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फरमान (27)

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फरमान

बैराम खाँ ने तुहमास्प से ईरानी सेना प्राप्त की और उससे तथा हूमायूँ से एक-एक फरमान लेकर फिर से हिन्दुस्थान आया। ये फरमान उसने हुमायूँ के भाई कामरान के नाम लिखवाये थे ताकि भाई को भाई के खिलाफ नहीं लड़ना पड़े और उनमें प्रेम हो जाये। बैरामखाँने हिन्दुकुश पर्वत पार कर कांधार पर आक्रमण किया। कांधार उस समय असकरी के अधिकार में था। बैरामखाँ ने कांधार को जीत कर असकरी को गिरफ्तार कर लिया।

जब बैराम खाँ ने ईरान से हिन्दुस्थान के लिये कूच किया था तब हुमायूँ ने उसे निर्देश दिये थे कि हिन्दुस्थान की जमीन पर किसी भी खुदा के बंदे को[1]  बंदी नहीं बनाया जाये। बैरामखाँ ने इस लड़ाई में और आगे भी जितनी लड़ाईयाँ लड़ीं उन सबमें इस निर्देश का उल्लंघन विशेष अवसर आने पर ही किया। उसने कभी भी किसी मुसलमान सिपाही को बंदी नहीं बनाया लेकिन वह जानता था कि हुमायूँ का आदेश कामरान और अस्करी जैसे मक्कारो के लिये नहीं था।

कंधार के सारे समाचार ईरान को भिजवाकर बैरामखाँ काबुल के लिये रवाना हुआ। उन दिनों काबुल पर कामरान अधिकार जमाये बैठा था और अपने आप को बादशाह कहता था। बैरामखाँ सफर के दौरान बिल्कुल चुप रहता था और पूरे रास्ते सोचते हुए ही चलता था।

इस दौरान वह अनुमान लगाता था कि आगे क्या होने वाला है! कांधार से काबुल तक की यात्रा के दौरान बैरामखाँ इस बात पर निरंतर चिंतन करता रहा कि जब वह कामरान के सामने पेश होगा तो कामरान उसके साथ क्या-क्या बदसलूकी कर करेगा!

समस्त अप्रिय स्थितियों का अनुमान करके बैरामखाँ पूरी तैयारी के साथ कामरान के सामने पेश हुआ। कामरान उस समय चारबाग में दरबार कर रहा था। उसने बैरामखाँ को बड़ी हिकारत भरी निगाह से देखा और उसके आने का कारण पूछा। बैरामखाँ ने सोचा कि यदि वह दोनों फरमान इस समय कामरान को देता है तो अहसान फरामोश कामरान बैठे-बैठे ही हाथ में लेगा।

इससे बादशाह का अपमान होगा। बैरामखाँ ने रास्ते में जैसा सोचा था, ठीक वैसा ही घटित हो रहा था। ऐसी स्थिति कतई नहीं थी कि वह कामरान से खड़ा होने के लिये कहे किंतु बैरामखाँ तो पूरी तैयारी करके गया था। उसने अपने कपड़ों में से कुरान निकाली और कहा- ‘बादशाह हुजूर ने आपके लिये यह कुरान भिजवाई है।’

जब अहसान फरामोश कामरान कुरान की ताजीम को खड़ा हुआ तो बैरामखाँ ने कहा- ‘और यह फरमान भी।’

बैरामखाँ ने कुरान और दोनों बादशाहों के फरमान एक साथ कामरान के हाथ में रख दिये। कामरान तिलमिला कर रह गया और कुछ भी न कर सका। इसके बाद बैरामखाँ ने ढेर सारे उपहार कामरान को दिये ताकि कामरान किसी तरह हुमायूँ के प्रति वफादार हो जाये।

साथ ही साथ बैरामखाँ ने बड़ी तरकीब से कामरान को धमकाया कि तू हुमायूँ के प्रति वफादार हो जा अन्यथा मिर्जा असकरी को जिस तरह गिरफ्तार किया गया है, वही स्थिति कामरान के साथ भी हो सकती है। बदले में कामरान ने भी बैरामखाँ को धमकाया कि बालक अकबर अब तक मेरे पास है, यदि मिर्जा अस्करी को कुछ हुआ तो बालक भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

-अध्याय 27, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] इस्लाम के अनुयायी को।

कातर निगाहें (28)

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कातर निगाहें

बैराम खाँ एक ऐसा स्वामिभक्त था जिसके हृदय में निजी अभिमान का अंशमात्र भी नहीं होता और जो अपने स्वामी की कातर निगाहें देखने के बजाय मर जाना अधिक पसंद करता है, भले ही स्वामी कितना ही मक्कार और बदजात क्यों न हो!

कामरान ने एक माह तक बैराम खाँ को अपने पास रखा उसने हुमायूँ से मेल करने का आश्वासन दिया किंतु मन में मैल बनाये रहा। इस समय वह बैराम खाँ के साथ बदसलूकी नहीं कर सकता था क्योंकि मिर्जा अस्करी उसकी कैद में था। बहुत सोच-विचार कर उसने अपनी फूफी खानजादा बेगम को भी बैरामखाँ के साथ कर दिया ताकि खानजादा बेगम हुमायूँ से मिर्जा अस्करी के लिये क्षमादान मांग सके।

कामरान से विदा लेकर बैराम खाँ कांधार लौटा। उस समय तक बैरामखाँ का संदेश पाकर हुमायूँ भी हिन्दुकुश पर्वत पार करके कांधार आ गया था और काबुल से बैराम खाँ के लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था।

बरसों बाद फूफी को जीवित देखकर हुमायूँ बहुत प्रसन्न हुआ। फूफी खानजादा बेगम ने घड़ियाली आँसू बहाते हुए हुमायूँ से मिर्जा अस्करी के प्राणों की भीख मांगी तथा चंगेजखाँ और तैमूर के वंशज को सामान्य अपराधियों की भांति न मारने की प्रार्थना की। हुमायूँ तो पहले से ही तैयार बैठा था। अब उसे फूफी का समर्थन भी मिल गया था।

जब बैराम खाँ मिर्जा अस्करी की गर्दन में तलवार डालकर उसे हुमायूँ के सामने लाया तो बाबर की औलाद को इस हालत में देखकर हुमायूँ का दिल दहल गया। उसने सहारे के लिये अपने दोनों ओर नजरें दौड़ाईं उसके एक ओर चगताई[1]  और एक ओर कजलबाश[2]  अमीर अपने-अपने दरजे से परा[3]  बांधकर खड़े थे। किसी अमीर की हिम्मत न हुई कि वह बैरामखाँ के खिलाफ एक भी शब्द कह सके।

हारकर हुमायूँ ने कातर दृष्टि से बैरामखाँ की ओर देख कर कहा- ‘मैं जानता हूँ कि यह तुम्हारा अपराधी है और तुमने इसे गिरफ्तार किया है किंतु मेरी आज्ञा है कि मिर्जा अस्करी के गले में से तलवार निकाल दी जाये।’

बैराम खाँ ने स्वामिभक्ति दिखाई और बिना किसी हील-हुज्जत के तत्काल आदेश का पालन किया। गले में से तलवार निकलते ही मिर्जा अस्करी ने हुमायूँ को आदाब बजाया और नौ-नौ आँसू बहाता हुआ हुमायूँ के पैरों में बैठ गया। हुमायूँ ने अपने धूर्त भाई को गले से लगा लिया।

आँखों में आँसू भरकर हुमायूँ ने फिर बैराम खाँ की ओर देखा- ‘अपने अपराधी के लिये तुम क्या सजा मुकर्रर करते हो खानका?’

बैराम खाँ तो जानता था कि अस्करी के भाग्य का यही फैसला होने वाला है किंतु संभवतः हुमायूँ नहीं जानता था कि बैरामखाँ एक ऐसा स्वामिभक्त था जिसके हृदय में निजी अभिमान का अंशमात्र भी नहीं होता और जो अपने स्वामी की कातर निगाहें देखने के बजाय मर जाना अधिक पसंद करता है, भले ही स्वामी कितना ही मक्कार और बदजात क्यों न हो!

बैराम खाँ ने पूरे सम्मान के साथ हुमायूँ को आदाब बजाया और चुपचाप दरबार से बाहर हो गया। जाने क्यों उसे ऐसा लगा कि उसने मिर्जा अस्करी की नहीं अपितु बालक अकबर की जान बख्शी है। फूफी नमक हराम अस्करी को अपने साथ कामरान के पास ले गयी।

-अध्याय 28, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] मुगल, चंगेजखां के वंशज।

[2] ईरानी लाल टोपी वाले। तुर्की भाषा में कजलवास का अर्थ होता है लाल टोपी वाले।

[3] पंक्ति।

तोप के सामने (29)

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तोप के सामने

दुष्ट कामरान ने शहजादे अकबर को तोप के सामने लटका दिया। अब उसे बचाने वाला कोई नहीं था। बैराम खाँ ने पिछले दरवाजे से दुर्ग में घुसकर दुर्ग की प्राचीर से लटक रहे तीन वर्ष के अकबर को तोप के सामने से उतारा और मुख्य दरवाजा खोलकर हुमायूँ के पास चला आया।

हिन्दुकुश पर्वत पार करते समय हुमायूँ बीमार पड़ गया था और इस समय वह इस लायक नहीं था कि ढंग से चल फिर भी सके। जब यह खबर नमक हराम मिर्जा अस्करी और फूफी खानजादा बेगम ने कामरान को जाकर दी तो कामरान उसी समय कांधार पर चढ़ दौड़ा।

हुमायूँ और बैराम खाँ इस आकस्मिक स्थिति के लिये तैयार नहीं थे। उन्हें किला खाली करके भाग जाना पड़ा। हुमायूँ का लड़का अकबर अब तक कामरान के पास था जिसे कामरान अपने साथ लाया था।

किला हाथ से निकल जाने के बाद हुमायूँ के सामने एक बार फिर संकट खड़ा हो गया। हिन्दुकुश पर्वत के इस पार इस समय केवल यही एक दुर्ग हुमायूँ के पास था। इस समय उसे केवल बैरामखाँ का ही आसरा रह गया था।

कांधार से बाहर आकर बैराम खाँ ने अपनी सेना को नये सिरे से व्यवस्थित किया और एक दिन अवसर पाकर किले को घेर लिया। उसने थोड़ी-थोड़ी दूरी पर अपनी तोपें लगाईं और हर तरफ से बमबारी करने लगा।

तोपों की मार से किले का बचना असंभव जानकर कामरान ने तीन वर्ष के अकबर को रस्सियों से बांधकर किले की दीवार पर लटका दिया और एक घुड़सवार के साथ हुमायूँ को संदेश भिजवाया कि यदिे वह तोप चलाना बंद नहीं करेगा तो अकबर मौत के मुँह में चला जायेगा।

हर ओर से छूटती हुई तोपों को देखकर अकबर चीखने चिल्लाने और बुरी तरह से रोने लगा। जाने कौनसी अदृश्य शक्ति थी जो इस घनघोर विपत्ति में भी अकबर के प्राणों को सुरक्षित रखे हुए थी! विवश होकर बैराम खाँ को तोपों का मुँह बंद कर देना पड़ा।

वह समझ गया कि जब तक अकबर को कामरान से छीन नहीं लिया जाता, तब तक हर जीती हुई बाजी से हाथ धोना पड़ेगा। उसने एक योजना बनाई जिसके अनुसार हुमायूँ अपनी पूरी सेना लेकर किले के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ा और बैराम खाँ चुपचाप जंगल की तरफ चला गया। काफी दूर जाकर बैराम खाँ फिर से कांधार की तरफ मुड़ा और अचानक किले के दूसरे दरवाजे पर जा धमका।

कामरान को पता भी नहीं लगा और बैराम खाँ ने किले का दरवाजा तोड़ लिया। जब बैराम खाँ नंगी तलवार लेकर कामरान के महल में घुसा तो कामरान किसी तरह जान बचाकर भाग निकला। बैराम खाँ ने दुर्ग की प्राचीर से लटक रहे तीन वर्ष के अकबर को तोप के सामने से उतारा और मुख्य दरवाजा खोलकर हुमायूँ के पास चला आया।

हुमायूँ ने पूरे दो साल बाद बेटे का मुँह देखा। इस समय उसका रोम-रोम बैराम खाँ के प्रति कृतज्ञता से भरा हुआ था।

-अध्याय 29, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

आँखों में सलाई (30)

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आँखों में सलाई
आँखों में सलाई

बैराम खाँ ने उसी समय लोहे की सलाईयां गरम करवाईं और कामरान की आँखों में फिरा दीं। आँखों में सलाई फिरते ही कामरान अंधा होकर चीखने और छटपटाने लगा।

कांधार हाथ से निकल जाने के बाद कामरान फिर से काबुल भाग आया और मोर्चा बांधकर बैठ गया। वह जानता था कि हुमायूँ भले ही कितना अकर्मण्य और आलसी क्यों न हो किंतु बैराम खाँ काबुल पर आक्रमण अवश्य करेगा।

कामरान का अनुमान ठीक निकला। बहुत जल्दी बैराम खाँ काबुल पर आ धमका। इस बार उसके हाथ बंधे हुए नहीं थे। न तो बालक अकबर कामरान की गिरफ्त में था और न हुमायूँ बैराम खाँ के साथ आया था। बैराम खाँ हर ओर से निश्चिंत था और जीवन भर के इस प्रबल बैरी से मुक्ति चाहता था। उसने चारों ओर से काबुल पर घेरा डाला ताकि कामरान को भाग जाने का अवसर नहीं मिले।

बैरामखाँ की जबर्दस्त मार के सामने कामरान टिक नहीं सका और एक रात वह किले से भाग निकला। उसके साथ उसकी बेगमें और गिने-चुने विश्वसनीय साथी ही थे। सुबह होने पर किले के भीतर इस बात की खबर फैली कि कामरान तो रात को ही भाग निकला। अब लड़ना व्यर्थ जानकर किलेदार ने किला बैरामखाँ को समर्पित कर दिया।

बैराम खाँ जानता था कि कामरान इतना मक्कार है कि कहीं भी छिप सकता है। उसने किले का कौना-कौना छान मारा किंतु कामरान नहीं मिला। और तो और न तो मिर्जा अस्करी और न फूफी खानजादा बेगम ही उसके हाथ लगी।

बैरामखाँ समझ गया कि रात के अंधेरे में पंछी घोंसले से उड़ गया। उसने तुरंत अपने घुड़सवार बदख्शां, दिल्ली और खैबरदर्रे की ओर जाने वाले रास्तों पर दौड़ाये। वह स्वयं भी अपने शिकार की खोज में निकला। चप्पे-चप्पे को सावधानी से छानने के बाद अंततः तीसरे दिन कामरान और अस्करी उसके हाथ लग गये।

वे दोनों मक्कार भाई दिल्ली के बादशाह इस्लामशाह से मदद लेने जा रहे थे। बैराम खाँ चाहता तो उसी समय कामरान और अस्करी का काम तमाम कर सकता था। लेकिन यहाँ भी उसने इखलास रखा और उन्हें हुमायूँ के पास ले गया।

कामरान और अस्करी के तरफदारों ने इस बार फिर वही पुरानी वाली चालें दोहराईं। बाबर के परिवार की बूढ़ी औरतें हुमायूँ के पास बैठकर रोने लगीं कि तैमूर, चंगेज और बाबर के वंशजों को साधारण गुनहगारों की तरह न मारा जाये।

बैराम खाँ ने हुमायूँ से प्रार्थना की कि कामरान और अस्करी उसे सौंप दिये जायें। उसने हुमायूँ को वचन दिया कि वह कामरान और अस्करी को जान से नहीं मारेगा। हुमायूँ ने बहुत सोच-विचार के बाद कामरान और अस्करी बैराम खाँ के हाथों में सौंप दिये।

बैरामखाँ ने उन दोनों मक्कार भाईयों को अंधेरी कोठरी में ले जाकर बंद कर दिया और बाहर सख्त पहरा बैठा दिया। कई दिनों के सोच-विचार के बाद बैराम खाँ ने अपने अपराधियों के लिये दण्ड निर्धारित किया। एक रात उसने अंधेरी कोठरी का ताला खुलवाया और दोनों कैदियों को बाहर निकाल कर कहा कि अंतिम बार दुनिया को जी भर कर देख लो।

दोनों मक्कार भाईयों ने कोठरी से बाहर आकर नजरें घुमाईं। अंधेरे में उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया। जब उन्होंने आकाश की तरफ देखा तो हजारों तारों को चमचमाते हुए देखा जो अमावस्या की रात में भी दुनिया की सुंदरता को कायम रखे हुए थे।

बैराम खाँ ने उसी समय लोहे की सलाईयां गरम करवाईं और कामरान की आँखों में फिरा दीं। आँखों में सलाई फिरते ही कामरान अंधा होकर चीखने और छटपटाने लगा। धूर्त अस्करी उसी समय बैराम खाँ के कदमों से लिपट गया और उसे खुदा का वास्ता देकर रहम करने के लिये कहा।

अस्करी को गिड़गिड़ाते हुए देखकर बैराम खाँ को हुमायूँ की आंखें याद हो आईं। कितनी बेबसी भरी आँखें थीं वे! उसने अस्करी की आँखों को फोड़ने का इरादा त्याग दिया। उसकी नजर में कामरान ही असली गुनहगार था जिसे अपने किये की सजा मिल चुकी थी। उसी रात बैराम खाँ ने दोनों भाईयों को सपरिवार मक्का के लिये रवाना कर दिया।

अंधा कामरान अस्करी को साथ लेकर अपने कृत्यों पर पछताता हुआ हिन्दुस्तान की जमीन से बाहर हो गया और चार साल बाद वह मक्का में ही मर गया। कुछ दिनों बाद अस्करी भी मौत के गाल में समा गया। हिन्दाल पहले ही किसी अफगान द्वारा धोखे से मारा जा चुका था।

बाबर की खूनी ताकत के चार ही उत्तराधिकारी थे जिनमें से अब केवल हुमायूँ ही शेष बचा था। उसने अकबर को गजनी का सूबेदार नियुक्त किया और बैरामखाँ को उसका संरक्षक घोषित किया।

-अध्याय 30, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

फिर से दिल्ली (31)

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फिर से दिल्ली

अपने भाईयों से मुक्ति पाकर हुमायूँ ने फिर से दिल्ली और आगरा पर अधिकार करने की ठानी। 1540 ईस्वी में उसने दिल्ली और आगरा छोड़े थे और दर-दर की ठोकरें खाते हुए चौदह साल हो चले थे। वह काबुल से चलकर पेशावर आया और सिंधु नदी पार करके कालानौर  तक चला आया।

यहाँ उसने अपनी सेना के तीन हिस्से किये। एक हिस्सा शिहाबुद्दीन के नेतृत्व में लाहौर पर चढ़ाई करने के लिये भेजा गया। दूसरा हिस्सा बैरामखाँ के नेतृत्व में हरियाणा पर चढ़ाई करने के लिये भेजा गया और तीसरा हिस्सा स्वयं हुमायूँ के पास रहा जो कालानौर[1] में बना रहा। जब शिहबुद्दीन ने लाहौर पर अधिकार कर लिया तो हुमायूँ लाहौर चला गया।

उधर बैरामखाँ ने हरितान प्रदेश[2]  पर अधिकार कर लिया और सतलज के तट पर आ डटा। वह माछीवारा में अफगानों से दो-दो हाथ करना चाहता था। उस समय सतलज में बाढ़ आ रही थी इसलिये तरुद्दीबेगखाँ के नेतृत्व में जो मुगल सेना थी उसने सतलज पार करने से मना कर दिया। तरुद्दीबेगखाँ ने अपनी सेना को पड़ाव डालने के आदेश दे दिये।

बैरामखाँ को यह स्वीकार नहीं हुआ। उसने अपने आदमियों को अपने पीछे आने के लिये कहा और अपना घोड़ा सतलुज में उतार दिया। देखते ही देखते बैरामखाँ की सेना पार हो गयी। न चाहते हुए भी तरुद्दीबेग को बैरामखाँ के पीछे जाना पड़ा।

यहाँ पर अफगानों ने फिर से मुगलों के खिलाफ बड़ा मोर्चा बांधा। दिल्ली का बादशाह सिकन्दर सूर[3]  अस्सी हजार सिपाहियों को लेकर बैरामखाँ के मुकाबले में आया। उसके पास हाथियों की विशाल सेना थी जिसे देखकर मुगलसेना के हाथ-पाँव फूल गये लेकिन बैरामखाँ जानता था कि हिंदुस्थान का ताज हाथियों की इस विशाल दीवार के दूसरी तरफ ही स्थित है जिसे हर हालत में पार करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।

15 मई 1955 को शाम के समय बैरामखाँ ने अफगानों पर हमला किया। उसने हमले की योजना इस प्रकार बनाई कि रात होने पर भी लड़ाई चलती रहे। जैसे ही रात हुई और अंधेरे में कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया, बैरामखाँ के आदमियों ने योजनानुसार अफगानों के ठीक पीछे जाकर भयंकर आग लगा दी।

इस आग के उजाले में मुगलों को अफगानों की स्थिति और गतिविधि का पूरा ज्ञान होता रहा और वे तक-तक कर तीर चलाते रहे किंतु मुगलों की तरफ अंधेरा होने के कारण अफगान उनकी स्थिति के बारे में कुछ भी नहीं जान पाते थे। परिणाम स्वरूप अफगानों की भारी क्षति हुई और उनके पैर उखड़ गये।

इसके बाद बैरामखाँ ने सिकन्दर सूर को खदेड़ना आरंभ कर दिया। सरहिंद में एक बार पुनः पराजित होकर सिकन्दर सूर पहाड़ों में भाग गया।

बैरामखाँ की मुट्ठी भर सेना ने अफगानों की सेना के विशाल अजगर को निगल लिया और लूट में मिले हाथी हूमायूँ को भिजवा दिये। बहुत से साधारण सिपाही बंदी बना लिये गये। इनमें से जो खुदा के बंदे थे उन्हें बादशाह के आदेश के मुताबिक छोड़ दिया गया तथा काफिरों को गुलाम बनाकर बेचने के लिये मध्य एशियाई मुल्कों में भेज दिया गया।

नसीबखाँ और उसके पठानों की बहुत सी जोरू और बच्चे भी बैरामखाँ के हाथ लगे जिन्हें बैरामखाँ खुद हाथी पर सवार होकर, युद्ध के मैदान से जान बचाकर भाग रहे नसीबखाँ के पास छोड़ आया।

तरुद्दीबेग ने फिर बैरामखाँ का विरोध किया। वह भागते हुए पठानों को जान से मारना चाहता था किंतु बैरामखाँ का कहना था कि खुदा के बंदों का खून बहाना ठीक नहीं है। यह झगड़ा इतना बढ़ा कि भागते हुए पठानों को भी इसकी खबर लग गयी। मुगलों की सेना में परस्पर विरोध देखकर पठान लौट आये और उन्होंने मुगलों के डेरों पर आक्रमण कर दिया। मजबूर होकर बैरामखाँ को पठानों पर तलवार उठानी पड़ी।

जीत का संदेश पाकर हुमायूँ भी सरहिंद आ गया। बैरामखाँ ने बड़े भारी जलसे के साथ उसका स्वागत किया और वहीं दरबार लगवाकर हुमायूँ को फिर से हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया।

इस अवसर पर हुमायूँ ने अमीरों से पूछा कि यह जीत किस के नाम लिखी जाये? कुछ अमीरों ने बैरामखाँ का और कुछ ने अब्दुलमाली का नाम लिया। जब बैरामखाँ और अब्दुलमाली से पूछा गया तो उन्होंने भी अपना-अपना नाम लिया। हुमायूँ ने यह जीत अकबर के नाम लिखी और उसे लाहौर का सूबेदार बनाकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। साथ ही बैरामखाँ को एक बार फिर अकबर का संरक्षक बनाया।

बैरामखाँ का बढ़ता हुआ रुतबा तरुद्दीबेगखाँ को अच्छा नहीं लगा। वह हुमायूँ का मुँह लगा विश्वसनीय सिपहसालार था। माछीवारा के मैदान में बैरामखाँ ने उसे नीचा दिखाया था और उसकी वरिष्ठता की परवाह किये बिना अपनी मरजी से ही युद्ध की गतिविधियाँ संचालित की थीं। तरुद्दीबेग ने हुमायूँ से बैरामखाँ की बहुत शिकायतें कीं किंतु हुमायूँ ने तरुद्दीबेग की एक नहीं सुनी। अब बैरामखाँ ने हुमायूँ को सलाह दी कि बिना कोई समय गंवाये दिल्ली के लिये कूच कर देना चाहिये।

हुमायूँ अपनी सारी सेना बटोरकर एक बार फिर से दिल्ली के लिये चल पड़ा। 20 जुलाई 1555 को हूमायूँ ने दिल्ली में प्रवेश किया और 23 जुलाई को अच्छा दिन जानकर वह दिल्ली के तख्त पर बैठा। उसकी खूनी ताकत एक बार फिर रंग ले आई थी।

-अध्याय 31, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] पूर्व पंजाब के गुरुदासपुर जिले में स्थित है।

[2] अब इसे हरियाणा कहते हैं।

[3] हुमायूँ के भारत से भाग जाने के बाद शेरशाह सूरी ने आगरा और दिल्ली सहित हिन्दुस्थान के बहुत बड़े भाग पर अधिकार कर लिया था। मई 1545 में एक आकस्मिक दुर्घटना में वह मारा गया और उसका बेटा इस्लामशाह हिन्दुस्थान का बादशाह हुआ। अक्टूबर 1553 में उसकी भी मृत्यु हो गयी। उसके बाद इस्लामशाह का 12 वर्षीय बेटा दिल्ली के तख्त पर बैठा। बारह वर्षीय सुल्तान अपने मामा मुहम्मद आदिलशाह के हाथों मार डाला गया। आदिलअली शाह को अदली भी कहा जाता है। अदली ने शासन का सारा भार अपने हिन्दू वजीर हेमू को सौंप दिया और स्वयं चुनार में जाकर भोग विलास करने लगा। इस बीच इब्राहीमशाह और सिकन्दरशाह नाम के दो व्यक्तियों ने अपने आप को सूर साम्राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। ये दोनों दुष्ट आपस में भी लड़ते रहते थे। मौका पाकर सिकन्दर सूर ने दिल्ली हथिया ली थी।

मेवों की बेटी (32)

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मेवों की बेटी

पहली मेवों की बेटी चंगेज और तैमूरलंग के खानदान में और दूसरी बेटी तुर्कों की कराकूयलू शाखा के बहारलू खानदान में ब्याह दी गयी। आगे चलकर इसी मेवों की बेटी से 17 दिसम्बर 1556 को लाहौर में बैरामखाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम का जन्म हुआ।

दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में स्थित रेवाड़ी, अलवर और तिजारा परगनों में सैंकड़ों सालों से मेव जाति बड़ी संख्या में रहती आयी है। ये लोग बड़ी ही विद्रोही प्रकृति के थे और सैंकड़ों साल से दिल्ली के शासकों की नाक में दम करते आये थे।

इनके अत्याचारों से तंग आकर बलबन ने बुरी तरह से इनका दमन किया। उसने दिल्ली के चारों ओर फैले हुए सैंकड़ों मील के क्षेत्र में जंगल कटवा दिये और मेवों के सैंकड़ों गाँव उजाड़ दिये। हजारों मेवों को उसने जान से मार डाला। उसके बाद पूरे सौ साल तक ये लोग शांत रहे।

जब तैमूर लंग ने भारत पर आक्रमण किया था तब नाहर बहादुर इन लोगों का नेता था। नाहर बहादुर के पूर्वज पिछले दो सौ साल से मेवों का नेतृत्व कर रहे थे। कहा जाता है कि नाहर बहादुर के पूर्वज यदुवंशी हिन्दू हुआ करते थे लेकिन नाहर बहादुर मुसलमान हो गया था।

उसने तैमूर को संदेश भिजवाया था कि वह बेशक पूरे हिन्दुस्थान को जलाकर खाक कर दे किंतु मेवों की तरफ मुँह न करे क्योंकि मेव तो पहले से ही कुफ्र को खत्म कर चुके हैं।

जिस समय बाबर ने हिन्दुस्थान पर आक्रमण किया था तब हसनखाँ मेवाती इन लोगों का नेता था। वह इब्राहीम लोदी की तरफ से बाबर से लड़ने के लिये आया था। इब्राहीम लोदी की पराजय के साथ ही हसनखाँ मेवाती को अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा।

जब राणा सांगा ने खानुआ के मैदान में बाबर को घेरा तो हसनखाँ मेवाती फिर से अपने खोये हुए राज्य को हासिल करने के लिये राणा सांगा की ओर से बाबर के विरुद्ध आ जुटा। जब बाबर को यह मालूम हुआ तो उसने अपने दूतों मुल्ला तुर्क अली और नजफखाँ बेग को हसनखाँ मेवाती की सेवा में भेजकर कहलवाया कि यदि तुझे राज्य चाहिये था तो मेरे पास आता। मैं भी मुसलमान हूँ और दूसरे मुसलमानों की मदद करना मेरा फर्ज है।

हसनखाँ मेवाती ने कहा- ‘जो मैं वीर हूँ तो तुझसे लड़कर ही राज्य लूंगा।’

हसनखाँ की यह हसरत मन में ही रह गयी। वह खानुआ के मैदान में अपने दस हजार सिपाहियों के साथ मारा गया। हसनखाँ के बेटे नाहरखाँ ने अलवर दुर्ग का सारा खजाना बाबर को समर्पित करके बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली। बाबर ने उसे एक छोटी सी जागीर जीवन यापन के लिये प्रदान की।

जब हुमायूँ फिर से दिल्ली का बादशाह हुआ तो हसनखाँ मेवाती का चचेरा भाई जमालखाँ हुमायूँ के पास आया। उसने हुमायूँ से प्रार्थना की- ‘मैं अपनी बड़ी बेटी का विवाह आपसे करना चाहता हूँ।’

हुमायूँ इस प्रस्ताव से बड़ा प्रसन्न हुआ। वैसे भी उसे कोई नया विवाह किये हुए काफी समय हो चला था। उसने जमालखाँ से पूछा- ‘तेरे कितनी बेटियाँ हैं?’

जमालखाँ ने कहा- ‘विवाह योग्य दो हैं।’

हुमायूँ जमालखाँ की बात सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने जमालखाँ को  आदेश दिया- ‘बड़ी बेटी का निकाह हम से कर दे और छोटी बेटी हमारे खानखाना बैरामखाँ को दे दे।’

इस प्रकार पहली मेवों की बेटी चंगेज और तैमूरलंग के खानदान में और दूसरी बेटी तुर्कों की कराकूयलू शाखा के बहारलू खानदान में ब्याह दी गयी। आगे चलकर इसी मेवों की बेटी से 17 दिसम्बर 1556 को लाहौर में बैरामखाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम का जन्म हुआ। 

-अध्याय 32, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

कच्चे चबूतरे का बादशाह (33)

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कच्चे चबूतरे का बादशाह

बैराम खाँ ने साढ़े तेरह साल के बालक अकबर को बादशाह तो घोषित कर दिया किंतु वह केवल कच्चे चबूतरे का बादशाह था। मुगलों का असली तख्त तो दिल्ली में था जिस पर कोई भी कभी भी कब्जा कर सकता था।

जब हुमायूँ दिल्ली को प्रस्थान कर गया तो सिकंदर सूर ने पहाड़ों से निकल कर फिर से मानकोट के किले पर अधिकार कर लिया। बैरामखाँ उसे कुचलने के लिये दिल्ली से पुनः कालानौर आया। तेरह वर्ष का अकबर सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त करने की मंशा से उसके साथ था। इस बार सिकन्दर सूर दुर्ग में था और बैरामखाँ खुले मैदान में।

इसलिये युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदला हुआ था। फिर भी बैरामखाँ ने मानकोट के चारों ओर कड़ा शिकंजा कस रखा था और ऐसा लगता था कि कुछ ही दिनों में किला हाथ लग जायेगा लकिन उन्हीं दिनों दिल्ली से खबर आई कि 26 जनवरी 1556 को बादशाह हुमायूँ सीढ़ियों से गिर कर मर गया।

हुमायूँ का अर्थ होता है भाग्यशाली किंतु मुगल बादशाहों में वह सबसे अधिक दुर्भाग्यशाली था। जैसे ही उसकी लोथ सीढ़ियों से नीचे गिरी, सरदारों ने एक आदमी को हुमायूँ के कपड़े पहना दिये और ऐसा प्रदर्शित किया मानो हुमायूँ मरा नहीं है। उन्हें भय था कि दिल्ली में यदि सिकंदर सूर के आदमियों को हुमायूँ की मौत का पता लग गया तो वे बगावत कर देंगे और दिल्ली उनके हाथ से निकल जायेगी।

दिल्ली से तुरंत विश्वसनीय गुप्तचरों को कालानौर के लिये रवाना किया गया ताकि वे बैरामखाँ को सूचित कर सकें। बैरामखाँ के सामने विकट स्थिति उत्पन्न हो गयी। क्या करे और क्या नहीं करे! यदि इस समय वह अकबर को लेकर दिल्ली के लिये रवाना हो जाता है तो सिकन्दर सूर उसके पीछे दिल्ली तक चढ़ आयेगा और यदि वह दुर्ग का घेरा बनाये रखता है तो दिल्ली में कोई भी षड़यंत्र हो सकता है।

बहुत सोच-विचार के बाद बैरामखाँ ने निर्णय लिया कि प्रबल शत्रु का सिर पूरी तरह कुचले बिना दिल्ली चले जाने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। उसने उसी समय ईंटों का एक बड़ा चबूतरा बनवाया और उस पर तेरह साल के अकबर को बैठाकर उसे हिन्दुस्थान का बादशाह घोषित कर दिया।

हुमायूँ के प्रमुख और विश्वसनीय अमीर अब्दुलमाली ने बैरामखाँ के इस कदम का विरोध किया और दरबार में शामिल होने से मना कर दिया। अब्दुलमाली एक सनकी आदमी था जो बहुत रोचक बातें किया करता था। हुमायूँ उसे अपना दोस्त मानता था जिससे अब्दुलमाली का दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ा हुआ रहता था।

हुमायूँ का वरद हस्त होने के कारण अब्दुलमाली जब चाहे, जिसे चाहे, जो चाहे, कहता फिरता था। जब बैरामखाँ ने उसे अकबर के सामने हाजिर होकर मुजरा करने को कहा तो अब्दुलमाली ने बैरामखाँ से बदतमीजी की और मुजरा करने से मना कर दिया।

अब्दुलमाली अब तक हुमायूँ के संरक्षण में सुरक्षित रहा था। वह नहीं जानता था कि बैरामखाँ किस मिट्टी का बना हुआ है। बैरामखाँ ने तुरंत तलवार निकाल कर अब्दुलमाली की छाती पर अड़ा दी और गिरफ्तार कर लिया। जब तक यह बात अकबर को मालूम होती तब तक बैरामखाँ के आदमी अब्दुलमाली को लेकर लाहौर जाने वाला आधा रास्ता तय कर चुके थे। बैरामखाँ के आदेश पर अब्दुलमाली को लाहौर दुर्ग में कैद करके रखा गया। वह कब और किन परिस्थितियों में मरा, कोई नहीं जानता।

जब यह सूचना अकबर के सौतेले भाई हकीमखाँ तक पहुंची कि उसका बाप हुमायूँ मर गया है और बैरामखाँ ने अब्दुलमाली को गिरफ्तार करके अकबर को हिन्दुस्थान का बादशाह घोषित कर दिया है तो हकीमखाँ ने अपने आप को अकबर से स्वतंत्र करके काबुल का बादशाह घोषित कर दिया।

हुमायूँ को इतिहासकारों ने शतरंज का बादशाह कहा है किंतु जिस समय अकबर बादशाह बना, उस समय उसकी स्थिति शतरंज के बादशाह जैसी भी नहीं थी। मिट्टी और ईंटों के चबूतरे पर बैठे हुए उस अनाथ बालक को बादशाह घोषित करके बैरामखाँ ने सबसे पहले मुजरा किया और सोने के इतने सिक्के नजर किये जिनसे अकबर अपने अमीरों और मुजरा करने वालों को बख्शीश दे सके। बैरामखाँ के अलावा किसी और सिपहसलार या सिपाही के पास ऐसा कुछ नहीं था जो बादशाह की नजर किया जा सके।

कहने को अकबर अब हिन्दुस्थान का बादशाह था किंतु उसके अधिकार में केवल दिल्ली और आगरा के ही सूबे थे। उन पर भी उसका अधिकार अमीरों की दया पर निर्भर करता था। सच पूछो तो मिट्टी और ईंटों के उस कच्चे चबूतरे पर भी उसका वास्तविक अधिकार नहीं था जिस पर कि उसका राज्यतिलक हुआ था। यदि उसे पैर टिकाने या सिर छिपाने के लिये कहीं जगह थी तो केवल सरहिंद के उस सूबे में जो बैरामखाँ के अधिकार में था।

-अध्याय 33, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

सलीमा बेगम (34)

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सलीमा बेगम

अकबर अपनी बुआ की बेटी सलीमा बेगम से यद्यपि उम्र में छोटा था किंतु वह सलीमा बेगम पर जान लुटाता था और उससे विवाह करना चाहता था लेकिन दूसरी ओर सलीमा बेगम खुरदरे चेहरे वाले जिद्दी और अनपढ़ अकबर को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी।

सदियों से ईरानी खून में तुर्कों, मंगोलों, तातारों, हब्शियों और अरबों का खून आ-आकर मिलने से ईरानी खून का सौंदर्य बुरी तरह से प्रभावित हुआ। जिन ईरानी औरतों के सुंदर मुख को निकट से देखने के लिये सूर्य की किरणें नील आकाश के असीम सरोवर में बिना विचारे कूद पड़ती थीं, उन ईरानी औरतों के चेहरे-मोहरे अब पहले जैसे न रह गये थे फिर भी ईरानी खून का सौंदर्य कहीं-कहीं अपनी झलक पूरे ठाठ के साथ दिखाता ही था। तब ऐसा लगता था मानो कुदरत ने कोई करिश्मा किया है। सलीमा बेगम कुदरत का ऐसा ही करिश्मा थी।

मध्य एशिया में तूरान एक प्रसिद्ध देश हुआ है। जिन दिनों वहाँ बाबर का शासन था उन दिनों ख्वाजा हसन नाम का एक आदमी ईरानी समाज में बहुत ही आदरणीय माना जाता था। उसका बेटा अलादउद्दीन भी तूरान में पूज्य समझा जाता था। बाबर ने अलादउद्दीन की सच्चरित्रता से प्रभावित होकर अपनी बेटी गुलरुख का विवाह अलादउद्दीन के बेटे मिरजा नूरूद्दीन से कर दिया था। सलीमा बेगम इसी विवाह का परिणाम थी।

अकबर अपनी बुआ की बेटी सलीमा बेगम से यद्यपि उम्र में छोटा था किंतु वह सलीमा बेगम पर जान लुटाता था और उससे विवाह करना चाहता था लेकिन दूसरी ओर सलीमा बेगम खुरदरे चेहरे वाले जिद्दी और अनपढ़ अकबर को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी। सलीमा बेगम अपने दादा की तरह सुशिक्षित और अनुशासन पसंद सुंदर सुघड़ लड़की थी जो काव्य रचना भी खूब करती थी जबकि अकबर अपने दादा बाबर की तरह अक्खड़, झगड़ालू और निरंकुश स्वभाव का युवक था। वह वही करता था जो उसे पसंद होता था, भले ही उसमें बड़ों की राय हो या न हो।

हुमायूँ की अचानक मौत ने अकबर को अकाल प्रौढ़ बना दिया। वह अपने मनमौजी स्वभाव को त्याग कर, तमाम झगड़ों और जिद्दों को एक तरफ रखकर जिंदगी की जटिलताओं को सुलझाने में व्यस्त हो गया।

तेजी से बदल गयी परिस्थितियों में उसकी समझ में अच्छी तरह से आ रहा था कि इस समय वह एक बिगड़ैल शहजादे के स्थान पर बादशाह कहलाने वाला अनाथ बालक है और उसका संपूर्ण भविष्य बैरामखाँ की अनुकम्पा पर निर्भर करता है। अपने इस अतालीक[1]  को प्रसन्न करने के लिये अकबर ने अपनी सबसे प्रिय वस्तु न्यौछावर करने का निश्चय किया।

अकबर ने बैरामखाँ को बुला कर उसी कच्चे चबूतरे पर फिर से दरबार आयोजित करने का आदेश दिया। अकबर के इस आदेश से बैरामखाँ असमंजस में पड़ गया। आखिर उससे सलाह-मशविरा किये बिना अकबर दरबार का आयोजन क्यों करना चाहता था?

जब सारे प्रमुख अमीर दरबार में हाजिर हो चुके तो अकबर ने बैरामखाँ से आग्रह किया कि आज वह एक भेंट अपने अतालीक को देना चाहता है लेकिन वह भेंट के बारे में तभी बतायेगा जब बैरामखाँ बिना कोई सवाल किये अपनी मंजूरी देगा। बैरामखाँ ने बड़े ही आश्चर्य के साथ अकबर की शर्त स्वीकार कर ली।

जब अकबर ने सलीमा बेगम का विवाह बैरामखाँ से करने की घोषणा की तो स्वयं बैरामखाँ और अन्य दरबारियों के आश्चर्य का पार न रहा। जिस समय हुमायूँ ने आगरा में बाबर को कोहिनूर हीरा भेंट किया था तब जो सिपाही मौके पर हाजिर थे, उनमें बैरामखाँ भी था।

कोहिनूर को देखकर बैरामखाँ की आँखें चौड़ गयीं थीं किंतु आज उसे महसूस हुआ कि हुमायूँ ने जो भेंट बाबर को दी थी, आज की भेंट उससे भी कई गुना बढ़कर थी। कोहिनूर आदमी द्वारा तराशा गया पत्थर का बेजान टुकड़ा था तो सलीमा बेगम कुदरत का बनाया हुआ जीता-जागता नायाब करिश्मा।

-अध्याय 34, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] संरक्षक।

अकाल का महादानव (35)

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अकाल का महादानव

बैरामखाँ जानता था कि सिकंदर सूर, आदिलशाह और इब्राहीम से निबटे बिना दिल्ली तक पहुंच पाना संभव नहीं था लेकिन इन सब शत्रुओं से प्रबल एक और शत्रु था जो बैरामखाँ को सबसे ज्यादा सता रहा था। वह था देश व्यापी महाअकाल। अकाल का महादानव पूरे देश में ताण्डव कर रहा था।

सलीमा बेगम को पाकर बैरामखाँ दूने जोश से अकबर के शत्रुओं पर टूट पड़ा। इस समय हिन्दुस्थान की स्थिति ऐसी थी कि आगरा से मालवा तथा जौनपुर की सीमाओं तक आदिलशाह की सत्ता थी। काबुल जाने वाले मार्ग पर दिल्ली से लेकर छोटे रोहतास तक सिकंदर सूर का शासन था तथा पहाड़ियों के किनारे से गुजरात की सीमा तक इब्राहीमखाँ के थाने लगते थे।

ये तीनों ही व्यक्ति अपने आप को दिल्ली का अधिपति समझते थे। इनके सिपाही आये दिन किसी न किसी गाँव में घुस जाते और जनता से राजस्व की मांग करते। जनता तीन-तीन बादशाहों को पालने में समर्थ नहीं थी। ये सिपाही निरीह लोगों पर तरह-तरह का अत्याचार करते। जबर्दस्ती उनके घरों में घुस जाते और उनका माल-असबाब उठा कर भाग जाते।

बिना कोई धन चुकाये जानवरों को पकड़ लेते और उन्हें मार कर खा जाते। शायद ही कोई घर ऐसा रह गया था जिसमें स्त्रियों की इज्जत आबरू सुरक्षित बची थी। जनता इन जुल्मों की चक्की में पिस कर त्राहि-त्राहि कर रही थी लेकिन किसी ओर कोई सुनने वाला नहीं था।

बैरामखाँ जानता था कि सिकंदर सूर, आदिलशाह और इब्राहीम से निबटे बिना दिल्ली तक पहुंच पाना संभव नहीं था लेकिन इन सब शत्रुओं से प्रबल एक और शत्रु था जो बैरामखाँ को सबसे ज्यादा सता रहा था। वह था देश व्यापी महाअकाल। अकाल का महादानव पूरे देश में ताण्डव कर रहा था जिसके चलते राजकोष जुटाना और सेना बढ़ाना संभव नहीं था।

बैरामखाँ के पास अब तक जो भी कोष था वह उसने हरहाने[1]  में नसीबखाँ की सेना से लूटा था। इसमें से काफी सारा धन उसने हुमायूँ को दे दिया था और हुमायूँ ने वह सारा धन अमीरों की दावतें करने पर तथा मुजरा करने वाली औरतों पर लुटा दिया था। बचे-खुचे धन से वह सेना को किसी तरह वेतन देकर टिकाये हुए था।

अकाल की स्थिति यह थी कि उत्तरी भारत में उस साल कहीं भी बरसात नहीं हुई थी। दिल्ली और आगरे के जिलों में तो अकाल ने बड़ा ही उग्र रूप धारण कर लिया था और हजारों आदमी भूख से मर रहे थे। राजधानी दिल्ली बिल्कुल बरबाद हो चुकी थी। थोड़े से मकानों के सिवा अब वहाँ कुछ भी नहीं था।

अच्छे-अच्छे घरों के लोग दर-दर के भिखारी होकर निचले इलाकों में भाग गये थे जहाँ वे भीख मांगकर गुजारा कर सकते थे। रोजगार की आशा करने से अच्छा तो मौत की आशा करना था क्योंकि मौत फिर भी मिल जाती थी लेकिन रोजगार नहीं मिलता था। जब खाली हवेलियों में भूखे नंगे लोग लूटमार के लिये घुसते तो उन्हें सोना चांदी और रुपया पैसा मिल जाता था किंतु अनाज का दाना भी देखना नसीब नहीं होता था जिसके अभाव में सोना-चांदी और रुपए-पैसे का कोई मूल्य नहीं था।

संभ्रांत लोगों की यह हालत थी तो निर्धनों और नीचे तबके के लोगों की तकलीफों का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता। औरतें वेश्यावृत्ति करके पेट पालने लगीं। लाखों बच्चे भूख और बीमारी से तड़प-तड़प कर मर गये। अकाल के साथ ही महामारी प्लेग का भी प्रकोप हुआ।

प्लेग ने हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों को अपनी चपेट में ले लिया। शहर के शहर खाली हो गये। लोगों ने भाग कर जंगलों और पहाड़ों में शरण ली। फिर भी असंख्य आदमी मर गये। अंत में ऐसी स्थिति आयी कि जब खाने को कहीं कुछ न रहा तो आदमी आदमी का भक्षण करने लगा। इक्के-दुक्के आदमी को अकेला पाकर पकड़ लेने के लिये नरभक्षियों के दल संगठित हो गये। पूरे देश में हा-हा कार मचा हुआ था।

एक ओर तो जनता की यह दुर्दशा थी दूसरी ओर सिकन्दर सूर, आदिलशाह, इब्राहीम लोदी और बैरामखाँ की सेनाओं में हिन्दुस्थान पर अधिकार करने के लिये घमासान मचा हुआ था।

भारत वर्ष की एसी स्थिति देखकर काशी में बैठे गुसांई तुलसीदास ने लिखा-

खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि

बनिक  को  न  बनिज  न चाकर को चाकरी

जीविका  विहीन  लो  सीद्यमान   सोच  बस

कहै  एक एकन सौं,  कहाँ  जाय  का  करी।

-अध्याय 35, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] पंजाब के होशियार पुर जिले में स्थित है।

धूसर बनिया (36)

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धूसर बनिया

एक जमाना था जब रेवाड़ी की सड़कों पर एक धूसर बनिया नमक बेचा करता था। उसका नाम था हेमचंद्र लेकिन वह अपने आप को हेमू ही कहता था। वह बातों का बड़ा खिलाड़ी था। देखते ही देखते वह किसी को भी अपने पक्ष में कर लेता था। धीरे-धीरे वह राजकीय कर्मचारियों से घुल मिल गया और मौका पाकर बाजार में तोल करने वाले कर्मचारी के पद पर नियुक्त हो गया।

यहाँ से उसने प्रगति के नये अध्याय लिखने आरंभ किये। एक दिन शेरशाह सूरी के दूसरे नम्बर के बेटे जलालखाँ की नजर उस पर पड़ी। वह हेमू के वाक् चातुर्य से बड़ा प्रभावित हुआ और उसे अपने साथ महल में ले गया। हेमू ने उसे ऐसी-ऐसी बातें बताईं जो जलालखाँ ने पहले कभी नहीं सुनी थीं।

जलालखाँ ने हेमू को अपना गुप्तचर बना लिया ताकि वह जन सामान्य के बीच घटित होने वाली घटनाओं की सच्ची खबर जलालखाँ को देता रहे। हेमू ने अपने काम से जलालखाँ को प्रसन्न कर लिया और धीरे-धीरे जलालखाँ की नाक का बाल बन गया।

जब जलालखाँ इस्लामशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा तो उसने हेमू को महत्वपूर्ण पद प्रदान किये। हेमू में सामान्य प्रशासन और सामरिक प्रबंधन की उच्च क्षमतायें थीं। एक दिन वह प्रधानमंत्री बन गया। जब आठ साल शासन करके इस्लामशाह गंदी बीमारियों के कारण मर गया तो इस्लामशाह का 12 वर्षीय बेटा फीरोजशाह दिल्ली का शासक हुआ। फीरोजशाह के मामा मुबारिजखाँ ने अपने भांजे फीरोजशाह की हत्या कर दी और खुद आदिलशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। हेमू पैनी नजरों से दिल्ली में घटने वाली घटनाओं को देख रहा था।

आदिलशाह विलासी प्रवृत्ति का था और शासन के नीरस काम करना उसके वश की बात नहीं थी। उसे एक ऐसे विश्वसनीय और योग्य आदमी की तलाश थी जो उसके लिये दिल्ली से लेकर बंगाल तक फैले विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रख सके। उसने हेमू को बुलाकर पूछा कि वह किसके प्रति वफादार है? अपने पुराने स्वामियों इस्लामशाह और फीरोज शाह के प्रति या फिर आदिलशाह के प्रति?

हेमू था तो साधारण मिट्टी से बना हुआ, पतला-दुबला और कमजोर कद काठी का आदमी किंतु ईश्वर ने उसके मन और मस्तिष्क में साहस और निर्भीकता जैसे गुण मुक्त हस्त से रखे थे। उसने कहा- ‘जब तक मेरे पुराने स्वामी जीवित थे, तब तक मेरी वफादारी उनके साथ थी और यदि वे आज भी जीवित होते तो मैं उनके प्रति ही वफादार रहता किंतु अब चूंकि वे दुनिया में नहीं रहे इसलिये मैं आपके अधीन काम करने को तैयार हूँ।’

आदिलशाह शुरू से ही हेमू का प्रशंसक था। वह जानता था कि यदि हेमू जैसे समर्पित और योग्य व्यक्ति की सेवायें मिल जायें तो आदिलशाह न केवल शत्रुओं से अपने राज्य को बचाये रख सकेगा अपितु राज-काज हेमू पर छोड़कर स्वयं आसानी से अपने राग-रंग में डूबा रह सकेगा। उसने हेमू को अपना प्रधानमंत्री बनाया। कुछ दिनों बाद सेना का भार भी उस पर छोड़ दिया। मामूली आदमी होते हुए भी हेमू उच्च कोटि का सेनानायक सिद्ध हुआ। उसने अपने मालिक आदिलशाह के लिये चौबीस लड़ाईयाँ लड़ीं जिनमें से बाईस लड़ाईयाँ जीतीं।

हेमू न केवल वीर, साहसी, उद्यमी और बुद्धिमान व्यक्ति था अपितु भाग्यलक्ष्मी उसके सामने हाथ बांधे खड़ी रहती थी। उसने ऐसा तोपखाना खड़ा किया जिसकी बराबरी उस समय पूरी धरती पर किसी और बादशाह अथवा राजा का तोपखाना नहीं कर सकता था। उसके पास हाथियों की 3 फौजें थीं जिनका उपयोग वह तीस हजार सैनिकों के साथ करता था। हेमू के पास जितने हाथी थे उतने उस समय दुनिया में और किसी के पास नहीं थे। तैमूर लंग को हिन्दुस्थान में कत्ले आम मचाकर भी केवल 120 हाथी ही मिल पाये थे।

यह एक भाग्य की ही बात थी कि आदिलशाह जैसे धूर्त, मक्कार और धोखेबाज हत्यारे को हेमू जैसे उच्च सेनानायक की सेवायें प्राप्त हुई। शीघ्र ही हेमू की धाक शत्रुओं पर जम गयी। जब हुमायूँ भारत छोड़कर ईरान भागा था तब उसने हेमू का नाम तक नहीं सुना था किंतु जब उसने पुनः दिल्ली की ओर मुँह किया तो समूचा उत्तरी भारत हेमू के नाम से गुंजायमान था। उसके द्वारा जीती गयीं बाईस लड़ाईयों के किस्से सुन-सुन कर हुमायूँ और उसके तमाम सिपहसालार हेमू के नाम से कांपते थे। अकबर को तो सपने में भी हेमू ही दिखाई देता था।

एक बार हुमायूँ के दरबार में रहने वाले चित्रकार ने एक ऐसा चित्र बनाया जिसमें एक आदमी के सारे अंग अलग-अलग दिखाये गये थे। जब अकबर ने उस चित्र को देखा तो भरे दरबार में कहा कि काश यह चित्र हेमू का होता! अकबर की बात सुनकर हुमायूँ के अमीरों के मुँह सूख गये। वे जानते थे कि एक न एक दिन उन्हें हेमू की तलवार का सामना करना ही है।

-अध्याय 36, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

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