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आगरा से पलायन (47)

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आगरा से पलायन

जब बादशाह ने आगरा से पलायन करके दिल्ली के लिए कूच किया तो खुरजे में माहम अनगा का जंवाई शहाबुद्दीन अहमद खाँ अपने सब भाई बंदों के साथ बादशाह की पेशवाई के लिये हाजिर हुआ।

जब दिल्ली पर काबिज होने के चार साल पूरे होने को आये तो बैरामखाँ और अकबर राजकीय कार्य के सिलसिले में दिल्ली से आगरा गये। बैराम खाँ तो आगरा पहुँच कर राजकीय कार्यों में व्यस्त हो गया और अकबर सदा की तरह शिकार और खेलों में लग गया। हालांकि अब वह अठारह साल का कड़ियल जवान था और शासन के मामलों को बेहतर समझ सकता था किंतु उसकी तबियत शिकार खेलने और मौज मस्ती करने में ही अधिक लगती थी।

एक दिन जब अकबर शिकार खेलने के लिये आगरा के बाहर स्थित घने जंगलों में गया हुआ था तब वहीं माहम अनगा के गुप्तचर उसकी सेवा में हाजिर हुए। उन्होंने अकबर से कहा- ‘आपकी माँ मलिका हमीदा बानू सख्त बीमार हैं और उन्होंने कहलवाया है कि यदि बादशाह सलामत अपनी माँ को आखिरी बार देखना चाहता हैं तो बिना वक्त गंवाये, जैसे खडे़ हैं, वैसे ही चले आयें।’

पितृहीन अकबर माता के प्राण संकट में जानकर उसी क्षण मिरजा अबुल कासिम[1]  को साथ लेकर दिल्ली के लिये रवाना हो गया और बैराम खाँ को अपने दिल्ली जाने की खबर भिजवा दी। जैसे ही अकबर दिल्ली पहुँचा तो उसे हरम की औरतों ने घेर लिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि उन औरतों का नेतृत्व माहम अनगा कर रही थी।

अकबर को यह देखकर संतोष हुआ कि उसकी माँ बिल्कुल सुरक्षित है।

– ‘हमने तो सुना था कि मलिका ए आलम की तबियत नासाज है?’

हमीदा बानू कुछ बोलती उससे पहले माहम अनगा बड़े नाज-नखरों से अकबर की बलैयाएं लेती हुई बोली- ‘मलिका क्यों बीमार पड़ने लगी? बीमार पड़े हमारा दुश्मन, वह मुआ बैरामखाँ। मौत ले जाये उसे खींचकर।’

– ‘फिर अचानक क्यों आपने हमें दिल्ली बुलवाया? वह भी मलिका की तबियत बहुत खराब होने की झूठी सूचना देकर?’ अकबर माहम अनगा के जवाब से हैरान रह गया।

– ‘बादशाह सलामत को अचानक दिल्ली इस लिये बुलवाया गया है कि हमें यह खबर लगी थी नमक हराम बैरामखाँ आगरा में बादशाह के साथ दगा करके स्वयं बादशाह बनने की तैयारी कर रहा है।’

– ‘किस ने दी ऐसी झूठी खबर?’ अकबर ने पूछा।

– ‘खबर बहुत ही भरोसे के आदमी ने लाकर दी और हमें यहाँ इस बात के सबूत भी मिले हैं।’ हमीदा बानू ने जवाब दिया।

अकबर ने माहम अनगा को दिलासा दी- ‘आप फिक्र न करें। खानबाबा का गुस्सा जरूर तेज है जिसके कारण उन्होंने कई ज्यादतियाँ की हैं किंतु ऐसी कोई बात नहीं है कि वे बादशाह के साथ दगा करें।’

 जब माहम अनगा की बात नहीं चली तो हमीदा बानू सामने आयी। उसने कहा- ‘यह ठीक है कि बैरामखाँ आज ऐसा नहीं करने वाला किंतु एक न एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जब वह ऐसा करने की सोचे। इसलिये जरूरी है कि तुम अभी बैरामखाँ से छुटकारा पा लो।’

अकबर ने माँ की बात को ध्यान से सुना और मौके पर उचित निर्णय लेने का भरोसा दिया। इस पर माहम अनगा ने नया पासा फैंका। उसने अकबर से कहा- ‘मुझे मक्का जाने की इजाजत दी जाये।’

– ‘क्यों?’ अकबर चौंका।

– ‘इसलिये कि यह बात बैरामखाँ तक जरूर पहुंचेगी। जब उसे पता लगेगा कि मैंने उसकी शिकायत की है तो वह जरूर या तो मुझे मार डालेगा या फिर अत्तका[2]  को।’

– ‘लेकिन उसे पता ही कैसे लगेगा कि आपके और मेरे बीच में क्या बात हुई है?’

– ‘क्योंकि उसके जासूस यहाँ भी मौजूद होंगे।’

– ‘चलो मान भी लिया जाये कि उसके जासूस यहाँ भी मौजूद होंगे लेकिन क्या उसकी इतनी हिम्मत होगी कि वह आप पर तेग उठाये?’

– ‘जब वह अत्तका को सबके सामने जान से मारने की धमकी दे सकता है तो क्या वह ऐसा नहीं कर सकता?’

भले ही अकबर माहम अनगा और हमीदा बानू की बातों को मानने से इन्कार कर रहा था किंतु ऐसा वह केवल उन्हें दिलासा देने के लिये कर रहा था। जब उसने अत्तका को बुलाकर सच्चाई जाननी चाही तो न केवल अत्तका अपितु सैंकड़ों आदमी बैराम खाँ की चुगलियों पर उतर आये। माहम अनगा ने दिल्ली, लाहौर और काबुल के सूबेदारों को पहले से ही बुला रखा था। उन्होंने भी बैराम खाँ की ज्यादतियाँ बढ़ा-चढ़ा कर अकबर से कहीं। अब अकबर के पास उनकी बात मान लेने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

माहम थी तो भिश्ती परिवार से किंतु लम्बे समय से राजघराने में रहकर राजनीति की चतुर खिलाड़ी हो गयी थी। उसने बादशाह को विचार मग्न देखकर कहा- ‘यह आपने बहुत ही अच्छा किया जो मिरजा अबुल कासिम को अपने साथ लेते आयेे।’

– ‘यदि मिरजा अबुल कासिम हमारे साथ नहीं आते तो क्या कोई विशेष बात हो जाती?’ अकबर ने पूछा।

– ‘क्या शहंशाह को पता है कि बैरामखाँ हमेशा से मिरजा को अपने साथ क्यों रखता है?’ माहम अनगा ने उलट कर सवाल किया।

– ‘क्या इसमें भी किसी तरह का भेद है?’ अकबर के चेहरे पर असमंजस के चिह्न प्रकट हुए।

– ‘यही तो आप समझते नहीं बादशाह सलामत! अबुल कासिम बैरामखाँ का वो मोहरा है जिसे उसने आफत के समय के लिये संभालकर रखा हुआ है।’

– ‘आप क्या कह रही हैं मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा!’

– ‘मिरजा कासिम को बैरामखाँ ने इसलिये अपने साथ रखा हुआ है कि जब भी आप उसकी बात मानने से इन्कार करें तो बैरामखाँ आपके स्थान पर मिरजा को तख्त पर बैठा सके। बाबर का वंशज होने के कारण बाकी अमीर भी अबुल कासिम को अपना बादशाह स्वीकार कर लेंगे।’

माहम अनगा की बात सुनकर अकबर की आँखें फटी की फटी रह गयीं। कई बार खुद अकबर ने महसूस किया था कि बैराम खाँ मिरजा अबुल कासिम को बहुत अधिक तवज्जो दिया करता है। क्या वाकई में बैराम खाँ इतना शातिर आदमी है! माहम अनगा की इस बात से अकबर पूरी तरह माहम के वश में हो गया।

माहम अनगा की सलाह पर अकबर ने सारे अमीरों को पत्र लिखकर सूचित किया कि खानखाना बैराम खाँ उलटा चलता है जिससे हम उसे अपनी नजरों से गिराकर यहाँ दिल्ली चले आये हैं। जो अमीर अपना भला चाहता है तो वह यहाँ हाजिर हो जाये।

जब बादशाह ने आगरा से पलायन करके दिल्ली के लिए कूच किया तो खुरजे[3]  में माहम अनगा का जंवाई शहाबुद्दीन अहमद खाँ अपने सब भाई बंदों के साथ बादशाह की पेशवाई के लिये हाजिर हुआ था और वहीं से बादशाह के संग लग लिया था। जब उसने बादशाह को अपनी सास के अधीन देखा तो अपने श्वसुर शमशुद्दीन खाँ अत्तका को बहीर[4]  से और मुनअमखाँ को काबुल से दिल्ली चले आने के लिये लिखा। जब शमशुद्दीन आया तो अकबर ने बैरामखाँ का नक्कारा, निशान और तुमन तौग शमशुद्दीन को दे दिये तथा पंजाब का सूबेदार भी बना दिया।

जब माहम अनगा के समधी मुहम्मद बरकी[5]  को ये सब समाचार मालूम हुए तो उसने बैराम खाँ को सारा हाल लिख भेजा। बैराम खाँ ने अकबर की कोई परवाह नहीं की।


[1] यह मिरजा कामरान का बेटा था।

[2] धाय का पति

[3] दिल्ली और अलीगढ़ के बीच स्थित है।

[4] पंजाब में लाहौर के पास था। अब पाकिस्तान में है।

[5]  माहम अनगा के बेटे अहमदखां का ससुर।

-अध्याय 47, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

हरम सरकार (48)

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हरम सरकार

अकबर के आगरा से दिल्ली चले आने पर आगरा में बैराम खाँ की सरकार और दिल्ली में हरम सरकार स्थापित हो गयी। ये दोनों सरकारें एक-दूसरे को खत्म करने पर तुल गयीं।

अकबर इन दोनों सरकारों के बीच में बादशाह होते हुए भी प्यादे की तरह बेबस होकर रह गया। कैसी विचित्र शतरंज थी यह? दोनों ओर की सेना में फर्जी[1]  से लेकर ढईया[2] और प्यादे[3] तक अलग-अलग थे किंतु दोनों सेनाओं का बादशाह एक ही था।

माहम अनगा के निर्देशन में शाहबुद्दीन और शमशुद्दीन दिल्ली का किला सजाकर बैठ गये। बैरामखाँ से बादशाह का मिजाज बदल जाने के समाचार थोड़े ही दिनों में चारों और फैल गये।

अमीर, उमराव, सरदार, ताबेदार और भी बहुत सारे लोग बैरामखाँ को छोड़-छोड़कर दिल्ली पहुँचने लगे। सबसे पहले कयाखाँ गंग आया जो बैरामखाँ के बड़े अमीरों में से था। जो भी दिल्ली आता था उसे माहम अनगा और शाहबुद्दीन अहमदखाँ की सलाह से जागीर[4] मनसब[5] और खिताब[6]  दिये जाने लगे।[7]

जब बैरामखाँ के आदमी एक-एक करके खिसकने लगे तो बैरामखाँ की आँखें खुलीं। उसने मिरजा अबुल कासिम को ढूंढा किंतु वह आगरे में नहीं मिला। बैरामखाँ समझ गया कि खेल पक्का हुआ है। बैरामखाँ ने वक्त की नजाकत को समझकर अपने आदमी बादशाह की खिदमत में माफी मांगने के लिये भेजे। अकबर ने उनको भी अपनी ओर मिला लिया और फिर से आगरा नहीं लौटने दिया।

बैरामखाँ ने कुछ दिनों तक तो अपने आदमियों के लौट आने की प्रतीक्षा की किंतु उन्हें लौटता न देखकर बादशाह को संदेश भिजवाया कि माफी मांगने के लिये मैं स्वयं दिल्ली आ रहा हूँ। इस पर अकबर के अमीरों ने सलाह दी कि बादशाह लाहौर चले जायें और जब वह लाहौर आये तो बादशाह काबुल चले जायें।

माहम अनगा ने कहा कि बादशाह को कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। बैरामखाँ को लिख दिया जावे कि दिल्ली न आवे। यदि फिर भी वह दिल्ली आये तो उसका मार्ग रोका जाये।

माहम अनगा की सलाह पर अकबर ने बैरामखाँ के आदमियों को ही दिल्ली-आगरा के बीच का मार्ग रोकने पर तैनात किया ताकि बैरामखाँ को भली भांति अपमानित किया जा सके। इस तरह माहम अनगा ने बैरामखाँ के बादशाह तक पहुँचने के सारे रास्ते बंद कर दिये।

जब बैरामखाँ ने देखा कि बादशाह तक पहुँचने के सारे रास्ते बंद हैं तो उसने अमीरों से सलाह की। बैरामखाँ के अमीरों ने सलाह दी कि अभी बादशाह के पास अधिक आदमी नहीं हैं। बेहतर होगा कि बैरामखाँ दिल्ली पर आक्रमण कर दे और अकबर तथा माहम अनगा को बंदी बना ले।

बैरामखाँ ने हुमायूँ के स्नेह का विचार करके ऐसा करना उचित नहीं समझा। वह अब भी यही समझता रहा कि मेरे बिना अकबर का काम नहीं चल सकेगा इसलिये जैसे भी हो अकबर से मेल-मिलाप का प्रयास करना चाहिये किंतु उसका कोई रास्ता नहीं सूझता था।

 बहुत सारा आगा-पीछा सोचकर बैरामखाँ ने अपने प्रमुख अमीरों को बुलवाया और उन्हें बादशाह की सेवा में भेजकर कहलवाया कि मैं अपने सारे आदमी आपकी खिदमत में भेज रहा हूँ ताकि बदमाश लोग आपको मेरे विरुद्ध जो कुछ भी कहते रहे हैं आप उनकी बात न सुनकर मेरी निष्ठा पर विचार करें तथा मुझे मक्का जाने की इजाजत दें। बैरामखाँ ने अपनी मोहर भी अकबर को भिजवा दी।

बैरामखाँ ने यह सारा उपक्रम इस आशा में किया था कि अकबर बैरामखाँ का यह नरम रुख देखकर पसीज जायेगा और फिर से मेल-मिलाप कर लेगा किंतु बैरामखाँ नहीं जानता था कि विधाता उससे विपरीत हो गया है जिसके कारण लाख उपाय करने से भी बात बनने वाली नहीं है।

जब बैरामखाँ के सारे अमीर बैरामखाँ की मोहर और मक्का जाने की अर्जी लेकर अकबर के पास पहुंचे तो हरम सरकार ने इसे बैरामखाँ सरकार की हार और अकबर की जीत बताया तथा अकबर को सलाह दी कि उसे किसी भी तरह नरम नहीं पड़ना चाहिये। इस तरह दोनों सरकारों के बीच मेल-मिलाप का आखिरी मौका भी हाथ से निकल गया।

-अध्याय 48, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  वजीर।

[2] घोड़ा।

[3]  सबसे छोटा मोहरा, पैदल सिपाही।

[4] जागीर में गाँव अथवा सूबे दिये जाते थे जिनसे प्रतिवर्ष निश्चित राशि राजस्व के रूप में प्राप्त होती थी।

[5] मनसब सैनिक पद था। सबसे छोटा मनसब 10 का था और सबसे बड़ा मनसब बारह हजार का था। आठ हजार तथा उससे ऊपर के मनसब केवल बादशाह और उसके पुत्र-पौत्रों के लिये आरक्षित थे। जयपुर नरेश राजा मानसिंह तथा उनके जैसे 1-2 व्यक्ति ही अधिकतम 7 हजार मनसब के पद पर नियुक्त हो पाये थे। मनसब देते समय उन्हें बादशाह की ओर से यह आदेश भी होता था कि जब भी उन्हें बुलाया जाये, वे बादशाह की सेवा में कितने घुड़सवार लेकर हाजिर होंगे। जरूरी नहीं था कि सात हजारी मनसबदार सात हजार घुड़सवार लेकर आये। यह पद की उच्चता का द्योतक था, न कि जात अथवा सवार का।

[6] उपाधियां अक्सर व्यक्ति के काम और हैसियत का द्योतक होती थीं जैसे धातृ पति को अत्तका अथवा अतगा खाँ की, अमीर के पुत्रों को मिरजा की, बादशाह को खाँ की और बादशाहों के बादशाह को खानखाना की उपाधि दी जाती थी।

[7] तबकात अकबरी में लिखा है कि बैरामखाँ के 25 नौकर पाँच हजारी मनसब को पहुँच कर नौबत और निशान के धनी हो गये थे।

लखनवी (49)

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लखनवी

सलीमशाह ने भी एक बार एक लाख स्वर्ण मुद्रायें दी थीं जिन्हें बाबा रामदास ने उसी प्रकार भिखारियों में बांट दिया था जिस प्रकार से इस बार बांट दिया है। इसलिये सलीमशाह ने उसका नाम लखनवी रख दिया था। बैराम खाँ उस तपस्वी संगीतज्ञ को प्रणाम करके उठ आया।

उन दिनों आगरा से मथुरा तक का मार्ग राजमार्ग कहलाता था जो हर समय मनुष्यों, घोड़ों और गौओं की चहल-पहल से भरा रहता था। आगरा से बारह मील की दूरी पर यह राजमार्ग रुनुकता गाँव से होकर गुजरता था।

किसी समय यह रेणुका क्षेत्र कहलाता था जो अपभ्रंश होकर रुनुकता कहलाने लगा था। रुनुकता गाँव से लगभग डेढ़ मील दूर यमुनाजी के दक्षिणी तट पर गौघाट स्थित था जिसकी चहल-पहल देखते ही बनती थी। उन दिनों आगरा से मथुरा के बीच यमुनाजी में नौकाओं के माध्यम से भी काफी आवागमन होता था।

रुनुकता क्षेत्र में बड़े-बड़े चारागाह थे जिनमें हजारों गौएं रहा करती थीं। ये गौएं नियमित रूप से जिस स्थान पर यमुनाजी का जल पीने के लिये आया करती थीं, उस स्थान का नाम गौघाट पड़ गया था। बड़ी-बड़ी नौकाओं में सवार पथिक गौओं के विशाल झुण्डों को देखने के लिये गौघाट पर घण्टों तक रुके रहते थे।

इसी गौघाट पर कई संतों ने अपनी कुटियाएं बना ली थीं जिनका निर्वहन गौपालकों और चरवाहों द्वारा दी गयी दान दक्षिणा तथा इन गौओं के दूध पर हुआ करता था। ये संत संध्या काल में एकत्र होकर तानपूरों पर भजन गाया करते थे जिन्हें सुनने के लिये चरवाहों की भीड़ जुट जाती। श्रद्धालु और भजनों के रसिक लोग भी नौकाएं रुकवाकर इन सभाओं में आ बैठते थे। देर रात तक ये संगीत सभायें जुड़ी रहतीं।

 उस समय तक देश में मुस्लिम शासन हुए साढ़े तीन शताब्दियाँ हो चुकी थीं। हिन्दू प्रजा, मुस्लिम शासकों और उनके बर्बर सैनिकों के अत्याचार से त्रस्त एवं भयभीत रहती थी किंतु उनसे मुक्ति का कोई उपाय नहीं था। पराभव का काल जानकर हिन्दु प्रजा ईश्वर की शरणागति हो हरि भजन में ही अधिकांश समय व्यतीत करती थी।

उन दिनों गौघाट पर पर एक वृद्ध संगीतज्ञ रहता था। वह प्रातः सूर्योदय से बहुत पहले उठकर भगवान कृष्ण के एक छोटे से देवालय के सामने बैठकर भगवान को जगाया करता था।

एक दिन बैरामखाँ किसी कार्य से देर रात्रि में मथुरा से आगरा के लिये निकला। जिस समय वह गौघाट पहुँचा, उस समय भी सूर्योदय होने में काफी विलम्ब था। इसलिये उसने अपने घोड़े की गति कम कर ली। उसका विचार था कि यदि संभव हुआ तो वह गौघाट पर रुक कर कुछ देर विश्राम कर लेगा। निकट पहुँचने पर यमुनाजी के निर्मल तट पर बहने वाली सुवासित वायु के झौंकों ने उसके नासा रंध्रों में प्रवेश किया तो उसकी सारी थकावट जाती रही।

अचानक बैरामखाँ को लगा कि वायु के इन झौंकों में घुली हुई कोई अदृश्य शक्ति उसे खींच रही है। वह घोड़े से उतर पड़ा और और अपने सेवकों को वहीं रुकने का संकेत करके अकेला ही चहल कदमी करने लगा। जब वह कुछ और आगे गया तो उसके कर्णरंध्रों में एक संगीत लहरी ने प्रवेश किया। बैरामखाँ संगीत लहरी के सम्मोहन में बंधा हुआ उसी दिशा में बढ़ने लगा जिस दिशा से वह संगीत लहरी आ रही थी।

कुछ आगे जाने पर बैरामखाँ ने एक अद्भुत दृश्य देखा उसने देखा कि एक कुटी के समक्ष एक छोटा सा देवालय है जिसमें भगवान कृष्ण की श्यामवर्ण मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के सामने एक छोटा सा दिया जगमगा रहा है और एक कृशकाय वृद्ध मगन होकर तानपूरा बजा रहा है तथा साथ ही साथ भजन गा रहा है। वृद्ध के नेत्रों से आँसुओं की अनवरत धारा बह रही है। वृद्ध के कंधे पर एक जनेऊ पड़ा था और घुटनों पर एक फटी धोती लिपटी थी।

उसने देखा कि वह वृद्ध कोई और नहीं हेमू का वही बूढ़ा बाप है जिसका वध स्वयं बैराम खाँ ने अपनी तलवार से किया था। जाने क्या माया है? बैराम खाँ को लगा उसका सिर फट जायेगा। क्या ऐसा भी संभव है? थोड़ी देर में जब बैराम खाँ की आँखें अंधेरे में और साफ देखने लगीं तो उसने देखा कि वह हेमू का बूढ़ा बाप नहीं कोई और वृद्ध है जिसके कण्ठ से निकली स्वर माधुरी ही उसे यहाँ तक खींच लाई है।

सम्मोहित सा बैराम खाँ वहीं धरती पर बैठ गया। वृद्ध को पता तक न चल सका कि अंधेरे में कोई और परछाई भी आकर बैठ गयी है। सच पूछो तो स्वयं बैराम खाँ को भी पता न चला कि वह कब यहाँ तक चलकर आया और कब धरती पर बैठकर उस संगीत माधुरी में डुबकियाँ लगाने लगा। वृद्ध तल्लीन होकर गाता रहा। बैराम खाँ भी बेसुध होकर सुनता रह।-

वृद्ध अपने आराध्य से जागने की विनती कर रहा था-

जागिये बृजराज कुंअर कमल कुसुम फूले।

कुमुद बंद सकुचित भये भृंग लता  फूले।

तमचुर  खग रौर सुनहु बोलत  बनराईं

राँभति गौ खरिकन में  बछरा हित धाईं

बिधु मलीन रबिप्रकास  गावत नर-नारी।

सूर स्याम प्रात  उठौ  अंबुज कर धारी।

भजन का एक-एक शब्द बैराम खाँ की आत्मा में उतर गया। जाने कितना समय इसी तरह बीत गया। भजन पूरा करके जब वृद्ध गायक ने तानपूरा धरती पर रखा तो सूर्य देव धरती पर पर्याप्त आलोक फैला चुके थे। वृद्ध की दृष्टि बेसुध पड़े बैरामखाँ पर पड़ी।

वृद्ध ने देखा कि कोई दाढ़ीवाला खान धरती पर पड़ा है और उसकी आँखों से आँसू बहे चले जा रहे हैं। उसकी पगड़ी खुलकर धूल में बिखर गयी है और तलवार कमर से निकलकर एक तरफ पड़ी है। संगीत लहरी के बंद हो जाने पर बैरामखाँ की तंद्रा भंग हुई। उसने देखा कि वृद्ध संगीतज्ञ चुपचाप खड़ा हुआ उसी को ताक रहा है।

बैराम खाँ लजा कर उठ बैठा। क्या हो गया था उसे! बैरामखाँ को स्वयं अपनी स्थिति पर आश्चर्य हुआ। कब वह यहाँ तक चला आया था! कब वह धरती पर गिर गया था? क्यों वह रोने लगा था? कब क्या हुआ उसे कुछ पता नहीं चला था।

बैरामखाँ उठ कर बैठ तो गया किंतु उसके शरीर में इतनी शक्ति भी शेष नहीं बची थी कि वह अपने घोड़े तक  पहुंचसके। उसने संकेत करके वृद्ध से पानी मांगा। वृद्ध ने यमुनाजी में से पानी लाकर उस विचित्र और अजनबी खान को पिलाया। खान के कीमती वस्त्रों और वेशभूषा को देखकर वृद्ध ने अनुमान लगाया कि वह कोई उच्च अधिकार सम्पन्न अधिकारी है किंतु वृद्ध ने उससे कोई सवाल नहीं किया।

– ‘आप कौन हैं बाबा?’ बहुत देर बाद बैराम खाँ ने ही मौन भंग किया।

– ‘मैं इस छोटे से मंदिर का बूढ़ा पुजारी रामदास[1]  हूँ।’ आप कौन हैं?’

– ‘मैं पापी हूँ। मैंने बहुत पाप किये हैं।’ जाने कैसे अनायास ही बैराम खाँ के मुँह से निकला और फिर से आँसू बह निकले।

– ‘भगवान शरणागत वत्सल हैं, सब पापों को क्षमा कर देते हैं, उन्हीं की शरण में जाओ भाई।’ वृद्ध ने स्नेहसिक्त शब्दों से खान को ढाढ़स बंधाया।

– ‘क्या आप मुझे एक भजन और सुनायेंगे।’ बैराम खाँ ने गिड़गिड़ा कर कहा।

वृद्ध फिर से तानपूरा लेकर बैठ गया और बहुत देर तक गाता रहा। जब बैरा मखाँ उठा तो उसका मन पूरी तरह हल्का था। वह बहुत अनुनय करके वृद्ध को अपने साथ आगरा ले गया और अगले दिन दरबार आयोजित करके सबके सामने वृद्ध का गायन करवाया। जाने क्या था उस वृद्ध के भजनों में कि भरे दरबार में बैरामखाँ रोने लगा।

बैराम खाँ ने भीगी आँखों से एक लाख स्वर्ण मुद्रायें वृद्ध के हाथ में धर कर हाथ जोड़़ लिये। जब वृद्ध विदाई पाकर चलने लगा तो बैरामखाँ उसे छोड़ने के लिये आगरा के परकोटे तक आया। वृद्ध मुद्रायें लेकर चला गया।

बहुत दिनों बाद जब बैराम खाँ एक बार फिर मथुरा से होकर निकला तो उसे वृद्ध संगीतज्ञ का स्मरण हो आया। वह बरबस उसी कुटिया तक जा पहुंचा। जब बैरामखाँ कुटिया तक पहुंचा तो उसने फिर से एक अद्भुत दृश्य देखा उसने देखा कि कुटिया के सामने वृद्ध संगीतज्ञ तानपूरा हाथ में लिये नाच रहा है और उसके नेत्रों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही है।

सम्पूर्ण परिवेश में एक संगीत माधुरी घुली हुई है। वृद्ध को घेर कर बहुत से लोग बैठे हुए उस अद्भुत दृश्य का आनंद ले रहे हैं। अचानक बैराम खाँ चौंक पड़ा। वृद्ध तो नृत्य में तल्लीन है फिर तानपूरा कौन बजा रहा है?

एक बार, दो बार, हजार बार बैराम खाँ ने आँखें फाड़-फाड़ कर देखा निश्चित रूप से तानपूरा वृद्ध नहीं बजा रहा था। आस पास बैठे व्यक्तियों में किसी के पास तानपूरा नहीं था। जाने क्या माया थी! बहुत देर तक यह अद्भुत दृश्य घटित होता रहा और बैराम खाँ ठगा हुआ सा चुपचाप खड़ा रहा। जब वृद्ध का नृत्य बंद हुआ तो सब के सब जैसे नींद से जागे।

जब सब लोग चले गये तो बैराम खाँ ने पूछा- ‘बाबा! जब आप नृत्यलीन थे तब तानपूरा कौन बजा रहा था?

वृद्ध हँसा और उसने संकेत करके खान को बैठने के लिये कहा। मंत्रमुग्ध सा बैरामखाँ उसी रेती पर बैठ गया। बहुत देर तक दोनांे चुप बैठे रहे। कोई कुछ नहीं बोला। अंत में वृद्ध ने तानपूरा उठाया और भजन गाने लगा। बैराम खाँ समझ गया कि यह भजन मुझे ही सुनाने के लिये गाया जा रहा है। कुछ ही देर में वृद्ध और बैराम खाँ दोनों की ही आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली।

भजन समाप्त होने पर बैराम खाँ का ध्यान वृद्ध की देह पर गया। उसके आश्यर्च का पार न रहा। आज भी वृद्ध के कंधे पर जनेऊ के अतिरिक्त और कुछ न था और घुटनों पर वही फटी हुई धोती लिपटी थी।

– ‘बाबा! उन एक लाख मोहरों का क्या हुआ?’ बैराम खाँ ने पूछा।

– ‘उन्हें जहाँ होना चाहिये था, वहीं भेज दीं हैं खान।’

– ‘उन्हें कहाँ होना चाहिये था?’

– ‘जिन्हें उनकी आवश्यकता थी, उन्हीं के पास।’ वृद्ध ने मुस्कुरा कर संकेत किया।

यह जानकर बैराम खाँ के आश्चर्य का पार नहीं रहा कि वृद्ध ने वे मोहरें भिखारियों में बांट दी थीं। अपने और अपने सातों बेटों के लिये एक भी नहीं रखी थी। उसी दिन बैरामखाँ को ज्ञात हुआ कि वह वृद्ध कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। एक जमाने में दिल्ली का बादशाह सलीमशाह भी उसके पास इसी तरह आया करता था जिस तरह बैराम खाँ आया करता है। सलीमशाह ने वृद्ध रामदास को अपने दरबार का कलावंत घोषित कर रखा था।

बैराम खाँ को यह भी ज्ञात हुआ कि सलीमशाह ने भी एक बार एक लाख स्वर्ण मुद्रायें दी थीं जिन्हें बाबा रामदास ने उसी प्रकार भिखारियों में बांट दिया था जिस प्रकार से इस बार बांट दिया है। इसलिये सलीमशाह ने उसका नाम लखनवी रख दिया था। बैराम खाँ उस तपस्वी संगीतज्ञ को प्रणाम करके उठ आया।

जाने क्यों उसके नेत्रों में बार-बार हेमू के बूढ़े बाप का निरपराध चेहरा घूम जाता था जो अस्सी साल की आयु में गर्दन कटवाने को तो तैयार था किंतु अपना धर्म त्यागने को नहीं। रह-रह कर उसे अपने ऊपर ग्लानि होती थी। किस धर्म के लिये उसने हेमू और उसके बूढ़े बाप की जान ले ली थी? क्या अंतर हो जाता यदि अकबर की जगह हेमू ही दिल्ली का बादशाह बना रहता?

बैराम खाँ तो चाकर था, चाकर भी न रह सका। अपराधी घोषित कर दिया गया। यदि अकबर की जगह हेमू की चाकरी में रहता तो क्या बुरा हो जाता?

-अध्याय 49, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] भक्तकुल शिरोमणि सूरदास इन्हीं रामदास के सातवें पुत्र थे।

आगरा से अलविदा (50)

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अकबर के दरबार में बैराम खाँ और अब्दुर्रहीम

बैराम खाँ ने आनंद और विनोद में डूबे उस परिवार को दखल देना ठीक नहीं समझा और दूर से ही उल्टे पैरों लौट गया। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया कि अब वह खुदा की इबादत के लिये मक्का चला जायेगा। आगरा से अलविदा कहने का समय आ गया था।

जब अपने सारे आदमियों को अकबर की सेवा में भेज देने के कई दिन बाद तक भी बैराम खाँ के पास दिल्ली से कोई जवाब नहीं आया तो बैराम खाँ बेचैन हो उठा। उसके सारे विश्वसनीय अमीर पहिले ही दिल्ली जा चुके थे, इनमें से कुछ अपनी मर्जी से गये थे और कुछ को स्वयं बैराम खाँ ने यह सोचकर भेज दिया था कि एक न एक दिन ये भी धोखा देंगे ही।

फिर क्यों न इन्हें स्वयं ही जाने के लिये कह दे। यदि ये मेरे हितैषी होंगे तो अकबर को मेरे पक्ष में करेंगे किंतु संभवतः उनमें से एक भी हितैषी न था जो लौटकर बैराम खाँ को दिल्ली की कुछ तो सूचना देता!

अब संसार में ऐसा कोई नहीं था जो बैराम खाँ को सलाह दे सकता था। ऐसे में बैराम खाँ को वृद्ध रामदास की याद आयी। बैराम खाँ अकेला ही घोड़े पर सवार होकर आगरा के लिये रवाना हो गया।

जिस समय बैरामखाँ गौघाट पहुँचा, उस समय तक सूर्यदेव आकाश के ठीक मध्य में आ विराजे थे और हजारों गायें यमुनाजी में पानी पीने के लिये तट पर आयी हुई थीं। उनके गलों में बंधे घुंघरुओं की रुनझुन से पूरा वातावरण गुंजायमान था। कुछ गायें तट पर खड़े वृक्षों के नीचे बैठी सुस्ता रही थीं। अचानक दाढ़ी वाले खान को देखते वे ही त्रस्त होकर भाग खड़ी हुईं।

बैराम खाँ को रोना आ गया। धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो मनुष्य तो मनुष्य, पशु तक शक्ल देखकर बिदक जायें। उसकी मनःस्थिति इन दिनों ऐसी थी कि वह छोटी से छोटी बात को अनुभव करने लगा था।

जिस समय बैराम खाँ कुटिया तक पहुँचा, उस समय बाबा रामदास कुटिया के बाहर करंज के घने पेड़ के नीचे बैठा अपने बेटों के साथ चावल खा रहा था। बालकों की माँ पत्तलों में पानी ला-लाकर पुत्रों को पिला रही थी। पिता पुत्रों में किसी बात को लेकर विनोद हो रहा था और पुत्रवती माता भी उनकी इस चुहल में सम्मिलित थी। इस आनंद विभोर परिवार को देखकर बैराम खाँ के पैर जमीन से चिपक गये।

बैराम खाँ को अचानक खानुआ के मैदान का स्मरण हो आया। ऐसे ही निरीह लोगों के रहे होंगे वे नरमुण्ड भी जिनकी मीनारें बनाकर बाबर ने ठोकरों से लुढ़का दिया था! क्या अपराध था उन लोगों का? केवल इतना ही तो कि वे सब नंगे तन रहकर पेड़ों की छाया में बैठकर मुठ्ठी भर चावल खाने वाले लोग थे? वे तलवार चलाना नहीं जानते थे, सत्ता तथा सियासत से उनका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था! वे तानपूरा बजाकर पूरा जीवन निकाल देते थे!

स्वयं बैराम खाँ भी तो जीवन भर यही करता आया है। बाबर, हुमायूँ और अकबर का राज जमाने के लिये कितने निरीह और निरपराध लोगों को उसने तलवार के घाट उतार दिया था! और आज……… आज वह उन सारे बादशाहों से दूर इस तानपूरे वाले बाबा के पास किस उम्मीद में चला आया था? अपनी दयनीय स्थिति पर बैराम खाँ वहीं रोने लगा। जाने क्या था इस डेढ़ पसली के भिखारी में, जो बैराम खाँ उसके सामने आते ही रोने लगता था?

बैराम खाँ ने आनंद और विनोद में डूबे उस परिवार को दखल देना ठीक नहीं समझा और दूर से ही उल्टे पैरों लौट गया। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया था। अब सत्ता और सियासत से दूर रखेगा वह अपने आप को। खुदा की इबादत के लिये मक्का चला जायेगा। आगरा से अलविदा कहने का समय आ गया था।

-अध्याय 50, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

बैराम खाँ का विद्रोह (51)

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बैराम खाँ और सलीमा बेगम

बैराम खाँ का विद्रोह मुगलों के इतिहास की ऐसी दर्दनाक दास्तान है जिसे पढ़कर किसी भी नेकदिल इंसान का दिल सियासत लिए हिकारत के भावों से भर जाएगा।

वापस आगरा न जाकर बैराम खाँ वहीं से अलवर के लिये रवाना हो गया ताकि वहाँ से अपने परिवार को लेकर मक्का के लिये प्रस्थान कर सके। जब उसके बचे-खुचे सेवकों को पता लगा कि बैराम खाँ अलवर चला गया है तो वे भी आगरा खाली करके उसके पीछे-पीछे अलवर चले आये। बैराम खाँ अलवर से अपना परिवार लेने के बाद सरहिंद की ओर गया जहाँ उसका गुप्त खजाना गढ़ा हुआ था।

जब पंजाब में नियुक्त जागीरदारों और सूबेदारों को बैराम खाँ के आगरा खाली कर देने के समाचार मिले तो उन्होंने बादशाह की हुकूमत से विद्रोह कर दिया और वे खानखाना के पक्ष में एकत्र होने लगे। ये वे लोग थे जिन पर खानखाना की बहुत मेहरबानियाँ थीं और जो यह समझते थे कि हुकूमत का वास्तविक मालिक तो बैराम खाँ ही है, अकबर ने बादशाह बनते ही उसके साथ गद्दारी की है।

जब बैराम खाँ के पंजाब की ओर जाने और पंजाब के अमीरों द्वारा विद्रोह करने के समाचार हरम सरकार को मिले तो हरम की सारी औरतों ने मिलकर अकबर को खूब भड़काया। हम तो पहले से ही कहते थे कि बैराम खाँ पूरा बदमाश और दगाबाज है। अकबर को भी हरम सरकार की बातें ठीक लगने लगीं। उसने बैराम खाँ को चिठ्ठी भिजवाई-

”बैराम खाँ को मालूम हो कि तू हमारे नेक घराने की मेहरबानियों का पाला हुआ है। चालीस साल की स्वामिभक्ति को भुलाकर विद्रोह करना ठीक नहीं है। तूने हमें बहुत कष्ट दिये हैं। फिर भी हम तुझे दण्ड नहीं देते। इससे तो अच्छा है कि तू लाहौर और सरहिंद में रखे अपने खजाने को हमारे पास भेज दे और खुद हज करने के लिये चला जा। जब तू हज से लौटकर आयेगा, तब तू जैसा कहेगा वैसा ही किया जायेगा क्योंकि अभी तो तेरे दुश्मनों ने मुझसे तेरी बुराइयां करके हमारा दिल तेरी ओर से फेर दिया है। बुरे लोगों के फेर में पड़कर तू अपनी प्रतिष्ठा तो खत्म कर ही चुका है, हम नहीं चाहते कि तू और अधिक कलंक अपने मुँह पर लगाये।”

अकबर की ओर से ऐसी रूखी चिट्ठी पाकर बैराम खाँ का दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। यह वही अकबर था जिसे बैराम खाँ तोपों के गोलों के बीच से जीवित निकाल लाया था! क्या यह वही तेरह साल का अनाथ बालक था जिसे बैराम खाँ ने दुश्मनों के हाथों से कत्ल होने से बचाया था! यह वही अकबर था जिसे बैराम खाँ ने मिट्टी के कच्चे चबूतरे से उठाकर दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया था!

क्या यह वही अकबर था जिसके लिये बैराम खाँ ने सिकंदर सूर और हेमू जैसे प्रबल शत्रुओं को नेस्तनाबूद कर दिया था! क्या यह वही अकबर था जिसके लिये बैराम खाँ ने कामरान, हिंदाल और असकरी जैसे शहजादों को अंधा करके मक्का भेज दिया था! क्या आज वही अकबर बैराम खाँ को मक्का जाने के लिये कह रहा था! सत्ता का खेल किस खिलाड़ी को धूल नहीं चटा देता! बैराम खाँ तकदीर के इस तरह पलटने पर हैरान था!

अकबर की ओर से पूरी तरह निराश होकर बैराम खाँ नागौर के रास्ते पंजाब को रवाना हुआ। अकबर को सूचना मिली तो उसने फिर पत्र लिखकर कहा कि मैं अब भी कहता हूँ कि हज को चला जा। हिन्दुस्तान में तेरे लिये जागीर मुकर्रर कर दी जायेगी जिसका हासिल तुझे पहुँचा दिया जाया करेगा।

सियासत के नापाक दामन से अपना नाता तोड़ लेने कि लिये बैराम खाँ हज के लिये रवाना हो गया। अपनी योजनाओं को इस तरह सफल होते देखकर दुष्टा माहम अनगा ने अपने खूनी जाल का दायरा और फैलाया। उसने नासिरुलमुल्क को बैराम खाँ के पीछे भेजा।

एक जमाने में नासिरुलमुल्क गरीब विद्यार्थी के रूप में बैराम खाँ के पास मदद मांगने के लिये आया था। बैराम खाँ की कृपा से ही वह मुल्ला से अमीर बना था। माहम अनगा ने नासिरुलमुल्क को यह जिम्मा सौंपा कि वह बैराम खाँ से समस्त राजकीय चिह्न छीनकर उसे हिन्दुस्तान से निकाल कर बाहर कर दे।

जब बैराम खाँ की सेना ने सुना कि नासिरुलमुल्क के नेतृत्व में मुगल सेना आक्रमण के लिये आयी है तो बैराम खाँ के सैनिक दगा करके मुगलसेना में जा मिले। बैराम खाँ ने अपने हाथी, तुमन, तौग, निशान और नक्कारा आदि समस्त राजकीय चिह्न नासिरुलमुल्क को भिजवा दिये और स्वयं अपने निश्चय के अनुसार मक्का की ओर बढ़ता रहा।

जब नासिरुलमुल्क ये सारे राजकीय चिह्न लेकर दिल्ली लौट आया तो भी माहम अनगा का दिल नहीं भरा। उसने पीर मुहम्मद को बैराम खाँ के पीछे भेजा। पीर मुहम्मद भी एक जमाने में बैराम खाँ के नमक पर पला था किंतु आज वह भी बैराम खाँ के खून का प्यासा होकर उसके पीछे लग गया।

बैराम खाँ उस समय बीकानेर रियासत के राव कल्याणमल और कुंवर रायसिंह का मेहमान था। नासिरुलमुल्क के बाद पीर मोहम्मद को आया देखकर बैराम खाँ भड़क गया। उसके मन से सात्विक भाव जाते रहे और उसने मक्का जाने से पहले अकबर का दिमाग दुरुस्त करने का निश्चय किया।

बैराम खाँ ने उत्तर दिशा में तैनात सूबेदारों को चिठ्ठियाँ लिखीं कि मैं तो दुनिया से उदास होकर मक्के को जा रहा था किंतु दुष्टा माहम अनगा बादशाह का मन मेरी ओर से फेर कर मुझे हर कदम पर अपमानित कर रही है। इसलिये अब मेरा विचार है कि मैं माहम अनगा और पीर मुहम्मद से निबट कर ही मक्का को जाऊंगा। इस प्रकार हरम सरकार की ज्यादतियों के चलते चालीस वर्षों का सबसे विश्वस्त और सबसे नमकख्वार नौकर बागी हो गया।

बैराम खाँ का विद्रोह मुगलों के इतिहास की ऐसी दर्दनाक दास्तान है जिसे पढ़कर किसी भी नेकदिल इंसान का दिल सियासत लिए हिकारत के भावों से भर जाएगा।

-अध्याय 51, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

बारूद में आग (52)

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बारूद में आग

अब तो पूरी तरह बारूद में आग दिखा दी गयी थी। अपनी मान-मर्यादा को इस तरह धूल में मिलते देखकर सत्ता का चतुर खिलाड़ी बैराम खाँ एक बार फिर से खून की होली खेलने को तैयार हो गया।

जब अकबर को ज्ञात हुआ कि बैराम खाँ बागी हो गया है तो उसे माहम अनगा की सारी बातें सही लगने लगीं। अब तक वह जो कुछ भी करता आया था, माहम अनगा के कहने पर ही करता आया था। इसी से उसके मन में हमेशा ग्लानि भाव बना रहता था किंतु जब उसने सुना कि बैराम खाँ ने मक्का जाने का इरादा त्यागकर पंजाब के अमीरों को चिट्ठयां भेजी हैं कि वह अपने शत्रुओं को सबक सिखायेगा तो अकबर ने बैराम खाँ को लम्बा पत्र भिजवाया।

पत्र क्या था! पूरा का पूरा तोपखाना था। इस पत्र ने बारूद को आग दिखाने का काम किया। घृणा और वैमनस्य बढ़ाने का पूरा सामान उसमें मौजूद था। अकबर ने लिखा-

”खानखाना जाने कि तू इस बड़े घराने का पाला हुआ है। हमारे पिता ने तेरी सेवा और भक्ति देखकर तेरी पालना की और हमारी शिक्षा का बड़ा काम तुझे सौंपा। उनके पीछे[1]  हमने तेरी[2]  पिछली बन्दगी का विचार करके सारे राजकाज तेरे भरोसे पर छोड़ दिये। तूने जो अच्छा बुरा करना चाहा वही किया। यहाँ तक कि इन पाँच वर्षों में कई कुकर्म ऐसे भी किये जिनसे सब लोगों को तुझसे घृणा हो गयी।

तूने शेख गदाई को सारे मौलवियों और सैयदों के ऊपर कर दिया और उसको भी तसलीम[3]  करने की माफी दे दी। वह बड़े घमण्ड से घोड़े पर सवार होकर हमसे हाथ मिलाता था। जो अधम सेवक तेरे थे उनको तो तूने खान और सुलतान के खिताब देकर झण्डे, डंके और बड़ी उपज के देश दे दिये और मेरे बाप के अमीरों, खानों और सुलतानों को रोटी का भी मुहताज कर दिया।

हमारे दादा के सेवकों को खाने को भी नहीं दिया। जो नौकर हमारी सवारियों और शिकारों में दौड़ते थे उनके प्राणों पर बनी हुई थी। अपने नौकरों को तो तू कुछ भी नहीं कहता था जो भांति-भांति के अपराध करते थे। हमारे नौकरों को मारने और उनके घर लूटने में तू कोई देर नहीं करता था।

हुसैन कुली ने कभी मुर्गे तक से पंजा नहीं लड़ाया था किंतु तूने[4] उसे सबसे अच्छी जागीरें दीं। फिर इन दिनों में तो तूने  ऐसे-ऐसे अनाचार किये जिनसे हमको क्लेश ही क्लेश होता जाता था। और तो क्या जो थोड़े से लोग हमारे पास रह गये थे, हमको तू उनसे भी अलग करना चाहता था।

इसलिये हम आगरे से दिल्ली चले आये और तुझे लिखा कि कुछ ऐसे पेच पड़ गये हैं कि तू हमसे मिल नहीं सकता। हम तुझसे इतना दुःख पाकर भी तुझको वैसा ही बैरामखाँ जानते हैं और तेरे चित्त की शांति के लिये शपथ करते हैं। तेरे धन और प्राण हरने का हमारा विचार कदापि नहीं है परन्तु हम राजकाज स्वयं ही किया चाहते हैं।

इसके सिवा तेरा और जो मनोरथ हो अरजी में लिख भेज। जिस रीति से हम योग्य समझेंगे हुक्म देंगे। तू हमारे घर में पला है और हमारा हुक्म मानना तेरा धर्म है। तुझे आदेश दिया जाता है कि जो लोग तुझे हमारे विरुद्ध भड़काते हैं उन्हें पकड़ कर हमारे पास भेज दे। यदि तूने हमारी सलाह पर विचार नहीं किया तो हम स्वयं सेना सजा कर आयेंगे और तुझको नष्ट कर देंगे।

हमारे उदय का समय है और तेरे नष्ट होने का। हम जीतेंगे और तू हारेगा। पछतावेगा और पकड़ा जावेगा। तुझे सलाह दी जाती है कि तू अपनी वास्तविक स्थिति पर विचार करे। जिन सेवकों को तू पाँच  वर्ष तक पालता रहा और भाई-बेटा कहता रहा, वे सब बिना ही किसी कारण के तुझे छोड़कर हमारी सेवा में आ गये हैं। जो रह गये हैं वे भी जल्दी ही चले आयेंगे।”

बैराम खाँ इस पत्र को पढ़कर और भी भड़क गया। उसने अपनी स्त्रियों, बालक अब्दुर्रहीम और सम्पत्ति को भटिण्डा दुर्ग में छोड़ा। भटिण्डा दुर्ग का जागीरदार शेर मुहम्मद दीवान बैराम खाँ का निज सेवक था। जैसे ही बैराम खाँ अपनी सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ा। शेर मुहम्मद ने दगा करके बैराम खाँ की सम्पत्ति दबा ली तथा उसकी स्त्रियों और बच्चों को पकड़ कर अकबर के पास ले गया।

अब तो पूरी तरह बारूद में आग दिखा दी गयी थी। अपनी मान-मर्यादा को इस तरह धूल में मिलते देखकर सत्ता का चतुर खिलाड़ी बैराम खाँ एक बार फिर से खून की होली खेलने को तैयार हो गया। इस बार उसका निशाना निरपराध लोगों की खोपड़ियाँ न होकर दुष्ट माहम अनगा की शैतान खोपड़ी थी जिसने बैराम खाँ की सरकार को च्युत करके हरम सरकार बनाकर हरामजादगी की सभी हदें पार कर ली थीं।

-अध्याय 52, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] हुमायूँ के बाद।

[2] खानखाना की।

[3] झुक कर सलाम करना।

[4]  बैरामखाँ ने।

विशाल अजगर (53)

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विशाल अजगर

बादशाही लश्कर पहाड़ के नीचे जमा खड़ा था। ज्यों ही बैरामखाँ आता हुआ दिखायी दिया तो बड़ा कोलाहल मचा। मुगल सेना के विशाल अजगर ने वक्राकार होकर बैरामखाँ को चारों ओर से घेर लिया।

जब अकबर ने सुना कि बैरामखाँ अपनी सेना लेकर जालंधर तक आ पहुँचा है तो भी वह शिकार खेलने में व्यस्त रहा और उसने कोई कार्यवाही नहीं की। अकबर की यह उदासीनता देखकर माहम अनगा ने अपने समस्त विश्वस्त अमीरों के नेतृत्व में विशाल सेना भेजकर बैरामखाँ पर आक्रमण करवाया।

बैरामखाँ ने बादशाह की सेना को मारकर दूर तक भगा दिया। जब बैरामखाँ अकबर की सेना को खदेड़ कर लौट रहा था तो एक स्थान पर उसका हाथी दलदल में फंस गया। उसी समय माहम अनगा के आदमियों ने जो कि चुपचाप बैरामखाँ का पीछा कर रहे थे, बैरामखाँ पर आक्रमण कर दिया।

बैरामखाँ का बड़ा भारी नुक्सान हुआ और उसे सवालक की पहाड़ियों में भाग जाना पड़ा। नादोन के हिन्दू नरेश गणेश ने उसे शरण दी और अकबर के विरुद्ध खम ठोककर खड़ा हो गया। इस पर माहम अनगा ने अकबर को खूब उल्टी-सीधी बातें समझाईं। अकबर को भी लगने लगा कि जब तक मैं बैरामखाँ को नहीं कुचल देता तब तक मैं चैन से दिल्ली में शासन नहीं कर सकता।

इस बार सेना की कमान स्वयं अकबर ने संभाली। जिस मुगल सेना को बैरामखाँ ने अपने धन-बल और बुद्धि चातुर्य से खड़ा किया था वही मुगल सेना विशाल अजगर की तरह फूत्कार करती हुई बैरामखाँ को ही निगलने के लिये दिल्ली से निकल पड़ी।

जब मनुष्य का समय विपरीत हो जाता है तब हितैषी, बंधु, मित्र और सेवक तक उसके शत्रु हो जाते हैं। राजा, योगी, अग्नि और जल की मित्रता तो वैसे भी अल्पकालिक ही होती है। फिर यहाँ तो मामला चंगेज खाँ और तैमूर लंगड़े के खूनी वारिस अकबर का था, जिसका अनुकूल होना, न होना कोई अंतर नहीं रखता था।

जाने क्यों बैरामखाँ कभी भी यह समझ नहीं पाया था कि जिस अकबर को हिन्दुस्थान का बादशाह बनाने के लिये वह हिन्दुओं पर ना-ना तरह के अत्याचार कर रहा है और रक्त की नदियाँ बहाता हुआ चला जा रहा है, वही अकबर एक दिन अपने स्वार्थ के लिये बैरामखाँ के विरुद्ध सेना लेकर निकल पड़ने में किंचित् मात्र भी संकोच नहीं करेगा!

अकबर को बैरामखाँ पर चढ़कर आया देखकर पहाड़ों के कई सारे शरणागत वत्सल हिन्दू नरेश, कृतघ्न अकबर का रास्ता रोकने के लिये आगे आये। पहाड़ों में घमासान मच गया। जिन हरित शृंगों से नीलाभ जल की निर्मल धारायें फूट-फूट कर वंसुधरा को धानी चूनर ओढ़ाया करती हैं, उन्हीं शृंगों से रक्त के झरने फूट पड़े।

पहाड़ों की शांति घोड़ों की टापों, तलवारों की झंकारों और हाथियों के चीत्कारों से भंग हो गयी। मौत के मुँह में जाते निर्दोष सैनिकों की डकराहटों से पहाड़ों का कठोर हृदय भी पिघल कर रो पड़ा। मनुष्य के हृदय की कठोरता के आगे पहाड़ों की कठोरता भी फीकी पड़ गयी।

कटे अंगों से रक्त बहाते हुए सैनिक एक हाथ से अपनी आंतों को पकड़े रहते और दूसरे हाथ से तलवार घुमाते रहते थे। उनके प्राण पंखेरू उड़ जाते थे किंतु मन से लड़ने की अभिलाषा नहीं जाती थी।

हजारों हिन्दू सैनिकों का रक्त बह चुकने के बाद हिन्दू नरेश, अकबर की सेना के मुखिया सुलतान हुसैनखाँ जलायर का सिर काटने में सफल हो गये। हिन्दू नरेशों ने बड़े गाजे-बाजे और ढोल-ढमाकों के साथ जलायर का सिर बैरामखाँ को भेंट किया।

बैरामखाँ उस सिर को देखते ही रो पड़ा और छाती पीटते हुए कहने लगा कि मेरे जीवन को धिक्कार है जिसके लिये काफिर की बजाय अल्लाह के बंदे का सिर काटा गया।

बैरामखाँ ने उसी समय बादशाह को पत्र लिखा- ‘बादशाह को मालूम होवे कि जलायरखा का कटा हुआ सिर देख कर माहम अनगा का सिर काटने की तमन्ना मेरे दिल से काफूर हो गयी है। अब मैं तुझसे और नहीं लड़ना चाहता। अतः मुनअमखाँ को भेज ताकि वह आकर मुझे यहाँ से ले जावे। मैं तुझे सलाम करके मक्का चला जाऊंगा।

अकबर ने उसी समय मुनअमखाँ, ख्वाजाजहाँ, अशरफखाँ और हाजी मुहम्मदखाँ सीसतानी को सतलज और व्यास नदी के बीच बसे हुए हाजीपुर[1]  में भेजा जहाँ बैरामखाँ शरण लिये हुए था। जब अकबर के अमीर उन सुरम्य घाटियों में पहुँचे तो उन्होंने हिन्दू नरेशों और जागीरदारों की भारी भीड़ देखी जो बैरामखाँ की रक्षा के लिये अपनी-अपनी मर्यादा के अनुसार मरने-मारने को तैयार खड़े थे।मुनअमखाँ उन निष्ठावान हिन्दू नरेशों को देखकर शोक से विलाप करने लगा।

जब दूसरे अमीरों ने मुनअमखाँ के रोने का कारण पूछा तो मुनअमखाँ ने कहा- ‘जिन लोगों को बैरामखाँ ने दूध पिला-पिलाकर पाला था, वे तो साँप के बच्चे निकले और बुरा वक्त आने पर बैरामखाँ को छोड़कर बादशाह के पास भाग आये किंतु जिन पहाड़ी नरेशों को बैरामखाँ ने तलवार के बल पर अपने अधीन किया था, उन्हें गुलाम बनाया और हर तरह से अपमानित किया था, वे बैरामखाँ का बुरा वक्त जानकर उसके लिये जान देने और मरने-मारने के लिये खड़े हो गये। दुनिया की ऐसी उल्टी रीति देखकर ही मैं रोता हूँ।’

मुनअमखाँ का यह ताना सुनकर उसके साथ खड़े अमीरों की गर्दन शर्म से नीची हो गयी क्योंकि वे सब के सब नमक हराम थे और एक न एक दिन बैरामखाँ के टुकड़ों पर पले थे। उनमें से किसी ने बैरामखाँ की खैरख्वाही नहीं चाही थी और कभी भी बादशाह को सच्चाई बताने की कोशिश नहीं की थी।

बैरामखाँ उस समय किले में था। हिन्दू सरदार, मुनअमखाँ को उसके पास ले गये। मुनअमखाँ को देखकर बैरामखाँ रोने लगा। एक दिन वह भी था जब बैरामखाँ खानखाना था और मुनअमखाँ उसका खास ताबेदार हुआ करता था लेकिन भाग्य के विधान से आज मुनअमखाँ खानखाना था और बैरामखाँ बादशाह का अपराधी। मुनअमखाँ ने बैरामखाँ को तसल्ली दी और किसी तरह किले से बाहर ले आया।

जब बैरामखाँ हिन्दुओं का संरक्षण त्याग कर अकबर की शरण में जाने लगा तो बाबा जम्बूर और शाहकुलीखाँ महरम बैरामखाँ का पल्लू पकड़कर रोने लगे। बैरामखाँ ने उन दोनों हितैषियों से पूछा- ‘मैं तो अपने स्वामी की शरण में जाता हूँ। तुम दोनों क्यों रोते हो? तो उन्होंने जवाब दिया- ‘दगा है, मत जाओ।’

– ‘यदि मेरा शिष्य[2]  ही मुझसे दगा करे तो धरती पर मेरा जीवित रहना बेकार है। इसका मतलब यह होगा कि मैंने उसे सही तालीम नहीं दी।’ बैरामखाँ ने उन दोनों को दिलासा दी।

– ‘लेकिन बादशाह इस समय अपनी बुद्धि के अधीन नहीं है, वह तो माहम अनगा के कहे अनुसार चलता है। उसने माहम अनगा का दूध पिया है।’ बाबा जम्बूर ने चेतावनी दी।

– ‘बाबा! जो कुदरत ने मेरे भाग्य में दगा ही लिखी है तो दगा ही सही। तुम दोनों ने मेरा बहुत साथ निभाया है। एक अहसान अपने इस भागयहीन दोस्त पर और करना। यदि मैं मारा जाऊँ तो अब्दुल रहीम को हिन्दुस्थान से बाहर ले जाना और जैसे भी बन पड़े उसकी परवरिश करके उसे अपने पैरों पर खड़ा कर देना। जब वह समझदार हो जाये और दुनियादारी को समझने लगे तो उसे अपने बाप का आखिरी पैगाम कहना ………..।’ गला भर आने से वह आगे नहीं बोल सका।

– ‘कहो खानखाना कहो! अपनी बात पूरी करो। क्या है आपका पैगाम?’ बाबा जम्बूर ने जोर-जोर से बिलखते हुए पूछा।

– ‘रहीम से कहना कि कभी भी सियासत[3]  को अपनी जिंदगी में जगह न देना। कहीं भी कुछ भी काम कर लेना, तानपूरा बजाकर भीख मांग लेना किंतु सियासत से दूर रहना। यहाँ चारों ओर दगा ही दगा है। न्याय नहीं है।’

मुनअमखाँ ने खानखाना का कंधा थपथपाया। बैरामखाँ तब तक संतुलित हो चुका था। उसने झुककर अपने खैरख्वाह दोस्तों को अलविदा कहा और मुनअमखाँ के साथ चल दिया। हिन्दू सरदारों ने भीगी आँखों से बैरामखाँ को विदाई दी। हालांकि बादशाह से मिलने के लिये बैरामखाँ की उतावली देखकर उन्हें अच्छा नहीं लगा था।

बादशाही लश्कर पहाड़ के नीचे जमा खड़ा था। ज्यों ही बैरामखाँ आता हुआ दिखायी दिया तो बड़ा कोलाहल मचा। मुगल सेना के विशाल अजगर ने वक्राकार होकर बैरामखाँ को चारों ओर से घेर लिया। अकबर के अमीरों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बैरामखाँ इतनी आसानी से उनके हत्थे चढ़ जायेगा।

वे पूरी तरह चौकस थे। कभी भी कुछ भी हो सकता था। जिस बैरामखाँ ने हिन्दुस्थान का ताज एक बार नहीं दो-दो बार मुगलों के पैरों में डाल दिया था। उस बैरामखाँ की ताकत का क्या अन्दाजा? जाने वह कब क्या करे?

कुछ लोग बैरामखाँ की जय बोल रहे थे तो कुछ लोग उस पर खुदा की मार पड़े कहकर गालियां दे रहे थे। बैरामखाँ गले में रूमाल बांधे हुए अकबर के डेरे में घुसा और अकबर के पैरों में गिर कर फूट-फूट कर रोने लगा।

अकबर ने बैरामखाँ का सिर उठाकर छाती से लगा लिया। रूमाल गले से खोला। आँसू पौंछे और उसे अपने दाहिने हाथ को बैठाया। मुनअमखाँ उसके पास बैठा। अकबर ने ऐसी दया और ममता की बातें कीं जिनसे बैरामखाँ के मुख की मलिनता और मन की ग्लानि जाती रहीं। अकबर ने जो कपड़े पहिने हुए थे, उसी समय उतारकर बैरामखाँ को पहिनाये और उसे बहुत सारा धन दिया।

बैरामखाँ का परिवार भी उसे वापिस लौटा दिया। मुनअमखाँ तथा अन्य अमीरों ने भी बैरामखाँ को बहुत सा धन भेंट में दिया।[4] अकबर की दरियादिली देखकर बैरामखाँ फिर से रोने लगा।

अकबर ने कहा- ‘इतने मायूस क्यों होते हैं खानबाबा! आप तो विद्या, भलाई, दान, धर्म और कर्म से युक्त नीति में निपुण, शूरवीर, कार्य कुशल और दृढ़ हृदय के स्वामी हैं। आपने तैमूर के घराने पर कई उपकार किये हैं। आपने तो ऐसे समय में भी धैर्य नहीं खोया था जब बादशाह हुजूर हूमायूँ का राज्य स्थिर नहीं हुआ था और पंजाब के अलावा सारा राज्य हाथ से जाता रहा था। आपने दिल्ली और आगरा जीत कर बादशाह हुजूर के कदमों में डाल दिये। आपने तो उस समय भी धैर्य नहीं खोया जब बादशाह हुजूर के इंतकाल के बाद पठान और अफगान बड़े जोश से दिल्ली की बादशाही का दावा करते थे, चगताई अमीर[5]  हिन्दुस्तान में रहना पसंद नहीं करते थे और मुझे काबुल लौट जाने की सलाह देते थे। बदखशां के स्वामी मिरजा सुलेमान ने काबुल में अमल कर लिया था तब भी आपने उद्योग करके अपना राज्य नहीं बनाया, मुझे फिर से राज्य दिलवाया। आपने बड़े हजरत बाबर और अब्बा हुजूर हूमायूँ की बड़ी सेवा की है। आप किसी भी तरह दिल छोटा करने लायक नहीं हैं। आप हमारे अतालीक हैं। आप इस तरह रोकर हमें तकलीफ नहीं पहुंचायें।’

अकबर की बातों से बैरामखाँ को बड़ी तसल्ली पहुँची। उसने अकबर से पूछा- ‘अब मेरे लिये क्या आज्ञा है शहंशाह?

– ‘खानबाबा! अब हम बालिग हो गये हैं और सारा काम खुद ही किया चाहते हैं इसलिये आप मक्का चले जायें। यदि आप यहाँ रहेंगे तो बीच के  लोग[6] आपको हमारे विरुद्ध और हमें आपके विरुद्ध भड़काते रहेंगे जिसका परिणाम अच्छा न होगा।’ अकबर ने जवाब दिया

बैरामखाँ ने सिर झुका कर बादशाह की बात मान ली और उसी समय मक्का जाने के लिये तैयार हो गया। जब बैरामखाँ का परिवार बादशाही हरम के डेरे से निकल कर बाहर आया तो अकबर भी हज पर जाने वाले यात्रियों को विदा देने के लिये अपने डेरे से बाहर निकला। बैरामखाँ ने झुककर अकबर का हाथ चूमा और घोड़े पर सवार हो गया।

बहुत ही उदास आँखों से अकबर ने हज पर जाने वाले इन यात्रियों को विदाई दी। उसने बार-बार दृष्टि घुमाकर देखा किंतु सलीमा बेगम दिखाई नहीं दी। जाने किस बुर्के में कैद कर लिया था उसने अपने आप को! बैरामखाँ के साथ अकबर ने अनजाने में एक तरह उसे भी हज पर जाने की आज्ञा दे दी थी जबकि वह कतई नहीं चाहता था कि सलीमा बेगम को किसी तरह का कोई कष्ट हो।

-अध्याय 53, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] इस स्थान का वास्तविक नाम उस समय कुछ और था जो अब ज्ञात नहीं है।

[2] बैरामखाँ अकबर का अतालीक अर्थात् शिक्षक रहा था। हुमायूँ भी बैरामखाँ को अतालीक कहा करता था।

[3] राजनीति

[4]  तुर्क लोग इस प्रकार की आर्थिक सहायता को चन्दूग कहते थे। आज हिन्दुस्थान भर में इस तरह की सहायता के लिये चंदा शब्द का प्रयोग होता है।

[5] चंगेजखां का एक बेटा जगताईखां था। चंगेज खां ने तैमूर के परदादा के बाप ”कराचार नोयां” को चगताईखां का अतालीक बनाया था। इसीसे ”कराचार नोयां” के वंशज चगताई कहलाते थे। तैमूरी बादशाह भी चगताई कहलाते थे।

[6] मध्यस्थ

नकाबपोश (54)

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नकाबपोश

बहुत दूर से वे पाँचों नकाबपोश घोड़े फैंकते हुए चले आ रहे थे। बालू के टीले और कंटीले झुरमुट उनका रास्ता रोकते थे किंतु उनकी परवाह किये बिना वे सरपट घोडा़ दौड़ाये चले जा रहे थे। उनके घोड़े थक चुके थे और मुँह से श्वेत फेन बहने लगा था।

हालांकि नकाब के कारण अश्वारोहियों के चेहरे दिखाई नहीं देते थे किंतु शरीर के हिलने से अनुमान होता था कि वे स्वयं भी घोड़ों पर बैठे हुए बुरी तरह हाँफ रहे थे। इतना होने पर भी वे अपने पीछे आ रहे शत्रुओं के भय से किसी भी तरह रुकने का नाम नहीं लेते थे।

सूरज कंटीली झाड़ियों की ओट में छिपने की तैयारी कर रहा था और प्रकाश भी काफी कम हो चला था। नकाबपोशों को लगने लगा था कि कुछ ही क्षणों में वे घोड़ों से लुढ़क कर जमीन पर आ जायेंगे किंतु उनका नेतृत्व कर रहे नकाबपोश को प्रतीक्षा थी ऐसे झुरमुट की जिसकी ओट लेकर वे अपनी दिशा बदल लें और उनके पीछे आ रहा दुश्मन तेज गति से आगे निकल जाये।

आखिर एक ऐसा झुरमुट आ ही गया। नकाबपोशों का नेता एक बड़ी सी झाड़ी की ओट में होकर कंटीले झुरमुट के भीतर घुस गया। अन्य नकाबपोशों ने भी उसका अनुसरण किया। बचते-बचते भी कांटेदार टहनियाँ उनके वस्त्रों को चीर कर अपनी तीक्ष्णता का बोध करवा ही गयीं।

अश्वारोही अपनी तेज गति से चल रही सांसों पर नियंत्रण करने का प्रयास करने लगे। अन्ततः उनकी चाल सफल रही। कुछ ही क्षणों में बीसियों घोड़े सरपट भागते हुए आगे निकल गये। दुश्मन को अनुमान ही नहीं हो सका कि नकाबपोश झुरमुट की ओट में ही खड़े हैं।

– ‘ढूंढते रहेंगे अब वे हमें कई दिनों तक।’ नकाबपोशों के नेता ने अपना नकाब हटाया और झुरमुट के बीचों बीच पसरे बालुई टीले पर कूद गया।                                                 

अन्य नकाब पोशों ने भी अपने नकाब हटा लिये और जैसे-तैसे अपने घोड़ों से उतर पड़े। नकाब हटने से ही यह ज्ञात हो सका कि इनके चेहरे आपस में किसी भी तरह मेल नहीं खाते थे। इनमें से दो स्त्रियाँ थीं। एक स्त्री अभिजात्य एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली दिखाई देती थी तो दूसरी उसकी दासी। यह एक विचित्र बात थी कि अभिजात्य दिखायी देने वाली गौरवर्णा स्त्री पालकी, ऊंट अथवा हाथी पर सवारी न करके घोड़े की पीठ पर इतना लम्बा सफर तय कर रही थी।

अभिजात्य दिखाई देने वाली एक स्त्री की पीठ से चार वर्ष का बालक बंधा हुआ था। माँ की पीठ से रगड़ खाकर उसका चेहरा छिल गया था फिर भी बालक अद्भुत धैर्यवान था और पूरी तरह शांत बना हुआ था। दासी दिखायी देने वाली स्त्री की पीठ से एक छोटी सी गठरी बंधी हुई थी जिसमें दैनिक जीवन यापन का कुछ मामूली सा सामान था जो इस समय बहुमूल्य जान पड़ता था। तीन पुरुष चेहरों में से दो फकीरों जैसे दिखायी देते थे और एक चेहरा गुलाम दिखायी देने वाले व्यक्ति का था।

– ‘क्या आज रात यहीं रुकने का इरादा है बाबा?’ अभिजात्य दिखायी देने वाली गौरवर्णा स्त्री ने अपने नेता की ओर मुँह करके पूछा।

– ‘नहीं! यहाँ नहीं बानो। आज की रात हम जाल्हुर[1]  मस्जिद में पड़ाव करेंगे। तुम थोड़ा सा सुस्ता लो, तब तक घोड़े भी तैयार हो जायेंगे और वे अफगान लुटेरे भी दूर निकल जायेंगे।’ अपनी लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए वृद्ध फकीर ने जवाब दिया।

– ‘जाल्हुर? क्या जाल्हुर पास ही है? क्या हम एक ही दिन में पालनपुर से जाल्हुर तक आ पहुँचे?’

– ‘हाँ बानू। वो जो पहाड़ियाँ दिखायी देती हैं, उनके बीच में जाल्हुर बसा हुआ है। हम घंटे भर में वहाँ पहुँच सकते हैं। तब तक पूरी तरह रात हो चुकी होगी और हम आसानी से मस्जिद में आसरा ले सकेंगे।’

क्षुद्र कंटीली झाड़ियों ने अवसर पाते ही दुष्टता की और अंधेरे का जाल इतनी जोर से आकाश में फैंक कर मारा कि दिन भर की यात्रा से थककर चूर हुआ सूरज उस जाल में उलझ कर रह गया। झाड़ियों को इस दुष्टता की सजा़ मिली और वे स्वयं भी अब शैतानी अंधेरे में डूबने लगीं। पाँचों अश्वारोही फिर से घोड़ों पर सवार होकर दूर दिखायी देने वाली पहाड़ियों की ओर बढ़ गये।

यह उनकी यात्रा का अंत न था, मध्य भी न था। पाटन से चलकर अहमदाबाद और पालनपुर होते हुए वे अभी तो केवल जाल्हुर के निकट पहुँचे थे, यहाँ से अजमेर और फिर अलवर होते हुए उन्हें आगरा पहुँचना था। कौन जाने वहाँ पहुँचना हो भी अथवा नहीं! वे तो यह भी नहीं जानते कि आगरा पहुँच कर भी उनकी यात्रा पूरी होगी अथवा नहीं!

इस समय तो वे केवल इतनी बात जानते हैं कि उन्हें हर हालत में उस विकट शत्रु से अपने आप को बचाकर आगरा तक ले जाना है जो पाटन से ही उनके पीछे लगा हुआ है और अवसर पाते ही उनके प्राण हर सकता है। उन्हें अपने जीवन की चिंता उतनी न थी जितनी कि बानू की पीठ पर बंधे हुए चार वर्षीय रहीम के जीवन के बारे में थी।

-अध्याय 54, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] जालौर

बुरी खबर (55)

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बैराम खाँ की हत्या का प्रतीकात्मक चित्र

अकबर अन्तर्मन के जिस दड़बे में छिपकर रहता था, उस दड़बे की छत इस बुरी खबर की आंधी ने एक ही झटके में उड़ा दी थी। अकबर ने इस दड़बे में स्मृतियों के जाने कितने क्षण कबूतरों की तरह पाल रखे थे।

– ‘रहीम कौन ?’ तरुण बादशाह ने अत्यन्त ही अन्यमनस्कता से पूछा। असमय का व्यवधान उसे अच्छा नहीं लगा। जाने किस बदजा़त ने इस कमअक़्ल गुलाम को यहाँ ला तैनात किया है! चैन से बैठने ही नहीं देता। किसी न किसी बहाने से थोड़ी-थोड़ी देर में आ धमकता है, जल्लाद कहीं का। पिछले कई दिनों से अकबर की अन्यमनस्कता हताशा की सीमा तक उसे बोझिल बनाये हुए है अन्यथा अन्यमनस्कता उसके स्वभाव में नहीं है। उसे यह बार-बार का व्यवधान किंचित् भी नहीं सुहा रहा।

– ‘बैरामखाँ का फरजंद अब्दुर्रहीम, जिल्ले इलाही।’ तातार गुलाम ने भय से काँपते हुए निवेदन किया।

– ‘कौन बैरामखाँ ?’ बादशाह खीझ उठा।

– ‘खानखाना बैरामखाँ हुजूर। उनका बेटा रहीम।’

– ‘खानखाना बैरामखाँ का बेटा रहीम! क्या वह खानखाना के साथ हज करने नहीं गया था?’

क्रोध के कारण बादशाह के शब्द काफी तीखे हो आये थे। गुलाम में साहस नहीं था कि वह तरुण बादशाह के इस प्रश्न का उत्तर दे सके।

– ‘अच्छा जा। काँपना बंद कर और उसे ले आ, यहीं।

तातार गुलाम के प्राण फिर से लौटकर शरीर में आ गये और वह भागता हुआ कक्ष से बाहर हो गया। पसीने की एक लकीर गर्दन से आरंभ होकर ऐढ़ी तक जा पहुँची थी। कितना तो मना किया था कमबख़्त को! किंतु मेरी कोई माने तब न! इधर बादशाह और उधर बैरामखाँ का बेटा। आने की सूचना दो तो मुसीबत और न दो तो मुसीबत। जाने किस बात पर कब सर क़लम हो जाये! खुदा बचाये ऐसी नौकरी से। अपनी उखड़ी हुई सांसों और हिलती हुई दाढ़ी पर काबू पाते हुए उसने अब्दुर्रहीम को अंदर जाने का संकेत किया।

कमरे का पर्दा हटाकर जब अब्दुर्रहीम ने अपनी छोटी-छोटी कोहनियों से बादशाह को कोर्निश बजाई तो सन्न रह गया बादशाह। अल्लाह! चालीस वर्ष के जिस प्रौढ़ बैरामखाँ को बादशाह ने अपने सामने हज के लिये रवाना किया था वह तो पाँच वर्ष का बालक बन कर फिर से लौट आया था! कुदरत भी कई बार कैसे करिश्मे दिखाती है! संभवतः यह उसी का परिणाम था कि प्रौढ़ हो चुका बैरामखाँ पाँच वर्ष का बालक बनकर फिर से उसके सामने खड़ा था। बादशाह के मन में पसरी क्षण भर पहले की अन्यमनस्कता विलुप्त हो गयी।

– ‘खानबाबा!’ बादशाह के मुँह से बरबस निकल गया।

– ‘मैं खानखाना बैरामखाँ का फरजंद अब्दुर्रहीम हूँ जहाँपनाह। अपनी निर्दोष और मासूम आँखों पर नन्ही पलकें झपकाते हुए उसने उत्तर दिया।

– ‘खानखाना कहाँ हैं ?’ अकबर के मन से क्रोध और घृणा का हलाहल जाने कहाँ लुप्त हो गया जो अभी कुछ क्षण पूर्व बैरामखाँ का नाम सुनते ही उसके होठों से छलक पड़ा था।

– ‘इस दुनिया से भी जो ऊपर दुनिया है, अब्बा हुजूर उस दुनिया के बादशाह की खिदमत में चले गये हैं।’ अब्दुर्रहीम ने परिश्रम से याद किया हुआ वाक्य बादशाह के सामने दुहरा दिया।

– ‘क्या कहते हो? कब?? कैसे???’ हैरत में पड़ गया बादशाह। कितनी कच्ची उम्र और कितनी सख्त बात! क्या इस बालक को यह पता भी है कि वह जो कह रहा है, उसका अर्थ क्या है? लेकिन यह हो कैसे सकता है! मुझे तो यह समाचार किसी ने दिया ही नहीं।

– ‘अब्बा हुजूर को गये हुए तो चार महीने बीत गये जहाँपनाह।’

– ‘मग़र ये सब हुआ कैसे ?’

– ‘अफगान मुबारक लोहानी ने उन्हें अपने छुरे से हलाक कर दिया।’

– ‘खानाखाना को हलाक कर दिया! क्या इस धरती पर ऐसा कोई आदमी जन्मा था जो खानखाना की तरफ आँख उठाकर भी देख सकता था? खु़दा गवाह है कि लोहा बैरामखाँ को काट नहीं सकता था और आग जला नहीं सकती थी लेकिन तुम कह रहे हो कि उसे एक कमजा़त अफगान ने हलाक कर दिया? उसे देखकर तोपें दहाड़ना छोड़कर बकरियों की तरह मिमियाने लगती थीं। उसके सामने आकर बड़ी से बड़ी तलवार कागज का पुर्जा साबित होती थी और तुम कहते हो कि उस बैरामखाँ को एक छुरे से ज़िबह कर दिया? आवेश से क्षण भर को तरुण बादशाह का चेहरा लाल हुआ किंतु शीघ्र ही वह इतना सफेद हो गया, जैसे किसी ने शरीर में से रक्त निचोड़ लिया हो। वह आगे कुछ भी नहीं बोल सका।

पाँच वर्ष का अब्दुर्रहीम देर तक बादशाह के खुरदेरे चेहरे को ताकता रहा। पिछले चार महीनों के अनुभव ने रहीम को पाँच वर्ष के बालक से एक परिपक्व आदमी बना दिया था। उसके सिर पर पिता का साया न रहा था और वह जान चुका था कि अब दुनिया में उसे अपने बलबूते पर गुजारा करना है। यही कारण था कि वह बालक होने पर भी इतना संतुलित था और निर्विकार भाव से तरुण बादशाह के सामने खड़ा उसके आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।

बहुत देर तक अकबर के मुँह से कुछ नहीं निकला। बैरामखाँ की मौत की सूचना ने उसके समूचे अस्तित्व को झिंझोड़ कर रख दिया था। इस सूचना की चोट बादशाह के भीतर बैठे अनाथ अकबर तक जा पहुँची थी। उस अकबर तक जो बादशाह न था, अनाथ बालक था। जो जहाँपनाह न था, दर-दर का भिखारी था। जो नूरानी चेहरे का रूआबदार तरुण न था, कमज़ोर कलेजे का पितृहीन पुत्र था। जो अपने अमीरों के सामने तनकर नहीं खड़ा था, बैरामखाँ की छाती पर सिर रखकर रो रहा था।

अकबर अन्तर्मन के जिस दड़बे में छिपकर रहता था, उस दड़बे की छत इस बुरी खबर की आंधी ने एक ही झटके में उड़ा दी थी। अकबर ने इस दड़बे में स्मृतियों के जाने कितने क्षण कबूतरों की तरह पाल रखे थे। मन की मुण्डेर पर बैठे ये कबूतर हर क्षण गुटरगू़ँ करते रहते थे। वे सब के सब आज अचानक ही फड़फड़ा कर चीत्कार करने लगे। क्रूर समय बाज की तरह झपट्टा मार कर स्मृतियों के इन निर्दोष कबूतरों को लहू-लुहान कर गया था।

अकबर ने सीने की ज्वाला को गरम साँस में ढालकर बाहर की ओर धकेलते हुए देखा- पाँच वर्ष का अब्दुर्रहीम अब भी चुपचाप उसी की ओर देखे जा रहा था। अकबर ने झपट कर रहीम को अपने सीने से लगा लिया।

– ‘क्या हुआ अब्दुर्रहीम, जो खानबाबा नहीं रहे! हम तो हैं! आज से हम तुम्हारे अब्बा हुजूर हैं और आप हमारे अतालीक[1]  हैं। समझ रहे हैं आप, हम क्या कह रहे हैं?’

पाँच वर्ष का अब्दुर्रहीम बादशाह के शब्दों का सही-सही अर्थ तो अनुमानित नहीं कर सका किंतु इतना वह अवश्य जान गया था कि जिस काम के लिये माता ने उसे बादशाह की सेवा में भेजा था, वह काम हो गया है। कुछ क्षण बादशाह उसे अंक में कसे रहा। बालक ने भी अपने आप को वहाँ से हटाने या छूटने का प्रयास नहीं किया।

– ‘तुम्हारे साथ और कौन आया है ?’

– ‘मेरे साथ बाबा जम्बूर और काका मुहम्मद अमीन भी आये हैं, वे बाहर खड़े हैं।’

– ‘और तुम्हारी माँ मेवाती बेगम तथा तुम्हारी छोटी माँ सलीमा बेगम! वे दोनों कहाँ हैं?’ अकबर ने बुरी खबर की आशंका से बेचैन होकर पूछा।

– ‘वे आगरे में एक रिश्तेदार के यहाँ ठहरी हुई हैं। उन्होंने ही बाबा जम्बूर और काका मुहम्मद अमीन के साथ हमें आपकी हाजिरी में भेजा है।’

– ‘बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन कौन हैं?’

– ‘ये दोनों पहुँचे हुए फकीर हैं और अब्बा हुजूर के नेकदिल दोस्त भी। उन्होंने ही दुश्मनों से मेरी और अम्मी जान की जान बचाई थी।’

– ‘अरे कोई है?’ बादशाह ने बालक को अपनी बाहों से मुक्त करते हुए द्वार की ओर ताक कर कहा। क्षण भर में ही तातार गुलाम प्रकट हो गया।

– ‘बाहर दो फकीर खड़े हैं, उन्हें हाज़िर कर।’ अकबर ने आदेश दिया।

आदेश पाकर गुलाम हाँफता हुआ सा बाहर निकल गया।

-अध्याय 55, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  शिक्षक।

दो फकीर (56)

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दो फकीर

बालक अब्दुर्रहीम को दो फकीर अकबर के पास लेकर आए थे। उन फकीरों के मुंह से बैराम खाँ की हत्या का विवरण सुनकर अकबर का चेहरा सफेद पड़ गया, मानो किसी ने उसके चेहरे का समस्त रक्त निचोड़ लिया हो!

बाबा जम्बूर और मुहम्मद अमीन दीवाना बादशाह की सेवा में उपस्थित हुए तो बादशाह ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। उतावलापन बादशाह के स्वभाव में न था किंतु आज वह बादशाह नहीं रह गया था, पितृहीन बालक हो गया था। यही कारण था कि उसने किसी भी प्रश्न का उत्तर पाये बिना लगातार ढेर सारे प्रश्न पूछ लिये। जब बादशाह ने अपने प्रश्नों पर विराम लगाया तो वह बुरी तरह हांफ रहा था। जम्बूर ने एक हाथ अपनी लम्बी दाढ़ी पर और दूसरा हाथ तस्बीह के दाने पर फेरते हुए कहा-

– ‘अय दुनिया भर के बादशाहों के बादशाह! खानाखाना इस दुनिया में जिस काम के लिये आया था वह पूरा हो चुका था और धरती पर उसकी मौजूदगी की कोई खास वज़ह नहीं रह गयी थी। इसलिये परवरदिगार! तूने उसे अपनी चाकरी में ले लिया।’ बाबा जम्बूर ने अदृश्य आस्मानी ताकत को सम्बोधित करके कहा।

– ‘अय पाक रूह अकब्बर! मेरे रहमदिल दोस्त बैरामखाँ ने अपने सारे फ़र्ज बखूबी पूरे किये। क़यामत के दिन जब खुदा उसके अच्छे-बुरे का हिसाब करेगा तो उसकी रूह शर्मसार नहीं होगी।’ फकीर मुहम्मद अमीन ने आस्मानी ताकत के सज़दे में सिर झुकाया।

– ‘वह तो ठीक है लेकिन हुआ क्या था?’ अकबर ने और भी बेचैन होकर पूछा। इन दोनों फकीरों के उत्तर में ऐसा कुछ नहीं था जो बादशाह को किंचित भी संतुष्ट कर सकता।

– ‘ऐ शाहों के शाह! बेचैन न हो। फकीर मुहम्मद अमीन तुझे सारी बातें तफ़सील से बतायेगा।’ बाबा जम्बूर ने तरुण बादशाह की बेचैनी ताड़ ली।

– ‘हम फकीरों का सियासी लोगों से कोई रिश्ता नहीं होता। न ही सियासी बातें हमारी समझ में आती हैं किंतु इतना मैं जरूर जानता हूँ कि खानाखाना जिस तरह पूरी जिन्दगी अपने दुश्मनों से लड़ता रहा था और उन्हें कदम-कदम पर शिकस्त देता रहा था, उसके कारण यह मुनासिब ही था कि हिन्दुस्तान की जमीन पर उसका कोई दोस्त नहीं रह गया था। जब तक वह तेरे साथ था, उसने अपनी तेग म्यान में नहीं रखी थी किंतु जब वह हज़ करने के लिये तुझसे रुखसत हुआ तो उसने अपनी तेग म्यान में रखकर हम फकीरों का साथ कर लिया। उसी समय मैंने जाना कि उसके दिल में फकीरों, कमजो़रों और यहाँ तक कि अपने दुश्मनों के लिये भी कितनी ज़गह थी! जिस शेरशाह के पुत्र सलीमशाह को बैरामखाँ ने जंग के मैदान में हलाक किया था, उसी सलीमशाह की बेटी जब पनाह मांगने आयी तो बैरामखाँ ने उसे पनाह भी दी और अपने साथ हज पर ले जाना भी मंजूर कर लिया लेकिन उसकी दरियादिली को किसी ने नहीं जाना।’

मुहम्मद अमीन का गला भर आया।

– ‘जब तक तलवार उसके हाथ में थी तब तक किसी दुश्मन का हौसला न हुआ कि वह बैरामखाँ की ओर आँख उठाकर देख सके लेकिन जैसे ही दुश्मनों का मालूम हुआ कि बैरामखाँ ने तलवार छोड़कर हज़ के लिये जाना मंजूर किया है तो दुश्मन चारों ओर से उस पर छा गये। फिर भी दुश्मनों में इतना साहस नहीं था कि सामने से बैरामखाँ पर वार करते। बैरामखाँ को भी उनकी कोई परवाह नहीं थी लेकिन एक दिन जब वह कुदरत की खूबसूरती को देखता हुआ पाटन के सहस्रलिंग तालाब में नहाने के लिये उतरा तो अफगान मुबारक लोहानी घात लगाकर बैठ गया ………..।’

– ‘मुबारक लोहानी कौन है?’ अकबर ने मुहम्मद अमीन को टोका।

– ‘मुबारक लोहानी एक अफगान नौजवान है। उसका बाप पाँच साल पहले मच्छीवाड़ा की लड़ाई में बैरामखाँ की तलवार से मारा गया था। इसलिये मुबारक लोहानी के दिल में नफरत की आग जल रही थी। वह तभी से बैरामखाँ के पीछे लगा हुआ था और एक बेहतर मौके की तलाश में था।’ मुहम्मद अमीन ने जवाब दिया।

– ‘आगे क्या हुआ?’ अकबर ने बालक की तरह मचलकर पूछा।

– ‘जैसे ही बैरामखाँ तालाब से बाहर निकला तो मुबारक लोहानी चीते की तरह उछलकर सामने आया और उसने बैरामखाँ की पीठ में खंजर भौंक दिया। बैरामखाँ वहीं गिर पड़ा। खंजर उसके सीने में आर-पार हो गया था। इसलिये कुछ ही पल में खानखान की रूह बदन से फ़ना हो गयी।’ बात पूरी करते करते बाबा जम्बूर की भी आँखें भीग आयीं।[1]

– ‘आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था। बैरामखाँ को उसकी नाफिक्री ने मार डाला। मैंने कई बार उसे आगाह किया था कि अपने दुश्मनों पर नज़र रखा कर। उनके इरादे नेक नहीं हैं।’ मुहम्मद अमीन ने आँखें मींचते हुए कहा। अकबर ने भी अपनी आँखों में छलछला आयीं पानी की बूंदों को छिपाने के लिये पलकें बंद कर लीं।

बादशाह यद्यपि तरुण था और उदास भी किंतु फिर भी उसकी आँखों में जाने कैसा रौब छाया हुआ था कि फकीर होने पर भी न तो मुहम्मद अमीन और न ही बाबा जम्बूर उसकी आँखों में सीधे-सीधे झांक सके थे। जैसे ही बाबा जम्बूर को अनुमान हुआ कि बादशाह ने पलकें बन्द कर ली हैं तो उसने बादशाह के चेहरे को ध्यान से देखा बादशाह के चेहरे पर बनने वाली लकीरों में अब्दुर्रहीम का भविष्य छिपा हुआ था। जम्बूर इन लकीरों से बनने वाले चित्रों को देखकर आश्वस्त होना चाहता था।

-अध्याय 56, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  बैरामखाँ के वध के बारे में अलग-अलग उल्लेख मिलता है। एक इतिहासकार ने लिखा है कि बैरामखाँ पाटन में नित्य प्रति पट्टन के बागों और मकानों को देखने जाया करता था। एक दिन वह नाव में बैठकर सहस्रलिंग तालाब का जलमहल देखने गया। वहाँ से आते समय जब नाव से उतरकर घोड़े पर सवार होने लगा तो मुबारकखाँ 30-40 पठानों के साथ तालाब के तट पर आया और ऐसा जाहिर किया कि मिलने को आया है। खानखाना ने उन सबको बुलवा लिया। मुबारकखाँ ने बैरामखाँ के पास पहुँचते ही छुरा निकालकर बैरामखाँ की पीठ में ऐसा मारा कि छाती के पार हो गया। फिर और एक पठान ने मस्तक पर तलवार मारकर काम पूरा कर दिया। बैरामखाँ के साथी भाग छूटे। फकीरों ने उसकी लोथ उठाकर शेख हिसाम की कब्र के पास गाड़ दी।

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