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प्रजापालन (67)

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प्रजापालन

राजा के मंत्री ही राजा की ओर से प्रजापालन , प्रजा का अनुशासन और उसकी सार-संभाल करते हैं। जिस राजा के सचिव, सहायक और सेवक प्रजा को दुख देते हैं, उस राजा का नाश हो जाता है और प्रजा पीड़ित होती है।

अतिथियों के भोजन के बाद चारों व्यक्ति तसल्ली से बैठे। किसी को किसी तरह की शीघ्रता न थी।

– ‘हमने सुना है कि राजाजी ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध बड़ी वीरता दिखायी।’ गुसांईंजी ने मानसिंह की ओर देखते हुए कहा।

गुसांईंजी के कथन से मानसिंह के मुख की आभा जाती रही, उसका कण्ठ सूख गया। वह कुछ नहीं बोल सका।

– ‘कहिये! क्या राणा ने अधीनता स्वीकार कर ली?’ गुसाईंजी ने फिर प्रश्न किया।

– ‘नहीं! वे स्वाभिमानी हैं, वे जान दे देंगे किंतु पराधीनता स्वीकार नहीं करेंगे।’ राजा मानसिंह ने किसी तरह प्रत्युत्तर दिया।

– ‘सुना है महाराणा ने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया!’ गुसांईंजी ने फिर प्रश्न किया।

– ‘महाराणा ने वीरोचित व्यवहार ही किया है गुसांईंजी! दुर्भाग्य मेरा है, मैं ही उचित सत्कार के योग्य नहीं हूँ।’ 

– ‘अपने आप को उचित सत्कार के योग्य बनाओ राजाजी।’

– ‘मैं प्रयास करता हूँ किंतु यह मेरे बूते से बाहर की बात है।’

– ‘बूता तो रघुवीरजी देंगे। आप उनसे बूता मांग कर तो देखिये किंतु बूता मांगने से पहले बंधु के साथ विग्रह का भाव त्यागना होगा।’

– ‘मेरा उनसे कोई विग्रह नहीं। मैं तो कर्त्तव्य पालन के लिये ही उनके सामने हथियार उठाता हूँ।’

– ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अकर्त्तव्य को ही कर्त्तव्य समझ बैठे हैं?’

– ‘मेरी तुच्छ बुद्धि मुझे कोई निर्णय नहीं करने देती।’

– ‘जो सहजता से उपलब्ध है, उसे स्वीकार कर लेने की लालसा हमें बुद्धि से काम ही नहीं करने देती।’

– ‘मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ गुसाईंजी।’

– ‘बंधु द्रोह भयानक पाप है राजन्। मनुष्य को इस पातक से बचने के लिये प्राण देकर भी प्रयास करना चाहिये। जो अबंधु है, जो रिपु है, जो हरिविमुख है, उस पर कोप करने की सामर्थ्य और इच्छा पैदा करो। अन्यथा जीवन में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा।’

मानसिंह ने धरती पर माथा टिका दिया। उसके नेत्रों से जलधार बह निकली। गुसाईंजी ने बड़े स्नेह से उसके माथे पर हाथ फिराया।

– ‘कहिये राजा टोडरमल! आपके राज्य में जनता सुख से तो है?’ गुसाईंजी ने प्रौढ़ वयस स्थूलाकाय अतिथि को सम्बोधित करके पूछा।

– ‘राज्य शहंशाह अकब्बर का है महात्मन्। मैं तो उनका अकिंचन सेवक हूँ।’ राजा टोडरमल ने सिर झुका कर उत्तर दिया।

– ‘राजा के मंत्री ही राजा की ओर से प्रजा का अनुशासन और उसकी सार-संभाल करते हैं। जिस राजा के सचिव, सहायक और सेवक प्रजा को दुख देते हैं, उस राजा का नाश हो जाता है और प्रजा पीड़ित होती है। आप राज्य के वित्त और अर्थ सचिव हैं। आपका उत्तरदायित्व तो सर्वाधिक है।’

– ‘सचिव के अधिकार की सीमा और अपनी सामर्थ्य भर तक तो मैं प्रजा पालन का प्रयास करता ही हूँ महात्मन्।’

– ‘इस समय भारत वर्ष की जनसंख्या कितनी है?’

– ‘सिंधु नदी से बंगाल के समुद्र तक तथा हिमालय से सेतुबंध रामेश्वरम् तक लगभग बारह करोड़ जन निवास करता है।’

– ‘उसमें से कितनी प्रजा मुगल साम्राज्य के अधीन है?’

– ‘लगभग दस करोड़ महात्मन्।’

– ‘मुगल साम्राज्य में मंत्रियों, सचिवों तथा उच्चाधिकारियों की संख्या कितनी है?’

– ‘कुल मिलाकर यही कोई आठ हजार मनसबदार होंगे।’

– ‘राजकीय कोश का कितना हिस्सा इन मनसबदारों में बँटता है?’

– ‘साम्राज्य की कुल आय का इकरानवे प्रतिशत इन मनसबदारों में बँट जाता है।

– ‘इन आठ हजार मनसबदारों में से सम्राट, राजपुत्रों तथा सचिवों आदि उच्च अधिकारियों की संख्या कितनी है?’

– ‘एक हजारी जात और उनसे ऊपर के मनसबदारों की संख्या चार सौ पैंतालीस है।’

– ‘उन पर राजकीय आय का कितना प्रतिशत व्यय होता है?’

– ‘यही कोई इकसठ प्रतिशत।’

– ‘सम्राट और राजपुत्रों की संख्या कितनी है?’

– ‘बादशाह तथा उसके शहजादों सहित प्रथम श्रेणी के कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों तथा रईसों की संख्या अड़सठ है।’

– ‘इनके ऊपर कितना खर्च होता है?’

– ‘लगभग सैंतीस प्रतिशत।’

– ‘शेष आय का क्या होता है?’

– ‘इसमें से अधिकांश राशि काजियों, उलेमाओं, खतीबों, मुहतसिबों, मुफ्तियों, सद्रों तथा तथा फकीरों में बँट जाती है।’

– ‘यह सारा धन आता कहाँ से है?’

– ‘प्रजा से विभिन्न प्रकार के करों के रूप में प्राप्त होता है।’

– ‘क्या इसके अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्राट अथवा उसके अधिकारियों के पास धन नहीं आता?’

– ‘युद्ध में लूटा गया धन बादशाह तथा उनके सैनिकों को प्राप्त होता है। उसे राजकीय कोष में जमा नहीं करवाया जाता। इसलिये उसका कोई हिसाब नहीं है।’

– ‘भारतवर्ष की जिस प्रजा से विपुल कर लेकर आप इतना धन एकत्र करते हैं, उसका कितना प्रतिशत प्रजा के हितार्थ व्यय किया जाता है?’

– ‘बादशाह, शहजादों तथा मनसबदारों को जो धन दिया जाता है, वह समस्त धन प्रजा के रक्षण हेतु सैन्य जुटाने में व्यय होता है।’

– ‘सम्राज्य विस्तार हेतु किया गया सैन्य व्यय प्रजा के रक्षण के लिये कैसे माना जा सकता है?’

– ‘प्रजा रक्षण एवं साम्राज्य विस्तार साथ-साथ ही चलते हैं प्रभु।’

– ‘जो सैन्य स्वयं ही प्रजा को लूटता फिरता हो, उनकी सम्पत्ति, गौ तथा स्त्रियों का हरण करता हो। उससे किस प्रकार के प्रजा रक्षण की अपेक्षा है आपको?’ गुसाईंजी ने किंचित् रुष्ट होकर पूछा।

राजा टोडर मल गुसाईंजी की खिन्नता देखकर सहम गया। उसके मुँह से कोई शब्द तक न निकल सका।

– ‘सत्य तो यह है राजाजी कि सम्राट, राजपुत्रों तथा सामंतों के भोग से बचा हुआ अधिशेष सैनिकों के सामने फैंका जाता है। इस उच्छिष्ट से सैनिकों का उदर नहीं भरता। उन्हें विवश होकर प्रजा में लूट मार करनी पड़ती है। इसमें आपका दोष नही है क्योंकि म्लेच्छ सम्राट के राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार यही है।’

गुसाईंजी क्षण भर के लिये मौन रहे और फिर एक लम्बी साँस लेकर बोले-

”किसबी किसान कुल, बनिक भिखारी भाट,

चाकर  चपल  नट,  चोर,  चार,  चेटकी।

पेट को  पढ़त,  गुन  गढ़त,  चढ़त  गिरि,

अरत   गहन-गन,   अहन   अखेट  की।

ऊँचे  नीचे  करम  धरम   अधरम   करि,

पेट  को  ही  पचत,  बेचत  बेटा  बेटकी।

तुलसी  बुझाई  एक  राम  घनश्याम ही तें,

आग  बड़वागि  ते  बड़ी है  आग पेट की।

दारिद  दसानन  दबाई,   दुनी  दीन  बंधु।

दुरित  दहन   देखि   तुलसी  हहा  करी।”

कुटिया में निस्तब्धता छा गयी। कुछ समय पश्चात् गुसांईजी ने ही मौन तोड़ा- ‘आप लोग राज पुरुष हैं किंतु क्या इस सत्य से परिचित हैं कि आज प्रजा के मन में सत्ता के सत्य का अनुभव जितना गहरा है, उससे भी अधिक गहरा अनुभव सत्ता की व्यर्थता का है। किसान कारीगर, और सामान्य प्रजा भुखमरी अनिश्चय और सैन्य शोषण से त्रस्त है।

सम्राट के पापों का दण्ड प्राकृतिक आपदाओं के रूप में फलित होता है। प्रजा दिन रात हाड़ तोड़ परिश्रम करके किसी तरह अपने आप को जीवित रखे हुए है। बहुत से लोग घर बार छोड़कर योगियों, मुनियों, साधुओं, संतों, सिद्धों, तांत्रिकों तथा उदासीन तापसों के वेश धारण करके भिखारी बने हुए घूमते हैं।

इनकी लूट पाट से त्रस्त प्रजा का विश्वास धर्म में से उठता जा रहा है। बड़ी संख्या में उत्पन्न पण्डों, पुरोहितों, पुजारियों और ज्योतिषियों ने भी प्रजा से धन ऐंठने के ना-ना उपाय ढूंढ निकाले हैं। लोगों की आस्था धर्माचारण से उठती जा रही है।

कुटिया के बाहर रात गहराती जा रही थी और भीतर मौन।

-अध्याय 67, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

अयोग्य शिष्य (68)

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अयोग्य शिष्य

खानखाना अब्दुर्रहीम अच्छी तरह जनता था कि शहजादा सलीम एक ऐसा अयोग्य शिष्य है जिसे कभी भी पढ़ा-लिखा कर इंसान नहीं बनाया जा सकता।

कच्छवाहों की राजकुमारी जोधाबाई से निकाह करके अकबर ने उसे मरियम उज्जमानी नाम दिया और उसे शाह-बेगम घोषित किया। उससे उत्पन्न पुत्र सलीम का नामकरण सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर किया गया।

सलीम का नामकरण भले ही सूफी संत के नाम पर किया गया था किंतु वह बहुत जिद्दी और क्रूर प्रवृत्ति का बालक था। उसकी शिक्षा के लिये कई शिक्षकों को नियुक्त किया गया किंतु वे इस दुष्ट बालक को नहीं पढ़ा सके। अंत में अकबर ने अब्दुर्रहीम को इस कार्य के लिये चुना।

जब अब्दुर्रहीम को शहजादा सलीम का अतालीक बनाया गया तो उसने बादशाह का आभार जताने के लिये बड़ा भारी जलसा किया। बादशाह अपने तमाम अमीर-उमरावों और शहजादों सहित रहीम के डेरे पर हाजिर हुआ और दिल खोलकर मिर्जाखाँ की तारीफ में कसीदे पढ़े।

अब्दुर्रहीम ने अकबर की इच्छानुसार जिद्दी बालक सलीम का समुचित शिक्षण प्रारंभ किया तथा बालक के शारीरिक, बौद्धिक एवं मानसिक विकास का हर संभव प्रयास किया किंतु सलीम भी शिक्षा के मामले में अपने बाप अकबर का ही अनुकरण करने वाला सिद्ध हुआ।

जिस प्रकार हुमायूँ के लाख चाहने पर भी अकबर ने विधिवत् शिक्षा नहीं ली, उसी प्रकार सलीम भी पढ़ाई लिखाई से दूर ही रहा। भाग्य की यह विचित्र विडम्बना ही थी कि अकबर को बैरामखाँ जैसा और सलीम को अब्दुर्रहीम जैसा अद्भुत शिक्षक मिला किंतु वे अच्छी शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके।

सलीम की अयोग्यता को देखकर अब्दुर्रहीम ने माथा पीट लिया किंतु फिर भी उसने किसी तरह सलीम को फारसी, तुर्की तथा हिन्दी भाषाओं का ज्ञान करवाया और हिन्दी तथा फारसी में कविता लिखना भी समझाया। उसे घुड़सवारी और तलवारबाजी का भी ज्ञान करवाया।

जब सलीम पंद्रह साल का हुआ तो उसका विवाह कच्छवाहा राजकुमारी मानबाई से करवा दिया गया। इसके बाद तो सलीम का मन शिक्षा से पूरी तरह हट गया। उधर खानखाना भी मुगलिया सल्तनत का दक्षिण भारत में प्रसार करने में जुट गया तो उसके पास सलीम को पढ़ाने का समय न रहा।

अब्दुर्रहीम के दूर हटते ही सलीम बुरे लोगों की संगत में पड़ गया और उसने अब्दुर्रहीम की शिक्षाओं को भुलाकर एक क्रूर इंसान का रूप ले लिया। उसके हरम में स्त्रियों की संख्या बढ़ने लगी जो शीघ्र ही आठ सौ तक जा पहुँची। दिन भर हिंजड़े, गवैये और नचकैये सलीम के हरम में धमाल मचाये रहते। सलीम इनके साथ दिन-रात शराब पीता और शिकार खेलने जाता।

नियति ने भारत वर्ष के साथ कैसा क्रूर मजाक किया था, इस संस्कारहीन, अमर्यादित शराबी के भाग्य में विधाता ने भारत का भाग्य विधाता होने के अंक लिखे थे।

-अध्याय 68, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

कविता का व्याकरण (69)

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कविता का व्याकरण

खानखाना अच्छी तरह समझता था कि जीवन रूपी कठोर कविता का व्याकरण और चाटुकारिता से भरी हुई कविता का व्याकरण कितने अलग होते हैं।

शहजादे का अतालीक मुकर्रर किये जाने से अब्दुर्रहीम के रुतबे और ख्याति में एकाएक ही बहुत वृद्धि हुई। अब्दुर्रहीम की विद्वता की ख्याति सुनकर उसके दरबार में दुनिया भर के लोग जुटने लगे जिनमें कवियों की संख्या सर्वाधिक थी। हिन्दुस्थान, ईरान, तूरान तथा ख्वारिज्म के लगभग तीन सौ कवि निरंतर उसके दरबार में उपस्थित रहते।

अब्दुर्रहीम स्वयं भी तुर्की, फारसी, अरबी, हिन्दी, संस्कृत अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं का जानकार था। उसने ग्यारह वर्ष की आयु में बिना गुरु की सहायता से पहली काव्य रचना की थी तब से उसकी कविता में निखार आता ही गया था। अकबर ने फ्रांस और यूरोपीय देशों से पत्राचार करने का जिम्मा रहीम पर ही छोड़ रखा था जिससे उन देशों के लोग भी जब रहीम से मिलने आते तो रहीम को खुश करने के लिये अपने देश के कवियों की कवितायें सुनाया करते।

वास्तव में उन दिनों अकबर के दरबार तक पहुँचने का मार्ग अब्दुर्रहीम के दरबार से होकर गुजरता था। उस काल में शासक वर्ग के पास बज्म[1]  और रज्म[2]  को छोड़कर और कोई काम न था। इसलिये कविगण भी अधिकतर अपने आकाओं को खुश करने वाली, स्त्रियों के अंग लास्य का वर्णनातीत वर्णन करने वाली तथा हर तरह से अपने स्वामियों का मनोरंजन करने वाली कवितायें ही अधिक कहते थे। दर्शन और नीति से रहित उन कविताओं में चाटुकारिता का ही भाव अधिक होता था।

इन बेस्वाद कविताओं का व्याकरण रहीम के मन को किंचित् भी रास नहीं आता था और कभी-कभी तो उसका मन दरबारी व्याकरण वाली कविताओं से पूरी तरह से उचाट हो जाता था फिर भी यदि रहीम को कवियों के बीच बैठना सुहाता था तो केवल इसलिये कि रहीम को पूरा विश्वास था कि यदि धरती से खून-खराबे का दौर कभी समाप्त होगा तो इन्हीं कवियों के दम पर। उन दिनों बहादुरी दिखाने वाले और दान देने वाले तो फिर भी मिल जाते थे किंतु कवियों और कविताओं का सम्मान करने वालों का पूरी तरह अभाव था।

चाटुकार कवियों के साथ-साथ गंग, केशवदास[3]  मंडन तथा चामुंडराय जैसे कविता के वास्तविक मर्म को जानने वाले कवि भी रहीम के दरबार में आने लगे थे। इन कवियों की कृपा से रहीम के पुस्तकालय में पूरी दुनिया के कवियों की कविताओं का संग्रह होने लगा था जिनकी नकलें उतारने और संभाल कर धरने के लिये तीन सौ से अधिक आदमी रहीम के पुस्तकालय में लगे रहते थे। रहीम का पुस्तकालय उस समय हिन्दुस्थान का सबसे बड़ा पुस्तकालय था। कवियों के साथ चित्रकारों, गवैयों और संगीतकारों का भी अच्छा जमावड़ा होने लगा था।

वस्तुतः इन सब उपायों से रहीम ने अपने समय की मुख्य धारा को ही बदल दिया। वह समय धरती का सबसे बड़ा तोपखाना खड़ा करने, हाथियों की सबसे बड़ी फौज संगठित करने, राज्य सीमाओं का विस्तार करने और निर्दोषों का खून बहाने की मिसालें कायम करने का था किंतु रहीम ने भारत का सबसे बड़ा कवि दरबार जोड़कर, सबसे बड़ा पुस्तकालय स्थापित कर और गवैयों तथा चित्रकारों को प्रश्रय देकर अपने बाप दादों का पुराना ढर्रा ही बदल दिया था। इस तरह वह स्वयं एक आदमी न रहकर सांस्कृतिक प्रतिष्ठान बन गया था।

इन सबसे अलग और बड़ी बात तो यह थी कि वह अपने दरबार के समस्त कवियों से अलग था और उसने अपना सुर उस समय की कवि परम्पराओं से न मिलाकर धूल, गरीबी और मुसीबतों में लिपटे गाँवों की गलियों में भटकने वाले कवियों और गवैयों से मिलाया। उसकी कविता में गरीब के आँसू थे जिनका व्याकरण अभावों और मुसीबतों में गढ़ा गया था।

-अध्याय 69, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1]  आमोद-प्रमोद।

[2]  युद्ध।

[3] ये महाकवि बिहारी के पिता थे।

जुआ (70)

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जुआ

मिर्जा खाँ को रणक्षेत्र से बाहर खींच ले जाने का प्रयास करने वाले उसके शुभचिंतक सैनिक नहीं जानते थे कि मिर्जा खाँ आज सेनापति नहीं था, जुआरी था, जिसने पराये हाथों में थमे पासों पर अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था। हर हालत में उसे जुआ खेलना ही अभीष्ट था, पक्के जुआरी की तरह, हारे चाहे जीते।

गुजरात के सुलतान मुजफ्फर खाँ को बादशाह अकबर कैद करके अपने साथ आगरा ले आया था किंतु कुछ दिनों बाद ही वह अकबर के नमक हराम नौकरों को अपनी और मिलाकर कैद से भाग निकलने में सफल हो गया और फिर से बड़ी भारी फौज एकत्र करके उसने लगभग पूरे गुजरात पर दखल जमा लिया। अहमदाबाद में बैठकर मुजफ्फर खाँ ने मुल्क में अपने नाम की दुहाई फेर दी। इससे अकबर की बड़ी किरकिरी हुई।

दुबारा मुजफ्फर खाँ के पीछे जाना अकबर अपनी शान के खिलाफ समझता था। एक से एक बड़ा सेनापति अकबर की सेवा में हाजिर था किंतु वह इस मोर्चे पर किसी विश्वसनीय आदमी को ही भेजना चाहता था। बहुत सोच विचार करने के बाद अकबर ने मिर्जा खाँ अब्दुर्रहीम को यह जिम्मा सौंपा। रहीम के साथ दस हजार सैनिकों की फौज भेजी गयी।

जब रहीम यह फौज लेकर मेड़ता के पास पहुंचा तो मुजफ्फर खाँ ने पट्टन में टिके हुए मुगल सेनापति कुतुबुद्दीन को मार डाला और आगे बढ़कर भंड़ूचमें भी भारी तबाही मचाई। अब्दुर्रहीम ताबड़तोड़ चलता हुआ पाटन पहुँचा। वहाँ पहुंचकर उसका उत्साह ठण्डा पड़ गया। उसे ज्ञात हुआ कि इस समय मुजफ्फर खाँ के पास चालीस हजार घुड़सवार और एक लाख पैदल सेना है।

भाग्य रहीम को एक बार फिर से आगरा से गुजरात खींच ले आया था और बहुत दूर से कबड्डी दे रहा था। यह वही गुजरात था जो पहले भी दो बार रहीम का जीवन पूरी तरह से बदल चुका था। रहीम को लगा कि इस बार की चुनौती पहले की तमाम चुनौतियों से किसी भी तरह कम विषम नहीं थी। इस चुनौती को जीत पाना आसान नहीं था, चारों ओर मौत का ही सामान सजा हुआ था। 

अब्दुर्रहीम के दस हजार सैनिक तो मुजफ्फर खाँ के अजगर रूपी सैन्य के मुँह में मेमने की तरह पिस कर मरने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते थे। मिर्जाखाँ रहीम को उसके आदमियों ने सलाह दी कि मालवा से मुगल लश्कर मंगवा लिया जाये तभी मुजफ्फर खाँ पर हाथ डाला जाये।

इस पर मिर्जा खाँ के मंत्री दौलत खाँ लोदी ने रहीम को गुप्त सलाह दी कि यदि वह अपने पिता की तरह भाग्य पलटना चाहता है तो बड़ा खतरा मोल ले। मालवा की सेना के आने पर युद्ध जीता गया तो उसका श्रेय अकेले रहीम को नहीं मिलेगा। उसमें दूसरे सेनापतियों का हिस्सा होगा।

मिर्जा खाँ को अपने मंत्री की बात जंच गयी और वह अपने दस हजार आदमियों के दम पर ही इस लड़ाई को जीतने की तैयारी करने लगा। उसने अपनी सेना के सात टुकड़े किये और उन्हें इस तरह समायोजित किया जिससे जरूरत पड़ने पर इन अंगों को आसानी से जोड़ा एवं अलग किया जा सके। स्वयं इस लश्कर के केंन्द्र में स्थित रहकर उसने हिन्दू राजाओं को अपने बांयी ओर तथा मुस्लिम सेनापतियों को दांयी ओर रखा। इसके बाद उसने गुजरात की ओर प्रस्थान किया।

जब मुजफ्फर खाँ को ज्ञात हुआ कि अब्दुर्रहीम सात सेनाएं लेकर आ रहा है तो वह अहमदाबाद में आ टिका और अब्दुर्रहीम की प्रतीक्षा करने लगा। अब्दुर्रहीम अहमदाबाद के बाहर मानपुर में आकर ठहर गया। दोनों ओर की सेनाएं एक दूसरे की वास्तविक ताकत को तोलने में लग गयीं।

इसी बीच रहीम ने एक नाटक खेला। उसने अपने कुछ विश्वस्त आदमियों को एक नकली फरमान बादशाह की ओर से बनाकर दिया और उन्हें चुपचाप आगरा की तरफ कुछ दूर चले जाने को कहा। फिर रहीम खुद ही बहुत सारे आदमी अपने साथ लेकर उनके पीछे गया और गाजे बाजे के साथ उन्हें अगवानी करके लौटा लाया। रहीम के नौकरों ने निर्धारित योजना के अनुसार बादशाह का नकली फरमान रहीम की सेवा में पेश किया।

सारी सेना के बीच यह नकली फरमान जोर-जोर से पढ़कर सुनाया गया। इस फरमान में बादशाह ने लिखा था कि हम आते हैं, हमारे पहुँचने तक लड़ाई मत करना।

यह फरमान सुनकर सारी सेना मारे प्रसन्नता के नाच उठी तथा उत्साह में भर कर सरखेज की तरफ आगे बढ़ गयी और अहमदाबाद के बाहर साबरमती के तट पर जाकर टिक गयी, जिस तरफ मुजफ्फरखाँ की फौज पड़ाव किये हुए थी। मुजफ्फरखाँ ने यह सुनकर कि बादशाह स्वयं फौज लेकर आ रहा है, बादशाह के आने से पहले से ही रहीम की सेना को नष्ट करने का विचार किया।

उसने काफी दूर जाकर नदी पार करने तथा रहीम की सेना पर पीछे से वार करने की योजना बनायी। इस पर रहीम ने राय दुर्गा को मुजफ्फरखाँ की सेना को पीछे से रोकने के लिये नियुक्त किया और जब मुजफ्फरखाँ की आधी सेना नदी पार करने के लिये आगे बढ़ गयी तब रहीम अपनी बाकी की छः सेनाओं को लेकर मुजफ्फरखाँ पर जा चढ़ा। इससे मुजफ्फरखाँ की सेना में भ्रम फैल गया तथा सेना के दो टुकड़े हो गये।

दिन चढ़े तक लड़ाई होती रही। भयानक मारकाट मची जिसमें अब्दुर्रहीम के ठीक सामने ढाल की तरह अड़े हुए सैनिकों का पूरी तरह चूरा हो गया। हरावल और एलतमश के पैर टूट जाने पर अब्दुर्रहीम की जान पर बन आयी। उसके आस-पास केवल एक सौ हाथी और तीन सौ घुड़सवार रह गये।

मुजफ्फर खाँ इनके ठीक सामने अपने सात हजार सैनिकों के साथ जमा हुआ था। रहीम को इस विपन्न अवस्था में देखकर वह आगे बढ़ा। पक्के जुआरी की तरह रहीम इस स्थिति से निबटने के लिये पहले से ही तैयारी कर चुका था। उसने महावतों को आदेश दिया कि बिना कुछ भी देखे हुए जितनी तेजी से हो सके, उतनी तेजी से अपने हाथियों को आगे की ओर हूलते रहें और जहाँ तक हो सके ज्यादा से ज्यादा संख्या में दुश्मन के सैनिकों को रौंदते रहें।

दुश्मन ठीक छाती पर चढ़ आया। जिस प्रकार समंदर की लहरों को गिन सकना संभव नहीं है उसी प्रकार इस दुश्मन से भी पार पाना संभव जान नहीं पड़ता था किंतु अब कुछ नहीं हो सकता था। दांव खेला जा चुका था। अब तो केवल परिणाम ही जानना शेष था। एक बार तो ऐसी नौबत आयी कि मिर्जाखाँ के आदमियों ने मिर्जा खाँ के घोड़े की लगाम पकड़ ली और उसे जबर्दस्ती खींचकर मैदान से बाहर ले जाने लगे।

मिर्जा खाँ को रणक्षेत्र से बाहर खींच ले जाने का प्रयास करने वाले उसके शुभचिंतक सैनिक नहीं जानते थे कि मिर्जा खाँ आज सेनापति नहीं था, जुआरी था, जिसने पराये हाथों में थमे पासों पर अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था। हर हालत में उसे जुआ खेलना ही अभीष्ट था, पक्के जुआरी की तरह, हारे चाहे जीते। उसने सैनिकों के हाथ से अपने घोड़े की रास छुड़ा ली और घोड़े को ऐंड़ लगाकर तेजी से आगे बढ़ गया।

ठीक उसी समय रहीम की युक्ति काम कर गयी। रहीम के हाथियों ने मुजफ्फर खाँ की सेना को कुचल कर रख दिया। मुजफ्फर खाँ का तोपखाना आगे वाली सेना ले जा चुकी थी, बची हुई सेना हाथियों को रोकने में असमर्थ सिद्ध हुई। फतह हासिल करने का वक्त आ पहुंचा था। रहीम और उसके आदमी दुगने जोश से तलवार चलाने लगे।

यह विशुद्ध जुआ था जो मिर्जा खाँ ने भाग्योत्थान के लालच में खेला था। इसका परिणाम कुछ भी हो सकता था। भाग्यलक्ष्मी उस पर रीझी हुई थी, उसने मिर्जा खाँ के पक्ष में जीत का नया पन्ना लिख दिया। मुजफ्फर खाँ मात खाकर राजमहेन्द्र की ओर भागा।

भागते हुए सैनिकों का पीछा करने के बजाय रहीम पलट कर खड़ा हो गया और नदी पार करके आने वाली मुजफ्फर खाँ की अग्रिम सेना की प्रतीक्षा करने लगा।

उधर जब मुजफ्फर खाँ की अग्रिम सेना ने नदी पार की, तब उसे समाचार मिला कि मुजफ्फर खाँ परास्त होकर राज महेंद्र की ओर भाग गया है तब वह सेना भी आगे बढ़ने के बजाय फिर से नदी पार करके भाग खड़ी हुई। राय दुर्गा प्रतीक्षा ही करता रह गया।

विजय की प्रसन्नता में रहीम ने अपने बचे खुचे सैनिकों को इकठ्ठा किया और अपना सर्वस्व उनमें बाँट दिया। आखिर में एक सिपाही मिर्जा खाँ की सेवा में हाजिर हुआ। उसे कुछ नहीं मिला था लेकिन तब तक रहीम का सर्वस्व बँट चुका था। मिर्जा खाँ ने अपने डेरे में निगाह घुमाई, वहाँ एक कलमदान के अतिरिक्त कुछ न रह गया था। रहीम ने सिपाही को कलमदान देकर कहा कि आज तो यही ले जाओ मौका आने पर, इस कलमदान के बदले में जो जी चाहे ले जाना।

जब मिर्जा खाँ की जीत का समाचार आगरा पहुँचा तो अकबर ने मिर्जा खाँ का को खानखाना का खिताब, एक भारी खिलअत तथा पाँच हजारी मनसब बख्शा और रहीम के आदमियों के भी मनसब बढ़ाये।

-अध्याय 70, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

नोपकृतं (71)

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नोपकृतं

प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु,  मित्रेषु बंधुवर्गेषुं। नोपकृतं  नोपकृतं  नोपकृतं  कि कृतं तेन।। अर्थात्- जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का क्रमशः उपकार, उपकार और उपकार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

गुजरात विजय के उपलक्ष्य में खानखाना बनाये जाने पर अब्दुर्रहीम दिल्ली दरबार में उपस्थित हुआ और उसने बादशाह के प्रति आभार का प्रदर्शन किया। बादशाह ने उसकी सेवाओं की प्रशंसा की और उसे फिर से मोर्चे पर लौट जाने के आदेश दिये।

अब्दुर्रहीम को खानखाना बनाये जाने के उपलक्ष्य में अब्दुर्रहीम के महलों में भारी उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर अमीरों, उमरावों और हिन्दू नरेशों के साथ-साथ बड़ी संख्या में कवि, गवैये और चित्रकार भी उपस्थित हुए। दिल्ली में इस समारोह की धूम मच गयी।

वैसे भी नये, पुराने, अनाड़ी और मंजे हुए कवि अब्दुर्रहीम के समक्ष आने के लिये हर समय उत्सुक रहते थे तथा उसेे अपनी कविताएं सुनाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे। वे अपनी कविताएं रहीम को सुनाते और अब्दुर्रहीम से प्रशंसा तथा पुरस्कार पाकर अपनी उन्नति का मार्ग खोलने की चेष्टा  करते थे। इस अवसर पर जगन्नाथ त्रिशूली ने एक श्लोक रहीम के दरबार में उपस्थित कवियों के सामने सुनाया-

प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु, मित्रेषु बंधुवर्गेषुं।

नापकृतं नोपकृतमं न सत्कृतं कि कृत तेन।।[1]

दरबार में उपस्थित कवियों ने युवा कवि जगन्नाथ की बड़ी प्रशंसा की लेकिन रहीम कुछ चिंतत हो गये।

– ‘क्या बात है, खानखाना को श्लोक ठीक नहीं लगा?’ युवा कवि ने सहमते हुए पूछा।

– ‘श्लोक बहुत सुंदर है किंतु कवि यदि अनुमति दे तो मैं इसमें कुछ संशोधन करना चाहता हूँ।’ अब्दुर्रहीम ने कहा।

– ‘यदि खानखाना स्वयं मेरी कविता में सुधार करेंगे तो यह मेरा सौभाग्य होगा।’ जगन्नाथ त्रिशूली ने कहा।

– ‘तो फिर इस श्लोक को इस तरह पढ़ो कवि-

प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु,  मित्रेषु बंधुवर्गेषुं।

नोपकृतं  नोपकृतं  नोपकृतं  कि कृतं तेन।।[2]


[1]  जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का (क्रमशः) अपकार, उपकार और सत्कार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

[2] जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का क्रमशः उपकार, उपकार और उपकार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

-अध्याय 71, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

बनी के राना (72)

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बनी के राना

तुम जंगल के सेर बनी के राना । बड़ेन  की  चाल  बड़ेन पहचाना ।।

– ‘अब्बा हुजूर, फिर क्या हुआ?’ जाना ने पिता के कंधे पर मुक्का मारा।

– ‘अरे कब क्या हुआ?’ खानखाना ने पूछा।

– ‘अरे कल जो कहानी आप हमें सुना रहे थे, उसमें आगे क्या हुआ?’

– ‘हम कल कौनसी कहानी सुना रहे थे?’

– ‘हम कल कौनसी कहानी सुना रहे थे? इतना भी याद नहीं रहता?’ जाना ने पिता की नकल उतारते हुए कहा।

– ‘हाँ भई! नहीं रहता।’

– ‘अरे वो जंगल के सेर वाली।’

– ‘सेर नहीं शेर।’

– ‘लेकिन आप ही ने तो कल सेर बोला था।’

– ‘अरे वह तो कविता में ऐसे कह सकते हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि शेर हमेशा के लिये सेर हो जायेगा।’

– ‘अच्छा अब्बा हुजूर! अब मैं शेर ही बोलूंगी, सेर नहीं। आप आगे की कहानी तो सुनाइये।’

– ‘हाँ तो कल हम कहाँ थे?’

– ‘हम तो यहीं थे, अपने डेरे में।’

– ‘डेरे में तो थे किंतु कहानी में कहाँ थे?’

– इसे क्या मालूम, ये तो सो गयी थी।’ ऐरेच ने कहा।

– नहीं! मैं सोयी नहीं थी, मुझे सब याद है।

– अच्छा बताओ तो तुम्हें क्या याद है?’

– ‘आप ने कहा था कि जब सियार ने जुलाहे को कंधे पर कपास धुनने का धुना और हाथ में कमानी लेकर जाते हुए देखा तो सियार ने सोचा कि यह कोई शिकारी है और शिकार मारने के लिये जंगल में आ रहा है। सियार ने सोचा कि यह कहीं मुझ पर ही तीर न मार दे इसलिये खुशामद से इसको खुश किया जाये।’

– ‘हाँ-हाँ! मैंने कल यहाँ तक ही कहानी सुनायी थी कि मियाँ फहीम आ गये थे हमें शिकार पर ले जाने के लिये।’

– ‘अब्बा हुजूर! ये खुशामद क्या होता है?’

– ‘जब किसी को प्रसन्न करने के लिये झूठी सच्ची तारीफ की जाती है तो उसे खुशामद कहते हैं। जैसे हम तुम्हारी खुशामद करते रहते हैं।’ खानखाना ने बेटी के गाल पर चपत लगाते हुए कहा।

– ‘अब्बा हुजूर! ये जाना तो बस बोलती ही रहती है। आप कहानी सुनाईये ना।’ दाराब ने मचल कर कहा।

– ‘अब्बा हुजूर! सियार ने जुलाहे की खुशामद कैसे की?’ जाना ने अपनी नन्हीं हथेलियों से खानखाना का सिर अपनी ओर मोड़ते हुए कहा। वह नहीं चाहती थी कि पिता भाई की ओर देखे।

– ‘तू बीच-बीच में सवाल मत पूछ।’ ऐरच ने जाना को धमकाया।

– ‘यदि तुम सब चुप होकर बैठोगे तो ही तो मैं कहानी सुना पाऊंगा ना!’ खानखाना ने कहा।

– ‘अच्छा हम सब चुप होकर बैठते हैं।’ कारन ने सब बच्चों को चुप रहने का संकेत किया।

– ‘सियार ने सोचा कि यदि मैं इस शिकारी को दिल्ली का राजा कहूंगा तो यह मुझसे बड़ा राजी होगा और मुझे नहीं मारेगा। इसलिये उसने बड़ी मीठी आवाज में कहा-

”कांधे  धनुष  हाथ  में  बाना।

कहाँ  चले   दिल्ली   पतराना।”

जुलाहा पहली बार जंगल से गुजर रहा था। उसने सुना था कि जंगल में भयानक शेर रहते हैं जो आदमी को खा जाते हैं लेकिन उसने कभी भी शेर को देखा नहीं था। सियार को देखकर उसने सोचा कि हो न हो, यही शेर है। जुलाहा डर गया और उससे बचने का उपाय सोचने लगा। उसने सोचा कि बड़ा आदमी बड़ी बात ही सोचता है। यह खुद राजा है इसलिये मुझे भी राजा ही समझता है। यदि मैं इसे जंगल का राणा कहकर इसकी प्रशंसा करूं तो यह अवश्य ही मुझे छोड़ देगा। इसलिये जुलाहे ने कहा-

”तुम जंगल के सेर बनी के राना।

बड़ेन  की  चाल  बड़ेन पहचाना।”

– ‘फिर क्या हुआ?’

– ‘फिर क्या होना था, दोनों ने एक दूसरे की झूठी तारीफ की, दोनों ही एक दूसरे से डरते रहे और दोनों ही एक दूसरे को क्षमा करके अपने-अपने रास्ते चल दिये।

– ‘फिर क्या हुआ?’

– ‘फिर कुछ नहीं हुआ, खेल खतम, पैसा हजम।’

– ‘अब्बा हुजूर! हमें भी एक दिन शिकार मारने के लिये ले चलिये ना।’ जाना ने कहा।

– ‘तू तो लड़की है। तू कैसे शिकार मारेगी! मैं लड़का हूँ, मैं अब्बा हुजूर के साथ शिकार मारने जाऊंगा।’ ऐरच ने कहा।

– ‘मैं भी तो लड़का हूँ, मैं भी अब्बा हुजूर के साथ शिकार मारने जाऊँगा।’ दाराब ने कहा।

– ‘नहीं लड़की होने से क्या होता है, मैं जरूर ही शिकार मारने जाऊँगी।’ जाना ने कहा।

– ‘अच्छा-अच्छा। झगड़ो मत। तुम सब कल शिकार मारने चलना। तुम्हारी अम्मी को भी ले चलेंगे।’ खानखाना ने बच्चों का फैसला करते हुए कहा।

-अध्याय 72, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

अहेर (73)

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अहेर

मैं यहाँ अहेर खेलने के लिये आया था। अपने साथियों से अलग होकर जंगल में भटक गया। खानखाना अपने कपड़े झाड़ते हुए उठ बैठा। उसकी भुजा में अब भी भयानक दर्द हो रहा था।

अरावली की सघन उपत्यकाओं में एक आदमी तेजी से भागा चला जा रहा था किंतु हाथ में गाय का रस्सा पकड़े हुए होने से उसकी गति तेज नहीं हो पाती थी। उसकी छोटी कटी हुई दाढ़ी तथा वेशभूषा से ज्ञात होता था कि वह कसाई है। कुछ लोग हाथों में लम्बी तलवार लेकर उसका पीछा कर रहे थे।

उनकी वेशभूषा स्थानीय राजपूतों जैसी थी। कसाई, अपने पीछे आने वाले मनुष्यों के भय से ऐसे कठिन मार्ग का अनुसरण कर रहा था जिस मार्ग पर घोड़े आदि किसी सवारी पर बैठकर निकल पाना संभव नहीं था। इससे उसके कपड़े काँटों में उलझ कर तार-तार हो गये थे।

जब गाय को लेकर भागने वाला कसाई किसी तरह पकड़ में न आया तो पीछा करने वाले मनुष्य तीन दिशाओं में इस प्रकार बिखर गये जिससे कि कसाई को किसी संकरे स्थान में घेरा जा सके। काफी देर की भाग दौड़ के बाद अंततः कसाई पकड़ा गया। पीछा करने वाले आदमियों ने तलवार के एक ही वार से गाय की रस्सी काट दी। गाय रस्सी कटते ही भाग खड़ी हुई।

गाय के भाग जाने से क्रुद्ध होकर कसाई छुरा निकाल कर अपने प्रतिद्वंद्वियों पर टूट पड़ा। उसका यह दुस्साहस देखकर पीछा करने वाले राजपूतों ने अपनी तलवारें उसकी छाती पर टिका दी। इससे पहले कि उनमें कुछ संवाद हो पाता। जाने कहाँ से एक खान अचानक प्रकट हुआ और राजपूतों को ललकारने लगा।

– ‘एक अकेले आदमी को इस तरह जंगल में घेरकर वध करने में तुम्हें लज्जा नहीं आती?’ खान ने दूर से चिल्लाकर कहा।

– ‘पापी का वध करने में कैसी लज्जा?’ एक राजपूत ने सचमुच ही उसका वध करने की नीयत से अपनी तलवार आकाश में घुमाई।

– ‘मैं कहता हूँ कि ठहर जा। अन्यथा अपनी जान से हाथ धोएगा।’ खान ने तलवार घुमाने वाले इंसान को चेतावनी दी। अब वह इन लोगों के काफी निकट आ गया था।

– ‘मुझे आदेश देने वाला तू कौन होता है?’ राजपूत ने अपनी तलवार खान की ओर घुमाते हुए कहा।

– ‘मैं कौन होता हूँ यह तो तुझे ज्ञात हो ही जायेगा फिलहाल तो तू मेरी तलवार का वार संभाल।’ खान ने हवा में तलवार घुमाकर राजपूत पर भरपूर वार किया। राजपूत इस अप्रत्याशित हमले के लिये तैयार नहीं था। वह कंधा पीछे करके किसी तरह बचा।

देखते ही देखते घमासान मच गया। अपनी परम्परा के मुताबिक एक राजपूत खान से दो-दो हाथ करने लगा। बाकी के तीनों राजपूत इन्हें देखने के लिये खड़े हो गये। राजपूतों को खान के साथ उलझा हुआ देखकर कसाई मौका पाकर भाग खड़ा हुआ। राजपूत कड़ियल जवान था तो खान भी उससे कम बलिष्ठ नहीं था।

दोनों ही तलवार के खिलाड़ी जान पड़ते थे। थोड़ी देर बाद खान हाँफने लगा। वह भुजा पर राजपूत की तलवार का वार भी खा बैठा। वार बचाने के लिये जैसे ही खान जमीन पर झुका, राजपूत ने उसे लात मार कर जमीन पर गिरा दिया और फुर्ती से खान की छाती पर चढ़ बैठा।

– ‘अब बोल क्या कहता है?’ राजपूत ने तलवार की नोक खान की छाती में चुभाते हुए पूछा।

खान चुपचाप जमीन पर पड़ा रहा। उसकी भुजा और छाती में इतनी जोर का दर्द हो रहा था कि उससे बोलते नहीं बन पड़ रहा था।

– ‘सरदार इस खान का क्या किया जाये?’ खान की छाती पर बैठै युवक ने अपने प्रौढ़ साथी की तरफ देखकर पूछा।

– ‘इसी से पूछ। क्यों बीच में पड़ा था यह?’

– ‘तुम चार आदमी मिलकर एक आदमी को मार रहे थे इसी से मैं बीच में पड़ा।

– ‘किस अधिकार से?’

– ‘तलवार के अधिकार से।’

– ‘तू क्या राव उदयसिंह[1]  है, जो तू सिरोही राज्य में तलवार का अधिकारी हो गया।’

– ‘तेरा राव उदयसिंह मेरा मातहत है।’

– ‘तो तू दिल्लीधीश्वर है?’ प्रौढ़ राजपूत ने व्यंग्य पूर्वक कहा।

– ‘मैं दिल्लीधीश्वर अकबर का सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम हूँ।’

– ‘कौन अब्दुर्रहीम? क्या खानखाना बैरामखाँ का बेटा?’

– ‘हाँ वही।’

– ‘सच कहता है?’

– ‘हाँ।’

– ‘क्या तू वही अब्दुर्रहीम है जिसने मुगल राज्य में आदमी को गुलाम बनाने और चिड़ियों के मारने पर रोक लगवाई है?’ दूसरे राजपूत ने पूछा।

– ‘हाँ।’

– ‘इतना बडा़ सेनापति, बिल्कुल अकेला? और इस अवस्था में?’ प्रौढ़ सरदार ने खान की छाती पर बैठे युवक को खड़े होने का संकेत करते हुए कहा।

– ‘मैं यहाँ शिकार खेलने के लिये आया था। अपने साथियों से अलग होकर जंगल में भटक गया। खानखाना अपने कपड़े झाड़ते हुए उठ बैठा। उसकी भुजा में अब भी भयानक दर्द हो रहा था।

– ‘बिना यह जाने कि गलती किस की है, बिना यह जाने कि वह कसाई कौन था, बिना यह जाने कि हम कौन हैं, तू बिना अपना परिचय दिये अचानक तलवार लेकर टूट पड़ा?’

– ‘हमें किसी पर टूट पड़ने के लिये किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। हम अपनी इच्छा के मालिक स्वयं हैं।’

– ‘हम चाहें तो तेरी गर्दन इसी समय काट दें किंतु तूने म्लेच्छों के राज्य में आदमियों को गुलाम बनाने पर रोक लगवाई है और तूने निरीह पक्षियों को मारने पर भी पाबंदी लगवाई है। तू नेक दिल इंसान है इसलिये हम तेरी जान नहीं लेते।’

– ‘मेरी जान लेना इतना आसान नहीं है सरदार। चाहे तो अपने मन की कर के देख ले।’

– ‘नहीं। हम तेरी जान नहीं लेंगे। इस डर से नहीं कि हमें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी अपितु इसलिये कि हम तेरी इज्जत करते हैं। हमने तेरे बारे में कई किस्से सुन रखे हैं। जा तू अपनी राह को चला जा और हमें अपनी राह जाने दे।’

– ‘ऐसे कैसे जायेगा सरदार? अभी तो तूने ही हमारा सत्कार किया है, हमारा सत्कार भी तो देख।’

– ‘बड़े आदमियों का सत्कार न ही मिले तो अच्छा। फिर कभी मौका लगा तो तेरा सत्कार भी देखेंगे।’

जैसे ही सरदार अपने आदमियों को लेकर वहाँ से चलने को हुआ, खानखाना के साथी उसे ढूंढते हुए वहीं आ पहुँचे। खानखाना ने अपने आदमियों को संकेत किया। चारों राजपूत उसी समय बंदी बना लिये गये।

बच्चे पिता के इस तरह अलग हो जाने से डर गये थे। माहबानू भी खानखाना के अचानक बिछड़ जाने से चिंतित थी किंतु अब उसके सुरक्षित मिल जाने से उसकी साँस में साँस आई।

जब राजपूतों को खानखाना के डेरे पर लाया गया तो खानखाना ने उन राजपूतों से कहा- ‘यदि अपनी गुस्ताखी के लिये क्षमा मांग लो तो तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।

राजपूतों ने कहा- ‘गाय की रक्षा करना हमारा धर्म है। यदि खानखाना चाहे तो हमारी गर्दन काट ले किंतु हम क्षमा नहीं मांगेंगे।’

राजपूतों की दृढ़ता देखकर खानखाना ने उन्हें स्वतंत्र कर दिया।

रहीम अब सामान्य सिपाही न रहा था, अब वह बादशाहों का बादशाह अर्थात् खानखाना था। उसके भाग्य का सितारा बुलंदी पर था। विशाल मुगलिया सल्तनत का खानखाना हो जाने से उसका इकबाल लगभग पूरे उत्तरी भारत पर कायम हो गया था। हिन्दुस्थान ही नहीं अफगानिस्तान, ईरान, तूरान, ख्वारिज्म और फरगाना तक उसकी तूती बोलने लगी थी। वह जीवन का बहुत बड़ा इम्तिहान उत्तीर्ण करके इस दर्जे तक पहुँचा था। अब उसके जीवन में कठिनाईयाँ कम और उत्सव के अवसर अधिक थे।

जब वह दिल्ली दरबार में बादशाह का धन्यवाद ज्ञापित करके फिर से अहमदाबाद जा रहा था तो मार्ग में उसके अमीरों ने उसके लिये शिकार का आयोजन किया। संयोगवश वह अपने आदमियों से अलग होकर एक पेड़ के नीचे बैठा सुस्ता रहा था, उसी दौरान यह घटना हो गयी।

कहने को तो यह घटना छोटी ही थी किंतु प्राणों पर आये खतरे के हिसाब से यह उतनी ही बड़ी थी जितनी कि मुजफ्फरखाँ के सात हजार सैनिकों के सामने अपने तीन सौ घुड़सवार और सौ हाथी झौंक कर जीवन का जुआ खेल जाने की थी।

इस घटना ने रहीम को बहुत सी बातें सोचने पर मजबूर कर दिया। उसकी समझ में अच्छी तरह से आ गया कि आदमी भले ही हर स्थान पर नहीं पहुँचे किंतु उसकी खुशबू या बदबू स्वतः ही दूर-दूर तक फैल जाती है। मौका पड़ने पर आदमी की तलवार भले ही उसके प्राण न बचा सके किंतु उसकी खुशबू उसे अपरिचितों और जंगलों में भी उसके प्राण बचा ले जाती है।

रहीम के अंतस का एक कौना रह-रह कर यह भी सोचता था कि कौन जाने किस निरीह कबूतर या चिड़िया की दुआ उसके काम आई हो! जाने किस बेकस गुलाम की दुआ ऐन वक्त पर उसके आड़े आ गयी हो!

-अध्याय 73, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] यह सिरोही राज्य का तत्कालीन राजा था। इस घटना के विवरण के साथ स्थान का उल्लेख किसी भी तत्कालीन ग्रंथ में नहीं मिलता किंतु ऐसा अनुमान होता है कि यह घटना सिरोही राज्य में घटित हुई होगी।

जसोदा बार बार भाखै (74)

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जसोदा-बार-बार-भाखै

जसोदा बार बार भाखै । है कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहि राखै।

अकबर ने शहजादा मुराद का विवाह खानखाना अब्दुर्रहीम के साले खाने-आजम मिर्जा अजीज कोका की बेटी से करना निश्चित किया। शहजादे मुराद के विवाह में भाग लेने के लिये अकबर ने मुगलिया सल्तनत के लगभग सभी बड़े अमीर, उमराव और सेनापतियों को पंजाब में बुलवाया जहाँ वह अपने विशाल लाव-लश्कर सहित डेरा डाले हुए था।

अकबर ने इस मौके पर खानखाना को भी पत्र लिखकर बुलाया था कि यदि गुजरात में शांति हो गयी हो तो वह शहजादे के विवाह में शरीक होने के लिये चला आये। खानखाना सांडनी पर बैठकर पन्द्रह दिन की ताबड़तोड़ यात्रा करता हुआ पंजाब पहुँचा जहाँ बादशाह का लश्कर पड़ाव डाले हुए था। पंजाब में शहजादे का विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद अकबर खानखाना को अपने साथ सीकरी ले आया था। उनके साथ बहुत से अमीर उमराव भी आ गये थे जो अब तक सीकरी में ही पड़ाव डाले हुए बैठे थे।

अकबर ने कहने को तो दिल्ली को अपनी राजधानी बना रखा था किंतु वह दिल्ली के स्थान पर फतहपुर सीकरी में अधिक रहता था। चौमासे में अक्सर वह शाम के समय आगरा आ जाता और देर रात तक अपने आदमियों के साथ यमुनाजी के तट पर जमा रहता।

सायंकालीन दरबार में वह शासन और राजनीति की बातें अत्यंत आवश्यक होने पर ही किया करता था। अन्यथा यह समय उसके रागरंग और मनोविनोद के लिये निर्धारित था। उसने उज्जैन के परम पराक्रमी महाराजा विक्रमादित्य के अनुसरण पर अपने दरबार में भी नवरत्नों की नियुक्ति की थी।

इन रत्नों में कवि, लेखक, गवैये, संगीतकार और अन्य विद्वान शामिल थे। सांयकालीन दरबार का आयोजन मुख्य रूप से नवरत्नों के सानिध्य में समय व्यतीत करने के लिये किया जाता था। इन नवरत्नों को भी उसने अलग-अलग उपाधियों से नवाज रखा था। आज के इस सांयकालीन दरबार का आयोजन मुख्यतः संगीत सम्राट तानसेन के गायन के लिये किया गया था।

जब बहुत देर तक राग अलापने के बाद तानसेन ने सितार एक तरफ रखा तो दरबारी फिर से विचारों की दुनिया से बाहर निकल कर वर्तमान में लौटे। आज के गायन में तानसेन ने सूरदासजी का पद गाया था-

 ”जसोदा बार बार भाखै।

 है कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालहि राखै।”

अकबर ने तानसेन से इस पद का अर्थ करने को कहा। तानसेन ने पद का अर्थ इन शब्दों में किया- ‘मैया यशोदा बार-बार अर्थात् पुनः-पुनः यह पुकार लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!’

इस पर अकबर ने फैजी की ओर देखा फैजी ने कहा- ‘यशोदा बार-बार अर्थात् रो-रोकर यह रट लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!’

– ‘राजा बीरबल! आप क्या कहते हैं?’ अकबर ने बीरबल से पूछा।

– ‘शहंशाह! इस पद का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है किंतु मेरे साथी समझ नहीं पा रहे हैं। माता यशोदा बार-बार अर्थात् द्वार-द्वार पर जाकर कहती हैं कि है कोई ऐसा हितू, जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!’

इस बार अकबर ने खाने आजम कोका की ओर देखा कोका ने कहा- ‘यशोदा बार-बार अर्थात् दिन-दिन[1]  यह पुकार लगाती हैं कि है कोई ऐसा हितैषी जो ब्रज में गोपाल को रोक ले!’

इस बार बारी आयी खानखाना की। खानखाना ने कहा- ‘जहाँपनाह! तानसेन गायक हैं, इनको एक ही पद बार-बार अलापना पड़ता है इसलिये इन्होंने बार-बार का अर्थ पुनः-पुनः किया। फैजी फारसी के शायर हैं, इन्हें रोने के अलावा और क्या काम है! इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ”रो-रो” कर किया। राजा बीरबल द्वार-द्वार घूमने वाले विप्र हैं इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ”द्वार-द्वार” किया। खाने आजम कोका नजूमी[2]  हैं, उनको दिन, तिथि और वार से ही वास्ता पड़ता है इसलिये उन्होंने बार-बार का अर्थ ”दिन-दिन” किया लेकिन बादशाह हुजूर इस पद का वास्तविक अर्थ यह है कि माता यशोदा का बाल-बाल अर्थात् रोम-रोम पुकारता है कि कोई तो मिले जो मेरे गोपाल को ब्रज में ही रोक ले।’

खानखाना का जवाब सुनकर अकबर की आँखों में प्रसन्नता का ज्वार उमड़ आया। उसने आसन से खड़े होकर रहीम को शाबासी दी। दूसरे सभासदों ने भी खानखाना की बहुत प्रशंसा की।

-अध्याय 74, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] प्रतिदिन।

[2] ज्योतिषी।

वकीले मुतलक (75)

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वकीले मुतलक

एक तरफ मुगल सल्तनत का वकीले मुतलक है तो दूसरी ओर सल्तनत का महत्वपूर्ण सेनापति। स्वयं बादशाह तक इन दोनों में से किसी को नाराज नहीं करना चाहता।

बादशाह ने दरबार बर्खास्त करने का आदेश दिया और खानखाना को संकेत से अपने साथ आने के लिये कह कर उठ खड़ा हुआ।

एकांत पाकर बादशाह ने खानखाना से कहा- ‘खानखाना! तुम्हें एक जिम्मेदारी सौंपता हूँ। मियाँ शाहबाज खाँ और राजा टोडरमल के बीच कुछ पैसों को लेकर झगड़ा है। तुम्हें पता लगाना है कि सच्चाई क्या है और गलती किसकी है? ज्यादातर अमीर इस झगड़े को लेकर दो खेमों में बंट गये हैं। चगताई अमीर शाहबाजखाँ के पक्ष में हैं और हिन्दू सरदार राजा टोडरमल के पक्ष में। जिससे दरबार का वातावरण खराब हो रहा है। किसी तरह यह बखेड़ा निबटाओ।’

रहीम को लगा कि बादशाह ने उसे एक अलग तरह के रणक्षेत्र में नियुक्त कर दिया है। इसमें तलवारें नहीं चलनी हैं, दोनों ओर के तर्कों और दोनों ओर की स्वामिभक्तियों की बर्छियां चलनी हैं। सबसे विचित्र बात तो यह है कि दोनों ही पक्षों द्वारा चलाई गयी बर्छियों का वार खानखाना को अपनी छाती पर झेलना है।

एक तरफ मुगल सल्तनत का वकीले मुतलक है तो दूसरी ओर सल्तनत का महत्वपूर्ण सेनापति। स्वयं बादशाह तक इन दोनों में से किसी को नाराज नहीं करना चाहता। भले ही दोनों ओर के पक्ष में से कोई भी हारे या जीते किंतु जरा सी भी चूक होते ही खानखाना की तो अकारण ही पराजय हो जानी है।

बादशाह के आदेश से खानखाना ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। अकबर के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब कुछ ही दिनों बाद राजा टोडरमल और शाहबाजखाँ ने एक साथ बादशाह की सेवा में हाजिर होकर निवेदन किया कि अब उनका हिसाब साफ हो गया है और उनके बीच किसी तरह का विवाद नहीं है।

बादशाह ने उन दोनों की वे दरख्वास्तें उन्हें वापिस लौटा दीं जो उन्होंने एक दूसरे के विरुद्ध लिखकर बादशाह को दी थीं। उनके जाने के बाद बादशाह ने खानखाना को बुलाकर पूछा- ‘यह क्या चमत्कार है खानखाना? कई महीनों से चला आ रहा यह झगड़ा अचानक ही कैसे निबट गया?’

– ‘जहाँपनाह! मैंने जब दोनों पक्षों से बात की तो मुझे अनुमान हुआ कि राजा टोडर मल मूंछ के लिये और शाहबाजखाँ पैसों के लिये लड़ रहा था। इसलिये मैंने झगड़ा निबटाने के लिये इस तरह की योजना बनाई कि शाहबाजखाँ के पास पैसा रह जाये और राजा टोडरमल के पास मूंछ।

– ‘गलती पर कौन था?’

– ‘गलती शाहबाजखाँ की थी किंतु वह किसी भी कीमत पर राजा टोडर मल को धन लौटाने के लिये तैयार नहीं था। जब मैंने शाहबाजखाँ से कहा कि यदि वह शेख अबुलफजल आदि अमीरों की उपस्थिति में अपनी गलती कबूल करे तो राजा टोडरमल उससे एक भी पैसा नहीं लेगा और यदि शाहबाजखाँ ऐसा नहीं करेगा तो उसे बादशाही कोप का शिकार होना पड़ेगा। इस पर शाहबाजखाँ तैयार हो गया।’

– ‘और राजा टोडर मल, वह कैसे माना?’

– ‘मैंने राजा टोडरमल से कहा कि यदि वह अपना पैसा छोड़ने को तैयार हो जाये तो शाहबाज खाँ शेख अबुल फजल की उपस्थिति में अपनी गलती मान लेगा। इससे राजा टोडरमल को पैसा भले ही न मिले किंतु बादशाह की निगाह में उसकी इज्जत बढ़ जायेगी। यह सुनकर राजा टोडरमल भी तैयार हो गया।’

– ‘तुमने कमाल कर दिया खानखाना। तुम तो वकील होने के लायक हो। जिस बखेड़े को मैं स्वयं भी प्रयास करके नहीं निबटा सका वह झगड़ा तुमने जरा सी युक्ति से निबटा दिया।

भाग्य की बात! इस घटना के कुछ ही दिनों बाद साम्राज्य के वकीले मुतलक राजा टोडरमल की मृत्यु हो गयी। बादशाह ने खानखाना अब्दुर्रहीम को राज्य का नया वकीले मुतलक नियुक्त कर दिया। उन दिनों यह पद राज्य का सबसे बड़ा पद था। वकीले मुतलक बादशाह का प्रतिनिधि समझा जाता था। उसे कोई भी आदेश लिखित में देने की आवश्यकता नहीं थी। उसका आदेश बादशाह का आदेश होता था।

जब वकीले मुतलक अब्दुर्रहीम चौंतीस वर्ष का हुआ तो उसके घर में एक के बाद एक तीन बेटों का जन्म हुआ। बादशाह स्वयं वकीले मुतलक के महलों में जाकर उसे पुत्रों के जन्म की बधाई देकर आया। यहाँ तक कि बादशाह ने स्वयं ही उनका नामकरण भी किया जो ऐरच, दाराब और कारन नाम से जाने गये। ये तीनों पुत्र अकबर की धात्री माहमअनगा की पुत्री माहबानू से हुए थे। माहबानू से ही जाना बेगम और एक अन्य पुत्री का जन्म हुआ था।

बाद में रहीम को दो बेटे और प्राप्त हुए जिनके नाम रहमानदाद और अमरूल्लाह रखे गये। रहमनादाद का जन्म सौधा जाति की एक स्त्री से हुआ था और मिर्जा अमरूल्लाह एक दासी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।

-अध्याय 75, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

विचित्र दरबार (76)

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विचित्र दरबार

थोड़ी ही देर में रहीम ने जिस दरबार में प्रवेश किया उस विशाल और विचित्र दरबार की शोभा देखते ही बनती थी। दरबार का शामियाना सोने और चांदी की चोबों पर खड़ा था जो दिन-रात मोतियों की झालरों से झिलमिलाता था।

– ‘हुजूर! बाहर फरियादियों का हुजूम इकट्ठा हो गया है। कुछ लोग तो सुबह से आस लगाये बैठे हैं। शाम होने को आई।’

– ‘तो लोगों को मालूम हो गया कि रहीम आगरे में है?’

– ‘हाँ हुजूर! अब तो दूर-दूर से लोग आ रहे हैं।’

– ‘अच्छा उन सबको दरबार में बैठा।

थोड़ी ही देर में रहीम ने जिस दरबार में प्रवेश किया उस विशाल और विचित्र दरबार की शोभा देखते ही बनती थी। दरबार का शामियाना सोने और चांदी की चोबों पर खड़ा था जो दिन-रात मोतियों की झालरों से झिलमिलाता था। दरबार के फर्श पर महंगे कालीन बिछे थे। एक ओर एक विशाल चबूतरा बना हुआ था जिस पर अत्यंत भव्य और विशाल तख्त पड़ा था।

तख्त की बारीक कारीगरी बरबस ही देखने वाले का ध्यान खींचती थी। तख्त पर चीन देश से आयी रेशम की महंगी चद्दरें और तकिये करीने से सजे हुए थे। समूचे आगरे में यदि कोई और दरबार किसी भी लिहाज से रहीम के दरबार से प्रतिस्पर्धा कर सकता था तो वह था स्वयं शहंशाह अकबर का दरबार।

जितना भव्य दरबार था, उतना ही भव्य खानखाना स्वयं था। आज तो खानखाना की शोभा विशेष रूप से देखने योग्य थी। वह बादशाहों की भांति समस्त राजकीय चिह्न धारण किये हुए था। खानखाना के सिर का मुकुट महंगे और दुर्लभ हीरे जवाहरों से जगमगा रहा था। कलंगी के स्थान पर हुमा पक्षी का पंख हवा में फहराता था। इस पंख को केवल शहजादे ही धारण कर सकते थे। उसके तलवार की मूठ पर बड़े-बड़े याकूत, नीलम, पन्ने तथा वैदूर्य जड़े हुए थे।

खानखाना के सेवकों ने सिंह की तरह गर्दन उठा कर चल रहे खानखाना के सिर पर हीरे-मातियों से जड़े सोने के छत्र की छाया कर रखी थी और वे दोनों दिशाओं से चंवर ढुलाते हुए चल रहे थे। जैसे ही खानखाना दरबार में दिखायी दिया, सैंकड़ों कण्ठ उसकी जय-जयकार करने लगे।

आज के इस विशेष दरबार का आयोजन खानखाना के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में किया गया था। खानखाना ने एक भरपूर निगाह दरबार में उपस्थित सेवकों और आगंतुकों पर डाली और मुंशी को दरबार की कार्यवाही आरंभ करने का संकेत किया।

सबसे पहले जो आदमी उसकी सेवा में प्रस्तुत किया गया उसने सैनिकों के से कपड़े पहन रखे थे और हाथ में तलवार ले रखी थी। उस आदमी ने सिर पर जो पगड़ी धारण कर रखी थी, उस पगड़ी पर दो लम्बी-लम्बी कीलें लगी हुई थीं।

– ‘हुजूर! यह गुलाम आपकी सेना में नौकरी पाना चाहता है।’ विचित्र वेशभूषा वाले आदमी ने सिर झुका कर निवेदन किया।

– ‘क्या नौकरी करोगे?’

– ‘हुजूर, सिपाही की।’

– ‘तुमने अपनी पगड़ी पर ये कीलें क्यों लगवा रखी हैं?’

– ‘हुजूर पहली कील तो उस आदमी के लिये है जो नौकरी पर तो रखे किंतु तन्खाह न दे।’

– ‘और दूसरी कील?’

– ‘दूसरी कील उस नौकर के लिये है जो तन्खाह तो ले किंतु काम न करे।’

 – ‘कितनी तन्खाह चाहिये?’

– ‘दस रुपया महीना।’

– ‘कितनी उम्र है?’

– ‘पच्चीस साल।’

– ‘कितने साल नौकरी करेंगे?’

– ‘यही कोई पच्चीस साल।’

– ‘एक साल की तन्खाह कितनी हुई?’

– ‘एक सौ बीस रुपया।’

– ‘पच्चीस साल की कितनी हुई?’

– ‘तीन हजार रुपया।’

– ‘ये लीजिये तीन हजार रुपया और अपने सिर से पहली कील का बोझ उतार दीजिये। दूसरी कील का बोझ उठाने का आपको पूरा अधिकार है।’

जीवन भर की कमाई आज ही पाकर युवक प्रसन्नता से कूदने लगा। दरबार में उपस्थित जन समुदाय फिर से खानखाना की जय-जयकार करने लगा।

इसके बाद एक बुढ़िया की बारी थी। वह अपने हाथ में एक तवा लेकर आई थी। उसने कहा- ‘हुजूर मैं आपको छूकर देखना चाहती हूँ।’

– ‘इस बुढ़िया की मुराद पूरी की जाये।’ खानखाना ने आदेश दिया।

बुढ़िया तवा लेकर तख्त पर चढ़ गयी और जैसे ही खानखाना के निकट पहुँची, अपने हाथ का तवा खानखाना की देह से रगड़ने लगी। कुछ देर बाद तख्त से नीचे उतर कर बड़ी हैरानी से तवे को उलट-पलट कर देखने लगी।

बुढ़िया की उल्टी-सीधी चेष्टाएं देखकर अब्दुर्रहीम को हँसी आ गयी। वह बोला- ‘निराश न हो बुढ़िया। तूने अपने लोहे का तवा पारस से ही रगड़ा है। अब यह सचमुच ही सोने का हो गया है। मुंशीजी! इस बुढ़िया को तवे के बराबर सोना तोलकर दे दिया जाये।’

दरबार में फिर से जय-जयकार गूंजने लगी।

अगला फरियादी एक गरीब ब्राह्मण था। उसने खानखाना के सामने आते ही मुसलमानों को गाली देना आरंभ कर दिया। जिनके कारण उसके जजमानों की संख्या घट गयी थी और अब वह भूखों मरने की स्थिति को पहुँच गया था।

– ‘विप्र देवता! इस प्रकार मत कोसो। तुम्हें खाने पीने को बहुत मिलेगा।’

इतना सुनते ही ब्राह्मण देवता ने अपने सिर से मैली-कुचैली और स्थान-स्थान से फटी हुई पगड़ी खानखाना पर दे मारी और कहा- ‘हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिसकी बात से प्रसन्न होओ, उसे कुछ न कुछ अवश्य दो। मेरे पास इस पगड़ी के सिवा कुछ नहीं है। यही तुझे देता हूँ।’

खानखाना ने तुरंत ही अपना रत्न जड़ित स्वर्ण ताज उतार कर उस ब्राह्मण को दे दिया और उसकी मैली कुचैली तथा तार-तार हो रही पगड़ी अपने माथे पर बांधते हुए कहा- ‘हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिससे कुछ लो, उसे अधिक नहीं तो, उतना तो अवश्य ही दो।’

अगला फरियादी एक नौजवान था। उसे विश्वास न था कि खानखाना उसकी भी मुराद पूरी कर सकता है लेकिन उसने सुन रखा था कि खानखाना कवियों की बड़ी इज्जत करता है। भले ही कितना ही घटिया कवि हो, वह खानखाना के दरवाजे से खाली हाथ नहीं लौटता। इसलिये वह अपनी फरियाद एक कविता में ढाल कर लाया था। उसने कहा- ‘हे उदार खानखाना! एक चन्द्रमुखी प्यारी है। वह जान मांगे तो कुछ सोच नहीं, रुपया मांगती है, यही मुश्किल है।’

खानखाना ने मुस्कुरा कर पूछा- ‘कितना रुपया मांगती है?’

– ‘एक लाख।’

– ‘तो तू एक लाख छः हजार ले जा।’

– ‘एक लाख तो ठीक, पर छः हजार क्यों?’

– ‘तेरे सजने-धजने के लिये। यदि इसी हाल में गया तो रुपया लेकर भी नहीं मानेगी।’

जब युवक वहाँ से हटा तो एक बहुत ही कंगाल आदमी अपने स्थान से उठकर खड़ा हुआ और बोला- ‘खानखाना! कैसे सम्बंधी हो तुम! अपने साढ़ू को नहीं पहचानते?’

खानखाना ने कहा- ‘आओ साढ़ूजी, मैं तो आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। आओ यहाँ बैठो मेरे पास।’

जब कंगाल खानखाना के बराबर तख्त पर बैठ गया तो खानखाना ने अपने मुंशी से कहा- ‘मुंशीजी! साढ़ूजी को एक लाख रुपया देकर विदा किया जाये।’

मुंशी बहुत देर से चुपचाप बैठा हुआ दरबार की कार्यवाही देख रहा था। इस बार उससे रहा न गया। उसने कंगले को व्यंग्य पूर्वक देखते हुए पूछा- ‘गुस्ताखी मुआफ हुजूर! ये आपके साढ़ू हैं, पहले कभी इन्हें देखा नहीं?’

– ‘मुंशीजी! आप इन्हें नहीं पहचानते! देखिये, सम्पत्ति और विपत्ति दो बहिनें हैं। एक हमारे घर में है और एक इनके। इसी नाते से ये हमारे साढ़ू हैं।’

कंगला अपनी ढीठता त्याग कर खानखाना के पैरों में गिर पड़ा।

इस बार एक युवा पण्डित खानखाना के समक्ष था।

– ‘पाँय लागूं पण्डितजी। कहिये क्या सेवा करूँ?’

युवा पण्डित खानखाना के सामने आकर कातर दृष्टि से देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सका। उसके हाथ-पाँव काँपने लगे और उसका कण्ठ सूख गया।

– ‘आपके अंगोछे में क्या लिपटा हुआ है?’ खानखाना ने पूछा।

युवा पण्डित ने अपने अंगोछे में लिपटी हुई एक खाली शीशी निकाली और खानखाना की ओर बढ़ा दी। खानखाना के सेवक ने शीशी खानखाना को ले जाकर दी।

खानखाना ने देखा, शीशी में पानी की केवल एक बूंद है। उन्होंने पण्डित की ओर देखकर कहा- ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे। मोती मानस चून।’

पण्डित ने आँखों में आँसू भर कर कहा- ‘हाँ, यही तो मैं भी कह रहा हूँ ।’

– ‘मुंशीजी! हमारे पास आईये।’ खानखाना ने मुंशी को आदेश दिया।

जब मुंशी खानखाना के ठीक पास जाकर खड़ा हो गया तो खानखाना ने उसके कान में कहा- ‘इस पण्डित के घर का पता मालूम कर लो और आज रात को वहाँ एक लाख रुपया पहुँचाओ।’

मुंशी फिर चक्कर में पड़ गया। उसकी आँखों में उभरे सवाल को देखकर खानखाना ने उसके कान में फुसफुसाकर कहा- ‘अरे भाई आप देखते नहीं हैं! पण्डितजी किसी प्रतिष्ठित खानदान के हैं इसलिये मुँह से कुछ मांग नहीं सकते किंतु संकेत से बता रहे हैं कि बिना धन के पानी बचे तो कैसे बचे। जैसे शीशी में एक बूंद ही है वैसे घर भी खाली होने को है।’

अगला आदमी एक बूढ़ा मुसलमान था। उसकी निर्धनता उसके बुरे हाल का परिचय दूर से दे रही थी। वह हाथ जोड़कर खानखाना के ठीक सामने खड़ा हो गया।

– ‘बोलो बाबा।’

– ‘हुजूर! गुस्ताखी मुआफ हो। गुलाम आप पर पत्थर फैंक कर देखना चाहता है।’ बूढ़े को हिन्दुस्तानी में बात करनी नहीं आती थी। वह ईरानी भाषा बोल रहा था।

– ‘ठीक है, जैसा जी में आये करो। मैं तैयार हूँ।’ खानखाना ने ईरानी भाषा में ही जवाब दिया और अपनी ढाल संभाल कर बैठ गया।

बूढ़े ने अपने कांपते हाथों में थामा हुआ पत्थर खानखाना पर दे मारा। पत्थर खानखाना की ढाल से जाकर टकराया।

– ‘मुंशी जी! बाबा को एक हजार रुपया दिया जाये।’

– ‘गुस्ताखी मुआफ हुजूर। क्या यह पत्थर फैंकने का पारिश्रमिक है?’ मुंशी ने हाथ जोड़ कर पूछा।

– ‘नहीं मुंशीजी। बूढ़े बाबा ने यह पत्थर हम पर यह जांचने के लिये फैंका था। जब फलदार वृक्षों पर पत्थर देकर मारते हैं तो फल मिलते हैं, खानखाना क्या उनसे भी गया बीता है!’

– ‘खानखाना तेरी जय हो। युगों तक इस धरती पर तेरा इकबाल बुलंद रहे। मैं सचमुच ही ईरान से यहाँ तक चलकर तुझे जांचने के लिये ही आया हूँ। मेरा नाम शकेबी अस्फहानी है। मैं ईरान का रहने वाला हूँ। पार साल जब मैं मक्का जाते समय अदन में पहुँचा तो मैंने वहाँ कुछ बच्चों को एक गीत गाते हुए सुना कि- खानखाना आया। जिसके प्रताप से कुंआरी कन्याओं ने पति पाये। व्यापारियों ने माल बेचे, बादल बरसे और जल-थल भर गये। मैं उस गीत की वास्तविकता को अपनी आँखों से देखने के लिये यहाँ तक चला आया हूँ। मुझे इन रुपयों की आवश्यकता नहीं है। इन्हें किसी जरूरतमंद इंसान को दे दिया जाये।’

उपस्थित जनसमुदाय फिर से जय-जयकार करने लगा।

इसके बाद मंडन कवि[1]  उठ कर खड़ा हुआ। उसने दोनों हाथ खानखाना की ओर फैला कर कहा-

‘तेरे गुन  खानखानां  परत  दुनी  के कान,

तेरे  काज  ये  गुन   आपनो   धरत  हैं।

तू तो खग्ग खोलि-खोलि खलन पै  कर लेत

यह   तो   पै  कर  नेक  न   डरत  हैं।

मंडन   सुकवि   तू   चढ़त  नवखंडन  पै,

ये   भुजदण्ड   तेरे   चढ़िए   रहत   हैं।

ओहती   अटल   खान  साहब  तुरक मान,

तेरी  या  कमान  तोसों  तेहुँसों   करत है।’

मण्डन की कविता पूरी होते ही खानखाना पर फूल बरसने लगे। सैंकड़ों कण्ठों से निकली जयजयकार, उनसे दुगुनी हथेलियों से निकली तालियों की गड़गड़ाहट, ढोल, नगारों और तुरहियों की तुमुल ध्वनि से आकाश व्याप्त हो गया।

दरबार बर्खास्तगी की घोषणा के साथ ही खानखाना दस्तरख्वान पर जा बैठा। आज उसके दस्तरख्वान का प्रबंध दरबार में ही किया गया था। उसके साथ-साथ सैंकड़ों आदमियों के भोजन का प्रबंध किया गया था।

-अध्याय 76, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] ये बुंदेलखण्डी कवि थे।

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