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सलीमा बेगम (34)

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सलीमा बेगम

अकबर अपनी बुआ की बेटी सलीमा बेगम से यद्यपि उम्र में छोटा था किंतु वह सलीमा बेगम पर जान लुटाता था और उससे विवाह करना चाहता था लेकिन दूसरी ओर सलीमा बेगम खुरदरे चेहरे वाले जिद्दी और अनपढ़ अकबर को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी।

सदियों से ईरानी खून में तुर्कों, मंगोलों, तातारों, हब्शियों और अरबों का खून आ-आकर मिलने से ईरानी खून का सौंदर्य बुरी तरह से प्रभावित हुआ। जिन ईरानी औरतों के सुंदर मुख को निकट से देखने के लिये सूर्य की किरणें नील आकाश के असीम सरोवर में बिना विचारे कूद पड़ती थीं, उन ईरानी औरतों के चेहरे-मोहरे अब पहले जैसे न रह गये थे फिर भी ईरानी खून का सौंदर्य कहीं-कहीं अपनी झलक पूरे ठाठ के साथ दिखाता ही था। तब ऐसा लगता था मानो कुदरत ने कोई करिश्मा किया है। सलीमा बेगम कुदरत का ऐसा ही करिश्मा थी।

मध्य एशिया में तूरान एक प्रसिद्ध देश हुआ है। जिन दिनों वहाँ बाबर का शासन था उन दिनों ख्वाजा हसन नाम का एक आदमी ईरानी समाज में बहुत ही आदरणीय माना जाता था। उसका बेटा अलादउद्दीन भी तूरान में पूज्य समझा जाता था। बाबर ने अलादउद्दीन की सच्चरित्रता से प्रभावित होकर अपनी बेटी गुलरुख का विवाह अलादउद्दीन के बेटे मिरजा नूरूद्दीन से कर दिया था। सलीमा बेगम इसी विवाह का परिणाम थी।

अकबर अपनी बुआ की बेटी सलीमा बेगम से यद्यपि उम्र में छोटा था किंतु वह सलीमा बेगम पर जान लुटाता था और उससे विवाह करना चाहता था लेकिन दूसरी ओर सलीमा बेगम खुरदरे चेहरे वाले जिद्दी और अनपढ़ अकबर को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी। सलीमा बेगम अपने दादा की तरह सुशिक्षित और अनुशासन पसंद सुंदर सुघड़ लड़की थी जो काव्य रचना भी खूब करती थी जबकि अकबर अपने दादा बाबर की तरह अक्खड़, झगड़ालू और निरंकुश स्वभाव का युवक था। वह वही करता था जो उसे पसंद होता था, भले ही उसमें बड़ों की राय हो या न हो।

हुमायूँ की अचानक मौत ने अकबर को अकाल प्रौढ़ बना दिया। वह अपने मनमौजी स्वभाव को त्याग कर, तमाम झगड़ों और जिद्दों को एक तरफ रखकर जिंदगी की जटिलताओं को सुलझाने में व्यस्त हो गया।

तेजी से बदल गयी परिस्थितियों में उसकी समझ में अच्छी तरह से आ रहा था कि इस समय वह एक बिगड़ैल शहजादे के स्थान पर बादशाह कहलाने वाला अनाथ बालक है और उसका संपूर्ण भविष्य बैरामखाँ की अनुकम्पा पर निर्भर करता है। अपने इस अतालीक[1]  को प्रसन्न करने के लिये अकबर ने अपनी सबसे प्रिय वस्तु न्यौछावर करने का निश्चय किया।

अकबर ने बैरामखाँ को बुला कर उसी कच्चे चबूतरे पर फिर से दरबार आयोजित करने का आदेश दिया। अकबर के इस आदेश से बैरामखाँ असमंजस में पड़ गया। आखिर उससे सलाह-मशविरा किये बिना अकबर दरबार का आयोजन क्यों करना चाहता था?

जब सारे प्रमुख अमीर दरबार में हाजिर हो चुके तो अकबर ने बैरामखाँ से आग्रह किया कि आज वह एक भेंट अपने अतालीक को देना चाहता है लेकिन वह भेंट के बारे में तभी बतायेगा जब बैरामखाँ बिना कोई सवाल किये अपनी मंजूरी देगा। बैरामखाँ ने बड़े ही आश्चर्य के साथ अकबर की शर्त स्वीकार कर ली।

जब अकबर ने सलीमा बेगम का विवाह बैरामखाँ से करने की घोषणा की तो स्वयं बैरामखाँ और अन्य दरबारियों के आश्चर्य का पार न रहा। जिस समय हुमायूँ ने आगरा में बाबर को कोहिनूर हीरा भेंट किया था तब जो सिपाही मौके पर हाजिर थे, उनमें बैरामखाँ भी था।

कोहिनूर को देखकर बैरामखाँ की आँखें चौड़ गयीं थीं किंतु आज उसे महसूस हुआ कि हुमायूँ ने जो भेंट बाबर को दी थी, आज की भेंट उससे भी कई गुना बढ़कर थी। कोहिनूर आदमी द्वारा तराशा गया पत्थर का बेजान टुकड़ा था तो सलीमा बेगम कुदरत का बनाया हुआ जीता-जागता नायाब करिश्मा।

-अध्याय 34, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] संरक्षक।

अकाल का महादानव (35)

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अकाल का महादानव

बैरामखाँ जानता था कि सिकंदर सूर, आदिलशाह और इब्राहीम से निबटे बिना दिल्ली तक पहुंच पाना संभव नहीं था लेकिन इन सब शत्रुओं से प्रबल एक और शत्रु था जो बैरामखाँ को सबसे ज्यादा सता रहा था। वह था देश व्यापी महाअकाल। अकाल का महादानव पूरे देश में ताण्डव कर रहा था।

सलीमा बेगम को पाकर बैरामखाँ दूने जोश से अकबर के शत्रुओं पर टूट पड़ा। इस समय हिन्दुस्थान की स्थिति ऐसी थी कि आगरा से मालवा तथा जौनपुर की सीमाओं तक आदिलशाह की सत्ता थी। काबुल जाने वाले मार्ग पर दिल्ली से लेकर छोटे रोहतास तक सिकंदर सूर का शासन था तथा पहाड़ियों के किनारे से गुजरात की सीमा तक इब्राहीमखाँ के थाने लगते थे।

ये तीनों ही व्यक्ति अपने आप को दिल्ली का अधिपति समझते थे। इनके सिपाही आये दिन किसी न किसी गाँव में घुस जाते और जनता से राजस्व की मांग करते। जनता तीन-तीन बादशाहों को पालने में समर्थ नहीं थी। ये सिपाही निरीह लोगों पर तरह-तरह का अत्याचार करते। जबर्दस्ती उनके घरों में घुस जाते और उनका माल-असबाब उठा कर भाग जाते।

बिना कोई धन चुकाये जानवरों को पकड़ लेते और उन्हें मार कर खा जाते। शायद ही कोई घर ऐसा रह गया था जिसमें स्त्रियों की इज्जत आबरू सुरक्षित बची थी। जनता इन जुल्मों की चक्की में पिस कर त्राहि-त्राहि कर रही थी लेकिन किसी ओर कोई सुनने वाला नहीं था।

बैरामखाँ जानता था कि सिकंदर सूर, आदिलशाह और इब्राहीम से निबटे बिना दिल्ली तक पहुंच पाना संभव नहीं था लेकिन इन सब शत्रुओं से प्रबल एक और शत्रु था जो बैरामखाँ को सबसे ज्यादा सता रहा था। वह था देश व्यापी महाअकाल। अकाल का महादानव पूरे देश में ताण्डव कर रहा था जिसके चलते राजकोष जुटाना और सेना बढ़ाना संभव नहीं था।

बैरामखाँ के पास अब तक जो भी कोष था वह उसने हरहाने[1]  में नसीबखाँ की सेना से लूटा था। इसमें से काफी सारा धन उसने हुमायूँ को दे दिया था और हुमायूँ ने वह सारा धन अमीरों की दावतें करने पर तथा मुजरा करने वाली औरतों पर लुटा दिया था। बचे-खुचे धन से वह सेना को किसी तरह वेतन देकर टिकाये हुए था।

अकाल की स्थिति यह थी कि उत्तरी भारत में उस साल कहीं भी बरसात नहीं हुई थी। दिल्ली और आगरे के जिलों में तो अकाल ने बड़ा ही उग्र रूप धारण कर लिया था और हजारों आदमी भूख से मर रहे थे। राजधानी दिल्ली बिल्कुल बरबाद हो चुकी थी। थोड़े से मकानों के सिवा अब वहाँ कुछ भी नहीं था।

अच्छे-अच्छे घरों के लोग दर-दर के भिखारी होकर निचले इलाकों में भाग गये थे जहाँ वे भीख मांगकर गुजारा कर सकते थे। रोजगार की आशा करने से अच्छा तो मौत की आशा करना था क्योंकि मौत फिर भी मिल जाती थी लेकिन रोजगार नहीं मिलता था। जब खाली हवेलियों में भूखे नंगे लोग लूटमार के लिये घुसते तो उन्हें सोना चांदी और रुपया पैसा मिल जाता था किंतु अनाज का दाना भी देखना नसीब नहीं होता था जिसके अभाव में सोना-चांदी और रुपए-पैसे का कोई मूल्य नहीं था।

संभ्रांत लोगों की यह हालत थी तो निर्धनों और नीचे तबके के लोगों की तकलीफों का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता। औरतें वेश्यावृत्ति करके पेट पालने लगीं। लाखों बच्चे भूख और बीमारी से तड़प-तड़प कर मर गये। अकाल के साथ ही महामारी प्लेग का भी प्रकोप हुआ।

प्लेग ने हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों को अपनी चपेट में ले लिया। शहर के शहर खाली हो गये। लोगों ने भाग कर जंगलों और पहाड़ों में शरण ली। फिर भी असंख्य आदमी मर गये। अंत में ऐसी स्थिति आयी कि जब खाने को कहीं कुछ न रहा तो आदमी आदमी का भक्षण करने लगा। इक्के-दुक्के आदमी को अकेला पाकर पकड़ लेने के लिये नरभक्षियों के दल संगठित हो गये। पूरे देश में हा-हा कार मचा हुआ था।

एक ओर तो जनता की यह दुर्दशा थी दूसरी ओर सिकन्दर सूर, आदिलशाह, इब्राहीम लोदी और बैरामखाँ की सेनाओं में हिन्दुस्थान पर अधिकार करने के लिये घमासान मचा हुआ था।

भारत वर्ष की एसी स्थिति देखकर काशी में बैठे गुसांई तुलसीदास ने लिखा-

खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि

बनिक  को  न  बनिज  न चाकर को चाकरी

जीविका  विहीन  लो  सीद्यमान   सोच  बस

कहै  एक एकन सौं,  कहाँ  जाय  का  करी।

-अध्याय 35, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] पंजाब के होशियार पुर जिले में स्थित है।

धूसर बनिया (36)

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धूसर बनिया

एक जमाना था जब रेवाड़ी की सड़कों पर एक धूसर बनिया नमक बेचा करता था। उसका नाम था हेमचंद्र लेकिन वह अपने आप को हेमू ही कहता था। वह बातों का बड़ा खिलाड़ी था। देखते ही देखते वह किसी को भी अपने पक्ष में कर लेता था। धीरे-धीरे वह राजकीय कर्मचारियों से घुल मिल गया और मौका पाकर बाजार में तोल करने वाले कर्मचारी के पद पर नियुक्त हो गया।

यहाँ से उसने प्रगति के नये अध्याय लिखने आरंभ किये। एक दिन शेरशाह सूरी के दूसरे नम्बर के बेटे जलालखाँ की नजर उस पर पड़ी। वह हेमू के वाक् चातुर्य से बड़ा प्रभावित हुआ और उसे अपने साथ महल में ले गया। हेमू ने उसे ऐसी-ऐसी बातें बताईं जो जलालखाँ ने पहले कभी नहीं सुनी थीं।

जलालखाँ ने हेमू को अपना गुप्तचर बना लिया ताकि वह जन सामान्य के बीच घटित होने वाली घटनाओं की सच्ची खबर जलालखाँ को देता रहे। हेमू ने अपने काम से जलालखाँ को प्रसन्न कर लिया और धीरे-धीरे जलालखाँ की नाक का बाल बन गया।

जब जलालखाँ इस्लामशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा तो उसने हेमू को महत्वपूर्ण पद प्रदान किये। हेमू में सामान्य प्रशासन और सामरिक प्रबंधन की उच्च क्षमतायें थीं। एक दिन वह प्रधानमंत्री बन गया। जब आठ साल शासन करके इस्लामशाह गंदी बीमारियों के कारण मर गया तो इस्लामशाह का 12 वर्षीय बेटा फीरोजशाह दिल्ली का शासक हुआ। फीरोजशाह के मामा मुबारिजखाँ ने अपने भांजे फीरोजशाह की हत्या कर दी और खुद आदिलशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। हेमू पैनी नजरों से दिल्ली में घटने वाली घटनाओं को देख रहा था।

आदिलशाह विलासी प्रवृत्ति का था और शासन के नीरस काम करना उसके वश की बात नहीं थी। उसे एक ऐसे विश्वसनीय और योग्य आदमी की तलाश थी जो उसके लिये दिल्ली से लेकर बंगाल तक फैले विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रख सके। उसने हेमू को बुलाकर पूछा कि वह किसके प्रति वफादार है? अपने पुराने स्वामियों इस्लामशाह और फीरोज शाह के प्रति या फिर आदिलशाह के प्रति?

हेमू था तो साधारण मिट्टी से बना हुआ, पतला-दुबला और कमजोर कद काठी का आदमी किंतु ईश्वर ने उसके मन और मस्तिष्क में साहस और निर्भीकता जैसे गुण मुक्त हस्त से रखे थे। उसने कहा- ‘जब तक मेरे पुराने स्वामी जीवित थे, तब तक मेरी वफादारी उनके साथ थी और यदि वे आज भी जीवित होते तो मैं उनके प्रति ही वफादार रहता किंतु अब चूंकि वे दुनिया में नहीं रहे इसलिये मैं आपके अधीन काम करने को तैयार हूँ।’

आदिलशाह शुरू से ही हेमू का प्रशंसक था। वह जानता था कि यदि हेमू जैसे समर्पित और योग्य व्यक्ति की सेवायें मिल जायें तो आदिलशाह न केवल शत्रुओं से अपने राज्य को बचाये रख सकेगा अपितु राज-काज हेमू पर छोड़कर स्वयं आसानी से अपने राग-रंग में डूबा रह सकेगा। उसने हेमू को अपना प्रधानमंत्री बनाया। कुछ दिनों बाद सेना का भार भी उस पर छोड़ दिया। मामूली आदमी होते हुए भी हेमू उच्च कोटि का सेनानायक सिद्ध हुआ। उसने अपने मालिक आदिलशाह के लिये चौबीस लड़ाईयाँ लड़ीं जिनमें से बाईस लड़ाईयाँ जीतीं।

हेमू न केवल वीर, साहसी, उद्यमी और बुद्धिमान व्यक्ति था अपितु भाग्यलक्ष्मी उसके सामने हाथ बांधे खड़ी रहती थी। उसने ऐसा तोपखाना खड़ा किया जिसकी बराबरी उस समय पूरी धरती पर किसी और बादशाह अथवा राजा का तोपखाना नहीं कर सकता था। उसके पास हाथियों की 3 फौजें थीं जिनका उपयोग वह तीस हजार सैनिकों के साथ करता था। हेमू के पास जितने हाथी थे उतने उस समय दुनिया में और किसी के पास नहीं थे। तैमूर लंग को हिन्दुस्थान में कत्ले आम मचाकर भी केवल 120 हाथी ही मिल पाये थे।

यह एक भाग्य की ही बात थी कि आदिलशाह जैसे धूर्त, मक्कार और धोखेबाज हत्यारे को हेमू जैसे उच्च सेनानायक की सेवायें प्राप्त हुई। शीघ्र ही हेमू की धाक शत्रुओं पर जम गयी। जब हुमायूँ भारत छोड़कर ईरान भागा था तब उसने हेमू का नाम तक नहीं सुना था किंतु जब उसने पुनः दिल्ली की ओर मुँह किया तो समूचा उत्तरी भारत हेमू के नाम से गुंजायमान था। उसके द्वारा जीती गयीं बाईस लड़ाईयों के किस्से सुन-सुन कर हुमायूँ और उसके तमाम सिपहसालार हेमू के नाम से कांपते थे। अकबर को तो सपने में भी हेमू ही दिखाई देता था।

एक बार हुमायूँ के दरबार में रहने वाले चित्रकार ने एक ऐसा चित्र बनाया जिसमें एक आदमी के सारे अंग अलग-अलग दिखाये गये थे। जब अकबर ने उस चित्र को देखा तो भरे दरबार में कहा कि काश यह चित्र हेमू का होता! अकबर की बात सुनकर हुमायूँ के अमीरों के मुँह सूख गये। वे जानते थे कि एक न एक दिन उन्हें हेमू की तलवार का सामना करना ही है।

-अध्याय 36, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

विक्रमादित्य हेमचंद्र (37)

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विक्रमादित्य हेमचंद्र

जब महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के अधीश्वर हुए तो देशवासियों का उत्साह विशाल झरने की भांति फूट पड़ा। महाराज हेमचंद्र के अफगान व तुर्क सैनिक हिन्दू जनता के इस उत्साह को आश्चर्य और कौतूहल से देखते थे।

जब हेमू को ज्ञात हुआ कि हुमायूँ की मृत्यु हो गयी है और बैरामखाँ अकबर को लेकर दिल्ली आ रहा है तो वह ग्वालिअर से अपनी सेना लेकर आगरा पर चढ़ दौड़ा। आगरा का सूबेदार इस्कन्दरखा उजबेग  हेमू का नाम सुनकर बिना लड़े ही आगरा छोड़कर दिल्ली की ओर भाग गया। उसकी सेना में इतनी भगदड़ मची कि तीन हजार मुगल सिपाही आपस में ही कुचल कर मर गये। हेमू ने आगरा पर अधिकार कर लिया और शाही सम्पत्ति लूट ली।

आगरा के हाथ में आते ही हेमू दिल्ली की ओर बढ़ा। दिल्ली का सूबेदार तार्दीबेगखाँ अपनी सेना लेकर कुतुबमीनार से आठ किलोमीटर दूर पूर्व में स्थित तुगलकाबाद आ गया। हेमू ने उसमें जबरदस्त मार लगायी। तार्दीबेगखाँ और  इस्कन्दरखा उजबेग परास्त होकर सरहिन्द की ओर भागे। संभल का शासक अलीकुलीखाँ हेमू का नाम सुनकर भगोड़ों के साथ हो लिया।

हेमू ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसका धूर्त स्वामी आदिलशाह अपनी बेशुमार औरतों के साथ चुनार के दुर्ग में रंगरलियां मनाता रहा। हेमू को उसके पतित चरित्र से घृणा हो गयी थी जिससे हेमू ने अपने आप को मन ही मन स्वतंत्र कर लिया था। उपरी तौर पर दिखावे के लिये वह उसे बादशाह कहता रहा।

आगरा और दिल्ली अधिकार में आ जाने के बाद हेमू ने अदली को कोई सूचना नहीं भेजी और स्वयं ही अपने बल बूते पर भारत भूमि को म्लेच्छों से मुक्त करवा कर हिन्दू पद पादशाही की स्थापना के स्वप्न संजोने लगा।

दिल्ली हाथ में आ जाने के बाद हेमू ग्वालियर से लेकर सतलज नदी तक के सम्पूर्ण क्षेत्र का स्वामी हो गया। अपनी विशाल गजसेना के साथ उसने दिल्ली में प्रवेश किया। उसने दिल्ली के दुर्ग को गंगाजल से धुलवाकर पवित्र किया और एक दिन शुभ मूहूर्त निकलवाकर विक्रमादित्य हेमचंद्र के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर विधिवत् आरूढ़ हुआ।

सदियों से बेरहम तुर्कों के क्रूर शासन के अधीन अपने दुर्भाग्य पर आठ-आठ आँसू बहाती हुई हिन्दू जनता को महाराज विक्रमादित्य हेमचन्द्र के सिंहासनारूढ़ होने पर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कभी ऐसा दिन भी आयेगा जब दिल्ली पर पुनः हिन्दू राजा का शासन होगा। घर-घर शंख, घड़ियाल और नगाड़े बजने लगे।

हजारों की संख्या में हिन्दू जनता दूर-दूर से चलकर दिल्ली पहुँचने लगी। दिल्ली की गलियां, चौक, यमुनाजी का तट और समस्त जन स्थल इन नागरिकों से परिपूर्ण हो गये। महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र की जय-जय कार से पूरी दिल्ली गूंजने लगी।

सुहागिन स्त्रियों के झुण्ड के झुण्ड मंगल गीत गाते हुए मंदिरों की तरफ जाते हुए दिखाई देने लगे। सैंकड़ों साल से सुनसान पड़े मंदिरों में फिर से दीपक जलने लगे और आरतियाँ होने लगीं। मंदिरों के शिखरों पर केसरिया ध्वजायें लहराने लगीं। घर-घर वेदपाठ होने लगे तथा द्वार-द्वार पर गौ माता की पूजा आरंभ हो गयी। चावल के आटे से चौक पूरे गये और केले के पत्तों से तोरण सजाये गये। घरों के आंगन यज्ञों की वेदी से उठने वाले सुवासित धूम्र से आप्लावित हो गये।

जब से महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के राजा हुए तब से दिल्ली में हर रात दीवाली मनायी जाने लगी। यमुना का तट देश भर के तीर्थ-यात्रियों से पट गया। दूर-दूर से आने वाले हजारों श्रद्धालु रात्रि में इकट्ठे होकर यमुनाजी की आरती उतारते। महाराजा हेमचंद्र भी नित्य ही हाथी पर सवार होकर यमुनाजी के दर्शनों के लिये जाते।

सैंकड़ों वेदपाठी ब्राह्मण कंधे पर जनेऊ और गले में पीताम्बर डाले हुए महाराजा के पीछे-पीछे चलते। महाराजा हेमचंद्र अकाल के इस कठिन समय में भी याचकों, ब्राह्मणों और बटुकों को अपने हाथों से भोजन करवाते और उन्हें धन-धान्य तथा वस्त्र प्रदान करते।

वस्तुतः हिन्दू जनता का यह उत्साह पूरे तीन सौ पैंसठ साल बाद प्रकट हुआ था। ई. 1193 में तराइन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गौरी ने जब दिल्लीधीश्वर पृथ्वीराज चौहान को परास्त कर दिल्ली पर अधिकार किया था तब से ही हिन्दू अपने ही देश भारत वर्ष में गुलामों से बदतर जीवन यापन कर रहे थे।

पृथ्वीराज चौहान को परास्त करके मुहम्मद गौरी ने भारतवर्ष की अपार सम्पत्ति को हड़प लिया। जिससे देश की जनता एक साथ ही व्यापक स्तर पर निर्धन हो गयी। मुहम्मद गौरी के गुलामों और सैनिकों ने पूरे देश में भय और आतंक का वातावरण बना दिया। हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया। हजारों-लाखों ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिये गये।

स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया। मंदिर एवं पाठशालायें ध्वस्त करके मस्जिदों में परिवर्तित कर दी गयीं। दिल्ली का विष्णुमंदिर जामा मस्जिद में बदल दिया गया। धार, वाराणसी उज्जैन, मथुरा, अजयमेरू, जाल्हुर की संस्कृत पाठशालायें ध्वस्त करके रातों रात मस्जिदें खड़ी कर दी गयीं।

अयोध्या, नगरकोट और हरिद्वार जैसे तीर्थ जला कर राख कर दिये गये। हिन्दू धर्म का ऐसा पराभव देखकर जैन साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल, श्रीलंका तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गये। पूरे देश में हाहाकार मच गया। बौद्ध धर्म तो हूणों के हाथों पहले ही पराभव को प्राप्त हो चुका था।

अब जब महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के अधीश्वर हुए तो देशवासियों का उत्साह विशाल झरने की भांति फूट पड़ा। महाराज हेमचंद्र के अफगान व तुर्क सैनिक हिन्दू जनता के इस उत्साह को आश्चर्य और कौतूहल से देखते थे।

ऐसा नहीं था कि जन-सामान्य देश में चारों तरफ रक्तपात और लूटमार करती हुई सिकंदर सूर, इब्राहिमखाँ, इस्लामशाह, आदिलशाह और बैरामखाँ की सेनाओं को भूल गया था। जनता पूरी तरह आशंकित और भयभीत थी कि कहीं महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र चार दिन की चांदनी सिद्ध न हों!

वस्तुतः यह भय और आशंका ही जन सामान्य के बड़ी संख्या में उमड़ पड़ने का कारण था। जनता चाहती थी कि जब तक महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के तख्त पर हैं तब तक ही सही कुछ धर्म-कर्म और पुण्य लाभ अर्जित कर लिया जाये।

-अध्याय 37, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

काबुल या दिल्ली (38)

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काबुल या दिल्ली

जब अकबर के समक्ष यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि काबुल या दिल्ली तो अकबर ने अकबर अपने अमीरों की सलाह से आदेश दिया कि सेना को दिल्ली की ओर बढ़ाने के बजाय काबुल की ओर कूच किया जाये।

उन दिनों उत्तरी भारत के समस्त बादशाह और सेनापति हेमू के नाम से थर्राते थे। इब्राहीम सूर के सैनिकों को यदि स्वप्न में भी हेमू के सिपाही दिख जाते तो वे शैय्या त्याग कर खड़े हो जाते। बंगाल का शासक मुहम्मदशाह तो उस दिशा में पैर करके भी नहीं सोता था जिस दिशा में हेमू की सेना के स्थित होने के समाचार होते थे।

आगरा का सूबेदार इस्कन्दर खाँ उजबेग, दिल्ली का सूबेदार तार्दीबेग खाँ और संभल का सूबेदार अलीकुली खाँ हेमू की सेना का नाम सुनकर ही भाग छूटे थे। उस समय समूचे उत्तरी भारत में केवल बैराम खाँ अकेला ही सेनापति था जो हेमू से दो-दो हाथ करने की तमन्ना दिल में लिये घूमता था। वह जानता था कि एक न एक दिन बैराम खाँ और हेमू एक दूसरे के सामने होंगे। वह अवसर शीघ्र ही आ उपस्थित हुआ।

जैसे ही बैराम खाँ जालंधर में सलीमा बेगम से निकाह करने के बाद मानकोट को हस्तगत करने के लिये फिरा वैसे ही उसे आगरा और दिल्ली के पतन का समाचार मिला। अकबर के अमीरों ने अकबर को सलाह दी कि हिन्दुस्थान की ओर से ध्यान हटाकर अपनी सारी ताकत काबुल पर केंद्रित कर लेनी चाहिये क्योंकि इस समय मुगल सेना में केवल बीस हजार सैनिक हैं और हेमू एक लाख सैनिकों की ताकत का स्वामी है।

उसके पास इस समय धरती भर की सबसे बड़ी हस्ति सेना है और धरती भर का सबसे बड़ा तोपखाना है। जब अकबर के समक्ष यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि काबुल या दिल्ली तो अकबर ने अमीरों की सलाह से आदेश दिया कि सेना को दिल्ली की ओर बढ़ाने के बजाय काबुल की ओर कूच किया जाये।

बैराम खाँ इस आदेश को सुनकर सकते में आ गया। वह नहीं चाहता था कि जिस दिल्ली और आगरा के लिये उसने अपने जीवन की बाजी लगा दी थी, जिस दिल्ली और आगरा के लिये वह हुमायूँ के साथ हिन्दुस्थान से लेकर ईरान और ईरान से लेकर हिन्दुस्थान में दर दर की ठोकरें खाता फिरा था, जिस दिल्ली और आगरा के लिये उसने सिकंदर लोदी, राणा सांगा और मेदिनी राय जैसे प्रबल शत्रुओं को धूल चटा दी थी, जिस दिल्ली और आगरा के लिये उसने बाबर के तीन-तीन शहजादों को कैद करके मक्का भिजावा दिया था, उस दिल्ली और आगरा का मार्ग छोड़कर वह बिना युद्ध किये ही भाग खड़ा हो।

बैराम खाँ अकबर के आदेश से सहमत नहीं हुआ। उसने अकबर को समझाया कि भले ही हमारे पास बीस हजार सैनिक हैं और शत्रु के पास एक लाख सैनिक बताये जा रहे हैं किंतु बाबर और हुमायूँ भी तो इन्हीं परिस्थितियों में लड़ते और जीतते आये थे।

बैराम खाँ ने अकबर को समझाया कि भले ही हेमू के पास एक लाख सैनिक और तीस हजार हाथी हैं किंतु हेमू की असली ताकत उसके तोपखाने में बसती है। यदि किसी तरह उससे तोपखाना छीन लिया जाये तो उसे आसानी से परास्त किया जा सकता है। बैराम खाँ ने अकबर को समझाया कि हमारे समक्ष प्रश्न यह नहीं है कि काबुल या दिल्ली ! हमारे समक्ष केवल एक ही प्रश्न है कि या तो दिल्ली या फिर मौत! हमें केवल दिल्ली को चुनना है न कि मौत को!

अकबर को अपने संरक्षक की बातें अमीरों की बातों से ज्यादा अच्छी लगीं और वह काबुल लौट चलने के बजाय दिल्ली की ओर बढ़ने के लिये राजी हो गया।

-अध्याय 38, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

तार्दीबेग की हत्या (39)

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तार्दीबेग की हत्या

जब अकबर जंगल में काफी आगे तक चला गया तो बैरामखाँ ने तार्दीबेग को अपने डेरे पर बुलवाया। जैसे ही तार्दीबेग बैरामखाँ के डेरे पर पहुँचा, बैराम खाँ ने तलवार निकाल कर तार्दीबेग की हत्या कर दी।

अकबर की सहमति पाकर बैरामखाँ ने खिज्र खाँ को सिकंदर सूर से निबटने के लिये तैनात किया और स्वयं अकबर को लेकर दिल्ली की ओर बढ़ा। सरहिंद पर आगरा, दिल्ली और संभल के तीनों भगोड़े सूबेदार अकबर से आ मिले। इन तीनों ने भी अकबर को सलाह दी कि यदि जान प्यारी है तो दिल्ली जाने की बजाय काबुल को लौट चलो। अकबर एक बार फिर विचलित हो गया।

अकबर की इस ऊहापोह से निबटने के लिये बैराम खाँ ने एक योजना बनाई। उसने सरहिन्द के जंगल में शिकार का आयोजन किया। उसने स्वयं को और तार्दीबेग खाँ को इस शिकार से दूर रखा। जब अकबर जंगल में काफी आगे तक चला गया तो बैराम खाँ ने तार्दीबेग को अपने डेरे पर बुलवाया। जैसे ही तार्दीबेग बैराम खाँ के डेरे पर पहुँचा, बैराम खाँ ने तलवार निकाल कर तार्दीबेग की हत्या कर दी।

जब शाम को अकबर अपने डेरे पर लौटा तो उसे तार्दीबेग की हत्या के समाचार मिले। अकबर यह सुनकर सकते में आ गया। अमीर तार्दीबेग खाँ हुमायूँ का विश्वस्त सिपहसलार था। जिस समय बैराम खाँ एक साधारण सिपाही की हैसियत रखता था, उस समय भी तार्दीबेग खाँ हुमायूँ के बराबर बैठकर सलाह मशविरा दिया करता था। अकबर तिलमिलाया तो खूब किंतु कुछ कहने की स्थिति में नहीं था।

बैराम खाँ ने अपने मंत्री मौलाना पीर मोहम्मद शिरवानौ को अकबर की सेवा में भेजा। मौलाना शिरवानौ बैराम खाँ का विश्वसनीय आदमी था। वह न केवल बैराम खाँ का संदेश लेकर गया अपितु बादशाह के दिल में बैराम खाँ के लिये फिर से जगह बनाने का उद्देश्य लेकर भी गया। मौलाना पर यह जिम्मेदारी भी छोड़ी गयी कि वह अकबर के दिल का सच्चा हाल पता लगाकर आये ताकि आगे की कार्यवाही की जा सके।

मौलाना ने फर्श तक झूलती हुई लम्बी दाढ़ी हिलाते हुए बादशाह को कोर्निश बजाई। बादशाह ने उसे बैठने तक को नहीं कहा। मौलाना ने दुबारा कोर्निश बजाई और निवेदन किया- ‘बादशाह सलामत मैं इस समय अपने पाकरूह मालिक खानका बैराम खाँ की ओर से आपकी सेवा में हाजिर हुआ हूँ।’

बादशाह ने मौलाना की बात का कोई जवाब नहीं दिया। मौलाना काफी देर तक चुपचाप खड़ा रहा। काफी देर बाद बादशाह ने मौलाना की ओर आँखें घुमाकर कहा- ‘कहता क्यों नहीं कि तुझे क्या कहना है? पत्थर के बुत की तरह बेजान होकर क्यों खड़ा है?’

– ‘बादशाह सलामत! मेरे पाकरूह मालिक खानका बैराम खाँ ने अर्ज किया है कि नमक हराम तार्दीबेग जानबूझ कर दिल्ली की लड़ाई बीच में छोड़कर भाग आया था। वह कभी भी मुगल सल्तनत का विश्वसनीय नहीं था। यदि तार्दीबेग की हत्या नहीं की जाती तो दूसरे अमीर भी कोताही बरतने लगते। इसका परिणाम यह होता कि आप हिन्दुस्थान में रहकर जो कुछ हासिल किया चाहते हैं वह आपको कभी भी हासिल नहीं होता।’

– ‘तेरे पाकरूह मालिक ने तुझे यह नहीं बताया कि उसे दण्ड देने से पहले बादशाह सलामत से पूछा क्यों नहीं गया?’ अकबर ने क्रोधित होकर पूछा।

 – ‘बादशाह हुजूर का गुस्सा बेवजह नहीं है। मेरे मालिक ने कहलवाया है कि बादशाह सलमात बड़े ही पाकरूह, नर्मदिल इंसान हैं। यदि उनसे पूछा जाता तो वे कभी भी तार्दीबेग को मारने के लिये राजी नहीं होते। ऐसी स्थिति में भी उस नमक हराम को तो मारना ही था। तब हद से ज्यादा बेअदबी होती। हुक्म न मानने से मुल्क और लश्कर में बहुत खलल और फसाद पैदा होता।’

– ‘तो अब क्या चाहते हो? अकबर बैराम खाँ का जवाब सुनकर दहल गया।

– ‘खानका ने अर्ज की है कि उन्हें माफी दी जावे और यह घोषणा करवाई जावे कि तार्दीबेग का खून बादशाह सलामत के हुक्म से किया गया है।’

– ‘क्यों?’

– ‘ताकि सब कपटी लोगों के दिल में दहशत पैदा हो जावे और कोई भी अमीर नमक हरामी करने की हिम्मत न करे।’

– ‘ठीक है। खानका को हमारी खिदमत में भेज।’

अकबर का जवाब सुनकर मौलाना ने गर्दन ऊपर उठाई और सीधे ही बादशाह की आँखों में झांकते हुए बोला- ‘हुजूर! बड़े बादशाह हुजूर हुमायूँ ने एक बार कहा था कि खानका बैराम खाँ ने जितने अहसान मुगलिया सल्तनत पर किये हैं उन अहसानों के बदले मुगल खानदान के कई शहजादे बैराम खाँ पर कुरबान किये जा सकते हैं।’

– ‘क्या यह भी तुम्हारे पाकरूह मालिक ने कहलवाया है?’ अकबर ने हँसकर पूछा।

– ‘नहीं! यह तो मैं अपनी ओर से बादशाह हुजूर की खिदमत में पेश कर रहा हूँ।’ मौलाना ने भी हँसकर जवाब दिया।

– ‘और कुछ?’

– ‘हाँ हुजूर! एक बात और।’

– ‘क्या मौलाना? और क्या??’

– ‘मेरी अर्ज ये है कि जब खानका आपकी खिदमत में हाजिर हों तो हुजूर यह नहीं भूलें कि जिस समय बड़े बादशाह हुजूर ने खानका पर मुगल शहजादे कुर्बान करने की बात कही थी, उस समय से लेकर अब तक चंगेजी खानदान पर खानका के अहसानों की फेहरिश्त और भी लम्बी हो गयी है।’ मौलाना की बात सुनकर बादशाह का चेहरा सूख गया।

मौलाना कोर्निश बजाकर डेरे से बाहर हो गया। उसका काम हो गया था। बादशाह के आदेश पर बैराम खाँ उसी रात अकबर के डेरे पर हाजिर हुआ। अकबर ने खड़े होकर अपने अतालीक बैराम खाँ का स्वागत किया जो अब केवल अतालीक भर न था। सच्चाई तो यह थी कि बैराम खाँ उस समय मुगलिया सल्तनत की समस्त शक्तियों का स्वामी था।

-अध्याय 39, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

फिर से पानीपत (40)

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अकबर के पुत्र सलीम का जन्म

बाबर ने पानीपत के मैदान में ही इब्राहीम लोदी से भारत का राज्य छीना था। आज एक बार मुगल सेना फिर से पानीपत की ओर चल पड़ी थी जहाँ उसे महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र की विशाल सेना से दो-दो हाथ करने थे।

जब महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र ने देखा कि बैराम खाँ मुगल सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहा है तो उन्होंने दिल्ली से बाहर जाकर पानीपत के मैदान में बैराम खाँ से दो-दो हाथ करने का निर्णय लिया। महाराजा ने धन के लालची अफगान अमीरों को विपुल धन राशि देकर अपने वश में किया और पूरे उत्तरी भारत में दुहाई फिरवाई कि वह मुगलों को भारतवर्ष से बाहर खदेड़ने के लिये पानीपत जा रहा है। जिन राजाओं और सेनापतियों को अपनी जन्मभूमि से प्रेम हो, वे भी पानीपत पहुँचें।

महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र का संदेश पाकर तीस हजार राजपूत सैनिक फिर से पानीपत के मैदान में आ जुटे। अब दिल्ली की सेना केवल अफगान सैनिकों के भरोसे नहीं रह गयी। महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र ने अपने विश्वस्त सलाहकारों से कहा कि यदि इस सयम महाराणा सांगा जीवित होते तो भारतवर्ष को म्लेच्छों से मुक्त करवा लेना कोई बड़ी बात नहीं होती।

महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र को अपने तोपखाने और हस्ति सेना पर बहुत भरोसा था किंतु ये तभी कारगर थे जब वे समय से पूर्व रणक्षेत्र में पहुँचकर उचित जगह पर तैनात कर दिये जायें। इनकी गति घुड़सवारों की तरह त्वरित नहीं थी। इसलिये उन्होंने अपना तोपखाना पानीपत के लिये रवाना कर दिया और स्वयं अपने हाथियों को मक्खन खिलाते हुए पानीपत की ओर बढ़े।

जब दिल्ली की सेना गोला बारूद लेकर पानीपत की ओर जा रही थी तो अकबर के सेनापति अलीकुली खाँ को सूचना लगी कि हेमू ने अपना तोपखाना तो पानीपत की ओर भेज दिया है और स्वयं अपने हाथियों को मक्खन खिलाता हुआ मस्ती से आ रहा है। बैराम खाँं ने अलीकुली खाँ को इसी काम पर तैनात कर रखा था कि किसी भी तरह मौका लगते ही तोपखाने को नष्ट कर दे। अलीकुली खाँ ने अपनी सेना को दिल्ली की सेना के मार्ग में ला अड़ाया। दिल्ली के मुट्ठी भर सैनिक इस आकस्मिक युद्ध के लिये तैयार नहीं थे। बात की बात में अलीकुली खाँ ने दिल्ली की सेना से तोपखाना छीन लिया।

तोपखाना छीने जाने के दो सप्ताह बाद इधर से महाराज हेमचंद्र की सेना और उधर से खानका बैराम खाँ की सेना पानीपत के मैदान में आमने सामने हुई। बैराम खाँ ने अलीकुली खाँ, सिकन्दर खाँ उजबेग और अब्दुल्ला उजबेग को मोर्चे पर भेजा और स्वयं अकबर को लेकर पानीपत से पाँच मील पीछे ही रुक गया।

तोपखाना छिन जाने के बाद महाराज हेमचंद्र ने अपना पूरा ध्यान हस्ति सैन्य पर केंद्रित किया। उन्होंने हाथियों को जिरहबख्तर पहनाये और उनकी पीठों पर बंदूकची बैठाये। सेना के दाहिनी ओर शादीखाँ कक्कड़ और बांयी ओर अपने भांजे रमैया को नियुक्त करके महाराज हेमचंद्र सेना के मध्य भाग में आ डटे।

अपने हाथी पर खड़े होकर महाराज हेमचंद्र ने पहले अपनी सेना को और फिर शत्रु सेना को देखा भाग्य की विडम्बना देखकर महाराजा का कलेजा कांप गया। उनका अपना तोपखाना शत्रु के हाथों में पड़कर उनके अपने सिपाहियों को निगलने के लिये तैयार खड़ा था। उन्हें लगा कि जिस हेमू के सामने भाग्य लक्ष्मी हाथ बांधे खड़ी रहती थी, आज उसके रूठ जाने से ही ऐसा हुआ है। उन्होंने अपने सैनिकों को धंसारा करने का आदेश दिया।

हेमू द्वारा वर्षों से संचित तोपखाना महाराज हेमचंद्र की सेना पर आग फैंकने लगा किंतु हिन्दू सिपाही मृत्यु की परवाह न करके आगे को बढ़ते ही रहे जिससे महाराज हेमचंद्र की सेना का भी वही हश्र हुआ जो खानुआ के मैदान में राणा सांगा की सेना का हुआ था। मुगल सेना ने यहाँ भी तुगलुमा का प्रयोग किया। दुर्भाग्य से हिन्दू और अफगानी सैनिक इस पद्धति से युद्ध करने में सक्षम नहीं थे। देखते ही देखते हिन्दू चारों ओर से घिर गये।

महाराजा हेमचंद्र चौबीस लड़ाईयों के अनुभवी सेनापति थे जिनमें से बाईस के परिणाम उनके पक्ष में आये थे। उन्होंने तोपखाने की परवाह न करके शत्रु सैन्य में वो मार लगाई कि अलीकुलीखाँ की सेना के दांये और बांये दोनों पक्षों को तोड़ दिया। थोड़ी ही देर में विजय तराजू के एक पलड़े में लटक गयी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पलड़ा महाराज हेमचंद्र के पक्ष में झुका हुआ था। हिन्दू वीर उत्साह से भर गये और भरपूर हाथ चलाने लगे।

जब यह सूचना पानीपत से पाँच मील दूर पड़ाव कर रहे बैरामखाँ को दी गयी तो बैरामखाँ अपनी सारी बची-खुची सेना को लेकर युद्ध के मैदान में पहुँचा। जिस समय वह युद्ध क्षेत्र में कूदा, उस समय युद्ध बहुत ही नाजुक स्थिति में था। घोड़ों पर बैठकर महाराजा तक पहुँचना संभव नहीं जानकर बैराम खाँ और उसके अमीर घोड़ों से उतर पड़े तथा तलवारें निकाल कर पैदल ही महाराजा की ओर दौड़ पड़े। बैरामखाँ को युद्ध के मैदान में आया देखकर मुगलों का जोश दूना हो गया। वे तक-तक कर तीर, भाले और बंदूकें चलाने लगे।

इतिहास गवाह है कि दुर्भाग्य और पराजय ने शायद ही कभी हिन्दू जाति का पीछा छोड़ा हो। इस सर्वत्र व्यापी दुर्भाग्य के चलते न पुरुषार्थ, न विद्या और न उद्यम, कुछ भी हिन्दुओं के काम नहीं आया। यही कारण था कि सम्पूर्ण शौर्य, पराक्रम और युद्ध कौशल के रहते हुए भी न तो महाराजा दाहिर सेन सिंधु के मैदान में मुहम्मद बिन कासिम को परास्त कर सके, न महाराजा जयपाल पंजाब में महमूद गजनवी को परास्त कर सके, न महाराजा पृथ्वीराज चौहान तराइन के मैदान में मुहम्मद गौरी को परास्त कर सके और न राणा सांगा खानुआ के मैदान में बाबर को परास्त कर सके। यहाँ भी भाग्य की विडम्बना ने फिर से अपना इतिहास दोहराया।

जब मुगल सेना में अफरा-तफरी मचनी आरंभ हुई और ऐसा लगा कि महाराज हेमचंद्र को विजय श्री मिलने ही वाली है, उसी समय जाने कहाँ से एक सनसनाता हुआ तीर आया और महाराजा की आँख फोड़ता हुआ निकल गया। जाने प्रारब्ध में यही लिखा था अथवा सचमुच ही भारतवर्ष की सौभाग्य लक्ष्मी रूठ गयी थी, महाराजा हेमचंद्र की आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वे हौदे में गिर पड़े।

महावत ने महाराज को बेहोश हुआ जानकर हाथी को पीछे की ओर मोड़ा ताकि युद्ध भूमि से बाहर निकल जाये किंतु तब तक शैतान शाहकुली मरहम की दृष्टि महाराज पर पड़ चुकी थी। उसने अपने आदमियों को साथ लेकर महाराज के हाथी को घेर लिया।

अफगान सैनिक महाराज हेमचंद्र को मरा हुआ जानकर युद्ध का मैदान छोड़कर भाग छूटे। राजपूत वीरों ने अंत तक महाराज का साथ नहीं छोड़ा और युद्ध भूमि में तिल-तिल कर कट मरे। महाराज के पाँच हजार सैनिक उसी समय मार डाले गये। डेढ़ हजार हाथी लूट में बैराम खाँ के हाथ लगे।

पानीपत के मैदान में बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराकर दिल्ली में मुगलों के राज्य की नींव रखी थी, एक बार फिर से पानीपत का मैदान मार कर मुगलों ने दिल्ली हासिल कर ली। इसी के साथ म्लेच्छों को भारत भूमि से भगाने का स्वप्न हमेशा-हमेशा के लिये भंग हो गया।

-अध्याय 40, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

काफिरों की हत्या (41)

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अकबर की धाय माहम अनगा का दरबार

काफिरों की हत्या करने के बाद बैरामखाँ ने अपने प्रबलतम शत्रु महाराज हेमचंद्र का सिर काबुल भेज दिया जहाँ उसे चौराहे पर लटका दिया गया ताकि शत्रु समझ लें कि बैरामखाँ का विरोध करने वालों का क्या हश्र होता है।

अलीकुलीखाँ और शाहकुली मरहम मूर्च्छित महाराजा हेमचंद्र को लेकर बैरामखाँ के पास आये। महाराज के शरीर में अनगिनत घाव थे जिनसे रक्त बह रहा था। नेत्र में लगे तीर से काफी मात्रा में रक्त प्रवाह हुआ था जिससे उनकी साँस की गति मद्धिम चल रही थी।

कोटि-कोटि हिन्दुओं की आशाओं के सूरज दिल्लीधीश्वर महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र की जो दुर्दशा इस समय थी, उसे देखकर किसी भी करुण कोमल मनुष्य का दिल दहल जाता किंतु चंगेजी वंश की खूनी ताकत महाराजा के रक्त को बहते हुए देखकर उल्लास से नाच उठी थी।

जब अकबर ने महाराज के शरीर को देखा तो उसे सहसा विश्वास नहीं हुआ। क्या यही वह संक्षिप्त काया थी जिसके भय से हजारों मुगल सैनिक रातों को ठीक से सोते भी नहीं थे! क्या यही वह विकराल सेनापति था जिसने बाईस विकराल युद्धों में खम ठोक कर जीत हासिल की थी!

क्या यह वही अद्भुत महाराजा था जिसके पास धरती भर की सबसे बड़ी गजसेना और धरती भर का सबसे बड़ा तोपखाना था! क्या यह वही महामना धनपति राजा था जो अपने हाथियों को मक्खन खिलाया करता था! यदि यह वही था तो इस तरह निःशक्त होकर भूमि पर क्यों पड़ा था?

अकबर को आगरा का वह चित्रकार याद हो आया जिसने एक दिन ऐसे आदमी का चित्र बनाया था जिसके समस्त अंग अलग थे। उस चित्र को देखते ही भरे दरबार में अकबर के मुँह से निकल पड़ा था कि काश यह चित्र हेमू का होता और उसकी बात सुनकर समूचा मुगल दरबार सहम गया था। क्या उस कुत्सा[1]  के सत्य होने की घड़ी आ गयी थी!

– ‘बादशाह सलामत आपका इकबाल युगों तक बुलंद रहे इसके लिये जरूरी है कि आप अपनी तलवार से इस फसादी[2]  काफिर[3]  की गर्दन उड़ा दें।’ बैरामखाँ ने अकबर से अनुरोध किया।

बैरामखाँ की बात सुनकर अकबर अपने विचारों से बाहर निकला। खानका का अनुरोध सुनकर उसका हाथ तलवार पर गया किंतु अगले ही क्षण उसने तलवार की मूठ से अपना हाथ हटा लिया।

अकबर को तलवार की मूठ से हाथ हटाते हुए देखकर अमीरों के मुँह आश्चर्य से खुले रह गये। क्या हुआ? बादशाह ने तलवार क्यों नहीं निकाली?

– ‘बादशाह सलामत! काफिरों को मारकर गजा[4]  का सवाब[5]  हासिल करें। ताकि हम सब आपको मुबारकबाद दे सकें।’ बैरामखाँ ने फिर से अपना अनुरोध दोहराया।

– ‘नहीं! यह नहीं हो सकता।’ अकबर बुदबुदाया।

– ‘क्या नहीं हो सकता हुजूर?’

– ‘हम मरते हुए आदमी पर तलवार नहीं चलायेंगे।’

– ‘मरे हुए आदमी पर शस्त्र चलाना अनुचित है किंतु यह शत्रु अभी जीवित है। शत्रु को मारने में ही भलाई है। काफिर को मारने से आपको गाजी की उपाधि हासिल होगी।’ बैरामखाँ ने फिर से अनुरोध किया।

– ‘हमारे मारने के लिये और भी काफिर काफी हैं। जब यह होश में आ जाये तब इसे मार दिया जाये।’ अकबर ने प्रतिवाद किया।

– ‘आप ठीक कहते हैं। यह आपके द्वारा मारे जाने के योग्य नहीं है। आप अपनी तेग इसकी गर्दन पर टिका कर छोड़ दें। यह मरा हुआ मान लिया जायेगा।’ बैरामखाँ ने अकबर को सहमत नहीं होते हुए देखकर बेचैनी से कहा।

अकबर ने म्यान में से तलवार निकालकर महाराज हेमचंद्र की गर्दन पर टिका दी। ठीक उसी क्षण बैरामखाँ ने अपनी तलवार से महाराज हेमचंद्र की गर्दन उनके धड़ से अलग कर दी। भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट महाराज हेमचंद्र का कटा हुआ मस्तक एक ओर को लुढ़क गया जिसे देखकर विश्वास नहीं होता था कि इसी मस्तक पर एक दिन देशवासियों ने चंवर ढुलते और चंदन चर्चित अभिषेक होते देखे थे।

हिन्दू काफिरों की हत्या करने के बाद बैरामखाँ ने अपने प्रबलतम शत्रु महाराज हेमचंद्र का सिर काबुल भेज दिया जहाँ उसे चौराहे पर लटका दिया गया ताकि शत्रु समझ लें कि बैरामखाँ का विरोध करने वालों का क्या हश्र होता है। महाराज हेमचंद्र का धड़ दिल्ली ले जाया गया और वहाँ उसे सूली पर लटकाया गया। इस अवसर पर बैरामखाँ ने पानीपत के मैदान से पकडे़ गये डेढ़ हजार हाथी अकबर को भेंट किये।

-अध्याय 41, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] बुरी इच्छा

[2] उत्पात मचाने वाला, झगड़ालू।

[3] इस्लाम में विधर्मी को काफिर कहा जाता है।

[4] विधर्मी को मारना गजा कहा जाता है।

[5] पुण्य

सोने की ईंटें (42)

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सोने की ईंटें

रानी अलवर जिले में स्थित बीजवाड़े की पहाड़ियों में जाकर छिप गयी। उसने कई दिनों तक जंगलों में घूम-घूम कर सोने की ईंटें तथा स्वर्ण-आभूषण धरती में अलग-अलग स्थानों पर दबा दिये ताकि यदि बैराम खाँ सोने का पीछा करता हुआ बीजवाड़े की पहाड़ियों में आ भी पहुँचे तो भी उसे एक साथ सम्पूर्ण कोष कभी भी प्राप्त न हो।

अलवर जिले में देवती माचेड़ी नाम के दो गाँव हैं। इन्हीं में से एक गाँव में साधारण बनियों के घर में हेमू का जन्म हुआ था। जिस समय वह विक्रमादित्य की उपाधि धारण कर अपने सिर पर चंवर ढुलवाता हुआ पानीपत की लड़ाई लड़ने गया तो वह अपना सारा धन अपने वृद्ध पिता के पास माचेड़ी के दुर्ग में छोड़ गया।

जिस दिल्लीधीश्वर के पास अपने समय की सबसे बड़ी हस्तिसेना थी, अपने समय का सबसे बड़ा तोपखाना था, जो अपने हाथियों को मक्खना खिलाता हुआ युद्ध के मैदान में पहुँचा था, उस राजा की सम्पत्ति का अनुमान लगा पाना सहज संभव नहीं है। यदि यह कहा जाये कि यक्षराज कुबेर का खजाना भी महाराज हेमचंद्र के खजाने के समक्ष क्या रहा होगा तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

बैराम खाँ ने सुना था कि हेमू की रानी भी युद्ध क्षेत्र में उपस्थित है और हेमू का सारा खजाना उसके पास है। जब महाराज हेमचंद्र पकडे़ गये तो उसने अपने आदमी रानी के पीछे भेजे किंतु लाख पैर पटकने पर भी रानी हाथ नहीं लगी। वह जाने किन पर्वतों में गुम हो गयी।

बैराम खाँ जानता था कि यदि हेमू का खजाना उसके हाथ लग जाये तो वह जीवन भर के लिये धन की तंगी से छुटकारा पा जायेगा। इसलिये उसने रानी का पीछा नहीं छोड़ा और नासिरुलमुल्क को देवती माचेड़ी पर आक्रमण करने भेजा। बैरामखाँ का अनुमान था कि रानी देवती माचेड़ी अवश्य जायेगी।

बैराम खाँ का अनुमान सही निकला। रानी पानीपत के मैदान से सीधी देवती माचेड़ी अपने श्वसुर के पास आयी और युद्ध के सब हाल उन्हें सुनाये। वृद्ध पिता को अपने प्रतिभाशाली पुत्र के इस भयानक अंत पर दुःख तो हुआ किंतु भाग्य का विधान समझ कर सिर पर हाथ धर कर बैठ गया। उसकी आँख से एक आँसू तक न निकला। उसकी निश्चलता को देखकर भ्रम होता था कि वह जीवित आदमी न होकर पत्थर की मूर्ति है। यहाँ तक कि वह अपनी शोक संतप्त पुत्रवधू को सांत्वना भी न दे सका।

रानी वीर भारतीय नारी थी। विपत्ति में धैर्य रखना जानती थी। काफी देर तक वह चुपचाप अपने निश्चल हो गये श्वसुर को देखती रही। जब उसे किसी अनिष्ट की आशंका हुई तो उसने वृद्ध श्वसुर को हिलाकर कहा- ‘पिताजी!’

वृद्ध ने सिर से हाथ हटा कर पुत्रवधू की ओर देखा।

– ‘पिताजी! महाराज का सारा कोष मुझे दे दें।’

– ‘जब राजा ही नहीं रहा तो रानी उस खजाने का क्या करेगी? क्या अब भी कोश में ममता शेष है?’ वृद्ध श्वसुर ने दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए कहा।

– ‘आप जानते हैं पिताजी कि कोष के प्रति मेरे मन में कभी भी ममता नहीं रही।’

– ‘तो फिर क्या बात है?’

– ‘मैं इस कोष को सुरक्षित रूप से कहीं छिपा देना चाहती हूँ।’

– ‘ क्यों?’

– ‘पिताजी! समझने का प्रयास करें। बैराम खाँ हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा। वह शीघ्र ही माचेड़ी पर आक्रमण करेगा। यदि महाराज का खजाना दुष्ट बैरामखाँ के हाथ लग गया तो हिन्दू जाति पर भयानक कहर टूट पड़ेगा। जिस प्रकार उसने हमारे ही तोपखाने से हमें मार डाला है, उसी प्रकार वह हमारे ही धन से अजेय बनकर सम्पूर्ण हिन्दू जाति को रौंद डालेगा।

– ‘किंतु पुत्री! तू इसे लेजाकर रखेगी कहाँ? एक न एक दिन तो बैराम खाँ इस कोष तक पहुँच ही जायेगा। इतनी सामर्थ्य आज सम्पूर्ण भारतवर्ष में किस के पास है जो बैरामखाँ का मार्ग रोक सके?’

– ‘मैं इसे ऐसे स्थान पर ले जाकर छिपाऊंगी कि बैराम खाँ कभी उस तक पहुँच ही न सके।’

– ‘इससे तो अधिक अच्छा होगा कि प्रजा से प्राप्त की गयी सम्पत्ति पुनः प्रजा को लौटा दी जाये। क्यों न इसे निर्धन लोगों में बाँट दिया जाये?’ वृद्ध आँखों में चमक लौट आयी।

– ‘यह ठीक है पिताजी कि राजा की सम्पत्ति प्रजा की ही होती है और जब राजा न रहा तो प्रजा को इसे पुनः प्राप्त करने का अधिकार है किंतु यदि हम इसे निर्धन लोगों में बांटेंगे तो उनकी विपत्ति और अधिक बढ़ जायेगी। बैराम खाँ उन पर भी आक्रमण करेगा और उनसे छीन लेगा।’

– ‘तो फिर तुम इसे कहाँ ले जाकर रखोगी?

– ‘मैं इसे घने जंगलों में छिपा दूंगी जहाँ से इसे कोई भी प्राप्त न कर सके।’

वृद्ध ने वीर पुत्रवधू की बात मान ली और कोशागार की तालिका उसे सौंप दी। रानी ने इससे पूर्व इस कोश को एक साथ नहीं देखा था। इस विपुल स्वर्ण भण्डार को देखकर उसकी आँखें चौंधिया गयीं। कोष में इतना सोना था कि उससे ठोस सोने का एक पूरा हाथी निर्मित किया जा सकता था। कोष से स्वर्ण को बाहर निकालते हुए क्षण भर के लिये उसे शोक अवश्य हुआ होगा कि यह विपुल स्वर्ण उसके लिये किसी काम का न था।

रानी ने समस्त स्वर्ण अपने हाथियों पर रखवाया और एक रात श्वसुर के चरणों की धूल माथे से लगाकर दुर्ग के गुप्त मार्ग से बाहर हो गयी। कोई न जान सका कि रानी कहाँ गयी।

कहते हैं कि रानी अलवर जिले में स्थित बीजवाड़े की पहाड़ियों में जाकर छिप गयी। उसने कई दिनों तक जंगलों में घूम-घूम कर सोने की ईंटें तथा स्वर्ण-आभूषण धरती में अलग-अलग स्थानों पर दबा दिये ताकि यदि बैराम खाँ सोने का पीछा करता हुआ बीजवाड़े की पहाड़ियों में आ भी पहुँचे तो भी उसे एक साथ सम्पूर्ण कोष कभी भी प्राप्त न हो।[1]

जब नासिरुलमुल्क ने देवती माचेड़ी के चारों ओर घेरा डाला तब तक रानी सारा स्वर्ण लेकर जा चुकी थी किंतु यह सारी कार्यवाही इतने गोपनीय ढंग से की गयी थी कि इस बात की खबर किसी को कानों कान भी नहीं हुई। नासिरुलमुल्क ने माचेड़ी की गढै़या पर जम कर बारूद बरसाया। महाराज हेमचंद्र के आदमी यहाँ भी बहादुरी से लड़े किंतु हजारों मुगल सैनिकों के सामने इन मुट्ठी भर आदमियों की सामर्थ्य ही क्या थी!

महाराज हेमचंद्र के पिता अस्सी साल की वृद्धावस्था में भी हथियार उठा कर लड़े। वे एक ऐसी सेना के नायक थे जिसका राजा पहले ही युद्ध में मारा जा चुका था किंतु फिर भी लड़ना उनका धर्म था, उसलिये वे तब तक लड़ते रहे जब तक कि नासिरुलमुल्क के सिपाहियों ने उन्हें पकड़ नहीं लिया।

नासिरुलमुल्क वृद्ध को जंजीरों में जकड़कर दिल्ली ले आया जहाँ बैराम खाँ ने उन्हें अकबर के समक्ष पेश किया- ‘बादशाह सलामत! यह बूढ़ा-शैतान काफिर हेमू का बाप है। लाख समझाने पर भी मुसलमान होने से इन्कार करता है। इसका क्या किया जाये?’ बैराम खाँ ने सिर झुकाकर पूछा।

– ‘जब पिता का राज्य पुत्र भोगता है तो पिता को भी पुत्र के अच्छे-बुरे का दण्ड भोगना चाहिये। हेमू हमारा दुश्मन था उस नाते से यह भी हमारा दुश्मन है। उचित तो यही है कि इस काफिर की गर्दन उड़ा दी जाये किंतु यदि यह अब भी इस्लाम कुबूल करता है तो इसे छोड़ दिया जाये।’ अकबर ने कहा।

– ‘बोल काफिर क्या कहता है?’ बैराम खाँ ने वृद्ध को ललकारा।

– ‘मैं अस्सी वर्ष से अपने धर्म में हूँ और अपने ईश्वर की पूजा करता हूँ। क्या केवल इसलिये मुसलमान बन जाऊं कि मुझे अपने प्राण संकट में दिखायी दे रहे हैं? तू यदि मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दे तब भी मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा। हमारे ऋषियों ने कहा है, स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मौ भयावह।’ वृद्ध ने जंजीर से जकड़ी हुई अपनी गर्दन ऊपर की।

 बैराम खाँ ने संकेत किया। मौलाना पीर मुहम्मद ने वृद्ध की गर्दन एक ही वार में उड़ा दी। इस अवसर पर बैराम खाँ ने अलवर और माचेड़ी से लूटा गया बहुत सा सोना और माचेड़ी से पकड़े गये पचास हाथी बादशाह की नजर किये। इसी के साथ महाराज हेमचंद्र का सम्पूर्ण वैभव, शौर्य और पराक्रम इतिहास के पन्नों में सदा-सदा के लिये खो गया।

-अध्याय 42, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] कई सालों तक राहगीरों को बीजवाड़ा की पहाड़ियों में सोने की ईंटें तथा मोहरें मिला करती थीं।

मस्त हाथी (43)

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मस्त हाथी

एक दिन शाम के समय बैराम खाँ यमुना में नौका विहार के लिये गया। जाने कैसे एक शाही हाथी बिगड़ गया और बैराम खाँ को कुचलने के लिये झपटा। बैराम खाँ किसी तरह मस्त हाथी से अपनी जान बचाकर लौट आया।

दिल्ली और उसके बाद आगरा भी मुगलों ने फिर से हासिल कर लिये किंतु मानकोट का जो दुर्ग वे खिज्र खाँ के भरोसे छोड़ आये थे वह अब तक नहीं जीता जा सका था। बैरामखाँ जानता था कि जब तक सिकन्दर सूर की कमर नहीं तोड़ दी जाती तब तक हिन्दुस्थान में मुगल साम्राज्य का प्रसार नहीं किया जा सकता। इसलिये बैरामखाँ ने मानकोट आक्रमण की योजना बनायी।

मानकोट का घेरा अकबर के जीवन का पहला युद्ध था जिसे परिस्थितियों के कारण अधूरा छोड़ देना पड़ा था। इसलिये उसने बैराम खाँ से कहा कि वह स्वयं मानकोट जीतना चाहता है और अधूरी जीत को पूरी किया चाहता है। बैरामखाँ ने अकबर को भी युद्ध में चलने की अनुमति दे दी।

बैराम खाँ को फिर से मानकोट पर चढ़कर आया देखकर सिकन्दर सूर ने बैराम खाँ के वकील नासिरुल्मुल्क के माध्यम से बहुत सारा धन और इनाम बैराम खाँ को भिजवाया और कहलवाया कि भले ही अदली का सेनापति हेमू मारा जा चुका हैं किंतु अदली खुद अभी भी जीवित है जो कि आपका और मेरा दोनों का दुश्मन है। वह बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। उसने बंगाल के हाकिम मुहम्मदखाँ को मार डाला है और अब मुहम्मदखाँ के बेटे जलाजुद्दीन पर चढ़ बैठा है। मैं अदली से लड़ने के लिये बिहार जाना चाहता हूँ। यदि आप मुझे बिहार जाने का रास्ता दे दे तो मैं मानकोट खाली करके चला जाऊंगा।

बैराम खाँ को सिकंदर सूर की बात जंच गयी। उसने अकबर को सिकन्दर सूर का प्रस्ताव मान लेने की सिफारिश की और समझाया कि यदि सिकन्दर सूर और अदली एक दूसरे से लड़कर कमजोर हो जाते हैं तो इसमें मुगलों का ही भला होगा और जो काम एक दिन अकबर को करना पड़ेगा, वह काम इन दोनों अफगान शैतानों की परस्पर लड़ाई से स्वतः सम्पन्न हो जायेगा।

अकबर ने बैराम खाँ की बात मान ली और सिकन्दर सूर को मानकोट खाली करके बिहार जाने की अनुमति दे दी। सिकन्दर सूर मानकोट दुर्ग की चाबियाँ और बहुत से हाथी अकबर की नजर करके बिहार को चला गया। जहाँ से साल भर बाद उसकी मृत्यु के समाचार ही आये। बिना किसी क्षति के मानकोट हाथ आ जाने की खुशी में मुगल सेना ने जश्न मनाया।

अकबर को उन दिनों हाथी लड़ाने का शौक चर्राया हुआ था। इसलिये उसने हाथियों की लड़ाई का आयोजन करवाया। बैराम खाँ उन दिनों बीमार था और फोड़े निकल आने से घोड़े पर नहीं चढ़ सकता था। इसलिये वह अपने डेरे में ही रहा और हाथियों की लड़ाई देखने नहीं गया। हाथियों को शराब पिलाकर मदहोश कर दिया गया और एक दूसरे पर हूल दिया गया।

शराब के मद में चूर हाथी अपनी सारी संजीदगी को भूलकर वहशी दरिंदों की तरह लड़े।  दो बादशाही हाथी तो मानो एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये। दोनों ही हाथी खास बादशाही अंगरक्षक दल के थे और अच्छा खाये-पिये हुए थे। इसलिये दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था। अंत में वे लड़ते-लड़ते मैदान से बाहर हो गये और बैरामखाँ के डेरे तक जा पहुँचे। उनके पीछे तमाशाई लोगों की भीड़ भी चीख-पुकार मचाती हुई आयी।

लोगों की चीखें सुनकर बैरामखाँ सतर्क हो गया और किसी तरह तम्बू से बाहर निकल कर उसने अपनी जान बचाई। जांघों में फोड़े होने से वह मुश्किल से ही बच पाया। किसी तरह उन मदमत्त हाथियों पर नियंत्रण किया गया।

अचानक हाथियों के चढ़ आने से बैराम खाँ के दिल में संदेह हो गया कि यह अकबर के आदेश से हुआ है। जब बैराम खाँ ने अपने आदमियों से सलाह मशविरा किया तो उन्होंने भी बैरामखाँ की हाँ में हाँ मिला दी। बैरामखाँ के सिर पर खून सवार हो गया किंतु उसने किसी तरह अपने आवेश पर नियंत्रण रखा और अपना एक आदमी माहम अनगा के पास भेज कर कहलवाया कि मैं अपना कुछ कसूर नहीं जानता हूँ और खैरख्वाहों के विरुद्ध भी कोई काम नहीं करता हूँ। फिर कैसे चुगलखोरों ने मुझे गुनहगार करके बादशाही की इतनी बड़ी नामिहरबानी करा दी है कि मस्त हाथी मेरी चादर पर छोड़े जाते हैं?

बैराम खाँ के शब्द क्या थे! सुलगते हुए शोले थे जिन की आँच महसूस कर माहम अनगा कांप उठी। वह खुद चादर ओढ़कर मिजाजपुर्सी के लिये बैरामखाँ के डेरे में हाजिर हुई। घंटों तक चिकनी चुपड़ी बातें करके उसने बैरामखाँ का मिजाज ठण्डा किया।

बैराम खाँ ने कहा कि बदजात हाथी उसे सौंप दिये जायें। जब माहम अनगा ने बैराम खाँ की मांग के बारे में बताया तो अकबर खुद भी बैराम खाँ के डेरे पर आया। उसने बैरामखाँ को समझाया कि हाथी शराब के नशे में थे और अचानक ही लड़ते हुए इस ओर आ निकले थे। इसमें किसी तरह का षड़यंत्र नहीं था लेकिन बैरामखाँ अपनी जिद्द पर अड़ा रहा।

हार कर अकबर ने दोनों हाथी बैराम खाँ के डेरे पर भिजवा दिये। बैराम खाँ ने हाथियों को तो कुछ नहीं कहा किंतु उनके महावतों को जम कर पिटवाया। अकबर अपनी आँखों से यह दृश्य देखता रहा। उसके बेकसूर महावत पिटते रहे और बादशाह होते हुए भी वह कुछ नहीं कर सका।

यह बात अभी शांत हुई भी न थी कि फिर से एक अनहोनी घट गयी। एक दिन शाम के समय बैराम खाँ यमुना में नौका विहार के लिये गया। जाने कैसे एक शाही हाथी बिगड़ गया और बैराम खाँ को कुचलने के लिये झपटा। बैराम खाँ किसी तरह मस्त हाथी से अपनी जान बचाकर लौट आया।

जब अकबर को यह बात पता चली तो उसने मस्त हाथी को महावत सहित बैराम खाँ के पास भिजवा दिया। बैराम खाँ ने महावत की खाल खिंचवा ली। अकबर चुप रहा। बैराम खाँ ने उसी दिन अकबर के शिक्षक मुल्ला पीर मोहम्मद को नौकरी से अलग कर दिया। अकबर इस पर भी चुप रहा। इसके बाद बैराम खाँ ने बादशाही हाथियों का मुआयना किया और बहुत से हाथी अपने आदमियों में बांट दिये। इनमें से अधिकांश हाथी वही थे जिन्हें बैराम खाँ ने हरहाने, सरहिन्द, पानीपत और देवती माचेड़ी के मोर्चों से पकड़ा था। अकबर इस बार भी चुपचाप देखते रह जाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सका।

-अध्याय 43, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

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