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पेट में दर्द (64)

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पेट में दर्द
पेट में दर्द

महाराणा प्रताप ने मानसिंह से कहलवाया कि हमारे पेट में दर्द है इसलिए हम आपके साथ भोजन नहीं करेंगे। मानसिंह तुरंत समझ गया कि महाराणा प्रताप मुझे म्लेच्छों का नौकर जानकर मेरे साथ भोजन नहीं करेंगे और यह मेरा अपमान है।

जब मेवाड़ राजवंश ने अपनी कन्याएं मुगलों को देने से मना कर दिया तो अकबर ने अपनी सेनाओं का मुँह उदयपुर की ओर मोड़ दिया। राजा मानसिंह को विशाल सैन्य और बहुत सारी नसीहतें व हिदायतें देकर इस अभियान पर रवाना किया गया। मानसिंह दिल्ली से कूच कर पहले डूंगरपुर पहुँचा जहाँ उसने डूंगरपुर पर आक्रमण कर उसे हस्तगत कर लिया।

डूंगरपुर का महारावल आसकरण मानसिंह के भय से पहाड़ों में भाग गया। अपनी सेना को डूंगरपुर में ही छोड़कर मानसिंह महाराणा को मनाने के लिये उदयपुर आया। महाराणा प्रतापसिंह ने मानसिंह को बंधु जानकर अपने महलों में विशाल दरबार का आयोजन किया तथा मानसिंह का बड़ा भारी स्वागत किया।

औपचारिक स्वागत संभाषण के पश्चात् महाराणा ने मानसिंह से कहा- ‘कुंअरजू! आप हमारे आत्मीय हैं, बंधु हैं, मेवाड़ की धरती आपका स्वागत करती है।’

– ‘महाराणाजी! जिस मेवाड़ की धरती को परमात्मा ने हर तरह से सुंदर और धन-धान्य से परिपूर्ण बनाया है, उसकी रक्षा और समृद्धि की कामना करना जितना आपका कर्तव्य है, उतना ही दायित्व आपके आत्मीय बंधु होने के नाते मेरा भी है।’

– ‘सम्पूर्ण भारतवर्ष हम सबकी जननी है, इसके कण-कण की रक्षा करना हम सबका कर्त्तव्य है।’ महाराणा ने कहा।

– ‘मेवाड़ को भी अब अपने हित-अनहित के सम्बंध में दूसरे राज्यों की भांति प्रचलित मान्यताओं से कुछ हटकर सोचना चाहिये। ताकि प्रजा में स्थायित्व आये तथा शांति और समृद्धि का आगमन हो सके।’ मानसिंह ने अकबरी शतरंज का पहला मोहरा आगे बढ़ाया।

– ‘मैं आपका आशय समझा नहीं कुंअरजू!’

– ‘मेवाड़ विगत सैंकड़ों वर्षों से दिल्ली से जूझता आया है। दिल्ली सल्तनत के विभिन्न राजवंशों के रहते ऐसा करना उचित ही था किंतु मुगलों के दिल्लीधीश्वर बन जाने के बाद स्थिति बदल गयी है। अब दिल्ली से लोहा लेने में कोई लाभ नहीं है। इस अनावश्यक संघर्ष से मेवाड़ की शक्ति का अपव्यय हो रहा है तथा जनता की समृद्धि नष्ट हो रही है।’

– ‘कुंअरजू! मैं समझता हूँ कि इस समय हमारा आत्मीय बंधु नहीं अकब्बर का सेवक बोल रहा है।’

– ‘दोनों ही भूमिकाओं में मैं एक ही व्यक्ति हूँ महाराणाजी।’

– ‘तुम एक होकर भी दो भूमिकाएं निभा सकते हो किंतु हम नहीं। हमारी भूमिका हमारे पूर्वज लिख गये हैं, उसे नये सिरे से लिखना हमारे वश में नहीं है।’

– ‘महाराणाजी! यदि राजा का हठ प्रजा के लिये हितकर नहीं हो तो राजा को अपना हठ त्याग देना चाहिये।’

– ‘मेवाड़ में राजा और प्रजा अलग नहीं हैं कुंअरजू! जो राजा का हठ है, वही प्रजा का हठ है और जो प्रजा के लिये हितकर है, वही राजा के लिये भी हितकर है।’

– ‘आप तनिक शांत मस्तिष्क से विचार करें। आप भारत भर के राजाओं में सबसे बुद्धिमान, सबसे वीर और सबसे उत्तम राजा हैं। आपके जैसे महान् राजा की प्रजा अंतहीन संघर्ष का कष्ट उठाये यह उचित नहीं है।’ मानसिंह ने महाराणा को उत्तेजित होते देखकर अपने शब्द बदले।

– ‘जब यह सम्पूर्ण संसार ही नश्वर है तो फिर कष्ट चिरस्थायी कैसे हो सकते हैं। एक न एक दिन उनका भी नाश होना ही है।’

– ‘किंतु किस मूल्य पर? जब मुगलों की सेना मेवाड़ भूमि को जलाकर राख कर देगी, तब यदि कष्ट नष्ट भी होंगे तो उनका क्या लाभ होगा?

– ‘मानसिंह।! मेवाड़ को जला कर राख कर देना आसान नहीं है। कोई प्रयास करके तो देखे।’

– ‘महाराणाजी! मैं नहीं चाहता कि कभी भी ऐसा हो किंतु आप कल्पना कीजिये कि जब मुगलों के लाख-लाख सैनिक मेवाड़ के चप्पे-चप्पे पर छा जायेंगे तब प्रजा के लिये कौनसी ठौर बचेगी?’

– ‘मेवाड़ की प्रजा म्लेच्छों की गुलामी करने के स्थान पर रणभूमि में मृत्यु का आलिंगन करना अधिक उचित समझेगी।’

– ‘शहंशाह अकबर ने आपसे मित्रता की अपेक्षा की है, न कि अधीनता की।’

– ‘मित्रता के नाम पर हिन्दुआनियों के डोले मुगल शहजादों को जायें, यह मित्रता नहीं है, अधीनता है, छल है, राष्ट्र का अपमान है।’

महाराणा के उत्तर से मानसिंह का मुँह उतर गया। उसका वंश ही भारतवर्ष में पहला राजवंश था जिसने अपनी कुंअरि का डोला अकबर को देकर, इस कुचेष्टा का मार्ग प्रशस्त किया था। वह आगे कोई तर्क न करके गर्दन झुकाकर इतना ही बोला- ‘मुगल आपसे कुंअरियों के डोले नहीं मांगेंगे।’

महाराणा ने भी वातावरण को अत्यंत कटु हो आया देखकर इस विषय पर आगे बोलना उचित नहीं समझा। उसने विषय बदलते हुए कहा- ‘कुंअरजू के सम्मान में उदयसागर की पाल पर भोजन का आयोजन किया गया है। आप कृपा कर वहीं  पधारें। कुंअर अमरसिंह आपकी अगवानी करेंगे।’

यह कहकर महाराणा उठ गया। उसके साथ ही समस्त सभासद भी उठ खड़े हुए। कुंअर अमरसिंह राजा मानसिंह को लेकर उदयसागर की पाल पर पहुँचा। मानसिंह के सम्मान में सचमुच ही भोजन का विशाल आयोजन किया गया था। मेवाड़ के समस्त सामंत और जागीरदार इस अवसर पर उपस्थित थे।

राजा मानसिंह के सामने कांसे का बहुत बड़ा थाल रखा गया और उसमें विविध व्यंजन रखे गये। कुंअर अमरसिंह के लिये भी मानसिंह के सामने ही थाल लगाया गया था। जब अमरसिंह ने राजा मानसिंह को भोजन आरंभ करने का अनुरोध किया तो मानसिंह ने पूछा- ‘क्या महाराणा भोजन नहीं करेंगे?’

– ‘महाराणाजू के पेट में दर्द है। इसलिये उन्होंने कहलवाया है कि मैं ही आपके साथ भोजन करूं।’

पलक झपकते ही मानसिंह सारी स्थिति समझ गया। वह समझ गया कि महाराणा उसके साथ भोजन क्यों नहीं करना चाहता। अपमान से मानसिंह का चेहरा लाल हो गया और मारे क्रोध के उसकी साँस तेज-तेज चलने लगी। उसने अपनी म्यान में से कटार निकाली और उससे थाली उलटते हुए कहा- ‘अब तो महाराणा के पेट की दवा लेकर आऊंगा तभी भोजन करूंगा।’

मेवाड़ के सामंतों ने तलवारें खींच लीं। अमरसिंह ने उन्हें तलवारें म्यान में रखने का संकेत करते हुए मानसिंह से निवेदन किया- ‘जैसी आपकी इच्छा कुंअरजू!’

मानसिंह अपमान और क्रोध से तिलमिलाया हुआ चेहरा लिये हुए, डेरे से बाहर हो गया।

जब मानसिंह बिना भोजन किये हुए ही जाने लगा तो महाराणा को सूचित किया गया। महाराणा ने उससे कहलवाया- ‘यदि तुम अपनी सामर्थ्य से हमारे पेट में दर्द की दवा लेकर आओगे तो हम मालपुरे में आपका स्वागत करेंगे और जो अपने फूफा अकब्बर के साथ आओगे तो जहाँ हमसे बन पड़ेगा, वहीं तुम्हारा सत्कार करेंगे।’ मानसिंह एक बार फिर तिलमिला कर रह गया।

महाराणा ने भोजन उठाकर कुत्तों को खिला दिया और तालाब के किनारे की मिट्टी खुदवाकर वहाँ गंगाजल छिड़कवाया।

-अध्याय 64, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

नववर्ष उत्सव (65)

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नववर्ष उत्सव

आज के दरबार में बड़ी भीड़ थी। दरबारे आम में वैसे भी बड़ी भीड़ रहती है किंतु आज की भीड़ कुछ अलग किस्म की थी। आम दिनों में तो मांगने वालों और फरियादियों का तांता लगता है किंतु आज के दिन रियाया बादशाह को नववर्ष उत्सव की मुबारिकबाद देने के लिये उपस्थित हुई थी।

आज के दिन से हिन्दुओं के विक्रम संवत का 1638वां साल आरंभ हो रहा था। हर साल नये विक्रम पर इस तरह के विशेष दरबार का आयोजन नहीं होता था किंतु रियाया हर साल बादशाह को नये साल की मुबारिकबाद कहने आती थी इसलिये अकबर ने इस साल से नये साल का विशेष दरबार करना आरंभ किया।

जब सारे मनसबदार, अमीर, उमराव और सरदार अपनी-अपनी पंक्ति में क्रमबद्ध खड़े हो गये तो बख्शी बादशाह को दरबार में लिवाकर लाया। अकबर ने एक भरपूर निगाह दरबार में उपस्थित लोगों पर डाली। बादशाह की दृष्टि रहीम पर जाकर रुकी। रहीम ने बादशाह की इच्छा जानकर बादशाह और सभासदों को नववर्ष की बधाई देते हुए कहा -‘जहाँपनाह! हिन्दुस्थान में नया साल आज के दिन से आरंभ होता है। इस मुबारक दिन की शुरूआत अच्छे कामों और अच्छी बातों से हो तो आज के दिन को यादगार बनाया जा सकता है।’

– ‘मिर्जाखाँ! आज के दिन तुम ही कोई इतनी अच्छी बात कहो जो हमें जीवन भर याद रहे।’

– ‘गरीबों और बेकसों पर रहम खाने वाले नेकदिल शंहशाह! आपका इकबाल युगों-युगों तक इस धरती पर बुलंद रहे। जहाँपनाह! आज धरती भर के बादशाहों में आपका प्रभुत्व सबसे बढ़ चढ़ कर है। आप सब प्रकार से सामर्थ्यवान हैं। प्रभुता आप पर फबती है किंतु आज के इस मुबारक दिन के उजाले में मेरा दिल कुछ और कहना चाहता है।’

– ‘तुम अपनी बात निश्चिंत होकर कह सकते हो मिर्जा!

– ‘जिल्ले इलाही! मेरा मन कहता है कि आदमी का प्रभुत्व वास्तव में ईश्वर का प्रभुत्व है। इसलिये वास्तव में प्रभुता ईश्वर को ही फबती है। उसके आगे बड़े से बड़ा बादशाह भी तुच्छ मनुष्य है। उस परम शक्तिशाली ईश्वर ने सब मनुष्यों को आजाद पैदा किया है तब फिर तुच्छ मनुष्य की क्या सामर्थ्य जो बादशाह होकर अपने ही जैसे मनुष्यों को गुलाम बनाये?’

– ‘तुम क्या कहना चाहते हो मिर्जा, खुलकर कहो।’ रहीम की रहस्यमयी बात सुनकर अकबर के कान खड़े हो गये। 

– ‘जहाँपनाह! बादशाही सिपाहियों, अमीरों, उमरावों तथा और भी जो ताकतवर लोग इस धरती पर हैं उन्होंने अपने ही जैसे लाखों आदमियों को जबर्दस्ती पकड़ कर गुलाम बना रखा है। जिस अल्लाह ने ताकतवर लोगों को बनाया है उसी परवरदिगार ने बेकस और मजलूम गुलामों को बनाया है। उन्हें जबर्दस्ती पकड़ना और उनसे बलपूर्वक गुलामी करवाना उचित नहीं है। क्यों नहीं आज नये साल के मुबारक दिन में हम अपने गुनाह कबूल करें और गुलामों को अल्लाह की इच्छा के मुताबिक आजाद कर दें।’

मिर्जाखाँ की बात सुनकर बादशाह अचंभे के सागर में डूब गया। क्या ऐसा संभव है कि गुलामों को आजाद कर दिया जाये? हजारों साल से हमारे बाप-दादे गुलामों को पकड़ते आये हैं और उनसे अपनी सेवा करवाते आये हैं। यदि गुलाम न रहे तो हमारी सेवा टहल और नीच काम कौन करेगा?

दरबारियों ने भी इस विचित्र बात को सुना तो वे अचंभे से जड़ हो गये। अकबर ने हिन्दू सरदार राजा टोडरमल की ओर देखा

– ‘जहाँपनाह! मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम बजा फर्माते हैं। इंसानों को जबर्दस्ती गुलाम बनाया जाना ठीक नहीं है। बात-बात पर गुलामों को कोड़े मारना, बात-बात पर उनकी खाल खिंचवा लेना, यह अमानवीय है तथा ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध जान पड़ता है।’ राजा टोडरमल ने कहा। 

– ‘यदि गुलाम न रहे तो फिर सेवा, चाकरी और नीच टहल के काम कौन करेगा?’ खानेजहाँ कोका ने ऐतराज किया।

– ‘यह काम स्वेच्छा से काम करने वाले सेवकों से करवाया जाये और इसके लिये उन्हें भृत्ति का भुगतान किया जाये।’ राजा टोडरमल ने सुझाव दिया।

– ‘राजा बीरबल! आप क्या कहते हैं?’ बादशाह ने बीरबल की ओर गर्दन घुमाईं

– ‘जहाँपनाह……….! ‘

– ‘सम्राट अकबर की जय। राजा टोडरमल की जय। मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम की जय। राजा बीरबल की जय………..।’ इससे पहले कि बीरबल कुछ जवाब देता, दरबारे आम में मौजूद सहस्रों लोगों की भीड़ बादशाह और उसके अमीरों की जय-जयकार बोलने लगी। राजा बीरबल ने मुस्कारकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

– ‘क्या किसी अमीर, उमराव, सरदार और राजा को इस सम्बंध में कुछ कहना है?’ अकबर ने पूछा।

परम्परा से गुलामों की निर्बाध सुविधा भोगने वाले तुर्क एवं मंगोल अमीरों को यह बात अच्छी नहीं लगी किंतु शहबाजखाँ का उदाहरण उनके सामने था। इस समय मिर्जाखाँ की इच्छा के विरुद्ध बोलने का एक ही अर्थ था और वह था बादशाह के कोप को आमंत्रण।

जब कोई अमीर-उमराव कुछ नहीं बोला तो अकबर ने उसी क्षण ऐलान किया कि आज से उसके राज्य में कोई भी व्यक्ति किसी को गुलाम नहीं बनायेगा। जो भी गुलाम इस समय जहाँ कहीं भी हैं वे मुक्त किये जाते हैं। वे अपने मर्जी के मुताबिक कहीं भी जाने को स्वतंत्र हैं। वे चाहें तो अपने वर्तमान मालिक के यहाँ चाकरी में रह सकते हैं लेकिन उनके मालिकों को उन्हें वेतन का भुगतान करना होगा। इस आदेश का उल्लंघन करने वाले सजा के हकदार होंगे।

बीसियों हिन्दू सरदार, जागीरदार और मनसबदार उसी समय बादशाह अकबर, मिर्जा रहीम और राजा टोडरमल की जय-जयकार बोलने लगे। आम जनता ने भी उनके कण्ठ से कण्ठ मिलाया।

नये साल के पहले दिन यह सचमुच एक बड़ा तोहफा था जो पूरे साढ़े तीन सौ साल बाद मिर्जा रहीम ने हिन्दुस्थान की प्रजा को दिलवाया था। कुतुबुदीन ऐबक ने 1193 ईस्वी में भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना की थी। वह स्वयं मुहम्मद गौरी का जेर खरीद गुलाम था।

उसके शासन काल में हजारों हिन्दुओं को जबर्दस्ती पकड़ कर गुलाम बनाया गया था। तब से ही हिन्दुस्थान में यह परम्परा चली आ रही थी लेकिन आज हिन्दुस्थान के हजारों गरीब, बेकस और मायूस इंसानों की जिंदगी में आशा की नवीन किरण का संचार हुआ।

आज का दिन रहीम का था। अभी उसका काम समाप्त नहीं हुआ था। उसने कहा- ‘जहाँपनाह! इस मुबारक बादशाही इच्छा के लिये मैं आपको मुबारक देता हूँ लेकिन एक और अर्ज किया चाहता हूँ।’

– ‘कहो मिर्जाखाँ, अपने दिल की बात जरूर कहो। आज का दिन तुम्हारा है।’

– ‘हुजूर! अल्लाह ने मासूम पंछियों के सीने में मासूम दिल छुपाया है। इन मासूम दिलों में घाव करना अल्लाह के बंदों के लिये उचित नहीं है। इन मासूम परिंदों पर दया की जानी चाहिये।’ रहीम ने निवेदन किया।

– ‘लेकिन हजारों आदमी चिड़ियों को पकड़ कर अपना रोजगार चलाते हैं। यदि परिंदों को मारने पर रोक लगाई गयी तो उन गरीब इंसानों का क्या होगा?’ अकबर मिर्जाखाँ के सुझाव पर हैरान था।

– ‘परवर दिगार! इंसान बहुत छोटे लाभ के लिये बड़ा अपराध करता है। छोटे-छोटे जीव-जंतु, चिड़ियां और मछलियाँ इस प्रकृति की नियामत हैं, इनके वध पर रोक लगनी चाहिये।’ मिर्जाखाँ अब भी अपनी बात पर अडिग था।

अकबर ने फिर से राजा टोडरमल की ओर देखा।

– ‘जहाँपनाह! मिर्जाखाँ की बात सही है। आदमी अपना पेट भरने के लिये यदि बड़ा जानवर मारे तो एक जानवर से कई इंसानों का पेट भरेगा किंतु एक इंसान का पेट भरने के लिये जाने कितने छोटे-छोटे परिंदों की जान चली जाती है।’

– ‘लेकिन बड़े जानवर! वे भी तो अल्लाह के बनाये हुए हैं। जब छोटे जानवरों को मारना उचित नहीं है तो क्या बड़े जानवरों को मारना उचित है?’ अकबर ने पूछा।

– ‘उचित तो उन्हें मारना भी नहीं है किंतु उन्हें मारने से पहले इंसान दस बार सोचता है और अत्यंत आवश्यक होने पर ही मारता है। जबकि निरीह परिंदों को तो वह बिना सोचे समझे, केवल अपने मौज, शौक और मनोरंजन के लिये मार डालता है।’ राजा बीरबल ने जवाब दिया।

– ‘खानेजहाँ, आपका क्या विचार है?’

– ‘बादशाह की इच्छा ही सर्वोपरि है जिल्ले इलाही।’ कोका ने सिर झुका कर जवाब दिया।

– ‘जब आप सबकी ऐसी ही इच्छा है तो हम आज के मुबारक दिन यह हुक्म देते हैं कि हमारे राज्य में बिना किसी कारण के किसी परिंदे और मछली आदि छोटे जीव को न मारा जाये। सब जीवों को अल्लाह की नियामत समझा जाये और अल्लाह का हुकुम मानकर उनकी रक्षा की जाये।’ अकबर अपनी बात पूरी करके क्षण भर के लिये ठहरा।

– ‘आज के इस मुबारक मौके पर हम एक ऐलान और किया चाहते हैं।’ सारे दरबार की निगाहें फिर से बादशाह की ओर घूम गयीं।

– ‘शहजादे सलीम के अतालीक का पद लम्बे समय से रिक्त है। हम बहुत दिनों से चिंतित थे कि शहजादे के योग्य अतालीक कहाँ से ढूंढ कर लायें। सौभाग्य से हमारे अपने दरबार में अत्यंत योग्य अतालीक मौजूद है किंतु हमारी निगाह उस ओर गयी ही नहीं। आज हम उसी योग्य और रहमदिल इंसान को अपने शहजादे का अतालीक मुकर्रर किया चाहते हैं।’ अकबर ने फिर से अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

कौन होगा शहजादे का नया अतालीक? समस्त दरबारियों की उत्सुक निगाहें अपने चारों ओर खड़े महत्वपूर्ण व्यक्तियों को खोजने लगीं।

– ‘जहाँपनाह! कौन वह सौभाग्यशाली है जिसे शहजादे का अतालीक मुकर्रर किया जाना तय किया गया है।’

– ‘मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम। वे हर तरह से इस कार्य के लिये उपयुक्त हैं। हम उन्हीं को शहजादे का नया अतालीक नियुक्त करते हैं। हमें भरोसा है कि मिर्जाखाँ के संरक्षण में शहजादे की उचित तालीम होगी और वह एक नेकदिल इंसान बन पायेगा।’ मिर्जाखाँ बादशाह की इस आकस्मिक कृपा से अभिभूत था। उसके पास बादशाह का आभार ज्ञापित करने के लिये शब्द नहीं थे।

इसी ऐलान के साथ नये साल का दरबार बर्खास्त हो गया। उस दिन आम रियाया, शिया अमीर और हिन्दू उमराव बादशाह अकबर, राजा टोडरमल और मिर्जाखाँ रहीम की जय जयकार बोलते हुए दरबार से निकले। चगताई, ईरानी और तूरानी सुन्नी अमीरों के चेहरों पर चिंता की नयी लकीरें उभर आयी थीं किंतु वे बादशाही कोप को गजबइलाही[1]  से कम नहीं समझते थे इसलिये चिंता की उन लकीरों को छुपा कर रखने में ही अपनी भलाई समझते थे।

-अध्याय 65, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] ईश्वरीय प्रकोप।

चित्रकूट की एक शाम (66)

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चित्रकूट की एक शाम

चित्रकूट की एक शाम तीन राजपुरुष अपने कीमती और ऊँचे घोड़ों को मंथर गति से मंदाकिनी के किनारे-किनारे चलाये ले जा रहे थे। वे तीनों असाधारण रूप से चुप थे। वनावली के सघन होने पर भी मार्ग बिल्कुल साफ था किंतु ऐसा लगता था कि नदी और अश्व अपनी-अपनी गति को एक दूसरे के अनुरूप बना कर गतिमान हो रहे थे। मंदाकिनी के निर्मल जल में किल्लोल करने वाली मछलियाँ और तट की बालुका पर चलने वाले अश्व एक दूसरे को भलीभांति देख सकते थे।

वस्त्र एवं शस्त्र सज्जा से वे तीनों ही कोई उच्च राजपुरुष प्रतीत होते थे। तीनों के सिर पर मुगलिया राजशाही की प्रतीक एक जैसी पगड़ियाँ सुशोभित थीं जिनपर मूल्यवान मोहर और कलंगी जड़ी थी। तीनों राजपुरुषों की कमर में बड़ी-बड़ी तलवारें लटकी रही थीं जिनकी मूठों पर बहुमूल्य रत्न जड़े थे।

उनकी पीठों पर सावधानी से बंधी ढालों में भी कीमती रत्नों की भरमार थी जिससे वे युद्ध में काम आने वाली वस्तु के स्थान पर सजावट की वस्तु अधिक प्रतीत होती थीं। इस साम्य के अतिरिक्त उन तीनों घुड़सवारों की शेष वेषभूषा आपस में मेल नहीं खाती थी।

सबसे आगे चल रहा घुड़सवार कतिपय स्थूल और वर्तुलाकाय देह का स्वामी था। उसकी वय भी उसके साथियों में सर्वाधिक थी। वह प्रौढ़ावस्था को पार करके वानप्रस्थावस्था में प्रवेश करने को तैयार प्रतीत होता था। उसके माथे का गोल तिलक और देह के रेशमी वस्त्र उसके राजपुरुष होने की घोषणा तो करते थे किंतु चेहरे मोहरे से वह वह राजपुरुष न होकर कोई बड़ा सेठ साहूकर अधिक प्रतीत होता था।

दूसरा घुड़सवार किसी प्रौढ़ वयस हिंदू नरेश जैसा दिखायी देता था। उसके माथे पर केसर-कुमकुम से शैव पद्धति का बड़ा सा तिलक अत्यंत सावधानी पूर्वक अंकित किया गया था जिसके मध्य में भस्म की क्षीण रेखा भी सुशोभित थी।

तीसरा घुड़सवार लगभग पच्चीस वर्ष का कड़ियल जवान था। उसने मुगलिया नवाब की वेषभूषा धारण कर रखी थी। उसकी तीखी ठुड्डी और उस पर तरतीब से तराशी गयी तीखी दाढ़ी उसके तुर्क होने की परिचायक थी। उसकी छोटी और सतर्क आँखों से दर्प टपका ही पड़ता था जिसे सहन कर पाना हर किसी के वश का नहीं था।

ये तीनों घुड़सवार आपस में घनिष्ठ मित्र थे और आज बहुत दिनों बाद साथ-साथ किसी ऐसी लम्बी यात्रा पर निकले थे जो किसी युद्ध के प्रयोजन से नहीं की जा रही थी। प्रयाग से सरैयों और उससे आगे सोनेपुर तक तो वे आपस में खूब बतियाते आये थे किंतु जैसे ही सरौही से कामदगिरि के दर्शन होने प्रारंभ हुए, तीनों ही मित्र असाधारण रूप से चुप हो गये थे तथा उनके घोड़ों की गति भी असाधारण रूप से धीमी हो गयी थी।

सूर्यदेव पश्चिम की ओर झुक चले थे किंतु संध्या होने में अभी विलम्ब था। ये तीनों मित्र प्राकृतिक वनावली, मंदाकिनी के सानिध्य और कामद गिरि के दर्शनों का लाभ लेते हुए अंततः रामघाट पहुँच गये। यहाँ से वे अपने अश्वों से उतर पड़े। उन्होंने अपने अश्व मंदाकिनी के तट पर स्थित वृक्षों से बांध दिये और स्वयं नदी की रेती में उतर पड़े। अब उनका लक्ष्य सामने दिखायी देने वाली एक छोटी सी कुटिया थी जिसके बाहर तुलसी की झाड़ियां बहुतायत से विद्यमान थीं। इन झाड़ियों के चारों ओर नदी के वर्तुल प्रस्तरों से कलात्मक घेरे बने हुए थे।

इन तीनों को अपनी ओर आता हुआ देखकर कुटिया में से एक प्रौढ़ वयस सन्यासी इनकी अगवानी के लिये बाहर आया। दोनों प्रौढ़ वयस राजपुरुष सन्यासी के पैरों में गिर पड़े। युवा खान अपरिचय के संकोच के कारण एक ओर खड़ा रहा।

सन्यासी ने दोनों राजपुरुषों को उठा कर हृदय से लगाते हुए कहा- ‘राजा टोडरमल! राजा मानसिंह! आप दोनों राजपुरुषों का इस अकिंचन की कुटिया में स्वागत है।’

– ‘गुसांईजी महाराज! रघुनाथजी ने हम पर बड़ी कृपा कीन्ही सो आपके दर्शन सुलभ हुए।’ राजा टोडरमल ने हाथ जोड़कर सन्यासी की अभ्यर्थना करते हुए कहा।

– ‘रघुनाथजी के मन की दया को कौन जान सकता है! मुझे तो लगता है उन्होंने इस अकिंचन तुलसीदास पर कृपा करके आप जैसे दुर्लभ राजपुरुषों के दर्शन चित्रकूट में ही सुलभ करवा दिये। यह तो बताईये कि ये युवा सिपहसलार कौन हैं?’

– ‘ये खानखाना बैरामखाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम हैं। आप बादशाह अकब्बर के मीर अर्ज हैं तथा शहजादे सलीम के शिक्षक भी। ये बहुत दिनों से आपसे मिलने को उत्सुक थे। आपके ही अनुरोध पर आज हम यहाँ आपके श्री चरणों में उपस्थित हो सके हैं।’

– ‘बहुत अच्छी बात की जो आप लोग इन्हें भी अपने साथ ले आये किंतु यह तो पता लगे कि ये मुझे कैसे जानते हैं और मुझसे क्यों भेंट किया चाहते हैं।’

अब्दुर्रहीम ने किसी तरह हिम्मत जुटा कर कहा-

‘ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात।

अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ।’

खान के मुँह से इतना सुंदर दोहा सुनकर गुसांईंजी प्रसन्न हुए। उन्होंने हँस कर कहा-

‘उमा दारु जोषित की नाईं।

सबहि नचावत राम गुसाईं।।’ 

खान गुसांईंजी के पैरों में गिर पड़ा। उसने कहा-

‘जो रहीम तन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं।

जल में जो छाया परी, काया भीजत नाहिं।’ 

गुसांईंजी ने भाव विभोर होकर खान को धरती से उठाते हुए कहा-

‘तुलसी काया खेत है, मनसा भये किसान।

पाप पुण्य दोऊ बीज हैं, बुवै सो लुणे निदान।’

गुसांईजी की महती कृपा देखकर रहीम ने विह्वल होकर कहा-

 ‘तन रहीम है कर्म बस, मन राखो ओहि ओर।

 जल में उलटी नाव ज्यों, खैंचत गुन के जोर।।”

गुसांईंजी ने रहीम को हृदय से लगा लिया तथा उसे अपने पास नारियल के पत्तों की चटाई पर बैठाते हुए कहा- ‘और सुनाओ। कुछ ऐसा सुनाओ कि कानों को और सुख मिले।’

  – ‘गुसांईंजी! मेरी ऐसी सामर्थ्य नहीं।’ खान ने सहम कर कहा।

  – ‘खानजू!’ गुसांईंजी के नेत्रों में जल भर आया।

गुसांईंजी की ऐसी विह्वलता देखकर रहीम गाने लगा-

”भज  मन  राम सियापति, रघुकुल ईस।

दीनबंधु,   दुख   टारन,   कौसलधीस।

भर नरहरि,  नारायन,  तजि  बकवाद।

प्रगटि  खंभ ते राख्यो  जिन   प्रहलाद।

गोरज  धन  बिच  राखत,  श्री ब्रजचंद।

तिय दामिनि जिमि हेरत, प्रभा  अमंद।।” [1]

गाते-गाते रहीम के नेत्रों से जलधार बह निकली। गुसांईंजी के शरीर में भी रोमांच हो आया। उनकी रोमावली खड़ी हो गयी और आँखों के कोये आंसुओं से भीग गये। वे भी गाने लगे-

”राम राम रटु,  राम राम रटु,  राम  राम जपु जीहा।

राम नाम नवनेह मेह  को,  मन!  हठि  होहि  पपीहा।

सब साधन फल कूप सरित सर, सागर सलिल निरासा।

राम नाम रति स्वाति सुधा  सुभ  सीकर  प्रेम पियासा।”

गुसाईंजी चुप हुए तो रहीम ने गाया-

”तैं रहीम मन आपुनो, कीन्हों चारू चकोर।

 निसि बासर लागो रहै, कृष्णचंद की ओर।।”

युगों-युगों से प्यासे चातक बहुत देर तक रघुनाथ कीर्तन का रसपान करते रहे। प्रौढ़ वयस राजपुरुष इस अद्भुत मिलन को देखकर रोमांचित थे। उन्हें इस बात का अनुमान तो था कि रहीम उत्कृष्ट कवि है किंतु वह इस उच्च कोटि का कृष्ण भक्त है, इसका ज्ञान उन्हें आज ही हुआ।

बहुत देर तक कुटिया में आनंद रस बरसता रहा। पत्तियों के छिद्रों में से झांकते हुए सूर्यदेव अपनी गति भूल कर आकाश में थम ही गये। अचानक उन्हें अपनी स्थिति का ज्ञान हुआ तो वे हड़बड़ा कर कामदगिरि की खोह में विश्राम करने के लिये प्रस्थान कर गये। सूर्य देव की इस हड़बड़ाहट के कारण अचानक ही अंधेरा हो गया। ठीक उसी समय शिष्यों ने आकर निवेदन किया- ‘अतिथियों के लिये भोजन तैयार है।’

-अध्याय 66, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] खानखाना कृत।

प्रजापालन (67)

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प्रजापालन

राजा के मंत्री ही राजा की ओर से प्रजापालन , प्रजा का अनुशासन और उसकी सार-संभाल करते हैं। जिस राजा के सचिव, सहायक और सेवक प्रजा को दुख देते हैं, उस राजा का नाश हो जाता है और प्रजा पीड़ित होती है।

अतिथियों के भोजन के बाद चारों व्यक्ति तसल्ली से बैठे। किसी को किसी तरह की शीघ्रता न थी।

– ‘हमने सुना है कि राजाजी ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध बड़ी वीरता दिखायी।’ गुसांईंजी ने मानसिंह की ओर देखते हुए कहा।

गुसांईंजी के कथन से मानसिंह के मुख की आभा जाती रही, उसका कण्ठ सूख गया। वह कुछ नहीं बोल सका।

– ‘कहिये! क्या राणा ने अधीनता स्वीकार कर ली?’ गुसाईंजी ने फिर प्रश्न किया।

– ‘नहीं! वे स्वाभिमानी हैं, वे जान दे देंगे किंतु पराधीनता स्वीकार नहीं करेंगे।’ राजा मानसिंह ने किसी तरह प्रत्युत्तर दिया।

– ‘सुना है महाराणा ने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया!’ गुसांईंजी ने फिर प्रश्न किया।

– ‘महाराणा ने वीरोचित व्यवहार ही किया है गुसांईंजी! दुर्भाग्य मेरा है, मैं ही उचित सत्कार के योग्य नहीं हूँ।’ 

– ‘अपने आप को उचित सत्कार के योग्य बनाओ राजाजी।’

– ‘मैं प्रयास करता हूँ किंतु यह मेरे बूते से बाहर की बात है।’

– ‘बूता तो रघुवीरजी देंगे। आप उनसे बूता मांग कर तो देखिये किंतु बूता मांगने से पहले बंधु के साथ विग्रह का भाव त्यागना होगा।’

– ‘मेरा उनसे कोई विग्रह नहीं। मैं तो कर्त्तव्य पालन के लिये ही उनके सामने हथियार उठाता हूँ।’

– ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अकर्त्तव्य को ही कर्त्तव्य समझ बैठे हैं?’

– ‘मेरी तुच्छ बुद्धि मुझे कोई निर्णय नहीं करने देती।’

– ‘जो सहजता से उपलब्ध है, उसे स्वीकार कर लेने की लालसा हमें बुद्धि से काम ही नहीं करने देती।’

– ‘मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ गुसाईंजी।’

– ‘बंधु द्रोह भयानक पाप है राजन्। मनुष्य को इस पातक से बचने के लिये प्राण देकर भी प्रयास करना चाहिये। जो अबंधु है, जो रिपु है, जो हरिविमुख है, उस पर कोप करने की सामर्थ्य और इच्छा पैदा करो। अन्यथा जीवन में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा।’

मानसिंह ने धरती पर माथा टिका दिया। उसके नेत्रों से जलधार बह निकली। गुसाईंजी ने बड़े स्नेह से उसके माथे पर हाथ फिराया।

– ‘कहिये राजा टोडरमल! आपके राज्य में जनता सुख से तो है?’ गुसाईंजी ने प्रौढ़ वयस स्थूलाकाय अतिथि को सम्बोधित करके पूछा।

– ‘राज्य शहंशाह अकब्बर का है महात्मन्। मैं तो उनका अकिंचन सेवक हूँ।’ राजा टोडरमल ने सिर झुका कर उत्तर दिया।

– ‘राजा के मंत्री ही राजा की ओर से प्रजा का अनुशासन और उसकी सार-संभाल करते हैं। जिस राजा के सचिव, सहायक और सेवक प्रजा को दुख देते हैं, उस राजा का नाश हो जाता है और प्रजा पीड़ित होती है। आप राज्य के वित्त और अर्थ सचिव हैं। आपका उत्तरदायित्व तो सर्वाधिक है।’

– ‘सचिव के अधिकार की सीमा और अपनी सामर्थ्य भर तक तो मैं प्रजा पालन का प्रयास करता ही हूँ महात्मन्।’

– ‘इस समय भारत वर्ष की जनसंख्या कितनी है?’

– ‘सिंधु नदी से बंगाल के समुद्र तक तथा हिमालय से सेतुबंध रामेश्वरम् तक लगभग बारह करोड़ जन निवास करता है।’

– ‘उसमें से कितनी प्रजा मुगल साम्राज्य के अधीन है?’

– ‘लगभग दस करोड़ महात्मन्।’

– ‘मुगल साम्राज्य में मंत्रियों, सचिवों तथा उच्चाधिकारियों की संख्या कितनी है?’

– ‘कुल मिलाकर यही कोई आठ हजार मनसबदार होंगे।’

– ‘राजकीय कोश का कितना हिस्सा इन मनसबदारों में बँटता है?’

– ‘साम्राज्य की कुल आय का इकरानवे प्रतिशत इन मनसबदारों में बँट जाता है।

– ‘इन आठ हजार मनसबदारों में से सम्राट, राजपुत्रों तथा सचिवों आदि उच्च अधिकारियों की संख्या कितनी है?’

– ‘एक हजारी जात और उनसे ऊपर के मनसबदारों की संख्या चार सौ पैंतालीस है।’

– ‘उन पर राजकीय आय का कितना प्रतिशत व्यय होता है?’

– ‘यही कोई इकसठ प्रतिशत।’

– ‘सम्राट और राजपुत्रों की संख्या कितनी है?’

– ‘बादशाह तथा उसके शहजादों सहित प्रथम श्रेणी के कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों तथा रईसों की संख्या अड़सठ है।’

– ‘इनके ऊपर कितना खर्च होता है?’

– ‘लगभग सैंतीस प्रतिशत।’

– ‘शेष आय का क्या होता है?’

– ‘इसमें से अधिकांश राशि काजियों, उलेमाओं, खतीबों, मुहतसिबों, मुफ्तियों, सद्रों तथा तथा फकीरों में बँट जाती है।’

– ‘यह सारा धन आता कहाँ से है?’

– ‘प्रजा से विभिन्न प्रकार के करों के रूप में प्राप्त होता है।’

– ‘क्या इसके अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्राट अथवा उसके अधिकारियों के पास धन नहीं आता?’

– ‘युद्ध में लूटा गया धन बादशाह तथा उनके सैनिकों को प्राप्त होता है। उसे राजकीय कोष में जमा नहीं करवाया जाता। इसलिये उसका कोई हिसाब नहीं है।’

– ‘भारतवर्ष की जिस प्रजा से विपुल कर लेकर आप इतना धन एकत्र करते हैं, उसका कितना प्रतिशत प्रजा के हितार्थ व्यय किया जाता है?’

– ‘बादशाह, शहजादों तथा मनसबदारों को जो धन दिया जाता है, वह समस्त धन प्रजा के रक्षण हेतु सैन्य जुटाने में व्यय होता है।’

– ‘सम्राज्य विस्तार हेतु किया गया सैन्य व्यय प्रजा के रक्षण के लिये कैसे माना जा सकता है?’

– ‘प्रजा रक्षण एवं साम्राज्य विस्तार साथ-साथ ही चलते हैं प्रभु।’

– ‘जो सैन्य स्वयं ही प्रजा को लूटता फिरता हो, उनकी सम्पत्ति, गौ तथा स्त्रियों का हरण करता हो। उससे किस प्रकार के प्रजा रक्षण की अपेक्षा है आपको?’ गुसाईंजी ने किंचित् रुष्ट होकर पूछा।

राजा टोडर मल गुसाईंजी की खिन्नता देखकर सहम गया। उसके मुँह से कोई शब्द तक न निकल सका।

– ‘सत्य तो यह है राजाजी कि सम्राट, राजपुत्रों तथा सामंतों के भोग से बचा हुआ अधिशेष सैनिकों के सामने फैंका जाता है। इस उच्छिष्ट से सैनिकों का उदर नहीं भरता। उन्हें विवश होकर प्रजा में लूट मार करनी पड़ती है। इसमें आपका दोष नही है क्योंकि म्लेच्छ सम्राट के राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार यही है।’

गुसाईंजी क्षण भर के लिये मौन रहे और फिर एक लम्बी साँस लेकर बोले-

”किसबी किसान कुल, बनिक भिखारी भाट,

चाकर  चपल  नट,  चोर,  चार,  चेटकी।

पेट को  पढ़त,  गुन  गढ़त,  चढ़त  गिरि,

अरत   गहन-गन,   अहन   अखेट  की।

ऊँचे  नीचे  करम  धरम   अधरम   करि,

पेट  को  ही  पचत,  बेचत  बेटा  बेटकी।

तुलसी  बुझाई  एक  राम  घनश्याम ही तें,

आग  बड़वागि  ते  बड़ी है  आग पेट की।

दारिद  दसानन  दबाई,   दुनी  दीन  बंधु।

दुरित  दहन   देखि   तुलसी  हहा  करी।”

कुटिया में निस्तब्धता छा गयी। कुछ समय पश्चात् गुसांईजी ने ही मौन तोड़ा- ‘आप लोग राज पुरुष हैं किंतु क्या इस सत्य से परिचित हैं कि आज प्रजा के मन में सत्ता के सत्य का अनुभव जितना गहरा है, उससे भी अधिक गहरा अनुभव सत्ता की व्यर्थता का है। किसान कारीगर, और सामान्य प्रजा भुखमरी अनिश्चय और सैन्य शोषण से त्रस्त है।

सम्राट के पापों का दण्ड प्राकृतिक आपदाओं के रूप में फलित होता है। प्रजा दिन रात हाड़ तोड़ परिश्रम करके किसी तरह अपने आप को जीवित रखे हुए है। बहुत से लोग घर बार छोड़कर योगियों, मुनियों, साधुओं, संतों, सिद्धों, तांत्रिकों तथा उदासीन तापसों के वेश धारण करके भिखारी बने हुए घूमते हैं।

इनकी लूट पाट से त्रस्त प्रजा का विश्वास धर्म में से उठता जा रहा है। बड़ी संख्या में उत्पन्न पण्डों, पुरोहितों, पुजारियों और ज्योतिषियों ने भी प्रजा से धन ऐंठने के ना-ना उपाय ढूंढ निकाले हैं। लोगों की आस्था धर्माचारण से उठती जा रही है।

कुटिया के बाहर रात गहराती जा रही थी और भीतर मौन।

-अध्याय 67, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

अयोग्य शिष्य (68)

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अयोग्य शिष्य

खानखाना अब्दुर्रहीम अच्छी तरह जनता था कि शहजादा सलीम एक ऐसा अयोग्य शिष्य है जिसे कभी भी पढ़ा-लिखा कर इंसान नहीं बनाया जा सकता।

कच्छवाहों की राजकुमारी जोधाबाई से निकाह करके अकबर ने उसे मरियम उज्जमानी नाम दिया और उसे शाह-बेगम घोषित किया। उससे उत्पन्न पुत्र सलीम का नामकरण सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर किया गया।

सलीम का नामकरण भले ही सूफी संत के नाम पर किया गया था किंतु वह बहुत जिद्दी और क्रूर प्रवृत्ति का बालक था। उसकी शिक्षा के लिये कई शिक्षकों को नियुक्त किया गया किंतु वे इस दुष्ट बालक को नहीं पढ़ा सके। अंत में अकबर ने अब्दुर्रहीम को इस कार्य के लिये चुना।

जब अब्दुर्रहीम को शहजादा सलीम का अतालीक बनाया गया तो उसने बादशाह का आभार जताने के लिये बड़ा भारी जलसा किया। बादशाह अपने तमाम अमीर-उमरावों और शहजादों सहित रहीम के डेरे पर हाजिर हुआ और दिल खोलकर मिर्जाखाँ की तारीफ में कसीदे पढ़े।

अब्दुर्रहीम ने अकबर की इच्छानुसार जिद्दी बालक सलीम का समुचित शिक्षण प्रारंभ किया तथा बालक के शारीरिक, बौद्धिक एवं मानसिक विकास का हर संभव प्रयास किया किंतु सलीम भी शिक्षा के मामले में अपने बाप अकबर का ही अनुकरण करने वाला सिद्ध हुआ।

जिस प्रकार हुमायूँ के लाख चाहने पर भी अकबर ने विधिवत् शिक्षा नहीं ली, उसी प्रकार सलीम भी पढ़ाई लिखाई से दूर ही रहा। भाग्य की यह विचित्र विडम्बना ही थी कि अकबर को बैरामखाँ जैसा और सलीम को अब्दुर्रहीम जैसा अद्भुत शिक्षक मिला किंतु वे अच्छी शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके।

सलीम की अयोग्यता को देखकर अब्दुर्रहीम ने माथा पीट लिया किंतु फिर भी उसने किसी तरह सलीम को फारसी, तुर्की तथा हिन्दी भाषाओं का ज्ञान करवाया और हिन्दी तथा फारसी में कविता लिखना भी समझाया। उसे घुड़सवारी और तलवारबाजी का भी ज्ञान करवाया।

जब सलीम पंद्रह साल का हुआ तो उसका विवाह कच्छवाहा राजकुमारी मानबाई से करवा दिया गया। इसके बाद तो सलीम का मन शिक्षा से पूरी तरह हट गया। उधर खानखाना भी मुगलिया सल्तनत का दक्षिण भारत में प्रसार करने में जुट गया तो उसके पास सलीम को पढ़ाने का समय न रहा।

अब्दुर्रहीम के दूर हटते ही सलीम बुरे लोगों की संगत में पड़ गया और उसने अब्दुर्रहीम की शिक्षाओं को भुलाकर एक क्रूर इंसान का रूप ले लिया। उसके हरम में स्त्रियों की संख्या बढ़ने लगी जो शीघ्र ही आठ सौ तक जा पहुँची। दिन भर हिंजड़े, गवैये और नचकैये सलीम के हरम में धमाल मचाये रहते। सलीम इनके साथ दिन-रात शराब पीता और शिकार खेलने जाता।

नियति ने भारत वर्ष के साथ कैसा क्रूर मजाक किया था, इस संस्कारहीन, अमर्यादित शराबी के भाग्य में विधाता ने भारत का भाग्य विधाता होने के अंक लिखे थे।

-अध्याय 68, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

कविता का व्याकरण (69)

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कविता का व्याकरण

खानखाना अच्छी तरह समझता था कि जीवन रूपी कठोर कविता का व्याकरण और चाटुकारिता से भरी हुई कविता का व्याकरण कितने अलग होते हैं।

शहजादे का अतालीक मुकर्रर किये जाने से अब्दुर्रहीम के रुतबे और ख्याति में एकाएक ही बहुत वृद्धि हुई। अब्दुर्रहीम की विद्वता की ख्याति सुनकर उसके दरबार में दुनिया भर के लोग जुटने लगे जिनमें कवियों की संख्या सर्वाधिक थी। हिन्दुस्थान, ईरान, तूरान तथा ख्वारिज्म के लगभग तीन सौ कवि निरंतर उसके दरबार में उपस्थित रहते।

अब्दुर्रहीम स्वयं भी तुर्की, फारसी, अरबी, हिन्दी, संस्कृत अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं का जानकार था। उसने ग्यारह वर्ष की आयु में बिना गुरु की सहायता से पहली काव्य रचना की थी तब से उसकी कविता में निखार आता ही गया था। अकबर ने फ्रांस और यूरोपीय देशों से पत्राचार करने का जिम्मा रहीम पर ही छोड़ रखा था जिससे उन देशों के लोग भी जब रहीम से मिलने आते तो रहीम को खुश करने के लिये अपने देश के कवियों की कवितायें सुनाया करते।

वास्तव में उन दिनों अकबर के दरबार तक पहुँचने का मार्ग अब्दुर्रहीम के दरबार से होकर गुजरता था। उस काल में शासक वर्ग के पास बज्म[1]  और रज्म[2]  को छोड़कर और कोई काम न था। इसलिये कविगण भी अधिकतर अपने आकाओं को खुश करने वाली, स्त्रियों के अंग लास्य का वर्णनातीत वर्णन करने वाली तथा हर तरह से अपने स्वामियों का मनोरंजन करने वाली कवितायें ही अधिक कहते थे। दर्शन और नीति से रहित उन कविताओं में चाटुकारिता का ही भाव अधिक होता था।

इन बेस्वाद कविताओं का व्याकरण रहीम के मन को किंचित् भी रास नहीं आता था और कभी-कभी तो उसका मन दरबारी व्याकरण वाली कविताओं से पूरी तरह से उचाट हो जाता था फिर भी यदि रहीम को कवियों के बीच बैठना सुहाता था तो केवल इसलिये कि रहीम को पूरा विश्वास था कि यदि धरती से खून-खराबे का दौर कभी समाप्त होगा तो इन्हीं कवियों के दम पर। उन दिनों बहादुरी दिखाने वाले और दान देने वाले तो फिर भी मिल जाते थे किंतु कवियों और कविताओं का सम्मान करने वालों का पूरी तरह अभाव था।

चाटुकार कवियों के साथ-साथ गंग, केशवदास[3]  मंडन तथा चामुंडराय जैसे कविता के वास्तविक मर्म को जानने वाले कवि भी रहीम के दरबार में आने लगे थे। इन कवियों की कृपा से रहीम के पुस्तकालय में पूरी दुनिया के कवियों की कविताओं का संग्रह होने लगा था जिनकी नकलें उतारने और संभाल कर धरने के लिये तीन सौ से अधिक आदमी रहीम के पुस्तकालय में लगे रहते थे। रहीम का पुस्तकालय उस समय हिन्दुस्थान का सबसे बड़ा पुस्तकालय था। कवियों के साथ चित्रकारों, गवैयों और संगीतकारों का भी अच्छा जमावड़ा होने लगा था।

वस्तुतः इन सब उपायों से रहीम ने अपने समय की मुख्य धारा को ही बदल दिया। वह समय धरती का सबसे बड़ा तोपखाना खड़ा करने, हाथियों की सबसे बड़ी फौज संगठित करने, राज्य सीमाओं का विस्तार करने और निर्दोषों का खून बहाने की मिसालें कायम करने का था किंतु रहीम ने भारत का सबसे बड़ा कवि दरबार जोड़कर, सबसे बड़ा पुस्तकालय स्थापित कर और गवैयों तथा चित्रकारों को प्रश्रय देकर अपने बाप दादों का पुराना ढर्रा ही बदल दिया था। इस तरह वह स्वयं एक आदमी न रहकर सांस्कृतिक प्रतिष्ठान बन गया था।

इन सबसे अलग और बड़ी बात तो यह थी कि वह अपने दरबार के समस्त कवियों से अलग था और उसने अपना सुर उस समय की कवि परम्पराओं से न मिलाकर धूल, गरीबी और मुसीबतों में लिपटे गाँवों की गलियों में भटकने वाले कवियों और गवैयों से मिलाया। उसकी कविता में गरीब के आँसू थे जिनका व्याकरण अभावों और मुसीबतों में गढ़ा गया था।

-अध्याय 69, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  आमोद-प्रमोद।

[2]  युद्ध।

[3] ये महाकवि बिहारी के पिता थे।

जुआ (70)

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जुआ

मिर्जा खाँ को रणक्षेत्र से बाहर खींच ले जाने का प्रयास करने वाले उसके शुभचिंतक सैनिक नहीं जानते थे कि मिर्जा खाँ आज सेनापति नहीं था, जुआरी था, जिसने पराये हाथों में थमे पासों पर अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था। हर हालत में उसे जुआ खेलना ही अभीष्ट था, पक्के जुआरी की तरह, हारे चाहे जीते।

गुजरात के सुलतान मुजफ्फर खाँ को बादशाह अकबर कैद करके अपने साथ आगरा ले आया था किंतु कुछ दिनों बाद ही वह अकबर के नमक हराम नौकरों को अपनी और मिलाकर कैद से भाग निकलने में सफल हो गया और फिर से बड़ी भारी फौज एकत्र करके उसने लगभग पूरे गुजरात पर दखल जमा लिया। अहमदाबाद में बैठकर मुजफ्फर खाँ ने मुल्क में अपने नाम की दुहाई फेर दी। इससे अकबर की बड़ी किरकिरी हुई।

दुबारा मुजफ्फर खाँ के पीछे जाना अकबर अपनी शान के खिलाफ समझता था। एक से एक बड़ा सेनापति अकबर की सेवा में हाजिर था किंतु वह इस मोर्चे पर किसी विश्वसनीय आदमी को ही भेजना चाहता था। बहुत सोच विचार करने के बाद अकबर ने मिर्जा खाँ अब्दुर्रहीम को यह जिम्मा सौंपा। रहीम के साथ दस हजार सैनिकों की फौज भेजी गयी।

जब रहीम यह फौज लेकर मेड़ता के पास पहुंचा तो मुजफ्फर खाँ ने पट्टन में टिके हुए मुगल सेनापति कुतुबुद्दीन को मार डाला और आगे बढ़कर भंड़ूचमें भी भारी तबाही मचाई। अब्दुर्रहीम ताबड़तोड़ चलता हुआ पाटन पहुँचा। वहाँ पहुंचकर उसका उत्साह ठण्डा पड़ गया। उसे ज्ञात हुआ कि इस समय मुजफ्फर खाँ के पास चालीस हजार घुड़सवार और एक लाख पैदल सेना है।

भाग्य रहीम को एक बार फिर से आगरा से गुजरात खींच ले आया था और बहुत दूर से कबड्डी दे रहा था। यह वही गुजरात था जो पहले भी दो बार रहीम का जीवन पूरी तरह से बदल चुका था। रहीम को लगा कि इस बार की चुनौती पहले की तमाम चुनौतियों से किसी भी तरह कम विषम नहीं थी। इस चुनौती को जीत पाना आसान नहीं था, चारों ओर मौत का ही सामान सजा हुआ था। 

अब्दुर्रहीम के दस हजार सैनिक तो मुजफ्फर खाँ के अजगर रूपी सैन्य के मुँह में मेमने की तरह पिस कर मरने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते थे। मिर्जाखाँ रहीम को उसके आदमियों ने सलाह दी कि मालवा से मुगल लश्कर मंगवा लिया जाये तभी मुजफ्फर खाँ पर हाथ डाला जाये।

इस पर मिर्जा खाँ के मंत्री दौलत खाँ लोदी ने रहीम को गुप्त सलाह दी कि यदि वह अपने पिता की तरह भाग्य पलटना चाहता है तो बड़ा खतरा मोल ले। मालवा की सेना के आने पर युद्ध जीता गया तो उसका श्रेय अकेले रहीम को नहीं मिलेगा। उसमें दूसरे सेनापतियों का हिस्सा होगा।

मिर्जा खाँ को अपने मंत्री की बात जंच गयी और वह अपने दस हजार आदमियों के दम पर ही इस लड़ाई को जीतने की तैयारी करने लगा। उसने अपनी सेना के सात टुकड़े किये और उन्हें इस तरह समायोजित किया जिससे जरूरत पड़ने पर इन अंगों को आसानी से जोड़ा एवं अलग किया जा सके। स्वयं इस लश्कर के केंन्द्र में स्थित रहकर उसने हिन्दू राजाओं को अपने बांयी ओर तथा मुस्लिम सेनापतियों को दांयी ओर रखा। इसके बाद उसने गुजरात की ओर प्रस्थान किया।

जब मुजफ्फर खाँ को ज्ञात हुआ कि अब्दुर्रहीम सात सेनाएं लेकर आ रहा है तो वह अहमदाबाद में आ टिका और अब्दुर्रहीम की प्रतीक्षा करने लगा। अब्दुर्रहीम अहमदाबाद के बाहर मानपुर में आकर ठहर गया। दोनों ओर की सेनाएं एक दूसरे की वास्तविक ताकत को तोलने में लग गयीं।

इसी बीच रहीम ने एक नाटक खेला। उसने अपने कुछ विश्वस्त आदमियों को एक नकली फरमान बादशाह की ओर से बनाकर दिया और उन्हें चुपचाप आगरा की तरफ कुछ दूर चले जाने को कहा। फिर रहीम खुद ही बहुत सारे आदमी अपने साथ लेकर उनके पीछे गया और गाजे बाजे के साथ उन्हें अगवानी करके लौटा लाया। रहीम के नौकरों ने निर्धारित योजना के अनुसार बादशाह का नकली फरमान रहीम की सेवा में पेश किया।

सारी सेना के बीच यह नकली फरमान जोर-जोर से पढ़कर सुनाया गया। इस फरमान में बादशाह ने लिखा था कि हम आते हैं, हमारे पहुँचने तक लड़ाई मत करना।

यह फरमान सुनकर सारी सेना मारे प्रसन्नता के नाच उठी तथा उत्साह में भर कर सरखेज की तरफ आगे बढ़ गयी और अहमदाबाद के बाहर साबरमती के तट पर जाकर टिक गयी, जिस तरफ मुजफ्फरखाँ की फौज पड़ाव किये हुए थी। मुजफ्फरखाँ ने यह सुनकर कि बादशाह स्वयं फौज लेकर आ रहा है, बादशाह के आने से पहले से ही रहीम की सेना को नष्ट करने का विचार किया।

उसने काफी दूर जाकर नदी पार करने तथा रहीम की सेना पर पीछे से वार करने की योजना बनायी। इस पर रहीम ने राय दुर्गा को मुजफ्फरखाँ की सेना को पीछे से रोकने के लिये नियुक्त किया और जब मुजफ्फरखाँ की आधी सेना नदी पार करने के लिये आगे बढ़ गयी तब रहीम अपनी बाकी की छः सेनाओं को लेकर मुजफ्फरखाँ पर जा चढ़ा। इससे मुजफ्फरखाँ की सेना में भ्रम फैल गया तथा सेना के दो टुकड़े हो गये।

दिन चढ़े तक लड़ाई होती रही। भयानक मारकाट मची जिसमें अब्दुर्रहीम के ठीक सामने ढाल की तरह अड़े हुए सैनिकों का पूरी तरह चूरा हो गया। हरावल और एलतमश के पैर टूट जाने पर अब्दुर्रहीम की जान पर बन आयी। उसके आस-पास केवल एक सौ हाथी और तीन सौ घुड़सवार रह गये।

मुजफ्फर खाँ इनके ठीक सामने अपने सात हजार सैनिकों के साथ जमा हुआ था। रहीम को इस विपन्न अवस्था में देखकर वह आगे बढ़ा। पक्के जुआरी की तरह रहीम इस स्थिति से निबटने के लिये पहले से ही तैयारी कर चुका था। उसने महावतों को आदेश दिया कि बिना कुछ भी देखे हुए जितनी तेजी से हो सके, उतनी तेजी से अपने हाथियों को आगे की ओर हूलते रहें और जहाँ तक हो सके ज्यादा से ज्यादा संख्या में दुश्मन के सैनिकों को रौंदते रहें।

दुश्मन ठीक छाती पर चढ़ आया। जिस प्रकार समंदर की लहरों को गिन सकना संभव नहीं है उसी प्रकार इस दुश्मन से भी पार पाना संभव जान नहीं पड़ता था किंतु अब कुछ नहीं हो सकता था। दांव खेला जा चुका था। अब तो केवल परिणाम ही जानना शेष था। एक बार तो ऐसी नौबत आयी कि मिर्जाखाँ के आदमियों ने मिर्जा खाँ के घोड़े की लगाम पकड़ ली और उसे जबर्दस्ती खींचकर मैदान से बाहर ले जाने लगे।

मिर्जा खाँ को रणक्षेत्र से बाहर खींच ले जाने का प्रयास करने वाले उसके शुभचिंतक सैनिक नहीं जानते थे कि मिर्जा खाँ आज सेनापति नहीं था, जुआरी था, जिसने पराये हाथों में थमे पासों पर अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था। हर हालत में उसे जुआ खेलना ही अभीष्ट था, पक्के जुआरी की तरह, हारे चाहे जीते। उसने सैनिकों के हाथ से अपने घोड़े की रास छुड़ा ली और घोड़े को ऐंड़ लगाकर तेजी से आगे बढ़ गया।

ठीक उसी समय रहीम की युक्ति काम कर गयी। रहीम के हाथियों ने मुजफ्फर खाँ की सेना को कुचल कर रख दिया। मुजफ्फर खाँ का तोपखाना आगे वाली सेना ले जा चुकी थी, बची हुई सेना हाथियों को रोकने में असमर्थ सिद्ध हुई। फतह हासिल करने का वक्त आ पहुंचा था। रहीम और उसके आदमी दुगने जोश से तलवार चलाने लगे।

यह विशुद्ध जुआ था जो मिर्जा खाँ ने भाग्योत्थान के लालच में खेला था। इसका परिणाम कुछ भी हो सकता था। भाग्यलक्ष्मी उस पर रीझी हुई थी, उसने मिर्जा खाँ के पक्ष में जीत का नया पन्ना लिख दिया। मुजफ्फर खाँ मात खाकर राजमहेन्द्र की ओर भागा।

भागते हुए सैनिकों का पीछा करने के बजाय रहीम पलट कर खड़ा हो गया और नदी पार करके आने वाली मुजफ्फर खाँ की अग्रिम सेना की प्रतीक्षा करने लगा।

उधर जब मुजफ्फर खाँ की अग्रिम सेना ने नदी पार की, तब उसे समाचार मिला कि मुजफ्फर खाँ परास्त होकर राज महेंद्र की ओर भाग गया है तब वह सेना भी आगे बढ़ने के बजाय फिर से नदी पार करके भाग खड़ी हुई। राय दुर्गा प्रतीक्षा ही करता रह गया।

विजय की प्रसन्नता में रहीम ने अपने बचे खुचे सैनिकों को इकठ्ठा किया और अपना सर्वस्व उनमें बाँट दिया। आखिर में एक सिपाही मिर्जा खाँ की सेवा में हाजिर हुआ। उसे कुछ नहीं मिला था लेकिन तब तक रहीम का सर्वस्व बँट चुका था। मिर्जा खाँ ने अपने डेरे में निगाह घुमाई, वहाँ एक कलमदान के अतिरिक्त कुछ न रह गया था। रहीम ने सिपाही को कलमदान देकर कहा कि आज तो यही ले जाओ मौका आने पर, इस कलमदान के बदले में जो जी चाहे ले जाना।

जब मिर्जा खाँ की जीत का समाचार आगरा पहुँचा तो अकबर ने मिर्जा खाँ का को खानखाना का खिताब, एक भारी खिलअत तथा पाँच हजारी मनसब बख्शा और रहीम के आदमियों के भी मनसब बढ़ाये।

-अध्याय 70, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

नोपकृतं (71)

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नोपकृतं

प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु,  मित्रेषु बंधुवर्गेषुं। नोपकृतं  नोपकृतं  नोपकृतं  कि कृतं तेन।। अर्थात्- जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का क्रमशः उपकार, उपकार और उपकार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

गुजरात विजय के उपलक्ष्य में खानखाना बनाये जाने पर अब्दुर्रहीम दिल्ली दरबार में उपस्थित हुआ और उसने बादशाह के प्रति आभार का प्रदर्शन किया। बादशाह ने उसकी सेवाओं की प्रशंसा की और उसे फिर से मोर्चे पर लौट जाने के आदेश दिये।

अब्दुर्रहीम को खानखाना बनाये जाने के उपलक्ष्य में अब्दुर्रहीम के महलों में भारी उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर अमीरों, उमरावों और हिन्दू नरेशों के साथ-साथ बड़ी संख्या में कवि, गवैये और चित्रकार भी उपस्थित हुए। दिल्ली में इस समारोह की धूम मच गयी।

वैसे भी नये, पुराने, अनाड़ी और मंजे हुए कवि अब्दुर्रहीम के समक्ष आने के लिये हर समय उत्सुक रहते थे तथा उसेे अपनी कविताएं सुनाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे। वे अपनी कविताएं रहीम को सुनाते और अब्दुर्रहीम से प्रशंसा तथा पुरस्कार पाकर अपनी उन्नति का मार्ग खोलने की चेष्टा  करते थे। इस अवसर पर जगन्नाथ त्रिशूली ने एक श्लोक रहीम के दरबार में उपस्थित कवियों के सामने सुनाया-

प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु, मित्रेषु बंधुवर्गेषुं।

नापकृतं नोपकृतमं न सत्कृतं कि कृत तेन।।[1]

दरबार में उपस्थित कवियों ने युवा कवि जगन्नाथ की बड़ी प्रशंसा की लेकिन रहीम कुछ चिंतत हो गये।

– ‘क्या बात है, खानखाना को श्लोक ठीक नहीं लगा?’ युवा कवि ने सहमते हुए पूछा।

– ‘श्लोक बहुत सुंदर है किंतु कवि यदि अनुमति दे तो मैं इसमें कुछ संशोधन करना चाहता हूँ।’ अब्दुर्रहीम ने कहा।

– ‘यदि खानखाना स्वयं मेरी कविता में सुधार करेंगे तो यह मेरा सौभाग्य होगा।’ जगन्नाथ त्रिशूली ने कहा।

– ‘तो फिर इस श्लोक को इस तरह पढ़ो कवि-

प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु,  मित्रेषु बंधुवर्गेषुं।

नोपकृतं  नोपकृतं  नोपकृतं  कि कृतं तेन।।[2]


[1]  जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का (क्रमशः) अपकार, उपकार और सत्कार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

[2] जिसने चल अधिकार पाकर शत्रु, मित्र और भाई बंदों का क्रमशः उपकार, उपकार और उपकार नहीं किया, उसने कुछ नहीं किया।

-अध्याय 71, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

बनी के राना (72)

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बनी के राना

तुम जंगल के सेर बनी के राना । बड़ेन  की  चाल  बड़ेन पहचाना ।।

– ‘अब्बा हुजूर, फिर क्या हुआ?’ जाना ने पिता के कंधे पर मुक्का मारा।

– ‘अरे कब क्या हुआ?’ खानखाना ने पूछा।

– ‘अरे कल जो कहानी आप हमें सुना रहे थे, उसमें आगे क्या हुआ?’

– ‘हम कल कौनसी कहानी सुना रहे थे?’

– ‘हम कल कौनसी कहानी सुना रहे थे? इतना भी याद नहीं रहता?’ जाना ने पिता की नकल उतारते हुए कहा।

– ‘हाँ भई! नहीं रहता।’

– ‘अरे वो जंगल के सेर वाली।’

– ‘सेर नहीं शेर।’

– ‘लेकिन आप ही ने तो कल सेर बोला था।’

– ‘अरे वह तो कविता में ऐसे कह सकते हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि शेर हमेशा के लिये सेर हो जायेगा।’

– ‘अच्छा अब्बा हुजूर! अब मैं शेर ही बोलूंगी, सेर नहीं। आप आगे की कहानी तो सुनाइये।’

– ‘हाँ तो कल हम कहाँ थे?’

– ‘हम तो यहीं थे, अपने डेरे में।’

– ‘डेरे में तो थे किंतु कहानी में कहाँ थे?’

– इसे क्या मालूम, ये तो सो गयी थी।’ ऐरेच ने कहा।

– नहीं! मैं सोयी नहीं थी, मुझे सब याद है।

– अच्छा बताओ तो तुम्हें क्या याद है?’

– ‘आप ने कहा था कि जब सियार ने जुलाहे को कंधे पर कपास धुनने का धुना और हाथ में कमानी लेकर जाते हुए देखा तो सियार ने सोचा कि यह कोई शिकारी है और शिकार मारने के लिये जंगल में आ रहा है। सियार ने सोचा कि यह कहीं मुझ पर ही तीर न मार दे इसलिये खुशामद से इसको खुश किया जाये।’

– ‘हाँ-हाँ! मैंने कल यहाँ तक ही कहानी सुनायी थी कि मियाँ फहीम आ गये थे हमें शिकार पर ले जाने के लिये।’

– ‘अब्बा हुजूर! ये खुशामद क्या होता है?’

– ‘जब किसी को प्रसन्न करने के लिये झूठी सच्ची तारीफ की जाती है तो उसे खुशामद कहते हैं। जैसे हम तुम्हारी खुशामद करते रहते हैं।’ खानखाना ने बेटी के गाल पर चपत लगाते हुए कहा।

– ‘अब्बा हुजूर! ये जाना तो बस बोलती ही रहती है। आप कहानी सुनाईये ना।’ दाराब ने मचल कर कहा।

– ‘अब्बा हुजूर! सियार ने जुलाहे की खुशामद कैसे की?’ जाना ने अपनी नन्हीं हथेलियों से खानखाना का सिर अपनी ओर मोड़ते हुए कहा। वह नहीं चाहती थी कि पिता भाई की ओर देखे।

– ‘तू बीच-बीच में सवाल मत पूछ।’ ऐरच ने जाना को धमकाया।

– ‘यदि तुम सब चुप होकर बैठोगे तो ही तो मैं कहानी सुना पाऊंगा ना!’ खानखाना ने कहा।

– ‘अच्छा हम सब चुप होकर बैठते हैं।’ कारन ने सब बच्चों को चुप रहने का संकेत किया।

– ‘सियार ने सोचा कि यदि मैं इस शिकारी को दिल्ली का राजा कहूंगा तो यह मुझसे बड़ा राजी होगा और मुझे नहीं मारेगा। इसलिये उसने बड़ी मीठी आवाज में कहा-

”कांधे  धनुष  हाथ  में  बाना।

कहाँ  चले   दिल्ली   पतराना।”

जुलाहा पहली बार जंगल से गुजर रहा था। उसने सुना था कि जंगल में भयानक शेर रहते हैं जो आदमी को खा जाते हैं लेकिन उसने कभी भी शेर को देखा नहीं था। सियार को देखकर उसने सोचा कि हो न हो, यही शेर है। जुलाहा डर गया और उससे बचने का उपाय सोचने लगा। उसने सोचा कि बड़ा आदमी बड़ी बात ही सोचता है। यह खुद राजा है इसलिये मुझे भी राजा ही समझता है। यदि मैं इसे जंगल का राणा कहकर इसकी प्रशंसा करूं तो यह अवश्य ही मुझे छोड़ देगा। इसलिये जुलाहे ने कहा-

”तुम जंगल के सेर बनी के राना।

बड़ेन  की  चाल  बड़ेन पहचाना।”

– ‘फिर क्या हुआ?’

– ‘फिर क्या होना था, दोनों ने एक दूसरे की झूठी तारीफ की, दोनों ही एक दूसरे से डरते रहे और दोनों ही एक दूसरे को क्षमा करके अपने-अपने रास्ते चल दिये।

– ‘फिर क्या हुआ?’

– ‘फिर कुछ नहीं हुआ, खेल खतम, पैसा हजम।’

– ‘अब्बा हुजूर! हमें भी एक दिन शिकार मारने के लिये ले चलिये ना।’ जाना ने कहा।

– ‘तू तो लड़की है। तू कैसे शिकार मारेगी! मैं लड़का हूँ, मैं अब्बा हुजूर के साथ शिकार मारने जाऊंगा।’ ऐरच ने कहा।

– ‘मैं भी तो लड़का हूँ, मैं भी अब्बा हुजूर के साथ शिकार मारने जाऊँगा।’ दाराब ने कहा।

– ‘नहीं लड़की होने से क्या होता है, मैं जरूर ही शिकार मारने जाऊँगी।’ जाना ने कहा।

– ‘अच्छा-अच्छा। झगड़ो मत। तुम सब कल शिकार मारने चलना। तुम्हारी अम्मी को भी ले चलेंगे।’ खानखाना ने बच्चों का फैसला करते हुए कहा।

-अध्याय 72, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

अहेर (73)

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अहेर

मैं यहाँ अहेर खेलने के लिये आया था। अपने साथियों से अलग होकर जंगल में भटक गया। खानखाना अपने कपड़े झाड़ते हुए उठ बैठा। उसकी भुजा में अब भी भयानक दर्द हो रहा था।

अरावली की सघन उपत्यकाओं में एक आदमी तेजी से भागा चला जा रहा था किंतु हाथ में गाय का रस्सा पकड़े हुए होने से उसकी गति तेज नहीं हो पाती थी। उसकी छोटी कटी हुई दाढ़ी तथा वेशभूषा से ज्ञात होता था कि वह कसाई है। कुछ लोग हाथों में लम्बी तलवार लेकर उसका पीछा कर रहे थे।

उनकी वेशभूषा स्थानीय राजपूतों जैसी थी। कसाई, अपने पीछे आने वाले मनुष्यों के भय से ऐसे कठिन मार्ग का अनुसरण कर रहा था जिस मार्ग पर घोड़े आदि किसी सवारी पर बैठकर निकल पाना संभव नहीं था। इससे उसके कपड़े काँटों में उलझ कर तार-तार हो गये थे।

जब गाय को लेकर भागने वाला कसाई किसी तरह पकड़ में न आया तो पीछा करने वाले मनुष्य तीन दिशाओं में इस प्रकार बिखर गये जिससे कि कसाई को किसी संकरे स्थान में घेरा जा सके। काफी देर की भाग दौड़ के बाद अंततः कसाई पकड़ा गया। पीछा करने वाले आदमियों ने तलवार के एक ही वार से गाय की रस्सी काट दी। गाय रस्सी कटते ही भाग खड़ी हुई।

गाय के भाग जाने से क्रुद्ध होकर कसाई छुरा निकाल कर अपने प्रतिद्वंद्वियों पर टूट पड़ा। उसका यह दुस्साहस देखकर पीछा करने वाले राजपूतों ने अपनी तलवारें उसकी छाती पर टिका दी। इससे पहले कि उनमें कुछ संवाद हो पाता। जाने कहाँ से एक खान अचानक प्रकट हुआ और राजपूतों को ललकारने लगा।

– ‘एक अकेले आदमी को इस तरह जंगल में घेरकर वध करने में तुम्हें लज्जा नहीं आती?’ खान ने दूर से चिल्लाकर कहा।

– ‘पापी का वध करने में कैसी लज्जा?’ एक राजपूत ने सचमुच ही उसका वध करने की नीयत से अपनी तलवार आकाश में घुमाई।

– ‘मैं कहता हूँ कि ठहर जा। अन्यथा अपनी जान से हाथ धोएगा।’ खान ने तलवार घुमाने वाले इंसान को चेतावनी दी। अब वह इन लोगों के काफी निकट आ गया था।

– ‘मुझे आदेश देने वाला तू कौन होता है?’ राजपूत ने अपनी तलवार खान की ओर घुमाते हुए कहा।

– ‘मैं कौन होता हूँ यह तो तुझे ज्ञात हो ही जायेगा फिलहाल तो तू मेरी तलवार का वार संभाल।’ खान ने हवा में तलवार घुमाकर राजपूत पर भरपूर वार किया। राजपूत इस अप्रत्याशित हमले के लिये तैयार नहीं था। वह कंधा पीछे करके किसी तरह बचा।

देखते ही देखते घमासान मच गया। अपनी परम्परा के मुताबिक एक राजपूत खान से दो-दो हाथ करने लगा। बाकी के तीनों राजपूत इन्हें देखने के लिये खड़े हो गये। राजपूतों को खान के साथ उलझा हुआ देखकर कसाई मौका पाकर भाग खड़ा हुआ। राजपूत कड़ियल जवान था तो खान भी उससे कम बलिष्ठ नहीं था।

दोनों ही तलवार के खिलाड़ी जान पड़ते थे। थोड़ी देर बाद खान हाँफने लगा। वह भुजा पर राजपूत की तलवार का वार भी खा बैठा। वार बचाने के लिये जैसे ही खान जमीन पर झुका, राजपूत ने उसे लात मार कर जमीन पर गिरा दिया और फुर्ती से खान की छाती पर चढ़ बैठा।

– ‘अब बोल क्या कहता है?’ राजपूत ने तलवार की नोक खान की छाती में चुभाते हुए पूछा।

खान चुपचाप जमीन पर पड़ा रहा। उसकी भुजा और छाती में इतनी जोर का दर्द हो रहा था कि उससे बोलते नहीं बन पड़ रहा था।

– ‘सरदार इस खान का क्या किया जाये?’ खान की छाती पर बैठै युवक ने अपने प्रौढ़ साथी की तरफ देखकर पूछा।

– ‘इसी से पूछ। क्यों बीच में पड़ा था यह?’

– ‘तुम चार आदमी मिलकर एक आदमी को मार रहे थे इसी से मैं बीच में पड़ा।

– ‘किस अधिकार से?’

– ‘तलवार के अधिकार से।’

– ‘तू क्या राव उदयसिंह[1]  है, जो तू सिरोही राज्य में तलवार का अधिकारी हो गया।’

– ‘तेरा राव उदयसिंह मेरा मातहत है।’

– ‘तो तू दिल्लीधीश्वर है?’ प्रौढ़ राजपूत ने व्यंग्य पूर्वक कहा।

– ‘मैं दिल्लीधीश्वर अकबर का सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम हूँ।’

– ‘कौन अब्दुर्रहीम? क्या खानखाना बैरामखाँ का बेटा?’

– ‘हाँ वही।’

– ‘सच कहता है?’

– ‘हाँ।’

– ‘क्या तू वही अब्दुर्रहीम है जिसने मुगल राज्य में आदमी को गुलाम बनाने और चिड़ियों के मारने पर रोक लगवाई है?’ दूसरे राजपूत ने पूछा।

– ‘हाँ।’

– ‘इतना बडा़ सेनापति, बिल्कुल अकेला? और इस अवस्था में?’ प्रौढ़ सरदार ने खान की छाती पर बैठे युवक को खड़े होने का संकेत करते हुए कहा।

– ‘मैं यहाँ शिकार खेलने के लिये आया था। अपने साथियों से अलग होकर जंगल में भटक गया। खानखाना अपने कपड़े झाड़ते हुए उठ बैठा। उसकी भुजा में अब भी भयानक दर्द हो रहा था।

– ‘बिना यह जाने कि गलती किस की है, बिना यह जाने कि वह कसाई कौन था, बिना यह जाने कि हम कौन हैं, तू बिना अपना परिचय दिये अचानक तलवार लेकर टूट पड़ा?’

– ‘हमें किसी पर टूट पड़ने के लिये किसी से अनुमति नहीं लेनी होती। हम अपनी इच्छा के मालिक स्वयं हैं।’

– ‘हम चाहें तो तेरी गर्दन इसी समय काट दें किंतु तूने म्लेच्छों के राज्य में आदमियों को गुलाम बनाने पर रोक लगवाई है और तूने निरीह पक्षियों को मारने पर भी पाबंदी लगवाई है। तू नेक दिल इंसान है इसलिये हम तेरी जान नहीं लेते।’

– ‘मेरी जान लेना इतना आसान नहीं है सरदार। चाहे तो अपने मन की कर के देख ले।’

– ‘नहीं। हम तेरी जान नहीं लेंगे। इस डर से नहीं कि हमें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी अपितु इसलिये कि हम तेरी इज्जत करते हैं। हमने तेरे बारे में कई किस्से सुन रखे हैं। जा तू अपनी राह को चला जा और हमें अपनी राह जाने दे।’

– ‘ऐसे कैसे जायेगा सरदार? अभी तो तूने ही हमारा सत्कार किया है, हमारा सत्कार भी तो देख।’

– ‘बड़े आदमियों का सत्कार न ही मिले तो अच्छा। फिर कभी मौका लगा तो तेरा सत्कार भी देखेंगे।’

जैसे ही सरदार अपने आदमियों को लेकर वहाँ से चलने को हुआ, खानखाना के साथी उसे ढूंढते हुए वहीं आ पहुँचे। खानखाना ने अपने आदमियों को संकेत किया। चारों राजपूत उसी समय बंदी बना लिये गये।

बच्चे पिता के इस तरह अलग हो जाने से डर गये थे। माहबानू भी खानखाना के अचानक बिछड़ जाने से चिंतित थी किंतु अब उसके सुरक्षित मिल जाने से उसकी साँस में साँस आई।

जब राजपूतों को खानखाना के डेरे पर लाया गया तो खानखाना ने उन राजपूतों से कहा- ‘यदि अपनी गुस्ताखी के लिये क्षमा मांग लो तो तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।

राजपूतों ने कहा- ‘गाय की रक्षा करना हमारा धर्म है। यदि खानखाना चाहे तो हमारी गर्दन काट ले किंतु हम क्षमा नहीं मांगेंगे।’

राजपूतों की दृढ़ता देखकर खानखाना ने उन्हें स्वतंत्र कर दिया।

रहीम अब सामान्य सिपाही न रहा था, अब वह बादशाहों का बादशाह अर्थात् खानखाना था। उसके भाग्य का सितारा बुलंदी पर था। विशाल मुगलिया सल्तनत का खानखाना हो जाने से उसका इकबाल लगभग पूरे उत्तरी भारत पर कायम हो गया था। हिन्दुस्थान ही नहीं अफगानिस्तान, ईरान, तूरान, ख्वारिज्म और फरगाना तक उसकी तूती बोलने लगी थी। वह जीवन का बहुत बड़ा इम्तिहान उत्तीर्ण करके इस दर्जे तक पहुँचा था। अब उसके जीवन में कठिनाईयाँ कम और उत्सव के अवसर अधिक थे।

जब वह दिल्ली दरबार में बादशाह का धन्यवाद ज्ञापित करके फिर से अहमदाबाद जा रहा था तो मार्ग में उसके अमीरों ने उसके लिये शिकार का आयोजन किया। संयोगवश वह अपने आदमियों से अलग होकर एक पेड़ के नीचे बैठा सुस्ता रहा था, उसी दौरान यह घटना हो गयी।

कहने को तो यह घटना छोटी ही थी किंतु प्राणों पर आये खतरे के हिसाब से यह उतनी ही बड़ी थी जितनी कि मुजफ्फरखाँ के सात हजार सैनिकों के सामने अपने तीन सौ घुड़सवार और सौ हाथी झौंक कर जीवन का जुआ खेल जाने की थी।

इस घटना ने रहीम को बहुत सी बातें सोचने पर मजबूर कर दिया। उसकी समझ में अच्छी तरह से आ गया कि आदमी भले ही हर स्थान पर नहीं पहुँचे किंतु उसकी खुशबू या बदबू स्वतः ही दूर-दूर तक फैल जाती है। मौका पड़ने पर आदमी की तलवार भले ही उसके प्राण न बचा सके किंतु उसकी खुशबू उसे अपरिचितों और जंगलों में भी उसके प्राण बचा ले जाती है।

रहीम के अंतस का एक कौना रह-रह कर यह भी सोचता था कि कौन जाने किस निरीह कबूतर या चिड़िया की दुआ उसके काम आई हो! जाने किस बेकस गुलाम की दुआ ऐन वक्त पर उसके आड़े आ गयी हो!

-अध्याय 73, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] यह सिरोही राज्य का तत्कालीन राजा था। इस घटना के विवरण के साथ स्थान का उल्लेख किसी भी तत्कालीन ग्रंथ में नहीं मिलता किंतु ऐसा अनुमान होता है कि यह घटना सिरोही राज्य में घटित हुई होगी।

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