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सब भाड़ में (124)

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रहीम ने भाड़ में घास झौंकते हुए रीवां नरेश को जवाब दिया कि जिस रहीम के सिर पर विशाल मुगलिया सल्तनत का भार था उस रहीम ने सल्तनत का भार सब भाड़ में झौंक दिया है।

रीवां नरेश की आँखें फटी की फटी रह गयीं। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि जो दृश्य वे अपनी आँखों से देख रहे हैं वह सत्य भी हो सकता है! उन्होंने देखा कि ठीक अब्दुर्रहीम के जैसा दिखने वाला एक खान भाड़ झौंक रहा था। क्या यह सचमुच अब्दुर्रहीम ही है!

रीवां नरेश आज ही चित्रकूट आये थे और इस समय अपने आदमियों के साथ मंदाकिनी के किनारों की हरियाली देखने के लिये निकले थे। उन्होंने सुना तो था कि इन दिनों अब्दुर्रहीम चित्रकूट में है किंतु वह इस दशा में होगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

एक दिन रीवां नरेश ने जिस अब्दुर्रहीम के संकेत मात्र पर हजारों योद्धओं को प्राण न्यौछावर करते देखा था, आज वही अब्दुर्रहीम नितांत एकाकी हो इस तरह जीवन यापन कर रहा था! एक दिन हिन्दुस्थान का बड़े से बड़ा आदमी जिसकी जय-जयकार से आकाश गंुजा देता था, आज वही अब्दुर्रहीम अपना समस्त वैभव खोकर नीच आदमी का दास हो गया था! एक दिन जिस अब्दुर्रहीम को दोनों हाथों में तलवार लेकर रण में बिजली गिराते हुए देखा था, वही अब्दुर्रहीम आज अपने दोनों हाथों से भाड़ झौंक रहा था!

बहुत से पुराने चित्र स्मृतियों के आगार से निकल कर रीवां नरेश की आँखों के समक्ष जीवति हो उठे। कहाँ वह वैभव और कहाँ यह दैन्य? नहीं! यह अब्दुर्रहीम नहीं हो सकता! किंतु अपनी आंखों का वे क्या करें? दिखने में तो यह अब्दुर्रहीम जैसा ही है।

रीवां नरेश घोड़े से उतर गये। मन की बेचैनी बढ़ गयी। कैसे पूछा जाये? कहीं सचमुख अब्दुर्रहीम ही हुआ तो! और यदि नहीं हुआ तो! दोनों ही स्थितियों में पूछना उचित नहीं। काफी देर सोच विचार के बाद रीवां नरेश को एक उपाय सूझ गया। वे भाड़ झौंकने वाले खान के ठीक पास जाकर खड़े हो गये। खान अपने काम में लगा रहा। जैसे कि उसने किसी को अपने पास आकर खड़े होते हुए देखा ही नहीं। रीवां नरेश की बेचैनी और भी बढ़ गयी। जब किसी तरह भी रहा न गया तो अवसर पाकर धीरे से बोले-

‘जाके सिर अस भार, सो कस झौंकत भार अस?’[1]

रीवां नरेश की आशा के विपरीत खान ने भाड़ में सूखी घास झौंकते हुए उत्तर दिया-

‘रहिमन उतरे पार, भार झौंकि सब भार में।’[2]

  – ‘अब्दुर्रहीम! मेरे मित्र!’ रीवां नरेश ने लपक कर खान को गले लगा लिया।

खान ने धीरे से अपने आप को छुड़ाते हुए कहा-

‘ये रहीम दर दर फिरैं मांगि मधुकरी खाहिं,

यारों यारी छांड़ दो वे रहीम  अब  नाहिं।’[3]

  – ‘किंतु अब्दुर्रहीम! आप यहाँ! इस दशा में?’ रीवां नरेश ने उसे फिर से गले लगाते हुए कहा।

खानखाना ने मुस्कुराकर कहा-

‘चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस।

जा पर विपदा परत है, सो आवत एहि देस।’[4]

  – ‘ऐसी भी कहीं विपदा होती है खानखाना? आपके मित्र हैं, हितैषी हैं, शुभचिंतक हैं, आप पर प्राण न्यौछावर करने वाले हैं। देश-कोष सब लुटाने वाले हैं। वे सब किस लिये हैं?’

अत्यंत शांत स्वर में अब्दुर्रहीम ने कहा-

‘रहिमन  विपदा  हू  भली,  जो  थोरे  दिन  होय।

हित अनहित या जगत में , जानि परत सब कोय।।’[5]

  – ‘किंतु क्यों? विपदा क्यों?’ रीवां नरेश का मन चीत्कार कर उठा।

खानखाना ने कहा-

‘अन्तर दाव लगी रहै, धुआँ न प्रगटै सोइ।

कै जिय आपन जानहीं, कै जिहि बीती होई।’[6]

  – ‘किंतु इस तरह जीवन से उदासीन हो जाना, इस तरह की विरक्ति को पहुँच जाना? क्यों आखिर क्यों?’ रीवां नरेश प्रश्नों पर प्रश्न किये जा रहे थे और खानखाना बड़ी चतुराई से उन्हें टालता जा रहा था-

‘तैं रहीम मन आपुनो, कीन्हों चारु चकोर।

निसि बासर लागो रहै कृष्ण चंद्र की ओर।।’ [7]

रीवां नरेश समझ गये। यह इस तरह अपने मन रूपी कवच से बाहर नहीं आयेगा। अतः वे बहुत अनुनय विनय करके खानखाना को अपने डेरे पर ले गये। बहुत दिनों के बाद उन्हें अकस्मात् पाकर रीवा नरेश को अपार हर्ष हुआ था किंतु उसकी दुर्दशा को देखकर वे बहुत दुखी थे। खानखाना के स्वभाव से वे बहुत अच्छी तरह परिचित थे इसलिये इतना साहस न हुआ कि रहीम को अपने साथ रीवां चलने के लिये कह सकें। देर रात तक रीवां नरेश इधर उधर की बातें करते रहे और भोजन आदि के उपरांत उसे विदा किया।

पूरी रात रीवां नरेश बेचैन रहे। कोई मार्ग नहीं सूझता था कि कैसे वे अपने अत्यंत स्वाभिमानी मित्र का हित साधन करें। अगले दिन बहुत जल्दी ही वे अपने घोड़े पर सवार होकर फिर से चित्रकूट दर्शन के लिये निकल गये।

मार्ग में एक जगह उन्हें भीड़ दिखायी दी। इतनी सुबह किस बात की भीड़ हो गयी, यह देखने के लिये जब वे आगे बढ़े तो उनके आश्चर्य का पार न रहा। उन्होंने देखा कि अब्दुर्रहीम भिखारियों को चने बांट रहा है। रीवां नरेश को अत्यंत उत्सुकता पूर्ण निगाहों से अपनी ओर ताकता देखकर रहीम ने कहा-

‘रहिमन दानि दरिद्रतर तऊ जांचिबे जोग,

ज्यों सरितन सूखा परे कुआँ खनावत लोग।’[8] 

डेरे पर पहुँच कर रीवां नरेश ने एक लाख रुपया अब्दुर्रहीम को भिजवाया। बेटों और पोतों की मृत्यु के बाद अब्दुर्रहीम का मन अब संसार से उचाट हो गया था। उसे धन की आवश्यकता नहीं थी और जिस चीज की आवश्यकता थी, वह कोई दे नहीं सकता था। फिर भी उसने जाने क्या सोच कर एक लाख रुपया रख लिया।

-अध्याय 124, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] जिसके सिर पर पूरे साम्राज्य का भार था, वह इस तरह भाड़ क्यों झौंक रहा है?

[2] अपने सिर का सारा भार भाड़ में झौंक कर रहीमदास पार उतर गये हैं।

[3] ये रहीम अब दर-दर फिरते हैं और भीख मांगकर खाते हैं। मित्रो! अब मित्रता त्याग दो। अब वे रहीम नहीं रहे।

[4] चित्रकूट में अवध नरेश श्रीरामजी ने निवास किया। जिन पर विपदा आती है, वे इसी देश चले आते हैं।

[5] विपदा अच्छी है जो थोड़े दिन ही रहती है किंतु संसार में हितैषी अथवा अपकारी की पहचान करवा देती है।

[6] हृदय में अग्नि लगी रहती है, उसका धुआँ दिखाई नहीं देता। इसे या तो वह जानता है जिसके हृदय में अग्नि लगी हुई है, या फिर वह जिसके ऊपर कभी ऐसी विपदा आई है।

[7]  हे रहीम! तूने अपना मन सुंदर चकोर पक्षी के समान कर लिया है जो सदैव ही कृष्ण रूपी चंद्र की ओर लगा रहता है।

[8]  यदि दानी निर्धन हो जाये तो भी उसे जांचा जाना चाहिये जिस प्रकार नदी के सूख जाने पर लोग उसके तल में कुआँ खोदकर पानी निकालते हैं।

गोद लिये हुलसी फिरै (125)

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गुसाईंजी ने वृद्ध ब्राह्मण के हाथों से चिट्ठी लेकर पढ़ी तो उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बह निकली। खानखाना ने उसमें लिखा था- गोद लिये हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय।

– ‘तुलसी बाबा! ई बूढ़ा विप्र तोहरे शरण में आइ बा। हमार रक्षा आप न करिहैं तो कवन करे?’ एक बूढ़ा ब्राह्मण गुसाईंजी के पैरों में लोट गया।

– ‘ई विप्र देवता का करथें? हमइ नरक का मार्ग सुझावत हये का? चला उठा अब बेर ना करा।’

– ‘आप नरक में जाब्य, चित्रकूटौ नरकइ भहई जाब्य बाबा। तोहरे लिए का नरक, का सरग! हमरे लिए त इअहि जनम नरक होई गबा।’

– ‘ऐसन काहें घिघियात हो बामन देवता? कछु काम होई तो कहा।’

– ‘हम का बताई बाबा। तू अपनइ आँखी से देखि ल, ई हमारी बिटिया विआहई लायक होई गई बा। एकर विहाह करावई के बा।’

– ‘हम त खुद गिरस्थीदार नाइ हइ त तोहार का मदद करिवई?’

– ‘बाबा! हँसी ना करा। गरीब बामन क बेटी हउ। एकर हाँथ पीला होइ जात त हम चैन से मरित।’

– ‘साफ-साफ बतावा विप्रवर। का चाहथ्य?’

– ‘कछु धन से मदद होइ जात त हम एकाह ब्याहि देइत।’

– ‘धन! हमरे पास महाराज धन कहाँ बा?’ धन बये तो केहू राजा महराजा क दुआर देखा। तुलसी की कुटिया में तो एक सेर अनाज न मिली।’

– ‘हमइ ई सब नाहिं पता बाबा। हम सुने रहे कि ताहरे हाँथ में बड़ी शक्ति बा। कछु मंतर फेरा और दुइ-चार सेर कंचन बनाइद।’

निर्धन ब्राह्मण का दुखड़ा सुनकर गुसाईंजी दुविधा में पड़ गये। बड़ी देर तक सोचते रहे कि क्या किया जाये। अंततः उन्हें एक उपाय सूझ ही गया। उन्होंने कागज कलम उठाई और एक चिट्ठी खानखाना के नाम लिख दी।

– ‘विप्र होऽऽ!’ गुसाईं जी ने कुटिया के बाहर ऊंघ रहे ब्राह्मण को जगाया।

– ‘हाँ महराज!’

– ‘ई ल चिठिया।’

– ‘ई चिठिया क का होये महराज?’

– ‘ई चिठिया से बहुत कुछ होये, तनिक जतन करइ पड़े।’

– ‘का महराज, कउन जतन करइ पड़े? 

– ‘एका मंदाकिनी पार पर रहिइ वाले अब्दुर्रहीम खानखाना के पास लइजा। कहि दिह्य तुलसी दिये हैं।’

– ‘ लेकिन गुसाईंजी, ऐसे हमार का काम होये?’ बूढ़े ने विचलित होकर पूछा।

– ‘तनिक धैर्य रखा देवता। जा बिलम्ब जिनि करा।’

बूढ़ा ब्राह्मण गुसाईंजी को प्रणाम करके चला गया। जब वह किसी तरह पूछता-पूछता खानखाना की कुटिया तक पहुँचा तो संध्या होने में कुछ ही समय शेष रह गया था। खानखाना ने चिट्ठी हाथ में लेकर बांची-

”सुर तिय, नर तिय, नाग तिय, सब चाहत अस होय।”

बस केवल इतने ही अक्षर लिखे हुए थे उसमें। कुछ समझ में न आया। क्या चाहते हैं तुलसी बाबा? उसने दृष्टि ऊपर उठा कर कहा- ‘का हो देवता! ऊ बाहेर के बैठा बा?’

– ‘हमार बिटिया प्रभु।’

– ‘तनिक ओका इन्हाँ लिआवा।’

– ‘चला बिटिया। तनिक इहाँ आइके खानजू के परनाम करा।’

विप्र दुहिता ने धरती पर माथा टेक कर दूर से ही खानखाना को परनाम किया। खानखाना को अपने सवाल का जवाब मिल गया। उन्होंने रीवां नरेश के यहाँ से आई एक लाख रुपयों की पोटली निकाली और विप्र देवता के चरणों में धर दी- ‘ अऊर कछु सेवा होई ते कहा।’

– ‘अब कवनऊ साध बाकी नाइ बा खानजू। बिटिया क हाँथ पिअर होइ जाये त तोहरे साथ बैठिके माला जपब।’

– ‘एक काम हमरउ करा?’

– ‘एक काही के, दुई कहा न, सेवक सेवकाई न करे तो का करे?’ बूढ़े का रोम-रोम खानखाना के प्रति आभारी था।

– ‘ई चिट्ठिी तुलसी बाबा के दइ देह्य।’

बूढ़े ब्राह्मण ने उसी दिन गुसाईंजी की सेवा में उपस्थित हो सब विवरण कह सुनाया और खानजू की चिठिया उनके हाथ में रख दी। गुसाईंजी ने चिट्ठी को पढ़ा तो उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बह निकली। उसमें लिखा था- ”गोद लिये हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय।”[1]


[1] इस पंक्ति के दो अर्थ हैं- पहला तो ये कि यह कन्या अपनी गोद में तुलसीदासजी जैसा गुणी बेटा लेकर प्रसन्नता पूर्वक विचरण करे। दूसरा अर्थ यह कि माता हुलसी, अपने पुत्र तुलसी को गोद में लिये घूमें। इसके तुलसीदास जैसा बेटा हो। (तुलसीदासजी की माता का नाम हुलसी था।)

-अध्याय 125, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

बादशाह का अपहरण (126)

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आखिर वही हुआ जो नूरजहाँ चाहती थी, खुर्रम अपने बाप की नजरों में गिर गया। खुसरो पहले ही मर चुका था और जहाँदार वैसे भी किसी काम का न था। इस प्रकार शहरयार के बादशाह के तख्त तक पहुँचने के मार्ग में आने वाली तीन बाधायें स्वतः हट चुकी थीं। अब केवल परवेज बचा था जिसे शहरयार के हित में या तो मर जाना चाहिये था या फिर अपने दोनों भाईयों की तरह बादशाह से बगावत कर अपने बाप की नजरों से गिर जाना चाहिये था।

नूरजहाँ अब इसी कार्य में जुट गयी। उसने परवेज और महावतखाँ की सम्मिलित ताकत तोड़ने के लिये जहाँगीर से आदेश दिलवाया कि परवेज तो खानजहाँ लोदी के संरक्षण में गुजरात में रहे और महावतखाँ बंगाल चला जाये। महावतखाँ और परवेज दोनों ने ही इस आदेश को अंगीकार नहीं किया।

वे दोनों ही खुर्रम की ओर से भयभीत थे इसलिये एक साथ रहना चाहते थे। इधर खानखाना भले ही बादशाह से क्षमा पाकर फिर से मिली खानखाना की उपाधि ठुकरा कर चित्रकूट चला गया था किंतु अब भी वह परवेज और महावतखाँ के लिये किसी प्रबल शत्रु से कम नहीं था।

जब महावतखाँ बंगाल नहीं गया तो नूरजहाँ ने महावतखाँ को दरबार में तलब किया। महावतखाँ यदि मुगलिया सल्तनत में आज की तारीख में किसी से डरता था तो केवल नूरजहाँ से। उसकी इतनी हिम्मत नहीं हो सकी कि वह नूरजहाँ के सामने पेश हो सके इसलिये वह चुपचाप बंगाल को खिसक गया और मन ही मन नूरजहाँ तथा उसके भाई आसिफखाँ से निबटने की योजना बनाने लगा।

जब महावतखाँ दरबार में उपस्थित नहीं हुआ तो नूरजहाँ ने महावतखाँ के समधी को बुलवाया और सरे आम पीटकर कैद में डाल दिया। उस पर यह आरोप लगाया कि उसने मामूली आदमी होने के बावजूद बिना बादशाही हुक्म के महावतखाँ जैसे बड़े आदमी की बेटी से अपने बेटे की शादी की। यह एक अजीब अभियोग था जो उससे पहले किसी और आदमी पर नहीं लगा था।

जब महावतखाँ को ये समाचार पहुँचे तो वह भड़क गया। वह बंगाल जाने की योजना अधर में छोड़कर अपने पाँच हजार जंगी राजपूत सैनिकों के साथ पंजाब को चला गया जहाँ इन दिनों जहाँगीर प्रवास कर रहा था। वह कोई कदम उठाने से पहले बादशाह से मिल लेना चाहता था।

नूरजहाँ के संकेत पर बादशाह ने महावतखाँ से रूपयों का हिसाब मांगा। जब महावतखाँ ने जो हिसाब दिया, बादशाह उससे संतुष्ट नहीं हुआ और उसने महावतखाँ के साथ कठोरता बरती। इससे कुपित होकर महावतखाँ विद्रोही हो गया और एक दिन जब बादशाह भट नदी पार कर रहा था, महावतखाँ ने अवसर पाकर अपने राजपूत सैनिकों के बल पर जहाँगीर का अपहरण कर लिया और उसे हाथी पर सवार करके अपने डेरे पर ले गया।

महावतखाँ ने अपनी ओर से सब योजना ठीक-ठाक बनायी थी किंतु एक चूक उससे हो गयी। बादशाह हाथ लगते ही उसने नूरजहाँ को छोड़ दिया जो कुछ ही दूरी पर पड़ाव डाले हुए थी। नूरजहाँ को जब इस अपहरण का समाचार लगा तो वह उल्टे पैरों नदी पार करके अपने डेरे पर चली गयी।

अगले दिन वह आसिफखाँ के नेतृत्व में महावतखाँ से लड़ने के लिये आयी किंतु महावतखाँ के राजपूतों ने उसे भगा दिया। किसी तरह नदी में गोते खाती हुई वह फिर से अपने डेरे में लौट गयी। आसिफखाँ ने भाग कर अटक के किले में शरण लेनी चाही किंतु महावतखाँ ने उसे पकड़ लिया।

महावतखाँ बड़ा ही दुष्ट निकला। वह बादशाह को उसी हालत में काबुल ले गया और खानखाना को संदेश भिजवाया कि जिसने तुझे खानखाना बनाया था वह तो मेरी कैद में है जो तू वाकई में खानखाना है तो अपने बादशाह को छुड़ाकर ले जा।

महावतखाँ ने आगरे के सूबेदार को आदेश भिजवाये कि यदि बादशाह की सलामती चाहते हो तो दाराशिकोह और औरंगजेब को नजरबंद करके लाहौर ले आओ।

जब खुर्रम ने ये समाचार सुने तो उसने महावतखाँ के विरुद्ध चढ़ाई करने का मानस बनाया किंतु इस समय उसके पास मात्र पाँच सौ राजपूत सैनिक थे जो अकस्मात ही राजा भीमसिंह के बेटे किशनसिंह की मृत्यु हो जाने से बिखर गये थे। अतः अपने आप को हर तरह से निरुपाय पाकर खुर्रम ने ठठ्ठे की राह पकड़ी।

-अध्याय 126, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

खीरा सिर से काटिये (127)

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खानखाना के बेटे दाराबखाँ की पुत्री नूरजहाँ के भाई आसिफखाँ के बेटे शायस्ताखाँ को ब्याही गयी थी। चूंकि दाराबखाँ और दाराबखाँ के बेटे को महावतखाँ ने मार डाला था इसलिये खानखाना की यह पौत्री महावतखाँ से बड़ी क्रुद्ध रहा करती थी। महावतखाँ का कोई भी परिचित आदमी जब भी उससे मिलता तो वह एक ही बात कहा करती थी कि जिस दिन मुझे महावतखाँ दिखेगा, उसे मैं बन्दूक से मार दूंगी।

जब बाबा अब्दुर्रहीम खानखाना की पदवी ठुकराकर चित्रकूट में जा बैठा तो दाराबखाँ की बेटी को बड़ी चिंता हुई। उसे लगा कि महावतखाँ को दण्ड देने का अवसर हाथ से निकला जा रहा है। खानखाना के अतिरिक्त किसी और में महावतखाँ को दण्डित करने की सामर्थ्य नहीं थी। जब उसने सुना कि महावतखाँ बादशाह को कैद करके काबुल ले गया है और उसने खानखाना को चुनौती दी है कि यहाँ आकर बादशाह को छुड़ा लेवे तो वह स्वयं अपने बाबा के पास चित्रकूट गयी ताकि अपने पितामह को इस कार्य के लिये तैयार कर सके।

खानखाना ने अपनी पौत्री का स्वागत तो किया किंतु उसके आने का उद्देश्य जानकर वह दुविधा में पड़ गया। उसे बादशाह के अपहरण किये जाने का समाचार  पहले ही मिल गया था किंतु वह अपने आप को यह चुनौती स्वीकार करने में असमर्थ जानकर चुप लगा गया था। पौत्री के हठ ने उसे फिर से सोचने पर विवश कर दिया था।

– ‘बाबा हुजूर! आप ही ने हमें सिखाया था कि खीरा मुख से काटिये मलिये नमक लगाय। रहिमन कड़ुए मुखन को चहिये यही सजाय। क्या महावतखाँ के अपराध कड़ुए खीरे से भी कम हैं? उसका मुख काटकर उसमें नमक कौन भरेगा? आपके पुत्रों में से कोई जीवित न रहा। नहीं तो मैं इस काम के लिये उनके सामने दामन फैलाती। आप ही इस खानदान की डूबती हुई नैया के खेवनहार हैं। इस समय यदि आपने कोई उद्यम नहीं किया तो बैरामखाँ का वंश हमेशा के लिये डूब जायेगा। यदि आपने इस बार बादशाह को छुड़ा लिया तो आपका बचा-खुचा वंश पेट पालने के लिये किसी का मोहताज नहीं रहेगा।’

बेटी जाना भी इसी पक्ष में थी कि जीवन के इस पड़ाव पर भी खानखाना को खानदान के भविष्य के लिये उद्यम करना चाहिये। इस सब सोच-विचार के बाद खानखाना ने अपने लिये घोड़ा मंगावाया और उसकी जीन कस कर उस पर सवार होते हुए बोला- ‘सर सूखे पंछी उड़े, और कहीं ठहरायं। कच्छ-मच्छ बिन पच्छ के कह रहीम कहँ जायं?’[1]

बेटी जाना ने बूढ़े बाप को एक हाथ में नंगी तलवार घुमाते हुए और दूसरे हाथ से घोड़े की लगाम खींचते हुए देखा तो आँखों में आँसू भरकर बोली- ‘याद रखना बाबा। खीरा मुख से काटिये मलिये नमक लगाय। रहिमन कड़ुए मुखन को चहिये यही सजाय।’ अपनी बात पूरी करते करते जाना फफक-फफक कर रो पड़ी। कौन जाने यह चेहरा फिर से दिखायी भी दे या नहीं।

जाना को रोते देखकर खानखाना ने घोड़े को ऐंड़ लगाते हुए कहा-

‘रहिमन मैन तुरंग चढ़ि चलिबो पावक माँहि।

प्रेमपंथ ऐसा कठिन सबसों निबहत नाँहि। ‘[2]

जाना जानती थी कि अब खानखाना वह पुराना वाला खानखाना न था जिसके घोड़े पर सवार होते ही शत्रुओं की छाती फट जाती थी ओर उनके मस्तिष्क की नसें काम करना बंद कर देती थीं। उसकी आयु बीत गयी थी। उसके आदमी बिखर गये थे। उसकी फौज नष्ट हो गयी थी। उसके बेटे काल के मुँह में समा गये थे।

उसके सिर पर हुमा का पंख नहीं था। उसके चंवर और छत्र जाने कहाँ चले गये थे! अब तो भग्न हृदय, जर्जर देह और श्वेत केश ही उसके हिस्से में थे। उस पर भी मुसीबत यह कि बादशाह महावतखाँ की कैद में था और नूरजहाँ बेबस। ऐसे में महावतखाँ पर विजय हासिल करना आकाश में कुसुम खिलाने जैसा ही था किंतु यह कमजोर खानखाना भी बेटी जाना की दृष्टि में धन्य था जो पोती के अनुरोध पर असाध्य को भी साधने के लिये उठ खड़ा हुआ था।

जो खुर्रम हिन्दुस्तान का शंहशाह होने का ख्वाब देखते न थकता था, वह अपने बाप पर मुसबीत आई देखकर ठठ्ठे को भाग खड़ा हुआ था, जो परवेज हिन्दुस्थान का तख्त पाने के लिये दाराबखाँ का सिर काटने में जरा भी देर करने को तैयार नहीं था, वही परवेज अपने बाप पर मुसबीत आई जानकर दक्षिण से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा। उन्हीं खुर्रम और परवेज के बाप को महावतखाँ की कैद से छुड़ाने के लिये बूढ़ा खानखाना फिर से तुरंग पर सवार हुआ।

चित्रकूट से चलकर खानखाना सीधा आगरा आया। उसके आदमी और कबूतर आज भी उन्हीं गलियों, कूँचों, बारामदों और बाजारों में डटे हुए थे। उसने अपने खबरचियों और कबूतरों के जरिये अपने जानने वालों और बादशाह के शुभेच्छुओं को सूचना भिजवाई कि वह सेना लेकर काबुल जा रहा है, जिसे भी बादशाह को छुड़वाने के लिये चलना हो, उसके पास आ जाये।

जिसने भी यह संदेश पाया, उसे विश्वास नहीं हुआ। खानखाना फिर से घोड़े पर बैठकर बादशाह को छुड़ाने के लिये काबुल जा रहा था! देखते ही देखते लोग जुड़ने लगे। बात की बात में हजारों युवक खानखाना की हवेली के सामने इकठ्ठे होने लगे। सब कुछ सपने जैसा था किंतु सब अपनी आँखों से उस सपने को घटित होता हुआ देख रहे थे। खानखाना ने कुछ ही दिनों में विशाल सेना खड़ी कर ली और उसने काबुल की ओर कूच किया।

खानखाना को फिर से मैदान में आया देखकर खुर्रम हिन्दुस्थान छोड़कर ईरान भागने की तैयारी करने लगा लेकिन जब दक्षिण से समाचार आया कि परवेज मर गया तो खुर्रम ने ईरान जाने का निश्चय त्यागकर गुजरात के रास्ते दक्षिण को चले जाने की तैयारी की किंतु बूंदी नरेश राव रतनसिंह ने मौका पाकर बुरहानपुर में खुर्रम को गिरफ्तार कर लिया।

बाबर के वंशजों के लिये वक्त एक दिन इतना बेरहम हो जायेगा, इसकी तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। बादशाह महावतखाँ की कैद में था तो शहजादा खुर्रम राव रतनसिंह के शिकंजे में। यह अलग बात थी कि सियासत की चतुर खिलाड़ी नूरजहाँ को लगा कि उसकी योजनाओं के फलीभूत होने का समय आ गया। अब वह बेखटके अपने जंवाई शहरयार को बादशाह बना सकती थी।

-अध्याय 127, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  तालाब के सूखने पर पक्षी उड़कर दूर चले जाते हैं किंतु कछुओं और मछलियों के पंख नहीं होते, वे तो उसी सूखे सरोवर का साथ निभाते हैं।

[2] घोड़े पर सवार होकर आग के भीतर चलना, ऐसी कठिन राह सबसे नहीं निभती। यह राह एक जलन है, दूसरी ओर बड़ी फिसलन। एक ओर चींटी के भी पैर फिसल जाते हैं और संसार में लोग हैं कि उस पर स्वार्थ रूपी बोझ लादकर ले जाना चाहते हैं।

बेरहम वक्त (128)

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– ‘इस कुतिया के बच्चे को कह कि हुक्का भर कर लाये नहीं तो मार-मार कर चमड़ी उधेड़ दूंगा।’ शराब के नशे में धुत्त कुंवर हरिसिंह ने चिल्लाकर कहा तो खुर्रम की रूह कांप गयी। हुक्का लाने वाली दासी भी कुंवर का यह रौद्र रूप देखकर सहम गयी।

ऐसा घनघोर अपमान! खुर्रम तो स्वप्न में भी इस स्थिति की कल्पना नहीं कर सकता था कि उसके इशारों पर नाचने वाले एक अदने से राव का लड़का एक दिन उसके साथ ऐसा दुर्व्यवहार करेगा।

– ‘कमबख्त, जुबान को लगाम दे नहीं तो………।’ खुर्रम गुर्राया।

– ‘नहीं तो क्या? क्या करेगा तू?’ खाल खिंचवा लेगा?’ कुंवर हरिसिंह ने घूंसा तान कर पूरे जोर से खुर्रम की नाक पर दे मारा। खुर्रम की आँखों में लाल-पीले सितारे से झिलमिला आये। वह कराह कर नीचे बैठ गया। उसकी नाक से रक्त बहने लगा था।

दासी ने कुंवर का यह रूप देखा तो हुक्का शहजादे की ओर बढ़ा दिया- ‘शहजादे के लिये उचित यही है कि कुंअरजू जो कहते हैं, आप वही करें।’

खुर्रम ने दासी के हाथ से हुक्का ले लिया। इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचा था। किसी तरह खड़ा होकर वह डेरे से बाहर आया। उसके कदम अपमान और चोट से लड़खड़ा रहे थे। दासी मशाल लेकर उसके पीछे चली।

खुर्रम ने बाहर आकर देखा कि एक तरफ बड़े से घेरे में अंगारे दहक रहे हैं जिनका लाल प्रकाश चारों तरफ फैला हुआ है। इससे पहले खुर्रम ने कभी अंगारों को इतने ध्यान से नहीं देखा था। उसका जी हुआ कि हरिसिंह को बालों से पकड़ कर घसीटता हुआ लाये और इन अंगारों में झौंक दे।

पहले के से दिन होते तो खुर्रम निस्संदेह यही करता किंतु भाग्य ने वे दिन खुर्रम से छीन लिये थे। शहजादा होते हुए भी अब वह शहजादा नहीं था, बादशाह द्वारा घोषित भगोड़ा था जिसे बादशाह के सेनापतियों ने पकड़ लिया था। यह एक अलग बात थी कि बादशाह स्वयं इन दिनों महावतखाँ की कैद में था।

तो क्या महावतखाँ भी बादशाह हुजूर के साथ यही बर्ताव कर रहा होगा! यह विचार मन में आते ही खुर्रम की रही-सही हिम्मत भी पस्त हो गयी। उसने किसी तरह चीमटे से अंगारे उठाकर हुक्के में डाले और डेरे के भीतर चला गया। उसका मन हुआ कि वह हरिसिंह के पैरों में अपना सिर रख कर कहे कि उसे छोड़ दे और चलकर महावतखाँ पर आक्रमण करे नहीं तो महावतखाँ बादशाह हुजूर को मार डालेगा।

कुंवर हरिसिंह क्रोध से आँखें चढ़ाये बैठा था। उसके भय से खुर्रम के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला। उसने चुपचाप हुक्का हरिसिंह के सामने रख दिया।

– ‘चल पैर दबा।’ हरिसिंह ने अपने दोनों पैर ढोलिये[1]  पर लम्बे कर दिये।

खुर्रम तिलमिला कर रह गया किंतु बाहर से वह शांत ही बना रहा। उसने किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं की। खुर्रम को अपनी जगह से न हिलते देखकर कुंवर हरिसिंह का क्रोध फिर से भड़क गया।

– ‘अरे गोले ![2] तुझे सुनाई नहीं देता क्या?’

– वक्त से डर हरिसिंह। मैं तेरा गुलाम नहीं हूँ। तैमूरी खानदान का मुगल शहजादा हूँ, खुदा ने चाहा तो मैं एक दिन हिन्दुस्थान के तख्त पर बैठूंगा। मुझसे गुलामों की तरह सेवा लेते हुए तुझे लज्जा नहीं आती?’

– ‘तो जनाब अब भी हिन्दुस्थान के तख्त पर बैठने का सपना पाले हुए हैं।’ कुंवर हरिसिंह ने हुक्के की नली मुँह से निकालते हुए कहा।

– ‘वक्त की चाल बड़ी बेरहम होती है हरिसिंह। कौन जाने कल क्या हो?’

– ‘कल जो होगा, वो न तुझे पता है और न मुझे किंतु आज जो होगा, वो केवल मुझे पता है। जानना चाहता है कि आज क्या होगा?’

खुर्रम ने हरिसिंह की बात का कोई जवाब नहीं दिया।

– ‘अच्छा-अच्छा। तू नहीं जानना चाहता तो मत पूछ। मैं ही तुझे बताये देता हूँ कि आज क्या होगा!’ अपनी बात कहते-कहते हरिसिंह नशे के कारण हांफने लगा। एक क्षण को विराम लेकर उसने हुक्के का कश खींचा और मुँह से नली निकाल कर बोला- ‘आज जब मैं डावड़ियों[3]  का मुजरा देखूंगा तो तू मेरे पैर दबायेगा और पंखा लेकर मेरी हवा करेगा। तू मेरी गिलास में शराब भरेगा और मेरी चिलम पकड़ कर खड़ा रहेगा। और जो तू ऐसा नहीं करेगा तो मैं डावड़ियों के साथ तुझसे भी मुजरा करवाऊंगा।’

खुर्रम के जीवन में इतनी खराब शाम अब से पहले कभी नहीं आयी थी। परिस्थिति के आगे वह लाचार था। मुजरा न करना पड़े इसलिये उसने किसी तरह का प्रतिरोध नहीं किया। वह चुपचाप वही करता चला गया, जो भी कुछ भी करने को उससे कहा गया।

खुर्रम वक्त की इस बेरहमी पर हैरान था किंतु कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं था। कई दिनों तक यह तमाशा चलता रहा। जब यह बात राव रतनसिंह को मालूम हुई तो उसने कुंवर हरिसिंह को बुला कर बहुत बुरा-भला कहा और यह कहकर शहजादे को मुक्त कर दिया कि जब इसे गिरफ्तार करने वाला बादशाह खुद ही अपने मातहतों की कैद में है तो इसे कैद में रखने का क्या लाभ है!

कुंवर हरिसिंह की कैद से छूटकर खुर्रम सिर पर पैर रखकर ठठ्ठे की ओर ऐसे भागा मानो साक्षात मौत ही पीछे लगी हुई हो। उसका विचार ठठ्ठे से नीचे उतर कर सिंध होते हुए गुजरात की ओर जाने का था। वह कतई नहीं चाहता था कि हरिसिंह के शिकंजे से निकलने के बाद वह अब्दुर्रहीम के शिकंजे में जा फंसे।

-अध्याय 128, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] बड़ी चारपाई।

[2] गुलाम।

[3] नृत्यांगनाओं।

काला साया (129)

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बदजात महावतखाँ बादशाह से कोई दुर्व्यवहार तो नहीं करता था किंतु उसने बादशाह पर ढेर सारी पाबंदियाँ लाद दी थीं जो किसी दुर्व्यवहार से कम नहीं थीं। बिना महावतखाँ की इजाजत के कोई परिंदा तक बादशाह के पास पर नहीं मार सकता था।

उसे सुबह-शाम दो सेर शराब और आधा सेर कबाब दिया जाता था। न तो वह हवा खोरी के लिये अपने डेरे से बाहर निकल सकता था और न घोड़े पर सवार हो सकता था। बादशाह से उसकी तलवार भी छीन ली गयी थी तथा उसे किसी से भी बात करने की इजाजत नहीं थी।

इन पाबंदियों में जकड़ा हुआ जहाँगीर बुरी तरह छटपटाता था। उसे रह-रह कर वे दिन याद आते थे जब वह अपने मरहूम बाप जलालुद्दीन अकबर के आदेश से राजा शालिवाहन की देखरेख में हमाम में कैद कर दिया गया था। अपने स्वभाव के विपरीत जहाँगीर उद्यम करने को तैयार था किंतु वहाँ से छूट भागने का उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ता था। उसके चारों ओर इतना कड़ा पहरा था कि बिना किसी बाहरी मदद के भाग निकलने की संभावना तक दिखायी नहीं देती थी।

एक दिन जहाँगीर ने पहरेदारों के मुँह से सुना कि खानखाना अब्दुर्रहीम अपना चित्रकूट प्रवास त्याग कर फिर से आगरा आ गया है और महावतखाँ से लड़ने के लिये सेना तैयार कर रहा है। बादशाह को अंधेरे में आशा की एक क्षीण किरण दिखायी दी। जहाँगीर को पक्का विश्वास था कि यदि नूरजहाँ को इस समय खानखाना की सेवाएं मिल गयीं तो जहाँगीर की रिहायी संभव है।

जहाँगीर नहीं जानता था कि जिस नूरजहाँ को वह मलिका ए आलम कहते हुए नहीं थकता था, वह तो जहाँगीर की ओर से बेफिक्र होकर अपनी जंवाई शहरयार को बादशाह बनाने की तैयारियों में जुट गयी थी और खानखाना अभी अपनी मंजिल से बहुत दूर था। जहाँगीर दिन रात नूरजहाँ और खानखाना की सम्मिलित सेना के आने की राह देखता था किंतु इंतजार था कि खत्म होने में ही नहीं आता था। न तो नूरजहाँ आती थी और न खानखाना की सेना के आगरा से कूच करने का समाचार आता था।

वह हर सुबह उम्मीद का नया उजाला देखने की चाह में उठता था और हर शाम नाउम्मीदी के अंधेरे में जा धंसता था। धीरे-धीरे जहाँगीर की नाउम्मीदी बढ़ती ही जाती थी। यहाँ तक कि उसका खाना-पीना भी छूटने लगा।

एक रात महावतखाँ के डेरे में ईरान से लायी गयी रक्कासाओं  का मुजरा आयोजित किया गया। ईरानी रक्कासाओं[1] के आने की खुशी में बड़ा जश्न हुआ। मनों शराब पानी की तरह बही। हजारों अशर्फियाँ खील-बताशों की तरह हवा में उछाली गयीं। हर ओर मौज-मस्ती का आलम था। पहरेदारों को भी मुफ्त की शराब मिली तो उन्होंने भी छक कर पी ली। आधी रात होते-होते तो आलम यह हो गया कि हर कोई शराब के नशे में चूर होकर लुढ़क गया।

मैदान साफ था। बादशाह पर निगाह रखने वाला कोई भी पहरेदार अपने होश में न था। जहाँगीर ने अपना भाग्य सराहा और अच्छा मौका जानकर डेरे से भाग निकला।

डेरे से बाहर आते ही उसका कलेजा धक से रह गया। अंधेर में निकल कर आये किसी काले साये ने उसकी कलाई पकड़ ली थी। जहाँगीर को लगा कि अब तक का सारा उद्यम व्यर्थ गया। उसने यह पूछने के लिये होंठ खोलने चाहे कि किस गुस्ताख ने बादशाह का हाथ पकड़ने की हिमाकत की है किंतु उससे पहले ही साया फुसफुसा कर बोला- ‘उस ओर नहीं हुजूर, इस ओर।’

जहाँगीर को यह आवाज बहुत जानी पहचानी लगी किंतु वह पहचान न सका कि यह कौन हो सकता है? फिर भी उसने अनुमान किया कि जो कोई भी हो, यह है मित्र ही। वह चुपचाप काले साये के साथ चलने लगा। थोड़ी दूर चलते ही एक पेड़ के नीचे दो घोड़े बंधे हुए मिले। पास ही कुछ और साये घोड़ों पर सवार थे।

काले साये ने बादशाह को एक घोड़े पर सवार करवाया और स्वयं दूसरे घोड़े पर सवार हो गया। काले साये के सवार होते ही घोड़े हवा से बातें करने लगे। लगभग दो घड़ी तक घोड़ा दौड़ाने के बाद काले साये ने अपने घोड़े की रफ्तार कम की। बादशाह को घोड़े पर दो घड़ी तक तेज रफ्तार करने का अभ्यास नहीं था, वह बुरी तरह हांफ रहा था।

जब घोड़े बिल्कुल रुक गये तो काला साया अपने घोड़े से उतर कर बादशाह के घोड़े के पास आया और सिर झुकाकर बोला-

– ‘ बादशाह सलामत को गुलाब अब्दुर्रहीम का सलाम कुबूल हो।’

अब्दुर्रहीम का नाम सुनते ही बादशाह की नसों में रक्त का प्रवाह तेज हो गया। उसने घोड़े से उतर कर खानखाना को गले से लगा लिया।

– ‘खानबाबा! आखिर आपने यह करिश्मा कर ही दिखाया।’ बादशाह ने भावविभोर होकर कहा।

– ‘यह करिश्मा मेरा नहीं है आलीजाह! वह तो मेरी उन रक्कासाओं का कमाल है जो महावतखाँ के डेरे में बेधड़क घुस गयीं।’

– इस मुबारक मौके पर हम सबसे पहले मलिका ए आलम नूरजहाँ का मुबारक मुँह देखना चाहते हैं।’

– ‘बादशाह सलामत की इच्छा हर हाल में पूरी की जायेगी।’ खानखाना फिर से घोड़े पर सवार होते हुए बोला।

-अध्याय 129, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] नृत्यांगनाओं।

फिर से दक्खिन (130)

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नूरजहाँ ने जहाँगीर को आया देखकर सिर पीट लिया किंतु बाहर से उसने बड़ी प्रसन्नता जाहिर की और बादशाह का स्वागत किया। अगली रात नूरजहाँ के डेरों में बड़ा भारी जलसा किया गया। जलसे में ईरान से आयी हुई उन खूबसूरत रक्कासाओं के ऊपर अशर्फियाँ उछाली गयीं किंतु बादशाही आदेश से इस जलसे में किसी को शराब नहीं परोसी गयी।

जहाँगीर अब फिर बादशाह था। अपनी मर्जी का मालिक था, अपने नौकरों को फिर से हुक्म देने का अधिकारी था। फिर भी वह महावतखाँ से सीधे-सीधे लड़ने की स्थिति में नहीं था। उसने महावतखाँ से कहलवाया कि यदि अपनी सलामती चाहता है तो आसिफखाँ को छोड़ दे और ठठ्ठे में जाकर खुर्रम पर चढ़ाई करे। महावतखाँ हुक्म न मानने में अपनी भलाई न देखकर अपना सिर पीटता हुआ ठठ्ठे को चल दिया।

लाहौर पहुँच कर जहाँगीर ने बड़े दरबार का आयोजन किया। तख्त के आधे हिस्से पर जहाँगीर बैठा और आधे हिस्से पर मलिका ए आलम नूरजहाँ आसीन हुई। इस दरबार में खानखाना फिर से उसी स्थान पर खड़ा हुआ जिस स्थान पर वह अकबर के जमाने में खड़ा होता था। खानखाना के पीछे उसके विश्वस्त सेवक खड़े हुए। खानखाना को विशाल लश्कर के साथ फिर से अपने सामने देखकर जहाँगीर को रुलाई आ गयी। वह भरे दरबार में बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोया।

– ‘बादशाह सलामत! अपने गुलामों के होते हुए अपना जी छोटा न करें।’ खानखाना ने तसल्ली देते हुए कहा।

– ‘मैं अपने गुलामों में तेरे जैसे नमक हलाल और महावतखाँ जैसे नमक हराम को देखकर रो रहा हूँ। तू मुझे रोने दे खानखाना! मैं इसी योग्य हूँ।’

बहुत देर रो लेने के बाद जब जहाँगीर सामान्य हुआ तो उसने खानखाना के सामने झोली फैलाकर कहा- ‘जा, मेरे अतालीक जा। महावतखाँ का सिर ले आ। जा मेेरे खानखाना जा, मेरे दुश्मनों का सिर ले आ। जा मेरे बाप जा, नूरजहाँ का दिल दुखाने वालों का सिर ले आ।’

खानखाना को अपने ऊपर चढ़कर आया देखकर महावतखाँ की हालत पतली हो गयी। वह खुर्रम की तरह ईरान भागने की नहीं सोच सकता था। खुर्रम की जड़ें तो फिर भी ईरान में अपने लिये मिट्टी तलाश सकती थीं किंतु महावतखाँ को तो हिन्दुस्थान की मिट्टी के अलावा कहीं भी आसरा नहीं था।

पहले तो महावतखाँ ने खानखाना का सामना करने का विचार किया किंतु वह जानता था कि इस बार जो खानखाना उस पर चढ़कर आया है, वह बादशाह की नजरों से गिरा हुआ, भगोड़ा, विद्रोही घोषित किया गया खानखाना नहीं है। उसकी म्यान में बादशाह की तलवार है। उसकी आँखों में अपने बेटों और पोतों के कत्ल का खून है। उसके दिल में अपने अपमान की ज्वाला भड़क रही है। अब वह निरा निरीह खानखाना नहीं है जिसके आगे अकेला फहीम खड़ा हो। इस बार वह मुगलों की समस्त ताकत समेट कर आया है। भले ही एक दिन महावतखाँ नूरजहाँ के जबड़ों में से बादशाह को उड़ा ले जाने का हौंसला रखता था किंतु खानखाना की ताकत का सामना करने का साहस महावतखाँ में नहीं था

मौका पाते ही खानखाना ने महावतखाँ को घेर लिया। महावतखाँ बड़े बेमन से खानखाना का सामना करने को तैयार हुआ किंतु खानखाना ने उसमें कसकर मार लगाई। जबर्दस्त शिकस्त खाकर महावतखाँ ने सिंध से गुजरात की ओर उतरना आरंभ किया। खानखाना उसे दबाता चला गया और महावतखाँ निरतंर नीचे की ओर खिसकता गया। महावतखाँ की योजना थी कि यदि वह किसी तरह खुर्रम के पास पहुँच जाये तो उसे भी युद्ध का नैतिक आधार प्राप्त हो जाये।

यही कारण था कि महावतखाँ निरंतर दक्षिण की ओर भाग रहा था। जब वह गुजरात से भी नीचे उतरने लगा तो उसकी योजना खानखाना की समझ में आ गयी। अब उसका प्रयास था कि किसी तरह दक्खिन में प्रवेश करने से पहले ही वह महावतखाँ को घेर ले ताकि उसे खुर्रम और महावतखाँ की सम्मिलित ताकत का सामना न करना पड़े।

-अध्याय 130, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

दुखती रग (131)

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महावतखाँ लड़ता कम था और भागता अधिक था। उधर खानखाना लड़ना तो चाहता था किंतु किसी मैदान में अच्छी तरह मोर्चा बांधकर। इस कारण दोनों ही सेनाएं छुट-पुट लड़ाईयाँ ही करती थीं। जब दक्खिन बहुत कम दूरी पर रह गया तब खानखाना ने पूरी ताकत के साथ महावतखाँ पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। जब वह अपने सेनानायकों के साथ विचार-विमर्श करके हमले की अंतिम योजना बना रहा था, उसी समय दिल्ली का संदेशवाहक बादशाह की चिट्ठी लेकर खानखाना की सेवा में हाजिर हुआ।

बादशाह की चिट्ठी पाकर खानखाना के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं। बादशाह ने लिखा था कि इधर कुछ ऐसी बातें हो गयी हैं कि खानखाना को मोर्चा उठाकर तुरंत दिल्ली हाजिर होना चाहिये। यदि खानखाना रोटी मोर्चे पर खावे तो पानी दिल्ली में आकर पिये।

जाने ऐसी क्या मुसीबत आन पड़ी थी जो खानखाना को अपनी पूरी सेना सहित तुरंत दिल्ली तलब किया गया था! दिल्ली तलब किये जाने के पीछे कारण चाहे जो भी रहा हो किंतु खानखाना को मन मार कर फिर से दिल्ली लौटना पड़ा।

ताबड़तोड़ चलता हुआ खानखाना बादशाह के पास पहुँचा। बीमार तो वह लाहौर से ही हो गया था किंतु इस भागमभाग में वह और अधिक बीमार हो गया। फिर भी किसी तरह अपनी जर्जर देह को समेट कर वह बादशाह के सामने उपस्थित हुआ।

खानखाना को देखकर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ। बार-बार खानखाना के कंधे चूमते हुए बादशाह ने कहा- ‘मेरे अतालीक!’ जाने क्यों लगता है कि मेरा अंत आ पहुँचा! मैं चाहता हूँ कि अब जब तक मैं जीवित हूँ आप मेरे पास ही रहें। मुझे छोड़कर कहीं न जायें।’

खानखाना बादशाह की बात सुनकर हैरान रह गया। क्या केवल इसीलिये खानखाना को वह मोर्चा उठाकर दिल्ली तलब किया गया था! ऐसा संभव नहीं था। खानखाना जहाँगीर की प्रकृति को पहचानता था। अवश्य ही इसके पीछे कोई सियासी कारण है किंतु बादशाह खुलकर नहीं कह रहा।

– ‘शंहशाहे आलम! गुलाम ने जीवन के बहत्तर बसंत देखे हैं और गुलाम पेड़ों की पत्तियों का रंग देखकर बता सकता है कि इस समय कौन सी ऋतु चल रही है। आप निःसंकोच होकर गुलाम पर भरोसा करें।’

खानखाना ने कह तो दिया किंतु वह नहीं जानता था कि उसने बादशाह की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। बादशाह ने लम्बी साँस लेकर कहा- ‘मैं जानता हूँ कि आप मोर्चा उठा लेने का असली कारण जानना चाहते हैं किंतु मुझे नहीं मालूम कि मैंने ठीक किया या गलत!’

– ‘बादशाह सलामत जो भी फैसला करेंगे, सल्तनत और रियाया की भलाई के लिये ही करेंगे। यदि कुछ बातों की जानकारी मुझे हो तो मैं भी अपनी ओर से कुछ अर्ज कर सकता हूँ।’

– ‘खानखाना! मैं नहीं जानता कि जीवन का सफल होना क्या होता है किंतु मैं इतना अंदाज जरूर लगा सकता हूँ कि मेरा जीवन असफलताओं की जीती जागती कहानी है।’

– ‘मामूली परेशानियों से अपना दिल तंग न करें बादशाह सलामत। मुझे बतायें कि आपकी परेशानी का असली सबब क्या है?’

– ‘खानखाना! जब मैंने तुमको महावतखाँ का सिर काट कर लाने के लिये भेजा तो मुझे अचानक ही अपने पैरों की जमीन खिसकती हुई दिखाई दी। मुझे हरम में बड़ा भारी षड़यंत्र होता हुआ दिखाई दिया। मलिका नूरजहाँ स्वयं इस षड़यंत्र का ताना-बाना बुन रही थीं। वे चाहती हैं कि किसी तरह तुम्हारे हाथों महावतखाँ के साथ-साथ शहजादा खुर्रम भी मारा जाये। इसलिये मलिका नूरजहाँ ने अपने मोहरे उसी तरह खेलने शुरू किये।’

खानखाना को बादशाह से यह सूचना पाकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

– ‘इतना ही नहीं। मलिका ए आलम नूरजहाँ तो यह भी चाहती हैं कि उनका अपना भाई आसिफखाँ जो महावतखाँ की कैद में है, वह भी तुम्हारे हाथों मारा जाये। और यह भी कि इस दौरान यदि आप भी लड़ाई में काम आ सकें तो अच्छा रहे। हमें उसी दिन मालूम हो सका कि परवेज और खुर्रम के बीच जंग का बीज मलिका नूरजहाँ ने ही बोया था।

अब जबकि शहजादा परवेज नहीं रहा है, नूरजहाँ खून की वही होली खुर्रम और शहरयार के बीच खेलना चाहती है। यद्यपि खुर्रम ओर शहरयार दोनों ही मेरे बेटे हैं किंतु आसिफखाँ अपने जवांई खुर्रम को और नूरजहाँ अपने जंवाई शहरयार को दिल्ली के तख्त पर बैठाने के लिये अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं।

इस सबका परिणाम यह है कि सल्तनत के विश्वस्त सिपाही एक-एक करके मौत के मुँह में जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में आपको इन दोनों के बीच पीस डालने का कोई अर्थ नहीं था। इससे तो बेहतर तो यही है कि शहजादा खुर्रम और मलिका नूरजहाँ आपस में ही लड़कर निबट लें।’

बादशाह अपनी बात पूरी करते-करते हाँफने लगा। खानखाना चुपचाप बादशाह को सलाम करके बाहर निकल आया।

-अध्याय 131, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

अद्भुत बालक (132)

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जेठ का महीना है और सूर्यदेव आकाश के ठीक मध्य में विराजमान हैं। सन-सनाती लू से परिपूर्ण आकाश में धूल के तप्त कण घुल जाने से जब वायु कानों में घुसती है तो लगता है किसी ने पिघला हुआ सीसा उंडेल दिया है। ऐसी विकट गर्मी में मनुष्यों और पशुओं की कौन कहे, चिड़ियों तक के जाये भी घोंसलों में दुबक कर बैठे हैं। राह-पंथ सब रिक्त हैं। किसान भी सब काम धाम छोड़कर पेड़ों के नीचे आकर सिमट गये हैं। गर्मी से देह को झुलसने से बचाने के लिये वे बार-बार गीले कपड़े से देह पौंछ रहे हैं।

ऐसे में उन्होंने एक विचित्र दृश्य देखा उन्होंने देखा कि एक कीमती और ऊँचे घोड़े पर सवार एक वृद्ध खान तेजी से घोड़ा फैंकता हुआ आया और उनके पास रुककर उनसे वृन्दावन जाने का मार्ग पूछने लगा। खान के कीमती वस्त्र करीलों के झुण्ड में उलझ-उलझ कर तार-तार हो गये हैं। उसकी कीमती पगड़ी बेतरतीब हो गयी है जिससे उसकी सघन श्वेत अलकावली माथे पर झूल आयी है। खान के चित्त की दशा कुछ ऐसी है कि कपड़ों की ही तरह उसे अपनी देह का भी कोई भान नहीं है। स्थान-स्थान पर करील ओर बबूल के काँटों ने त्वचा को खरौंच डाला है। गर्मी में लगातार दौड़ते रहने के कारण घोड़े के मुँह से फेन बह रहा है।

दिखने में वह कोई आला दर्जे का सिपाही लगता था किंतु उसकी अस्त-व्यस्त दाढ़ी, पगड़ी और फटे हुए कपड़े उसके चित्त में विक्षेप होने का बखान कर रहे थे। किसानों ने उसे वृंदावन जाने का मार्ग तो बताया किंतु साथ ही यह अनुरोध भी किया कि वह इस लू में घोड़े की यात्रा न करके कुछ देर पेड़ के नीचे विश्राम कर ले। जब सूरज ढल जाये तो वह वृंदावन चला जाये किंतु खान ने उनकी बात नहीं सुनी। वृंदावन को जाने वाला मार्ग जानते ही खान ने अपने घोड़े को ऐंड़ लगाई और आगे बढ़ गया।

बहुत देर तक किसान उस विचित्र वृद्ध के बारे में बतियाते रहे। किसानों का अनुमान काफी हद तक ठीक ही था। खान के चित्त की दशा खराब नहीं थी तो ऐसी भी नहीं थी कि उसे ठीक कहा जा सके।

खान घोड़े पर अकेला ही सवार था किंतु जाने किससे वार्तालाप करता हुआ जा रहा था। वह बार-बार कहता था कि किसी तरह एक बार वृंदावन पहुंच जाऊँ। उन्हें एक बार देख भर पाऊँ। आज मैं उन्हें अवश्य ही कुछ भेंट चढ़ाऊँगा किंतु क्या भेंट चढ़ाऊँगा? वे तो स्वयं ही रत्नाकर में रहते हैं और खुद लक्ष्मी उनकी गृहणी है, सब कुछ तो उनके पास है। फिर क्या उन्हें चढ़ाऊँ? बस उनका मन उनके पास नहीं है। वह राधाजी ने ले लिया है। आज मैं अपने परमात्मा को अपना मन ही चढ़ाऊँगा ताकि वे मन वाले हो जायें और वे मेरी सुधि लें।[1]

जब खान वृंदावन में गोविंददेव के मंदिर तक पहुँचा तो मंदिर के मुख्य कपाट बंद थे। यह भगवान के विश्राम का समय था। खान ने मंदिर के सामने पहुंचकर घोड़ा तो यमुना के किनारे एक पेड़ से बांध दिया और स्वयं मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचकर मंदिर के सेवकों से कपाट खोलने का अनुरोध करने लगा।

– ‘आपको किससे काम है, महंतजी से?’ मंदिर के सेवकों ने पूछा

– ‘महंतजी से नहीं, गोविंददेवजी से।’ खान ने जवाब दिया।

– ‘आप तो खान हैं, आपको भला उनसे क्या काम है?’

– ‘बहुत जरूरी काम है, आप समय व्यर्थ न करें। कपाट खोलें। समय निकला जा रहा है।’

– ‘किसका समय निकला जा रहा है?’ सेवकों ने पूछा।

– ‘महाराज! मेरे और गोविंददेवजी के मिलने का समय निकला जा रहा है। शीघ्रता कीजिये। कपाट खोलिये।’

– ‘लेकिन यह समय तो भगवान के विश्राम का है। संध्या काल में आना, तभी कपाट खुलेंगे।’

– ‘नहीं-नहीं संध्या काल में नहीं। आप देखते नहीं कि मुझे गोविंददेवजी को बहुत जरूरी चीज देनी है?’

– ‘क्या जरूरी चीज देनी है?’

– ‘नहीं-नहीं। वह मैं आपको नहीं बता सकता। आप कृपा करके कपाट खोलिये।’

– ‘अच्छा! आप यहीं ठहरिये महंतजी से पूछना पड़ेगा।’

खान चिलचिलाती दुपहरी में वहीं धरती पर बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। गर्मी से उसकी त्वचा पर छाले पड़ गये। सेवकों ने उसकी यह दशा देखी तो वे दौड़े-दौड़े महंतजी के पास गये- ‘महाराज! एक विक्षिप्त और वृद्ध खान आया है और मंदिर के कपाट खोलने की जिद्द कर रहा है। अभी इसी समय।’

– ‘क्या चाहता है? कौन है?’

– ‘महाराज, यह तो वह नहीं बताता कि कौन है। विक्षिप्त जैसा लगता है। कभी कहता है कि गोविंददेव से मिलने का समय निकला जा रहा है और कभी कहता है कि गोविंददेव को कुछ जरूरी चीज देनी है।’

– ‘यदि वह विक्षिप्त है तो उसे भगाओ वहाँ से और यदि विक्षिप्त नहीं है तो जानने का प्रयास करो कि वह वास्तव में कौन है और क्या चाहता है?’ महंतजी ने ऊंघते हुए कहा। महंतजी अपने विश्राम में किसी तरह का खलल नहीं चाहते थे।

– ‘महाराज! वह चिचिलाती धूप में मंदिर के दरवाजे के सामने बैठा रो रहा है।’

– ‘तो रोने दो उसे। थोड़ी देर में चला जायेगा।’

सेवकों ने फिर से मुख्य द्वार पर आकर देखा, खान उसी तरह बैठा हुआ रो रहा था। सेवकों को लौट आया देखकर वह पुनः खड़ा हो गया- ‘पूछ आये महंतजी से? अब तो खोलो कपाट।’

सेवक उसकी बात का जवाब न देकर चुपचाप लौटने लगे। कपाट खुलते न देखकर खान और भी अधीर हो गया। उसने वहीं खड़े होकर जोर जोर से गाना आरंभ किया-

कमल –  दल      नैननि     की      उनमानि ।

बिसरत  नाहिं  सखी मो मन ते मंद  मंद  मुसकानि।।

यह दसननि दुति  चपला हूँ ते महा  चपल  चमकानि।

वसुधा  की  सबकरी  मधुरता  सुधा   पगी  बतरानि।

चढ़ी  रहे चित  उर बिसाल की  मुकुलमाल  थहरानि।

नृत्य समय  पीतांबर हू  की  फहरि  फहरि  फहरानि।

अनुदित  श्री वृंदावन  ब्रज  वे  आवन आवन  जानि।

अब रहीम चित्त ते न टरति है सकल स्याम की बानि।।

जाने क्या था खान के शब्दों में कि सेवक वहीं ठहर कर सुनने लगे। अचानक उन्होंने देखा कि मंदिर के कपाट स्वतः खुलने लगे और एक बालक बाहर आया। उसने खान का हाथ पकड़ कर पूछा- ‘क्यों रहीम! क्यों रोते हो?’

– ‘कोई मुझे भीतर नहीं जाने देता।’

– ‘क्या करोगे भीतर जाकर? मैं तो यहीं आ गया।’ बालक ने खान का हाथ थाम कर कहा।

– ‘तुम कौन हो?’

– ‘मुझे नहीं जानते?’

– ‘नहीं!’

– ‘मैं तुम्हारा गोविंददेव।’

– ‘अच्छा बताओ तो मैं आपके लिये क्या लाया हूँ?’ खान ने पूछा।

– ‘तुम मुझे अपना मन देने लाये थे, मैंने तुम्हारा मन ले लिया। अब और क्या काम है?’ बालक ने मुस्कुरा कर पूछा।

– ‘प्रसाद चाहिये।’

– ‘ये लो, प्रसाद भी लो और अब जाओ वापिस।’ बालक ने अपनी मुठ्ठी में से खान को प्रसाद दिया।

– ‘मैं ऐसे नहीं जाऊँगा।’

– ‘तो फिर कैसे जाओगे?’

– ‘तुम्हें छिपा कर जाऊँगा।’

– ‘क्यों? छिपा कर क्यों?’

– ‘ताकि कोई तुम्हें देख नहीं सके।’

– ‘तुम मुझे कहाँ छुपाओगे रहीम? जहाँ भी छुपाओगे कोई न कोई ढूंढ ही लेगा।’

– ‘एक जगह है मेरे पास, वहाँ आपको कोई नहीं ढूंढ सकेगा।’

– ‘कौनसी जगह है?’

– ‘मेरे हृदय में बहुत अंधेरा है नाथ। आप वहाँ छिपकर रहिये। आप को वहाँ कोई भी नहीं ढूंढ सकेगा।

नवनीतसार मपह्यत्य शंकया स्वीकृतं यदि पलायनं त्वया।

मानसे  मम  घनान्धतामसे  नन्दनन्दन कथे न लीयसे।’

खान फिर से रो-रो कर गाने लगा।

– ‘अच्छा तो ठीक है मैं तुम्हारे हृदय में छुप कर रहूंगा। देखो, किसी को बता न देना।’

– ‘नहीं नाथ! मैं किसी को नहीं बताऊँगा।’

– ‘अच्छा, अब यहाँ से चलें! यह महंतजी के विश्राम का समय है।’

मंदिर के सेवकों ने जब यह दृश्य देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। उन्होंने दौड़कर महंतजी को सारा किस्सा बताया। महंतजी शैय्या त्याग कर खड़ाऊँ की खट्-खट् करते हुए जब तक द्वार पर आये तब तक द्वार पर कोई नहीं रह गया था। न खान और न प्रसाद देने वाला बालक।[2]

-अध्याय 132, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  रत्नाकरोऽस्ति सदनं गृहिणी च पद्मा

   किं देयमस्ति भवते जगदीश्वराय।

   राधागृहीतमनसे मनसे च तुभ्यं

   दत्तं मया निजमनस्तदिदं गृहाण।।- खानखाना कृत।

[2]  विद्या निवास मिश्र रहीम र्गंथावली की भूमिका में इस घटना का उल्लेख किया गया है।

बेहोशी (133)

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आज पूरे चार दिन बाद रहीम की बेहोशी टूटी थी। जाने कहाँ-कहाँ से ढूंढ कर लायी थी जाना उसे। तीन दिनों की भागम भाग के बाद खानखाना दिल्ली के बाहर जंगलों में बेसुध पड़ा हुआ मिला था।

– ‘बेटी जाना!’

– ‘हाँ अब्बा हुजूर।’

– ‘देखो तो कमरे में कितना अंधेरा घिर आया है, जरा रौशनी करो बेटी।’  खानखाना ने छटपटा कर कहा।

आज पूरे चार दिन बाद रहीम की बेहोशी टूटी थी। जाने कहाँ-कहाँ से ढूंढ कर लायी थी जाना उसे। तीन दिनों की भागम भाग के बाद खानखाना दिल्ली के बाहर जंगलों में बेसुध पड़ा हुआ मिला था। तब से हकीम का इलाज चल रहा था किंतु उसकी बेहोशी टूटती ही नहीं थी। आज अचानक शाम के समय खानखाना ने आँखें खोलीं।

– ‘यह शमां आपके पलंग के पास ही रौशन है पिताजी।’ जाना वृद्ध पिता की यह दशा देखकर चौंक पड़ी।

– ‘हाँ-हाँ! यह शमां और यह फानूस भी तो रौशन है। जाने क्यों मुझे दिखायी नहीं दिया लेकिन वह कहाँ गया?’

– ‘वह कौन अब्बा हुजूर?’

– ‘वह जो बालक बन कर मेरे साथ खेल रहा था?’

– ‘कौन अब्बा हुजूर, कौन खेल रहा था बालक बनकर?’

– ‘अरे वही, मधुसूदन! देवकी नंदन…………..!’ अचानक ही खानखाना अपनी बात अधूरी छोड़कर छत की ओर देखकर चिल्ला उठता है- ‘मेरी ओर देखो परमात्मन्! हे कृपा निधान! फिर से बोलो दयानिधान! मुझे इस तरह जंगल में छोड़कर कहाँ जा छिपे हो? कब से तो आपको ढूंढ रहा हूँ!’ खानखाना ने अत्यंत बेचैन होकर कहा तो जाना बाप के सीने पर झुक कर उसकी मालिश करने लगी। खानखाना बेहोश हो गया।

कुछ ही देर में खानखाना को फिर होश आया। उसने देखा कि न तो जंगल है और न करील के वे विशाल कुंज। मुरली मनोहर का कोई पता नहीं है। जाने कब तक वह बूढे़ रहीम के साथ आँख-मिचौनी खेलता रहा था और अचानक ही जाने कहाँ जाकर गायब हो गया था। मुरली मनोहर के स्थान पर जाना उसके पास थी।

– ‘जाना!’

– ‘हाँ अब्बा हुजूर।’

– ‘हम कहाँ हैं बेटी?’

– ‘आप बाबा हुजूर बैरामखाँ वाली हवेली में हैं।’

– ‘हम यहाँ कब आये?’

– ‘आप आये नहीं अब्बा हुजूर! आपको लाया गया है।’

– ‘कब?’

– ‘आज हवेली में आये हुए आपको चार दिन हो गये।’

– ‘हम कहाँ थे?’

– ‘आप दिल्ली के बाहर जंगलों में बेहोश पड़े हुए थे। आप वहाँ क्यों गये थे अब्बा हुजूर?’

– ‘वही तो हम सोच रहे हैं बेटी कि वह हमें मथुरा से दिल्ली की सरहद तक तो लाया किंतु जंगल में ही छोड़कर गायब क्यों हो गया?’

– ‘कौन कहाँ पहुँचा कर गायब हो गया?’

– ‘तू नहीं जानेगी।’

– ‘कुछ तो बताइये अब्बा हुजूर, आप अचानक कहाँ चले गये थे और फिर पूरे तीन दिन बाद आप जंगल में बेहोशी की हालत में क्यों मिले? किसने की आपकी ऐसी दशा?’

– ‘कुछ खाने को दो जाना। बहुत भूख लग रही है। उसने हमें भगा-भगा कर थका ही डाला।’ खानखाना ने जाना की बातों का उत्तर न देकर कहा।

जाना खानखाना के लिये कुछ खाने को लाने के लिये चली गयी। जब वह अपने हाथों में समां के चावल और दूध लेकर लौटी तो उसने देखा वृद्ध पिता फिर से बेसुध हो गया है। उसने चावल एक ओर रखकर अपना माथा पीट लिया।

-अध्याय 133, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

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