इतिहास की दृष्टि से इस्लाम का उदय तथा प्रसार बहुत पुराना नहीं है। इस्लाम को धरती पर आए हुए केवल 1400 साल हुए हैं किंतु इतने कम समय में ही धरती का ऐसा कोई कोना नहीं है जहाँ इस्लाम के किसी न किसी फिरके का कोई न कोई अनुयायी न रहता हो!
मध्य एशिया में स्थित ‘सउदी अरेबिया’ नामक देश के ‘मक्का’ नगर में रहने वाले ‘कुरेश कबीले’ में ई.570 में ‘हजरत मुहम्मद’ का जन्म हुआ। लगभग चालीस वर्ष की आयु में उन्होंने ‘इस्लाम’ की स्थापना की तथा मूर्तिपूजा का विरोध किया।
ई.622 में हजरत मुहम्मद, मक्का से मदीना गये, वहाँ उन्होंने अपने अनुयायियों की एक सेना संगठित करके मक्का पर आक्रमण कर दिया तथा सैन्य-बल से मक्का में सफलता प्राप्त की। मुहम्मद, न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिये गये वरन् राजनीति के भी प्रधान बन गये और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गये। जिस तेजी से इस्लाम का उदय तथा प्रसार हुआ, उतनी तेजी से किसी अन्य मजहब का नहीं हुआ।
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इस प्रकार पैगम्बर मुहम्मद के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया और मुहम्मद के जीवन काल में ही इस्लाम को सैनिक तथा राजनीतिक स्वरूप प्राप्त हो गया। हजरत मुहम्मद के बाद उनके उत्तराधिकारी ‘खलीफा’ कहलाये। मुहम्मद के बाद उनके ससुर अबूबकर, प्रथम खलीफा चुने गये। उनके प्रयासों से मेसोपोटमिया तथा सीरिया में इस्लाम का प्रचार हुआ। अबूबकर की मृत्यु होने पर ई.634 में ‘उमर’ खलीफा बने। उन्होंने इस्लाम के अनुयायियों की एक विशाल सेना संगठित की और साम्राज्य विस्तार तथा धर्म प्रचार का कार्य साथ-साथ आरम्भ किया। इस्लाम का उदय तथा प्रसार मध्य एशिया में बड़ी क्रांति लेकर आया। जिन देशों पर उनकी सेना विजय प्राप्त करती थी वहाँ के लोगों को मुसलमान बना लेती थी। इस प्रकार थोड़े ही समय में फारस, मिस्र आदि देशों में इस्लाम का प्रचार हो गया। खलीफाओं ने इस्लाम का दूर-दूर तक प्रचार किया। खलीफाओं के समय में भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा, न केवल इस्लाम के अपितु राज्य के भी प्रधान होते थे। उनके राज्य का शासन कुरान के अनुसार होता था। इस कारण शासन पर मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव रहता था।
इस प्रकार इस्लाम का प्रचार शान्तिपूर्ण विधि से उपदेशकों द्वारा नहीं, वरन् खलीफा के सैनिकों द्वारा तलवार के बल पर किया गया। जहाँ कहीं इस्लाम का प्रचार हुआ वहाँ की धरा रक्त-रंजित हो गई। इस्लामी सेनाध्यक्ष, युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिये ‘जेहाद’ अर्थात् धर्म युद्ध का नारा लगाते थे जिसका अर्थ था, विधर्मियों का विनाश।
इस्लाम का भारत में प्रवेश
इस्लाम का उदय भारतवासियों के लिए बड़ा संकट था। ई.711 में ईरान के गवर्नर हज्जाज ने बगदाद के खलीफा की आज्ञा लेकर अपने भतीजे ‘मुहम्मद बिन कासिम’ जो कि हज्जाज का दामाद भी था, की अध्यक्षता में एक सेना सिन्ध पर आक्रमण करने भेजी। यह भारत पर इस्लाम का प्रथम आक्रमण था।
इसका प्रभाव बहुत कम समय के लिये तथा बहुत कम स्थान तक सीमित था किंतु जब अफगानिस्तान में इस्लाम के अनुयायियों का शासन स्थिर हो गया, तब भारत पर इस्लामी सेनाओं के आक्रमण बढ़ गये तथा अंततः ई.1193 में दिल्ली उनके अधीन चला गया। इस प्रकार इस्लाम के अनुयायियों ने आक्रांताओं तथा विजेताओं के रूप में भारत में प्रवेश किया।
सांस्कृतिक संघर्ष
विजेता इस्लामी सेनाओं तथा उनके नेताओं की वेष-भूषा, खान-पान, लिपि एवं भाषा, दर्शन एवं अध्यात्म आदि के रूप में एक परिपक्व संस्कृति थी जो भारत की मूल संस्कृति से काफी अलग थी। चूंकि वे विजेता के रूप में आये थे इसलिये उन्होंने पराजित भारतीय संस्कृति को अपनाने से मना कर दिया तथा उन्होंने अपनी हर बात को पराजित भारतीय संस्कृति पर थोपने की चेष्टा की। इस प्रकार इस्लाम का उदय तथा प्रसार भारत के शांत लोगों के जीवन में बड़ी उत्तेजना लेकर आया।
इस कारण स्वाभाविक ही था कि भारतीय लोग इस संस्कृति को नकार देते तथा उनसे घृणा करते। इस प्रकार राजनीतिक संघर्ष के साथ-साथ सांस्कृतिक संघर्ष भी आरम्भ हो गया जिसके कारण दोनों संस्कृतियों के बीच इतनी गहरी खाई उत्पन्न हो गई जिसे पाटना लगभग असंभव हो गया। इस सांस्कृतिक संघर्ष को रोकने तथा चौड़ी होती जा रही खाई को पाटने के लिये इस्लाम के भीतर एक अध्यात्मिक क्रांति हुई जिसे सूफी मत कहा जाता है।
भारत में सूफी मत का आगमन एक युगांतरकारी घटना थी। सूफ मत ने इस्लाम को तो प्रभावित किया ही, साथ ही हिन्दुओं के मन में भी कुछ आकर्षण उत्पन्न किया।
शरीअत के खिलाफ बगावत
कुछ विद्वानों का मत है कि सूफीवाद, इस्लाम की शरीअत के खिलाफ एक बगावत थी। सूफी मत कोई एक मत नहीं है। इसमें सैंकड़ों सम्प्रदाय हैं तथा प्रत्येक सम्प्रदाय की अलग-अलग मान्यताएं हैं।
सूफियों का इस्लामियां सम्प्रदाय मानता है कि हजरत अली विष्णु के दसवें अवतार थे। हिन्दूओं के मन से मुसलमानों के प्रति कट्टर घृणा का भाव कम करने में इन सूफियों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।
अनेक हिन्दू ‘इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन्ह हिन्दू वारिये’ कहकर सूफियों के अनुयायी हो गये। यही कारण है कि नागौर के सूफी फकीर सुल्तानुत्तारकीन हमीमुद्दीन को हिन्दू तार किशनजी कहते हैं तथा उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं।
सादा जीवन
भारत में सूफी मत लाने वाले फकीरों ने धन-सम्पत्ति को ठुकरा कर सादा जीवन व्यतीत किया। इस कारण भी भारतीय समाज उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखने लगा।
नागौर के सूफी फकीर सुल्तानुत्तारकीन हमीमुद्दीन के वंशज ख्वाजा हुसैन नागौरी ने अपनी सारी संपत्ति निर्धन लोगों में बांट दी तथा अपने पास केवल एक छकड़ा रख लिया जिस पर बैठकर वे दूर-दूर की यात्राएं किया करते थे। उन्होंने अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में तथा नागौर में सुल्तानुत्तारकीन हमीमुद्दीन की दरगाह में कुछ भवन बनवाये।
गीत-संगीत की प्रधानता
चूंकि सूफी लोग भी भारतीयों की तरह गीत-संगीत तथा नृत्य के माध्यम से ईश्वर की कृपा प्राप्त करने की चेष्टा करते थे इसलिये बहुत से सूफी फकीर भारतीयों के मन को भा गये।
अमीर खुसरो ने सितार नामक वाद्ययंत्र का तथा ब्रज मिश्रित कव्वाली गायन विधा का विकास किया। इन सूफियों के प्रयासों से भारतीयों के मन में इस्लाम के प्रति वह कट्टरता नहीं रही जो सूफियों के आने से पहले हुआ करती थी। अमीर खुसरो का यह गीत इस संदर्भ में विशेष लोकप्रिय है-
छाप तिलक सब छीनी रे
सैंया ने मोसे नैना मिलाके।
प्रेम भटी का मदवा पिलाके,
मतवाली कर दीनी रे
सैंया ने मो से नैना मिलाके।
बलबल जाऊं मैं तोरे रंगरेजवा
अपनी सी रंग लीनी रे
सैंया ने मौसे नैना मिला के।
हरी-हरी चूड़ियां, गोरी-गोरी बहियां,
हथवा पकड़ हर लीन्ही रे
सैंया ने मो से नैना मिलाके।
खुसरो निजाम के बल बल जइये,
मोहे सुहागन कीन्हीं रे
सैंया ने मो से नैना मिलाके।
वसंतोत्सव का आयोजन
भारतीय परम्पराओं को अपना लेने के कारण सूफी मत भारतीयों का मन जीतने में सफल हुआ। निजामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो ने सूफियों में वंसतोत्सव मनाने की परम्परा आरम्भ की।
कहा जाता है कि निजामुद्दीन औलिया ने अपने बहिन के पुत्र इकबाल को अपने पास रखकर पाला किंतु दैवयोग से वह 17-18 साल की आयु में मर गया। इस पर निजामुद्दीन औलिया बहुत दुखी रहने लगे। एक बार वे दिल्ली के निकट महरौली के जंगल में एक तालाब के किनारे दुखी मन से बैठे थे। अमीर खुसरो से अपने गुरु की यह दशा देखी नहीं गई।
उस दिन बसंत पंचमी थी तथा हिन्दू जनता पीले कपड़े पहनकर मंदिरों में पीले फूल चढ़ाने के लिये नाचती गाती जा रही थी। उन्हें देखकर अमीर खुसरो ने भी सरसों के पीले फूल तोड़े तथा निजामुद्दीन औलिया के चरणों में ले जाकर रख दिये। यह देखकर उन्होंने अमीर खुसरो से पूछा कि यह क्या है?
इस पर खुसरो ने जवाब दिया कि आज बसंत पंचमी को हिन्दू अपने देवताओं को पीले फूल चढ़ा रहे हैं इसलिये मैंने भी अपने गुरु को पीले फूल अर्पित किये हैं। शिष्य का यह समर्पण देखकर गुरु के हृदय में आशा और आनंद का संचार हुआ। उसी दिन से सूफी फकीरों की दरगाह पर बसंतोत्सव मनाया जाने लगा।
इस्लाम के उदय एवं प्रसार के कई सौ साल बाद सूफी परम्परा का जन्म हुआ। सूफी परम्परा के कुछ सिद्धांत इस्लाम से मेल खाते हैं तो कुछ सिद्धांत दुनिया के अन्य सम्प्रदायों एवं दर्शनों से मेल खाते हैं।
वैराग्ययुक्त साधना द्वारा अल्लाह की उपासना को श्रेयस्कर मानने वाले सूफी कहलाते थे। सूफी परम्परा अथवा ससव्वुफ इन्हीं फकीरों की देन है। यह एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक परम्परा है तथा इसका इतिहास इस्लाम की तरह पुराना है। सूफी शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है।
प्रायः यह अरबी भाषा के सफा शब्द से बना हुआ माना जाता है जिसका अर्थ पवित्र तथा शुद्ध होता है। इस प्रकार सूफी एक ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जो मन, वचन एवं कर्म से पवित्र हो। कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी शब्द की व्युत्पत्ति सोफिया शब्द से हुई है। सोफिया का अर्थ ज्ञान होता है अतः सूफी उसे कहते हैं जो ज्ञानी हो।
इसकी व्युत्पत्ति सफ शब्द से मानने वालों का मत है कि सफ का अर्थ पंक्ति अथवा प्रथम श्रेणी होता है, अतः सूफी उन पवित्र व्यक्तियों को कहा जाता है जो अल्लाह के प्रिय होने के कारण कयामत के दिन प्रथम पंक्ति में खड़े होंगे। अरबी भाषा में सूफ ऊन को कहते हैं। अतः सूफी शब्द का अर्थ सूफ अर्थात् एक प्रकार के पश्मीने से है।
यह लबादा मोटे ऊन का बनता था और अत्यधिक सस्ता होता था। यह सादगी तथा निर्धनता का प्रतीक माना जाता था। पश्चिम एशिया में ऐश्वर्य तथा भौतिक वैभव से परे सादा-सरल जीवन यापन करने वाले संत (इस में ईसाई भी शामिल थे) इस प्रकार का वस्त्र धारण करते थे। अल्लाह की उपासना में तल्लीन मुसलमान फकीरों ने भी इसे अपना लिया।
वे इसी वस्त्र के धारण करने के कारण पवित्रता, सादगी तथा त्याग के प्रतीक बन गये और सूफी कहलाने लगे। एक विचारधारा के अनुसार सूफी मत पैगम्बर मुहम्मद के रहस्यमय विचारों को प्रतिनिधित्व करता है। कुरान शरीफ तथा हदीस में कतिपय उल्लेख इसके मौलिक रूप से सम्बन्धित हैं। इस प्रकार सूफी मत, इस्लाम के समान ही प्राचीन माना जाता है।
सूफी परम्परा पर वैश्विक दर्शनों का प्रभाव
सूफी मत का जन्म भले ही विदेशी धरती पर हुआ हो किंतु उसका पोषक तत्व भारतीय वेदान्त वाद है। सूफी प्रेम काव्य कोमल हृदय की सुन्दर एवं सरस अभिव्यक्ति है। कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी मत पर चार दार्शनिक प्रभाव हैं-
1. आर्यों का अद्वैततवाद एवं विशष्टाद्वैतवाद,
2. नव अफलातूनी मत
3. विचार स्वातंत्र्य
4. इस्लाम की गुह्य विद्या।
सूफी मत का आदम में बीजवपन हुआ, नूह में अंकुर जमा, इब्राहीम में कली खिली, मूसा में विकास हुआ, मसीह में परिपाक हुआ तथा मुहम्मद में फलागम हुआ। सूफी मत के स्वरूप के सम्बन्ध में एक विद्वान ने लिखा है- ‘ईश्वर द्वारा पुरुष में व्यक्तित्व की समाप्ति और ईश्वर की उद्बुद्धि का नाम तसव्वुफ है। यह एक प्रकार से रहस्यवाद है तथा आदर्शवाद से भिन्न है।
सूफी परम्परा पर शामी जातियों का प्रभाव
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सूफी मत का आदि स्रोत हमें शामी जातियों की आदिम प्रवृत्तियों में मिलता है। सूफी मत की आधार शिला रति भाव था, जिसका पहले पहल शामी जातियों ने बहुत समय तक विरोध किया था। मूसा और मुहम्मद ने संयत भोग का विधान किया। मूसा ने प्रवृत्ति मार्ग पर जोर देकर लौकिक प्रेम का समर्थन किया। सूफी इश्कमजाजी को इश्कहकीकी की पहली सीढ़ी मानते हैं। सूफियों के इलहाम और हाल की दशा का मूल भी शामी जातियों में पाया जाता है। कुछ शामी रतिदान से घृृणा करने के कारण नबी की संतान कहलाये। कभी-कभी वे देवता के वश में होकर जो कुछ बोलते थे, वह इलहाम कहलाया और इनकी ऐसी दशा हाल। सूफियों ने पीर परस्ती तथा समाधि पूजा भी शामियों से ली। शामियों में मूर्ति चूमने की परिपाटी थी जो सूफियों में बोसे और वस्ल के रूप में ग्रहण की गई। सूफियों के प्रमुख तत्व प्रेम का स्रोत भी शामियों की गुह्य मण्डली थी जिसमें निरन्तर सुरा सेवन होता रहता था। कहीं हाल आ रहा है, कहीं करामात दिखाई जा रही है है। उस आधार पर कहा जा सकता है कि सूफियों के पूर्व पुरुष ये नबी ही हैं जो सहजानंद के उपासक थे और आत्मशुद्धि के लिये अनेक प्रकार के उपायों का आश्रय लेकर प्रेम का राग अलापते थे।
इन्हीं की भावना सूफी मत में पल्लवित और पुष्पित हुई। यद्यपि यहोवा के आविर्भाव के कारण नबियों की प्रतिष्ठा क्षीण हो गई तथापि सूफीमत को इन्हीं नबियों का प्रसाद समझना चाहिये।
सूफी परम्परा पर यहोवा का प्रभाव
आरम्भ में यहोवा के उपासकों की कट्टरता और संकीर्णता के कारण मादक भाव (हाल) को भारी क्षति पहुंची किंतु बाद में यही भाव उनमें कव्वाली के रूप में मान्य हुआ। यहोवा ने रतिक्रिया से दूर रहने की काफी चेष्टा की कि यहोवा मंदिरों में देवदासों और देवदासियों के रूप में प्रेम का यह स्रोत फूट पड़ा।
हसीअ को यहोवा के इस प्रेम में अपने अली के प्रेम का प्रमाण मिला। सूफियों की इश्कमजाजी तथा इश्कहकीकी में यही भावना निहित है। सुलेमान के गीतों में भी प्रेम की इसी दशा के दर्शन होते हैं। परमात्मा और आत्मा इन गीतों के दुल्हा-दुल्हन होते हैं। इन गीतों में लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति है। यही पद्धति सूफियों के यहां मान्य है।
वेदान्त का प्रभाव
यसअियाह ने अहं ब्रह्मास्मि की घोषणा करके अद्वैत की प्रतिष्ठा की उसके गान में करुणा, वेदना और कामुकता का सम्मिश्रण है। इस प्रकार वे अंशतः सूफी हैं।
मसीह का प्रभाव
मसीह के आविर्भाव से शामी जातियों में विराग की प्रवृत्ति जागी किंतु धीरे-धीरे उपासकों में प्रणय भावना प्रचारित होती गई। एक स्थान पर मसीह को दूल्हा तथा उनके भक्तों को दुल्हन कहा गया है। संभवतः इस पर यूनान की गुप्त टोलियों या अफलातून के प्रेम का प्रभाव पड़ा हो। जिनका मसीह पर विश्वास नहीं जमा, उन्हें नास्तिक कहा गया।
नास्तिक मत का प्रभाव
नास्तिक नामक मत का प्रवर्तक साइमन नामक फकीर था। इस नास्तिक मत का प्रभाव सूफी मत पर भी पड़ा। इसी कारण सूफी आज भी पीरेमुगां का जाप करते हैं तथा उससे मधुपान की याचना करते हैं। मादन भाव नास्तिक मत का प्रधान अंग था। सूफी मत का प्राचीन नाम भी नास्तिक मत मिलता है।
बुद्ध का प्रभाव
नास्तिक मत की बिखरी शक्तियों से मानी मत का विकास हुआ। सूफी मत के विकास में मानी मत का बड़ा योगदान है। मानी मत पर बुद्ध का प्रभाव पड़ा था। गुरु-शिष्य परम्परा का विधान, मूर्तियों के खण्डन और जन्मान्तर निरूपण के सम्बन्ध में मानी मत ने जिस विचारधारा को जन्म दिया, वह सूफी मत हो गया। सूफियों का स्वतंत्र मत जिन्दी मानी मत का अवशेष है। मानी मत की परिणति तसव्वुफ हो गई।
अफलातून के दर्शन का प्रभाव
मसीह के मत के यूनान में पहुंचने पर उस पर अफलातून के दर्शन का प्रभाव पड़ा। फिर प्लेटिनस के द्वारा उस पर भारतीय दर्शन का भी प्रभाव पड़ा। प्लेटिनस ने पृथ्वी से लेकर नक्षत्र मण्डल तक व्याप्त अलौकिक सत्ता के आलोक का वर्णन अनूठे ढंग से किया है। सूफियों की अध्यात्म भावना इससे अत्यंत प्रभावित है। सूफी मत में इस प्रभाव से जो आनन्द प्रस्फुटित हुआख् वह प्रजा और प्रेम का प्रसाद है।
सूफी परम्परा पर मुहम्मद का प्रभाव
सूफी मत के इतने विकास के बाद पैगम्बर मुहम्मद का नबी के रूप में आविर्भाव हुआ। उन्होंने कुरान को इलहाम कहकर इस्लाम का प्रवर्त्तन किया। यह नए प्रारूप में इस्लाम का उदय तथा प्रसार था। सूफियों ने ईमान और दीन की अपेक्षा इलहाम पर अधिक जोर दिया। यही कारण है कि उन्हें पूर्णरूपेण सूफी नहीं कहा जा सकता है। उनकी भक्ति में प्रेम के स्थान पर दास्य भाव है। प्रेम और संगीत के अतिरिक्त सूफियों के प्रायः सभी लक्षण पैगम्बर मुहम्मद में पाये जाते हैं।
सूफी परम्परा का भारत में प्रवेश
भारत में सूफी मत का प्रचार 12वीं शताब्दी में प्रसिद्ध सूफी अल्हुज्विरी के आगमन से हुआ। आइने अकबरी में सूफियों के 14 सम्प्रदाय बताये गये हैं जिनमें से भारत के चार सूफी सम्प्रदाय अधिक प्रसिद्ध हुए-
1. कादरी सम्प्रदाय
2. सुहरावर्दी सम्प्रदाय
3. नक्शबंदी सम्प्रदाय
4. चिश्ती सम्प्रदाय
सूफियों में चिश्तिया सम्प्रदाय सबसे उदार और लोकप्रिय सम्प्रदाय माना जाता है। चिश्ती संप्रदाय के संस्थापक ख्वाजा अबू-इसहाक-शामी चिश्ती, हजरत अली के वंशज थे। खुरासान के चिश्त नगर में रहने के कारण वे चिश्ती कहलाये। चिश्त तथा फीरोजकुह इनके केन्द्र थे जो अधिक समय तक स्थाई न रहे। सूफी दरवेशों के रूप में वहीं से चलकर वे भारत आये।
गौस उल-आजम महबूब सुभानी शेख अब्दुल जिलानी
ईराक की राजधानी बगदाद में गौस उल-आजम महबूब सुभानी शेख अब्दुल जिलानी की दरगाह है। वह सूफी परम्परा का फकीर था। इस संप्रदाय के फकीर पैरों में जूते-चप्पल नहीं पहनते थे तथा कपड़ों के स्थान पर एक मोटा ऊनी लबादा धारण करते थे। इनकी संख्या बहुत कम थी और ये स्थान-स्थान पर घूम कर ईश्वर की आराधना का उपदेश दिया करते थे। पैगम्बर मुहम्मद सूती लबादा ओढ़ते थे। अतः सूफी फकीरों को ऊनी लबादा ओढ़ने के कारण इस्लाम विरोधी माना जाता था।
ऊनी लबादा धारण करने की परम्परा ईसाइयों में थी। अनेक सूफियों ने अपने आप को पैगम्बर मुहम्मद द्वारा प्रतिपादित इस्लाम से अलग माना। ईसाइयों ने भी कोशिश की कि वे सूफी मत को अपनी ओर खींच लें। इसलिये उन्होंने सूफी फकीरों को मूहन्ना अथवा मसीहा का शिष्य कहना प्रारंभ कर दिया किन्तु इन दोनों मतों में मौलिक अन्तर है।
मसीहा का मूल मंत्र विराग है जबकि सूफी परम्परा के मूल में प्रेम का निवास है। ईसाई तो सूफी मत को भले ही अपने धर्म में घोषित नहीं कर पाये किन्तु सूफी फकीरों ने ईसाई धर्म में बहुत बड़ा एवं क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया। वर्तमान के मसीह मत में प्रेम का प्रसार सूफी परम्परा के संसर्ग का परिणाम है।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने गौर साम्राज्य की अंतिम सीमा पर स्थित अजमेर को अपना स्थाई निवास बनाया। मोइनुद्दीन चिश्ती के प्रारम्भिक जीवन विषयक प्रामाणिक सूचनाओं का प्रायः अभाव है।
गौस उल आजम का एक शिष्य था मोईनुद्दीन, जिसका जन्म फारस में हुआ था। ई.1186 में मोइनुद्दीन को अपने गुरु का उत्तराधिकारी चुना गया। उन दिनों अफगानिस्तान में इस्लाम धर्म का प्रचार नहीं था। अतः गौस उल आजम ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि वे अफगानिस्तान में जाकर इस्लाम का प्रचार करें।
सूफियों की एक बहुत बड़ी-विशेषता थी- ये जहाँ भी जाते वहाँ की संस्कृति, भाषा, खान-पान, रीति रिवाज और सामाजिक परम्पराओं को अपना लेते थे। वे शीघ्र ही पूरे अफगानिस्तान में फैल गये और वहाँ से भारत में आ गये। इनमें से मोइनुद्दीन भी एक थे। ई.1191 में मोइनुद्दीन अजमेर आये। उन्होंने फारसी या अरबी में धर्मोपदेश करने के स्थान पर ब्रजभाषा को अपनाया तथा ईश्वर की आराधना में हिन्दू तौर-तरीकों को भी जोड़ लिया। उन्होंने ब्रजभाषा में कव्वाली गाने की प्रथा आरम्भ की।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने गौर साम्राज्य की अंतिम सीमा पर स्थित अजमेर को अपना स्थाई निवास बनाया। मोइनुद्दीन चिश्ती के प्रारम्भिक जीवन विषयक प्रामाणिक सूचनाओं का प्रायः अभाव है। खैरुल मजलिस जैसे ग्रंथों में भी उनसे सम्बन्धित सूचनाएं नहीं हैं। जमाली द्वारा रचित मियारुल-अरिफिन में ख्वाजा से सम्बन्धित उन आख्यानों एवं वार्ताओं का संग्रह है जो ईरान तथा भारत में लोकप्रिय थीं।
इसके अनुसार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म सीस्तान में हुआ था और उनके पिता का नाम ख्वाजा गियासुद्दीन हसन था। वे समरकन्द, बुखारा, हरवान (निशापुर के निकट), बगदाद, अस्तराबाद, हेरात, बल्ख, गजना आदि का भ्रमण तथा ज्ञानोपलब्धि करते हुए लाहौर पहुँचे। वहाँ से दिल्ली होते हुए अजमेर पहुँचे। आरंभ में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा किंतु अंततः उन्हें सर्वसाधारण से आदर, श्रद्धा, प्रेम और समर्पण प्राप्त हुआ।
ख्वाजा के जीवन से सम्बन्धित मलफजातों में उनकी अलौकिक तथा आध्यात्मिक उपलब्धियों के विवरण प्राप्त होते हैं। उनसे स्पष्ट होता है कि ख्वाजा अपने जीवन काल में ही दिव्य चरित्र सम्बन्धी आख्यानों के केन्द्र बन गये थे।
शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुसार अजमेर नरेश पृथ्वीराज चौहान तथा उनके कर्मचारियों ने ख्वाजा के अजमेर प्रवास को स्वयं के लिये तथा राज्य के लिये अनिष्टकारी मानते हुए उन्हें कष्ट देने का प्रयास किया किंतु ख्वाजा की चमत्कारी और अलौकिक शक्ति के फलस्वरूप अंततः पृथ्वीराज चौहान (राय पिथौरा) को मुईजुद्दीन मुहम्मद के हाथों पराजित एवं अपमानित होना पड़ा।
कुछ लोगों के अनुसार मुइनुद्दीन चिश्ती मुहम्मद गौरी के लिए जासूसी करता था। उसी ने अजमेर में रहकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बारे में गुप्त जानकारियाँ मुहम्मद गौरी को भिजवाई थीं।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाएँ
ख्वाजा की चमत्कारिक शक्तियों तथा उनके द्वारा सम्पादित लोक कल्याणकारी कार्यों के प्रभावानुसार शताब्दियों तक उनके प्रति लोगों में श्रद्धावर्द्धन होता रहा। वे संसार में गरीब नवाज के नाम से जाने जाते हैं। मोइनुद्दीन चिश्ती के अनुसार चार वस्तुएं उत्तम होती हैं- प्रथम, वह दरवेश जो अपने आप को दौलतमंद जाहिर करे। द्वितीय वह भूखा, जो अपने आप को तृप्त प्रकट करे। तृतीय वह दुखी जो अपने आप को प्रसन्न दिखाये और चतुर्थ, वह व्यक्ति जिसे शत्रु भी मित्र परिलक्षित हो।
हमीदुद्दीन नागौरी की शिक्षाएँ
एक अनुश्रुति के अनुसार एक बार एक दरवेश ने ख्वाजा से एक अच्छे दरवेश (फकीर) के गुणों पर प्रकाश डालने के लिये विनय की। ख्वाजा का मत था कि शरिया के अनुसार पूर्ण विरक्त व्यक्ति अल्लाह के निर्देशों का पालन करता है और उसके द्वारा निषिद्ध कार्य नहीं करता। तरीका एक सच्चे दरवेश के लिये नौ करणीय कार्यों का विवरण देता है। जब ख्वाजा से इन नौ शर्तों की व्याख्या करने की प्रार्थन की तो उन्होंने अपने शिष्य हमीदुद्दीन नागौरी को इनकी व्याख्या करने और सभी के ज्ञान के लिये इन्हें लिपिबद्ध करने की आज्ञा दी।
शेख हमीदुद्दीन ने दरवेश जीवन के लिये आवश्यक नौ शर्तों का वर्णन इस प्रकार किया है-
1. किसी को धन नहीं कमाना चाहिये।
2. किसी को किसी से धन उधार नहीं लेना चाहिये।
3. सात दिन बीतने पर भी यदि किसी ने कुछ नहीं खाया है तो भी इसे न तो किसी को बताना चाहिये और न किसी से कोई सहायता लेनी चाहिये।
4. यदि किसी के पास प्रभूत मात्रा में भोजन, वस्त्र, रुपये या खाद्यान्न हो तो उसे दूसरे दिन तक भी नहीं रखना चाहिये।
5. किसी को बुरी बात नहीं कहनी चाहिये। यदि किसी ने कष्ट दिया हो तो उसे (कष्ट पाने वाले को) अल्लाह से प्रार्थना करनी चाहिये कि उसके शत्रु को सन्मार्ग दिखाये।
6. यदि कोई अच्छा कार्य करता है तो यह समझना चाहिये कि यह उसके पीर की कृपा है अथवा यह काई दैवी कृपा है।
7. यदि कोई बुरे काम करता है तो उसे उसके लिये स्वयं को दोषी मानना चाहिये और उसे अल्लाह का खौफ होना चाहिये। भविष्य में बुराई से बचना चाहिये। अल्लाह से खौफ करते हुए उसे बुरे कामों की पुनरावृत्ति नहीं करनी चाहिये।
8. इन शर्तों को पूरा करने के बाद दिन में नियमित उपवास रखना चाहिये और रात में अल्लाह की इबादत करनी चाहिये।
9. व्यक्ति को मौन रहना चाहिये ओर जब तक आवश्यक न हो, नहीं बोलना चाहिये। शरिया निरन्तर बोलना और पूर्णतः मौन रहना, अनुचित बताता है। उसे केवल अल्लाह को खुश करने वाले वचन बोलने चाहिये।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की अन्य शिक्षाएँ
1. दुनिया में दो बातों से बढ़कर कोई बात नहीं है- पहली विद्वानों की संगति तथा दूसरी बड़ों का सम्मान।
2. जीवन में सबसे अनमोल क्षण वे हैं जब मनुष्य इच्छाओं पर काबू पा लेता है।
3. ज्ञान वह है जो सूर्य की तरह उभरे और सारा संसार उसके प्रकाश से रोशन हो जाये।
4. सदाचारी लोगों की संगति सदाचार से अच्छी है तथा दुराचारी लोगों की संगति दुराचार से बुरी है।
5. मित्र की मित्रता में समस्त संसार का त्याग कर दिया जाये, तब भी कम है।
6. ज्ञानी हृदय सत्य का घर होता है।
7. भक्ति और तपस्या में सबसे बड़ा काम विनम्रता है।
8. ईश्वर का कृपापात्र वहीं मनुष्य होता है जिसके दिल में दरिया जैसी दानशीलता, सूर्य जैसी दयालुता और जमीन जैसी खातिरदारी हो।
9. सूफी का हृदय ईश्वर प्रेम की जलती हुई आग की भट्टी की तरह है। इसमें जो भी अन्य विचार आते हैं, वे जल कर राख हो जाते हैं क्योंकि प्रेम की आग के समान बलवान कोई अन्य आग नहीं है।
10. गरीब और बेसहारा लोगों की सेवा करना, भूखे को खाना खिलाना और बीमार तथा पीड़ित लोगों की मदद करने के समान कोई अन्य पूजा नहीं है।
11. ज्ञानी ईश्वर स्मरण के अतिरिक्त और कोई बात जिह्वा से नहीं निकालते।
12. नदियों का बहता पानी शोर करता है किंतु जब समुद्र में मिल जाता है तो शांत हो जाता है। इस तरह जब प्रेमी प्रियतम से मिल जाता है, तब वार्तालाप नहीं रहता है।
13. ज्ञानी वह है जब सुबह को उठे तो उसे रात के बारे में कुछ स्मरण नहीं रहे।
14. दरवेश वह है जो किसी को निराश नहीं जाने दे। यदिभूखा है तो खाना खिलाये, नंगा है तो अच्छा कपड़ा पहनाये। उसका हाल पूछ कर उससे सहानुभूति जताये।
15. गलत और नाजायज काम से स्वयं को दूर रखो।
16. मरने की ख्वाहिश मत करो किंतु मृत्यु को स्मरण रखो और मरने के लिये हर समय तैयार रहो।
17. जब बोलो सच बोलो तथा अपना वचन सदैव पूरा करो।
ख्वाजा की रहस्यवादी विचारधारा के अनुसार व्यक्ति की सबसे बड़ी इबादत अनाथों की मदद है। जो लोग ईश्वर की उपासना करना चाहते हैं, उनमें सागर की गम्भीरता, धूप जैसी दयालुता और पृथ्वी जैसी विनम्रता होनी चाहिये।
प्राणी मात्र से प्रेम
हिन्दू उन दिनों मुसलमानों की कट्टरता और हिंसक प्रवृत्ति से परेशान थे तथा उनके प्रति भारी घृणा रखते थे। जब हिन्दुओं ने सूफियों को इस प्रकार ईश्वर की आराधना करते देखा तो वे बड़े प्रभावित हुए। हिन्दू धर्म और दर्शन का मूल बिन्दु प्रेम है। जब उसी प्रेम के दर्शन उन्हें सूफियों के कलाम में हुए तो उन्होंने अपने हदय की ग्रन्थि को खोल फैंका और वे मोइनुद्दीन में आस्था रखने लगे। मोइनुद्दीन सरल हदय के स्वामी थे। वे प्राणी मात्र से प्रेम करने वाले और लोगों का उपकार चाहने वाले थे। इस कारण उन्होंने मुसलमानों से भी अधिक हिन्दुओं का दिल जीता।
मोइनुद्दीन चिश्ती का निधन
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन की कोई निश्चित तिथि नहीं मिलती। कुछ स्रोतों में उनका निधन ई.1227 में हुआ तथा कुछ अन्य स्रोत उनके निधन की तिथि ई.1235-36 के आसपास मानते हैं। कुछ विद्वान उनके निधन की तिथि 16 मार्च 1236 बताते हैं। उनके अनुसार 97 वर्ष की आयु में ख्वाजा जन्नतनशीन हुए।
ख्वाजा लोकगीतों में
ख्वाजा की मृत्यु के बाद लोकगीतों में उनकी दयालुता के किस्से गाये जाने लगे। लोक गीतों के कारण ख्वाजा की प्रसिद्धि अजमेर से दिल्ली और आगरा आदि क्षेत्रों में फैल गई। कहते हैं कि मुगल बादशाह अकबर को आगरा के निकट एक गांव में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के बारे में गीत सुनने को मिले। इन्हें सुनकर अकबर ख्वाजा की दरगाह पर जियारत करने अजमेर आया तथा इसके बाद पूरे दस साल तक अजमेर आता रहा।
मोइनुद्दीन चिश्ती का परिवार
ख्वाजा के बड़े पुत्र फखरुद्दीन ने अपने रहने के लिये माण्डल नामक कस्बे को चुना। फखरुद्दीन की मृत्यु के बाद उसे अजमेर के निकट सरवाड़ में दफनाया गया। मोइनुद्दीन के अन्य दो पुत्रों ख्वाजा अबुसईद एवं हिस्मुद्दीन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है। ख्वाजा मोइनुद्दीन की पुत्री बीबी हाफिज जमाल अजमेर में ही रही। ख्वाजा अजमेरी का पोता हिस्मुद्दीन सांभर में रहने लगा। ख्वाजा मोइनुद्दीन का खादिम ए खास मौलाना सयैद फखर्रूद्दीन अहमद गारदेजी जिसे मौलाना अहमद भी कहा जाता है, वह ख्वाजा मोइनुद्दीन की मजार का मुख्य संरक्षक बन गया। उसके वंशज खुद्दाम अथवा मुजविरन कहलाये। इन वंशजों ने इस मजार के चारों ओर अपनी झौंपड़ियां बनाईं।
यह कहा जा सकता है कि सूफी परम्पराओं से हटकर, अजमेर में ख्वाजा अजमेरी के वंशजों ने तथा नागौर में सूफी हमीदुद्दीन के उत्तराधिकारियों ने शासकीय अधिकारियों से मेलजोल बढ़ाया। जिस तरह हमीदुद्दीन के वंशज गुजरात, दिल्ली एवं देश के अन्य भागों में जाकर बस गये, उसी तरह शेख मोइनुद्दीन चिश्ती के वंशज भी देश के अन्य भागों में जाकर बस गये। उनमें से कुछ मेहदवी हो गये। इससे देश भर में चिश्तिया सम्प्रदाय के सूफियों का मत फैल गया। उनके कारण ही अजमेर की दरगाह देश के विभिन्न भागों में प्रसिद्ध पा गई।
ख्वाजा मोइनुद्दीन को उसी हुज्रा (कोठरी) में दफनाया गया जिसमें उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय प्रार्थनायें करने में व्यतीत किया था। इसी को अब मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहते हैं। आरंभ में यह कच्ची मजार के रूप में एक पहाड़ी पर स्थित थी जो झाड़ियों एवं पौधों से घिरी हुई थी। ख्वाजा हुसैन नागौरी ने उनकी समाधि पर एक मकबरा बनवाया।
दरगाह पर यात्राओं का सिलसिला
नागौर के सूफी हमीदुद्दीन, ख्वाजा मोइनुद्दीन के मुख्य खलीफाओं में से एक थे। वे ई.1274 ईस्वी तक जीवित रहे। वे तथा उनके अनुयायी ख्वाजा मोइनुद्दीन की मजार पर बरसों बरस यात्रा करते रहे। ख्वाजा की दरगाह के शुरुआती यात्रियों में शेख फरीदुद्दीन गंज ए शकर थे जिन्होंने ध्यान (मेडीटेशन) के लिये ख्वाजा की मजार के निकट स्थित एक चिल्ला (कोठरी नुमा गुफा) में काफी समय व्यतीत किया।
आज भी इसे बाबा फरीद का चिल्ला कहा जाता है। यह भी दावा किया जाता है कि ख्वाजा अजमेरी का मुख्य खलीफा शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, ख्वाजा मोइनुद्दीन की मजार की यात्रा करने वाला पहला मुख्य सूफी था।
यह भी कहा जाता है कि जिस वर्ष ख्वाजा मोइनुद्दीन का निधन हुआ, उसी वर्ष इल्तुतमिश ई.1227 में अजमेर आया। इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी नसीरुद्दीन महमूद ने नागौर तथा अजमेर के इक्तेदार इजुद्दीन बलबन के विद्रोह को कुचलने के लिये नागौर जाते समय अजमेर की यात्रा की।
अलाउद्दीन खलजी ने ई.1301 में रणथंभौर तथा ई.1303 में चित्तौड़ अभियान किया तथा राजस्थान में काफी समय व्यतीत किया। जैन स्रोतों के अनुसार अलाउद्दीन खलजी ने ख्वाजा मोइनुद्दीन की मजार की यात्रा की।
दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में से मुहम्मद बिन तुगलक ऐसा पहला सुल्तान था जिसकी इस मजार पर की गई यात्रा का सुस्पष्ट उल्लेख मिलता है। उसने ई.1332 में इस मजार की यात्रा की किंतु उसकी यात्रा धार्मिक उद्देश्य के लिये थी, या उसने जियारत की थी, इसका उल्लेख किसी भी समकालीन इस्लामी स्रोत में नहीं मिलता।
ई.1396 में गुजरात के तत्कालीन तुगलक गवर्नर जफर खां ने ख्वाजा की मजार की यात्रा की। वह मजार से तीन कोस पहले अपने घोड़े से उतर कर पैदल ही मजार तक गया तथा उसने विधि पूर्वक जियारत सम्पन्न की। साइमन डिग्बे ने इसे राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित यात्रा बताया है क्योंकि जफर खां की आंख दिल्ली के तख्त पर लगी हुई थी।
वह यह देखना चाहता था कि यदि अजमेर अधिकार में आ जाता है तो दिल्ली सल्तन के विरुद्ध उसकी ताकत में कितनी वृद्धि हो सकती है।
दिल्ली सल्तनत के पतन के बाद अजमेर राजपूतों के हाथों में आ गया। ई.1455 में माण्डू के सुल्तान महमूद खिलजी ने माण्डलगढ़ पर आक्रमण किया। अजमेर के खुद्दामों ने माण्डलगढ़ जाकर महमूद खिलजी से अनुरोध किया कि वे अजमेर को राजपूतों से छीन लें। महमूद उसी समय अजमेर के लिये चल पड़ा।
उसने ख्वाजा की दरगाह के ठीक सामने अपना डेरा जमाया और गढ़ बीठली को घेर लिया। चार दिन तक चली भयानक लड़ाई के बाद उसने दुर्गपति गजधर को मार डाला तथा गढ़ बीठली पर अधिकार कर लिया।
महमूद ने अपने सेनापति चिश्ती खां को अजमेर का चार्ज लेने के लिये कहा जो कि ख्वाजा अजमेरी के वंशजों में से था किंतु चिश्ती खां का परिवार माण्डू में रह रहा था, इसलिये उसने अजमेर का चार्ज लेने से मना कर दिया।
इस पर महमूद ने ख्वाजा नेमतुल्लाह को अजमेर का हाकिम नियुक्त किया तथा उसे सैफ खान की उपाधि दी। अजमेर में एक मुफ्ती तथा एक काजी की भी नियुक्ति की गई। ख्वाजा की दरगाह में एक मुदर्रिस की नियुक्ति की गई ताकि वह धार्मिक मामलों में आदेश दे सके।
दरगाह के बिल्कुल पास में एक मस्जिद बनाई गई तथा बुलंद दरवाजे का निर्माण किया गया जो आज भी मौजूद है। मजार तथा उसके आसपास के क्षेत्र को भी दुबारा से बनवाया गया। ख्वाजा के खुद्दाम को वजीफा भी निर्धारित किया गया। मांडू के शासकों ने मजार के निकट एक खानकाह का निर्माण करवाया।
ई.1351 में शेख बुरहानुद्दीन गरीब के शिष्य शेख जैनुद्दीन ने अजमेर दरगाह की यात्रा की। ई.1352 में शेख निजामुद्दीन औलिया के शिष्य मौलाना फखरुद्दीन जरदारी ने अजमेर दरगाह की यात्रा की। मखदूम जलालुद्दीन बुखारी, मीर सयैद जहाँगीर समनानी ने भी दरगाह की यात्रा की। सयैद मुहम्मद गेसू दराज ने उत्तर भारत की समस्त प्रमुख दरगाहों की यात्रा की जिनमें अजमेर की दरगाह भी सम्मिलित थी।
मगरीबी परम्परा के बाबा इशहाक ने ई.1377 में अजमेर दरगाह की यात्रा की। वह काफी दिनों तक अजमेर में रहा एवं ख्वाजा अजमेरी के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिये खाटू भी गया। उसका शिष्य एवं खलीफा शेख जमालुद्दीन अहमद खट्टो (ई. 1446-47) उन दिनों के बड़े सूफी संतों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था, उसने भी अजमेर दरगाह पर काफी समय व्यतीत किया।
माण्डू निवासी शेखुल इस्लाम सयैद नूरुद्दीन मुबारक गजनवी का पोता शाह नजमुद्दीन प्रमुख सुहरावर्दी फकीर था, उसने भी अजमेर दरगाह की संक्षिप्त यात्रा की। शह बदीउद्दीन मदार, मदारिया (कलंदरिया) परम्परा का प्रमुख संत था, उसने भी अजमेर दरगाह की यात्रा की। वह काकला पहाड़ पर ही डेरा जमाकर रहने लगा।
यह पहाड़ बाद में मदार टेकरी कहलाने लगा। उसके नाम पर आज भी अजमेर में मदार गेट, मदार रेलवे स्टेशन तथा मदार चिल्ला बने हुए हैं। अवध के शेख मीना तथा कालपी के मीर मुहम्मद ने भी अजमेर दरगाह की यात्रा की। इस प्रकार तेरहवीं शताब्दी से लेकर मध्य पंद्रहवीं शताब्दी तक देश के प्र्रमुख सूफी फकीरों एवं मुस्लिम शासकों ने अजमेर की यात्रा की। इनमें से कई लोग महीनों तथा बरसों तक अजमेर में रहे।
उन दिनों गुजरात, दिल्ली माण्डू तथा नागौर क्षेत्रों में रहने वाले साधारण मुसलमान भी दरगाह की यात्रा पर आया करते थे। हमीदुद्दीन नागौरी के वंशजों ने अजमेर दरगाह की विशेष रूप से यात्राएं कीं चाहे वे देश के किसी भी हिस्से में क्यों न रहते रहे हों। इनमें शेख कमालुद्दीन हुसैन नागौरी सर्वप्रमुख थे। इन्हें शेख हुसैन नागौरी भी कहा जाता है।
इन दिनों अजमेर में अशांति होने के कारण काफी लोग अजमेर छोड़कर चले गये। ख्वाजा के बहुत से वंशज भी अजमेर से चले गये। दरगाह पर भी केवल खुद्दाम ही बचे थे। पहाड़ों से शेर निकल कर दरगाह में घूमा करते थे। शेख हुसैन नागौरी ने अजमेर दरगाह में कुछ निर्माण कार्य भी करवाया।
बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि लगातार अफरा तफरी के माहौल के कारण लोगों ने ख्वाजा की दरगाह को भुला दिया। दरगाह उपेक्षित हो गई और आगरा में अकबर का शासन होने तक लोग ख्वाजा मोइनुद्दीन को भूले रहे। जबकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार शेख हुसैन नागौरी का शिष्य (खलीफा) शेख अहमद माज्द अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद अजमेर आ गया तथा 70 वर्ष तक ख्वाजा की दरगाह पर रहा। उसके पास अजमेर दरगाह के मुफ्ती का पद भी रहा।
कहा जाता है कि वह रात्रि में ख्वाजा की दरगाह पर पहुँचता। उसके लिये दरगाह के दरवाजे स्वतः खुल जाते। वह दरगाह में प्रवेश करके तहज्जुद (देर रात्रि की प्रार्थना) करता था तथा चश्त (मध्य प्रातः की प्रार्थना) तक किसी से कुछ नहीं बोलता था। उसके बाद वह वहीं बैठकर लोगों को धार्मिक निर्देश देता था।
ई.1516 में उसने अजमेर के लोगों से कहा कि राणा सांगा का आक्रमण होने वाला है इसलिये वे शहर छोड़कर चले जायें। शेख द्वारा यह बात कहने के एक सप्ताह बाद सांगा का आक्रमण हो गया। वह स्वयं भी अजमेर छोड़कर नारनौल चला गया। उस समय उसकी आयु 90 वर्ष थी।
सोलहवीं शताब्दी में गुजरात के शहजादे बहादुरशाह ने अजमेर दरगाह की यात्रा की। जब वह दरगाह पहुँचा तो बबन (बयीन मज्जूब) नामक सूफी फकीर दरगाह के दरवाजे पर बैठा हुआ था। बबन ने अपनी दासी से कहा कि वह शहजादे के लिये तख्त लेकर आये। शहजादा उन दिनों अपने पिता से चिढ़ा हुआ था।
इसलिये उसने फकीर के शब्दों को अपने लिये अच्छी भविष्यवाणी समझा। उसने दरगाह पर प्रतिज्ञा की कि यदि वह गुजरात का बादशाह बन जायेगा तो वह अजमेर पर कब्जा करके दरगाह परिसर में रखी समस्त मूर्तियों को तोड़ डालेगा। ये मूर्तियां ई.1515 से ई.1525 के बीच के समय में दरगाह परिसर में रखी गई थीं।
जब बहादुरशाह गुजरात का बादशाह बना तो उसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये अपने सेनापति शमशीरूल मुल्क को अजमेर पर अधिकार करने के लिये भेजा। शमशीरुल मुल्क ने सरलता से अजमेर पर अधिकार कर लिया तथा दरगाह में जियारत की।
दरगाह के मण्डप की उत्तरी दीवार पर सोने के अक्षरों में एक कविता लिखी है जिसमें कहा गया है कि दरगाह का गुम्बज ई.1532 में संवारा गया। वस्तुतः यह कार्य शमशीरुलमुल्क ने किया। बहादुरशाह अजमेर पर बहुत कम समय के लिये अधिकार रख सका। मेड़ता के वीरमदेव ने बहादुरशाह की सेनाओं को अजमेर से बाहर निकालकर अजमेर पर अधिकार कर लिया। शीघ्र ही जोधपुर के राव मालदेव ने वीरमदेव को अजमेर से बाहर निकालकर अजमेर पर अधिकार कर लिया।
पाण्डुआ (बंगाल) के निवासी नूर कुतुब ए आलम के शिष्य सयैद शम्सुद्दीन ताहिर ने 150 वर्ष की उम्र पाई। उसने भी अजमेर दरगाह की यात्रा की। वह दरगाह में काफी समय तक रहा। कहा जाता है कि उसने हमीदुद्दीन नागौरी के वंशज शेख रफीउद्दीन बयाजिद से अजमेर दरगाह में भेंट की जो स्थायी रूप से दरगाह में ही बस गये थे।
ई.1450 में मुलतान के शेख हुसैन ने अजमेर दरगाह की यात्रा की। वह 12 वर्ष तक दरगाह के निकट एक कोठरी में ध्यान एवं प्रार्थनाएं करता रहा। वह मालवा के शासक महमूद खिलजी तथा उसके पुत्र गयासुद्दीन का समकालीन था। नागोरे (तमिलनाडु) निवासी शेख शाह उल हमीद अपने समय का जानामाना सूफी था।
उसने भी अजमेर में ख्वाजा की दरगाह की यात्रा की। कहा जाता है कि ख्वाजा अजमेरी ने मुजाविरन (खुद्दाम) को पहले ही बता दिया कि संत शाह उल हमीद आ रहे हैं, इसलिये खुद्दाम ने शहर से बाहर जाकर संत का स्वागत किया।
गयासुद्दीन खिलजी के समय में मकबरे का गुम्बद बनाया गया। पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों अथवा सोलहवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में प्रसिद्ध कवि शेख जमाली ने अजमेर की यात्रा की। उसने अजमेर दरगाह की स्थापना की।
मुगलों से पहले, दिल्ली के शासकों में से सुल्तान बहलोल लोदी (ई.1451-88) एवं शेरशाह सूरी (ई.1544) ने भी अजमेर दरगाह की यात्रा की। ग्वालियर के ख्वाजा खानुन ने अजमेर दरगाह पर काफी समय व्यतीत किया। मौलाना शेख अब्दुल फतह नागौरी शट्टारी, शेख मुहम्मद गौस ग्वालियरी का उत्तराधिकारी था। वह भी अजमेर की दरगाह पर काफी समय रहा।
अहमदाबाद का रहने वाला शेख बुरहान अजमेर आया और उसका निधन अजमेर में ही हो गया। उसे दरगाह के निकट ही दफनाया गया। सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में सयैद सालार अजमेरी, ख्वाजा की दरगाह में रहता था। उसके उपदेश सुनने के लिये बड़ी संख्या में लोग जुटते थे। उसने भारत से बाहर भी बहुत से देशों का भ्रमण किया।
वह अपने समय का विद्वान सूफी था। उसके अनुयायियों में खिजर का पुत्र शेख मुबारक (अबुल फजल तथा फैजी) का पिता भी था। शेख सालार के प्रसिद्ध मुरीदों में सयैद अली घावास भी था जो पीर बाबा के नाम से प्रसिद्ध था। पीर बाबा का पिता हमायूं की सेवा में था। भारत आने के बाद पीर बाबा दरवेशी बन गया। पानीपत की यात्रा करने के बाद वह अजमेर आया तथा सैयद सालार अजमेरी का मुरीद बन गया।
अपने पीर के कहने पर वह अजमेर से उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश में जाकर चिश्ती सम्प्रदाय का प्रचार करने लगा, वहीं पर ई.1593 में उसकी मृत्यु हुई।
उसके खलीफा अखुम दरवेज तथा उसका पुत्र अब्दुल करीम थे। अखुंद दरवेज एक महान अफगान पीर था, उसने अपनी समस्त शक्तियों के साथ रोशनियां आंदोलन के बढ़ते हुए प्रभाव तथा उसके जनक शेख बैयाजिद पीर ए तारिक का विरोध किया। रोशनयिां मत का विरोध करने के लिये अखुंद ने चिश्ती सिलसिलाह की स्थापना की। इस क्षेत्र में नक्शबंदी तथा सुहरावर्दी सिलसिलाह प्रभावशाली होकर उभरे।
उमर चिश्ती खादिम के पुत्र शेख मांझू और शेख चवन ने भी अजमेर की यात्रा की। शेख मांझू ने अपने पैरों को लोहे की जंजीरों से बांध लिया तथा प्रतिज्ञा की कि वह उसी को अपना पीर मानेगा जो उसके पैरों की जंजीरों को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से तोड़ दे। वह हज पर भी गया।
अंत में मंदसौर में शेख दान ने उसके पैरों की जंजीरें अपनी आध्यात्मिक शक्ति से तोड़ीं। शेख चवन ई.1543 में माण्डू चला गया तथा माण्डू दुर्ग की तलहटी में स्थित नालचा में बस गया। खानदेश के एक वजीर के पुत्र मलिक महमूद बयाराह ने हज की यात्रा करने के बाद अजमेर दरगाह की यात्रा की। उसने दरगाह में मुल्तव्वली का दायित्व निभाया तथा ई.1576-77 में अजमेर शहर छोड़कर अहमदाबाद चला गया।
ई.1556 में मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर, आगरा एवं दिल्ली के तख्त पर बैठा। ई.1562 में अकबर शिकार खेलने के लिये गया एवं फतहपुर सीकरी के निकट मिधाकुर गांव से होकर गुजरा। वहाँ कुछ औरतें महान ख्वाजा की प्रशंसा में एक लोक भजन गा रही थीं।
अकबर उस भजन को सुनकर प्रभावित हुआ एवं अजमेर की यात्रा पर चल पड़ा। इसके बाद ख्वाजा की दरगाह के एक नये इतिहास की शुरुआत हुई तथा मुगलों एवं ख्वाजा की दरगाह का पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला सम्बन्ध आरम्भ हुआ। इस सम्बन्ध ने भारत के इतिहास को बहुत प्रभावित किया।
जनवरी 1562 में अकबर पहली बार अजमेर आया तथा उसने मोइनुद्दीन की मजार के बारे में पता लगाया। उस समय अजमेर उपेक्षित और बहुत छोटा कस्बा था अकबर ने ख्वाजा की दरगाह की तीन बार ई.1562, ई.1568 और ई.1570 में जियारत की।
ई.1570 में शहजादे सलीम के जन्म के उपरांत उसने आगरा से दरगाह तक की यात्रा पैदल चल कर की। इसके बाद अकबर ई.1579 तक लगातार प्रतिवर्ष अजमेर आया। उसने ख्वाजा की दरगाह के प्रबंध के लिये शेख मुहम्मद बुखारी को नियुक्त किया जिसने अकबर की इच्छानुसार एक बड़ी मस्जिद का निर्माण करवाया।
अकबर द्वारा दरगाह को भेंट किये गये बर्तन एवं अन्य सामग्री आज भी रखी हैं। जहाँगीर और शाहजहाँ ने ख्वाजा की दरगाह के रख रखाव के लिये उदारता पूर्वक अनुदान दिया। संगीत के विरोधी औरंगजेब ने ख्वाजा के प्रति श्रद्धा के कारण दरगाह पर संगीत सभाओं को जारी रखा और अनुदान दिया।
दरगाह पर मुस्लिम कलैण्डर के रजब माह की पहली से छठी तिथि तक विशाल उर्स का आयोजन किया जाता है। उर्स का आयोजन मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन की बरसी के रूप में किया जाता है।
छत्रपति शिवाजी का संघर्ष बहुकोणीय था। उन्होंने बीजापुर के शिया राज्य से भूमि छीनकर हिन्दू राज्य की स्थापना की। शिवाजी ने औरंगजेब से जीवन भर संघर्ष किया। छत्रपति ने आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह तथा जोधपुर नरेश जसवंतसिंह जैसे दुराधर्ष योद्धाओं से अपने राज्य को बचाया तथा औरंगजेब के जीवन काल में ही अपना राज्याभिषेक करवाया।
प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी केन्द्र में तथा भारत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित महाराष्ट्र में भारत की कई महान् विभूतियों का जन्म हुआ है। ई.1630 में इसी महाराष्ट्र प्रदेश में छत्रपति शिवाजी राजे का जन्म हुआ। उनके जन्म से सवा चार सौ साल पहले से भारत विचित्र राजनीतिक परिस्थितियों में फंसा हुआ था।
उत्तर भारत पर ई.1206 से 1526 तक कट्टर सुन्नी तुर्कों ने शासन किया। उन्होंने हिन्दुओं को निर्धनता और दुर्भाग्य के समुद्र में डुबोकर बड़ी संख्या में मुसलमान बना लिया था। ई.1526 से दिल्ली पर समरकंद से आए मंगोल शासन कर रहे थे। वे भी तुर्क थे तथा पहले के तुर्कों की तरह कट्टर सुन्नी मुसलमान थे।
भारत में मुगलिया राज्य के संस्थापक बाबर ने भारत को दारूल-हर्श (काफिरों का देश) घोषित किया तथा स्वयं को जेहाद (धार्मिक यात्रा) पर बताया जिसका उद्देश्य काफिरों को मारना या मुसलमान बनाना होता है।
उसके पौत्र अकबर ने उत्तर भारत के अधिकांश प्रबल हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करके उनकी राजकुमारियों से या तो स्वयं ने विवाह कर लिए या अपने पुत्र सलीम के साथ कर दिये। इसी को आजकल अकबर की हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा उदारता कहा जाता है। जबकि मुगलों के हरम में गईं इन हिन्दू राजकुमारियों की कोख से जन्मे तुर्क शहजादों ने हिन्दुओं को पहले से कहीं अधिक दुर्भाग्य, निर्धनता और मृत्यु प्रदान की।
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उत्तर भारत में चित्तौड़ का प्रबल राज्य सदियों से शासन करता आया था जिसने अकबर के समक्ष घुटने टेकने तथा अपनी कन्याओं के विवाह मुसलमानों के साथ करने से मना कर दिया। इसलिए अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग में तीस हजार से अधिक हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया। उसने हिन्दू राजाओं को अपना सेनापति नियुक्त किया तथा हिन्दुओं के हाथों ही हिन्दुओं को मरवाया।
इसके बदले में उसने हिन्दुओं पर से जजिया हटाया ताकि हिन्दू राजा एवं इतिहासकार, अकबर की उदारता के गुण गाते रह सकें। अकबर के पुत्र जहांगीर ने भी हिन्दुओं को नष्ट करने की यही रेशमी फंदे वाली नीति अपनाई। उसके पुत्र शाहजहाँ ने भारत की हिन्दू प्रजा पर फिर से जजिया लगाया और बड़ी संख्या में हिन्दुओं का संहार करवाया।
उसका पुत्र औरंगजेब कट्टर सुन्नी बादशाह सिद्ध हुआ। उसने भारत से काफिरों को समाप्त करके दारूल-इस्लाम अर्थात् मुस्लिम राज्य की स्थापना करने का काम तेजी से आगे बढ़ाया।
इस काल में दक्षिण भारत, पांच छोटे-छोटे मुस्लिम राज्यों- बरार में इमादशाही राज्य, अहमदनगर में निजामशाही राज्य, बीजापुर में आदिलशाही राज्य, गोलकुण्डा में कुतुबशाही राज्य तथा बीदर में बरीदशाही राज्य में बंटा हुआ था। इन पांचों राज्यों पर शिया बादशाह शासन करते थे।
इन शिया मुस्लिम राज्यों ने दक्षिण भारत के शक्तिशाली विजयनगर हिन्दू साम्राज्य का अंत कर दिया और हिन्दू प्रजा को लूटकर अपने महल खजानों से भर लिए। वे हिन्दुओं के तीर्थों एवं देवालयों को बुरी से तरह नष्ट करते आ रहे थे। एक तरफ तो दक्षिण भारत के शिया राज्य, दक्षिण के हिन्दुओं को नष्ट कर रहे थे तो दूसरी ओर उत्तर भारत के कट्टर सुन्नी शासक, इन शिया राज्यों को फूटी आंखों से भी नहीं देखना चाहते थे। सुन्नी शासकों की दृष्टि में शिया भी वैसे ही काफिर थे जैसे कि हिन्दू।
शिवाजी का जन्म अहमदनगर के निजामशाह राज्य के प्रभावशाली जागीरदार शाहजी भौंसले के दूसरे पुत्र के रूप में हुआ। शिवाजी के जन्म के कुछ समय बाद शाहजी ने शिवाजी की माता जीजाबाई को स्वयं से अलग करके शिवनेर दुर्ग में रख दिया क्योंकि जीजाबाई का पिता जाधवराय, निजामशाह के शत्रुओं अर्थात् मुगलों की सेवा में चला गया था।
ई.1636 में मुगलों ने अहमदनगर का राज्य समाप्त कर दिया तब शाहजी ने बीजापुर राज्य में नौकरी कर ली। जीजाबाई के पिता जाधवराय की भी जल्दी ही मृत्यु हो गई, इस कारण जीजाबाई का वह आश्रय भी समाप्त हो गया और वह कई वर्षों तक अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए जंगलों में बने किलों में भटकती रही।
मुगल सेनाएं शाहजी के पुत्र को मार डालना चाहती थीं क्योंकि शाहजी, पहले तो निजामशाह की ओर से और अब आदिलशाह की ओर से मुगलों से युद्धरत था। बालक शिवा कई बार मुगल सिपाहियों के हाथों में पड़ते-पड़ते बचा किंतु जीजाबाई के धैर्य और साहस से प्रत्येक बार, बालक शिवा के प्राणों की रक्षा हुई।
इस प्रकार शिवाजी ने अपने बाल्यकाल में ही मुस्लिम सैनिकों द्वारा किए जा रहे हिन्दू प्रजा के कत्ल और शोषण को बहुत निकट से देखा। इन्हीं परिस्थितियों में शिवाजी 16 साल के हो गए और उन्होंने हिन्दू प्रजा के उद्धार के लिए स्वयं को तैयार करने तथा किलों को जीतने के लिए सेना बनाने का निश्चय किया।
किलों को जीतने और बनाने के लिए यह आयु बहुत कम थी, किंतु शिवाजी के निश्चय उनकी आयु से कहीं बहुत आगे थे। उनके हृदय में भारत की निरीह जनता के लिए पीड़ा थी। इसी पीड़ा को दूर करने के लिए उन्होंने मुस्लिम राज्यों को समाप्त करके हिन्दू राज्य की स्थापना का सपना देखा जिसे वह हिन्दू पदपादशाही कहते थे।
शिवाजी का मानना था कि मुगल अजेय नहीं हैं, उन्हें यह प्रेरणा अपने पिता शाहजी से मिली थी। शाहजी ने भी, अहमदनगर तथा बीजापुर के लिए मुगलों के विरुद्ध संघर्ष किया था और मुगलों के दांत खट्टे किए थे, जिससे शाहजी की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई थी।
शाहजी की प्रेरणा से शिवाजी के नेतृत्व में मराठा शक्ति का फिर से उदय हुआ। दक्षिण भारत में बहमनी राज्य की स्थापना से पहले मराठे ही इस क्षेत्र पर शासन करते थे। जीवन-पर्यंत किए गए संघर्ष के बल पर शिवाजी ने स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना की। औरंगजेब जैसा क्रूर एवं मदांध शासक भी शिवाजी द्वारा संगठित की गई मराठा शक्ति का दमन नहीं कर सका। अंत में यह मराठा शक्ति भारत से मुगल शासन को उखाड़ फैंकने के लिए यम की फांस सिद्ध हुई।
प्रस्तुत पुस्तक में सत्रहवीं शताब्दी के महानायक छत्रपति शिवाजी राजे की जीवनी के साथ-साथ उनके संघर्ष एवं उनकी उपलब्धियों का ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर लेखन एवं विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक में शिवाजी के समकालीन लेखकों द्वारा लिखे गए तथ्यों को काम में लेने का यथासंभव प्रयास किया गया है।
शिवाजी के समकालीन ग्रंथों में से कुछ ग्रंथों का उल्लेख किया जाना समीचीन होगा जिनमें मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ), नुश्खा-ए-दिलकुशा, स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) आदि प्रमुख हैं। औरंगजेब ने अपने समय का इतिहास लिखने पर पाबन्दी लगा दी थी परन्तु मोहम्मद हाशिम खाफी खाँ नामक एक मुगल सेनापति ने गुप्त रूप से मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ) नामक ग्रन्थ की रचना की।
यह एक विशाल ग्रन्थ है जो ई.1519 में बाबर के समरकंद एवं फरगना आक्रमणों से आरम्भ होकर उसके वंशज मुहम्मदशाह रंगीला के शासन के 14वें साल के इतिहास के साथ समाप्त होता है। ग्रन्थ का महत्व ई.1605 से 1733 तक की घटनाओं, विशेषतः औरंगजेब के शासनकाल के आरम्भ (ई.1658) से लेकर ई.1733 तक के लिए अधिक है। उसने औरंगजेब की धार्मिक नीति का समर्थन और छत्रपति शिवाजी की निन्दा की है।
औरंगजेब के समकालीन प्रसिद्ध हिन्दू सेनापति भीमसेन ने नुश्खा-ए-दिलकुशा नामक फारसी ग्रंथ में औरंगजेब के राज्यकाल का आंखों देखा इतिहास लिखाँ उसने महाराजा जसवन्तसिंह तथा दलपतराव बुल्देला के अधीन काम किया था। उसने दक्षिण के युद्धों तथा औरंगजेब के बाद लड़े गए उत्तराधिकार युद्ध को अपनी आँखों से देखा। उसने शिवाजी की गतिविधियों तथा उनकी संगठन प्रतिभा का अच्छा वर्णन किया है।
यूरोपीय पर्यटक जॉन फ्रॉयर शिवाजी के जीवन काल में भारत घूमने आया। उसने अपनी आंखों से मुगलों की सेनाओं को शिवाजी का राज्य बर्बाद करते हुए देखा। उसने भारत में हुए अनुभवों के आधार पर ”न्यू एकाउंट ऑफ ईस्ट इण्डिया कम्पनी एण्ड पर्शिया” नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में छत्रपति शिवाजी का संघर्ष उस काल की घटनाओं के साथ मिलता है।
इस पुस्तक में एक स्थान पर उसने लिखा है- ”मुगल सेनाएं अपने मार्ग में आने वाली हर चीज को गिरा देती थीं। गांव के गांव जलाए जा रहे थे। खेतों में खड़ी मक्का की फसलें भूमि पर गिराई जा रही थी। पशुओं को पकड़कर मुगलों के राज्य को ले जाया जा रहा था तथा शिवाजी के राज्य में रहने वाले स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों को बलपूर्वक दास बनाया जा रहा था।”
औरंगजेब के समय में इटली के वेनिस नगर का निवासी निकोलोआ मनूची ई.1650 में सूरत होता हुआ दिल्ली पहुँचा। वह तुर्की और फारसी भाषाओं का ज्ञाता था। उसने लम्बे समय तक भारत में प्रवास किया तथा औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह की तरफ से उत्तराधिकार के युद्ध में भाग लिया। जब दारा, औरंगजेब से पराजित होकर सिन्ध की ओर पलायन कर गया तो निकोलोआ मनूची भी उसके साथ सिन्ध तक गया था।
मनूची वहाँ से वापस दिल्ली होते हुए कश्मीर आया और वहाँ से बिहार तथा बंगाल के भ्रमण पर गया। कुछ समय के लिए उसने दिल्ली तथा आगरा में चिकित्सक का कार्य भी किया। उसने मिर्जा राजा जयसिंह के द्वारा छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध किए गए अभियान में भाग लिया। उसने स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) नामक पुस्तक लिखी जिसमें छत्रपति शिवाजी का संघर्ष एवं शिवाजी के समय का आंखों देखा इतिहास भी उपलब्ध है।
आधुनिक इतिहासकारों में जदुनाथ सरकार ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर छत्रपति शिवाजी का संघर्ष लिखकर भारत की प्रजा पर बड़ा उपकार किया है। आधुनिक काल के अनेक मराठी एवं अंग्रेजी लेखकों ने भी शिवाजी के संघर्ष एवं उपलब्धियों को निरपेक्ष होकर लिखा है।
शिवाजी और मुगलों के बीच बहुत लम्बा-चौड़ा पत्र व्यवहार हुआ जिनसे हार-जीत के दावों को सफलतापूर्वक कसौटी पर कसा जा सकता है। इन ग्रंथों एवं पत्रों का उपयोग करते हुए इस ग्रंथ का प्रणयन किया गया है तथा सत्रहवीं शताब्दी के उस अप्रतिम, अतुल्य एवं महान राजा को विनम्र श्रद्धांजलि देने का प्रयास किया गया है।
इस पुस्तक को लिखते समय मुझे शिवाजी के पिता शाहजी का जीवन चरित्र पढ़ने का अवसर मिला। मुझे यह देखकर दुःख हुआ कि भारत के इस वीर योद्धा के प्रति इतिहासकारों ने बहुत अन्याय किया है जिसके कारण विद्यालयी एवं विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में शाहजी की छवि नकारात्मक बन गई है।
उन्हें शिवाजी तथा उनकी माता जीजाबाई को त्यागने वाला तथा मुसलमान बादशाहों की नौकरी करने वाला साधारण एवं छोटा सा सेनानायक बताया गया है। जबकि शाहजी अपने समय में भारत के विख्यात योद्धाओं में गिने जाते थे। इस पुस्तक में उस अप्रतिम योद्धा के सम्बन्ध में ऐतिहासिक तथ्यों का पता लगाकर सत्य को सामने लाने का प्रयास किया गया है।
मैं लगभग सात वर्ष का बालक ही था जब मेरे पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता ने मुझे कवि भूषण के लिखे हुए कुछ पद सुनाए। इन पदों में छत्रपति शिवाजी की वीरता का अद्भुत वर्णन किया गया है। मेरे बाल-मन पर शिवाजी की वीरता की अमिट छाप अंकित हो गई। अपने स्कूल के दिनों में ही मुझे आचार्य चतुरसेन के उपन्यास ‘चट्टानें’ पढ़ने का सौभाग्य भी प्राप्त हो गया।
इससे शिवाजी के प्रति मेरे मन में आदर और श्रद्धा का भाव जागृत हुआ। लगभग एक दशक पहले मुझे शिवाजी सावंत के उपन्यास ‘छावा’ को पढ़ने का भी सौभाग्य मिला जिसमें मराठों के संघर्ष का लोमहर्षक वर्णन किया गया है। आशा है यह पुस्तक इतिहास के सुधि पाठकों को पसंद आएगी।
छत्रपति शिवाजी का संघर्ष प्रत्येक भारतवासी का संघर्ष है, प्रत्येक हिन्दू का संघर्ष है, प्रत्येक स्वातंत्र्य प्रेमी का संघर्ष है, प्रत्येक उस मानव का संघर्ष है जो अपने राष्ट्र से प्रेम करता है तथा निरीह प्रजा के सुख के लिए अपना जीवन समर्पित करता है।
माना जाता है कि शिवाजी के पूर्वज मेवाड़ के महाराणाओं के वंश में से निकले थे। राजकुमार सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह उनका पूर्वज था।
ई.1303 में अल्लाऊद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग तोड़ा और रावल रत्नसिंह को मार डाला। उसकी मृत्यु के साथ ही मेवाड़ के गुहिलों की रावल शाखा का अंत हो गया। तब बहुत से राजपूत परिवार चित्तौड़ दुर्ग छोड़कर देश के अन्य भागों में चले गए। तब गुहिल वंश का एक क्षत्रिय राजकुमार सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह चित्तौड़ छोड़कर दक्षिण भारत को चला आया तथा अपने परिवार के साथ यहीं रहने लगा। दक्षिण भारत में ही उसका निधन हुआ। यही सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह शिवाजी के मराठी पूर्वजों में पहला था।
सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह के कुछ वंशज खेती-बाड़ी करके उदरपूर्ति करने लगे तथा कुछ वंशज, दक्षिण के शासकों के लिए लड़ाइयां लड़ते हुए अपनी आजीविका अर्जित करने लगे। सज्जनसिंह की पांचवी पीढ़ी में अग्रसेन नामक एक वीर पुरुष हुआ जिसके दो पुत्र- कर्णसिंह तथा शुभकृष्ण हुए। कर्णसिंह के पुत्र भीमसिंह को बहमनी राज्य के सुल्तान ने राजा घोरपड़े की उपाधि एवं मुधौल में 84 गांवों की जागीर प्रदान की।
इस कारण भीमसिंह के वंशज घोरपड़े कहलाए। दूसरे पुत्र शुभकृष्ण के वंशज भौंसले कहलाए। इस प्रकार शिवाजी के पूर्वज घोरपड़े एवं भौंसले दो शाखाओं में बंट गए।
शुभकृष्ण का पौत्र बापूजी भौंसले हुआ। बापूजी भौंसले का परिवार बेरूल (एलोरा) गांव में काश्तकारी एवं पटेली का काम करता था। पटेल का काम कृषकों से भूमि का लगान वसूल करके उसे शाही खजाने में जमा करवाने का होता था। इन लोगों को महाराष्ट्र में पाटिल भी कहते थे। बापूजी भौंसले ई.1597 में वैकुण्ठवासी हुआ।
Shivaji
बापूजी भौंसले के दो पुत्र थे जिनके नाम मालोजी और बिठोजी थे। शरीर से हृष्ट-पुष्ट होने के कारण इन दोनों भाइयों ने सिन्दखेड़ के सामन्त लुकाजी यादव अथवा जाधवराय के यहाँ सैनिक की नौकरी प्राप्त कर ली। जाधवराय, अहमदनगर के बादशाह निजामशाह की सेवा में था तथा निजाम से उसका बहुत नैकट्य भी था। कुछ दिनों बाद मालोजी एवं बिठोजी को जाधवराय के महल का मुख्य रक्षक नियुक्त किया गया।
जाधवराय का परिहास
मालोजी का विवाह पल्टनपुर के देशमुख बंगोजी अथवा जगपाल राव नायक निम्बालकर की बहिन दीपाबाई से हुआ। मालोजी को लम्बे समय तक कोई संतान प्राप्ति नहीं हुई। अंत में एक मुस्लिम फकीर के आशीर्वाद से ई.1594 में मालोजी के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। फकीर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उस बालक का नाम शाहजी रखा गया। शाहजी अत्यंत रूपवान एवं प्रभावशाली चेहरे का बालक था।
कुछ समय पश्चात् मालोजी को एक और पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम शरीफजी रखा गया। एक बार होली के त्यौहार पर मालोजी अपने बड़े पुत्र शाहजी को जाधवराय के महल में ले गया। वहाँ जाधवराय के बहुत से सामंत-सरदार एवं मित्र आए हुए थे। जाधवराय ने रूपवान बालक शाहजी को बड़े प्रेम से अपने पास बैठाया।
वहीं पर जाधवराय की पुत्री जीजाबाई बैठी हुई थी। जब सब लोग होली खेल रहे थे, तब इन दोनों बालकों ने भी एक दूसरे पर रंग डाला। इसे देखकर अचानक जाधवराय के मुख से निकला कि कितनी सुंदर जोड़ी है। उसने अपनी पुत्री जीजा से पूछा कि क्या तुम इस लड़के से विवाह करोगी?
इतना सुनते ही मालोजी उत्साह से भर गया और खड़े होकर बोला, सुना आप सबने, जाधवराय ने अपनी पुत्री का सम्बन्ध मेरे पुत्र से कर दिया है। जाधवराय तो बच्चों से परिहास मात्र कर रहा था। अतः मालोजी का यह दुःसाहस देखकर क्रोधित हो गया और तुरन्त प्रतिकार करते हुए मालोजी और बिठोजी को अपनी सेवा से च्युत कर दिया।
मालोजी का उत्कर्ष
मालोजी एवं बिठूजी, दोनों भाई वहाँ से उठ गए और अगले ही दिन सिन्दखेड़ छोड़कर अपने पैतृक गांव चले गए। वहाँ वे फिर से खेतीबाड़ी करने लगे। एक दिन मालोजी को कहीं से अचानक प्रचुर खजाना हाथ लगा। उस धन से उसने एक हजार सैनिकों की वेतन-भोगी सेना तैयार की और अहमदनगर के शासक निजामशाह की सेवा में भर्ती हो गया।
शाहजी का संघर्ष एवं उत्कर्ष
ई.1619 में मालोजी का निधन हो गया और उसकी समस्त जागीरें शाहजी को प्राप्त हो गईं। शाहजी ने अपने चचेरे भाइयों के साथ मिलकर अहमदनगर के निजाम के लिए, मुगलों के विरुद्ध कई युद्ध लड़े और जीते। ई.1624 में खुर्रम 1,20,000 सैनिक लेकर अहमदनगर पर चढ़ आया। बीजापुर का आदिलशाह भी 80,000 सैनिक लेकर खुर्रम की सहायता करने आया।
ये दोनों सेनाएं मेहकार नदी के तट पर शिविर लगाकर बैठ गईं। इस समय अहमदनगर के पास केवल 20 हजार सैनिक थे जिनमें से 10 हजार सैनिक नगर की सुरक्षा के लिए लगाए गए और 10 हजार सैनिक मुगलों से लड़ने के लिए शाहजी को दिए गए। शाहजी के 10 हजार सैनिक मुगलों का कुछ भी नहीं कर सकते थे।
फिर भी शाहजी ने नदी भटवाड़ी के निकट अपना शिविर लगाया। एक रात जब काफी तेज बरसात हुई तो शाहजी ने नदी पर बने विशाल बांध में छेद करवा दिए। बांध टूट गया तथा उसका पानी तेजी से बहता हुआ मुगलों और बीजापुर की सेना की तरफ आया। इस कारण मुगलों के शिविर में बाढ़ आ गई। शाहजी अपने सैनिकों के साथ तैयार था।
वह बिजली बनकर शत्रुओं पर टूट पड़ा। बड़ी संख्या में मुगल सैनिक मारे गए। शाहजी ने मुगलों के पांच बड़े सेनापतियों को जीवित ही पकड़ लिया। इस प्रकार भटवाड़ी के युद्ध में मिली विजय के बाद शाहजी का कद भारत की राजनीति में बहुत बड़ा हो गया। अहमदनगर की ओर से उसे पूना और सूपा की जागीरें प्राप्त हुईं।
शाहजी का बीजापुर की सेवा में जाना
मुगलों की सेवा त्यागने के बाद से शाहजी भौंसले का जीवन भी बहुत कठिन हो गया। शाहजहाँ किसी भी तरह शाहजी को पुनः अपनी सेवा में लेना चाहता था क्योंकि अहमदनगर की वास्तविक शक्ति शाहजी ही था किंतु शाहजी ने मना कर दिया। शाहजहां ने निजाम के वजीर जहाँ खाँ को रिश्वत देकर अपनी तरफ कर लिया। जहाँ खाँ ने निजाम तथा उसके सम्पूर्ण परिवार की हत्या कर दी। यहाँ तक कि निजाम परिवार की दो गर्भवती महिलाओं को भी मार दिया।
शाहजी ने हार नहीं मानी, उसने मृतक निजाम के निकट सम्बन्धी के बालक मुर्तजा को अहमदनगर का निजाम घोषित कर दिया तथा मुगलों को कड़ी टक्कर देता हुआ, ”निजाम मुर्तजा” को लेकर एक के बाद दूसरे किले में भटकने लगा। ई.1635 में मिर्जा राजा जयसिंह ने शाहजी भौंसले के 3 हजार आदमी और 8 हजार बैल पकड़ लिए।
इन बैलों पर तोपखाना और बारूद लदा हुआ था। इस भारी जीत के उपलक्ष्य में जयसिंह को अपने राज्य जयपुर में लगभग दो वर्ष तक छुट्टियां मनाने की अनुमति मिली तथा मुगल सेनापति खानेजमाँ महाबत खाँ को शिवाजी के विरुद्ध लगाया गया। महाबतखाँ, शाहजी के विरुद्ध लड़ता हुआ पूरी तरह बर्बाद हो गया तथा ई.1634 में उसकी मृत्यु हो गई।
ई.1636 के आरम्भ में शाहजहाँ स्वयं सेना लेकर अहमदनगर के विरुद्ध लड़ाई करने आया। मुगल साम्राज्य की पूरी शक्ति शाहजी के विरुद्ध झौंक दी गई। शाहजहां ने बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर दबाव बनाकर, उनकी सेनाएं भी शाहजी के विरुद्ध लगा दीं। इस प्रकार शाहजी चारों ओर से घिर गया। अंत में उसके पास केवल पांच दुर्ग रह गए।
एक दिन मुगलों ने मुर्तजा को अगवा कर लिया। मुर्तजा का जीवन बचाने के लिए शाहजी को मुगलों से समझौता करना पड़ा। शाहजहाँ मुर्तजा को दिल्ली ले गया तथा अहमदनगर के निजामशाही राज्य को पूरी तरह समाप्त कर दिया। बीजापुर का शासक आदिलशाह, शाहजी की वीरता से बहुत प्रभावित था। उसने शाहजी के समक्ष प्रस्ताव भिजवाया कि शाहजी, बीजापुर की सेवा ग्रहण कर ले।
शाहजी ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। शाहजहाँ से अनुमति लेकर आदिलशाह ने शाहजी को बीजापुर की सेवा में रख लिया। शाहजहाँ ने बीजापुर को यह अनुमति इस शर्त पर दी कि शाहजी की ओर जागीर नहीं दी जाए। शाहजी को बीजापुर राज्य की ओर से 92 हजार सवारों का सेनापति नियुक्त किया गया।
उसे कर्नाटक की तरफ एक बड़ी जागीर दी गई। पूना तथा सूपा भी की जागीरें भी पूर्ववत् उसके पास बनी रहीं। उन दिनों बीजापुर का सेनापति रनदुल्ला खाँ, विजयनगर साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर खड़े हुए छोटे-छोटे हिन्दू राज्यों को नष्ट कर रहा था। ई.1637-40 के बीच हुए इन अभियानों में शाहजी को रनदुल्ला खाँ का साथ देना पड़ा।
इन हिन्दू राज्यों को नष्ट-भ्रष्ट करके बीजापुर के शाह तथा सेनापति ने अकूत सम्पदा एकत्रित कर ली। इस सम्पदा से बीजापुर के शाह ने अपने लिए विशाल महलों का निर्माण करवाया। इनमें दाद महल एवं गोलगुम्बद भी सम्मिलित हैं। इन अभियानों में हिन्दू जनता पर भयानक अत्याचार किए गए जिन्हें देखकर शाहजी की आत्मा हा-हाकार करती थी।
कुछ समय पश्चात् शाहजी ने बीजापुर के शाह से ये क्षेत्र जागीर के रूप में अपने अधिकार में ले लिए ताकि हिन्दू प्रजा को मुस्लिम अत्याचारों से बचाया जा सके।
इस प्रकार हम देखते हैं कि शिवाजी के पूर्वज बड़े प्रतापी थे। उन्होंने संकट काल में खेती का व्यवसाय अपनाया तथा धीरे-धीरे अपने क्षत्रिय कर्म में लौट आए। बाद में जब शिवाजी का उत्कर्ष चरम पर पहुंच गया तो बहुत से लोग शिवाजी के पूर्वज को उच्च कुल का मानने की बजाय हीन कुल का बताने लगे।
शिवाजी का बाल्यकाल बड़ी कठिनाइयों में बीता। कहा जा सकता है कि इन कठिनाइयों ने ही शिवाजी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण किया।
शाहजी एवं जीजाबाई का विवाह
मालोजी अभी तक जाधवराय द्वारा किए गए अपमान को भूला नहीं था। मालोजी भी अभी तक अहमदनगर की सेवा में था तथा उसकी पुत्री जीजाबाई भी अब तक अविवाहित थी। इसलिए मालोजी ने निजामशाह से प्रार्थना की कि वह जाधवराय से कहकर जीजाबाई का विवाह मेरे पुत्र शाहजी से करवाए। निजामशाह ने जाधवराय को इस विवाह के लिए सहमत किया तथा ई.1605 में जीजाबाई और शाहजी का विवाह हो गया।
जीजाबाई एवं शाहजी का दाम्पत्य जीवन
जीजाबाई एवं शाहजी के दाम्पत्य से पहले सम्भाजी का और बाद में शिवाजी का जन्म हुआ। शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी के निजामशाही किले में हुआ। यह दुर्ग पूना जिले के धुर उत्तर में जुन्नार नगर के निकट शिवनेर में स्थित था। जीजाबाई ने शिवाई नामक स्थानीय देवी से अपने पुत्र के लिए मनौती मांगी थी। इसलिए बालक का जन्म होने पर उसका नाम शिवाजी रखा गया।
कुछ समय पश्चात् जाधवराय, निजाम से नाराज होकर मुगलों की सेवा में चला गया। इससे मालोजी को कठिनाई हुई क्योंकि वह (मालोजी) अब भी निजाम की सेवा में था। अतः मालोजी ने अपने पुत्र शाहजी की पत्नी जीजाबाई तथा उसके पुत्र शिवाजी को शिवनेर के दुर्ग में रख दिया। शिवाजी का बाल्यकाल बड़ी कठिनाइयों में बीता।
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जीजाबाई का बड़ा पुत्र सम्भाजी अपने पिता शाहजी के पास रहा। जाधवराय से सम्बन्ध तोड़ लेने के कारण निजाम के राज्य में मालोजी और बिठोजी का कद बहुत बढ़ गया और वे निजाम के प्रधानमंत्री मलिक अम्बर के अत्यंत विश्वासपात्र बन गए। उन्हें निजामशाही में अच्छी जागीरें प्राप्त हो गईं।
शाहजी के अन्य विवाह
कुछ समय पश्चात् शाहजी ने तुकाबाई मोहिते नामक एक सुंदर युवती से विवाह कर लिया। इस दाम्पत्य से शाहजी को एकोजी अथवा व्यंकोजी नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। कुछ समय पश्चात् शाहजी ने नरसाबाई नामक एक मराठा कन्या से विवाह किया। शाहजी को सांताजी नामक एक और पुत्र की प्राप्ति हुई जो मराठों के इतिहास में सांताजी घोरपड़े के नाम से प्रसिद्ध है। वह शिवाजी के द्वितीय पुत्र राजाराम के समय मराठों का बहुत प्रसिद्ध योद्धा माना जाता था।
जीजाबाई की कठिनाइयाँ
अहमदनगर के निजाम को यह सहन नहीं था कि जाधवराय उसकी सेवा त्यागकर मुगलों की सेवा करे। एक दिन उसने जाधवराय तथा उसके परिवार को अपने दुर्ग में आमंत्रित किया तथा छल से जाधवराय तथा उसके परिवार के तीन प्रमुख सदस्यों की हत्या करवा दी।
पति द्वारा अलग कर दिए जाने के पश्चात् जीजाबाई किसी तरह अपने पिता के सहारे जीवन व्यतीत कर रही थी किंतु अब पिता का आश्रय भी छिन जाने के कारण जीजा का जीवन और उसके पुत्र शिवाजी का बाल्यकाल अत्यंत कष्टमय हो गया। जीजा ने अपना समय धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में लगाना आरम्भ किया।
उसने रामायण, महाभारत तथा भगवद्गीता आदि ग्रंथों का अच्छा अध्ययन किया तथा इन ग्रंथों के नायकों एवं वीर पुरुषों की गाथाएं अपने पुत्र शिवाजी को भी सुनाईं। जीजाबाई ने शिवाजी को भारत राष्ट्र के उत्थान के लिए, मुगलों के चंगुल से स्वतंत्र कराने की आवश्यकता से परिचित करवाया तथा उच्च जीवन आदर्श अपनाने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने शिवाजी को शक्ति का संचय करने की आवश्यकता का भी ज्ञान करवाया। माता जीजाबाई के उपदेशों से बालक शिवा, साधु-संतों, विद्वानों और ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखने लगा। इस प्रकार शिवाजी का बाल्यकाल हिन्दू गौरव से प्रकाशित हो उठा।
कुछ समय बाद शाहजी भी निजामशाह की सेवा छोड़कर मुगलों की सेवा में चला गया। शाहजी को 7000 का मनसब दिया गया किंतु वहाँ उसका मन नहीं लगा और डेढ़ साल बाद वह पुनः निजाम की सेवा में आ गया। अब मुगलों ने अहमदनगर के विरुद्ध अभियान चलाया। शाहजी अहमदनगर की ढाल बनकर खड़ा हो गया।
जब शाहजी मुगलों की सेवा छोड़कर पुनः निजाम की सेवा में आया, तब मुगलों का कोप शाहजी की पत्नी जीजाबाई और उसके पुत्र शिवाजी पर कहर बनकर टूटा। उन्हें मुगलों द्वारा प्रताड़ित किया जाने लगा। इस पर जीजाबाई, शिवाजी को लेकर एक किले से दूसरे किले में निरंतर यात्रा करती रही। एक बार जब मुगलों ने इन्हें बुरी तरह घेर लिया तो जीजा ने शिवाजी को एक पहाड़ी दुर्ग में अपने समर्थकों के बीच इस तरह छिपा दिया कि मुगल उसे ढूंढ नहीं सकें।
जीजाबाई एवं शिवाजी को पुनः संरक्षण
जब शाहजी की स्थिति सुधर गई तो उसने दादा कोणदेव को अपनी पूना एवं सूपा की जागीरों का संरक्षक नियुक्त किया तथा उसे आदेश दिया कि वह जीजाबाई एवं शिवाजी को शिवनेर के दुर्ग से लाकर पूना में रखे और उनकी देखभाल करे।
दादा कोणदेव बुद्धिमान, स्वामिभक्त, दृढ़प्रतिज्ञ और धर्म एवं राजनीति की गहरी समझ रखने वाला व्यक्ति था। वह जीजाबाई तथा उसके पुत्र शिवाजी को शिवनेर के दुर्गम दुर्ग से पूना ले आया। उसने पूना में लाल-महल नामक भव्य आवास का निर्माण करवाया तथा जीजा एवं उसके पुत्र को इसी महल में रखा।
कोणदेव का मानना था कि प्रजा पर अपना प्रभाव स्थापित करने के लिए शासक को भव्य महल में रहना चाहिए।
शाहजी द्वारा पुत्रों में जागीरों का वितरण
शाहजी ने अपने बड़े पुत्र सम्भाजी को कर्नाटक में बैंगलोर की जागीर दी। दूसरे पुत्र शिवाजी को पूना तथा सूपा की जागीरें दीं तथा तीसरे पुत्र एकोजी अथवा व्यंकोजी को तंजावुर की जागीर दी। कुछ समय पश्चात अफजल खाँ ने शाहजी के बड़े पुत्र सम्भाजी की हत्या कर दी। इस पर बैंगलोर की जागीर का प्रबन्ध शाहजी स्वयं करने लगा।
दादा कोणदेव द्वारा बालक शिवाजी का प्रशिक्षण
बालक शिवाजी एक ओर, अपनी माँ से रामायण एवं महाभारत के उच्च आदर्श सम्पन्न वीर पुरुषों एवं नारियों की गाथाएं सुन रहा था तथा दूसरी ओर, दादा कोणदेव द्वारा प्रजा की समृद्धि के लिए किए जा रहे कार्यों को अपनी आंखों से देख रहा था। उसने शाहजी की जागीरों को सम्पन्न बनाने के लिए अनेक उपाय किए तथा उनकी काया पलट कर रख दी।
उसने जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए कदम उठाए तथा प्रजा को डाकुओं के भय से मुक्त करने के लिए डाकुओं के विरुद्ध सैनिक अभियान किये। मानव बस्तियों में घुसकर मनुष्यों को मार डालने वाले वन्य-पशुओं को रोकने के लिए उसने मावल युवकों की एक सेना तैयार की। दादा कोणदेव ने एक और अद्भुत काम किया।
यह कार्य उस काल में और कोई जागीरदार या शासक नहीं कर रहा था। वह बालक शिवाजी को अपने साथ लेकर शाहजी की जागीर के हर गांव में जाता तथा वहाँ के लोगों की समस्याओं और झगड़ों के बारे में पूछता। समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करता तथा झगड़ों को दोनों पक्षों के साथ बैठकर सुनता। वह दोनों पक्षों को समझाता तथा अंत में अपना निर्णय सुनाता।
इस निर्णय प्रक्रिया में वह बालक शिवाजी को भी सम्मिलित करता। यह क्षेत्र मावल कहलाता था तथा इसके निवासियों को मावली कहते थे जो अशिक्षित होने के कारण खेती के सही तरीकों से अनजान थे। दादा कोणदेव उन्हें खेती करने के सही तरीके बताता था जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो। कोणदेव ने शिवाजी को अश्व संचालन, धनुष विद्या, नेजा तथा तलवार चालन, मल्ल युद्ध आदि का प्रशिक्षण दिलवाया।
मित्र-मण्डलियों की स्थापना
मेधा और प्रतिभा सम्पन्न शिवाजी, कोणदेव के कार्य में रुचि लेने लगा। उसकी इस प्रवृत्ति को देखकर बहुत से किसान और आमजन शिवाजी को अपना हितैषी और शासक मानने लगे। इससे पहले कभी किसी शासक ने निर्धन प्रजा से इतना निकट सम्बन्ध नहीं रखा था। धीरे-धीरे शिवाजी पूना और सूपा, दोनों जागीरों में लोकप्रिय हो गया।
शिवाजी ने अपने पिता की जागीर के हर गांव का भ्रमण करके अपनी मित्र मण्डलियां स्थापित कीं। शिवाजी ने इन युवकों को राष्ट्रभक्ति और धर्म का पाठ पढ़ाया। उनके साथ खेलकूद कर उनसे निकटता स्थापित की। धीरे-धीरे हजारों युवक, शिवाजी के मित्र बन गए जो अपने राजा की एक आवाज पर प्राण न्यौछावर करने को तैयार थे।
शिवाजी का प्रथम विवाह एवं बैंगलोर की यात्रा
ई.1640 में माता जीजा ने, दादा कोणदेव से परामर्श करके शिवाजी का विवाह निम्बालकर परिवार की कन्या सईबाई से कर दिया। जब शाहजी को इस विवाह के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने कोणदेव को आदेश भिजवाया कि वह जीजाबाई, शिवाजी और उसकी पत्नी सईबाई को लेकर बैंगलोर आए ताकि वह (शाहजी) अपने परिवार से मिल सके और पुत्रवधू को आशीर्वाद दे सके।
दादा कोणदेव इस परिवार को पूना (महाराष्ट्र) से लेकर बैंगलोर (कर्नाटक) गया जहाँ उन सबका यथोचित सत्कार किया गया। इस यात्रा में शिवाजी ने माता एवं पत्नी के साथ उस क्षेत्र के हिन्दू तीर्थों एवं मंदिरों के दर्शन किये। जीजाबाई तीन वर्ष तक अपने पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ बीजापुर में रही।
एक दिन शाहजी, शिवाजी को अपने साथ लेकर आदिलशाह के दरबार में गया। वहाँ शिवाजी ने आदिलशाह को झुककर सलाम करने की बजाय सीधे खड़े रहकर अभिवादन किया। इस पर आदिलशाह ने चकित होकर पूछा कि इसने ऐसा क्यों किया? इस पर शाहजी ने आदिलशाह से क्षमा मांगते हुए कहा कि यह निरा बालक है इसे शाही रीति-रिवाजों की जानकारी नहीं है।
गौ-मांस बेचने वाले कसाई का वध
एक दिन शिवाजी ने एक कसाई को मार्ग में गौ-मांस बेचते हुए देखा तो उसने आदिलशाह से कहा कि हम गाय को माता के समान पूजते हैं और कसाई उसे सड़क पर काटते हैं। इसलिए आप अपने राज्य में गौ-हत्या पर रोक लगाएं।
आदिलशाह ने शिवाजी की बात सुनकर आदेश दिए कि कोई भी व्यक्ति सड़क पर न तो गाय काटेगा और न सड़क पर गौ-मांस बेचेगा क्योंकि वहाँ से हिन्दू भी निकलते हैं। इस आज्ञा के जारी होने के कुछ दिनों बाद एक कसाई गाय को लेकर जा रहा था। शिवाजी ने रस्सी काटकर गाय को मुक्त कर दिया तथा कसाई द्वारा विरोध किए जाने पर कसाई के पेट में कटार भौंक दी जिससे कसाई मर गया।
जब यह बात आदिलशाह तक पहुंची तो उसने शिवाजी की कार्यवाही का समर्थन किया क्योंकि शाही आज्ञा के अनुसार, सड़क पर गौहत्या तथा गौ-मांस की बिक्री नहीं हो सकती थी तो फिर हत्या करने के लिए गाय को सरेआम सड़क पर लेकर कैसे चला जा सकता था! आदिलशाह ने शिवाजी के कृत्य का समर्थन तो किया किंतु साथ ही वह अच्छी तरह समझ गया कि जिस शिवाजी का बाल्यकाल ऐसा है, उसका युवा काल कैसा होगा!
शिवाजी का दूसरा विवाह
आदिलशाह शिवाजी के साहस एवं स्वातंत्र्य भाव से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने शाहजी से कहकर शिवाजी का एक और विवाह करवाया। यह विवाह शिरके घराने की कन्या सोयराबाई से हुआ। आदिलशाह स्वयं भी इस विवाह में अपने अमीरों सहित उपस्थित हुआ और शिवाजी तथा उसकी नई पत्नी को आशीर्वाद दिया।
शिवाजी की बीजापुर से विदाई
जब से शिवाजी, बैंगलोर आया था, शाहजी उसे बीजापुर राज्य के प्रशासन, सेना के प्रबन्धन, दरबारी रीति-रिवाज, अमीरों के षड़यंत्र, अश्वशाला की व्यवस्था, शस्त्रों के संचालन एवं रख-रखाव आदि का प्रशिक्षण दे रहा था। जब शाहजी से मिलने के लिए कोई अमीर-उमराव आता, तो शाहजी, शिवाजी को अपने पास बैठा लेता ताकि वह राज्यकाज सम्बन्धी बातों को सुने और समझे।
सब-कुछ ठीक ही चल रहा था और शाहजी के साथ-साथ आदिलशाह भी शिवाजी पर प्रेम लुटा रहा था किंतु ई.1643 में शिवाजी द्वारा कसाई का वध किए जाने के बाद, शाहजी अपने पुत्र की तरफ से आशंकित रहने लगा कि जाने कब यह कौनसी मुसीबत खड़ी कर दे और आदिलशाह इसे हानि पहुंचा दे। इसलिए शाहजी ने दादा कोणदेव से कहा कि वह जीजाबाई तथा उसके पुत्र एवं पुत्र-वधुओं को लेकर पुनः पूना चला जाए। इस समय शिवाजी की आयु लगभग 13 वर्ष हो गई थी।
शिवाजी के मन में शाहजी के कामों से विरक्ति
शाहजी बीजापुर के सुल्तान की सेवा में था। इस नाते उसने बीजापुर द्वारा हिन्दू राज्यों पर किए गए आक्रमणों में मुख्य भूमिका निभाई थी। बीजापुर राज्य द्वारा हजारों हिन्दू परिवार उजाड़ दिए गए थे और उन्हें बलपूर्वक मुस्लिम बनने पर बाध्य किया था। हिन्दुओं की सम्पत्तियां छीनकर उन्हें भिखारी बनाकर छोड़ दिया गया था।
सैंकड़ों भव्य हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया गया था। शाहजी को इन सब कामों में बीजापुर की सेना का नेतृत्व करना पड़ता था। बैंगलोर यात्रा में शिवाजी को ये सब बातें विस्तार से ज्ञात हुईं। शिवाजी का बाल्यकाल अपनी माता द्वारा दिए गए संस्कारों के कारण प्रबल हिन्दू विचारों से प्रभावित था। शिवाजी को अपने पिता के इस कार्य से विरक्ति हुई और उसके मन में मुस्लिम शासन के प्रति विद्रोह के अंकुर ने जन्म लिया।
शिवाजी की राजनीति बहुत स्पष्ट थी। उनकी राजनीति अपने लिए एक राज्य बनाने तक सीमित नहीं थी। वे भारत भूमि पर विशाल हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करना चाहते थे।
सक्रिय राजनीति में प्रवेश
शिवाजी का सक्रिय राजनीति में प्रवेश उनकी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण हुआ। वे अपने पिता से अलग रहकर अपनी माता के संरक्षण में पले थे। शिवाजी की राजनीति की पहली शिक्षक शिवाजी की माता जीजाबाई ही थी। शिवाजी की राजनीति की शुरुआत अपने पिता शाहजी की जागीर की व्यवस्था देखने से आरम्भ हुई। इस समय शिवाजी किशोरावस्था में ही थे।
जागीर के बेहतर प्रबन्धन के प्रयास
शाहजी ने शिवाजी को पूना की जागीर की देखभाल का जिम्मा सौंपा तथा शर्त रखी कि शाहजी के जीवित रहने तक शिवाजी, जागीर में अपने पिता का प्रतिनिधि मात्र होगा तथा शाहजी की मृत्यु के बाद वह इस जागीर का वास्तविक स्वामी बन जाएगा। अब शिवाजी दुगुने उत्साह से जागीर का प्रबन्ध करने लगा। उसका अधिक ध्यान कृषि की दशा सुधारने पर था ताकि प्रजा की आय बढ़े और उनके बीच के झगड़े कम हों।
शिवाजी द्वारा गांवों में गुप्तचरों की नियुक्ति
शिवाजी ने प्रत्येक ग्राम में कोटवारों के साथ-साथ ग्रामीणों को भी रात में जागकर गांव की रक्षा करने की व्यवस्था आरम्भ की। नए उद्यान लगाए तथा परस्पर विवादों के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था भी की। जनता में नैतिकता एवं उत्साह की वृद्धि के लिए धार्मिक आयोजनों को समारोह पूर्वक मनाने के लिए प्रेरित किया गया। शिवाजी ने प्रत्येक गांव में अपने गुप्तचर नियुक्त किए जो गांव में घटने वाली प्रत्येक घटना की सूचना शिवाजी तक पहुंचाते थे।
हिन्दू स्वातंत्र्य के लिए छपटाहट
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माता जीजाबाई ने अपने परिवार के समस्त दुर्दिनों के लिए मुस्लिम शासकों को जिम्मेदार माना था। उसने शिवाजी को भी यही समझाया था कि न केवल हमारी अपितु समस्त हिन्दुओं की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण मुस्लिम शासकों का कुशासन है। जब तक मुसलमान शासकों का अंत नहीं होगा, हिन्दू प्रजा सुखी नहीं होगी।
शिवाजी जैसे-जैसे बड़ा होता जा रहा था, स्वयं भी स्पष्ट रूप से देख पा रहा था कि हर ओर हिन्दू प्रजा को मुस्लिम शासकों के अत्याचारों का सामना करना पड़ रहा था। शिवाजी ने देखा कि हिन्दू प्रजा अपनी तरफ से जितना अधिक मुस्लिम धर्म का सम्मान करती थी, मुसलमानों द्वारा उन्हें उतना ही अधिक प्रताड़ित किया जाता था।
वह इस निष्कर्ष पर पहुंचने लगा था कि यदि प्रजा को सुखी बनाना है तो मुसलमानों का राज्य नष्ट करके, धर्मनिष्ठ एवं प्रजा-वत्सल हिन्दू राजाओं का राज्य स्थापित करना होगा।
यदि मुसलमान शासक और अधिक लम्बे समय तक बने रहे तो हिन्दू धर्म, हिन्दू जाति, हिन्दू ग्रंथ, हिन्दू तीर्थ, हिन्दू संस्कृति सभी कुछ नष्ट हो जाएंगे। जीजाबाई प्रायः उसे चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, स्कंदगुप्त और महाराणा प्रताप की कहानियां सुनाती। इन राजाओं ने विदेशी शासकों को परास्त करके अपनी हिन्दू प्रजा के गौरव को जीवित रखा था। शिवाजी भी ऐसा ही राजा बनने के स्वप्न देखने लगा।
वह जब भी अपनी जागीर में भ्रमण पर जाता तो युवकों को एकत्रित करके हिन्दू संस्कृति के उन्नयन एवं हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए ओजस्वी भाषण देता था। वह अपनी प्रजा को हिन्दू राज्य की स्थापना के लाभों के बारे में समझाता। वह प्रत्येक हिन्दू युवक को शास्त्रों के अध्ययन के साथ-साथ शस्त्र संचालन की शिक्षा लेने के लिए प्रेरित करता।
शिवाजी उनसे कहता कि हम महान राष्ट्र की वीर संतानें हैं। हम संस्कारी पुरुष हैं और हम धर्म, प्रजा एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए शस्त्रों का सहारा लेंगे। यदि हम इस पवित्र एवं पुण्य कार्य को प्रारम्भ करते हैं तो ईश्वर भी अवश्य ही हमारी सहायता करेंगे। हम सफल होंगे और हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करेंगे। शिवाजी के भाषणों को सुनकर शिवाजी की प्रजा स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए दीवानी हो उठती।
शिवाजी प्रायः अपने ग्रामीण मित्रों के बीच जाकर तलवार चालन, घुड़सवारी और अन्य शस्त्रों के संचालन का अभ्यास करता। शिवाजी के मार्गदर्शन में मावली युवकों को अपने जीवन का उद्देश्य मिल गया था। उनके मन से दासता का भाव जा रहा था और अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का भाव जाग्रत हो रहा था।
कोंकण के चप्पे-चप्पे से परिचय
कोंकण की जागीर ई.1632 से शाहजी के अधिकार में चली आती थी। यह जागीर उसे बीजापुर की ओर से, मुगलों के विरुद्ध युद्ध करने के भुगतान के रूप में मिली थी। अब शाहजी की ओर से शिवाजी इस जागीर का प्रबन्ध करता था। शिवाजी प्रायः अपनी जागीर में भ्रमण पर रहता। वह मावली युवकों के साथ आसपास के पहाड़ों, नदियों एवं जंगलों को भी देखने जाता।
पांच वर्ष तक लगातार घूमते रहने के कारण शिवाजी कोंकण प्रदेश के एक-एक पहाड़, एक-एक जंगल, नदी-नालों-मुहानों और पर्वतीय उपत्यकाओं से परिचित हो गया। इस पूरे क्षेत्र में कई दुर्ग थे जिनमें मुस्लिम दुर्गपति नियुक्त थे। शिवाजी भी ऐसे ही दुर्ग अपने लिए बनवाने के स्वप्न देखने लगा। उसे यह भी लगने लगा था कि वे प्रयास करें तो मुस्लिम दुर्गपतियों से उनके दुर्ग आसानी से छीन सकते हैं।
दादा कोणदेव की चेतावनी
शिवाजी अपनी पत्नी एवं माता को बताए बिना घर से कई-कई दिनों तक के लिए अनुपस्थित रहने लगा। इस बीच वह अपने मावली साथियों के बीच जंगलों में जाकर युद्धाभ्यास करता था और किस दुर्ग को कैसे छीना जाएगा, इसकी योजना बनाता था। एक दिन यह बात कोणदेव तक पहुंच गई।
उसने शिवाजी को बुलाकर सावधान किया कि वह पूना में आदिलशाह के जागीरदार का प्रतिनिधि मात्र है। अतः आदिलशाह के विरुद्ध किसी भी तरह का कार्य करने के बारे में नहीं सोचे अन्यथा वह और उसका पूरा परिवार किसी बड़े संकट में फंस सकता है। शिवाजी ने दादा कोणदेव की बात को ध्यान से सुना किंतु ये बातें उसे निश्चय से डिगाने के लिए पर्याप्त नहीं थीं।
तोरण दुर्ग पर धावा
अंततः शिवाजी ने वह कर दिखाया जिसके बारे में वह पिछले कुछ वर्षों से सोच रहा था और इसकी तैयारी भी कर रहा था। एक दिन उसने अपने साथियों सहित, तोरण दुर्ग पर आक्रमण किया और उसे अपने अधिकार में ले लिया। जब यह सूचना बीजापुर पहुंची तो शिवाजी से उत्तर मांगा गया।
शिवाजी ने अपने उत्तर में आदिलशाह से कहलवाया कि उसने यह कदम बीजापुर राज्य की सुरक्षा के लिए उठाया है तथा तोरण दुर्ग को डाकुओं से मुक्त कराया है। वह इस दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत कर रहा है ताकि मुगलों से राज्य की रक्षा की जा सके। शाहजी के आश्वासन देने पर आदिलशाह ने शिवाजी के तर्क को स्वीकार कर लिया।
खजाने की प्राप्ति
एक दिन शिवाजी तोरण दुर्ग की मरम्मत करवा रहा था कि एक दीवार से उसे विशाल खजाने की प्राप्ति हुई। इसमें बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्राएं थीं। शिवाजी ने अपने साथियों से सच ही कहा था कि यदि वे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के कार्य को आरम्भ करेंगे तो उन्हें ईश्वरीय सहायता प्राप्त होगी। ईश्वरीय कृपा स्वतः उपस्थित हो गई थी।
इस खजाने का उपयोग एक विशाल सेना को तैयार करने में किया जा सकता था। शिवाजी अब दुगुने उत्साह से अपने कार्य में जुट गया। उसने वेतनभोगी सैनिकों की भर्ती करनी आरम्भ कर दी। उनके लिए अस्त्र-शस्त्र खरीदे तथा अश्वों का प्रबन्ध किया।
रायगढ़ का निर्माण
शिवाजी ने अब अपने दूसरे स्वप्न अर्थात् अपनी इच्छानुसार दुर्ग निर्माण करने पर ध्यान केन्द्रित किया। शिवाजी ने एक ऊंचे पहाड़ पर नया दुर्ग बनवाना आरम्भ किया तथा उसका नाम रायगढ़ रखा। यह सूचना भी बीजापुर में आदिलशाह तक शीघ्र ही पहुंच गई।
आदिलशाह ने शाहजी को बुलाया और उसे निर्देश दिए कि वह इस दुर्ग का निर्माण रुकवाए। शाहजी ने कोणदेव को पत्र लिखकर निर्देशित किया कि नए दुर्ग का निर्माण तत्काल रोक दिया जाए। कोणदेव ने शाहजी के पत्र के साथ अपनी ओर से भी एक पत्र शिवाजी को भिजवाया कि वह दुर्ग का निर्माण रोक दे। शिवाजी ने अपने दोनों अभिाभावकों के आदेश का पालन नहीं किया और दुर्ग का निर्माण यथावत् जारी रखा।
आदिलशाह की बीमारी
ई.1646 में बीजापुर का सुल्तान आदिलशाह बीमार पड़ गया। लगभग 10 वर्ष तक वह लाचार होकर खाट में पड़ा रहा। उसकी बीमारी के कारण राज्य का प्रबन्धन शिथिल हो गया और शत्रु सिर उठाने लगे। उसके अमीरों में वर्चस्व को लेकर षड़यंत्र होने लगे। बीजापुर की राजनीतिक परिस्थितियां शिवाजी के लिए अनुकूल सिद्ध हुईं। उसने बीजापुर के किलों पर तेजी से अधिकार करने की योजना बनाई।
सूपा दुर्ग पर दृष्टि
पूना की जागीर के निकट सूपा की जागीर थी जिस पर शिवाजी का अधिकार था। इस जागीर के निकट सूपा का दुर्ग था जिसमें आदिलशाह की तरफ से सम्भाजी मोहिते दुर्गपति था। शाहजी की द्वितीय पत्नी इसी सम्भाजी मोहिते की बहिन थी। इस तरह सूपा का दुर्गपति शिवाजी का सौतेला मामा था।
शिवाजी ने सम्भाजी से आग्रह किया कि वह शिवाजी के अभियान में सहयोग करे तथा दुर्ग शिवाजी को सौंप दे किंतु सम्भाजी, बीजापुर के प्रति वफादार बना रहा। उसने शिवाजी का साथ देने से मना कर दिया तथा सम्पूर्ण जानकारी आदिलशाह को भिजवा दी। जब शिवाजी को ज्ञात हुआ कि मोहिते ने शिवाजी की गतिविधियों की समस्त सूचनाएं बीजापुर भिजवा दी हैं तो एक रात्रि में शिवाजी ने अपने साथियों को लेकर सूपा दुर्ग पर आक्रमण कर दिया।
मोहिते के पास लगभग 400 सिपाही थे, किंतु वे दुर्ग की रक्षा नहीं कर सके। शिवाजी ने मोहिते परिवार को बंदी बना लिया और दुर्ग में स्थित समस्त खजाने पर अधिकार कर लिया।
शिवाजी ने मोहिते को समझाने का भरसक प्रयास किया कि वह शिवाजी द्वारा आरम्भ किए गए स्वातंत्र्य संग्राम में सम्मिलित हो जाए। उसे उसका दुर्ग तथा खजाना पुनः लौटा दिया जाएगा किंतु मोहिते अपनी जिद पर अड़ा रहा कि वह आदिलशाह के प्रति वफादारी को नहीं त्यागेगा। इस पर शिवाजी ने मोहिते को बंदी अवस्था में ही अपने पिता शाहजी के पास बैंगलोर भिजवा दिया क्योंकि रिश्तेदारी होने के कारण शिवाजी मोहिते को कोई कष्ट नहीं देना चाहता था।
कोणदेव की मृत्यु
सूपा के दुर्ग पर अधिकार हो जाने के बाद शिवाजी के पास तीन दुर्ग हो गए थे जो कि एक बड़ी बात थी किंतु शिवाजी अब कुछ समय के लिए चुप होकर बैठ गया ताकि आदिलशाह की प्रतिक्रिया का सामना कर सके। दारा कोणदेव, शिवाजी के प्रयासों का प्रशंसक बन गया।
उसे लगने लगा कि शिवाजी के पास वह मेधा और त्वरा है जिसके बल पर वह अपने उद्देश्यों में सफल हो सकता है। कोणदेव अब काफी वृद्ध हो गया था तथा रुग्ण रहने लगा था। इसलिए एक दिन उसने शिवाजी को अपने पास बुलाया और उससे कहा कि तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो, वही सही है।
मैं ही गलत था जो तुम्हारे प्रयासों का विरोध करता रहा। राष्ट्रहित में विदेशियों के शासन को समाप्त करने के लिए किसी को तो आगे आना ही पड़ेगा, वह तुम हो। कोणदेव ने शिवाजी की सफलता की कामना की और उसे आशीर्वाद दिया। मार्च 1647 में एक दिन कोणदेव ने अंतिम श्वांस ली। शिवाजी को शिवाजी बनाने वाले दो व्यक्तियों में से एक, इस धरती से विदा हो गया था। अब आगे का पथ शिवाजी को जीजाबाई के मार्गदर्शन में तय करना था।
बीजापुर राज्य के अनेक दुर्गों पर अधिकार
कोणदेव के आशीर्वाद से शिवाजी ने अपने भीतर नई ऊर्जा का अनुभव किया। उसका आत्मबल और भी बढ़ गया। उसने बीजापुर राज्य के कुछ अन्य दुर्गों पर धावा बोला और बिना अधिक रक्तपात किये, कई दुर्ग हस्तगत कर लिए। शिवाजी ने यह संकल्प धारण कर रखा था कि चूंकि अधिकांश दुर्गपति हिन्दू वीर हैं, अतः उनका रक्त नहीं बहाया जाए। उन्हें अपने अधीन करके प्रेम पूर्वक अपनी सेवा में नियुक्त किया जाए।
पुरन्दर दुर्ग पर अधिकार
अब शिवाजी किसी के लिए भी उपेक्षित किए जाने की स्थिति में नहीं रहा था। वह अपने शत्रुओं की आंखों में खटक चुका था। उस पर किसी भी समय आक्रमण हो सकता था। इसलिए आवश्यक था कि वह जागीर एवं अपने विजित क्षेत्र की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबन्ध करे। उसके राज्य की सीमा पर पुरन्दर दुर्ग स्थित था।
यदि वह इस दुर्ग पर अधिकार लेता तो उसे, शत्रु का मार्ग जागीर में प्रवेश करने से पहले ही रोकने की क्षमता प्राप्त हो जाती। यह दुर्ग भी बीजापुर राज्य के अधिकार में था तथा वहाँ नीलो नीलकंठ सरनायक नामक दुर्गपति नियुक्त था। यह एक ब्राह्मण परिवार था तथा इसके सम्बन्ध शिवाजी के परिवार से बहुत अच्छे चले आ रहे थे।
इन्हीं सम्बन्धों के कारण शिवाजी इस दुर्ग पर आक्रमण करने से बच रहा था। शिवाजी ने अपनी एक सेना इस दुर्ग के पास नियुक्त कर रखी थी ताकि उपद्रवी तत्वों एवं दस्युओं से शिवाजी की जागीर की रक्षा हो सके। इसके लिए उसने नीलकंठ परिवार से अनुमति भी प्राप्त कर रखी थी।
अचानक ही सरनायक परिवार में भाइयों के बीच एक विवाद खड़ा हो गया। नीलकंठ सरनायक ने शिवाजी से आग्रह किया कि वह पुरन्दर दुर्ग में आकर इस विवाद को सुलझाए और भाइयों में सुलह करवाए। दीपावली के दिन शिवाजी अपने सहायकों के साथ दुर्ग में पहुंचा। उसके आदमियों ने सरनायक परिवार के भाइयों को उनके पलंगों एवं खाटों पर ही बांधकर बंदी बना लिया।
शिवाजी ने उन भाइयों से कहा कि वे बीजापुर की नौकरी त्यागकर शिवाजी की नौकरी स्वीकार कर लें तथा शिवाजी के प्रति निष्ठावान रहने का वचन दें। इससे यह दुर्ग सरनायक परिवार के पास बना रहेगा। सरनायक भाइयों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
शिवाजी ने उन्हें बंदीगृहों में बंद कर दिया तथा लगातार 2-3 माह तक प्रेमपूर्वक अपनी बात समझाते रहे। अंत में सरनायक बंधुओं ने शिवाजी के प्रति निष्ठा ग्रहण करने का संकल्प लिया। शिवाजी ने उन सभी भाइयों को मुक्त करके दुर्ग सौंप दिया। सरनायक परिवार सदैव शिवाजी के प्रति निष्ठावान बना रहा।
कल्याण के दुर्ग एवं खजाने पर अधिकार
शिवाजी को अपने गुप्तचरों से सूचना मिली कि बीजापुर के शाह आदिलशाह ने कल्याण के दुर्गपति को निर्देश दिए हैं कि दुर्ग में स्थित समस्त कोष बीजापुर भेज दिया जाए। कल्याण के निकटवर्ती दुर्गपतियों एवं जागीरदारों को निर्देश दिए गए कि वे इस खजाने को मार्ग में सुरक्षा प्रदान करें। जब दुर्गपति मुल्ला अहमद, कल्याण दुर्ग से खजाना लेकर निकला तो शिवाजी ने अपनी सेना को दो दलों में विभक्त किया।
उन्होंने एक सैन्य-दल को मुल्ला अहमद को लूटने के लिए रवाना किया तथा दूसरे सैन्य-दल को कल्याण दुर्ग पर अधिकार करने भेजा। जब मुल्ला खजाना लेकर पुरन्दर दुर्ग के निकट से निकल रहा था, शिवाजी की टुकड़ी ने उस पर धावा बोल दिया। मुल्ला कुछ भी नहीं कर सका।
शिवाजी के आदमी खजाना लेकर रायगढ़ दुर्ग पहुंच गए। दूसरे दल ने भी तेजी से काम किया तथा मुल्ला के वापस लौट आने से पहले ही कल्याण दुर्ग पर धावा बोल दिया तथा दुर्ग पर अधिकार करके मुल्ला के परिवार को बंदी बना लिया।
शिवाजी द्वारा मुस्लिम स्त्री पर दया
इस परिवार में मुल्ला की एक पुत्रवधू भी थी जो अत्यंत सुंदर थी। शिवाजी के सेनापति आवाजी सोनदेव ने इस स्त्री को पालकी में बैठाकर शिवाजी के पास पूना भेज दिया। सोनदेव को आशा थी कि युवक शिवाजी इस अनिंद्य सुंदरी को उपहार के रूप में पाकर अत्यंत प्रसन्न होगा। शिवाजी ने उसे देखा तो उसके रूप की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका।
उसने कहा- ‘हे ईश्वर! तुझे धन्यवाद जो तूने इतनी सुन्दर सूरत बनाई है। कितना अच्छा होता यदि मेरी माता भी तेरे समान सुन्दर होती तो मैं भी इतना सुन्दर होता।’ शिवाजी ने उस स्त्री को मुल्ला के पास भेज दिया तथा सोनदेव को फटकार भिजवाई कि फिर कभी किसी स्त्री को बंदी नहीं बनाए। इस घटना के बाद शिवाजी की सेना में अनुशासन और भी गंभीर हो गया। शिवाजी के जीवित रहते, किसी मराठा सेनापति या सैनिक ने कभी अनुशासन भंग नहीं किया।
प्रबलगढ़ पर अधिकार
अब शिवाजी का राज्य पूना और सूपा से बढ़कर समुद्र के किनारे तक आ पहुंचा। पनवेल के निकट प्रबलगढ़ नामक दुर्ग था। यह भी बीजापुर राज्य के अधीन था। यहाँ केशरीसिंह नामक दुर्गपति नियुक्त था। शिवाजी ने इस दुर्ग को भी बिना रक्तपात किये, अपने अधिकार में लेने के प्रयास किए किंतु जब ये प्रयास सफल नहीं हुए तो शिवाजी ने युद्ध करने का निर्णय लिया।
भीषण युद्ध में केशरीसिंह अपने आदमियों सहित मारा गया। इस दुर्ग में शिवाजी को सोने की मुहरें, सोने की छड़ें तथा होन का विशाल खजाना प्राप्त हुआ। यह समस्त स्वर्ण, एक गुप्त स्थान पर कुछ बर्तनों में रखा हुआ था। (होन शब्द का निर्माण स्वर्ण से हुआ है। इसे हूण भी कहते थे, एक होन की कीमत चार रुपए के बराबर थी)
शत्रु की माता को सष्टांग प्रणाम
शिवाजी के भय से केशरीसिंह की माता तथा दो बच्चे किले में ही एक स्थान पर छिप गए थे। शिवाजी के सैनिकों ने उन्हें पकड़कर शिवाजी के समक्ष प्रस्तुत किया। शिवाजी ने इस वृद्धा को देखते ही धरती पर लेटकर साष्टांग प्रणाम किया तथा सवारी के लिए पालकी देकर अपने सैनिकों की सुरक्षा में उसके जन्मस्थान देवल गांव भेज दिया।
इसके बाद शिवाजी ने केशरीसिंह तथा उसके आदमियों का हिन्दू विधि विधान से अंतिम संस्कार करवाया। शिवाजी के इस आचरण का शिवाजी की सेना पर गहरा प्रभाव पड़ा। शिवाजी के निकट सम्पर्क में आने वाला ऐसा कोई प्राणी नहीं था जिसके हृदय में शिवाजी के प्रति आदर और प्रेम न उपजा हो। मुगलिया काल में शिवाजी की राजनीति जैसी शुचिता अन्य किसी राजा अथवा योद्धा के आचरण में देखने को नहीं मिलती।
ताश के पत्तों की तरह झोली में आ गिरे दुर्ग
शीघ्र ही शिवाजी की राजनीति के अच्छे परिणाम मिलने लगे। शिवाजी तलवार चलाता जा रहा था और बड़े-बड़े दुर्गम दुर्ग शिवाजी की झोली में बरसाती भुनगों की तरह आ-आ कर गिर रहे थे। सिंहगढ़, तोरण, चाकण, कोण्डाना, पुरन्दर, कुम्भलगढ़, पन्हाला, कंगूरी, तुंग, तिकोना, भूरप, कौंडी, लोगहर, राजमण्डी तथा कल्याणी के दुर्ग और चाकण से लेकर नीरा नदी तक का क्षेत्र शिवाजी के अधिकार में आ गए। शिवाजी ने वीरवारी तथा लिंगनाथगढ़ नामक नए दुर्गों का निर्माण करवाया। भूषण कवि ने लिखा है-
दुग्ग पर दुग्ग जीते, सरजा सिवाजी गाजी, डग्ग
नाचे डग्ग पर शण्ड मुण्ड परके।
आदिलशाह द्वारा शाहजी को बंदी बनाया जाना
ई.1645 में जब शिवाजी की गतिविधियों के समाचार बीजापुर के शाह को मिले तो उसने शिवाजी के पिता शाहजी को बंदी बनाने का निश्चय किया। आदिलशाह को लगा कि शाहजी की शह पर ही शिवाजी यह सब कार्यवाही कर रहा है। उसने शाहजी को बंदी बनाने का कार्य अपने विश्वस्त व्यक्ति, मुधौल के उपसेनापति बाजी घोरपड़े को सौंपा। बाजी घोरपड़े और शाहजी भौंसले एक ही वंश से थे।
बाजी ने शाहजी को अपने निवास पर भोजन हेतु आमंत्रित किया तथा छल से बंदी बनाकर आदिलशाह के पास भेज दिया। बीजापुर में शाहजी को कठोर कारावास में रखा गया तथा उससे कहा गया कि वह शिवाजी की गतिविधियों को रुकवाए। शाहजी ने स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने के लिए अपनी ओर से भरसक प्रयास किया किंतु कुतुबशाह ने उनकी कोई बात नहीं सुनी।
आदिलशाह की कैद से शाहजी की मुक्ति
जब शिवाजी को अपने पिता के बंदी होने का समाचार मिला तो शिवाजी की राजनीति को बड़ा धक्का लगा। शिवाजी ने अपनी समस्त गतिविधियां बंद कर दीं तथा अपने पिता को बंदीगृह से छुड़ाने के लिए स्वयं आत्म-समर्पण करने का निश्चय किया। शिवाजी की पत्नी सईबाई ने शिवाजी को यह आत्मघाती कदम उठाने से रोका।
सईबाई ने शिवाजी को समझाया कि पिता और पुत्र यदि दोनों ही आदिलशाह के हाथ लग गए तो वह एक को भी जीवित नहीं छोड़ेगा। इस पर शिवाजी ने मुगल बादशाह शाहजहाँ से सहायता मांगने के लिए अपने वकील के हाथों एक पत्र भिजवाया। शाहजहाँ ने आदिलशाह को लिखा कि वह शाहजी को बंदीगृह से मुक्त करे किंतु आदिलशाह अपनी जिद पर अड़ा रहा।
इस अवधि में शाहजहाँ की तरफ से औरंगजेब दक्खिन के मोर्चे पर नियुक्त था। औरंगजेब ने आदिलशाह पर दबाव बनाया कि वह शाहजी को मुक्त करे। शाहजी का मित्र मुरारपंत, आदिलशाह को समझाने में सफल हुआ कि शिवाजी द्वारा की जा रही कार्यवाहियों में शाहजी का हाथ नहीं है।
शिवाजी ने बीजापुर के शाह को प्रस्ताव भिजवाया कि यदि शाहजी को मुक्त कर दिया जाए तो वह सिंहगढ़ (पुराना नाम कोंडाणा दुर्ग) बीजापुर को समपर्पित कर देगा। अंततः चार साल तक बंदीगृह में रहने के बाद 16 मई 1649 को शाहजी को बंदीगृह से मुक्ति मिली। चार साल की अवधि में कनार्टक में व्यवस्थाएं बिगड़ने लगी थीं। इसलिए आदिलशाह ने शाहजी को उसका पुराना पद और कर्नाटक की जागीर लौटा दी एवं जागीर का प्रबन्ध करने भेज दिया।
शाहजहाँ काशाहजी एवं शिवाजी को निमंत्रण
शाहजी किसी समय मुगलों की सेवा में भर्ती हुआ था किंतु उसने मुगलों को छोड़कर अहमदनगर की तथा अहमदनगर राज्य के समाप्त होने पर बीजापुर राज्य की नौकरी की। बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी को चार साल तक बंदीगृह में रखा। इसलिए 14 अगस्त 1649 को शाहजहाँ के पुत्र मुराद ने शाहजी एवं शिवाजी को पत्र लिखकर मुगलों की सेवा के लिए आमंत्रित किया ताकि शाहजी और शिवाजी मिलकर मुगलों के लिए बीजापुर राज्य का नाश कर सकें।
शिवाजी को लिखे गए पत्र का मजमून इस प्रकार से था– ‘‘हमारी कभी न खत्म होने वाली शाही मेहरबानियों से निहाल हों और समझें कि अत्यंत मेहरबानी के साथ आपके पिता के अपराधों पर हमने अपनी कलम से माफी की लकीर खींची है और वफादारी और निष्ठा के लिए कृपा और क्षमा के द्वार खोल दिए गए हैं। यही समय है कि आप अपने पिता और अन्य कुलजनों के साथ बादशाह की चौखट पर सलाम करने के लिए हमारे सामने हाजिर हों, ताकि वो खुशी हासिल करने के लिए आपको 5 हजार सवारों के साथ पांच हजारी जात की मनसब और बाकी मुनासिब इनामात देकर आपके साथियों से ऊंचा उठाया जा सके और शाही सेवा में आपके पिता के पुराने मनसब बहाल किए जा सकें।”
शिवाजी ने बीजापुर को अपने पिता की मुक्ति के एवज में सिंहगढ़ समर्पित किया था। इसलिए शाहजी या शिवाजी पर मुगलों का कोई अहसान नहीं था। अतः शिवाजी और शाहजी ने मुराद के पत्रों का कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया। शिवाजी की राजनीति अब नए दौर में प्रवेश कर चुकी थी।
मुगलों से दूरी
उत्तर भारत के मुगलों एवं दक्षिण भारत के शिया मुसलमानों की राजनीति के बीच शिवाजी सम्भल कर चल रहा था। शिवाजी की राजनीति उत्तर के सुन्नियों एवं दक्षिण के शियाओं दोनों से एक साथ उलझ गई थी। शिवाजी दोनों को अपना शत्रु मानता था और नित्य नवीन क्षेत्र अपने राज्य में सम्मिलित कर रहा था। जीत के उत्साह में उसने कभी आपा नहीं खोया। वह जानता था कि एक बार में एक ही शत्रु से बैर मोल लेना चाहिए। इसलिए उसने अब तक जितनी कार्यवाहियां की थीं, बीजापुर राज्य के क्षेत्र में की थीं।
बीजापुर के शाह से उसे इसलिए घृणा थी क्योंकि उसने विजयनगर साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर उत्पन्न हुए छोटे-छोटे हिन्दू राज्यों एवं उनकी प्रजाओं पर भयानक अत्याचार किए थे तथा शाहजी को अकारण चार साल तक बंदीगृह में रखा था। ई.1653 में शाहजहाँ ने औरंगजेब को दक्षिण का सूबेदार बनाया।
औरंगजेब अच्छी तरह समझता था कि यदि दक्खिन में शांति से रहना है तो शिवाजी से अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखने होंगे। उसने शिवाजी को पत्र लिखकर मिलने के लिए बुलाया किंतु शिवाजी ने अपनी व्यस्तताओं का हवाला देकर औरंगजेब से भेंट नहीं की।
जावली पर अधिकार
शिवाजी की बढ़ती हुई कार्यवाहियाँ और शिवाजी की राजनीति बीजापुर के शाह की बर्दाश्त से बाहर होती जा रही थीं। एक दिन आदिलशाह ने अपने सेनापति श्यामराज को आदेश दिया कि वह या तो शिवाजी का वध करे या पकड़कर लाए। श्यामराज अपनी विशाल सेना लेकर शिवाजी को खोजता हुआ जावली की ओर आया।
जावली क्षेत्र उन दिनों आदिलशाह के विश्वस्त एवं प्रबल जागीरदार चन्द्रराव मोरे के अधिकार में था। वह भी चाहता था कि शिवाजी की गतिविधियों पर विराम लगे। अतः उसने श्यामराज के साथ सहयोग किया। शिवाजी के गुप्तचर इन दोनों जागीरदारों की कार्यवाहियों की सूचना निरंतर शिवाजी तक पहुंचा रहे थे।
इसलिए शिवाजी भी पूरी तैयारी कर रहा था। श्यामराज अपने साथ एक विशाल सेना लेकर, शिवाजी के डेरों के आसपास के जंगल में जा छिपा। उसकी योजना थी कि जब कभी शिवाजी यहाँ से होकर निकले, उसे घेर कर मार डाला जाए। शिवाजी, श्यामराज द्वारा बिछाए गए मौत के जाल को अच्छी तरह समझ गया तथा उसने इस जाल को अपने हाथों से काटने का निर्णय लिया।
एक रात जब श्यामराज की सेना गहरी निद्रा में सो रही थी, शिवाजी अपनी सेना लेकर श्यामराज के शिविर पर टूट पड़ा। अचानक हुए इस धावे के लिए श्यामराज तैयार नहीं था। उसके अधिकांश सैनिक या तो मारे गए या प्राण बचाकर जंगलों में भाग गए। श्यामराज भी सिर पर पैर धरकर भागा। शिवाजी ने शिकारी बनकर आए श्यामराज को उसके ही बनाए हुए मौत के जाल में फांस लिया था।
जावली की जागीर पर अधिकार
जावली का जागीरदार चन्द्रराव मोरे, अपना सम्बन्ध प्राचीन मौर्य वंश से बताता था। शिवाजी चाहता था कि इस हिन्दू राजपरिवार से उसकी मित्रता हो जाए ताकि एक हिन्दू को दूसरे हिन्दू का रक्त न बहाना पड़े। शिवाजी ने इसके लिए प्रयास भी किए किंतु शक्ति के मद में चूर, चन्द्रराव मोरे हर समय शिवाजी की हँसी उड़ाया करता था।
फिर भी शिवाजी ने उसे स्वजातीय हिन्दू जानकर कभी शत्रुता वाली कार्यवाही नहीं की। अब जबकि चन्द्रराव मोरे ने श्यामराज के साथ मिलकर शिवाजी के लिए मौत का जाल बिछाने में सहयोग किया था, शिवाजी ने मोरे को समाप्त करने का निर्णय लिया।
शिवाजी शक्ति का प्रयोग करके भी मोरे से निबट सकता था किंतु शिवाजी की राजनीति का नियम था कि शक्ति को बचाकर रखा जाए तथा शत्रु पक्ष के हिन्दू वीरों के प्राण नहीं लिए जाएं। इसलिए शिवाजी ने एक कूटजाल बुना। उसने अपने वेतन अधिकारी रघुनाथ बल्लाल को मोरे के पास एक वैवाहिक प्रस्ताव लेकर भेजा तथा स्वयं सेना सहित जावली के जंगलों में जा छिपा।
26 जनवरी 1656 को रघुनाथ बल्लाल चुने हुए 25 तलवारबाजों को लेकर मोरे के पास जावली गया और वहाँ कुछ औपचारिक वार्तालाप करके कुछ विशेष बातें करने के लिए अगले दिन का समय ले लिया। अगले दिन के वार्तालाप के लिए जावली के महलों में एक अलग कक्ष नियत किया गया।
यहाँ चन्द्रराव मोरे तथा उसके भाई सूर्यराव मोरे के अतिरिक्त और कोई नहीं था। रघुनाथ भी अपने एक सहायक को लेकर मोरे से मिलने पहुंचा। थोड़ी देर के वार्तालाप के पश्चात् रघुनाथ तथा उसके सहायक ने अपने कपड़ों से कटारें निकालकर मोरे बंधुओं का वध कर दिया। मोरे के अंगरक्षक कक्ष के बाहर मौजूद थे किंतु वे निश्चिंत एवं असावधान थे।
इसलिए रघुनाथ और उसका साथी उन्हें भ्रम में डालकर महलों से बाहर निकल आए और सीधे जंगल की ओर भागे। शिवाजी को जैसे ही इसकी सूचना मिली, वह जंगल से निकलकर जावली के महल पर टूट पड़ा। देखते ही देखते जावली की सेना के पांव उखड़ गए और चन्द्रराव मोरे के दो पुत्र बंदी बना लिए गए।
इस प्रकार 27 जनवरी 1656 को जावली दुर्ग पर शिवाजी का अधिकार हो गया। जावली की विजय से शिवाजी को बहुत बड़ा भू-भाग, कोष और राजगढ़ का दुर्ग हाथ लगा जो बाद में शिवाजी की राजधानी बना।
आदिलशाह की मृत्यु
ई.1657 में बीजापुर के शाह आदिलशाह की मृत्यु हो गई। वह दस साल से बीमार चल रहा था तथा शासन व्यवस्था उसके मंत्री एवं सेनापति संभालते थे। आदिलशाह के बाद उसका 18 साल का पुत्र अली आदिलशाह (द्वितीय) बीजापुर का नया सुल्तान हुआ।
औरंगजेब की नाराजगी
जिस समय औरंगजेब अहमदनगर राज्य के किलों को एक-एक करके निगल रहा था, उस समय शिवाजी, बीजापुर राज्य के किलों केे लिए काल बना हुआ था। दोनों अपने-अपने उद्देश्यों में लगे हुए थे किंतु दोनों ही जानते थे कि शीघ्र ही वे एक दूसरे के लिए चुनौती बन जाएंगे। शिवाजी की राजनीति औरंगजेब के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गई।
राजनीति का शातिर खिलाड़ी औरंगजेब इस समय शिवाजी को शांत रखना चाहता था इसलिए उसने 22 अप्रेल 1657 को शिवाजी को एक पत्र भेजा जिसमें उसने अपना बड़प्पन प्रदर्शित करते हुए लिखा-
”वास्तव में बीजापुर के जितने किले और महल पहले से आपके कब्जे में हैं, हम उन्हें आपको स्थायी तौर पर सौंपते हैं। आपकी इच्छा के अनुसार दाभोल के किले और उसके अधीन क्षेत्रों से प्राप्त आय भी हम आपके लिए छोड़ते हैं- आपके बाकी अनुरोध स्वीकार किए जाएंगे ओर आप अपनी कल्पना से कहीं अधिक हमारे अनुग्रह और कृपा के पात्र बनेंगे।”
औरंगजेब का पत्र पाकर शिवाजी चिढ़ गया। उसने औरंगजेब को करारा जवाब देने के लिए मुगलों के अधिकार वाले जुन्नार नगर पर चढ़ाई करके शहर को लूट लिया। इसके बाद शिवाजी ने अहमदनगर पर आक्रमण किया।
औरंगजेब इस कार्यवाही से गुस्से से पागल हो गया। उसने दक्षिण में नियुक्त समस्त मुगल सेनापतियों को लिखित निर्देश भिजवाए- ”शिवाजी के इलाकों में घुस जाओ, तमाम गांव बर्बाद कर दो, बेरहमी से लोगों की हत्या करो ओर उन्हें बुरी तरह लूट लो। शिवाजी की पूना और चाकण की जागीरें पूरी तरह नष्ट कर दी जाएं और लोगों की हत्या और उन्हें गुलाम बनाने में जरा भी ढील न दी जाए।”
औरंगजेब का आदेश जारी होते ही मुगल सेनाएं शिवाजी की जागीरों में घुस गईं और उन्हें बुरी तरह नष्ट करने लगीं। शिवाजी ने यह सारा हाल शाहजहाँ को लिख भेजा तथा अपनी जागीरों में मुगलों के हस्तक्षेप एवं उनके द्वारा किए जा रहे विध्वंस पर नाराजगी जताई।
शाहजहाँ, औरंगजेब द्वारा दक्षिण में दिखाई जा रही अति-सक्रियता से प्रसन्न नहीं था। उसने औरंगजेब को आदेश भिजवाए कि दक्षिण में शांति बनाए रखी जाए तथा बीजापुर रियासत अथवा उसके किसी जागीरदार के विरुद्ध विध्वंस की कार्यवाही नहीं की जाए।
सितम्बर 1657 में शाहजहाँ की बीमारी की सूचना पूरे देश में फैल गई और औरंगजेब का ध्यान मुगलों के तख्त पर कब्जा करने में लग गया। इसका लाभ उठाकर शिवाजी ने 24 अक्टूबर 1657 को कल्याण और भिवण्डी पर अधिकार कर लिया। जनवरी 1658 में उसने माहुली का दुर्ग जीत लिया। इस प्रकार शिवाजी, समुद्र तट से लेकर पर्वतीय प्रदेश तक के पुराने निजामशाही कोंकण का स्वामी बन गया।
कल्याण तथा भिवण्डी को औरंगजेब ने मुगल राज्य में सम्मिलित कर लिया था, शिवाजी की इस कार्यवाही से औरंगजेब ने स्वयं को अत्यधिक अपमानित अनुभव किया किंतु वह मुगलिया राजनीति के ऐसे झंझावात में फंस चुका था कि अगले कई वर्षों तक उसे शिवाजी की तरफ देखने का समय नहीं मिलने वाला था।
औरंगजेब शिवाजी की राजनीति को बहुत अच्छी तरह समझ चुका था। दक्षिण से आगरा की ओर भागते हुए उसने बीजापुर के शासक अली आलिशाह (द्वितीय) को एक पत्र लिखकर अपनी बौखलाहट व्यक्त की-
”इस देश की रक्षा करो। शिवाजी को, जिसने यहाँ कुछ किलों पर चोरी से कब्जा जमा लिया है, बाहर निकालो। यदि तुम उनकी सेवाएं स्वीकार करना चाहते हो तो उसे कर्नाटक में साम्राज्य के क्षेत्रों से दूर की जागीरें दो, ताकि वह यहाँ की शांति न भंग कर सके।”
अफजल खाँ का वध औरंगजेब कालीन इतिहास की बड़ी घटना थी जिसने औरंगजेब की सत्ता को न केवल चुनौती दी अपितु इसकी चूलें भी हिला दीं।
शिवाजी मुगलों के आंतरिक क्लेश को ध्यान से देख रहा था। जब मुगल शहजादे उत्तराधिकार के युद्ध में व्यस्त हो गए तो शिवाजी बीजापुर की आदिलशाही पर बिजली बनकर टूट पड़ा और उसके बहुत सारे क्षेत्र अपने राज्य में मिला लिए।
इस समय बीजापुर की गद्दी पर आदिलशाह (द्वितीय) आसीन था। यह वही आदिलशाही थी जो वियजनगर साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर खड़े छोटे हिन्दू राज्यों को निगल गई थी तथा जिसने शाहजी को चार साल तक अपने बंदीगृह में रखा था।
अफजल खाँ का अभियान
बीजापुर का सुल्तान समझ गया कि यदि शिवाजी के विरुद्ध कठोर कार्यवाही नहीं की गई तो शिवाजी, सम्पूर्ण आदिलशाही को निगल जाएगा। इसलिए ई.1659 में अफजलखाँ को विशाल सेना के साथ शिवाजी कि विरुद्ध अभियान पर भेजा गया। उससे कहा गया कि शिवाजी से किसी तरह की संधि नहीं की जाए, उसे या तो बंदी बनाया जाए या फिर उसका वध किए जाए।
अफजल खाँ लम्बे-चौड़े डील और दुष्ट स्वभाव का व्यक्ति था। वह अपने वचनों का कभी पालन नहीं करता था, शरण में आए हुए शत्रु को भी निर्ममता से मार डालता था। उसे अनेक युद्धों का अनुभव था। उसने दरबार में घोषणा की कि वह घोड़े से उतरे बिना ही धूर्त शिवाजी को बंदी बनाकर सिंहासन के पायों से बांध देगा।
शिवाजी का प्रण
इधर शिवाजी भी अफजल खाँ को जान से मारना चाहता था क्योंकि अफजल खाँ ने धोखे से बहुत से हिन्दुओं की हत्या की थी और उनका सर्वनाश किया था। शिरा का हिन्दू शासक कस्तूरी रंगन युद्ध का त्याग करके अफजल खाँ की शरण में आया था तथा अफजल खाँ ने उसकी रक्षा करने का वचन दिया था।
उसके उपरांत भी अफजल खाँ ने बड़ी क्रूरता से कस्तूरी रंगन की उसके परिवार सहित हत्या की थी। यहाँ तक कि अफजल खाँ ने शिवाजी के बड़े भाई सम्भाजी की भी हत्या की थी। शिवाजी, हिन्दुओं के इस शत्रु को किसी भी कीमत पर जीवित नहीं छोड़ना चाहता था।
अफजल खाँ, शिवाजी की सेना में भय एवं आतंक फैलाने के लिए मार्ग के समस्त हिन्दू मंदिरों और देव विग्रहों को तोड़ता हुआ और गांवों को उजाड़ता हुआ आगे बढ़ा। उसने बाई के निकट डेरा डाला। अफजल खाँ की तैयारियों को देखते हुए शिवाजी प्रतापगढ़ दुर्ग में चला गया। यह दुर्ग पहाड़ की एक पतली चोटी पर स्थित था।
इस पर न तो चढ़ाई करके शिवाजी को बाहर निकाला जा सकता था और न ही घेरा डालकर बैठा जा सकता था। इसलिए अफजल खाँ ने एक कपट जाल बुना। उसने कुलकर्णी ब्राह्मण कृष्णजी भास्कर को शिवाजी के पास भेजकर कहलवाया कि अफजल खाँ, शिवाजी के पिता शाहजी का मित्र है।
यदि शिवाजी अफजल के पास चलकर संधि कर ले तो शिवाजी को सुल्तान से क्षमादान दिलवा दिया जाएगा। शिवाजी ने बड़ी आत्मीयता से कृष्णजी भास्कर और उसके साथियों का स्वागत-सत्कार किया तथा उनके ठहरने का प्रबन्ध इस प्रकार किया कि शिवाजी, कृष्णजी के साथियों की दृष्टि में आए बिना, कृष्णजी भास्कर से एकांत में भेंट कर सके।
शिवाजी ने कृष्णजी तथा उसके साथियों से कहा कि मैंने अपनी मूर्खताओं के कारण बहुत ही गंभीर अपराध किए हैं जिनके लिए मैं लज्जित हूँ। यदि अफजल खाँ मुझे शाह से क्षमादान दिलवा चाहें तो मैं आत्मसमर्पण के लिए तैयार हूँ और समस्त दुर्ग वापस करने की इच्छा रखता हूँ। कृष्णजी और उनके साथी, शिवाजी के इस उत्तर से संतुष्ट हो गए।
रात्रि में एकांत पाकर शिवाजी, कृष्णजी से मिलने के लिए पहुंचा और ब्राह्मण के पैर पकड़कर बोला-
”मैंने आज तक जो कुछ भी किया है वह हिन्दू धर्म एवं हिन्दुत्व की भलाई के लिए किया है। मुझे तुलजा भवानी ने स्वप्न में आदेश दिया है कि मैं गौ, ब्राह्मण और हिन्दू मंदिरों में विराजित देव विग्रहों की रक्षा करूं। जो धर्मविरोधी लोग देवालयों को तोड़कर नष्ट कर रहे हैं, मैं उन्हीं को समाप्त करने एवं दण्डित करने का कार्य कर रहा हूँ। ब्राह्मण होने के नाते आपका भी यह कर्त्तव्य है कि इस पुनीत कार्य में मेरी सहायता करें। इसके लिए आपको पुण्य और पारितोषिक दोनों प्राप्त होंगे।”
ऐसा कहकर शिवाजी ने कृष्णजी को बहुमूल्य उपहार दिए तथा दीपरा नामक गांव इनाम में देने का वचन दिया। यह गांव पीढ़ी-दर पीढ़ी कृष्णजी के परिवार के पास ही रहने देने का वचन भी दिया।
कृष्णजी इस समय दुष्ट अफजल खाँ का दूत बनकर आया था किंतु वह भी मुसलमानों द्वारा हिन्दू प्रजा पर किए जा रहे अत्याचारों से बहुत दुःखी था। इसलिए उसने हिन्दू धर्म के रक्षक और प्रजा वत्सल राजा शिवाजी की सहायता करने का निर्णय लिया।
उसने शिवाजी को बता दिया कि अफजल खाँ का प्रण है कि वह शिवाजी को बंदी बनाकर सुल्तान के समक्ष प्रस्तुत करेगा। कृष्णजी ने शिवाजी को सलाह दी कि किसी भी तरह सुल्तान से संधि करने में ही भलाई है क्योंकि तुम किसी भी प्रकार विजयी नहीं हो सकते।
शिवाजी ने कृष्णजी की बातों से सहमति जताई तथा अपने दूत गोपीनाथ पंतोजी को अफजल खाँ के पास संधि की शर्तें तय करने के लिए नियुक्त किया। कृष्णाजी भास्कर, पन्तोजी को अपने साथ लेकर अफजल खाँ के शिविर में गया।
कृष्णाजी ने अफजल खाँ को समझाया कि शिवाजी संधि करने को तत्पर है क्योंकि वह जानता है कि वह अफजल खाँ से लड़कर जीत नहीं सकता। गोपीनाथ पंतोजी चतुर राजनीतिज्ञ था। उसने अफजल खाँ को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि वह अपने एक अंगरक्षक की उपस्थिति में शिवाजी से मिले तथा शिवाजी भी अपने एक अंगरक्षक के साथ मिलने के लिए आए।
यदि अफजल खाँ शिवाजी की सुरक्षा की जिम्मेदारी ले तो शिवाजी, सुल्तान के समक्ष समर्पण कर देगा। अफजल खाँ को अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा था। वह यह सोचकर प्रसन्न था कि शिवा, अफजल खाँ द्वारा बुने हुए जाल में स्वयं ही फंसने के लिए आ रहा है इसलिए वह प्रतापगढ़ दुर्ग के नीचे शिवाजी से मिलने को तैयार हो गया।
अफजल खाँ का वध
10 नवम्बर 1659 को मध्याह्न पश्चात् 3 से 4 बजे के बीच दोनों के बीच भेंट होनी निश्चित हुई। शिवाजी ने अफजल खाँ से निबटने की हर संभव तैयारी की। उसने प्रतापगढ़ दुर्ग के नीचे की ढालू धरती पर एक शामियाना लगवाया जो चारों तरफ से खुला हुआ था।
वहाँ तक जाने के लिए नीचे से ऊपर तक के वृक्ष एवं झाड़ियां काटकर एक मार्ग बनाया गया तथा अन्य सभी मार्गों को कांटेदार झाड़ियों से अच्छी तरह बंद कर दिया गया। शिवाजी ने नेताजी पाल्कर तथा पेशवा मोरोपंत के नेतृत्व में अपनी मावली सेना को पर्वतीय गुफाओं और झाड़ियों में छिपा दिया जो किसी भी संकट के समय शिवाजी के पास पहुंच कर सहायता कर सके। उन्हें यह भी निर्देश दिए कि जैसे ही दुर्ग से तोप चलने की आवाज हो, मावली सेना तत्काल अफजल खाँ की सेना पर धावा बोल दे।
निर्धारित समय पर अफजल खाँ अपने साथ लगभग डेढ़ हजार सैनिक लेकर प्रतापगढ़ दुर्ग की तरफ रवाना हुआ। गोपीनाथ पंतो ने उससे कहा कि वह अपने अंगरक्षकों को यहीं छोड़ दे अन्यथा शिवाजी मिलने के लिए नहीं आएगा। इस पर अफजल खाँ ने सेना को दुर्ग की तलहटी में ही छोड़ दिया तथा अपने अंगरक्षक सैयद बंदा और मध्यस्थ कृष्णजी भास्कर को लेकर दुर्ग की पहाड़ी पर चढ़ने लगा।
उधर शिवाजी ने प्रातःकाल से ही इस भेंट की तैयारी करने लगा। उसने तुलजा भवानी की पूजा की। शरीर पर लोहे की जाली की पोषाक पहनी तथा उसके ऊपर ढीले-ढाले वस्त्र धारण किये। सिर पर साफे के नीचे इस्पात की टोपी पहनी तथा अपने बाएं हाथ में बघनखा और दाएं हाथ के नीचे बिछुवा छिपा लिया। समस्त तैयारियां पूरी होने पर शिवाजी ने माता जीजाबाई के चरण पकड़ कर आशीर्वाद मांगा और गंतव्य के लिए रवाना हो गया। तानाजी मलसुरे तथा जीवमहला नामक दो अंगरक्षक शिवाजी के साथ चले।
अफजल खाँ, शिवाजी से पहले ही शामियाने में पहुंच गया। शामियाने में शानदार बहुमूल्य कालीन बिछे हुए थे। उन्हें देखकर अफजल खाँ ने कटाक्ष किया कि एक जागीरदार के लड़के को इतनी शानो-शौकत शोभा नहीं देती। तब गोपीनाथ पन्तो ने जवाब दिया- ‘हुजूर यह समस्त सामान, शिवाजी के आत्म समर्पण के साथ ही बीजापुर सुल्तान की सेवा में प्रस्तुत कर दिया जाएगा।’
अब तक शिवाजी आया नहीं आया था, इसलिए संदेशवाहकों को उसे लाने भेजा गया। अफजल खाँ, शिवाजी की इस उद्दण्डता पर झल्लाने लगा। कुछ समय पश्चात् शिवाजी ने तानाजी मालसुरे तथा जीवमहला के साथ शामियाने के निकट आत हुआ दिखाई दिया।
अफजल खाँ का अंगरक्षक सैयद बंदा भी अफजल खाँ की तरह अत्यंत हृष्ट-पुष्ट तथा भारी डील-डौल वाला व्यक्ति था। शिवाजी उसे देखकर शामियाने के बाहर ही ठिठकर खड़ा हो गया। नाटे कद के साधारण शरीर वाले शिवाजी को देखकर अफजल खाँ ने उसकी समस्या को समझ लिया और सैयद बंदा को पीछे हटने को कहा।
शिवाजी ने शामियाने के भीतर आकर अफजल खाँ का अभिवादन किया। अफजल खाँ ने कृष्णजी भास्कर से पूछा कि क्या यही शिवाजी है? कृष्णजी भास्कर के हाँ कहने पर अफजल खाँ ने शिवाजी से पूछा- ”तुमने क्यों हमारे किलों को लूटा और उनको उजाड़ बना दिया?”
शिवाजी ने उत्तर दिया- ”मैंने राज्य की सेवा की है, मैंने डाकू-लुटेरों को किलों से भगाकर शाह का कब्जा करा दिया है। मुझे इनाम मिलना चाहिए, न कि दण्ड।”
अफजल खाँ ने नाराज होकर कहा- ”तुम अब इतने बेखौफ हो गए हो कि तुम्हें शाह का खौफ भी नहीं रहा।”
शिवाजी ने कहा- ”नहीं खाँ साहब, मैं तो शाह की खिदमत कर रहा हूँ और हमेशा उनका खिदमतगार रहूंगा।”
अफजल खाँ ने कहा- ”खैर जो हुआ सो हुआ, अब तुम सारे किले मुझे वापस कर दो और मेरे साथ शाह से अपने इन अपराधों की माफी मांगने बीजापुर चलो।”
शिवाजी ने कहा- ”यदि मैं शाह का इस प्रकार का फरमान पा लूं तो उसे सिर पर रखकर पालन करूंगा।”
तभी कृष्णजी भास्कर ने कहा- ”अभी तुम खान की सुरक्षा में हो, झुककर सलाम करो और माफी मांगो, खान तुम्हें माफ कर देंगे।”
शिवाजी ने जवाब दिया- ”खान और मैं सुल्तान के सेवक हैं, फिर खान कैसे मेरे अपराधों को क्षमा कर सकते हैं? फिर भी यदि आप मुझसे कहते हैं तो मैं आपकी आज्ञा का उल्लघंन नहीं कर सकता और खान की गोद में अपना सिर रखता हूँ।” इतना कहकर शिवाजी और खान गले मिलने के लिए आगे बढ़े।
अफजल खाँ ने गले मिलते समय शिवाजी की गर्दन को जोर से अपनी बांहों में जकड़ लिया और गला घोंटकर मारने की कोशिश की। शारीरिक शक्ति के मामले में शिवाजी, अफजल खाँ की तुलना में कुछ भी नहीं था, वह अफजल खाँ के कंधों तक कठिनाई से आ पाया था।
शिवाजी ने अफजल खाँ की पकड़ से मुक्त होने के लिए अपने बाएं हाथ में बंधे बघनखे से उसके पेट पर प्रहार करके उसकी अंतड़ियों को बाहर निकाल लिया जिससे अफजल खाँ की पकड़ ढीली पड़ गई। अवसर मिलते ही शिवाजी ने अपने दाएं हाथ में फंसे बिछुए से खाँ के पेट पर और भी जबर्दस्त प्रहार किये।
अफजल खाँ जोर से चीखा। इन दोनों को गुत्थमगुत्था देखकर उनके अनुचर भी शामियाने में चले आए। सैयद बंदा ने अपनी तलवार से शिवाजी के सिर पर भयानक प्रहार किया। इससे शिवाजी की पगड़ी के नीचे रखी इस्पात की टोपी कट गई और शिवाजी के सिर पर भी चोट लगी।
जीवमहला भी दौड़कर आया और उसने सैयद बंदा के हाथ पर तलवार से वार करके उसका हाथ काट डाला। सैयद बंदा दूसरे हाथ से युद्ध करता रहा। इसी बीच अफजल खाँ के कहारों ने अफजल खाँ को उठाकर पालकी में डाल लिया और उसे लेकर भागने लगे। तभी निकट छिपे हुए शिवाजी के सिपाहियों ने बाहर आकर अफजल खाँ का सिर काट लिया तथा उसे लेकर प्रतापगढ़ दुर्ग की ओर भाग लिए।
इस प्रकार अफजल खाँ का वध हुआ और शिवाजी की विजय हुई। हालांकि उनके प्राण भी संकट में थे।
शिवाजी ने अफजल खाँ का सिर ऊंचे बांस में लटकाकर दुर्ग की बुर्ज से उसका प्रदर्शन किया और गगन भेदी जयघोष किया। कस्तूरी रंगन और उसके निर्दोष परिवार की हत्या का बदला भलीभांति ले लिया गया था। जिन हिन्दुओं को अफजल खाँ ने अत्यंत ही क्रूरता-पूर्वक एवं छल-पूर्वक मारा था, उन्हीं हिन्दुओं के नायक ने अफजल खाँ का हिसाब चुकता कर दिया था।
शिवाजी सकुशल दुर्ग में पहुंच गया तो दुर्ग से तोप छोड़ी गई। नेताजी पाल्कर और उसकी मावली सेना जंगल से निकलकर बीजापुरी सेना पर टूट पड़ी। बीजापुरी सेना बहुत बड़ी थी किंतु अचानक आक्रमण होने से तथा अफजल खाँ के लौटकर न आने से हतप्रभ एवं किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गई और इधर-उधर भागने लगी।
मावली सेना बहुत तेज गति से मुस्लिम सैनिकों को काट रही थी इसलिए बहुत से मुसलमानों ने हथियार रखकर आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें शरणागत जानकर उनकी जान बख्श दी गई।
विशाल युद्ध सामग्री एवं धन की प्राप्ति
अफजल खाँ के डेरों से शिवाजी को भारी मात्रा में हथियार, तम्बू, तोपें, हाथी-घोड़े तथा दस लाख रुपये नगद प्राप्त हुए। शिवाजी ने अपने सैनिकों को एकत्रित करके उन्हें धनराशि पुरस्कार में वितरित कर दी। घायलों एवं मृतकों को धन एवं पेंशन देकर सहायता की गई।
शिवाजी की इस विजय का समाचार आग की तरह दूर-दूर तक फैल गया। उसके चमात्कारिक किस्से हिन्दू प्रजा में व्याप्त होने लगे। प्रजा को लगने लगा कि यह राजा, हिन्दुओं की रक्षा के लिए ही ईश्वरीय सहायता के रूप में भेजा गया है।
खन्दूजी का वध
शिवाजी की सेना में खन्दूजी काकरे नामक एक सेनापति था। बीजापुरी डेरों से जान बचाकर भागता हुआ अफजल खाँ का परिवार उसके हाथ लग गया। अफजल खाँ के परिवार ने खन्दूजी को घूस देकर अपने प्राणों की भीख मांगी। खन्दूजी ने रुपयों के लालच में इस परिवार को कुयाना नदी के किनारे-किनारे कुरात तक सुरक्षित निकाल दिया। यह बात शिवाजी को ज्ञात हो गई। शिवाजी की आज्ञा से, विश्वासघाती खन्दूजी का सिर काट दिया गया।
फजल खाँ और रुस्तम-ए-जहाँ की पराजय
अफजल खाँ के वध के कुछ समय पश्चात् जनवरी 1660 में आदिलशाह ने अफजल खाँ के पुत्र फजल खाँ को शिवाजी को दण्डित करने भेजा। रुस्तम-ए-जहां नामक अमीर भी अपनी सेना लेकर फजल खाँ के साथ हो गया। मलिक इतबार, अजीज खान के पुत्र फतेह खाँ, सरजेराव घाटगे और अन्य सरदारों को भी फजल खाँ के साथ रवाना किया गया। शिवाजी ने बीजापुर की इस विशाल सेना को जबर्दस्त धूल चटाई। मुस्लिम सेना के 12 हाथी और 200 घोड़े छीन लिए।
शिवाजी और शाहजी में संधि
अफजल खाँ, फजल खाँ तथा रुस्तम-ए-जहां के असफल हो जाने पर अली आदिलशाह (द्वितीय) ने शिवाजी के पिता शाहजी को जिम्मेदारी सौंपी कि वह बीजापुर राज्य की तरफ से अपने पुत्र शिवाजी से संधि करे। शिवाजी को शाहजी के आगमन का समाचार मिला तो वह कई मील पैदल चलकर अपने पिता की अगवानी करने पहुंचा।
एक मंदिर में पिता-पुत्र का मिलन हुआ। शिवाजी ने शाहजी को आदर सहित पालकी में बैठाया तथा स्वयं पालकी के साथ नंगे पांव पैदल चलकर अपने निवास तक लेकर आया। शाहजी अपनी इस यात्रा में लगभग डेढ़ माह तक जीजाबाई तथा शिवाजी के पास रहा।
शिवाजी ने अपने पिता को वचन दिया कि अब वह अकारण बीजापुर राज्य पर आक्रमण नहीं करेगा। उसने शाहजी को सुझाव दिया कि मुगल फिर से दक्खिन को रौंदने के लिए आ रहे हैं इसलिए शिवाजी, बीजापुर तथा गोलकुण्डा, तीनों मिलकर एक संघ बनाएं और मुगलों का सामना करें। डेढ़ माह बाद शाहजी, शिवाजी से विदा लेकर पुनः आदिलशाह के पास लौट गया।
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