Home Blog Page 191

खीरा सिर से काटिये (127)

0

खानखाना के बेटे दाराबखाँ की पुत्री नूरजहाँ के भाई आसिफखाँ के बेटे शायस्ताखाँ को ब्याही गयी थी। चूंकि दाराबखाँ और दाराबखाँ के बेटे को महावतखाँ ने मार डाला था इसलिये खानखाना की यह पौत्री महावतखाँ से बड़ी क्रुद्ध रहा करती थी। महावतखाँ का कोई भी परिचित आदमी जब भी उससे मिलता तो वह एक ही बात कहा करती थी कि जिस दिन मुझे महावतखाँ दिखेगा, उसे मैं बन्दूक से मार दूंगी।

जब बाबा अब्दुर्रहीम खानखाना की पदवी ठुकराकर चित्रकूट में जा बैठा तो दाराबखाँ की बेटी को बड़ी चिंता हुई। उसे लगा कि महावतखाँ को दण्ड देने का अवसर हाथ से निकला जा रहा है। खानखाना के अतिरिक्त किसी और में महावतखाँ को दण्डित करने की सामर्थ्य नहीं थी। जब उसने सुना कि महावतखाँ बादशाह को कैद करके काबुल ले गया है और उसने खानखाना को चुनौती दी है कि यहाँ आकर बादशाह को छुड़ा लेवे तो वह स्वयं अपने बाबा के पास चित्रकूट गयी ताकि अपने पितामह को इस कार्य के लिये तैयार कर सके।

खानखाना ने अपनी पौत्री का स्वागत तो किया किंतु उसके आने का उद्देश्य जानकर वह दुविधा में पड़ गया। उसे बादशाह के अपहरण किये जाने का समाचार  पहले ही मिल गया था किंतु वह अपने आप को यह चुनौती स्वीकार करने में असमर्थ जानकर चुप लगा गया था। पौत्री के हठ ने उसे फिर से सोचने पर विवश कर दिया था।

– ‘बाबा हुजूर! आप ही ने हमें सिखाया था कि खीरा मुख से काटिये मलिये नमक लगाय। रहिमन कड़ुए मुखन को चहिये यही सजाय। क्या महावतखाँ के अपराध कड़ुए खीरे से भी कम हैं? उसका मुख काटकर उसमें नमक कौन भरेगा? आपके पुत्रों में से कोई जीवित न रहा। नहीं तो मैं इस काम के लिये उनके सामने दामन फैलाती। आप ही इस खानदान की डूबती हुई नैया के खेवनहार हैं। इस समय यदि आपने कोई उद्यम नहीं किया तो बैरामखाँ का वंश हमेशा के लिये डूब जायेगा। यदि आपने इस बार बादशाह को छुड़ा लिया तो आपका बचा-खुचा वंश पेट पालने के लिये किसी का मोहताज नहीं रहेगा।’

बेटी जाना भी इसी पक्ष में थी कि जीवन के इस पड़ाव पर भी खानखाना को खानदान के भविष्य के लिये उद्यम करना चाहिये। इस सब सोच-विचार के बाद खानखाना ने अपने लिये घोड़ा मंगावाया और उसकी जीन कस कर उस पर सवार होते हुए बोला- ‘सर सूखे पंछी उड़े, और कहीं ठहरायं। कच्छ-मच्छ बिन पच्छ के कह रहीम कहँ जायं?’[1]

बेटी जाना ने बूढ़े बाप को एक हाथ में नंगी तलवार घुमाते हुए और दूसरे हाथ से घोड़े की लगाम खींचते हुए देखा तो आँखों में आँसू भरकर बोली- ‘याद रखना बाबा। खीरा मुख से काटिये मलिये नमक लगाय। रहिमन कड़ुए मुखन को चहिये यही सजाय।’ अपनी बात पूरी करते करते जाना फफक-फफक कर रो पड़ी। कौन जाने यह चेहरा फिर से दिखायी भी दे या नहीं।

जाना को रोते देखकर खानखाना ने घोड़े को ऐंड़ लगाते हुए कहा-

‘रहिमन मैन तुरंग चढ़ि चलिबो पावक माँहि।

प्रेमपंथ ऐसा कठिन सबसों निबहत नाँहि। ‘[2]

जाना जानती थी कि अब खानखाना वह पुराना वाला खानखाना न था जिसके घोड़े पर सवार होते ही शत्रुओं की छाती फट जाती थी ओर उनके मस्तिष्क की नसें काम करना बंद कर देती थीं। उसकी आयु बीत गयी थी। उसके आदमी बिखर गये थे। उसकी फौज नष्ट हो गयी थी। उसके बेटे काल के मुँह में समा गये थे।

उसके सिर पर हुमा का पंख नहीं था। उसके चंवर और छत्र जाने कहाँ चले गये थे! अब तो भग्न हृदय, जर्जर देह और श्वेत केश ही उसके हिस्से में थे। उस पर भी मुसीबत यह कि बादशाह महावतखाँ की कैद में था और नूरजहाँ बेबस। ऐसे में महावतखाँ पर विजय हासिल करना आकाश में कुसुम खिलाने जैसा ही था किंतु यह कमजोर खानखाना भी बेटी जाना की दृष्टि में धन्य था जो पोती के अनुरोध पर असाध्य को भी साधने के लिये उठ खड़ा हुआ था।

जो खुर्रम हिन्दुस्तान का शंहशाह होने का ख्वाब देखते न थकता था, वह अपने बाप पर मुसबीत आई देखकर ठठ्ठे को भाग खड़ा हुआ था, जो परवेज हिन्दुस्थान का तख्त पाने के लिये दाराबखाँ का सिर काटने में जरा भी देर करने को तैयार नहीं था, वही परवेज अपने बाप पर मुसबीत आई जानकर दक्षिण से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा। उन्हीं खुर्रम और परवेज के बाप को महावतखाँ की कैद से छुड़ाने के लिये बूढ़ा खानखाना फिर से तुरंग पर सवार हुआ।

चित्रकूट से चलकर खानखाना सीधा आगरा आया। उसके आदमी और कबूतर आज भी उन्हीं गलियों, कूँचों, बारामदों और बाजारों में डटे हुए थे। उसने अपने खबरचियों और कबूतरों के जरिये अपने जानने वालों और बादशाह के शुभेच्छुओं को सूचना भिजवाई कि वह सेना लेकर काबुल जा रहा है, जिसे भी बादशाह को छुड़वाने के लिये चलना हो, उसके पास आ जाये।

जिसने भी यह संदेश पाया, उसे विश्वास नहीं हुआ। खानखाना फिर से घोड़े पर बैठकर बादशाह को छुड़ाने के लिये काबुल जा रहा था! देखते ही देखते लोग जुड़ने लगे। बात की बात में हजारों युवक खानखाना की हवेली के सामने इकठ्ठे होने लगे। सब कुछ सपने जैसा था किंतु सब अपनी आँखों से उस सपने को घटित होता हुआ देख रहे थे। खानखाना ने कुछ ही दिनों में विशाल सेना खड़ी कर ली और उसने काबुल की ओर कूच किया।

खानखाना को फिर से मैदान में आया देखकर खुर्रम हिन्दुस्थान छोड़कर ईरान भागने की तैयारी करने लगा लेकिन जब दक्षिण से समाचार आया कि परवेज मर गया तो खुर्रम ने ईरान जाने का निश्चय त्यागकर गुजरात के रास्ते दक्षिण को चले जाने की तैयारी की किंतु बूंदी नरेश राव रतनसिंह ने मौका पाकर बुरहानपुर में खुर्रम को गिरफ्तार कर लिया।

बाबर के वंशजों के लिये वक्त एक दिन इतना बेरहम हो जायेगा, इसकी तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। बादशाह महावतखाँ की कैद में था तो शहजादा खुर्रम राव रतनसिंह के शिकंजे में। यह अलग बात थी कि सियासत की चतुर खिलाड़ी नूरजहाँ को लगा कि उसकी योजनाओं के फलीभूत होने का समय आ गया। अब वह बेखटके अपने जंवाई शहरयार को बादशाह बना सकती थी।

-अध्याय 127, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  तालाब के सूखने पर पक्षी उड़कर दूर चले जाते हैं किंतु कछुओं और मछलियों के पंख नहीं होते, वे तो उसी सूखे सरोवर का साथ निभाते हैं।

[2] घोड़े पर सवार होकर आग के भीतर चलना, ऐसी कठिन राह सबसे नहीं निभती। यह राह एक जलन है, दूसरी ओर बड़ी फिसलन। एक ओर चींटी के भी पैर फिसल जाते हैं और संसार में लोग हैं कि उस पर स्वार्थ रूपी बोझ लादकर ले जाना चाहते हैं।

बेरहम वक्त (128)

0

– ‘इस कुतिया के बच्चे को कह कि हुक्का भर कर लाये नहीं तो मार-मार कर चमड़ी उधेड़ दूंगा।’ शराब के नशे में धुत्त कुंवर हरिसिंह ने चिल्लाकर कहा तो खुर्रम की रूह कांप गयी। हुक्का लाने वाली दासी भी कुंवर का यह रौद्र रूप देखकर सहम गयी।

ऐसा घनघोर अपमान! खुर्रम तो स्वप्न में भी इस स्थिति की कल्पना नहीं कर सकता था कि उसके इशारों पर नाचने वाले एक अदने से राव का लड़का एक दिन उसके साथ ऐसा दुर्व्यवहार करेगा।

– ‘कमबख्त, जुबान को लगाम दे नहीं तो………।’ खुर्रम गुर्राया।

– ‘नहीं तो क्या? क्या करेगा तू?’ खाल खिंचवा लेगा?’ कुंवर हरिसिंह ने घूंसा तान कर पूरे जोर से खुर्रम की नाक पर दे मारा। खुर्रम की आँखों में लाल-पीले सितारे से झिलमिला आये। वह कराह कर नीचे बैठ गया। उसकी नाक से रक्त बहने लगा था।

दासी ने कुंवर का यह रूप देखा तो हुक्का शहजादे की ओर बढ़ा दिया- ‘शहजादे के लिये उचित यही है कि कुंअरजू जो कहते हैं, आप वही करें।’

खुर्रम ने दासी के हाथ से हुक्का ले लिया। इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचा था। किसी तरह खड़ा होकर वह डेरे से बाहर आया। उसके कदम अपमान और चोट से लड़खड़ा रहे थे। दासी मशाल लेकर उसके पीछे चली।

खुर्रम ने बाहर आकर देखा कि एक तरफ बड़े से घेरे में अंगारे दहक रहे हैं जिनका लाल प्रकाश चारों तरफ फैला हुआ है। इससे पहले खुर्रम ने कभी अंगारों को इतने ध्यान से नहीं देखा था। उसका जी हुआ कि हरिसिंह को बालों से पकड़ कर घसीटता हुआ लाये और इन अंगारों में झौंक दे।

पहले के से दिन होते तो खुर्रम निस्संदेह यही करता किंतु भाग्य ने वे दिन खुर्रम से छीन लिये थे। शहजादा होते हुए भी अब वह शहजादा नहीं था, बादशाह द्वारा घोषित भगोड़ा था जिसे बादशाह के सेनापतियों ने पकड़ लिया था। यह एक अलग बात थी कि बादशाह स्वयं इन दिनों महावतखाँ की कैद में था।

तो क्या महावतखाँ भी बादशाह हुजूर के साथ यही बर्ताव कर रहा होगा! यह विचार मन में आते ही खुर्रम की रही-सही हिम्मत भी पस्त हो गयी। उसने किसी तरह चीमटे से अंगारे उठाकर हुक्के में डाले और डेरे के भीतर चला गया। उसका मन हुआ कि वह हरिसिंह के पैरों में अपना सिर रख कर कहे कि उसे छोड़ दे और चलकर महावतखाँ पर आक्रमण करे नहीं तो महावतखाँ बादशाह हुजूर को मार डालेगा।

कुंवर हरिसिंह क्रोध से आँखें चढ़ाये बैठा था। उसके भय से खुर्रम के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला। उसने चुपचाप हुक्का हरिसिंह के सामने रख दिया।

– ‘चल पैर दबा।’ हरिसिंह ने अपने दोनों पैर ढोलिये[1]  पर लम्बे कर दिये।

खुर्रम तिलमिला कर रह गया किंतु बाहर से वह शांत ही बना रहा। उसने किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं की। खुर्रम को अपनी जगह से न हिलते देखकर कुंवर हरिसिंह का क्रोध फिर से भड़क गया।

– ‘अरे गोले ![2] तुझे सुनाई नहीं देता क्या?’

– वक्त से डर हरिसिंह। मैं तेरा गुलाम नहीं हूँ। तैमूरी खानदान का मुगल शहजादा हूँ, खुदा ने चाहा तो मैं एक दिन हिन्दुस्थान के तख्त पर बैठूंगा। मुझसे गुलामों की तरह सेवा लेते हुए तुझे लज्जा नहीं आती?’

– ‘तो जनाब अब भी हिन्दुस्थान के तख्त पर बैठने का सपना पाले हुए हैं।’ कुंवर हरिसिंह ने हुक्के की नली मुँह से निकालते हुए कहा।

– ‘वक्त की चाल बड़ी बेरहम होती है हरिसिंह। कौन जाने कल क्या हो?’

– ‘कल जो होगा, वो न तुझे पता है और न मुझे किंतु आज जो होगा, वो केवल मुझे पता है। जानना चाहता है कि आज क्या होगा?’

खुर्रम ने हरिसिंह की बात का कोई जवाब नहीं दिया।

– ‘अच्छा-अच्छा। तू नहीं जानना चाहता तो मत पूछ। मैं ही तुझे बताये देता हूँ कि आज क्या होगा!’ अपनी बात कहते-कहते हरिसिंह नशे के कारण हांफने लगा। एक क्षण को विराम लेकर उसने हुक्के का कश खींचा और मुँह से नली निकाल कर बोला- ‘आज जब मैं डावड़ियों[3]  का मुजरा देखूंगा तो तू मेरे पैर दबायेगा और पंखा लेकर मेरी हवा करेगा। तू मेरी गिलास में शराब भरेगा और मेरी चिलम पकड़ कर खड़ा रहेगा। और जो तू ऐसा नहीं करेगा तो मैं डावड़ियों के साथ तुझसे भी मुजरा करवाऊंगा।’

खुर्रम के जीवन में इतनी खराब शाम अब से पहले कभी नहीं आयी थी। परिस्थिति के आगे वह लाचार था। मुजरा न करना पड़े इसलिये उसने किसी तरह का प्रतिरोध नहीं किया। वह चुपचाप वही करता चला गया, जो भी कुछ भी करने को उससे कहा गया।

खुर्रम वक्त की इस बेरहमी पर हैरान था किंतु कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं था। कई दिनों तक यह तमाशा चलता रहा। जब यह बात राव रतनसिंह को मालूम हुई तो उसने कुंवर हरिसिंह को बुला कर बहुत बुरा-भला कहा और यह कहकर शहजादे को मुक्त कर दिया कि जब इसे गिरफ्तार करने वाला बादशाह खुद ही अपने मातहतों की कैद में है तो इसे कैद में रखने का क्या लाभ है!

कुंवर हरिसिंह की कैद से छूटकर खुर्रम सिर पर पैर रखकर ठठ्ठे की ओर ऐसे भागा मानो साक्षात मौत ही पीछे लगी हुई हो। उसका विचार ठठ्ठे से नीचे उतर कर सिंध होते हुए गुजरात की ओर जाने का था। वह कतई नहीं चाहता था कि हरिसिंह के शिकंजे से निकलने के बाद वह अब्दुर्रहीम के शिकंजे में जा फंसे।

-अध्याय 128, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] बड़ी चारपाई।

[2] गुलाम।

[3] नृत्यांगनाओं।

काला साया (129)

0

बदजात महावतखाँ बादशाह से कोई दुर्व्यवहार तो नहीं करता था किंतु उसने बादशाह पर ढेर सारी पाबंदियाँ लाद दी थीं जो किसी दुर्व्यवहार से कम नहीं थीं। बिना महावतखाँ की इजाजत के कोई परिंदा तक बादशाह के पास पर नहीं मार सकता था।

उसे सुबह-शाम दो सेर शराब और आधा सेर कबाब दिया जाता था। न तो वह हवा खोरी के लिये अपने डेरे से बाहर निकल सकता था और न घोड़े पर सवार हो सकता था। बादशाह से उसकी तलवार भी छीन ली गयी थी तथा उसे किसी से भी बात करने की इजाजत नहीं थी।

इन पाबंदियों में जकड़ा हुआ जहाँगीर बुरी तरह छटपटाता था। उसे रह-रह कर वे दिन याद आते थे जब वह अपने मरहूम बाप जलालुद्दीन अकबर के आदेश से राजा शालिवाहन की देखरेख में हमाम में कैद कर दिया गया था। अपने स्वभाव के विपरीत जहाँगीर उद्यम करने को तैयार था किंतु वहाँ से छूट भागने का उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ता था। उसके चारों ओर इतना कड़ा पहरा था कि बिना किसी बाहरी मदद के भाग निकलने की संभावना तक दिखायी नहीं देती थी।

एक दिन जहाँगीर ने पहरेदारों के मुँह से सुना कि खानखाना अब्दुर्रहीम अपना चित्रकूट प्रवास त्याग कर फिर से आगरा आ गया है और महावतखाँ से लड़ने के लिये सेना तैयार कर रहा है। बादशाह को अंधेरे में आशा की एक क्षीण किरण दिखायी दी। जहाँगीर को पक्का विश्वास था कि यदि नूरजहाँ को इस समय खानखाना की सेवाएं मिल गयीं तो जहाँगीर की रिहायी संभव है।

जहाँगीर नहीं जानता था कि जिस नूरजहाँ को वह मलिका ए आलम कहते हुए नहीं थकता था, वह तो जहाँगीर की ओर से बेफिक्र होकर अपनी जंवाई शहरयार को बादशाह बनाने की तैयारियों में जुट गयी थी और खानखाना अभी अपनी मंजिल से बहुत दूर था। जहाँगीर दिन रात नूरजहाँ और खानखाना की सम्मिलित सेना के आने की राह देखता था किंतु इंतजार था कि खत्म होने में ही नहीं आता था। न तो नूरजहाँ आती थी और न खानखाना की सेना के आगरा से कूच करने का समाचार आता था।

वह हर सुबह उम्मीद का नया उजाला देखने की चाह में उठता था और हर शाम नाउम्मीदी के अंधेरे में जा धंसता था। धीरे-धीरे जहाँगीर की नाउम्मीदी बढ़ती ही जाती थी। यहाँ तक कि उसका खाना-पीना भी छूटने लगा।

एक रात महावतखाँ के डेरे में ईरान से लायी गयी रक्कासाओं  का मुजरा आयोजित किया गया। ईरानी रक्कासाओं[1] के आने की खुशी में बड़ा जश्न हुआ। मनों शराब पानी की तरह बही। हजारों अशर्फियाँ खील-बताशों की तरह हवा में उछाली गयीं। हर ओर मौज-मस्ती का आलम था। पहरेदारों को भी मुफ्त की शराब मिली तो उन्होंने भी छक कर पी ली। आधी रात होते-होते तो आलम यह हो गया कि हर कोई शराब के नशे में चूर होकर लुढ़क गया।

मैदान साफ था। बादशाह पर निगाह रखने वाला कोई भी पहरेदार अपने होश में न था। जहाँगीर ने अपना भाग्य सराहा और अच्छा मौका जानकर डेरे से भाग निकला।

डेरे से बाहर आते ही उसका कलेजा धक से रह गया। अंधेर में निकल कर आये किसी काले साये ने उसकी कलाई पकड़ ली थी। जहाँगीर को लगा कि अब तक का सारा उद्यम व्यर्थ गया। उसने यह पूछने के लिये होंठ खोलने चाहे कि किस गुस्ताख ने बादशाह का हाथ पकड़ने की हिमाकत की है किंतु उससे पहले ही साया फुसफुसा कर बोला- ‘उस ओर नहीं हुजूर, इस ओर।’

जहाँगीर को यह आवाज बहुत जानी पहचानी लगी किंतु वह पहचान न सका कि यह कौन हो सकता है? फिर भी उसने अनुमान किया कि जो कोई भी हो, यह है मित्र ही। वह चुपचाप काले साये के साथ चलने लगा। थोड़ी दूर चलते ही एक पेड़ के नीचे दो घोड़े बंधे हुए मिले। पास ही कुछ और साये घोड़ों पर सवार थे।

काले साये ने बादशाह को एक घोड़े पर सवार करवाया और स्वयं दूसरे घोड़े पर सवार हो गया। काले साये के सवार होते ही घोड़े हवा से बातें करने लगे। लगभग दो घड़ी तक घोड़ा दौड़ाने के बाद काले साये ने अपने घोड़े की रफ्तार कम की। बादशाह को घोड़े पर दो घड़ी तक तेज रफ्तार करने का अभ्यास नहीं था, वह बुरी तरह हांफ रहा था।

जब घोड़े बिल्कुल रुक गये तो काला साया अपने घोड़े से उतर कर बादशाह के घोड़े के पास आया और सिर झुकाकर बोला-

– ‘ बादशाह सलामत को गुलाब अब्दुर्रहीम का सलाम कुबूल हो।’

अब्दुर्रहीम का नाम सुनते ही बादशाह की नसों में रक्त का प्रवाह तेज हो गया। उसने घोड़े से उतर कर खानखाना को गले से लगा लिया।

– ‘खानबाबा! आखिर आपने यह करिश्मा कर ही दिखाया।’ बादशाह ने भावविभोर होकर कहा।

– ‘यह करिश्मा मेरा नहीं है आलीजाह! वह तो मेरी उन रक्कासाओं का कमाल है जो महावतखाँ के डेरे में बेधड़क घुस गयीं।’

– इस मुबारक मौके पर हम सबसे पहले मलिका ए आलम नूरजहाँ का मुबारक मुँह देखना चाहते हैं।’

– ‘बादशाह सलामत की इच्छा हर हाल में पूरी की जायेगी।’ खानखाना फिर से घोड़े पर सवार होते हुए बोला।

-अध्याय 129, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] नृत्यांगनाओं।

फिर से दक्खिन (130)

0

नूरजहाँ ने जहाँगीर को आया देखकर सिर पीट लिया किंतु बाहर से उसने बड़ी प्रसन्नता जाहिर की और बादशाह का स्वागत किया। अगली रात नूरजहाँ के डेरों में बड़ा भारी जलसा किया गया। जलसे में ईरान से आयी हुई उन खूबसूरत रक्कासाओं के ऊपर अशर्फियाँ उछाली गयीं किंतु बादशाही आदेश से इस जलसे में किसी को शराब नहीं परोसी गयी।

जहाँगीर अब फिर बादशाह था। अपनी मर्जी का मालिक था, अपने नौकरों को फिर से हुक्म देने का अधिकारी था। फिर भी वह महावतखाँ से सीधे-सीधे लड़ने की स्थिति में नहीं था। उसने महावतखाँ से कहलवाया कि यदि अपनी सलामती चाहता है तो आसिफखाँ को छोड़ दे और ठठ्ठे में जाकर खुर्रम पर चढ़ाई करे। महावतखाँ हुक्म न मानने में अपनी भलाई न देखकर अपना सिर पीटता हुआ ठठ्ठे को चल दिया।

लाहौर पहुँच कर जहाँगीर ने बड़े दरबार का आयोजन किया। तख्त के आधे हिस्से पर जहाँगीर बैठा और आधे हिस्से पर मलिका ए आलम नूरजहाँ आसीन हुई। इस दरबार में खानखाना फिर से उसी स्थान पर खड़ा हुआ जिस स्थान पर वह अकबर के जमाने में खड़ा होता था। खानखाना के पीछे उसके विश्वस्त सेवक खड़े हुए। खानखाना को विशाल लश्कर के साथ फिर से अपने सामने देखकर जहाँगीर को रुलाई आ गयी। वह भरे दरबार में बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोया।

– ‘बादशाह सलामत! अपने गुलामों के होते हुए अपना जी छोटा न करें।’ खानखाना ने तसल्ली देते हुए कहा।

– ‘मैं अपने गुलामों में तेरे जैसे नमक हलाल और महावतखाँ जैसे नमक हराम को देखकर रो रहा हूँ। तू मुझे रोने दे खानखाना! मैं इसी योग्य हूँ।’

बहुत देर रो लेने के बाद जब जहाँगीर सामान्य हुआ तो उसने खानखाना के सामने झोली फैलाकर कहा- ‘जा, मेरे अतालीक जा। महावतखाँ का सिर ले आ। जा मेेरे खानखाना जा, मेरे दुश्मनों का सिर ले आ। जा मेरे बाप जा, नूरजहाँ का दिल दुखाने वालों का सिर ले आ।’

खानखाना को अपने ऊपर चढ़कर आया देखकर महावतखाँ की हालत पतली हो गयी। वह खुर्रम की तरह ईरान भागने की नहीं सोच सकता था। खुर्रम की जड़ें तो फिर भी ईरान में अपने लिये मिट्टी तलाश सकती थीं किंतु महावतखाँ को तो हिन्दुस्थान की मिट्टी के अलावा कहीं भी आसरा नहीं था।

पहले तो महावतखाँ ने खानखाना का सामना करने का विचार किया किंतु वह जानता था कि इस बार जो खानखाना उस पर चढ़कर आया है, वह बादशाह की नजरों से गिरा हुआ, भगोड़ा, विद्रोही घोषित किया गया खानखाना नहीं है। उसकी म्यान में बादशाह की तलवार है। उसकी आँखों में अपने बेटों और पोतों के कत्ल का खून है। उसके दिल में अपने अपमान की ज्वाला भड़क रही है। अब वह निरा निरीह खानखाना नहीं है जिसके आगे अकेला फहीम खड़ा हो। इस बार वह मुगलों की समस्त ताकत समेट कर आया है। भले ही एक दिन महावतखाँ नूरजहाँ के जबड़ों में से बादशाह को उड़ा ले जाने का हौंसला रखता था किंतु खानखाना की ताकत का सामना करने का साहस महावतखाँ में नहीं था

मौका पाते ही खानखाना ने महावतखाँ को घेर लिया। महावतखाँ बड़े बेमन से खानखाना का सामना करने को तैयार हुआ किंतु खानखाना ने उसमें कसकर मार लगाई। जबर्दस्त शिकस्त खाकर महावतखाँ ने सिंध से गुजरात की ओर उतरना आरंभ किया। खानखाना उसे दबाता चला गया और महावतखाँ निरतंर नीचे की ओर खिसकता गया। महावतखाँ की योजना थी कि यदि वह किसी तरह खुर्रम के पास पहुँच जाये तो उसे भी युद्ध का नैतिक आधार प्राप्त हो जाये।

यही कारण था कि महावतखाँ निरंतर दक्षिण की ओर भाग रहा था। जब वह गुजरात से भी नीचे उतरने लगा तो उसकी योजना खानखाना की समझ में आ गयी। अब उसका प्रयास था कि किसी तरह दक्खिन में प्रवेश करने से पहले ही वह महावतखाँ को घेर ले ताकि उसे खुर्रम और महावतखाँ की सम्मिलित ताकत का सामना न करना पड़े।

-अध्याय 130, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

दुखती रग (131)

0

महावतखाँ लड़ता कम था और भागता अधिक था। उधर खानखाना लड़ना तो चाहता था किंतु किसी मैदान में अच्छी तरह मोर्चा बांधकर। इस कारण दोनों ही सेनाएं छुट-पुट लड़ाईयाँ ही करती थीं। जब दक्खिन बहुत कम दूरी पर रह गया तब खानखाना ने पूरी ताकत के साथ महावतखाँ पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। जब वह अपने सेनानायकों के साथ विचार-विमर्श करके हमले की अंतिम योजना बना रहा था, उसी समय दिल्ली का संदेशवाहक बादशाह की चिट्ठी लेकर खानखाना की सेवा में हाजिर हुआ।

बादशाह की चिट्ठी पाकर खानखाना के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं। बादशाह ने लिखा था कि इधर कुछ ऐसी बातें हो गयी हैं कि खानखाना को मोर्चा उठाकर तुरंत दिल्ली हाजिर होना चाहिये। यदि खानखाना रोटी मोर्चे पर खावे तो पानी दिल्ली में आकर पिये।

जाने ऐसी क्या मुसीबत आन पड़ी थी जो खानखाना को अपनी पूरी सेना सहित तुरंत दिल्ली तलब किया गया था! दिल्ली तलब किये जाने के पीछे कारण चाहे जो भी रहा हो किंतु खानखाना को मन मार कर फिर से दिल्ली लौटना पड़ा।

ताबड़तोड़ चलता हुआ खानखाना बादशाह के पास पहुँचा। बीमार तो वह लाहौर से ही हो गया था किंतु इस भागमभाग में वह और अधिक बीमार हो गया। फिर भी किसी तरह अपनी जर्जर देह को समेट कर वह बादशाह के सामने उपस्थित हुआ।

खानखाना को देखकर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ। बार-बार खानखाना के कंधे चूमते हुए बादशाह ने कहा- ‘मेरे अतालीक!’ जाने क्यों लगता है कि मेरा अंत आ पहुँचा! मैं चाहता हूँ कि अब जब तक मैं जीवित हूँ आप मेरे पास ही रहें। मुझे छोड़कर कहीं न जायें।’

खानखाना बादशाह की बात सुनकर हैरान रह गया। क्या केवल इसीलिये खानखाना को वह मोर्चा उठाकर दिल्ली तलब किया गया था! ऐसा संभव नहीं था। खानखाना जहाँगीर की प्रकृति को पहचानता था। अवश्य ही इसके पीछे कोई सियासी कारण है किंतु बादशाह खुलकर नहीं कह रहा।

– ‘शंहशाहे आलम! गुलाम ने जीवन के बहत्तर बसंत देखे हैं और गुलाम पेड़ों की पत्तियों का रंग देखकर बता सकता है कि इस समय कौन सी ऋतु चल रही है। आप निःसंकोच होकर गुलाम पर भरोसा करें।’

खानखाना ने कह तो दिया किंतु वह नहीं जानता था कि उसने बादशाह की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। बादशाह ने लम्बी साँस लेकर कहा- ‘मैं जानता हूँ कि आप मोर्चा उठा लेने का असली कारण जानना चाहते हैं किंतु मुझे नहीं मालूम कि मैंने ठीक किया या गलत!’

– ‘बादशाह सलामत जो भी फैसला करेंगे, सल्तनत और रियाया की भलाई के लिये ही करेंगे। यदि कुछ बातों की जानकारी मुझे हो तो मैं भी अपनी ओर से कुछ अर्ज कर सकता हूँ।’

– ‘खानखाना! मैं नहीं जानता कि जीवन का सफल होना क्या होता है किंतु मैं इतना अंदाज जरूर लगा सकता हूँ कि मेरा जीवन असफलताओं की जीती जागती कहानी है।’

– ‘मामूली परेशानियों से अपना दिल तंग न करें बादशाह सलामत। मुझे बतायें कि आपकी परेशानी का असली सबब क्या है?’

– ‘खानखाना! जब मैंने तुमको महावतखाँ का सिर काट कर लाने के लिये भेजा तो मुझे अचानक ही अपने पैरों की जमीन खिसकती हुई दिखाई दी। मुझे हरम में बड़ा भारी षड़यंत्र होता हुआ दिखाई दिया। मलिका नूरजहाँ स्वयं इस षड़यंत्र का ताना-बाना बुन रही थीं। वे चाहती हैं कि किसी तरह तुम्हारे हाथों महावतखाँ के साथ-साथ शहजादा खुर्रम भी मारा जाये। इसलिये मलिका नूरजहाँ ने अपने मोहरे उसी तरह खेलने शुरू किये।’

खानखाना को बादशाह से यह सूचना पाकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

– ‘इतना ही नहीं। मलिका ए आलम नूरजहाँ तो यह भी चाहती हैं कि उनका अपना भाई आसिफखाँ जो महावतखाँ की कैद में है, वह भी तुम्हारे हाथों मारा जाये। और यह भी कि इस दौरान यदि आप भी लड़ाई में काम आ सकें तो अच्छा रहे। हमें उसी दिन मालूम हो सका कि परवेज और खुर्रम के बीच जंग का बीज मलिका नूरजहाँ ने ही बोया था।

अब जबकि शहजादा परवेज नहीं रहा है, नूरजहाँ खून की वही होली खुर्रम और शहरयार के बीच खेलना चाहती है। यद्यपि खुर्रम ओर शहरयार दोनों ही मेरे बेटे हैं किंतु आसिफखाँ अपने जवांई खुर्रम को और नूरजहाँ अपने जंवाई शहरयार को दिल्ली के तख्त पर बैठाने के लिये अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं।

इस सबका परिणाम यह है कि सल्तनत के विश्वस्त सिपाही एक-एक करके मौत के मुँह में जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में आपको इन दोनों के बीच पीस डालने का कोई अर्थ नहीं था। इससे तो बेहतर तो यही है कि शहजादा खुर्रम और मलिका नूरजहाँ आपस में ही लड़कर निबट लें।’

बादशाह अपनी बात पूरी करते-करते हाँफने लगा। खानखाना चुपचाप बादशाह को सलाम करके बाहर निकल आया।

-अध्याय 131, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

अद्भुत बालक (132)

0

जेठ का महीना है और सूर्यदेव आकाश के ठीक मध्य में विराजमान हैं। सन-सनाती लू से परिपूर्ण आकाश में धूल के तप्त कण घुल जाने से जब वायु कानों में घुसती है तो लगता है किसी ने पिघला हुआ सीसा उंडेल दिया है। ऐसी विकट गर्मी में मनुष्यों और पशुओं की कौन कहे, चिड़ियों तक के जाये भी घोंसलों में दुबक कर बैठे हैं। राह-पंथ सब रिक्त हैं। किसान भी सब काम धाम छोड़कर पेड़ों के नीचे आकर सिमट गये हैं। गर्मी से देह को झुलसने से बचाने के लिये वे बार-बार गीले कपड़े से देह पौंछ रहे हैं।

ऐसे में उन्होंने एक विचित्र दृश्य देखा उन्होंने देखा कि एक कीमती और ऊँचे घोड़े पर सवार एक वृद्ध खान तेजी से घोड़ा फैंकता हुआ आया और उनके पास रुककर उनसे वृन्दावन जाने का मार्ग पूछने लगा। खान के कीमती वस्त्र करीलों के झुण्ड में उलझ-उलझ कर तार-तार हो गये हैं। उसकी कीमती पगड़ी बेतरतीब हो गयी है जिससे उसकी सघन श्वेत अलकावली माथे पर झूल आयी है। खान के चित्त की दशा कुछ ऐसी है कि कपड़ों की ही तरह उसे अपनी देह का भी कोई भान नहीं है। स्थान-स्थान पर करील ओर बबूल के काँटों ने त्वचा को खरौंच डाला है। गर्मी में लगातार दौड़ते रहने के कारण घोड़े के मुँह से फेन बह रहा है।

दिखने में वह कोई आला दर्जे का सिपाही लगता था किंतु उसकी अस्त-व्यस्त दाढ़ी, पगड़ी और फटे हुए कपड़े उसके चित्त में विक्षेप होने का बखान कर रहे थे। किसानों ने उसे वृंदावन जाने का मार्ग तो बताया किंतु साथ ही यह अनुरोध भी किया कि वह इस लू में घोड़े की यात्रा न करके कुछ देर पेड़ के नीचे विश्राम कर ले। जब सूरज ढल जाये तो वह वृंदावन चला जाये किंतु खान ने उनकी बात नहीं सुनी। वृंदावन को जाने वाला मार्ग जानते ही खान ने अपने घोड़े को ऐंड़ लगाई और आगे बढ़ गया।

बहुत देर तक किसान उस विचित्र वृद्ध के बारे में बतियाते रहे। किसानों का अनुमान काफी हद तक ठीक ही था। खान के चित्त की दशा खराब नहीं थी तो ऐसी भी नहीं थी कि उसे ठीक कहा जा सके।

खान घोड़े पर अकेला ही सवार था किंतु जाने किससे वार्तालाप करता हुआ जा रहा था। वह बार-बार कहता था कि किसी तरह एक बार वृंदावन पहुंच जाऊँ। उन्हें एक बार देख भर पाऊँ। आज मैं उन्हें अवश्य ही कुछ भेंट चढ़ाऊँगा किंतु क्या भेंट चढ़ाऊँगा? वे तो स्वयं ही रत्नाकर में रहते हैं और खुद लक्ष्मी उनकी गृहणी है, सब कुछ तो उनके पास है। फिर क्या उन्हें चढ़ाऊँ? बस उनका मन उनके पास नहीं है। वह राधाजी ने ले लिया है। आज मैं अपने परमात्मा को अपना मन ही चढ़ाऊँगा ताकि वे मन वाले हो जायें और वे मेरी सुधि लें।[1]

जब खान वृंदावन में गोविंददेव के मंदिर तक पहुँचा तो मंदिर के मुख्य कपाट बंद थे। यह भगवान के विश्राम का समय था। खान ने मंदिर के सामने पहुंचकर घोड़ा तो यमुना के किनारे एक पेड़ से बांध दिया और स्वयं मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचकर मंदिर के सेवकों से कपाट खोलने का अनुरोध करने लगा।

– ‘आपको किससे काम है, महंतजी से?’ मंदिर के सेवकों ने पूछा

– ‘महंतजी से नहीं, गोविंददेवजी से।’ खान ने जवाब दिया।

– ‘आप तो खान हैं, आपको भला उनसे क्या काम है?’

– ‘बहुत जरूरी काम है, आप समय व्यर्थ न करें। कपाट खोलें। समय निकला जा रहा है।’

– ‘किसका समय निकला जा रहा है?’ सेवकों ने पूछा।

– ‘महाराज! मेरे और गोविंददेवजी के मिलने का समय निकला जा रहा है। शीघ्रता कीजिये। कपाट खोलिये।’

– ‘लेकिन यह समय तो भगवान के विश्राम का है। संध्या काल में आना, तभी कपाट खुलेंगे।’

– ‘नहीं-नहीं संध्या काल में नहीं। आप देखते नहीं कि मुझे गोविंददेवजी को बहुत जरूरी चीज देनी है?’

– ‘क्या जरूरी चीज देनी है?’

– ‘नहीं-नहीं। वह मैं आपको नहीं बता सकता। आप कृपा करके कपाट खोलिये।’

– ‘अच्छा! आप यहीं ठहरिये महंतजी से पूछना पड़ेगा।’

खान चिलचिलाती दुपहरी में वहीं धरती पर बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। गर्मी से उसकी त्वचा पर छाले पड़ गये। सेवकों ने उसकी यह दशा देखी तो वे दौड़े-दौड़े महंतजी के पास गये- ‘महाराज! एक विक्षिप्त और वृद्ध खान आया है और मंदिर के कपाट खोलने की जिद्द कर रहा है। अभी इसी समय।’

– ‘क्या चाहता है? कौन है?’

– ‘महाराज, यह तो वह नहीं बताता कि कौन है। विक्षिप्त जैसा लगता है। कभी कहता है कि गोविंददेव से मिलने का समय निकला जा रहा है और कभी कहता है कि गोविंददेव को कुछ जरूरी चीज देनी है।’

– ‘यदि वह विक्षिप्त है तो उसे भगाओ वहाँ से और यदि विक्षिप्त नहीं है तो जानने का प्रयास करो कि वह वास्तव में कौन है और क्या चाहता है?’ महंतजी ने ऊंघते हुए कहा। महंतजी अपने विश्राम में किसी तरह का खलल नहीं चाहते थे।

– ‘महाराज! वह चिचिलाती धूप में मंदिर के दरवाजे के सामने बैठा रो रहा है।’

– ‘तो रोने दो उसे। थोड़ी देर में चला जायेगा।’

सेवकों ने फिर से मुख्य द्वार पर आकर देखा, खान उसी तरह बैठा हुआ रो रहा था। सेवकों को लौट आया देखकर वह पुनः खड़ा हो गया- ‘पूछ आये महंतजी से? अब तो खोलो कपाट।’

सेवक उसकी बात का जवाब न देकर चुपचाप लौटने लगे। कपाट खुलते न देखकर खान और भी अधीर हो गया। उसने वहीं खड़े होकर जोर जोर से गाना आरंभ किया-

कमल –  दल      नैननि     की      उनमानि ।

बिसरत  नाहिं  सखी मो मन ते मंद  मंद  मुसकानि।।

यह दसननि दुति  चपला हूँ ते महा  चपल  चमकानि।

वसुधा  की  सबकरी  मधुरता  सुधा   पगी  बतरानि।

चढ़ी  रहे चित  उर बिसाल की  मुकुलमाल  थहरानि।

नृत्य समय  पीतांबर हू  की  फहरि  फहरि  फहरानि।

अनुदित  श्री वृंदावन  ब्रज  वे  आवन आवन  जानि।

अब रहीम चित्त ते न टरति है सकल स्याम की बानि।।

जाने क्या था खान के शब्दों में कि सेवक वहीं ठहर कर सुनने लगे। अचानक उन्होंने देखा कि मंदिर के कपाट स्वतः खुलने लगे और एक बालक बाहर आया। उसने खान का हाथ पकड़ कर पूछा- ‘क्यों रहीम! क्यों रोते हो?’

– ‘कोई मुझे भीतर नहीं जाने देता।’

– ‘क्या करोगे भीतर जाकर? मैं तो यहीं आ गया।’ बालक ने खान का हाथ थाम कर कहा।

– ‘तुम कौन हो?’

– ‘मुझे नहीं जानते?’

– ‘नहीं!’

– ‘मैं तुम्हारा गोविंददेव।’

– ‘अच्छा बताओ तो मैं आपके लिये क्या लाया हूँ?’ खान ने पूछा।

– ‘तुम मुझे अपना मन देने लाये थे, मैंने तुम्हारा मन ले लिया। अब और क्या काम है?’ बालक ने मुस्कुरा कर पूछा।

– ‘प्रसाद चाहिये।’

– ‘ये लो, प्रसाद भी लो और अब जाओ वापिस।’ बालक ने अपनी मुठ्ठी में से खान को प्रसाद दिया।

– ‘मैं ऐसे नहीं जाऊँगा।’

– ‘तो फिर कैसे जाओगे?’

– ‘तुम्हें छिपा कर जाऊँगा।’

– ‘क्यों? छिपा कर क्यों?’

– ‘ताकि कोई तुम्हें देख नहीं सके।’

– ‘तुम मुझे कहाँ छुपाओगे रहीम? जहाँ भी छुपाओगे कोई न कोई ढूंढ ही लेगा।’

– ‘एक जगह है मेरे पास, वहाँ आपको कोई नहीं ढूंढ सकेगा।’

– ‘कौनसी जगह है?’

– ‘मेरे हृदय में बहुत अंधेरा है नाथ। आप वहाँ छिपकर रहिये। आप को वहाँ कोई भी नहीं ढूंढ सकेगा।

नवनीतसार मपह्यत्य शंकया स्वीकृतं यदि पलायनं त्वया।

मानसे  मम  घनान्धतामसे  नन्दनन्दन कथे न लीयसे।’

खान फिर से रो-रो कर गाने लगा।

– ‘अच्छा तो ठीक है मैं तुम्हारे हृदय में छुप कर रहूंगा। देखो, किसी को बता न देना।’

– ‘नहीं नाथ! मैं किसी को नहीं बताऊँगा।’

– ‘अच्छा, अब यहाँ से चलें! यह महंतजी के विश्राम का समय है।’

मंदिर के सेवकों ने जब यह दृश्य देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। उन्होंने दौड़कर महंतजी को सारा किस्सा बताया। महंतजी शैय्या त्याग कर खड़ाऊँ की खट्-खट् करते हुए जब तक द्वार पर आये तब तक द्वार पर कोई नहीं रह गया था। न खान और न प्रसाद देने वाला बालक।[2]

-अध्याय 132, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  रत्नाकरोऽस्ति सदनं गृहिणी च पद्मा

   किं देयमस्ति भवते जगदीश्वराय।

   राधागृहीतमनसे मनसे च तुभ्यं

   दत्तं मया निजमनस्तदिदं गृहाण।।- खानखाना कृत।

[2]  विद्या निवास मिश्र रहीम र्गंथावली की भूमिका में इस घटना का उल्लेख किया गया है।

बेहोशी (133)

0

आज पूरे चार दिन बाद रहीम की बेहोशी टूटी थी। जाने कहाँ-कहाँ से ढूंढ कर लायी थी जाना उसे। तीन दिनों की भागम भाग के बाद खानखाना दिल्ली के बाहर जंगलों में बेसुध पड़ा हुआ मिला था।

– ‘बेटी जाना!’

– ‘हाँ अब्बा हुजूर।’

– ‘देखो तो कमरे में कितना अंधेरा घिर आया है, जरा रौशनी करो बेटी।’  खानखाना ने छटपटा कर कहा।

आज पूरे चार दिन बाद रहीम की बेहोशी टूटी थी। जाने कहाँ-कहाँ से ढूंढ कर लायी थी जाना उसे। तीन दिनों की भागम भाग के बाद खानखाना दिल्ली के बाहर जंगलों में बेसुध पड़ा हुआ मिला था। तब से हकीम का इलाज चल रहा था किंतु उसकी बेहोशी टूटती ही नहीं थी। आज अचानक शाम के समय खानखाना ने आँखें खोलीं।

– ‘यह शमां आपके पलंग के पास ही रौशन है पिताजी।’ जाना वृद्ध पिता की यह दशा देखकर चौंक पड़ी।

– ‘हाँ-हाँ! यह शमां और यह फानूस भी तो रौशन है। जाने क्यों मुझे दिखायी नहीं दिया लेकिन वह कहाँ गया?’

– ‘वह कौन अब्बा हुजूर?’

– ‘वह जो बालक बन कर मेरे साथ खेल रहा था?’

– ‘कौन अब्बा हुजूर, कौन खेल रहा था बालक बनकर?’

– ‘अरे वही, मधुसूदन! देवकी नंदन…………..!’ अचानक ही खानखाना अपनी बात अधूरी छोड़कर छत की ओर देखकर चिल्ला उठता है- ‘मेरी ओर देखो परमात्मन्! हे कृपा निधान! फिर से बोलो दयानिधान! मुझे इस तरह जंगल में छोड़कर कहाँ जा छिपे हो? कब से तो आपको ढूंढ रहा हूँ!’ खानखाना ने अत्यंत बेचैन होकर कहा तो जाना बाप के सीने पर झुक कर उसकी मालिश करने लगी। खानखाना बेहोश हो गया।

कुछ ही देर में खानखाना को फिर होश आया। उसने देखा कि न तो जंगल है और न करील के वे विशाल कुंज। मुरली मनोहर का कोई पता नहीं है। जाने कब तक वह बूढे़ रहीम के साथ आँख-मिचौनी खेलता रहा था और अचानक ही जाने कहाँ जाकर गायब हो गया था। मुरली मनोहर के स्थान पर जाना उसके पास थी।

– ‘जाना!’

– ‘हाँ अब्बा हुजूर।’

– ‘हम कहाँ हैं बेटी?’

– ‘आप बाबा हुजूर बैरामखाँ वाली हवेली में हैं।’

– ‘हम यहाँ कब आये?’

– ‘आप आये नहीं अब्बा हुजूर! आपको लाया गया है।’

– ‘कब?’

– ‘आज हवेली में आये हुए आपको चार दिन हो गये।’

– ‘हम कहाँ थे?’

– ‘आप दिल्ली के बाहर जंगलों में बेहोश पड़े हुए थे। आप वहाँ क्यों गये थे अब्बा हुजूर?’

– ‘वही तो हम सोच रहे हैं बेटी कि वह हमें मथुरा से दिल्ली की सरहद तक तो लाया किंतु जंगल में ही छोड़कर गायब क्यों हो गया?’

– ‘कौन कहाँ पहुँचा कर गायब हो गया?’

– ‘तू नहीं जानेगी।’

– ‘कुछ तो बताइये अब्बा हुजूर, आप अचानक कहाँ चले गये थे और फिर पूरे तीन दिन बाद आप जंगल में बेहोशी की हालत में क्यों मिले? किसने की आपकी ऐसी दशा?’

– ‘कुछ खाने को दो जाना। बहुत भूख लग रही है। उसने हमें भगा-भगा कर थका ही डाला।’ खानखाना ने जाना की बातों का उत्तर न देकर कहा।

जाना खानखाना के लिये कुछ खाने को लाने के लिये चली गयी। जब वह अपने हाथों में समां के चावल और दूध लेकर लौटी तो उसने देखा वृद्ध पिता फिर से बेसुध हो गया है। उसने चावल एक ओर रखकर अपना माथा पीट लिया।

-अध्याय 133, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

उड़ गया चातक (134)

0

खानखाना की चेतना लौटी। उसने देखा हवेली पूरी तरह निस्तब्ध है। कहीं से कोई शब्द नहीं। बेटी जाना बाप के पलंग पर ही कंधा रखकर सो गयी है। शमां की रौशनी तेल खत्म हो जाने से अपने अंतिम क्षण गिन रही है जिससे कमरे में अंधेरा छाता जा रहा है।

पूरी रात खानखाना सुधि और बेसुधि के पारावार में हिचकोले खाता रहा है। जब होश आता है तो जाना, जाना चिल्लाता है और जब बेसुधि में हिचकोले खाता है तो हे मुरली मनोहर! हे गिरधारी! चिल्लाता है।

जब खानाखाना कुछ खाने को मांगकर फिर से बेसुध हो गया था, जाना उसी समय समझ गयी थी कि अब कुछ ही समय का खेल शेष है। रंगमंच का खिलाड़ी अपने हिस्से का अभिनय समाप्त करके फिर से नेपथ्य में जाने को उतावला है। जिस्मानी रौशनी फिर से आस्मानी रौशनी में शाया होना चाहती है।

– ‘हे मुरली मनोहर! हे गिरधारी! इस ओर निहारो बनवारी!’ खानखाना चिल्ला उठा।

जाना की नींद खुल गयी। उसने देखा, वृद्ध पिता के दोनों हाथ आकाश की ओर उठे हुए हैं-

‘हे देवकी नन्दन। माधव मुरारी! मैं आपका गुलाम हूँ। सम्पूर्ण जगत से ठुकराया गया, दीन, हीन, मलीन  और राह का भिखारी हूँ। केशव! आपकी आज्ञा से मैंने जीवन के रंगमंच पर कौन-कौन भूमिकाएं नहीं कीं! मैंने कौन-कौन स्वांग नहीं धरे! हे वनमाली! हे मधूसूदन श्रीकृष्ण! अगर मेरे इस स्वांग और अभिनय से आपका कुछ भी मनोरंजन हुआ हो तो उसके पुरस्कार स्वरूप मुझे अब और अभिनय करने से मुक्ति दे दो। अगर आपको मेरा कोई स्वांग अच्छा नहीं लगा हो तो ऐसा आदेश दो कि मैं फिर कोई स्वांग न करूँ, मेरे स्वांग करने पर ही आप रोक लगा दें, मैं सहज हो जाऊँ।[1] मुझसे यह अदम्य पीड़ा सही नहीं जाती। आप अपने दासों की कठोर परीक्षा न लें प्रभु!’

– ‘मैं जानता हूँ प्रभु! एक न एक दिन आप मेरी सुनेंगे। आपने अंधे सूरदास की भी तो सुनी लेकिन उसे आपने कितना रुलाया! हे नाथ! मेरे मित्र तुलसीबाबा का तो पूरा जीवन ही मुसीबतों का घर बन कर रह गया।’

– ‘हे प्रभु! अब मैं भी खूब सारा रो तो लिया! और कितना रोऊँ! अधिक रो सकने की मेरी सामृथ्य नहीं है प्रभु! अपनी शरण में ले लो प्रभु। मैंने तेरे दासों को रोते हुए ही देखा प्रभु! वह तेरा गुलाम तुलसी! कितना रोया वह? उसकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी।’

  – ‘पायँपीर पेटपीर  बाँहपीर  मुँहपीर, 

जर जर  सकल  सरीर  पीर  मई  है।

देव भूत पितर करम खल  काल ग्रह, 

मोहि पर  दवरि  दमानक  सी  दई  है।

हौं तो बिन मोल के बिकानो बलि बारेही तें,

ओट रामनाम की ललाट लिख लई है।

कुंभज के  किंकर बिकल बूड़े गोखुरनि, 

हाय रामराय ऐसी हाल कहूँ भई है?[2] 

– ‘मेरी यह पीड़ा दूर करो नाथ। बहुत हो चुका प्रभु! अब इस लीला को समेटो। क्यों बालकों की तरह दूर खड़े तमाशा देखते हो? मैं तो चींटी की तरह मर जाऊंगा। अपने नेत्र उघाड़ो नाथ! क्यों मेरा उपहास करवाते हो?’

जाना वृद्ध पिता के इस आत्मालाप को चुपचाप सुनती रही। उसने देखा कि पिता फिर से बेहोश हो गया। इस बार उसका सिर पलंग पर था और पैर फर्श पर थे। जाना ने पिता के पैर सीधे करके पलंग पर रख दिये और शमां में तेल डालने लगी।

थोड़ी ही देर में खानखाना की चेतना फिर से लौटी। वह चिल्लाता हुआ उठ बैठा- ‘मियाँ रसखान! अरे रस की खान! फिर से गाओ तो वह गान! कहाँ है तुम्हारी सुरीली तान!’ खानखाना गाने लगा-

सेस महेस,  गनेस दिनेस,  सुरेसहु जाहि  निरंतर   ध्यावैं।

जाहि अनादि अनंत  अखंड, अछेद, अभेद,  सुबेद  बतावैं।

नारद से सुक व्यास रहैं, पचि हारे तऊ पुनि  पार न पावैं।

ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।’[3]

खानखाना उठ कर नाचने लगा। उसकी आँखें लाल थीं और होठों पर सफेद पपड़ी जमी हुई थी।

पिता की यह दशा देखकर जाना की छाती भर आयी। खानखाना नाचते-नाचते क्षण भर के लिये रुका फिर अस्फुट स्वर में गाने लगा- ‘ हरि मुख किधौं मोहिनी माई। बोलत बचन मंत्र सो लागत गति मति जात भुलाई।[4] ……..अरी मोहे भवन भयानक लागे माई[5] ………छवि आवत मोहनलाल की……….।[6]  मुखड़े छोटे होने लगे। श्वांस अवरुद्ध होने लगी। आँखें मुंदने लगीं। फिर अचानक खानखाना ने पूरे नेत्र खोले, स्वर पूर्णतः स्पष्ट हो गया। उसने भरपूर दृष्टि जाना पर डाली और फिर से गाने लगा-

‘कबहुँक  खग  मृग  मीन कबहुँ मर्कटतनु  धरि  कै।

कबहुँक  सुन-नर-असुर-नाग-मय  आकृति  करि कै।

नटवत्  लख  चौरासि  स्वाँग  धरि-धरि  मैं  आयो।

हे    त्रिभुवन नाथ!    रीझ  को  कछु  न   पायो।

जो हो प्रसन्न तो देहु  अब  मुकति दान माँगहु बिहँस

जो पै उदास तो कहहु इम मत धरु रे नर स्वाँग अस।’[7]

पद पूरा होते होते खानखाना धरती पर गिर गया। उसने एक लम्बी हिचकी ली और प्रेम का प्यासा हुमा पंछी सदैव के लिये प्रीतम मुरली मनोहर के पास खेलने के लिये चला गया। जाना चीख कर पिता की छाती पर गिर पड़ी।

-अध्याय 134, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] अनीता नटवन्मया तवपुरः श्रीकृष्ण। या भूमिका

   व्योमाकाश खखाम्बराब्धिवसवस्त्वत्प्रीतयेद्यावधि।

   प्रीतस्त्वं यदि चेन्निरीक्ष्य भगवन् स्वप्रार्थित देहि मे

  नो चेद् ब्रूहि कदापि मानय पुनस्त्वेतादृशीं भूमिकाम्।।

                                                  – खानखाना कृत।

[2] यह पद गोस्वामी तुलसीदास रचित हनुमान बाहुक का है। जिसका अर्थ है- पाँव की पीड़ा, पेट की पीड़ा, बाहु की पीड़ा और मुख की पीड़ा- सारा शरीर पीड़ामय होकर जीर्ण-शीर्ण हो गया है। देवता, प्रेत, पितर, कर्म, काल और दुष्टग्रह, सब एक साथ ही आक्रमण करके तोप की सी बाड़ दे रहे हैं। बलि जाता हूँ। मैं तो लड़कपन से ही आपके हाथ बिना मोल बिका हुआ हूँ और अपने कपाल में रामनाम का आधार लिख लिया है। हाय राजा रामचंद्रजी! कहीं ऐसी दशा भी हुई है कि अगस्त्य मुनि का सेवक गाय के खुर में डूब गया हो?

[3] रसखानकृत।

[4] सूरदास कृत।

[5] सूरदास कृत।

[6] खानखाना कृत।

[7] खानखाना कृत।

उच्छवास (135)

0

मैं इस उपन्यास की भूमिका में लिख आया हूँ- ”उस युग में एक सिपाही का कवि हो जाना कितनी बड़ी बात थी इसका अनुमान लगा पाना आज की परिस्थितियों में संभव नहीं है।” उपन्यास के पूरा हो जाने पर मैं उच्छवास के रूप मेंइस वक्तव्य में कुछ और भी जोड़ना चाहता हूँ।

उस युग में भारत में वैष्णवी संत परम्परा में अद्भुत संत प्रकट हुए जिनमें भक्त कुल शिरोमणी वल्लभाचार्य, संत सूरदास, गोस्वामी तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, भक्त रैदास, भक्त मीरांबाई, स्वामी हरिदास आदि अनेकानेक नाम लिये जा सकते हैं। ये समस्त भक्त रहीमदास के समकालिक थे अथवा कुछ ही वर्ष आगे पीछे हुए थे।

इन उत्कृष्ट संतो की इतनी बड़ी सूची देखकर आश्चर्य नहीं होता। आश्चर्य यह देखकर भी नहीं होता कि उस युग में बहुत से मुसलमानों का कृष्ण भक्ति की तरफ प्रवृत्त हो जाना असामान्य बात होकर भी सहज सुलभ थी। आश्चर्य तो इस बात को देखकर होता है कि आज के युग में वह बात उतनी सुलभ नहीं रही है। कारण श्री माधव ही जानें।

मैंने इस उपन्यास के लिये संदर्भ सामग्री जुटाने के प्रयास में मुसलमानों में कृष्णभक्ति परम्परा की पर्याप्त चौड़ी धारा के दर्शन किये हैं। उस धारा में रहीम, रसखान, रज्जब, दरियाशाह, दरियाबजी, लालदास, लतीफशाह, गरीबदास, वाजिन्द, वषनाजी, शेख भीखन, रसलीन, दाराशिकोह, सरमद साहब, साल बेग और कारे बेग से लेकर ताज बीबी, और चाँदबीबी जैसी सैंकड़ों नदियाँ आकर गिरती थीं।

जलालुद्दीन वसाली तो रामभक्ति करने के लिये मुल्तान छोड़कर अयोध्या आ बसे थे। उस युग में रहीमदास की उपस्थिति सचमुच ही भारत वर्ष के लिये गर्व की बात थी।  भारत भूमि पर कृष्ण भक्ति की यह निर्मल, शीतल और शांतिदायक धारा जीवित रहती तो निश्चय ही भारत भूमि का कण-कण प्रेम, विनय और पारस्परिक सद्भाव के सुवासित जल से गह-गह कर महक उठता, जिसकी सुगंध पड़ौसी देशों ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व को भी शांति का मार्ग दिखाती।

मौर्य काल में भगवान बुद्ध के संदेशों ने प्रेम और अहिंसा की बयार से पूरी दुनिया को शांति दी। भगवान श्रीकृष्ण की गौसेवा एवं महावीर स्वामी के उपदेशों ने भारत भूमि से पशुहिंसा का ताण्डव रोकने में जो अद्भुत काम किया, वह बिना धर्म के संभव ही नहीं था। किंतु हाय रे भारत भूमि! दुर्भाग्य हमारा पीछा क्यों नहीं छोड़ता!

वर्तमान युग में श्री कृष्ण भक्ति के स्थान पर धर्म निरपेक्षता के नाम पर एक दूषित विचारधारा प्रवाहित हो रही है। रहीम तो धर्मनिरपेक्ष नहीं थे! रहीम के साथ ही सम्पूर्ण भूमण्डल पर कोटि-कोटि प्रातः स्मरणीय जन हुए हैं जो धर्मनिरपेक्ष नहीं थे। वास्तविकता तो यह है कि किसी भी युग में हमें धर्मनिरपेक्षता की नहीं अपितु धार्मिक सद्भाव की आवश्यता है। धर्मनिरपेक्षता ढिंढोरा पीटने वालों के लिए रहीम का एक दोहा स्मरण हो आता है-

”आप न काहू काम के, डार पात फल फूल।

औरन को रोकत फिरैं, रहिमन पेड़ बबूल।।”[1]

यदि भारत अपने आप को फिर से जगद्गुरू के पद पद प्रतिष्ठित देखना चाहता है तो उसे धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा से बाहर निकलकर, धार्मिक सद्भाव स्थापित करना होगा। धर्म का प्रकाश ही आज की अंतहीन समस्याओं का एकमात्र समाधान है। नैतिकता का बल ही समाज से अपराधों को कम और आदमी के लालच को नियंत्रत कर सकता है। धर्म के नाम पर होने वाली पोंगापंथी का विरोध होना चाहिए न कि स्वयं धर्म का। अपनी बात रहीम के ही एक दोहे से समाप्त करता हूँ-

”यह न रहीम सराहिये लेन-देन की प्रीत।

प्रानन बाजी राखिये, हारि होय  के जीत।”[2]

-अध्याय 135, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] स्वयं तो बबूल के पेड़ की तरह किसी काम के हैं नहीं। न तो शाखायें अच्छी हैं, न पत्ते किसी काम के हैं और न ही पुष्प किसी काम के हैं। केवल कांटों के बल पर अपनी राह पर चलते पथिक को रोकने का ही काम करते हैं।

[2] लेन देन का प्रेम सराहने योग्य नहीं होता। प्रेम में तो प्राणों की बाजी लगानी पड़ती है, भले ही हार हो अथवा जीत।

प्रस्तावना – चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

0
प्रस्तावना - चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती - www.bharatkaitihas.com
प्रस्तावना - चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

प्रस्तावना – चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ई-बुक की पृष्ठभूमि को स्पष्ट किया गया है।

बहुत से लोग सूफीवाद को इस्लाम का एक रूप मानते हैं तथा सूफियों को मुसलमान मानते हैं किंतु सूफीवाद का उदय इस्लाम के विरुद्ध एक वैचारिक क्रांति के रूप में हुआ। इस्लमा में सूफीवाद की मान्यताओं के लिए कोई स्थान नहीं है। यह बात सही है कि भारत में सूफीवाद ने इस्लाम के साथ प्रवेश किया तथा सूफियों ने भारत में इस्लाम का प्रचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई किंतु वस्तुतः सूफीवाद और इस्लाम एक-दूसरे के विरोधी हैं।

विद्वानों की मान्यता है कि सूफी सम्प्रदाय रहस्यवादी उपासना पद्धति है जिसका जन्म तो स्वतन्त्र रूप से हुआ किंतु उसने विश्व के लगभग समस्त प्रमुख धार्मिक मतों से रहस्यवादी दर्शन को ग्रहण करके सार्वभौमिक स्वरूप ग्रहण किया। उस पर भारतीय वेदान्त तथा बौद्ध धर्म का प्रभाव है तो यूनान के अफलातून (अरस्तू) के मत का भी उतना ही प्रभाव है।

मसीही धर्म से भी उसने बहुत कुछ लिया है तो पैगम्बर मुहम्मद ने भी उस पर अपनी छाप छोड़ी है। इन सारे धर्मों में जो कुछ भी रहस्यमयी उपासना पद्धतियां थीं उन सबको सूफियों ने ग्रहण करके अपने लिये एक ऐसे अद्भुत दर्शन की रचना की जो अपने आप में बेजोड़ है।

मध्य एशिया की शामी जातियों के कबीलों की गोद में इस सम्प्रदाय ने जन्म लिया तथा प्रेम के बोल बोलते हुए और अपनी मस्ती में  नाचते-गाते हुए यह सम्प्रदाय पूरी दुनिया में फैल गया। सूफी सम्प्रदाय के भीतर भी बहुत से सम्प्रदाय हो गये जिनमें से 14 सम्प्रदाय भारत में आये।

इनमें से भी चार सम्प्रदयों ने भारत में विशेष प्रभाव जमाया। इन चारों में से भी चिश्तिया सम्प्रदाय अपने आप में अनेक कारणों से महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। बारहवी शताब्दी में इसी चिश्तिया सम्प्रदाय के ख्चाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का भारत में आगमन हुआ।

इस पुस्तक में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के जीवन की संक्षिप्त जानकारी के साथ-साथ उनकी शिक्षाओं का उल्लेख किया गया है। उस युग के इतिहास, दर्शन तथा समाजशास्त्र को इस पुस्तक में पर्याप्त स्थान दिया गया है। आशा है यह पुस्तक पाठकों के लिये बहु-उपयोगी सिद्ध होगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...