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उड़ गया चातक (134)

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खानखाना की चेतना लौटी। उसने देखा हवेली पूरी तरह निस्तब्ध है। कहीं से कोई शब्द नहीं। बेटी जाना बाप के पलंग पर ही कंधा रखकर सो गयी है। शमां की रौशनी तेल खत्म हो जाने से अपने अंतिम क्षण गिन रही है जिससे कमरे में अंधेरा छाता जा रहा है।

पूरी रात खानखाना सुधि और बेसुधि के पारावार में हिचकोले खाता रहा है। जब होश आता है तो जाना, जाना चिल्लाता है और जब बेसुधि में हिचकोले खाता है तो हे मुरली मनोहर! हे गिरधारी! चिल्लाता है।

जब खानाखाना कुछ खाने को मांगकर फिर से बेसुध हो गया था, जाना उसी समय समझ गयी थी कि अब कुछ ही समय का खेल शेष है। रंगमंच का खिलाड़ी अपने हिस्से का अभिनय समाप्त करके फिर से नेपथ्य में जाने को उतावला है। जिस्मानी रौशनी फिर से आस्मानी रौशनी में शाया होना चाहती है।

– ‘हे मुरली मनोहर! हे गिरधारी! इस ओर निहारो बनवारी!’ खानखाना चिल्ला उठा।

जाना की नींद खुल गयी। उसने देखा, वृद्ध पिता के दोनों हाथ आकाश की ओर उठे हुए हैं-

‘हे देवकी नन्दन। माधव मुरारी! मैं आपका गुलाम हूँ। सम्पूर्ण जगत से ठुकराया गया, दीन, हीन, मलीन  और राह का भिखारी हूँ। केशव! आपकी आज्ञा से मैंने जीवन के रंगमंच पर कौन-कौन भूमिकाएं नहीं कीं! मैंने कौन-कौन स्वांग नहीं धरे! हे वनमाली! हे मधूसूदन श्रीकृष्ण! अगर मेरे इस स्वांग और अभिनय से आपका कुछ भी मनोरंजन हुआ हो तो उसके पुरस्कार स्वरूप मुझे अब और अभिनय करने से मुक्ति दे दो। अगर आपको मेरा कोई स्वांग अच्छा नहीं लगा हो तो ऐसा आदेश दो कि मैं फिर कोई स्वांग न करूँ, मेरे स्वांग करने पर ही आप रोक लगा दें, मैं सहज हो जाऊँ।[1] मुझसे यह अदम्य पीड़ा सही नहीं जाती। आप अपने दासों की कठोर परीक्षा न लें प्रभु!’

– ‘मैं जानता हूँ प्रभु! एक न एक दिन आप मेरी सुनेंगे। आपने अंधे सूरदास की भी तो सुनी लेकिन उसे आपने कितना रुलाया! हे नाथ! मेरे मित्र तुलसीबाबा का तो पूरा जीवन ही मुसीबतों का घर बन कर रह गया।’

– ‘हे प्रभु! अब मैं भी खूब सारा रो तो लिया! और कितना रोऊँ! अधिक रो सकने की मेरी सामृथ्य नहीं है प्रभु! अपनी शरण में ले लो प्रभु। मैंने तेरे दासों को रोते हुए ही देखा प्रभु! वह तेरा गुलाम तुलसी! कितना रोया वह? उसकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी।’

  – ‘पायँपीर पेटपीर  बाँहपीर  मुँहपीर, 

जर जर  सकल  सरीर  पीर  मई  है।

देव भूत पितर करम खल  काल ग्रह, 

मोहि पर  दवरि  दमानक  सी  दई  है।

हौं तो बिन मोल के बिकानो बलि बारेही तें,

ओट रामनाम की ललाट लिख लई है।

कुंभज के  किंकर बिकल बूड़े गोखुरनि, 

हाय रामराय ऐसी हाल कहूँ भई है?[2] 

– ‘मेरी यह पीड़ा दूर करो नाथ। बहुत हो चुका प्रभु! अब इस लीला को समेटो। क्यों बालकों की तरह दूर खड़े तमाशा देखते हो? मैं तो चींटी की तरह मर जाऊंगा। अपने नेत्र उघाड़ो नाथ! क्यों मेरा उपहास करवाते हो?’

जाना वृद्ध पिता के इस आत्मालाप को चुपचाप सुनती रही। उसने देखा कि पिता फिर से बेहोश हो गया। इस बार उसका सिर पलंग पर था और पैर फर्श पर थे। जाना ने पिता के पैर सीधे करके पलंग पर रख दिये और शमां में तेल डालने लगी।

थोड़ी ही देर में खानखाना की चेतना फिर से लौटी। वह चिल्लाता हुआ उठ बैठा- ‘मियाँ रसखान! अरे रस की खान! फिर से गाओ तो वह गान! कहाँ है तुम्हारी सुरीली तान!’ खानखाना गाने लगा-

सेस महेस,  गनेस दिनेस,  सुरेसहु जाहि  निरंतर   ध्यावैं।

जाहि अनादि अनंत  अखंड, अछेद, अभेद,  सुबेद  बतावैं।

नारद से सुक व्यास रहैं, पचि हारे तऊ पुनि  पार न पावैं।

ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।’[3]

खानखाना उठ कर नाचने लगा। उसकी आँखें लाल थीं और होठों पर सफेद पपड़ी जमी हुई थी।

पिता की यह दशा देखकर जाना की छाती भर आयी। खानखाना नाचते-नाचते क्षण भर के लिये रुका फिर अस्फुट स्वर में गाने लगा- ‘ हरि मुख किधौं मोहिनी माई। बोलत बचन मंत्र सो लागत गति मति जात भुलाई।[4] ……..अरी मोहे भवन भयानक लागे माई[5] ………छवि आवत मोहनलाल की……….।[6]  मुखड़े छोटे होने लगे। श्वांस अवरुद्ध होने लगी। आँखें मुंदने लगीं। फिर अचानक खानखाना ने पूरे नेत्र खोले, स्वर पूर्णतः स्पष्ट हो गया। उसने भरपूर दृष्टि जाना पर डाली और फिर से गाने लगा-

‘कबहुँक  खग  मृग  मीन कबहुँ मर्कटतनु  धरि  कै।

कबहुँक  सुन-नर-असुर-नाग-मय  आकृति  करि कै।

नटवत्  लख  चौरासि  स्वाँग  धरि-धरि  मैं  आयो।

हे    त्रिभुवन नाथ!    रीझ  को  कछु  न   पायो।

जो हो प्रसन्न तो देहु  अब  मुकति दान माँगहु बिहँस

जो पै उदास तो कहहु इम मत धरु रे नर स्वाँग अस।’[7]

पद पूरा होते होते खानखाना धरती पर गिर गया। उसने एक लम्बी हिचकी ली और प्रेम का प्यासा हुमा पंछी सदैव के लिये प्रीतम मुरली मनोहर के पास खेलने के लिये चला गया। जाना चीख कर पिता की छाती पर गिर पड़ी।

-अध्याय 134, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] अनीता नटवन्मया तवपुरः श्रीकृष्ण। या भूमिका

   व्योमाकाश खखाम्बराब्धिवसवस्त्वत्प्रीतयेद्यावधि।

   प्रीतस्त्वं यदि चेन्निरीक्ष्य भगवन् स्वप्रार्थित देहि मे

  नो चेद् ब्रूहि कदापि मानय पुनस्त्वेतादृशीं भूमिकाम्।।

                                                  – खानखाना कृत।

[2] यह पद गोस्वामी तुलसीदास रचित हनुमान बाहुक का है। जिसका अर्थ है- पाँव की पीड़ा, पेट की पीड़ा, बाहु की पीड़ा और मुख की पीड़ा- सारा शरीर पीड़ामय होकर जीर्ण-शीर्ण हो गया है। देवता, प्रेत, पितर, कर्म, काल और दुष्टग्रह, सब एक साथ ही आक्रमण करके तोप की सी बाड़ दे रहे हैं। बलि जाता हूँ। मैं तो लड़कपन से ही आपके हाथ बिना मोल बिका हुआ हूँ और अपने कपाल में रामनाम का आधार लिख लिया है। हाय राजा रामचंद्रजी! कहीं ऐसी दशा भी हुई है कि अगस्त्य मुनि का सेवक गाय के खुर में डूब गया हो?

[3] रसखानकृत।

[4] सूरदास कृत।

[5] सूरदास कृत।

[6] खानखाना कृत।

[7] खानखाना कृत।

उच्छवास (135)

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मैं इस उपन्यास की भूमिका में लिख आया हूँ- ”उस युग में एक सिपाही का कवि हो जाना कितनी बड़ी बात थी इसका अनुमान लगा पाना आज की परिस्थितियों में संभव नहीं है।” उपन्यास के पूरा हो जाने पर मैं उच्छवास के रूप मेंइस वक्तव्य में कुछ और भी जोड़ना चाहता हूँ।

उस युग में भारत में वैष्णवी संत परम्परा में अद्भुत संत प्रकट हुए जिनमें भक्त कुल शिरोमणी वल्लभाचार्य, संत सूरदास, गोस्वामी तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, भक्त रैदास, भक्त मीरांबाई, स्वामी हरिदास आदि अनेकानेक नाम लिये जा सकते हैं। ये समस्त भक्त रहीमदास के समकालिक थे अथवा कुछ ही वर्ष आगे पीछे हुए थे।

इन उत्कृष्ट संतो की इतनी बड़ी सूची देखकर आश्चर्य नहीं होता। आश्चर्य यह देखकर भी नहीं होता कि उस युग में बहुत से मुसलमानों का कृष्ण भक्ति की तरफ प्रवृत्त हो जाना असामान्य बात होकर भी सहज सुलभ थी। आश्चर्य तो इस बात को देखकर होता है कि आज के युग में वह बात उतनी सुलभ नहीं रही है। कारण श्री माधव ही जानें।

मैंने इस उपन्यास के लिये संदर्भ सामग्री जुटाने के प्रयास में मुसलमानों में कृष्णभक्ति परम्परा की पर्याप्त चौड़ी धारा के दर्शन किये हैं। उस धारा में रहीम, रसखान, रज्जब, दरियाशाह, दरियाबजी, लालदास, लतीफशाह, गरीबदास, वाजिन्द, वषनाजी, शेख भीखन, रसलीन, दाराशिकोह, सरमद साहब, साल बेग और कारे बेग से लेकर ताज बीबी, और चाँदबीबी जैसी सैंकड़ों नदियाँ आकर गिरती थीं।

जलालुद्दीन वसाली तो रामभक्ति करने के लिये मुल्तान छोड़कर अयोध्या आ बसे थे। उस युग में रहीमदास की उपस्थिति सचमुच ही भारत वर्ष के लिये गर्व की बात थी।  भारत भूमि पर कृष्ण भक्ति की यह निर्मल, शीतल और शांतिदायक धारा जीवित रहती तो निश्चय ही भारत भूमि का कण-कण प्रेम, विनय और पारस्परिक सद्भाव के सुवासित जल से गह-गह कर महक उठता, जिसकी सुगंध पड़ौसी देशों ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व को भी शांति का मार्ग दिखाती।

मौर्य काल में भगवान बुद्ध के संदेशों ने प्रेम और अहिंसा की बयार से पूरी दुनिया को शांति दी। भगवान श्रीकृष्ण की गौसेवा एवं महावीर स्वामी के उपदेशों ने भारत भूमि से पशुहिंसा का ताण्डव रोकने में जो अद्भुत काम किया, वह बिना धर्म के संभव ही नहीं था। किंतु हाय रे भारत भूमि! दुर्भाग्य हमारा पीछा क्यों नहीं छोड़ता!

वर्तमान युग में श्री कृष्ण भक्ति के स्थान पर धर्म निरपेक्षता के नाम पर एक दूषित विचारधारा प्रवाहित हो रही है। रहीम तो धर्मनिरपेक्ष नहीं थे! रहीम के साथ ही सम्पूर्ण भूमण्डल पर कोटि-कोटि प्रातः स्मरणीय जन हुए हैं जो धर्मनिरपेक्ष नहीं थे। वास्तविकता तो यह है कि किसी भी युग में हमें धर्मनिरपेक्षता की नहीं अपितु धार्मिक सद्भाव की आवश्यता है। धर्मनिरपेक्षता ढिंढोरा पीटने वालों के लिए रहीम का एक दोहा स्मरण हो आता है-

”आप न काहू काम के, डार पात फल फूल।

औरन को रोकत फिरैं, रहिमन पेड़ बबूल।।”[1]

यदि भारत अपने आप को फिर से जगद्गुरू के पद पद प्रतिष्ठित देखना चाहता है तो उसे धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा से बाहर निकलकर, धार्मिक सद्भाव स्थापित करना होगा। धर्म का प्रकाश ही आज की अंतहीन समस्याओं का एकमात्र समाधान है। नैतिकता का बल ही समाज से अपराधों को कम और आदमी के लालच को नियंत्रत कर सकता है। धर्म के नाम पर होने वाली पोंगापंथी का विरोध होना चाहिए न कि स्वयं धर्म का। अपनी बात रहीम के ही एक दोहे से समाप्त करता हूँ-

”यह न रहीम सराहिये लेन-देन की प्रीत।

प्रानन बाजी राखिये, हारि होय  के जीत।”[2]

-अध्याय 135, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] स्वयं तो बबूल के पेड़ की तरह किसी काम के हैं नहीं। न तो शाखायें अच्छी हैं, न पत्ते किसी काम के हैं और न ही पुष्प किसी काम के हैं। केवल कांटों के बल पर अपनी राह पर चलते पथिक को रोकने का ही काम करते हैं।

[2] लेन देन का प्रेम सराहने योग्य नहीं होता। प्रेम में तो प्राणों की बाजी लगानी पड़ती है, भले ही हार हो अथवा जीत।

प्रस्तावना – चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

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प्रस्तावना - चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती - www.bharatkaitihas.com
प्रस्तावना - चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

प्रस्तावना – चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ई-बुक की पृष्ठभूमि को स्पष्ट किया गया है।

बहुत से लोग सूफीवाद को इस्लाम का एक रूप मानते हैं तथा सूफियों को मुसलमान मानते हैं किंतु सूफीवाद का उदय इस्लाम के विरुद्ध एक वैचारिक क्रांति के रूप में हुआ। इस्लमा में सूफीवाद की मान्यताओं के लिए कोई स्थान नहीं है। यह बात सही है कि भारत में सूफीवाद ने इस्लाम के साथ प्रवेश किया तथा सूफियों ने भारत में इस्लाम का प्रचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई किंतु वस्तुतः सूफीवाद और इस्लाम एक-दूसरे के विरोधी हैं।

विद्वानों की मान्यता है कि सूफी सम्प्रदाय रहस्यवादी उपासना पद्धति है जिसका जन्म तो स्वतन्त्र रूप से हुआ किंतु उसने विश्व के लगभग समस्त प्रमुख धार्मिक मतों से रहस्यवादी दर्शन को ग्रहण करके सार्वभौमिक स्वरूप ग्रहण किया। उस पर भारतीय वेदान्त तथा बौद्ध धर्म का प्रभाव है तो यूनान के अफलातून (अरस्तू) के मत का भी उतना ही प्रभाव है।

मसीही धर्म से भी उसने बहुत कुछ लिया है तो पैगम्बर मुहम्मद ने भी उस पर अपनी छाप छोड़ी है। इन सारे धर्मों में जो कुछ भी रहस्यमयी उपासना पद्धतियां थीं उन सबको सूफियों ने ग्रहण करके अपने लिये एक ऐसे अद्भुत दर्शन की रचना की जो अपने आप में बेजोड़ है।

मध्य एशिया की शामी जातियों के कबीलों की गोद में इस सम्प्रदाय ने जन्म लिया तथा प्रेम के बोल बोलते हुए और अपनी मस्ती में  नाचते-गाते हुए यह सम्प्रदाय पूरी दुनिया में फैल गया। सूफी सम्प्रदाय के भीतर भी बहुत से सम्प्रदाय हो गये जिनमें से 14 सम्प्रदाय भारत में आये।

इनमें से भी चार सम्प्रदयों ने भारत में विशेष प्रभाव जमाया। इन चारों में से भी चिश्तिया सम्प्रदाय अपने आप में अनेक कारणों से महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। बारहवी शताब्दी में इसी चिश्तिया सम्प्रदाय के ख्चाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का भारत में आगमन हुआ।

इस पुस्तक में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के जीवन की संक्षिप्त जानकारी के साथ-साथ उनकी शिक्षाओं का उल्लेख किया गया है। उस युग के इतिहास, दर्शन तथा समाजशास्त्र को इस पुस्तक में पर्याप्त स्थान दिया गया है। आशा है यह पुस्तक पाठकों के लिये बहु-उपयोगी सिद्ध होगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इस्लाम का उदय तथा प्रसार

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इस्लाम का उदय- bharatkaitihas.com
इस्लाम का उदय

इतिहास की दृष्टि से इस्लाम का उदय तथा प्रसार बहुत पुराना नहीं है। इस्लाम को धरती पर आए हुए केवल 1400 साल हुए हैं किंतु इतने कम समय में ही धरती का ऐसा कोई कोना नहीं है जहाँ इस्लाम के किसी न किसी फिरके का कोई न कोई अनुयायी न रहता हो!

मध्य एशिया में स्थित ‘सउदी अरेबिया’ नामक देश के ‘मक्का’ नगर में रहने वाले ‘कुरेश कबीले’ में ई.570 में ‘हजरत मुहम्मद’ का जन्म हुआ। लगभग चालीस वर्ष की आयु में उन्होंने ‘इस्लाम’ की स्थापना की तथा मूर्तिपूजा का विरोध किया।

ई.622 में हजरत मुहम्मद, मक्का से मदीना गये, वहाँ उन्होंने अपने अनुयायियों की एक सेना संगठित करके मक्का पर आक्रमण कर दिया तथा सैन्य-बल से मक्का में सफलता प्राप्त की। मुहम्मद, न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिये गये वरन् राजनीति के भी प्रधान बन गये और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गये। जिस तेजी से इस्लाम का उदय तथा प्रसार हुआ, उतनी तेजी से किसी अन्य मजहब का नहीं हुआ।

भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या और हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास - bharatkaitihas.com
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इस प्रकार पैगम्बर मुहम्मद के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया और मुहम्मद के जीवन काल में ही इस्लाम को सैनिक तथा राजनीतिक स्वरूप प्राप्त हो गया। हजरत मुहम्मद के बाद उनके उत्तराधिकारी ‘खलीफा’ कहलाये। मुहम्मद के बाद उनके ससुर अबूबकर, प्रथम खलीफा चुने गये। उनके प्रयासों से मेसोपोटमिया तथा सीरिया में इस्लाम का प्रचार हुआ। अबूबकर की मृत्यु होने पर ई.634 में ‘उमर’ खलीफा बने। उन्होंने इस्लाम के अनुयायियों की एक विशाल सेना संगठित की और साम्राज्य विस्तार तथा धर्म प्रचार का कार्य साथ-साथ आरम्भ किया। इस्लाम का उदय तथा प्रसार मध्य एशिया में बड़ी क्रांति लेकर आया। जिन देशों पर उनकी सेना विजय प्राप्त करती थी वहाँ के लोगों को मुसलमान बना लेती थी। इस प्रकार थोड़े ही समय में फारस, मिस्र आदि देशों में इस्लाम का प्रचार हो गया। खलीफाओं ने इस्लाम का दूर-दूर तक प्रचार किया। खलीफाओं के समय में भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा, न केवल इस्लाम के अपितु राज्य के भी प्रधान होते थे। उनके राज्य का शासन कुरान के अनुसार होता था। इस कारण शासन पर मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव रहता था।

इस प्रकार इस्लाम का प्रचार शान्तिपूर्ण विधि से उपदेशकों द्वारा नहीं, वरन् खलीफा के सैनिकों द्वारा तलवार के बल पर किया गया। जहाँ कहीं इस्लाम का प्रचार हुआ वहाँ की धरा रक्त-रंजित हो गई। इस्लामी सेनाध्यक्ष, युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिये ‘जेहाद’ अर्थात् धर्म युद्ध का नारा लगाते थे जिसका अर्थ था, विधर्मियों का विनाश।

इस्लाम का भारत में प्रवेश

इस्लाम का उदय भारतवासियों के लिए बड़ा संकट था। ई.711 में ईरान के गवर्नर हज्जाज ने बगदाद के खलीफा की आज्ञा लेकर अपने भतीजे ‘मुहम्मद बिन कासिम’ जो कि हज्जाज का दामाद भी था, की अध्यक्षता में एक सेना सिन्ध पर आक्रमण करने भेजी। यह भारत पर इस्लाम का प्रथम आक्रमण था।

इसका प्रभाव बहुत कम समय के लिये तथा बहुत कम स्थान तक सीमित था किंतु जब अफगानिस्तान में इस्लाम के अनुयायियों का शासन स्थिर हो गया, तब भारत पर इस्लामी सेनाओं के आक्रमण बढ़ गये तथा अंततः ई.1193 में दिल्ली उनके अधीन चला गया। इस प्रकार इस्लाम के अनुयायियों ने आक्रांताओं तथा विजेताओं के रूप में भारत में प्रवेश किया।

सांस्कृतिक संघर्ष

विजेता इस्लामी सेनाओं तथा उनके नेताओं की वेष-भूषा, खान-पान, लिपि एवं भाषा, दर्शन एवं अध्यात्म आदि के रूप में एक परिपक्व संस्कृति थी जो भारत की मूल संस्कृति से काफी अलग थी। चूंकि वे विजेता के रूप में आये थे इसलिये उन्होंने पराजित भारतीय संस्कृति को अपनाने से मना कर दिया तथा उन्होंने अपनी हर बात को पराजित भारतीय संस्कृति पर थोपने की चेष्टा की। इस प्रकार इस्लाम का उदय तथा प्रसार भारत के शांत लोगों के जीवन में बड़ी उत्तेजना लेकर आया।

इस कारण स्वाभाविक ही था कि भारतीय लोग इस संस्कृति को नकार देते तथा उनसे घृणा करते। इस प्रकार राजनीतिक संघर्ष के साथ-साथ सांस्कृतिक संघर्ष भी आरम्भ हो गया जिसके कारण दोनों संस्कृतियों के बीच इतनी गहरी खाई उत्पन्न हो गई जिसे पाटना लगभग असंभव हो गया। इस सांस्कृतिक संघर्ष को रोकने तथा चौड़ी होती जा रही खाई को पाटने के लिये इस्लाम के भीतर एक अध्यात्मिक क्रांति हुई जिसे सूफी मत कहा जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में सूफी मत की सफलता के कारण

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भारत में सूफी मत

भारत में सूफी मत का आगमन एक युगांतरकारी घटना थी। सूफ मत ने इस्लाम को तो प्रभावित किया ही, साथ ही हिन्दुओं के मन में भी कुछ आकर्षण उत्पन्न किया।

शरीअत के खिलाफ बगावत

कुछ विद्वानों का मत है कि सूफीवाद, इस्लाम की शरीअत के खिलाफ एक बगावत थी। सूफी मत कोई एक मत नहीं है। इसमें सैंकड़ों सम्प्रदाय हैं तथा प्रत्येक सम्प्रदाय की अलग-अलग मान्यताएं हैं।

सूफियों का इस्लामियां सम्प्रदाय मानता है कि हजरत अली विष्णु के दसवें अवतार थे। हिन्दूओं के मन से मुसलमानों के प्रति कट्टर घृणा का भाव कम करने में इन सूफियों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

अनेक हिन्दू ‘इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन्ह हिन्दू वारिये’ कहकर सूफियों के अनुयायी हो गये। यही कारण है कि नागौर के सूफी फकीर सुल्तानुत्तारकीन हमीमुद्दीन को हिन्दू तार किशनजी कहते हैं तथा उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं।

सादा जीवन

भारत में सूफी मत लाने वाले फकीरों ने धन-सम्पत्ति को ठुकरा कर सादा जीवन व्यतीत किया। इस कारण भी भारतीय समाज उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखने लगा।

नागौर के सूफी फकीर सुल्तानुत्तारकीन हमीमुद्दीन के वंशज ख्वाजा हुसैन नागौरी ने अपनी सारी संपत्ति निर्धन लोगों में बांट दी तथा अपने पास केवल एक छकड़ा रख लिया जिस पर बैठकर वे दूर-दूर की यात्राएं किया करते थे। उन्होंने अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में तथा नागौर में सुल्तानुत्तारकीन हमीमुद्दीन की दरगाह में कुछ भवन बनवाये।

गीत-संगीत की प्रधानता

चूंकि सूफी लोग भी भारतीयों की तरह गीत-संगीत तथा नृत्य के माध्यम से ईश्वर की कृपा प्राप्त करने की चेष्टा करते थे इसलिये बहुत से सूफी फकीर भारतीयों के मन को भा गये।

अमीर खुसरो ने सितार नामक वाद्ययंत्र का तथा ब्रज मिश्रित कव्वाली गायन विधा का विकास किया। इन सूफियों के प्रयासों से भारतीयों के मन में इस्लाम के प्रति वह कट्टरता नहीं रही जो सूफियों के आने से पहले हुआ करती थी। अमीर खुसरो का यह गीत इस संदर्भ में विशेष लोकप्रिय है-

छाप तिलक सब छीनी रे

सैंया ने मोसे नैना मिलाके।

प्रेम भटी का मदवा पिलाके,

मतवाली कर दीनी रे

सैंया ने मो से नैना मिलाके।

बलबल जाऊं मैं तोरे रंगरेजवा

अपनी सी रंग लीनी रे

सैंया ने मौसे नैना मिला के।

हरी-हरी चूड़ियां, गोरी-गोरी बहियां,

हथवा पकड़ हर लीन्ही रे

सैंया ने मो से नैना मिलाके।

खुसरो निजाम के बल बल जइये,

मोहे सुहागन कीन्हीं रे

सैंया ने मो से नैना मिलाके।

वसंतोत्सव का आयोजन

भारतीय परम्पराओं को अपना लेने के कारण सूफी मत भारतीयों का मन जीतने में सफल हुआ। निजामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो ने सूफियों में वंसतोत्सव मनाने की परम्परा आरम्भ की।

कहा जाता है कि निजामुद्दीन औलिया ने अपने बहिन के पुत्र इकबाल को अपने पास रखकर पाला किंतु दैवयोग से वह 17-18 साल की आयु में मर गया। इस पर निजामुद्दीन औलिया बहुत दुखी रहने लगे। एक बार वे दिल्ली के निकट महरौली के जंगल में एक तालाब के किनारे दुखी मन से बैठे थे। अमीर खुसरो से अपने गुरु की यह दशा देखी नहीं गई।

उस दिन बसंत पंचमी थी तथा हिन्दू जनता पीले कपड़े पहनकर मंदिरों में पीले फूल चढ़ाने के लिये नाचती गाती जा रही थी। उन्हें देखकर अमीर खुसरो ने भी सरसों के पीले फूल तोड़े तथा निजामुद्दीन औलिया के चरणों में ले जाकर रख दिये। यह देखकर उन्होंने अमीर खुसरो से पूछा कि यह क्या है?

इस पर खुसरो ने जवाब दिया कि आज बसंत पंचमी को हिन्दू अपने देवताओं को पीले फूल चढ़ा रहे हैं इसलिये मैंने भी अपने गुरु को पीले फूल अर्पित किये हैं। शिष्य का यह समर्पण देखकर गुरु के हृदय में आशा और आनंद का संचार हुआ। उसी दिन से सूफी फकीरों की दरगाह पर बसंतोत्सव मनाया जाने लगा।

-डाॅ. मोहनलाल गुप्ता

सूफी परम्परा

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सूफी परम्परा

इस्लाम के उदय एवं प्रसार के कई सौ साल बाद सूफी परम्परा का जन्म हुआ। सूफी परम्परा के कुछ सिद्धांत इस्लाम से मेल खाते हैं तो कुछ सिद्धांत दुनिया के अन्य सम्प्रदायों एवं दर्शनों से मेल खाते हैं।

वैराग्ययुक्त साधना द्वारा अल्लाह की उपासना को श्रेयस्कर मानने वाले सूफी कहलाते थे। सूफी परम्परा अथवा ससव्वुफ इन्हीं फकीरों की देन है। यह एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक परम्परा है तथा इसका इतिहास इस्लाम की तरह पुराना है। सूफी शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है।

प्रायः यह अरबी भाषा के सफा शब्द से बना हुआ माना जाता है जिसका अर्थ पवित्र तथा शुद्ध होता है। इस प्रकार सूफी एक ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जो मन, वचन एवं कर्म से पवित्र हो। कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी शब्द की व्युत्पत्ति सोफिया शब्द से हुई है। सोफिया का अर्थ ज्ञान होता है अतः सूफी उसे कहते हैं जो ज्ञानी हो।

इसकी व्युत्पत्ति सफ शब्द से मानने वालों का मत है कि सफ का अर्थ पंक्ति अथवा प्रथम श्रेणी होता है, अतः सूफी उन पवित्र व्यक्तियों को कहा जाता है जो अल्लाह के प्रिय होने के कारण कयामत के दिन प्रथम पंक्ति में खड़े होंगे। अरबी भाषा में सूफ ऊन को कहते हैं। अतः सूफी शब्द का अर्थ सूफ अर्थात् एक प्रकार के पश्मीने से है।

यह लबादा मोटे ऊन का बनता था और अत्यधिक सस्ता होता था। यह सादगी तथा निर्धनता का प्रतीक माना जाता था। पश्चिम एशिया में ऐश्वर्य तथा भौतिक वैभव से परे सादा-सरल जीवन यापन करने वाले संत (इस में ईसाई भी शामिल थे) इस प्रकार का वस्त्र धारण करते थे। अल्लाह की उपासना में तल्लीन मुसलमान फकीरों ने भी इसे अपना लिया।

वे इसी वस्त्र के धारण करने के कारण पवित्रता, सादगी तथा त्याग के प्रतीक बन गये और सूफी कहलाने लगे। एक विचारधारा के अनुसार सूफी मत पैगम्बर मुहम्मद के रहस्यमय विचारों को प्रतिनिधित्व करता है। कुरान शरीफ तथा हदीस में कतिपय उल्लेख इसके मौलिक रूप से सम्बन्धित हैं। इस प्रकार सूफी मत, इस्लाम के समान ही प्राचीन माना जाता है।

सूफी परम्परा पर वैश्विक दर्शनों का प्रभाव

सूफी मत का जन्म भले ही विदेशी धरती पर हुआ हो किंतु उसका पोषक तत्व भारतीय वेदान्त वाद है। सूफी प्रेम काव्य कोमल हृदय की सुन्दर एवं सरस अभिव्यक्ति है। कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी मत पर चार दार्शनिक प्रभाव हैं-

1. आर्यों का अद्वैततवाद एवं विशष्टाद्वैतवाद,

2. नव अफलातूनी मत

3. विचार स्वातंत्र्य

4. इस्लाम की गुह्य विद्या।

सूफी मत का आदम में बीजवपन हुआ, नूह में अंकुर जमा, इब्राहीम में कली खिली, मूसा में विकास हुआ, मसीह में परिपाक हुआ तथा मुहम्मद में फलागम हुआ। सूफी मत के स्वरूप के सम्बन्ध में एक विद्वान ने लिखा है- ‘ईश्वर द्वारा पुरुष में व्यक्तित्व की समाप्ति और ईश्वर की उद्बुद्धि का नाम तसव्वुफ है। यह एक प्रकार से रहस्यवाद है तथा आदर्शवाद से भिन्न है।

सूफी परम्परा पर शामी जातियों का प्रभाव

भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या और हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास - bharatkaitihas.com
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सूफी मत का आदि स्रोत हमें शामी जातियों की आदिम प्रवृत्तियों में मिलता है। सूफी मत की आधार शिला रति भाव था, जिसका पहले पहल शामी जातियों ने बहुत समय तक विरोध किया था। मूसा और मुहम्मद ने संयत भोग का विधान किया। मूसा ने प्रवृत्ति मार्ग पर जोर देकर लौकिक प्रेम का समर्थन किया। सूफी इश्कमजाजी को इश्कहकीकी की पहली सीढ़ी मानते हैं। सूफियों के इलहाम और हाल की दशा का मूल भी शामी जातियों में पाया जाता है। कुछ शामी रतिदान से घृृणा करने के कारण नबी की संतान कहलाये। कभी-कभी वे देवता के वश में होकर जो कुछ बोलते थे, वह इलहाम कहलाया और इनकी ऐसी दशा हाल। सूफियों ने पीर परस्ती तथा समाधि पूजा भी शामियों से ली। शामियों में मूर्ति चूमने की परिपाटी थी जो सूफियों में बोसे और वस्ल के रूप में ग्रहण की गई। सूफियों के प्रमुख तत्व प्रेम का स्रोत भी शामियों की गुह्य मण्डली थी जिसमें निरन्तर सुरा सेवन होता रहता था। कहीं हाल आ रहा है, कहीं करामात दिखाई जा रही है है। उस आधार पर कहा जा सकता है कि सूफियों के पूर्व पुरुष ये नबी ही हैं जो सहजानंद के उपासक थे और आत्मशुद्धि के लिये अनेक प्रकार के उपायों का आश्रय लेकर प्रेम का राग अलापते थे।

इन्हीं की भावना सूफी मत में पल्लवित और पुष्पित हुई। यद्यपि यहोवा के आविर्भाव के कारण नबियों की प्रतिष्ठा क्षीण हो गई तथापि सूफीमत को इन्हीं नबियों का प्रसाद समझना चाहिये।

सूफी परम्परा पर यहोवा का प्रभाव

आरम्भ में यहोवा के उपासकों की कट्टरता और संकीर्णता के कारण मादक भाव (हाल) को भारी क्षति पहुंची किंतु बाद में यही भाव उनमें कव्वाली के रूप में मान्य हुआ। यहोवा ने रतिक्रिया से दूर रहने की काफी चेष्टा की कि यहोवा मंदिरों में देवदासों और देवदासियों के रूप में प्रेम का यह स्रोत फूट पड़ा।

हसीअ को यहोवा के इस प्रेम में अपने अली के प्रेम का प्रमाण मिला। सूफियों की इश्कमजाजी तथा इश्कहकीकी में यही भावना निहित है। सुलेमान के गीतों में भी प्रेम की इसी दशा के दर्शन होते हैं। परमात्मा और आत्मा इन गीतों के दुल्हा-दुल्हन होते हैं। इन गीतों में लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति है। यही पद्धति सूफियों के यहां मान्य है।

वेदान्त का प्रभाव

यसअियाह ने अहं ब्रह्मास्मि की घोषणा करके अद्वैत की प्रतिष्ठा की उसके गान में करुणा, वेदना और कामुकता का सम्मिश्रण है। इस प्रकार वे अंशतः सूफी हैं।

मसीह का प्रभाव

मसीह के आविर्भाव से शामी जातियों में विराग की प्रवृत्ति जागी किंतु धीरे-धीरे उपासकों में प्रणय भावना प्रचारित होती गई। एक स्थान पर मसीह को दूल्हा तथा उनके भक्तों को दुल्हन कहा गया है। संभवतः इस पर यूनान की गुप्त टोलियों या अफलातून के प्रेम का प्रभाव पड़ा हो। जिनका मसीह पर विश्वास नहीं जमा, उन्हें नास्तिक कहा गया।

नास्तिक मत का प्रभाव

नास्तिक नामक मत का प्रवर्तक साइमन नामक फकीर था। इस नास्तिक मत का प्रभाव सूफी मत पर भी पड़ा। इसी कारण सूफी आज भी पीरेमुगां का जाप करते हैं तथा उससे मधुपान की याचना करते हैं। मादन भाव नास्तिक मत का प्रधान अंग था। सूफी मत का प्राचीन नाम भी नास्तिक मत मिलता है।

बुद्ध का प्रभाव

नास्तिक मत की बिखरी शक्तियों से मानी मत का विकास हुआ। सूफी मत के विकास में मानी मत का बड़ा योगदान है। मानी मत पर बुद्ध का प्रभाव पड़ा था। गुरु-शिष्य परम्परा का विधान, मूर्तियों के खण्डन और जन्मान्तर निरूपण के सम्बन्ध में मानी मत ने जिस विचारधारा को जन्म दिया, वह सूफी मत हो गया। सूफियों का स्वतंत्र मत जिन्दी मानी मत का अवशेष है। मानी मत की परिणति तसव्वुफ हो गई।

अफलातून के दर्शन का प्रभाव

मसीह के मत के यूनान में पहुंचने पर उस पर अफलातून के दर्शन का प्रभाव पड़ा। फिर प्लेटिनस के द्वारा उस पर भारतीय दर्शन का भी प्रभाव पड़ा। प्लेटिनस ने पृथ्वी से लेकर नक्षत्र मण्डल तक व्याप्त अलौकिक सत्ता के आलोक का वर्णन अनूठे ढंग से किया है। सूफियों की अध्यात्म भावना इससे अत्यंत प्रभावित है। सूफी मत में इस प्रभाव से जो आनन्द प्रस्फुटित हुआख् वह प्रजा और प्रेम का प्रसाद है।

सूफी परम्परा पर मुहम्मद का प्रभाव

सूफी मत के इतने विकास के बाद पैगम्बर मुहम्मद का नबी के रूप में आविर्भाव हुआ। उन्होंने कुरान को इलहाम कहकर इस्लाम का प्रवर्त्तन किया। यह नए प्रारूप में इस्लाम का उदय तथा प्रसार था। सूफियों ने ईमान और दीन की अपेक्षा इलहाम पर अधिक जोर दिया। यही कारण है कि उन्हें पूर्णरूपेण सूफी नहीं कहा जा सकता है। उनकी भक्ति में प्रेम के स्थान पर दास्य भाव है। प्रेम और संगीत के अतिरिक्त सूफियों के प्रायः सभी लक्षण पैगम्बर मुहम्मद में पाये जाते हैं।

सूफी परम्परा का भारत में प्रवेश

भारत में सूफी मत का प्रचार 12वीं शताब्दी में प्रसिद्ध सूफी अल्हुज्विरी के आगमन से हुआ। आइने अकबरी में सूफियों के 14 सम्प्रदाय बताये गये हैं जिनमें से भारत के चार सूफी सम्प्रदाय अधिक प्रसिद्ध हुए-

1. कादरी सम्प्रदाय

2. सुहरावर्दी सम्प्रदाय

3. नक्शबंदी सम्प्रदाय

4. चिश्ती सम्प्रदाय

सूफियों में चिश्तिया सम्प्रदाय सबसे उदार और लोकप्रिय सम्प्रदाय माना जाता है। चिश्ती संप्रदाय के संस्थापक ख्वाजा अबू-इसहाक-शामी चिश्ती, हजरत अली के वंशज थे। खुरासान के चिश्त नगर में रहने के कारण वे चिश्ती कहलाये। चिश्त तथा फीरोजकुह इनके केन्द्र थे जो अधिक समय तक स्थाई न रहे। सूफी दरवेशों के रूप में वहीं से चलकर वे भारत आये।

गौस उल-आजम महबूब सुभानी शेख अब्दुल जिलानी

ईराक की राजधानी बगदाद में गौस उल-आजम महबूब सुभानी शेख अब्दुल जिलानी की दरगाह है। वह सूफी परम्परा का फकीर था। इस संप्रदाय के फकीर पैरों में जूते-चप्पल नहीं पहनते थे तथा कपड़ों के स्थान पर एक मोटा ऊनी लबादा धारण करते थे। इनकी संख्या बहुत कम थी और ये स्थान-स्थान पर घूम कर ईश्वर की आराधना का उपदेश दिया करते थे। पैगम्बर मुहम्मद सूती लबादा ओढ़ते थे। अतः सूफी फकीरों को ऊनी लबादा ओढ़ने के कारण इस्लाम विरोधी माना जाता था।

ऊनी लबादा धारण करने की परम्परा ईसाइयों में थी। अनेक सूफियों ने अपने आप को पैगम्बर मुहम्मद द्वारा प्रतिपादित इस्लाम से अलग माना। ईसाइयों ने भी कोशिश की कि वे सूफी मत को अपनी ओर खींच लें। इसलिये उन्होंने सूफी फकीरों को मूहन्ना अथवा मसीहा का शिष्य कहना प्रारंभ कर दिया किन्तु इन दोनों मतों में मौलिक अन्तर है।

मसीहा का मूल मंत्र विराग है जबकि सूफी परम्परा के मूल में प्रेम का निवास है। ईसाई तो सूफी मत को भले ही अपने धर्म में घोषित नहीं कर पाये किन्तु सूफी फकीरों ने ईसाई धर्म में बहुत बड़ा एवं क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया। वर्तमान के मसीह मत में प्रेम का प्रसार सूफी परम्परा के संसर्ग का परिणाम है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती

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ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने गौर साम्राज्य की अंतिम सीमा पर स्थित अजमेर को अपना स्थाई निवास बनाया। मोइनुद्दीन चिश्ती के प्रारम्भिक जीवन विषयक प्रामाणिक सूचनाओं का प्रायः अभाव है।

गौस उल आजम का एक शिष्य था मोईनुद्दीन, जिसका जन्म फारस में हुआ था। ई.1186 में मोइनुद्दीन को अपने गुरु का उत्तराधिकारी चुना गया। उन दिनों अफगानिस्तान में इस्लाम धर्म का प्रचार नहीं था। अतः गौस उल आजम ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि वे अफगानिस्तान में जाकर इस्लाम का प्रचार करें।

सूफियों की एक बहुत बड़ी-विशेषता थी- ये जहाँ भी जाते वहाँ की संस्कृति, भाषा, खान-पान, रीति रिवाज और सामाजिक परम्पराओं को अपना लेते थे। वे शीघ्र ही पूरे अफगानिस्तान में फैल गये और वहाँ से भारत में आ गये। इनमें से मोइनुद्दीन भी एक थे। ई.1191 में मोइनुद्दीन अजमेर आये। उन्होंने फारसी या अरबी में धर्मोपदेश करने के स्थान पर ब्रजभाषा को अपनाया तथा ईश्वर की आराधना में हिन्दू तौर-तरीकों को भी जोड़ लिया। उन्होंने ब्रजभाषा में कव्वाली गाने की प्रथा आरम्भ की।

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने गौर साम्राज्य की अंतिम सीमा पर स्थित अजमेर को अपना स्थाई निवास बनाया। मोइनुद्दीन चिश्ती के प्रारम्भिक जीवन विषयक प्रामाणिक सूचनाओं का प्रायः अभाव है। खैरुल मजलिस जैसे ग्रंथों में भी उनसे सम्बन्धित सूचनाएं नहीं हैं। जमाली द्वारा रचित मियारुल-अरिफिन में ख्वाजा से सम्बन्धित उन आख्यानों एवं वार्ताओं का संग्रह है जो ईरान तथा भारत में लोकप्रिय थीं।

इसके अनुसार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म सीस्तान में हुआ था और उनके पिता का नाम ख्वाजा गियासुद्दीन हसन था। वे समरकन्द, बुखारा, हरवान (निशापुर के निकट), बगदाद, अस्तराबाद, हेरात, बल्ख, गजना आदि का भ्रमण तथा ज्ञानोपलब्धि करते हुए लाहौर पहुँचे। वहाँ से दिल्ली होते हुए अजमेर पहुँचे। आरंभ में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा किंतु अंततः उन्हें सर्वसाधारण से आदर, श्रद्धा, प्रेम और समर्पण प्राप्त हुआ।

ख्वाजा के जीवन से सम्बन्धित मलफजातों में उनकी अलौकिक तथा आध्यात्मिक उपलब्धियों के विवरण प्राप्त होते हैं। उनसे स्पष्ट होता है कि ख्वाजा अपने जीवन काल में ही दिव्य चरित्र सम्बन्धी आख्यानों के केन्द्र बन गये थे।

शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुसार अजमेर नरेश पृथ्वीराज चौहान तथा उनके कर्मचारियों ने ख्वाजा के अजमेर प्रवास को स्वयं के लिये तथा राज्य के लिये अनिष्टकारी मानते हुए उन्हें कष्ट देने का प्रयास किया किंतु ख्वाजा की चमत्कारी और अलौकिक शक्ति के फलस्वरूप अंततः पृथ्वीराज चौहान (राय पिथौरा) को मुईजुद्दीन मुहम्मद के हाथों पराजित एवं अपमानित होना पड़ा।

कुछ लोगों के अनुसार मुइनुद्दीन चिश्ती मुहम्मद गौरी के लिए जासूसी करता था। उसी ने अजमेर में रहकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बारे में गुप्त जानकारियाँ मुहम्मद गौरी को भिजवाई थीं।

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाएँ

ख्वाजा की चमत्कारिक शक्तियों तथा उनके द्वारा सम्पादित लोक कल्याणकारी कार्यों के प्रभावानुसार शताब्दियों तक उनके प्रति लोगों में श्रद्धावर्द्धन होता रहा। वे संसार में गरीब नवाज के नाम से जाने जाते हैं। मोइनुद्दीन चिश्ती के अनुसार चार वस्तुएं उत्तम होती हैं- प्रथम, वह दरवेश जो अपने आप को दौलतमंद जाहिर करे। द्वितीय वह भूखा, जो अपने आप को तृप्त प्रकट करे। तृतीय वह दुखी जो अपने आप को प्रसन्न दिखाये और चतुर्थ, वह व्यक्ति जिसे शत्रु भी मित्र परिलक्षित हो।

हमीदुद्दीन नागौरी की शिक्षाएँ

एक अनुश्रुति के अनुसार एक बार एक दरवेश ने ख्वाजा से एक अच्छे दरवेश (फकीर) के गुणों पर प्रकाश डालने के लिये विनय की। ख्वाजा का मत था कि शरिया के अनुसार पूर्ण विरक्त व्यक्ति अल्लाह के निर्देशों का पालन करता है और उसके द्वारा निषिद्ध कार्य नहीं करता। तरीका एक सच्चे दरवेश के लिये नौ करणीय कार्यों का विवरण देता है। जब ख्वाजा से इन नौ शर्तों की व्याख्या करने की प्रार्थन की तो उन्होंने अपने शिष्य हमीदुद्दीन नागौरी को इनकी व्याख्या करने और सभी के ज्ञान के लिये इन्हें लिपिबद्ध करने की आज्ञा दी।

शेख हमीदुद्दीन ने दरवेश जीवन के लिये आवश्यक नौ शर्तों का वर्णन इस प्रकार किया है-

1. किसी को धन नहीं कमाना चाहिये।

2. किसी को किसी से धन उधार नहीं लेना चाहिये।

3. सात दिन बीतने पर भी यदि किसी ने कुछ नहीं खाया है तो भी इसे न तो किसी को बताना चाहिये और न किसी से कोई सहायता लेनी चाहिये।

4. यदि किसी के पास प्रभूत मात्रा में भोजन, वस्त्र, रुपये या खाद्यान्न हो तो उसे दूसरे दिन तक भी नहीं रखना चाहिये।

5. किसी को बुरी बात नहीं कहनी चाहिये। यदि किसी ने कष्ट दिया हो तो उसे (कष्ट पाने वाले को) अल्लाह से प्रार्थना करनी चाहिये कि उसके शत्रु को सन्मार्ग दिखाये।

6. यदि कोई अच्छा कार्य करता है तो यह समझना चाहिये कि यह उसके पीर की कृपा है अथवा यह काई दैवी कृपा है।

7. यदि कोई बुरे काम करता है तो उसे उसके लिये स्वयं को दोषी मानना चाहिये और उसे अल्लाह का खौफ होना चाहिये। भविष्य में बुराई से बचना चाहिये। अल्लाह से खौफ करते हुए उसे बुरे कामों की पुनरावृत्ति नहीं करनी चाहिये।

8. इन शर्तों को पूरा करने के बाद दिन में नियमित उपवास रखना चाहिये और रात में अल्लाह की इबादत करनी चाहिये।

9. व्यक्ति को मौन रहना चाहिये ओर जब तक आवश्यक न हो, नहीं बोलना चाहिये। शरिया निरन्तर बोलना और पूर्णतः मौन रहना, अनुचित बताता है। उसे केवल अल्लाह को खुश करने वाले वचन बोलने चाहिये।

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की अन्य शिक्षाएँ

1. दुनिया में दो बातों से बढ़कर कोई बात नहीं है- पहली विद्वानों की संगति तथा दूसरी बड़ों का सम्मान।

2. जीवन में सबसे अनमोल क्षण वे हैं जब मनुष्य इच्छाओं पर काबू पा लेता है।

3. ज्ञान वह है जो सूर्य की तरह उभरे और सारा संसार उसके प्रकाश से रोशन हो जाये।

4. सदाचारी लोगों की संगति सदाचार से अच्छी है तथा दुराचारी लोगों की संगति दुराचार से बुरी है।

5. मित्र की मित्रता में समस्त संसार का त्याग कर दिया जाये, तब भी कम है।

6. ज्ञानी हृदय सत्य का घर होता है।

7. भक्ति और तपस्या में सबसे बड़ा काम विनम्रता है।

8. ईश्वर का कृपापात्र वहीं मनुष्य होता है जिसके दिल में दरिया जैसी दानशीलता, सूर्य जैसी दयालुता और जमीन जैसी खातिरदारी हो।

9. सूफी का हृदय ईश्वर प्रेम की जलती हुई आग की भट्टी की तरह है। इसमें जो भी अन्य विचार आते हैं, वे जल कर राख हो जाते हैं क्योंकि प्रेम की आग के समान बलवान कोई अन्य आग नहीं है।

10. गरीब और बेसहारा लोगों की सेवा करना, भूखे को खाना खिलाना और बीमार तथा पीड़ित लोगों की मदद करने के समान कोई अन्य पूजा नहीं है।

11. ज्ञानी ईश्वर स्मरण के अतिरिक्त और कोई बात जिह्वा से नहीं निकालते।

12. नदियों का बहता पानी शोर करता है किंतु जब समुद्र में मिल जाता है तो शांत हो जाता है। इस तरह जब प्रेमी प्रियतम से मिल जाता है, तब वार्तालाप नहीं रहता है।

13. ज्ञानी वह है जब सुबह को उठे तो उसे रात के बारे में कुछ स्मरण नहीं रहे।

14. दरवेश वह है जो किसी को निराश नहीं जाने दे। यदिभूखा है तो खाना खिलाये, नंगा है तो अच्छा कपड़ा पहनाये। उसका हाल पूछ कर उससे सहानुभूति जताये।

15. गलत और नाजायज काम से स्वयं को दूर रखो।

16. मरने की ख्वाहिश मत करो किंतु मृत्यु को स्मरण रखो और मरने के लिये हर समय तैयार रहो।

17. जब बोलो सच बोलो तथा अपना वचन सदैव पूरा करो।

ख्वाजा की रहस्यवादी विचारधारा के अनुसार व्यक्ति की सबसे बड़ी इबादत अनाथों की मदद है। जो लोग ईश्वर की उपासना करना चाहते हैं, उनमें सागर की गम्भीरता, धूप जैसी दयालुता और पृथ्वी जैसी विनम्रता होनी चाहिये।

प्राणी मात्र से प्रेम

हिन्दू उन दिनों मुसलमानों की कट्टरता और हिंसक प्रवृत्ति से परेशान थे तथा उनके प्रति भारी घृणा रखते थे। जब हिन्दुओं ने सूफियों को इस प्रकार ईश्वर की आराधना करते देखा तो वे बड़े प्रभावित हुए। हिन्दू धर्म और दर्शन का मूल बिन्दु प्रेम है। जब उसी प्रेम के दर्शन उन्हें सूफियों के कलाम में हुए तो उन्होंने अपने हदय की ग्रन्थि को खोल फैंका और वे मोइनुद्दीन में आस्था रखने लगे। मोइनुद्दीन सरल हदय के स्वामी थे। वे प्राणी मात्र से प्रेम करने वाले और लोगों का उपकार चाहने वाले थे। इस कारण उन्होंने मुसलमानों से भी अधिक हिन्दुओं का दिल जीता।

मोइनुद्दीन चिश्ती का निधन

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन की कोई निश्चित तिथि नहीं मिलती। कुछ स्रोतों में उनका निधन ई.1227 में हुआ तथा कुछ अन्य स्रोत उनके निधन की तिथि ई.1235-36 के आसपास मानते हैं। कुछ विद्वान उनके निधन की तिथि 16 मार्च 1236 बताते हैं। उनके अनुसार 97 वर्ष की आयु में ख्वाजा जन्नतनशीन हुए।

ख्वाजा लोकगीतों में

ख्वाजा की मृत्यु के बाद लोकगीतों में उनकी दयालुता के किस्से गाये जाने लगे। लोक गीतों के कारण ख्वाजा की प्रसिद्धि अजमेर से दिल्ली और आगरा आदि क्षेत्रों में फैल गई। कहते हैं कि मुगल बादशाह अकबर को आगरा के निकट एक गांव में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के बारे में गीत सुनने को मिले। इन्हें सुनकर अकबर ख्वाजा की दरगाह पर जियारत करने अजमेर आया तथा इसके बाद पूरे दस साल तक अजमेर आता रहा।

मोइनुद्दीन चिश्ती का परिवार

ख्वाजा के बड़े पुत्र फखरुद्दीन ने अपने रहने के लिये माण्डल नामक कस्बे को चुना। फखरुद्दीन की मृत्यु के बाद उसे अजमेर के निकट सरवाड़ में दफनाया गया। मोइनुद्दीन के अन्य दो पुत्रों ख्वाजा अबुसईद एवं हिस्मुद्दीन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है। ख्वाजा मोइनुद्दीन की पुत्री बीबी हाफिज जमाल अजमेर में ही रही। ख्वाजा अजमेरी का पोता हिस्मुद्दीन सांभर में रहने लगा। ख्वाजा मोइनुद्दीन का खादिम ए खास मौलाना सयैद फखर्रूद्दीन अहमद गारदेजी जिसे मौलाना अहमद भी कहा जाता है, वह ख्वाजा मोइनुद्दीन की मजार का मुख्य संरक्षक बन गया। उसके वंशज खुद्दाम अथवा मुजविरन कहलाये। इन वंशजों ने इस मजार के चारों ओर अपनी झौंपड़ियां बनाईं।

यह कहा जा सकता है कि सूफी परम्पराओं से हटकर, अजमेर में ख्वाजा अजमेरी के वंशजों ने तथा नागौर में सूफी हमीदुद्दीन के उत्तराधिकारियों ने शासकीय अधिकारियों से मेलजोल बढ़ाया। जिस तरह हमीदुद्दीन के वंशज गुजरात, दिल्ली एवं देश के अन्य भागों में जाकर बस गये, उसी तरह शेख मोइनुद्दीन चिश्ती के वंशज भी देश के अन्य भागों में जाकर बस गये। उनमें से कुछ मेहदवी हो गये। इससे देश भर में चिश्तिया सम्प्रदाय के सूफियों का मत फैल गया। उनके कारण ही अजमेर की दरगाह देश के विभिन्न भागों में प्रसिद्ध पा गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह

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मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह

ख्वाजा मोइनुद्दीन को उसी हुज्रा (कोठरी) में दफनाया गया जिसमें उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय प्रार्थनायें करने में व्यतीत किया था। इसी को अब मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहते हैं। आरंभ में यह कच्ची मजार के रूप में एक पहाड़ी पर स्थित थी जो झाड़ियों एवं पौधों से घिरी हुई थी। ख्वाजा हुसैन नागौरी ने उनकी समाधि पर एक मकबरा बनवाया।

दरगाह पर यात्राओं का सिलसिला

   नागौर के सूफी हमीदुद्दीन, ख्वाजा मोइनुद्दीन के मुख्य खलीफाओं में से एक थे। वे ई.1274 ईस्वी तक जीवित रहे। वे तथा उनके अनुयायी ख्वाजा मोइनुद्दीन की मजार पर बरसों बरस यात्रा करते रहे। ख्वाजा की दरगाह के शुरुआती यात्रियों में शेख फरीदुद्दीन गंज ए शकर थे जिन्होंने ध्यान (मेडीटेशन) के लिये ख्वाजा की मजार के निकट स्थित एक चिल्ला (कोठरी नुमा गुफा) में काफी समय व्यतीत किया।

आज भी इसे बाबा फरीद का चिल्ला कहा जाता है। यह भी दावा किया जाता है कि ख्वाजा अजमेरी का मुख्य खलीफा शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, ख्वाजा मोइनुद्दीन की मजार की यात्रा करने वाला पहला मुख्य सूफी था।

यह भी कहा जाता है कि जिस वर्ष ख्वाजा मोइनुद्दीन का निधन हुआ, उसी वर्ष इल्तुतमिश ई.1227 में अजमेर आया। इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी नसीरुद्दीन महमूद ने नागौर तथा अजमेर के इक्तेदार इजुद्दीन बलबन के विद्रोह को कुचलने के लिये नागौर जाते समय अजमेर की यात्रा की।

अलाउद्दीन खलजी ने ई.1301 में रणथंभौर तथा ई.1303 में चित्तौड़ अभियान किया तथा राजस्थान में काफी समय व्यतीत किया। जैन स्रोतों के अनुसार अलाउद्दीन खलजी ने ख्वाजा मोइनुद्दीन की मजार की यात्रा की।

दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में से मुहम्मद बिन तुगलक ऐसा पहला सुल्तान था जिसकी इस मजार पर की गई यात्रा का सुस्पष्ट उल्लेख मिलता है। उसने ई.1332 में इस मजार की यात्रा की किंतु उसकी यात्रा धार्मिक उद्देश्य के लिये थी, या उसने जियारत की थी, इसका उल्लेख किसी भी समकालीन इस्लामी स्रोत में नहीं मिलता।

ई.1396 में गुजरात के तत्कालीन तुगलक गवर्नर जफर खां ने ख्वाजा की मजार की यात्रा की। वह मजार से तीन कोस पहले अपने घोड़े से उतर कर पैदल ही मजार तक गया तथा उसने विधि पूर्वक जियारत सम्पन्न की। साइमन डिग्बे ने इसे राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित यात्रा बताया है क्योंकि जफर खां की आंख दिल्ली के तख्त पर लगी हुई थी।

वह यह देखना चाहता था कि यदि अजमेर अधिकार में आ जाता है तो दिल्ली सल्तन के विरुद्ध उसकी ताकत में कितनी वृद्धि हो सकती है।

दिल्ली सल्तनत के पतन के बाद अजमेर राजपूतों के हाथों में आ गया। ई.1455 में माण्डू के सुल्तान महमूद खिलजी ने माण्डलगढ़ पर आक्रमण किया। अजमेर के खुद्दामों ने माण्डलगढ़ जाकर महमूद खिलजी से अनुरोध किया कि वे अजमेर को राजपूतों से छीन लें। महमूद उसी समय अजमेर के लिये चल पड़ा।

उसने ख्वाजा की दरगाह के ठीक सामने अपना डेरा जमाया और गढ़ बीठली को घेर लिया। चार दिन तक चली भयानक लड़ाई के बाद उसने दुर्गपति गजधर को मार डाला तथा गढ़ बीठली पर अधिकार कर लिया।

महमूद ने अपने सेनापति चिश्ती खां को अजमेर का चार्ज लेने के लिये कहा जो कि ख्वाजा अजमेरी के वंशजों में से था किंतु चिश्ती खां का परिवार माण्डू में रह रहा था, इसलिये उसने अजमेर का चार्ज लेने से मना कर दिया।

इस पर महमूद ने ख्वाजा नेमतुल्लाह को अजमेर का हाकिम नियुक्त किया तथा उसे सैफ खान की उपाधि दी। अजमेर में एक मुफ्ती तथा एक काजी की भी नियुक्ति की गई। ख्वाजा की दरगाह में एक मुदर्रिस की नियुक्ति की गई ताकि वह धार्मिक मामलों में आदेश दे सके।

दरगाह के बिल्कुल पास में एक मस्जिद बनाई गई तथा बुलंद दरवाजे का निर्माण किया गया जो आज भी मौजूद है। मजार तथा उसके आसपास के क्षेत्र को भी दुबारा से बनवाया गया। ख्वाजा के खुद्दाम को वजीफा भी निर्धारित किया गया। मांडू के शासकों ने मजार के निकट एक खानकाह का निर्माण करवाया।

ई.1351 में शेख बुरहानुद्दीन गरीब के शिष्य शेख जैनुद्दीन ने अजमेर दरगाह की यात्रा की। ई.1352 में शेख निजामुद्दीन औलिया के शिष्य मौलाना फखरुद्दीन जरदारी ने अजमेर दरगाह की यात्रा की। मखदूम जलालुद्दीन बुखारी, मीर सयैद जहाँगीर समनानी ने भी दरगाह की यात्रा की। सयैद मुहम्मद गेसू दराज ने उत्तर भारत की समस्त प्रमुख दरगाहों की यात्रा की जिनमें अजमेर की दरगाह भी सम्मिलित थी।

मगरीबी परम्परा के बाबा इशहाक ने ई.1377 में अजमेर दरगाह की यात्रा की। वह काफी दिनों तक अजमेर में रहा एवं ख्वाजा अजमेरी के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिये खाटू भी गया। उसका शिष्य एवं खलीफा शेख जमालुद्दीन अहमद खट्टो (ई. 1446-47) उन दिनों के बड़े सूफी संतों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था, उसने भी अजमेर दरगाह पर काफी समय व्यतीत किया।

माण्डू निवासी शेखुल इस्लाम सयैद नूरुद्दीन मुबारक गजनवी का पोता शाह नजमुद्दीन प्रमुख सुहरावर्दी फकीर था, उसने भी अजमेर दरगाह की संक्षिप्त यात्रा की। शह बदीउद्दीन मदार, मदारिया (कलंदरिया) परम्परा का प्रमुख संत था, उसने भी अजमेर दरगाह की यात्रा की। वह काकला पहाड़ पर ही डेरा जमाकर रहने लगा।

यह पहाड़ बाद में मदार टेकरी कहलाने लगा। उसके नाम पर आज भी अजमेर में मदार गेट, मदार रेलवे स्टेशन तथा मदार चिल्ला बने हुए हैं। अवध के शेख मीना तथा कालपी के मीर मुहम्मद ने भी अजमेर दरगाह की यात्रा की। इस प्रकार तेरहवीं शताब्दी से लेकर मध्य पंद्रहवीं शताब्दी तक देश के प्र्रमुख सूफी फकीरों एवं मुस्लिम शासकों ने अजमेर की यात्रा की। इनमें से कई लोग महीनों तथा बरसों तक अजमेर में रहे।

उन दिनों गुजरात, दिल्ली माण्डू तथा नागौर क्षेत्रों में रहने वाले साधारण मुसलमान भी दरगाह की यात्रा पर आया करते थे। हमीदुद्दीन नागौरी के वंशजों ने अजमेर दरगाह की विशेष रूप से यात्राएं कीं चाहे वे देश के किसी भी हिस्से में क्यों न रहते रहे हों। इनमें शेख कमालुद्दीन हुसैन नागौरी सर्वप्रमुख थे। इन्हें शेख हुसैन नागौरी भी कहा जाता है।

इन दिनों अजमेर में अशांति होने के कारण काफी लोग अजमेर छोड़कर चले गये। ख्वाजा के बहुत से वंशज भी अजमेर से चले गये। दरगाह पर भी केवल खुद्दाम ही बचे थे। पहाड़ों से शेर निकल कर दरगाह में घूमा करते थे। शेख हुसैन नागौरी ने अजमेर दरगाह में कुछ निर्माण कार्य भी करवाया।

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि लगातार अफरा तफरी के माहौल के कारण लोगों ने ख्वाजा की दरगाह को भुला दिया। दरगाह उपेक्षित हो गई और आगरा में अकबर का शासन होने तक लोग ख्वाजा मोइनुद्दीन को भूले रहे। जबकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार शेख हुसैन नागौरी का शिष्य (खलीफा) शेख अहमद माज्द अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद अजमेर आ गया तथा 70 वर्ष तक ख्वाजा की दरगाह पर रहा। उसके पास अजमेर दरगाह के मुफ्ती का पद भी रहा।

कहा जाता है कि वह रात्रि में ख्वाजा की दरगाह पर पहुँचता। उसके लिये दरगाह के दरवाजे स्वतः खुल जाते। वह दरगाह में प्रवेश करके तहज्जुद (देर रात्रि की प्रार्थना) करता था तथा चश्त (मध्य प्रातः की प्रार्थना) तक किसी से कुछ नहीं बोलता था। उसके बाद वह वहीं बैठकर लोगों को धार्मिक निर्देश देता था।

ई.1516 में उसने अजमेर के लोगों से कहा कि राणा सांगा का आक्रमण होने वाला है इसलिये वे शहर छोड़कर चले जायें। शेख द्वारा यह बात कहने के एक सप्ताह बाद सांगा का आक्रमण हो गया। वह स्वयं भी अजमेर छोड़कर नारनौल चला गया। उस समय उसकी आयु 90 वर्ष थी।

सोलहवीं शताब्दी में गुजरात के शहजादे बहादुरशाह ने अजमेर दरगाह की यात्रा की। जब वह दरगाह पहुँचा तो बबन (बयीन मज्जूब) नामक सूफी फकीर दरगाह के दरवाजे पर बैठा हुआ था। बबन ने अपनी दासी से कहा कि वह शहजादे के लिये तख्त लेकर आये। शहजादा उन दिनों अपने पिता से चिढ़ा हुआ था।

इसलिये उसने फकीर के शब्दों को अपने लिये अच्छी भविष्यवाणी समझा। उसने दरगाह पर प्रतिज्ञा की कि यदि वह गुजरात का बादशाह बन जायेगा तो वह अजमेर पर कब्जा करके दरगाह परिसर में रखी समस्त मूर्तियों को तोड़ डालेगा। ये मूर्तियां ई.1515 से ई.1525 के बीच के समय में दरगाह परिसर में रखी गई थीं।

जब बहादुरशाह गुजरात का बादशाह बना तो उसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये अपने सेनापति शमशीरूल मुल्क को अजमेर पर अधिकार करने के लिये भेजा। शमशीरुल मुल्क ने सरलता से अजमेर पर अधिकार कर लिया तथा दरगाह में जियारत की। 

दरगाह के मण्डप की उत्तरी दीवार पर सोने के अक्षरों में एक कविता लिखी है जिसमें कहा गया है कि दरगाह का गुम्बज ई.1532 में संवारा गया। वस्तुतः यह कार्य शमशीरुलमुल्क ने किया। बहादुरशाह अजमेर पर बहुत कम समय के लिये अधिकार रख सका। मेड़ता के वीरमदेव ने बहादुरशाह की सेनाओं को अजमेर से बाहर निकालकर अजमेर पर अधिकार कर लिया। शीघ्र ही जोधपुर के राव मालदेव ने वीरमदेव को अजमेर से बाहर निकालकर अजमेर पर अधिकार कर लिया।

पाण्डुआ (बंगाल) के निवासी नूर कुतुब ए आलम के शिष्य सयैद शम्सुद्दीन ताहिर ने 150 वर्ष की उम्र पाई। उसने भी अजमेर दरगाह की यात्रा की। वह दरगाह में काफी समय तक रहा। कहा जाता है कि उसने हमीदुद्दीन नागौरी के वंशज शेख रफीउद्दीन बयाजिद से अजमेर दरगाह में भेंट की जो स्थायी रूप से दरगाह में ही बस गये थे।

ई.1450 में मुलतान के शेख हुसैन ने अजमेर दरगाह की यात्रा की। वह 12 वर्ष तक दरगाह के निकट एक कोठरी में ध्यान एवं प्रार्थनाएं करता रहा। वह मालवा के शासक महमूद खिलजी तथा उसके पुत्र गयासुद्दीन का समकालीन था। नागोरे (तमिलनाडु) निवासी शेख शाह उल हमीद अपने समय का जानामाना सूफी था।

उसने भी अजमेर में ख्वाजा की दरगाह की यात्रा की। कहा जाता है कि ख्वाजा अजमेरी ने मुजाविरन (खुद्दाम) को पहले ही बता दिया कि संत शाह उल हमीद आ रहे हैं, इसलिये खुद्दाम ने शहर से बाहर जाकर संत का स्वागत किया।

गयासुद्दीन खिलजी के समय में मकबरे का गुम्बद बनाया गया। पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों अथवा सोलहवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में प्रसिद्ध कवि शेख जमाली ने अजमेर की यात्रा की। उसने अजमेर दरगाह की स्थापना की।

मुगलों से पहले, दिल्ली के शासकों में से सुल्तान बहलोल लोदी (ई.1451-88) एवं शेरशाह सूरी (ई.1544) ने भी अजमेर दरगाह की यात्रा की। ग्वालियर के ख्वाजा खानुन ने अजमेर दरगाह पर काफी समय व्यतीत किया। मौलाना शेख अब्दुल फतह नागौरी शट्टारी, शेख मुहम्मद गौस ग्वालियरी का उत्तराधिकारी था। वह भी अजमेर की दरगाह पर काफी समय रहा।

अहमदाबाद का रहने वाला शेख बुरहान अजमेर आया और उसका निधन अजमेर में ही हो गया। उसे दरगाह के निकट ही दफनाया गया। सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में सयैद सालार अजमेरी, ख्वाजा की दरगाह में रहता था। उसके उपदेश सुनने के लिये बड़ी संख्या में लोग जुटते थे। उसने भारत से बाहर भी बहुत से देशों का भ्रमण किया।

वह अपने समय का विद्वान सूफी था। उसके अनुयायियों में खिजर का पुत्र शेख मुबारक (अबुल फजल तथा फैजी) का पिता भी था। शेख सालार के प्रसिद्ध मुरीदों में सयैद अली घावास भी था जो पीर बाबा के नाम से प्रसिद्ध था। पीर बाबा का पिता हमायूं की सेवा में था। भारत आने के बाद पीर बाबा दरवेशी बन गया। पानीपत की यात्रा करने के बाद वह अजमेर आया तथा सैयद सालार अजमेरी का मुरीद बन गया।

अपने पीर के कहने पर वह अजमेर से उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश में जाकर चिश्ती सम्प्रदाय का प्रचार करने लगा, वहीं पर ई.1593 में उसकी मृत्यु हुई।

उसके खलीफा अखुम दरवेज तथा उसका पुत्र अब्दुल करीम थे। अखुंद दरवेज एक महान अफगान पीर था, उसने अपनी समस्त शक्तियों के साथ रोशनियां आंदोलन के बढ़ते हुए प्रभाव तथा उसके जनक शेख बैयाजिद पीर ए तारिक का विरोध किया। रोशनयिां मत का विरोध करने के लिये अखुंद ने चिश्ती सिलसिलाह की स्थापना की। इस क्षेत्र में नक्शबंदी तथा सुहरावर्दी सिलसिलाह प्रभावशाली होकर उभरे।

उमर चिश्ती खादिम के पुत्र शेख मांझू और शेख चवन ने भी अजमेर की यात्रा की। शेख मांझू ने अपने पैरों को लोहे की जंजीरों से बांध लिया तथा प्रतिज्ञा की कि वह उसी को अपना पीर मानेगा जो उसके पैरों की जंजीरों को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से तोड़ दे। वह हज पर भी गया।

अंत में मंदसौर में शेख दान ने उसके पैरों की जंजीरें अपनी आध्यात्मिक शक्ति से तोड़ीं। शेख चवन ई.1543 में माण्डू चला गया तथा माण्डू दुर्ग की तलहटी में स्थित नालचा में बस गया। खानदेश के एक वजीर के पुत्र मलिक महमूद बयाराह ने हज की यात्रा करने के बाद अजमेर दरगाह की यात्रा की। उसने दरगाह में मुल्तव्वली का दायित्व निभाया तथा ई.1576-77 में अजमेर शहर छोड़कर अहमदाबाद चला गया।

ई.1556 में मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर, आगरा एवं दिल्ली के तख्त पर बैठा। ई.1562 में अकबर शिकार खेलने के लिये गया एवं फतहपुर सीकरी के निकट मिधाकुर गांव से होकर गुजरा। वहाँ कुछ औरतें महान ख्वाजा की प्रशंसा में एक लोक भजन गा रही थीं।

अकबर उस भजन को सुनकर प्रभावित हुआ एवं अजमेर की यात्रा पर चल पड़ा। इसके बाद ख्वाजा की दरगाह के एक नये इतिहास की शुरुआत हुई तथा मुगलों एवं ख्वाजा की दरगाह का पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला सम्बन्ध आरम्भ हुआ। इस सम्बन्ध ने भारत के इतिहास को बहुत प्रभावित किया।

जनवरी 1562 में अकबर पहली बार अजमेर आया तथा उसने मोइनुद्दीन की मजार के बारे में पता लगाया। उस समय अजमेर उपेक्षित और बहुत छोटा कस्बा था अकबर ने ख्वाजा की दरगाह की तीन बार ई.1562, ई.1568 और ई.1570 में जियारत की।

ई.1570 में शहजादे सलीम के जन्म के उपरांत उसने आगरा से दरगाह तक की यात्रा पैदल चल कर की। इसके बाद अकबर ई.1579 तक लगातार प्रतिवर्ष अजमेर आया। उसने ख्वाजा की दरगाह के प्रबंध के लिये शेख मुहम्मद बुखारी को नियुक्त किया जिसने अकबर की इच्छानुसार एक बड़ी मस्जिद का निर्माण करवाया।

अकबर द्वारा दरगाह को भेंट किये गये बर्तन एवं अन्य सामग्री आज भी रखी हैं। जहाँगीर और शाहजहाँ ने ख्वाजा की दरगाह के रख रखाव के लिये उदारता पूर्वक अनुदान दिया। संगीत के विरोधी औरंगजेब ने ख्वाजा के प्रति श्रद्धा के कारण दरगाह पर संगीत सभाओं को जारी रखा और अनुदान दिया।

दरगाह पर मुस्लिम कलैण्डर के रजब माह की पहली से छठी तिथि तक विशाल उर्स का आयोजन किया जाता है। उर्स का आयोजन मोइनुद्दीन चिश्ती के निधन की बरसी के रूप में किया जाता है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

छत्रपति शिवाजी का संघर्ष एवं उपलब्धियाँ – प्रस्तावना

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छत्रपति शिवाजी का संघर्ष बहुकोणीय था। उन्होंने बीजापुर के शिया राज्य से भूमि छीनकर हिन्दू राज्य की स्थापना की। शिवाजी ने औरंगजेब से जीवन भर संघर्ष किया। छत्रपति ने आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह तथा जोधपुर नरेश जसवंतसिंह जैसे दुराधर्ष योद्धाओं से अपने राज्य को बचाया तथा औरंगजेब के जीवन काल में ही अपना राज्याभिषेक करवाया।

प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी केन्द्र में तथा भारत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित महाराष्ट्र में भारत की कई महान् विभूतियों का जन्म हुआ है। ई.1630 में इसी महाराष्ट्र प्रदेश में छत्रपति शिवाजी राजे का जन्म हुआ। उनके जन्म से सवा चार सौ साल पहले से भारत विचित्र राजनीतिक परिस्थितियों में फंसा हुआ था।

उत्तर भारत पर ई.1206 से 1526 तक कट्टर सुन्नी तुर्कों ने शासन किया। उन्होंने हिन्दुओं को निर्धनता और दुर्भाग्य के समुद्र में डुबोकर बड़ी संख्या में मुसलमान बना लिया था। ई.1526 से दिल्ली पर समरकंद से आए मंगोल शासन कर रहे थे। वे भी तुर्क थे तथा पहले के तुर्कों की तरह कट्टर सुन्नी मुसलमान थे।

भारत में मुगलिया राज्य के संस्थापक बाबर ने भारत को दारूल-हर्श (काफिरों का देश) घोषित किया तथा स्वयं को जेहाद (धार्मिक यात्रा) पर बताया जिसका उद्देश्य काफिरों को मारना या मुसलमान बनाना होता है।

उसके पौत्र अकबर ने उत्तर भारत के अधिकांश प्रबल हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करके उनकी राजकुमारियों से या तो स्वयं ने विवाह कर लिए या अपने पुत्र सलीम के साथ कर दिये। इसी को आजकल अकबर की हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा उदारता कहा जाता है। जबकि मुगलों के हरम में गईं इन हिन्दू राजकुमारियों की कोख से जन्मे तुर्क शहजादों ने हिन्दुओं को पहले से कहीं अधिक दुर्भाग्य, निर्धनता और मृत्यु प्रदान की।

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उत्तर भारत में चित्तौड़ का प्रबल राज्य सदियों से शासन करता आया था जिसने अकबर के समक्ष घुटने टेकने तथा अपनी कन्याओं के विवाह मुसलमानों के साथ करने से मना कर दिया। इसलिए अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग में तीस हजार से अधिक हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया। उसने हिन्दू राजाओं को अपना सेनापति नियुक्त किया तथा हिन्दुओं के हाथों ही हिन्दुओं को मरवाया।

इसके बदले में उसने हिन्दुओं पर से जजिया हटाया ताकि हिन्दू राजा एवं इतिहासकार, अकबर की उदारता के गुण गाते रह सकें। अकबर के पुत्र जहांगीर ने भी हिन्दुओं को नष्ट करने की यही रेशमी फंदे वाली नीति अपनाई। उसके पुत्र शाहजहाँ ने भारत की हिन्दू प्रजा पर फिर से जजिया लगाया और बड़ी संख्या में हिन्दुओं का संहार करवाया।

उसका पुत्र औरंगजेब कट्टर सुन्नी बादशाह सिद्ध हुआ। उसने भारत से काफिरों को समाप्त करके दारूल-इस्लाम अर्थात् मुस्लिम राज्य की स्थापना करने का काम तेजी से आगे बढ़ाया।

इस काल में दक्षिण भारत, पांच छोटे-छोटे मुस्लिम राज्यों- बरार में इमादशाही राज्य, अहमदनगर में निजामशाही राज्य, बीजापुर में आदिलशाही राज्य, गोलकुण्डा में कुतुबशाही राज्य तथा बीदर में बरीदशाही राज्य में बंटा हुआ था। इन पांचों राज्यों पर शिया बादशाह शासन करते थे।

इन शिया मुस्लिम राज्यों ने दक्षिण भारत के शक्तिशाली विजयनगर हिन्दू साम्राज्य का अंत कर दिया और हिन्दू प्रजा को लूटकर अपने महल खजानों से भर लिए। वे हिन्दुओं के तीर्थों एवं देवालयों को बुरी से तरह नष्ट करते आ रहे थे। एक तरफ तो दक्षिण भारत के शिया राज्य, दक्षिण के हिन्दुओं को नष्ट कर रहे थे तो दूसरी ओर उत्तर भारत के कट्टर सुन्नी शासक, इन शिया राज्यों को फूटी आंखों से भी नहीं देखना चाहते थे। सुन्नी शासकों की दृष्टि में शिया भी वैसे ही काफिर थे जैसे कि हिन्दू।

शिवाजी का जन्म अहमदनगर के निजामशाह राज्य के प्रभावशाली जागीरदार शाहजी भौंसले के दूसरे पुत्र के रूप में हुआ। शिवाजी के जन्म के कुछ समय बाद शाहजी ने शिवाजी की माता जीजाबाई को स्वयं से अलग करके शिवनेर दुर्ग में रख दिया क्योंकि जीजाबाई का पिता जाधवराय, निजामशाह के शत्रुओं अर्थात् मुगलों की सेवा में चला गया था।

ई.1636 में मुगलों ने अहमदनगर का राज्य समाप्त कर दिया तब शाहजी ने बीजापुर राज्य में नौकरी कर ली। जीजाबाई के पिता जाधवराय की भी जल्दी ही मृत्यु हो गई, इस कारण जीजाबाई का वह आश्रय भी समाप्त हो गया और वह कई वर्षों तक अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए जंगलों में बने किलों में भटकती रही।

मुगल सेनाएं शाहजी के पुत्र को मार डालना चाहती थीं क्योंकि शाहजी, पहले तो निजामशाह की ओर से और अब आदिलशाह की ओर से मुगलों से युद्धरत था। बालक शिवा कई बार मुगल सिपाहियों के हाथों में पड़ते-पड़ते बचा किंतु जीजाबाई के धैर्य और साहस से प्रत्येक बार, बालक शिवा के प्राणों की रक्षा हुई।

इस प्रकार शिवाजी ने अपने बाल्यकाल में ही मुस्लिम सैनिकों द्वारा किए जा रहे हिन्दू प्रजा के कत्ल और शोषण को बहुत निकट से देखा। इन्हीं परिस्थितियों में शिवाजी 16 साल के हो गए और उन्होंने हिन्दू प्रजा के उद्धार के लिए स्वयं को तैयार करने तथा किलों को जीतने के लिए सेना बनाने का निश्चय किया।

किलों को जीतने और बनाने के लिए यह आयु बहुत कम थी, किंतु शिवाजी के निश्चय उनकी आयु से कहीं बहुत आगे थे। उनके हृदय में भारत की निरीह जनता के लिए पीड़ा थी। इसी पीड़ा को दूर करने के लिए उन्होंने मुस्लिम राज्यों को समाप्त करके हिन्दू राज्य की स्थापना का सपना देखा जिसे वह हिन्दू पदपादशाही कहते थे।

शिवाजी का मानना था कि मुगल अजेय नहीं हैं, उन्हें यह प्रेरणा अपने पिता शाहजी से मिली थी। शाहजी ने भी, अहमदनगर तथा बीजापुर के लिए मुगलों के विरुद्ध संघर्ष किया था और मुगलों के दांत खट्टे किए थे, जिससे शाहजी की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई थी।

शाहजी की प्रेरणा से शिवाजी के नेतृत्व में मराठा शक्ति का फिर से उदय हुआ। दक्षिण भारत में बहमनी राज्य की स्थापना से पहले मराठे ही इस क्षेत्र पर शासन करते थे। जीवन-पर्यंत किए गए संघर्ष के बल पर शिवाजी ने स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना की। औरंगजेब जैसा क्रूर एवं मदांध शासक भी शिवाजी द्वारा संगठित की गई मराठा शक्ति का दमन नहीं कर सका। अंत में यह मराठा शक्ति भारत से मुगल शासन को उखाड़ फैंकने के लिए यम की फांस सिद्ध हुई।

प्रस्तुत पुस्तक में सत्रहवीं शताब्दी के महानायक छत्रपति शिवाजी राजे की जीवनी के साथ-साथ उनके संघर्ष एवं उनकी उपलब्धियों का ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर लेखन एवं विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक में शिवाजी के समकालीन लेखकों द्वारा लिखे गए तथ्यों को काम में लेने का यथासंभव प्रयास किया गया है।

शिवाजी के समकालीन ग्रंथों में से कुछ ग्रंथों का उल्लेख किया जाना समीचीन होगा जिनमें मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ), नुश्खा-ए-दिलकुशा, स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) आदि प्रमुख हैं। औरंगजेब ने अपने समय का इतिहास लिखने पर पाबन्दी लगा दी थी परन्तु मोहम्मद हाशिम खाफी खाँ नामक एक मुगल सेनापति ने गुप्त रूप से मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ) नामक ग्रन्थ की रचना की।

यह एक विशाल ग्रन्थ है जो ई.1519 में बाबर के समरकंद एवं फरगना आक्रमणों से आरम्भ होकर उसके वंशज मुहम्मदशाह रंगीला के शासन के 14वें साल के इतिहास के साथ समाप्त होता है। ग्रन्थ का महत्व ई.1605 से 1733 तक की घटनाओं, विशेषतः औरंगजेब के शासनकाल के आरम्भ (ई.1658) से लेकर ई.1733 तक के लिए अधिक है। उसने औरंगजेब की धार्मिक नीति का समर्थन और छत्रपति शिवाजी की निन्दा की है।

औरंगजेब के समकालीन प्रसिद्ध हिन्दू सेनापति भीमसेन ने नुश्खा-ए-दिलकुशा नामक फारसी ग्रंथ में औरंगजेब के राज्यकाल का आंखों देखा इतिहास लिखाँ उसने महाराजा जसवन्तसिंह तथा दलपतराव बुल्देला के अधीन काम किया था। उसने दक्षिण के युद्धों तथा औरंगजेब के बाद लड़े गए उत्तराधिकार युद्ध को अपनी आँखों से देखा। उसने शिवाजी की गतिविधियों तथा उनकी संगठन प्रतिभा का अच्छा वर्णन किया है।

यूरोपीय पर्यटक जॉन फ्रॉयर शिवाजी के जीवन काल में भारत घूमने आया। उसने अपनी आंखों से मुगलों की सेनाओं को शिवाजी का राज्य बर्बाद करते हुए देखा। उसने भारत में हुए अनुभवों के आधार पर ”न्यू एकाउंट ऑफ ईस्ट इण्डिया कम्पनी एण्ड पर्शिया” नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में छत्रपति शिवाजी का संघर्ष उस काल की घटनाओं के साथ मिलता है।

इस पुस्तक में एक स्थान पर उसने लिखा है- ”मुगल सेनाएं अपने मार्ग में आने वाली हर चीज को गिरा देती थीं। गांव के गांव जलाए जा रहे थे। खेतों में खड़ी मक्का की फसलें भूमि पर गिराई जा रही थी। पशुओं को पकड़कर मुगलों के राज्य को ले जाया जा रहा था तथा शिवाजी के राज्य में रहने वाले स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों को बलपूर्वक दास बनाया जा रहा था।”

औरंगजेब के समय में इटली के वेनिस नगर का निवासी निकोलोआ मनूची ई.1650 में सूरत होता हुआ दिल्ली पहुँचा। वह तुर्की और फारसी भाषाओं का ज्ञाता था। उसने लम्बे समय तक भारत में प्रवास किया तथा औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह की तरफ से उत्तराधिकार के युद्ध में भाग लिया। जब दारा, औरंगजेब से पराजित होकर सिन्ध की ओर पलायन कर गया तो निकोलोआ मनूची भी उसके साथ सिन्ध तक गया था।

मनूची वहाँ से वापस दिल्ली होते हुए कश्मीर आया और वहाँ से बिहार तथा बंगाल के भ्रमण पर गया। कुछ समय के लिए उसने दिल्ली तथा आगरा में चिकित्सक का कार्य भी किया। उसने मिर्जा राजा जयसिंह के द्वारा छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध किए गए अभियान में भाग लिया। उसने स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) नामक पुस्तक लिखी जिसमें छत्रपति शिवाजी का संघर्ष एवं शिवाजी के समय का आंखों देखा इतिहास भी उपलब्ध है।

आधुनिक इतिहासकारों में जदुनाथ सरकार ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर छत्रपति शिवाजी का संघर्ष लिखकर भारत की प्रजा पर बड़ा उपकार किया है। आधुनिक काल के अनेक मराठी एवं अंग्रेजी लेखकों ने भी शिवाजी के संघर्ष एवं उपलब्धियों को निरपेक्ष होकर लिखा है।

शिवाजी और मुगलों के बीच बहुत लम्बा-चौड़ा पत्र व्यवहार हुआ जिनसे हार-जीत के दावों को सफलतापूर्वक कसौटी पर कसा जा सकता है। इन ग्रंथों एवं पत्रों का उपयोग करते हुए इस ग्रंथ का प्रणयन किया गया है तथा सत्रहवीं शताब्दी के उस अप्रतिम, अतुल्य एवं महान राजा को विनम्र श्रद्धांजलि देने का प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक को लिखते समय मुझे शिवाजी के पिता शाहजी का जीवन चरित्र पढ़ने का अवसर मिला। मुझे यह देखकर दुःख हुआ कि भारत के इस वीर योद्धा के प्रति इतिहासकारों ने बहुत अन्याय किया है जिसके कारण विद्यालयी एवं विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में शाहजी की छवि नकारात्मक बन गई है।

उन्हें शिवाजी तथा उनकी माता जीजाबाई को त्यागने वाला तथा मुसलमान बादशाहों की नौकरी करने वाला साधारण एवं छोटा सा सेनानायक बताया गया है। जबकि शाहजी अपने समय में भारत के विख्यात योद्धाओं में गिने जाते थे। इस पुस्तक में उस अप्रतिम योद्धा के सम्बन्ध में ऐतिहासिक तथ्यों का पता लगाकर सत्य को सामने लाने का प्रयास किया गया है।

मैं लगभग सात वर्ष का बालक ही था जब मेरे पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता ने मुझे कवि भूषण के लिखे हुए कुछ पद सुनाए। इन पदों में छत्रपति शिवाजी की वीरता का अद्भुत वर्णन किया गया है। मेरे बाल-मन पर शिवाजी की वीरता की अमिट छाप अंकित हो गई। अपने स्कूल के दिनों में ही मुझे आचार्य चतुरसेन के उपन्यास ‘चट्टानें’ पढ़ने का सौभाग्य भी प्राप्त हो गया।

इससे शिवाजी के प्रति मेरे मन में आदर और श्रद्धा का भाव जागृत हुआ। लगभग एक दशक पहले मुझे शिवाजी सावंत के उपन्यास ‘छावा’ को पढ़ने का भी सौभाग्य मिला जिसमें मराठों के संघर्ष का लोमहर्षक वर्णन किया गया है। आशा है यह पुस्तक इतिहास के सुधि पाठकों को पसंद आएगी।

छत्रपति शिवाजी का संघर्ष प्रत्येक भारतवासी का संघर्ष है, प्रत्येक हिन्दू का संघर्ष है, प्रत्येक स्वातंत्र्य प्रेमी का संघर्ष है, प्रत्येक उस मानव का संघर्ष है जो अपने राष्ट्र से प्रेम करता है तथा निरीह प्रजा के सुख के लिए अपना जीवन समर्पित करता है।

 -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिवाजी के पूर्वज (2)

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शिवाजी के पूर्वज

माना जाता है कि शिवाजी के पूर्वज मेवाड़ के महाराणाओं के वंश में से निकले थे। राजकुमार सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह उनका पूर्वज था।

ई.1303 में अल्लाऊद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग तोड़ा और रावल रत्नसिंह को मार डाला। उसकी मृत्यु के साथ ही मेवाड़ के गुहिलों की रावल शाखा का अंत हो गया। तब बहुत से राजपूत परिवार चित्तौड़ दुर्ग छोड़कर देश के अन्य भागों में चले गए। तब गुहिल वंश का एक क्षत्रिय राजकुमार सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह चित्तौड़ छोड़कर दक्षिण भारत को चला आया तथा अपने परिवार के साथ यहीं रहने लगा। दक्षिण भारत में ही उसका निधन हुआ। यही सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह शिवाजी के मराठी पूर्वजों में पहला था।

सज्जनसिंह अथवा सुजानसिंह के कुछ वंशज खेती-बाड़ी करके उदरपूर्ति करने लगे तथा कुछ वंशज, दक्षिण के शासकों के लिए लड़ाइयां लड़ते हुए अपनी आजीविका अर्जित करने लगे। सज्जनसिंह की पांचवी पीढ़ी में अग्रसेन नामक एक वीर पुरुष हुआ जिसके दो पुत्र- कर्णसिंह तथा शुभकृष्ण हुए। कर्णसिंह के पुत्र भीमसिंह को बहमनी राज्य के सुल्तान ने राजा घोरपड़े की उपाधि एवं मुधौल में 84 गांवों की जागीर प्रदान की।

इस कारण भीमसिंह के वंशज घोरपड़े कहलाए। दूसरे पुत्र शुभकृष्ण के वंशज भौंसले कहलाए। इस प्रकार शिवाजी के पूर्वज घोरपड़े एवं भौंसले दो शाखाओं में बंट गए।

शुभकृष्ण का पौत्र बापूजी भौंसले हुआ। बापूजी भौंसले का परिवार बेरूल (एलोरा) गांव में काश्तकारी एवं पटेली का काम करता था। पटेल का काम कृषकों से भूमि का लगान वसूल करके उसे शाही खजाने में जमा करवाने का होता था। इन लोगों को महाराष्ट्र में पाटिल भी कहते थे। बापूजी भौंसले ई.1597 में वैकुण्ठवासी हुआ।

Shivaji
Shivaji

बापूजी भौंसले के दो पुत्र थे जिनके नाम मालोजी और बिठोजी थे। शरीर से हृष्ट-पुष्ट होने के कारण इन दोनों भाइयों ने सिन्दखेड़ के सामन्त लुकाजी यादव अथवा जाधवराय के यहाँ सैनिक की नौकरी प्राप्त कर ली। जाधवराय, अहमदनगर के बादशाह निजामशाह की सेवा में था तथा निजाम से उसका बहुत नैकट्य भी था। कुछ दिनों बाद मालोजी एवं बिठोजी को जाधवराय के महल का मुख्य रक्षक नियुक्त किया गया।

जाधवराय का परिहास

मालोजी का विवाह पल्टनपुर के देशमुख बंगोजी अथवा जगपाल राव नायक निम्बालकर की बहिन दीपाबाई से हुआ। मालोजी को लम्बे समय तक कोई संतान प्राप्ति नहीं हुई। अंत में एक मुस्लिम फकीर के आशीर्वाद से ई.1594 में मालोजी के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। फकीर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उस बालक का नाम शाहजी रखा गया। शाहजी अत्यंत रूपवान एवं प्रभावशाली चेहरे का बालक था।

कुछ समय पश्चात् मालोजी को एक और पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम शरीफजी रखा गया। एक बार होली के त्यौहार पर मालोजी अपने बड़े पुत्र शाहजी को जाधवराय के महल में ले गया। वहाँ जाधवराय के बहुत से सामंत-सरदार एवं मित्र आए हुए थे। जाधवराय ने रूपवान बालक शाहजी को बड़े प्रेम से अपने पास बैठाया।

वहीं पर जाधवराय की पुत्री जीजाबाई बैठी हुई थी। जब सब लोग होली खेल रहे थे, तब इन दोनों बालकों ने भी एक दूसरे पर रंग डाला। इसे देखकर अचानक जाधवराय के मुख से निकला कि कितनी सुंदर जोड़ी है। उसने अपनी पुत्री जीजा से पूछा कि क्या तुम इस लड़के से विवाह करोगी?

इतना सुनते ही मालोजी उत्साह से भर गया और खड़े होकर बोला, सुना आप सबने, जाधवराय ने अपनी पुत्री का सम्बन्ध मेरे पुत्र से कर दिया है। जाधवराय तो बच्चों से परिहास मात्र कर रहा था। अतः मालोजी का यह दुःसाहस देखकर क्रोधित हो गया और तुरन्त प्रतिकार करते हुए मालोजी और बिठोजी को अपनी सेवा से च्युत कर दिया।

मालोजी का उत्कर्ष

मालोजी एवं बिठूजी, दोनों भाई वहाँ से उठ गए और अगले ही दिन सिन्दखेड़ छोड़कर अपने पैतृक गांव चले गए। वहाँ वे फिर से खेतीबाड़ी करने लगे। एक दिन मालोजी को कहीं से अचानक प्रचुर खजाना हाथ लगा। उस धन से उसने एक हजार सैनिकों की वेतन-भोगी सेना तैयार की और अहमदनगर के शासक निजामशाह की सेवा में भर्ती हो गया।

शाहजी का संघर्ष एवं उत्कर्ष

ई.1619 में मालोजी का निधन हो गया और उसकी समस्त जागीरें शाहजी को प्राप्त हो गईं। शाहजी ने अपने चचेरे भाइयों के साथ मिलकर अहमदनगर के निजाम के लिए, मुगलों के विरुद्ध कई युद्ध लड़े और जीते। ई.1624 में खुर्रम 1,20,000 सैनिक लेकर अहमदनगर पर चढ़ आया। बीजापुर का आदिलशाह भी 80,000 सैनिक लेकर खुर्रम की सहायता करने आया।

ये दोनों सेनाएं मेहकार नदी के तट पर शिविर लगाकर बैठ गईं। इस समय अहमदनगर के पास केवल 20 हजार सैनिक थे जिनमें से 10 हजार सैनिक नगर की सुरक्षा के लिए लगाए गए और 10 हजार सैनिक मुगलों से लड़ने के लिए शाहजी को दिए गए। शाहजी के 10 हजार सैनिक मुगलों का कुछ भी नहीं कर सकते थे।

फिर भी शाहजी ने नदी भटवाड़ी के निकट अपना शिविर लगाया। एक रात जब काफी तेज बरसात हुई तो शाहजी ने नदी पर बने विशाल बांध में छेद करवा दिए। बांध टूट गया तथा उसका पानी तेजी से बहता हुआ मुगलों और बीजापुर की सेना की तरफ आया। इस कारण मुगलों के शिविर में बाढ़ आ गई। शाहजी अपने सैनिकों के साथ तैयार था।

वह बिजली बनकर शत्रुओं पर टूट पड़ा। बड़ी संख्या में मुगल सैनिक मारे गए। शाहजी ने मुगलों के पांच बड़े सेनापतियों को जीवित ही पकड़ लिया। इस प्रकार भटवाड़ी के युद्ध में मिली विजय के बाद शाहजी का कद भारत की राजनीति में बहुत बड़ा हो गया। अहमदनगर की ओर से उसे पूना और सूपा की जागीरें प्राप्त हुईं।

शाहजी का बीजापुर की सेवा में जाना 

मुगलों की सेवा त्यागने के बाद से शाहजी भौंसले का जीवन भी बहुत कठिन हो गया। शाहजहाँ किसी भी तरह शाहजी को पुनः अपनी सेवा में लेना चाहता था क्योंकि अहमदनगर की वास्तविक शक्ति शाहजी ही था किंतु शाहजी ने मना कर दिया। शाहजहां ने निजाम के वजीर जहाँ खाँ को रिश्वत देकर अपनी तरफ कर लिया। जहाँ खाँ ने निजाम तथा उसके सम्पूर्ण परिवार की हत्या कर दी। यहाँ तक कि निजाम परिवार की दो गर्भवती महिलाओं को भी मार दिया।

शाहजी ने हार नहीं मानी, उसने मृतक निजाम के निकट सम्बन्धी के बालक मुर्तजा को अहमदनगर का निजाम घोषित कर दिया तथा मुगलों को कड़ी टक्कर देता हुआ, ”निजाम मुर्तजा” को लेकर एक के बाद दूसरे किले में भटकने लगा। ई.1635 में मिर्जा राजा जयसिंह ने शाहजी भौंसले के 3 हजार आदमी और 8 हजार बैल पकड़ लिए।

इन बैलों पर तोपखाना और बारूद लदा हुआ था। इस भारी जीत के उपलक्ष्य में जयसिंह को अपने राज्य जयपुर में लगभग दो वर्ष तक छुट्टियां मनाने की अनुमति मिली तथा मुगल सेनापति खानेजमाँ महाबत खाँ को शिवाजी के विरुद्ध लगाया गया। महाबतखाँ, शाहजी के विरुद्ध लड़ता हुआ पूरी तरह बर्बाद हो गया तथा ई.1634 में उसकी मृत्यु हो गई।

ई.1636 के आरम्भ में शाहजहाँ स्वयं सेना लेकर अहमदनगर के विरुद्ध लड़ाई करने आया। मुगल साम्राज्य की पूरी शक्ति शाहजी के विरुद्ध झौंक दी गई। शाहजहां ने बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर दबाव बनाकर, उनकी सेनाएं भी शाहजी के विरुद्ध लगा दीं। इस प्रकार शाहजी चारों ओर से घिर गया। अंत में उसके पास केवल पांच दुर्ग रह गए।

एक दिन मुगलों ने मुर्तजा को अगवा कर लिया। मुर्तजा का जीवन बचाने के लिए शाहजी को मुगलों से समझौता करना पड़ा। शाहजहाँ मुर्तजा को दिल्ली ले गया तथा अहमदनगर के निजामशाही राज्य को पूरी तरह समाप्त कर दिया। बीजापुर का शासक आदिलशाह, शाहजी की वीरता से बहुत प्रभावित था। उसने शाहजी के समक्ष प्रस्ताव भिजवाया कि शाहजी, बीजापुर की सेवा ग्रहण कर ले।

शाहजी ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। शाहजहाँ से अनुमति लेकर आदिलशाह ने शाहजी को बीजापुर की सेवा में रख लिया। शाहजहाँ ने बीजापुर को यह अनुमति इस शर्त पर दी कि शाहजी की ओर जागीर नहीं दी जाए। शाहजी को बीजापुर राज्य की ओर से 92 हजार सवारों का सेनापति नियुक्त किया गया।

उसे कर्नाटक की तरफ एक बड़ी जागीर दी गई। पूना तथा सूपा भी की जागीरें भी पूर्ववत् उसके पास बनी रहीं। उन दिनों बीजापुर का सेनापति रनदुल्ला खाँ, विजयनगर साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर खड़े हुए छोटे-छोटे हिन्दू राज्यों को नष्ट कर रहा था। ई.1637-40 के बीच हुए इन अभियानों में शाहजी को रनदुल्ला खाँ का साथ देना पड़ा।

इन हिन्दू राज्यों को नष्ट-भ्रष्ट करके बीजापुर के शाह तथा सेनापति ने अकूत सम्पदा एकत्रित कर ली। इस सम्पदा से बीजापुर के शाह ने अपने लिए विशाल महलों का निर्माण करवाया। इनमें दाद महल एवं गोलगुम्बद भी सम्मिलित हैं। इन अभियानों में हिन्दू जनता पर भयानक अत्याचार किए गए जिन्हें देखकर शाहजी की आत्मा हा-हाकार करती थी।

कुछ समय पश्चात् शाहजी ने बीजापुर के शाह से ये क्षेत्र जागीर के रूप में अपने अधिकार में ले लिए ताकि हिन्दू प्रजा को मुस्लिम अत्याचारों से बचाया जा सके।

इस प्रकार हम देखते हैं कि शिवाजी के पूर्वज बड़े प्रतापी थे। उन्होंने संकट काल में खेती का व्यवसाय अपनाया तथा धीरे-धीरे अपने क्षत्रिय कर्म में लौट आए। बाद में जब शिवाजी का उत्कर्ष चरम पर पहुंच गया तो बहुत से लोग शिवाजी के पूर्वज को उच्च कुल का मानने की बजाय हीन कुल का बताने लगे।

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