संयुक्त प्रांत के प्रमुख क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद
जिस समय पंजाब, महाराष्ट्र एवं बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधयाँ चल रही थीं, उस समय उत्तर उत्तर भारत में क्रांतिकारी गतिविधियाँ अपने चरम पर थीं। उत्तर भारत के दिल्ली, संयुक्त प्रदेश, आगरा एवं अवध, बिहार तथा उड़ीसा आदि प्रांतों के क्रांतिकारी भी अंग्रेज सरकार के लिए बड़ी चुनौती बने हुए थे।
उत्तर भारत में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
दिल्ली में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
दिल्ली षड़यन्त्र केस: 1912 ई. में भारत सरकार अपनी राजधानी, कलकत्ता से हटाकर दिल्ली ले आई। 23 दिसम्बर 1912 को जब वायसराय लॉर्ड हार्डिंग तथा उनकी पत्नी ने हाथी पर बैठकर नई राजधानी में प्रवेश किया तो चांदनी चौक में क्रांतिकारियों ने वायसराय के हाथी पर बम फेंक दिया।
वायसराय के पीछे बैठे अंगरक्षक की तत्काल मृत्यु हो गई। स्वयं वायसराय भी बम और हौदे के टुकड़ों से घायल हो गया तथा घबराहट में बेहोश हो गया। लेडी हार्डिंग ने तत्काल जुलूस स्थगित करवा दिया और वायसराय को चिकित्सा के लिये राजकीय आवास ले जाया गया।
पुलिस ने बम फेंकने के सन्देह में मास्टर अमीर चन्द, सुल्तान चन्द्र, दीनानाथ, अवध बिहारी, बाल मुकुन्द, बसन्त कुमार, हनुमन्त सहाय, चरनदास आदि 13 क्रांतिकारियों को पकड़ लिया। इन लोगों पर दो वर्ष तक मुकदमा चला। यह मुकदमा दिल्ली षड़यन्त्र केस के नाम से प्रसिद्ध है।
दीनानाथ सरकारी गवाह बन गया। मई 1915 में अमीरचन्द, अवधबिहारी और बालमुकुन्द को दिल्ली में तथा बसन्त कुमार विश्वास को अम्बाला में फांसी दी गई। चरणदास को आजीवन काला पानी की सजा दी गई। शेष अभियुक्तों को लम्बा कारावास हुआ।
इस प्रकरण में पुलिस ने कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की। क्रांतिकारियों द्वारा भी इसके बारे में अधिक नहीं लिखा गया। फिर भी प्राप्त तथ्यों के आधार पर माना जाता है कि वायसराय पर बम फेंकने की योजना रासबिहारी बोस ने बनाई थी। ठाकुर जोरवरसिंह बारहठ तथा उनके भतीजे प्रतापसिंह बारहठ बम लेकर दिल्ली पहुंचे थे।
जोरावरसिंह ने बुर्का ओढ़कर, वायसराय पर बम फंेका और फिर वे चुपचाप स्त्रियों की भीड़ में से खिसक कर मध्यप्रदेश के जंगलों में चले गये। प्रतापसिंह भी फरार हो गये किंतु बाद में एक सहपाठी की धोखे-बाजी से आसारानाडा स्टेशन पर पुलिस के हाथों पकड़े गये। उन्हें जेल में रखा गया जहां पुलिस ने उन पर बर्बर अत्याचार किये जिनके कारण जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई।
जोरावरसिंह आजीवन गिरफ्तार नहीं हुए किंतु जिस दिन समाचार पत्रों में यह छपा कि न्यायालय ने जोरावरसिंह को वायसराय पर बम फैंकने के आरोप से बरी कर दिया है, उसके अगले दिन ही जोरावरसिंह का निधन हो गया।
सरकार ने रासबिहारी बोस की गिरफ्तारी पर 7500 रुपये का पुरस्कार घोषित किया। रासबिहारी बोस भारत से जापान चले गये। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने जापानी सरकार की सहायता से आजाद हिन्द फौज का गठन किया जिसे बाद में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का नेतृत्व प्राप्त हुआ।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस बम को फेंकने वाले बसन्त विश्वास और मन्मथ विश्वास थे। इन दोनों बंगाली नवयुवकों ने महिलाओं का भेष धारण किया था और छत पर सवारी देखने को बैठी स्त्रियों के बीच में जा बैठे थे। वहीं से उन्होंने निशाना साधकर वायसराय के हाथी पर बम फेंका था। भाग्यवश वायसराय बच गया और अंगरक्षक मारा गया।
संयुक्त प्रदेश, आगरा एवं अवध में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
महाराष्ट्र, बंगाल और पंजाब की क्रांतिकारी गतिविधियों से संयुक्त प्रदेश , आगरा एवं अवध में भी उबाल आया। इस क्षेत्र के क्रांतिकारियों ने बनारस को अपना केन्द्र बनाया। वे बंगाल और महाराष्ट्र के क्रांतिकारियों से सम्पर्क में थे। 1907 ई. में बनारस में भी शिवाजी उत्सव मनाया गया और एक जुलूस निकाला गया जिसमें पं. सुन्दरलाल ने राजद्रोह से भरा जोशीला भाषण दिया।
संयुक्त प्रदेश में क्रांतिकारी आन्दोलन की भूमि तैयार करने में पं. सुन्दरलाल का बड़ा हाथ था। उन्होंने लाला लाजपतराय, तिलक और अरविन्द घोष के साथ भी काम किया। 1909 ई. में उन्होंने इलाहाबाद से कर्मयोगी नामक समाचार पत्र निकाला जिसमें महर्षि अरविन्द योगी और बाल गंगाधर तिलक के लेखों एवं भाषणों के अनुवाद प्रकाशित होते थे।
सुंदरलाल की प्रेरणा से इलाहाबाद से स्वराज्य नामक पत्र भी निकला गया जिसमें उग्र राष्ट्रवादी विचार प्रकाशित होते थे। बाद में सरकार ने इन दोनों समाचार पत्रों को बन्द करवा दिया। दिल्ली षड़यन्त्र केस में भी सुन्दरलाल का नाम जोड़ा गया परन्तु पुलिस उनके विरुद्ध साक्ष्य नहीं जुटा सकी।
1910 ई. में बंगाल के कुछ क्रांतिकारियों के सहयोग से बनारस में युवक समिति स्थापित हुई जो बंगाल की अनुशीलन समिति की शाखा थी। प्रकट रूप से इस समिति में युवकों को शारीरिक, धार्मिक और साहित्यिक प्रशिक्षण दिया जाता था परन्तु गुप्त रूप से यह समिति क्रांतिकारी कार्य करती थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस क्षेत्र के क्रांतिकारी भी व्यापक सशस्त्र क्रांति की योजना बनाने लगे किंतु वह कार्यरूप में परिणित नहीं हो सकी।
बिहार और उड़ीसा में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
सरकार की गुप्त रिपोर्टों से ज्ञात होता है कि बिहार के पटना, देवघर आदि शहरों में बंगाल से भागकर आये क्रांतिकारियों ने स्थानीय नवयुवकों को साथ लेकर, गुप्त समितियां गठित कीं और उनके माध्यम से बिहार की जनता में क्रांतिकारी विचारों को फैलाने का प्रयास किया। यहाँ के क्रांतिकारियों ने धन एकत्र करने के लिए कुछ डकैतियां भी कीं।
बिहारी नेशनल कॉलेज के अँग्रेजी के अध्यापक कामाख्या नाथ मित्र ने अपने भाषणों से अनेक बिहारी छात्रों में क्रांतिकारी भावना जागृत की। इस पर सरकार ने उन्हें कॉलेज छोड़ने को विवश कर दिया। कामाख्या बाबू के एक शिष्य सुधीर कुमार सिंह ने उनके काम को आगे बढ़ाया।
उन्होंने बांकीपुर के छात्रों के सहयोग से एक गुप्त समिति गठित की। इस समिति का बंगाल की अनुशीलन समिति के साथ सम्पर्क स्थापित हो गया। बंगाल से कई क्रांतिकारी विद्यार्थी, बिहार में आने-जाने लगे और बिहारी छात्रों को क्रांतिकारी भावना के साथ जोड़ने का काम करने लगे। बिहार में कोई महत्त्वपूर्ण क्रांतिकारी घटना नहीं घटी।
राष्ट्रीय स्तर पर क्रांति की योजना
रासबिहारी बोस, करतारसिंह, पिंगले और शचीन्द्र सान्याल ने ढाका से लाहौर तक एक साथ विद्रोह कराने की एक योजना तैयार की। 21 फरवरी 1915 को क्रांति का दिन निश्चित किया गया किन्तु कृपालसिंह नामक सैनिक ने यह योजना समय से पूर्व ही, ब्रिटिश अधिकारियों के सामने उजागर कर दी। इससे योजना बुरी तरह विफल हो गई।
महाराष्ट्र के अमर क्रांतिकारी वीर विनायक दामोदर सावरकर
महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधियाँ ईस्वी 1857 की सशस्त्र क्रांति के विफल हो जाने के बाद से आरम्भ होने लगी थीं। महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधियाों को चरम पर पहुंचाने का श्रेय विनायक दामोदर सावरकर को जाता है।
महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
महाराष्ट्र अँग्रेजों के आगमन के समय से ही राजनीतिक हलचलों का केन्द्र बना हुआ था। महाराष्ट्र की जनता में राजनीतिक जागृति भी दूसरे क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक थी। माना जाता है कि 1857 की क्रांति असफल होने के बाद भारत में सशस्त्र क्रांति का मार्ग सर्वप्रथम महाराष्ट्र में ही अंगीकार किया गया। महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधियाँ भारत को स्वतंत्रता मिलने तक चलती रहीं।
व्यायाम-मण्डल
1896-97 ई. में पूना में चापेकर बन्धुओं- दामोदर हरि चापेकर और बालकृष्ण हरि चापेकर ने व्यायाम-मण्डल की स्थापना की। वे कांग्रेस की नीतियों के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि कांग्रेस के अधिवेशनों में की जा रही भाषणबाजी से देश को कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।
देश की भलाई के लिए करोड़ों लोगों को युद्ध क्षेत्र में प्राणों की बाजी लगानी होगी। उन्होंने ऐसे नौजवानों को शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जो सशस्त्र क्रांति के मार्ग पर चलने को तैयार हों। 22 जून 1897 की रात को उन्होंने पूना के प्लेग कमिश्नर रैण्ड और उसके सहायक आयर्स्ट की हत्या कर दी।
दामोदर चापेकर पकड़ा गया। 18 अप्रैल 1898 को उसे फांसी दे दी गई। 8 फरवरी 1899 को व्यायाम मण्डल के सदस्यों ने उन द्रविड़ बन्धुओं को मौत के घाट उतार दिया जिन्होंने पुरस्कार के लालच में चापेकर बन्धुओं को पकड़वाया था। इस पर सरकार ने व्यायाम-मण्डल के अनेक सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया।
बालकृष्ण चापेकर तथा वासुदेव चापेकर को भी फांसी दे दी गई। पूना के नाटू बन्धुओं को देश-निकाला दिया गया। बाल गंगाधर तिलक को केसरी में भड़काऊ लेख लिखने के आरोप में 18 माह की जेल हुई।
अभिनव भारत
महाराष्ट्र के सर्वाधिक चर्चित क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर हुए। उनका जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र में नासिक के निकट एक गांव में चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ। 1901 ई. में उन्होंने पूना के फर्ग्यूसन कॉलेज में प्रवेश लिया और क्रांतिकारी विचारों का प्रसार करने के लिए अभिनव भारत नामक गुप्त संस्था स्थापित की।
उन्होंने दुर्गा की प्रतिमा के समक्ष, देश को अँग्रेजों से मुक्त कराने का संकल्प लिया। यह संस्था सारे पश्चिम तथा मध्य भारत में सक्रिय रही। सावरकर, तिलक के शिष्य थे। बम्बई विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद तिलक की अनुशंसा पर उन्हें सरदारसिंहजी राणा द्वारा संचालित छत्रपति शिवाजी छात्रवृत्ति मिली।
1906 ई. में वे बैरिस्ट्री पढ़ने लन्दन चले गये। लन्दन प्रवास में भी सावरकर ने क्रांतिकारी विचारों का प्रचार किया तथा भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम नामक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने यह सिद्ध किया कि 1857 की क्रांति, सैनिक विद्रोह न होकर भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। ब्रिटिश सरकार ने इस पुस्तक पर पाबन्दी लगा दी।
विनायक दामोदर सावरकर के लन्दन चले जाने के बाद भी अभिनव भारत संस्था काम करती रही। पूरे महाराष्ट्र में स्थान-स्थान पर उसकी शाखाएं स्थापित हो गईं। इस संस्था ने सार्वजनिक सभाओं, मुद्रित पुस्तिकाओं, गणपति पूजन और शिवाजी उत्सव, आदि का आयोजन करके लोगों को सशस्त्र क्रांति के लिये प्रेरित किया।
यह संस्था अपने सदस्यों को सैनिक प्रशिक्षण देकर ब्रिटिश शासकों से मोर्चा लेने को तैयार करती थी। सदस्यों को ड्रिल करना, लाठी चलाना, तलवार चलाना, घुड़सवारी करना, तैरना, पहाड़ों पर चढ़ना और लम्बी दूर तक दौड़ना आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था। पूना और बम्बई के बहुत से कॉलेजों और स्कूलों में भी अभिनव भारत की शाखाएं थीं।
उसके अनेक सदस्य महत्त्वपूर्ण सरकारी पदों पर भी थे। वे अत्यधिक गोपनीय रूप से अभिनव भारत से सम्पर्क में थे। अभिनव भारत का वार्षिक सम्मेलन भी गुप्त रूप से आयोजित होता था। इस संस्था का सम्बन्ध बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ भी था।
अभिनव भारत ने देश और विदेश से तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र एकत्र करने का प्रयास किया। सावरकर ने लन्दन से, विश्वस्त साथियों के माध्यम से कई पिस्तौलें भेजीं। पांडुरंग महादेव को रूसी क्रांतिकारियों से बम बनाने की कला सीखने के लिए पेरिस भेजा गया। अभिनव भारत के अतिरिक्त और भी बहुत सी गुप्त संस्थाएं बम्बई, पूना, नासिक, कोल्हापुर, सतारा, नागपुर आदि स्थानों में सक्रिय थीं। उनमें से कुछ संस्थाओं का अभिनव भारत से सम्पर्क था।
1908 ई. में तिलक की गिरफ्तारी और 6 साल के माण्डले निर्वासन से क्रांतिकारियों का आक्रोश अत्यधिक बढ़ गया। दामोदर जोशी ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर कोल्हापुर में बहुत बड़ी संख्या में बम बनाने के लिए एक कारखाना खोला। दुर्भाग्यवश एक बम के फट जाने से भेद खुल गया। बहुत से लोगों को गिरफ्तार करके उन्हें लम्बी सजाएं दी गईं। इसे कोल्हापुर बम केस कहा जाता है।
विनायक दामोदर सावरकर के बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर को क्रांतिकारी गीत लिखने के अपराध में 1909 ई. में आजीवन निर्वासन का दण्ड दिया गया। 1909-10 ई. में नासिक षड़यन्त्र केस चला। नासिक के जिस जिला मजिस्ट्रेट ने गणेश सावरकर के मुकदमे का फैसला सुनाया, उसे 21 दिसम्बर 1909 को गोली मार दी गई।
इस प्रकार, क्रांतिकारियों ने गणेश सावरकर के निर्वासन का बदला चुकाया। सावरकर को फंसाने में अँग्रेज अधिकारी जैक्सन ने विशेष भूमिका निभाई थी। इसलिये क्रांतिकारियों ने 21 दिसम्बर 1909 को उसे भी मार डाला। इस मुकदमे में 38 लोग बंदी बनाये गये। इनमें से 37 लोग महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण थे।
38 आरोपियों में से 27 को कठोर कारावास तथा 3 को कालेपानी की सजा हुई। अनन्त लक्ष्मण कन्हारे, कृष्णजी गोपाल कर्वे और विनायक नारायण देशपांडे को फांसी दी गई। भारत सरकार ने विनायक दामोदर सावरकर को समस्त उत्पात की जड़ मानकर उन्हें बंदी बनाने के आदेश जारी किये।
13 मार्च 19010 को सावरकर पेरिस से लंदन आये तथा विक्टोरिया स्टेशन पर उतरे। उसी समय लंदन की पुलिस ने उन्हें बंदी बना लिया तथा सैनिक जहाज में बैठाकर समुद्र के रास्ते, भारत के लिये रवाना कर दिया। जब यह जहाज फ्रांसीसी अधिकार वाले मार्सिली बंदरगाह के निकट पहुंचा तो सावरकर पुलिस को चकमा देकर पोटहोल से समुद्र में कूद गये तथा तैरकर फ्रांसीसी बंदरगाह पर पहुंच गये।
फ्रांसीसी तटरक्षकों ने समझा कि सावरकर जहाज पर से चोरी करके भाग रहे हैं, सावरकर को फ्रैंच भाषा नहीं आती थी और तटरक्षकों को अँग्रेजी भाषा नहीं आती थी इसलिये तटरक्षकों ने सावरकर की बात को समझे बिना ही, उन्हें अँग्रेज पुलिस के हवाले कर दिया।
सावरकर को नासिक लाया गया और जैक्सन हत्याकाण्ड के 37 आदमियों के साथ उन पर भी नासिक षड़यन्त्र केस चलाया गया। दिसम्बर 1910 में विनायक सावरकर को आजीवन निर्वासन का दण्ड दिया गया। उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली गई। उन्हें बैरिस्टर की मान्यता नहीं मिली और बी.ए. की डिग्री भी रद्द कर दी गई।
सावरकर को अण्डमान की जेल में भी भीषण यातनाएं दी गईं। 1921 ई. में उन्हें तथा उनके बड़े भाई को, अण्डमान से निकालकर रत्नागिरी जेल में रखा गया। भारत में उनकी रिहाई के लिए निरन्तर आन्दोलन चलता रहा। अन्ततः 27 वर्ष की जेल भगुतने के बाद 1937 ई. में उन्हें जेल से रिहा किया गया।
नासिक षड़यंत्र केस में अनेक क्रांतिकारियों को जेल में डाला गया। इससे महाराष्ट्र के क्रांतिकारियों के मनोबल में कमी आई। फिर भी, उन्होंने कई घटनाओं को कार्यरूप दिया। गणेश सावरकर को देश-निर्वासन का दण्ड दिलवाने में भारत सचिव के मुख्य परामर्शदाता सर कर्जन वाइली का बड़ा हाथ था।
1 जुलाई 1909 को मदनलाल धींगरा ने लन्दन में वाइली को गोली से उड़ा दिया। धींगरा को गिरफ्तार करके 16 अगस्त 1909 को फांसी दी गई। मुकदमे की कार्यवाही के समय धींगरा ने कहा- ‘मैं स्वीकार करता हूँ कि उस दिन मैंने एक अँग्रेज का खून बहाने का प्रयास किया था। देश-भक्त भारतीय नौजवानों को दी जाने वाली अमानुषिक फांसियों और निर्वासनों का थोड़ा-सा बदला लेने के लिए मैंने ऐसा किया था।’
क्रांतिकारियों को बड़ी संख्या में अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने तथा बम बनाने के लिए धन की आवश्यकता थी। कर्वे गुट ने छोटी-मोटी चोरियां करके धन एकत्रित करने का मार्ग अपनाया किंतु शीघ्र ही उन्होंने इस मार्ग को त्याग दिया क्योंकि अपने ही देशवासियों को लूटना उन्हें पसंद नहीं आया। इस प्रकार धन के अभाव में 1910 ई. तक महाराष्ट्र में क्रांतिकारियों का संगठन बिखरने लगा।
मि. एश की हत्या
वीर सावरकर के शिष्य तथा त्रावणकोर के जंगलात विभाग के कर्मचारी, वांची एयर ने टिनेवली के जिला अधिकारी मि. एश को गोली से उड़ा दिया जिसने टिनेवली में आतंक मचा रखा था। मजिस्ट्रेट की हत्या करने के बाद उन्होंने स्वयं को भी गोली मार ली। उनका साथी शंकर कृष्ण अय्यर पकड़ा गया। उसे चार साल की जेल हुई।
पेशावर में पुलिस ने एक जुलूस पर गोली चलाई जिससे लोगों में आक्रोश फैल गया। लोगों को नियंत्रित करने के लिये सेना बुलाई गई। इस सेना में पंजाबियों की प्रधानता थी तथा क्रांतिकारियों के गुप्त संगठन भी सेना के भीतर सक्रिय थे। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने 18वीं रॉयल गढ़वाली राइफल्स को बुलवाया परन्तु चन्द्रसिंह गढ़वाली की अपील पर गढ़वालियों ने पठानों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया और अपनी राइफलें भी उन्हें सौंप दी।
25 अप्रैल को जनता ने पेशावर पर कब्जा कर लिया जो 4 मई तक स्थापित रहा। बाद में अन्य सैनिकों की सहायता से पेशावर पर पुनः अधिकार किया गया। चनद्रसिंह गढ़वाली को आजीवन कालेपानी की और 16 अन्यों को 3 से लेकर 15 साल तक की कड़ी सजा दी गई। 1937 ई. में कांग्रेस सरकारों के दबाव से वे सब रिहा कर दिये गये।
उत्तर-पूर्वी सीमान्त क्षेत्र में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
उत्तर-पूर्वी सीमान्त क्षेत्र भी क्रांतिकारी गतिविधियों से अलग नहीं रहा। यहाँ के नागाओं ने ब्रिटिश शासन का अन्त कर नागा राज्य की स्थापना करने का प्रयास किया। उन्होंने यदुनाग के नेतृत्व में अँग्रेजों से लोहा लिया। अँग्रेजों ने यहाँ भी कठोर दमन का साहरा लिया। 1930 ई. में यदुनाग को गिरफ्तार करके फांसी दे दी गई।
उसके बाद संगठन का नेतृत्व उसकी सहायिका गाइडिलिउ ने संभाला। उसके नेतृत्व में 1931-32 ई. में विद्रोही नागाओं ने ब्रिटिश अधिकारियों को बहुत तंग किया। गाइडिलिउ को पकड़ने के लिए लोगों को तरह-तरह के पुरस्कारों का प्रलोभन दिया गया। जब इसमें सफलता नहीं मिली तो बड़े पैमाने पर सैनिक कार्रवाही की गई। अक्टूबर 1932 में उसे पकड़कर आजीवन कारावास की सजा दी गई। आजादी के बाद इस वीरांगना को रिहा किया गया।
सामान्यतः यह माना जाता है कि 1934 के आस-पास क्रांतिकारी आन्दोलन समाप्त हो गया परन्तु यह सत्य नहीं है। 1942 ई. के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान यह फिर सक्रिय हो उठा था।
जल सेना और वायु सेना में विद्रोह
जब आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों पर लाल किले में मुकदमे चल रहे थे और जनता उनकी रिहाई के लिए आन्दोलन चला रही थी, उस समय भारतीय सेना में भी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आवाज उठी। अँग्रेज अधिकारियों के दुर्व्यवहार से तंग आकर 20 जनवरी 1946 को कराची में वायुसेना के सैनिकों ने हड़ताल कर दी जो बम्बई, लाहौर और दिल्ली स्थित वायुसेना मुख्यालयों पर भी फैल गई।
नौ-सेना ने भी वायु सेना का अनुसरण किया। 19 फरवरी 1946 को भारतीय नौ-सैनिकों ने भी हड़ताल कर दी। 21 फरवरी 1946 को यह हड़ताल क्रांति के रूप में बदलने लगी तथा बम्बई के साथ-साथ कलकत्ता, कराची और मद्रास में भी फैल गई। अँग्रेज अधिकारियों ने इस क्रांति का दमन करने के लिए गोलियां चलाईं।
क्रांतिकारी सैनिकों ने भी गोली का जवाब गोली से दिया। इससे ब्रिटिश सरकार घबरा गई। बड़ी कठिनाई से सरदार पटेल ने सरकार और नौ-सैनिकों के बीच समझौता करवाया। इस विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार को अनुमान हो गया कि अब उनके लिये भारत पर शासन करना संभव नहीं रह गया है।
विदेशों में क्रांतिकारी आन्दोलन - श्यामजी कृष्ण वर्मा
विदेशों में क्रांतिकारी आन्दोलन की अलख जगाने वालों में श्यामजी कृष्ण वर्मा, सरदारसिंहजी रेवा भाई राना, श्रीमती भीखाजी रुस्तम कामा तथा वीर विनायक दामोदर सावरकर प्रमुख थे।
विदेशों में क्रांतिकारी आन्दोलन
देशभक्त क्रांतिकारियों ने अन्य देशों के क्रांतिकारियों से सम्पर्क स्थापित करके उनसे भारत की स्वाधीनता के लिये समर्थन, सहायता एवं हथियार प्राप्त किये। विदेशों में क्रांतिकारी आन्दोलन चलाना सरल कार्य नहीं था किंतु फिर भी कुछ भारतीयों ने अपने मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए इस संघर्ष का बीड़ा उठाया। विदेशों में काम करने वाले प्रमुख क्रांतिकारी इस प्रकार से थे-
(1.) श्यामजी कृष्ण वर्मा
श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म काठियावाड़ के मांडवी नामक गांव में एक निर्धन परिवार में 1857 ई. में हुआ था। 1879 ई. में वे कानून की शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड गये। 1884 ई. में उन्होंने बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण की और वे भारत लौट आये। कुछ वर्षों बाद वे राजस्थान की उदयपुर रियासत में उच्च पद पर नौकरी करने करने लगे।
1893 से जनवरी 1895 ई. तक वे उदयपुर रियासत की स्टेट कौंसिल के सदस्य रहे। ब्रिटिश रेजीडेंट के दबाव के कारण उन्हें यह नौकरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद वे जूनागढ़़ रियासत की सेवा में चले गये किन्तु वहाँ से भी उन्हें हटना पड़ा। 1897 ई. में श्यामजी वापस इंग्लैंड चले गये क्योंकि पूना के प्लेग कमिश्नर रैण्ड तथा उसके सहायक आयर्स्ट की हत्या में सरकार को श्यामजी कृष्ण वर्मा का हाथ होने का भी सन्देह था।
इंग्लैण्ड में उन्होंने व्यापार के माध्यम से बहुत धन कमाया और सारा धन इंग्लैंण्ड में भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रचार में लगा दिया। जनवरी 1905 में लन्दन में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने इण्डियन होमरूल सोसाइटी की स्थापना की और इण्डियन सोशियोलॉजिस्ट शीर्षक से मुखपत्र निकालना आरम्भ किया।
इस पत्र में क्रांतिकारी विचारों से ओतप्रोत लेख प्रकाशित होते थे। 1905 ई. में उन्होंने लन्दन में इंडिया हाउस नामक हॉस्टल की स्थापना की, जो शीघ्र ही भारतीय क्रांतिकारियों का मुख्य केन्द्र बन गया। इंडिया हाउस में जमा होने वाले युवकों में विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल और मदनलाल धींगरा प्रमुख थे।
इण्डियन होमरूल सोसायटी द्वारा प्रतिवर्ष इंग्लैण्ड में 1857 की क्रांति की वर्षगांठ बड़ी धूमधाम से मनाई जाती थी जिसमें जोशीले भाषण होते थे। ऐसी सभाओं में इंग्लैंड में पढ़ने जाने वाले भारतीय नवयुवकों की टोलियां सम्मिलित होती थीं। उनकी इन गतिविधियों को देखकर ब्रिटिश सरकार श्यामजी कृष्ण वर्मा को तंग करने लगी।
इस पर श्यामजी ने इंग्लैण्ड छोड़ दिया और 1907 ई. में पेरिस चले गये। 1914 ई. में वे फ्रांस से स्विट्जरलैंड चले गये। 30 मार्च 1930 को स्विट्जरलैंड में उनका देहान्त हुआ। इस प्रकार, श्यामजी कृष्ण वर्मा पहले व्यक्ति थे जिन्होंने विदेशों में क्रांतिकारी गतिविधियां आरम्भ कीं।
(2.) विनायक दामोदर सावरकर
श्यामजी कृष्ण वर्मा के लन्दन से पेरिस चले जाने के बाद विनायक दामोदर सावरकर ने लन्दन के इंडिया हाउस का काम संभाला। उनके नेतृतव में पहले की ही भांति सन् 1857 की क्रांति की वर्षगांठ धूमधाम से मनाई जाती रही और क्रांतिकारी परचे छपवा कर भारत के विभिन्न हिस्सों में भिजवाये जाते रहे।
आर्थर एफ. हार्सली के सहयोग से इण्डियन सोशियोलाजिस्ट भी छपता रहा। जुलाई 1909 में हार्सली को जेल में डाल दिया गया। तब गाई अल्फ्रेड ने पत्र के प्रकाशन का दायित्व संभाला। सितम्बर 1909 में अल्फ्रेड को भी एक साल के लिये जेल भेज दिया गया। इसके बाद इण्डियन सोशियोलाजिस्ट छपना बन्द हो गया।
ब्रिटिश सरकार द्वारा सावरकर के भाई गणेश सावरकर को अनुचित रूप से दण्डित किया गया था। इसका बदला लेने के लिये 1 जुलाई 1909 को मदनलाल धींगरा ने सर वाइली की गोली मार दी। अँग्रेज अधिकारियों का मानना था कि वाइली की हत्या की योजना विनायक दामोदर सावरकर ने बनाई थी परन्तु आरोप सिद्ध करने के लिए साक्ष्य नहीं मिल सके।
इसके बाद सावरकर पर अपने रसोइये चतुर्भुज अमीन के हाथ फरवरी 1909 में 20 ब्राउनिंग पिस्तौलें और कारतूस भारत भेजने का आरोप लगाया गया। मार्च 1910 में सावरकर को बंदी बनाकर भारत भेज दिया गया जहाँ उन्हें 37 अन्य व्यक्तियों के साथ नासिक षड़यंत्र केस का अभियुक्त बनाया गया।
22 मार्च 1911 को सावरकर को 50 वर्ष की कैद की सजा देकर अण्डमान भेज दिया गया, जहाँ उन्हें कोल्हू में बैल की जगह जोता गया और अमानवीय यातनाएं दी गईं। 1937 ई. में जब बम्बई में नया मंत्रिमण्डल बना तब उन्हें 10 मई 1937 को जेल से मुक्त किया गया। दिसम्बर 1937 में उन्हें हिन्दू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया।
(3.) सरदारसिंहजी रेवा भाई राना
जब मार्च 1910 में विनायक दामोदर सावरकर को लन्दन में बंदी बनाया गया तब भारतीय क्रांतिकारियों ने लंदन के स्थान पर पेरिस को अपने कार्यों का केन्द्र बनाया। पेरिस में श्यामजी कृष्ण वर्मा को अपने सहयोगी मिल गये जिनमें सरदारसिंहजी रेवा भाई राना और श्रीमती भीखाजी रूस्तम कामा प्रमुख थे।
राना, बम्बई के एल्फिंस्टन कॉलेज से 1898 ई. में स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद कानून की पढ़ाई के लिये लन्दन गये। पढ़ाई के साथ-साथ वे व्यापार भी करने लगे और पेरिस में जाकर बस गये। उन्हें भारतीय क्रांतिकारियों से सहानुभूति थी, वे क्रांतिकारियों को आर्थिक सहायता देते रहते थे।
ब्रिटिश सरकार को इसकी जानकारी मिलते ही उसने फ्रांसीसी सरकार पर राना को गिरफ्तार करने के लिए दबाव डाला। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांसीसी सरकार ने राना को बन्दी बनाकर मार्टिनिक द्वीप भिजवा दिया।
(4.) श्रीमती भीखाजी रुस्तम कामा
श्रीमती कामा का जन्म 1875 ई. के लगभग एक भारतीय पारसी परिवार में हुआ। उनके पति सफल वकील थे। 1902 ई. में वे यूरोप गईं। उन्होंने इंग्लैण्ड के क्रांतिकारियों को यथा संभव आर्थिक सहायता प्रदान की। इसीलिए उन्हें भारतीय क्रांति की माता भी कहा जाता है।
राना और कामा ने अगस्त 1907 में जर्मनी के स्टुटगार्ट में आयोजित इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस में भारत का प्रतिनिधित्व किया। श्रीमती कामा ने सम्मेलन के मंच से भारत में ब्रिटिश शासन के अत्याचारों एवं निरंकुशता की भर्त्सना करते हुए भारत की स्वतंत्रता का जोरदार समर्थन किया।
1909 ई. के मध्य में श्रीमती कामा पेरिस वापस आ गईं और श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ मिलकर काम करने लगीं। उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य के प्रकाशन एवं वितरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सितम्बर 1909 में कामा ने जेनेवा से वंदेमातरम् नामक मासिक पत्र निकाला जो शीघ्र ही प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों का मुखपत्र बन गया।
1909-10 ई. की अवधि में लाला हरदयाल ने भी इस पत्र का सम्पादन किया। श्रीमती कामा ने जर्मनी में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में प्रभम भारतीय तिरंगा फहराया।
(4.) गदर पार्टी और इण्डिया लीग
जिस प्रकार श्यामजी कृष्ण वर्मा ने इंग्लैण्ड, फ्रांस व जर्मनी में कार्य किया था, उसी प्रकार भाई परमानन्द ने अमेरिका और इंग्लैण्ड में कार्य किया। 1911 के आरम्भ में लाला हरदयाल अमरीका पहुँचे। 1913 ई. में उन्होंने वहाँ कार्यरत भारतीय क्रांतिकारियों के साथ मिलकर गदर पार्टी की स्थापना की।
कनाडा की सरकार इस समय पंजाबी अप्रवासियों के विरुद्ध रंगभेद की नीति अपना रही थी। पंजाबियों को तिरस्कार का सामना करना पड़ता था। इसलिए लाला हरदयाल ने बाबा सोहनसिंह भखना की अध्यक्षता में पोर्टलैंड में हिन्दुस्तान एसोसिएशन ऑफ दि पैसिफिक फोस्ट नामक संस्था स्थापित की।
इसका उद्देश्य विदेशों में भारतीयों के अधिकारों की रक्षा करना और भारत की आजादी के लिए भारतीयों में चेतना पैदा करना था। इस संस्था का नाम भी गदर पार्टी पड़ गया। इस गदर पार्टी के सभापति बाबा सोहनसिंह, उप सभापति बाबा केसरसिंह, मंत्री लाला हरदयाल और कोषाध्यक्ष पं. काशीराम चुने गये।
इस पार्टी ने 1 नवम्बर 1913 से एक साप्ताहिक अँग्रेजी पत्रिका गदर का प्रकाशन आरम्भ किया। इस पत्रिका का अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित होता था। यह पत्रिका, भारत तथा भारत से बाहर उन देशों में भेजी जाती थी जहाँ बड़ी संख्या में भारतीय रहते थे। इस पत्रिका में क्रांति और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सम्बन्ध में प्रचुर सामग्री रहती थी। विदेशों में बसे भारतीय, इस सामग्री को बड़ी रुचि के साथ पढ़ते थे। गदर पार्टी ने गुरिल्ला युद्ध के द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने की योजना बनाई।
अमेरिका में पहले गदर पार्टी ने और बाद में इण्डिया लीग ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। जे. जे. सिंह कई वर्षों तक अमेरिका स्थित इण्डिया लीग के प्रधान रहे। जब अमेरिका में कोमागाटामारू की घटना का समाचार पहुँचा तब गदर पार्टी ने कनाडा और भारत सरकार के विरुद्ध क्रांति कराने के उद्देश्य से हजारों स्वयंसेवकों को भर्ती कर लिया।
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान लाला हरदयाल जर्मनी गये। उन्होंने जर्मनी के बादशाह विलियम कैसर से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया परन्तु उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। इन्हीं दिनों लाला हरदयाल की प्रेरणा से राजा महेन्द्रप्रताप ने काबुल में एक अस्थाई सरकार का गठन किया।
राजा महेन्द्रप्रताप के मंत्रिमण्डल में बरकतुल्ला को प्रधानमंत्री, मौलाना अब्दुल्ला, मौलाना बशीर, सी. पिल्ले, शमशेरसिंह, डॉ. मथुरासिंह, खुदाबख्श और मुहम्मद अली को मंत्री बनाया गया। अस्थायी सरकार ने निश्चय किया कि जर्मनी और तुर्की की सहायता से ईरान, इराक, अरब और अफगानिस्तान के मुसलमान विद्रोह कर दें और उधर पंजाब में सिक्ख उनका साथ दंे।
लाला हरदयाल ने इस कार्य के लिए सैकड़ों क्रांतिकारी और बहुत सा गोला बारूद भारत भिजवाया। लाला हरदयाल ने जर्मनी में भारत स्वतंत्रता समिति स्थापित की जो क्रांतिकारियों को अस्त्र-शस्त्र तथा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराती थी।
क्रांतिकारी आंदोलन का मूल्यांकन करते समय हमें क्रांतिकारी आंदोलन की सफलाताओं एवं असफलताओं पर विचार करने के साथ-साथ राष्ट्र को दिए गए योगदान पर भी चर्चा करनी होगी।
क्रांतिकारी आन्दोलन की असफलता के कारण
क्रांतिकारी आंदोलन भारत को अँग्रेजी शासन से मुक्त करवाने के उद्देश्य से आरम्भ किया गया था परन्तु यह आंदोलन अँग्रेजों से सत्ता नहीं छीन सका। यद्यपि यह कहना उचित नहीं है कि भारत में क्रांतिकारी आंदोलन सफल नहीं रहा तथापि इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि भारत का क्रांतिकारी आन्दोलन, अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त क्यों नहीं कर सका!
(1.) केन्द्रीय संगठन का अभाव
क्रांतिकारियों की असफलता का मुख्य कारण उनके केन्द्रीय संगठन का अभाव था। इस कारण विभिन्न प्रान्तों के क्रांतिकारियों की गतिविधियों में सहयोग और समन्वय स्थापति नहीं हो सका। विभिन्न प्रान्तों के क्रांतिकारी अपने-अपने क्षेत्र में भिन्न-भिन्न समय में अलग-अलग क्रांतिकारी गतिविधियां चलाते थे जिनके माध्यम से शक्ति-सम्पन्न ब्रिटिश सत्ता का अन्त किया जाना सम्भव नहीं था।
(2.) समाज के सहयोग का अभाव
भारतीय समाज के अत्यंन्त सीमित वर्ग ने क्रांतिकारियों को सहयोग एवं समर्थन दिया। उन्हें किसानों, श्रमिकों, व्यापारियों, मध्यम वर्ग तथा कांग्रेस का समर्थन नहीं मिला। समाज का उच्च वर्ग हिंसा के मार्ग से भय खाता था और खुले रूप से क्रांतिकारियों का विरोध करता था।
मध्यम वर्ग अपने बच्चों को हत्या, डकैती, लूट, तोड़-फोड़ के मार्ग पर नहीं जाने देना चाहता था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आशुतोष मुकर्जी जैसे नेताओं ने तो सरकार से क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए कठोर कदम उठाने का आग्रह किया।
(3.) साधनों का अभाव
क्रांतिकारियों के पास साधनों का अभाव हर समय बना रहा। वे बड़ी कठिनाई से अस्त्र-शस्त्र जुटा पाते थे। उन्हें गुप्त रूप से कार्य करना पड़ता था, जबकि सरकार का खुफिया विभाग इतना कुशल और जागरूक था कि क्रांतिकारियों की अधिकांश गतिविधियों का सरकार को पता लगा जाता था और सरकार क्रांतिकारियों की योजनाओं को विफल बना देती थी।
(4.) कांग्रेसी नेताओं द्वारा कड़ा विरोध
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी स्वतंत्रता का आंदोलन चला रही थी। इसके नेताओं में लाला लाजपत राय, विपिनचंद्र पाल तथा सुभाष चंद्र बोस ही ऐसे गिने-चुने कांग्रेसी थे जो क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखते थे।
कांग्रेस के उदारवादी नेता तो अपने ही दल के उग्रवादी नेताओं को ही सहन करने को तैयार नहीं थे ऐसी स्थिति में वे क्रांतिकारियों को कैसे सहन कर सकते थे। बाद में जब मोहनदास गांधी कांग्रेस के नेता हो गये तब उन्होंने क्रांतिकारियों की गतिविधियों का कड़ा विरोध किया क्योंकि उनका अहिंसा का सिद्धान्त क्रांतिकारियों के किसी भी सिद्धांत से मेल नहीं खाता था।
(5.) सरकार द्वारा क्रांतिकारियों का कठोर दमन
भारतकी गोरी सरकार क्रांतिकारियों का कठोरता से दमन कर रही थी और उन्हें फांसी पर चढ़ा रही थी। इस कारण क्रांतिकारी आंदोलन को जनता का वैसा समर्थन नहीं मिला जैसा समर्थन कांग्रेस के अहिंसावादी आंदोलन को मिला जिसमें अधिकतम सजा पुलिस की लाठियां और कुछ दिनों की जेल थी।
सरकार ने 1907 ई. में सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया। 1908 ई. में विद्रोही सभा अधिनियम पारित किया तथा फौजदारी कानून को अधिक कठोर बनाकर उसका सख्ती से पालन करने की आज्ञा दी। 1908 ई. एवं 1910 ई. में प्रेस अधिनियम द्वारा समाचार पत्रों पर कई तरह के प्रतिबन्ध लगाये गये।
1911 ई. में सरकारी अधिकारियों को सार्वजनिक सभाओं पर नियंत्रण रखने के लिये अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करने का अधिकार दिया गया। क्रांतिकारियों को फांसी, आजीवन कारावास तथा निर्वासन से कम सजा नहीं दी जाती थी। ऐसी दमनकारी नीति के सामने क्रांतिकारी अधिक समय तक टिके नहीं रह सके।
(6.) साथियों द्वारा विश्वासघात
कुछ क्रांतिकारी पकड़े जाने पर, पुलिस की ज्यादतियों का सामना नहीं कर पाते थे और अपने संगठन के गुप्त भेद पुलिस को दे देते थे। इस कारण क्रांतिकारियों की बहुत सी योजनाएं विफल हो जाती थीं तथा बड़ी संख्या में क्रांतिकारी पकड़ लिये जाते थे। कई बार जनता में से भी कोई व्यक्ति पुरस्कार के लालच में पुलिस का मुखबिर बनकर क्रांतिकारियों को पकड़वा देता था।
राष्ट्रीय आन्दोलन में क्रांतिकारियों का योगदान
कांग्रेस समर्थक इतिहासकारों का मानना है कि राष्ट्रीय आन्दोलन में क्रांतिकारी आन्दोलन की कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि इन्हें कोई सफलता नहीं मिली परन्तु ऐसा कहना देशभक्त क्रांतिकारियों के प्रति घोर अन्याय करना है। सफलता ही किसी आंदोलन के योगदान की एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती।
कांग्रेस द्वारा समर्थित खिलाफत आंदोलन (नवम्बर 1919-24 ई.), कांग्रेस द्वारा संचालित असहयोग आंदोलन (अगस्त 1920-फरवरी 1922 ई.) और कांग्रेस द्वारा प्रेरित भारत छोड़ो आंदोलन (1942 ई.) आदि आंदोलनों के उद्देश्य पूरे नहीं हो सके थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत की आजादी में इन आंदोलनों को कोई योगदान नहीं था।
भारत में बंग-भंग (1905 ई.) से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन (1942 ई.) तक चले क्रांतिकारी आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियाँ इस प्रकार से हैं-
(1.) नौजवानों को लाठी खाने और जेल जाने की प्रेरणा
क्रांतिकारी भले ही देश को आजाद नहीं करवा पाये किंतु उन्होंने देश को तेजी से आजादी की तरफ बढ़ाया। उन्होंने अपने देश को स्वतंत्र करवाने के लिये लोगों को अपने प्राण न्यौछावर करने की प्रेरणा दी। क्रांतिकारियों द्वारा अपने प्राणों का त्याग करके जन-साधारण के के समक्ष आदर्श उत्पन्न किया ताकि वे राजनीतिक दलों द्वारा संचालित आंदोलनों में खुल कर भाग ले सकें और अपने शरीर पर पुलिस के डण्डों का वार सह सकें।
हजारों नौजवान अपनी नौकरियां छोड़कर जेल जाने की हिम्मत भी इसलिये कर सके क्योंकि उनके जैसे सैंकड़ों नौजवान, देश को आजाद करवाने के लिये फांसी के फंदों पर झूल रहे थे। वे मरने के बाद फिर से जन्म लेकर अँग्रेजों को देश से भगाने की शपथ लेते थे।
जब युवा क्रांतिकारियों के समूह आजादी के गीत गाते हुए फांसी के फंदों तक जाते थे तो उन युवाओं की रगों में भी खून उबलने लगता था जो क्रांति का मार्ग नहीं अपना सके थे। वस्तुतः कांग्रेस के आंदोलनों में जन साधारण का जुड़ाव क्रांतिकारियों के ही बलिदान का प्रतिफलन था।
(2.) बंग-भंग का निरस्तीकरण
क्रांतिकारियों द्वारा की गई हिंसात्मक कार्यवाहियों के बाद अनेक बार ब्रिटिश सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन करना पड़ा। बंग-भंग के विरुद्ध केवल बंगालियों ने नहीं, अपितु देश के अन्य प्रान्तों के लोगों ने भी तीव्र आन्दोलन किया। सरकार ने इस आन्दोलन को निर्ममतापूर्वक कुचला।
लाला लाजपतराय तथा बालगंगाधर तिलक को जेल में ठूँसा गया तथा प्रेस एक्ट द्वारा समाचार पत्रों का मुंह बन्द किया गया। सरकार की दमनात्मक कार्यवाहियों ने नवयुवकों को क्रांति के मार्ग पर धकेला। जब क्रांतिकारियों ने अनेक अँग्रेज अधिकारियों को मार डाला तो क्रांतिकारियों के भय से ही सरकार ने बंगाल का विभाजन रद्द किया।
(3.) राजधानी का परिवर्तन
बंगाल के क्रांतिकारियों ने पूरे देश के क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया। उन्हें हथियार और धन उपलब्ध करवाया तथा हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। रास बिहारी बोस ने महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब तथा दिल्ली ही नहीं अपितु जापान में जाकर क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया।
यही कारण था कि बंगाल के क्रांतिकारियों से भयभीत होकर ब्रिटिश सरकार 1911 ई. में अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले गई। यहाँ भी रास बिहारी बोस के साथियों ने गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग के जुलूस पर उस समय बम फैंका जब वे हाथी पर बैठकर ब्रिटिश राज की नई राजधानी में प्रवेश कर रहे थे।
(4.) पूर्ण स्वराज्य की मांग
कांग्रेस 1885 ई. में अपनी स्थापना से लेकर 1929 ई. तक औपनिवेशिक राज्य (डोमिनियन स्टेटस) का सपना पाले हुए थी जबकि क्रांतिकारियों ने 1905 में बंग-भंग के बाद ही पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित किया। गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन आरम्भ करते समय 1920 ई. में कहा था कि- ‘यदि देश मेरे पीछे चले तो मैं एक वर्ष के भीतर स्वराज्य ला दूँगा।’
क्रांतिकारियों ने गांधी के नये प्रयोग को देखने के लिए दो वर्ष तक अपनी गतिविधियों को स्थगित रखा किन्तु जब गांधी का असहयोग आन्दोलन असफल सिद्ध हुआ तब क्रांतिकारियों को विश्वास हो गया कि अहिंसात्मक तथा संवैधानिक आन्दोलनों से सरकार कुछ भी देने वाली नहीं है।
8 अप्रेल 1929 को बहरी सरकार को जनता की आवाज सुनाने के लिए सरदार भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय असेम्बली में बम का धमाका किया। ये दोनों क्रांतिकारी चाहते तो आसानी से भाग सकते थे किंतु वे वहीं खड़े हो गये ताकि पुलिस उन्हें बंदी बना ले। इस बम धमाके के बाद भारत ने आजादी की ओर तेजी से कदम बढ़ाये। जनवरी 1930 में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया।
(5.) भारतीय सेनाओं में विद्रोह
क्रांतिकारी सदस्य निरंतर प्रयास करते रहते थे कि भारतीय सैनिक, विदेशी शासकों के विरुद्ध हथियार उठायें। अंत में 1946 ई. में जल-सेना और नौ-सेना में सशस्त्र विद्रोह हुए। भारतीय सैनिकों ने कई अँग्रेज अधिकारियों को मार डाला। यही वह बिंदु था जब गोरी सरकार ने भारत को सदैव के लिये छोड़ने का निर्णय लिया।
इस सफलता का श्रेय केवल दो ही तत्त्वों को दिया जा सकता है- क्रांतिकारियों की प्रेरणा तथा विद्रोही सैनिकों की हिम्मत। इस सफलता का श्रेय अकेली कांग्रेस को किसी भी प्रकार नहीं दिया जा सकता।
(6.) गांधीजी को समुचित उत्तर
गांधीजी ने बम की पूजा शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने क्रांतिकारियों तथा उनके कृत्यों की घोर निन्दा की। इस पर क्रांतिकारियों ने बम का दर्शन नामक पर्चा जारी किया।
इस पर्चे में गांधी को उनकी बातों का समुचित उत्तर दिया गया-
‘कांग्रेस ने 1928 ई. में ब्रिटिश सरकार से कई बातें करने को कहा परन्तु सरकार ने उनकी तनिक भी परवाह नहीं की और राष्ट्र का अपमान भी किया। इसलिए सरकार की नीति का विरोध करने और राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने के लिए हमने वायसराय की ट्रेन के नीचे बम रखा। लॉर्ड इरविन द्वारा सम्पूर्ण देश का अपमान किये जाने पर भी गांधीजी 23 दिसम्बर 1929 को वायसराय से मुलाकात करने वाले थे।
इसलिए हमने उसी दिन वायसराय की ट्रेन के नीचे बम रखा ताकि गांधी की वायसराय से भेंट न हो। वायसराय के बच जाने एवं गांधी तथा वायसराय की भेंट हो जाने पर भी क्या लाभ हुआ? स्वशासन, औपनिवेशिक स्वराज्य, आत्म-निर्णय का अधिकार आदि मांगें गुलामी की निशानी हैं। क्रांतिकारियों ने तो 25 वर्ष पहले ही पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति को अपना लक्ष्य घोषित कर दिया था, जबकि कांग्रेस ने केवल इस वर्ष स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया
….. गांधीजी अहिंसात्मक आन्दोलन से ब्रिटिश शासकों के मन में परिवर्तन लाना चाहते हैं किन्तु इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ है। अतः प्रेम और अहिंसा से ब्रिटिश जाति को जीतने की आशा करना व्यर्थ है।’
(7.) कांग्रेस के नेताओं से अधिक प्रसिद्धि
इसमें कोई संदेह नहीं कि भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, श्यामजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर, मदनलाल धींगरा, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला आदि बहुत से क्रांतिकारियों को कांग्रेस के दिग्गज नेताओं से भी अधिक प्रसिद्धि एवं लोकप्रियता प्राप्त हुई। फांसी के फंदे पर झूलने वाले क्रांतिकारी, युवा दिलों की धड़कन बन गये। लोग अपने बच्चों को इन क्रांतिकारियों के किस्से, महानायकों के किस्सों की भांति सुनाने लगे।
कांग्रेस के अध्यक्ष एवं कांग्रेस का इतिहास लिखने वाले पट्टाभि सीतारमैया ने बेहिचक स्वीकार किया है- ‘कराची में कांग्रेस अधिवेशन के समय सरदार भगतसिंह का नाम भारत में उतना ही सर्वप्रिय हो चुका था जितना गांधीजी का। कराची अधिवेशन के कुछ दिनों पूर्व ही सरदार भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी दी गई थी। इसलिए कांग्रेस ने भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदानों की सराहना में एक प्रस्ताव पारित किया।’
(8.) कांग्रेस से भी अधिक उपलब्धियाँ
वस्तुतः क्रांतिकारियों की कुछ सफलताएं तो कांग्रेस की सफलताओं से भी बहुत आगे थीं। गांधीजी ने जनता में जागृति फैलाने का कार्य किया जबकि क्रांतिकारियों ने जनता में जागृति और क्रांति दोनों फैलाने का कार्य किया। क्रांतिकारी आन्दोलन ने कांग्रेस के आंदोलन को मजबूती प्रदान की तथा उसके लिये पूरक आंदोलन के रूप में कार्य किया।
ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों से बहुत घबराती थी इसलिये वह कांग्रेस को राजनीतिक अधिकार प्रदान करती थी। जब सरकार वैधानिक आन्दोलन को कुचलने के लिए भारतीयों पर जुल्म करती तो क्रांतिकारी इसका प्रत्युत्तर बम और बंदूकों से देते थे। इसलिए सरकार कांग्रेस की कुछ बातें मान लेती थी तथा क्रांतिकारियों को कुचलने की नीति जारी रखती थी।
क्रांतिकारियों का मार्ग अत्यंत कठिन था। कांग्रेस ने भारत की जनता से करोड़ों रुपयों का चंदा एकत्रित किया जबकि क्रांतिकारियों के पास आर्थिक संसाधनों का अभाव रहता था।
सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है- ‘हमारी जाति की मुरझाई हुई मनोवृत्ति पर शहीदों के खून की वह वर्षा काफी उत्तेजक सिद्ध हुई। जिस वन्देमातरम् के कहने पर लोग मारे जाते थे, जन आन्दोलन जब एक स्वप्न था, उस जमाने में इन लोगों ने जो हिम्मत की, उसे कोई अन्धा, मूर्ख, कायर भले ही छोटा बताये, किन्तु हमारी जाति के मन पर उसका जो असर पड़ा, वह बहुत महत्त्वपूर्ण था।’
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि क्रांतिकारी आन्दोलन के अभाव में, कांग्रेस द्वारा चलाये जा रहे राष्ट्रीय आन्दोलन की सफलता संदिग्ध थी। दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों का उदाहरण हमारे सामने है।
यदि गोरी सरकार, सत्याग्रहों, असहयोग तथा उपवासों से डर कर आजादी देती तो इन देशों को अपनी स्वतंत्रता के लिये उतना रक्त नहीं बहाना पड़ता जितना कि उन्होंने बहाया। इसलिए भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में क्रांतिकारी आन्दोलन का उतना ही महत्त्व है जितना कांग्रेस द्वारा चलाये गये संवैधानिक आन्दोलन का।
गांधीजी का प्रारम्भिक जीवन गुजरात के पोरबन्दर, राजकोट और बांकानेर राज्यों में बीता जहाँ गांधीजी के पिता करमचंद दीवान रहे। गांधी के जीवन पर उनकी मातापुतली बाई का काफी प्रभाव पड़ा।
बीसवीं सदी में भारत की राजनीति में गांधी का पदार्पण, बीसवीं शताब्दी की प्रमुख घटनाओं में से एक है। उन्होंने कांग्रेस के चरित्र एवं आंदोलन की दिशा को नया स्वरूप प्रदान किया तथा देश में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन को अपने विचारों के अनुसार नवीन दिशा दी।
भारत की राजनीति में गांधी के पदार्पण के समय दो महत्त्वपूर्ण घटनायें घटीं। इनमें से पहली घटना अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर थी जो अँग्रेजों द्वारा 11 नवम्बर 1918 को प्रथम विश्वयुद्ध में विजय प्राप्त करने के रूप में हुई। दूसरी घटना राष्ट्रीय स्तर पर थी जो 1 अगस्त 1920 को बालगंगाधर तिलक की मृत्यु के रूप में घटित हुई।
इन दोनों ही घटनाओं ने अँग्रेजों को नया आत्म-विश्वास प्रदान किया। अब वे नई संभावनाओं के साथ भारत पर शासन कर सकते थे।
गांधीजी का प्रारम्भिक जीवन
जन्म और शिक्षा
मोहनदास करमचन्द गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबन्दर कस्बे में एक वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता करमचन्द गांधी पोरबन्दर, राजकोट और बांकानेर रियासतों के दीवान रहे। इनकी माता पुतली बाई अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। गांधी के जीवन पर पुतली बाई का काफी प्रभाव पड़ा।
1876 ई. में मोहनदास, अपने माता-पिता के साथ राजकोट चले गये। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं हुई। 1881 ई. में उन्होंने हाई स्कूल में प्रवेश किया। 1883 ई. में कस्तूर बाई से उनका विवाह हुआ। 1887 ई. में गांधीजी ने मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। 1888 ई. में वे बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैण्ड गये।
1891 ई. में वे बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। भारत लौटकर गांधी ने राजकोट तथा बम्बई में वकालत आरम्भ की किन्तु उन्हें इस कार्य में सफलता नहीं मिली। कुछ समय के लिये उन्होंने पोरबन्दर रियासत का न्यायिक कार्य भी किया परन्तु वहाँ उनका मन नहीं लगा। 1893 ई. में उन्हें दादा अब्दुल्ला एण्ड कम्पनी नामक मुस्लिम व्यापारिक संस्था के दक्षिण अफ्रीका के कानूनी कार्यों की देखरेख का काम मिला और वे दक्षिण अफ्रीका के डरबन नगर चले गये।
दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष
मोहनदास गांधी, दक्षिण अफ्रीका के नाटाल सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत होने वाले प्रथम भारतीय थे। उन दिनों दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार भारतीयों तथा अफ्रीकियों के प्रति रंगभेद की नीति अपनाती थी जिससे उन्हें कई प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते थे। एक बार गांधी को रेल से प्रिटोरिया की यात्रा करने के दौरान, रंगभेद का व्यक्तिगत अनुभव हुआ।
उन्होंने दक्षिणी अफ्रीका सरकार की रंगभेद एवं दमन की नीति का विरोध किया। उन्होंने अफ्रीका के प्रवासी भारतीयों को संगठित करके सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ दिया। मई 1894 में गांधी जी ने नाटाल इण्डियन कांग्रेस की स्थापना की।
1896 ई. में गांधीजी कुछ समय के लिये भारत आये तथा उसी वर्ष वे अपने परिवार के साथ पुनः दक्षिण अफ्रीका चले गये। डरबन में उग्रवादी दक्षिण अफ्रीकी श्वेतों ने गांधीजी के साथ अत्यंत दुर्व्यवहार किया। इस पर गांधी ने लगातार आठ वर्षों तक गोरी सरकार के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। उन्होंने अनिवार्य पंजीकरण, हस्त-मुद्रण, अन्तःप्रन्तीय प्रवास पर प्रतिबन्ध, बन्धक मजदूरों पर लगाये गये कर तथा ईसाई विवाहों के अतिरिक्त अन्य समस्त विवाहों को अमान्य ठहराने वाले कानूनों का विरोध किया।
1901 ई. में गांधी एक बार पुनः भारत लौटे परन्तु 1902 ई. में उन्हें ट्रांसवाल के एशिया वासियों तथा प्रवासी भारतीयों के निमन्त्रण पर पुनः दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। इस बार गांधीजी ने फीनिक्स फार्म की स्थापना करके आन्दोलनकारियों को संगठित किया एवं उनके आश्रय का प्रबन्ध किया।
गांधीजी ने आन्दोलनकारियों को सरकार के काले कानून के विरुद्ध निष्क्रिय प्रतिरोध (सत्याग्रह) करने की शपथ दिलवाई। गांधीजी एक प्रतिनिधि मण्डल लेकर इंग्लैण्ड भी गये। 1907 ई. में उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोधी आन्दोलन चलाया जिसके लिए उन्हें दो माह के कारावास की सजा दी गई।
जनरल स्मट्स की सरकार के साथ समझौता हो जाने पर उन्हें जेल से रिहा किया गया किन्तु प्रवासी भारतीय पठानों ने इस समझौते को भारतीय हितों के विरुद्ध विश्वासघात मानते हुए गांधीजी पर प्राण-घातक हमला किया। गांधीजी बच गये, फिर भी उन्होंने हमलावरों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही नहीं की।
उधर जनरल स्मट्स की सरकार ने समझौते की शर्तों की अवहेलना करनी आरम्भ कर दी। इस पर गांधीजी ने पुनः सत्याग्रह आरम्भ कर दिया। इस बार उन्हें पुनः दो मास के कठोर कारावास की सजा दी गई। रिहाई के बाद जब गांधीजी ने फिर सत्याग्रह किया तो उन्हें पुनः गिरफ्तार करके तीन माह की सजा दी गई।
दक्षिण अफ्रीका की संघीय सरकार द्वारा तीन पौण्ड के पोल टैक्स को रद्द न करने के विरोध में नवम्बर 1913 में गांधीजी ने सत्याग्रह आन्दोलन आरम्भ किया तथा एक विशाल जुलूस का नेतृत्व करते हुए ट्रांसवाल में प्रवेश किया। इस पर उन्हें गिरफ्तार करके नौ माह के कठोर कारावास की सजा दी गई।
कुछ समय बाद ही सरकार ने उन्हें बिना शर्त रिहा कर दिया। इसके बाद जनरल स्मट्स के साथ हुए समझौते के कारण गांधीजी ने सत्याग्रह आन्दोलन समाप्त कर दिया। इसके बाद गांधीजी इंग्लैण्ड चले गये। 1914 ई. में प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ होने पर उन्होंने लन्दन में इण्डियन ऐम्बुलेंस कोर का गठन किया। इस संस्था ने युद्ध में घायल सैनिकों की बड़ी सेवा की। ब्रिटिश सरकार ने गांधी को युद्ध कालीन सेवा के लिये कैसरे हिन्द स्वर्ण पदक से सम्मानित किया।
भारत में वापसी
जनवरी 1915 में गांधी भारत लौट आये। 25 मई 1915 को गांधी ने अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की जो बाद में साबरमती आश्रम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 1917 ई. में उन्होंने सत्याग्रह करके भारतीयों को बलपूर्वक ब्रिटिश उपनिवेशों में मजदूरी करने के लिए ले जाने की पद्धति बन्द करवाई तथा चम्पारन (बिहार) में नील की खेती में काम करने वाले मजदूरों और किसानों को गोरे मालिकों के अत्याचारों से मुक्ति दिलवाई।
अगले वर्ष खेड़ा में किसानों को लगान से छूट दिलवाने के लिये ‘कर नहीं’ आन्दोलन चलाया। इसी वर्ष अहमदाबाद में मिल-मजूदरों की मांगों के समर्थन में आमरण अनशन किया।
कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिये जाने के बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर आदि ख्याति प्राप्त लोगों ने तथा जन साधारण ने सरकारी उपाधियाँ लौटा दीं।
असहयोग आन्दोलन से पहले की घटनाएँ
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार को पूरा सहयोग दिया था और गोरी सरकार ने युद्ध समाप्ति के बाद भारतीयों को स्वशासन का अधिकार देने का आश्वासन दिया था परन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद सरकार ने भारत सरकार अधिनियम, 1919 ई. के माध्यम से मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की घोषणा की।
यह भारतीय जनता के साथ विश्वासघात था क्योंकि इन सुधारों से भारतीयों को स्वशासन का अधिकार नहीं मिला। इससे गांधीजी को निराशा हुई किन्तु गांधीजी ने सरकार के साथ सहयोग की नीति को नहीं छोड़ा। 1919 ई. के सुधार अधिनियम से समस्त राष्ट्रवादी असन्तुष्ट थे किन्तु गांधीजी उसे कार्यान्वित करने के पक्ष में थे। उन्होंने अपने पत्र यंग इण्डिया के माध्यम से जनता से अपील की कि इन सुधारों को सफल बनाने के लिये कार्य करें।
रोलट एक्ट
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान क्रांतिकारियों को कुचलने के लिये सरकार ने भारत रक्षा अधिनियम पारित किया था। युद्ध समाप्ति के बाद इस अधिनियम की अवधि भी समाप्त होने वाली थी। फरवरी 1919 में भारत सरकार ने न्यायाधीश रोलट की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर एक विधेयक प्रस्तावित किया।
यह रोलट एक्ट कहलाता है। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति पर सन्देह होने मात्र पर बन्दी बनाया जा सकता था और बिना मुकदमा चलाये, कितने ही समय तक जेल में रखा जा सकता था। उस पर गुप्त रूप से मुकदमा चलाकर उसे दण्डित किया जा सकता था।
गांधीजी ने घोषणा की कि यदि यह विधेयक पारित किया गया तो वे इसके विरोध में सत्याग्रह करेंगे। भारत सरकार ने भारतीय नेताओं के विरोध की अनदेखी करके 21 मार्च 1919 को इस अधिनियम को लागू कर दिया। गांधीजी ने जनता से अपील की कि वे 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल करें।
गांधीजी की अपील पर 6 अपै्रल को सारे देश में हड़ताल रखी गई तथा जुलूस निकाले गये। दिल्ली में जुलूस का नेतृत्व स्वामी श्रद्धानन्द ने किया। जब जुलूस दिल्ली रेलवे स्टेशन के निकट पहुँचा तब पुलिस ने जुलूस पर गोली चलाई। इससे 5 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई तथा बहुत से लोग घायल हो गये।
लाहौर में भी गोली चली। पंजाब में कई स्थानों पर उपद्रव हुए। पंजाब के उपद्रवों के समाचार सुनकर गाँधीजी 8 अप्रेल 1919 को दिल्ली की तरफ रवाना हुये। मार्ग में उन्हें सरकार का आदेश मिला कि वे दिल्ली और पंजाब में प्रविष्ट न हों। गाँधीजी ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। इस पर उन्हें पलवल में बंदी बनाकर वापिस भेज दिया गया।
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड
9 अप्रेल 1919 को अमृतसर के दो लोकप्रिय नेताओं- डॉ. सत्यपाल और डॉ. किचलू को गिरफ्तार करके अज्ञात स्थान पर भेज दिया गया। इससे अमृतसर में उत्तेजना फैल गई और जनता ने अपने नेताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये जिला मजिस्ट्रेट के आवास की तरफ कूच किया।
सेना ने लोगों को रोकने के लिये गोली चलाई जिससे दो व्यक्ति मर गये। जनता ने मृत व्यक्तियों के शवों को कन्धों पर डालकर जुलूस निकाला तथा अपना मार्च जारी रखा। जनता ने मार्ग में स्थित नेशनल बैंक के भवन में आग लगा दी और एक यूरोपियन मैनेजर की हत्या कर दी। जनता ने कुल पाँच अँग्रेजों की हत्या कर दी और कई भवनों में आग लगा दी। 10 अप्रेेल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल डायर आंदोलन पर नियन्त्रण करने के लिये अमृतसर पहुँचा। उसने बहुत से लोगों को बंदी बना लिया।
13 अप्रैल 1919 को वैशाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक आम सभा आयोजित की गई। जनरल डायर ने इस सभा को असंवैधानिक घोषित कर दिया। सरकारी अधिकारियों ने सभा पर प्रतिबन्ध लगने का नोटिस नगर में अच्छी तरह नहीं घुमाया गया और हजारों लोगों को बाग में एकत्रित होने दिया।
जब आठ-दस हजार लोग बाग में पहुँच गये तब जनरल डायर 200 भारतीय और 50 अँग्रेज सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग पहुँचा। उस समय सभा की कार्यवाही शान्तिपूर्वक चल रही थी। जनरल डायर ने बिना कोई चेतावनी दिये जनता पर गोलियां चलवाईं। गोली चलाना तभी बन्द किया गया जब कारतूस समाप्त हो गये।
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इस गोलीकाण्ड में 379 लोग मारे गये और एक से दो हजार लोग घायल हुये। इस गोलीकाण्ड में मृत एवं घायल लोगों की वास्तविक संख्या अधिक थी।
इस हत्याकाण्ड से पूरे देश में अँग्रेजों के विरुद्ध घृणा फैल गई। सरकार ने इस काण्ड की जांच के लिये हण्टर समिति नियुक्त की। जनरल डायर ने हण्टर समिति के समक्ष स्वीकार किया कि उसने लोगों को तितर-बितर होने का आदेश देने के दो या तीन मिनट बाद गोली चलाने का आदेश दिया। स्पष्ट है कि इतने कम समय में आठ-दस हजार लोगों की भीड़ तितर-बितर नहीं हो सकती थी।
लाहौर, गुजरावालां, कसूर तथा अन्य स्थानों पर भी ऐसे अत्याचार किये गये। पंजाब में मार्शल-लॉ लागू कर दिया गया तथा मार्शल-लॉ के उल्लघंन के आरोप में लगभग 300 व्यक्तियों को बन्दी बनाया गया। इनमें से 15 व्यक्तियों को मृत्यु-दण्ड, 6 व्यक्तियों को हमेशा के लिये देश-निकाला और शेष व्यक्तियों को कठोर कारावास की सजा दी गई।
मार्च 1920 में हण्टर समिति ने रिपोर्ट दी जिसमें सरकारी अधिकारियों के दृष्टिकोण को ठीक ठहराया गया किंतु जनरल डायर को नौकरी से हटा दिया गया। इंग्लैण्ड के समाचार पत्रों ने डायर को ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक घोषित किया। इंग्लैण्ड की जनता ने उसके गुजारे के लिये चन्दा एकत्रित किया।
इंग्लैण्ड की सरकार ने जनरल डायर को साम्राज्य की सुरक्षा के लिए की गई सेवाओं के लिये सोर्ड ऑफ ऑनर (सम्मान की तलवार) तथा 2000 पौण्ड भेंट किये। इन कार्यवाहियों ने भारतीयों पर बहुत बुरा प्रभाव डाला। जो लोग अँग्रेजी सरकार के अच्छे शासन की प्रशंसा किया करते थे, वे भी अब सरकार से घृणा करने लगे।
खिलाफत आन्दोलन
तुर्की का सुल्तान विश्व के मुसलमानों का खलीफा कहलाता था। प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने इंग्लैण्ड के विरुद्ध, जर्मनी का साथ दिया था। युद्ध समाप्त होने के बाद 10 अगस्त 1919 को तुर्की के साथ सेब्रे की सन्धि हुई जिसके अनुसार तुर्की साम्राज्य का विघटन कर दिया गया तथा खलीफा को नजरबन्द कर दिया गया।
अतः भारतीय मुसलमानों ने खिलाफत आन्दोलन आरम्भ किया। मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली इस आन्दोलन के प्रमुख नेता थे। गांधीजी ने इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता का स्वर्णिम अवसर समझकर इस आन्दोलन का समर्थन किया। 24 नवम्बर 1919 को दिल्ली में अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन हुआ जिसमें गांधीजी को अध्यक्ष चुना गया।
गांधीजी ने परामर्श दिया कि यदि अँग्रेज तुर्की-समस्या का उचित हल न निकालें तो असहयोग एवं बहिष्कार की नीति अपनाई जाये। 20 मई 1920 को खिलाफत समिति ने गांधीजी के असहयोग कार्यक्रम को स्वीकार कर लिया।
असहयोग आन्दोलन
जब गांधीजी को अँग्रेजों के विरुद्ध भारतीय मुसलमानों का सहयोग मिलने का पूरा विश्वास हो गया तो गांधीजी ने अँग्रेज सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन चलाने का निश्चय किया। इसके लिए सितम्बर 1920 में कलकत्ता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन बुलाया गया जिसकी अध्यक्षता लाला लाजपतराय ने की। इस अधिवेशन में गांधीजी के क्रमिक अहिंसक असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम स्वीकार किया गया। स्वयं गांधीजी द्वारा प्रस्तुत किये गये इस प्रस्ताव की तीन मांगें थीं-
(1.) खिलाफत के साथ की गई भूल सुधारी जायें,
(2.) पंजाब में की गई भूलें सुधारी जायें,
(3.) स्वराज स्थापित किया जाये।
यदि सरकार इन मांगों को स्वीकार नहीं करती है तो जनता द्वारा असहयोग आंदोलन आरम्भ किया जाये जिसके अंतर्गत निम्नलिखित कार्य किये जायें-
(1.) सरकारी उपाधियाँ व अवैतनिक पदों को छोड़ दिया जाये तथा विभिन्न सरकारी संस्थाओं में जो लोग नामित हुए हैं, वे अपने पदों से त्यागपत्र दे दें।
(2.) सरकारी स्वागत समारोहों तथा सरकारी अधिकारियों द्वारा उनके सम्मान में किये जाने वाले अन्य सरकारी व अर्द्ध सरकारी उत्सवों में भाग न लें।
(3.) सरकारी तथा सरकारी मान्यता प्राप्त स्कूलों एवं कॉलेजों का बहिष्कार किया जाये तथा भारतीय छात्रों के लिए राष्ट्रीय विद्यापीठों की स्थापना की जाये।
(4.) वकीलों व मुवक्किलों द्वारा ब्रिटिश अदालतों का बहिष्कार किया जाये तथा आपसी विवादों के लिए पंचायती अदालतें स्थापित की जायें।
(5.) कौंसिलों के चुनाव में खड़े प्रत्याशी अपने नाम वापिस लें। यदि कोई प्रत्याशी चुनाव लड़े तो मतदाता उसे वोट न दें।
(6.) सैनिक, क्लर्क तथा श्रमिक, मेसोपोटामिया में सेवाएं देने से मना करें।
(7.) विदेशी सामान का बहिष्कार किया जाये।
देशबंधु चितरंजनदास, लाला लाजपतराय, श्रीमती ऐनीबेसेंट, विपिनचन्द्र पाल, मदनमोहन मालवीय तथा मुहम्मदअली जिन्ना आदि नेताओं ने गांधीजी द्वारा प्रस्तुत लगभग समस्त प्रस्तावों का विरोध किया। नई विधान परिषदों के बायकाट के प्रस्ताव पर इन नेताओं ने विशेष रूप से कड़ा विरोध जताया किन्तु गांधीजी ने पं. मोतीलाल नेहरू और अली बन्धुओं के समर्थन से प्रस्ताव पारित करवा लिया।
इसके बाद गांधीजी और अली बन्धुओं ने असहयोग आन्दोलन के पक्ष में वातावरण तैयार करने के लिये देश के विभिन्न भागों का दौरा किया। नवम्बर 1920 में नये विधान मण्डलों के चुनाव हुए। देश के लगभग दो-तिहाई मतदाता वोट देने नहीं गये। स्पष्ट है कि कांग्रेस को जनता का भारी समर्थन मिला।
नागपुर अधिवेशन
दिसम्बर 1920 में नागपुर में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता विजय राघवाचार्य ने की। इस अधिवेशन में असहयोग के प्रस्ताव को दोहराया गया तथा उसके कार्यक्रम के अन्त में एक धारा जोड़ दी गई कि यदि आवश्यकता पड़ी तो कर देने से मना किया जा सकता है।
इस अधिवेशन के माध्यम से जन-साधारण का आह्वान किया गया कि वे चरखा कातें तथा कपड़ा बुनें। नागपुर अधिवेशन में मजदूरों और किसानों के सम्बन्ध में भी प्रस्ताव आये। उनकी न्यायोचित मांगों का समर्थन किया गया और सरकारी दमन की निन्दा की गई। इस अधिवेशन में भाषा के आधार पर प्रान्तों के गठन का प्रस्ताव भी पारित किया गया।
असहयोग आन्दोलन की प्रगति
कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिये जाने के बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर आदि ख्याति प्राप्त लोगों ने तथा जन साधारण ने सरकारी उपाधियाँ लौटा दीं। गांधीजी ने कैसरे-हिन्द स्वर्ण पदक तथा जुल युद्ध पदक लौटा दिये।
गांधीजी और अली बन्धुओं ने देश भर में दौरे करके सार्वजनिक सभाएं कीं और स्थानीय लोगों से सम्पर्क करके असहयोग आंदोलन को समर्थन देने का आह्वान किया। चितरंजनदास, मोतीलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, विट्ठलभाई एवं वल्लभभाई पटेल ने वकालत छोड़ दी।
सरकारी स्कूलों व न्यायलायों का बहिष्कार होने लगा। कांग्रेस के आह्वान पर काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, राष्ट्रीय कॉलेज लाहौर, जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ली आदि शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई। सेठ जमनालाल बजाज ने उन वकीलों को जीवन निर्वाह के लिए एक लाख रुपया दिया जिन्होंने अपनी वकालत छोड़कर असहयोग आन्दोलन में भाग लिया था।
जब ड्यूक ऑफ कनाट 1919 के सुधारों का उद्घाटन करने भारत आया तो उसका स्वागत हड़तालों से किया गया। स्थान-स्थान पर विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई गईं और सार्वजनिक रूप से हजारों चरखे काते गये।
इस सफलता को देखकर गांधीजी ने भविष्यवाणी की कि 31 दिसम्बर 1921 तक स्वराज्य आ जायेगा। करोड़ों लोगों ने उनकी बात का विश्वास किया। जनता गांधीजी के आह्वान पर बड़े से बड़ा बलिदान करने को तैयार थी परन्तु कोई यह नहीं जानता था कि एक साल में स्वराज किस रास्ते से आयेगा?
1921 ई. में जब देश में असहयोग आन्दोलन चरम पर था, ब्रिटिश सरकार ने अपने युवराज प्रिन्स ऑफ वेल्स को भारत भेजा। 17 नवम्बर 1921 को प्रिन्स ऑफ वेल्स बम्बई पहुँचा। ब्रिटिश अधिकारियों ने उसके शाही स्वागत की तैयारी की किन्तु बम्बई की जनता ने उसका स्वागत हड़ताल और विरोध प्रदर्शनों से किया।
इस हड़ताल में बम्बई के हजारों श्रमिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं जिससे बहुत से लोग मारे गये। सैंकड़ों लोगों को बंदी बनाया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस की गोली से 30 लोग मरे और 200 से अधिक लोगों को बंदी बनाया गया। प्रिन्स ऑफ वेल्स भारत में जहाँ भी गया, भारतवासियों ने उसका स्वागत इसी तरह से किया।
जब बम्बई में उग्र विरोध प्रदर्शन हुए तथा पुलिस ने गोली चलाई तो गांधीजी ने पांच दिन का उपवास कर प्रायश्चित किया और कांग्रेस वर्किंग कमेटी से मांग की कि बम्बई की घटनाओं के कारण आन्दोलन को वापस लेने के प्रश्न पर विचार करना चाहिए।
वर्किंग कमेटी ने इस परिस्थिति पर विचार किया और कांग्रेस कमेटियों को पूर्ण अहिंसा का वातावरण स्थापित करने का आदेश दिया। उधर सरकार ने अपना दमन-चक्र तेज कर दिया। मुहम्मद अली, मौलाना शौकत अली, मोतीलाल नेहरू, चितरंजन दास, लाला लापतराय, डॉ. किचलू आदि नेताओं एवं हजारों स्वयं सेवक आदि को बंदी बना लिया गया।
1921 ई. के अन्त तक लगभग 20 हजार राजनीतिक कार्यकर्ता विभिन्न जेलों में बन्द थे। दिसम्बर 1921 में मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में एक शिष्ट मण्डल वायसराय से मिला। दोनों पक्षों के बीच एक समझौता वार्त्ता हुई परन्तु असफल रही। इसके बाद धर-पकड़ और तेज हो गई। 1922 ई. में देश की विभिन्न जेलों में 30 हजार राजनीतिक बंदी थे।
असहयोग आन्दोलनका स्थगित किया जाना
दिसम्बर 1921 में अहमदाबाद में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ। निर्वाचित अध्यक्ष देशबन्धु चितरंजन दास के जेल में होने के कारण दिल्ली के हकीम अजमल खाँ ने इस अधिवेशन की अध्यक्षता की। अधिवेशन में घोषणा की गई कि देश में तब तक अहिंसक असहयोग आंदोलन जोरदार ढंग से चलाया जाये जब तक स्वराज स्थापित नहीं हो जाता।
गांधीजी को कांग्रेस का डिक्टेटर नियुक्त किया गया और कांग्रेस महासमिति के सारे अधिकार उनको सौंप दिये गये। फरवरी 1922 में गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड रीडिंग को पत्र लिखकर सूचित किया कि यदि एक सप्ताह में सरकार ने दमन चक्र बन्द नहीं किया तो कर न देने का आन्दोलन चलाया जायेगा।
5 फरवरी 1922 को गोरखपुर जिले में चौरी-चौरा नामक स्थान पर पुलिस ने अहिंसात्मक आन्दोलनकारियों पर गोली चलाई। जब उनकी गोलियां समाप्त हो गयीं, तब वे भागकर थाने में छिप गये। उत्तेजित भीड़ ने थाने को आग लगा दी जिससे एक पुलिस सब इंस्पेक्टर और 21 सिपाही जलकर राख हो गये। गांधीजी हिंसा के पक्ष में नहीं थे, अतः उन्होंने आन्दोलन स्थगित करने की घोषणा कर दी। अचानक आन्दोलन स्थगित करने के कारण अनेेक नेताओं ने गांधीजी की तीव्र आलोचना की।
सुभाषचन्द्र बोस ने लिखा है- ‘डिक्टेटर का फरमान उस वक्त मान लिया गया किन्तु कांग्रेस शिविर में नियमित विद्रोह फैल गया। कोई भी न समझ सका कि महात्मा ने चौरीचोरा की विच्छिन्न घटना का इस्तेमाल सारे देश के आन्दोलन का गला घोट देने में क्यों किया….. जबकि जनता का जोश उबल रहा था, उस वक्त पीछे हटने का आदेश देना राष्ट्र के दुर्भाग्य के अलावा और कुछ न था।’
पं. नेहरू ने लिखा है- ‘ऐसे समय, जबकि लगता था कि हम अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं और सब मोर्चों पर आगे बढ़ रहे हैं, अपने संघर्ष के बन्द कर दिये जाने का समाचार हमें मिला तो हम बहुत नाराज हुए।’
यद्यपि प्रकट रूप से यह आन्दोलन केवल चौरी-चौरा की घटना के कारण स्थगित किया गया था तथापि वास्तविकता यह थी कि बाहर से शक्तिशाली दिखाई देने वाला यह आन्दोलन आंतरिक रूप से कमजोर हो रहा था। सरकार की दमनकारी नीति से जनता में निराशा और भय उत्पन्न हो रहा था।
1921 ई. के अन्त में मलाबार के मोपलाओं द्वारा हिन्दुओं पर किये गये अत्याचारों से भी आन्दोलन को क्षति पहुँची थी। आंदोलन स्थगित किये जाने के बाद सरकार ने 10 मार्च 1922 को गांधीजी को बंदी बना लिया और उन्हें राजद्रोह फैलाने के अपराध में 6 वर्ष का साधारण कारावास दिया गया। 3 फरवरी 1924 को बीमारी के कारण गांधीजी को छोड़ दिया गया।
असहयोग आन्दोलन की असफलता के कारण
बहुत से इतिहासकारों ने स्वीकार किया है कि गांधीजी द्वारा आन्दोलन स्थगित किये जाने का अभिप्राय उसकी असफलता को स्वीकार करना था। आन्दोलन की असफलता के कुछ निश्चित कारण थे-
(1.) 1920-21 ई. में होने वाले विधानमंडलों के चुनाव का बहिष्कार किया गया। इस कारण कांग्रेसी सदस्यों ने निर्वाचन में भाग नहीं लिया किन्तु सरकार के वफादार और अन्य लोगों को निर्वाचन में भाग लेने से नहीं रोका जा सका और वे विधान मण्डलों में प्रवेश पा गए। विधान मण्डलों के बहिष्कार से कांग्रेस घाटे में रही।
(2.) गांधीजी ने अपने सहयोगियों से परामर्श किये बिना ही अचानक आन्दोलन स्थगित कर दिया। देशबन्धु चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपतराय, सुभाषचन्द्र बोस आदि नेताओं ने गांधीजी के इस कार्य की आलोचना की। आन्देालन को उस समय समाप्त करना बहुत बड़ी भूल था, जबकि वह अपने चरम पर था।
(3.) यह सही है कि आन्दोलन पूर्णतः अहिंसात्मक नहीं रह सका किन्तु हिंसा के लिए आन्दोलनकारी, उत्तरदायी नहीं थे। ब्रिटिश सरकार ने शान्तिपूर्ण सत्याग्रहियों पर अमानवीय अत्याचार करके उन्हें हिंसा करने के लिये उकसाया था।
(4.) गांधीजी ने ब्रिटिश शासकों की हिंसा, गोली वर्षा और उनके द्वारा की गई सैकड़ों भारतीयों की हत्या की निन्दा में एक शब्द भी नहीं कहकर अपनी लोकप्रियता को खो दिया। बहुत से विचारकों की मान्यता है कि यदि आन्दोलन कुछ दिन और चलता तो संकट-ग्रस्त अँग्रेज सरकार को कुछ समझौता करने के लिए विवश होना पड़ता किन्तु अचानक स्थगन से कुछ भी प्राप्त नहीं हो सका।
(5.) खिलाफत, मुसलमानों का धार्मिक मामला था। तुर्की के मुसलमान भी इसमें रुचि नहीं रखते थे किंतु गांधीजी ने मुसलमानों का सहयोग प्राप्त करने के लिए इसे अपना निजी मामला बना लिया। इस प्रकार गांधीजी इस राष्ट्रीय आन्दोलन को संर्कीणता की ओर ले गये। ऐसी स्थिति में इसका असफल होना स्वाभाविक था।
(6.) मुसलमानों ने आन्दोलन के अहिंसात्मक स्वरूप को ठीक से समझा ही नहीं था। अतः अचानक आन्दोलन समाप्त करने पर मुसलमानों ने यह प्रचार करना आरम्भ किया कि गांधीजी ने अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए मुसलमानों को गुमराह किया। इससे देश में उत्तेजना फैल गई और साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हो गये।
(7.) सरकार का दमन-चक्र अत्यंत कठोर था। सरकार द्वारा दी जाने वाली अमानवीय यातनाएं सहन करना आम आदमी के लिये कठिन था। अतः आन्दोलन का गतिशील रहना असम्भव था।
असहयोग आन्दोलन का महत्त्व
असहयोग आन्दोलन एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त करने में असफल रहा। इससे जनता में गांधीजी के विरुद्ध असन्तोष और निराशा की लहर फैल गई। फिर भी, इस आन्दोलन के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। अनेक क्षेत्रों में इसके अच्छे परिणाम निकले-
(1.) असहयोग आन्दोलन ने राष्ट्रीय आन्दोलन को नया स्वरूप दिया। राष्ट्रीय आन्दोलन के पहले चरण में नौरोजी तथा गोखले आदि नरमपंथी नेताओं ने भारतीयों को यह मार्ग दिखाया कि सरकार को याचिकाएं देकर अपनी बात मनवाई जाये। दूसरे चरण में लाल, बाल तथा पाल ने राजनीतिक भिक्षावृत्ति त्यागने का मार्ग दिखाया। इस तीसरे चरण में गांधी ने भारतीयों को सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह का मार्ग दिखाया।
(2.) इस आन्दोलन से भारतीयों में राजनीतिक जागृति का और अधिक विकास हुआ तथा स्वराज की मांग प्रबल हुई। पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘गांधी के असहयोग आन्दोलन ने आत्मनिर्भरता एवं अपनी शक्ति संचित करने का पाठ पढ़ाया। सरकार भारतीयों के ऐच्छिक अथवा अनैच्छिक सहयोग पर निर्भर करती है और यदि यह सहयोग नहीं दिया गया तो सरकार का सम्पूर्ण ढांचा कम से कम सिद्धान्ततः लड़खड़ा जायेगा। सरकार पर दबाव डालने का यही सर्वाधिक प्रभावशाली ढंग है।’
(3.) इस आंदोलन में पहली बार कांग्रेस ने सविनय प्रार्थना पत्र भेजने की नीति का परित्याग करके ब्रिटिश सरकार से सीधी टक्कर ली। अतः प्रत्येक व्यक्ति में राष्ट्रीय आन्दोलन में सहयोग देने तथा देश के लिए कुछ बलिदान करने की भावना जागृत हुई। इससे कांग्रेस का आन्दोनल जन-साधारण में गहराई तक प्रवेश कर गया।
(4.) असहयोग आंदोलन के माध्यम से गांधीजी ने देशवासियों को सरकार की आलोचना करना सिखाया। इससे पूर्व जनता, सरकार की आलोचना करने से डरती थी किन्तु अब वह निर्भीक हो गयी तथा अब जेल जाना देश-भक्ति का प्रतीक बन गया।
(5.) गांधीजी ने स्वराज प्राप्ति के लिए अहिंसात्मक सत्याग्रह का जो अस्त्र हाथ में लिया, उसका अँग्रेज सरकार के पास कोई उत्तर नहीं था। शान्त सत्याग्रहियों पर गोली चलाना, अथवा लाठियां बरसाना घृणित समझा गया। इससे जनमत, सरकार के प्रबल विरुद्ध हो गया।
(6.) इस आंदोलन ने सरकार के मन में जनता का भय उत्पन्न कर दिया। बम्बई के तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड लायड ने लिखा है- ‘गांधीजी ने हमें डरा दिया था। उनके कार्यक्रम ने हमारी जेलें भर दी थीं। आप, लोगों को सदैव गिरफ्तार करते नहीं रह सकते, तब जबकि उनकी संख्या 31,90,00,000 हो। अगर उन लोगों ने गांधीजी का दूसरा कदम उठाया होता तथा टैक्स देने से इन्कार कर दिया होता तो ईश्वर जाने, तब हम कहाँ होते।’
अतः भविष्य में होने वाले राष्ट्रीय आन्दोलन के लिये यह हथियार महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
(7.) आन्दोलन के दौरान कांग्रेस ने राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना, चरखा चलाना व खादी तैयार करना, स्वदेशी माल को अपनाना आदि कई रचनात्मक कार्य हाथ में लिये। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से भारतीयों के आर्थिक शोषण में कमी आई।
असहयोग आन्दोलन के बाद की राजनीति में गांधीजी ने कुछ और प्रयोग किए किंतु अहयोग आंदोलन की तरह वे सभी प्रयोग निष्फल सिद्ध हुए। गांधीजी ने जनता से जो वायदे किए, उन्हें वे पूरा नहीं कर सके।
असहयोग आन्दोलन के बाद की राजनीति
भारत में 1920 ई. में असहयोग आंदोलन आरम्भ हुआ जो लगभग विफल हो गया। इसके दस साल बाद 1930 ई. में सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ हुआ। इन दो बड़े आंदोलनों के बीच के 10 साल के अंतराल में भारत में अनेक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएं घटित हुईं। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है-
(1.) स्वराज्य दल का गठन
मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास आदि बहुत से नेताओं का विचार था कि कांग्रेसी नेताओं को विधान मण्डलों में प्रवेश करना चाहिये। क्योंकि ऐसा करने से सरकार के वफादार एवं उदारवादी लोगों को विधान मण्डलों में जाने का अवसर नहीं मिलेगा तथा कांग्रेस द्वारा असहयोग का कार्यक्रम कौंसिलों में भी ले जाया जा सकेगा।
अतः विधानमंडलों का बहिष्कार सम्बन्धी निर्णय रद्द किया जाना चाहिए। इस समय गांधीजी जेल में थे। इसलिये दिसम्बर 1922 के गया अधिवेशन में चितरंजन दास ने इसके सम्बन्ध में प्रस्ताव रखा किन्तु राजगोपालचारी, डॉ. अन्सारी तथा सरदार पटेल आदि नेताओं के विरोध के कारण चितरंजन दास का प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।
अतः चितरंजनदास तथा मोतीलाल नेहरू आदि नेताओं ने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर मार्च 1923 में स्वराज्य पार्टी की स्थापना की। सितम्बर 1923 में दिल्ली में कांग्रेस का एक विशेष अधिवेशन बुलाया गया जिसमें कांग्रेस ने अपने सदस्यों को आगामी निर्वाचन में मतदान करने तथा चुनाव लड़ने की स्वीकृति प्रदान की तथा स्वराज्य दल के कार्यक्रम को स्वीकार कर लिया। 1924 ई. में जेल से रिहा होने के बाद गांधीजी ने भी स्वराज्य दल के कार्यक्रम को समर्थन दे दिया।
स्वराज्य दल का मुख्य उद्देश्य विधान मण्डलों में प्रवेश करके सरकार के समक्ष बाधाएं खड़ी करना तथा सरकारी तंत्र को असफल बनाना था। 1923 ई. के चुनावों में स्वराज्य दल को आशातीत सफलता मिली। स्वराज्य दल के नेता मोतीलाल नेहरू ने केन्द्रीय विधान मण्डल में 8 फरवरी 1924 को भारत के लिये उत्तरदायी सरकार स्थापित करने, गोलमेज सम्मेलन बुलाने तथा भारत के लिए नये संविधान का निर्माण करवाने का प्रस्ताव पारित करवा लिया।
साथ ही वार्षिक बजट की मांगों को अस्वीकार कर दिया। इस कारण गवर्नर जनरल को अपनी शक्तियों का प्रयोग करके वार्षिक बजट को पारित करना पड़ा। सरकार के कड़े विरोध के उपरांत भी विधान मण्डल में 1918 ई. के दमनकारी कानूनों के विरुद्ध राजनीतिक नेताओं की रिहाई के प्रस्ताव पारित किये गये।
फरवरी 1924 के प्रस्तावों में सरकार ने 1919 के द्वैध शासन को मौलिक रूप से ठीक बताया। मुडिमैन समिति की रिपोर्ट केन्द्रीय विधान मण्डल के समक्ष प्रस्तुत की गई। सरकार द्वारा कड़ा विरोध किये जाने पर भी, मोतीलाल नेहरू, मुडिमैन समिति की रिपोर्ट के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करवाने में सफल रहे।
1925 ई. में देशबन्धु चितरंजन दास की मृत्यु हो जाने से स्वराज्य दल कमजोर पड़ गया। मार्च 1926 में कांग्रेस ने पुनः विधान मण्डलों के बहिष्कार की घोषणा की। अतः स्वराज्य दल ने भी विधान मण्डलों में प्रवेश का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। इसके बाद भारतीय राजनीति से स्वराज्य दल का अस्तित्त्व समाप्त हो गया।
(2.) साइमन कमीशन की नियुक्ति
8 नवम्बर 1927 को ब्रिटिश सरकार ने भारत में उत्तरदायी सरकार की प्रगति की जांच के लिये सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में ब्रिटिश संसदों का एक कमीशन नियुक्त किया। इसमें साइमन सहित सातों सदस्य अँग्रेज थे। इस कारण इसे व्हाइट कमीशन भी कहा जाता है।
इस कमीशन में किसी भारतीय को न लिये जाने से भारतीयों को असंतोष हुआ और भारत के समस्त राजनीतिक दलों ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया। जहाँ भी साइमन कमीशन गया, वहाँ काले झण्डों, हड़तालों, प्रदर्शनों और ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारे से उसका विरोध किया गया।
लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपतराय के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला गया। पुलिस अधिकारी साण्डर्स ने लालाजी के सिर पर लाठी के प्रहार किये जिससे लालाजी बुरी तरह घायल हो गये और 17 नवम्बर 1928 को उनका निधन हो गया। इस पर भगतसिंह आदि क्रांतिकारियों ने 17 दिसम्बर 1928 को साण्डर्स की हत्या करके लालाजी की मृत्यु का बदला लिया।
मई 1930 में साइमन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी जिसे 7 जून 1930 को प्रकाशित किया गया। इस रिपोर्ट में औपनिवेशिक स्वराज्य का कहीं उल्लेख नहीं था और केन्द्र में उत्तरदायी सरकार की स्थापना के लिये कुछ नहीं कहा गया था। प्रतिरक्षा को भारतीयों के हाथों में नहीं सौंपा गया था।
प्रान्तों को स्वायत्तता देने की बात कही गई किंतु गवर्नर की विशेष शक्तियों के माध्यम से उस स्वायत्तता को सीमित कर दिया गया। सर शिवस्वामी अय्यर ने इस रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में फैंकने योग्य बताया। कूपलैंड ने इसे राजनीतिशास्त्र के पुस्तकालय हेतु उच्चकोटि की रचना बताया। फिर भी 1935 के भारत सरकार अधिनियम में इस रिपोर्ट की अनेक बातें ली गईं।
(3.) नेहरू रिपोर्ट
जब भारत में साइमन कमीशन का सर्वत्र बहिष्कार हुआ तब भारत सचिव लॉर्ड ब्रेकन हेड ने भारतीयों को ऐसा संविधान बनाने की चुनौती दी जिससे समस्त भारतीय पक्ष सहमत हों। कांग्रेस ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया तथा 28 फरवरी 1928 को दिल्ली में एक सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन की 25 बैठकें हुईं परन्तु हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग के विरोधी रुख के कारण साम्प्रदायिक प्रश्नों के सम्बन्ध में कुछ भी निर्णय नहीं हो सका।
फिर भी, कुछ मूलभूत बातों पर सहमति हो गई और 10 मई 1928 को बम्बई में दुबारा सर्वदलीय बैठक हुई जिसमें भारत के संविधान का मसविदा तैयार करने के लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की गई। इस समिति में सुभाषचन्द्र बोस, सर तेजबहादुर सप्रू, शुऐब कुरेशी, सरदार मंगलसिंह, एम. एम. अणे, सर अली इमाम और जी. आर. प्रधान सहित कुल आठ सदस्य थे। इस समिति की रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है। इस रिपोर्ट की मुख्य बातें इस प्रकार से थीं-
(1.) भारत को तत्काल औपनिवेशिक स्वराज प्रदान किया जाये। केन्द्र व प्रान्तों में पूर्ण उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाये तथा कार्यकारिणी को विधान मण्डल के प्रति उत्तरदायी बनाया जाये।
(2.) भारत में संघीय व्यवस्था लागू की जाये और संघीय आधार पर शक्तियों का विभाजन किया जाये। अवशिष्ट शक्तियां केन्द्र के पास रखी जायें।
(3.) साम्प्रदायिक चुनाव पद्धति तथा अति-प्रतिनिधित्व (जनसंख्या से अधिक स्थान) को स्वीकृत किया जाये किन्तु अल्पसंख्यकों को सांस्कृतिक, स्वायत्तता तथा सुरक्षा आदि की गारण्टी दी जाये।
(4.) सिन्ध प्रांत को बम्बई प्रांत से पृथक किया जाये तथा उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त को अन्य प्रान्तों के समकक्ष दर्जा दिया जाये।
(5.) भारत सरकार की कानूनी शक्तियां संसद के पास रहें जो ब्रिटिश सम्राट, सीनेट और प्रतिनिधि सभा से मिलकर बनें। प्रतिनिधि सभा तथा प्रान्तीय विधान परिषदों के चुनावों में 22 वर्ष या अधिक आयु के व्यक्ति को भाग लेने का अधिकार हो जो कानून द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो।
(6.) शासन की कार्यकारिणी शक्ति बादशाह के पास रहे और गर्वनर जनरल, ब्रिटिश एम्परर के प्रतिनिधि की हैसियत से, कानून और संविधान के अनुसार उस शक्ति का प्रयोग करे। गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद् में प्रधानमंत्री सहित सात मंत्री हों। प्रधानमंत्री की नियुक्ति गवर्नर जनरल द्वारा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार गवर्नर जनरल द्वारा की जाये। कार्यकारिणी परिषद् सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी हो।
(7.) एक प्रतिरक्षा समिति बनाई जाये। प्रतिरक्षा सम्बन्धी व्यय की स्वीकृति प्रतिनिधि सभा से लेने की व्यवस्था हो किन्तु भारत पर विदेशी आक्रमण होने या इसकी संभावना होने पर कार्यकारिणी को किसी भी धनराशि को खर्च करने का अधिकार हो।
(8.) प्रिवी कौंसिल की तमाम अपीलें बन्द करके भारत में एक उच्चतम न्यायालय स्थापित किया जाये जो संविधान की व्याख्या करे तथा प्रान्तीय विवादों पर निर्णय दे।
यद्यपि नेहरू रिपोर्ट को तैयार करते समय भारत के समस्त पक्षों से विचार-विमर्श किया गया था किंतु रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद विभिन्न दलों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से सोचना आरम्भ कर दिया। मुस्लिम लीग में इस रिपोर्ट को स्वीकार किये जाने के सम्बन्ध में तीव्र मतभेद उठ खड़े हुए।
अली बन्धुओं ने विभिन्न प्रान्तीय मुस्लिम संगठनों को इसे स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित किया जबकि मुहम्मद अली जिन्ना इसमें कुछ ऐसे मौलिक परिवर्तन चाहते थे जिससे इसका स्वरूप ही बदल जाये। स्वयं कांग्रेस में भी काफी मतभेद उत्पन्न हो गये।
दिसम्बर 1928 में कलकत्ता कांग्रेस के अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में युवा कांग्रेसियों ने यह प्रस्ताव पारित करवा लिया कि यदि ब्रिटिश संसद 31 दिसम्बर 1929 तक इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करती है तो कांग्रेस का लक्ष्य डोमिनियन स्टेटस की बजाय पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना हो जायेगा।
(4.) पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव
मई 1929 में इंग्लैण्ड में चुनाव हुए जिनमें अनुदार टोरी दल की पराजय हुई और रेम्जे मेक्डोनल्ड के नेतृत्व में मजदूर दल की सरकार बनी। चुनाव के बाद मेक्डोनल्ड ने भारत को अधिराज्य स्थिति देने की घोषणा की तथा अक्टूबर 1929 में भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन को विचार-विमर्श के लिए इंग्लैंण्ड बुलाया।
इंग्लैण्ड से लौटने के बाद इरविन ने भी अधिराज्य स्थिति का दर्जा देने तथा गोलमेज सम्मेलन बुलाये जाने का संकेत दिया परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि ऐसा कब तक हो पायेगा। इंग्लैण्ड में अनुदार दल इस योजना का घोर विरोध कर रहा था। गांधीजी ने गवर्नर जनरल से भेंट करके वास्तविक स्थिति की जानकारी चाही परन्तु उन्हें निराश होना पड़ा। इसी बीच ब्रिटिश सरकार ने नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया।
दिसम्बर 1929 में अत्यंत तनावपूर्ण वातावरण में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन आयोजित हुआ। कांग्रेस अब तक औपनिवेशिक स्वराज की मांग करती रही थी किंतु इस अधिवेशन में कांग्रेस ने अब तक की नीति का परित्याग करते हुए पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित किया।
कांग्रेस कमेटी को यह अधिकार दिया गया कि वह उपयुक्त समय पर सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ करे। रावी नदी के तट पर 31 दिसम्बर 1929 को युवा जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता का प्रतीक तिरंगा झंडा फहराया। यह निर्णय लिया गया कि प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी का दिन स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया जाये।
इस प्रकार हम देखते हैं कि असहयोग आन्दोलन के बाद की राजनीति में गांधीजी ने कोई विशेष सफलता अर्जित नहीं की।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत पर आधारित था। इस आंदोलन के माध्यम से गांधीजी ने भारतीयों से आह्वान किया कि वे ब्रिटिश सरकार के आदेशों का पालन नहीं करें ताकि अंग्रेज सरकार भारतीयों को शासन के अधिकार सौंप दें।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारण
गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा आरम्भ किये गये सविनय अवज्ञा आन्दोलन के अनेक कारण थे-
(1.) सरकार द्वारा नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार किया जाना
नेहरू रिपोर्ट, भारत सचिव लॉर्ड ब्रेकन हेड की उस चुनौती के बाद तैयार की गई थी कि भारतीय ऐसी रिपोर्ट तैयार करके दिखायें जो समस्त पक्षों को स्वीकार्य हो। कुछ पक्षों के विरोध के बावजूद नेहरू रिपोर्ट का देशव्यापी स्वागत हुआ था। स्वयं ब्रिटिश राजनीतिज्ञ भी इसे पढ़कर आश्चर्य चकित रह गये थे। फिर भी वे भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये तैयार नहीं थे। सरकार द्वारा नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिये जाने के बाद भारतीय नेताओं के सामने संघर्ष के अतिरिक्त और कोई विकल्प ही नहीं बचा था।
(2.) विश्वव्यापी आर्थिक मन्दी
1929-1931 ई. की अवधि में विश्वव्यापी आर्थिक मन्दी का दौर था। भारत भी इससे अछूता नहीं रह गया था। देश की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गई थी और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में भारी वृद्धि होती जा रही थी जिससे जनता में सरकार के विरुद्ध तीव्र असन्तोष फैल गया था।
(3.) सरकार की शोषणकारी आर्थिक नीतियाँ
ब्रिटिश नौकरशाही की गलत आर्थिक नीतियों से भारत में औद्योगिक एवं व्यापारिक वर्ग में तीव्र असंतोष फैलता जा रहा था। भारत सरकार द्वारा ब्रिटिश सरकार एवं अँग्रेज व्यापारियों को लाभ पहुँचाने के लिए रुपये के मूल्य में परिवर्तन किया गया जिससे देश का व्यापारी वर्ग असन्तुष्ट हो गया।
(4.) देश में बढ़ती हुई हिंसात्मक प्रवृत्ति
ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बुरी तरह चूसा था। उसके कारण भारत के कृषकों एवं श्रमिकों की स्थिति अत्यंत खराब हो गई थी। 1930 का दशक आते-आते, भारत के कृषक और श्रमिक अकाल, बेरोजगारी एवं कम उत्पादकता की समस्याओं से जूझ रहे थे। उन्हें अपनी विपन्नता से बाहर आने का मार्ग नहीं सूझ रहा था।
जूट, कपड़ा, चाय और इस्पात उद्योगों में कार्यरत श्रमिक, अर्धनग्न अवस्था में आधे पेट खाकर दिन-रात हाड़ तोड़ परिश्रम करने को विवश थे। फिर भी उन पर अत्याचारों का सिलसिला जारी था। मेरठ-षड्यंत्र मुकदमे में 36 श्रमिक नेताओं को लम्बी अवधि की सजा दिये जाने के कारण श्रमिक वर्ग में उत्तेजना चरम पर थी।
कृषकों और श्रमिकों के संगठित हो जाने से देश में बड़ी-बड़ी हड़तालों का तांता लग गया। उनके आन्दोलन हिंसात्मक रूप धारण करने लगे थे। नवयुवकों में भी हिंसात्मक प्रवृत्तियाँ दिखाई दे रही थीं।
गांधीजी ने इस सम्बन्ध में वायसराय को पत्र लिखकर सूचित किया कि हमारा अहिंसात्मक आन्दोलन न केवल ब्रिटिश शासन की हिंसात्मक शक्ति का अपितु बढ़ते हुए हिंसात्मक दल का भी सामना करेगा। इस पर वायसराय ने गांधीजी पर आरोप लगाया कि वे अपने कार्यों से देश में अशान्ति उत्पन्न कर रहे हैं।
सविनय अवज्ञा आन्दोलनसे पूर्व, समझौते का प्रयास
फरवरी 1930 में कांग्रेस कार्य समिति ने गांधीजी को पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करने के लिए सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ करने का अधिकार दे दिया था किन्तु गांधीजी ने आन्दोलन आरम्भ करने के पूर्व एक बार पुनः सरकार से समझौते का प्रयास किया और लॉर्ड इरविन को 2 मार्च 1930 को एक पत्र लिखा जिसमें उन 11 मांगों का उल्लेख किया गया जो जनवरी 1930 में सरकार के समक्ष प्रस्तुत की गई थीं।
पत्र में यह भी कहा गया कि यदि सरकार ने उन मांगों को पूरा नहीं किया तो वे 12 मार्च 1930 को नमक कानून का उल्लंघन करेंगे। कांग्रेस की 11 मांगें इस प्रकार से थीं-
(1.) रुपये की विनिमय दर घटाकर 1 शिलिंग 4 पेंस की जाये।
(2.) लगान आधा किया जाये।
(3.) सैनिक व्यय आधा किया जाये।
(4.) सिविल सेवा के अधिकारियों का वेतन आधा किया जाये।
(5.) रक्षात्मक शुल्क लगाये जायें और विदेशी कपड़ों का आयात नियंत्रित किया जाये।
(6.) तटीय यातायात रक्षा विधेयक पारित किया जाये।
(7.) गुप्तचर विभाग समाप्त कर दिया जाये या उस पर सार्वजनिक नियंत्रण हो।
(8.) भारतीयों को आत्मरक्षार्थ आग्नेय अस्त्र रखने के लिए लाइसेंस दिये जायें।
(9.) नमक पर सरकारी इजारेदारी और नमक टैक्स को खत्म किया जाये।
(10.) नशीली वस्तुओं का विक्रय बन्द किया जाये।
(11.) उन समस्त राजनैतिक बंदियों को रिहा किया जाये जिन्हें हत्या करने या हत्या का प्रयास करने के लिए दण्डित नहीं किया गया है।
वायसराय लॉर्ड इरविन ने गांधीजी के पत्र का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। गांधीजी ने अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए वायसराय से भेंट करने की इच्छा व्यक्त की किन्तु वायसराय ने गांधीजी से मिलने से मना कर दिया।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रथम चरण
दाण्डी कूच
12 मार्च 1930 को गांधीजी ने 79 कार्यकर्ताओं के साथ साबरमती आश्रम से समुद्र तट पर स्थित दाण्डी की ओर पैदल कूच किया। 24 दिन की यात्रा में लगभग 200 मील की यात्रा पूरी की गई। इस दौरान पूरे मार्ग में गांधीजी ने जन-साधारण को अपने उद्देश्य की जानकारी दी।
बहुत से लोग इस संदेश को सुनकर कांग्रेस के सदस्य बन गये। बहुत से लोगों ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। 5 अप्रैल 1930 को गांधीजी और उनके साथी दाण्डी पहुंचे। 6 अपै्रल को आत्मशुद्धि के उपरान्त गांधीजी ने समुद्र के जल से नमक बनाकर, नमक कानून भंग किया।
सविनय अवज्ञा आन्दोलनके कार्यक्रम
गांधीजी द्वारा नमक-कानून भंग करके देश को सविनय अवज्ञा आंदोलन आरम्भ करने का संदेश दिया गया। इसके बाद लोगों ने स्थान-स्थान पर कानूनों को तोड़ना आरम्भ कर दिया। गांधीजी ने इस आन्दोलन में कई कार्यों को सम्मिलित किया-
(1.) गांव-गांव में नमक कानून तोड़ा जाये।
(2.) छात्र, सरकारी स्कूलों को और कर्मचारी, सरकारी कार्यालयों को छोड़ दें।
(3.) स्त्रियां शराब, अफीम और विदेशी कपड़े की दुकानों पर धरना दें।
(4.) विदेशी कपड़ों को जलाया जाये।
(5.) लोग सरकार को टैक्स न दें।
(6.) हर घर में नौजवान और बूढ़े, तकली चलायें तथा सूत कातें।
(7.) हिन्दू छूआछूत को त्याग दें।
(8.) हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, पारसी और ईसाई, हृदय की एकता प्राप्त करें।
सविनय अवज्ञा आन्दोलनकी प्रगति
गांधीजी द्वारा नमक कानून तोड़ने के बाद बम्बई, बंगाल, संयुक्त प्रदेश, मध्य प्रदेश और मद्रास में गैर-कानूनी तरीके से नमक बनाना आरम्भ हो गया। दिल्ली में 1600 स्त्रियों ने शराब की दुकानों पर धरना दिया और बहुत-सी दुकानें बन्द हो गईं। स्त्रियों ने पर्दा त्यागकर इस आन्दोलन में भाग लिया।
इन स्त्रियों को जेल में डाल दिया गया। विदेशी कपड़े के बहिष्कार का कार्यक्रम आशा से भी अधिक सफल रहा। बम्बई में अँग्रेज उद्योगपतियों की 16 कपड़ा मिलें बन्द हो गयीं तथा भारतीय मिलें तेजी से काम करने लगीं। धारासना में 2500 सत्याग्रहियों ने नमक के गोदाम पर पंक्तिबद्ध होकर चढ़ाई कर दी। पुलिस ने उनकी निर्ममता से पिटाई की, जिससे अनेक व्यक्ति बुरी तरह से घायल हो गये।
न्यू फ्रीमेन समाचार पत्र के संवाददाता वेब मिलर ने लिखा- ‘धरासना के समान पीड़जनक दृश्य मैंने कभी नहीं देखे। कभी-कभी तो ये क्षण इतने दुःखद हो जाते थे कि क्षण भर के लिए आंख फेर लेनी पड़ती थी। स्वयं-सेवकों का अनुशासन अत्यंत अद्भुत था।’
किसानों ने कर नहीं चुकाने का आन्दोलन चलाया। किसान आन्दोलन ने संयुक्त प्रदेश के अवध क्षेत्र में बड़ा उग्र रूप धारण कर लिया। 1931 ई. के आरम्भ तक सम्पूर्ण अवध क्षेत्र में 1,60,000 किसानों को भूमि से बेदखल कर दिया गया। कपास पैदा करने वाले बरार के बुलडाना अंचल में भी किसानों के लगानबंदी आन्दोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया।
200 से अधिक कृषक नेताओं को बंदी बना लिया गया। इसी प्रकार, कर्नाटक के कन्नड़ (कनारा) जिले के किसानों ने भी बढ़-चढ़ कर आन्दोलन में भाग लिया।
इस प्रकार इस आन्दोलन ने करबंदी, लगानबंदी, शराबबंदी, नमक सत्याग्रह, जंगल सत्याग्रह, गांजा, भांग और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना, सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और आदालतों के बहिष्कार, सरकारी कार्यक्रमों से असहयोग आदि अनेक कार्यक्रम आयोजित किये गये।
पुलिस तथा सेना की ज्यादतियों के बावजूद सत्याग्रहियों की संख्या प्रतिदिन बढ़ती चली गई। 16 अप्रैल 1930 को जवाहरलाल नेहरू तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। 5 मई को गांधीजी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। गांधीजी की गिरफ्तारी के विरोध में 6 मई को देशव्यापी हड़ताल हुई जिसमें बम्बई के मजदूरों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत की गोरी सरकार ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए क्रूरता का सहारा लिया। सम्पूर्ण पश्चिमोत्तर प्रदेश, संयुक्त प्रदेश, बम्बई प्रेसीडेन्सी, बंगाल और पंजाब के अनेक जिलों में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। सभाओं और जुलूसों पर रोक लगा दी गई। लगानबंदी के जुर्म में कठोर सजा का प्रावधान किया गया।
आंदोलनकारियों पर गोली चलाने और लाठी बरसाने का रास्ता अपनाया गया। जून 1930 में कांग्रेस और उससे सम्बन्धित समस्त संगठन गैर-कानूनी घोषित कर दिये गये। सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक वर्ष में 60,000 और कांग्रेस के आंकड़ों के अनुसार 90,000 लोगों को सजा दी गई जिनमें स्त्रियां और बच्चे भी थे।
ब्रिटिश सरकार ने भारत के ब्रिटिश प्रांतों एवं देशी राज्यों को मिलाकर एक संघ बनाने के उद्देश्य से तीन गोलमेज सम्मेलन किए किंतु गोलमेज सम्मेलनों में गांधीजी की कोई विशेष भूमिका नहीं रही।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन
लॉर्ड इरविन की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में ई.1930 में ब्रिटिश सरकार ने लन्दन में पहला गोलमेज सम्मेलन बुलाया। 12 नवम्बर 1930 को ब्रिटिश सम्राट ने इसका उद्घाटन किया। सम्मेलन की वास्तविक कार्यवाही 17 नवम्बर से आरम्भ हुई। सम्मेलन की अध्यक्षता इंगलैण्ड के प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने की।
सम्मेलन में 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिनमें से 16 प्रतिनिधि भारत की देशी रियासतों से तथा 57 प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत से थे जिन्हें गवर्नर जनरल द्वारा मनोनीत किया गया था। शेष 16 प्रतिनिधि ब्रिटिश सरकार तथा इंगलैण्ड के दोनों सदनों में विपक्ष के सदस्य थे।
भारतीय प्रतिनिधियों में हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, हरिजन, व्यापारी, जमींदार, श्रमिक आदि समस्त वर्गों का प्रतिनिधित्व था किंतु भारत के सर्वप्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस ने इसमें भाग नहीं लिया क्योंकि कांग्रेस 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित कर चुकी थी इसलिये वह ब्रिटिश सरकार द्वारा बुलाये गये ऐसे किसी भी सम्मेलन में भाग कैसे ले सकती थी जिसमें केवल औपनिवेशिक राज्य की बात की जाने वाली हो!
सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रमुख नेताओं में सर तेजबहादुर सप्रू, एम. ए. जयकर, श्रीनिवास शास्त्री, सी. वाई. चिंतामणि, मुहम्मद अली जिन्ना तथा भीमराव अम्बेडकर थे। भारतीय रियासतों से 16 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए जिनमें बीकानेर नरेश गंगासिंह, अलवर नरेश जयसिंह, बड़ौदा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ (तृतीय) के साथ-साथ धौलपुर, पटियाला, कश्मीर, इंदौर, रीवा, नवानगर, कोड़िया, सांगली तथा सारिली के राजा, भोपाल के नवाब तथा हैदराबाद, ग्वालिअर व मैसूर राज्यों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए।
सम्मेलन 19 जनवरी 1931 तक चला। सम्मेलन में सर तेज बहादुर सप्रू ने भारतीय संघ के निर्माण का प्रस्ताव किया। सप्रू ने कहा कि मैं संघीय प्रकार वाली सरकार में अत्यंत मजबूती से विश्वास करता हूँ। मेरा विश्वास है कि इसमें भारत की समस्याओं का हल तथा भारत की मुक्ति विद्यमान है। उन्होंने ब्रिटिश भारत के साथ भारतीय राज्यों के सहबंधन की वकालात करते हुए कहा कि इससे भारत की एकता तथा स्थायित्व की प्राप्ति होगी।
मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि मुहम्मद अली जिन्ना तथा मुहम्मद शफी ने सप्रू द्वारा प्रस्तावित संघीय भारत ;थ्मकमतंस प्दकपंद्ध के निर्माण की मांग का स्वागत किया। बीकानेर नरेश गंगासिंह द्वारा इस प्रस्ताव का बड़े उत्साह से समर्थन किया गया। उन्होंने मांग की कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासित राज्य का दर्जा दिया जाये तथा ब्रिटिश भारत व भारतीय रियासतों का एक संघ बनाया जाये किंतु उन्होंने कुछ शर्तें भी रखीं।
उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त यह थी कि सम्राट के साथ राजाओं के समझौते के अधिकारों को माना जाये और उनकी इच्छा के बिना उन्हें बदला न जाये। भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ ने कहा कि हम केवल स्वयं शासित संघीय ब्रिटिश भारत के साथ संघ बना सकते हैं। सम्मेलन में मुहम्मद अली जिन्ना और डॉ. भीमराव अम्बेडकर में तीव्र मतभेद हो गये इस कारण भारत में संघीय सरकार के निर्माण के विषय पर कोई निर्णय नहीं हो सका।
गांधी-इरविन पैक्ट
प्रथम गोल मेज सम्मेलन में वायसराय इरविन को अनुभव हो गया कि भारत की समस्या को कांग्रेस के सहयोग के बिना हल नहीं किया जा सकता। अतः 26 जनवरी 1931 को गांधीजी और कांग्रेस कार्यसमिति के समस्त सदस्य रिहा कर दिये गये। तेजबहादुर सप्रू और जयकर के प्रयत्नों से 17 फरवरी 1931 को दिल्ली में गांधीजी एवं वायसराय इरविन के बीच वार्त्ता आरम्भ हुई। 5 मार्च 1931 को दोनों पक्षों में एक समझौता हुआ जिसे गांधी-इरविन पैक्ट अथवा दिल्ली पैक्ट कहा जाता है। इस पैक्ट की मुख्य बातें इस प्रकार से थीं-
(1.) कांग्रेस सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापिस लेगी। आंदोलन के अंतर्गत किये जा रहे समस्त कार्यक्रम यथा- मालगुजारी न देने के लिए चलाया जा रहा आन्दोलन, सरकारी कार्यक्रमों के बहिष्कार आदि रोक दिये जायेंगे।
(2.) कांग्रेस द्वारा ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार, राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं किया जायेगा।
(3.) मद्यपान रोकने हेतु धरना जारी रह सकेगा किंतु इसके माध्यम से सरकार पर दबाव नहीं डाला जायेगा।
(4.) कांग्रेस के प्रतिनिधि, संवैधानिक प्रगति के उद्देश्यों की पूर्ति के लिये द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेंगे।
(5.) देश में संवैधानिक सम्बन्धों की संस्थापना हेतु गोलमेज सम्मेलन में विचार किया जायेगा और उसमें सुरक्षा, वैदेशिक सम्बन्ध, अल्पसंख्यकों की स्थिति आदि पर विचार होगा।
(6.) यह समझौता सविनय अवज्ञा आन्दोलन से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित कार्यवाही पर लागू होगा।
(7.) पुलिस द्वारा अब तक की गई कार्यवाही व उसकी मंशा की जांच नहीं होगी क्योंकि इससे परस्पर तर्क-वितर्क बढ़ेगा।
(8.) सविनय अवज्ञा आन्दोलन से सम्बन्धित आर्डिनेंस वापस ले लिये जायेंगे।
(9.) क्रिमिनल लॉ संशोधन कानून 1908 वापस ले लिया जायेगा।
(10.) 1931 ई. में लाया गया आर्डिनेंस नं. 1 अप्रभावी हो जायेगा।
(11.) सविनय अवज्ञा आन्दोलन में गिरफ्तार लोगों पर चल रहे मुकदमे वापस ले लिये जायेंगे।
(12.) सविनय अवज्ञा आन्दोलन में बंदी बनाये गये उन कैदियों को छोड़ दिया जायेगा, जिन्होंने हिंसक कार्य नहीं किये हैं।
(13.) यदि अभी तक जमानतें या जुर्माना अदा न हुआ हो तो अब जमानतों की आवश्यकता नहीं रहेगी और न जुर्माना अदा करना पडे़गा।
(14.) अतिरिक्त पुलिस वापस बुला ली जायेगी।
(15.) जब्त चल सम्पत्ति जो सरकार के कब्जे में है, लौटा दी जायेगी। यदि चल सम्पत्ति बेच दी गई है, तो उसका मुआवजा नहीं दिया जायेगा।
(16.) यदि सरकार ने आर्डिनेंस 1930 के अन्तर्गत अचल सम्पत्ति जब्त की है तो वह लौटा दी जायेगी।
(17.) यदि सरकार यह अनुभव करेगी कि वसूली अनुचित हुई है तो सरकार उसकी क्षतिपूर्ति करेगी।
(18.) उन राज्य कर्मचारियों को जिन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन के समय में नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया था, नौकरी में पुनः लेने पर उदारता से विचार किया जायेगा।
(19.) सरकार नमक-कानून को समाप्त नहीं करेगी। न ही, उसमें संशोधन करेगी किंतु सरकार कुछ गरीब वर्गों को यह सुविधा दे सकेगी कि वे अपने उपभोग के लिए नमक बना सकें परन्तु वे नमक बेच नहीं सकेंगे।
(20.) कांग्रेस द्वारा समझौते की शर्तों की पालना नहीं किये जाने पर सरकार शान्ति व व्यवस्था बनाये रखने के लिए आवश्यक कार्यवाही कर सकेगी।
पैक्ट का समर्थन
गांधी-इरविन पैक्ट पर देश में मिश्रित प्रतिक्रिया हुई। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसे महत्त्वपूर्ण माना क्योंकि ब्रिटिश सरकार पहली बार जनता की प्रतिनिधि संस्था से समझौते की बातचीत करने को राजी हुई थी। जिस सरकार ने कांग्रेस और उसके समस्त संगठनों को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, उस सरकार ने जन-आन्दोलन के कारण उन्हें फिर से संवैधिानिक घोषित किया तथा कांग्रेस के नेताओं से समझौता किया। इस दृष्टि से यह भारतीयों की बड़ी विजय थी। जन-साधारण ने इस समझौते को अपनी विजय के रूप में लिया।
पैक्ट का विरोध
कांग्रेस के प्रमुख युवा नेताओं ने गांधी-इरविन पैक्ट का जोरदार विरोध किया। उनकी दृष्टि में यह समझौता एक शिथिल और हारे हुए मन का सूचक था। सुभाषचन्द्र बोस और वी. पटेल जो उसे समय विदेश में थे, ने एक घोषणा-पत्र जारी किया जिसमें उन्होंने कहा- ‘गांधी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को स्थगित करने का जो कदम उठाया है, उसमें हमारी यह स्पष्ट राय है कि राजनेता के रूप में गांधी असफल हो चुके हैं।’
कई अन्य नेताओं ने इस समझौते का इसलिये विरोध किया कि जहाँ एक तरफ कांग्रेस के समक्ष पूर्ण स्वाधीनता का लक्ष्य था, वहीं दूसरी ओर गांधीजी ने महत्त्वपूर्ण विषयों को अँग्रेजों के हाथों में रखना स्वीकार करके कांग्रेस के लक्ष्य के विरुद्ध कार्य किया था।
क्रांतिकारियों की रिहाई का प्रश्न
कांग्रेस का युवा वर्ग गांधी-इरविन पैक्ट में क्रांतिकारियों के प्रति गांधीजी के रुख से बहुत नाराज हुआ। गांधीजी ने जेल में बंद तीनों प्रसिद्ध क्रांतिकारियों- भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को न तो कैद से छुड़वाने और न उनकी फांसी की सजा को कम करवाने का प्रयास किया।
गांधीजी ने जन आंकाक्षाओं की परवाह किये बिना, अपने अहिंसावादी सिद्धांतों के कारण क्रांतिकारियों के विरुद्ध सरकार द्वारा की जा रही कार्यवाही का समर्थन किया। मार्च 1931 के कराची अधिवेशन से पहले, तीनों क्रांतिकारियों को फांसी हो चुकी थी, इसलिए नवयुवकों ने गांधीजी के विरुद्ध काले झण्डों के साथ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। गांधीजी बड़ी कठिनता से इस समझौते को कांग्रेस से स्वीकार करा सके।
अयोध्यासिंह ने गांधी-इरविन समझौते के सन्दर्भ में लिखा है- ‘कांग्रेस ने जिन मांगों के लिए आन्दोलन चलाया था, क्या उनमें से एक भी मांग पूरी हुई? नहीं। गांधीजी ने जो ग्यारह सूत्री मांग पत्र पेश किया था, क्या उनमें से एक भी बात मानी गई? नहीं। यहाँ तक कि नमक कर भी नहीं हटाया गया। क्या लगानबन्दी और करबन्दी आन्दोलन के दौरान कुड़क की गई किसानों की चल-अचल सम्पत्ति वापस की गई? नहीं। क्या स्वराज की तरफ ले जाने वाली एक भी बात मंजूर की गई? नहीं।’
कराची अधिवेशन के अवसर पर कांग्रेस के एक प्रमुख प्रतिनिधि ने कहा- ‘यदि गांधजी की जगह किसी अन्य व्यक्ति ने ऐसा समझौता किया होता तो उसे उठाकर समुद्र में फेंक दिया जाता।’
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
17 अप्रैल 1931 को लॉर्ड विलिंगडन वायसराय बनकर भारत आया। नये वायसराय ने आते ही समझौता तोड़ना आरम्भ कर दिया। कांग्रेस ने जन आन्दोलन बन्द कर दिया था परन्तु पुलिस की गोलियां और लाठियां बन्द नहीं हुईं। गांधीजी ने चेतावनी दी कि यदि सरकारी दमन बन्द नहीं किया गया तो वे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लन्दन नहीं जायेंगे। मध्यस्थों ने एक बार पुनः वायसराय और गांधीजी की भेंट करवाई।
अंततः दोनों पक्षों में सुलह हो गई। 29 अगस्त 1931 को गांधीजी राजपूताना नामक जहाज से बम्बई से लन्दन के लिए रवाना हो गये। घनश्यामदास बिड़ला, मदनमोहन मालवीय तथा भोपाल नवाब हमीदुल्लाखाँ आदि भी उसी जहाज से गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिये लंदन गये। गांधीजी की लंदन यात्रा का समस्त व्यय बीकानेर नरेश गंगासिंह ने वहन किया।
7 सितम्बर 1931 को लंदन में दूसरा गोलमेज सम्मेलन आरम्भ हुआ। इसमें गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि थे। सम्मेलन में सरोजनी नायडू, पं. मदनमोहन मालवीय, सर अली इमाम, सर मुहम्मद इकबाल तथा घनश्यामदास बिड़ला ने भी भाग लिया किंतु वे विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए। शेष सदस्य लगभग वही थे जो प्रथम सम्मेलन में थे।
ब्रिटिश सरकार ने चुन-चुनकर अपने वफादार लोगों को सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित किया था। सरकार उन लोगों के बीच गांधीजी को बैठाकर सम्मेलन को असफल बनाना चाहती थी और असफलता का दोष भारतीयों के माथे मंढ़ना चाहती थी।
इस सम्मेलन में राजाओं ने भारत संघ में प्रवेश को लेकर पहले जैसा उत्साह नहीं दिखाया। डॉ. अम्बेडकर द्वारा दलित वर्गों के लिए स्थान आरक्षित करने की जिद तथा साम्प्रदायिक समस्या उठ खड़ी होने के कारण 1 दिसम्बर 1931 को यह सम्मेलन, बिना किसी समाधान के समाप्त हो गया।
ब्रिटिश सरकार सम्मेलन को सफल बनाना ही नहीं चाहती थी। वह तो जन-आन्दोलन को कुचलने की तैयारी के लिए थोड़ा समय चाहती थी, जो उसे मिल गया। गांधीजी निराश होकर खाली हाथ भारत लौट आये।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का दूसरा चरण
जब देश के प्रमुख नेता द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के लिये देश से बाहर थे तब लॉर्ड विलिंगडन ने सरकारी दमन चक्र तेज कर दिया। जब गांधीजी भारत लौटे तो संयुक्त प्रदेश के कृषि सम्बन्धी झगड़ों के सम्बन्ध में जवाहरलाल नेहरू को गिरफ्तार कर लिया गया था। खान अब्दुल गफ्फार खाँ तथा उनके भाई को भी गिरफ्तार कर लिया गया था।
बंगाल में सैनिक शासन लागू कर दिया गया था। संयुक्त प्रदेश एवं उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में अध्यादेशों द्वारा शासन चलाया जा रहा था। ऐसी गम्भीर परिस्थितियों को हल करने के लिए गांधीजी ने वायसराय से भेंट करनी चाही किन्तु वायसराय ने मिलने से मना कर दिया।
अतः गांधीजी ने 3 जनवरी 1932 को सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुनः आरम्भ करने की घोषणा की। ब्रिटिश सरकार इस बार आंदोलनकारियों को कुचलने के लिये कृत-संकल्प थी। 4 जनवरी 1932 को सरकार ने एक साथ कई आध्यादेश लागू किये। गांधीजी गिरफ्तार कर लिये गये।
कांग्रेस के छोटे-बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं की भी गिरफ्तारियाँ आरम्भ हो गईं। कांग्रेस तथा उसके समस्त संगठन पुनः असंवैधानिक घोषित कर दिये गये। उन संस्थाओं के समाचार पत्र बन्द करके उनके भवन, कोष आदि जब्त कर लिये गये।
1930 ई. के सविनय अवज्ञा आन्दोलन और 1932 ई. के आन्दोलन में पर्याप्त अन्तर था। 1930 के आंदोलन के लिये कांग्रेस ने पूरी तैयारी की थी और सरकार बचाव की मुद्रा में थी। 1932 ई. के आंदोलन के लिये कांग्रेस की कोई पूर्व तैयारी नहीं थी तथा सरकार आक्रमण की मुद्रा में थी।
इसलिये सरकार ने इस बार अधिक कठोरता एवं क्रूरता से काम लिया। 1933 ई. के अन्त तक 1,20,000 लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। सरकार ने स्थान-स्थान पर लाठी चार्ज किये। आंदोलनकारियों पर गोली चलाना भी साधारण बात थी। सम्पत्तियों की कुड़की, गांवों पर सामूहिक जुर्माने, भूमि की जब्ती आदि कार्यवाहियां बड़े पैमाने पर हुईं।
सरकार का विचार था कि वे इस दमन के सहारे शीघ्र ही आंदोलन को कुचल देंगे किन्तु निहत्थे भारतीय, ढाई साल तक तक पुलिस और सेना का सामना करते रहे।
20 सितम्बर 1932 से गांधीजी ने दलित वर्गों के लिये अलग प्रतिनिधित्व की योजना को रोकने के लिए आमरण अनशन आरम्भ किया। इसके बाद पूना पैक्ट हुआ। इस समझौते के अन्तर्गत हरिजनों के पृथक् मतदान की बात समाप्त हो गई और सामान्य सीटों में ही उनके लिए सीटों के संरक्षण की व्यवस्था की गई। इस पैक्ट से हरिजनों को बहुत लाभ मिला। उन्हें पहले की तुलना में दो-गुनी सीटें मिल गईं।
8 मई 1933 से गांधीजी ने फिर से 21 दिन का उपवास आरम्भ किया। यह उपवास भारतवासियों के हृदय परिवर्तन के लिए था। सरकार ने उसी दिन शाम को गांधीजी को रिहा कर दिया। गांधीजी की सलाह पर कांग्रेस ने 6 सप्ताह के लिए आन्दोलन स्थगित कर दिया।
इसके बाद गांधीजी ने वायसराय से पुनः भेंट करने का प्रयास किया परन्तु वायसराय ने कहा कि जब तक आन्दोलन पूरी तरह समाप्त नहीं होगा, वायसराय से भेंट नहीं होगी। इस पर जुलाई 1933 में सामूहिक सविनय अवज्ञा आन्दोलन बन्द कर उसकी जगह व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आन्दोलन जारी रखने का निर्णय किया गया परन्तु सरकार को इससे संतोष नहीं हुआ।
1 अगस्त 1933 को गांधीजी को पुनः बंदी बना लिया गया। 4 अगस्त को उन्हें रिहा किया गया और यरवदा छोड़कर पूना में रहने का आदेश दिया गया। इस आदेश का उल्लंघन करने पर उन्हें पुनः बंदी बनाया गया और एक साल के लिये जेल में डाल दिया गया। गांधीजी ने जेल में पुनः अनशन आरम्भ कर दिया।
जब उनकी शारीरिक स्थिति बिगड़ने लगी तो 23 अगस्त 1933 को उन्हें बिना शर्त रिहा किया गया। इसके बाद गांधीजी कुछ समय के लिए राजनीति से दूर रहे और हरिजनों की भलाई के काम में लग गये। मई 1934 में कांग्रेस कार्य समिति ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन, बिना शर्त पूरी तरह समाप्त कर दिया। यह सरकार की बहुत बड़ी जीत थी तथा कांग्रेस नेतृत्व की शर्मनाक पराजय।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का महत्त्व और प्रभाव
सविनय अवज्ञा आन्दोलन अपने लक्ष्य की प्राप्ति में पूरी तरह असफल रहा तथा राजनीतिक स्तर पर कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ फिर भी सामाजिक स्तर पर इस आन्दोलन के कुछ परिणाम अवश्य निकले-
(1.) सरकार द्वारा चलाये गये दमन चक्र से देश के नागरिकों में गोरी सरकार के प्रति रही-सही सहानुभूति भी समाप्त हो गई।
(2.) समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा एक साथ मिलकर संघर्ष किये जाने से उनमें राष्ट्रीयता एवं भावनात्मक एकता का प्रसार हुआ।
(3.) भारतीयों को अपनी पराधीनता का अहसास गहराई से हुआ और वे स्वतंत्रता प्राप्त करने हेतु आतुर हो उठे।
(4.) इस आंदोलन के माध्यम से स्वदेशी का प्रचार हुआ जिससे भारत में आत्म-निर्भरता के लिये चलाये जा रहे दूसरे कार्यक्रमों को भी बल मिला।
(5.) इस आन्दोलन के दौरान किये गये पूना पैक्ट से हरिजनों एवं समाज के अन्य वर्गों के बीच राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के लिये चल रही रस्साकशी कुछ कम हुई।
(6.) इस आन्दोलन से छुआछूत, सामाजिक भेद-भाव, साम्प्रदायिकता, पर्दा-प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों पर भी प्रहार हुआ जिससे लोगों को इन सामाजिक कुरीतियों के दुष्परिणामों को समझने का अवसर मिला।
(7.) इस आन्दोलन से राष्ट्रीय शिक्षा को भी बल मिला तथा राष्ट्रीय महत्त्व की कई शिक्षण संस्थायें स्थापित हुईं।
(7.) भारतीयों के अहिंसक आंदोलन तथा सरकार के अमानवीय दमन चक्र को देखकर अमरीका तथा इंग्लैण्ड आदि देशों में, भारत की समस्या के प्रति नैतिक सहानुभूति उत्पन्न हुई। ब्रिटेन के उदारवादी दल ने अपनी सरकार पर दबाव डाला कि वह भारत की समस्या का निराकरण करे।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रति अन्य संगठनों का रुख
सविनय अवज्ञा आन्दोलन कांग्रेस द्वारा चलाया गया था। कांग्रेस के आह्वान पर लाखों की संख्या में जन साधारण ने इस आंदोलन में भाग लिया। उस समय भारत की राजनीति में सक्रिय, विभिन्न तत्त्वों का इस आंदोलन के प्रति रुख इस प्रकार था-
(1.) हिन्दू-महासभा
हिन्दू-महासभा का मानना था कि विनय सहित किये गये आंदोलन से सरकार के सिर पर जूँ तक रेंगने वाली नहीं है। अतः उन्होंने इस आंदोलन को कांग्रेस का कायरता पूर्ण प्रयास बताया तथा स्वयं को इससे दूर रखा।
(2.) क्रांतिकारी संगठन
क्रांतिकारी संगठन शक्ति के बल पर अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालना चाहते थे। इसलिये उन्होंने भी इस आंदोलन को कायरता पूर्ण प्रयास बताते हुए स्वयं को इससे दूर रखा।
(3.) मुस्लिम लीग
मुस्लिम लीग इस आन्दोलन से पूरी तरह दूर रही। उसने इस आन्दोलन को असफल बनाने के लिए अँग्रेजों का साथ दिया तथा अपनी ओर से हर सम्भव प्रयास किये। मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना ने खुले आम घोषणा की- ‘हम गांधीजी के साथ सम्मिलित होने से इन्कार करते हैं, क्योंकि उनका यह आन्दोलन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए नहीं अपितु 7 करोड़ मुसलमानों को हिन्दू-महासभा के आश्रित बना देने के लिए है।’
(4.) राष्ट्रवादी मुसलमानों की भूमिका
राष्ट्रवादी मुसलमानों ने इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया किंतु उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं थी।
(5.) प्रवासी भारतीय
प्रवासी भारतीयों ने इस आन्दोलन के प्रति सहानुभूति प्रकट की और विदेशों में भारत के समर्थन में प्रदर्शनों तथा हड़तालों का आयोजन किया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की विफलता के बाद गांधीजी
सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरी तरह विफल रहा था। इसके बाद गांधीजी राजनीति से दूर होकर हरिजन सेवा में जुट गये। इसके बावजूद देश में राजनीतिक गतिविधियां जोरों से चलती रहीं।
तृतीय गोलमेज सम्मेलन
17 नवम्बर 1932 को लंदन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। अवैध संस्था घोषित हो जाने के कारण कांग्रेस इसमें भाग नहीं ले सकी। सम्मेलन में कुल 46 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। ब्रिटेन के विरोधी मजदूर दल के सदस्यों ने सम्मेलन में भाग लेने से मना कर दिया।
भारत के देशी राज्यों की ओर से अधिकतर नरेशों के स्थान पर राज्यों के वरिष्ठ मंत्रियों ने भाग लिया। इस संक्षिप्त सत्र में संघीय संविधान के संगठन तथा संघ में सम्मिलन के लिये राज्यों की ओर से निष्पादित किये जाने वाले प्रविष्ठ संलेख (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर विचार विमर्श किया गया।
भारत सरकार अधिनियम 1935
तीन गोलमेज सम्मेलनों में हुए विचार-विमर्श के बाद 1935 ई. में ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम 1935 पारित किया। इस अधिनियम के द्वारा केन्द्र में द्वैध शासन प्रणाली स्थापित की गई। गवर्नर जनरल को विशेष शक्तियां देकर संघीय व्यवस्थापिका को कमजोर बना दिया गया ताकि मुस्लिम बहुल प्रान्तों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की गई।
मुस्लिम लीग ने प्रांतीय स्वायत्तता पर अधिक जोर दिया ताकि मुस्लिम बहुल प्रांतों में वे स्वतन्त्र और केन्द्र के नियंत्रण से मुक्त रह सकें। चूँकि कांग्रेस और कुछ अन्य दलों तथा कुछ देशी रियासतों के शासकों ने संघीय भाग का विरोध किया था, अतः अधिनियम के संघीय भाग को लागू नहीं किया गया।
प्रान्तों से सम्बन्धित अधिनियम 1 अप्रैल 1937 से लागू कर दिया गया। इसके बाद प्रान्तों में चुनाव कराये गये। इन चुनावों में कांग्रेस को छः प्रांतों- मद्रास, बम्बई, बिहार, उड़ीसा, संयुक्त प्रान्त और मध्य प्रान्त में स्पष्ट बहुमत मिला। तीन प्रान्तों- बंगाल, असम और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में कांग्रेस सबसे बड़ा दल रही। दो प्रान्तों- पंजाब और सिन्ध में कांग्रेस को बहुत कम सीटें मिलीं।
चुनावों के बाद कांग्रेस ने यह शर्त रखी कि यदि गवर्नर जनरल यह आश्वासन दे कि प्रान्तों के गवर्नर, दैनिक प्रशासन में मंत्रियों के काम में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और संवैधानिक अध्यक्ष के रूप में कार्य करेंगे तो कांग्रेस, सरकार बनाने को तैयार है अन्यथा वह विपक्ष में बैठेगी।
गवर्नर जनरल लॉर्ड लिनलिथगो ने ऐसा आश्वासन देने से मना कर दिया। अतः कांग्रेस ने सरकार बनाने से मना कर दिया। इस पर अन्य दलों को प्रान्तीय सरकारें बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। इस कारण प्रांतों में अल्पमत की सरकारों का गठन हुआ। इस कारण प्रांतों में कोई काम नहीं हो सका।
21 जून 1937 को गवर्नर जनरल द्वारा सहयोग करने का आश्वासन दिये जाने पर 7 जुलाई 1937 को कांग्रेस बहुमत वाले प्रान्तों में कांग्रेस ने अपने मंत्रिमण्डल बनाये। अगले वर्ष कांग्रेस ने दूसरे दलों के सहयोग से असम और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में भी अपने मंत्रिमण्डल बना लिये। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग से किसी भी प्रांत में समझौता नहीं किया। बंगाल, पंजाब और सिन्ध में गैर-कांग्रेसी मन्त्रिमण्डल बने। 1939 ई. तक प्रान्तीय मंत्रिमण्डल सुचारू रूप से कार्य करते रहे।
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