भारत में साम्यवाद का उदय रूस की समाजवादी क्रान्ति से प्रेरित थी। साम्यवाद से प्रेरित युवकों को लगता था कि जिस प्रकार रूस में जार का शासन उखाड़ कर फैंक दिया गया है, उसी प्रकार भारत में साम्यवाद के बल पर साम्राज्यवादी अंग्रेजों का शासन समाप्त किया जा सकता है।
भारत में साम्यवाद का उदय
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद, 1917 ई. में घटित, रूस की महान् अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति ने अन्तर्राष्ट्रीय इतिहास में एक एक नया युग आरम्भ किया। भारत भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। रूस की समाजवादी क्रान्ति ने हमारे स्वाधीनता संग्राम पर गहरा प्रभाव डाला। इसी प्रभाव के करण भारत में ट्रेड यूनियन, किसान आन्दोलन, छात्र और नौजवान संघ तथा कई छोटे-बड़े संघों ने नई दिशा ग्रहण की और कांग्रेस ने भी व्यापक जन-आन्दोलनों का सहारा लिया।
साम्यवादियों की प्रारंभिक प्रवृत्तियाँ
ब्रिटिश शासकों ने भारत को साम्यवादी विचारधारा से दूर रखने का अथक प्रयास किया था, फिर भी यह विचारधारा भारत में प्रवेश कर गई। युद्ध काल में जो भारतीय क्रांतिकारी; जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, तुर्की और अफगानिस्तान से अपनी गतिविधियां चलाते थे, वे रूस की अक्टूबर क्रांति से प्रभावित होकर साम्यवाद की ओर मुड़े।
ऐसे क्रांतिकारियों में वी. चट्टोपाध्याय, एम. बरकतुल्ला, एम. एन. रॉय, अबनी मुखर्जी तथा आचार्य प्रमुख थे। प्रवासी सिक्खों और पंजाबी मजदूरों ने रतनसिंह और संतोष सिंह के माध्यम से मार्क्सवादियों एवं लेनिनवादियों से सम्पर्क स्थापित किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वाम पक्ष ने भी भारत में साम्यवाद को विकसित होने में सहयोग किया।
फिर भी बीसवीं सदी के प्रारम्भिक दो दशकों में वामपंथी आंदोलन की गतिविधियां, एक-दो पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों तक सीमित रहीं। इसी तरह अनेक प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों ने मास्को जाकर वहाँ के साम्यवादी नेताओं से सम्पर्क स्थापित किया। मई 1919 में भारतीय कार्यकर्त्ताओं का एक प्रतिनिधि मण्डल लेनिन से मिला।
लेनिन की सलाह पर प्रवासी भारतीयों ने 17 अक्टूबर 1920 को ताशकन्द में हिन्दुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया। एम. एन. राय, एवलिन ट्रेंट राय, ए. एन. मुखर्जी, रोजा फिटिगोफ, मोहम्मद अली (अहमद हसन), मोहम्मद शफीक सिद्दीकी और आचार्य एम. प्रतिवादी भंयकर इस पार्टी के प्रमुख नेता थे।
हिन्दुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी ने कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और लाहौर के कम्युनिस्ट विचारों के लोगों से सम्पर्क स्थापित किया और भारत में कम्युनिस्ट समूहों को संगठित करने में सहयोग दिया।
हिन्दुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी, पहले मास्को से और फिर बर्लिन से, एम. एन. राय व थर्ड इन्टरनेशनल के नेतृत्व में काम करने लगी। लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को यह संदेश दिया था कि वे अपने देश में चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलन का समर्थन करें तथा उसमें भाग लें किन्तु सर्वहारा के आन्दोलन का स्वतंत्र अस्तित्त्व बनाये रखें।
भारत में साम्यवादी समूह
भारत में 1920 ई. के बाद से ही साम्यवादी गतिविधियाँ बढ़ने लगी थीं। 1923 ई. तक बहुत से पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से साम्यवादी विचारों का प्रचार होने लगा था। साम्यवादी विचारधारा में रुचि रखने वाले लोग एक-दूसरे के निकट आते गये और संगठित होते गये। इस प्रकार देश के विभिन्न हिस्सों में साम्यवादी समूहों का उदय हुआ। माना जाता है कि 1921-22 ई. की अवधि में बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, लाहौर और कानपुर में साम्यवादी समूह अस्तित्त्व में आ चुके थे।
बम्बई के साम्यवादी समूह
बम्बई के साम्यवादी समूह की स्थापना में श्रीपाद अमृत डांगे की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रही। डांगे और उनके साथियों ने कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। बाद में इन लोगों ने बम्बई प्रादेशिक कांग्रेस कमेटी के अन्दर एक रेडिकल गु्रप बनाया। 1921 ई. में डांगे की पुस्तक गांधी बनाम लेनिन प्रकाशित हुई।
लगभग इसी समय यह कम्युनिस्ट समूह अस्तित्त्व में आया। अगस्त 1922 से डांगे ने अंग्रेजी भाषा में सोशलिस्ट नामक साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ किया। बम्बई के साम्यवादी समूह में के. एन. जोगलेकर और आर. एस. निम्बकर भी प्रमुख सदस्य थे। इस समूह का कार्यक्षेत्र भारतीय कांग्रेस के साथ-साथ बम्बई के कपड़ा मिल मजदूरों में भी था।
कलकत्ता के साम्यवादी समूह
कलकत्ता में मुजफ्फर अहमद और काजी नजरूल अहमद के प्रयासों से कम्युनिस्ट ग्रुप की स्थापना हुई। जुलाई 1920 से मुजफ्फर अहमद ने बंगला सांध्य दैनिक नवयुग का प्रकाशन आरम्भ किया। काजी नजरूल अहमद भी उनका हाथ बँटाने लगे। उन्होंने जहाजी मजदूरों की समस्याओं के सम्बन्ध में कई लेख प्रकाशित किये।
1921 ई. के अन्त में दोनों की भेंट नलिनी गुप्त से हुई जिन्हें एम. एन. राय ने भारत में साम्यवादी विचारधारा से जुड़े लोगों से सम्पर्क स्थापित करने के लिये भेजा था। इस प्रकार मुजफ्फर अहमद और काजी नजरूल अहमद का साम्यवादी विचारधारा से जुड़े लोगों से सम्पर्क स्थापित हो गया और कलकत्ता साम्यवादी समूह अस्तित्त्व में आया।
मद्रास के साम्यवादी समूह
मद्रास के वयोवृद्ध वकील मालयापुरम सिंगारावेलू चेट्टियार, मद्रास के साम्यवादी समूह के संस्थापक थे। वे असहयोग आन्दोलन के दौरान वकालत छोड़कर मजदूर आन्दोलन से जुड़ गये। उन्होंने कांग्रेस के गया अधिवेशन में भाग लिया तथा मद्रास में कम्युनिस्ट ग्रुप बनाया। एडवोकेट वेलायुधन ने भी इस कार्य में उनका सहयोग किया।
लाहौर के साम्यवादी समूह
ताशकन्द में स्थापित हिन्दुस्तान कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य मोहम्मद अली (अहमद हसन) के मित्र गुलाम हुसैन ने लाहौर के साम्यवादी समूह की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। गुलाम हुसैन ने इन्कलाब शीर्षक से पत्र निकाला तथा मजदूरों को संगठित करके साम्यवादी समूह की स्थापना की। इस कार्य में शम्सुद्दीन अहमद और मुहम्मद सिद्दीकी ने भी उनकी सहायता की।
संयुक्त प्रांत के साम्यवादी समूह
संयुक्त प्रान्त के कुछ हिस्सों में भी साम्यवादी समूह काम करने लगे थे। कानपुर और बनारस उनके मुख्य केन्द्र थे।
महाराष्ट्र के साम्यवादी समूह
नागपुर में भी एक साम्यवादी समूह काम कर रहा था।
भारत में किसी भी साम्यवादी समूह को वैधानिक मान्यता नहीं दी गई थी। इनमें से कुछ समूहों ने कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से सम्पर्क स्थापित कर रखा था और अपने कार्यों के लिए वहाँ से दिशा-निर्देश प्राप्त करते थे। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने तीन कार्य निर्देशित किये थे-
(1.) कम्युनिस्टों को आवश्यक रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और स्वराज पार्टी के वाम पक्ष (जिनका नेतृत्व सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू के हाथों में था) के भीतर कार्य करना चाहिए।
(2.) यह प्रयास किया जाये कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (जिसके अन्तर्गत स्वराज पार्टी भी सम्मिलित है) साम्राज्यवाद विरोधी खेमे का रूप ग्रहण करे।
(3.) कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल, भारतीय कम्युनिस्टों के लिए इस बात को उचित मानता था कि वे जनता की पार्टी अथवा मजदूर-किसान पार्टी का संगठन करें। यह पार्टी राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर कार्य करे। उसका कार्यक्रम सुस्पष्ट, साम्राज्यवाद विरोधी, सामन्तवाद विरोधी तथा जनतांत्रिक हो।
इस प्रकार, साम्यवादी समूह कांग्रेस के भीतर रहकर कार्य करने लगे और उनका आन्दोलन कांग्रेस तथा अन्य संगठनों के नेताओं की सहानुभूति प्राप्त करने लगा। सरकार का गुप्तचर विभाग उनकी गतिविधियों पर कड़ी निगाह रखे हुए था। उसने सरकार को सावधान किया कि इससे पहले कि भारत के साम्यवादी समूह, एक शक्तिशाली पार्टी के रूप में संगठित हों, उनकी शक्ति को तोड़ना उचित होगा। इसलिए 1922 से लेकर 1930 ई. तक सरकार ने कम्युनिस्टों के विरुद्ध सात मुकदमे चलाये। इनमें से पांच मुकदमे पेशावर में, एक कानपुर में और एक मेरठ में चलाया गया। सरकार द्वारा कम्युनिस्टों को कठोर सजा देकर भारत में कम्युनिस्ट प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया गया।
कानुपर षड़यंत्र केस
1924 ई. के आरम्भ में ब्रिटिश सरकार ने एस. ए. डांगे, मुजफ्फर अहमद, नलिनी गुप्ता, शौकत उस्मानी, गुलाम हुसैन, रामचरण लाल शर्मा, सिंगारावेलू चेट्टियार, एम. एन. राय आदि कम्युनिस्टों के विरुद्ध कानुपर में एक मुकदमा चलाया जो कानुपर षड़यंत्र केस के नाम से प्रसिद्ध है। एम. एन. राय और रामचरण लाल शर्मा विदेश में थे, अतः पकड़ में नहीं आये।
चेट्टियार अत्यधिक बीमार थे, अतः उनके विरुद्ध मुकदमा नहीं चलाया गया। गुलाम हुसैन सरकारी गवाह बन गये। शेष चार अभियुक्तों- एस. ए. डांगे, मुजफ्फर अहमद, नलिनी गुप्ता तथा शौकत उस्मानी को चार-चार साल का कठोर कारावास हुआ। इन लोगों के विरुद्ध मुख्य रूप से दो आरोप लगाये गये-
(1.) इन लोगों के माध्यम से कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल, भारत में अपनी शाखा स्थापित करने का प्रयास कर रहा था।
(2.) ये लोग मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना का प्रयास कर रहे थे।
न्यायालय में हुई बहस में यह भी कहा गया कि कम्युनिस्ट, भारत से ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए ही मजदूरों को संगठित कर रहे हैं तथा कांग्रेस के अन्दर से गरम दल और राष्ट्रवादी नेता, क्रांतिकारियों का साथ दे रहे हैं। देश-विदेश के समाचार पत्रों में इस अभियोग की बहुत चर्चा हुई।
सरकार ने कम्युनिस्ट नेताओं को बंदी बनाकर लोगों में भय पैदा करने का प्रयास किया ताकि लोग कम्युनिस्ट पार्टी से दूर रहें परन्तु सरकार के इस प्रयास का परिणाम उल्टा हुआ तथा आम-जन कम्युनिस्टों के कार्य कलापों में पहले से अधिक रुचि लेने लगा।
भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना का उद्देश्य, सम्पूर्ण स्वराज्य को प्राप्त करना और एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जिसमें उत्पादन और धन के वितरण पर सामूहिक स्वामित्व हो।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
कानपुर षड़यन्त्र केस के कुछ दिनों बाद ही संयुक्त प्रांत में सक्रिय साम्यवादी समूह के नेता सत्यभक्त ने 1 सितम्बर 1924 को कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। इस पार्टी का उद्देश्य, सम्पूर्ण स्वराज्य को प्राप्त करना और एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जिसमें उत्पादन और धन के वितरण पर सामूहिक स्वामित्व हो। पार्टी का एक तदर्थ संविधान भी तैयार किया गया। इस पार्टी का कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से कोई सम्बन्ध नहीं था। 1925 ई. तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की संख्या 250 तक पहुँच गयी।
कानुपर की साम्यवादी कान्फ्रेन्स
इसी पार्टी के तत्त्वावधान में दिसम्बर 1924 के अन्तिम सप्ताह में कानुपर में पहली साम्यवादी कान्फ्रेन्स हुई जिसमें एस. वी. घाटे, जागेलेकर, नाग्बियार, शम्शुद्दीन हसन, चेट्टियार, मुजफ्फर अहमद आदि अनेक प्रमुख कम्युनिस्टों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में सत्यभक्त की कड़ी आलोचना की गई क्योंकि उन्होंने अपनी पार्टी को राष्ट्रवादी पार्टी घोषित किया था तथा कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से किसी प्रकार का सम्पर्क नहीं रखा था।
अन्य कम्युनिस्टों का तर्क था कि कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के नियमानुसार पार्टी का नाम भारत की कम्युनिस्ट पार्टी होना चाहिए न कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, और उसे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के निर्देशानुसार कार्य करना चाहिए। सत्यभक्त अल्पमत में पड़ गये, अतः उन्होंने पार्टी तथा राजनीति, दोनों को छोड़ दिया।
कानुपर सम्मेलन दो दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण था-
(1.) कम्युनिस्ट आंदोलन को सत्यभक्त जैसे राष्ट्रवादी आदमी के हाथों में पड़ने से बचा लिया गया जो एक ऐसी कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण का विचार प्रस्तुत कर रहा था जो राष्ट्रीय हो और जिसका कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के साथ कोई सम्पर्क न हो।
(2.) भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन, समूहों के निर्माण की अवस्था से निकलकर, नियमित रूप से कार्य करने वाली अखिल भारतीय पार्टी की अवस्था में पहुँच गया।
भारत की कम्यूनिस्ट पार्टीकी स्थापना
कानपुर कान्फ्रेंस में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के समर्थक साम्यवादियों का दबदबा रहा और उन्होंने अन्य ग्रुपों को संगठित करके 27 दिसम्बर 1925 को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की घोषणा की। पार्टी की एक केन्द्रीय समिति का भी गठन किया गया जिसमें 30 सदस्यों का प्रावधान था परन्तु उस दिन केवल 16 सदस्य ही चुने गये।
भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की स्थापना ईस्वी 1925 में सुप्रसिद्ध कम्यूनिस्ट नेता एम. एन. रॉय ने की तथा इसके स्थापना सम्मलेन की अध्यक्षता सिंगरावेलु चेट्टियार ने की। इसी सम्मेलन में पार्टी का नया संविधान पारित किया गया तथा विभिन्न पदाधिकारियों की नियुक्ति की गई। बीकानेर के जानकी प्रसाद बगरहट्टा तथा एस. वी. घाटे महासचिव चुने गये। यह निश्चित किया गया कि पार्टी का मुख्यालय अगले वर्ष बम्बई चला जायेगा और घाटे उसका काम संभालेंगे। इस पार्टी के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार से थे-
1. भारत को पूर्ण रूप से स्वतंत्र करवाना।
2. बलपूर्वक आरोपित ब्रिटिश शासन को समाप्त करना।
3. भारत में सोवियत रूस जैसी सरकार की स्थापना करना।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियाँ
मजदूर-किसान पार्टियों का गठन
भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी के लिए संवैधानिक रूप से काम करना संभव नहीं था, इसलिये मजदूरों, किसानों और श्रमजीवी वर्ग के हितों की रक्षा के लिए मजदूर-किसान पार्टियों के गठन का निर्णय लिया गया ताकि उनकी आड़ में, कम्युनिस्ट अपनी गतिविधियाँ चला सकें। मुजफ्फर अहमद के अनुसार मजदूर-किसान पार्टियों के गठन की दिशा में कदम उठाने का श्रेय काजी नजरूल इस्लाम और शम्सुद्दीन को था। कुछ लेखकों के अनुसार इसका श्रेय ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के फिलिप स्पार्ट को है।
बंगाल में लेबर स्वराज पार्टी की स्थापना
बंगाल में सबसे पहली मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना हुई जिसका प्रारम्भिक नाम लेबर स्वराज पार्टी रखा गया। लेबर स्वराज पार्टी ने दिसम्बर 1925 से लांगल नामक पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया। अगस्त 1926 में इस पत्र का नाम बदलकर गनबानी (गणवाणी) किया गया। 1928 ई. में पार्टी का नाम मजदूर-किसान पार्टी किया गया।
बम्बई में कामकरी शेतकरी पार्टी की स्थापना
बम्बई में एस. एस. मीरजकर, ढुंढिराज ठेंगड़ी और उनके साथियों द्वारा मार्च 1927 में कामकरी शेतकरी पार्टी (मजदूर किसान पार्टी) की स्थापना की गई। इस पार्टी का मुखपत्र क्रांति शीर्षक से साप्ताहिक आवृत्ति पर प्रकाशित किया जाता था। इस पार्टी का काम मजदूरों, किसानों और युवकों में प्रगतिशील राजनीतिक विचारों का प्रसार करना था। इस पार्टी ने मजदूरों को संगठित करके कई हड़तालों का संचालन किया। 80,000 सदस्यों वाली गिरनी कामगार यूनियन (लाल झण्डा) इसी पार्टी के सदस्यों द्वारा स्थापित की गई।
पंजाब में किरती-किसान पार्टी की स्थापना
दिसम्बर 1927 में पंजाब में किरती-किसान पार्टी की स्थापना हुई। इस पार्टी में अमृतसर और लाहौर, दोनों क्षेत्रों के कृषक एवं श्रमिक सम्मिलित थे। अब्दुल मजीद तथा सोहनसिंह जोश इस पार्टी के प्रमुख नेता थे। किसरती उनका मुखपत्र था जो पंजाबी और उर्दू, दो भाषाओं में प्रकाशित होता था।
संयुक्त प्रांत में मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना: संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) में 14 अक्टूबर 1928 को मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना हुई। पूरनचन्द जोशी को पार्टी का सचिव चुना गया।
अखिल भारतीय मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना
1928 ई. के मेरठ सम्मेलन में कम्युनिस्टों ने देश भर की मजदूर-किसान पार्टियों के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया। 21-24 दिसम्बर 1928 को कलकत्ता में सोहनसिंह जोश की अध्यक्षता में एक सम्मेलन बुलाया गया। इस सम्मेलन में अखिल भारतीय मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना करने की घोषणा की गई। आर. एस. निंबकर को पार्टी का सचिव बनाया गया और बम्बई में पार्टी का मुख्यालय स्थापित किया गया। पार्टी के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार थे-
(1.) आर्थिक और सामाजिक मुक्ति सहित सम्पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना।
(2.) मजदूरों और किसानों के शक्तिशाली आन्दोलनों को गति प्रदान करना।
(3.) जनसाधारण के आर्थिक एवं राजनीतिक स्तर को उन्नत बनाना।
मेरठ षड़यन्त्र केस
1927-28 ई. में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में देश के विभिन्न हिस्सों में मजदूरों ने अनेक हड़तालें कीं। कम्युनिस्टों की बढ़ती हुई शक्ति से भारत सरकार व भारतीय पूँजीपतियों में घबराहट फैल रही थी। इसलिये अनेक उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह कम्युनिस्टों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करे।
ब्रिटिश नौकरशाही भी इन आंदोलनों को मजबूती से कुचलना चाहती थी। बम्बई तथा कलकत्ता आदि महानगरों में हड़ताली मजदूर बड़ी संख्या में रहते थे। इसलिये निश्चित किया गया कि देश के विभिन्न हिस्सों से कम्युनिस्टों के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार करके मेरठ लाया जाये तथा वहाँ उन पर मुकदमा चलाया जाये।
कुल 32 कम्युनिस्ट नेताओं पर मुकदमा चलाया गया और जानबूझ कर मुकदमे की कार्यवाही को लम्बा खींचा गया। सरकार की इस कार्यवाही से कम्युनिस्ट संगठन कमजोर हो गया, मजदूर आन्दोलन को भारी क्षति पहुँची और मजदूर-किसान पार्टियां विघटित हो गईं।
भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी का नया कार्यक्रम
मेरठ षड़यन्त्र केस से पहले, कम्युनिस्ट नेता, देश के बुर्जुआ राष्ट्रवादियों (दक्षिणपंथी कांग्रेसियों) के साथ मिलकर काम करने में विश्वास रखते थे परन्तु अब उन्होंने अनुभव किया कि भारत में विदेशी सत्ता को बनाये रखने तथा जन आन्दोलन को कमजोर बनाने में देश के व्यापारी, पूँजीपति एवं उद्योगपति किसी से कम नहीं हैं और भारतीय कांग्रेस इन्हीं तत्त्वों के प्रभाव में है।
अतः कम्युनिस्ट नेताओं ने बुर्जुआ राष्ट्रवाद का विरोध करने का कार्यक्रम तैयार किया और सर्वहारा वर्ग की एक मजदूर पार्टी का निर्माण करने का निर्णय लिया। 1929 ई. के अन्त में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का विभाजन हो गया तथा कम्युनिस्ट, इस संगठन से अलग हो गये।
कम्युनिस्टों ने अपना एक नया कार्यक्रम घोषित किया जिसमें बलपूर्वक ब्रिटिश शासन को समाप्त करना, सोवियत रूस की तरह भारत में भी सर्वहारा वर्ग की सरकार बनाना, बड़े-बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करना, देशी रियासतों तथा जमींदारी प्रथा का उन्मूलन करना आदि अनेक कार्यक्रम सम्मिलत थे। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक गुप्त केन्द्रीय संगठन स्थापित करने का निर्णय लिया गया।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन और भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी
12 मार्च 1930 से गांधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ हुआ। गांधीजी के द्वारा चलाये गये पूर्ववर्ती समस्त आंदोलनों की तरह यह आन्दोलन भी विफल रहा। इस आन्दोलन के दौरान कम्युनिस्टों ने रैड ट्रेड यूनियन का गठन किया तथा इसके माध्यम से आन्दोलन को अधिक व्यापक और उग्र बनाने का प्रयास किया।
अपैल 1930 में जी. आई. पी. की हड़ताल, जून, 1930 में शोलापुर का विद्रोह, एक आम राजनीतिक हड़ताल तथा अन्य किसान एवं मजदूर आन्दोलनों का सफल संचालन करके, कम्युनिस्टों ने ब्रिटिश शासन का डटकर मुकाबला किया। मजदूर आन्दोलन में उन्होंने अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके बढ़ते हुए प्रभाव से सरकार चिंतित हो उठी। क्योंकि अधिकांश कम्युनिस्ट नेता जेल में बन्द थे, फिर भी उनका प्रभाव बढ़ता जा रहा था। 1931 ई. में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में 166 हड़तालें हुईं जिनमें हजारों मजदूरों ने भाग लिया। 1934 ई. में 159 हड़तालें हुईं। बम्बई की कपड़ा मिलों में भी मजदूरों ने बड़ी हड़तालें कीं। विस्तृत स्तर पर हो रही हड़तालें और उग्र प्रदर्शन, देश में कम्युनिस्टों के बढ़ते हुए प्रभाव के स्पष्ट संकेत थे।
सरकार द्वारा कम्युनिस्ट आंदोलन को कुचलने के प्रयास
ब्रिटिश सरकार ने कम्युनिस्टों के बढ़ते हुए प्रभाव को समाप्त करने के लिए कई कदम उठाये। रैड ट्रेड यूनियन तथा कांग्रेस से सम्बद्ध मजदूर यूनियनों के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। मजदूरों के जुलूसों तथा सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 23 जुलाई 1934 को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।
कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध अन्य संगठनों को भी गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। विदेशों से आने वाले कम्युनिस्ट साहित्य पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। सरकार को आशा थी कि इन कदमों से कम्युनिस्टों की गतिविधियों पर अंकुश लगेगा और वे प्रभावहीन हो जायेंगे परन्तु इन प्रतिबन्धों के उपरान्त भी कम्युनिस्टों ने हिम्मत नहीं हारी और उनकी गुप्त गतिविधियाँ जारी रहीं।
संयुक्त मोर्चे का गठन
1935 ई. में सातवीं कम्युनिस्ट इंटरनेशनल का आयोजन हुआ। इसमें भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को सुझाव दिया गया कि वह साम्राज्यवाद विरोधी मोर्चा गठित करे। रजनी पामदत्त, ब्राडले और रूसी प्रतिनिधि दिमित्रोव ने भी भारत में एक संयुक्त मोर्चे की स्थापना की आवश्यकता जताई ताकि भारत के कम्युनिस्ट, उसकी ओट में पुनः अपना प्रभाव बढ़ा सकें।
इसलिये भारत के कम्युनिस्टों ने कांग्रेस के भीतर काम कर रहे कांग्रेस समाजवादी दल के साथ गठजोड़ कर लिया। कांग्रेस समाजवादी दल भी वामपंथी शक्तियों की एकता का समर्थक था इसलिये उसने 1936 ई. में कम्युनिस्टों को कांग्रेस समाजवादी दल में सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया। कम्युनिस्टों ने इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। वे कांग्रेस समाजवादी दल के सदस्य बन गये परन्तु उन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान को भी बनाये रखा।
अन्य कम्युनिस्ट संस्थाओं की स्थापना
संयुक्त मोर्चे की स्थापना के फलस्वरूप अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस भी पुनः शक्तिशाली बन गई। 1936 ई. में स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में अखिल भारतीय किसान सभा का निर्माण हुआ। उसी वर्ष अखिल भारतीय छात्र यूनियन अस्तित्त्व में आई। भारत के लेखकों एवं साहित्यकारों ने मुंशी प्रेमचन्द की अध्यक्षता में एक अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना कर ली।
संयुक्त मोर्चे की स्थापना से भारतीय कांग्रेस की नीतियों में बदलाव आया। उसने किसानों की समस्याओं एवं उनके संगठनों की तरफ अधिक ध्यान देना आरम्भ किया। इससे किसान संगठनों की शक्ति का विकास हुआ। 1936 ई. के फैजपुर सम्मेलन में जहाँ 20,000 किसानों ने भाग लिया था, वहीं 1938 ई. में किसान सभा के सदस्यों की संख्या पांच लाख को पार कर गई। संयुक्त मोर्चे की स्थापना के बाद मजदूर संघों की संख्या में भी आशातीत वृद्धि हुई। श्रमिक वर्ग अपनी राष्ट्रव्यापी हड़तालों के माध्यम से अपनी अधिकांश मांगे मनवाने में सफल रहा।
संयुक्त मोर्चे का पतन
संयुक्त मोर्चा अस्थायी सिद्ध हुआ। कांग्रेस समाजवादी दल का दक्षिणपंथी गुट, कांग्रेस समाजवादी दल में कम्युनिस्टों के बढ़ते हुए प्रभाव से चिंतित हो उठा। इस गुट ने धमकी दी कि यदि कम्युनिस्टों को नियंत्रित नहीं किया गया तो वे दल से अलग हो जायेंगे।
जब धमकी का असर नहीं हुआ तो जुलाई 1939 में मीनू मसानी, अशोक मेहता, राममनोहर लोहिया तथा अच्युत पटवर्धन आदि नेताओं ने कांग्रेस समाजवादी दल को छोड़ दिया। इस प्रकार संयुक्त मोर्चे में दरार पड़ गई।
1940 ई. में कांग्रेस समाजवादी दल ने कम्युनिस्टों को पार्टी से बाहर निकाल दिया परन्तु समाजवादियों के इस कदम का, उनकी अपनी पार्टी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। संयुक्त मोर्चे के अधिकांश नेता एवं कार्यकर्ता कम्युनिस्ट खेमे में चले गये। दक्षिण भारत से तो कांग्रेस समाजवादी दल का पूरा सफाया हो गया। संयुक्त मोर्चे का भी पतन हो गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध और भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, सोवियत रूस के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से प्रभावित होती थी। विश्व युद्ध के प्रारम्भ में सोवियत रूस ने जर्मनी के साथ अनाक्रमण समझौता कर रखा था। अतः भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने इस विश्व युद्ध को साम्राज्यवादी युद्ध घोषित करते हुए राष्ट्रीय आन्दोलन को तेज करने तथा ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की अपील की।
यद्यपि कांग्रेस समाजवादी दल और सुभाषचन्द्र बोस का नवोदित फॉरवर्ड ब्लॉक भी विश्व युद्ध में अँग्रेजों को सहयोग देने के विरुद्ध थे परन्तु कम्युनिस्ट पार्टी चाहती थी कि साम्राज्यवादी युद्ध को राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध में बदल दिया जाये। इसी उद्देश्य से कम्युनिस्टों ने 1940 ई. में अनेक मिलों में हड़तालें करवाईं तथा सरकार के युद्ध समर्थक प्रयासों को विफल बनाने का प्रयास किया। इसलिये भारत सरकार ने प्रमुख कम्युनिस्ट नेताओं को बन्दी बना लिया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 480 मुख्य कम्युनिस्ट नेताओं को बन्दी बनया गया।
जब जून 1941 में जर्मनी ने सोवियत रूस पर अचानक आक्रमण कर दिया तो विवश होकर सोवियत रूस को मित्र राष्ट्रों (साम्राज्यवादियों) के गुट में सम्मिलित होना पड़ा। रूस के पासा पलटते ही भारतीय कम्युनिस्टों का दृष्टिाकोण बदल गया। जिस विश्व युद्ध को वे साम्राज्यवादियों का युद्ध कहकर उसका विरोध कर रहे थे, उसी को अब लोक युद्ध (जनता का युद्ध) कहकर उसका समर्थन करने लगे और साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार को हर सम्भव सहयोग देने की अपील करने लगे। ब्रिटिश सरकार ने भी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से समस्त प्रतिबन्ध हटा लिये और कम्युनिस्ट नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को जेलों से रिहा कर दिया।
भारत छोड़ो आन्दोलन और भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी
अगस्त 1942 में कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी से भारत छोड़ो आन्दोलन भड़क उठा। इस समय द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था तथा रूस, ब्रिटेन आदि साम्राज्यवादी देशों के गुट में था। इसलिये कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया और मजदूरों से अपील की कि वे हड़तालों आदि में भाग न लें तथा युद्धोपयोगी सामग्री के उत्पादन में कमी न आने दें।
बिटिश सरकार की स्थिति को मजबूत बनाने की दृष्टि से कम्युनिस्टों ने कालाबाजारी, सूदखोरी, जमाखोरी एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन चलाये। पार्टी ने युद्धकाल में अपने विचारों का प्रचार करने के लिए पीपल्स वार शीर्षक से एक पत्रिका भी आरम्भ की। इस अवधि में कम्युनिस्टों को भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ जिसका उन्होंने पूरा-पूरा लाभ उठाया।
कम्युनिस्टों द्वारा भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किये जाने के कारण, कांग्रेसी नेता कम्युनिस्ट पार्टी से नाराज हो गये और दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद कांग्रेस ने कम्युनिस्टों को कांग्रंेस के समस्त निर्वाचित पदों से हटा दिया। इस प्रकार कम्युनिस्ट पूरी तरह से कांग्रेस से अलग हो गये।
युद्ध के बाद की घटनाएँ
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1945-46 ई. में भारत सरकार ने दिल्ली के लाल किले में आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों के विरुद्ध मुकदमा चलाया। पूरे देश में सरकार के इस कृत्य का विरोध हुआ और आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों की रिहाई की मांग हुई। कम्युनिस्ट पार्टी ने भी बन्दियों की रिहाई के समर्थन में प्रदर्शन किये।
20 जनवरी 1946 को कराची के वायु सैनिकों ने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के समर्थन में हड़तील की। फरवरी 1946 में बम्बई के बन्दरगाह पर खड़े तलवार जहाज के नाविकों ने विद्रोह किया जो कराची बन्दरगाह में भी फैल गया। कम्युनिस्टों ने विद्रोही नौ-सैनिकों के पक्ष में हड़ताल तथा प्रदर्शन का आयोजन किया।
सरकार ने आंदोलनकारियों के विरुद्ध हिंसा का सहारा लिया। तीन दिन चले इस आन्दोलन में 250 लोग मारे गये। नौ-सैनिक विद्रोह का भारत सरकार एवं ब्रिटिश साम्राज्यवादियों पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। सशस्त्र सेना द्वारा जनता के पक्ष में आ जाने से भारत सरकार में घबराहट चरम पर पहुँच गई।
इस अवधि में देशी रियासतों में भी जन-आन्दोलनों का दबाव बढ़ने लगा। जनता, देशी राजाओं से उत्तरदायी शासन की स्थापना करने की मांग करने लगी। कम्युनिस्ट पार्टी ने रियासती जन-आन्दोलनों को पूरा समर्थन दिया और ट्रावनकोर के महाराजा के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष में भाग लिया जिसमें 400 कम्युनिस्टों की जान चली गई।
उड़ीसा और पंजाब की रियासतों में भी इसी तरह के संघर्ष हुए। उन संघर्षों में भी कम्युनिस्टों ने भाग लिया। हैदराबाद रियासत के निरंकुश शासन के विरुद्ध, तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष चला जिसमें कम्युनिस्टों ने मुख्य भूमिका निभाई। इस आन्दोलन में लगभग 4000 कम्युनिस्ट मारे गये।
मार्च 1946 में नियंत्रित मताधिकार के आधार पर विधान मण्डलों के चुनाव सम्पन्न हुए। कम्युनिस्ट पार्टी ने भी चुनावों में भाग लिया परन्तु उसे केवल 9 स्थान मिले। इन चुनावों में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने पहली बार अपने बल पर, अपने झण्डे के नीचे, चुनाव लड़े।
इस प्रकार भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रीय आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा पार्टी ने भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता का नारा दिया। किसानों एवं मजदूरों में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करके उन्हें संगठित किया तथा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा एवं शक्ति दी।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने ई.1939 में कांग्रेस के अन्दर ही फॉरवर्ड ब्लॉक नामक प्रगतिशील पार्टी की स्थापना की जिसके झण्डे के नीचे समस्त वामपंथी तत्त्व एकत्र हो सकें। कांग्रेस के दक्षिण पंथी नेताओं ने इस पार्टी की स्थापना का विरोध नहीं किया।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की पृष्ठभूमि
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का झुकाव आरम्भ से ही कांग्रेस के वामपंथी तत्त्वों के साथ रहा। वे युवा, संघर्ष-प्रिय, प्रगतिशील एवं वामपंथी गुट के प्रखर पक्षधर थे। उन्होंने नेहरू के साथ मिलकर 1927 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में सर्वप्रथम सम्पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखा, जो गांधी के विरोध के उपरान्त भी पारित हो गया।
इस अवसर पर बोस को कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में लिया गया। गांधीजी को यह पसन्द नहीं आया और नवम्बर 1928 में कलकत्ता कांग्रेस के दौरान गांधीजी ने डोमिनियन स्टेट्स (औपनिवेशिक दर्जा) से सम्बन्धित प्रस्ताव पारित करवाया। अगले ही वर्ष लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में अधिक-से-अधिक वामपंथी तत्त्वों को संगठनात्मक दायित्वों से हटा दिया गया जिनमें सुभाषचन्द्र बोस भी थे। इस प्रकार, कांग्रेस में गांधी और सुभाषचन्द्र बोस के बीच अन्तर्विरोध बढ़ने लगा।
1934 ई. में कांग्रेस के दक्षिणपंथी नेतृत्व से खिन्न कांग्रेसियों ने, कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना की। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने स्वयं को इस दल से सम्बद्ध नहीं किया किंतु वे प्रकट रूप से इस पार्टी की नीतियों का समर्थन करते थे। 1938 ई. में सुभाषचंद्र बोस को हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया।
1939 ई. में सुभाषचंद्र बोस पुनः कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए खड़े किये गये जबकि गांधीजी तथा उनके अनुयायी सुभाषचंद्र के पक्ष में नहीं थे। गांधीजी ने पट्टाभि सीतारमैया को सुभाष बाबू के सामने खड़ा कर दिया। सुभाष का कहना था कि दक्षिणपंथी नेतृत्व की समझौतावादी नीति का विरोध करने के लिए मेरा चुनाव लड़ना आवश्यक है।
इस प्रकार ये चुनाव गांधी और सुभाष के बीच प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गये। चुनाव परिणाम सुभाष बाबू के पक्ष में रहा और पट्टाभि सीतारमैया हार गये। गांधीजी ने तिलमिलाकर घोषणा की कि यह मेरी हार है। संयम का पाठ पढ़ाने वाले गांधीजी इस हार में अपना संयम खो बैठे और उन्होंने कांग्रेस में बगावत खड़ी कर दी।
गांधीजी के कहने पर कार्यसमिति के 15 सदस्यों ने कार्यसमिति से त्यागपत्र दे दिया। सुभाष बाबू ने कांग्रेस का विघटन रोकने का प्रयास किया परन्तु गांधीजी तथा उनके समर्थकों ने सुभाष से नाता तोड़ने का निर्णय कर लिया। सुभाष ने कांग्रेस को टूटने से बचाने के लिये अध्यक्ष पद त्याग दिया। दक्षिणपंथियों ने तत्काल डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को नया अध्यक्ष चुन लिया।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
सुभाषचन्द्र बोस ने कांग्रेस के अन्दर ही एक ऐसी प्रगतिशील पार्टी की स्थापना करने का निश्चय किया जिसके झण्डे के नीचे समस्त वामपंथी तत्त्व एकत्र हो सकें। यह पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से गठित हुई। दक्षिणपंथियों ने इसकी स्थापना को लेकर कोई विवाद खड़ा नहीं किया। फॉरवर्ड ब्लॉक के तीन प्रमुख उद्देश्य थे-
(1.) भारत की आजादी के लिये तेजी से कार्य करना।
(2.) कांग्रेस पर से गांधी गुट का नेतृत्व हटाना।
(3.) दक्षिणपंथी नेताओं की समझौतावादी नीति का कड़ा विरोध करना।
फॉरवर्ड ब्लॉक के विरुद्ध कार्यवाही
सुभाषचन्द्र बोस का कहना था- ‘फॉरवर्ड ब्लॉक, श्री गांधी के व्यक्तित्व और अहिंसात्मक असहयोग के सिद्धान्त को पूरा सम्मान देती है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि कांग्रेस के मौजूदा हाईकमान में भी अपनी निष्ठा बनाये रखे।’
इस पर कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सुभाष के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए उन्हें समस्त पदों से हटा दिया और मात्र चार-आने का सामान्य सदस्य रहने दिया। वामपंथी तत्त्वों ने भी फॉरवर्ड ब्लॉक की आलोचना की, क्योंकि वे इसकी स्थापना के पीछे सुभाष बाबू के व्यक्तिगत कारण मानते थे।
वास्तविकता यह थी कि न तो गांधी के दक्षिणपंथी चेले, न जयप्रकाश नारायण के समाजवादी चेले और न रूस के पिछलग्गू वामपंथी चेले, सुभाषचंद्र बोस जैसे प्रखर नेता के नेतृत्व को उभरते हुए देखाना चाहते थे। वास्तविकता यह भी थी कि कांग्रेस के नेताओं को लगता था कि द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अँग्रेज भारत को आजाद कर देंगे।
कांग्रेस का कोई भी धड़ा नहीं चाहता था कि आजादी की लड़ाई जीतने का श्रेय किसी भी कीमत पर कोई और ले जाये। कम से कम, सुभाष बाबू तो कतई नहीं। अतः फॉरवर्ड ब्लॉक अलग-थलग पड़ गया परन्तु सुभाष और उनके साथी डटे रहे।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान फॉरवर्ड ब्लॉक ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। अतः भारत सरकार ने फॉरवर्ड ब्लॉक को असंवैधानिक घोषित कर दिया। सुभाषचंद्र बोस तथा उनके साथियों को जेलों में डाल दिया गया। सुभाष बाबू ने जेल में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल आरम्भ कर दी।
कुछ दिनों बाद उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। तब सरकार ने उन्हें जेल से रिहा करके उनके ही घर में नजरबन्द करके रखा। सुभाष वहाँ भी नहीं टिके और एक रात्रि में गुप्त रूप से घर से निकल गये। वे भारत छोड़कर चले गये। उन्हें हर हाल में देश को स्वतंत्र कराना था। सुभाष बाबू के भारत से चले जाने के बाद कांग्रेस के दक्षिणपंथी एवं वामपंथी नेताओं ने राहत की सांस ली तथा फॉरवर्ड ब्लॉक नेतृत्वहीन हो गया।
1946 ई. में फॉरवर्ड ब्लॉक की कार्यकारिणी की बैठक बम्बई में सम्पन्न हुई जिसमें फॉरवर्ड ब्लॉक को एक समाजवादी पार्टी बतलाया गया और वर्ग-संघर्ष की अवधारणा को इसका आधार माना गया परन्तु सुभाष द्वारा स्थापित फॉरवर्ड ब्लॉक, इस परिभाषा से मेल नहीं खाता था।
सुभाष बाबू ने स्पष्ट कहा था कि फॉरवर्ड ब्लॉक, कांग्रेस के अभिन्न अंग के रूप में काम करेगा तथा कांग्रेस की संस्कृति, नीति एवं कार्यक्रमों को नहीं त्यागेगा। वह गांधी में भले ही विश्वास न रखे किंतु गांधी के अहिंसात्मक असहयोग के राजनीतिक सिद्धान्त में अटूट विश्वास रखेगा।
अन्य वामपंथी पार्टियाँ
असहयोग आन्दोलन के दौरान, अनेक अतिवादियों एवं क्रांतिकारियों ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। इनमें से अधिकांश मार्क्स की विचारधारा से प्रभावित थे। सविनय अवज्ञा आन्दोलन की वापसी के बाद कांग्रेस के अन्दर विभिन्न गुट उभरने लगे।
कांग्रेस समाजवादी दल के अतिरिक्त अन्य विचारधारा वाले लोग या तो स्वेच्छा से कांग्रेस से अलग हो गये अथवा अलग कर दिये गये। इन लोगों ने विभिन्न वामपंथी दलों की स्थापना की। ये समस्त दल, मार्क्सवाद के सिद्धांतों पर आधारित थे। यद्यपि ये दल राष्ट्रीय आन्दोलन में कोई विशेष भूमिका नहीं निभा पाये तथापि उनके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।
भारतीय क्रांतिकारी साम्यवादी दल
सौम्येन्द्र नाथ टैगोर कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्त्ता थे और उन्होंने असहयोग आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी परन्तु जब गांधीजी ने आन्दोलन को अचानक स्थगित कर दिया तो उनका कांग्रेस से मोह भंग हो गया। वे साम्यवादी विचारधारा की तरफ मुड़ गये। 1927 ई. में सौम्येन्द्र नाथ, बंगाल मजदूर-किसान पार्टी के प्रमुख नेता बन चुके थे।
इसी हैसियत से वे मास्को गये तथा इण्टरनेशनल कम्युनिस्ट नेतृत्व को भारत में साम्यवादी आन्दोलन की स्थितियों से अवगत कराया। सौम्येन्द्र चाहते थे कि रूसी नेतृत्व मजदूर-किसान पार्टी को मान्यता प्रदान करे ताकि किसानों और मजदूरों में साम्यवादी आन्दोलन का अधिक प्रचार-प्रसार हो सके परन्तु सोवियत नेतृत्व उस समय औपनिवेशिक देशों में इस प्रकार की पृथक पार्टियों के निर्माण के पक्ष में नहीं था।
जब भारतीय कम्युनिस्टों ने कांग्रेस में प्रवेश करने का निश्चय कर लिया तो सौम्येन्द्र टैगोर ने कम्युनिस्टों से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया।
आगामी कुछ वर्षों तक सौम्येन्द्र ने संयुक्त मोर्चा गठित करने वाली समस्त पार्टियों एवं गुटों के विरुद्ध संघर्ष चलाया। उनका मानना था कि साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी आन्दोलन तभी सफल होगा जब इसका नेतृत्व सही अर्थों में सर्वहारा वर्ग के हाथों में होगा। वे हिंसात्मक कार्यवाहियों को अनुचित नहीं मानते थे। 1942 ई. में सौम्येन्द्र ने भारतीय क्रांतिकारी साम्यवादी दल की स्थापना की।
पार्टी ने द्वितीय विश्व युद्ध को साम्राज्यवादी युद्ध घोषित किया तथा भारतीयों से भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त करने के लिये संघर्ष करने का आह्नान किया। अन्य वामपंथी दलों की भांति इस पार्टी ने भी क्रिप्स योजना का घोर विरोध किया परन्तु वामपंथी दलों की नीति से उलट, भारत छोड़ो आन्दोलन को पूर्ण समर्थन दिया एवं उसमें सक्रिय सहयोग दिया।
क्रांतिकारी समाजवादी दल
बारीन्द्र घोष तथा भूपेन्द्र के नेतृत्व में बंगाल के क्रांतिकारियों ने अनुशीलन समिति नामक संस्था स्थापित की थी। 1924 ई. में कुछ क्रांतिकारियों ने इस संस्था को पुनर्गठित करके हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी का गठन किया। नई संस्था का उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत में ‘संयुक्त राज्य संघीय गणतंत्र’ की स्थापना करना था।
अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संस्था ने हर सम्भव विधि से अस्त्र-शस्त्र तथा धन जुटाना आरम्भ किया। योगेश चटर्जी इस संस्था के मुख्य कार्यकर्ता थे। बिहार, संयुक्त प्रदेश, पंजाब तथा दिल्ली में भी पार्टी के घटक सक्रिय थे परन्तु इसका संगठन काफी शिथिल रहा।
1930 ई. में चटगांव आर्मरी रेड के दौरान इस संस्था के अनेक कार्यकर्त्ता बंदी बना लिये गये और उन्हें लम्बी सजाएं दी गईं। जेल में रहते हुए वे लोग मार्क्सवादी साहित्य एवं समाजवादी विचारधारा के सम्पर्क में आये। 1937 ई. में इस संस्था के समस्त कार्यकर्त्ताओं को रिहा कर दिया गया।
1940 ई. में उन लोगों ने मिलकर क्रांतिकारी समजावादी दल की स्थापना की परंतु यह निर्णय लिया गया कि पार्टी कांग्रेस समाजवादी दल के अंदर रहते हुए कार्य करेगी। कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में क्रांतिकारी समाजवादियों ने गांधी-बोस विवाद में बोस का साथ दिया जबकि कांग्रेस समाजवादियों ने परोक्ष रूप से गांधी का समर्थन किया।
इस कारण दोनों में वैमनस्य उत्पन्न हो गया और क्रांतिकारी समाजवादी दल ने कांग्रेस समाजवादी दल से सम्बन्ध तोड़ लिया। इस दल ने विश्वयुद्ध के दौरान अलग पहचान बनाये रखी और सोवियत रूस का अंधानुकरण न करके ब्रिटिश साम्राज्यवादी विरोधी रुख पर स्थिर रहा। इस दल ने भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया।
भारतीय बोलशेविक पार्टी
बंगाल की लेबर पार्टी का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए प्रयास करना तथा भारतीय सामाज को वर्ग-संघर्ष से बचाना था। यद्यपि लेबर पार्टी कम्युनिस्टों से सम्बद्ध थी तथापि कुछ मुद्दों पर वह, कम्युनिस्टों की घोर विरोधी थी। त्रिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के दौरान लेबर पार्टी ने सुभाषचंद्र बोस का समर्थन किया।
जबकि कम्युनिस्टों ने बोस को समर्थन नहीं दिया। इस बात पर लेबर पार्टी का कम्युनिस्टों से मोह भंग हो गया और 1939 ई. में एन. दत्त मजूमदार, अजीत राय, शिशिर राय आदि सदस्यों ने भारतीय लेबर पार्टी छोड़कर, भारतीय बोलशेविक पार्टी की स्थापना की। बोलशेविक पार्टी, साम्राज्यवाद विरोधी पार्टी थी।
द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारम्भ में इस पार्टी ने साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलन को सहयोग दिया परन्तु जब सोवियत संघ, मित्र राष्ट्रों के खेमे में आ गया तो बोलशेविक पार्टी का दृष्टिकोण बदल गया।
अब उसने द्वितीय विश्वयुद्ध को साम्राज्यवादियों का युद्ध न कहकर लोक युद्ध कहना आरम्भ कर दिया और जनता से अपील की कि ब्रिटिश सरकार को हर सम्भव सहायता प्रदान की जाये ताकि फासिस्ट शक्तियों को परास्त किया जा सके। जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया तो इस पार्टी ने आन्दोलन को तुरन्त स्थगित करने की मांग की।
इसी प्रकार, बोलशेविक-लेनिनिस्ट पार्टी और दी रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी आदि संगठन भी अस्तित्त्व में आये। इनमें से अधिकांश ने काग्रेस के अन्दर रहते हुए कार्य करना पसन्द किया। ये लोग, कांग्रेस को अपनी विचारधारा के अनुरूप ढालना चाहते थे परन्तु ऐसा नहीं हो सका।
औद्योगिक श्रमिक वर्ग में असंतोष ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासकों द्वारा लम्बे समय तक किए गए शोषण के विरोध में उत्पन्न हुआ था। श्रमिक वर्ग में असंतोष के कारण हड़तालों की शुरुआत हुई।
भारत में 1835 ई. तक चाय बागान श्रमिक अस्तित्व में आ चुके थे फिर भी यह माना जा सकता है कि भारत में औद्योगिक मजदूरों का वर्ग 1850-55 ई. की अवधि में उस समय अस्तित्व में आया, जब देश में पहली कपड़ा मिल खुली, पहली चटकल खुली, पहली रेल चली तथा खानों से बड़ी मात्रा में कोयला निकालना आरम्भ हुआ।
जैसे-जैसे मजदूरों की संख्या बढ़ी, उन्हें संगठित होने की आवश्यकता अनुभव हुई और देश में मजदूर संगठनों की स्थापना हुई तथा उनके उदय के साथ ही भारत में मजदूर आंदोलन भी उठ खड़े हुए।
रजनी पामदत्त के अनुसार- ‘भारत में मजूदर आन्दोलन की शुरुआत लगभग 50 साल पहले हुई किन्तु संगठित आन्दोलन के रूप में उसका इतिहास, प्रथम विश्व युद्ध के बाद आरम्भ होता है।’
भारत में औद्योगिक क्रांति
1850-59 ई. का दशक, भारत में औद्योगिक क्रांति का प्रारम्भिक काल था। इस अवधि में भारत में रेल आई तथा बंगाल, बम्बई एवं अन्य राज्यों में कोयला खनन, जूट और सूती कपड़ा निर्माण के बड़े उद्योग आरम्भ हुए। भारत में इन उद्योगों का आरम्भ, पूँजीवादी इंग्लैण्ड को लाभ पहुँचाने के लिये किया गया था।
इंग्लैण्ड की मिलों को कच्चे माल की आवश्यकता थी। भारत में कच्चा माल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था किंतु कच्चे माल वाले क्षेत्रों को आपस में जोड़ना आवश्यक था ताकि कच्चे माल के विशाल भण्डारों को मैदानों से बंदरगाहों तक सरलता से ले जाया जा सके।
इस कारण भारत में कच्चा माल ढोने के लिये रेलों का और रेलों को चलाने के लिये कोयला-खनन उद्योग का तेजी से विकास हुआ। भारत के औद्योगिक विकास के प्रथम चरण में जो उद्योग अस्तित्त्व में आये उनकी स्थापना यूरोपीय उद्योगपतियों ने की क्योंकि भारतीय वैश्य, सदियों से व्यापारी और साहूकार के रूप में काम कर रहे थे।
वे इतने बड़े पूँजीपति नहीं थे जो उद्योगों में पूंजी निवेश कर सकें परन्तु धीरे-धीरे भारतीय वैश्य भी उद्योगों की स्थापना के लिये आगे आये। इन्हीं उद्योगों के साथ श्रमिक शक्ति का उदय हुआ। लगभग 50-60 वर्षों तक भारत में औद्योगिकीकरण रेलवे, कोयला-खनन, जूट तथा कपड़ा उद्योग तक सीमित रहा।
औद्योगिक श्रमिकोंकी संख्या में वृद्धि
19वीं सदी के अन्त तक कुछ प्रमुख क्षेत्रों- रेलवे, कोयला खनन, जूट तथा कपड़ा आदि का औद्योगिकीकरण हो चुका था। उद्योगों के विस्तार के साथ-साथ मजदूरों की संख्या में भी वृद्धि होती जा रही थी। उस समय के भारतीय मजदूर वर्ग की संख्या का अनुमान लगाना कठिन है क्योंकि सम्पत्ति-विहीन, सर्वहारा श्रमजीवियों की संख्या अत्यधिक थी जबकि आधुनिक ढंग के उद्योगों में काम करने वाले औद्योगिक मजदूरों की संख्या अत्यल्प थी।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1884 ई. में भारत में 815 कारखाने थे जिनमें 3,49,810 मजूदर काम करते थे। 1902 ई. में 1533 कारखानों में 5,41,634 मजदूर और 1914 ई. में 2,936 कारखानों में 9,50,973 मजदूर कार्यरत थे। फैक्ट्री एक्ट के अंतर्गत वे कारखाने आते थे जिनमें भाप या विद्युत शक्ति से मशीनें चलती थीं और बीस या अधिक मजदूर काम करते थे।
कुछ सूबों में दस या दस से अधिक मजदूरों से काम लेने वाले कारखाने भी फैक्ट्री एक्ट के अन्तर्गत आ जाते थे। इस से कम संख्या में नियोजित श्रमिकों वाले कारखानों के मजदूर औद्योगिक मजदूर नहीं माने जाते थे। जिन उद्योगों में भाप या विद्युत शक्ति का प्रयोग नहीं होता था जैसे कि सिगरेट बनाने के कुछ कारखानों में पचास से भी अधिक मजदूर काम करते थे, औद्योगिक मजदूरों में सम्मिलित नहीं किये जाते थे।
भारत में औद्योगिक श्रमिक वर्ग का उदय एक तरह की सामाजिक क्रांति थी। इस वर्ग का जन्म ग्रामीण बेरोजगारों और ग्रामीण निर्धनों से हुआ था। ये वे लोग थे जो औपनिवेशिक विस्तार के दबाव एवं नवीन सामाजिक प्रणाली के कारण गांवों में बेरोजगार हो जाने के कारण, अपने गांव छोड़कर रोजगार की खोज में निकटवर्ती शहरों में चले आये थे परन्तु वहाँ भी रोजगार के सीमित अवसर उपलब्ध थे। श्रमिकों की उपलब्धता आवश्यकता से अधिक होने के कारण उन्हें बहुत कम पारिश्रमिक पर रखा जाता था। पूँजीपतियों ने इन ग्रामीण मजदूरों का जी-भरकर शोषण किया।
श्रमिक वर्ग की दुर्दशा
नये उद्योगों के खुलने के साथ-साथ मजदूरों की संख्या बढ़ती चली गई परन्तु प्रथम विश्व युद्ध के पहले उसके काम, काम की अवधि, वेतन, रहने के घर आदि की हालत बहुत दयनीय थी। पुरुष एवं महिला श्रमिकों से प्रातः 5 बजे से लेकर रात्रि 10 बजे तक काम लिया जाता था। 6-7 साल के लड़के-लड़कियों से भी 13-14 घंटे काम लिया जाता था।
इतनी कड़ी और लम्बी मेहनत के कारण अधिकतर मजदूर कम आयु में ही बीमार होकर मर जाते थे अथवा काम करने की क्षमता से हाथ धो बैठते थे। उनका उपचार नहीं करवाया जाता था तथा उनके स्थान पर तुरन्त नये मजदूर भर्ती कर लिये जाते थे। मजदूरों को कितना वेतन मिलता था, इसका सही विवरण नहीं मिलता।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1892 ई. में पुरुषों को 12 रुपये, औरतों को 9 रुपये तथा बच्चों को 6 रुपये मासिक मजदूरी मिलती थी। ये आंकड़े सही नहीं माने जा सकते। वास्तविक पारिश्रमिक इससे काफी कम था। इस पर भी, प्रतिदिन काम नहीं मिल पाता था। पारिश्रमिक तय करने के बाद भी, काम को खराब बताकर, या कम बताकर या अन्य बहाने बनाकर पारिश्रमिक काट लिया जाता था।
1928 ई. में ब्रिटेन की ट्रेड यूनियन कांग्रेस के प्रतिनिधि मण्डल ने भारत के कारखानों का दौरा किया तथा भारत के मजदूरों की हालत के बारे में कहा- ‘सारी-जांच पड़ताल से यही पता चलता है कि भारत के अधिकतर मजदूरों को एक शिलिंग रोज से ज्यादा नहीं मिलता।’
प्रतिनिधि मण्डल ने मजदूरों के निवास स्थानों के बारे में लिखा- ‘हम लोग जहाँ भी ठहरे, वहाँ मजदूर-बस्तियों को देखने अवश्य गये और यदि हम उनको न देखते, तो हमें कभी यह विश्वास नहीं होता कि दुनिया के पर्दे पर इतनी गन्दे स्थान भी हैं।’
बीमारी, बेकारी, वृद्धावस्था और मृत्यु के समय मजदूरों की सहायता करने का कोई प्रबन्ध नहीं था। 1931 ई. की जनगणना रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के सबसे बड़े औद्योगिक केन्द्र बम्बई में मजदूर जिस तरह के घरों में रहते हैं, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक की बात है।
1938 ई. में भारतीय मजदूरों के प्रतिनिधि एस. वी. परूलेकर ने जेनेवा में अन्तर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा- ‘भारत में अधिकतर मजदूरों को जितनी मजदूरी मिलती हैं, उससे वे जिन्दगी की मामूली से मामूली जरूरतों को भी पूरा नहीं कर सकते।’
श्रमिक वर्ग के असन्तोष के प्रारम्भिक संकेत
औद्योगिक मजदूर वर्ग लम्बे समय तक शोषण को चुपचाप सहन करता रहा, फिर उनका असन्तोष हड़ताल और प्रदर्शन के रूप में अभिव्यक्त होने लगा। मालिकों द्वारा किये जा रहे शोषण, सरकार और पुलिस के अत्याचार तथा अधिकारियों द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न के विरुद्ध मजूदरों ने अपना असन्तोष असंगठित रूप में व्यक्त करना आरम्भ किया।
मजदूर वर्ग के असन्तोष का पहला प्रभावी संकेत 1877 ई. में देखने को मिला जब मजदूरी की दर के प्रश्न को लेकर नागपुर की एम्प्रेस मिल के मजदूरों ने हड़ताल की। इसके बाद 1882 से 1890 ई. की अवधि में मद्रास प्रेसीडेंसी तथा बम्बई प्रेसीडेंसी में 25 हड़तालें हुईं।
ये समस्त हड़तालें संयोगवश ही हुई थीं जो जुर्माने तथा वेतन में कटौती जैसी शिकायतों को लेकर थीं। ये किसी सुव्यवस्थित योजना का परिणाम नहीं थीं। अभी मजदूर संगठित नहीं हो पाये थे फिर भी, उन्होंने हड़ताल रूपी हथियार का प्रयोग करना सीख लिया था। मिल मालिकों ने मजदूरों की हड़तालों को रोकने के लिए कई कड़े नियम लागू किये।
श्रमिक संघों का उदय
भारत में श्रमिक संघों का उदय कब और किन परिस्थितियों में एवं किन व्यक्तियों के माध्यम से हुआ यह विवादास्पद प्रश्न है। अयोध्यासिंह के अनुसार सबसे पहले बंगाल के ब्रह्म समाजी नेता शशिपद बनर्जी ने नवम्बर 1866 में कलकत्ता के उत्तरी किनारे पर स्थित बरा नगर में मजदूरों की एक सभा की तथा उनकी भलाई के लिए सुरापान निवारणी समिति और आशा बैंक की स्थापना की।
1870 ई. में उन्होंने मजदूरों को संगठित करने के लिए श्रमजीवी समिति की स्थापना की। 1872 ई. में उन्होंने भारत श्रमजीवी नामक मासिक पत्र निकाला। बनर्जी का कार्यक्षेत्र मजदूरों की तकलीफें सुनने तथा मजदूरों और मालिकों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने तक सीमित था।
परम्परागत रूप से माना जाता है कि भारत में मजदूर आन्दोलन का इतिहास 1884 ई. में बम्बई में मजदूरों की एक सभा से आरम्भ हुआ जिसे एन. एम. लोखंडी नामक स्थानीय सम्पादक ने आहूत किया था। इस प्रकार, भारत में श्रमिक संघों का उदय एक गैर-श्रमिक व्यक्ति की पहल पर हुआ।
लोखंडी ने मजदूरों की मांगों का एक आवेदन-पत्र तैयार किया, जो बम्बई के मजदूरों की तरफ से फैक्ट्री कमीशन को दिया जाने वाला था। इस आवेदन पत्र में मांग की गयी कि काम के घंटों पर पाबन्दी लगायी जाये, सप्ताह में एक दिन का अवकाश मिले, दोपहर में खाने-पीने की छुट्टी दी जाये और दुर्घटनाग्रस्त मजदूरों को मुआवजा मिले।
इस आवेदन-पत्र पर लगभग 5 हजार मजदूरों ने हस्ताक्षर किये। लोखंडी स्वयं को बम्बई मिल मजदूर एसोसिएशन का सभापति बताते थे। यद्यपि इस संघ का विधिवत् गठन नहीं हुआ था, तथापि इसका उल्लेख प्रथम मजदूर संगठन के रूप में किया जाता है।
रजनी पामदत्त उपरोक्त विचार से सहमत नहीं हैं। उन्होंने लिखा है-
‘लोखंडे (लोखंडी) का भारत के मजदूर इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है किन्तु यह समझना गलत है कि भारत में मजदूर आन्दोलन लोखंडे के काम से आरम्भ हुआ है। बम्बई मिल मजदूर एसोसिएशन किसी भी अर्थ में मजदूर संगठन नहीं था। उसके न तो सदस्य थे, न कायदे-कानून थे और न ही कोई कोष था। लोखंडे मजदूरों की भलाई चाहने वाले एक परोपकारी वृत्ति के व्यक्ति थे जो मजदूरों के हित में कानून बनवाने का प्रयत्न किया करते थे। वे मजदूरों के संगठन या मजदूरों के संघर्ष का श्रीगणेश करने वाले व्यक्ति नहीं थे।’
मजदूरों के कल्याण की बात को लेकर अन्य संगठन भी बने जैसे- जी. आई. पी. रेलवे सिगनलर्स यूनियन (1896 ई.), एमल्गमेटिड सोसायटी ऑफ रेलवे सर्वेन्ट्स ऑफ इण्डिया एण्ड बर्मा (1897 ई.), वर्किंग मेन्स इंस्टीट्यूशन कलकत्ता (1905 ई.), चटकल यूनियन बंगाल (1906 ई.), ईस्ट इंडिया रेलवे इम्प्लॉइज यूनयिन (1907 ई.), बम्बई की पोस्टल यूनियन (1907 ई.), बम्बई कामगार हितवर्धिनी सभा (1910 ई.) आदि। किसी भी यूनियन ने, यहाँ तक कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी, प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति तक मजदूरों के संघर्ष की कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं की।
मजदूरों में संगठन की कमी रही, फिर भी वे निष्क्रिय नहीं रहे। उस युग के मजदूर जिस तरह संघर्ष में एक-दूसरे का साथ देते थे, और उनमें प्राथमिक ढंग की जो वर्ग-चेतना उत्पन्न हो गयी थी, उसे कम करके नहीं आंकना चाहिए। उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशक की हड़तालें अधिक लम्बी, बड़ी और संगठित थीं। उदाहरण के लिए 1895 ई. में बजबज जूट मिल के मजदूरों की हड़ताल के कारण मिल लगभग 45 दिन बन्द रही। हड़तालियों पर पुलिस ने गोली चलाई जिसमें दो हड़ताली गम्भीर रूप से घायल हुए।
बजबज मिल के डायरेक्टरों ने 1895 ई. में अपनी रिपोर्ट में लिखा- ‘उन्हें इस बात का खेद है कि इस छमाही में मजदूरों ने एक हड़ताल की जिसके कारण मिल 6 हफ्ते तक बन्द पड़ी रही।’ यह अपनी तरह की पहली जोरदार हड़ताल थी।
1897 ई. में जब बम्बई की मिल मालिक एसोसएशन ने मजदूरों को वेतन पर रखने के बजाय ठेके पर रखने का निर्णय किया तो इस निर्णय के विरुद्ध 8000 बुनकरों ने हड़ताल की। 1899 ई. में जी. आई. पी. सी. रेलवे के सिगनल देने वाले मजदूरों की महत्त्वपूर्ण हड़ताल हुई। छोटी-छोटी हड़तालों का क्रम तो चलता ही रहता था।
1882 से 1890 ई. के बीच, बम्बई और मद्रास के विभिन्न कारखानों मे 25 महत्त्वपूर्ण हड़तालें हुईं। छोटी हड़तालें और भी अधिक थीं। ये हड़तालें मजदूरों की एकता और समान उद्देश्यों के लिए संघर्ष की ज्वलन्त उदाहरण हैं। उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि 1880-1908 ई. के मध्य, मजदूर वर्ग शक्तिशाली हो चुका था।
डी. एच. बुकानना ने लिखा है- ‘1880 और 1908 के बीच विभिन्न सरकारी कमीशनों के समक्ष जितनी भी गवाहियाँ आयीं, उनमें में यह बात कही गयी कि मजदूरों की कोई वास्तविक यूनियन नहीं बनी है। फिर भी, बहुत से लोगों ने बताया कि अलग-अलग मिलों के मजदूर अक्सर आपस में एक साथ मिल जाते हैं और एक समूह के रूप में बड़ी आजादी का परिचय देते हैं।’
1892 ई. में बॉयलरों के इन्सपेक्टर ने सरकार को बताया- ‘मजदूरों में एक अजीब एका दिखायी देता है जिसकी न तो कोई लिखा-पढ़ी हुई है और न ही जिसे कोई खास नाम दिया गया है।’
बम्बई के कलक्टर ने सरकार को लिखा- ‘मुझे विश्वास है कि इसी एके के कारण मजदूरों ने बहुत दिनों से अपनी मजदूरी में कोई हेर-फेर नहीं होने दिया।’
इसी प्रकार, बम्बई प्रान्त में उद्योगों के संचालक मि. भरूचा ने कहा था- ‘मालिकों के मुकाबले में मजदूर सर्वशक्तिमान मालूम पड़ता है; और हालांकि उनकी कोई यूनियन नहीं है, मगर मालिकों के विरुद्ध एक हो जाने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती।’
हड़तालों का जुझारूपन
1905 ई. के बाद मजदूरों की हड़तालों में जुझारूपन आ गया। इसका एक कारण राष्ट्रीय आन्दोलन में जुझारूपन आना था। उससे मजदूर वर्ग भी अछूता न रहा। उसमें भी राजनीतिक चेतना और नवजागरण के लक्षण दिखाई देने लगे। बंगाल के विभाजन से देश में असन्तोष व्याप्त था और बंगाल प्रबल राजनीतिक आन्दोलन का केन्द्र बना हुआ था। बंग-भंग आन्दोलन ने भी मजदूर आन्दोलनों को प्रेरणा दी।
कलकत्ता में छापाखाने की हड़ताल
1905 ई. में बंगाल में कई हड़तालें हुईं परन्तु कलकत्ता में हुई भारत सरकार के छापाखाने के कर्मचारियों की हड़ताल बहुत महत्त्वपूर्ण थी। यह हड़ताल सितम्बर 1905 में आरम्भ हुई और लगभग एक माह तक चली। हड़तालियों की मुख्य मांगें थीं- ओवरटाइम के भत्ते में वृद्धि, रविवार तथा अन्य अवकाश के दिन काम के लिए अतिरिक्त पैसा, जुर्माना बन्द और रुग्णावकाश दिये जाने की व्यवस्था। सरकार ने हड़तालियों से कुछ ही दिनों में समझौता कर लिया।
हड़ताल टूटने के तुरन्त बाद 7 हड़ताली नेताओं को नौकरी से हटा कर गिरफ्तार कर लिया गया। सरकार की इस कार्यवाही से मजदूर भड़क उठे और जबरदस्त हड़ताल आरम्भ हुई। राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक नेता भी हड़तालियों की सभा में भाषण देने जाने लगे तो सरकार ने घोर दमन का सहारा लिया।
इस पर भी स्थिति नहीं बदली तो सरकार को झुकना पड़ा और कुछ माँगों को स्वीकार करना पड़ा। गिरफ्तार नेताओं को रिहा करना पड़ा। तब जाकर हड़ताल समाप्त हुई। यह मजदूरों की शानदार जीत थी।
ईस्ट इण्डिया रेलवे की हड़ताल
जुलाई 1906 में ईस्ट इण्डिया रेलवे के बंगाल सेक्शन में हड़ताल हुई। इस हड़ताल का मुख्य कारण यूरोपीयों और भारतीयों के वेतन में भारी अन्तर, ब्रिटिश अधिकारियों का भारतीय रेलवे कर्मचारियों के साथ दुव्यर्वहार और अच्छे आवास की मांग आदि थे। यह हड़ताल इतनी जबरदस्त रही कि इंग्लैण्ड के ब्रिटिश शासकों में भी हलचल मच गई।
चूँकि हड़तालियों को राजनीतिक नेताओं ने सम्बोधित किया था, इसलिये हड़ताल को राजनीति से प्रेरित बताकर क्रूरता के साथ कुचला गया। कई पुराने रेलवे कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया। 1907 ई. में रेलवे कर्मचारियों ने पुनः हड़ताल कर दी। इस बार सारे देश में हड़ताल हुई। मई 1907 में बम्बई के रेलवे वर्कशॉप के मजदूरों ने हड़ताल की।
नवम्बर 1907 में ईस्ट इण्डिया रेलवे के मजदूरों ने हड़ताल की। इस हड़ताल के कारण कल-कारखानों और जहाजों को कोयला मिलना बन्द हो गया। सरकार ने पुलिस और सेना की सहायता से हड़ताल को कुचलने का प्रयास किया परन्तु सफलता नहीं मिली। यह हड़ताल बी. एन. आर. में भी फैलने लगी। अन्त में सरकार को झुकना पड़ा और रेलवे मजदूरों की मांगों पर विचार करने के लिए एक बोर्ड बैठाना पड़ा। इससे ब्रिटिश सरकार की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा।
महाराष्ट्र के श्रमिकों की हड़ताल
देश में सबसे महत्त्वपूर्ण हड़ताल 22 जुलाई 1908 को तिलक को दिये गये 6 साल के कारावास के विरुद्ध बम्बई के मजदूरों ने की। यह मजदूरों की राजनीतिक आम हड़ताल थी जो 6 दिन तक जारी रही और मजदूरों ने बम्बई की सड़कों पर ब्रिटिश सेना से जमकर लोहा लिया।
जब 13 जुलाई को अदालत में तिलक के मुकदमे की सुनवाई आरम्भ हुई तो मजदूरों ने सरकार को, तिलक को न फंसाने की चेतावनी दी तथा हड़ताल पर चले गये। 17 जुलाई को मजदूरों के आन्दोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया। 18 और 19 जुलाई को लगभग 65,000 मजदूर सड़कों पर निकल आये।
पुलिस ने हड़ताली मजदूरों पर गोलियाँ चलाईं। 20 जुलाई को हजारों लोग मजदूरों के समर्थन में आ जुटे। 21 और 22 जुलाई को हड़ताल ने विराट रूप धारण कर लिया। 22 जुलाई को जब तिलक को कारावास की सजा सुनाई गई तो 23 जुलाई से सर्वोच्च स्तर की हड़ताल आरम्भ हो गई। एक लाख मजदूरों और आम जनता ने मिलकर पुलिस और सेना के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
बहुत से लोग मारे गये तथा सैकड़ों घायल हुए। 6 दिन तक चले क्रूर दमन के बाद हड़ताल को कुचल दिया गया। इस हड़ताल ने प्रमाणित कर दिया कि भारत का मजदूर वर्ग भी राष्ट्रीय आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इस समय तक भारत के औद्योगिक प्रतिष्ठानों में मजदूरों की संख्या में आशातीत वृद्धि हो चुकी थी और वे सरकार तथा मिल मालिकों, दोनों से एक साथ लोहा लेने की स्थिति में आ गये थे। 1914 ई. के आंकड़ों के अनुसार उस समय भारत में 264 कपड़ा मिलें काम कर रही थीं जिनमें लगभग ढाई लाख मजदूर और कर्मचारी कार्य करते थे।
जूट उद्योग की 60 मिलों में लगभग दो लाख मजदूर थे और रेलवे में 6 लाख से अधिक मजदूर तथा कर्मचारी थे। सरकारी छापाखानों, टेलीफोन तथा टेलीग्राफ, पोस्ट ऑफिस तथा अन्य उद्योगों में भी लाखों मजदूर कार्यरत थे। इतना होने पर भी उनका कोई टिकाऊ संगठन नहीं बन पाया था।
रजनी पामदत्त ने लिखा है- ‘अभी मजदूरों का टिकाऊ संगठन बनाना सम्भव नहीं था। वजह यह नहीं थी कि भारत के मजदूर पिछड़े हुए थे या उनमें लड़ाकू मनोभावना की कमी थी। इसकी वजह केवल यह थी कि मजदूर हद से अधिक गरीब थे, पढ़े-लिखे नहीं थे और उनके पास साधनों का अभाव था।’
प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में जिस प्रकार की परिस्थितियां बन रही थीं और भारत पर रूसी क्रान्ति तथा उसके बाद सारी दुनिया में उठने वाली क्रान्तिकारी लहर का जो प्रभाव पड़ा था, उनके कारण भारत का मजदूर वर्ग संघर्ष करने के लिये तैयार हो गया। यहीं से भारत में आधुनिक ढंग का मजदूर आन्दोलन आरम्भ हुआ।
देश की आर्थिक हालत और राजनीतिक परिस्थिति दोनों ने ही मजदूरों में नयी जागृति पैदा करने में सहायता दी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान देश में वस्तुओं की कीमतें दुगनी हो गईं किन्तु मजदूरों के वेतन में इस हिसाब से वृद्धि नहीं हुई। इस कारण उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई। इसके विपरीत मिल मालिक अंधाधुंध लाभ अर्जित कर रहे थे।
समाज के मध्यम वर्ग ने अपने राजनीतिक संघर्ष एवं स्वार्थ के लिए मजदूरों का इस्तेमाल किया और एक जबरदस्त आन्दोलन चलाया गया। पहली बार, मजदूरों को सुनियोजित ढंग से अपने असन्तोष को अभिव्यक्त करने का अवसर मिला परन्तु उनका नेतृत्व मध्यम वर्ग के हाथों में चला गया।
1918 ई. के अंत में एक बड़े औद्योगिक केन्द्र में पहली बार पूरा उद्योग, हड़ताल के कारण ठप्प हो गया। यह उस वक्त हुआ जब बम्बई की सूती मिलों में हड़ताल आरम्भ हुई। 1918 ई. में हड़तालों की जो लहर आरम्भ हुई, वह 1919 ई. में समस्त देश में फैल गयी।
जनवरी 1919 ई. तक लगभग समस्त मिलों के 1,25,000 मजदूर बाहर निकल आये। 1919 ई. के बसन्त में रोलट एक्ट के विरुद्ध हड़ताल हुई। उसमें मजदूरों ने जिस तरह भाग लिया, उससे स्पष्ट हो गया कि मजदूर वर्ग भी अब राष्ट्रीय संघर्ष में सबसे आगे बढ़कर लड़ने लगा है। 1919 ई. के खत्म होते-होते और 1920 ई. के पूर्वार्द्ध में हड़तालों की व्यापकता और तेजी अपनी चरम सीमा पर पहुंच गयी।
आर. के. दास ने भारत का मजदूर आन्दोलन नामक पुस्तक में लिखा है-
‘4 नवम्बर से 2 दिसम्बर 1919 तक कानपुर की ऊनी मिलों के 17,000 मजदूरों ने हड़ताल की; 7 दिसम्बर 1919 से 9 जनवरी 1920 तक जमालपुर के 16,000 रेलवे मजदूरों ने हड़ताल की; 9 से 18 जनवरी 1920 तक कलकत्ते की जूट मिलों के 35,000 मजदूरों ने काम करना बन्द रखा; 2 जनवरी से 3 फरवरी तक बम्बई में आम हड़ताल रही जिसमें 2 लाख मजदूरों ने भाग लिया, 31 जनवरी को बम्बई में ब्रिटिश इंडिया नैवीगेशन कम्पनी के 10,000 मजदूरों ने हड़ताल की; 26 फरवरी तक शोलापुर के 16,000 मिल मजदूरों ने काम बन्द रखा; 2 से 16 फरवरी तक इण्डियन मैरीन डाक (गोदी) के 20,000 मजदूरों ने हड़ताल रखी; 24 फरवरी से 29 मार्च तक टाटा के लोहे और इस्पात कारखाने के 40,000 मजदूरों ने काम बन्द रखा; 20 से 26 मार्च तक मद्रास के 17,000 मिल मजदूरों ने हड़ताल की; मई, 1920 में अहमदाबाद के 25,000 मजदूरों ने काम बन्द रखा।’
इस प्रकार 1920 ई. के पहले 6 महीने की अवधि में लगभग 200 हड़तालें हुईं जिनमें 15 लाख से अधिक मजदूरों ने भाग लिया।
जब भारत में औद्योगिकीकरण के कारण श्रमिक वर्ग की संख्या में वृद्वि हुई और श्रमिक असंतोष बढ़ा, तब ट्रेड यूनियनवाद का उदय हुआ।
ट्रेड यूनियनवाद का उदय
बीसवीं सदी के दूसरे दशक में राष्ट्रव्यापी हड़तालों की पृष्ठभूमि में भारत का ट्रेड यूनियन आन्दोलन उत्पन्न हुआ। लगभग समस्त बड़े उद्योगों तथा औद्योगिक केन्द्रों में अधिकतर ट्रेड यूनियनें इसी अवधि में बनीं। इनमें से कई तो बुनियादी तौर पर हड़ताल कमेटियां मात्र थीं। ऐसी यूनियनों में अधिक समय तक टिकने की शक्ति नहीं थी। मजदूर लोग संघर्ष के लिए तैयार रहते थे परन्तु यूनियन का दफ्तरी काम दूसरे लोग करते थे।
इस सम्बन्ध मे रजनी पामदत्त ने लिखा है- ‘अभी देश में समाजवाद के आधार पर, मजदूर वर्ग के विचारों तथा वर्ग-संघर्ष के आधार पर चलने वाला कोई राजनीतिक आन्दोलन नहीं था। इसका नतीजा यह हुआ कि विभिन्न कारणों से प्रेरित होकर जो बाहरी लोग दूसरे वर्गों के मजदूरों के संगठनों की सहायता करने को आये, उनमें मजदूर आन्दोलन के उद्देश्यों तथा जरूरतों की कोई समझ नहीं थी…… भारत के मजदूर आन्दोलन के गले में बहुत दिनों तक यह पत्थर बंधा रहा और उसने मजदूरों की शानदार लड़ाकू भावना और वीरता के बढ़ने में बहुत बाधा डाली, और उसका असर, अब भी बाकी है।’
मद्रास श्रमिक संघ की स्थापना
आम तौर पर यह माना जाता है कि नियमित सदस्यता और शुल्क के आधार पर ट्रेड यूनियन संगठन बनाने का पहला प्रयास थियोसोफिकल सोसाइटी की नेता श्रीमती एनीबेसेंट के सहयोगी वी. पी. वाडिया ने 1918 ई. में मद्रास श्रमिक संघ की स्थापना के रूप में किया। यह मद्रास शहर की कपड़ा मिलों में काम करने वाले मजदूरों के लिए बनाई गई थी।
उन्हें इस यूनियन का सदस्य बनाया गया और उनसे चन्दा वसूल किया गया। जिस औद्योगिक केन्द्र में यह यूनियन बनी, वह खुद अपेक्षाकृत कमजोर था। वाडिया का दृष्टिकोण भी संकुचित और सीमित था। अप्रैल 1918 में यूनियन बन जाने के बाद मद्रास के मजदूरों ने मिल मालिकों के सामने अपनी मांगें प्रस्तुत कीं और जब मांगें नहीं मानी गईं तो मजदूरों ने वाडिया से मांग की कि अब हड़ताल होनी चाहिए।
वाडिया ने हड़ताल का विरोध किया। वाडिया ऐसे समय में हड़ताल करके मिल मालिकों को हानि पहुँचाने के पक्ष में नहीं थे। वे स्वयं को ब्रिटिश साम्राज्य की राजभक्त प्रजा समझते थे। अतः वाडिया ने हड़ताल नहीं होने दी। दूसरी तरफ बिनी एण्ड कम्पनी ने वाडिया के अनुरोध को अनसुना करके कारखाने में ताला लगा दिया।
विवश होकर मजदूरों को अपनी मांगें छोड़नी पड़ीं। 1921 ई. में मिल मालिकों ने कारखाने का ताला खोल दिया। ताला खुल जाने के बाद मजदूरों ने हड़ताल कर दी। इस पर कम्पनी ने हाईकोर्ट की शरण ली। हाई कोर्ट ने हड़ताल को असंवैधानिक ठहराते हुए यूनियन पर 1 लाख 5 हजार रुपये का जुर्माना आरोपति किया। कम्पनी ने घोषणा की कि यदि वाडिया, मजदूर आन्दोलन से हट जाये तो हम यूनियन से जुर्माना वसूल करने की कार्यवाही नहीं करेंगे। इस पर वाडिया ने मजदूर आन्दोलन से सम्बन्ध तोड़ लिया।
मजूर-महाजन संघ की स्थापना
1918 ई. में गांधीजी ने अहमदाबाद के मजदूरों का पक्ष लेकर उनका नेतृत्व किया तथा एक यूनियन स्थापित की जो टैक्सटाइल लेबर एसोसिएशन अथवा मजूर-महाजन संघ के रूप में विख्यात हुई। रजनी पामदत्त ने लिखा है- ‘अहमदाबाद में गांधीजी ने मालिकों के सहयोग से एक फुट-परस्त संगठन बनाया जिसका आधार वर्ग-शान्ति स्थापित करना था। उनका बनाया हुआ यह अहमदाबाद लेबर एसोसिएशन अथवा मजूर-महाजन संघ, भारत के मजदूर आन्दोलन से सदैव अलग रहा।’
अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस
अहमदाबाद कपड़ा मिल श्रमिक संघ कांग्रेस की रचना थी। कांग्रेस, मजदूरों की उग्रवादी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहती थी क्योंकि उनके उग्र आंदोलन उन पूंजीपतियों के लिये बहुत खतरनाक सिद्ध हो रहे थे जो कांग्रेस के समर्थक थे। कांग्रेस इन पूंजीपतियों के हितों की रक्षा करना चाहती थी।
इसी ध्येय को लेकर 1920 ई. में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की गई और उसे विभिन्न ट्रेड यूनियनों से सम्बद्ध किया गया। इसका पहला अधिवेशन 1920 ई. में लाला लाजपतराय की अध्यक्षता में बम्बई में हुआ। जोजेफ बैप्टिस्टा इसके उपाध्यक्ष थे। आरम्भ में यह संस्था केवल ऊपरी नेताओं का संगठन थी।
ट्रेड यूनियन कांग्रेस के बहुत से नेताओं का मजदूर आन्दोलन से बहुत कम सम्पर्क था। रजनी पामदत्त ने इस संगठन की स्थापना का कारण यह बताया है कि इस बहाने नेताओं को, जिनेवा के अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर सम्मेलन में कुछ प्रतिनिधियों को नामित करने एवं भेजने का अधिकार मिल जायेगा। ट्रेड यूनियन कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी एन. एम. जोशी के अनुसार भारत में ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना वाशिंगटन के मजदूर सम्मेलन के प्रभाव से हुई थी।
आगामी कई वर्षों तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मजदूरों की भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस पर नियन्त्रण बना रहा और लाला लाजपतराय, देशबन्धु चितंरजनदास, वी. वी. गिरि जैसे कांग्रेसी नेता इसके अध्यक्ष चुने जाते रहे। यद्यपि राष्ट्रीय आन्दोलन और श्रमिक आन्दोलन के बीच यह सम्बन्ध कई दृष्टियों से काफी महत्त्वपूर्ण रहा परन्तु मजदूर आन्दोलन के जुझारूपन को हानि पहुँची।
क्योंकि इसके सम्मेलनों में प्रायः वर्ग-शान्ति का उपदेश और मजदूरों के सामाजिक एवं नैतिक सुधार की बातें रहती थीं और सरकार से मजदूरों के सम्बन्ध में कानून बनाने और उनका रहन-सहन सुधारने की मांग की जाती थी। मजदूरों को बुरी आदतें छोड़ने तथा ईमानदारी, सन्तोष एवं शान्ति का जीवन बिताने के उपदेश दिये जाते थे।
इन कांग्रेसी नेताओं का हड़तालों के प्रति क्या रुख था, इस सम्बन्ध में ट्रेड यूनियन कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी एन. एम. जोशी ने लिखा है- ‘कार्यकारिणी ने कोई भी हड़ताल करने की अनुमति नहीं दी किन्तु भारत के विभिन्न भागों और विभिन्न धंधों में मजदूरों की हालत चूँकि बहुत खराब थी, इसलिए कुछ हड़तालों और तालाबंदियों की नौबत आ ही गयी जिनमें ट्रेड यूनियन कांग्रेस के पदाधिकारियों को भी दिलचस्पी लेनी पड़ी।’
1927 ई. तक ट्रेड यूनियन कांग्रेस का मजदूरों के वर्ग-संघर्ष से बहुत कम सम्बन्ध रहा। फिर भी इसमें संदेह नहीं कि इस संस्था के रूप में वह मंच तैयार हो गया था जहाँ ट्रेड यूनियनों के नेता जमा होते थे, आपसी विचार-विमर्श होता था और भावी रणनीति के बारे में विचार किया जाता था।
विश्वव्यापी मंदी का प्रभाव
1922 से 1926 ई. का काल भारतीय उद्योग और अर्थव्यवस्था में घोर मन्दी का समय था और मजदूरों के असन्तोष को बढ़ाने वाला था। मजदूरों के वेतन में कटौती की जाने लगी। उद्योगों के पुनर्गठन के नाम पर उनकी छंटनी की जाने लगी, जबकि जनसंख्या वृद्धि के कारण श्रमिकों की संख्या में वृद्धि हो गई थी।
इससे मजदूरों में असन्तोष बढ़ गया। ट्रेड यूनियन कांग्रेस, हड़तालों के पक्ष में नहीं थी। फिर भी जब कई क्षेत्रों में हड़तालों की नौबत आ गई तो ट्रेड यूनियन कांग्रेस के नेताओं ने मजदूरों को वास्तविक लड़ाकू नेतृत्व एवं समर्थन नहीं दिया। अतः अधिकांश हड़तालें असफल रहीं अथवा कुछ मामूली सुविधाओं से सन्तोष करना पड़ा।
उदाहरण के लिए सितम्बर 1922 में टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी जमशेदपुर की हड़ताल, अक्टूबर 1922 में सूरत की कपड़ा मिलों की हड़ताल, 1923 ई. में अहमदाबाद कपड़ा मिलों की हड़ताल आदि। 1927 ई. तक ट्रेड यूनियन कांग्रेस में 57 यूनियनें सम्मिलित हो गयी थीं जिनके सदस्यों की संख्या 1,50,555 थी।
संघर्ष की तैयारी
कांग्रेसी नेतृत्व, मजदूरों के असन्तोष को दूर न कर सका और ट्रेड यूनियन कांग्रेस का सफेद झण्डा लाल होने लगा। मजदूरों में साम्यवादी विचारधारा पनपने लगी और अब वे क्रान्ति तथा चिंगारी आदि शब्दों का प्रयोग करने लगे। ब्रिटिश सरकार ने कानपुर षड़यन्त्र केस की आड़ में नवोदित साम्यवादियों को गिरफ्तार करके उनकी शक्ति को कुचलने का प्रयास किया परन्तु इससे मजदूरों में साम्यवाद की लोकप्रियता पहले से भी अधिक बढ़ गई।
वे अपने अधिकारों एवं हितों के लिए संघर्ष करने को उत्सुक हो उठे। यद्यपि आरम्भ में मजदूर आन्दोलन को, प्रभावशाली नेतृत्व नहीं मिल पाया, फिर भी भारत सरकार यह बात अच्छी तरह जानती थी कि यदि मजदूर वर्ग ने राजनीतिक चेतना प्राप्त कर ली और यदि उसे मजबूत संगठन और अच्छे नेता मिल गये तो ब्रिटिश साम्राज्य खतरे में पड़ जायेगा।
इसीलिए सरकार ने मजदूरों की स्थिति की जांच कराने के लिए कुछ कमेटियां और कमीशन नियुक्त किये। 1921 ई. में बंगाल में औद्योगिक अशान्ति की जांच करने के लिए एक कमेटी नियुक्त की गयी। 1922 ई. में बम्बई प्रान्त में औद्योगिक विवादों की जांच करने के लिए कमेटी बनायी गयी। 1919-20 ई. में मद्रास प्रान्त में सरकार ने एक मजदूर विभाग खोला और फिर बम्बई प्रान्त में भी मजदूर विभाग खुल गया।
1921 ई. से औद्योगिक झगड़ों के आंकड़े रखे जाने लगे। सरकारी कमेटियों की समस्त जांच रिपोर्टों में यही सुझाव दिया गया कि मजदूर यूनियनों की राजनीतिक कार्यवाहियों पर रोक लगा दी जाये। सरकार ने इसके लिये प्रयास किये किंतु मजदूरों में राजनीतिक जागरण के चिन्ह दिखाई देने लगे थे। उनमें समाजवादी और साम्यवादी विचारों का प्रवेश होने लगा।
ट्रेड यूनियन कांग्रेस में साम्यवादियों का प्रवेश
साम्यवादियों ने अपनी पृथक ट्रेड यूनियन स्थापित कर रखी थी परंतु उसकी स्थिति काफी कमजोर थी। उन्होंने अपनी ट्रेड यूनियन को भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस से सम्बद्ध करने के लिये अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस में प्रभाव बढ़ाना आरम्भ किया।
उनके बढ़ते हुए प्रभाव के कारण उनके नेता दत्तोपन्त ठेंगड़ी 1925 ई. में भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिये गये। 1927 ई. में पुनः साम्यवादी नेता एस. पी. घाटे अध्यक्ष चुने गये। इन नेताओं ने ट्रेड यूनियन कांग्रेस के माध्यम से वर्ग-संघर्ष की शुरुआत की परन्तु कार्यकारी परिषद् में सुधारवादी कांग्रेसियों का बहुमत होने के कारण वे ट्रेड यूनियन कांग्रेस को अपनी मनचाही दिशा में नहीं ले जा सके।
1927-28 ई. तक साम्यवादी नेता, ट्रेड यूनियन कांग्रेस में और अधिक शक्तिशाली हो गये। 1927 ई. में दिल्ली तथा कानपुर में ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अधिवेशन हुए। इन दोनों अधिवेशनों में मजदूरों के लड़ाकू नेताओं की चुनौती भरी आवाजें सुनायी देने लगीं और यह भी स्पष्ट हो गया कि भारत की अधिकतर ट्रेड यूनियनें मजदूर वर्ग के इन नये नेताओं के साथ हैं न कि कांग्रेसी नेताओं के।
अखिल भारतीय मजदूर एवं किसान पार्टी
साम्यवादियों ने मजदूर एवं किसान पार्टियों के माध्यम से ट्रेड यूनियनों पर नियन्त्रण स्थापित कर लिया। सर्वप्रथम नवम्बर 1925 में बंगाल में मजदूर-किसान पार्टी स्थापित की गई थी परन्तु तब इसका नाम इण्डियन नेशनल कांग्रेस की लेबर एवं स्वराज्य पार्टी था। इसके संस्थापकों में हेमन्त सरकार, कुतुबुदीन अहमद, काजी नजरुल इस्लाम आदि मुख्य थे।
इसके बाद बम्बई, पंजाब और संयुक्त प्रान्त में भी इसी तरह की प्रान्तीय पार्टियां गठित की गईं। दिसम्बर 1928 में कलकत्ता अधिवेशन में इन समस्त पार्टियों को मिलाकर अखिल भारतीय मजदूर एवं किसान पार्टी का गठन किया गया। इस पार्टी के माध्यम से मजदूरों और किसानों के मध्य साम्यवादी विचारधारा का जोरदार ढंग से प्रचार किया गया।
रजनी पामदत्त ने लिखा है- ‘मजदूरों में जिस नयी जागृति के चिन्ह 1927 में प्रकट हुए थे, उसका राजनीतिक रूप इस संगठन के रूप में सामने आया, हालांकि शुरु में वह बहुत सी उलझनों का शिकार बना रहा। इस संगठन से यह जाहिर होता था कि देश में कौन सी नयी शक्तियां आगे बढ़ रही हैं।’
हड़तालों की धूम
भारत में 1927-28 ई. का समय भारी अशान्ति का था। सरकार के मुद्रा विधेयक तथा रुपये के अवमूल्यन आदि कार्यों से पूँजीपतियों एवं उद्योगपतियों में बैचैनी थी तथा साइमन कमीशन को लेकर भारतीय राजनीतिक क्षितिज उद्विग्न था। सारे देश में साइमन कमीशन के विरुद्ध जोरदार प्रदर्शन किये गये जिनमें मजदूरों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
पहली बार ऐसे नेता सामने आये जिनका, कारखानों में काम करने वालों मजदूरों से घनिष्ठ सम्पर्क था और जो वर्ग-संघर्ष को अनिवार्य मानते थे। प्रारम्भ में कांग्रेस के नेता और ट्रेड आन्दोलन के सुधारवादी नेता, साइमन कमीशन के विरुद्ध होने वाली हड़तालों और प्रदर्शनों में मजदूरों की भागीदारी के पक्ष में नहीं थे परन्तु जब मजदूरों ने इन हड़तालों एवं प्रदर्शनों में शानदार सफलताएं अर्जित कीं तो कांग्रेसी नेता चौंक गये।
1928 ई. में हड़तालों के कारण 3 करोड़ 15 लाख कार्य-दिवस प्रभावित हुए। इससे जहाँ एक तरफ मजदूरों की एकता सुदृढ़ हुई, वहीं उनमें संघर्ष करने की शक्ति भी बढ़ी। यह सब साम्यवादी नेतृत्व के कारण सम्भव हो पाया। साम्यवादी नेतृत्व ने उद्योगपतियों और सरकार के पक्ष में मजदूरों के साथ विश्वासघात नहीं किया जैसा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नताओं ने किया था।
इस दौरान ट्रेड यूनियनों के संगठन का काम तेजी से आगे बढ़ा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बम्बई में ट्रेड यूनियनों की सदस्य संख्या 1923 ई. में 48,669 थी जो 1927 ई. में बढ़कर 75,602 और मार्च 1929 तक बढ़कर 2,00,325 हो गई।
इन यूनियनों में बम्बई के मिल मजदूरों की गिरनी कामगार यूनियन (लाल बावटा) सबसे आगे थी जिसकी सदस्य संख्या मार्च 1929 में 65,000 हो गई थी। इसी बीच, बम्बई की पुरानी सूती मजदूर यूनियन जो 1926 ई. में स्थापित हुई थी और जो ट्रेड यूनियन कांग्रेस के मंत्री एन. एम. जोशी के सुधारवादी नेतृत्व में काम कर रही थी, की सदस्य संख्या घटकर 6,749 रह गयी।
इससे पता चल जाता है कि मजदूरों को कौन-सी यूनियन पसन्द थी। गिरनी कामगार यूनियन की शक्ति इस बात में थी कि अलग अलग मिलों में उसकी मिल-कमेटियां थीं और उनका मजदूरों के साथ बहुत निकट का सम्पर्क था। इस प्रकार, मजदूर आन्दोलन आर्थिक और राजनीतिक दोनों क्षेत्रों में आगे-आगे चल रहा था और सुधारवादी नेतृत्व को हटा रहा था। इससे सरकार और कांग्रेसी नेतृत्व दोनों को चिन्ता हुई।
जनवरी 1929 में वायसराय लॉर्ड इरविन ने कहा- ‘कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रचार से बड़ी चिन्ता उत्पन्न हो रही है।’ 1928-29 ई. की सरकारी रिपोर्ट में कहा गया- ‘कम्युनिस्टों के प्रचार एवं प्रसार से, विशेष तौर पर कुछ बड़े शहरों के औद्योगिक मजदूरों के बीच उनके प्रचार और प्रभाव से, अधिकारियों को बहुत चिन्ता हुई।’ भारत के राष्ट्रवादी अखबारों को भी चिन्ता सताने लगी।
मई 1929 में बोम्बे क्रॉनिकल ने लिखा– ‘देश में आजकल समाजवाद का वातावरण है। कुछ महीनों से भारत में विभिन्न सभा-सम्मेलनों, खास तौर पर किसानों और मजदूरों के सम्मेलनों द्वारा समाजवादी सिद्धान्तों का प्रचार हो रहा है।’
ऐसी स्थिति में ट्रेड यूनियन के सुधारवादी नेताओं को अपना नेतृत्व छिन जाने की आंशका उत्पन्न हो गई। ट्रेड यूनियन की कार्यकारिणी समिति के अध्यक्ष शिवराव ने कहा– ‘अब समय आ गया है जब भारत के ट्रेड यूनियन आन्दोलन को अपने संगठन में से शरारती लोगों को निकाल देना चाहिए।’ स्पष्ट है कि उनका संकेत साम्यवादियों की तरफ था।
मेरठ षड़यन्त्र केस
भारतीय मजदूरों में साम्यवाद के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने की दृष्टि से 1929 ई. में गवर्नर जनरल ने एक विशेष अध्यादेश निकाला जिसका उद्देश्य भारत में साम्यवादी गतिविधियों पर रोक लगाना था। इसके बाद ट्रेड डिस्प्यूट्स एक्ट (औद्योगिक झगड़ों का कानून) बनाया गया जिसका उद्देश्य मजदूरों और मालिकों के झगड़ों को समझौतों के द्वारा सुलझाना तथा सार्वजनिक आवश्यकता के धन्धों में हड़ताल के अधिकार को सीमित करना था।
मार्च 1929 में सारे भारत में मजदूर आन्दोलन के सक्रिय नेता बंदी बना कर मेरठ ले जाये गये जहाँ उन पर मुकदमा चलाया गया। आरम्भ में 31 प्रमुख नेताओं को बंदी बनाया गया था। बाद में लेस्टर हचिंसन नामक एक अँग्रेज को भी गिरफ्तार करके 32वाँ अभियुक्त बनाया गया। उस पर ब्रिटिश सरकार का तख्ता उलटने का षड़यन्त्र रचने का आरोप लगाया गया।
इतिहास में यह घटना मेरठ षड़यन्त्र केस के नाम से प्रसिद्ध है। यह इतिहास में सबसे लम्बे और सबसे विशद सरकारी मुकदमों में गिना जाता है। इस मुकदमे में श्रीपाद अमृत डांगे, मुजफ्फर अहमद, एस. वी. घाटे, किशोरी लाल घोष, के. एन. जोगलेकर, फिलिप स्प्रैंट, एस. एस. मिरजकर, बी. एफ. ब्रेडले, पी. सी. जोशी, जी. एम. अधिकारी, धरनी गोस्वामी आदि नेता मुख्य अभियुक्त थे।
अभियुक्तों में इंग्लैण्ड के मजदूर आन्दोलन के तीन प्रतिनिधि भी सम्मिलित थे। समस्त अभियुक्त ट्रेड यूनियन कांग्रेस, गिरनी कामगार यूनियन एवं मजदूर-किसान पार्टियों के पदाधिकारी थे। मुकदमे को जानबूझकर तीन साल तक खींचा गया ताकि प्रमुख नेताओं की अनुपस्थिति में ट्रेड यूनियन आन्दोलन और मजदूर किसान आन्दोलन को कुचला जा सके।
लम्बी सुनवाई के बाद जनवरी 1933 में समस्त अभियुक्तों को कठोर सजाएं सुनाई गईं। मुजफ्फर अहमद को आजन्म काला पानी; डांगे, घाटे, जोगलेकर, निम्बकर और स्प्रैंट को बारह साल का कालापानी; ब्रेडले, मिरजकर और उस्मानी को दस साल का काला पानी दिया गया। इसी प्रकार की सजाएं शेष अभियुक्तों को भी दी गईं।
बाद में विश्व जनमत के दबाव के कारण अपील में सजाएं काफी घटा दी गईं। प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी, लम्बी सुनवाई और लम्बी सजाओं के परिणामस्वरूप मजदूर आन्दोलन को काफी धक्का लगा। भारतीय साम्यवादी दल के अब तक किये गये समस्त प्रयासों पर पानी फिर गया। उसे पुनः संभलने में काफी समय लगा।
ट्रेड यूनियन कांग्रेस में दरार
मेरठ षड़यन्त्र केस के उपरान्त भी सुधारवादियों (कांग्रेसी) और उग्रवादियों (साम्यवादी) में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के नेतृत्व पर कब्जा करने के लिए प्रतिस्पर्धा जारी रही। 1929 ई. के अन्त में नागपुर अधिवेशन में ट्रेड यूनियन कांग्रेस में उग्रवादियों का बहुमत हो गया और सुधारवादी अल्पमत में आ गये।
उन्होंने बहुमत के फैसले को मानने से इन्कार कर दिया और ट्रेड यूनियन कांग्रेस में फूट डाल दी। वे अपनी समर्थक यूनियनों को लेकर ट्रेड यूनियन कांग्रेस से अलग हो गये और उन्होंने अपना अलग ट्रेड यूनियन फेडरेशन बना लिया। जिन उग्रवादी नेताओं के हाथों में ट्रेड यूनियन कांग्रेस की बागडोर आ गयी थी, उनमें भी आपसी एकता एवं सहयोग की कमी थी।
1931 ई. के अधिवेशन में दोनों पक्षों में मतभेद इतने बढ़ गये कि देशपाण्डे के नेतृत्व में साम्यवादियों ने ट्रेड यूनियन कांग्रेस से सम्बन्ध विच्छेद करके रैड ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की। इसका मूल कारण रूसी कम्युनिस्ट नेता कामिन्टर्न (तृतीय) का भारतीय कम्युनिस्टों को यह आदेश था कि सुधारवादी बुर्जुआओं अथवा राष्ट्रवादी सुधारवादियों से किसी प्रकार का सम्बन्ध न रखा जाये।
साम्यवादियों का यह निर्णय स्वयं उनके लिए घातक सिद्ध हुआ। अब ब्रिटिश सरकार के लिए साम्यवादियों को गिरफ्तार करना आसान हो गया। गांधीजी के सविनय अवज्ञा आन्दोलन से स्वयं को अलग रखकर भी उन्होंने आत्मघाती कदम उठाया। वे जनता की सामान्य सहानुभूति को खोकर अलग-थलग पड़ गये।
साम्यवादियों के नेतृत्व में हड़तालों का सिलसिला आगे भी जारी रहा परन्तु उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। सरकार ने एक संकटकालीन अधिकार आर्डिनेन्स जारी कर दिया जिसके अन्तर्गत कम्युनिस्ट नेता तथा ट्रेड यूनियन नेताओं को बिना मुकदमा चलाये, नजरबन्द कर दिया। कम्युनिस्ट पार्टी को तथा एक दर्जन से अधिक पंजीकृत ट्रेड यूनियनों को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
यंग वर्कर्स लीग (नौजवान मजदूर सभा) पर रोक लगा दी गई। इस प्रकार सरकार ने मजदूरों के जुझारू संगठनों को कुचलने का प्रयास किया। उधर साम्यवादी दल में भी नीति सम्बन्धी मतभेद उभरने लगे। देशपाण्डे तथा उसके समर्थक अलगाव की नीति को त्यागने के पक्ष में थे जबकि रणदिवे के उग्रवादी समर्थक इस पर डटे रहना चाहते थे।
उनके आपसी विवाद ने रैड ट्रेड यूनियन कांग्रेस को समाप्त कर दिया और उससे सम्बद्ध विभिन्न यूनियनें पुनः अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस में लौटने लगीं। नतीजा यह हुआ कि 1935 ई. में दोनों ट्रेड यूनियनें फिर से एक हो गयी।
विभिन्न ट्रेड यूनियनों का एकीकरण
1929 ई. में सुधारवादियों ने अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस से अलग होकर भारतीय ट्रेड यूनियन फेडरेशन के नाम से अलग संगठन बना लिया था। इसके साथ 30 ट्रेड यूनियनें सम्बद्ध थीं। 1931 ई. में ऑल इण्डिया रेलवे मैन्स फेडरेशन तथा कुछ अन्य यूनियनें भी इसमें सम्मिलित हो गईं।
1936 ई. में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के बम्बई में हुए अधिवेशन के मंच से फेडरेशन के सुधारवादी नेताओं से अपील की गई कि उन्हें मजदूरों के केन्द्रीय नेतृत्व में एकता स्थापित करने के लिए आगे कदम बढ़ाना चाहिए और उन्हें विश्वास दिलाया कि एकता के लिए उनकी समस्त शर्तें मान ली जायेंगी, यदि वे दो बुनियादी सिद्धान्त स्वीकार कर लें।
पहला यह कि ट्रेड यूनियन आन्दोलन का आधार वर्ग-संघर्ष है और दूसरा यह कि ट्रेड यूनियनों के अन्दर जनवाद होना चाहिए। इस अपील का अच्छा परिणाम निकला। 1938 ई. में नागपुर अधिवेशन के समय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशन, अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस में सम्मिलित हो गई।
कांग्रेस की प्रबन्ध समिति में दोनों हिस्सों को बराबर-बराबर प्रतिनिधित्व दिया गया। एक बार पुनः अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस, मजदूर आन्दोलन को एकजुट करने वाला संगठन बन गयी। केवल अहमदाबाद का लेबर एसोसिएशन (मजूर-महाजन) उसके बाहर रहा, क्योंकि वह गांधीवादी प्रेरणा से चल रहा था।
भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का जन्म
1937 ई. के चुनावों के बाद अधिकांश ब्रिटिश भारतीय प्रान्तों में कांग्रेसी मन्त्रिमण्डल बने। श्रमिक संघों को उनसे बहुत आशाएं थी परन्तु जब उन्होंने वेतन कटौती तथा छंटनी आदि को लेकर हड़तालें कीं तो कांग्रेसी एवं गैर-कांग्रेसी दोनों तरह की सरकारों ने हड़तालों का दमन किया जिससे श्रमिक संघों का कांग्रेस से मोह भंग हो गया।
1930-38 ई. की अवधि के दौरान ट्रेड यूनियन आन्दोलन बड़ी तेजी से फैला। अनेक नयी यूनियनें बनी। 1928 ई. में पंजीकृत यूनियनोें की संख्या 29 थी, 1938 ई. में 296 हो गई जिनकी सदस्य संख्या 2,61,000 के लगभग थी। 1937 ई. में हड़तालों की संख्या 379 पहुँच गई जिनमें 6,47,801 श्रमिकों ने हिस्सा लिया।
इससे अधिक संख्या में श्रमिकों ने इससे पहले कभी हिस्सा नहीं लिया था। सबसे जबरदस्त, बंगाल की जूट हड़ताल रही। प्रबल दमन के बावजूद वह पूरे जूट उद्योग में फैल गयी। इस हड़ताल का मूल कारण था- 1,30,000 श्रमिकों की छंटनी करके उन्हें काम से हटाना, श्रमिकों के वेतन में कटौती करना और रेशनेलाइजेशन के नाम पर मजदूरों से अत्यधिक काम लेना।
बंगाल की फजलुल हक सरकार ने हड़ताल को कुचलने का हर सम्भव प्रयास किया। बंगाल सरकार का तर्क था कि इस हड़ताल का कोई आर्थिक आधार नहीं है और साम्यवादी नेता भारत में बगावत करने के लिए उसका उपयोग कर रहे हैं। अन्त में मिल मालिकों को झुकना पड़ा और वेतन कटौती को रद्द करना पड़ा।
अहमदाबाद में हड़तालों की समस्या उठ खड़ी होने पर बम्बई प्रान्त की कांग्रेस सरकार ने धारा 144 लगा दी। कानपुर की कपड़ा मिलों में भी हड़ताल हो गई जो शीघ्र ही आम हड़ताल में बदल गई। दूसरे उद्योगों के श्रमिक भी इसमें सम्मिलित हो गये। मिल मालिकों ने साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के प्रयास किये परन्तु श्रमिकों ने उनके प्रयास विफल कर दिये।
55 दिन की हड़ताल के बाद श्रमिकों की जीत हुई। बम्बई के श्रमिकों ने ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट के विरुद्ध शानदार हड़ताल की। इसमें लगभग 90 हजार श्रमिक सम्मिलित हुए। रेलवे श्रमिकों का संगठन यद्यपि सुधारवादियों के नियन्त्रण में था, फिर भी बंगाल-नागपुर रेलवे के 40,000 श्रमिकों ने एक महीने हड़ताल रखी।
इस प्रकार लगभग सभी प्रांतों में ट्रेड यूनियन आन्दोलन को कांग्रेसी सरकारों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा श्रमिक संगठनों के सम्बन्ध और अधिक बिगड़ते, उससे पहले ही द्वितीय विश्व युद्ध आरम्भ हो गया और कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने त्यागपत्र दे दिये।
युद्ध के प्रारम्भ में साम्यवादी नेतृत्व की ट्रेड यूनियनों ने कई बार हड़तालें करवाईं परन्तु जब सोवियत रूस, मित्र राष्ट्रों के पक्ष में आ गया तो भारतीय साम्यवादी भी ब्रिटिश सरकार का सहयोग करने लगे। उन्होंने 1942-45 ई. के मध्य किसी भी हड़ताल का नेतृत्व अथवा समर्थन नहीं किया।
इसके विपरीत कांग्रेसी नेतृत्व वाली ट्रेड यूनियनों ने कई बार हड़तालें कीं परन्तु उनके नेताओं की गिरफ्तारी के कारण वे सफल नहीं रहीं। दूसरी तरफ साम्यवादियों को अखिल भारतीय ट्रेड यूनियनों पर अपना नियन्त्रण स्थापित करने में सफलता मिल गई।
1945-46 ई. की अवधि में देश की स्थिति काफी शोचनीय हो चुकी थी। युद्ध के कारण मंहगाई बढ़ती जा रही थी और आए दिन हड़तालों से आर्थिक जीवन को भारी क्षति पहुँच रही थी। सरकार स्थिति को नियन्त्रण में लाने में असफल हो रही थी और साम्यवादी संगठन नित्य नये विवादों को जन्म दे रहे थे।
ऐसी स्थिति में कांग्रेस ने गांधीवादी सिद्धान्तों के आधार पर भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस बनाने का निश्चय किया जिसमें केवल कांग्रेसी विचारधारा वाली यूनियनें ही सम्मिलित हों। मई 1947 में भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस अस्तित्त्व में आई।
कांग्रेस द्वारा अलग संगठन बना लेने के बाद कांग्रेस-समाजवादियों ने भी अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन को छोड़ दिया और दिसम्बर 1948 में हिन्द मजदूर सभा नाम से एक स्वतन्त्र यूनियन बना ली। इससे मजदूर वर्ग की एकता को जबरदस्त धक्का लगा। अब देश में तीन मजदूर संगठन अपने-अपने ढंग से काम करने लगे।
इस प्रकार भारत में ट्रेड यूनियनवाद का उदय हुआ और उसने न केवल श्रमिक वर्ग के असंतोष को स्वर दिया अपितु ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार के समक्ष भारतीयों में उभर रहे असंतोष को भी अभिव्यक्त किया।
मांटेग्यू-चैम्सफोर्ड रिपोर्ट के आधार पर 1919 ई. में ब्रिटिश संसद में एक विधेयक पारित किया गया। इसे मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम अथवा भारत सरकार अधिनियम 1919 कहते हैं।
मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट से असंतोष
भारत की गोरी सरकार का 1909 ई. का अधिनियम मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट कहलाता है। यह कांग्रेस की 1907 ई. की सूरत फूट का लाभ उठाने, कांग्रेस के उग्रवादी नेताओं को हतोत्साहित करने, उदारवादी नेताओं की पीठ थपथपाने, क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलने और अलगाववादी-मुसलमानों को प्रसन्न करके उन्हें कांग्रेस तथा राष्ट्रीय आन्दोलन से दूर रखने की एक सोची-समझी तथा सुनिश्चित रणनीति थी।
भारतीयों को 1909 ई. के सुधारों से सन्तोष नहीं हुआ और देश में दिन-प्रतिदिन राजनीतिक असन्तोष के साथ-साथ क्रान्तिकारी एवं आतंकवादी गतिविधियों में वृद्धि होती चली गई। 1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ हुआ। तिलक और ऐनीबीसेंट ने मिलकर होमरूल आन्दोलन चलाया।
भारतीय जनता पुनः संघर्ष के रास्ते पर चल पड़ी। सरकार को विश्व युद्ध में भारतीयों के सहयोग की आवश्यकता थी। कांग्रेस की अपील पर भारतीयों ने इस युद्ध में अँग्रेजों का पूरा सहयोग दिया।
1916 ई. में इतिहास का पहिया एक बार फिर से सीधी दिशा में घूम गया जब बाल गंगाधर तिलक के प्रयासों से कांग्रेस के नरम दल और गरम दल (उदारवादी एवं उग्रवादी) पुनः एक हो गये। इसी काल में कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों एक ही मंच पर आकर अँग्रेजों से अधिक सुधारों की मांग करने लगीं।
इस बीच इंग्लैण्ड की सरकार ने मेसोपोटामिया में तुर्की के विरुद्ध युद्ध का संचालन भारत सरकार को सौंपा। भारत सरकार मेसोपोटामिया के मोर्चे पर असफल रही। इस पर इंग्लैण्ड में बड़ा विवाद उठा और मेसोपोटामिया कमीशन की नियुक्ति की गई। इस कमीशन ने भारत सरकार को दोषी ठहराया, उसकी कड़ी आलोचना की तथा उसे सर्वथा अयोग्य बताया।
उसने तत्कालीन भारतीय शासन-प्रणाली को त्रुटिपूर्ण बताते हुए उसमें सुधारों की मांग की। फलस्वरूप भारत सचिव चेम्बरलेन को त्यागपत्र देना पड़ा और मांटेग्यू ने उसका स्थान ग्रहण किया।
ब्रिटिश सरकार की घोषणा
प्रथम विश्व युद्ध जीतने के लिये इंग्लैण्ड को हर हालत में भारतीयों के सहयोग की आवश्यकता थी। इसलिये भारत सचिव मांटेग्यू ने 20 अगस्त, 1917 को इंग्लैण्ड के हाउस ऑफ कॉमन्स में एक ऐतिहासिक घोषणा की।
मांटेग्यू ने कहा- ‘सम्राट की सरकार की नीति जिससे भारत सरकार भी पूर्णतः सहमत है, यह है कि भारतीय शासन के प्रत्येक विभाग में भारतीयों का सम्पर्क उत्तरोत्तर बढ़े और उत्तरदायी शासन प्रणाली का क्रमिक विकास हो, जिसमें अधिकाधिक प्रगति करते हुए भारत में स्वशासन प्रणाली स्थापित हो और वह ब्रिटिश साम्राज्य का एक अंग बनकर रहे। उन्होंने यह तय कर लिया है कि जितना शीघ्र हो इस दिशा में ठोस रूप में कुछ कदम उठाये जाएं।’
इस घोषणा में कोई ठोस एवं स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी कि कौनसे कदम उठाये जायेंगे। भारत के विभिन्न पक्षों में इस घोषणा पर मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई। कांग्रेस के नरम दल ने उसका स्वागत मैग्नाकार्टा के रूप में किया, जबकि गरम दल नेताओं ने इसको शब्दों का जाल बताकर राष्ट्रीयता को अवरुद्ध करने की दिशा में एक षड़यन्त्र बताया।
जन-साधारण ने इसे संवैधानिक सुधारों की दिशा में महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा। जब इसके प्रारूप का प्रकाशन हुआ तो भारतीयों को आशा की अपेक्षा निराशा अधिक हुई क्योंकि प्रस्तावित योजना में भारतीयों की प्रगति का मूल्यांकन, ब्रिटिश सरकार के हाथों में रखा गया और एकदम उत्तरदायी सरकार की स्थापना नहीं की गयी, जो कि भारतीयों की प्रमुख मांग थी।
मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट
नवम्बर 1917 में भारत सचिव मांटेग्यू दिल्ली आये। उन्होंने गवर्नर जनरल चेम्सफोर्ड के साथ भारत के प्रमुख नगरों का दौरा किया। मांटेग्यू ने भारतीय सेना के प्रमुख अधिकारियों तथा विभिन्न प्रतिनिधि मण्डलों से विचार-विमर्श करके प्रस्तावित सुधारों के बारे में उनके सुझाव प्राप्त किये। तत्पश्चात् एक रिपोर्ट तैयार की गई जिसे मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट कहते हैं। 8 जुलाई 1918 को यह रिपोर्ट प्रकाशित कर दी गई। इस रिपोर्ट के मुख्य बिन्दु इस प्रकार से थे-
(1.) जहाँ तक सम्भव हो, स्थानीय संस्थाओं पर जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों का नियन्त्रण हो, सरकार का हस्तक्षेप कम से कम हो।
(2.) प्रान्तों में आंशिक उत्तरदायी सरकारें स्थापित की जायें और प्रान्तों को पहले की अपेक्षा अधिक शक्तियां दी जायें।
(3.) ब्रिटिश संसद के प्रति भारत सरकार की जिम्मेदारी ज्यों की त्यों बनी रहे किन्तु केन्द्रीय विधान परिषद् का विस्तार किया जाये ताकि यह भारत सरकार को पहले से अधिक प्रभावित कर सके।
(4.) भारत सरकार पर, भारत सचिव का नियन्त्रण कम कर दिया जाये।
(5.) सिक्ख, ईसाई और आंग्ल-भारतीयों को भी अलग प्रतिनिधित्व दिया जाये।
मांटेग्यू की रिपोर्ट के आधार पर 2 जून 1919 को एक विधेयक ब्रिटिश संसद में रखा गया। 18 दिसम्बर 1919 को यह विधेयक संसद द्वारा पारित कर दिया गया तथा 23 दिसम्बर 1919 को इंग्लैण्ड के बादशाह ने इसे स्वीकृति प्रदान कर दी जिससे यह कानून बन गया।
भारत सरकार अधिनियम-1919 पारित करने के कारण
1919 ई. के सुधार अधिनियम को पारित करने के निम्नलिखित कारण थे-
(1.) मार्ले-मिन्टो सुधार अधिनियम-1909 के द्वारा गोरी सरकार ने मुसलमानों की निष्ठा क्रय करने और हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य उत्पन्न करने का प्रयास किया था परन्तु बाद में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिनके कारण मुसलमान भी अँग्रेजों के विरोधी बन गये और 1916 ई. में वे कांग्रेस के साथ मिलकर स्वराज की मांग करने लगे।
(2.) तिलक और ऐनीबीसेंट के होमरूल आन्दोलन ने भारतीयों में नवीन आशा का संचार किया। सरकार ने आन्दोलन को क्रूर तरीके से दबाने का प्रयास किया। इससे जन असन्तोष और अधिक भड़क उठा। इसे शान्त करना आवश्यक था।
(3.) केन्द्रीय विधान परिषद् के 19 निर्वाचित सदस्यों ने भारत मंत्री को भारत में सुधारों के सम्बन्ध में एक प्रस्ताव भिजवाया था।
(4.) कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष कांग्रेस लीग योजना के नाम से सुधारों की एक योजना प्रस्तुत की थी।
(5.) मेसोपोटामिया कमीशन की रिपोर्ट में भारतीय शासन प्रणाली को त्रुटिपूर्ण बताते हुए उसमें सुधारों की मांग की गई थी।
(6.) प्रथम विश्व युद्ध के काल में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के लिये ब्रिटिश सरकार ने, युद्ध समाप्ति के बाद भारतीयों को स्वराज्य देने की बात कही थी। युद्ध समाप्ति के बाद जब भारतीयों को कुछ भी नहीं मिला तो उनका आक्रोश चरम पर पहुंच गया। भारतीयों के असन्तोष को कम करने के लिये मार्ले-मिन्टो सुधार अधिनियम के माध्यम से उत्तरदायी शासन की स्थापना का नाटक रचा गया।
भारत सरकार अधिनियम 1919
मांटेग्यू-चैम्सफोर्ड रिपोर्ट के आधार पर 1919 ई. में ब्रिटिश संसद में एक विधेयक पारित किया गया। इसे मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम अथवा भारत सरकार अधिनियम 1919 कहते हैं। इस अधिनियम को 1921 ई. में लागू किया गया। इस अधिनियम के अन्तर्गत निम्नलिखित संवैधानिक परिवर्तन किये गये-
(क) गृह सरकार
भारत सचिव
भारत में ब्रिटिश शासन प्रणाली के अंतर्गत भारत के शासन को दो भागों में बांटा गया था- एक भाग इंग्लैण्ड में कार्य करता था और दूसरा भारत में। शासन का इंग्लैण्ड वाला भाग गृह सरकार कहलाता था। इसके पांच मुख्य अंग थे- बादशाह, मन्त्रिमण्डल, संसद, भारत सचिव और भारत परिषद् (इण्डिया कौंसिल)।
इनमें भारत सचिव और भारत परिषद् सर्वाधिक महत्त्वूपर्ण थे। भारत सचिव, भारत के शासन सम्बन्धी मामलों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी था। अब तक भारत सचिव को भारतीय राजस्व में से वेतन मिलता था। भारतीयों ने इस प्रणाली के विरुद्ध अनेक बार विरोध प्रदर्शित किया था।
अतः 1919 ई. के अधिनियम द्वारा भारत सचिव का वेतन इंग्लैण्ड के कोष से दिये जाने की व्यवस्था की गई। 1919 के अधिनियम के द्वारा भारत सचिव की शक्तियों में मामूली कमी की गई। प्रान्तों में जो विषय भारतीय मंत्रियों को दिये गये, उन्हें हस्तान्तरित विषय कहा गया तथा जो विषय गवर्नर के पास रखे गये, उन्हें रक्षित विषय कहा गया। हस्तान्तरित विषयों में भारत सचिव का हस्तक्षेप निम्नलिखित बातों तक सीमित कर दिया गया –
(1.) ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा करना।
(2.) गवर्नर जनरल तथा उसकी परिषद् को 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत जो कार्य सौंपे गये है, उनकी देखभाल करना तथा उनके उचित कार्यों का समर्थन करना।
(3.) केन्द्रीय विषयों के शासन की देखभाल करना।
(4.) भारतीय हाईकमिश्नर, भारतीय नौकरियों और अपने ऋण लेने के अधिकारों की रक्षा करना।
(5.) केन्द्र तथा प्रान्तों के रक्षित विषयों पर भी भारत सचिव का नियन्त्रण कुछ ढीला कर दिया गया। इस अधिनियम के पूर्व जो भी विधेयक केन्द्रीय अथवा प्रान्तीय विधान सभाओं में प्रस्तुत किये जाते थे, उनमें भारत सचिव की पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी। इस अधिनियम में यह व्यवस्था की गई कि कुछ विशेष मामलों से सम्बन्धित विधेयक जैसे- विदेशी मामले, सीमा शुल्क, सैनिक मामले, मुद्रा तथा सार्वजनिक ऋण आदि को छोड़कर शेष विषयों में भारत सचिव की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होगी। प्रान्तों के मामलों के सम्बन्ध में यह निश्चित कर दिया गया कि किसी भी बिल को भारत सचिव के पास तब तक नहीं भेजा जायेगा, जब तक कि गवर्नर जनरल उसकी स्वीकृति के बारे में कोई रुकावट उत्पन्न न करे।
(6.) भारत सचिव की पूर्व-स्वीकृति के बिना, गवर्नर जनरल, भारत में कोई भी महत्त्वपूर्ण नियुक्ति नहीं करेगा तथा कोई भी महत्त्वपूर्ण पद कम नहीं करेगा।
भारत परिषद्
भारत परिषद् के संगठन में भी सुधार किया गया। अधिनियम के पूर्व भारत परिषद् का सारा व्यय भारत के राजस्व से वसूल किया जाता था। अब इस परिषद् के अधिकारियों, कर्मचारियों तथा कार्यकाल के समस्त खर्चे इंग्लैण्ड के खजाने से देने की व्यवस्था की गई।
यह भी व्यवस्था की गई कि भारत परिषद् में कम से कम आठ तथा अधिक से अधिक बारह सदस्य होंगे। इनमें से आधे सदस्य ऐसे होंगे जिन्हें भारत में सेवा करने का कम से कम दस वर्ष का अनुभव हो। भारत परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 7 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया तथा उनका वेतन 1000 पौंड से बढ़ाकर 1200 पौंड वार्षिक कर दिया गया।
हाई कमिश्नर
इस अधिनियम के अन्तर्गत पहली बार हाई कमिश्नर के पद का सृजन किया गया। इससे पूर्व भारत सरकार के लिए भण्डारों की समस्त आवश्यक वस्तुएं और मशीनें भारत सचिव लन्दन में खरीदता था। इस अधिनियम में यह तय किया गया कि हाई कमिश्नर, भारत सरकार की समस्त आवश्यक वस्तुएं लन्दन में खरीदेगा।
इसके अतिरिक्त वह इंग्लैण्ड में पढ़ने वाले भारतीय विद्यार्थियों की सुविधाओं और आवश्यकताओं पर ध्यान देगा। हाई कमिश्नर की नियुक्ति सपरिषद् गवर्नर जनरल करेगा। उसका वेतन भारतीय कोष से दिया जायेगा। उसे साधारणतः 6 वर्ष के लिये नियुक्त किया जायेगा।
उपर्युक्त परिवर्तनों से गृह-सरकार पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि इस अधिनियम के बाद भी उसकी वैधानिक सर्वोच्चता ज्यों की त्यों बनी रही। गवर्नर जनरल और उसकी सरकार के समस्त सदस्यों को गृह-सरकार का आदेश मानना तथा उनके द्वारा निर्धारित नीति पर चलना अनिवार्य था।
(ख) केन्द्रीय सरकार
गवर्नर जनरल और उसकी कार्यकारिणी: इस अधिनियम द्वारा केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद् की रचना और उसकी शक्तियों में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं किया गया। भारत की समस्त कार्यकारिणी शक्ति सपरिषद् गवर्नर जनरल में निहित थी। गवर्नर जनरल की शक्तियां पहले की भांति असीमित, निरंकुश और अनुत्तरदायी थीं।
भारत की शान्ति एवं व्यवस्था के लिए वह भारत सचिव के प्रति उत्तरदायी था और भारत सचिव ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था। अपने विशेषाधिकारों, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका तथा वित्तीय शक्तियों के कारण गवर्नर जनरल तानाशाह कहा जा सकता था। वह भारत में ब्रिटिश ताज का प्रतिनिधि था।
उसकी नियुक्ति इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री की अनुशंसा पर इंग्लैण्ड के मुकुट द्वारा पांच वर्ष के लिए की जाती थी। गवर्नर जनरल अपनी कार्यकारिणी परिषद् का प्रधान होता था तथा उसकी अनुशंसा पर भारत सचिव कार्यकारिणी परिषद् के सदस्यों की नियुक्ति करता था।
गवर्नर जनरल अपनी इच्छानुसार कार्यकारिणी परिषद् के सदस्यों में कार्य का विभाजन करता था और कार्यकारिणी परिषद् की बैठक बुलाता था। गवर्नर जनरल को ब्रिटिश भारत के हित, उसकी शान्ति और सुरक्षा आदि विषयों में अपनी कार्यकारिणी परिषद् की सम्मति मानने से मना करने का भी अधिकार था।
1919 ई. के अधिनियम में विदेश विभाग और राजनीतिक विभाग पर गवर्नर जनरल का सीधा नियंत्रण स्थापित किया गया। केन्द्रीय व्यवस्थापिका (विधान मण्डल) में कोई ऐसा प्रस्ताव जिसका सम्बन्ध सेना अथवा देशी राजाओं आदि से हो, बिना गवर्नर जनरल की पूर्व स्वीकृति के प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था। असाधारण परिस्थितियों में ब्रिटिश भारत तथा उसके किसी भाग की शान्ति एवं उत्तम शासन के लिए गवर्नर जनरल को 6 मास के लिये अध्यादेश जारी करने का अधिकार था।
गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद् में प्रधान सेनापति सहित 7 सदस्य थे। कार्यकारिणी के प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल पांच वर्ष था। 1919 ई. के अधिनियम के अन्तर्गत विधि-सदस्य की अर्हता में परिवर्तन किया गया। अब उसी व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया जा सकता था जो भारत के उच्च न्यायालयों में कम से कम दस वर्ष तक एडवोकेट रहा हो।
इस अधिनियम में यह भी कहा गया कि कार्यकारिणी में तीन सदस्य ऐसे होने चाहिए जिन्होंने ब्रिटिश ताज के अधीन कम से कम दस वर्ष सेवा की हो। इसके परिणामस्वरूप कार्यकारिणी में तीन भारतीय सदस्यों की नियुक्ति की गई किन्तु इन भारतीयों के हाथों में कोई वास्तविक शक्ति नहीं थी। कार्यकारिणी परिषद् केन्द्रीय विधान मण्डल के प्रति उत्तरदायी नहीं थी।
कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य अपनी भावी उन्नति के लिए गवर्नर जनरल की अनुशंसाओं पर निर्भर रहते थे। इसलिये वे किसी भी मामले में गवर्नर जनरल को असन्तुष्ट नहीं करते थे। इस प्रकार कार्यकारिणी पर गवर्नर जनरल का पूरा नियंत्रण था।
केन्द्रीय व्यवस्थापिका
इस अधिनियम द्वारा पहली बार दो सदनों वाली केन्द्रीय व्यवस्थापिका की स्थापना की गई। पहले सदन को विधान सभा और दूसरे सदन को राज्य सभा कहा जाता था। विधान सभा 3 वर्ष के कार्यकाल के लिए तथा राज्य सभा 5 वर्ष के कार्यकाल के लिए निर्वाचित होती थी। गवर्नर जनरल इन सदनों को कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व भी भंग कर सकता था। इनका संगठन इस प्रकार से किया गया था-
(1.) विधान सभा
विधान सभा में 145 सदस्य थे जिनमें 104 निर्वाचित सदस्य थे। निर्वाचित सदस्यों में से 52 सदस्य सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों से, 30 मुस्लिम, 2 सिक्ख, 9 यूरोपियन, 7 जमींदार तथा 4 भारतीय वाणिज्य के हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। 41 मनोनीत सदस्यों में 26 सरकारी अधिकारी और 15 गैर-सरकारी सदस्य होते थे।
(2) राज्य सभा
इसकी अधिकतम संख्या 60 थी। इनमें से सरकारी सदस्यों की अधिकतम संख्या 20 हो सकती थी। शेष 40 सदस्यों में से 34 निर्वाचित (19 सामान्य निर्वाचन क्षेत्र से, 12 साम्प्रदायिक क्षेत्रों में से और 3 विशेष निर्वाचन क्षेत्रों से) होते थे। 6 गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति गवर्नर जनरल द्वारा की जाती थी।
विधान मण्डल का कार्यक्षेत्र
विधान सभा, केन्द्रीय सूची में उल्लिखित विषयों पर ब्रिटिश भारत के लिए कानून बना सकती थी। गवर्नर जनरल की पूर्व स्वीकृति से यह प्रान्तों के लिए भी कानून बना सकती थी किन्तु यह 1919 के अधिनियम में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती थी तथा ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती थी जो ब्रिटिश संसद के किसी कानून के विरुद्ध हो।
केन्द्रीय बजट पहले विधान सभा में प्रस्तुत किया जाता था और फिर राज्य सभा में भेजा जाता था। बजट के लगभग 85 प्रतिशत भाग पर विधान सभा बहस तो कर सकती थी किन्तु मतदान नहीं कर सकती थी। शेष 15 प्रतिशत भाग के बारे में विधान सभा किसी खर्च के लिए मना कर सकती थी अथवा कोई कटौती कर सकती थी किन्तु यह किसी रकम को बढ़ा नहीं सकती थी।
कोई भी बिल, जब तक दोनों सदनों द्वारा पारित नहीं हो जाता था, कानून नहीं बन सकता था। बजट; राज्य सभा में उसी दिन प्रस्तुत किया जाता था, जिस दिन विधान सभा में प्रस्तुत किया जाता था। अन्य वित्त विधेयक पहले विधान सभा में प्रस्तुत किये जाते थे।
राज्य सभा, वित्त विधेयक को अस्वीकार कर सकती थी अथवा संशोधनों के लिए लौटा सकती थी। यदि विधान सभा, राज्य सभा की अस्वीकृति या संशोधनों के सुझाव से सहमत न हो तो गवर्नर जनरल अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करके उसे स्वीकार कर सकता था।
केन्द्रीय विधान मण्डल का ढांचा अत्यन्त दोषपूर्ण था। गवर्नर जनरल तथा उसकी कार्यकारिणी, विधान मण्डल के प्रति उत्तरदायी नहीं थी। विधान मण्डल, गवर्नर जनरल तथा उसकी कार्यकारिणी के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करके उन्हें त्यागपत्र देने को बाध्य नहीं कर सकता था।
वह केवल सार्वजनिक हितों के मामलों में प्रस्ताव कर सकता था किन्तु इन प्रस्तावों को मानना या न मानना गवर्नर जनरल की इच्छा पर निर्भर था। अतः विधान मण्डल के पास प्रभुत्व शक्ति का अभाव था। यह केवल कार्यकारिणी को प्रभावित कर सकता था।
गवर्नर जनरल, विधान मण्डल द्वारा पारित किसी भी विधेयक को अस्वीकार अथवा संशोधित कर सकता था। आपातकाल में वह अध्यादेश प्रसारित कर सकता था। इससे स्पष्ट है कि गवर्नर जनरल भारतीय प्रशासन में सर्वेसर्वा था और केन्द्रीय विधान मण्डल उसके सामने असहाय था।
कार्य-शक्तियों का विभाजन
इस अधिनियम द्वारा प्रान्तों में आंशिक उत्तरदायी सरकारें स्थापित की गई थीं। अतः शासन सम्बन्धी समस्त विषयों को दो सूचियों मे विभाजित किया गया- केन्द्रीय सूची और प्रान्तीय सूची। जो विषय दोनों सूचियों में सम्मिलित होने से रह गये थे; वे केन्द्रीय सरकार के अर्न्तगत आ जाते थे।
जिन विषयों के सम्बन्ध में सम्पूर्ण भारत अथवा एक से अधिक प्रान्तों में समान कानून की आवश्यकता अनुभव की गई, उन्हें केन्द्रीय सूची में रखा गया और प्रान्तीय हित के विषय प्रान्तीय सूची में रखे गये।
केन्द्रीय सूची में 47 विषय थे, जैसे- प्रतिरक्षा, वैदेशिक सम्बन्ध, देशी रियासतों से सम्बन्ध, रेल, डाक व तार, सिक्के तथा नोट, सैन्य सम्बन्धी विषय, सार्वजनिक ऋण, दीवानी तथा फौजदारी कानून, सीमा शुल्क, रुई पर उत्पादन कर, नमक कर, आयकर आदि।
प्रान्तीय सूची में 50 विषय रखे गये, जैसे- स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा चिकित्सा, शिक्षा, सार्वजनिक निर्माण कार्य, पुलिस तथा जेल, वन, सिंचाई, अकाल राहत, कृषि, भूमि कर, सहकारी संस्थाएं आदि। दोनों सूचियों के किसी विषय के सम्बन्ध में मतभेद होने पर उनका निर्णय गवर्नर जनरल करता था।
राजस्व विभाजन
प्रशासनिक अधिकारों की भांति राजस्व के साधनों को भी दो भागों- केन्द्रीय राजस्व तथा प्रान्तीय राजस्व में विभाजित किया गया। केन्द्रीय राजस्व में चुंगी, आयकर, रेल, डाक व तार, नमक, अफीम आदि रखे गये। प्रान्तीय राजस्व में भूमि कर, चुंगी, सिंचाई, स्टाम्प व रजिस्ट्रेशन आदि रखे गये। इस प्रकार राजस्व के प्रमुख स्रोत केन्द्र सरकार के पास थे।
(ग) प्रान्तीय शासन व्यवस्था
20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश ताज की राजकीय घोषणा का लक्ष्य भारत को क्रमिक रूप से उत्तरदायी सरकार प्रदान करना था। इस दिशा में अग्रसर होने के लिए सबसे अधिक उपर्युक्त क्षेत्र प्रान्त ही थे परन्तु प्रान्तों में भी 1919 के अधिनियम द्वारा आंशिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त को ही अपनाया गया, पूर्ण उत्तरदायित्व के सिद्धान्त को नहीं। द्वैध शासन, केवल उन प्रान्तों में लागू किया गया जिनमें गवर्नर होते थे। जिन छोटे प्रान्तों में चीफ कमिश्नर थे, उनमें यह लागू नहीं किया गया।
द्वैध शासन प्रणाली
1919 के अधिनियम के अन्तर्गत प्रान्तों में जो शासन व्यवस्था स्थापित की गई उसे द्वैध शासन प्रणाली कहा जाता है। द्वैध शासन का अर्थ है- दो शासकों का शासन। सम्पूर्ण प्रशासनिक विषयों को केन्द्रीय सूची और प्रान्तीय सूची में विभाजित किया गया।
इस अधिनियम द्वारा पहली बार प्रान्तीय विषयों को भी दो भागों में बांटा गया- रक्षित विषय और हस्तान्तरित विषय। जिन विषयों को भारतीयों के हाथों में देने से ब्रिटिश सरकार को हानि नहीं थी, उन विषयों को हस्तान्तरित किया गया था तथा उनका शासन भारतीय मंत्रियों को सौंपा गया।
उदाहरणार्थ- स्थानीय स्वशासन, चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं सफाई, यूरोपियनों एवं आंग्ल-भारतीयों की शिक्षा को छोड़कर शेष जनता की शिक्षा, सार्वजनिक कार्य, कृषि, सहकारी समितियां, मछली क्षेत्र, उद्योग-धन्धे, खाद्य वस्तुओं में मिलावट, जन्म तथा मृत्यु सम्बन्धी आंकड़े, तौल और माप आदि 22 विषय हस्तान्तरित रखे गये। शेष 28 विषय जो अधिक महत्त्वपूर्ण थे, वे रक्षित सूची में रखे गये, जैसे- भूमि कर, अकाल सहायता, न्यायिक प्रशासन, खनिज विकास, पुलिस, समाचार पत्र एवं छापाखानों पर नियन्त्रण, प्रान्तीय वित्त आदि।
दायित्व हस्तान्तरण
हस्तान्तरित विषयों का दायित्व भारतीय मंत्रियों को सौंपा गया, जो प्रान्तीय विधान परिषद् के प्रति उत्तरदायी होते थे। रक्षित विषयों का दायित्व गवर्नर तथा उसकी कार्यकारिणी परिषद् को सौंपा गया जो प्रान्तीय विधान परिषद् के प्रति उत्तरदायी न होकर भारत सचिव के प्रति उत्तरदायी होते थे।
रक्षित विषयों पर प्रान्तीय विधान परिषद् का कोई नियन्त्रण नहीं था। जहाँ यह विवाद उत्पन्न हो जाता कि कोई विषय रक्षित है अथवा हस्तान्तरित, वहाँ गवर्नर अन्तिम निर्णय देता था। इस प्रकार, हस्तान्तरित विषयों के सम्बन्ध में केन्द्रीय नियंत्रण में शिथिलता दी गई।
द्वैध शासन प्रणाली की असफलता
इस अधिनियम के माध्यम से यह अपेक्षा की गई थी कि शासन के दोनों भाग (एक ओर गवर्नर तथा कार्यकारिणी परिषद् और दूसरी ओर गवर्नर तथा मंत्रिमण्डल) आपसी सहयोग से शासन का संचालन करेंगे परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं होने से द्वैध शासन व्यवस्था असफल हो गई। संयुक्त प्रवर समिति का मत था कि मन्त्रियों को संयुक्त उत्तरदायित्व के अनुसार काम करना चाहिए।
इसलिए 1919 ई. के अधिनियम की एक धारा में, ‘हस्तान्तरित विषयों के सम्बन्ध में गवर्नर अपने मन्त्रियों की सलाह से कार्य करेगा’ की व्यवस्था की गई परन्तु अधिनियम में ‘मंत्री संयुक्त रूप से उत्तरदायी होंगे’ के लिए कोई नियम नहीं बनाया गया। अतः गवर्नर ने इसका लाभ उठाते हुए अलग-अलग मन्त्रियों से पृथक् विचार-विमर्श का तरीका अपनाया ताकि मन्त्रियों को दबा कर रखा जा सके।
प्रान्तीय कार्यपालिका
प्रान्तीय कार्यपालिका को भी दो भागों में बांटा गया। एक भाग तो गवर्नर और कार्यकारिणी परिषद् थी और दूसरा भाग गवर्नर और भारतीय मन्त्री थे। कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में कार्यकारिणी परिषद् में चार सदस्य थे, अन्य प्रान्तों में केवल दो सदस्य थे। यह व्यवस्था की गई कि कार्यकारिणी परिषद् में आधे सदस्य गैर-सरकारी भारतीय होंगे।
कार्यकारिणी के समस्त सदस्य पांच वर्ष के लिए ब्रिटिश ताज द्वारा भारत सचिव की अनुंशसा पर नियुक्त किये जाते थे। व्यवहार में जिन व्यक्तियों के नाम की अनुंशसा गवर्नर जनरल करता था, भारत सचिव उन्हीं को स्वीकृति दे देता था। गवर्नर, प्रांतीय कार्यकारिणी परिषद् का प्रधान होता था तथा वह कार्यकारिणी के किसी भी निर्णय की उपेक्षा कर सकता था।
हस्तान्तरित विषयों का शासन चलाने के लिए मन्त्री नियुक्त किये गये। उनकी अधिकतम संख्या निश्चित नहीं की गई। बम्बई, कलकत्ता एवं मद्रास में तीन मन्त्री नियुक्त किये गये और शेष प्रान्तों में दो मन्त्री नियुक्त किये गये थे। मन्त्रियों की नियुक्ति गवर्नर द्वारा की जाती थी तथा उसकी इच्छा रहने तक ही वे अपने पद पर बने रह सकते थे।
मन्त्रियों की नियुक्ति विधान परिषद् के सदस्यों में से की जाती थी। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्री नियुक्त कर दिया जाता जो विधान परिषद् का सदस्य नहीं होता था, तो उसे 6 महीने में विधान परिषद् का सदस्य बनना होता था अथवा मन्त्री पद छोड़ना होता था। जिस मन्त्री में विधान परिषद् का विश्वास नहीं होता था, उसे भी पद छोड़ना होता था।
गवर्नर को बिना कारण बताये मन्त्रियों को हटाने का अधिकार था। इस प्रकार, मन्त्रियों को विधान परिषद् तथा गवर्नर की दया पर छोड़ दिया गया था। इसलिए मन्त्रियों को अपने दो स्वामियों को प्रसन्न रखना पड़ता था।
यदि मन्त्रियों की सलाह से प्रान्त की शान्ति या सुरक्षा में बाधा उत्पन्न होती हो अथवा अल्पसंख्यकों के हितों के विरुद्ध हो अथवा भारत सचिव व गवर्नर जनरल के आदेशों के विरुद्ध हो तो गवर्नर, मन्त्रियों की सलाह की उपेक्षा करके अपनी इच्छानुसार कार्य कर सकता था।
यदि किसी कारण से हस्तान्तरित विषयों का शासन इस अधिनियम के अनुसार नहीं चलाया जा सकता था, तो गवर्नर भारत सचिव की पूर्व स्वीकृति से इस अधिनियम को, अनिश्चित अवधि के लिये स्थगित कर सकता था। ऐसी स्थिति में हस्तान्तरित विषयों का प्रशासन रक्षित विषयों की तरह चलाया जा सकता था।
प्रान्तीय विधान मण्डल
भारत सरकार अधिनियम 1919 के द्वारा केन्द्र में कानून बनाने के लिए दो सदन रखे गये किंतु प्रान्तों में केवल एक ही सदन रखा गया। अतः प्रान्तीय विधान मण्डल से अभिप्राय केवल विधान परिषद् से है। इस अधिनियम के अन्तर्गत विधान परिषद के सदस्यों की संख्या में वृद्धि हो गई। प्रत्येक प्रान्त में इसके सदस्यों की संख्या भिन्न-भिन्न थी।
मद्रास की विधान परिषद् के कुल सदस्यों की संख्या 132 थी, बम्बई 114, बंगाल 140, उत्तर प्रदेश 123, पंजाब 94, बिहार और उड़ीसा 103, मध्य प्रान्त 73, असम 531. यह व्यवस्था की गई कि विधान परिषद् में कम से कम 70 प्रतिशत सदस्य निर्वाचित होंगे। 20 प्रतिशत से अधिक सरकारी अधिकारी नहीं होंगे।
कुछ मनोनीत गैर-सरकारी सदस्य होते थे। गवर्नर की कार्यकारिणी के सदस्य विधान परिषद् के पदेन सदस्य होते थे। विधान परिषद् का कार्यकाल तीन वर्ष था किन्तु गवर्नर उसे, अवधि से पूर्व भी भंग कर सकता था और विशेष परिस्थिति में उसकी अवधि एक वर्ष के लिए बढ़ा भी सकता था।
यद्यपि प्रान्तों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत स्थापित कर दिया गया परन्तु मताधिकार इतना सीमित रखा गया कि 1920 ई. में ब्रिटिश भारत की 24 करोड़ 17 लाख जनसंख्या में से केवल 53 लाख लोगों को ही मताधिकार दिया गया। मताधिकार के लिए प्रत्येक प्रान्त में अलग अर्हताएं निर्धारित की गईं।
सामान्यतः जो लोग देहाती क्षेत्रों में 10 रुपये से लेकर 50 रुपये तक प्रतिवर्ष भूमि कर देते थे, उन्हें मत देने का आधिकार दे दिया गया। नगरों में जो कम से कम 2000 रुपये वार्षिक आय पर आयकर देते थे या जिन्हें अपने मकान से कम से कम 36 रुपये वार्षिक किराया मिलता था या जो 36 रुपये वार्षिक किराया देते थे या जो नगरपालिका को कम से कम 3 रुपये वार्षिक टैक्स देते थे, वे अपना नाम मतदाता सूची में लिखवा सकते थे।
प्रान्तीय विधान परिषद् को यह अधिकार दिया गया कि वह अपने प्रान्त में अच्छी सरकार के लिए कानून बनाये। इस अधिनियम से पूर्व प्रत्येक बिल के लिए गवर्नर जनरल की आज्ञा लेना आवश्यक था किन्तु इस अधिनियम में यह तय किया गया कि कुछ विशेष मामलों को छोड़कर शेष के लिए गवर्नर जनरल की आज्ञा की आवश्यकता नहीं रहेगी परन्तु गवर्नर तथा गवर्नर जनरल को विशेष शक्तियां देकर विधान परिषद् के अधिकारों को सीमित कर दिया गया।
विधान परिषद् को कई वित्तीय शक्तियां दी गईं परन्तु गवर्नर की विशेष शक्तियों द्वारा उन पर अनेक प्रतिबंध लगा दिये गये ताकि यदि विधान परिषद् गवर्नर की इच्छानुसार किसी मांग को पारित न करेे, तो गवर्नर अपनी विशेष शक्ति द्वारा पारित कर सके। बजट को दो भागों में बांट दिया जाता था। पहले भाग में वे रकमें सम्मिलित की जाती थीं जिन पर विधान परिषद् केवल बहस कर सकती थी, अपना मत नहीं दे सकती थी।
द्वैध शासन के दोष और उसकी असफलता के कारण
यद्यपि कांग्रेस ने द्वैध शासन प्रणाली का बहिष्कार किया था तथापि 1924 ई. में कांग्रेस की ओर से स्वराज पार्टी ने चुनावों में भाग लिया तथा विधान मण्डलों में प्रवेश कर इसे असफल बनाने का प्रयास किया। अतः सरकार ने मुडीमैन समिति की नियुक्ति की। इस समिति के यूरोपियन सदस्यों ने द्वैध शासन को मौलिक रूप से सही माना परन्तु समिति के भारतीय सदस्यों ने इसे गलत बताया।
साइमन कमीशन ने भी द्वैध शासन प्रणाली के कई दोषों पर प्रकाश डाला। नेहरू रिपोर्ट में भी इसकी कटु आलोचना की गई। 1921 से 1937 ई. तक ब्रिटिश भारतीय प्रान्तों में द्वैध शासन पद्धति चालू रही परन्तु इसमें निहित दोषों के कारण इसका विफल होना निश्चित था। द्वैध शासन के निम्नलिखित दोष उसकी असफलता के कारण सिद्ध हुए-
(1.) सैद्धान्तिक दृष्टि से दोषपूर्ण
द्वैध शासन सैद्धान्तिक दृष्टि से दोषपूर्ण था। यह मान लिया गया था कि भारतीय अभी पूर्ण उत्तरदायी शासन के लिए अयोग्य हैं। इसलिए भारत में आरम्भ में आंशिक उत्तरदायी सरकार की स्थापना की जाये ताकि भारतीय मन्त्रियों को साधारण अधिकार मिल जायें और वास्तविक सत्ता अँग्रेजों के हाथों में बनी रहे।
इसलिए भारतीयों का द्वैध शासन प्रणाली से असन्तुष्ट हो जाना स्वाभाविक था। प्रान्तीय सरकार को दो भागों में बांटना बिल्कुल गलत था जिसमें एक भाग विधान मण्डल के प्रति उत्तरदायी था और दूसरा अनुत्तरदायी था। इससे शासन की एकता तथा कार्यक्षमता नष्ट हो गई।
सर रेजीनाल्ड क्राउक ने लिखा है- ‘द्वैध शासन एक प्रकार की वर्णसंकर व्यवस्था है जो कभी स्थाई नहीं रह सकती, क्योंकि किसी देश अथवा प्रांत के शासन का संचालन दो पृथक् अथवा स्वतंत्र मन्त्रिमण्डलों द्वरा सफलतापूर्वक नहीं किया जा सकता।’
(2.) विषयों का अवैज्ञानिक विभाजन
प्रान्तीय विषयों का रक्षित और हस्तांतरित विषयों में बंटवारा, सरकार की एकता को नष्ट करने वाला कदम था। इस विभाजन से नित्य नई समस्याएं उत्पन्न होती थीं। विषयों का बंटवारा भी अवैज्ञानिक ढंग से किया गया ताकि किसी भी मन्त्री के पास किसी भी समूचे विभाग का नियंत्रण न रहे और वे सदैव ही गवर्नर तथा उसकी कार्यकारिणी पर निर्भर रहें। उदाहराणार्थ, कृषि और सिंचाई का अभिन्न सम्बन्ध है किन्तु कृषि को हस्तान्तरित विषय और सिंचाई को रक्षित विषय रखा गया।
मद्रास सरकार के व्यवसाय मंत्री सर के. वी. रेड्डी ने मुडीमैन कमेटी के समक्ष गवाही देते हुए कहा- ‘मैं कृषि मन्त्री था, पर सिंचाई से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं था। कृषि मन्त्री होते हुए भी मेरा मद्रास कृषक ऋण अधिनियम और मद्रास भूमि विकास ऋण अधिनियम से कोई सरोकार नहीं था। सिंचाई, कृषि ऋण, भूमि विकास ऋण और अकाल राहत के बिना कृषि मन्त्री की कार्यक्षमता और प्रभाव की केवल कल्पना ही की जा सकती है। मैं मन्त्री था उद्योग का परन्तु कारखाने, भाप यंत्र, जल-विद्युत तथा श्रम विभाग मेरे पास नहीं थे, क्योंकि ये सब रक्षित विषय थे।’
(3.) गवर्नर की विशेष शक्तियां
1919 के अधिनियम के अन्तर्गत गवर्नरों को विशेष शक्तियां प्रदान की गईं जिसके कारण द्वैध शासन सफलतापूर्वक कार्य नहीं कर पाया। गवर्नर ने तीन प्रकार से सारी शक्तियां अपने हाथों में ले लीं-
(1.) गवर्नर को सरकार चलाने के लिये नियम बनाने तथा आदेश जारी करने का अधिकर था। उन्होंने नियम बना दिया कि सचिव अपने विभागीय कार्य के लिए सप्ताह में एक बार गवर्नर से मिले तथा उनके और मंत्रियों के मतभेद के प्रकरण गवर्नर के निर्णय हेतु प्रस्तुत करे। इससे मंत्री बिल्कुल शक्तिहीन हो गये और सचिव उनके विरुद्ध गवर्नर के कान भरने लगे।
(2.) गवर्नरों ने मन्त्रियों से इकट्ठा मिलने की बजाय अलग-अलग मिलन आरम्भ कर दिया, इससे मन्त्रियों की बातों की उपेक्षा करना आसान हो गया।
(3.) गवर्नरों ने यह सिद्धन्त अपना लिया कि मन्त्री केवल परामर्शदाता है और यह गवर्नर की इच्छा पर निर्भर है कि वह मन्त्रियों की किसी बात को माने या न माने। इसलिये गवर्नर मन्त्रियों की उचित सलाह की भी उपेक्षा करने लगे।
(4.) संयुक्त विचार-विमर्श का अभाव
अधिनियम के निर्माताओं ने प्रान्तीय सरकार के दोनों भागों (रक्षित तथा हस्तांतरित) के संयुक्त विचार-विमर्श की अनुशंसा की थी ताकि मन्त्रियों के माध्यम से गवर्नर की कार्यकारिणी को जन-इच्छाओं की जानकारी मिल सके और कार्यकारिणी के सदस्यों के अनुभव से मन्त्री भी कुछ सीख सकें।
गवर्नरों को इस प्रकार के निर्देश भी दिये गये थे किन्तु मद्रास के गवर्नर को छोड़कर अन्य किसी भी गवर्नर ने इन निर्देशों का पालन नहीं किया। बजट पर विचार करने के अतिरिक्त कार्यकारिणी के सदस्य तथा मन्त्रिगण शासन सम्बन्धी मामलों पर विचार विमर्श के लिए कभी सम्मिलित नहीं होते थे। इससे उनमें निरन्तर अविश्वास और तनातनी रहती थी और वे सार्वजनिक रूप से एक दूसरे की निन्दा करते थे।
(5.) संयुक्त उत्तरदायित्व का अभाव
मन्त्री किसी भी संगठित दल के प्रतिनिधि नहीं थे, अतः वे किसी निश्चित कार्यक्रम से बंधे हुए नहीं थे। गवर्नरों ने उनमें संयुक्त उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न करने का प्रयास नहीं किया और न कभी सामूहिक विचार-विमर्श होने दिया। इसलिए विभिन्न समस्याओं पर उनके भिन्न-भिन्न विचार होते थे।
कई बार एक मन्त्री, दूसरे मन्त्री की योजना की विधान परिषद् में आलोचना भी कर देता था। मन्त्रियों का कार्यकारिणी के साथ भी कोई समन्वय नहीं था। मन्त्री, विधान परिषद् के प्रति उत्तरदायी थे। जबकि कार्यकारिणी के सदस्य विधान परिषद् के प्रति उत्तरदायी नहीं थे। संयुक्त उत्तरदायित्व के अभाव में प्रशासन में अनेक कठिनाइयां उत्पन्न होने लगीं।
(6.) मन्त्रियों की कमजोर स्थिति
इस अधिनियम के अन्तर्गत मन्त्रियों को वास्तविक अधिकार नहीं दिये गये जिससे उनकी स्थिति काफी कमजोर बनी रही। वे राष्ट्र-निर्माण सम्बन्धी विभिन्न विभागों का संचालन करते थे परन्तु उनके पास कोष नहीं थे। प्रान्तों में वित्त विभाग रक्षित विषय था। अतः वित्त विभाग हर मामले में रक्षित विषयों का पक्ष लेता था और हस्तांतरित विषयों के मार्ग में अनेक प्रकार की बाधाएं उत्पन्न कर देता था, ताकि यह सिद्ध कर दिया जाये कि भारतीय मन्त्री अयोग्य हैं।
वित्त विभाग का प्रयत्न रहता था कि हस्तान्तरित विभागों की मांगों पर विचार करने से पूर्व रक्षित विभागों की सारी मांगें पूरी कर दी जायें और फिर हस्तांतरित विभागों के सामने धन की कमी का बहाना लेकर उनकी मांगें अस्वीकार कर दी जायें। गवर्नर हस्तान्तरित विषयों में जब चाहे हस्तक्षेप कर सकता था और कारण बताये बिना, किसी भी मन्त्री को पदच्युत कर सकता था। इन कारणों से द्वैध शासन का असफलता हो जाना स्वभाविक ही था।
(7.) विधान परिषद् का दोषपूर्ण गठन
प्रान्तों की विधान परिषदों के गठन में दोष था। लगभग 30 प्रतिशत सदस्य सरकारी अधिकारी अथवा सरकार द्वारा मनोनीत गैर-सरकारी अधिकारी होते थे। जो सदस्य निर्वाचित थे, वे विभिन्न सम्प्रदायों तथा विशेषाधिकार प्राप्त तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करते थे। मतदान का अधिकार भी सम्पत्ति, आयकर तथा राजस्व सम्बन्धी योग्यता पर आधारित था। अतः विधान परिषद् के अधिकांश सदस्य सरकार को प्रसन्न रखने के पक्ष में थे, ताकि वे अपने-अपने सम्प्रदायों अथवा हितों के लिए अधिक सुविधाएं प्राप्त कर सकें।
(8.) बाह्य परिस्थितियों का योगदान
अनेक बाह्य परिस्थितियों ने भी इस अधिनियम को असफल बनाया। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अनेक राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हो गयी थी। ब्रिटेन ने भी अपने कुछ अधिराज्यों के साथ समानता का व्यवहार करना आरम्भ कर दिया था। एशिया में नई राष्ट्रीय जागृति उत्पन्न हो चुकी थी।
ऐसी परिस्थितियों में भारतीयों को ब्रिटिश सरकार के ये सुधार अपर्याप्त और निराशाजनक प्रतीत हुए। स्वराज पार्टी ने विधान मण्डलों में प्रवेश किया परन्तु उसका ध्येय सरकार के मार्ग में रोड़े अटका कर द्वैध शासन को अव्यवहारिक सिद्ध करना था। 1930 ई. के बाद कांग्रेस का लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना हो गया। ब्रिटिश सरकार ने विधान मण्डलों की इच्छाओं की अवहेलना कर उदारवादियों को भी असंतुष्ट कर दिया।
डॉ. जकारिया ने लिखा है- ‘सरकार के इस निर्णय ने कि सुधारों पर इस तरह अमल किया जाय, जिससे लोगों को स्वशासन के कम से कम अधिकार मिलें और दूसरी तरफ स्वराज दल की इस नीति ने कि सरकार के संचालन में अधिक से अधिक रुकावटें लगाई जायें, 1919 के सुधारों के भाग्य का पहले से ही निर्णय कर दिया।’
कूपलैण्ड ने स्वीकार किया है कि द्वैध शासन असफल रहा, क्योंकि वह अपने रचयिताओं के मूल उद्देश्यों का पूरा न कर सका। द्वैध शासन की असफलता का एक कारण सिविल सेवकों पर मन्त्रियों का नियन्त्रण न होना भी था। अखिल भारतीय नौकरियों के सदस्य जो हस्तांतरित विभागों का संचालन करते थे, मन्त्रियों के अधीन नहीं थे।
गवर्नर तक सिविल सेवकों की निजी पहुंच थी और उनके हित भारत सचिव द्वारा संरक्षित थे। मन्त्रियों तथा सिविल सेवकों में बनती ही नहीं थी। सिविल सेवकों के विरुद्ध मन्त्रियों की शिकायतें निरर्थक सिद्ध होती थीं। असहयोग आन्दोलन तथा खिलाफत आन्दोलन ने देश में कटुता, अविश्वास और असहयोग का ऐसा वातावरण पैदा कर दिया था कि शासन का चलना असम्भव था।
संसदीय शासन प्रणाली के लिये मील का पत्थर
मारिस जोंस, गुरुमुख निहालसिंह, एम. वी. वायली आदि विद्वानों का मत है कि द्वैध शासन प्रणाली ने भारत में संसदीय सरकार के विकास में योगदान दिया। 1920 से 1937 ई. की अवधि में भारत में चार आम चुनाव हुए। इन चुनावों के उपरान्त गठित विधान सभाओं में भारतीय नेताओं को संसदीय परम्पराओं का व्यक्तिगत अनुभव हुआ तथा भारतीय मन्त्रियों को स्वशासन का प्रशिक्षण मिला।
उन्हें इस बात का अनुभव हुआ कि स्वशासन के मार्ग में कौनसी बाधाएं आ सकती हैं और उन्हें कैसे हल किया जा सकता है? मतदाताओं की दृष्टि से भी द्वैध शासन व्यवस्था की यह अवधि बिल्कुल बेकार नहीं गई। विधान सभाओं की दर्शक-दीर्घाएं सामान्यतः भरी रहती थीं।
वाद-विवाद का पूरी तरह से प्रचार होता था और जनता उसे पढ़ती थी। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में संसदीय शासन का आरम्भ हो गया था। इस दृष्टि से द्वैध शासन को भारत में संसदीय शासन प्रणाली की दिशा में मील का पत्थर कहा जा सकता है।
मारिस जोंस ने लिखा है- ‘प्रान्तीय स्तर पर प्रशासन के एक विशिष्ट क्षेत्र में उत्तरदायी शासन को मान्यता देकर 1919 के अधिनियम ने ससंदीय संस्थाओं का आरम्भ किया।’
भारत सरकार अधिनियम 1935 के माध्यम से प्रान्तों में स्वायत्त शासन तथा केन्द्र में आंशिक उत्तरदायी सरकार की स्थापना की व्यवस्था की गई। इसलिए भारत सचिव के उन अधिकारों में कमी की गई जिनके द्वारा वह भारत सरकार पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रखता था किन्तु गवर्नर जनरल तथा गवर्नरों के अधिकारों में वृद्धि कर दी गई।
कांग्रेस सहित समस्त राष्ट्रीय संस्थाओं ने 1919 ई. के सुधारों को अपर्याप्त, असन्तोषजनक और निराशापूर्ण घोषित किया। 1919 के सुधारों की जांच करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1927 ई. में साइमन कमीशन को भारत भेजा। भारतीयों ने इस कमीशन का तीव्र विरोध किया।
कांग्रेस ने साइमन रिपोर्ट के प्रत्युत्तर में नेहरू रिपोर्ट तैयार की किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इस रिपोर्ट की उपेक्षा की। इससे राष्ट्रीय आन्दोलन तीव्र हो उठा। ब्रिटिश सरकार ने भावी सुधारों के बारे में विचार विमर्श करने के लिए लन्दन में तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किये।
इन गोलमेज सम्मेलनों में हुए विचार-विमर्श के आधार पर मार्च 1933 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के भावी सुधारों का एक श्वेत-पत्र प्रकाशित किया। श्वेत-पत्र में दिये गये सरकारी निर्णयों एवं प्रस्तावों पर विचार करने के लिए एक संयुक्त संसदीय-समिति बनाई गई। 11 नवम्बर 1934 को इस समिति का प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ।
इस प्रतिवेदन में थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित किया। अगस्त 1935 में इसे ब्रिटिश क्राउन की स्वीकृति प्राप्त हो गई। इस अधिनियम को भारत सरकार अधिनियम 1935 कहा जाता है। इस अधिनियम में 321 धाराएं और 10 परिशिष्ट हैं।
इस अधिनियम में भी अनेक कमियां थीं फिर भी यह अधिनियम अत्यन्त महत्त्व का था। इसमें पहली बार ब्रिटिश प्रान्तों एवं देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ स्थापित करने, प्रान्तों में द्वैध शासन के स्थान पर प्रान्तीय स्वराज्य प्रारम्भ करने और केन्द्र में द्वैध शासन की स्थापना किये जाने की व्यवस्था की गई थी।
भारत सरकार अधिनियम 1935 की मुख्य विशेषताएँ
भारत सरकार अधिनियम-1935 की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-
(1.) गृह-सरकार के नियन्त्रण में ढील
भारत सरकार अधिनियम 1935 के माध्यम से प्रान्तों में स्वायत्त शासन तथा केन्द्र में आंशिक उत्तरदायी सरकार की स्थापना की व्यवस्था की गई। इसलिए भारत सचिव के उन अधिकारों में कमी की गई जिनके द्वारा वह भारत सरकार पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रखता था किन्तु गवर्नर जनरल तथा गवर्नरों के अधिकारों में वृद्धि कर दी गई। इससे भारत सचिव पहले की तरह ही शक्तिशाली हो गया क्योंकि गवर्नर जनरल और गवर्नर उसी के अधीन थे। इस प्रकार 1935 के अधिनियम से भारत सचिव के प्रत्यक्ष नियंत्रण में कमी अवश्य हुई परंतु उसकी वास्तविक सत्ता पूर्ववत् बनी रही।
1935 के अधिनियम द्वारा भारत परिषद् (इंडिया कौंसिल) को समाप्त करके सलाहकार परिषद् की स्थापना की गई। सलाहकारों की संख्या कम से कम तीन और अधिक से अधिक छः निश्चित की गई। इन सलाहकारों में से आधे ऐसे होने चाहिए थे जो भारत में 10 वर्ष तक ब्रिटिश सरकार के कर्मचारी रह चुके हों तथा अपनी नियुक्ति के समय उन्हें भारत छोड़े हुए दो वर्ष से अधिक नहीं हुए हों।
सलाहकारों का कार्यकाल पांच वर्ष निश्चित किया गया। कुछ निश्चित बातों को छोड़कर यह भारत मंत्री (सचिव) की इच्छा पर निर्भर था कि वह उनसे परामर्श करे अथवा नहीं। यदि परामर्श करे तो सामूहिक रूप से अथवा व्यक्तिगत रूप से? इस प्रकार यह सलाहकार परिषद पहले की भारत परिषद् से कहीं अधिक व्यर्थ और शक्तिहीन थी।
भारत सरकार अधिनियम 1935 के द्वारा हाई कमिश्नर का पद बना रहा। अब उसकी नियुक्ति गर्वनर जनरल के व्यक्तिगत निर्णय पर छोड़ दी गई। गवर्नर जनरल उसे पद से हटा भी सकता था, अतः वह ब्रिटिश हितों को ही संरक्षण देता था। भारत सचिव का हस्तान्तरित विषयों पर नियंत्रण लगभग समाप्त कर दिया गया तथा उसका शासन पूर्णतः, भारतीय मन्त्रियों को सौंप दिया गया परंतु जिन विषयों में गवर्नर जनरल और गवर्नर अपनी व्यक्तिगत इच्छा से काम करते थे, वहाँ भारत सचिव का नियंत्रण पूर्ववत बना रहा।
व्यावहारिक रूप में इससे कोई अन्तर नहीं पड़ा, क्योंकि 1935 के अधिनियम का संघीय पक्ष कभी लागू ही नहीं हुआ तथा केन्द्र का प्रशासन 1919 के अधिनियम के अनुसार चलता रहा। केवल प्रान्तों में जहाँ पूर्ण स्वायत्तता दी गई, वहाँ गृह सरकार के नियंत्रण में कमी आ गई थी।
(2.) अखिल भारतीय संघ की स्थापना
भारत सरकार अधिनियम 1935 के अन्तर्गत एक अखिल भारतीय संघ स्थापित करने की व्यवस्था की गई जिसमें 11 गवर्नरों के प्रान्त , 6 चीफ कमिश्नरों के प्रान्त और भारत की 566 देशी रियासतों को सम्मिलित करने की व्यवस्था की गई। ब्रिटिश भारत के प्रान्तों के लिए संघ में सम्मिलित होना अनिवार्य था परन्तु देशी रियासतों के लिए यह ऐच्छिक था। इसलिए प्रस्तावित संघ दो शर्तें पूरी होने के पश्चात् ही स्थापित किया जा सकता था-
(क.) संघीय संसद के दोनों सदन ब्रिटिश सम्राट से प्रार्थना करें कि संघ की स्थापना की जाये।
(ख.) कम से कम इतनी देशी रियासतें संघ में सम्मिलित होने की स्वीकृति दें कि उनकी जनसंख्या कुल रियासती जनसंख्या की आधी से अधिक हो तथा जो संघीय सभा में 53 स्थानों से अधिक स्थानों के अधिकारी हों।
संघ के दोनों सदनों में देशी राज्यों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया था। संघीय विधान सभा में 375 सदस्यों में से 125 सदस्य तथा संघीय राज्य सभा में 260 सदस्यों में से 140 सदस्य देशी रियासतों के प्रतिनिधि होनेे थे। चूंकि देशी रियासतों ने निर्धारित संख्या में संघ में सम्मिलित होना स्वीकार नहीं किया, अतः इस अधिनियम की संघीय योजना कार्यान्वित ही नहीं हो सकी।
(3.) केन्द्र में द्वैध शासन की स्थापना
1935 के अधिनियम द्वारा प्रान्तों में द्वैध शासन का अन्त कर दिया गया तथा केन्द्र में द्वैध शासन लागू कर दिया गया। संघीय विषयों को दो भागों में बांटा गया- रक्षित विषय तथा हस्तान्तरित विषय। रक्षित विषयों में प्रतिरक्षा, विदेशी मामले, चर्च सम्बन्धी मामले और कबाइली क्षेत्र के मामले सम्मिलित थे।
इनका शासन गवर्नर जनरल अपनी इच्छानुसार चला सकता था। रक्षित विषयों के प्रशासन में गवर्नर जनरल एक कार्यकारिणी परिषद् की सहायता लेता था, जिसमें सदस्यों की संख्या तीन से अधिक नहीं हो सकती थी। उनकी नियुक्ति सम्राट करता था और वे गवर्नर जनरल के प्रति उत्तरदायी होते थे। ये केन्द्रीय विधान मण्डल के दोनों सदनों के पदेन सदस्य होते थे और उनकी बैठकों में भाग लेते थे किन्तु उनके प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
हस्तान्तरित विषयों का शासन चलाने के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होती थी जो संघीय विधान मण्डल के प्रति उत्तरदायी थी। मन्त्रियों की नियुक्ति और पदमुक्ति गवर्नर जनरल द्वारा होती थी। इनकी अधिकतम संख्या 10 हो सकती थी। मन्त्रियों के लिए यह आवश्यक था कि वे संघीय विधान मण्डल के किसी भी सदन के सदस्य हों।
न होने की स्थिति में 6 माह में सदन का सदस्य बनें या पद-त्याग करें। हस्तान्तरित विषयों के बारे में यह आशा की गई थी कि गवर्नर जनरल मन्त्रियों की सलाह से उनका शासन चलायेगा किंतु हस्तान्तरित विषयों के सम्बन्ध में गवर्नर जनरल को विशेषाधिकार दिये जाने से स्थिति पहले जैसी ही हो गई।
(4.) संघीय विधान मण्डल की निर्बलता
संघीय विधान मण्डल के दो सदन थे- संघीय विधान सभा और संघीय राज्य सभा। संघीय विधान सभा में 375 सदस्य थे जिनमें 125 स्थान देशी रियासतों को दिये गये। इनका मनोनयन देशी रियासतों के नरेशों को करना था। प्रान्तों के प्रतिनिधियों का चुनाव सामान्य स्थानों, मुसलमानों व सिक्खों के सुरक्षित स्थानों पर अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा होना था।
इनमें 82 स्थान मुसलमानों को प्राप्त थे। इस प्रकार, देशी रियासतों के मनोनीत प्रतिनिधियों और मुस्लिम प्रतिनिधियों को मिलाकर सरकार बड़ी सरलता से अपना स्थायी बहुमत स्थापित कर सकती थी।
इसी प्रकार, संघीय राज्य सभा में कुल 260 स्थानों में से 140 स्थान देशी रियासतों को दिये गये और 6 स्थानों पर महिलाओं, अल्पमतों तथा दलित वर्ग को प्रतिनिधित्व देने के लिए गवर्नर जनरल द्वारा मनोनीत किये जाने थे। शेष सदस्यों का चुनाव साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली के आधार पर अप्रत्यक्ष रूप से होना था। अतः संघीय राज्य सभा में भी सरकार सरलता से अपना बहुमत स्थापित कर सकती थी।
संघीय विधान मण्डल की शक्तियों को सीमित करके उसे निर्बल बना दिया गया। विधान मण्डल 1935 के अधिनियम में संशोधन नहीं कर सकता था और न ब्रिटिश संसद के कानूनों के विरुद्ध कोई कानून पारित कर सकता था। विधान मण्डल द्वारा पारित किसी भी विधेयक को गवर्नर जनरल अस्वीकृत कर सकता था और गवर्नर जनरल द्वारा स्वीकृत विधेयक को इंग्लैण्ड की संसद रद्द कर सकती थी। विधान मण्डल की वित्तीय शक्तियाँ अत्यंन्त सीमित थीं।
बजट के दो भाग थे- (1.) भारत के राजस्व से किया जाने वाला व्यय (2.) शेष व्यय। भारत के राजस्व से किया जाने वाला व्यय सम्पूर्ण बजट का लगभग 80 प्रतिशत होता था, जिस पर विधान मण्डल बहस तो कर सकता था किन्तु उसमें कोई कटौती नहीं कर सकता था। कोई भी वित्त विधेयक गवर्नर जनरल की पूर्व स्वीकृति के बिना विधान मण्डल में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था।
विधान मण्डल के अधिवेशन के दौरान भी गवर्नर जनरल को आपात-कालीन अधिकार थे। वह अधिनियम भी पारित कर सकता था। गवर्नर जनरल के आपात-कालीन अधिकार भी व्यापक थे। वह इस अधिनियम को स्थगित करके, न्यायालय के अतिरिक्त अन्य समस्त अधिकार अपने हाथ में ले सकता था।
विधान मण्डल को निर्बल बनाना, अँग्रेजों की सोची-समझी चाल थी। क्योंकि वे भारतीयों को वास्तविक शक्ति देना ही नहीं चाहते थे। प्रो. कीथ ने लिखा है- ‘इस अधिनियम द्वारा एक ओर तो भारतीयों को यह विश्वास दिलाने की चेष्टा की गई कि उन्हें सब कुछ दे दिया गया है और दूसरी ओर संरक्षणों और आरक्षणों की व्यवस्था कर अँग्रेजों को यह विश्वास दिलाया गया कि उन्होंने कुछ भी नहीं खोया है।’
(5.) अधिकारों के विभाजन की नई पद्धति
इस अधिनियम द्वारा विषयों का विभाजन किया गया। संघीय सूची में संघीय सरकार से सम्बन्धित 59 विषय थे। प्रान्तीय सूची में प्रान्तीय हितों के 54 विषय थे। जिन 36 विषयों के सम्बन्ध में संघ और प्रान्त, दोनों कानून बना सकते थे, उन्हें समवर्ती सूची में रखा गया।
इस सूची में यदि प्रान्त और केन्द्रीय विधान मण्डल के कानून में किसी प्रकार का विरोध उत्पन्न हो जाये तो केन्द्रीय विधान मण्डल का कानून मान्य था। अवशिष्ट शक्तियों के बारे में यह व्यवस्था की गई कि गवर्नर जनरल अपनी इच्छा से केन्द्रीय विधान मण्डल अथवा प्रान्तीय विधान मण्डल को इन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति दे सकता था।
विश्व के किसी भी संविधान में अधिकारों के विभाजन की ऐसी पद्धति नहीं थी। विश्व के संघीय संविधानों में दो पद्धतियां प्रचलित थीं- (1.) संघ के अधिकार क्षेत्रों की स्पष्ट व्याख्या करके अवशिष्ट शक्तियां संघीय इकाइयों को सौंप दी गई थीं। (2.) संघीय इकाईयों के अधिकार क्षेत्र की स्पष्ट व्याख्या करके अवशिष्ट शक्तियां संघ को सौप दी गई थीं।
1935 के अधिनियम में समवर्ती सूची के सम्बन्ध में संघ को उच्चता दे दी गई और अवशिष्ट शक्तियों के सम्बन्ध में गवर्नर जनरल को अधिकार दे दिया गया।
संघीय व्यवस्थापिका में साम्प्रदायिक निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था प्रजातंत्रीय भावना के प्रतिकूल थी। मताधिकार भी धनी तथा विशेष प्रकार के पदों पर आसीन व्यक्तियों को दिया गया था। शक्तियों के उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि व्यवस्थापिका की शक्तियां नाम-मात्र की थीं। गवर्नर जनरल तथा ब्रिटिश क्राउन के प्रतिबन्धों का क्षेत्र बहुत व्यापक था। व्यवस्थापिका के पास कार्यकारिणी पर नियंत्रण लगाने की शक्तियां भी नाममात्र की थीं। गवर्नर जनरल व्यवस्थापिका की इच्छा के विरुद्ध भी कानून और मांगों को स्वीकृत कर सकता था। ऐसी परिस्थितियों में मन्त्री, व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी न रहकर गवर्नर जनरल के प्रति ही उत्तरदायी थे।
(6.) संघीय न्यायालय की स्थापना
प्रस्तावित भारत संघ की विभिन्न इकाइयों के मध्य उठने वाले तथा संघ और उसकी इकाइयों के मध्य उठने वाले विवादों पर निर्णय पर निर्णय देने के लिये 1935 के अधिनियम द्वारा एक संघीय न्यायालय की स्थापना की गई। गवर्नर जनरल अपनी इच्छा से किसी भी कानूनी मामले पर संघीय न्यायालय से राय मांग सकता था। संघीय न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय नहीं था तथा उसके द्वारा की गई अधिनियम की व्याख्या अन्तिम नहीं थी। संघीय न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध कई मामलों में प्रिवी कौंसिल की न्याय-समिति को अपील की जा सकती थी-
(1.) ऐसे मामले जिनमें 1935 के अधिनियम की व्याख्या अथवा इस अधिनियम के अधीन जारी किये गये सपरिषद् आदेश की व्याख्या का प्रश्न उत्पन्न होता हो और संघीय न्यायालय द्वारा प्रारम्भिक अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत निर्णय दिया गया हो।
(2.) ऐसे मामले जिनमें किसी रियासत के प्रवेश पत्र (इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) द्वारा संघीय सरकार को दी गई कानूनी और कार्यकारिणी शक्ति के विस्तार का प्रश्न उत्पन्न होता हो।
(3.) संघ में सम्मिलित होने वाली देशी रियासतों में संघीय विधान मण्डल द्वारा बनाये हुए कानूनों को लागू करने से जो विवाद उत्पन्न हों।
उपर्युक्त मामलों को छोड़कर शेष मामलों में प्रिवी काउंसिल की न्याय समिति की अपीलें केवल संघीय न्यायालय की आज्ञा से ही की जा सकती थीं।
(7.) प्रान्तीय स्वायत्तता की स्थापना
1935 के अधिनियम की समस्त व्यवस्थाओं में भारतीयों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व्यवस्था प्रान्तीय शासन से सम्बन्धित थी। इन व्यवस्थाओं के अन्तर्गत जिस प्रकार के शासनतंत्र की स्थापना की जानी थी, उसे प्रान्तीय स्वायत्तता कहा गया।
भारतीयों ने समझा कि उन्हें अधिनियम के द्वारा प्रान्तों में शासन व्यवस्था चलाने में काफी स्वतंत्रता होगी परन्तु इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त प्रान्तीय स्वायत्तता कल्पना मात्र थी। प्रान्तीय स्वशासन मन्त्रियों की अपेक्षा गवर्नरों के लिए अधिक था। इस अधिनियम के अन्तर्गत दिखावे के तौर पर प्रान्तों को अपने आन्तरिक मामलों में काफी हद तक स्वतंत्रता दे दी गई।
प्रान्तों में द्वैध शासन का अन्त कर दिया गया। जो विषय प्रान्तीय सूची में दिये गये, उनके प्रशासन के सम्बन्ध में प्रान्तों को स्वशासन दे दिया गया और केन्द्रीय नियंत्रण को सीमित कर दिया गया। अब प्रान्तीय शासन के संचालन का भार मन्त्रियों पर आ पड़ा, जो विधान मण्डल के प्रति उत्तरदायी होते थे। इस प्रकार, सतही तौर पर प्रान्तों में पूर्ण उत्तरदायी शासन की व्यवस्था की गई।
1935 के अधिनियम के द्वारा गवर्नर को कानूनी और समस्त वास्तविक शक्तियां प्रदान की गईं। गवर्नर को कानून निर्माण के क्षेत्र में बहुत अधिक शक्तियां प्राप्त थीं। प्रत्येक विधेयक गवर्नर की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता था। गवर्नर अपने विवेक से ब्रिटिश क्राउन की ओर से उस पर स्वीकृति प्रदान कर सकता था, उसे गवर्नर जनरल के पास भेज सकता था या विधान मण्डल को वापस भेज सकता था। गवर्नर को व्यवस्थापिका से स्वतंत्र कानून निर्माण के अधिकार भी प्राप्त थे। गवर्नर को दो प्रकार के अध्यादेश जारी करने के भी अधिकार थे-
(1.) उस समय जब प्रान्तीय विधान मण्डल का अधिवेशन हो रहा हो और आपात-कालीन परिस्थिति उत्पन्न हो जाए जिसमें तुरन्त कार्यवाही की आवश्यकता हो।
(2.) उस समय जब विधान मण्डल का सत्र चालू न हो। गवर्नर को आपातकालीन परिस्थितियों में प्रान्तीय शासन व्यवस्था को अपने हाथ में लेने का भी अधिकार था।
गवर्नर को वित्तीय क्षेत्र में भी कई अधिकार प्राप्त थे। गवर्नर की स्वीकृति के बिना कोई भी आर्थिक प्रस्ताव विधान मण्डल में प्रस्तावित नहीं किया जा सकता था। बजट के सुरक्षित भाग पर विधान मण्डल का कोई नियंत्रण नहीं था। बजट के शेष भाग पर विधान मण्डल स्वीकृति या अस्वीकृति दे सकते थे।
गवर्नर को शासन के क्षेत्र में विशेष उत्तरदायित्व तथा व्यक्तिगत निर्णय सम्बन्धी अधिकार भी प्राप्त थे। 1935 के अधिनियम के अन्तर्गत मन्त्रियों की जो दशा थी वह द्वैध शासन की व्यवस्था के अन्तर्गत मन्त्रियों की दशा से अच्छी नहीं कही जा सकती। किसी भी वस्तु और किसी भी कार्य पर मन्त्रियों का पूर्ण अधिकार नहीं था। गवर्नर व्यक्तिगत निर्णय के अधिकार के अन्तर्गत मन्त्रियों की सलाह को अमान्य कर सकता था।
1935 के अधिनियम के अन्तर्गत गवर्नरों को बहुत शक्तियां दी गई थीं। इसलिए भारत के समस्त प्रमुख राजनीतिक दलों ने इसे अस्वीकार कर दिया किन्तु जब इस अधिनियम को प्रान्तों में 1 अप्रैल 1937 से लागू करने की घोषणा की गई तब समस्त दल चुनावों में भाग लेने को तैयार हो गये। चुनावों के बाद उस समय तक मन्त्रिमण्डल बनाना व्यर्थ था, जब तक गवर्नर जनरल द्वारा यह आश्वासन न दे दिया जाये कि गवर्नर, प्रान्तों के दैनिक प्रशासन में कोई विशेष हस्तक्षेप नहीं करेगा।
(8.) गवर्नरों और गवर्नर जनरल की मनमानी शक्यिाँ
इस अधिनियम ने देश में राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रबल दबाव होते हुए भी गवर्नरों और गवर्नर जनरल को मनमानी शक्तियां प्रदान करके उत्तरदायी सरकारों की स्थापना निरर्थक कर दी। इस अधिनियम द्वारा भारतीय विधान मण्डलों को आर्थिक मामलों में नियंत्रण देकर भी अन्तिम वास्तविक नियंत्रण अँग्रेजों ने अपने पास रख लिया। यद्यपि कानून और व्यवस्था विभाग, उत्तरदायी मन्त्रियों को सौंप दिया गया तथापि शान्ति स्थापित रखने का विशेष उत्तरदायित्व गवर्नर का था। इस विशेष उत्तरदायित्व का बहाना लेकर गवर्नर राष्ट्रीय आन्दोलन का दमन कर सकते थे।
भारत सरकार अधिनियम 1935 की आलोचना
अँग्रेज विद्वानों ने इस अधिनियम की अत्यधिक प्रशंसा की है। प्रो. कूपलैंण्ड ने इस अधिनियम को रचनात्मक तथा राजनैतिक विचार की एक महान् सफलता बताया है। उसके मत में, इस अधिनियम ने भारत के भाग्य को अँग्रेजों के हाथों से भारतीयों के हाथों में बदल दिया। कूपलैण्ड के इस विचार से भारतीय विद्वान सहमत नहीं हैं। इस अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित संघीय व्यवस्था में निम्नलिखित दोष थे-
(1.) संघ का निर्माण भारतीयों की स्वतंत्र इच्छा से नहीं किया गया था।
(2.) इस अधिनियम में औपचारिक स्वराज्य की चर्चा तक नहीं की गई।
(3.) भारतीय संघ में सम्मिलित होने वाली इकाइयों में किसी प्रकार की समानता नहीं थी। ब्रिटिश प्रान्त, चीफ कमिश्नरों के प्रान्त और देशी रियासतों में क्षेत्रफल, शासन-पद्धति, जनसंख्या आदि की दृष्टि से बहुत अधिक असमानता थी।
(4.) संघीय सरकार का इकाइयों पर असमान अधिकार रखा गया था।
(5.) प्रांतों के लिए संघ में सम्मिलत होना अनिवार्य था परन्तु देशी रियासतों की इच्छा पर था कि वे संघ में सम्मिलित हों या नहीं।
(6.) देशी रियासतों की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या की 33 प्रतिशत थी परन्तु देशी रियासतों को संघीय विधान मण्डल के दोनों सदनों में अधिक स्थान दिये गये।
(7.) गृह सरकार सम्बन्धी व्यवस्थाओं में भी परिवर्तन नाममात्र का था। भारत सचिव के प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रखने के अधिकारों में कमी की गई थी परन्तु गवर्नर जनरल तथा गवर्नरों के माध्यम से वह भारतीय शासन पर अप्रत्यक्ष रूप से नियन्त्रण रखता था। इस प्रकार भारत सचिव की वास्तविक सत्ता पूर्ववत् ही रही।
(8.) भारत परिषद् की समाप्ति का कोई औचित्य नहीं था, उसके स्थान पर कमजोर सलाहकार परिषद आ गई।
(9.) केन्द्र में द्वैध शासन प्रारम्भ करने का निर्णय लिया गया था। प्रान्तों में 1919 के अधिनियम द्वारा स्थापित द्वैध शासन में जो कठिनाई पैदा हुई उसका केन्द्र में पैदा होना स्वाभाविक था। इस बात को जानते हुए भी कि भारतीय जनता द्वैध शासन से घृणा करती है; केन्द्र में द्वैध शासन लागू की गई।
(10.) इस अधिनियम में गवर्नर जनरल को विवेक से कार्य करने के अधिकार के साथ अनेक स्वेच्छाचारी शक्तियां प्रदान कर दी गईं। इस कारण, भारतीयों को जो थोड़े बहुत अधिकार मिले थे वे भी नगण्य-प्रायः हो गये।
(11.) संघीय विधान मण्डल का संगठन भी दोषपूर्ण था। साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली राष्ट्रवाद के लिए अहितकारी थी, फिर भी उसका विस्तार किया गया। हरिजनों को हिन्दुओं से अलग करके देश के राजनीतिक वातावरण को विषैला बना दिया गया।
(12.) अप्रत्यक्ष निर्वाचन की पद्धति प्रजातन्त्र के सिद्धान्तों के विरुद्ध थी। राज्यसभा को धनिकों, जमींदारों आदि उच्च वर्गों का सदन बना दिया गया।
(13.) इस अधिनियम के अन्तर्गत विधान मण्डल को स्वतंत्र संविधान बनाने अथवा 1935 के अधिनियम में संशोधन करने का अधिकार नहीं दिया गया।
(14.) प्रान्तीय गवर्नर के स्वेच्छापूर्ण अधिकारों के कारण प्रान्तीय स्वायत्तता प्रदर्शन मात्र, बनकर रह गई। गवर्नर के अधिकार तथा उत्तरदायित्व इतने अधिक थे कि प्रान्तीय विधान मण्डल एवं कार्यकारिणी के अधिकार पूर्णतः संकुचित हो गये।
पं. जवाहरलाल नेहरू ने 1935 के अधिनियम की आलोचना करते हुए लिखा है- ‘नया संविधान एक ऐसा यन्त्र था जिसकी ब्रेक तो दृढ़ थी परन्तु जिसका कोई इंजन नहीं था।’
जिन्ना ने लिखा है– ‘1935 की योजना पूर्ण रूप से स्वीकार न करने योग्य है।’
पं. मदनमोहन मालवीय ने लिखा है- ‘1935 का अधिनियम हमारे ऊपर जबरदस्ती लाद दिया गया था। यद्यपि बाहर से यह लोकतन्त्रीय दिखायी देता था परन्तु अन्दर से खोखला था।’
इंग्लैण्ड में मजदूर दल के नेता एटली ने कहा- ‘इस अधिनियम से संघीय स्तर पर रूढ़िवादी और प्रतिक्रियावादी तत्त्वों को इतनी अधिक प्रधानता दी गई कि किसी भी प्रकार का प्रजातन्त्रीय विकास सम्भव नहीं है।’
निस्सन्देह भारत जैसे विशाल देश के लिए संघ की नितान्त आवश्यकता थी और इसलिए भारतीयों द्वारा संघ योजना का स्वागत किया जाना चाहिए था किन्तु इसकी कमियों के कारण इसकी सर्वत्र आलोचना की गई। कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा आदि समस्त दलों ने इसे अस्वीकार कर दिया।
देशी रियासतों के शासकों ने भी इसका विरोध किया। अतः 11 सितम्बर 1940 को गवर्नर जनरल ने घोषणा की कि इस अधिनियम का संघ सम्बन्धी भाग निलम्बित तथा निष्क्रिय कर दिया गया है।
भारत में साम्प्रदायिक समस्या का आरम्भ मुसलमानों के भारत में प्रवेश के समय से हो गया था किन्तु ब्रिटिश शासन के दौरान इस समस्या ने एक नवीन रूप ग्रहण किया।
साम्प्रदायिकता की समस्या
साम्प्रदायिकता की समस्या हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन कर खड़ी हो गई। इस कारण जनता को आजादी प्राप्त करने में अधिक पसीना बहाना पड़ा तथा आजादी का रथ मंद गति से आगे बढ़ा। ऐसा कई बार हुआ जब निकट आती हुई आजादी, साम्प्रदायिक समस्या के कारण दूर खिसक गई। इस समस्या के कारण देश का विभाजन हुआ तब कहीं जाकर भारत को आजादी मिली किंतु साम्प्रदायिकता की समस्या का अंत देश की आजादी के बाद भी नहीं हो सका।
साम्प्रदायिकता का अर्थ
सम्प्रदाय शब्द की व्युत्त्पत्ति सम् तथा प्रदाय शब्दों से मिलकर हुई है। सम् का अर्थ है पूर्ण और प्रदाय का अर्थ होता है- देने वाला। इस प्रकार सम्प्रदाय का शाब्दिक अर्थ होता है- पूर्णता देने वाला। भारत में इस्लाम के प्रसार से पहले सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के भीतर तीन सम्प्रदाय माने जाते थे- शैव, शाक्त एवं वैष्णव। अर्थात् सम्प्रदाय, एक धर्म के भीतर उत्पन्न होने वाले मत थे। इस दृष्टि से शिया और सुन्नी, इस्लाम के; तथा कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेण्ट, ईसाई धर्म के सम्प्रदाय माने जा सकते हैं।
साम्प्रदायिक समस्या का अर्थ
साम्प्रदायिक समस्या से तात्पर्य दो भिन्न सम्प्रदायों की आध्यात्मिक एवं दार्शनिक मान्यताओं में अंतर होने से उनके अनुयायियों के बीच होने वाला संघर्ष है किंतु भारत की विशेष परिस्थितियों में साम्प्रदायिक समस्या का सम्बन्ध राजनीतिक संघर्ष से है।
भारत में साम्प्रदायिक समस्या का स्वरूप
भारत में साम्प्रदायिक समस्या का आरम्भ मुसलमानों के भारत में प्रवेश के समय से हो गया था किन्तु ब्रिटिश शासन के दौरान इस समस्या ने एक नवीन रूप ग्रहण किया। इस परिप्रेक्ष्य में हिन्दू, इस्लाम एवं ईसाई, धर्म न रहकर सम्प्रदाय बन गये।
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान धर्म के लिये सम्प्रदाय शब्द का प्रयोग किया जाना इस मानसिकता का परिचायक है कि सब मनुष्यों का धर्म तो एक ही है- मानव धर्म, किंतु बाह्य स्वरूप की भिन्नता के कारण अलग-अलग सम्प्रदाय खड़े हो गये हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार साम्प्रदायिकता वह मानसिकता है जो स्वयं को किसी धार्मिक सम्प्रदाय से सम्बद्ध करती है किन्तु जिसका वास्तविक उद्देश्य अपने समूह के लिए राजनीतिक शक्ति और संरक्षण प्राप्त करना होता है।
एक अन्य विद्वान ने लिखा है कि किसी समुदाय विशेष के लोगों के, एक सामान्य धर्म के अनुयायी होने के नाते उनके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हित भी एक जैसे ही होते हैं। इस मत के अनुसार भारत में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और इसाई अलग-अलग सम्प्रदायों के व्यक्ति हैं, जिनके हित उस सम्प्रदाय के सदस्यों के बीच, एक समान हैं।
साम्प्रदायकिता का आरम्भ साम्प्रदायिक हितों की पारस्परिक भिन्नता से होता है किन्तु सामान्यतः इसका अन्त विभिन्न धर्मानुयायियों में पारस्परिक विरोध तथा शत्रुता की भावना में होता है। जब यह भावना उग्र रूप धारण कर लेती है तो साम्प्रदायक दंगों में बदल जाती है जिनका अंत प्रायः सभ्यताओं, संस्कृतियों एवं अंततः राष्ट्रों के विभाजन से होता है।
भारत में स्वातंत्र्य संघर्ष के समय, विभिन्न सम्प्रदायों में अधिक शक्तियाँ प्राप्त करने की होड़ मची। यह होड़ पराधीन भारत की संवैधानिक संस्थाओं में अलग प्रतिनिधित्व अर्थात् आरक्षण प्राप्त करने से आरम्भ हुई तथा अलग राष्ट्रों का निर्माण करके उस शक्ति का उपभोग करने की लालसा पर जा पहुंची। इस प्रवृत्ति ने साम्प्रदायिक समस्या को उग्र स्वरूप प्रदान किया जिसकी परिणति लाखों लोगों की हत्या, करोड़ों लोगों के पलायन और भारत के विभाजन में हुई।
इस प्रकार राष्ट्रीयता एवं साम्प्रदायिकता, एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। राष्ट्रीयता अपने छोटे हितों को त्यागकर व्यापक हितों पर एकजुट होने के सिद्धांत पर आधारित है किंतु साम्प्रदायिकता, संकीर्णता, संकुचन तथा विभाजन की मानसिकता पर टिकी होती है।
राष्ट्रीयता एक राष्ट्र में कई सम्प्रदायों को संजोये रख सकती है किंतु साम्प्रदायिकता एक राष्ट्र के कई टुकड़े कर सकती है। जब कांग्रेस ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन चलाया तो अँग्रेजों ने उसे साम्प्रदायिकता की तलवार से काटने का निर्णय लिया। दुर्भाग्य से भारत में साम्प्रदायिकता के विकास के लिये आवश्यक तत्त्व पहले से ही मौजूद थे।
आधुनिक भारत के इतिहास में मुस्लिम साम्प्रदायिकता का उदय एवं विकास तथा भारतीय राजनीति में उसकी भूमिका, एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। भारतीय उपमहाद्वीप में विशाल हिन्दू बहुसंख्यक जनसंख्या एवं विशाल मुस्लिम अल्पसंख्यक जनसंख्या मौजूद है।
पश्चिम में भी बहुत से देश, अल्पसंख्यकों द्वारा उत्पन्न समस्याओं से ग्रस्त हैं परन्तु उनकी समस्याएं वर्ण, जातीयता, भाषाई-सांस्कृतिक समूह, राष्ट्र अथवा क्षेत्र विशेष से जुड़ी हुई हैं। जबकि भारत की साम्प्रदायिक समस्या मूलतः धार्मिक उन्माद से जुड़ी हुई है। भारत के हिन्दुओं तथा मुसलमानों या सिक्खों एवं ईसाइयों के अलग से अपने-अपने सामूहिक हित नहीं हैं।
यहाँ हर धर्म का आदमी उस क्षेत्र की भाषा बोलता है जिसमें वह रहता है। प्रत्येक सम्प्रदाय में बेरोजगारी, अशिक्षा तथा निर्धनता की समस्या मौजूद है। इन समस्याओं के कारण समस्त भारतीय जनता के राजनीतिक एवं आर्थिक हित एक समान ही हैं परन्तु धूर्त राजनीतिक नेतृत्व, धार्मिक उन्माद तथा औपनिवेशिक शक्तियों के प्रेात्साहन के फलस्वरूप हिन्दुओं एवं मुसलमानों की धार्मिक चेतना ने साम्प्रदायिक समस्या का रूप धारण कर लिया।
इस समस्या को जटिल बनाने में ब्रिटिश शासन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही क्योंकि इसके माध्यम से वे लम्बे समय तक हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति को अवरुद्ध करने में सफल रहे।
ब्रिटिश शासनकाल के अन्तिम तीन दशकों में भारत में साम्प्रदायिकता का उफान अपने चरम पर पहुंच गया जिसकी अन्तिम परिणति द्वि-राष्ट्रीय सिद्धान्त के जन्म में हुई। इस सिद्धांत के अनुसार हिन्दू तथा मुसलमान दो राष्ट्र हैं जिन्हें एक राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता।
भारत में साम्प्रदायिक समस्या के उदय के कारण
राष्ट्रीय आंदोलन में साम्प्रदायिकता की समस्या के उभार के लिये कई तत्त्व जिम्मेदार थे। साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले तत्कालीन मुस्लिम नेताओं ने इन तत्त्वों को एकत्रित करके अपने पक्ष में ऐसे तर्क जुटा लिये जिनके आधार पर वे अपने लिये प्रभावशाली राजनीति कर सकें। भारत में साम्प्रदायिकता के उदय के निम्नलिखित मुख्य कारण थे-
(1.) इस्लाम का भारत की भूमि में बाहर से आना
हिन्दू धर्म भारत की भूमि पर आकार लेने वाला प्रथम धर्म है जिसके लिये कहा जाता है कि यह धर्म नहीं, जीवन शैली है। इसी लिये इसे सनातन धर्म कहते हैं। बाद में बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई पंथ इसी धर्म से निकले किंतु इस्लाम तथा इसाई धर्म भारत में बाहर से आये। इस्लाम ने आक्रांताओं के धर्म के रूप में भारत में प्रवेश किया।
आक्रांता तो शक, कुषाण, हूण, बैक्ट्रियन तथा यूनानी भी थे किंतु उन्होंने इस देश में अपना धर्म थोपने के स्थान पर भारत के स्थानीय धर्मों को अपना लिया। उनमें से कुछ बौद्ध हो गये तो कुछ हिन्दू अथवा जैन। जबकि इस्लाम को मानने वाले आक्रांताओं ने ऐसा नहीं किया।
वे न केवल स्वयं के लिये इस्लाम को एकमात्र विकल्प के रूप में देखते थे अपितु उन्होंने भारत की जनता में भी इस्लाम के प्रसार का प्रयास किया। यदि इस्लाम भारत की भूमि पर उत्पन्न हुआ होता तो संभवतः हिन्दुओं और मुसलमानों तथा सिक्खों और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक वैमनस्य नहीं उठ खड़ा होता।
न तो मुसलमान कभी यह भूल पाये कि उनकी पहचान इस्लाम से है और न हिन्दू कभी भूल पाये कि उनकी पहचान हिन्दू धर्म से है। ऐसी परिस्थितियों में भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या मध्यकाल से ही मौजूद थी। उन्नीसवीं सदी में अँग्रेजों द्वारा हिन्दुओं एवं मुसलमानों में भेदभाव किये जाने से यह समस्या विकराल हो गई।
(2.) मुसलमानों का राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ जाना
भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के पूर्व, मुस्लिम समाज दो वर्गों में विभाजित था- प्रथम वर्ग में वे लोग थे जो विदेशों से आये आक्रांताओं, व्यापारियों तथा धर्म प्रचारकों के वंशज थे। दूसरे वर्ग में वे भारतीय थे जो भय अथवा लालच से ग्रस्त होकर, परिस्थिति वश, बल पूर्वक अथवा स्वेच्छा से धर्म-परिवर्तन करके मुसलमान बन गये थे अथवा ऐसे लोगों की सन्तान थे।
प्रथम वर्ग के लोग शासन संभालते थे तथा उनका शासन एवं शासकीय नौकरियों पर एकाधिकार था। यह मुस्लिम अभिजात्य वर्ग था। दूसरे वर्ग के लोग खेती-बाड़ी या अन्य छोटे-मोटे काम करते थे। धर्म-परिवर्तन के बाद भी उनके आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक स्तर में कोई उल्लेखीय परिवर्तन नहीं हुआ था।
प्रथम वर्ग अर्थात् मुस्लिम अभिजात्य वर्ग का राजनीतिक प्रभुत्व 18वीं और 19वीं शताब्दी में बंगाल, अवध तथा दिल्ली द्वारा अँग्रेजों के समक्ष घुटने टेक देने के साथ ही समाप्त हो चुका था। मुस्लिम अभिजात्य वर्ग, राजनीतिक प्रभुत्व का इतना अधिक अभ्यस्त था कि इसने कभी व्यापार अथवा किसी अन्य कार्य की ओर ध्यान नहीं दिया।
सरलता से धन प्राप्त होते रहने से इस वर्ग में अकर्मण्यता व्याप्त थी। प्रतिष्ठा बनाये रखने के दिखावे ने इस वर्ग को भीतर और बाहर दोनों तरफ से खोखला कर दिया। भूमि के स्थायी बन्दोबस्त के कारण अभिजात्य वर्ग के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो गई।
अँग्रेजी शिक्षा-पद्धति ने भी मुसलमानों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति को अवरुद्ध कर दिया, क्योंकि मुसलमान अपनी परम्परागत शिक्षा-पद्धति से चिपके रहे। उन्हें सरकारी नौकरियां नहीं मिल सकीं क्योंकि अँग्रेजी राज में सरकारी नौकरियों के लिए अँग्रेजी शिक्षा की डिग्रियां आवश्यक थीं।
इस क्षेत्र में हिन्दू उनसे आगे निकल गये। मुसलमानों की स्थिति के सम्बन्ध में विलियम हण्टर ने लिखा है- ‘एक अमीर, गौरव-पूर्ण तथा वीर जाति को निर्धन तथा निरक्षर जन-समूह में बदल दिया गया और उसके उत्साह तथा गर्व को मिट्टी में मिला दिया गया।’
अँग्रेजों के शासन में मुसलमानों के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में आई गिरावट के कारण मुसलमान स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगे और उनमें असन्तोष तथा विद्रोह की भावना उत्पन्न होने लगी।
(3.) 1857 की क्रांति के बाद अँग्रेजों का मुसलमानों पर अविश्वास एवं हिंदुओं पर अधिक विश्वास करना
अँग्रेजों का मानना था कि 1857 का विद्रोह मुसलमानों द्वारा, अपने खोये हुए शासन की पुनर्प्राप्ति का प्रयास था। सर जेम्स आउट्रम का मत था- ‘यह मुसलमानों के षड़यंत्र का परिणाम था जो हिन्दुओं की शक्ति के बल पर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे।’ वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘यह हिन्दू शिकायतों की आड़ में मुस्लिम षड़यंत्र था।’
यद्यपि 1857 की क्रांति में हिन्दू एवं मुसलमानों ने संयुक्त रूप से भाग लिया था परन्तु यह भी सत्य है कि मुसलमानों ने हिन्दुओं से अधिक उत्साह दिखाया। इस कारण ब्रिटिश शासन ने क्रांति की समाप्ति के बाद मुसलमानों पर विश्वास करना बंद करके हिन्दुओं की तरफ झुकाव दिखाया।
शासन के इस असमान व्यवहार के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की दूरियां बढ़ीं। जब-जब हिन्दुओं और मुसलमानों ने मिलकर देश की आजादी का बिगुल बजाया, तब-तब अँग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर चलते हुए मुसमलानों की साम्प्रदायिक भावना को भड़काया।
(4.) सर सैयद अहमदखाँ का अलीगढ़ आन्दोलन
1857 की क्रांति के असफल रहने के बाद अँग्रेजों के साथ सामंजस्य के प्रश्न पर मुस्लिम समाज में दो वर्ग उभर कर आये। एक वर्ग तो वह था जो किसी भी कीमत पर ब्रिटिश सत्ता से समझौता अथवा सहयोग करने के विरुद्ध था तथा हिंसात्मक साधनों से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहता था।
इसके विपरीत दूसरा वर्ग ब्रिटिश सत्ता की स्थिरता चाहता था तथा मुस्लिम समुदाय के विकास के लिए पश्चिमी शिक्षा को महत्त्वपूर्ण मानता था। पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व सैयद अहमद बरेलवी ने किया, जबकि दूसरे वर्ग की विचारधारा ने अलीगढ़ आन्दोलन को जन्म दिया, जिसका नेतृत्व सर सैयद अहमदखाँ ने किया।
उनका जन्म 17 अप्रैल 1817 को दिल्ली में हुआ। 1846 से 1854 ई. तक वे ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन दिल्ली के सदर अमीन रहे। 1855 ई. में उनका बिजनौर स्थानान्तरण हो गया। 1857 ई. की क्रांति के समय वह बिजनौर में थे। उन्होंने क्रांति के समय बहुत से अँग्रेजों के प्राण बचाये।
इससे उन्हें अँग्रेजों की कृपा प्राप्त हो गई। इस कृपा का उपयोग उन्होंने भारतीय मुसलमानों के हितों के लिये किया। उस समय भारतीय मुसलमान अपने अतीत में खोये हुए थे और अँग्रेजों के साथ उनके अच्छे सम्बन्ध नहीं थे। मुसलमानों में अँग्रेजी शिक्षा के प्रति धार्मिक और सांस्कृतिक उदासीनता थी।
सैयद अहमद खाँ ने अपने जीवन के प्रमुख दो उद्देश्य बनाये- पहला, अंग्रेजों व मुसलमानों के सम्बन्ध मधुर करना और दूसरा, मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना। उन्होंने मुसलमानों को समझाया कि ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहने से ही उनके हितों की पूर्ति हो सकती है तथा अँग्रेज अधिकारियों को समझाया कि मुसलमान हृदय से अँग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं हैं।
अँग्रेजों की थोड़ी सी सहानुभूति से वे सरकार के प्रति वफादार हो जायेंगे। अँग्रेजों ने भी मुसलमानों के प्रति सद्भावना प्रकट करना उचित समझा, क्योंकि हिन्दुओं में बढ़ती हुई राष्ट्रीयता के विरुद्ध वे मुस्लिम साम्प्रदायिकता का उपयोग कर सकते थे। अतः सर सैयद अहमदखाँ को अपने प्रथम उद्देश्य में शीघ्र ही सफलता मिल गई।
वास्तविकता यह थी कि सर सैयद अहमद ने स्वयं को मुस्लिम कुलीन वर्ग के हित-चिंतन तक ही सीमित रखा था। जब उन्होंने मुसलमानों को हिन्दुओं से पृथक करने तथा उनमें हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाने का कार्य आरम्भ किया, तब अँग्रेजों ने सर सैयद का ऐसा प्रचार किया जैसे वे समस्त मुस्लिम सम्प्रदाय के एक-मात्र उन्नायक हों।
भारत के अनपढ़ एवं संकीर्णतावादी मुसलमानों ने सर सैयद अहमदखाँ का साथ दिया परन्तु जागृत एवं प्रगतिशील मुसलमानों ने कांग्रेस को अपना समर्थन देकर सर सैयद की राष्ट्र-विरोधी एवं भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को शिथिल करने की नीति का समर्थन नहीं किया।
दूसरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपने विचारों और कार्यक्रमों का केन्द्र अलीगढ़ को बनाया। अलीगढ़ से किये गये समस्त प्रयासों को समग्र रूप से अलीगढ़ आन्दोलन कहा जाता है। अलीगढ़ आन्दोलन ने मुसलमानों की शिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
1875 ई. में सर सैयद अहमद खाँ ने अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज की स्थापना की। जनवरी 1877 में लॉर्ड लिटन ने इस कॉलेज का विधिवत् उद्घाटन किया तथा उत्तर प्रदेश के गवर्नर म्यूर ने इस कॉलेज को भूमि प्रदान की। इस प्रकार, आरम्भ से ही इस संस्था पर अंग्रेजों की विशेष कृपा-दृष्टि रही।
लॉर्ड लिटन को दिये गये स्मृति-पत्र के अनुसार इस कॉलेज ने ब्रिटिश ताज के प्रति नवचेतना लाने और उन्हें संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अलीगढ़ आन्दोलन के विचारों को प्रचारित करने के लिए सर सैयद ने 1886 ई. में ऑल इंडिया मुहम्मडन एजुकेशनल कांग्रेस की स्थापना की।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अन्तर स्पष्ट करने के लिए 1890 ई. में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया मुहम्मडन एजुकेशन कांफ्रेंस किया गया।
अलीगढ़ कॉलेज का मुख्य उद्देश्य तो मुस्लिम युवाओं में पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार करना था किन्तु शीघ्र ही वहाँ का मुख्य काम राष्ट्रविरोधी और साम्प्रदायिक वातावरण तैयार करना हो गया। वहाँ से प्रकाशित अलीगढ़ इन्स्टीट्यूट गजट शैक्षणिक विषयों पर ध्यान केन्द्रित न करके राजनीतिक क्रिया-कलापों की खिल्ली उड़ाने और गाली-गलौच करने लगा।
यद्यपि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश अधिकारियों के प्रोत्साहन एवं सहयोग से हुई थी तथापि जब कांग्रेस उनके द्वारा निर्देशित मार्ग पर न जाकर उलटे ब्रिटिश शासन की आलोचना का मंच बन गई तो ब्रिटिश नौकरशाही का रुख कांग्रेस-विरोधी हो गया। सैयद अहमद खाँ ने कांग्रेस का विरोध आरम्भ से ही किया था। जब ब्रिटिश शासकों का रुख कांग्रेस के विरुद्ध होने लगा तो सैयद अहमद ने कांग्रेस पर हमला और भी तेज कर दिया। उन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखने का प्रयास किया।
1887 ई. में सर सैयद ने कहा कि- ‘कांग्रेस में हिन्दू, बंगालियों के साथ मिलकर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहते थे जिससे वे मुसलमानों के धर्म-विरोधी कार्यों को दबा सकें।’
सर सैयद अहमद मुसलमानों के ऐतिहासिक महत्त्व का बखान करके हिन्दुओं तथा मुसलमानों में गहरी खाई उत्पन्न करना चाहते थे ताकि मुसलमानों को पृथकतावादी राजनीति के लिये तैयार किया जा सके।
उन्होंने इस बात का प्रचार करना आरम्भ किया कि यदि प्रतिनिधि मूलक जनतांत्रिक सरकार बन गई और ब्रिटिश शासन का अन्त हो गया और सत्ता भारतीयों को हस्तांतरित कर दी गई तो हिन्दू, मुसलमानों पर शासन करेंगे। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं के समकालिक करने की कांग्रेस की मांग को मुसलमानों के हितों के विरुद्ध बताया, क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय काफी पिछड़ा हुआ था।
1887 ई. में उन्होंने मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर लिखा- ‘जितना अनुभव और जितना विचार किया जाता है, सबका निर्णय यह निकलता है कि अब भारत के मुसलमानों को भारत की अन्य कौमों से समानता कर पाना असम्भव सा लगता है। बंगाली तो अब इतना आगे बढ़ गये कि यदि बंगाल, हिन्दुस्तान और पंजाब के मुसलमान पंख लगाकर भी उड़ें तो उनको पकड़ नहीं सकते। भारत की हिन्दू कौमों ने भी उन्नति करके मैदान में मुसलमानों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। यदि मुसलमान दौड़कर भी चलें तो भी उनको पकड़ नहीं सकते।’
इस प्रकार सैयद अहमद ने भारत की राजनीति में साम्प्रदायिक रंग घोल दिया। उन्होंने मुसलमानों के हितों की राजनीति करने के नाम पर जिन उपायों एवं वक्तव्यों का सहारा लिया, वे राष्ट्रीय जीवन के मार्ग को अवरुद्ध करने वाले सिद्ध हुए। उनकी साम्प्रदायिक राजनीति के दो हथियार थे- (1.) ब्रिटिश राज्य के प्रति अटूट स्वामि-भक्ति और (2.) मुसलमानों की पृथक् राजनीति।
अलीगढ़ आन्दोलन ने जिस मुस्लिम बौद्धिक जागरूकता का विकास किया उससे भारतीय मुसलमानों को अपनी अलग पहचान स्थापित करने में सहायता मिली। इसी कारण आगे चलकर उन्हें राजनैतिक रूप से संगठित होने का अवसर मिला।
(5.) थियोडर बेक का कांग्रेस विरोधी अभियान
अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसीपल थियोडर बेक ने कांग्रेस-विरोधी अभियान में सर सैयद को महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया। बेक ने अलीगढ़ के छात्रों को कांग्रेस से दूर रखने के लिए छात्रावासों में जाकर तथा छात्रों को अपने घर बुलाकर उनके मस्तिष्क में कांग्रेस विरोधी जहर भरा।
कांग्रेस-विरोधी राजनीतिक विचारों को इंग्लैण्ड में प्रचारित करने के लिए बेक की सहायता से अगस्त 1888 में यूनाइटेड इण्डियन पेट्रियाटिक एसोसिएशन की स्थापना की गई। बेक द्वारा कांग्रेस की नीतियों के विरोध में की जा रही कार्यवाहियों का एक मात्र लक्ष्य यह था कि ब्रिटिश सरकार कांग्रेस की मांगों को स्वीकार न करे।
फिर भी 1892 ई. में भारतीय परिषद् अधिनियम पारित हो गया। अतः पुनः मुस्लिम हितों की रक्षा के लिए बेक ने सर सैयद के सहयोग से दिसम्बर 1893 में मुहम्मडन एंगलो-ओरियंटल डिफेन्स एसोसिएशन की स्थापना की। वे इस संस्था के माध्यम से भारतीय मुसलमानों को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर अँग्रेजी राज्य से उनके लिए अधिक से अधिक लाभ उठाने का प्रयास कर रहे थे।
एसोसिएशन द्वारा मुसलमानों को बिना किसी प्रवेश-परीक्षा के तकनीकी शिक्षा संस्थानों में प्रवेश, व्यवस्थापिका सभा तथा अन्य स्थानीय स्वशासी निकायों में मुसलमानों के समुचित प्रतिनिधित्व तथा साम्प्रदायिक प्रणाली के आधार पर पृथक् निर्वाचन-पद्धति की स्थापना की मांग की गई। इन मांगों के लिए प्रस्तुत आधारभूत सिद्धान्त इस प्रकार थे-
(क.) जिन नगरों में मुस्लिम जनसंख्या 15 प्रतिशत थी, वहाँ कम-से-कम एक मुस्लिम सदस्य अवश्य होना चाहिए।
(ख.) जिन नगरों में मुस्लिम जनसंख्या 15 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक थी, वहाँ मुसलमान सदस्यों की संख्या यथासम्भव आधी होनी चाहिए।
(ग.) जिन नगरों में मुस्लिम जनसंख्या 25 प्रतिशत से अधिक हो, वहाँ आधे सदस्य अवश्य मुसलमान होने चाहिए।
एसोसिएशन के उद्घाटन भाषण में बेक ने कहा- ‘इस समय देश में दो आन्दोलन चल रहे हैं- पहला, राष्ट्रीय कांग्रेस का और दूसरा गो-हत्या विरोधी। पहला आन्दोलन ब्रिटिश-विरोधी है और दूसरा मुस्लिम-विरोधी।’
बेक ने अपने एक लेख में गृह-सरकार की इस बात के लिए निन्दा की कि वह देशद्रोही आन्दोलनकारियों के दबाव में आकर उनकी मांगें स्वीकार करती जा रही है। 1898 ई. में सर सैयद अहमद खाँ का और अगले वर्ष बेक का देहान्त हो गया। उनके देहान्त के बाद उनकी कांग्रेस विरोधी राजनीति को थियोडर मॉरिसन ने आगे बढ़ाया। उसने घोषणा की कि यदि भारत में प्रजातन्त्र की स्थापना होती है तो यहाँ अल्पसंख्यकों की स्थिति लकड़हारों एवं भिश्तियों जैसी हो जायेगी।
(6.) हिन्दुओं द्वारा अपने सांस्कृतिक उत्थान के प्रयास
ब्रिटिश काल में हिन्दू समाज में नई चेतना उत्पन्न हुई। मुसलमानों के शासन काल में हिन्दू अपने समस्त राजनीतिक अधिकार खो चुके थे तथा उनमें शासन का विरोध करने का भी साहस नहीं बचा था किंतु अँग्रेजों के शासन काल में पाश्चात्य शिक्षा के कारण हिन्दुओं में शासन के विरुद्ध संघर्ष करने का नवीन साहस उत्पन्न हुआ तथा हिन्दू समाज में राष्ट्रीयता की भावना का फिर से उदय हुआ। यही कारण है कि राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व प्रायः हिन्दू नेताओं के हाथों में रहा।
(क.) गौ-रक्षा आंदोलन
1882 ई. में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने गौ रक्षिणी सभा की स्थापना की तथा आर्य समाज ने देश भर में गौ-हत्या के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ा। मुसलमानों ने इस आंदोलन का विरोध किया जिसके फलस्वरूप देश के बहुत बड़े हिस्से में साम्प्रदायिक दंगे हुए। इन दंगों में बहुत से मन्दिर, मस्जिद और दुकानें नष्ट कर दी गईं। दोनों सम्प्रदायों के सैंकड़ों लोग घायल हुए।
(ख.) बाल गंगाधर तिलक के आंदोलन
: महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध जनमत तैयार करने के लिए छत्रपति शिवाजी एवं भगवान गणेश के नाम पर उत्सव आरम्भ किये। इस कारण मुस्लिम समुदाय, हिन्दुओं के विरुद्ध भड़क गया।
(ग.) उर्दू विरोधी आंदोलन
उत्तर-पश्चिमी प्रान्त के न्यायालयों एवं शासन के निम्न स्तरों पर उर्दू भाषा का प्रयोग लम्बे समय से किया जा रहा था किन्तु 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में उर्दू के स्थान पर, हिन्दी को शासन की भाषा के रूप में प्रयोग करने की मांग की जाने लगी। 1900 ई. में प्रान्त के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर एन्थोनी मेक्डोनेल ने हिन्दी को न्यायालयों की वैकल्पिक भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया। उसके इस कदम से मुसलमान, हिन्दुओं के विरुद्ध लामबन्द हो गये।
(7.) कांग्रेस की स्थापना के बादब्रिटिश नौकरशाहों द्वारा हिन्दुओं पर अविश्वास एवं मुसलमानों के प्रति विश्वास
साम्प्रदायिकता की समस्या को उलझाने में ब्रिटिश नौकरशाहों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने शासन के प्रारम्भ में वे मुसलमानों को उच्च पदों पर नियुक्त नहीं करते थे तथा अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त हिन्दुओं को प्राथमिकता देते थे। इस कारण ब्रिटिश राज में मुसलमानों की आर्थिक दशा, हिन्दुओं की अपेक्षा अधिक तेजी से खराब हुई।
ज्यों-ज्यों राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रता आने लगी, त्यों-त्यों अँग्रेज यह अनुभव करने लगे कि अपनी सत्ता की सुरक्षा के लिए उन्हें मुसलमानों को अपने पक्ष में लेना चाहिये तथा मुसलमानों को हिन्दुओं से दूर किया जाना चाहिये। 1905 ई. का बंगाल-विभाजन हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से दूर करने के लिए ही किया गया था।
लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी बंगाल के मुसलमानों को यह भरोसा दिया था कि नये सूबे में उनकी वही प्रधानता स्थापित होगी जो कभी मुस्लिम सूबेदारों के युग में होती थी। 1911 ई. में बंगाल विभाजन को निरस्त करने से मुस्लिम साम्प्रदायिकता में अत्यधिक वृद्धि हुई क्योंकि अँग्रेज, मुसलमानों को यह समझाने में सफल रहे कि हिन्दुओं के आंदोलन के कारण ही मुसलमान अपना मुस्लिम बहुल प्रांत खो बैठे।
(8.) सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का कम प्रतिनिधित्व
ब्रिटिश भारत में मुसलमानों की जनसंख्या 23 प्रतिशत थी किंतु 1893 ई. से 1907 ई. के मध्य विभिन्न विधान सभाओं में मुसलमानों को केवल 12 प्रतिशत स्थान प्राप्त हुए। 1904 ई. में किये गये एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार देश में 75 रुपये या इससे अधिक वेतन पर काम करने वाले हिन्दुओं की संख्या 1427 थी और मुसलमानों की संख्या केवल 213 थी। जब भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने संवैधानिक सुधारों की घोषणा करके भारत में प्रतिनिधि-शासन-प्रणाली के विस्तार का समर्थन किया तो मुसलमानों में चिन्ता व्याप्त हो गई। उनमें हिन्दुओं के प्रति ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हुआ जो अँग्रेजी पढ़-लिखकर अधिक संख्या में नौकरियां पा गये थे।
(9.) अँग्रेजों द्वारा साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहन
अँग्रेज नौकरशाहों ने मुसलमानों की चिंताओं का लाभ उठाने का निश्चय किया। वायसराय के निजी सचिव स्मिथ ने अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसिपल आर्किबाल्ड को लिखा- ‘यदि आगामी सुधारों के बारे में मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मण्डल मुसलमानों के लिए अलग अधिकारों की मांग करे और इसके लिए वायसराय से मिले तो वायसराय को उनसे मिलने में प्रसन्नता होगी।’
इस पर 36 मुस्लिम नेताओं का एक प्रतिनिधि मण्डल सर आगा खाँ के नेतृत्व में 1 अक्टूबर 1906 को शिमला में लॉर्ड मिन्टो से मिला और उन्हें एक आवेदन पत्र दिया जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें थीं-
1. मुसलमानों को सरकारी सेवाओं में उचित अनुपात में स्थान मिले।
2. नौकरियों में प्रतियोगी तत्त्व की समाप्ति हो।
3. प्रत्येक उच्च न्यायालय और मुख्य न्यायालय में मुसलमानों को भी न्यायाधीश का पद मिले।
4. नगरपालिकाओं में दोनों समुदायों को अपने-अपने प्रतिनिधि भेजने की वैसी ही सुविधा मिले, जैसी पंजाब के कुछ नगरों में है।
5. विधान परिषद के चुनाव के लिए मुख्य मुस्लिम जमींदारों, वकीलों, व्यापारियों, अन्य महत्त्वपूर्ण हितों के प्रतिनिधियों, जिला परिषदों और नगर पालिकाओं के मुस्लिम सदस्यों तथा पांच वर्षों अथवा किसी ऐसी ही अवधि के पुराने मुसलमान स्नातकों के निर्वाचक-मण्डल बनाये जायें।
इस प्रार्थना-पत्र में इस तथ्य पर विशेष जोर दिया गया कि भविष्य में किये जाने वाले किसी संवैधानिक परिवर्तन में न केवल मुसलमानों की संख्या, वरन् उनके राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्त्व को भी ध्यान में रखा जाये।
वायसराय मिन्टो ने मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डल के प्रार्थना-पत्र की प्रशंसा की तथा उनकी मांगों को उचित बताया। मिण्टो ने कहा- ‘आपका यह दावा बिल्कुल उचित है कि आपके स्थान का अनुमान सिर्फ आपकी जनसंख्या के आधार पर नहीं, अपितु आपके समाज के राजनीतिक महत्त्व और उसके द्वारा की गई साम्राज्य की सेवा के आधार पर लगाया जाना चाहिए।’ मिन्टो ने यह आश्वासन भी दिया कि भावी प्रशासनिक पुनर्गठन में मुसलमानों के अधिकार और हित सुरक्षित रहेंगे।
इस प्रकार ब्रिटिश नौकरशाही ने मुसलमानों को अपने जाल में फंसाने तथा साम्प्रदायिकता की खाई को चौड़ा करने का काम किया। इस प्रतिनिधि मण्डल की उत्तेजना को देखकर अँग्रेज नौकरशाह अच्छी तरह जान गये कि वे 6.2 करोड़ मुसलमानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से अलग करने में समर्थ हो गये हैं। इसकी पुष्टि खुद लेडी मिन्टो की डायरी से होती है। अक्टूबर 1906 का मुस्लिम शिष्ट मण्डल, एक मुस्लिम राजनैतिक दल के गठन का पूर्वाभ्यास था, इसका आभास मिलते ही ब्रिटिश नौकरशाही वर्ग में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई।
उसी शाम एक ब्रिटिश अधिकारी ने वायसराय की पत्नी मेरी मिन्टो को पत्र लिखकर सूचित किया- ‘मैं आपको संक्षेप में सूचित करता हूँ कि आज एक बहुत बड़ी बात हुई है। आज राजनीतिज्ञतापूर्ण एक ऐसा कार्य हुआ जिसका प्रभाव भारत तथा उसकी राजनीति पर चिरकाल तक पड़ता रहेगा। 6 करोड़ 20 लाख लोगों को हमने विद्रोही पक्ष में सम्मिलित होने से रोक लिया है।’
इंग्लैण्ड के समाचार पत्रों ने भी इसे एक बहुत बड़ी विजय बताया और मुसलमानों की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की। यह प्रथम अवसर था जब वायसराय के निमंत्रण पर भारत के विभिन्न भागों के मुसलमान शिमला में एकत्र हुए थे। जब वे वापिस अपने-अपने घर लौटे तब वे पूरे राजनीतिज्ञ बन चुके थे। अब उनके कंधों पर अलीगढ़ की राजनीति को सारे देश में फैलाने की जिम्मेदारी थी।
मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा करने के इस काम के लिए भारत सचिव मार्ले ने 16 अक्टूबर 1906 को गवर्नर जनरल लॉर्ड मिन्टो को पत्र लिखकर बधाई दी।
ब्रिटिश सरकार ने अपना आश्वासन पूरा किया और 1909 ई. के भारतीय परिषद् अधिनियम के अन्तर्गत ब्रिटिश भारत की प्रत्येक विधान सभा के लिए मुसलमानों को अपने समुदाय पर आधारित चुनाव मण्डलों से अपने प्रतिनिधियों को, अपनी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक अनुपात में चुनने का अधिकार दिया। इस प्रकार, मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाता रहा ताकि भारत में साम्प्रदायिक समस्या को बढ़ावा दिया जा सके।
भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का विकास अंग्रेजी शासन के द्वारा किया गया। अंग्रेज अधिकारियों ने भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से लड़ते रहने के लिए प्रेरित किया ताकि वे एकजुट होकर भारत की स्वाधीनता के लिए न लड़ सकें।
भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का विकास
(1.) मुस्लिम लीग की स्थापना
30 दिसम्बर 1906 को ढाका के नवाब सलीमउल्ला खाँ के निमंत्रण पर ढाका में, अलीगढ़ की मोहम्मडन एज्युकेशनल कॉन्फ्रेन्स की वार्षिक सभा आयोजित की गई।
इस सभा में सलीमुल्ला ने मुसलमानों के अलग राजनीतिक संगठन की योजना प्रस्तुत की तथा कहा कि इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार का समर्थन करना, मुसलमानों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना, कांग्रेस के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना और मुस्लिम नौजवानों को राजनीतिक मंच प्रदान करना है ताकि उन्हें भारतीय कांग्रेस से दूर रखा जा सके।
सलीमउल्ला ने इस संस्था का नाम मुस्लिम ऑल इण्डिया कान्फेडरेसी सुझाया। इस प्रस्ताव को उसी दिन स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 30 दिसम्बर 1906 को अखिल भारतीय मुस्लिम संगठन अस्तित्व में आया जिसका नाम ऑल इंडिया मुस्लिम लीग रखा गया।
नवाब विकुर-उल-मुल्क को इसका सभापति चुना गया। लीग के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए समिति गठित की गई जिसके संयुक्त सचिव मोहिसिन-उल-मुल्क तथा विकुर-उल-मुल्क नियुक्त किये गये। 1907 ई. में, कराची में लीग का वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ जिसमें लीग का संविधान स्वीकार किया गया। इस संविधान में मुस्लिम लीग के निम्नलिखित लक्ष्य और उद्देश्य निर्धारित किये गये-
(क.) भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा की भावना पैदा करना और किसी भी योजना के सम्बन्ध में मुसलमानों के प्रति होने वाली सरकारी कुधारणाओं को दूर करना।
(ख.) भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक तथा अन्य अधिकारों की रक्षा करना और उनकी आवश्यकताओं तथा उच्च आकांक्षाओं को संयत भाषा में सरकार के समक्ष रखना।
(ग.) जहाँ तक हो सके, उक्त उद्देश्यों को हानि पहुँचाये बिना, मुसलमानों तथा भारत के अन्य समाजों में मित्रतापूर्ण भावना उत्पन्न करना।
मुस्लिम लीग के संविधान में स्थायी अध्यक्ष की व्यवस्था की गई और खोजा सम्प्रदाय के धार्मिक नेता प्रिन्स आगा खाँ को अध्यक्ष बनाया गया। आगा खाँ के पास पहले से ही इतने काम थे कि उन्हें लीग के अध्यक्ष के कार्यालय का दैनिक कार्य देखने का समय नहीं था।
इसलिए लीग के हर वार्षिक अधिवेशन में एक कार्यकारी अध्यक्ष चुना जाता था। लीगी नेता, भारत के मुसलमानों में अपने देश के प्रति नहीं, अपितु अँग्रेजों के प्रति वफादारी की भावना बढ़ाना चाहते थे। वे भारत के अन्य निवासियों के साथ नहीं अपितु अँग्रेजों के साथ एकता स्थापित करना चाहते थे।
लीग के सचिव जकाउल्ला ने स्पष्ट कहा- ‘कांग्रेस के साथ हमारी एकता सम्भव नहीं हो सकती क्योंकि हमारे और कांग्रेसियों के उद्देश्य एक नहीं। वे प्रतिनिधि सरकार चाहते हैं, मुसलमानों के लिए जिसका मतलब मौत है। वे सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा चाहते हैं और इसका मतलब होगा कि मुसलमान सरकारी नौकरियों से हाथ धो बैठेंगे। इसलिए हम लोगों को (हिन्दुओं के साथ) राजनीतिक एकता के नजदीक जाने की आवश्यकता नहीं।’
1908 ई. में सर अली इमाम, लीग का कार्यकारी अध्यक्ष हुआ। उसने कांग्रेस की कटु आलोचना करते हुए कहा- ‘जब तक कांग्रेस के नेता इस तरह की व्यावहारिक नीति नहीं अपनाते, तब तक ऑल इंण्डिया मुस्लिम लीग को अपना पवित्र कर्त्तव्य निभाना है। यह कर्त्तव्य है- मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक भूल करने से रोकना अर्थात् उसे ऐसे संगठन में मिलने से रोकना जो लॉर्ड मार्ले के शब्दों में, चन्द्रमा को पकड़ने के लिए चिल्ला रहा है।’
इसी प्रकार अलीगढ़ में विद्यार्थियों की एक सभा में नवाब विकुर-उल-मुल्क ने कहा- ‘अगर हिन्दुस्तान से ब्रिटिश हुकूमत खत्म हो गई तो उस पर हिन्दू राज करेंगे और तब हमारी जिन्दगी, जायदाद और इज्जत पर सदैव खतरा मंडराया करेगा। इस खतरे से बचने के लिए मुसलमानों के लिए एकमात्र उपाय है- ब्रिटिश हुकूमत जरूर बनी रहे। मुसलमान अपने को ब्रिटिश फौज समझे और ब्रिटिश ताज के लिए अपना खून बहाने और अपनी जिन्दगी कुर्बान कर देने के लिए तैयार रहें…..आपका नाम ब्रिटिश हिन्दुस्तान की तवारीख में सुनहरे हर्फों में लिखा जायेगा। आने वाली पीढ़ियां आपका अहसान मानेंगी।’
(2.) 1909 के मार्ले मिण्टो सुधार में साम्प्रदायिक विभाजन के बीज
1909 ई. के मार्ले-मिण्टो सुधारों के द्वारा सरकार ने मुसलमानों, जमींदारों और व्यापारियों को अलग प्रतिनिधित्व प्रदान किया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार द्वारा पहली बार हिन्दुओं और मुसलमानों को पृथक इकाई स्वीकार करके उन्हें अलग-अलग प्रतिनिधित्व दिया गया।
गणेशप्रसाद बरनवाल ने लिखा है- ‘1909 ई. के मार्ले मिण्टो सुधार से मुस्लिम-मुखी द्विराष्ट्रवाद की फसल बीमा कर दी जाती है।’
वाई. पी. सिंह ने लिखा है- ‘अँग्रेजों ने भारतीय परिषद् अधिनियम, 1909 के द्वारा साम्प्रदायिक विद्वेष के बीज बोये।’
दुर्गादास ने लिखा है- ‘व्हाइट हॉल ने पृथक निर्वाचन एवं सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को स्वीकार करके अनजाने में ही सर्वप्रथम विभाजन के बीज बोये। मिण्टो के शब्दों में- मुस्लिम नेशन।’
(3.) लखनऊ समझौते से देश में शांति
1911 ई. के बाद अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं के प्रभाव से, जिनमें बाल्कन युद्ध और तुर्की में युवा तुर्क आन्दोलन सम्मिलित थे, भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश शासन के प्रति राजभक्ति कम होने लगी। युवा मुस्लिम वर्ग कांग्रेस के लक्ष्य से सहानुभूति रखने लगा।
इसलिये 1913 ई. में मुस्लिम लीग ने अपने संविधान में संशोधन करके कांग्रेस की ही तरह अपना लक्ष्य भारत में औपनिवेशिक स्वशासन प्राप्त करना निश्चित किया। जब दोनों पार्टियों के लक्ष्य एक हो गये तो उनमें निकटता आनी भी स्वाभाविक थी। कांग्रेस भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मुसलमानों का सहयोग चाहती थी।
फलस्वरूप 1916 ई. में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य समझौता हुआ जिसे लखनऊ समझौता कहते हैं। यह समझौता कराने में बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। इस समझौते में तीन बातें मुख्य थीं-
(क.) मुस्लिम लीग ने भी कांग्रेस की तरह भारत को उत्तरदायित्व-पूर्ण शासन देने की मांग की।
(ख.) कांग्रेस ने मुसलमानों के पृथक् निर्वाचन-मण्डल की प्रथा को स्वीकार कर लिया और विभिन्न प्रान्तों में उनके अनुपात को भी मान लिया।
(ग.) यह स्वीकार कर लिया गया कि यदि विधान सभाओं में किसी गैर-सरकारी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किसी प्रस्ताव का विरोध किसी एक सम्प्रदाय के तीन चौथाई सदस्य करेंगे तो उस प्रस्ताव पर विचार नहीं किया जायेगा।
पं. मदनमोहन मालवीय, सी. वाई. चिंतामणि आदि कई कांग्रेसी नेताओं को लगा कि इस समझौते में मुसलमानों को अत्यधिक सुविधाएं दे दी गई हैं। कुछ इतिहासकार तो इन सुविधाओं को साम्प्रदायिकता के विकास की महत्त्वपूर्ण कड़ी मानते हैं जिसकी परिणति पाकिस्तान के रूप में हुई।
तिलक का कहना था- ‘कुछ लोगों का विचार है कि हमारे मुसलमान भाइयों को अत्यधिक रियायतें दे दी गई हैं किन्तु स्वराज्य की मांग के लिए उनका हार्दिक समर्थन प्राप्त करने के लिए वह आवश्यक था; भले ही कठोर न्याय की दृष्टि से वह सही हो या गलत। उनकी सहायता और सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।’
अयोध्यासिंह के अनुसार इस पैक्ट से जिन्हें सबसे अधिक आघात लगा था वे थे, ब्रिटिश साम्राज्यवादी और उनके दलाल। लखनऊ समझौते के परिणाम स्वरूप कुछ समय के लिए देश में साम्प्रदायिक एकता स्थापित हुई।
(4.) खिलाफत आन्दोलन की विफलता
प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की, इंग्लैण्ड के विरुद्ध लड़ा। भारतीय मुसलमानों को आशंका थी कि यदि तुर्की युद्ध में हार गया तो तुर्की साम्राज्य का विघटन कर दिया जायेगा तथा खलीफा की शक्तियां भी समाप्त कर दी जायेंगी। अतः भारतीय मुसलमानों ने खिलाफत आन्दोलन चलाया।
गांधीजी ने मुसलमानों से अपील की कि वे सरकार के प्रति असहयोग का कार्यक्रम अपनायें। मुसलमानों ने गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में सहयोग दिया और कांग्रेस ने खिलाफत आन्दोलन में मुसलमानों का।
इस प्रकार दोनों आन्दोलन मिलकर एक हो गये किन्तु जब गांधीजी ने चौरी-चौरा काण्ड के कारण 1922 ई. में अचानक असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया तब मुसलमानों ने गांधीजी की कटु आलोचना की और लखनऊ समझौते से स्थापित साम्प्रदायिक एकता पुनः नष्ट हो गई।
मुसलमानों का एक वर्ग लखनऊ समझौते का घोर विरोधी था। इस वर्ग को भय था कि गांधीजी का नेतृत्व, मुसलमानों के भिन्न अस्तित्त्व को समाप्त कर देगा। खिलाफत एवं असहयोग आन्दोलन के दौरान ये नेता अनुभव करने लगे थे कि इस एकता से उनके अपने स्वार्थ पूरे नहीं हो रहे हैं; इससे भी एकता को आघात पहुँचा।
(5.) गांधीजी के नेतृत्व के प्रति संदेह
कांग्रेस में हिन्दू नेताओं का बोलबाला था तथा गांधीजी उनके सर्वमान्य नेता हो गये थे। गांधीजी यद्यपि मुसलमानों को प्रसन्न करने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देते थे और अपनी मेज की दराज में गीता के ऊपर कुरान रखते थे।
उन्हें मुहम्मद अली जिन्ना की अपेक्षा कुरान की अधिक आयतें याद थीं किंतु साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले मुसलमान नेताओं का मानना था कि गांधीजी का सत्य और अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रह, हिन्दू धर्म के आदर्शों से प्रेरित है। इस कारण मुसलमानों के लिये गांधीजी का नेतृत्व अमान्य है।
अनेक पढ़े-लिखे कट्टर मुस्लिम नेता गांधीजी के विरुद्ध थे। गांधीजी ने 1907 ई. में दक्षिण अफ्रीका में जनरल स्मट्स की सरकार के विरुद्ध आंदोलन चलाया तो उसे बीच में ही बंद कर दिया था।
दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीय पठानों ने गांधीजी के इस कार्य को विश्वासघात मानते हुए उनपर प्राण घातक हमला किया था। इस कारण मुसलमानों का, गांधीजी पर से विश्वास उठ चुका था।
फिर भी जब गांधीजी ने 1920 ई. में भारत में असहयोग आन्दोलन आरम्भ करते समय यह कहा कि- ‘यदि देश मेरे पीछे चले तो मैं एक वर्ष के भीतर स्वराज्य ला दूँगा।’ तो मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन से जोड़ लिया।
जब 1922 ई. में गांधीजी ने अचानक असहयोग आंदोलन बंद कर दिया तो मुसलमानों को लगा कि गांधीजी ने उन्हें मंझधार में छोड़कर, एक बार फिर विश्वासघात किया है। पूरे देश में अलगाववादी मुसलमानों ने यह प्रचार किया कि गांधीजी ने अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए मुसलमानों को गुमराह किया। इससे देश में उत्तेजना फैल गई और साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हो गये।
(6.) साम्प्रदायिक हिंसा से हिन्दू-मुस्लिम एकता भंग
साम्प्रदायिक एकता को सर्वप्रथम आघात मालाबार के मुस्लिम मोपलों ने पहुँचाया। 1921 ई. के अगस्त-सितम्बर माह में मोपलों ने असंख्य हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया, हिन्दू स्त्रियों को भी उनके अत्याचारों का शिकार बनना पड़ा। जब ये तथ्य समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए तो पूरे देश में तनाव व्याप्त हो गया। मुल्तान में भी मुसलमानों ने अनेक हिन्दुओं को मार डाला; उनकी सम्पत्ति लूट ली या नष्ट कर दी। सहारनपुर में भी ऐसी घटनाएं घटित हुईं। लाहौर में भी साम्प्रदायिक दंगे हुए। एक धर्मान्ध मुसलमान ने आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानन्द की रोगी-शैया पर ही हत्या कर दी। आर्य समाज के कुछ अन्य नेताओं की भी हत्या कर दी गई। इन घटनाओं ने हिन्दू जनता को विचलित कर दिया।
(7.) नवीन हिन्दू संस्थाओं की स्थापना
देश भर में हिन्दुओं के विरुद्ध हो रही हिंसक घटनाओं के विरोध में हिन्दू नेताओं ने हिन्दू एकता का नारा दिया। सारे देश में हिन्दू महासभा की शाखाएं स्थापित की गईं। अखिल भारतीय क्षत्रिय सभा की स्थापना हुई। 1923 ई. में डॉ. किचलू ने अमृतसर में तन्जीम और तबलीग आन्दोलन प्रारम्भ किया। 1925 ई. में विजय दशमी के दिन डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल का गठन किया जिसका उद्देश्य हिन्दू धर्म, जाति और संस्कृति की रक्षा करना था। पूरे भारत में इसकी शाखाएं स्थापित की गईं। 1928 ई. में लाहौर में ऑर्डर ऑफ दी हिन्दू यूथ नामक संगठन की स्थापना की गई। इन संस्थाओं की उपस्थिति से मुस्लिम साम्प्रदायिकता की राजनीति को और अधिक विस्तार प्राप्त हो गया।
(8.) वीर सावरकर का उग्र हिन्दुत्व
स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद तथा महर्षि अरविंद घोष ने परतंत्र भारत की देह में आत्मगौरव के नवीन प्राण फूंकने के लिये उग्र हिंदुत्व को जन्म दिया। कांग्रेस में लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल और बाल गंगाधर तिलक, इस उग्र हिंदुत्व के ध्वज-वाहक थे। 1 अगस्त 1920 को तिलक की मृत्यु होने पर कांग्रेस गांधीजी के नेतृत्व में चली गई।
इस पर महाराष्ट्र में जन्मे विनायक दामोदर सावरकर ने हिन्दू-राष्ट्रवाद की भावना को तिलक युग से आगे बढ़ाया। उन्होंने हिन्दुओं में राजनीतिक एवं सामाजिक एकीकरण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने हिन्दुओं के समान हितों पर बल देते हुए उनको संगठित होने का आह्नान किया। वे मुसलमानों को प्रसन्न करने वाली नीति के समर्थक नहीं थे।
उनका कहना था कि यदि भारतीय मुसलमान, स्वराज्य-प्राप्ति में सहयोग नहीं देना चाहते तो उनसे अनुनय-विनय करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मुसलमानों के बिना भी हिन्दू अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने में समर्थ हैं। मुसलमानों के लिये साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले नेताओं को, सावरकार का विरोध करने के बहाने, अपनी उग्र साम्प्रदायिक राजनीति को चमकाने का अच्छा अवसर प्राप्त हो गया।
(9.) नेहरू रिपोर्ट पर मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिक राजनीति
1927 ई. में जब कांग्रेस ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया तो भारत सचिव लॉर्ड बर्कनहेड ने चुनौती दी कि साइमन कमीशन का विरोध करने से क्या लाभ है जबकि भारतवासी स्वयं ऐसा कोई संविधान तैयार करने में असमर्थ हैं जिसे भारत के समस्त दल स्वीकार करते हों! भारतीय नेताओं ने भारत सचिव की इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।
भारत के भावी संविधान के लिये एक प्रस्ताव तैयार करने हेतु एक समिति का गठन किया गया। मोतीलाल नेहरू को समिति का अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू को सचिव नियुक्त किया गया। इसमें सुभाषचंद्र बोस तथा सर तेज बहादुर सप्रू सहित कुल 8 सदस्य थे। इस समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है।
इस रिपोर्ट में भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना, अल्पसंख्यकों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए अधिकारों की घोषणा; तथा वयस्क मताधिकार आदि बातें सम्मिलित की गईं। दिसम्बर 1928 में सर्वदलीय बैठक में जिन्ना ने नेहरू समिति के प्रस्तावों पर तीन संशोधन रखे किन्तु वे स्वीकार नहीं किये गये।
मुहम्मद शफी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने प्रारम्भ से ही नेहरू समिति का बहिष्कार किया। 31 दिसम्बर 1928 और 1 जनवरी 1929 को आगा खाँ की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय मुस्लिम कान्फ्रेंस की बैठक बुलाई गई। इसमें नेहरू रिपोर्ट के समस्त प्रस्तावों के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किये गये।
जिन्ना ने इस कान्फ्रेंस में भाग नहीं लिया परंतु उसने मार्च 1929 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में एक प्रस्ताव रखा जिसमें नेहरू रिपोर्ट के मुकाबले 14 शर्तें रखीं, जिनमें संघीय संविधान, प्रांतीय स्वायत्तता, पंजाब और बंगाल में बहुमत की स्थापना, केन्द्रीय विधानसभा और प्रान्तीय विधान मण्डलों में मुसलमानों के लिए एक-तिहाई स्थान सुरक्षित करने की मांगें सम्मिलित थीं।
1930 ई. में इलाहाबाद में आयोजित मुस्लिम लीग के वार्षिक सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में डा. इकबाल ने मुसलमानों की अलग राजनीतिक पहचान के आधार पर भारत में एक अलग मुस्लिम राष्ट्र या फेडरेशन की स्थापना की वकालात की। उसने कहा- ‘मैं पंजाब, उत्तर-पश्चिमी प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को एक अलग राष्ट्र में एकीकृत होते हुए देखना चाहता हूँ।’ इस प्रकार इकबाल ने भावी मुस्लिम भारत का नक्शा खींचा।
(10.) 1930 ई. का साम्प्रदायिक पंचाट
साइमन कमीशन की रिपोर्ट में प्रस्तावित संघीय भारत के निर्माण की दिशा में विचार विमर्श करने हेतु, ब्रिटिश सरकार ने 12 नवम्बर 1930 को लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार किया। सम्मेलन में मुहम्मद अली जिन्ना और डॉ. भीमराव अम्बेडकर में तीव्र मतभेद हो जाने से भारत में संघीय सरकार के निर्माण पर कोई निर्णय नहीं हो सका।
17 सितम्बर 1931 को लंदन में दूसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। इसमें कांग्रेस के प्रतिनिधि की हैसियत से अकेले गांधीजी ने भाग लिया। यह सम्मेलन भी असफल रहा। 17 नवम्बर 1932 को लंदन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इस समय कांग्रेस अवैध संस्था घोषित हो चुकी थी इसलिये वह सम्मेलन में भाग नहीं ले सकी।
जब गोलमेज सम्मेलनों से भी साम्प्रदायिक समस्या का समाधान नहीं हो पाया तो 1932 ई. में ब्रिटिश सरकार ने अपनी तरफ से साम्प्रदायिक पंचाट की घोषणा कर दी।
इसके अन्तर्गत मुसलमानों, यूरोपियनों, सिक्खों, भारतीय ईसाईयों, एंग्लो-इंण्डियनों, राजाओं और जागीरदारों को विभिन्न प्रान्तीय विधान सभाओं में अपने-अपने समुदायों के प्रतिनिधियों को पृथक् निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने का अधिकार दिया गया। डा. अम्बेडकर के प्रयत्नों से दलित वर्ग को अपने प्रतिनिधियों को पृथक निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने की सुविधा दे गई।
इस प्रकार इस पंचाट के माध्यम से अँग्रेजों ने बांटो एवं राज्य करो के सिद्धान्त पर देश में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने, दलितों को अलग प्रतिनिधित्व देकर हिन्दू-समाज का बंटवारा करने, भारतीय अल्पसंख्यकों को अनुचित महत्त्व प्रदान कर राष्ट्रीय एकता को छिन्न-छिन्न करने, राजाओं और जागीरदारों के लिए पृथक्-निवार्चन की व्यवस्था कर अप्रजातांत्रिक तत्त्वों को प्रोत्साहन देने तथा भारत में प्रगतिशील तत्त्वों की गतिविधियों को नियंत्रित एवं कमजोर करने का षड़यंत्र रचा तथा धर्म एवं व्यवसाय के आधार पर प्रतिनिधित्व का विभाजन करके भारत को नई समस्याओं के खड्डे में फैंक दिया।
(11.) मुसमलानों के लिये अधिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था
गांधीजी ने साम्प्रदायिक पंचाट का, विशेषकर दलितों को हिन्दुओं से पृथक् करने का जोरदार विरोध किया तथा 20 सितम्बर 1932 को आमरण अनशन पर बैठ गये। डॉ. अम्बेडकर ने इस व्रत को राजनैतिक धूर्त्तता बताया। कुछ लोगों ने इसे अपनी मांग मनवाने का तरीका बतलाया।
जब गांधीजी की तबीयत अधिक बिगड़ने लगी तब कुछ कांग्रेसी नेताओं ने 26 सितम्बर 1932 को डॉ. अम्बेडकर और गांधीजी के बीच एक समझौता करवाया। यह समझौता पूना पैक्ट के नाम से प्रसिद्ध है। इसके द्वारा साम्प्रदायिक पंचाट के आपत्तिजनक भाग को हटाया गया।
इस समझौते से डॉ.अम्बेडकर दलितों के लिए दुगने स्थान सुरक्षित करवाने में सफल रहे। दिसम्बर 1932 में ब्रिटिश सरकार ने केन्द्रीय विधान सभा में मुसलमानों के लिए एक-तिहाई स्थान सुरक्षित करने की घोषणा की जबकि मुसलमान कुल जनसंख्या के एक चौथाई ही थे। इससे हिन्दुओं को मुसलमानों के विरुद्ध क्षोभ उत्पन्न हुआ।
(12.) भारतीय राजनीति में जिन्ना का उदय
भारतीय राजनीति में जिन्ना का उदय भारत में साम्प्रदायिक समस्या को चरम पर पहुंचाने वाले प्रमुख तत्त्वों में से एक था। आरम्भ में वह राष्ट्रवादी था तथा भारत के विभाजन के पक्ष में नहीं था। 1906 ई. में ढाका में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और लीग ने मुसलमानों के लिये पृथक् प्रतिनिधित्व की मांग की तो जिन्ना ने उसका विरोध किया और कहा कि इस तरह का प्रयास देश को विभाजित कर देगा।
1913 ई. में जिन्ना ने मुस्लिम लीग की सदस्यता ग्रहण की किंतु वह कांग्रेस का सदस्य भी बना रहा। 1916 ई. में वह मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया। 1920 ई. में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में जिन्ना ने गांधीजी को महात्मा कहने से मना कर दिया और उन्हें मंच से मिस्टर गांधी कहकर सम्बोधित किया।
इस पर कांग्रेस के नेताओं ने जिन्ना का अपमान किया। इस घटना के बाद, जिन्ना एवं नेहरू के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। 30 सितम्बर 1921 को जिन्ना, कांग्रेस से अलग हो गया फिर भी वह राष्ट्रवादी बना रहा। 1933 ई. में जब चौधरी रहमत अली ने पाकिस्तान नामक अलग देश की अवधारणा दी तो जिन्ना ने उसे दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया।
1937 ई. में जब प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन हुए तो जवाहरलाल नेहरू ने एक वक्तव्य दिया- ‘देश में केवल दो ही ताकतें हैं- सरकार और कांग्रेस। सरकार का मुकाबला केवल कांग्रेस कर सकती है।’
इस वक्तव्य से जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गया और उसके बाद उसने नेहरू को नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने दिया। उसने तुरंत प्रतिवाद करते हुए कहा- ‘मैं कांग्रेस का साथ देने से इंकार करता हूँ, देश में एक तीसरा पक्ष भी है और वह है मुसलमानों का पक्ष।’
1937 ई. के चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। बंगाल, आसाम तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश में वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। केवल पंजाब और सिन्ध में कांग्रेस को कम मत मिले।
ग्यारह प्रान्तों में मुसलमानों के लिए सुरक्षित 482 सीटों में से कांग्रेस को 26 सीटें, मुस्लिम लीग को 108 सीटें तथा निर्दलीय मुसलमानों को 128 सीटें मिलीं। पंजाब में अधिकांश सीटें यूनियनिस्ट पार्टी को मिलीं। बंगाल में फजलुल हक की प्रजा-पार्टी को 38 सीटें मिलीं।
चुनावों में कांग्रेस को मिली भारी विजय से जिन्ना तिलमिला गया। उसने सोचा कि भारत के समस्त मुस्लिम राजनीतिक दलों को लीग के अन्तर्गत संगठित करके ही हिन्दुओं की पार्टी अर्थात् कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी जा सकती है। इसके बाद जिन्ना, मुसमलानों के लिये अलग देश अर्थात् पाकिस्तान बनाने की राह पर चल पड़ा।
उसने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को मुसलमानों की कमजोरी बनाने तथा उस कमजोरी को अपने पक्ष में भुनाने का निर्णय लिया। जिन्ना ने भारतीय राजनीति की पूरी दिशा बदल दी।
उसने कांग्रेस को धमकी दी- ‘मुसमलानों को अकेला छोड़ दें।’ उसके साथियों ने मुसलमानों पर हिन्दुओं द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के झूठे आंकड़े और मनगढ़ंत घटनाएं प्रचारित करके इस्लाम खतरे में, जैसे भड़काऊ नारे दिये और मुसलमानों में कृत्रिम भय पैदा करके साम्प्रदायिकता की समस्या को चरम पर पहुंचा दिया।
इसी बीच जवाहरलाल नेहरू ने अपने समाजवादी कार्यक्रम में मुसलमानों से सहयोग करने की अपील की किन्तु डॉ. इकबाल ने इसे मुसलमानों की सांस्कृतिक एकता को नष्ट करने की योजना बताया। इकबाल ने जिन्ना को भरपूर सहयोग दिया। इकबाल की मध्यस्थता से जिन्ना-सिकन्दर समझौता हुआ तथा पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के मुस्लिम सदस्य, मुस्लिम लीग के भी सदस्य बन गये।
इसके तुरन्त बाद बंगाल में फजलुल हक के नेतृत्व में और सिन्ध में सादुल्लाखाँ ने नेतृत्व में विधान सभाओं के मुस्लिम सदस्यों ने मुस्लिम लीग की सदस्यता स्वीकार कर ली। इससे मुस्लिम लीग शक्तिशाली पार्टी हो गई। इसी दौरान संयुक्त प्रान्त में मन्त्रिमण्डल निर्माण सम्बन्धी विवाद ने मुस्लिम लीग की लोकप्रियता बढ़ाने में योगदान दिया।
कांग्रेस और लीग के बीच अविश्वास की वृद्धि के कारण ऊपरी तौर पर गौण लगने वाले मसले, जैसे कि कांग्रेस के झण्डे को फहराना, वन्देमातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाना, उर्दू के स्थान पर हिन्दी के प्रयोग की मांग उठाना आदि भी अब साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए।
जिन्ना ने इसका लाभ उठाया और मुसलमानों पर अपने नेतृत्व और मुस्लिम लीग का प्रभाव मजबूती से आरोपित कर दिया। फलस्वरूप 1927 ई. में मुस्लिम लीग की सदस्य संख्या जो मात्र 1330 थी, 1938 ई. में एक लाख हो गई और 1944 ई. में 20 लाख के आसपास पहुँच गई।
जिन्ना मुस्लिम लीग को भारत के समस्त मुसलमानों की एक मात्र प्रतिनिधि संस्था कहता था जबकि कांग्रेस उसके इस दावे को अस्वीकार करती थी क्योंकि जिन्ना के दावे को स्वीकार करने का अर्थ था कि कांग्रेस न तो एकमात्र अखिल भारतीय पार्टी है और न हिन्दू और मुसलमान, दोनों की पार्टी है।
इस कारण जिन्ना, कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं, विशेषतः महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू से चिढ़ा हुआ रहता था। कांग्रेस के नेताओं के लिये जिन्ना का व्यवहार असह्य था। फिर भी गांधीजी हर हाल में जिन्ना को कांग्रेस के आंदोलन के साथ रखना चाहते थे। इस प्रकार कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग, दोनों पार्टियों के शर्षस्थ नेताओं के व्यक्तिगत मतभेदों ने देश में साम्प्रदायकिता को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया।
(13.) चौधरी रहमत अली द्वारा पाकिस्तान की अवधारणा
ब्रिटिश सरकार की ओर से लगातार दिये जा रहे प्रोत्साहन ने मुसलमानों के मन में अपने लिये एक अलग देश की कल्पना ने जन्म लिया। 1933 ई. में चौधरी रहमत अली नामक एक मुस्लिम विद्यार्थी ने लंदन में एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें कहा गया कि भारतीय मुसलमानों को अपना राज्य हिन्दुओं से अलग कर लेना चाहिये।
भारत को अखण्ड रखने की बात अत्यंत हास्यास्पद और फूहड़ है। भारत के जिन उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों- पंजाब, कश्मीर, सिंध, सीमांत प्रदेश तथा ब्लूचिस्तान में मुसलमानों की संख्या अधिक है, उन्हें अलग करके पाकिस्तान नामक देश बनाया जाना चाहिये। प्रस्ताव के अंत में कहा गया था- ‘हिन्दू राष्ट्रीयता की सलीब पर हम खुदकुशी नहीं करेंगे।’
कैंब्रिज विश्वविद्यालय के भारतीय मुस्लिम विद्यार्थियों ने रहमत अली का साथ दिया। उन्होंने एक इश्तहार प्रकाशित किया जिसमें पाकिस्तान की मांग के बारे में ‘नाउ ऑर नेवर’ का उल्लेख करते हुए कहा गया- ‘भारत किसी एक अकेले राष्ट्र का नाम नहीं है। न ही एक अकेले राष्ट्र का घर है। वास्तव में यह इतिहास में पहली बार ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्मित एक राष्ट्र की उपाधि है….. मुसलमानों की जीवन शैली भारत के अन्य लोगों से भिन्न है। इसलिये उनका अपना राष्ट्र होना चाहिये। हमारे राष्ट्रीय रिवाज और कैलेंडर अलग हैं। यहाँ तक कि हमारा खान-पान तथा परिधान भी भिन्न है।’
(14.) मुस्लिम लीग द्वारा नेशनल गार्ड का गठन
मुस्लिम लीग ने 1938 ई. में अपनी एक निजी सेना का गठन करना आरम्भ कर दिया। इस सेना के दो संगठन बनाये गये, एक था मुस्लिम लीग वालंटियर कॉर्प तथा दूसरा था मुस्लिम नेशनल गार्ड। मुस्लिम नेशनल गार्ड, मुस्लिम लीग का गुप्त अस्त्र था।
उसकी सदस्यता गुप्त थी और उसके अपने प्रशिक्षण केंद्र व मुख्यालय थे जहाँ उसके सदस्यों को सैन्य प्रशिक्षण और ऐसे निर्देश दिये जाते थे जो उन्हें दंगों के समय लाभ पहुंचायें। इन प्रशिक्षण केन्द्रों पर लाठी-भाला चलाने, चाकू मारकर हत्या करने और धावा बोलने का प्रशिक्षण दिया जाता था।
नेशनल गार्ड द्वारा भारी मात्रा में हथियार एकत्र किये गये और भारतीय सेना के विघटित मुस्लिम सैनिकों को भर्ती किया गया। मुस्लिम नेशनल गार्ड के यूनिट कमाण्डरों को सालार कहा जाता था। नेशनल गार्ड के लम्बे चौड़े जवान, हथियारों से लैस होकर जिन्ना के चारों ओर बने रहकर उसकी सुरक्षा करते थे।
(15.) द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार को कांग्रेस द्वारा असहयोग एवं मुस्लिम लीग द्वारा सहयोग
3 सितम्बर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया। ब्रिटिश सरकार ने प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के नाम पर भारतीयों से अपील की कि वे साम्राज्य की रक्षा करें। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को विश्वास में लिये बिना ही भारत को भी युद्ध में सम्मिलित करने की घोषणा कर दी।
कांग्रेस ने इसकी तीव्र आलोचना की और कहा कि जब तक भारत को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक उसे युद्ध में नहीं झौंका जा सकता। इसके विपरीत, मुस्लिम लीग ने युद्ध में अँग्रेजों की सहायता का आश्वासन दिया तथा बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिक मोर्चों पर लड़ने गये।
11 सितम्बर 1939 को वायसराय ने दोनों सदनों में घोषणा की कि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण भारत संघ के निर्माण की योजना स्थगित की जा रही है। मुस्लिम लीग ने इस घोषणा का स्वागत किया क्योंकि उसे प्रस्तावित संघ में हिन्दू प्रभुत्व स्थापित होने की आशंका थी।
इस प्रकार युद्ध नीति और भारत के संवैधानिक भविष्य को लेकर कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच खाई बहुत चौड़ी हो गई किंतु मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार एक दूसरे के और निकट आ गये। मुस्लिम लीग ने अवसर का लाभ उठाते हुए, ब्रिटिश सरकार से मांग की कि ई. 1935 के सम्पूर्ण संविधान पर पुनर्विचार किया जाये क्योंकि प्रान्तीय स्वायत्तता ने हिन्दू आधिपत्य की आशंका को सत्य सिद्ध कर दिया है।
(16.) मुक्ति दिवस का आयोजन
17 अक्टूबर 1939 को वायसराय ने एक वक्तव्य दिया जिसमें युद्ध के बाद भारत को उपनिवेश का दर्जा (डोमिनियन स्टेटस) देने का आश्वासन दिया। कांग्रेस ने इस घोषणा को अपर्याप्त बताया क्योंकि कांग्रेस 1930 से पूर्ण स्वराज्य की मांग कर रही थी। सरकार की नीति के विरोध में प्रान्तों के कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने त्यागपत्र दे दिये।
मुस्लिम लीग ने कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों के त्यागपत्र का स्वागत करने के लिये 22 दिसम्बर 1939 को मुक्ति दिवस मनाया। वायसराय ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं से केन्द्रीय और प्रान्तीय प्रशासन में सहयोग देने के सम्बन्ध में बातचीत जारी रखी परन्तु इसका कोई परिणाम नहीं निकला।
सच्चाई यह थी कि ब्रिटिश सरकार भारत के संवैधानिक भविष्य के बारे में ऐसे किसी प्रस्ताव को प्रोत्साहन देने के पक्ष में नहीं थी जिससे कांग्रेस और लीग की दूरी घटती हो। वह तो दोनों के मध्य साम्प्रदायिक विद्वेष को बढ़ाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहती थी।
(17.) मुस्लिम लीग का लाहौर अधिवेशन एवं पाकिस्तान प्रस्ताव
1940 ई. में रहमत अली ने इस्लाम की मिल्लत और भारतीयता का खतरा शीर्षक से एक इश्तहार प्रकाशित किया जिसमें उसने कहा कि मुसलमानों को भारतीयता से बचना चाहिये और अलग राष्ट्र के निर्माण का प्रयास करना चाहिये। रहमत अली ने इण्डिया शब्द के अँग्रेजी अक्षरों में हेरफेर करके दीनिया शब्द का निर्माण किया जिसका अर्थ होता था- एक ऐसा उपमहाद्वीप जो इस्लाम में धर्मांतरित होने की प्रतीक्षा कर रहा था।
रहमत अली ने बंगाल व आसाम का पुनः नामकरण करते हुए उसे बंग ए इस्लाम का नाम दिया। इस नाम का अर्थ था ‘इस्लाम का बंगुश।‘ उसने बिहार का नाम फरूखिस्तान, उत्तर प्रदेश का नाम हैदरिस्तान, राजपूताना का नाम मोइनिस्तान तथा हैदराबाद का नाम ओसमानिस्तान रखा।
उस वर्ष रहमत अली की परिकल्पना इतनी सफल हुई कि दिसम्बर 1940 में अपने लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने अलग देश बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि मुसलमानों को तब तक कोई संवैधानिक योजना स्वीकार नहीं होगी जब तक उसे इन मूल सिद्धांतों पर तैयार न किया गया हो।
जिन क्षेत्रों में मुसलमान बहुमत में हैं, जैसे भारत के उत्तर पश्चिमी और उत्तर पूर्वी अंचलों में, उन्हें संगठित करके आठ स्वतंत्र देशों के रूप में संगठित किया जाना चाहिये जिसमें घटक इकाइयाँ स्वतंत्र और प्रभुत्व संपन्न होंगी।
प्रस्तावित नये देश में मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों को उनके हितों की सुरक्षा के लिये प्रभावशाली संवैधानिक सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था जिनसे उनके धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं प्रशासनिक अधिकार सुरक्षित रहें। माना जाता है कि इस प्रस्ताव को पारित करवाने में ब्रिटिश अधिकारियों का हाथ था।
गणेशप्रसाद बरनवाल ने लिखा है- ‘लाहौर का पाकिस्तान प्रस्ताव, गांधीजी की हिन्दू मुस्लिम एकता मिशन की कर्बला है। 15 जून 1940 के हरिजन में गांधीजी की एकता संकल्पना का ग्लेशियर पिघलता दिखाई पड़ता है। जिसमें उन्होंने लिखा है- …… द मुस्लिम लीग इज फ्रैंकली कम्यूनल एंड वांट्स टू डिवाइड इण्डिया इन टू पार्टस्।’
(18.) क्रिप्स प्रस्ताव से कांग्रेस और मुस्लिम लीग आमने-सामने
द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भिक दो वर्षों में जब जापान के विरुद्ध मित्र राष्ट्रों की स्थिति कमजोर होती गई तो मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के लिए सर स्टैफर्ड क्रिप्स को कुछ प्रस्तावों के साथ भारत भेजा।
क्रिप्स प्रस्ताव के दो भागों में थे- एक तो दूरगामी प्रस्ताव जो युद्ध के बाद लागू किये जाने थे और दूसरे तात्कालिक प्रस्ताव जो तुरन्त लागू किये जाने थे। दूरगामी प्रस्ताव में एक संविधान निर्मात्री सभा का गठन करने तथा उसके द्वारा भारतीय संघ का संविधान बनाने का प्रावधान था।
मुस्लिम लीग को सन्तुष्ट करने के लिए इन प्रस्तावों में कहा गया कि यदि कोई प्रान्त भारतीय संघ में सम्मिलित नहीं होना चाहेगा तो ऐसे प्रान्तों को अपना पृथक् संघ और संविधान बनाने का अधिकार होगा। तात्कालिक प्रस्ताव में वायसराय की कार्यकारिणी में युद्धमन्त्री के अधिकारों से सम्बन्धित विषय थे।
कांग्रेस ने क्रिप्स के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उनमें उत्तरदायी शासन स्थापित करने वाली कोई बात नहीं थी। यद्यपि क्रिप्स प्रस्ताव में अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की मांग स्वीकार कर ली गई थी तथापि लीग ने भी क्रिप्स प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया क्योंकि इसमें पाकिस्तान के निर्माण के सम्बन्ध में स्पष्ट घोषणा नहीं थी।
यद्यपि कांग्रेस का एक वर्ग राजगोपालाचारी के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग की वास्तविकता को स्वीकार करने लगा था, तथापि 29 अप्रैल 1942 को भारतीय कांग्रेस कमेटी ने एक प्रस्ताव पारित करके कहा कि किसी भी भारतीय भौगोलिक क्षेत्र को भारतीय संघ से अलग हो जाने की स्वतंत्रता देना, देश के लिए अहितकर होगा। इस प्रकार कांग्रेस द्वारा मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग को खुली चुनौती दी गई।
(19.) भारत छोड़ो आन्दोलन पर मुस्लिम लीग की अलगाववादी राजनीति
क्रिप्स प्रस्तावों की असफलता के बाद 8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रस्ताव पारित किया। इस पर सरकार ने कांग्रेसी नेताओं को बंदी बना लिया। कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी ने आन्दोलन को विद्रोह में बदल दिया। जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन आरम्भ किया तो जिन्ना ने कांग्रेस के खिलाफ असभ्य भाषा में भाषण दिये और मुसलमानों को इस आंदोलन का विरोध करने का आह्वान किया।
मुसलिम लीग प्रेस ने इस पूरे आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन से लड़ रहे कांग्रेसियों को गुण्डे शब्द से संबोधित किया। कांग्रेस नेताओं के विरुद्ध उतनी कठोर बातें ब्रिटिश प्रेस ने भी नहीं कीं जितनी मुस्लिम लीग प्रेस ने कहीं।
20 अगस्त को लीग की कार्यकारिणी द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया- ‘कांग्रेस के इस आन्दोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को परेशान करना है जिससे वह हिन्दू कुलीनतन्त्र को शासन-भार सौंप दे और इस प्रकार वह मुसलमानों तथा अन्य भारतीय अल्पसंख्यक समुदाय को समय-समय पर दिये गये वचनों तथा नैतिक उत्तरदायित्वों को पूरा न कर सके। साथ ही मुसलमानों को भी कांग्रेस की शर्तों पर तथा आज्ञाओं के आगे झुकने के लिए विवश कर दे।’
इस प्रस्ताव की आड़ में जिन्ना ने मुस्लिम लीग को और अधिक सशक्त बनाने का प्रयास किया। हर प्रान्तीय लीग को संगठित किया गया। केन्द्रीय और प्रान्तीय स्तर के लीगी नेताओं को छोटे शहरों एवं कस्बों में पाकिस्तान का संदेश पहुँचाने के लिए नियमित दौरे करने को कहा गया तथा साम्प्रदायिक समस्या को उसके चरम पर पहुंचा दिया गया।
6 मई 1944 को वायसराय लॉर्ड वेवल ने गांधीजी को बीमारी के कारण जेल से छोड़ दिया। जेल से मुक्त होने के बाद गांधीजी ने साम्प्रदायिक समस्या के समाधान हेतु जिन्ना से मिलने का निश्चय किया। गांधीजी की योजना की मुख्य बात यह थी कि युद्ध के बाद भारत उत्तर-पूर्व तथा उत्तर-पश्चिम में मुस्लिम बहुमत वाले प्रदेशों की सीमा निर्धारित करने के लिए एक आयोग नियुक्त किया जाये।
इन प्रदेशों में किसी व्यावहारिक मताधिकार के आधार पर यह तय करने के लिए जनमत लिया जाये कि ये प्रदेश भारत से अलग होना चाहते हैं या नहीं। यदि मुस्लिम बहुमत वाले क्षेत्र भारत से अलग होने का निर्णय करते हैं तो उनका राज्य अलग बन जायेगा। जिन्ना ने इस योजना को अस्वीकार कर दिया। उसने अस्वीकृति के तीन कारण बताये-
(क.) इस फार्मूले से मुसलमानों को अपूर्ण, अंगहीन तथा दीमक युक्त पाकिस्तान दिया गया है। जिन्ना सम्पूर्ण बंगाल, आसाम, सिन्ध, पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त और ब्लूचिस्तान को पाकिस्तान में चाहता था।
(ख.) प्रस्तावित जनमत-संग्रह में गैर-मुसलमानों को भी भाग लेने की अनुमति दी गई थी।
(ग.) प्रतिरक्षा, संचार और परिवहन के सम्बन्ध में संयुक्त व्यवस्था का प्रस्ताव था जिसे लीग मानने को तैयार नहीं थी।
(20.) शिमला सम्मेलन की असफलता
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जून 1945 में लॉर्ड वेवल ने भारत के भावी प्रशासनिक पुनर्गठन की योजना पर वार्त्ता करने के लिए साम्प्रदायिक हितों से जुड़े प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया। यह सम्मेलन शिमला में आयोजित किया गया था इसलिये इसे शिमला सम्मेलन कहते हैं।
जिन्ना और गांधीजी का मतभेद केवल मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के विषय में रहता था। देश में 10 करोड़ मुसमलान थे एवं 25 करोड़ हिन्दू व अन्य मतों के अनुयायी थे। कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी थी जिसे विश्वास था कि वह 100 प्रतिशत हिन्दू, सिख एवं अन्य मतों के अनुयायियों का तथा 90 प्रतिशत मुस्लिम मतानुयायियों को नेतृत्व करती है और मुस्लिम लीग को देश के लगभग 10 प्रतिशत मुसलामनों का समर्थन प्राप्त है।
जबकि मुस्लिम लीग मानती थी कि उसे देश के 90 प्रतिशत मुसलामनों का समर्थन प्राप्त था। जिन्ना कहता था कि मुस्लिम लीग ही एक मात्र संस्था है जो मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कर सकती है जबकि गांधीजी का कहना था कि कांग्रेस हिन्दू और मुसलमान दोनों का प्रतिनिधित्व करती है।
गांधीजी ने शिमला सम्मेलन में कांग्रेस की ओर से मौलाना अबुल कलाम आजाद को भी सम्मिलित करने का प्रयास किया। इस पर जिन्ना नाराज हो गया। उसने कहा कि सरकार में केवल चार मुस्लिम प्रतिनिधि होंगे और वे चारों प्रतिनिधि मुस्लिम लीग की ओर से होंगे। कांग्रेस को केवल हिन्दुओं को ही अपना प्रतिनिधि बनाने का अधिकार है। इस बिंदु पर इतनी टसल चली कि शिमला सम्मेलन विफल हो गया।
(21.) मुसलमानों पर कांग्रेस का प्रभाव समाप्त
दिसम्बर 1945 में प्रान्तीय विधान सभाओं के चुनाव हुए। चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस का मुसलमानों में कोई विशेष प्रभाव नहीं है और मुसलमानों का वास्तिविक प्रतिनिधित्व मुस्लिम लीग कर रही है। ब्रिटिश भारत के 11 प्रान्तों में से 7 प्रान्तों में कांग्रेस के मन्त्रिमण्डल बने, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में खुदाई खिदमतगारों की सरकार बनी जिनके नेता सीमान्त गांधी खान अब्दुल गफ्फारखान थे। पंजाब में कांग्रेस तथा अकाली दल की मिलीजुली सरकार बनी। केवल दो प्रांतों- बंगाल एवं सिन्ध में मुस्लिम लीग की सरकारें बनीं।
(22.) कैबिनेट मिशन योजना
15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करने की घोषणा की। 24 मार्च 1946 को इस सम्बन्ध में भारतीय नेताओं से बातचीत करने के लिए कैबिनेट मिशन भारत आया। इस मिशन ने तीन महीने भारत में रहकर भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श किया।
16 मई 1946 को मिशन ने एक योजना की घोषणा की। इसमें भारत के लिए एक संघीय शासन व्यवस्था की बात कही गई जिसमें ब्रिटिश भारत के समस्त प्रान्त तथा भारत की देशी रियासतें सम्मिलित होनी थीं। मिशन ने भारत का संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का गठन करने का भी प्रस्ताव किया जिसके कुल 389 सदस्यों में से 210 गैर-मुस्लिम और 78 मुस्लिम सदस्य रखे गये।
शेष 101 स्थान देशी रियासतों के लिए सुरक्षित रखे गये। केबिनेट मिशन योजना का दूसरा महत्त्वपूर्ण अंश अन्तरिम सरकार की स्थापना का था। इसमें 14 सदस्य रखे गये जिनमें 5 कांग्रेस के सवर्ण हिन्दू सदस्य, 5 मुस्लिम लीग के सदस्य, 1 दलित वर्ग का सदस्य और 3 अन्य अल्प संख्यकों के सदस्य सम्मिलित होने थे।
कांग्रेस ने केबिनेट मिशन योजना के संविधान निर्माण सम्बन्धी प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया किन्तु अन्तरिम सरकार के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। मुस्लिम लीग ने सम्पूर्ण योजना को स्वीकार कर लिया। वह अन्तरिम सरकार में भाग लेने की भी इच्छुक थी।
जुलाई 1946 में कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार संविधान सभा के चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस को भारी सफलता मिली। इस पर 29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया। मुस्लिम लीग द्वारा कैबिनेट मिशन योजना अस्वीकार कर दिये जाने पर कांग्रेस ने अन्तरिम सरकार में भाग लेने की स्वीकृति दे दी। इस पर 12 अगस्त 1946 को वायसराय ने पं. जवाहरलाल नेहरू को अन्तरिम सरकार बनाने का निमन्त्रण भेज दिया।
(23.) सीधी कार्यवाही दिवस
आसानी से पाकिस्तान हाथ आता हुआ न देखकर मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 के दिन सीधी कार्यवाही दिवस मनाने तथा पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए सड़कों पर भयानक हिंसा करने का निर्णय लिया। जिन्ना को अपना निर्णय पलटने का अनुरोध करने के लिये जवाहरलाल नेहरू 16 अगस्त 1946 को जिन्ना के घर गये किंतु जिन्ना पर नेहरू की अपील का कोई असर नहीं हुआ।
बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और सुहरावर्दी वहाँ का मुख्यमंत्री था। सुहरावर्दी ने 16 अगस्त को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया ताकि मुस्लिम लीग के स्वयंसेवक बिना किसी रोक-टोक के सीधी कार्यवाही की हिंसा में भाग ले सकें। मुस्लिम लीग के आह्वान पर लाखों लोग सड़क पर निकल आये।
उन्होंने हिन्दुओं के घरों एवं दुकानों में आग लगा दी और हिन्दुओं का कत्लेआम आरम्भ कर दिया। कलकत्ता में भीषण हत्याकाण्ड हुआ जिसमें लगभग 4000 हिन्दू मारे गये। ये साम्प्रदायिक दंगे पूर्वी बंगाल के नोआखाली और त्रिपुरा जिलों में भी फैल गये जिनमें लगभग 200 हिन्दू मारे गये।
नोआखाली में बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का प्रयास किया गया तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार किये गये। इन दंगों की प्रतिक्रिया में बिहार में हिन्दुओं ने मुसलमानों पर आक्रमण कर दिया। सरकारी सूत्रों के अनुसार बिहार में लगभग 4300 मुसलमान मारे गये।
संयुक्त प्रान्त में 250 मुसलमान मारे गये। पूर्वी भारत की तरह पश्चिमी भारत में भी सीधी कार्यवाही में हिन्दुओं एवं सिक्खों के विरुद्ध भयानक हिंसा हुई। पंजाब में मरने वाले सिक्खों तथा हिन्दुओं की संख्या 3000 तक पहुंच गई। दंगों के दौरान सिक्खों की करोड़ों रुपये मूल्य की सम्पत्ति लूट ली गई अथवा तोड़-फोड़ एवं आगजनी में नष्ट कर दी गई।
(24.) अंतरिम सरकार के गठन के बाद साम्प्रदायिकता में वृद्धि
2 सितम्बर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने अन्तरिम सरकार का गठन किया। सत्ता का सारा लाभ कांग्रेस को न मिल जाय, इस आशंका से ग्रस्त मुस्लिम लीग अपने पूर्व निर्णय को बदल कर 13 सितम्बर को अन्तरिम सरकार में सम्मिलित हो गई। मुस्लिम लीग, नेहरू सरकार के समक्ष इतने कांटे बिछाना चाहती थी कि सरकार विफल हो जाये।
वित्तमंत्री की हैसियत से लियाकत अलीखां को सरकार के प्रत्येक विभाग में दखल देने का अधिकार मिल गया। वह प्रत्येक प्रस्ताव को या तो अस्वीकार कर देता था या फिर उसमें बदलाव कर देता था। उसने अपने कार्यकलापों से मंत्रिमण्डल को पंगु बना दिया। मंत्रिगण लियाकत अलीखां की अनुमति के बिना एक चपरासी भी नहीं रख सकते थे।
लियाकत अलीखां ने कांग्रेसी मंत्रियों को ऐसी उलझन में डाला कि वे कर्तव्यविमूढ़ हो गये। घनश्यामदास बिड़ला ने गांधीजी और जिन्ना के बीच खाई पाटने के उद्देश्य से लियाकत अलीखां को समझाने की चेष्टा की किंतु कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में कांग्रेस के अनुरोध पर लार्ड माउण्टबेटन ने लियाकत अली से बात की और करों की दरें काफी कम करवाईं।
मुस्लिम लीग ने सरकार में सम्मिलित होने के बाद भी संविधान सभा का बहिष्कार जारी रखा। मुस्लिम लीग के अंतरिम सरकार में सम्मिलित होने पर बंगाल और पंजाब के मुसलमानों ने हिंदुओं के विरुद्ध हमले तेज कर दिये। इस कारण मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से हिन्दू जनता भागने लगी।
लाहौर से लेकर पेशावर तक पूरा पंजाब धू-धू कर जलने लगा। अलगाववादी मुल्लाओं और मौलानाओं ने जानवरों की हड्डियां दिखा-दिखा कर मुसलमानों को भड़काया कि यह बिहार में हिंदुओं के अत्याचार के कारण मरे मुसलमानों की हड्डियां हैं। मुस्लिम लीग के वालंटियर (रजाकार) चुन-चुन कर हिन्दुओं के मोहल्लों और मकानों को लूटने लगे, आग लगाने लगे, स्त्रियों से बलात्कार करने लगे और उनका अपहरण करने लगे।
लॉर्ड माउण्टबेटन ने घोषणा की- ‘मैं रक्तपात और लूटमार नहीं होने दूंगा। मैं थलसेना और वायुसेना से काम लूंगा। मैं उत्पात करने वालों का दमन करने के लिये टैंकों और वायुयानों का उपयोग करूंगा।’
एक ओर वायसराय दंगों को रोकने के लिये कृत संकल्प था तो दूसरी ओर पंजाब का गर्वनर फ्रांसिस मुडी जिन्ना को आश्वासन दे रहा था- ‘मैं सबसे कह रहा हूँ कि मैं इस बात की चिंता नहीं करता कि सिक्ख सीमा पर कैसे पहुंचेंगे। अच्छी बात तो यह है कि यंथासंभव शीघ्र से शीघ्र उनसे छुटकारा हो जाये।’
यही कारण था कि वायसराय की घोषणा पर अमल नहीं हुआ। पंजाब में बड़ी संख्या में सिक्खों का कत्ल हुआ और अंग्रेज उनकी रक्षा नहीं कर पाये। सिक्खों की रक्षा करने की कौन कहे, स्वयं अँग्रेजों की जान के लाले पड़े हुए थे, वे किसी तरह भारत से सही सलामत निकलकर अपने देशी पहुंच जाना चाहते थे।
उपरोक्त कारणों से भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का विकास निरंतर होता चला गया जिससे भारत में साम्प्रदायिक समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया और देश का विभाजन निश्चित जान पड़ने लगा।
भारतीय राजनीति में नेताजी सुभाषचन्द्र का नाम बहुत ऊँचा है। वे भारतीय राजनीति के अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की, देश की भूमि से बाहर जाकर सेना का निर्माण किया तथा ब्रिटिश कालीन राजनीति में नेताजी के नाम से जाने गए।
प्रारम्भिक जीवन
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था। उनके पिता जानकीनाथ बोस कटक में सरकारी वकील थे। सुभाषचंद्र के सात भाई और छः बहिनें थीं। सुभाष अपनी माता के सातवें पुत्र थे। 1913 ई. में हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सुभाष ने कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रवेश लिया।
1915 ई. में उन्होंने प्रथम श्रेणी में एफ. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने बी. ए. की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वे आगे भी पढ़ना चाहते थे परन्तु उनके पिता उन्हें आई.सी.एस. बनाना चाहते थे। पिता की इच्छा के कारण वे 31 अगस्त 1919 को इंग्लैण्ड चले गये।
आठ माह की संक्षिप्त अवधि में सुभाषचंद्र बोस ने आई.सी.एस. की परीक्षा के साथ-साथ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में ऑनर्स की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। सुभाषचंद्र बोस सरकारी नौकरी नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने पिता तथा इण्डियन ऑफिस को सूचित कर दिया कि वे आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने पर भी, सरकारी नौकरी नहीं करेंगे। सुभाष पहले और सम्भवतः आखिरी भारतीय थे जिन्होंने बहुप्रतिष्ठित आई.सी.एस. की नौकरी का इस ढंग से परित्याग किया था।
राजनीति में प्रवेश
16 जुलाई 1921 को सुभाषचंद्र बोस भारत लौटे। उस समय भारत में असहयोग आन्दोलन चल रहा था। सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु देशबन्धु चितरंजनदास ने सुभाष को इस आन्दोलन में रचनात्मक कार्य करने को कहा। साथ ही उन्हें नेशनल कॉलेज का प्रधानाचार्य बनाया गया।
5 फरवरी 1922 को गोरखपुर के चौरी-चौरा काण्ड के कारण गांधीजी ने 12 फरवरी 1922 को आन्दोलन बन्द कर दिया। इससे सुभाष बाबू को गहरा धक्का लगा। 1923 ई. में देशबन्धु ने सुभाष को कलकत्ता नगर निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करवा दिया परन्तु वे इस पद पर पांच माह ही काम कर पाये।
25 अक्टूबर 1924 को वायसराय लॉर्ड रीडिंग ने फरमान संख्या एक जारी करके बंगाल के अधिकारियों को अधिकार दिया कि वे आम अदालती कार्यवाही किये बिना, किसी भी देशभक्त को दण्ड दे सकते थे। सुभाषचन्द्र बोस और देशबन्धु चितरंजनदास ने इस एक्ट का विरोध किया।
इस कारण सरकार ने सुभाष बाबू को बन्दी बनाकर अलीपुर जेल भेज दिया जहाँ से उन्हें बहरामपुर जेल भेज दिया गया। दो माह के बाद सुभाष को मांडले जेल भेज दिया गया। 1927 ई. में सुभाष बाबू के फेफड़ों में खराबी आ गई तथा वजन 40 पौंड कम हो गया। सरकार को बिना किसी शर्त, उन्हें रिहा करना पड़ा। सुभाष ने शीघ्र ही स्वास्थ्य लाभ कर लिया। बंगाल कांग्रेस ने उन्हें अपना प्रधान तथा अखिल भारतीय कांग्रेस ने उन्हें अपना प्रधान सचिव चुना।
1927 ई. में साइमन कमीशन भारत आया। देश भर में उसके विरुद्ध प्रदर्शन हुये। 1928 ई. के आरम्भ में साइमन कमीशन कलकत्ता पहुँचा। उसके विरुद्ध प्रदर्शन को सफल बनाने के लिए सुभाष बाबू ने मजदूर-किसान पार्टी से पूरी शक्ति से सम्मिलित होने का अनुराध किया।
इस अपील का अच्छा परिणाम निकला और कलकत्ता का कमीशन विरोधी प्रदर्शन सबसे सफल रहा। नेहरू रिपोर्ट के प्रकाशन और कांग्रेस द्वारा उसके समर्थन के बाद ही देश के बहुत से शहरों में इंडिपेंडेंस लीगों की स्थापना की गई। यह इस बात का सूचक था कि देश के नौजवान डोमीनियन स्टेटस से सन्तुष्ट नहीं थे।
वे भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता चाहते थे। नवम्बर 1928 में ऑल इंडिया इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना हुई। उसके नेता जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस थे। दिसम्बर 1928 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में नेहरू और बोस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित कराने का प्रयास किया किन्तु गांधीजी और कांग्रेस के अन्य दक्षिण पंथी नेताओं ने उनके प्रस्ताव को पारित नहीं होने दिया।
1929 ई. के अंत में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ। इसमें पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित किया गया। इस अधिवेशन में सुभाष ने एक अन्य प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया कि कांग्रेस का लक्ष्य देश में समानान्तर सरकार स्थापित करना होना चाहिए परन्तु उनके प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया गया।
इसके बाद सुभाष और वांमपंथी सदस्य अधिवेशन से बाहर आ गये। इसके दस मिनट बाद ही सुभाष ने लाहौर में कांग्रेस डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की। साथ ही उन्होंने सारे भारत में 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वाधीनता दिवस मनाने वाले प्रस्ताव का जोरदार समर्थन किया।
कांग्रेस सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाने के बारे में विचार-विमर्श कर रही थी, उसी समय सुभाषचन्द्र बोस तथा 11 अन्य लोगों को एक-एक साल का कठोर कारावास हो गया। बंगाल ने अपने प्रिय नेता को बन्दीगृह में रहते हुए भी मेयर पद से सम्मानित किया।
उन्हें अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया जिस पर वे 1932 ई. तक आसीन रहे। सितम्बर 1931 को वे जेल से रिहा हुए परन्तु 18 नवम्बर 1931 को उन्हें मालजदा से बहरामपुर जाते हुए, धारा 144 में बन्दी बना लिया गया। एक सप्ताह बाद उन्हें मुक्त कर दिया गया।
14 जनवरी 1932 को सुभाष को पुनः बन्दी बना लिया गया। इस बार वे स्टेट प्रिजनर्स के रूप में अपने बड़े भाई शरत बोस के साथ जबलपुर जेल में रखे गये। क्षयरोग के पुराने रोगी होने के कारण उन्हें भुवाली सैनेटोरियम भेजा गया किन्तु उन्हें वहाँ भी कोई लाभ नहीं हुआ। 23 फरवरी 1932 को उन्हें विदेश जाना पड़ा। उन्होंने पोलैण्ड, फ्रांस, चेकोस्लोवाकिया, आस्ट्रिया, इटली आदि देशों का भ्रमण किया।
गांधीजी से मतभेद
कांग्रेस के 1938 ई. के हरिपुर अधिवेशन के अध्यक्ष पद पर सुभाषचन्द्र बोस को सर्वसम्मति से चुना गया। इस समय तक कांग्रेस ने 1935 के अधिनियम के प्रान्तीय स्वायत्तता वाले भाग को तो स्वीकार कर लिया था परन्तु संघीय योजना को स्वीकार नहीे किया था। कई दक्षिण पंथी कांग्रेसी नेता संघीय योजना को भी स्वीकार करने की वकालत कर रहे थे।
सुभाषचन्द्र बोस संघीय योजना के विरुद्ध थे और वे अंग्रेज सरकार के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग अपनाना चाहते थे। सुभाषचन्द्र बोस और उनके समर्थकों ने जनमत तैयार करने के लिये सम्पूर्ण भारत में अपने विचारों का प्रचार करना आरम्भ कर दिया। इससे गांधीवादियों के साथ उनका विरोध बढ़ता गया।
उस समय तक कांग्रेस वर्किंग कमेटी का चुनाव नहीं होता था। अध्यक्ष ही उसे मनोनीत करता था।यदि अगले अधिवेशन के लिये सुभाष पुनः अध्यक्ष चुन लिये जाते तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी में वामपंथी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जा सकती थी और दक्षिणपंथियों को समझौते की तरफ जाने से रोका जा सकता था। इसलिये दक्षिणपंथियों ने सुभाष को अगले अधिवेशन का अध्यक्ष नहीं बनाने का निर्णय लिया।
1939 ई. में कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन के अध्यक्ष पद के लिये वामपंथियों के उम्मीदवार सुभाषचन्द्र बोस और दक्षिणपंथियों के उम्मीदवार डॉ.पट्टाभि सीतारमैया थे। गांधीजी ने पट्टाभि सीतारमैया को विजयी बनाने के लिये हर संभव प्रयास किया किंतु सीतारमैया हार गये।
सुभाष को 1575 वोट और सीतारमैया को 1376 वोट मिले। सुभाष की विजय से कांग्रेस के दक्षिणपंथियों में हलचल मच गई। गांधीजी ने सीतारमैया की हार को अपनी हार बताया और कहा कि कांग्रेस ने भ्रष्ट संगठन का रूप धारण कर लिया है और उसके सदस्य फर्जी हैं। उन्होंने खुली धमकी भी दी कि यदि कांग्रेस ने दक्षिणपंथियों के अनुकूल नीति का पालन नहीं किया तो वे कांग्रेस से अपना नाता तोड़ सकते हैं।
सुभाष के अध्यक्ष चुने जाने के बाद दक्षिणपंथियों ने कांग्रेस में उनके लिये संकट पैदा कर दिया। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 15 सदस्य दक्षिणपंथी थे। उन्होंने सुभाष के साथ सहयोग करने से इन्कार करते हुए त्याग-पत्र दे दिये। इसी पृष्ठभूमि में 10-12 मार्च 1939 को कांग्रेस का त्रिपुरा अधिवेशन हुआ।
गांधीजी इस समय राजकोट में अनशन कर रहे थे। दक्षिणपंथी नेताओं ने इस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करवा लिया कि कांग्रेस अध्यक्ष गांधीजी की इच्छा के अनुसार वर्किंग कमेटी मनोनीत करें। यह प्रस्ताव सुभाष बाबू के लिये स्पष्ट निर्देश था कि वे या तो दक्षिणपंथियों की इच्छानुसार चलें अथवा कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ दें।
सुभाष ने गांधीजी से मिलकर समस्या को हल करने का प्रयास किया परन्तु गांधीजी की हठधर्मिता के कारण समस्या का कोई हल नहीं निकला। गांधीजी के अड़ियल रवैये से क्षुब्ध होकर सुभाष बाबू ने अप्रैल 1939 में ए.आई.सी.सी. के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। दक्षिणपंथियों ने तत्काल डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुनकर कांग्रेस का नेतृत्व हथिया लिया।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने के बाद सुभाष ने कांग्रेस के अन्दर फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की परन्तु दक्षिणपंथी तो उन्हें कांग्रेस से ही निष्कासित करने पर तुले हुए थे। अतः उन्होंने सुभाष के विरुद्ध अनुशासन की कार्यवाही कर बंगाल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से हटा दिया और यह भी घोषित कर दिया कि वे आगामी तीन वर्ष तक कांग्रेस में किसी भी पद पर नहीं रह सकते हैं।
सुभाषचन्द्र बोस अंग्रेज सरकार से संघर्ष करने में आस्था रखते थे जबकि कांग्रेस संघर्ष के नाम पर समझौतों की राजनीति कर रही थी। सुभाष बाबू किसी भी कीमत पर ब्रिटिश सरकार से समझौता करके साम्राज्यवाद का समर्थन नहीं करना चाहते थे।
उनका स्पष्ट मत था कि द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में ब्रिटेन का संकट भारत का संकटमोचन है तथा ब्रिटेन की पराजय से भारत का स्वातंत्र्य सूर्य उगेगा। जिसे देखने के लिये भारतीयों की दीर्घकालिक लालसा है। अतः फॉरवर्ड ब्लॉक ने कांग्रेस से सम्बन्ध तोड़ लिया। यह एक ऐसा राजनीतिक संगठन था जो किसी भी तरह स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहता था, उसके लिये कांग्रेस की तरह अहिंसा न धर्म थी और न नीति।
फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यक्रम
फॉरवर्ड ब्लॉक साम्राज्यवादी शक्ति का विरोध शक्ति से करना चाहता था। मार्च 1940 में फॉरवर्ड ब्लॉक ने कांग्रेस द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य से समझौता करने के विरोध में रामगढ़ में एक सभा का आयोजन किया। 6 जून 1940 को फॉरवर्ड ब्लॉक ने भारत के विभिन्न नगरों में राष्ट्रीय सप्ताह का आयोजन किया।
इसमें युद्ध विरोधी प्रदर्शन किये गये तथा भारत में अंतरिम राष्ट्रीय सरकार स्थापित करने की मांग की गई। सुभाष बाबू ने द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत द्वारा ब्रिटेन के साथ सहयोग करने की बात का जोरदार विरोध किया।
उन्होंने मांग की कि भारत को युद्ध में सम्मिलित करने की ब्रिटिश शासकों की घोषणा को जबरदस्त चुनौती दी जाये, युद्ध में भारत के साधनों के उपयोग का विरोध किया जाये और केन्द्रीय सरकार के युद्ध प्रयासों में बाधा डाली जाये। फॉरवर्ड ब्लॉक का कार्यक्रम सेना में भारतीय रंगरूटों की भर्ती को रोकना, ब्रिटिश माल का बायकाट करना, सरकार को कर न देना तथा देशव्यापाी हड़तालों के माध्यम से सरकार को ठप्प करना था।
वीर सावरकर से भेंट
22 जून 1940 को सुभाष बाबू ने वीर सावरकर से भेंट की। वीर सावरकर ने सुभाष बाबू को सलाह दी कि जब अँग्रेज भयंकर युद्ध में फंसे हों, उस समय आप जैसे योग्य लोगों को स्थानीय एवं तुच्छ मसलों पर आंदोलन चलाकर जेल में सड़ने से कोई लाभ नहीं होगा। रास बिहारी बोस की तरह अँग्रेजों को वंचिका देकर देश से बाहर जाइये।
जर्मनी और इटली के हाथ लगे युद्धबंदियों को नेतृत्व प्रदान कीजिये। भारत की स्वाधीनता की घोषणा कीजिये। जापान के युद्ध में सम्मिलित होने की स्थिति में बंगाल की खाड़ी या बर्मा की ओर से आजादी का प्रयास कीजिये। सुभाषचंद्र बोस को ये सुझाव अनुकूल जान पड़े और उन्होंने अपने लिये भावी योजना तैयार कर ली।
सुभाषचन्द्र बोस की गिरफ्तारी
जुलाई 1940 में सुभाष बाबू ने कलकत्ता के हालवेल मकबरे को हटाने के लिये आन्दोलन आरम्भ किया। इस पर 2 जुलाई को उन्हें भारत सुरक्षा कानून के अंतर्गत बंदी बनाकर उन पर मुकदमा चलाया गया। उन्हें कलकत्ता की प्रेसीडेन्सी जेल में रखा गया।
अपने न्यायिक परीक्षण के दौरान 26 नवम्बर 1940 को सुभाष बाबू ने बंगाल के गवर्नर को पत्र लिखकर भूख हड़ताल करने की सूचना दी तथा लिखा कि- ‘अपने राष्ट्र को जीवित रखने के लिये व्यक्ति को मृत्यु का वरण अवश्य करना चाहिये। आज मुझे अवश्य मरना है ताकि भारत अपनी स्वाधीनता और गौरव को प्राप्त कर सके।’
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...