा रहे हैं। माता यशोदा बार-बार अर्थात् द्वार-द्वार पर जाकर कहती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!’

इस बार अकबर ने खाने आजम कोका की ओर देखा कोका ने कहा- ‘यशोदा बार-बार अर्थात् दिन-दिन[1]  यह पुकार लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितैषी जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!’

इस बार बारी आयी खानखाना की। खानखाना ने कहा- ‘जहाँपनाह! तानसेन गायक हैं, इनको एक ही पद बार-बार अलापना पड़ता है इसलिये इन्होंने बार-बार का अर्थ पुनः-पुनः किया। फैजी फारसी के शायर हैं, इन्हें रोने के अलावा और क्या काम है! इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ”रो-रो” कर किया। राजा बीरबल द्वार-द्वार घूमने वाले विप्र हैं इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ”द्वार-द्वार” किया। खाने आजम कोका नजूमी[2]  हैं, उनको दिन, तिथि और वार से ही वास्ता पड़ता है इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ”दिन-दिन” किया लेकिन बादशाह हुजूर इस पद का वास्तविक अर्थ यह है कि माता यशोदा का बाल-बाल अर्थात् रोम-रोम पुकारता है कि कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में ही रोक ले।’

खानखाना का जवाब सुनकर अकबर की आँखों में प्रसन्नता का ज्वार उमड़ आया। उसने आसन से खड़े होकर रहीम को शाबासी दी। दूसरे सभासदों ने भी खानखाना की बहुत प्रशंसा की।

-अध्याय 74, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] प्रतिदिन।

[2] ज्योतिषी।

वकीले मुतलक (75)

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वकीले मुतलक

एक तरफ मुगल सल्तनत का वकीले मुतलक है तो दूसरी ओर सल्तनत का महत्वपूर्ण सेनापति। स्वयं बादशाह तक इन दोनों में से किसी को नाराज नहीं करना चाहता।

बादशाह ने दरबार बर्खास्त करने का आदेश दिया और खानखाना को संकेत से अपने साथ आने के लिये कह कर उठ खड़ा हुआ।

एकांत पाकर बादशाह ने खानखाना से कहा- ‘खानखाना! तुम्हें एक जिम्मेदारी सौंपता हूँ। मियाँ शाहबाज खाँ और राजा टोडरमल के बीच कुछ पैसों को लेकर झगड़ा है। तुम्हें पता लगाना है कि सच्चाई क्या है और गलती किसकी है? ज्यादातर अमीर इस झगड़े को लेकर दो खेमों में बंट गये हैं। चगताई अमीर शाहबाजखाँ के पक्ष में हैं और हिन्दू सरदार राजा टोडरमल के पक्ष में। जिससे दरबार का वातावरण खराब हो रहा है। किसी तरह यह बखेड़ा निबटाओ।’

रहीम को लगा कि बादशाह ने उसे एक अलग तरह के रणक्षेत्र में नियुक्त कर दिया है। इसमें तलवारें नहीं चलनी हैं, दोनों ओर के तर्कों और दोनों ओर की स्वामिभक्तियों की बर्छियां चलनी हैं। सबसे विचित्र बात तो यह है कि दोनों ही पक्षों द्वारा चलाई गयी बर्छियों का वार खानखाना को अपनी छाती पर झेलना है।

एक तरफ मुगल सल्तनत का वकीले मुतलक है तो दूसरी ओर सल्तनत का महत्वपूर्ण सेनापति। स्वयं बादशाह तक इन दोनों में से किसी को नाराज नहीं करना चाहता। भले ही दोनों ओर के पक्ष में से कोई भी हारे या जीते किंतु जरा सी भी चूक होते ही खानखाना की तो अकारण ही पराजय हो जानी है।

बादशाह के आदेश से खानखाना ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। अकबर के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब कुछ ही दिनों बाद राजा टोडरमल और शाहबाजखाँ ने एक साथ बादशाह की सेवा में हाजिर होकर निवेदन किया कि अब उनका हिसाब साफ हो गया है और उनके बीच किसी तरह का विवाद नहीं है।

बादशाह ने उन दोनों की वे दरख्वास्तें उन्हें वापिस लौटा दीं जो उन्होंने एक दूसरे के विरुद्ध लिखकर बादशाह को दी थीं। उनके जाने के बाद बादशाह ने खानखाना को बुलाकर पूछा- ‘यह क्या चमत्कार है खानखाना? कई महीनों से चला आ रहा यह झगड़ा अचानक ही कैसे निबट गया?’

– ‘जहाँपनाह! मैंने जब दोनों पक्षों से बात की तो मुझे अनुमान हुआ कि राजा टोडर मल मूंछ के लिये और शाहबाजखाँ पैसों के लिये लड़ रहा था। इसलिये मैंने झगड़ा निबटाने के लिये इस तरह की योजना बनाई कि शाहबाजखाँ के पास पैसा रह जाये और राजा टोडरमल के पास मूंछ।

– ‘गलती पर कौन था?’

– ‘गलती शाहबाजखाँ की थी किंतु वह किसी भी कीमत पर राजा टोडर मल को धन लौटाने के लिये तैयार नहीं था। जब मैंने शाहबाजखाँ से कहा कि यदि वह शेख अबुलफजल आदि अमीरों की उपस्थिति में अपनी गलती कबूल करे तो राजा टोडरमल उससे एक भी पैसा नहीं लेगा और यदि शाहबाजखाँ ऐसा नहीं करेगा तो उसे बादशाही कोप का शिकार होना पड़ेगा। इस पर शाहबाजखाँ तैयार हो गया।’

– ‘और राजा टोडर मल, वह कैसे माना?’

– ‘मैंने राजा टोडरमल से कहा कि यदि वह अपना पैसा छोड़ने को तैयार हो जाये तो शाहबाज खाँ शेख अबुल फजल की उपस्थिति में अपनी गलती मान लेगा। इससे राजा टोडरमल को पैसा भले ही न मिले किंतु बादशाह की निगाह में उसकी इज्जत बढ़ जायेगी। यह सुनकर राजा टोडरमल भी तैयार हो गया।’

– ‘तुमने कमाल कर दिया खानखाना। तुम तो वकील होने के लायक हो। जिस बखेड़े को मैं स्वयं भी प्रयास करके नहीं निबटा सका वह झगड़ा तुमने जरा सी युक्ति से निबटा दिया।

भाग्य की बात! इस घटना के कुछ ही दिनों बाद साम्राज्य के वकीले मुतलक राजा टोडरमल की मृत्यु हो गयी। बादशाह ने खानखाना अब्दुर्रहीम को राज्य का नया वकीले मुतलक नियुक्त कर दिया। उन दिनों यह पद राज्य का सबसे बड़ा पद था। वकीले मुतलक बादशाह का प्रतिनिधि समझा जाता था। उसे कोई भी आदेश लिखित में देने की आवश्यकता नहीं थी। उसका आदेश बादशाह का आदेश होता था।

जब वकीले मुतलक अब्दुर्रहीम चौंतीस वर्ष का हुआ तो उसके घर में एक के बाद एक तीन बेटों का जन्म हुआ। बादशाह स्वयं वकीले मुतलक के महलों में जाकर उसे पुत्रों के जन्म की बधाई देकर आया। यहाँ तक कि बादशाह ने स्वयं ही उनका नामकरण भी किया जो ऐरच, दाराब और कारन नाम से जाने गये। ये तीनों पुत्र अकबर की धात्री माहमअनगा की पुत्री माहबानू से हुए थे। माहबानू से ही जाना बेगम और एक अन्य पुत्री का जन्म हुआ था।

बाद में रहीम को दो बेटे और प्राप्त हुए जिनके नाम रहमानदाद और अमरूल्लाह रखे गये। रहमनादाद का जन्म सौधा जाति की एक स्त्री से हुआ था और मिर्जा अमरूल्लाह एक दासी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।

-अध्याय 75, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

विचित्र दरबार (76)

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विचित्र दरबार

थोड़ी ही देर में रहीम ने जिस दरबार में प्रवेश किया उस विशाल और विचित्र दरबार की शोभा देखते ही बनती थी। दरबार का शामियाना सोने और चांदी की चोबों पर खड़ा था जो दिन-रात मोतियों की झालरों से झिलमिलाता था।

– ‘हुजूर! बाहर फरियादियों का हुजूम इकट्ठा हो गया है। कुछ लोग तो सुबह से आस लगाये बैठे हैं। शाम होने को आई।’

– ‘तो लोगों को मालूम हो गया कि रहीम आगरे में है?’

– ‘हाँ हुजूर! अब तो दूर-दूर से लोग आ रहे हैं।’

– ‘अच्छा उन सबको दरबार में बैठा।

थोड़ी ही देर में रहीम ने जिस दरबार में प्रवेश किया उस विशाल और विचित्र दरबार की शोभा देखते ही बनती थी। दरबार का शामियाना सोने और चांदी की चोबों पर खड़ा था जो दिन-रात मोतियों की झालरों से झिलमिलाता था। दरबार के फर्श पर महंगे कालीन बिछे थे। एक ओर एक विशाल चबूतरा बना हुआ था जिस पर अत्यंत भव्य और विशाल तख्त पड़ा था।

तख्त की बारीक कारीगरी बरबस ही देखने वाले का ध्यान खींचती थी। तख्त पर चीन देश से आयी रेशम की महंगी चद्दरें और तकिये करीने से सजे हुए थे। समूचे आगरे में यदि कोई और दरबार किसी भी लिहाज से रहीम के दरबार से प्रतिस्पर्धा कर सकता था तो वह था स्वयं शहंशाह अकबर का दरबार।

जितना भव्य दरबार था, उतना ही भव्य खानखाना स्वयं था। आज तो खानखाना की शोभा विशेष रूप से देखने योग्य थी। वह बादशाहों की भांति समस्त राजकीय चिह्न धारण किये हुए था। खानखाना के सिर का मुकुट महंगे और दुर्लभ हीरे जवाहरों से जगमगा रहा था। कलंगी के स्थान पर हुमा पक्षी का पंख हवा में फहराता था। इस पंख को केवल शहजादे ही धारण कर सकते थे। उसके तलवार की मूठ पर बड़े-बड़े याकूत, नीलम, पन्ने तथा वैदूर्य जड़े हुए थे।

खानखाना के सेवकों ने सिंह की तरह गर्दन उठा कर चल रहे खानखाना के सिर पर हीरे-मातियों से जड़े सोने के छत्र की छाया कर रखी थी और वे दोनों दिशाओं से चंवर ढुलाते हुए चल रहे थे। जैसे ही खानखाना दरबार में दिखायी दिया, सैंकड़ों कण्ठ उसकी जय-जयकार करने लगे।

आज के इस विशेष दरबार का आयोजन खानखाना के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में किया गया था। खानखाना ने एक भरपूर निगाह दरबार में उपस्थित सेवकों और आगंतुकों पर डाली और मुंशी को दरबार की कार्यवाही आरंभ करने का संकेत किया।

सबसे पहले जो आदमी उसकी सेवा में प्रस्तुत किया गया उसने सैनिकों के से कपड़े पहन रखे थे और हाथ में तलवार ले रखी थी। उस आदमी ने सिर पर जो पगड़ी धारण कर रखी थी, उस पगड़ी पर दो लम्बी-लम्बी कीलें लगी हुई थीं।

– ‘हुजूर! यह गुलाम आपकी सेना में नौकरी पाना चाहता है।’ विचित्र वेशभूषा वाले आदमी ने सिर झुका कर निवेदन किया।

– ‘क्या नौकरी करोगे?’

– ‘हुजूर, सिपाही की।’

– ‘तुमने अपनी पगड़ी पर ये कीलें क्यों लगवा रखी हैं?’

– ‘हुजूर पहली कील तो उस आदमी के लिये है जो नौकरी पर तो रखे किंतु तन्खाह न दे।’

– ‘और दूसरी कील?’

– ‘दूसरी कील उस नौकर के लिये है जो तन्खाह तो ले किंतु काम न करे।’

 – ‘कितनी तन्खाह चाहिये?’

– ‘दस रुपया महीना।’

– ‘कितनी उम्र है?’

– ‘पच्चीस साल।’

– ‘कितने साल नौकरी करेंगे?’

– ‘यही कोई पच्चीस साल।’

– ‘एक साल की तन्खाह कितनी हुई?’

– ‘एक सौ बीस रुपया।’

– ‘पच्चीस साल की कितनी हुई?’

– ‘तीन हजार रुपया।’

– ‘ये लीजिये तीन हजार रुपया और अपने सिर से पहली कील का बोझ उतार दीजिये। दूसरी कील का बोझ उठाने का आपको पूरा अधिकार है।’

जीवन भर की कमाई आज ही पाकर युवक प्रसन्नता से कूदने लगा। दरबार में उपस्थित जन समुदाय फिर से खानखाना की जय-जयकार करने लगा।

इसके बाद एक बुढ़िया की बारी थी। वह अपने हाथ में एक तवा लेकर आई थी। उसने कहा- ‘हुजूर मैं आपको छूकर देखना चाहती हूँ।’

– ‘इस बुढ़िया की मुराद पूरी की जाये।’ खानखाना ने आदेश दिया।

बुढ़िया तवा लेकर तख्त पर चढ़ गयी और जैसे ही खानखाना के निकट पहुँची, अपने हाथ का तवा खानखाना की देह से रगड़ने लगी। कुछ देर बाद तख्त से नीचे उतर कर बड़ी हैरानी से तवे को उलट-पलट कर देखने लगी।

बुढ़िया की उल्टी-सीधी चेष्टाएं देखकर अब्दुर्रहीम को हँसी आ गयी। वह बोला- ‘निराश न हो बुढ़िया। तूने अपने लोहे का तवा पारस से ही रगड़ा है। अब यह सचमुच ही सोने का हो गया है। मुंशीजी! इस बुढ़िया को तवे के बराबर सोना तोलकर दे दिया जाये।’

दरबार में फिर से जय-जयकार गूंजने लगी।

अगला फरियादी एक गरीब ब्राह्मण था। उसने खानखाना के सामने आते ही मुसलमानों को गाली देना आरंभ कर दिया। जिनके कारण उसके जजमानों की संख्या घट गयी थी और अब वह भूखों मरने की स्थिति को पहुँच गया था।

– ‘विप्र देवता! इस प्रकार मत कोसो। तुम्हें खाने पीने को बहुत मिलेगा।’

इतना सुनते ही ब्राह्मण देवता ने अपने सिर से मैली-कुचैली और स्थान-स्थान से फटी हुई पगड़ी खानखाना पर दे मारी और कहा- ‘हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिसकी बात से प्रसन्न होओ, उसे कुछ न कुछ अवश्य दो। मेरे पास इस पगड़ी के सिवा कुछ नहीं है। यही तुझे देता हूँ।’

खानखाना ने तुरंत ही अपना रत्न जड़ित स्वर्ण ताज उतार कर उस ब्राह्मण को दे दिया और उसकी मैली कुचैली तथा तार-तार हो रही पगड़ी अपने माथे पर बांधते हुए कहा- ‘हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिससे कुछ लो, उसे अधिक नहीं तो, उतना तो अवश्य ही दो।’

अगला फरियादी एक नौजवान था। उसे विश्वास न था कि खानखाना उसकी भी मुराद पूरी कर सकता है लेकिन उसने सुन रखा था कि खानखाना कवियों की बड़ी इज्जत करता है। भले ही कितना ही घटिया कवि हो, वह खानखाना के दरवाजे से खाली हाथ नहीं लौटता। इसलिये वह अपनी फरियाद एक कविता में ढाल कर लाया था। उसने कहा- ‘हे उदार खानखाना! एक चन्द्रमुखी प्यारी है। वह जान मांगे तो कुछ सोच नहीं, रुपया मांगती है, यही मुश्किल है।’

खानखाना ने मुस्कुरा कर पूछा- ‘कितना रुपया मांगती है?’

– ‘एक लाख।’

– ‘तो तू एक लाख छः हजार ले जा।’

– ‘एक लाख तो ठीक, पर छः हजार क्यों?’

– ‘तेरे सजने-धजने के लिये। यदि इसी हाल में गया तो रुपया लेकर भी नहीं मानेगी।’

जब युवक वहाँ से हटा तो एक बहुत ही कंगाल आदमी अपने स्थान से उठकर खड़ा हुआ और बोला- ‘खानखाना! कैसे सम्बंधी हो तुम! अपने साढ़ू को नहीं पहचानते?’

खानखाना ने कहा- ‘आओ साढ़ूजी, मैं तो आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। आओ यहाँ बैठो मेरे पास।’

जब कंगाल खानखाना के बराबर तख्त पर बैठ गया तो खानखाना ने अपने मुंशी से कहा- ‘मुंशीजी! साढ़ूजी को एक लाख रुपया देकर विदा किया जाये।’

मुंशी बहुत देर से चुपचाप बैठा हुआ दरबार की कार्यवाही देख रहा था। इस बार उससे रहा न गया। उसने कंगले को व्यंग्य पूर्वक देखते हुए पूछा- ‘गुस्ताखी मुआफ हुजूर! ये आपके साढ़ू हैं, पहले कभी इन्हें देखा नहीं?’

– ‘मुंशीजी! आप इन्हें नहीं पहचानते! देखिये, सम्पत्ति और विपत्ति दो बहिनें हैं। एक हमारे घर में है और एक इनके। इसी नाते से ये हमारे साढ़ू हैं।’

कंगला अपनी ढीठता त्याग कर खानखाना के पैरों में गिर पड़ा।

इस बार एक युवा पण्डित खानखाना के समक्ष था।

– ‘पाँय लागूं पण्डितजी। कहिये क्या सेवा करूँ?’

युवा पण्डित खानखाना के सामने आकर कातर दृष्टि से देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सका। उसके हाथ-पाँव काँपने लगे और उसका कण्ठ सूख गया।

– ‘आपके अंगोछे में क्या लिपटा हुआ है?’ खानखाना ने पूछा।

युवा पण्डित ने अपने अंगोछे में लिपटी हुई एक खाली शीशी निकाली और खानखाना की ओर बढ़ा दी। खानखाना के सेवक ने शीशी खानखाना को ले जाकर दी।

खानखाना ने देखा, शीशी में पानी की केवल एक बूंद है। उन्होंने पण्डित की ओर देखकर कहा- ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे। मोती मानस चून।’

पण्डित ने आँखों में आँसू भर कर कहा- ‘हाँ, यही तो मैं भी कह रहा हूँ ।’

– ‘मुंशीजी! हमारे पास आईये।’ खानखाना ने मुंशी को आदेश दिया।

जब मुंशी खानखाना के ठीक पास जाकर खड़ा हो गया तो खानखाना ने उसके कान में कहा- ‘इस पण्डित के घर का पता मालूम कर लो और आज रात को वहाँ एक लाख रुपया पहुँचाओ।’

मुंशी फिर चक्कर में पड़ गया। उसकी आँखों में उभरे सवाल को देखकर खानखाना ने उसके कान में फुसफुसाकर कहा- ‘अरे भाई आप देखते नहीं हैं! पण्डितजी किसी प्रतिष्ठित खानदान के हैं इसलिये मुँह से कुछ मांग नहीं सकते किंतु संकेत से बता रहे हैं कि बिना धन के पानी बचे तो कैसे बचे। जैसे शीशी में एक बूंद ही है वैसे घर भी खाली होने को है।’

अगला आदमी एक बूढ़ा मुसलमान था। उसकी निर्धनता उसके बुरे हाल का परिचय दूर से दे रही थी। वह हाथ जोड़कर खानखाना के ठीक सामने खड़ा हो गया।

– ‘बोलो बाबा।’

– ‘हुजूर! गुस्ताखी मुआफ हो। गुलाम आप पर पत्थर फैंक कर देखना चाहता है।’ बूढ़े को हिन्दुस्तानी में बात करनी नहीं आती थी। वह ईरानी भाषा बोल रहा था।

– ‘ठीक है, जैसा जी में आये करो। मैं तैयार हूँ।’ खानखाना ने ईरानी भाषा में ही जवाब दिया और अपनी ढाल संभाल कर बैठ गया।

बूढ़े ने अपने कांपते हाथों में थामा हुआ पत्थर खानखाना पर दे मारा। पत्थर खानखाना की ढाल से जाकर टकराया।

– ‘मुंशी जी! बाबा को एक हजार रुपया दिया जाये।’

– ‘गुस्ताखी मुआफ हुजूर। क्या यह पत्थर फैंकने का पारिश्रमिक है?’ मुंशी ने हाथ जोड़ कर पूछा।

– ‘नहीं मुंशीजी। बूढ़े बाबा ने यह पत्थर हम पर यह जांचने के लिये फैंका था। जब फलदार वृक्षों पर पत्थर देकर मारते हैं तो फल मिलते हैं, खानखाना क्या उनसे भी गया बीता है!’

– ‘खानखाना तेरी जय हो। युगों तक इस धरती पर तेरा इकबाल बुलंद रहे। मैं सचमुच ही ईरान से यहाँ तक चलकर तुझे जांचने के लिये ही आया हूँ। मेरा नाम शकेबी अस्फहानी है। मैं ईरान का रहने वाला हूँ। पार साल जब मैं मक्का जाते समय अदन में पहुँचा तो मैंने वहाँ कुछ बच्चों को एक गीत गाते हुए सुना कि- खानखाना आया। जिसके प्रताप से कुंआरी कन्याओं ने पति पाये। व्यापारियों ने माल बेचे, बादल बरसे और जल-थल भर गये। मैं उस गीत की वास्तविकता को अपनी आँखों से देखने के लिये यहाँ तक चला आया हूँ। मुझे इन रुपयों की आवश्यकता नहीं है। इन्हें किसी जरूरतमंद इंसान को दे दिया जाये।’

उपस्थित जनसमुदाय फिर से जय-जयकार करने लगा।

इसके बाद मंडन कवि[1]  उठ कर खड़ा हुआ। उसने दोनों हाथ खानखाना की ओर फैला कर कहा-

‘तेरे गुन  खानखानां  परत  दुनी  के कान,

तेरे  काज  ये  गुन   आपनो   धरत  हैं।

तू तो खग्ग खोलि-खोलि खलन पै  कर लेत

यह   तो   पै  कर  नेक  न   डरत  हैं।

मंडन   सुकवि   तू   चढ़त  नवखंडन  पै,

ये   भुजदण्ड   तेरे   चढ़िए   रहत   हैं।

ओहती   अटल   खान  साहब  तुरक मान,

तेरी  या  कमान  तोसों  तेहुँसों   करत है।’

मण्डन की कविता पूरी होते ही खानखाना पर फूल बरसने लगे। सैंकड़ों कण्ठों से निकली जयजयकार, उनसे दुगुनी हथेलियों से निकली तालियों की गड़गड़ाहट, ढोल, नगारों और तुरहियों की तुमुल ध्वनि से आकाश व्याप्त हो गया।

दरबार बर्खास्तगी की घोषणा के साथ ही खानखाना दस्तरख्वान पर जा बैठा। आज उसके दस्तरख्वान का प्रबंध दरबार में ही किया गया था। उसके साथ-साथ सैंकड़ों आदमियों के भोजन का प्रबंध किया गया था।

-अध्याय 76, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] ये बुंदेलखण्डी कवि थे।

शिकायत (77)

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शिकायत

अमीरों को सबसे अधिक शिकायत इस बात से थी कि साधारण सिपाही के घर में जन्म लेने वाला रहीम हुमा का पर लगाकर दरबार करता है। भले ही उसका बाप खानखाना के पद तक जा पहुँचा हो किंतु था तो वह मूल रूप से एक साधारण सिपाही ही!

खानखाना का ऐसा ठाठ-बाट, अकूत सम्पदा और उसके दरबार की ऐसी निराली शान देखकर कई दुष्टों की छाती पर साँप लोट गये। कहाँ से लाया खानखाना यह सम्पदा? कहाँ से आये ये सारे साजो-सामान? कहाँ से आये इतने सारे लोग? सब कुछ रहस्यमय था।

ऐसा ठाठ-बाट और ऐसा रूआब तो शहंशाह अकबर के अतिरिक्त और किसी अमीर, उमराव एवं सरदार के पास न था। कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों की छातियां ईर्श्या से दहकने लगीं। शहजादों की नाक में सलवटें पड़नी आरंभ हो गयीं।

उन्हें सबसे अधिक शिकायत इस बात से थी कि साधारण सिपाही के घर में जन्म लेने वाला रहीम हुमा का पर लगाकर दरबार करता है। भले ही उसका बाप खानखाना के पद तक जा पहुँचा हो किंतु था तो वह मूल रूप से एक साधारण सिपाही ही! इस तरह का दरबार करना तो शहजादों को भी नसीब नहीं था। फिर रहीम की ऐसी क्या हैसियत है?

जब आग जलती है तो धुंआ उसकी सूचना चारों ओर फैला ही देता है। जानने में रुचि न रखने वालों को भी आग की सूचना हो जाती है। रहीम के सम्बंध में भी यही हुआ। लोगों की छातियों में जलने वाली आग का धुंआ भी चारों ओर फैलने लगा और एक दिन बादशाह अकबर के महल तक जा पहुँचा।

बादशाह इन खबरों को सुन-सुन कर मुस्कुराता था। एक दिन बहुत से अमीरों ने एक साथ बादशाह के हुजूर में इकट्ठे होकर रहीम की शिकायत की- ‘बादशाह सलामत यह कमजात रहीम आपकी नेक मेहरबानियों को पाकर अपना दिमाग फेर बैठा है। वह आलीशान तख्त पर बैठकर बादशाहों और शहजादों की भांति दरबार लगाता है। लोगों को सोना, चाँदी, कपड़े, रुपये और धान बांटता है।’

– ‘लोगों को सोना, चाँदी, कपड़े, रुपये और धान बांटना कोई गुनाह है क्या?’ बादशाह ने मुस्कुरा कर पूछा।

बादशाह का जवाब सुनकर अमीरों के चेहरे फक पड़ गये। किसी तरह हिम्मत करके एक दरबारी ने कहा- ‘बेशक यह गुनाह नहीं किंतु रहीम इतना माल-असबाब लाया कहाँ से, यह तो जानना चाहिये।’

– ‘तुम्हें क्या लगता है, रहीम ने कहीं चोरी की होगी या डाका डाला होगा।’

– ‘ऐसा लगता तो नहीं किंतु वह बेशुमार दौलत लुटा रहा है।’

– ‘इसके अलावा उसका कोई और गुनाह?’

– ‘हुजूरे आली! वह शहजादों की तरह सिर पर ताज रखता है और ताज पर हुमा का पर भी!’ एक अमीर ने उत्तेजित होकर कहा।

– ‘और?’

– ‘हुजूर मेरी जान बख्शी जाये किंतु सही बात तो यह है कि वह आपकी तरह तख्त पर बैठकर चंवर ढुलवाता है और छत्र तान कर चलता है।’

– ‘तुम्हारी बात सही है, इसका क्या सबूत है तुम्हारे पास?’

– ‘सुबूत देखना है तो अभी बादशाह सलामत स्वयं जहमत फरमायें और रहीम के डेरे पर चलकर स्वयं अपनी आँखों से देख लें।’

– ‘ठीक है। आज ऐसा ही किया जाये।’

कुछ ही देर में बादशाह की सवारी रहीम के डेरे पर थी। खानखाना को इत्तला मिली तो भागता हुआ ड्यौढ़ी पर हाजिर हुआ और अपने सिर से पगड़ी उतार कर हाथी के नीचे बिछाता हुआ बोला- ‘मेरे धन्य भाग जो बादशाह सलामत की नजर इस ओर हुई।’

– ‘खानखाना! हमने तुम्हारे दरबार की बड़ी तारीफ सुनी है, इसलिये हम बिना बुलाये ही तुम्हारा दरबार देखने चले आये।’ बादशाह ने हाथी से उतर कर पगड़ी के कपड़े पर पैर धरते हुए कहा।

– ‘इस गरीबखाने पर आपके पधारने के अलावा यहाँ और कोई तारीफ की बात नहीं है हुजूर। फिर भी आप ने इनायत की ही है तो कुछ न कुछ खास बात जरूर होगी।’

– ‘हमने सुना है तलवार का हुनर दासों को भी स्वामी बना देता है। क्या यह बात सही है खानखाना?’

– ‘नहीं बादशाह सलामत। यह बात सही नहीं है। स्वामिभ्क्ति और स्वामी की कृपा ही दास को स्वामी बना सकती है।’ खानखाना ने शांति से प्रत्युत्तर दिया। बादशाह को रहीम के जवाब से बड़ी तसल्ली हुई

  बादशाह के आदेश से खानखाना ने बादशाह को अपना दरबार दिखाया। उसे देखकर अकबर की आँखें चौंधिया गयीं। वाकई में जगह काबिले तारीफ तो थी ही, रश्क करने लायक भी थी। अकबर खानखाना के तख्त पर जाकर बैठ गया।

रहीम ने उसी क्षण दौड़कर हुमा के पर वाला ताज बादशाह के सिर पर रख दिया और स्वयं बादशाह के ऊपर छत्र तानकर खड़ा हो गया। उसके नौकर भी संकेत पाकर बादशाह पर चंवर ढुलाने लगे और बादशाह सलामत की जय-जयकार करने लगे।

बादशाह ने पूछा- ‘खानखाना! बादशाहों और शहजादों के काम में आने वाली चीजें तुम्हारे यहाँ क्या कर रही हैं?’

– ‘जिल्ले इलाही। मुझे अंदाज था कि एक न एक दिन हजरत यहाँ पधारेंगे। उसी की तैयारी में यह सामान मंगा रखा था। यदि शहजादों और बादशाहों के काम आने वाला यह सामान यहाँ नहीं होता तो मुझे आज अपने मालिक के सामने लज्जित होना पड़ता।

– ‘हम तुम्हारी आवभगत से प्रसन्न हुए खानखाना। आज से यह सब सामान तुम्हें दिया जाता है। हमारे हुक्म से अब तुम ही इसका उपयोग करो।’ यह कहकर बादशाह उठ गया।

-अध्याय 77, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

जाडा महडू (78)

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जाडा महडू

– ‘हुजूर! महाराणा प्रतापसिंह के भाई जगमाल का वकील जाडा महडू आपकी सेवा में हाजिर हुआ चाहता है।’ गुलाम ने राज्य के वकील खानखाना अब्दुर्रहीम से निवेदन किया। उस समय खानखाना अपने निजी दरबार में व्यस्त था।

– ‘जाडा महडू!’ खानखाना के भीतर स्मृतियों का पिटारा खुला। कहाँ सुना यह नाम? कब? अचानक ही उसे जाडा महडू का प्रसंग याद आ गया, जैसे सोते से जाग पड़ा हो, ‘जा उसे ले आ, यहीं ले आ। बड़ा मजेदार आदमी है।’

अब्दुर्रहीम जब मेवाड़ में था तब उसने इस कवि की बड़ी तारीफ सुनी थी। जाडा महडू का वास्तविक नाम आसकरण चारण था। उसके जैसा चाटुकार जमाने में न था। शरीर से बहुत मोटा होने तथा चारणों की महडू शाखा में होने के कारण इसे मेवाड़ में जाडा महडू कहकर पुकारते थे। उन दिनों तो उसे जाडा से रूबरू होने का अवसर नहीं मिला था किंतु अब्दुर्रहीम के मन में जाडा से मिलने की बड़ी इच्छा थी जो आज अनायास ही पूरी हो रही थी।

जब सेवक जाडा महडू को लेने बाहर गया तो खानखाना ने सरकारी कामों को स्थगित करते हुए, दरबार में उपस्थित सभासदों से कहा- ‘तैयार हो जाओ। दरबार में बड़ा भूकम्प आने वाला है।’ खानखाना की बात से दरबारियों को बड़ा अचंभा हुआ। आखिर यह जाडा महडू चीज क्या है जो खानखाना दरबार में भूकम्प आने की भविष्यवाणी कर रहे हैं! पहले तो कभी इसका नाम सुना नहीं!

थोड़ी ही देर में गुलाम, जाडा महडू को लेकर उपस्थित हुआ। ठीक ही कहा था खानखाना ने। दरबार में उसका प्रवेश किसी भूकम्प से कम नहीं था। एक बहुत स्थूल काया ने दरवाजे से ही बादलों की तरह गरजना आरंभ कर दिया-

‘खानखानाँ नवाब रा अड़िया भुज ब्रह्मण्ड,

पूठै तो है चंडिपुर धार तले नव खण्ड।’   [1]

दरबार में बैठे बहुत से लोग समझ नहीं सके कि वह कह क्या रहा था लेकिन खानखाना डिंगल जानता था। उसे जाडा के छंद में बड़ा आनंद आया। जाडा ने अपनी दोनों भुजाओं को हवा में लहराते हुए कहा-

‘खानखानाँ नवाब रै खांडे आग खिवंत,

जलवासा नर प्राजलै तृणवाला जीवंत। ‘[2]

जाडा एक क्षण के लिये ठहरा और अपने फैंफड़ों में वायु भरकर पूरी ताकत से बोला-

खानखानाँ   नवाब हो  मोहि  अचंभो  एह,

मायो किम गिरि मेरु मन साढ़ तिहस्यी देह। ‘ [3]

जाडा ने आगे बढ़ते हुए तीसरा दोहा पढ़ा-

‘खानखानाँ नवाब री आदमगीरी  धन्न,

यह ठकुराई मरु गिर मनी न राई मन्न। ‘ [4]

अब जाडा खानखाना के ठीक निकट पहुंच चुका था। खानखाना ने अपने आसन से खड़े होकर दोनों हाथ आकाश की ओर उठाते हुए कहा-

‘धर जड्डी अंबर जड्डा, जड्डा महडू जोय।

जड्डा नाम अलाह दा, और न जड्डा कोय। ‘[5]

खानखाना की बात सुनकर जाडा आश्चर्य में पड़ गया। उसने पूछा- ‘खानखाना हुजूर! मैंने तो आपको प्रसन्न करने के लिये दोहा पढ़ा। आपने क्यों पढ़ा?’

– ‘जाडा को प्रसन्न करने के लिये।’ खानखाना ने मुस्कुराकर जवाब दिया।

– ‘मैंने तो अपने स्वार्थ से आपको प्रसन्न करना चाहा था। आप मुझे क्यों प्रसन्न करना चाहते थे।’

– ‘मैं अपने स्वार्थ से तुझे प्रसन्न करना चाहता था।’

– ‘मेरा स्वार्थ तो मुझे मालूम है, किंतु आपका स्वार्थ?’

– ‘जब तू अपना स्वार्थ कहेगा तो तुझे मेरा स्वार्थ भी ज्ञात हो जायेगा।’

– ‘मैं अपने मालिक की तरफ से अर्ज लेकर आया हूँ और अकेले में निवेदन करना चाहता हूँ।’

– ‘ठीक है। जब दरबार बर्खास्त हो जाये तो तू निर्भय होकर अपनी बात कहना। बता तुझे कविता का क्या ईनाम दिया जाये?’

– ‘मेरे स्वामी का काम ही मेरा ईनाम होगा।’ जाडा ने जवाब दिया।

– ‘तेरे स्वामी का काम होने लायक होगा तो मैं वैसे ही कर दूंगा। मेरी इच्छा है कि तूने मेरी प्रशंसा में जो दोहे पढ़े हैं, उस हर दोहे के लिये तुझे एक लाख रुपया दिया जाये।’ खानखाना ने कहा।

– ‘खानखाना की बुलंदी सलामत रहे। मैं अपना ईनाम फिर कभी ले लूंगा, फिलहाल तो अपने स्वामी का ही काम किया चाहता हूँ।’ जाडा भी अपनी तरह का एक ही आदमी था। उसकी इच्छा रखने के लिये खानखाना ने दरबार बर्खास्त कर दिया।

– ‘अब बोल। क्या कहता है?’

– ‘हुजूर। प्रतापसिंह उदैपुर राज्य का मालिक बन बैठा है। मेरे स्वामी जगमाल उसके भाई हैं किंतु मेरे स्वामी को उसने कोई जागीर नहीं दी। यदि खानखाना मेहरबानी करें तो मेरे स्वामी उदैपुर की गद्दी पर बैठ सकते हैं। इसके बदले में मेवाड़ शहंशाह अकब्बर की अधीनता स्वीकार कर लेगा।’

– ‘तेरे मालिक को राज्य चाहिये तो मैं बादशाह से कहकर दूसरा राज्य दिलवा दूंगा लेकिन भाईयों में इस तरह का बैर करना और अपनी मातृभूमि शत्रु को सौंप देना उचित नहीं है जाडा।’

– ‘लेकिन बिना कुछ प्रत्युपकार प्राप्त किये बादशाह सलामत मेरे स्वामी को राज्य क्यों देंगे?’

– ‘प्रत्युपकार का जब समय आयेगा तो वह भी प्राप्त कर लिया जायेगा। बोल क्या कहता है?’

– ‘क्या चित्तौड़ का दुर्ग दिलवा देंगे?’ जाडा ने प्रश्न किया।

– ‘प्रताप मर जायेगा किंतु तेरे मालिक को चित्तौड़ में चैन से नहीं बैठने देगा।’

– ‘तो फिर!’

– ‘जहाजपुर का परगना अभी मुगलों के कब्जे में है। तू कहे तो तेरे मालिक को वह परगना मिल सकता है लेकिन एक शर्त पर।’

– ‘सो क्या?’

– ‘तू भाईयों में बैर नहीं बढ़ायेगा और देश को दुश्मनों के हाथ नहीं बेचेगा।’

खानखाना की बात सुनकर जाडा का मुँह काला पड़ गया। उसने गर्दन नीची करके कहा- ‘वचन देता हूँ।’

– ‘तो ठीक है। तू समझ, जहाजपुर तेरे मालिक को मिल गया।’

-अध्याय 78, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] खानखानाँ नवाब की भुजा ब्रह्माण्ड में जा अड़ी है, जिसकी पीठ पर चंडीपुर (अर्थात् दिल्ली) है और जिसकी तलवार की धार के नीचे नवों खण्ड हैं।

[2] खानखानाँ की तलवार से ऐसी आग बरसती है जिससे पानीदार वीर पुरुष तो जल मरते हैं लेकिन घास मुख में लिये (शरण में आये) हुए नहीं जलते।

[3] मुझे यह आश्चर्य होता है कि खानखानाँ का मेरु पर्वत जैसा मन साढ़े तीन हाथ की देह में कैसे समाया है।

[4] खानखानाँ नवाब का औदार्य धन्य है कि मेरु पर्वत जैसे अपने प्रभुत्व को वे मन में राई के बराबर भी नहीं मानते।

[5] धरा बड़ी है, आकाश बड़ा है, महडू शाखा का यह चारण बड़ा है और अल्लाह का नाम बड़ा है। इनके अलावा और कोई बड़ा नहीं है।

चाकर रघुबीर के (79)

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चाकर रघुबीर के

हम चाकर रघुबीर के पटौ लिखौ दरबार। तुलसी हम का होंइगे नर के  मनसबदार।

– ‘महात्मन्! शंहशाह की इच्छा है कि आप उनके दरबार को पवित्र करें।’ शहंशाह अकबर के वकीले मुतलक और काशी के सूबेदार अब्दुर्रहीम खानखाना ने गुंसाईजी से हाथ जोड़कर निवेदन किया।

– ‘खानखानाजी, कैसी बात करते हैं आप? हम तो दास हैं। क्या आप राजपुरुष होकर इतना भी नहीं जानते कि दासों के आने से सम्राटों के दरबार पवित्र नहीं होते।’

– ‘आप दास नहीं, रामभक्त हैं और रामभक्त तो स्वयं रामजी के समान हैं। उनके आगमन से ही दरबार पवित्र होते हैं।’

गुसांईजी ने मुस्कुराकर जवाब दिया-

‘प्रभु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।

तुलसी कहूंँ न राम से साहिब सील निधान।।’

– ‘शहंशाह के दरबार में जाने से किसी तरह का अमंगल नहीं होगा बाबा।’ अब्दुर्रहीम ने धरती पर सिर टिका कर कहा।

गुंसाईजी ने करुणा से अब्दुर्रहीम के सिर पर हाथ रख दिया-

‘राम  नाम  रति  राम गति  राम नाम बिस्वास।

सुमिरत  सुभ मंगल कुसल दुहुँ दिसि तुलसीदास।।’

अब्दुर्रहीम ने निराश होकर राजा टोडरमल की ओर देखा वकीले मुतलक को असफल होता देखकर राजा टोडरमल ने प्रयास किया- ‘शंहशाह अकबर गुणियों की कद्र करने वाले हैं। वहाँ आपका यथोचित आदर सत्कार होगा गुसांईजी। जैसा आप चाहेंगे, वैसा ही सब प्रबंध शासन की ओर से हो जायेगा।’

गुसांईजी ने राजा टोडरमल का अनुरोध अस्वीकार करते हुए उत्तर दिया-

  ‘राम भरोसो  राम बल  राम नाम  बिस्वास।

  सुमिरत सुभ मंगल कुसल मांगत तुलसीदास।।’

– ‘आपने जीवन भर निर्धनता के कष्ट सहे हैं। आपने स्वयं ने भी कहा है- नहीं दरिद्र सम दुख जग माहीं………..।’

– ‘दरिद्र कौन है राजन्?’ गुसांईजी ने टोका तो राजा टोडरमल सहम गये, ‘रामजी के चाकर दरिद्र नहीं होते। दरिद्रता तो तन की अवस्था है, मन की नहीं। क्या मन, तन का दास मात्र है? क्या यह आवश्यक है कि यदि तन दरिद्र हो तो मन भी दरिद्र हो जाये? यदि ऐसा नहीं है तो क्या व्यक्ति केवल तन मात्र है? क्या तन के दरिद्र होने से ही व्यक्ति दरिद्र हो जाता है?’

– ‘क्षमा करें देव! चूक हो गयी। मेरा आशय यह नहीं था। मेरे पास ऐसे शब्द कहाँ हैं जो मैं आपकी मर्यादा के अनुकूल संभाषण कर सकूं।’

– ‘दोष तुम्हारा नहीं है राजन्। दोष तुम्हारे परिवेश का है जिसमें तुम्हें दिन रात रहना पड़ता है। उसी विकृत परिवेश का परिणाम है कि राजपुरुषों की दृष्टि केवल व्यक्तियों के बाहरी स्वरूप में उलझ कर रह जाती है और वे बहुत सी भ्रामक परिभाषाएं गढ़ लेते हैं।’

– ‘गुसांईजी! यदि आप जैसे विवेकी पुरुष शासन में हों तो प्रजा को कई मुश्किलों से छुटकारा मिल सकता है।’

– ‘नहीं! यह सत्य नहीं है। प्रत्येक मनुष्य का अपना धर्म होता है और मनुष्य को अपने धर्म का ही पालन करना चाहिये। भगवान कृष्ण ने कहा है ‘स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मौ भयावहः ।’ शासन चलाना मेरा धर्म नहीं है।’

– ‘शंहशाह चाहते हैं कि आप जैसी विभूती का शेष जीवन आराम से कटे।’ राजा टोडरमल ने हाथ जोड़ दिये।

गुसाईंजी ने नेत्र मूंद कर कहा-

‘करिहौं कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस।

जहाँ तहाँ  दुख  पाइहौ  तबहीं तुलसीदास।।’

– ‘महात्मन्! सम्राट ने आपको यथोचित मनसब देने का भी निश्चय किया है।’ इस बार राजा मानसिंह ने साहस किया।

गुसांईजी राजा मानसिंह की ओर देखकर मुस्कुराये-

  ‘हम चाकर रघुबीर के पटौ लिखौ दरबार।

  तुलसी हम का होंइगे नर के  मनसबदार।’

संध्या वंदन का समय होता देखकर गुसांईजी उठ खड़े हुए। उन्हीं के साथ तीनों राजपुरुष भी गुसांईजी को प्रणाम करके उठ कर खड़े हो गये। वे तीनों आज ही बादशाह अकबर के आदेश से गुसांईजी की सेवामें काशीजी में उपस्थित हुए थे किंतु दिन भर के प्रयास के बाद भी अपने उद्देश्य में असफल रहे थे।

-अध्याय 79, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

हुक्म उदूली (80)

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हुक्म उदूली

जब तुलसीदासजी ने अकबर के दरबार में जाने से मना कर दिया तो अकबर ने इसे अपनी हुक्म उदूली समझा और वह आग-बबूला हो गया।

– ‘उस भिखारी को इतना घमण्ड?’ क्रोध से चीख पड़ा अकबर।

– ‘नहीं जिल्लेइलाही। बाबा को किसी तरह का घमण्ड नहीं। उन्होंने अपनी युवावस्था में ही गृह संसार त्यागकर सन्यास धारण कर लिया था। अब वे फिर से संसारिक मोह माया में फंसना नहीं चाहते।’ खानखाना ने निवेदन किया।

– ‘किंतु यदि बादशाह की हुक्म उदूली इसी तरह होती रही तो रियाया एक दिन मुगलों का हुक्म मानना तो दूर बात सुनना भी बंद कर देगी।’

बादशाह के कोप को देखकर खानखाना सहम गया। आखिर बादशाह के मन में क्या है? क्या करना चाहता है वह?

– ‘हमने आपको काशी का सूबेदार इसलिये नहीं बनाया है कि आप बादशाही हुक्म की तौहीन का समाचार हम तक पहुँचाया करें।’

– ‘क्षमा करें हुजूर! बाबा ने किसी हुक्म की तौहीन नहीं की है। न ही उन्हें किसी तरह का हुक्म दिया गया था।’

– ‘यदि बादशाही हुक्म नहीं सुनाया था तो फिर तुमने उस भिखमंगे से कहा क्या था?

– ‘उन्हें कहा गया था कि बादशाह की ऐसी इच्छा है कि आप उनके दरबार में चलकर मनसब स्वीकार करें।’

– ‘और उसने अस्वीकार कर दिया?’ अकबर क्रोध से फुंकारा।

– ‘हाँ। उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।’

– ‘शब्दों की बाजीगरी से हमें बहलाओ मत खानखाना। बादशाह की इच्छा, बादशाह का प्रस्ताव और बादशाह का हुक्म, ये तीनों बातें एक ही अर्थ रखती हैं।’

खानखाना निरुत्तर हो गया।

– ‘उसे यहाँ पकड़ कर मंगवाओ।’

खानखाना के होश उड़ गये। बादशाह क्या करने को कहता है? कैसे संभव है यह? खानखाना की हिम्मत नहीं हुई कि बादशाह की ओर मुँह उठाकर देख सके। वह चुपचाप धरती में ही दृष्टि गड़ाये रहा।

– ‘तो आप भी बादशाह का हुक्म मानने से मना करते हैं?’

– ‘आप चाहें तो सर कलम कर लें किंतु गुलाम पर हुक्म उदूली की तोहमत न लगायें।’ खानखाना ने किसी तरह हिम्मत करके कहा। उसने आज से पहले बादशाह को अपने ऊपर कुपित होते हुए नहीं देखा था।

– ‘हम जानते हैं कि तुम ही नहीं राजा टोडरमल और राजा मानसिंह भी यह हुक्म नहीं मानेंगे।’

– ‘जिल्ले इलाही जानते हैं कि ये दोनों भी इस गुलाम की तरह मुगलिया तख्त के मजबूत पहरेदार हैं।’

– ‘इसलिये हमने निश्चय किया है कि मुगलिया तख्त के इन पहरेदारों की जगह शहजादे मुराद को इस काम के लिये भेजा जायेगा।’

बादशाह के आदेश से खानखाना सन्न रह गया। वह बादशाह को सलाम बजाकर राजा टोडरमल के दीवानखाने की ओर बढ़ गया। टोडरमल ने राजा मानसिंह, राजा बीरबल और तानसेन को भी अपनी कचहरी में बुलवा लिया। पाँचों राजपुरुषों ने बहुत देर तक माथा पच्ची की किंतु इस समस्या का कोई हल दिखायी नहीं दिया।

एक पखवाड़ा बीतते न बीतते शहजादा मुराद गुसाईंजी को बांधकर आगरा ले आया। पाँचों राजपुरुषों ने गुसाईंजी से मिलने का बहुत प्रयास किया किंतु मुराद ने किसी को भी गुसाईंजी से मिलने की अनुमति नहीं दी। अंत में किसी तरह खानखाना गुसाईंजी तक पहुँचा।

उसने देखा कि कारागार की अंधेरी कोठरी में प्रभूत मात्रा में दिव्य प्रकाश फैला हुआ है। जिसके आलोक में एक भव्य मूर्ति ध्यानमग्न अवस्था में विराजमान है। खानखाना के कदमों की आहट से गुसाईंजी का ध्यान भंग हुआ।

– ‘कौन है?’ गुसाईंजी ने पूछा।

– ‘मैं आपका गुनहगार हूँ बाबा।’ एक आकृति को अपने पैरों में गिरते देखकर गुसाईंजी उठ कर खड़े हो गये। उन्होंने कण्ठ स्वर से पहचाना कि अब्दुर्रहीम है।

– ‘उठो खानखाना।’ गुसाईंजी ने खानखाना को उठा कर छाती से लगा लिया।

– ‘मेरे ही कारण आप इस अवस्था को पहुँचे हैं।’

– ‘कोई किसी के कारण कहीं नहीं पहुँचता मित्र, सब अपने करमों और रामजी की इच्छा से चलायमान हैं।’

दोनों मित्र कारागार की उसी अंधेरी कोठरी में धरती पर बैठ गये। रहीम ने कहा कुछ हरिजस सुनाओ बाबा। प्राणों में बहुत बेचैनी है।

खानखाना के अनुरोध पर गुसाईंजी गाने लगे-

है प्रभु मेरोई सब दोसु।

सीलसिंधु, कृपालु, नाथ अनाथ,  आरत  पोसु।

बेष बचन बिराग मन अब अवगुननि को कोसु।

राम प्रीति प्रतीति पोली,  कपट  करतब  ठोसु।

राग  रंग  कुसंग  हो  सों  साधु संगति रोसु।

चहत केहरि जसहिं सेइ सृगाल  ज्यों  खरगोसु।

संभु सिखवन रसन हूँ नित  राम  नामहिं घोसु।

दंभहू  कलिनाम  कुंभज   सोच  सागर  सोसु।

मोद मंगल मूल अति अनुकूल  निज  निरजोसु।

रामनाम प्रभाव सुनि तुलहिसहु  परम  परितोस।।

-अध्याय 80, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

वानर (81)

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वानर
वानर

आधी रात के बाद सीकरी में हा-हाकार मच गया। जहाँ देखो वहीं लंगूर। महलों, छतों और कंगूरों पर उत्पात मचाते हुए हजारों लंगूर अचानक ही जाने कहाँ से आ गये थे। सैंकड़ों वानर लाल-लाल मुँह के थे तो हजारों काले मुँह के। उनकी लम्बी पूंछों और विकराल दाँतों ने बच्चों और स्त्रियों को ही नहीं हट्टे-कट्टे पुरुषों को भी भय से त्रस्त कर दिया।

देखते ही देखते यह वानर सेना अत्यंत कुपित होकर महलों का सामान इधर से उधर फैंकने लगी। जो कोई साहस करके वानरों को भगाने का प्रयास करता था, वानर सेना उसी को घेर लेती और घूंसों और चपतों से उसकी हालत खराब कर डालती। किसी की कुछ समझ में नहीं आता था कि इन वानरों से कैसे छुटकारा पाया जाये।

निद्रा में खलल पड़ने से बादशाह भी उठ कर बैठ गया। उसने अपनी बंदूक निकाली और वानरों पर गोलियां दागने लगा किंतु यह देाख्कर उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा कि बहुत गोलियां चलाने के बाद भी, एक भी वानर को गोली नहीं लगी।

जाने कितनी देर तक यह उत्पात चलता रहा। आखिर एक वानर बादशाह के हाथ से बंदूक छीनकर ले गया। बादशाह बेबस आदमियों की तरह देखता ही रह गया। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि खानखाना दौड़ता हुआ आ रहा है। उसने कहा- ‘ इन वानरों को रोकना बहुत आवश्यक है जिल्ले इलाही।’

– ‘मगर कैसे? ये तो बन्दूक से भी नहीं मरते!’

– ‘ये बंदूक से नहीं मरेंगे शहंशाहे आलम! इन वानरों का उत्पात रोकने का एक ही उपाय है।’

– ‘तो उपाय करते क्यों नहीं?’

– ‘वह उपाय मेरे वश में नहीं।’

– ‘तो किसके वश में है?’

– ‘वह तो आपके ही वश में है।’

– ‘मैंने उपाय करके देख लिया। इन पर तो बारूद का भी असर नहीं होता।’

– ‘ये क्रुद्ध-विरुद्ध वानर हैं, बारूद से डरने वाले नहीं। ये तो अपने स्वामी के आदेश पर गुसांईजी को मुक्त करवाने आये हैं।’

– ‘कौन गुसांई?’

– ‘वही काशी के बाबा, जिन्हें शहजादे मुराद आपके आदेश से बंदी बना लाये हैं।’

– ‘सच कहते हो?’

– ‘जो आँखों से दिखता है, क्या वह भी सच नहीं है?’

– ‘ठीक है, हम भी उस बाबा को देखेंगे, अभी।’

अकबर उठ कर कारागार को चल पड़ा। खानखाना ने भी बादशाह का अनुसरण किया। थोड़ी ही देर में वे दोनों गुसाईंजी के समक्ष थे।

आगे-आगे अकबर और उसके पीछे-पीछे खानखाना ने कोठरी में प्रवेश किया। एक अद्भुत दृश्य उनके सामने था। अकबर ने देखा, उन्नत भाल पर प्रबल तेजपुंज धारण किये हुए एक गौर वर्ण ब्राह्मण आकाश की ओर हाथ उठाकर गा रहा था-

संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बल बीरा।

जै  जै  हनुमान गुसाईं,  कृपा करहु  गुरुदेव की नाईं।

जाने कैसा आलोक था जो ब्राह्मण के मुखमण्डल से निकल कर पूरी कोठरी में फैल रहा था!

आगंतुकों को देखकर गुसाईंजी ने पाठ रोक दिया।

अकबर ने कहा- ‘ब्राह्मण! जा मैं तुझे स्वतंत्र करता हूँ।’

अकबर का आदेश सुनकर गुसांईजी ने कहा-

‘जो सत बार पाठ करि कोई, छूटहि बंदि महासुख होईं

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा।’[1]

– ‘मैंने सुना है कि तू बड़ा चमत्कारी है और घमण्डी भी।’

– ‘चमत्कारी तो इस सृष्टि को बनाने वाला है सम्राट। हम सब तो उसके संकेत मात्र पर नृत्य करने वाली कठपुतलियाँ हैं। हम अपनी इच्छा से न तो किसी को मनसबदार बना सकते हैं और न कारावास दे सकते हैं।’ एक क्षण रुककर, ‘उमा दारू जोसित की नाईं। सबहि नचावत राम  गुसाईं।’

गुसांईजी ने शांत स्वर से कहा और कारा से बाहर प्रस्थान कर गये। मंत्रमुग्ध सा अकबर उनके पीछे-पीछे आया। कारा से बाहर निकल कर अकबर ने कहा- ‘आप धन्य हैं महात्मा!’

गुसांईजी ने आकाश की ओर देखकर कहा-

‘हौं तो असवार रहौ खर कौ, तेरो ही नाम मोहि गयंद चढ़ायो।’

अकबर ने महल में लौट कर देखा, समस्त वानर महल त्याग कर जा चुके थे।

-अध्याय 81, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने अकबर की जेल से रिहाई के लिये हनुमान चालीसा की रचना की थी।

छत्तीस लाख (82)

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छत्तीस लाख

खानखाना ने उसी समय अपने कोश में से छत्तीस लाख रुपये कवि गंग को प्रदान किये। उस पूरे काल में संभवतः किसी और कवि को इतना बड़ा पुरस्कार नहीं मिला था।

– ‘महाराज जगन्नाथ!’ खानखाना ने अपने दरबार में उपस्थित कवि जगन्नाथ को सम्बोधित करके कहा।

– ‘जी हुजूर!’

– ‘तनिक इस पर पर विचार कीजिये और बताईये कि ये कैसा है?

अच्युतचरण तरंगिणि शशिशेखर-मौलि-मालती माले।

मन  तनु  वितरण-समये   हरता  देया  न मे  हरिता।। [1]

पूरा दरबार कवियों की वाहवाही से गूंज उठा। अब से पहले गंगा मैया पर रहीम ने कोई कविता नहीं पढ़ी थी।

– ‘खानखाना! जब तक कविवर जगन्नाथ आपके पद पर विचार करें, आप इस पद पर गौर फर्मायें।।’ केशवराय ने खड़े होकर जुहार की।

– ‘सुनाइये कविराय। आप भी सुनाईये। हमें मालूम है कि आप हमारी तारीफ की बजाय अपनी तारीफ सुनना अधिक पसंद करेंगे।’ खानखाना ने मुस्कुराकर केवशराय को अनुमति दी।

केशव ने गाया-

अमित  उदार  अति  पाव  विचारि  चारु

जहाँ-तहाँ  आदरियां  गंगाजी  के नीर सों

खलन के घालिबे को, खलक के पालिबे को

खानखानां  एक  रामचन्द्रजी  के तीर सों।।[2]

एक बार फिर पूरा दरबार कवियों की वाहवाही से गूंज उठा।

– ‘खानखाना! अनुमति हो तो हम भी कुछ कहें।’ ये कवि गंग थे।

– ‘आप भी कहें कविवर। आपको कौन रोक सकता हैा!’ खानखाना ने हँस कर कहा।

– ‘तो सुनिए खानखाना। कवि गंग आपकी सेवा में अपना नव रचित छंद प्रस्तुत करता है-

चकित  भँवर रहि गयो  गमन नहिं करत कमलबन

अहि फनि-मनि नहिं लेत तेज नहिं बहत पवन घन।

हँस  सरोवर  तज्यो,  चक्क  चक्की न मिले अति

बहु सुंदरि पद्मिनी,  पुरुष न  चहें  न  करें रति।

खल भलित सेस कवि गंग भनि अतिम तज रवि रथ खस्यो।

खानखान  बैरमसुवन  जि  दिन  कोप  करि  तंग कस्यो।।[3]

कवि गंग ने इतने मधुर स्वर में यह कविता कही कि सुनने वाले मंत्र मुग्ध से कविता के साथ ही बह गये। खानखाना ने कवित्त के भाव, अर्थ और पद लालित्य पर विचार करते हुए उसी समय अपने कोश में से छत्तीस लाख रुपये कविगंग को प्रदान किये। उस पूरे काल में संभवतः किसी और कवि को इतना बड़ा पुरस्कार नहीं मिला था।

-अध्याय 82, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  हे गंगा! जब मेरी मृत्यु हो तो तुम्हारे किनारे पर हो। हे माता! मेरी मृत्यु हो तो मुझे विष्णु का सारूप्य न देना, शिव का सारूप्य देना ताकि तुम मेरे सिर और आँखों पर बनी रहो।

[2] यह कविता अब्दुर्रहीम की प्रशंसा में कही गयी है।

[3]  हे खानखाना! बैरम के पुत्र! जिस दिन तून क्रोध करके अपना तूणीर कसा। उस दिन भौंरा चकित होकर कमलवन को जाना भूल गया। सर्पराज अपने फण पर मणि रखना भूल गया और घनी वायु ने अपनी गति कम कर ली। हंस ने सरोवर त्याग दिया और चकवे तथा चकवी ने अपना मिलन बिसार दिया। पुरुषों ने पद्मिनी स्त्रियों के साथ रति करने से मुँह मोड़ लिया। शेषनाग भी व्याकुल हो गये। कवि गंग कहता है कि सूर्य देव का रथ भी अपने मार्ग से विचलित हो गया।

मुख देखे दुःख उपजत (83)

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मुख देखे दुःख उपजत - www.bharatkaitihas.com
वृंदावन के गुसाईं के साथ संत कुंभनदास

भारतीय संतों को राजाओं, बादशाहों और धनपतियों से कोई काम नहीं होता था अकबर इस बात को समझ नहीं पाया। संत कुंभनदास ने अकबर को लिखकर भिजवाया- जिनको मुख देखे दुःख उपजत तिनको करिबे परी सलाम।

– ‘महाराज! बैरामखाँ को सुअन अब्दुर्रहीम महाराज के श्रीचरनन में कोटि-कोटि प्रणाम निवेदन करि रह्यौ। खानखाना ने अपना मस्तक भूमि पर रखकर कहा।

– ‘बिृंदाबन में तुम्हारौ स्वागत है खानखानाजू।’ संत कुंभनदास ने रहीम को धरती से उठाकर गले लगा लिया।

– ‘भौत दिनन ते इच्छा रही संतन के दरसनन की, सो आज पूरी भईं’ अब्दुर्रहीम ने भरे कण्ठ से कहा।

– ‘चहुं ओर तिहारे नाम की बड़ी चर्चा होय है खानखानाजू!’

खानखाना ने दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाते हुए कहा-

‘रहिमन धोखे भाव ते मुख ते निकसै राम।

पावत पूरन परम गति कामादिक कौ धाम।।’

– ‘ऐसे देव दुर्लभ संस्कार कहाँ ते पाये?’

– ‘बाबा रामदास की हमारे कुल पै बड़ी कृपा हती। उन्हिन के प्रताप ते मो जैसे अधम कूं आप जैसे संतन के दर्शन सुलभ हुयि जायं हैं।’

– ‘बाबा रामदास कौ कुल धन्य भयौ, जो सूरा जैसौ सपूत जन्म्यौ। नेत्र ना हते फिर भी हरि गुन गाय-गाय के तर गयौ।’

– ‘महाराज! एक बिनती हती।’

– ‘तुम आदेस करौ खानखानाजू। हमारे लायक जो कछू काम होयगो हम पूरौ करिंगे।’ संत ने प्रसन्न होकर कहा।

– ‘बादसाह की भौतई इच्छा है कि आप जैसे संत उनन के दरबार में रहैं।’

खानखाना का प्रस्ताव पाकर संत चिंता में डूब गये। बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोले- ‘खानखानजू! तुम तौ ठहरे ज्ञानी। जरा तसल्ली ते बिचार कै बताओ कि बादसाह के दरबार में हम भिखारिन कौ कहा काम परौ?’

– ‘बादसाहन के दरबार में यदि गुनी लोग न रहें तो चाण्डाल अपनौ डेरा जमाय लेंगे। जाते बादसाह कौ तौ पतन हौवेगो ही, परजा भी दुख पावेगी।’

– ‘किंतु भैया आग और पानी का कहा मेल? ऊ ठहरौ बादसाह। दिन रात तरवारि चलावै, लोगन कू मारै। हम रहे भिखारी, भीख मांगैं हरि भजन करैं।’

कुंभनदासजी का उत्तर सुनकर दीर्घ साँस छोड़ते हुए खानखाना ने कहा-

 ‘भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघू भूप।

  रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखो तो एकै रूप।।’

खानखाना के मुखमण्डल पर निराशा छा गयी। वह चाहता था कि अकबर के दरबार में कुछ अच्छे संत और विचारवान् लोग रहें किंतु यह एक विचित्र बात थी कि कोई भी संत सत्ता के निकट नहीं जाना चाहता था जिससे अकबर के दरबार में धूर्तों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जाती थी।

– ‘अच्छा एक बात बताऔ, हम अकब्बर के दरबार में चल कै रहैं, ऐसी इच्छा तुम्हारी रही कै अकब्बर की?’

संत के प्रश्न से खानखाना विचार में पड़ गया। बहुत सोच विचार कर

बोला- ‘बादसाह की।’

  – ‘तौ तुम सीकरी जाय कें अकब्बर ते यों कहियौं कि कुंभनदास ने कहलवाई है कि-

भगत कौ कहा सीकरी सों काम!

आवत  जात  पनैहा  टूटी,  बिसरि गयौ हरि  नाम।

जाको मुख देखे दुख उपजत, ताकों करन परी परनाम।

कुंभनदास  लाल  गिरधर  बिन  यह सब झूठौ धाम।

खानखाना संत के चरणों की मिट्ठी सिर से लगाकर उठ गया।

-अध्याय 83, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

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