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नकाबपोश (54)

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नकाबपोश - www.bharatkaitihas.com
नकाबपोश

बहुत दूर से वे पाँचों नकाबपोश घोड़े फैंकते हुए चले आ रहे थे। बालू के टीले और कंटीले झुरमुट उनका रास्ता रोकते थे किंतु उनकी परवाह किये बिना वे सरपट घोडा़ दौड़ाये चले जा रहे थे। उनके घोड़े थक चुके थे और मुँह से श्वेत फेन बहने लगा था।

हालांकि नकाब के कारण अश्वारोहियों के चेहरे दिखाई नहीं देते थे किंतु शरीर के हिलने से अनुमान होता था कि वे स्वयं भी घोड़ों पर बैठे हुए बुरी तरह हाँफ रहे थे। इतना होने पर भी वे अपने पीछे आ रहे शत्रुओं के भय से किसी भी तरह रुकने का नाम नहीं लेते थे।

सूरज कंटीली झाड़ियों की ओट में छिपने की तैयारी कर रहा था और प्रकाश भी काफी कम हो चला था। नकाबपोशों को लगने लगा था कि कुछ ही क्षणों में वे घोड़ों से लुढ़क कर जमीन पर आ जायेंगे किंतु उनका नेतृत्व कर रहे नकाबपोश को प्रतीक्षा थी ऐसे झुरमुट की जिसकी ओट लेकर वे अपनी दिशा बदल लें और उनके पीछे आ रहा दुश्मन तेज गति से आगे निकल जाये।

आखिर एक ऐसा झुरमुट आ ही गया। नकाबपोशों का नेता एक बड़ी सी झाड़ी की ओट में होकर कंटीले झुरमुट के भीतर घुस गया। अन्य नकाबपोशों ने भी उसका अनुसरण किया। बचते-बचते भी कांटेदार टहनियाँ उनके वस्त्रों को चीर कर अपनी तीक्ष्णता का बोध करवा ही गयीं।

अश्वारोही अपनी तेज गति से चल रही सांसों पर नियंत्रण करने का प्रयास करने लगे। अन्ततः उनकी चाल सफल रही। कुछ ही क्षणों में बीसियों घोड़े सरपट भागते हुए आगे निकल गये। दुश्मन को अनुमान ही नहीं हो सका कि नकाबपोश झुरमुट की ओट में ही खड़े हैं।

– ‘ढूंढते रहेंगे अब वे हमें कई दिनों तक।’ नकाबपोशों के नेता ने अपना नकाब हटाया और झुरमुट के बीचों बीच पसरे बालुई टीले पर कूद गया।                                                 

अन्य नकाब पोशों ने भी अपने नकाब हटा लिये और जैसे-तैसे अपने घोड़ों से उतर पड़े। नकाब हटने से ही यह ज्ञात हो सका कि इनके चेहरे आपस में किसी भी तरह मेल नहीं खाते थे। इनमें से दो स्त्रियाँ थीं। एक स्त्री अभिजात्य एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली दिखाई देती थी तो दूसरी उसकी दासी। यह एक विचित्र बात थी कि अभिजात्य दिखायी देने वाली गौरवर्णा स्त्री पालकी, ऊंट अथवा हाथी पर सवारी न करके घोड़े की पीठ पर इतना लम्बा सफर तय कर रही थी।

अभिजात्य दिखाई देने वाली एक स्त्री की पीठ से चार वर्ष का बालक बंधा हुआ था। माँ की पीठ से रगड़ खाकर उसका चेहरा छिल गया था फिर भी बालक अद्भुत धैर्यवान था और पूरी तरह शांत बना हुआ था। दासी दिखायी देने वाली स्त्री की पीठ से एक छोटी सी गठरी बंधी हुई थी जिसमें दैनिक जीवन यापन का कुछ मामूली सा सामान था जो इस समय बहुमूल्य जान पड़ता था। तीन पुरुष चेहरों में से दो फकीरों जैसे दिखायी देते थे और एक चेहरा गुलाम दिखायी देने वाले व्यक्ति का था।

– ‘क्या आज रात यहीं रुकने का इरादा है बाबा?’ अभिजात्य दिखायी देने वाली गौरवर्णा स्त्री ने अपने नेता की ओर मुँह करके पूछा।

– ‘नहीं! यहाँ नहीं बानो। आज की रात हम जाल्हुर[1]  मस्जिद में पड़ाव करेंगे। तुम थोड़ा सा सुस्ता लो, तब तक घोड़े भी तैयार हो जायेंगे और वे अफगान लुटेरे भी दूर निकल जायेंगे।’ अपनी लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए वृद्ध फकीर ने जवाब दिया।

– ‘जाल्हुर? क्या जाल्हुर पास ही है? क्या हम एक ही दिन में पालनपुर से जाल्हुर तक आ पहुँचे?’

– ‘हाँ बानू। वो जो पहाड़ियाँ दिखायी देती हैं, उनके बीच में जाल्हुर बसा हुआ है। हम घंटे भर में वहाँ पहुँच सकते हैं। तब तक पूरी तरह रात हो चुकी होगी और हम आसानी से मस्जिद में आसरा ले सकेंगे।’

क्षुद्र कंटीली झाड़ियों ने अवसर पाते ही दुष्टता की और अंधेरे का जाल इतनी जोर से आकाश में फैंक कर मारा कि दिन भर की यात्रा से थककर चूर हुआ सूरज उस जाल में उलझ कर रह गया। झाड़ियों को इस दुष्टता की सजा़ मिली और वे स्वयं भी अब शैतानी अंधेरे में डूबने लगीं। पाँचों अश्वारोही फिर से घोड़ों पर सवार होकर दूर दिखायी देने वाली पहाड़ियों की ओर बढ़ गये।

यह उनकी यात्रा का अंत न था, मध्य भी न था। पाटन से चलकर अहमदाबाद और पालनपुर होते हुए वे अभी तो केवल जाल्हुर के निकट पहुँचे थे, यहाँ से अजमेर और फिर अलवर होते हुए उन्हें आगरा पहुँचना था। कौन जाने वहाँ पहुँचना हो भी अथवा नहीं! वे तो यह भी नहीं जानते कि आगरा पहुँच कर भी उनकी यात्रा पूरी होगी अथवा नहीं!

इस समय तो वे केवल इतनी बात जानते हैं कि उन्हें हर हालत में उस विकट शत्रु से अपने आप को बचाकर आगरा तक ले जाना है जो पाटन से ही उनके पीछे लगा हुआ है और अवसर पाते ही उनके प्राण हर सकता है। उन्हें अपने जीवन की चिंता उतनी न थी जितनी कि बानू की पीठ पर बंधे हुए चार वर्षीय रहीम के जीवन के बारे में थी।

-अध्याय 54, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] जालौर

बुरी खबर (55)

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बुरी खबर - www.bharatkaitihas.com
बैराम खाँ की हत्या का प्रतीकात्मक चित्र

अकबर अन्तर्मन के जिस दड़बे में छिपकर रहता था, उस दड़बे की छत इस बुरी खबर की आंधी ने एक ही झटके में उड़ा दी थी। अकबर ने इस दड़बे में स्मृतियों के जाने कितने क्षण कबूतरों की तरह पाल रखे थे।

– ‘रहीम कौन ?’ तरुण बादशाह ने अत्यन्त ही अन्यमनस्कता से पूछा। असमय का व्यवधान उसे अच्छा नहीं लगा। जाने किस बदजा़त ने इस कमअक़्ल गुलाम को यहाँ ला तैनात किया है! चैन से बैठने ही नहीं देता। किसी न किसी बहाने से थोड़ी-थोड़ी देर में आ धमकता है, जल्लाद कहीं का। पिछले कई दिनों से अकबर की अन्यमनस्कता हताशा की सीमा तक उसे बोझिल बनाये हुए है अन्यथा अन्यमनस्कता उसके स्वभाव में नहीं है। उसे यह बार-बार का व्यवधान किंचित् भी नहीं सुहा रहा।

– ‘बैरामखाँ का फरजंद अब्दुर्रहीम, जिल्ले इलाही।’ तातार गुलाम ने भय से काँपते हुए निवेदन किया।

– ‘कौन बैरामखाँ ?’ बादशाह खीझ उठा।

– ‘खानखाना बैरामखाँ हुजूर। उनका बेटा रहीम।’

– ‘खानखाना बैरामखाँ का बेटा रहीम! क्या वह खानखाना के साथ हज करने नहीं गया था?’

क्रोध के कारण बादशाह के शब्द काफी तीखे हो आये थे। गुलाम में साहस नहीं था कि वह तरुण बादशाह के इस प्रश्न का उत्तर दे सके।

– ‘अच्छा जा। काँपना बंद कर और उसे ले आ, यहीं।

तातार गुलाम के प्राण फिर से लौटकर शरीर में आ गये और वह भागता हुआ कक्ष से बाहर हो गया। पसीने की एक लकीर गर्दन से आरंभ होकर ऐढ़ी तक जा पहुँची थी। कितना तो मना किया था कमबख़्त को! किंतु मेरी कोई माने तब न! इधर बादशाह और उधर बैरामखाँ का बेटा। आने की सूचना दो तो मुसीबत और न दो तो मुसीबत। जाने किस बात पर कब सर क़लम हो जाये! खुदा बचाये ऐसी नौकरी से। अपनी उखड़ी हुई सांसों और हिलती हुई दाढ़ी पर काबू पाते हुए उसने अब्दुर्रहीम को अंदर जाने का संकेत किया।

कमरे का पर्दा हटाकर जब अब्दुर्रहीम ने अपनी छोटी-छोटी कोहनियों से बादशाह को कोर्निश बजाई तो सन्न रह गया बादशाह। अल्लाह! चालीस वर्ष के जिस प्रौढ़ बैरामखाँ को बादशाह ने अपने सामने हज के लिये रवाना किया था वह तो पाँच वर्ष का बालक बन कर फिर से लौट आया था! कुदरत भी कई बार कैसे करिश्मे दिखाती है! संभवतः यह उसी का परिणाम था कि प्रौढ़ हो चुका बैरामखाँ पाँच वर्ष का बालक बनकर फिर से उसके सामने खड़ा था। बादशाह के मन में पसरी क्षण भर पहले की अन्यमनस्कता विलुप्त हो गयी।

– ‘खानबाबा!’ बादशाह के मुँह से बरबस निकल गया।

– ‘मैं खानखाना बैरामखाँ का फरजंद अब्दुर्रहीम हूँ जहाँपनाह। अपनी निर्दोष और मासूम आँखों पर नन्ही पलकें झपकाते हुए उसने उत्तर दिया।

– ‘खानखाना कहाँ हैं ?’ अकबर के मन से क्रोध और घृणा का हलाहल जाने कहाँ लुप्त हो गया जो अभी कुछ क्षण पूर्व बैरामखाँ का नाम सुनते ही उसके होठों से छलक पड़ा था।

– ‘इस दुनिया से भी जो ऊपर दुनिया है, अब्बा हुजूर उस दुनिया के बादशाह की खिदमत में चले गये हैं।’ अब्दुर्रहीम ने परिश्रम से याद किया हुआ वाक्य बादशाह के सामने दुहरा दिया।

– ‘क्या कहते हो? कब?? कैसे???’ हैरत में पड़ गया बादशाह। कितनी कच्ची उम्र और कितनी सख्त बात! क्या इस बालक को यह पता भी है कि वह जो कह रहा है, उसका अर्थ क्या है? लेकिन यह हो कैसे सकता है! मुझे तो यह समाचार किसी ने दिया ही नहीं।

– ‘अब्बा हुजूर को गये हुए तो चार महीने बीत गये जहाँपनाह।’

– ‘मग़र ये सब हुआ कैसे ?’

– ‘अफगान मुबारक लोहानी ने उन्हें अपने छुरे से हलाक कर दिया।’

– ‘खानाखाना को हलाक कर दिया! क्या इस धरती पर ऐसा कोई आदमी जन्मा था जो खानखाना की तरफ आँख उठाकर भी देख सकता था? खु़दा गवाह है कि लोहा बैरामखाँ को काट नहीं सकता था और आग जला नहीं सकती थी लेकिन तुम कह रहे हो कि उसे एक कमजा़त अफगान ने हलाक कर दिया? उसे देखकर तोपें दहाड़ना छोड़कर बकरियों की तरह मिमियाने लगती थीं। उसके सामने आकर बड़ी से बड़ी तलवार कागज का पुर्जा साबित होती थी और तुम कहते हो कि उस बैरामखाँ को एक छुरे से ज़िबह कर दिया? आवेश से क्षण भर को तरुण बादशाह का चेहरा लाल हुआ किंतु शीघ्र ही वह इतना सफेद हो गया, जैसे किसी ने शरीर में से रक्त निचोड़ लिया हो। वह आगे कुछ भी नहीं बोल सका।

पाँच वर्ष का अब्दुर्रहीम देर तक बादशाह के खुरदेरे चेहरे को ताकता रहा। पिछले चार महीनों के अनुभव ने रहीम को पाँच वर्ष के बालक से एक परिपक्व आदमी बना दिया था। उसके सिर पर पिता का साया न रहा था और वह जान चुका था कि अब दुनिया में उसे अपने बलबूते पर गुजारा करना है। यही कारण था कि वह बालक होने पर भी इतना संतुलित था और निर्विकार भाव से तरुण बादशाह के सामने खड़ा उसके आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।

बहुत देर तक अकबर के मुँह से कुछ नहीं निकला। बैरामखाँ की मौत की सूचना ने उसके समूचे अस्तित्व को झिंझोड़ कर रख दिया था। इस सूचना की चोट बादशाह के भीतर बैठे अनाथ अकबर तक जा पहुँची थी। उस अकबर तक जो बादशाह न था, अनाथ बालक था। जो जहाँपनाह न था, दर-दर का भिखारी था। जो नूरानी चेहरे का रूआबदार तरुण न था, कमज़ोर कलेजे का पितृहीन पुत्र था। जो अपने अमीरों के सामने तनकर नहीं खड़ा था, बैरामखाँ की छाती पर सिर रखकर रो रहा था।

अकबर अन्तर्मन के जिस दड़बे में छिपकर रहता था, उस दड़बे की छत इस बुरी खबर की आंधी ने एक ही झटके में उड़ा दी थी। अकबर ने इस दड़बे में स्मृतियों के जाने कितने क्षण कबूतरों की तरह पाल रखे थे। मन की मुण्डेर पर बैठे ये कबूतर हर क्षण गुटरगू़ँ करते रहते थे। वे सब के सब आज अचानक ही फड़फड़ा कर चीत्कार करने लगे। क्रूर समय बाज की तरह झपट्टा मार कर स्मृतियों के इन निर्दोष कबूतरों को लहू-लुहान कर गया था।

अकबर ने सीने की ज्वाला को गरम साँस में ढालकर बाहर की ओर धकेलते हुए देखा- पाँच वर्ष का अब्दुर्रहीम अब भी चुपचाप उसी की ओर देखे जा रहा था। अकबर ने झपट कर रहीम को अपने सीने से लगा लिया।

– ‘क्या हुआ अब्दुर्रहीम, जो खानबाबा नहीं रहे! हम तो हैं! आज से हम तुम्हारे अब्बा हुजूर हैं और आप हमारे अतालीक[1]  हैं। समझ रहे हैं आप, हम क्या कह रहे हैं?’

पाँच वर्ष का अब्दुर्रहीम बादशाह के शब्दों का सही-सही अर्थ तो अनुमानित नहीं कर सका किंतु इतना वह अवश्य जान गया था कि जिस काम के लिये माता ने उसे बादशाह की सेवा में भेजा था, वह काम हो गया है। कुछ क्षण बादशाह उसे अंक में कसे रहा। बालक ने भी अपने आप को वहाँ से हटाने या छूटने का प्रयास नहीं किया।

– ‘तुम्हारे साथ और कौन आया है ?’

– ‘मेरे साथ बाबा जम्बूर और काका मुहम्मद अमीन भी आये हैं, वे बाहर खड़े हैं।’

– ‘और तुम्हारी माँ मेवाती बेगम तथा तुम्हारी छोटी माँ सलीमा बेगम! वे दोनों कहाँ हैं?’ अकबर ने बुरी खबर की आशंका से बेचैन होकर पूछा।

– ‘वे आगरे में एक रिश्तेदार के यहाँ ठहरी हुई हैं। उन्होंने ही बाबा जम्बूर और काका मुहम्मद अमीन के साथ हमें आपकी हाजिरी में भेजा है।’

– ‘बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन कौन हैं?’

– ‘ये दोनों पहुँचे हुए फकीर हैं और अब्बा हुजूर के नेकदिल दोस्त भी। उन्होंने ही दुश्मनों से मेरी और अम्मी जान की जान बचाई थी।’

– ‘अरे कोई है?’ बादशाह ने बालक को अपनी बाहों से मुक्त करते हुए द्वार की ओर ताक कर कहा। क्षण भर में ही तातार गुलाम प्रकट हो गया।

– ‘बाहर दो फकीर खड़े हैं, उन्हें हाज़िर कर।’ अकबर ने आदेश दिया।

आदेश पाकर गुलाम हाँफता हुआ सा बाहर निकल गया।

-अध्याय 55, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  शिक्षक।

दो फकीर (56)

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दो फकीर

बालक अब्दुर्रहीम को दो फकीर अकबर के पास लेकर आए थे। उन फकीरों के मुंह से बैराम खाँ की हत्या का विवरण सुनकर अकबर का चेहरा सफेद पड़ गया, मानो किसी ने उसके चेहरे का समस्त रक्त निचोड़ लिया हो!

बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन दीवाना बादशाह की सेवा में उपस्थित हुए तो बादशाह ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। उतावलापन बादशाह के स्वभाव में न था किंतु आज वह बादशाह नहीं रह गया था, पितृहीन बालक हो गया था। यही कारण था कि उसने किसी भी प्रश्न का उत्तर पाये बिना लगातार ढेर सारे प्रश्न पूछ लिये। जब बादशाह ने अपने प्रश्नों पर विराम लगाया तो वह बुरी तरह हांफ रहा था। जम्बूर ने एक हाथ अपनी लम्बी दाढ़ी पर और दूसरा हाथ तस्बीह के दाने पर फेरते हुए कहा-

– ‘अय दुनिया भर के बादशाहों के बादशाह! खानाखाना इस दुनिया में जिस काम के लिये आया था वह पूरा हो चुका था और धरती पर उसकी मौजूदगी की कोई खास वज़ह नहीं रह गयी थी। इसलिये परवरदिगार! तूने उसे अपनी चाकरी में ले लिया।’ बाबा जम्बूर ने अदृश्य आस्मानी ताकत को सम्बोधित करके कहा।

– ‘अय पाक रूह अकब्बर! मेरे रहमदिल दोस्त बैरामखाँ ने अपने सारे फ़र्ज बखूबी पूरे किये। क़यामत के दिन जब खुदा उसके अच्छे-बुरे का हिसाब करेगा तो उसकी रूह शर्मसार नहीं होगी।’ फकीर मुहम्मद अमीन ने आस्मानी ताकत के सज़दे में सिर झुकाया।

– ‘वह तो ठीक है लेकिन हुआ क्या था?’ अकबर ने और भी बेचैन होकर पूछा। इन दोनों फकीरों के उत्तर में ऐसा कुछ नहीं था जो बादशाह को किंचित भी संतुष्ट कर सकता।

– ‘ऐ शाहों के शाह! बेचैन न हो। फकीर मुहम्मद अमीन तुझे सारी बातें तफ़सील से बतायेगा।’ बाबा जम्बूर ने तरुण बादशाह की बेचैनी ताड़ ली।

– ‘हम फकीरों का सियासी लोगों से कोई रिश्ता नहीं होता। न ही सियासी बातें हमारी समझ में आती हैं किंतु इतना मैं जरूर जानता हूँ कि खानाखाना जिस तरह पूरी जिन्दगी अपने दुश्मनों से लड़ता रहा था और उन्हें कदम-कदम पर शिकस्त देता रहा था, उसके कारण यह मुनासिब ही था कि हिन्दुस्तान की जमीन पर उसका कोई दोस्त नहीं रह गया था। जब तक वह तेरे साथ था, उसने अपनी तेग म्यान में नहीं रखी थी किंतु जब वह हज़ करने के लिये तुझसे रुखसत हुआ तो उसने अपनी तेग म्यान में रखकर हम फकीरों का साथ कर लिया। उसी समय मैंने जाना कि उसके दिल में फकीरों, कमजो़रों और यहाँ तक कि अपने दुश्मनों के लिये भी कितनी ज़गह थी! जिस शेरशाह के पुत्र सलीमशाह को बैरामखाँ ने जंग के मैदान में हलाक किया था, उसी सलीमशाह की बेटी जब पनाह मांगने आयी तो बैरामखाँ ने उसे पनाह भी दी और अपने साथ हज पर ले जाना भी मंजूर कर लिया लेकिन उसकी दरियादिली को किसी ने नहीं जाना।’

मुहम्मद अमीन का गला भर आया।

– ‘जब तक तलवार उसके हाथ में थी तब तक किसी दुश्मन का हौसला न हुआ कि वह बैरामखाँ की ओर आँख उठाकर देख सके लेकिन जैसे ही दुश्मनों का मालूम हुआ कि बैरामखाँ ने तलवार छोड़कर हज़ के लिये जाना मंजूर किया है तो दुश्मन चारों ओर से उस पर छा गये। फिर भी दुश्मनों में इतना साहस नहीं था कि सामने से बैरामखाँ पर वार करते। बैरामखाँ को भी उनकी कोई परवाह नहीं थी लेकिन एक दिन जब वह कुदरत की खूबसूरती को देखता हुआ पाटन के सहस्रलिंग तालाब में नहाने के लिये उतरा तो अफगान मुबारक लोहानी घात लगाकर बैठ गया ………..।’

– ‘मुबारक लोहानी कौन है?’ अकबर ने मुहम्मद अमीन को टोका।

– ‘मुबारक लोहानी एक अफगान नौजवान है। उसका बाप पाँच साल पहले मच्छीवाड़ा की लड़ाई में बैरामखाँ की तलवार से मारा गया था। इसलिये मुबारक लोहानी के दिल में नफरत की आग जल रही थी। वह तभी से बैरामखाँ के पीछे लगा हुआ था और एक बेहतर मौके की तलाश में था।’ मुहम्मद अमीन ने जवाब दिया।

– ‘आगे क्या हुआ?’ अकबर ने बालक की तरह मचलकर पूछा।

– ‘जैसे ही बैरामखाँ तालाब से बाहर निकला तो मुबारक लोहानी चीते की तरह उछलकर सामने आया और उसने बैरामखाँ की पीठ में खंजर भौंक दिया। बैरामखाँ वहीं गिर पड़ा। खंजर उसके सीने में आर-पार हो गया था। इसलिये कुछ ही पल में खानखान की रूह बदन से फ़ना हो गयी।’ बात पूरी करते करते बाबा जम्बूर की भी आँखें भीग आयीं।[1]

– ‘आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था। बैरामखाँ को उसकी नाफिक्री ने मार डाला। मैंने कई बार उसे आगाह किया था कि अपने दुश्मनों पर नज़र रखा कर। उनके इरादे नेक नहीं हैं।’ मुहम्मद अमीन ने आँखें मींचते हुए कहा। अकबर ने भी अपनी आँखों में छलछला आयीं पानी की बूंदों को छिपाने के लिये पलकें बंद कर लीं।

बादशाह यद्यपि तरुण था और उदास भी किंतु फिर भी उसकी आँखों में जाने कैसा रौब छाया हुआ था कि फकीर होने पर भी न तो मुहम्मद अमीन और न ही बाबा जम्बूर उसकी आँखों में सीधे-सीधे झांक सके थे। जैसे ही बाबा जम्बूर को अनुमान हुआ कि बादशाह ने पलकें बन्द कर ली हैं तो उसने बादशाह के चेहरे को ध्यान से देखा बादशाह के चेहरे पर बनने वाली लकीरों में अब्दुर्रहीम का भविष्य छिपा हुआ था। जम्बूर इन लकीरों से बनने वाले चित्रों को देखकर आश्वस्त होना चाहता था।

-अध्याय 56, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  बैरामखाँ के वध के बारे में अलग-अलग उल्लेख मिलता है। एक इतिहासकार ने लिखा है कि बैरामखाँ पाटन में नित्य प्रति पट्टन के बागों और मकानों को देखने जाया करता था। एक दिन वह नाव में बैठकर सहस्रलिंग तालाब का जलमहल देखने गया। वहाँ से आते समय जब नाव से उतरकर घोड़े पर सवार होने लगा तो मुबारकखाँ 30-40 पठानों के साथ तालाब के तट पर आया और ऐसा जाहिर किया कि मिलने को आया है। खानखाना ने उन सबको बुलवा लिया। मुबारकखाँ ने बैरामखाँ के पास पहुँचते ही छुरा निकालकर बैरामखाँ की पीठ में ऐसा मारा कि छाती के पार हो गया। फिर और एक पठान ने मस्तक पर तलवार मारकर काम पूरा कर दिया। बैरामखाँ के साथी भाग छूटे। फकीरों ने उसकी लोथ उठाकर शेख हिसाम की कब्र के पास गाड़ दी।

खुरदरा चेहरा (57)

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खुरदरा चेहरा

अकबर का खुरदरा चेहरा और अधिक खुरदरा हो आया। बहुत देर तक तरुण बादशाह के खुरदरे चेहरे पर विभिन्न प्रकार की लकीरें बनती-बिगड़ती रहीं। अधिकतर लकीरें ऐसी थीं जिन्हें बाबा जम्बूर किसी भी हालत में नहीं पढ़ सकता था लेकिन बाबा जम्बूर ने हारना नहीं सीखा था।

बाबा जम्बूर तो उस समय भी नहीं हारा था जब मुबारक लोहानी ने बैरामखाँ की पीठ में छुरा भौंक दिया था और बैरामखाँ जमीन पर गिरकर छटपटा रहा था। बाबा जम्बूर तो उस समय भी नहीं हारा था जिस समय मुबारक ने बैरामखाँ के डेरे पर पहुँच कर लूटमार व अंधाधुंध हत्याएं करनी आरंभ कर दी थी और बैरामखाँ का समूचा परिवार नाश के कगार पर जा खड़ा हुआ था। मुबारक लोहानी कुचले हुए नाग की तरह फुंफकार रहा था। एक तो अफगानी और तिस पर बैरी। उसके मन में बदले की जाने कैसी भीषण आग जल रही थी!

जब मुबारक लोहानी बैरामखाँ के डेरे की ओर बढ़ा तो बाबा जम्बूर को मुबारक लोहानी के खतरनाक इरादों का पता लग गया। बाबा जम्बूर खून से लथपथ बैरामखाँ के शव को यूँ ही छोड़कर मुबारक लोहानी के पीछे दौड़ पड़ा। मुबारक बैरामखाँ के समूचे वंश को ही नष्ट कर डालना चाहता था।

बैरामखाँ के अधिकतर गुलाम मुबारक लोहानी की तलवार की भेंट चढ़ गये। जो जान बचा सकते थे, खानाखाना के परिवार को असुरक्षित छोड़कर भाग छूटे थे। मुबारक लोहानी ने बैरामखाँ की सुंदर और जवान बीवी सलीमा बेगम तथा चार वर्ष के लड़के अब्दुर्रहीम को बहुत ढूंढा किंतु फकीर मुहम्मद अमीन दीवाना ने उस समय बाबा जम्बूर का साथ दिया। इसी से बेगम सलीमा और बालक रहीम मुबारक के हाथ नहीं लगे।

मुबारक लोहानी बाबा जम्बूर के पीछे लग गया किंतु बाबा जम्बूर ने हार नहीं मानी। एक के बाद एक गाँव, खेत, खलिहान और जंगल-जंगल भागता रहा है वह बैरामखाँ के परिवार को लेकर। ऐसी आँख-मिचौनी हुई उन दोनों के बीच कि चूहे-बिल्ली भी शर्मा जायें। अफगानी लुटेरों ने कई बार उन्हें घेर लिया किंतु बाबा जम्बूर हर बार बच निकला।

तब से लेकर अब तक बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन, सलीमा बेगम और अब्दुर्रहमान को लेकर भागते रहे हैं। मुबारक लोहानी और उसके अफगान लुटेरों से आँख-मिचौनी खेलते हुए पाटन से अहमदाबाद, जालोर और आगरा तक आ पहुँचना संभव नहीं था यदि बाबा जम्बूर ने हार मान ली होती।

रहीम की माँ नहीं चाहती थी कि बैरामखाँ का परिवार फिर से अकबर के पास पहुँचे। वह चाहती थी कि उसके पिता के यहाँ अलवर में ही बैरामखाँ का पूरा परिवार बस जाये किंतु सलीमा बेगम और बाबा जम्बूर ने उसकी बात नहीं मानी। चाहती तो सलीमा बेगम भी नहीं थी कि फिर से अकबर से सामना हो किंतु परिस्थितियों के आगे वह विवश थी।

बाबर की बेटी गुलरुख की औलाद होने के कारण सलीमा बेगम भी दिल्ली के तख्त पर अपना उतना ही अधिकार मानती थी जितना अकबर मानता था। खुद बैरामखाँ ने सलीमा बेगम का हाथ हुमायूँ से इसी लिये मांगा था कि यदि हुमायूँ के भाई दगा करके हुमायूँ की किसी औलाद को जिंदा न रहने दें तो बैरामखाँ उन गद्दारों के स्थान पर बाबर की नवासी सलीमा बेगम को हिन्दुस्थान के तख्त पर बैठा सके।

इतनी सारी बातें जानने पर भी अकबर ने सलीमा बेगम का कोई लिहाज नहीं किया था और बैरामखाँ को देश निकाला दे दिया था। मन ही मन घृणा करने लगी थी वह अकबर से किंतु भाग्य की कैसी विडम्बना थी कि अब बैरामखाँ के न रहने पर वह खुद फिर से अकबर के पास ही जा रही थी।

सलीमा बेगम के आदेश पर बाबा जम्बूर उसे और अब्दुर्रहीम को बैरामखाँ के हरम की सारी औरतों के साथ आगरा ले आया था। वह जानती थी कि बैरामखाँ के परिवार को अब यदि कोई सुरक्षित रख सकता है तो केवल अकबर। भले ही अकबर और खानाखाना में अंतिम दिनों में मनमुटाव हो गया हो, भले ही बादशाह ने बैरामखाँ के पीछे अपनी फौज लगा दी हो और भले ही बैरामखाँ बादशाह से विद्रोह पर उतर आया हो किंतु अकबर इतना कृतघ्न कभी नहीं हो सकता कि अपने संरक्षक के असहाय परिवार की रक्षा करने से मना कर दे।

बाबा जम्बूर ने अनुमान लगाया कि बादशाह के खुरदरे चेहरे पर बनती-बिगड़ती लकीरों में उन्हीं सब पुरानी बातों के चित्र बन और बिगड़ रहे हैं। बाबा जम्बूर उन चित्रों को पहचानने की कोशिश कर रहा था जिनमें बैरामखाँ का अतीत और रहीम का भविष्य छिपा हुआ था।

-अध्याय 57, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

प्रलाप (58)

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प्रलाप

अकबर मन ही मन प्रलाप कर रहा था। आज जीवन में पहली बार उसे इस बात का ज्ञान हुआ था कि बड़े से बड़े बादशाह का भी परिस्थितियों पर कोई नियंत्रण नहीं होता।

अकबर के खुरदरे चेहरे से चिंता की लकीरें मिटी नहीं। न तो अब्दुर्रहीम और न ही दोनों करिश्माई फकीर उसके सीने में जलती आग को शांत कर पाये। बादशाह ने अपने आप को भीषण ज्वाला में घिरे हुए पाया। हहराती हुई लपटों में झुलसा जा रहा था वह। जाने कैसा लावा था जो पिघल-पिघल कर उसके मन में भर गया था! स्थितियाँ इतनी विकट हो जायेंगी, इसका उसे स्वप्न में भी अनुमान नहीं था। उसने जीतना चाहा था किंतु बाजी उसके हाथ से निकल गयी थी। वह जीत कर भी हार गया था, सदा-सदा के लिये।

संसार में अब ऐसा कोई नहीं बचा था जिसे दिखाने के लिये वह जीतना चाहता था। उसने तो चाहा था कि बैरामखाँ देखे कि अकबर बिना बैरामखाँ के भी जीत सकता है किंतु बैरामखाँ ने उसे यह अवसर ही नहीं दिया। यह ठीक था कि उसने बैरामखाँ को परास्त किया था किंतु वह बैरामखाँ को परास्त नहीं करना चाहता था। बैरामखाँ ने उसे ऐसा करने के लिये मजबूर किया था। अकबर की इच्छा तो केवल इतनी ही थी कि खानाखाना अपनी आँखों से देखे कि अकबर जीत के लिये खानाखाना का मोहताज नहीं है। वह स्वयं भी जीत सकता है अपने बल बूते पर!

आज उसे बार-बार ‘कालानौर’ याद आ रहा था जब वह कुल तेरह साल की उम्र में बैरामखाँ के संरक्षण में मानकोट के दुर्ग पर घेरा डाले हुए था। अपनी विशाल सेना के साथ दुर्ग में बंद सिकन्दर सूर किसी भी भाँति काबू में आता ही न था। एक तो बैरामखाँ के पास सैनिकों की संख्या बहुत कम थी और दूसरी ओर राजधानी आगरा से किसी तरह की सहायता मिलने की आशा भी नहीं थी। बैरामखाँ के पास कुछ ही वफादार शिया सिपाही बचे थे जिन्हें बैरामखाँ फारस के शाह तहमास्प से लेकर आया था या फिर जिन सिपाहियों को खुद बैरामखाँ ने अपने बलबूते पर सेना में भरती किया था।

खानखाना को यह लड़ाई उन्हीं मुट्ठी भर सिपाहियों के बूते पर लड़नी थी क्योंकि बादशाह हुजूर[1]  तो आगरा छोड़कर जंग के मैदान में आते ही नहीं थे। बादशाह हुजूर के सिपहसलार दबी-ढंकी जुबान से चर्चा करते थे कि बादशाह हुजूर अपनी पुरानी आदत के अनुसार बादशाही पाते ही फिर से अय्याशी में डूब गये थे।

सिपहसलारों का यह भी कहना था कि बादशाह हुजूर को जो भी पैसा मिलता था, बादशाह हुजूर उसे शराब और सुंदर औरतों पर खर्च कर डालते थे। यही कारण था कि बादशाह हुजूर को मरहूम बड़े बादशाह हुजूर[2]  द्वारा जीता गया हिन्दुस्तान लगभग हमेशा के लिये खोकर फारस भाग जाना पड़ा था। बादशाह हुजूर में इतनी क्षमता न थी कि वे हिन्दुस्तान पर फिर से राज्य कायम कर सकते।

यह तो खानखाना ही था जो किसी भी कीमत पर बादशाह हुजूर को हिन्दुस्तान का ताज दिलवाने पर तुले हुआ था। यह उसी का बुलंद हौसला था कि बादशाह हुजूर रेगिस्तान की खाक छानना छोड़कर फिर से आगरा में आ बैठे थे और हिन्दुस्तान के बादशाह कहलाने लगे थे।

पूरे पन्द्रह साल तक बैरामखाँ घोड़े की पीठ पर बैठा रहा था तो केवल इसलिये कि बादशाह हुजूर को दिल्ली और आगरा के तख्त पर फिर से बैठा सके। लेकिन बादशाह हुजूर! उन्हें तो जैसे ही आगरा मिला, तलवार म्यान में रख ली। उन्होंने बैरामखाँ को सिकन्दर सूर के पीछे लगा दिया था और स्वयं आगरा के महलों में रहकर रास-रंग में डूब गये थे।

कक्ष में कुछ आवाज हुई तो अकबर ने सिर उठा कर देखा मशालची मशालों में तेल डाल रहा था। संभवतः सूरज डूबने को था। मशालों से निकलने वाले धुएँ से कुछ देर निजात पाने के लिये वह महल से निकल कर बाहर बागीचे में आ गया। पेड़ों की चोटी पर सूरज की किरणें अब भी थकी-हारी सी बैठी थीं। बादशाह ने चारों ओर आँख घुमाकर देखा, कैसी अजीब वीरानगी सी फैली हुई है! जाने कहाँ गयीं यहाँ की रौनकें! शायद खानबाबा के साथ चली गयीं! बैरामखाँ का ध्यान आया तो अकबर फिर से विचारों की दुनिया में डूब गया।

क्या सोच रहा था वह कुछ देर पहले! कालानौर! हाँ, वही तो! कालानौर के दृश्य अकबर की आँखों के सामने तैर गये। उनमें से कुछ चित्र तो इतने ताजे थे मानो आज कल में ही देखे हों और कुछ चित्र धूमिल हो चले थे। कुछ तो संभवतः स्मृति पटल से पूरी तरह लुप्त भी हो गये थे।

अकबर स्मृति पटल पर शेष बच गये चित्रों से बात करने लगा। कितना निर्भर करते थे बादशाह हुजूर खानबाबा पर! लगता था जैसे बादशाह हुजूर को खुदा के बाद खानबाबा का ही आसरा था। तभी तो बादशाह हुजूर ने हमें बारह वर्ष की उम्र में ही खानबाबा के संरक्षण में दे दिया था ताकि हम जंग और जंग के मैदान को समझ सकें। और खानबाबा! उन्हें भी तो जैसे बादशाह हुजूर की प्रत्येक मंशा पूरी करने का नशा सा छाया रहता था। लगता था जैसे बादशाह हुजूर की जीभ से आदेश बाद में निकलता था, उसकी पालना पहले हो जाती थी!

बादशाह हुजूर जानते थे कि वे जो कर रहे हैं, वह एक बादशाह के लिये उचित नहीं है। वे ये भी जानते थे कि बादशाही का आधार जंग का मैदान होता है न कि उसका हरम। इसीलिये तो बादशाह हुजूर ने हमें हरम में पलकर बड़ा होने देने के बजाय मैदाने जंग में रखना अधिक उचित समझा था। बादशाह हुजूर की मंशा को समझकर खानबाबा ने हमें जंग और मैदाने जंग की हर पेचीदगी समझाई।

इतना ही नहीं खानबाबा ने तो हमें जीवन में आने वाली उन पेचीदगियों को भी बताया जिन्हें केवल एक बाप ही बेटे को बताता है। हम भी तो कितना प्रसन्न थे एक अतालीक को पाकर! उन दिनों तो जैसे वे ही हमारे सब कुछ थे- दोस्त, उस्ताद और यहाँ तक कि वालिद भी।

देखा जाये तो खानबाबा को पाने से पहले हमने जीवन में पाया ही क्या था? मनहूसियत और केवल मनहूसियत! हमारा तो जन्म ही मनहूसियतों के बीच हुआ था। जाने कितनी तरह की मनहूसियतें तकदीर बनाने वाले ने हमारी किस्मत में लिखी थीं! रेगिस्तान में चारों ओर पसरी हुई धूल, सिर पर मगज को तपा देने वाला सूरज और हमें मार डालने के लिये चारों तरफ घूमते हुए दुश्मन। दुश्मन भी कैसे? हमारे अपने सगे सम्बंधी!

माँ-बाप जान बचाकर भागे तो हमें पीछे भूल गये। और हमारी किस्मत तो देखो! हम उन सगे सम्बंधियों के बीच पल कर बड़े हुए जो दुश्मनों से भी अधिक संगदिल और बेरहम हुआ करते हैं। जब हमारा सगा चाचा कामरान ही हमें दीवार पर टांक कर तोप से उड़ा देने को उतारू था तो फिर दूसरा कौन था जो हम पर रहम करता!

कैसा था हमारा कुनबा! ऐसे तंगदिल और स्वार्थी मनुष्यों का झुण्ड जो अपने ही खून के खिलाफ षड़यंत्र रचता था! जो अपनों का ही खून पीने को लालायित रहता था। बड़े बादशाह हुजूर[3]  को तो हमने देखा नहीं किंतु सुना है कि वे अपने कुनबे से बहुत प्रेम करते थे। फिर क्यों उनका कुनबा इतने घृणित लोगों से भर गया था! तब हमारे लिये यह दुनिया तपते हुए रेगिस्तान से अधिक क्या थी? तरुण बादशाह की आँखों में पानी तैर आया।            

खानबाबा जैसे तपते हुए रेगिस्तान में ठण्डी हवा का झौंका बनकर आये थे। जब कांधार में तोपें आग के शोले उगल रहीं थीं और हम मारे डर के हाथ पैर फैंक-फैंक कर रो रहे थे तब खानबाबा ही थे जिन्होंने किले की दीवार पर चढ़कर हमें छाती से लगा लिया था। खानाबाबा के रूप में पहली बार हमारा परिचय प्रेम और विश्वास के संसार से हुआ था।

तब पहली बार हमें पता लगा था कि जन्म देने वाली माँ और छाया देने वाले बाप के अलावा भी संसार में अच्छे लोग होते हैं। कितना चाहा था हमने कि अधिक से अधिक दिन हम

खानबाबा के साथ मैदाने जंग में रहें और उनसे वो सब इल्म हासिल करें जो एक बादशाह के पास होना चाहिये किंतु कुदरत को तो यह भी मंजूर नहीं था। उधर हम खानबाबा से जंग और जिंदगी के सबक सीख रहे थे तो इधर कुदरत हमारे लिये जंग और जिंदगी में मुश्किलों के नये हर्फ लिख रही थी।

लगभग ऐसा ही मनहूस दिन था वह भी जब बादशाह हुजूर की असमय मौत का समाचार कालानौर जंग के मैदान में पहुँचा था। कैसा लगा था तब! जैसे कोई शीशा झन्ना कर टूट पड़ता है! जैसे आसमानी बिजली जमीन पर आ गिरती है! जैसे कोई घोड़ा तेज रफ्तार से दौड़ता हुआ पहाड़ों की खाई में जा गिरता है।

कुदरत ने जाने कैसी मनहूसियत लिखी थी हमारी जिंदगी में! खानबाबा भी तो जैसे सन्न रह गये थे! उन पर यह दोहरी मार थी। मानकोट का दुर्ग एक दो दिन में ही टूटने वाला था। ऐसे में यदि बादशाह हुजूर की मौत का समाचार सिकन्दर सूर तक पहुँच जाता तो वह दोगुने जोश से भर जाता!

सेना और सेनापति बादशाह के लिये लड़ते हैं, भले ही बादशाह कैसा भी क्यों न हो। बिना बादशाह के लड़ती हुई सेना को शायद ही कोई सेनापति जीत हासिल करा सके! यह भी तो संभव था कि यदि हमारी अपनी मुगल सेना को बादशाह हुजूर की मौत का समाचार मिल जाता तो जाने कितने सैनिक खानबाबा का साथ छोड़कर सिकन्दर सूर से जा मिलते! यदि ऐसा हो जाता तो हाथ आयी हुई बाजी निश्चत ही पराजय में बदल जाती।

हमारी स्थिति तो और भी विचित्र थी। बादशाह हुजूर के बाद हम ही हिन्दुस्तान के तख्त के वारिस थे किंतु बादशाह हुजूर उस समय हमारे लिये जो तख्त छोड़ गये थे उसके नीचे केवल दिल्ली और आगरा के ही सूबे थे और वे भी पूरे नहीं थे। अधिकांश इलाकों पर सिकन्दर सूर के वफादार सूबेदार कायम थे।

तेरह वर्ष के बालक ही तो थे हम! हमारी समझ में कुछ नहीं आता था कि ऐसी स्थिति में हम क्या करें? लगता था कि हम भी बादशाह हुजूर की तरह शतरंज के बादशाह बनकर रह जायेंगे? क़यामत जैसी मुश्किल के उन दिनों में खानबाबा ही तो एकमात्र भरोसा रह गये थे हमारे। इस मुसीबत से बाहर निकलने के रास्ते केवल खानबाबा जानते थे। जो कुछ करना था उन्हीं को करना था, हमें तो केवल उनके साथ रहना था। 

स्मृतियों का झरोखा एक बार खुला तो खुलता ही चला गया। रात काफी हो गयी थी। बरसात के दिन थे इसलिये ओस भी गिर रही थी लेकिन बादशाह बाहर की दुनिया से बेखबर जाने किन विचारों में डूबा हुआ था! गुलाम हाथ बांधे खड़े थे। बेगमों तक खबर पहुँची तो वे भी चली आयीं थी। मुँह लगे अमीर-उमराव भी खिदमत में हाजिर थे किंतु किसी की मजाल नहीं थी जो तरुण बादशाह को भीतर चलने के लिये कह सके। इस समय बादशाह को टोकने का एक ही अर्थ था और वह था बादशाही कोप!

बादशाह के करीबी लोग जानते थे कि आज बादशाह उस हद तक गमगीन है जिस हद तक कोई अपने पिता की मौत पर होता है। जाने कैसा सम्बंध था बादशाह और बैरामखाँ के बीच? शायद ही कोई अनुमान लगा सकता था! कितना-कितना प्रेम था दोनों के बीच और कितनी-कितनी घृणा! शायद ही संसार में ऐसा कहीं होता हो। यदि कोई आदमी बादशाह के सामने बैरामखाँ का उल्लेख भर कर देता था तो उसे बादशाह की गालियां खानी पड़ती थीं, चाहे वह बैरामखाँ की प्रशंसा करे या फिर उसकी बुराई।

स्मृतियों के भण्डार में कितने-कितने चित्र थे जो अकबर को बैरामखाँ से जोड़े हुए थे। हुमायूँ बैरामखाँ की सेवाओं का उल्लेख करते हुए अक्सर भावुक हो जाता था और कहा करता था कि बैरामखाँ की सेवाओं के प्रत्युपकार में कई तैमूरी बादशाह और शहजादे कुरबान किये जा सकते हैं किंतु भाग्य की विडम्बना यह रही कि इतना सब जानने पर भी अकबर ने बैरामखाँ को देश निकाला दिया था। तरुण बादशाह को आज उन बातों का स्मरण बरबस हो आया।

-अध्याय 58, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] हुमायूँ।

[2] बाबर।

[3] बाबर।

शत्रु की वापसी (59)

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जब माहम अनगा को पता लगा कि बैरामखाँ का बेटा फिर से बादशाह के पास लौट आया है तो उसकी चिंता का पार न रहा। उसे लगा कि शत्रु की वापसी हो गई है और अब तक के सब किये धरे पर पानी फिर गया है। माहम चाहती थी कि माहम का अपना बेटा आदमखाँ तरक्की करे और उसे खानखाना बनाया जाये किंतु यदि बैरामखाँ का बेटा अकबर के पास रहेगा तो अकबर का ध्यान उस ओर अधिक रहेगा।

माहम अनगा का साहस न हुआ कि वह स्वयं अकबर से कुछ कहे। वह अनुभव करने लगी थी कि जब से बैरामखाँ को हज के लिये भेजा गया तब से अकबर माहम अनगा की राय तो जानना चाहता है किंतु उनमें से अमल एक पर भी नहीं करता।

माहम अनगा ने हमीदा बानू को तैयार किया ताकि वह अपने बेटे शहंशाह अकबर को समझाये कि शत्रु के बेटे को अपने घर में पनाह देना ठीक नहीं है। एक दिन जब यह समर्थ हो जायेगा, अपने बाप की ही तरह अहसान फरामोश होकर गद्दारी करेगा। अकबर जानता था कि माहम अनगा और हमीदा बानू कभी भी बैरामखाँ के बेटे का स्वागत नहीं करेंगी किंतु अब वह पहले की तरह कच्चा नहीं रहा था और पुरानी गलतियाँ दोहराना नहीं चाहता था।

अकबर ने मातम पुरसी के बहाने से सलीमा बेगम से मुलाकात की और सारी बातें विस्तार से समझाईं। उसने सलीमा बेगम से कहा कि अपने अतालीक और संरक्षक बैरामखाँ के परिवार की सुरक्षा करना मेरा उतना ही फर्ज है जितना कि अपने पिता हुमायूँ के परिवार की सुरक्षा करना लेकिन माहम अनगा और हमीदाबानू कभी नहीं चाहेंगे कि सलीमा बेगम और रहीम यहाँ रहें। आज नहीं तो कल कोई न कोई बखेड़ा खड़ा होगा ही। इसलिये ऐसा प्रबंध किया जाना आवश्यक है कि माहम अनगा और हमीदाबानू के दिलों से सलीमा बेगम और रहीम के प्रति दुश्मनी का भाव खत्म हो जाये।

सलीमा बेगम भले ही अकबर की फुफेरी बहिन थी किंतु उसने कभी भी खुलकर अकबर से बात नहीं की थी। जाने क्यों उसे यह खुरदरे चेहरे का लड़का कभी भी अच्छा नहीं लगा था लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल गयी थीं और सवाल पसंद नापसंद का न रहकर अस्तित्व को बचाये रखने का हो गया था।

अकबर ने सलीमा बेगम के सामने दो प्रस्ताव रखे। पहला तो यह कि सलीमा बेगम अकबर से निकाह कर ले ताकि माहम अनगा उसकी ओर आँख उठा कर भी नहीं देखे। दूसरा प्रस्ताव यह था कि बालक रहीम का विवाह माहम अनगा की बेटी माह बानू से कर दिया जाये। इस तरह माहम अनगा रहीम के खिलाफ भी न रह सकेगी लेकिन यह दूसरी वाली योजना अभी किसी को न बतायी जाये।

सलीमा बेगम न हाँ कह सकी, न ना। सलीमा बेगम की खुद की कोई औलाद नहीं थी, फिर भी रहीम उसके मरहूम पति बैरामखाँ का बेटा तो था ही। इतनी कम उम्र में पितृहीन हो गये बालक के लिये सलीमा के मन में बहुत दया थी। रहीम की मासूम आँखों में सलीमा बेगम को मरहूम बैरामखाँ का चेहरा दिखाई देता था।

यद्यपि बैरामखाँ उम्र में सलीमा बेगम से लगभग दुगुना था किंतु वह अपने पति से बहुत प्रेम करती थी। वह अक्सर तुर्की अदब में कवितायें लिख कर बैरामखाँ को सुनाया करती थी और बैरामखाँ एक-एक कविता के लिये उसे सोने की अशर्फियाँ दिया करता था।

यूँ तो सलीमा बेगम को विधाता ने दिल खोलकर रूप दिया था किंतु सलीमा बेगम जानती थी कि जिस प्रकार अकबर रूप तृष्णा से सलीमा बेगम की ओर ताका करता था, उसके उलट बैरामखाँ सलीमा बेगम के रूप पर कम और उसकी कविता पर अधिक जान छिड़कता था। सलीमा बेगम की लिखी हुई कितनी ही कवितायें बैरामखाँ ने याद कर ली थीं जिन्हें वह गाहे-बगाहे गुनगुनाया करता था। वह स्वयं भी नयी-नयी कविता लिख कर तथा अपने खानदान के और लोगों द्वारा लिखी गयी कविता सलीमा बेगम को सुनाया करता था।

जब कोई नया कवि बैरामखाँ के दरबार में आता तो बैरामखाँ उसकी कविता सलीमा बेगम को भी सुनाने का प्रबंध किया करता था। पूरी पूरी रात कवितायें कहते और सुनते बीत जाती थीं। रहीम की माँ को कविता से कोई लगाव नहीं था। वह बालक रहीम को गोद में लेकर चुपचाप उन दोनों की कवितायें सुनती रहती थी किंतु रहीम कविता में बड़ा रस लेता था। मात्र पाँच साल का होने पर भी वह विलक्षण बुद्धि वाला था। पिता द्वारा एक बार सुनाई गई कविता उसे हमेशा के लिये याद हो जाती थी।[1]

अपने और रहीम के भविष्य को देखते हुए सलीमा बेगम ने चुपचाप अकबर से निकाह कर लिया। ऐसा करने में उसने एक और भलाई देखी। उसे लगा कि एक बार जब वह अकबर के निकट पहुंच जायेगी तो रहीम की माता तथा अन्य बेगमों को भी भली भांति सुरक्षा दे सकेगी। बैरामखाँ के बाकी परिवार को भी संरक्षण प्राप्त हो जायेगा।

माहम अनगा, बाबर की बेटी गुलरुख की औलाद के विरुद्ध एक शब्द नहीं बोल सकी और यह निकाह निर्विघ्न सम्पन्न हो गया। जब माहम अनगा अकबर को नये विवाह की बधाई देने आई तो अकबर ने दूसरा पासा फैंका। उसने कहा कि अब माह बानू की भी सगाई कर देनी चाहिये। माहम अनगा ने समझा कि बादशाह उसे खुश करने की नीयत से कह रहा है। उसने गंभीरता से नहीं लिया लेकिन उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब अकबर ने पास बैठे रहीम के कंधे पर हाथ मारते हुए पूछा- ‘क्यों मियाँ? क्या खयाल है?’

बालक रहीम तो कुछ नहीं बोला किंतु माहम के चेहरा काला स्याह पड़ गया। अल्लाह जाने बादशाह के मन में क्या है? वह तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि बैरामखाँ इस रूप में लौटकर उसे शिकस्त देगा। माहम अनगा कुछ नहीं बोल सकी। निस्तब्ध होकर बादशाह के चेहरे को ताकती रही। अब वह स्तनपान करने वाला बालक न था, हिन्दुस्थान का बादशाह था। उसकी इच्छा के विरुद्ध एक लफ्ज भी निकालने की ताकत किसी में नहीं थी। माहम अपना काला पड़ गया चेहरा लिये अकबर के कक्ष से बाहर हो गयी।

कुछ ही दिनों बाद अब्दुर्रहीम को मिर्जाखाँ की उपाधि दी गयी और उससे माहम अनगा की बेटी माहबानू की सगाई भी कर दी गयी। पराजय से तिलमिलाई माहम ने खाट पकड़ ली। उसका दम भीतर ही भीतर घुटता था किंतु किसी से कुछ कह नहीं सकती थी।

केवल इन दो उपायों से अकबर ने बैरामखाँ के परिवार को पूरी तरह सुरक्षित कर दिया था। इसके बाद न तो हरम सरकार की कोई ताकत रह गयी थी और न उपयोगिता। रहीम के लौट आने के बाद अकबर का जोश लौट आया था और अब वह सारे काम अपनी मर्जी से करने लगा था।

अकबर ने बालक रहीम की शिक्षा के लिये दिल्ली और ईरान के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक नियुक्त किये। तुर्की, फारसी, अरबी, संस्कृत, छंद रचना, गणित, घुड़सवारी, तलवारबाजी, नौका चालन सबके लिये अलग-अलग शिक्षक नियुक्त किये गये। देखते ही देखते कच्ची मिट्टी आकार ग्रहण करने लगी।

रहीम को दो ही काम दिये गये थे। पहला काम था अपने शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण करना और दूसरा काम था शिक्षा प्राप्ति के बाद हर दम अकबर की सेवा में हाजिर रहना। अकबर दिन भर रहीम से तरह-तरह के सवाल करता रहता। बालक भी अपनी मति के अनुसार रोचक और रसभरे जवाब देता, जिन्हें सुनकर अकबर का रोम-रोम पुलकित हो उठता।

शायद ही कोई जान सकता था कि जब अकबर रहीम से बात कर रहा होता था तो अपने अतालीक बैरामखाँ से बतिया रहा होता था। अकबर ने जो कुछ बैरामखाँ से सीखा था, उसने वह सब भी रहीम को दे दिया। बादशाह के निरंतर सानिध्य से रहीम का व्यक्तित्व निखरने लगा, उसके जवाब बालकों जैसे न होकर सयानों जैसे होने लगे।

दिन प्रति दिन सलीमा बेगम और रहीम के प्रति अकबर का बढ़ता हुआ मोह देखकर अकबर की बेगमों का माथा ठनका। उन्हें अपना और अपने पुत्रों का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा। पहले तो वे माहम अनगा से अपने दिल की बात कह लेती थीं किंतु अब तो वह सहारा भी न रहा था।

-अध्याय 59, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] अब्दुर्रहीम का जन्म जमालखां मेवाती की बेटी के गर्भ से माघ बदी 1, संवत 1613 अर्थात् 17 दिसम्बर 1556 को लाहौर में हुआ था।

हरम सरकार के दुर्दिन (60)

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मुगल हरम का दृश्य

माहम अनगा की बेटी माहबानू की सगाई अब्दुर्रहीम से कर देने की खुशी में अकबर ने माहम अनगा के बेटे अजीज कोका को खानेआजम की पदवी दी लेकिन कुछ दिनों बाद जब अकबर ने अतगाखाँ को राज्य का वकीले मुतलक[1]  नियुक्त किया तो माहम अनगा समझ गयी कि अब मेरे दिन लद गये किंतु वह यह नहीं समझ सकी कि अब हरम सरकार के दुर्दिन आरम्भ हो गए हैं।

माहम अनगा के बेटे आदमखाँ, जंवाई शिहाबुद्दीन, खानखाना मुनअमखाँ तथा हरम सरकार चलाने में शामिल रहने वाले दूसरे लोगों को अतगाखाँ की नियुक्ति अच्छी नहीं लगी और वे वकीले मुतलक की अवज्ञा करने लगे। एक दिन आदमखाँ अपने कुछ आदमियों के साथ महल में जा पहुँचा और सरकारी काम करते हुए अतगाखाँ की हत्या कर दी। इसके बाद वह महल के उस हिस्से की ओर बढ़ा जहाँ अकबर सो रहा था।

बादशाह को सोया हुआ जानकर और आदमखाँ को नंगी तलवार सहित बादशाही महल की ओर आते जानकर एक हिंजड़े[2]  ने बादशाही महल के दरवाजे बंद कर दिये और स्वयं आदमखाँ का रास्ता रोककर खड़ा हो गया। शोरगुल से बादशाह की नींद खुल गयी और वह हरम के बाहर निकल आया। हींजड़ों के मुँह से सारी बात सुनकर अकबर ने आदमखाँ से पूछा कि उसने वकीले मुतलक की हत्या क्यों की?

आदमखाँ समझ नहीं सका कि अब हरम सरकार के दिन लद गये हैं और अकबर अब पहले वाला अकबर नहीं रहा है। वक्त की नजाकत समझना तो दूर रहा, आदमखाँ शराब के नशे में बादशाह से बक-झक करने लगा। इस पर अकबर ने अपनी म्यान से तलवार निकाल कर आदमखाँ की छाती पर टिका दी और उससे कहा कि वह अपनी तलवार हिंजड़े को दे दे लेकिन आदमखाँ ने अपनी तलवार हिंजड़े को देने की बजाय बादशाह की तलवार छीनने की चेष्टा की तथा बादशाह की कलाई पकड़ ली। इस बेअदबी से अकबर की खूनी ताकत हुंकार कर जाग बैठी। उसने आदमखाँ के मुँह पर कसकर मुक्का मारा जिससे आदमखाँ बेहोश हो गया।

अकबर ने हरम के हिंजड़ों को आदेश दिये कि आदमखाँ के हाथ-पैर बांध दिये जायें और उसे महल की मुंडेर से नीचे फैंक दिया जाये। जब हिंजड़ों ने आदमखाँ को नीचे फैंक दिया तो अकबर ने हिंजड़ों से कहा कि इसे एक बार फिर से मंुडेर पर ले जाओ और फिर से नीचे फैंको। हिंजड़ों ने कहा कि बादशाह सलामत यह तो मर चुका है। इस पर अकबर ने हिंजड़ों को लतियाते हुए कहा- ‘कमबख्तो! जैसा मैं कहूँ वैसा करो अन्यथा तुम्हें भी मुंडेर से नीचे फिंकवा दूंगा।’ हिंजड़े डर गये। उन्होंने बादशाह के आदेश से एक बार फिर आदमखाँ को मुंडेर से नीचे फैंक दिया। उसका शव पत्थरों पर बिखर गया। शैतानी खून के छींटे दूर-दूर तक उछल गये।

आदमखाँ का यह हश्र देखकर उसका बहनोई शियाबुद्दीन, खानखाना मुनअमखाँ और दूसरे साथी डर कर भाग गये। उन्हें भय हुआ कि कहीं अकबर उनके लिये भी वही आदेश न दे।

आदमखाँ से निबट कर अकबर माहम अनगा के महल में गया और उसने खाट पर पड़ी हुई माहम अनगा को पूरी घटना कह सुनाई। माहम को सारे समाचार पहले ही मिल गये थे। अपने बेटे की मौत का विवरण बादशाह के मुँह से सुनकर वह केवल इतना ही कह सकी- ‘शहंशाह! आपने बिल्कुल ठीक किया है।’

इस घटना के ठीक चालीसवें दिन माहम मर गयी। इसी के साथ हरम सरकार तथा हरम सरकार के दुर्दिन दोनों ही समाप्त हो गए।

-अध्याय 60, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] वकीले मुतलक का अर्थ था प्रधानमंत्री। बाद में यह पद दीवान कहलाने लगा।

[2] हिंजड़ों को ख्वाजा कहा जाता था।

फिर से गुजरात (61)

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फिर से गुजरात

हुमायूँ के गुजरात अभियान के दौरान बैरामखाँ का सितारा बुलंदी पर पहुँचा था और वह साधारण सिपाही से मुगलिया सल्तनत का खानखाना तथा अकबर के अतालीक के पद पर आसीन हुआ था। ईस्वी 1572 में अकबर ने गुजरात पर चढ़ाई की। इस अभियान में उसने मिर्जा खाँ अब्दुर्रहीम को भी अपने साथ लिया। इस प्रकार रहीम का भाग्य उसे फिर से गुजरात ले आया।

रहीम उस समय 16 साल का कड़ियल जवान था और उसके भाग्योदय का समय आ पहुँचा था। यह एक विचित्र बात थी कि कुदरत ने पिता की तरह पुत्र के भाग्योदय का प्रहसन भी गुजरात की जमीन पर लिखा था।

 जब अकबर पाटन पहुँचा तो उसे बैरामखाँ का स्मरण हो आया। उसने मिर्जाखाँ को अपने पास बुलाया। अकबर ने रहीम से फिर से वह सब पूछा कि कैसे बैरामखाँ की हत्या हुई। अपनी बाल्य स्मृतियों के पिटारे में से रहीम ने वह सब विवरण कह सुनाया जो जहरीले कांटे की तरह रहीम के हृदय में गड़ा रहता था।

रहीम के मुँह से फिर से बैरामखाँ की हत्या का विवरण सुनकर अकबर रोने को हो आया। उसने उस पाटन का राज्य रहीम को दे दिया जिस पाटन में बैरामखाँ की लोथ गिरी थी।

रहीम भाग्य की इस करवट पर हैरान था। यह वही पाटन थी जिसकी जमीन पर उसके बाप बैरामखाँ का खून गिरा था। यह वही पाटन थी जहाँ से चार साल का रहीम बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन दीवाना की गोद में बैठकर भाग खड़ा हुआ था। यह वही पाटन थी जहाँ उसके बाप की कब्र मौजूद थी और जिस कब्र को उसने कभी नहीं देखा था। आज मिर्जाखाँ रहीम उसी पाटन का गवर्नर था।

मिर्जाखाँ अकबर से अनुमति लेकर अपने बाप की कब्र पर आँसू बहाने के लिये गया। बाप जो पाटन की कब्र में सोया था। बाप जो बेटे के दिल में सोया था। बाप जो खून के एक-एक कतरे में समाया हुआ था। बाप जिसे पाटन ने छीन लिया था। बाप जो कवि था। बाप जो योद्धा था। बाप जो बादशाहों का बादशाह था। उस बाप की कब्र पर बैठकर रहीम बहुत देर तक आँसू बहाता रहा।

इस प्रकार गुजरात की जमीन पर रहीम के भाग्य ने पहला कदम धरा। उस समय रहीम नहीं जानता था कि यही गुजरात एक दिन उसे भी खानखाना के आसन पर बैठायेगा और एक दिन पूरा गुजरात ही रहीम को दे दिया जायेगा। पाटन की सूबेदारी मिलने के दो साल बाद अकबर ने खाने आजम कोका से गुजरात छीन कर रहीम को सौंप दिया।

-अध्याय 61, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

सितारा बुलंदी पर (62)

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सितारा बुलंदी पर

रहीम का सितारा भाग्य के आकाश पर पूरे जोर से चमकने लगा। रहीम का सितारा बुलंदी पर देखकर बहुत से लोगों की छाती पर सांप लोटने लगे।

जब अकबर ने मेवाड़ नरेश महाराणा प्रतापसिंह के खिलाफ अभियान किया तो उसने अपने समस्त योग्य सेनापतियों को अजमेर पहुँचने का आदेश दिया। मिर्जाखाँ रहीम को भी ये आदेश भेजे गये। पूरे दो साल तक मिर्जाखाँ रहीम, शहबाजखाँ आदि मुगल सेनापतियों के साथ मेवाड़ के पहाड़ों में भटकता रहा।

इस अभियान में रहीम ने प्रतापसिंह के बारे मे बहुत सी बातें सुनीं। वह चाहता था कि किसी दिन प्रतापसिंह को रूबरू देखे किंतु इसका सौभाग्य उसे कभी नहीं मिला। न जाने क्यों रहीम का मन चाहता था कि इस युद्ध में प्रतापसिंह जीत जाये।

होने को तो रहीम अकबर का सेनापति था और हाथ में तलवार लेकर अकबर के लिये ही लड़ता था किंतु उसका मन इस लड़ाई में कदापि उसका साथ नहीं देता था। वह एक अजीब सिपाही था जो अपने दुश्मन की जीत चाहता था। दो साल की दीर्घ अवधि में बहुत से आदमी गंवा कर और बहुत से निरपराध मेवाड़ियों का खून बहाकर ये लोग कुंभलमेर, गोगूंदा और उदयपुर पर अधिकार करने में सफल हो गये।

मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम के काम से प्रसन्न होकर अकबर ने ईस्वी 1580 में उसे मीर अर्ज के पद पर नियत किया। मीर अर्ज का काम यह था कि जो लोग बादशाह से अपनी दीन दशा कहने आयें, उनका वृत्तांत बादशाह की सेवा में निवेदन करे और जो उसका उत्तर मिले वह उनको जाकर कह दे। यदि संतोषजनक उत्तर न मिले तो याची की वास्तविक स्थिति को देखते हुए पुनः बादशाह से प्रार्थना करने का साहस करे।

अब तक यह काम किसी एक अधिकारी के जिम्मे नहीं होता था। प्रत्येक दिन के लिये अलग आदमी नियत होता था किंतु मिर्जाखाँ अब्दुर्रहीम की स्पष्टवादी प्रवृत्ति एवं निर्भीक व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अकबर ने रहीम को इस काम पर नियुक्त कर दिया।

रहीम ने यह काम इतनी सफलता से किया कि मात्र आठ माह बाद ही अकबर ने अजमेर की सूबेदारी और रणथंभौर का दुर्ग भी रहीम को सौंप दिये। मिर्जा रहीम देशपति और गढ़पति हो गया। रहीम का सितारा भाग्य के आकाश पर पूरे जोर से चमकने लगा। रहीम का सितारा बुलंदी पर देखकर बहुत से लोगों की छाती पर सांप लोटने लगे।

जब रहीम अजमेर की सूबेदारी संभाल कर फिर से बादशाह को सलाम करने के लिये दिल्ली आया तो बख्शियों ने रहीम को शहबाजखाँ के ऊपर खड़ा किया। इस पर शहबाजखाँ बिगड़ गया और उसने रहीम से नीचे खड़ा होने से मना कर दिया। जब इस बात का पता बादशाह को लगा तो उसने शहबाजखाँ को कछवाहा सरदार रायसाल दरबारी के पहरे में रख दिया। रहीम का यह रुतबा देखकर बड़े-बड़े अमीरों की रूह काँप गयी। वे समझ गये कि अभी रहीम का सितारा भाग्य के आकाश में और ऊँचा चढ़ेगा।

-अध्याय 62, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

मछलियाँ और कछुए (63)

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मछलियाँ और कछुए

मछलियाँ और कछुए इतिहास के उस मोड़ पर आ पहुंचे थे जहाँ अब उनमें से किसी एक का साम्राज्य बचे रहना था और दूसरे को मिट जाना था।

ईसा की नौवीं-दसवीं शताब्दी में चम्बल नदी के किनारे कूर्मवंशी क्षत्रियों की तीन शाखाएं राज्य करती थीं। इनमें से एक शाखा नरवर पर, दूसरी ग्वालिअर पर तथा तीसरी शाखा दूबकण्ड पर कायम थी। इन तीनों शाखाओं को कच्छवाहा[1] कहा जाता था।

ग्यारहवीं शती के आरंभ में नरवर के राजकुमार धौलाराय ने पुराणकालीन मत्स्य क्षेत्र पर आक्रमण किया और इस क्षेत्र में बसने वाले मत्स्यों को परास्त कर अपना शासन स्थापित किया। ये मत्स्य इस काल में मीणे[2] कहलाते थे। इस प्रकार कछुओं ने मछलियों को मार भगाया।

जिस समय बाबर ने भारत की धरती पर पैर रखा उस समय कच्छवाहा वंश का राजा पृथ्वीराज इस क्षेत्र पर शासन करता था जिसकी राजधानी आमेर थी। बाबर का मार्ग रोकने वालों में राजा पृथ्वीराज भी प्रमुख था और वह खानुआ के मैदान में भी बाबर के विरुद्ध लड़ा था लेकिन उसके पुत्र पूर्णमल के काल से आमेर राज्य घनघोर अंतर्कलह में घिर गया और राजाओं की हत्याओं का लम्बा सिलसिला चल पड़ा।

अकबर के शासन काल में आसकरण आमेर का राजा था। एक बार जब आसकरण तीर्थयात्रा के लिये गया तो उसके छोटे भाई भारमल[3]  ने आमेर पर कब्जा कर लिया और स्वयं को आमेर का राजा घोषित कर दिया। आसकरण ने अपना राज्य वापिस पाने के लिये पठान हाजीखाँ से मदद मांगी।

जब हाजीखाँ सेना लेकर आमेर पर आया तो भारमल ने अपनी पुत्री किसनावती का डोला हाजीखाँ को भिजवा दिया। हाजीखाँ राजकुमारी लेकर वापस चला गया और आमेर पर भारमल का शासन पक्का हो गया। आसकरण देखता रह गया।

भारमल एक स्वार्थी और निम्न विचारों का इंसान था। जब उसने देखा कि पठान हाजीखाँ में इतनी सामर्थ्य नहीं कि उसके राज्य को स्थायित्व दे सके तो उसने दिल्ली के बादशाह अकबर की शरण में जाने का विचार किया। ई.1562 में जब अकबर अजमेर जा रहा था तब भारमल दौसा के निकट उसकी सेवा में उपस्थित हुआ। उसने अपनी पुत्री जोधाबाई तथा पुत्र भगवानदास, अकबर को समर्पित कर दिये।

यह भारत के इतिहास में पहला अवसर था जब किसी प्रबल हिन्दू नरेश ने स्वेच्छा से अपनी पुत्री किसी मुस्लिम राजा को समर्पित की हो। अकबर ने संयोग से हाथ आये इस अवसर के मूल्य को पहचाना तथा जोधाबाई से विवाह कर लिया। राजा भारमल के पुत्र भगवानदास तथा पौत्र मानसिंह को भी अकबर अपने साथ आगरा ले गया और उन्हें मनसब आदि देकर अपना चाकर बना लिया।

मानसिंह तथा अकबर की आयु में कम ही अंतर था इसलिये उन दोनों में अच्छी मित्रता हो गयी। दोनों साथ-साथ शराब पीकर झगड़ते, दासियों का नृत्य देखते, साथ-साथ शिकार खेलते और युद्ध अभियानों पर जाते। कई बार दोनों नशे में चूर होकर किसी दासी के लिये गुत्थमगुत्था हो जाते किंतु नशा उतरते ही सुलह कर लेते। मानसिंह विद्वान, गुणी और प्रबल योद्धा था, उसकी सेवाओं से मुगल साम्राज्य का न केवल विस्तार हुआ अपितु उसमें स्थायित्व भी आ गया।

राजा भारमल, भगवानदास, मानसिंह और टोडरमल जैसे हिन्दू वीरों की सेवाएं प्राप्त कर लेने के बाद अकबर की समझ में आया कि एक ओर तो उसके पिता और दादा के रक्त सम्बंधी, कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी सुन्नी अमीर हैं जो अकबर को हटाकर स्वयं बादशाह बनना चाहते हैं और दूसरी ओर हिन्दू नरेश हैं जो एक बार चाकरी स्वीकार कर लेने के बाद प्राण गंवाकर भी अपने स्वामी की रक्षा करते हैं। अतः अकबर ने हिन्दू नरेशों को मुगल साम्राज्य की रक्षा के लिये नियुक्त करने का निर्णय किया।

उधर हिन्दू राजकुमारी से विवाह का अनुभव भी बहुत अच्छा रहा था। अतः अकबर ने समस्त हिन्दू नरेशों को आदेश दिया कि वे अपनी राजकुमारियों के डोले अकबर तथा अकबर के शहजादों और अमीरों के लिये भेजें। इस योजना से भारत वर्ष के हिन्दू नरेशों में हड़कम्प मच गया।

कई राजकन्याओं ने आत्मघात कर लिया किंतु बात बात पर मूंछों की लड़ाई लड़ने वाले हिन्दू नरेश इस विपत्ति से अपनी रक्षा नहीं कर सके। न ही उन्होंने अपने जनेऊ, वेद और कन्याओं की रक्षा करने के लिये किसी संगठन का निर्माण किया। फलतः बहुत से राजाओं को अपनी कन्याएं मुगलों से ब्याहनी पड़ीं।

इससे एक ओर तो हिन्दू नरेशों के जातीय गौरव का विगलन हुआ और दूसरी तरफ मुगल साम्राज्य की नींवें भारत में मजबूती से जम गयीं। सम्पूर्ण उत्तरी भारत में केवल मेवाड़ ही उस समय एकमात्र ऐसा हिन्दू नृवंश था जो चट्टान की तरह खड़ा था, जिसने न तो मुगलों की अधीनता स्वीकार की और न उन्हें अपनी कन्याएं सौंपना स्वीकार किया।

-अध्याय 63, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] कच्छवाहा शब्द कश्यप अथवा कच्छप से बना है। कूर्म तथा कच्छप दोनों ही शब्दों का अर्थ कछुआ होता है।

[2] मीन शब्द से मीणा बना है। मत्स्य और मीन दोनों ही शब्दों का अर्थ मछली होता है।

[3] इसे बिहारीमल भी कहते हैं।

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