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कांग्रेस का उदारवादी नेतृत्व

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उदारवादी कांग्रेसी नेता दादा भाई नौरोजी

ईस्वी 1885 से ईस्वी 1919 तक कांग्रेस का उदारवादी नेतृत्व कांग्रेस पर हावी रहा। इस काल के नेताओं ने अंग्रेज शासकों से अनुनय-विनय करके अपने अधिकारों में वृद्धि के लिए प्रयत्न किए।

भारत की आजादी के लिये संघर्ष अँग्रेजी राज्य की स्थापना के साथ ही आरम्भ हो गया था। 18वीं शती में प्रेस के उदय साथ ही भारतयों को अपने अधिकारों की मांग करने के लिये मंच मिलना आरम्भ हो गया था।

उन्नीसवीं सदी से ब्रिटिश राज्य में राजनीतिक संस्थाओं का उदय होने लगा। 1857 ई. में सशस्त्र क्रांति का प्रयास किया गया किंतु 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद सही अर्थों में राष्ट्रीय आन्दोलन आरम्भ हुआ। यही कारण है कि 1885 से लेकर 1947 ई. तक कांग्रेस का इतिहास, भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का ही इतिहास है। कांग्रेस के इतिहास को मुख्यतः दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है-

(1.) प्रथम चरण

स्थापना से लेकर रोलट एक्ट तक अर्थात् 1885 से 1919 ई. तक। इस चरण में 1885 से 1905 ई. तक कांग्रेस का नेतृत्व उदारवादियों ने किया और 1905 से 1919 ई. तक कांग्रेस का नेतृत्व उग्रवादी विचारधारा के नेताओं के हाथों में रहा।

(2.) द्वितीय चरण

असहयोग आंदोलन से लकर भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक अर्थात् 1920 से 1947 ई. तक। इस काल में कांग्रेस का नेतृत्व दक्षिणपंथी मोहनदास कर्मचंद गांधी और उनके समाजवादी वामपंथी सहयोगी जवाहरलाल नेहरू आदि के हाथों में रहा।

कांग्रेस का उदारवादी नेतृत्व

राजनीतिक उदारवाद 19वीं सदी के चिंतन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।  इस चिंतन का आधार यह विचार है कि विश्व में प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक उपादेयता है। फिर भी यह शब्द तुलनात्मक है। देश, काल एवं पात्र के अनुसार उदारवाद की परिभाषा में परिवर्तन हो जाता है। कोई विचार किसी समुदाय में उदारवादी माना जा सकता है जबकि वही विचार दूसरे समुदाय में अनुदारवादी अथवा उग्रवादी माना जा सकता है।

1885 से 1905 ई. तक कांग्रेस की बागडोर पूरी तरह से उदारवादियों अथवा नरम राष्ट्रवादियों के हाथों में रही। अतः राष्ट्रीय आन्दोलन का यह काल उदारवाद का युग कहलाता है। इस युग में भारतीय राजनीति में ऐसे व्यक्तियों का प्रभाव था जो अँग्रेजों तथा अँग्रेजी शासन के प्रति नरम रवैया रखते थे और बहिष्कार तथा असहयोग जैसे क्रान्तिकारी विचारों के विरुद्ध थे।

वे उच्च शिक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। उनका दृष्टिकोण सर्वथा वैधानिक था। इनमें से अधिकांश नेताओं के हृदय में ब्रिटिश राज के प्रति कृतज्ञता के भाव थे। वे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को वरदान समझते थे। उन्होंने अनेक सामाजिक संस्थाओं एवं रीति-रिवाजों में सामाजिक समानता तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की स्थापना के लिए परिवर्तन का सुझाव दिया।

वे भारत में प्रतिनिधिमूलक संस्थाओं की स्थापना और नागरिक स्वतन्त्रता की मांग प्रस्तुत करते थे। राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए उदारवादियों ने संवैधानिक आन्दोलन का समर्थन किया। उनके द्वारा जो राजनीतिक आन्दोलन प्रारम्भ किया गया वह भारत की एकता, जातीय एवं साम्प्रदायिक समन्वय, आधुनिककरण, सामाजिक रूढ़ियों का विरोध एवं भेदभाव का निषेध, नवीन आर्थिक प्रगति तथा औद्योगिकरण का समर्थन करता था।

उदारवादियों ने सेवाओं के भारतीयकरण, पाश्चात्य शिक्षा के विस्तार, व्यवस्थापिका सभाओं के चुने हुए सदस्यों की संख्या में वृद्धि, विधि का शासन, स्वतन्त्रता के अधिकारों का व्यापक प्रयोग आदि विषयों पर ध्यान केन्द्रित किया।

दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, लालमोहन घोष, रासबिहारी, गोपालकृष्ण गोखले, श्रीनिवास शास्त्री, महादेव गोविंद रानाडे आदि नेता उदारवादी युग के प्रमुख स्तम्भ थे। कुछ उदारवादी अँग्रेज यथा- ए. ओ. ह्यूम, विलियम वेडरबर्न, जार्ज यूल, मेक्विन, स्मिथ आदि भी कांग्रेस के सदस्य थे।

इन उदारवादी नेताओं ने 1885 से 1905 ई. तक कांग्रेस का नेतृत्व किया। उदारवादी नेताओं ने भारत के ब्रिटिश शासकों को प्रसन्न रखते हुए उनकी दयालुता एवं न्यायप्रियता की दुहाई देकर स्वशासन की ओर बढ़ने का प्रयत्न किया। जेल जाने का कष्ट उठाना इन नेताओं के वश की बात नहीं थी। वे अपनी सामजिक स्थिति, पद, व्यवसाय आदि को यथावत् बनाये रखते हुए भारत में स्वराज्य की स्थापना का स्वप्न देखते थे।

उदारवादी नेतृत्व की विशेषताएँ

(1.) भारत की एकता

उदारवादियों की मनोवृत्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू था- भारतीयों में एकता की भावना का बोध कराना। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था कि एकता के अभाव में भारत अपनी महानता को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए हमें सर्वप्रथम पूरे भारत को स्नेह के बंधन में बांधना होगा। दादाभाई नौरोजी ने भी इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न धर्मों को मानने वाली जनता में एकता तथा सहानुभूति होनी चाहिए। उदारवादी नेताओं के प्रचार से भारत के बुद्धिजीवी वर्ग में एकता की भावना का विकास हुआ तथा विभिन्न धर्मों एवं व्यवसायों में लगे लोग राष्ट्रीय कांग्रेस में सम्मिलित होने लगे। यह उदारवादियों की बड़ी उपलब्धि थी।

(2.) ब्रिटिश शासन के प्रति भक्ति भावना

कांग्रेस के अधिकांश उदारवादी नेता ब्रिटिश शासन के समर्थक एवं प्रशसंक थे। वे असहयोग तथा क्रान्तिकारी विचारों के विरोधी थे। उदारवादियों को ब्रिटिश जनतन्त्रीय व्यवस्था में असीम आस्था थी। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन ने ही भारत को आधुनिक सभ्यता के मार्ग पर अग्रसर किया, स्वतन्त्रता की भावना उत्पन्न की, राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया और देश की जनता को एकसूत्र में बांधने का काम किया। जस्टिस रानाडे का मानना था कि भारत में अँग्रेजी शासन भारतीयों को नागरिक एवं सार्वजनिक गतिविधियों का राजनैतिक शिक्षण देने की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध हुआ था।

उनका कहना था- ‘हिन्दुओं एवं मुसलमानों में वैज्ञानिक क्रियाकलाप, नवीन शिक्षण तथा व्यसायिक दृष्टिकोण की कमी होने के कारण प्रगति शिथिल होती गयी। अँग्रेजों के आगमन ने यह स्थिति बदल दी। भारत को एक नवीन ज्योति दिखाई दी। आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। अँग्रेजों के सम्पर्क में आने से हमें स्वतन्त्रता की महत्ता का आभास हुआ। सदियों की गुलामी एवं जड़ता को पाश्चात्य प्रभाव ने समाप्त कर दिया। भारतीय नवजागरण प्रारम्भ हुआ।’

दादाभाई नौरोजी की धारणा थी कि अँग्रेजों का शासन भारत के चहुँमुखी विकास के लिए दैविक वरदान का कार्य करेगा। उनका कहना था कि- ‘अँग्रेजों का उस समय तक भारत में बने रहना आवश्यक है जब तक कि भारतीयों को वे स्वावलम्बी बनाने सम्बन्धी अपना न्यासिता का उद्देश्य पूरा नहीं कर लेते।’

उदारवादियों ने भारतीयों की इंग्लैण्ड के प्रति वफादारी और उनकी देशभक्ति के बीच गहरा सम्बन्ध स्थापित करने में कभी असुविधा महसूस नहीं की।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा था- ‘ईश्वर भविष्य में हमारी वफादारी को और गहरा करे, हमारी देशभक्ति को और प्रोत्साहित करे और ब्रिटिश साम्राज्य के साथ हमारे सम्बन्धों को और अधिक दृढ़ करे।’

(3.) क्रमिक सुधारों के पक्ष में

उदारवादी नेता देश की शासन व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तनों के विरोधी थे। उनका मानना था कि भारत में सुधार कार्य एक साथ सम्भव नहीं है, इसलिए क्रमिक सुधार होने चाहिये। वे राजनीतिक एवं प्रशासकीय क्षेत्र में धीरे-धीरे सुधार लाना चाहते थे। वे सरकार में जनता की समुचित भागीदारी चाहते थे। आर. जी. प्रधान ने लिखा है- ‘कांग्रेस के प्रारम्भिक दिनों के प्रस्तावों से पता चलता है कि उनकी मांगें अत्यन्त साधारण थीं। कांग्रेस के नेता आदर्शवादी नहीं थे। वे हवाई किला नहीं बनाते थे। वे व्यवहारिक सुधारक थे तथा आजादी, क्रमशः कदम-कदम करके हासिल करना चाहते थे।’

फीरोजशाह जैसे नेता, अँग्रेजों के संरक्षण में भारत के राजनीतिक शिक्षण का मार्ग ढूँढ रहे थे और उनका विश्वास था कि किसी दिन अँग्रेज स्वयं ही, भारत की राष्ट्रीय मांगों को स्वीकार कर लेंगे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भी ब्रिटेन के मार्गदर्शन में भारत की प्रगति का स्वप्न देखते थे। उनका उद्देश्य भारत में राजनीतिक सुधारों की मांग प्रस्तुत करना तथा अँग्रेजी शासन से प्रार्थना एवं याचिकाओं के माध्यम से नवीन सुधारों को लागू करवाना था। गोपालकृष्ण गोखले भारत के राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं पुनर्जीवन के लिए क्रमिक विकास का सहारा लेना चाहते थे।

(4.) ब्रिटेन से स्थायी सम्बन्धों की स्थापना

उदारवादी नेता, पाश्चात्य सभ्यता एवं विचारों के पोषक थे। उनकी मान्यता थी कि भारतीयों के लिए, भारत का ब्रिटेन से सम्बन्ध होना एक वरदान है। ब्रिटेन से सम्बन्धों के कारण पाश्चात्य साहित्य, आधुनिक शिक्षा पद्धति, यातायात के साधन, न्याय प्रणाली, स्थानीय स्वशासन आदि व्यवस्थाएँ भारत के लिए अमूल्य वरदान सिद्ध हुई हैं।

पाश्चात्य विचार एवं दर्शन, लोगों में स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र के प्रति आदर उत्पन्न करता है। अतः भारत के हित में यही उचित होगा कि ब्रिटेन से उसका अटूट सम्बन्ध बना रहे।

श्रीमती एनीबीसेन्ट का माना था- ‘इस काल के नेता स्वयं को ब्रिटिश प्रजा मानने में गौरव का अनुभव करते थे।’

गोपालकृष्ण गोखले का कहना था- ‘हमारा भाग्य अँग्रेजों के साथ जुड़ा हुआ है। चाहे वह अच्छे के लिए हो अथवा बुरे के लिए।’

इसी प्रकार दादाभाई नौरोजी का कहना था- ‘कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने वाली संस्था नहीं है, अपितु वह तो ब्रिटिश सरकार की नींव को दृढ़ करना चाहती है।’

उदारवादी नेता मानते थे कि अँग्रेजों की मुक्त व्यापार नीति भारतीय उद्योगों के हितों के विरुद्ध है और भारत की निर्धनता के लिए ब्रिटिश शासन उत्तरदायी है फिर भी वे भारत और ब्रिटेन के आर्थिक हितों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानते थे।

गोखले राष्ट्रीय शक्ति तथा स्वालम्बन के विकास के साथ-साथ शासकीय संरक्षण में भारत के नव-स्थापित उद्योगों को इतना विकसित हुआ देखना चाहते थे कि वे अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा में मात न खा जाये। उदारवादियों ने बंगाल-विभाजन के बाद प्रारम्भ हुए स्वदेशी आन्दोलन का केवल आर्थिक दृष्टि से समर्थन किया, न कि राजनैतिक शस्त्र के रूप में।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा था कि स्वदेशी आन्दोलन का आधार देश-प्रेम था, न कि विदेशियों के प्रति घृणा। स्वदेशी का उद्देश्य आदर्श, विद्या, कला और उद्योगों को देश से बाहर निकालना नहीं है; अपितु वह उन्हें राष्ट्रीय पद्धति में समाविष्ट करने पर जोर देता है।

(5.) अँग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास

उदारवादियों का विश्वास था कि अँग्रेज, संसार के सर्वाधिक ईमानदार, शक्ति सम्पन्न और प्रजातन्त्रवादी लोग हैं। वे भारत में भी प्रजातान्त्रिक संस्थाओं का विकास करेंगे। यदि ब्रिटिश संसद और जनता को भारतीय समस्याओं से अवगत कराया जाए तो वे निश्चित रूप से सुधार के कदम उठायेंगे।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था- ‘अँग्रेजों के न्याय, बुद्धि और दया भावना में हमारी दृढ़ आस्था है। संसार की इस महानतम प्रतिनिधि सभा, संसदों की जननी ब्रिटिश कॉमन सभा के प्रति हमारे हृदय में असीम श्रद्धा है; अँग्रेज स्वेच्छा से भारत से चले जायेंगे।’

इस प्रकार, कांग्रेस के उदारवादी नेताओं का अँग्रेजों की न्यायप्रियता में असीम विश्वास था। उनकी मान्यता थी कि अँग्रेज न्यायप्रिय एवं स्वतन्त्रता प्रेमी हैं। यदि उन्हें भारतीयों की योग्यता पर विश्वास हो जायेगा तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के भारतीयों को स्वशासन का अधिकार प्रदान कर देंगे।

बाद में उदारवादियों का भारत के ब्रिटिश शासकों की न्यायप्रियता से विश्वास उठने लगा परन्तु ब्रिटिश राजनीतिज्ञों और ब्रिटिश जनता की न्यायप्रियता में उनका विश्वास बना रहा। इसलिये वे ब्रिटिश राजनीतिज्ञों तथा ब्रिटिश जनमत का समर्थन जीतने का प्रयास करते रहे।

(6.) ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन

कांग्रेस के उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन चाहते थे। कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा- ‘स्वशासन एक प्राकृतिक देन है, ईश्वरीय शक्ति की कामना है। प्रत्येक राष्ट्र को स्वयं अपने भाग्य का निर्णय करने का अधिकार होना चाहिए, यही प्रकृति का नियम है।’

ब्रिटिश साम्राज्य से सम्बन्ध विच्छेद की तो वे स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते थे। इसलिए पूर्ण स्वतन्त्रता की बात उनके मस्तिष्क में नहीं थी। वे तो ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन प्राप्त करना चाहते थे। दादाभाई नौरोजी ने अपनी सुधारवादी वृत्ति के कारण समस्त प्रकार के सुधारों के लिए अँग्रेजी शासन का सहारा लेना उचित ठहराया।

उन्होंने मांग रखी कि भारत को शीघ्र ही प्रतिनिध्यात्मक संस्थाओं से युक्त किया जाये। इस योजना के अन्तर्गत भारत सरलता से सुशासन की ओर बढ़ते हुए एक पूर्ण लोकतान्त्रिक राज्य बन सकता था।

1906 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में पहली बार भारतीयों को स्वराज्य शब्द का मन्त्र देते हुए कहा कि बदलते हुए समय के अनुसार अब भारतीय जनता केवल सुशासन तक ही सीमित नहीं रखी जा सकती, उसे स्वशासन की आवश्यकता है।

इसी प्रकार फीरोजशाह मेहता ने कहा कि प्रतिनिधि संस्थाओं की मांग भारत के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में ही की गई थी न कि किसी क्रान्तिकारी परिप्रेक्ष्य में। भारतीयों द्वारा अपने अधिकारों का जो ज्ञान शिक्षा के माध्यम से अर्जित किया गया है, उसी सन्दर्भ में भारतीयों ने प्रतिनिधि संस्थाओं की मांग रखी है।

(7.) वैधानिक उपायों में विश्वास

चूँकि उदारवादी नेताओं को अँग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास था, अतः वे क्रान्तिकारी उपायों को अपनाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने सरकार के साथ संघर्ष करने की बात कभी नहीं की। उनका पूर्ण विश्वास वैधानिक संघर्ष में था। वे अपने कार्यों से सरकार को असन्तुष्ट नहीं करना चाहते थे।

हिंसात्मक एवं क्रान्तिकारी उपाय उनके मस्तिष्क में कभी नहीं आये। उन्होंने प्रार्थनाओं, प्रार्थना-पत्रों, याचिकाओं, स्मरण-पत्रों और प्रतिनिधि-मण्डलों द्वारा सरकार से अपनी न्यायोचित मांगों को मानने का आग्रह किया। अनेक विद्वानों का मानना है कि इस समय कांग्रेस की नीति प्रार्थना करने की थी, अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने की नहीं।

इस रीति-नीति को कुछ लोगों ने राजनीतिक भिक्षावृत्ति कहा। अन्य विद्वानों का मत है कि उदारवादियों ने अँग्रेजी शासन का इसलिए विरोध नहीं किया क्योंकि उन्हें आंशका थी कि यदि उन्होंने ऐसा किया तो अँग्रेज सरकार कांग्रेस को ही समाप्त कर देगी। संभवतः उनका ऐसा सोचना सही था।

अभी कांग्रेस अपनी जड़ंे मजबूत नहीं कर पाई थी। इसलिए उन्होंने जनता की इच्छाओं तथा भावनाओं को अपने प्रस्तावों तथा अन्य वैधानिक उपायों द्वारा सरकार के सामने बड़े विनम्र रूप में प्रस्तुत किया।

उदारवादी नेताओं की मांगें

कांग्रेस ने अपनी स्थापना के प्रारम्भिक बीस वर्षों में वार्षिक अधिवेशनों में विभिन्न प्रस्ताव पारित करके ब्रिटिश सरकार का ध्यान भारतीय जनता की समस्याओं की ओर आकर्षित किया तथा नागरिक प्रशासन में विभिन्न प्रकार के सुधार करने की मांग की। उनकी विभिन्न मांगें इस प्रकार से थीं-

(1.) राजनीतिक मांगें

प्रारम्भिक राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा भारत की गोरी सरकार से भारतीयों के लिये अनेक राजनीतिक अधिकारों की मांगें की गईं-

1. प्रशासन व्यवस्था में भारतीयों की अधिक से अधिक भागीदारी हो।

2. विधायी परिषदों में सुधार हो।

3. केन्द्रीय तथा प्रान्तीय कौंसिलों का विस्तार हो तथा उनमें सरकार द्वारा नामित सरकारी सदस्यों की संख्या में कमी करके निर्वाचित और गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों की संख्या में वृद्धि की जाये।

4. कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण हो तथा मुकदमों की सुनवाई में जूरी प्रथा को मान्यता दी जाये।

5. वित्तीय व्यवस्था का पुनर्गठन करके करों का बोझ कम किया जाये।

6. अँग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा और विस्तार के व्यय में ब्रिटिश सरकार भी भागीदारी निभाये।

7. सरकार के सैनिक व्यय में कमी की जाये।

8. किसानों की स्थिति सुधारने के लिए भू-राजस्व की दर कम की जाये तथा यह 20 से 30 वर्षों के लिये स्थाई की जाये।

9. भारतीय जनता की दशा सुधारने के लिए उचित कदम उठाए जाएँ। प्राथमिक शिक्षा का विस्तार हो, औद्योगिक एवं तकनीकी शिक्षा की सुविधा दी जाये, सफाई में सुधार के लिए अधिक अनुदान दिया जाए इत्यादि।

1886 ई. में हुए कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में केन्द्रीय और प्रान्तीय कौंसिलों के विस्तार और उनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों की मांग उठी। यह मांग हर अधिवेशन में अधिक मजबूती के साथ दोहराई जाती रही। तीसरे अधिवेशन के प्रस्तावों में कहा गया कि कौंसिल में आधे प्रतिनिधि निर्वाचित पद्धति से आएं।

यह निर्वाचन सीधा न होकर परोक्ष विधि से हो। अर्थात् नगरपालिका, विश्वविद्यालय, व्यापार मण्डल, स्थानीय मण्डल और स्थानीय कौंसिल में निर्वाचन किया जाये और स्थानीय कौंसिल के माध्यम से केन्द्रीय कौंसिल में किया जाये। चौथे अधिवेशन में इस बात पर सर्वाधिक जोर डाला गया कि विधान परिषदों को इतना बढ़ाया जाए कि उनमें देश के हितों का प्रतिनिधित्व हो जाए। 1889 ई. के पांचवें अधिवेशन में 21 वर्ष के प्रत्येक भारतीय को मताधिकार देने की बात उठाई गई।

(2.) नागरिक अधिकारों की मांगें

उदारवादी नेता नागरिकों के लिये भाषण और प्रेस की स्वतन्त्रता का अधिकार, संगठन बनाने की स्वतन्त्रता का अधिकार जैसे नागरिक अधिकारों की मांग उठाते थे। जब कभी सरकार इन अधिकारों को सीमित करने का प्रयास करती थी, तब उदारवादी नेता इन अधिकारों के समर्थन में दलीलें देते थे।

1878 ई. में पारित प्रेस अधिनियम का उदारवादियों ने तब तक विरोध किया जब तक कि सरकार ने इस अधिनियम को निरस्त नहीं कर दिया। इसी प्रकार, 1880-90 ई. में जब सरकार ने समाचार पत्रों के आलोचना करने के अधिकार को समाप्त करने का प्रयास किया, तब उदारवादियों ने सरकारी प्रयासों का विरोध किया।

फीरोजशाह मेहता प्रेस की स्वतन्त्रता के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने टाइम्स ऑफ इण्डिया के नाम पत्र में लिखा- ‘यदि वर्नाक्यूलर प्रेस का कार्य शासन को अनुत्तरदायी दिखाई देता है तो यह अनुत्तरदायित्व सरकार के नियमन एवं पंजीकरण द्वारा भी बना रह सकता है। प्रेस की स्वतन्त्रता का दमन भारत में नवपल्ल्वित स्वतन्त्रता के विकास को अवरुद्ध कर देगा। इससे शासन को संचार के एक महत्त्वपूर्ण साधन से वंचित रहना पड़ेगा और उसे जन प्रतिक्रिया की सही जानकारी नहीं प्राप्त हो सकेगी। यदि प्रेस की स्वतन्त्रता का दमन किसी व्याप्त विरोध को दबाने में प्रयुक्त किया जाता है तो वह उचित नीति नहीं होगी।’

उन्होंने भारत सरकार को चेताया कि वह ऐसी किसी भी नीति का अनुसरण नहीं करे।

(3.) सांविधानिक सुधार और स्वशासी सरकार की मांग

उदारवादी नेता एक स्वशासी सरकार की स्थापना चाहते थे परन्तु इस दिशा में उन्होंने जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाया। प्रारम्भ में उन्होंने विधान परिषदों के विस्तार और विभिन्न सुधारों के माध्यम से भारतीय जनता को सरकार में अधिक हिस्सा देने की मांग की। इसके बाद उन्होंने विधान परिषदों के अधिकारों में वृद्धि की मांग की ताकि बजट पर बहस की जा सके और प्रशासन के कार्यों की समीक्षा करने का अवसर मिल सके। 1905 ई. तक इस विषय में प्रस्ताव पारित किये जाते रहे।

(4.) नागरिक सेवाओं के भारतीयकरण की मांग

उदारवादियों का मानना था कि विभिन्न प्रशासकीय एवं वित्तीय बुराइयों को तब तक दूर नहीं किया जा सकता जब तक कि अधिक-से अधिक भारतीयों को सिविल सेवाओं में भरती नहीं किया जायेगा।

कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में उमेशचन्द्र बनर्जी ने कहा- ‘मैं समझता हूँ कि यूरोप की तरह की शासन पद्धति की आकांक्षा रखना, कदापि राजद्रोह नहीं है। हमारी आकांक्षा केवल इतनी है कि शासन का आधार अधिक व्यापक हो और उसमें देशवासियों को समुचित तथा न्यायपूर्ण भाग मिले।’

1890 ई. के अधिवेशन में सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया कि देश के 95 प्रतिशत उत्तरदायित्व पूर्ण उच्च पदों पर यूरोपियनों का अधिकार है किंतु वे भारत के हित में नहीं सोचते हैं। उनका सारा चिंतन इस बात में निहित है कि ब्रिटिश शासन की नींव को और गहरा किया जाये।

अतः उदारवादियों ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स के 2 जून 1893 के उस प्रस्ताव को लागू करने की मांग की जिसके द्वारा भारत और इंग्लैण्ड में सिविल सेवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा का आयेाजन साथ-साथ किये जाने की व्यवस्था की गई थी। उन्होंने भारतीय सेवाओं के पुनर्गठन की मांग भी की। उन्होंने यह भी मांग की कि न्यायिक कार्य केवल उन्हीं व्यक्तियों को दिया जाये जो कानून के विशेषज्ञ हों।

(5.) भारत से धन निष्कासन रोकने की मांग

दादाभाई नौरोजी भारत में व्याप्त निर्धनता के लिए आवाज उठाने वाले प्रथम व्यक्ति थे। उन्होंने दो पुस्तकें- (1.) पावर्टी इन इण्डिया तथा (2.) पावर्टी ऐन अनब्रिटिश रूल इन इण्डिया लिखीं। उन्होंने भारत की निर्धनता के लिए अन्य विचारकों एवं आलोचकों द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों को, जिनमें भारत की निर्धनता के लिए भारत की बढ़ती हुई आबादी को दोषी ठहराया था, अमान्य सिद्ध किया। भारत की निर्धनता के लिए उन्होंने भारत की बढ़ती आबादी के स्थान पर अँग्रेजों की क्रूर आर्थिक शोषण की नीति को उत्तरदायी ठहराया।

धन निर्गम सिद्धान्त में उन्होंने लिखा कि विशेष रूप से चार मदों में इस देश की विपुल धन राशि ब्रिटिश हुकूमत की नहर प्रणाली से इंग्लिश चैनल तक पहुंच रही है- (1.) ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, (2.) भारत में सेना के व्यय के लिये ब्रिटेन के युद्ध विभाग को भुगतान (3.) भारत सरकार का ब्रिटेन में व्यय और (4.) भारत स्थित ब्रिटिश व्यावसायिक वर्ग द्वारा स्वदेश भेजी गई अपनी कमाई। 

भारत से जो पूँजी इंग्लैण्ड जाती थी उसके बदले में भारत को कुछ भी प्राप्त नहीं होता था। भारत से इंग्लैण्ड भेजा गया धन सार्वजनिक ऋण के रूप में पुनः भारत आता था जिसे चुकाने के लिए ब्याज देना पड़ता था। उदारवादियों ने मांग की कि देश का उत्पादन देश में ही रहे तथा भारत से धन-निष्कासन रोका जाये।

(6.) भारतीय उद्योगों को संरक्षण की मांग

उदारवादियों का मानना था कि भारत के तीव्र औद्योगीकरण में कई बाधाएँ हैं। जैसे- 1. स्वदेशी उद्योगों का ह्रास, 2. पूंजी की कमी, 3. तकनीकी शिक्षा का अभाव, 4. भारतीयों में उद्यम भावना की कमी और 5. मुक्त व्यापार की नीति। उदारवादी नेताओं ने इन बाधाओं को दूर करने तथा भारतीय उद्योगों को सरकारी प्रोत्साहन एवं सरंक्षण देने की मांग की। क्योंकि सरकारी सहायता के बिना भारत का औद्योगिक विकास सम्भव नहीं था और बिना औद्योगिक विकास के आर्थिक समृद्धि की कल्पना करना निरर्थक था।

जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे का कहना था- ‘भारत की गिरती हुई आर्थिक स्थिति का वास्तविक कारण भारत के घरेलू उद्योग-धन्धों का ह्रास तथा भारत की कृषि पर अत्यधिक निर्भरता है।’

नवीन उद्योगों की स्थापना तथा औद्योगिक उत्पादन की मात्रा में वृद्धि करके भारत की निर्धनता को दूर किया जा सकता था। रानाडे का यह भी मानना था कि अँग्रेजी शासन की विरोधी नीति इसके मार्ग में बाधक सिद्ध हो रही है। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था कि जब तक भारत के उद्योगों का उचित संरक्षण एवं संवर्धन नहीं होगा तब तक भारत आर्थिक दृष्टि से समृद्ध नहीं हो पायेगा।

उन्होंने बम्बई के कपड़ा उद्योग, बंगाल के जूट उद्योग, आसाम के चाय उद्योग तथा मध्य प्रदेश एवं दक्षिण भारत के कोयला एवं लोहा उद्योगों को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। वे फैक्ट्री नियमों को उत्पादन घटाने तथा उत्पादन मूल्य बढ़ाने वाले मानते थे। बनर्जी ने लंकाशायर के सूती कपड़ा उद्योगपतियों को भारत के सूती कपड़ा उद्योग को शिथिल करने का दोषी बताया।

(7.) श्रमिकों की दशा सुधारने की मांग

उदारवादी नेताओं ने श्रमिकों की स्थिति सुधारने की मांग की परन्तु इस विषय में अधिक उत्साह नहीं दिखाया। रानाडे, दादाभाई नौरोजी, जी. वी. जोशी, आर. सी. दत्त जैसे नेताओं ने भी श्रमिकों के प्रति कोई विशेष सहानुभूति प्रकट नहीं की। कांग्रेस के अधिवेशनों में भी श्रमिकों से सम्बन्धित प्रस्ताव पारित नहीं किये गये जबकि इस युग में भारतीय श्रमिकों की दशा शोचनीय थी। आगे चलकर लाला लाजपतराय ने इस विषय को पूरी शक्ति के साथ उठाया।

(8.) कृषि एवं कृषकों की दशा सुधारने की मांग

ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत कृषि एवं कृषक दोनों की दशा खराब होती जा रही थी। उदारवादी नेताओं का मानना था कि कठोरतापूर्वक किया गया कर निर्धारण और कर की ऊँची दर के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है। उन्होंने सरकार से भूमि कर में कमी करने तथा किसानों की स्थिति सुधारने के लिए पुराने ऋण माफ करने की मांग की।

उन्होंने जमींदारों के अधिकारों में कमी करने तथा किसानों को स्वतंत्र बनाने का सुझाव दिया ताकि किसान अपनी जमीन पर जी-तोड़ परिश्रम करके उत्पादन को बढ़ा सके।

कांग्रेस के चौथे अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करके कहा गया- ‘जमीन बन्दोबस्त के बदलते रहने से आम जनता परेशान और क्षुब्ध है। अतः प्रान्तीय कांग्रेस समितियाँ इस समस्या का अध्ययन करें और सुझावों सहित अपनी रिपोर्ट आगामी अधिवेशन में प्रस्तुत करें।’ इस प्रकार कांग्रेस के मंच से कृषि एवं कृषकों से सम्बन्धित समस्याएँ उठाई जाने लगीं।

(9.) अन्य माँगें

उदारवादी नेताओं ने नागरिक जीवन से सम्बन्धित अन्य समस्याओं पर भी प्रस्ताव पारित किये। इन प्रस्तावों में सिंचाई की उचित व्यवस्था, कृषि-बैकों की स्थापना, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन, भारत में सैनिक कॉलेज की स्थापना, प्रिवी कौंसिल में भारतीयों को प्रतिनिधित्व, पुलिस व्यवस्था में सुधार, विदेशों में रहने वाले भारतीयों की रक्षा आदि विषय सम्मिलित थे।

दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि लोगों ने शिक्षित बेरोजगारों की समस्या को उठाया। उनका कहना था कि भारत की निर्धनता; रोजगार के नये तरीकों के प्रयोग तथा अधिक रोजगार प्रदान करने से दूर हो सकती थी।

बनर्जी ने कहा था- ‘हमारी मांगों का प्रमुख लक्ष्य भारत में प्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना करवाना कहा जा सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख – उदारवादी नेतृत्व अथवा नरमपंथी कांग्रेस

कांग्रेस का उदारवादी नेतृत्व

उदारवादी नेतृत्व की सफलताएँ

उदारवादी नेतृत्व की सफलताएँ

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उदारवादी कांग्रेसी नेता फीरोजशाह मेहता

अनेक इतिहासकार नरमपंथी कांग्रेस के उदारवादी नेताओं को राजनीतिक याचक बताकर उनकी उपेक्षा करते हैं किंतु साम्रज्यशाही के उस काल में उदारवादी नेतृत्व की सफलताएँ असंदिग्ध रूप से उल्लेखनीय थीं।

उदारवादी नेताओं की रणनीति

कांग्रेस के उदारवादी नेताओं की रणनीति बहुत सरल, स्पष्ट और विनम्र संघर्ष की थी। उन्होंने सरकार के विरुद्ध कटु भाषा का प्रयोग किये बिना तथा सरकार को नाराज किये बिना, कांग्रेस अधिवेशनों में नागरिक अधिकारों की मांगों के सम्बन्ध में प्रस्ताव पारित किये तथा उन मांगों की पूर्ति के लिये सरकार पर विनम्र दबाव डाला।

(1.) जन साधारण से दूरी

उदारवादी नेताओं ने इस काल के राजनीतिक संघर्ष में जन-साधारण की भागीदारी को विशेष महत्त्व नहीं दिया तथा इसे केवल शिक्षित वर्गों तक सीमित रखा। गोपालकृष्ण गोखले का मानना था कि भारत का विशाल जनसमूह उदासीन, विभाजित, निर्धन और अज्ञानी है।

अन्य उदारवादी नेताओं का मानना था कि जब तक समाज के विभिन्न वर्गों को एक राष्ट्र के सूत्र में बाँध नहीं दिया जाता तब तक राष्ट्रीय आंदोलन नहीं चलाया जा सकता। जनसामान्य में राजनीतिक जागृति पैदा करके ही उन्हें राष्ट्रीय समस्याओं के निवारण के लिये आंदोलन का रास्ता दिखाया जा सकता है।

उनका विश्वास था कि राष्ट्रीय स्वतन्त्रता किसी क्रान्ति के फलस्वरूप नहीं अपितु विकास के फलस्वरूप प्राप्त होगी। अतः उनकी रणनीति धीरे-धीरे राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने और स्वायत्त शासन की ओर अग्रसर होने की थी। उनका मानना था कि सरकार पर नैतिक दबाव डालने, बातचीत करने, समझौते करने और रियायतें प्राप्त करने से राजनीतिक विकास सम्भव है।

(2.) सरकार से विनम्र अनुरोध

उदारवादी नेता संवैधानिक तरीकों में विश्वास रखते थे। इस कारण अपनी मांगें कानून की सीमा के अंतर्गत रखते थे। वे कांग्रेस के अधिवेशनों में पारित मांगों को समाचार पत्रों और भाषणों के माध्यम से जनसाधारण में प्रसारित करते थे और उनकी पूर्ति के लिये अत्यंत विनम्र भाषा में भारत सरकार एवं गृह-सरकार के समक्ष याचिकाएँ एवं स्मरण-पत्र प्रस्तुत करते थे।

उनकी भाषा इस प्रकार होती थी- ‘हम हमारी प्रिय लोकप्रिय सरकार से प्रार्थना करते हैं कि उपर्युक्त सुधारों को लागू करने की कृपा कर हमें अनुग्रहित करें।’

समय के साथ उदारवादी नेताओं की मांगों में वृद्धि होती रही किंतु इस काल में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलता, जब कांग्रेस द्वारा ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उग्र भाषा का प्रयोग किया गया हो। इन तरीकों से उदारवादियों ने ब्रिटिश सरकार पर दबाव डालने तथा ब्रिटिश जनता की सहानुभूति प्राप्त करने का प्रयास किया परन्तु वे राष्ट्रव्यापी आन्दोलन खड़ा नहीं कर सके।

(3.) इंग्लैण्ड में जनमत पक्ष में करने के प्रयास

इग्ंलैण्ड में कुछ अँग्रेज अधिकारियों और समाचार पत्रों ने कांग्रेस की छवि को विकृत करना आरम्भ किया। इस पर उदारवादी नेताओं ने इंग्लैण्ड में कांग्रेस की सही छवि प्रस्तुत करने और जनमत अपने पक्ष में करने का निश्चय किया। उन्होंने इंग्लैण्ड में अपने प्रचार-प्रसार को अधिक महत्त्व देना आरम्भ किया क्योंकि समस्त प्रकार के सुधारों को अततः ब्रिटिश संसद द्वारा ही लागू किया जाना था।

1887 ई. में दादाभाई नौरोजी ने लन्दन में भारतीय सुधार संघ की स्थापना की। इस अवसर पर उन्होंने कहा- ‘शासन का प्रमुख स्रोत इंग्लैण्ड में है, इसलिए इंग्लैण्ड में कांग्रेस द्वारा किये गये कोई भी वैधानिक प्रयत्न अधिक प्रभावशाली और लाभदायक होंगे।’

1888 ई. में उमेशचन्द्र बनर्जी तथा नार्टन इंग्लैण्ड गये और उन्होंने नौरोजी व भारत के पक्षधर चार्ल्स ब्रेडला की सहायता से एक भारतीय राजनैतिक एजेन्सी की स्थापना की जो बाद में ब्रिटिश कमेटी ऑफ इण्डियन नेशनल कांग्रेस में परिवर्तित हो गई। इसका मुख्यालय 25 क्रेवल स्ट्रीट, स्ट्रेण्ड पर खोला गया।

अनेक प्रतिष्ठित अँग्रेजों ने इसकी सदस्यता ग्रहण की। इसके अध्यक्ष वेडरबर्न और सचिव डिग्वी थे। इस संस्था के माध्यम से इंग्लैण्ड में भारतीय पक्ष का प्रचार-प्रसार हुआ। ब्रेडले ने इंग्लैण्ड के अनेक भागों में भारत के पक्ष में भाषण दिये। इससे इंग्लैण्ड के तटस्थ बुद्धिजीवियों में भारत के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण उत्पन्न हुआ।

इंग्लैण्ड में इण्डिया नामक एक पत्रिका आरम्भ की गई। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की समस्याओं को ब्रिटिश जनता के समक्ष रखना था। यह पत्रिका इंग्लैण्ड में काफी लोकप्रिय हुई और ब्रिटिश जनता में, भारत की समस्याओं के प्रति रुचि बढ़ी।

इसी समय दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश ससंद के सदस्य निर्वाचित हुए। 1893 ई. में भारतीय संसद समिति बनी जिसके प्रयत्नों से ब्रिटिश संसद ने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा भारत में भी आयोजित करने का प्रस्ताव पारित किया परन्तु इस पर अमल करने में बहुत विलम्ब किया गया।

उदारवादियों के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति

डॉ. आर. सी. मजूमदार के अनुसार कांग्रेस और इसके आन्दोलन के प्रति अँग्रेज सरकार का रुख प्रतिकूल रहा। नौकरशाही को भी इसके प्रति सहानुभूति नहीं थी और कुछ विशेष व्यक्तियों को छोड़कर सम्पूर्ण ब्रिटेन इसके विरुद्ध था।

डॉ. प्रसाद ने लिखा है- ‘नौकरशाही ने आरम्भ में तो कांग्रेस आन्दोलन का मजाक उड़ाया, फिर गाली-गलौच पर उतर आई और अन्त में सशक्त होकर इसके विरुद्ध दमन की नीति अपनाई।’

रैम्जे मेकडोनल्ड ने लिखा है- ‘राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति काफी सीमा तक सरकार की नीति पर निर्भर करती थी, जो आरम्भ में मैत्रीपूर्ण रही किन्तु बाद में घोर विरोध की हो गई।’

कांग्रेस की स्थापना वायसराय लॉर्ड डफरिन की स्वीकृति से हुई थी तथा इसकी स्थापना के पीछे सरकार का उद्देश्य राष्ट्रीय आन्दोलन के हिंसक मार्ग को संवैधानिक मार्ग की तरफ मोड़ना था। सरकार को विश्वास था कि कांग्रेस का नेतृत्व ऐसे सम्पन्न एवं आराम-पसन्द भारतीयों के हाथों में रहेगा जो न तो हिंसक मार्ग अपनायेंगे और न सरकार की कटु आलोचना करेंगे।

इस प्रकार कांग्रेस, सरकार द्वारा निर्देशित मार्ग पर चलती रहेगी। यही कारण है कि कांग्रेस के प्रथम तीन अधिवेशनों के अवसर पर सरकार की ओर से कांग्रेस के प्रतिनिधियों को चाय-पार्टियाँ दी गईं।

1988 ई. में ह्यूम और डफरिन के सम्बन्ध बिगड़ गये। इस कारण सरकारी नीति में परिवर्तन आ गया। अँग्रेज शासक, भारतीयों के समानता के दावे को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। 30 नवम्बर 1888 को लॉर्ड डफरिन ने अपने भाषण में कांग्रेस द्वारा की गई संसदीय सरकार की मांग की खिल्ली उड़ायी और कांग्रेस को एक सीमित वर्ग की संस्था कहा।

डफरिन ने सख्त शब्दों में कहा- ‘भारत के कुछ सुशिक्षित व मनीषी यह चाहते हैं कि सरकार लोकतांत्रिक हो, नौकरशाही उसके अधीन हो और उन्हें राष्ट्र के खजाने पर अधिकार मिल जाए और शनैः शनैः ब्रिटिश पदाधिकारी उनके सामने करबद्ध खड़े हों।’

डफरिन द्वारा इस प्रकार के विचार प्रकट किये जाने के बाद ब्रिटिश शासक कांग्रेस के विरोधी बन गये और उसके समाप्त होने की कामना करने लगे। सरकार ने कांग्रेस के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करना आरम्भ कर दिया। चौथा अधिवेशन 1888 ई. में दिसम्बर के अंतिम दिनों में इलाहाबाद में होना था।

वहाँ के गवर्नर ऑकलैण्ड कोलविन ने प्रयास किया कि उसके प्रांत में अधिवेशन के लिए पैसा एकत्र न हो, अधिवेशन के लिए कांग्रेस का प्रचार न होने पाए और अधिवेशन के लिए कांग्रेस को इलाहाबाद में कोई जगह न मिले। यदि महाराजा दरभंगा ने सहायता न की होती तो कांग्रेस को कोई स्थान नहीं मिल पाता।

महाराजा ने लोथर कैसल नामक भवन खरीद कर कांग्रेस के लिए दे दिया। सरकारी अधिकारियों ने लोगों पर दबाव डालना आरम्भ किया कि वे कांग्रेस के अधिवेशन में सम्मिलित न हों। मुसलमानों, देशी राजाओं तथा जमींदारों को कांग्रेस से दूर रखने का प्रयास किया गया। सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने पर रोक लगा दी।

भारत सचिव हेमिल्टन ने कांग्रेस को धन देने वालों पर निगरानी रखने का आदेश जारी कर दिया। कुछ प्रान्तों के गवर्नरों ने तो यह सुझाव भी दिया कि कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों पर रोक लगा दी जाये किन्तु यह सुझाव स्वीकार नहीं हुआ। 1895 ई. के बाद कांग्रेस के प्रति सरकार का दृष्टिकोण दिनों-दिन कठोर होता गया।

मुस्लिम नेता सर सैयद अहमद ने आरम्भ से ही कांग्रेस का विरोध किया था। उन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखने का अथक प्रयास किया। जब सरकार ने प्रारम्भ में कांग्रेस की सहायता की तो उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि यह सहायता बन्द की जाये।

सरकार को हिन्दू कांग्रेस की तरफ नहीं झुकना चाहिए। जब सरकार ने कांग्रेस विरोधी नीति पर चलना आरम्भ किया तो सर सैयद अहमद को अत्यधिक प्रसन्न्ता हुई और वे कांग्रेस की निन्दा तथा सरकार की प्रशंसा करने लगे।

कांग्रेस के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति में परिवर्तन के कारण

कांग्रेस के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति में केवल तीन सालों में ही आये बड़े परिवर्तन के पीछे कई कारण थे। इनमें से कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार से हैं-

(1.) कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में ह्यूम द्वारा आमंत्रित सदस्य ही आये थे जबकि बाद के अधिवेशनों में चुने हुए प्रतिनिधि आने लगे। इस कारण कांग्रेस ने संगठित राजनीतिक पार्टी का रूप लेना आरम्भ कर दिया था।

(2.) अभी तक कांग्रेस का विधान अस्तित्त्व में नहीं आया था, फिर भी वकील एसोसिएशन, शिक्षक एवं स्थानीय संस्थाओं के सदस्य अपने प्रतिनिधि चुनकर कांग्रेस के अधिवेशन में भेजते थे। इस प्रकार वे किसी न किसी रूप में चुने हुए प्रतिनिधि थे न कि आमंत्रित सदस्य।

(3.) कांग्रेस की लोकप्रियता में तेजी से वृद्धि हो रही थी। प्रथम अधिवेशन में केवल 72 आमंत्रित व्यक्तियों ने भाग लिया, दूसरे अधिवेशन में 431 ने और तीसरे में 607 चुने हुए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसकी बढ़ती लोकप्रियता से सरकार का सतर्क हो जाना स्वाभाविक ही था।

(4.) कांग्रेस का नेतृत्व बुर्जुआ विचारधारा के लोगों के हाथों में था जिनमें वकीलों की संख्या सर्वाधिक थी। पहले अधिवेशन में इनकी संख्या 39 थी, जो दूसरे अधिवेशन में बढ़कर 166 और तीसरे अधिवेशन में 206 हो गई थी।

(5.) भारतीय राजाओं, जमींदारों तथा तालुकेदारों की एक बड़ी संख्या कांग्रेस से जुड़कर इसकी सक्रिय सहायता कर रही थी। कांग्रेस के अधिवेशनों में इन लोगों के प्रतिनिधि भी पहुंच रहे थे। राजाओं, जमींदारों एवं तालुकेदारों ने कांग्रेस के अधिवेशनों को सफल बनाने के लिये विपुल धन दिया। महाराजा दरभंगा ने कई साल तक कांग्रेस को 10,000 रुपये प्रति वर्ष दिये। विजयनगरम के महाराजा भी नियमित रूप से कांग्रेस को रुपया देते थे। यह वर्ग ब्रिटिश शासन का आधार स्तम्भ था किंतु कांग्रेस के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित कर रहा था इस कारण सरकार का उद्विग्न हो जाना स्वाभाविक था।

(6.) कांग्रेस का नेतृत्व यद्यपि बुद्धिजीवी नेताओं के हाथों में था तथापि 1987 से ही कांग्रेस में निम्न मध्यम वर्ग और रैयत का घुसना आरम्भ हो गया। इस कारण दूर स्थानों से आये प्रतिनिधियों के भाषणों में देशी भाषा का प्रयोग होने लगा। इससे गोरी सरकार, कांग्रेस को संदेह की दृष्टि से देखने लगी।

(7.) ब्रिटिश शासक जिन लोगों को नहीं चाहते थे, वेे भी कांग्रेस के अन्दर घुस आये और ब्रिटिश शासक कांग्रेस को जिस रास्ते पर ले जाना चाहते थे, कांग्रेस ने उसका उल्टा रास्ता पकड़ लिया था।

मद्रास अधिवेशन के बाद डफरिन और अन्य ब्रिटिश अधिकारी, कांग्रेस के विरुद्ध हो गए।

अयोध्यासिंह ने लिखा है- ‘कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने के लिए वे अपने वफादार चाकरों और खैरख्वाहों को लेकर उस पर टूट पड़े। एक तरफ वायसराय डफरिन और पश्चिमोत्तर प्रदेश के गवर्नर कोलविन ने, दूसरी तरफ बनारस के राजा और हैदराबाद के नवाब ने, तीसरी तरफ सर सैयद अहमद और राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद ने, चौथी तरफ ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन ने तथा पांचवी तरफ सर दिनशा मानकजी पेटिट और अन्य धनी पारसियों ने आक्रमण किये। ब्रिटिश नौकरशाही ने मुसलमानों और पारसियों को, हिन्दुओं के एक बड़े हिस्से को, जमींदारों और धनी-मानी व्यक्तियों को कांग्रेस से अलग कर देने और उसका दुश्मन बना देने की कोशिश की।’

उदारवादी नेता सरकार को नाराज नहीं करना चाहते थे। सरकार की इस नाराजगी को उन्होंने चुपचाप सहन कर लिया और वे अविचलित भाव से अपना काम करते रहे।

उदारवादी नेतृत्व की सफलताएँ

उदारवादी नेतओं की कार्यविधि चाहे जो भी रही हो किंतु उनकी उपलब्धियाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण थीं-

(1.) संवैधानिक विकास में योगदान

उदारवादी आन्दोलन का भारत के संवैधानिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। कांग्रेस ने ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के शासन की जाँच करवाने में सफलता प्राप्त की। 1897 ई. का वेल्वी कमीशन, जिसने भारत सरकार के खर्चों की जांच की, उदारवादियों के प्रयत्नों का ही परिणाम था।

कांग्रेस के प्रचार ने सरकार की निरंकुशता को कम किया। उन्हीं के प्रयत्नों के फलस्वरूप 1892 ई. का परिषद् अधिनियम पारित हो पाया। यह अधिनियम राष्ट्रीयता के युद्ध में भारतीयों की प्रथम विजय थी। इस अधिनियम से शासन की निरंकुशता में थोड़ी-बहुत कमी अवश्य आई।

इसके द्वारा केन्द्रीय व्यवस्थापिका तथा प्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं की सदस्य संख्या में वृद्धि की गई। पहली बार बजट पर बहस करने और प्रश्न पूछने का अधिकार मिला। अप्रत्यक्ष चुनाव की प्रथा प्रारम्भ हुई। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का मानना था कि इस अधिनियम के द्वारा भारत में प्रतिनिधि शासन की नींव डाली गई।

उदारवादियों ने सरकार के कुछ प्रतिक्रियावादी कानूनों का सफलतापूर्वक विरोध किया। 1890 ई. में बंगाल सरकार ने अपने अधिकारियों को कांग्रेस अधिवेशन में दर्शक के रूप में भाग नहीं लेने का आदेश दिया। उदारवादियों ने इसकी घोर निन्दा करके इसे रद्द करवाया।

1894 ई. में केन्द्रीय सरकार ने 1879 ई. के लीगल प्रेक्टिशनर एक्ट में संशोधन करने के लिए व्यवस्थापिका सभा में एक विधेयक प्रस्तुत किया। इस संशोधन से वकीलों को जिलाधीशों तथा रेवेन्यू कमिश्नरों के अधीन रहकर काम करना पड़ता और राजनीतिक क्षेत्र में स्वतन्त्रापूर्वक कार्य करने पर भी रोक लग जाती।

इस विधेयक का मूल उद्देश्य कांग्रेस में सम्मिलित वकीलों को नियंत्रित करना था। उदारवादियों ने इस विधेयक का भरपूर विरोध किया जिससे सरकार ने विधेयक वापस ले लिया। कुछ विद्वान् 1909 के अधिनियम को भी उदारवादियों की उपलब्धि मानते हैं। इसका प्रारूप गोखले तथा अन्य भारतीय नेताओं की सलाह से तैयार किया गया था। 

(2.) प्रमुख अँग्रेजों से सहानुभूति का अर्जन

उदारवादियों के वैधानिक आन्दोलन एवं उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप ब्रिटिश जनता का ध्यान भारतीय राजनीतिक समस्याओं की ओर आकृष्ट हुआ और ब्रिटिश संसद के कुछ सदस्यों ने राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति सहानुभूति प्रकट की। मजदूर दल के नेता चार्ल्स ब्रेडला ने खुले रूप से हिन्दुस्तानी सदस्य की उपाधि धारण की।

अनेक अँग्रेज नेताओं ने भी अपने लेखों के माध्यम से इंग्लैण्ड की जनता का ध्यान भारतीय राजनीतिक मांगों की ओर आकर्षित किया। 1893 ई. में ब्रिटिश संसद के सर विलियम वेडरबर्न, डब्ल्यू. एम. केन. आदि सदस्यों ने एक भारतीय संसदीय समिति की स्थापना की।

इस समिति का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश संसद में भारत के राजनीतिक सुधारों के प्रश्नों पर हलचल उत्पन्न करना था। भारतीय कांग्रेस इस समिति को भारतीय समस्याओं की जानकारी देती थी। इस प्रकार, उदारवादियों ने अँग्रेज नेताओं की जो सहानुभूति प्राप्त की उसके फलस्वरूप इंग्लैण्ड में राष्ट्रीय आन्दोलन के विरुद्ध किये जाने वाले प्रचार को अप्रभावी बनाने में सहायता मिली।

(3.) राष्ट्रीय आन्दोलन की शुरुआत

उदारवादी नेताओं ने राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत की। यद्यपि वे जन साधारण के बीच जाकर काम नहीं करते थे तब भी समाचार पत्रों में छपने वाली रिपोर्र्टों के कारण कांग्रेस के कार्यक्रमों में रुचि लेने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ने लगी। देश भर में कांग्रेस के कार्यों की प्रशंसा होने लगी।

कांग्रेस के उन दिनों के नेता ही भारतीय राष्ट्रीयता के जनक माने जाते हैं। भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जगाने का श्रेय उन्हीं को था। अब आम आदमी भी सरकार के कार्यों पर ध्यान रखने लगा। 1901 से 1905 ई. के दौरान सरकार के विरुद्ध प्रबल विरोध उठ खड़ा हुआ। इस कारण कांग्रेस का राष्ट्रीय आन्दोलन विस्तृत होकर जन-आन्दोलन में बदल गया।

(4.) भारतीयों को राजनीतिक सूझबूझ की शिक्षा

उदारवादी नेतृत्व ने भारतीयों को राजनीतिक शिक्षा प्रदान की तथा भारतीयों में लोकतन्त्र के प्रति रुचि उत्पन्न की। दिसम्बर के अन्तिम दिनों में कांग्रेस प्रतिवर्ष अपना अधिवेशन करती थी जिसमें विभिन्न प्रान्तों के शिक्षित एवं राजनीतिक काम में रुचि रखने वाले लोग आते थे।

ये लोग राष्ट्रीय महत्त्व के प्रश्नों पर विचार-विमर्श करते थे और अपने दृष्टिकोण को विनीत, तर्कयुक्त एवं राजभक्ति पूर्ण भाषा में लिखे हुए प्रस्तावों द्वारा व्यक्त करते थे। समाचार पत्रों में इन प्रस्तावों को और प्रस्तावों से सम्बन्धित नेताओं के व्याख्यानों को प्रकाशित किया जाता था तथा उन पर सम्पादकीय टिप्पणियाँ भी लिखी जाती थीं।

हजारों भारतीय इन लेखों तथा टिप्पणियों को पढ़ते थे और अपने स्तर पर विचार-विमर्श करते थे। इस प्रकार, कांग्रेस ने भारतीयों को राजनीतिक शिक्षा एवं सूझबूझ प्रदान की।

(5.) ब्रिटिश शासन के दोषों का खुलासा

उदारवादियों की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि उन्होंने भारतीय जनता को ब्रिटिश शासन के दोषों से अवगत कराया। उन्होंने साम्राज्यवादियों द्वारा किये जा रहे शोषण तथा ब्रिटिश नौकरशाही के काम करने के तरीकों की खुलकर आलोचना की। इस प्रकार कांग्रेस ने सरकार की आलोचना करने तथा भारतीयों की मांगों को प्रकाश में लाने के लिए मंच प्रदान किया। इस कारण लॉर्ड डफरिन तथा अन्य ब्रिटिश अधिकारी कांग्रेस के विरोधी हो गये। उदारवादियों के सीमित क्रिया-कलापों के उपरान्त भी भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन का विरोध बढ़ता ही गया।

(6.) राष्ट्रीयता का प्रसार

उदारवादियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन की नींव को मजबूत किया जिससे जन साधारण में राष्ट्रीयता का प्रसार हुआ। कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन से ही इसमें राष्ट्रगीत गाया जाने लगा। इसकी कुछ पंक्तियां वंदेमातरम से ली गई थीं। इसके बाद हर अधिवेशन में राष्ट्रगीत गायन की परम्परा बन गई। उदारवादी नेताओं ने कांग्रेस को नौकरशाही के क्रूर हाथों से बचाकर भविष्य के लिए उसकी जड़ें इतनी गहरी कर दीं कि बाद में नौकरशाही तो क्या स्वयं इंग्लैण्ड की सरकार भी कांग्रेस को नष्ट नहीं कर सकी।

सर हेनरी कॉटन ने कहा था- ‘इस संगठन के नेता देश में एक शक्ति बन गए हैं जिनकी आवाज देश के एक कोने से दूसरे कोने तक निनादित होती है।’

इस काल में कांग्रेस द्वारा किये गये कार्यों का लाभ भारत की आजादी तक होता रहा। कन्हैयालाल माणिकलाल मुन्शी ने लिखा है- ‘यदि पिछले तीस वर्षों में कांग्रेस के रूप में एक अखिल भारतीय संस्था, राजनैतिक क्षेत्र में कार्यरत न रहती तो सम्भवतः गांधीजी का कोई आन्दोलन सफल नहीं होता और न ही सरदार पटेल की अध्यक्षता में कांग्रेस इतनी कुशल यंत्र प्रमाणित होती।’

पट्टाभि सीतारमैया ने लिखा है- ‘उन्होंने ही (नींव में दबे हुए ईंट-गारे की तरह) औपनिवेशिक स्वशासन, साम्राज्य के अन्तर्गत गृह-शासन, स्वराज्य तथा सबसे ऊपर पूर्ण स्वतन्त्रता की मंजिलों वाले ऊपर के ढांचे के निर्माण को सम्भव बनाया।’

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि उदारवादी नेतृत्व की सफलताएँ उल्लेखनीय थीं।

उदारवादी नेतृत्व की आलोचना

(1.) नेताओं में त्याग की कमी

उदारवादी नेताओं ने जो साधन अपनाये उन्हें राजनीतिक भिक्षावृत्ति कहकर उनकी आलोचना की जाती है। गुरुमुख निहालसिंह ने लिखा है- ‘सम्भवतः गोखले को छोड़कर कांग्रेस के उदार नेता व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लिए त्याग करने तथा कष्ट सहने को तैयार नहीं थे। इसलिए वे भारत के लिए शासन-सुधारों की भीख मांगना ही पसन्द करते थे, उनके लिए मांग करना नहीं।’

डॉ. पुरुषोत्तम नागर ने लिखा है- ‘उदारवादियों ने भारत के ब्रिटिश शासकों को प्रसन्न रखते हुए उनकी दयालुता एवं न्यायप्रियता की दुहाई देकर स्वशासन की ओर बढ़ने का प्रयत्न किया। साहस एवं कष्ट सहन करने की क्षमता आदि के अभाव के कारण कारावास का जीवन उनके लिए असह्य था। वे अपने पद, व्यवसाय तथा सामाजिक स्तर को अक्षुण्ण रखते हुए भारत में स्वराज्य की स्थापना का स्वप्न देखते थे।’

एक अन्य इतिहासकार ने उदारवादियों की आलोचना करते हुए लिखा है- ‘गांधी पूर्व युग के कॉलर-टाई धारी राष्ट्रवादी, शहरों में लेक्चर देते थे जहाँ कार उन्हें लेने पहुंचती थी और जहाँ टी तथा टिफिन उनके लिये तैयार रहता था। वे क्रिसमस की छुट्टियों में वार्षिक बैठकें करते थे, ब्रिटिश राज के शुभाशीषों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते थे, भारतीयों के लिये कुछ दुख दर्द रखते थे। बर्क और ग्लड्स्टन को उद्धृत करते थे, हिज मेजस्टी के स्वास्थ्य की कामना करते थे तथा पुनः स्वास्थ्यप्रद मौसम के आगमन तक विसर्जित हो जाते थे….।’

(2.) मनोवृत्ति के सम्बन्ध में आलोचना

उदारवादी नेता, ब्रिटिश शासकों की न्यायप्रियता में विश्वास जताते थे। उनका मानना था कि प्रजातन्त्र के समर्थक अँग्रेज, भारत के लिए भी इंग्लैण्ड जैसी व्यवस्था का समर्थन करेंगे। 1895 ई. में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा- ‘इंग्लैण्ड से हमें प्रेरणा और पथ-प्रदर्शन की आशा है…….इंग्लैण्ड से वह महान् आदेश आएगा जिससे हमारी जनता को मताधिकार मिलेगा। इंग्लैण्ड हमारा राजनीतिक नेता है।’

उदारवादियों ने भारतीयों की इंग्लैण्ड के प्रति वफादारी और उनकी देशभक्ति के बीच गहरा सम्बन्ध स्थापित करने में कभी असुविधा अनुभव नहीं की। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने लिखा है- ‘हमारा यह पक्का विश्वास है कि केवल ब्रिटिश सरकार के माध्यम से ही उन राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त किया जा सकता है जिनकी तीव्र अभिलाषा अँग्रेजी शिक्षा और अँग्रेजी शासन ने हम से की है।’

तत्कालीन उदारवादी नेताओं का ऐसा विश्वास उनकी गम्भीर भूल समझी जाती है। क्योंकि अँग्रेजों ने उदारवादियों के प्रस्तावों और प्रार्थना पत्रों पर कभी ढंग से ध्यान नहीं दिया। उदारवादी नेता, भारत और ब्रिटिश हितों को एक समझते थे जबकि वास्तविकता यह थी कि अँग्रेज भारत को अपना एक उपनिवेश मात्र समझते थे।

(3.) राजनीतिक सुधारों की प्राप्ति नहीं

उदारवादी प्रतिवर्ष अपने प्रस्तावों एवं याचिकाओं के माध्यम से राजनीतिक सुधारों की मांग करते रहे परन्तु विदेशी शासन से राजनीतिक सुधारों की मांग का नतीजा निराशा जनक रहा। भारत में पनपने वाले क्रान्तिकारी असन्तोष के लिए ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को सेफटी वाल्व की भांति प्रयोग किया और प्रारम्भिक वर्षों में कांग्रेस के प्रति नरम रुख अपनाया परन्तु जब कांग्रेस, सरकार की इच्छानुसार कार्य न कर सकी तो सरकार ने कांग्रेस-विरोधी रुख अपना लिया।

उदारवादियों की यह धारणा नितान्त मिथ्या थी कि राजनीतिक सुधारों के विषय में कांग्रेस ने सरकार को निर्देश देने का साहस किया। क्योंकि सरकार ने उसके सुझावों को मानने से इन्कार कर दिया। उदारवादी राजनीतिक सुधारों की प्राप्ति में असफल रहे।

(4.) आम जनता का सहयोग नहीं

प्रायः यह कहा जाता है कि उदारवादी नेता अपने आन्दोलन को जन-आन्दोलन नहीं बना पाये। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन का सामाजिक आधार केवल शहरी शिक्षित वर्ग तक ही सीमित था। शहरी शिक्षित वर्ग में भी वकील, डॉक्टर, पत्रकार, अध्यापक, कुछ व्यापारी तथा कुछ भूमिपति कांग्रेस के आंदोलन से जुड़ पाये।

अधिकांश औद्योगिक, व्यापारिक, पूँजीपति तथा जमींदार आदि प्रभावशाली लोग कांग्रेस के आंदोलन से दूर थे। इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन का कार्य उच्च मध्य वर्ग अथवा शिक्षित अभिजात्य वर्ग के हाथों में था जिनका आम जनता की राजनीतिक समझ में बहुत कम विश्वास था।

उनका मत था कि जन साधारण में राजनीतिक संघर्ष करने के लिये आवश्यक शक्ति एवं चारित्रिक दृढ़ता का अभाव है। इस दृष्टिकोण के कारण उदारवादी नेताओं की कार्यप्रणाली बहुत सुस्त रही। उनका मानना था कि अभी वह समय नहीं आया था जब भारतीय जनता विदेशी शासन को चुनौती दे सके।

उदारवादी आंदोलन का मूल्यांकन

कुछ लोगों के मतानुसार राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में प्रारम्भिक उदारवादी नेताओं का काल सबसे कम महत्त्वपूर्ण रहा क्योंकि उस काल के कार्यक्रमों में वह क्रियाशीलता दिखाई नहीं देती जो राष्ट्रीय आन्दोलन में होनी चाहिए।

लाला लाजपतराय ने लिखा है- ‘राष्ट्रीय आन्दोलन के तत्त्वों की कमी थी, वह एक ऐसा रुक-रुक कर चलने वाला आन्दोलन था जो उसी वर्ग की सहानुभूति एवं सद्भावना पर निर्भर था, जिसके विरुद्ध यह चलाया गया था। यह आन्दोलन जनता द्वारा न तो संयोजित था और न उसके द्वारा अनुप्राणित था।’

वस्तुतः ऐसा कहना उचित नहीं है उस काल की कांग्रेस में राष्ट्रीय आंदोलन के तत्त्वों की कमी थी। कांग्रेस की स्थापना, 1857 की क्रांति के केवल 28 वर्ष बाद हुई थी। उस समय सरकार फूंक-फूंक कर कदम रख रही थी और उसे ऐसी सूचनाएँ मिल रही थीं कि यदि भारतीय जनता के गुस्से को निकलने के लिये सुरक्षा नली नहीं दी गई तो वह ज्वाला के रूप में फटेगा।

कांग्रेस की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी। फिर भी अपनी स्थापना के तीन वर्ष के भीतर ही कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार के मार्गदर्शन से मुक्ति पा ली और भारतीयों के अधिकारों के विरुद्ध भारत तथा इंग्लैण्ड में अच्छा-खासा जनमत जगा लिया। यह उसकी बहुत बड़ी सफलता थी। यदि कांग्रेस गोरी सरकार के विरुद्ध उग्र आंदोलन करती तो निश्चय ही गोरी सरकार उसे कुचल कर समाप्त कर देती।

कांग्रेस के लिये यह बिल्कुल भी उचित नहीं होता क्योंकि अभी भारत में उसका जनाधार न के बराबर था। ऐसी पस्थितियों में इस काल के नेताओं ने राष्ट्रीय आन्दोलन की दृढ़ नींव डाली और ऐसे मार्ग का निर्माण किया जिस पर चलकर आजादी प्राप्त की गई। उन्होंने जीवन के प्रति वैज्ञानिक पद्धति को अपनाने पर बल दिया तथा सामाजिक समानता के आधार पर भारतीय समाज के पुनर्निर्माण पर बल दिया।

1897 ई. में सी. शंकर नायर ने उदारवादियों के विचारों का सार प्रस्तुत करते हुए कहा- ‘हम अपनी प्रणाली की उन सब बुराइयों को दूर करना चाहते हैं, जो हमारी उन्नति के मार्ग में बाधक हैं, उन पाश्चात्य सभ्यता के गुणों को अपनाना चाहते हैं जो हमारे लिए गुणकारी हैं और यह तब तक असम्भव है जब तक कोई सरकार पुराने ढांचे की सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहे……. हमें धर्मनिरपेक्ष सरकार की आवश्यकता है जो उदारवादी विचारों के माध्यम से उन्नति में सहायक हो।’

गुरुमुख निहालसिंह ने लिखा है- ‘उस समय की कांग्रेस राजभक्ति प्रदर्शित करती थी। उसकी संकुचित नीति नरमदली थी और उसकी भाषा निवेदनात्मक ही नहीं वरन् याचनापूर्ण थी; तथापि उसने उस युग में भारतवासियों  में राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न करने; उन्हें एकसूत्र में बांधने और उनमें राष्ट्रीय एवं राजनीतिक जागृति फैलाने के लिए महत्त्वपूर्ण तथा मौलिक काम किया था।’

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उदारवादियों ने याचक रहते हुए भी भारतीयों के लिये प्रतिनिधि संस्थाओं में अधिकाधिक प्रतिनिधित्व देने, विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने, प्रेस को स्वतन्त्रता देने तथा उच्च प्रशासनिक पदों पर भारतीयों को भी समान रूप से नियुक्ति देने के लिये सरकार पर दबाव बनाया।

उदारवादी नेताओं ने आर्थिक विकास के प्रति राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कराधान की एक न्यायसंगत पद्धति अपनाने की वकालत की जिसके अन्तर्गत जनता भुगतान कर सकने में समर्थ हो सके।

उन्होंने औद्योगीकरण पर बल दिया, जिससे राष्ट्रीय आय के साधनों में वृद्धि हो सके और बेरोजगारों को काम मिल सके परन्तु उदारवादियों ने किसानों और श्रमिकों के हितों की तरफ विशेष ध्यान नहीं दिया। फिर भी उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि उदारवादी नेतृत्व की सफलताएँ उल्लेखनीय थीं। सरहानीय थीं और देश की आजादी की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हुईं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख – उदारवादी नेतृत्व अथवा नरमपंथी कांग्रेस

कांग्रेस का उदारवादी नेतृत्व

उदारवादी नेतृत्व की सफलताएँ

कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व

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कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व - लाल, बाल और पाल

कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व उदारवादी नेताओं की रीति-नीति की प्रतिक्रया के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ था। उग्रराष्ट्रवादी नेता अंग्रेजों के समक्ष अनुनय-विनय करने को उचित नहीं मानते थे।

भारत में उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा, कांग्रेस के जन्म से बहुत पहले जन्म ले चुकी थी। 1857 ई. की क्रांति उसी की अभिव्यक्ति थी। पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र तथा बंकिमचंद्र चटर्जी ने उग्र राष्ट्रवाद के लिये आधार भूमि तैयार की क्योंकि उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन के चेहरे पर हिन्दू लक्षण बहुत स्पष्ट था।

कांग्रेस के उदारवादी नेता ब्रिटिश सरकार से विधान सभाओं में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि, भारत सचिव की कौंसिल में भारतीयों की नियुक्ति, सरकारी नौकरियों में भारतीयों को अँग्रेजों के समान अवसर, भू-राजस्व की दर में कमी, भारतीय उद्योगों को सरंक्षण आदि मांगें करते रहे किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इन मांगों पर बहुत कम ध्यान दिया।

इससे कुछ युवा कांग्रेसी नेताओं का वह भ्रम टूट गया कि इंग्लैण्ड की सरकार भारत में भारतीयों के लिये भी वैसी ही व्यवस्था करेगी जैसी कि अँग्रेजों के लिये इंग्लैण्ड में थी। उदारवादी नेता गोपालकृष्ण गोखले ने स्वीकार किया कि सरकार अपने वचनों का पालन नहीं कर रही थी और जो वायदे उसने किये थे, उनसे पीछे हट रही थी।

उग्र राष्ट्रवादियों का उदय

ब्रिटिश सरकार द्वारा उदारवादी नेताओं की मांगों पर ध्यान न दिये जाने के कारण कांग्रेस में युवा नेताओं का एक नया गुट उभर कर सामने आया जिसने संघर्ष के माध्यम से सरकार पर दबाव डालने का निश्चय किया। अँग्रेज लेखकों ने इस नवीन नेतृत्व को उग्र राष्ट्रीयता, उग्रवादी तथा गरम दल नेता कहा।

उनके द्वारा चलाये गये आंदोलन को उग्र राष्ट्रवाद, उग्रवाद तथा रेडिकल नेशनलिस्ट मूवमेंट कहा जाता है। इन युवा उग्रवादी नेताओं ने वृद्ध एवं उदारवादी नेताओं का विरोध किया जो अँग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास रखते थे और आवेदन-निवेदन, तथा स्मरण-पत्रों के माध्यम से भारतीयों को राजनीतिक अधिकार दिलवाना चाहते थे।

उग्र राष्ट्रवादियों को उदारवादियों की भिक्षावृत्ति की शैली पसन्द नहीं आई। वे उग्र जन-आन्दोलन के माध्यम से भारतीयों के लिये राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के लिए अधीर थे।

कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व

उग्रवादी नेताओं का मानना था कि कमजोर विरोध तथा अस्थिर वैधानिक सुधारों से भारत की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। उस काल में कतिपय प्रमुख उग्र राष्ट्रवादी नेता इस प्रकार से थे-

बालगंगाधर तिलक

कांग्रेस में उग्रराष्ट्रवाद के जनक बाल गंगाधर तिलक थे। वे कांग्रेस के जन्म से पूर्व ही उग्र राष्ट्रवाद का दीप प्रज्वलित कर चुके थे। 1882 ई. में बाल गंगाधर तिलक ने कोल्हापुर के राजा का, वहाँ के ब्रिटिश रेजीडेण्ट के विरुद्ध समर्थन करते हुए, केसरी में तथ्यों का प्रकाशन किया। इस कार्य के लिये तिलक को 4 माह की सजा हुई।

1896 ई. में बालगंगाधर तिलक ने कांग्रेस के मंच से कहा- ‘गत 12 वर्षों से हम चिल्ला रहे है कि शासन हमारी बातों को सुने किन्तु सरकार हमारी आवाज को नहीं सुनती, बन्दूक की आवाज को सुनती है। हमारे शासकों ने हमारे ऊपर अविश्वास किया है। अब हमें अधिक शक्तिशाली संवैधानिक साधनों के आधार पर अपनी बात उन्हें सुनानी चाहिए।’

 1897 ई. में तिलक ने कमिश्नर रैण्ड की हत्या को न्याय-संगत ठहराते हुए एक लेख लिखा। इसके लिये उन्हें 18 माह की सजा हुई। 1899 ई. में बम्बई के गवर्नर सैण्डहर्स्ट ने प्लेग ग्रस्त महाराष्ट्र की जनता पर आतंकपूर्ण कार्यवाही की। तिलक ने 1899 ई. के लखनऊ अधिवेशन में सैण्डहर्स्ट के विरुद्ध प्रस्ताव रखा किंतु उदारवादियों के दबाव में उन्हें वह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

इस प्रकार 19वीं सदी के अंतिम दशक में तिलक की अगुवाई में कांग्रेस में उग्र राष्ट्रवाद का प्रवेश हुआ। तिलक का कहना था कि हर हाल में विदेशी राज का विरोध करो।

तिलक का आदर्श था- ‘दूसरों की सेवा और स्वयं के लिये कष्ट।’ वे गांव की चौपाल पर बैठकर बात करते थे। वे पिटीशिन (याचिका) की बजाये प्रोटेस्ट (विरोध) करने में विश्वास करते थे।

तिलक ने स्पष्ट घोषणा की- ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे……. स्वराज्य क बिना कोई सामाजिक सुधार नहीं हो सकते, न कोई औद्योगिक प्रगति, न कोई उपयोगी शिक्षा और न ही राष्ट्रीय जीवन की परिपूर्णता। यही हम चाहते हैं और इसी के लिये ईश्वर ने मुझे इस संसार में भेजा है।’

यही कारण है कि ब्रिटिश पत्रकार वेलेंटाइन शिरोल ने तिलक को फादर ऑफ इण्डियन अनरेस्ट (भारतीय असन्तोष का जनक) कहा है। कांग्रेस में गरम दल की स्थापना का श्रेय तिलक को ही है।

महर्षि अरविंद घोष

यदि तिलक भारतीय असंतोष के जनक थे तो अरविंद हिन्दू धर्म के राष्ट्रीयकरण के शिल्पी थे। अगस्त 1893 में अरविन्द घोष ने न्यू लैम्प्स फॉर ओल्ड (पुरानों के स्थान पर नये दीप) शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने विचार प्रकट किया कि विरोध-पत्रों, प्रार्थना-पत्रों और स्मृति-पत्रों से देश कभी स्वतन्त्र नहीं हो सकता।

अपने वन्देमातरम् नामक पत्र में उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कार्य करने और संघर्ष करने के लिए एक कार्यक्रम बनाया। इस कार्यक्रम में उन्होंने भारतीयों को स्वदेशी, असहयोग, राष्ट्रभाषा और बहिष्कार का मन्त्र दिया।

अरविंद घोष ने भारतीयों को स्पष्ट मार्ग दिखाते हुए कहा- ‘स्वतंत्रता हमारे जीवन का उद्देश्य है। हिन्दू धर्म ही हमारे इस उद्देश्य की पूर्ति करेगा। राष्ट्रीयता एक धर्म है और ईश्वर की देन है….. भारत पुनः एक गुरु और मार्ग दर्शक के रूप में अपनी भूमिका निभाए, लोगों की आत्ममुक्ति हो ताकि राजनीतिक जीवन में वेदान्त के आदर्श प्राप्त किये जा सकें। यही भारत के लिये सच्चा स्वराज्य होगा। 1905 ई. में जब बंगभंग आंदोलन चला तो अरविंद ने घोषित किया कि राष्ट्रवाद कभी मर नहीं सकता क्योंकि यह ईश्वर ही है जो बंगाल में कार्य कर रहा है, ईश्वर को कभी मारा नहीं जा सकता, ईश्वर को जेल नहीं भेजा जा सकता।’

लाला लाजपतराय

उग्रवादी आंदोलन के प्रमुख नेता लाला लाजपतराय को पंजाब केसरी तथा शेरे-पंजाब कहा जाता था। उन्होंने पंजाबी तथा वन्देमातरम् नामक दैनिक समाचार पत्रों का प्रकाशन किया। वे आर्यसमाज के प्रबल समर्थक थे। 1902 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया। उन्हें सरदार अजीतसिंह के साथ मिलकर कोलोनाइजेशन बिल के खिलाफ आंदोलन चलाने के अपराध में बर्मा की माण्डले जेल में बंद किया गया।

उनका कहना था– ‘जैसे दास की आत्मा नहीं होती उसी प्रकार दास जाति की कोई आत्मा नहीं होती। आत्मा के बिना मनुष्य निरा पशु है इसलिये एक देश के लिये स्वराज्य परम आवश्यक है और सुधार अथवा उत्तम राज्य इसके विकल्प नहीं हो सकते।’ 

विपिनचंद्र पाल

विपिनचंद्र पाल; लाल (लाला लाजपतराय), बाल (बालगंगाधर तिलक) और पाल (विपिनचंद्र पाल) की उग्रवादी तिकड़ी (बिग थ्री) में थे। उनका कहना था- ‘देश को रिफॉर्म (सुधार) की नहीं अपितु री-फार्म (फिर से निर्माण) की आवश्यकता है….. अँग्रेजों को अपनी इच्छा से कर लगाने और उसे खर्च करने का अधिकार छोड़ना होगा।’

अन्य बड़े नेता: उदारवादी नेताओं की नीतियों की आलोचना करने वालों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विवेकानन्द और लाला मुंशीराम  भी थे।

फरवरी 1902 में स्वामी विवेकानन्द ने स्वामी अखण्डानन्द को एक पत्र लिखकर उनसे पूछा- ‘भयंकर अकाल, बाढ़, बीमारी और महामारी के इन दिनों में बताइए कि आपके कांग्रेसी लोग कहाँ हैं? क्या सिर्फ यही कहने से काम चलेगा कि देश की सरकार हमारे हाथ में सौंप दीजिए? और उनकी बात सुनता भी कौन है ? अगर कोई आदमी काम करता है तो क्या उसे किसी चीज के लिए मुँह खोलना पड़ता है?’

इस प्रकार, कांग्रेस में उग्र राष्ट्रीयता की भावना पनपने लगी। कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व बाल, पाल, लाल, तथा अरविंद की चतुष्टयी (फोर बिग) और उनके अनुयायी, भारतीयों की शक्ति को संगठित करके ब्रिटिश सरकार पर इतना दबाव डालना चाहते थे कि सरकार उनकी मांगों को ठुकरा न सके और भारतीयों को उनका देश सौंप दे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन – गरमपंथी कांग्रेस

कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के कारण

बंग-भंग आंदोलन

सूरत की फूट

उग्रवादी नेतृत्व की कार्यशैली

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व का मूल्यांकन

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के कारण

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उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति - www.bharatkaitihas.com
प्रमुख उग्रराष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के कारण कांग्रेस की स्थापना के बाद उदारवादी नेताओं द्वारा अपनाई गई रीति-नीति में छिपे हैं। वस्तुतः उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के बाद ही कांग्रेस सही अर्थों में एक राजनीतिक दल का स्वरूप ले सकी।

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के कारण

कांग्रेस में उग्रवादी नेतृत्व के उदय के कारणों को मोटे तौर पर दो भागों में रखा जा सकता है- (1.) राष्ट्रीय स्तर पर घटित घटनाएँ और (2.) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर घटित घटनाएँ।

राष्ट्रीय स्तर पर घटित घटनाएँ

(1.) 1892 ई. का अधिनियम

कांग्रेस के उदारवादी नेतृत्व द्वारा किये गये निवेदनों के कारण ब्रिटिश सरकार ने 1892 ई. का अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम को भारतीयों के स्वतन्त्रता संग्राम की प्रथम विजय के रूप में देखा गया किंतु यह भारतीयों को सन्तुष्ट नहीं कर सका। इस अधिनियम में निर्वाचन के सिद्धान्त को कोई स्थान नहीं दिया गया।

जो व्यक्ति विधान परिषदों के लिए निर्वाचित होते थे, वे जनता के वास्तविक प्रतिनिधि नहीं थे। निर्वाचित प्रतिनिधि को जब गवर्नर जनरल विधान सभा में मनोनीत करता था तभी वह बैठकों में भाग ले सकता था। निर्वाचित सदस्यों की संख्या कम रखी गई और इन सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं रखा गया।

बजट पर विधान परिषद् का कोई नियन्त्रण नहीं था। सदस्यों को बजट पर मतदान अथवा संशोधन उपस्थित करने का अधिकार नहीं था। सदस्य पूरक प्रश्न भी नहीं पूछ सकते थे। प्रश्न पूछने के अधिकार पर लगभग प्रतिबन्ध था।

लॉर्ड लैंसडाउन ने कहा था- ‘प्रश्न इस प्रकार के होने चाहिए, जिनमें केवल सम्मति प्रकट करने की प्रार्थना हो, उनमें किसी प्रकार की तर्क-भावना, कल्पना तथा मानहानि पूर्ण भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिए।’

इस अधिनियम से कार्यकारिणी के अधिकारों में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आई। मदनमोहन मालवीय ने लिखा है- ‘इस अधिनियम से भारतीयों को उनके देश की शासन व्यवस्था में कोई वास्तविक अधिकार प्राप्त नहीं हुआ।’

अँग्रेजों की इस कारस्तानी से भारतीयों में उग्र विरोध को विकसित होने का अवसर मिला।

(2.) राजनीतिक भिक्षावृत्ति से आस्था का हटना

1892 से 1905 ई. तक ब्रिटेन में अनुदार दल (टोरी दल) की सरकार रही। यह दल भारत में किसी तरह के राजनीतिक सुधारों का पक्षधर नहीं था। उसने कांग्रेस की मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया तथा भारतीयों के प्रति जातीय-विभेद की नीति को व्यापक रूप में लागू किया।

इन वर्षों में गोरी सरकार ने भारत में ऐसे कानून लागू किए जिनसे जनता और नौकरशाही में खुला विरोध आरम्भ हो गया। अँग्रेजी कुशासन के विरोध में कांग्रेस के युवा नेताओं में उग्रता आई तथा उनमें अपने नेताओं की राजनीतिक भिक्षा-वृत्ति में आस्था समाप्त हो गई।

ब्रिटेन के अनुदार दल ने भारत के उदारवादी नेतृत्व की अवहेलना की और भारत के शिक्षित वर्ग का अपमान किया। सरकार की इस मनोवृत्ति ने बालगंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपतराय, अरविन्द घोष आदि उग्रपंथी नेताओं को अँग्रेजों के विरुद्ध कटु भाषा का प्रयोग करने के लिये उद्वेलित किया।

उदारवादी नेता गोपालकृष्ण गोखले ने भी ब्रिटेन के अनुदार दल के कार्यों की आलोचना की। कांग्रेस के आठवें अधिवेशन में उन्होंने लॉर्ड लैन्स डाउन की सरकार को चेतावनी देते हुए कहा- ‘उसकी शिक्षा, स्थानीय स्वशासन और नौकरियों में भारतीयों की भर्ती से सम्बन्धित नीतियाँ संकट का आह्वान कर रही हैं।’

लॉर्ड एल्गिन (1894-1898 ई.) के काल में अँग्रेज अधिकारियों द्वारा अपनाई गई दमन की नीति से भारत के राजनीतिक असंतोष में उबाल आ गया। 1898 ई. में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में आर. सी. दत्त ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पिछले दो वर्षों में भारतीय जनता में असन्तोष की और भी वृद्धि हुई है। लाला लाजपतराय ने कहा– ‘भारतीयों को अब भिखारी बने रहने में सन्तोष नहीं कर लेना चाहिए और न अँग्रेजी सरकार के सामने गिड़गिड़ाना चाहिए…….. अँग्रेजों द्वारा कांग्रेस की मांगों की उपेक्षा का कारण यह था कि अधिकांश कांग्रेसी नेताओं में त्याग और बलिदान की भावना नहीं है।’

(3.) भारत का तीव्र आर्थिक शोषण

अँग्रेजों ने लगभग सवा सौ वर्ष के शासन में भारत के लगभग समस्त निर्याताकारी उद्योग समाप्त करके भारत को कच्चे माल की मण्डी बना दिया। इस कारण भारत से करोड़ों रुपया प्रति वर्ष इंग्लैण्ड जाने लगा और भारत की जनता निर्धन हो गई। 1870 ई. के बाद भारतीय नेताओं का ध्यान इस भयावह आर्थिक शोषण की ओर गया।

भारतीय उद्योगों का विनाश, कपास की बनी चीजों पर आयात कर में कमी और भारतीय मिलों में तैयार होने वाले कपड़े पर 7.5 प्रतिशत उत्पादन कर, कृषि पर भू-राजस्व का अत्यधिक बोझ, किसानों की बढ़ती हुई निर्धनता और शासन के उच्च पदों से भारतीयों को दूर रखने की मनोवृत्ति आदि कारकों से स्पष्ट था कि अँग्रेज भारत को हर तरह से लूट रहे हैं। उनके शासन का मूल उद्देश्य यही था। इस कारण भारत में उग्रवादी विचारों का पनपना स्वाभाविक था।

दादाभाई नौरोजी, रमेशचन्द्र दत्त, महादेव रानाडे, डी. एन. वाचा और सर विलियम डिग्वी आदि विचारकों ने अपने लेखों एवं पुस्तकों द्वारा अँग्रेजों की आर्थिक शोषण की नीति को उजागर कर दिया। उन्होंने बताया कि भारत में महत्त्वपूर्ण व्यापारिक प्रतिष्ठान अँग्रेजों के नियन्त्रण में हैं।

कपड़ा उद्योग भारतीयों के नियन्त्रण में होते हुए भी अँग्रेजों ने उसके विकास में अनेक बाधाएँ खड़ी कर दी हैं। सरकार की नीतियों के कारण निम्न-मध्यम वर्ग में बेकारी की समस्या उग्र रूप धारण कर रही थी। अकाल, भूचाल आदि प्राकृतिक प्रकोपों से जनता में असन्तोष अधिक बढ़ गया।

शिक्षित वर्ग के असन्तोष और जनता के कष्टों ने उग्र राष्ट्रीयता को बढ़ावा दिया। कांग्रेस के युवा नेता समझ गये कि जब तक भारत पराधीन रहेगा, तब तक उसका आर्थिक शोषण होता रहेगा और जनता निर्धनता के चंगुल से मुक्त नहीं हो सकेगी। इस कारण बहुत से लोग ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फैंकने के लिये कटिबद्ध हो गये।

(4.) अकाल तथा प्लेग के समय सरकार की दुष्टता

गुरुमुख निहाल सिंह ने लिखा है- ‘देश में अकाल, प्लेग आदि राष्ट्रीय विपत्तियों का सामना करने के लिए सरकार ने संतोषजनक नीति नहीं अपनाई।’

1896-97 ई. तथा 1899-1900 ई. में देश में पड़े भयंकर दुर्भिक्ष तथा उसके बाद फैली महामारी से लाखों लोग मर गये। जनता को राहत पहुंचाने में गोरी सरकार ने अत्यंत धीमी गति से कार्य किया। बम्बई प्रान्त में फैले प्लेग की रोकथाम के लिए अँग्रेज अधिकारियों ने अमानवीय ढंग से लोगों को बलपूर्वक घरों से निकाल दिया।

पूना में यह काम सेना को सौंपा गया और गोरे सैनिकों को घर-घर जाकर रोगियों की जांच करने को कहा। गोेरे सैनिक भारतीयों के घरों में घुसकर स्त्रियों की जांच करने के बहाने उनके साथ अत्यन्त अशिष्ट व्यवहार करते थे। इनसे जनता का क्रोध भड़क उठा और एक नौजवान दामोदर हरि चापेकर ने पूना के प्लेग कमिश्नर रैण्ड तथा बालकृष्ण चापेकर ने उसके सहायक लेफ्टिनेंट एयर्स्ट की हत्या कर दी।

चापेकर बन्धुओं को मृत्युदण्ड दिया गया। उनकी सहायता करने के आरोप में नाटू बन्धु बंदी बनाये गये। उन्हें बिना मुकदमा चलाए चार-पांच माह तक जेल में रखा गया और फिर देश निकाला दे दिया गया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, चापेकर बंधु इस बात से नाराज थे कि अँग्रेजों ने 400 ब्राह्मणों को घुड़सवार सेना में लेने से इसलिये मना कर दिया क्योंकि अँग्रेजों को लगता था कि ब्राह्मण जाति के सैनिक अधिक विद्रोही प्रकृति के हैं।

(5.) सांस्कृतिक नवजागरण

अँग्रेजों ने भारतीयों को यह समझाने का प्रयास किया कि पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति, भारत की सभ्यता एवं संस्कृति से श्रेष्ठ है। अँग्रेजों ने भारत में जिस प्रकार की शिक्षा का विस्तार किया, उसमें भी उनका ध्येय भारत में पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना था।

कांग्रेस के उदारवादी नेता भी पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगे हुए थे परन्तु उन्नीसवीं सदी के अन्त तथा बीसवीं सदी के प्रारम्भ में भारत के अनेक क्षेत्रों में धार्मिक पुनरुत्थान ने शिक्षित वर्ग में पाश्चात्य शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति के विरुद्ध प्रतिक्रिया उत्पन्न की।

आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसायटी आदि धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के प्रचार ने जनता का ध्यान अपने प्राचीन गौरव की ओर आकर्षित किया। स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म की महानता सिद्ध करके विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया।

इन महान् धार्मिक नेताओं ने जनता में आत्म-विश्वास तथा नवीन स्फूर्ति उत्पन्न की। इसी समय राष्ट्रीय साहित्य का भी विकास हुआ। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे साहित्यकारों ने भारतवासियों का ध्यान सामाजिक विद्रूपताओं की ओर खींचा।

इस युग का बंगला साहित्य देशभक्ति की उदात्त भावनाओं से सिंचित था। बंकिमचन्द्र का उपन्यास आनन्द मठ सन्यासी आंदोलन पर लिखा गया था। इसका गीत वन्दे मातरम् स्वतंत्रता की लड़ाई का प्रमुख गीत बन गया। जब श्रीमती एनीबीसेंट ने कहा कि विश्व का कोई भी धर्म इतना पूर्ण नहीं है, जितना हिन्दू धर्म, तो भारतीयों का आत्म विश्वास चरम पर पहुंच गया। उनमें पाश्चात्य शिक्षा, पाश्चात्य जीवन शैली एवं पश्चिमी वस्तुओं से विरक्ति होने लगी। गुरुमुख निहाल सिंह का मत है कि उग्रवादी आन्दोलन को देश के धार्मिक पुनरुत्थान से प्रेरणा मिली थी।

(6.) अँग्रेजों एवं एंग्लो-इण्डियनों का अंहकार युक्त व्यवहार

अँग्रेजों और एंग्लो-इण्डियनों के अंहकार युक्त व्यवहार ने भारत में उग्रवाद के जन्म एवं विकास में बड़ा योगदान दिया। अँग्रेज, भारतीयों को निम्न प्रजाति का समझते थे तथा घृणा की दृष्टि से देखते थे। आंग्ल-भारतीय समाचार पत्र खुले रूप में अँग्रेजों को भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार करने के लिये प्रोत्साहित करते थे।

सरकार की ओर से भी उन्हें प्रोत्साहन एवं सरंक्षण मिलता था। बहुत से ब्रिटिश सैनिक तथा अधिकारी, भारतीयों के साथ निर्दयतापूर्वक व्यवहार करते थे। सरकार उन लोगों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करती थी। किसी भारतीय की हत्या कर देने पर भी अँग्रेजों को नाममात्र की सजा दी जाती थी। लॉर्ड कर्जन की नीतियों ने जातिभेद की नीति को काफी प्रोत्साहित किया। कर्जन द्वारा रंग, क्षेत्र एवं जाति के आधार पर किये गये भेदभाव ने भारतीयों में उग्रवादी विचारों को जन्म दिया।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में कर्जन ने भारतयों के जीवन आदर्श पर अनैतिक रूप से कठोर प्रहार करते हुए कहा- ‘सत्य का उच्च आदर्श, पाश्चात्य अवधारणा है। इस आदर्श ने पहले पश्चिम की नैतिक परम्परा में उच्च स्थान बनाया, बाद में यह आदर्श पूर्व में भी आया जहाँ पहले धूर्तता और कुटिलता सम्मान प्राप्त करती थी….. भारत राष्ट्र जैसी कोई चीज नहीं है।’

(7.) आंग्ल-भारतीय पत्रों का भारत विरोधी दृष्टिकोण

हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रवाद के उदय का एक कारण आंग्ल भारतीय समाचार पत्रों द्वारा भारत विरोधी दृष्टिकोण का प्रचार करना था। इन समाचार पत्रों में शिक्षित भारतीयों को गुलाम, घुड़सवार भिखमंगे, नीच जाति आदि गालियां दी जाती थीं। फिर भी, सरकार इन पत्रों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करती थी। इससे युवा भारतीयों का उत्तेजित होना स्वाभाविक था।

 (8.) लैन्स डाउन और लॉर्ड एल्गिन का कार्यकाल

भारत के गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड लैन्स डाउन (1888-94 ई.) और लॉर्ड एल्गिन (1894-98 ई.) भारतीयों से घृणा करते थे। उन्होंने भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति घृणा पैदा करने वाले कई काम किये। दोनों के काल में अनेक दमनकारी कानून बनाये गये। लॉर्ड एल्गिन के समय भयंकर अकाल पड़ा किन्तु उसने राहत कार्यों की ओर ध्यान न देकर दिल्ली में एक शानदार दरबार का आयोजन किया जिसमें लाखों रुपये पानी की तरह बहाये।

अपना कार्यकाल पूरा करके इंग्लैण्ड लौटते समय एल्गिन ने घमण्ड से घोषणा की कि- ‘हिन्दुस्तान तलवार के जोर पर जीता गया था और तलवार के जोर से ही उसकी रक्षा की जायेगी।’

उसके इस कथन ने देश के भोले-भाले लोगों के दिलों में भी आग लगा दी। एल्गिन के समय में तिलक को राजद्रोह के अपराध में 18 मास का कठोर कारावास, चापेकर बन्धुओं को प्राण दण्ड, नाटु बन्धुओं को देश-निकाला आदि घटनाओं ने भी उग्रवादी भावनाओं को पनपाया।

(9.) कर्जन की दमनकारी नीतियाँ

कर्जन 1809-1905 ई. तक भारत का गवर्नर जनरल रहा। उसने जनआकांक्षाओं और जनता की मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया। उग्रवाद के उदय में उसके द्वारा अपनाई गई दमनकारी नीतियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनमें से निम्नलिखित प्रमुख है-

 (क) केन्द्रीकरण की नीति

लॉर्ड कर्जन शासन ने भारत के शासन का केन्द्रीयकरण किया। उसने शिक्षा, कृषि, सिंचाई, पुरातत्त्व, खनिज इत्यादि के निर्देशन और नियंत्रण के लिए विशेषज्ञों की नियुक्तियां कीं तथा मद्रास और बम्बई के गवर्नरों की विशेष स्थिति के विरुद्ध आवाज उठायी। उसकी इन नीतियों से सरकार में केन्द्रीयकरण को बढ़ावा मिला। भारतीयों ने उसकी इस नीति को पसन्द नहीं किया।

(ख) कलकत्ता निगम अधिनियम (1899)

1899 ई. में कलकत्ता निगम अधिनियम पारित करके कलकत्ता निगम में सदस्यों की संख्या 75 से घटाकर 50 कर दी गई। अब तक निगम में दो-तिहाई सदस्यों का चुनाव, शहरी करदाता करते थे। नई व्यवस्था में केवल आधे सदस्य ही जनता से चुकर आ सकते थे। शेष आधे सदस्यों को नियुक्त करने का अधिकार सरकार को दे दिया गया। यह व्यवस्था भी की गई कि निगम के चेयरमैन की नियुक्ति सरकार करे। चेयरमैन को कई विशेषाधिकार भी दिये गये।

इस प्रकार चुने हुए प्रतिनिधियों के अधिकारों में स्वतः कटौती हो गई। सरकार ने तर्क दिया कि निगम के सदस्य वास्तविक काम न करके, केवल बहस करते रहते थे। बंगाल में तथा देश के दूसरे भागों में सरकार की इस नीति का विरोध हुआ।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इस अधिनियम  की भर्त्सना करते हुए कहा- ‘जिस दिन यह अधिनियम पारित किया गया उसे बंगाल की भावी पीढ़ियां उस दिन के रूप में स्मरण रखेंगी जब कलकत्ता में स्थानीय शासन का उन्मूलन कर दिया गया।’ निगम के 28 भारतीय सदस्यों ने विरोध स्वरूप निगम की सदस्यता छोड़ दी।

(ग) दिल्ली दरबार में धन का अपव्यय

1899-1900 ई. में बम्बई, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बड़ौदा और मध्य भारत की कई रियासतें भयंकर अकाल की चपेट में आ गईं। भारत के बड़े क्षेत्र में इस अकाल का असर कई वर्षों तक रहा। लार्ड कर्जन ने जनता की बुरी अवस्था की परवाह न करके, सम्राट एडवर्ड सप्तम् के राज्यारोहण के अवसर पर 1903 ई. में दिल्ली में भव्य दरबार का आयोजन किया जिसमें भारत के धन का अपव्यय किया गया।  भारतीय नेताओं और समाचार पत्रों के विरोध को सरकार ने अनसुना कर दिया। कांग्रेस के 1903 ई. के अधिवेशन में कर्जन के इस कृत्य की कटु आलोचना की गई।

(घ) भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम

कर्जन ने भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904 लागू करके उच्च शिक्षा पर सरकारी शिकंजा अत्यंत मजबूती से कस दिया। भारतीयों के लिए उच्च शिक्षा के क्षेत्र को सीमित कर दिया और शिक्षा को राष्ट्रीय विचारधारा के विरुद्ध तथा साम्राज्यवादी विचारधारा के प्रचार का साधन बना दिया।

इस अधिनियम द्वारा विश्वविद्यालयों में सीनेट के सदस्यों की संख्या सीमित करके उनमें सरकार द्वारा नामित सदस्यों का बहुमत स्थापित किया गया। इस अधिनियिम के अन्तर्गत विश्वविद्यालयों को सम्बद्ध कॉलेजों पर नियन्त्रण करने के लिए अधिक अधिकार दिये गये तथा नये कॉलेजों को मान्यता देने के नियम कठोर बना दिये गये।

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्तियों पर सरकार की स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई। इस अधिनियम का एक ही अर्थ था कि उच्च शिक्षा के विषय में सरकार की इच्छा के बिना कोई भी कदम नहीं उठाया जा सकता था। कर्जन के इस निर्णय की देश भर में कटु आलोचना हुई तथा अधिनियम के विरोध में विशाल जनसभाएं आयोजित हुईं।

(ड.) राजकीय सूचनाओं की गोपनीयता का अधिनियम

लार्ड कर्जन ने राजकीय सूचनाओं की गोपनीयता का अधिनियम (1904) पारित करके समाचार पत्रों सहित समस्त नागरिकों पर यह प्रतिबंध लगा दिया कि वे असैनिक विषयों की जानकारी किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं दे सकते। समाचार पत्रों में सरकार के प्रति घृणा पैदा करने वाले समाचार नहीं छापे जा सकते।

वर्ग-द्वेष को प्रोत्साहन देना दण्डनीय अपराध बना दिया गया। इस कानून की आड़ में किसी भी नागरिक एवं सम्पादक को पकड़ा जा सकता था। इसलिये जनता में सरकार के विरुद्ध व्यापक असन्तोष फैल गया और लोगों ने इस अधिनियम का कड़ा विरोध किया।

(च) सैनिक व्यय में वृद्धि

भारत की गोरी सरकार द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार हेतु चीन और दक्षिण अफ्रीका में भारतीय व्यय से सेनाएं भेजी गईं। 1904 ई. में तिब्बत पर आक्रमण किया गया। इस अभियान का सारा खर्च भारत से वसूल किया गया। जबकि चीन, दक्षिण अफ्रीका और तिब्बत में की गई कार्यवाहियों से भारत का कोई सम्बन्ध नहीं था। कांग्रेस के गरमदल नेताओं ने भारत के राजकोष पर अनैतिक रूप से भार डालने के लिये सरकार की कटु आलोचना की।

(छ) विक्टोरिया मेमोरियल का निर्माण

लॉर्ड कर्जन ने इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया की स्मृति में कलकत्ता में विक्टोरिया मेमोरियल बनवाया। इस पर एक करोड़ रुपये से भी अधिक खर्च किया गया। भारतीय नेताओं ने कर्जन द्वारा किये गये इस धन के अपव्यय पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की।

(ज) बंगाल का विभाजन

1905 ई. में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल प्रान्त का विभाजन कर दिया। भारतीय इतिहास में इस घटना को बंग-भंग कहा जाता है। उस समय बंगाल प्रांत की जनसंख्या लगभग 8 करोड़ तथा क्षेत्रफल लगभग 1,90,000 वर्ग मील था। बंगाल, बिहार, उड़ीसा और छोटा नागपुर भी बंगाल प्रांत के अंतर्गत थे। इतने बड़े प्रान्त का प्रशासन चलाना कठिन कार्य था।

इसलिये लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन करके मुसलमानों के बहुमत वाले क्षेत्र को अलग कर दिया। पूर्वी बंगाल और असम को मिलाकर एक अलग प्रान्त बनाया गया जिसमें 3 करोड़ 10 लाख लोग रहते थे। इस जनसंख्या में 1 करोड़ 80 लाख मुसलमान थे।

लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी बंगाल प्रान्त में मुसलमानों की सभाएं आयोजित कीं जिनमें उसने कहा कि यह विभाजन केवल शासन की सुविधा के लिए ही नहीं किया जा रहा है वरन् उसके द्वारा एक मुस्लिम प्रान्त बनाया जा रहा है जिसमें इस्लाम के अनुयायियों की प्रधानता होगी।

बचे हुए पश्चिमी बंगाल प्रान्त में 1 करोड़ 70 लाख बंगला-भाषी लोगों की तुलना में बिहारी तथा उड़िया भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 4 करोड़ 10 लाख थी। इस प्रकार बंगाली हिन्दू, पूर्वी बंगाल में धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक बना दिये गये तथा पश्चिमी बंगाल में भाषा के आधार पर अल्पसंख्यक बना दिये गये।

बंगला विभाजन के पीछे अँग्रेजों के मन में कई प्रकार के भय कार्य कर रहे थे। उस समय के भारत सरकार के गृह सचिव हारवर्ट होप रिसले ने एक गोपनीय रिपोर्ट लिखी- ‘संयुक्त बंगाल एक शक्ति है। बंगाल का विभाजन हो जाने पर वह अलग-अलग रास्तों में बंट जायेगा…….. हमारा एक मुख्य उद्देश्य है हमारे विरोध में संगठित शक्ति को विभाजित करना और उसे कमजोर बनाना।’

लॉर्ड रोनाल्डशे ने कहा था- ‘बंगाली राष्ट्रीयता की बढ़ती हुई दृढ़ता पर आघात किया गया था।’ कर्जन के इस कृत्य की ब्रिटेन के समाचार पत्रों ने भी निन्दा की। मैनचेस्टर गारजियन ने लिखा- ‘बंगाल को दो टुकड़ों में बांट देने की कर्जन की योजना को समझना कठिन है और उसे क्षमा कर देना और भी कठिन।’

बंगाल के विभाजन से राष्ट्रीय आन्दोलन में अचानक तेजी आ गयी। समस्त भारत ने इस विभाजन का कड़ा विरोध किया। सरकार ने आन्दोलन को दबाने के लिए दमन का सहारा लिया जिससे गरम दल नेताओं को नया कार्यक्षेत्र एवं अनुकूल वातावरण प्राप्त हो गया।

(10.) बाल, पाल और लाल का उत्कर्ष

लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय, को भारत के इतिहास में बाल, पाल और लाल कहा जाता है। इन नेताओं ने कांग्रेस के उदारवादी नेताओं से ठीक उलट, उग्र राष्ट्रवाद को चिन्गारी दी। इन नेताओं ने आम भारतीय को अपने आंदोलन में सम्मिलित करते हुए उन्हें ब्रिटिश शासन का विरोध करने की प्रेरणा दी। बाल गंगाधर तिलक ने जन साधारण को अद्भुत नारा देकर राष्ट्रीय आंदोलन के लिये नई भूमि तैयार की।

उन्होंने कहा- ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे।’ तिलक के साथ लाला लाजपतराय, विपिनचन्द्र पाल, अरविन्द घोष आदि नेताओं ने भी अपना स्वर तीखा कर दिया। इन नेताओं ने कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन को भारत की आजादी के आंदोलन में बदल दिया।

(11.) लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी

लोकमान्य तिलक ने अपने समाचार पत्र केसरी में पूना में घटित घटनाओं के लिये सरकार की कटु आलोचना की। तिलक पर जनता को भड़काने और राजद्रोह करने के आरोप लगाकर बन्दी बनाया गया और उन्हें 18 माह के कठोर कारावास की सजा दी गई। पूना में उपद्रवियों को दण्ड देने वाली पुलिस टुकड़ी नियुक्त की गई। इन घटनाओं ने भारतीयों को और अधिक आंदोलित कर दिया। कांग्रेस के उदारवादी नेताओं का भी अँग्रेजों की न्यायप्रियता से विश्वास डगमगाने लगा।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा- ‘हम पूना में दण्ड देने वाली पुलिस की तैनाती गलत समझते हैं। तिलक और पूना के कुछ अन्य पत्रकारों को कैद में डालना और भी अधिक गलत समझते हैं। तिलक की कैद पर सारा राष्ट्र रो रहा है।’ श्रीमती एनीबीसेंट की मान्यता थी कि इन्हीं घटनाओें से भारत में उग्रवाद का विकास हुआ था।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर घटित घटनाएँ

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंतराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कई घटनाएं हुईं जिन्होंने भारत में साम्राज्यवाद विरोधी भावनाओं को उभारा।

(1.) जापान की रूस पर विजय

लगभग डेढ़ सौ वर्षों में यूरोपवासियों की एशिया और अफ्रीका के विभिन्न देशों में निरन्तर विजयों से एशिया में यह धारणा बन गई थी कि यूरोपवासी अजेय हैं परन्तु एशिया के एक छोटे से देश जापान ने 1905 ई. मे यूरोप के शक्तिशाली देश रूस को परास्त कर, इस धारणा को ध्वस्त कर दिया। इस घटना से भारतवासियों में यह आशा उत्पन्न हुई कि भारत भी ब्रिटिश शासन को समाप्त कर सकता है। देश के शिक्षित नवयुवक जापान की इस तीव्र प्रगति के कारणों को जानने के लिए उत्सुक हो उठे। उनके हृदय पर जापान के त्याग और देशभक्ति की भावना का गहरा प्रभाव पड़ा।

1 जुलाई 1905 को अँग्रेजी समाचार पत्र द पायनियर ने लिखा- ‘भारतीय शिक्षित वर्ग इस युद्ध को बहुत रुचि के साथ देख रहा था। ……जापानियों की विजय ने उनके उत्साह में बिजली पैदा कर दी थी।’

(2.) रूस की ड्यूमा क्रांति

1905 ई. में रूस में ड्यूमा क्रांति हुई जिसमें जनतंत्र, राजतंत्र पर भारी पड़ रहा था। इस क्रांति में रूसी जनता की इच्छा-शक्ति के अच्छे प्रदर्शन का भारत की जनता पर भी प्रभाव पड़ा।

उदारवादी नेता दादाभाई नौरोजी तक को कांग्रेस के 1906 ई. के अधिवेशन में कहना पड़ा- ‘रूस अपनी मुक्ति के लिये संघर्ष कर रहा है….. ये सभी निरंकुशतावाद के विरुद्ध है ….. क्या ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के स्वतंत्र नागरिक निरंकुश तंत्र की प्रजा रहना जारी रखेंगे?’

(3.) इटली की पराजय

1896 ई. में अबीसीनिया जैसे छोटे अफ्रीकी देश ने इटली जैसे शक्तिशाली यूरोपीय राष्ट्र की सेना को परास्त करके उसके साम्राज्यवादी स्वरूप को चकनाचूर कर दिया। भारतीयों ने इस घटना को आश्चर्य के साथ देखा।

(4.) बोअर युद्ध

1899-1902 ई. तक बोअर युद्ध हुआ। दक्षिण अफ्रीका में बोअर (डच) लोगों ने अपनी स्वतन्त्रता को बनाये रखने के लिए अँग्रेजों से जमकर लोहा लिया और एक बार तो ब्रिटिश सेना को बुरी तरह से परास्त करके खदेड़ दिया।

(5.) विदेशों में घटित क्रांतियाँ

1899-1900 ई. का बॉक्सर विद्रोह, 1908 ई. की युवा तुर्क क्रान्ति, 1910 ई. की मैक्सिको क्रान्ति और 1911 ई. की चीन क्रान्ति ऐसी ही प्रमुख क्रांतियां थीं जिनके कारण भारतीयों के लिये भी अँग्रेज अजेय नहीं रहे।

(6.) दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की बड़ी संख्या रहती थी जिनके साथ वहाँ की गोरी सरकार असमानता युक्त व्यवहार करती थी। गोरे अँग्रेज, काले भारतीयों को नीच जाति का मनुष्य कहते थे। उन्होंने भारतीयों पर कई तरह के प्रतिबन्ध लगाये। भारतीय, रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में यात्रा नहीं कर सकते थे और रात के नौ बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकल सकते थे।

उन दिनों बैरिस्टर मोहनदास कर्मचंद गांधी वहाँ वकालात कर रहे थे। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में गोरी सरकार द्वारा किये जा रहे भेदभाव के विरोध में शान्तिपूर्ण प्रतिरोध और सत्याग्रह आन्दोलन किया। गांधी के संघर्ष के फलस्वरूप भारतीयों को कुछ सुविधाएं मिल गईं। इससे भारतवासियों को भरोसा हुआ कि अनुनय-विनय की बजाय आन्दोलन और संघर्ष का तरीका अधिक उपयोगी है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन – गरमपंथी कांग्रेस

कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के कारण

उग्रराष्ट्रवादियों द्वारा बंग-भंग का विरोध

सूरत की फूट

उग्रवादी नेतृत्व की कार्यशैली

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व का मूल्यांकन

उग्रराष्ट्रवादियों द्वारा बंग-भंग का विरोध

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बंग-भंग का जनक लॉर्ड कर्जन

जब ईस्वी 1905 में लॉर्ड कर्जन ने हिन्दू बंगाल और मुस्लिम बंगाल बनाने के उद्देश्य से बंगाल का विभाजन किया तब उग्रराष्ट्रवादियों द्वारा बंग-भंग का विरोध किया गया।

लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन

बंगाल एक विशाल प्रान्त था। इसमें बंगाल, असम, बिहार, उड़ीसा तथा छोटा नागपुर तक विस्तृत भू-भाग सम्मिलित था। इतने बड़े प्रांत का शासन सुचारू रूप से  सम्भाला जाना कठिन था। इस कारणबंगाल के विभाजन पर 1892 ई. से विचार चल रहा था।

लॉर्ड कर्जन ने 18 जुलाई 1905 को बंगाल के विभाजन की घोषणा की तथा पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल नामक दो प्रांत बनाये। पहले टुकड़े में बंगाल का पूर्वी भाग और आसाम का क्षेत्र रखा गया। इस प्रांत के लिये पृथक् लेफिटनेंट गवर्नर नियुक्त किया गया जिसकी राजधानी ढाका रखी गई। पश्चिमी बंगाल में बिहार, उड़ीसा और पश्चिमी बंगाल के क्षेत्र रखे गये।

इसकी राजधानी कलकत्ता में रही। बंगाल को विभाजित करने का वास्तविक उद्देश्य बंगाल की एकजुट राजनीतिक शक्ति को भंग करना था। अँग्रेजों ने बंग-भंग के माध्यम से पूर्वी बंगाल के रूप में एक ऐसा प्रान्त बना दिया जिसमें मुसलमानों की प्रधानता थी। अँग्रेजों को आशा थी कि नया प्रांत, हिन्दू बहुल पश्चिमी प्रांत के विरुद्ध आवाज बुलंद करता रहेगा। सैयद अहमद खाँ तथा उनके आदमियों ने इस कार्य में अँग्रेजों का साथ दिया ताकि उनकी राजनीति चमक जाये।

उग्रराष्ट्रवादियों द्वारा बंग-भंग का विरोध

बंगाल-विभाजन के विरुद्ध पूरे देश में राष्ट्रव्यापी आन्दोलन खड़ा हो गया। बंगाल-विभाजन का प्रस्ताव सामने आते ही कलकत्ता में महाराजा जतीन्द्रमोहन ठाकुर की अध्यक्षता में एक सार्वजनिक सभा आयोजित हुई जिसमें सरकार से बंगाल विभाजन के सम्बन्ध में कुछ संशोधन करने की मांग की गई।

कर्जन ने किसी भी प्रकार का संशोधन करने से मना कर दिया। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हाल में विराट जनसभा हुई जिसमें बड़े-बड़े नेता तथा विभिन्न जिलों के प्रतिनिधि मण्डल उपस्थिति थे। इसके बाद पूरे बंगाल में बंग-भंग के विरोध में जनसभाएँ हुईं। इन सभाओं में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का कार्यक्रम स्वीकार किया गया।

16 अक्टूबर 1905 को कर्जन ने बंग-भंग की घोषणा को कार्यान्वित कर दिया। बंगाली जनता ने इस दिन को शोक-दिवस के रूप में मनाया। प्रातःकाल से ही कलकत्ता सहित विभिन्न नगरों की सड़कें वन्देमातरम् के गायन से गूँज उठीं। मनुष्यों के समूह नदी के किनारे एकत्रित होकर एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधने लगे।

गायन मण्डलियों ने वीर रस से ओत-प्रोत गीत गा-गाकर जनता में देशभक्ति की भावना जागृत की। उस दिन पूरे बंगाल में हड़ताल रही। स्थान-स्थान पर आयोजित जन-सभाओं में बंगालियों ने प्रण लिया कि हम एक जाति की हैसियत से, अपने प्रांत के बँटवारे से पैदा हुए बुरे प्रभावों को दूर करने और अपनी जाति की एकता बनाये रखने के लिए शक्ति-भर सब-कुछ करेंगें।

कलकत्ता में एक फेडरेशन हॉल का शिलान्यास किया गया जिसमें समस्त जिलों की मूर्तियों को रखा गया। पृथक् किये गये जिलों की मूर्तियों को पुनः एक होने तक के लिये ढक दिया गया। अनेक स्थानों पर हड़ताल के साथ-साथ उपवासों के भी आयेाजन किये गये। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने बुनकर उद्योग की सहायता से राष्ट्रीय निधि की स्थापना की।

विदेशी माल के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग के लिए व्यापक अभियान आरम्भ किया गया। प्रान्त के कोने-कोने में तथा प्रान्त के बाहर भी बंग-भंग के विरोध में जनसभाएं आयोजित की गईं। पूरा बंगाल वन्देमातरम् के गायन से गूँज उठा। सरकारी दमन ने आन्दोलन को और अधिक उग्र बना दिया।

वन्देमातरम् के गीत पर नियन्त्रण व आन्दोलनकारियों की गिरफ्तारी से आन्दोलन ने अत्यधिक उग्र रूप धारण कर लिया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और विपिनचन्द्र पाल ने समूचे बंगाल का दौरा करके जनता से अपील की कि वे बंग-भंग विरोधी अभियान को सफल बनायें। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व इस समय भी उदारवादियों के हाथों में था किंतु कांग्रेस ने बंग-भंग की कटु आलोचना की। नवयुवकों और विद्यार्थियांे ने इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में भाग लिया।

लॉर्ड कर्जन और उनके सहयोगियों ने मुसलमानों को इस आन्दोलन से अलग रखने के प्रयास किये किंतु अब्दुल रसूल, लियाकत हुसैन, अब्दुल हलीम गजनवी, यूसुफ खान बहादुर, मुहम्मद इस्माइल चौधरी आदि नेताओं के नेतृत्व में बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी बंग-भंग विरोधी आन्दोलन में भाग लिया।

मुसलमान नेताओं ने विशाल सभा का आयोजन करके प्रस्ताव पारित किया कि देश की उन्नति के लिए जो काम हिन्दू करेंगे, मुसलमान उसका समर्थन करेंगे, मुसलमान हिन्दुओं का साथ बंग-भंग विरोधी आन्दोलन में ही नहीं अपितु दूसरे मामलों में भी देंगे, और विदेशी माल के बॉयकाट और देशी माल के इस्तेमाल का समर्थन करेंगे। इस पर अँग्रेज अधिकारियों ने उन अलगाववादी मुस्लिम नेताओं को दंगे करने के लिये भड़काया जो अपने लिये एक मुस्लिम-बहुल प्रांत चाहते थे।

बंग-भंग आन्दोलन के विरुद्ध सरकार की दमन नीति

बंग-भंग विरोधी आंदोलन के फूट पड़ते ही सरकार ने सार्वजनिक सभाओें पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अध्यापकों को चेतावनी दी गई कि वे अपने छात्रों को इस आन्दोलन से दूर रखें। मैमनसिंह जिले में दो लड़कों पर केवल इसलिए जुर्माना किया गया कि वे वन्देमातरम् गा रहे थे।

सरकार ने निजी शिक्षण संस्थाओं को धमकी दी कि जिस स्कूल के अधिकारी अपने छात्रों एवं अध्यापकों को इस आन्दोलन से अलग नहीं रखेंगे उनकी मान्यता समाप्त करके सरकारी सहायता बंद कर दी जायेगी। इन स्कूलों के प्रबंधकों ने बहुत से छात्रों और शिक्षकों को स्कूलों से हटा दिया।

सरकार ने बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को बन्दी बनाकर उन्हें अमानवीय सजाएं दीं। गोरी सरकार का भयावह चेहरा उस समय खुलकर सामने आया जब सरकार ने मुसलमानों को हिन्दुओं पर आक्रमण करने तथा उन पर भीषण अत्याचार करने के लिये उकसाया।

एक स्थान पर तो मुसलमानों ने ढोल-बजा-बजा कर घोषणा करवाई कि सरकार ने उन्हें, हिन्दुओं को लूटने एवं हिन्दू-विधवाओं के साथ विवाह करने की अनुमति दे दी है। बंगाल के गवर्नर वैमफील्ड फुलर ने लोगों को भड़काने के लिये यह बयान दिया- ‘…… मेरी हिन्दू और मुस्लिम पत्नियों में, मुस्लिम पत्नी मेरी ज्यादा चहेती है।’

बंगाल में घटी इन घटनाओं पर टिप्पणी करते हुए उन दिनों के प्रसिद्ध समाचार पत्र मार्डन रिव्यू ने लिखा था- ‘आन्दोलन-काल की घटनाएं समस्त सम्बन्धित पक्षों के लिए निन्दनीय हैं…….हिन्दुओं के लिए उनकी भीरूता के लिए, क्योंकि उन्होंने मन्दिरों के अपवित्रीकरण, मूर्तियों के खण्डन तथा स्त्रियों के अपहरण के विरुद्ध बल-प्रयोग नहीं किया, स्थानीय मुस्लिम जनता के लिए नीच व्यक्तियों के बाहुल्य के कारण और अँग्रेजी सरकार के लिए इस कारण कि उसके शासन में इस प्रकार की घटनाएँ बिना रोक-टोक के बहुत दिनों तक होती रहीं।’

उग्रराष्ट्रवादियों द्वारा बंग-भंग का विरोध का महत्त्व

बंग-भंग आन्दोलन भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। वन्देमातरम् के नारे ने सदियों से सोई जनता को जागृत कर दिया। इस कारण राष्ट्रीय एकता की जो प्रबल भावना जागृत हुई उसने स्वतन्त्रता प्राप्ति की इच्छा को दृढ़ बना दिया। अब कांग्रेस का अपने उदारवादी नेताओं से मोह भंग हो गया। स्वयं गोखले को कहना पड़ा- ‘नवयुवक यह पूछने लगे हैं कि संवैधानिक उपायों का क्या लाभ है, यदि इनका परिणाम बंगाल का विभाजन ही होना था।’

इस प्रकार बंग-भंग की घटना ने भारतीय राजनीति में उग्रवाद को बढ़ावा दिया। इन घटनाओं ने उग्रवादी नेताओं की लोकप्रियता में भी वृद्धि की। जब ब्रिटिश सरकार ने उग्रवादी नेताओं का दमन करना आरम्भ किया तो जनसाधारण और अधिक उद्वेलित हो उठा। उन्हीं दिनों कुछ युवकों ने रक्त-रंजित क्राति का मार्ग अपना लिया।

इस आन्दोलन का महत्त्वपूर्ण परिणाम विदेशी माल का बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग तथा राष्ट्रीय शिक्षा पर बल दिया जाना था। आगे चलकर गांधीजी ने स्वदेशी को राष्ट्रीय आन्दोलन में एक प्रमुख अस्त्र के रूप में प्रयोग किया। बंग-भंग आंदोलन के दौरान लॉर्ड कर्जन ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एक खाई उत्पन्न कर दी, जो उत्तरोतर गहरी होती गई और देश में साम्प्रदायिकता की भयानक समस्या उत्पन्न हो गई।

बंग-भंग आन्दोलन के दौरान अनेक स्थानों पर दंगे हुए तथा हिन्दुओं के साथ घोर अन्याय किया गया। यह आन्दोलन दिसम्बर 1911 तक चलता रहा। 1911 ई. में बंग-भंग को निरस्त करके अँग्रेज सरकार ने इस आंदोलन को समाप्त करवाया। उसी वर्ष ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाई गई। यह भारतीयों की बड़ी जीत थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन – गरमपंथी कांग्रेस

कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के कारण

उग्रराष्ट्रवादियों द्वारा बंग-भंग का विरोध

सूरत की फूट

उग्रवादी नेतृत्व की कार्यशैली

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व का मूल्यांकन

सूरत की फूट

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सूरत की फूट

उदारवादी नेताओं एवं उग्रराष्ट्रवादी नेताओं के बीच ई.1907 में हुए वैचारिक मतभेदों के कारण कांग्रेस दो धड़ों में विभक्त हो गई। इन्हें नरमपंथी और गरमपंथी कांग्रेस कहा जाता था। इस घटना को सूरत की फूट कहते हैं।

उदारवादियों और उग्रवादियों के अलग-अलग रास्ते

बंगाल विभाजन के बाद कांग्रेस में, उदारवादियों और उग्रवादियों का अंतर्विरोध और अधिक गहरा हो गया। 1905 ई. में बनारस में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता गोपाल कृष्णा गोखले ने की। इस समय बंगाल में विदेशी वस्तुओं का बायकाट और स्वदेशी आन्दोलन जोरों पर था। सरकार का दमनचक्र भी पूरे जोरों पर था।

इस कारण कांग्रेस के बहुत से सदस्य सरकार से अत्यधिक कुपित थे तथा बनारस सम्मेलन में हंगामा होने की आंशका थी। इस हंगामे से बचने की रणनीति तैयार करने के लिये उदारवादी नेताओं ने, मुख्य अधिवेशन से पहले, अलग से एक बैठक की।

बनारस के मुख्य अधिवेशन में उदारवादियों और उग्रवादियों की पहली टकराहट, प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत के प्रश्न पर हुई। उदारवादी नेता, प्रिंस के हार्दिक स्वागत का प्रस्ताव पारित कराना चाहते थे किंतु तिलक और लाजपतराय इस प्रस्ताव के विरोध में थे।

अंत में तिलक एवं लाजपतराय ने इस शर्त पर विरोध को त्याग दिया कि अधिवेशन के कार्यवाही विवरण में, प्रिंस के स्वागत का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ नहीं लिखा जायेगा। इसके बाद उग्रवादियों द्वारा अधिवेशन में, सरकार द्वारा बंगाल के आन्दोलन को कुचलने के लिये किये जा रहे प्रयासों की निन्दा का प्रस्ताव लाया गया। इस प्रस्ताव पर दोनों गुटों के बीच विरोध और मुखर हो गया।

दोनों गुटों के बीच अंतर्द्वन्द्व का तीसरा बिंदु स्वदेशी आंदोलन था। उग्रवादी नेता विदेशी बायकाट और स्वदेशी आन्दोलन को सारे देश में फैलाना चाहते थे, जबकि उदारवादी नेता, इसे बंगाल तक ही सीमित रखना चाहते थे।

उदारवादी नेता पं. मदनमोहन मालवीय ने खुले अधिवेशन में जोर देकर कहा कि मैं बॉयकाट के पक्ष में नहीं हूँ। इस पर उग्रवादी भी भड़क गये। अंत में लाला लाजपतराय ने सत्याग्रह का मार्ग अपनाने का सुझाव दिया। इस प्रकार यह अधिवेशन बिना किसी और बड़ी घटना के सम्पन्न हो गया।

अगला अधिवेशन 1906 ई. में कलकत्ता में हुआ। इस अधिवेशन के कुछ महीने पहले से ही उग्रवादियों के गुट ने लोकमान्य तिलक अथवा लाला लाजपतराय को अध्यक्ष बनाने की मुहिम आरम्भ कर दी किन्तु उदारवादियों ने उग्रवादियों को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से दूर रखने के लिए बड़ी तिकड़मबाजी की।

स्वागत समिति के अध्यक्ष भूपेन्द्रनाथ बसु ने, स्वागत समिति की राय लिए बिना ही दादाभाई नौरोजी को कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष बनने के लिये लिख भेजा। इस प्रकार 81 वर्षीय नौरोजी को कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष बना दिया गया। उग्रवादियों ने नौरोजी का विरोध करना उचित नहीं समझा। दादाभाई नौरोजी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में निम्नलिखित बिन्दुओं पर जोर दिया-

(1.) आन्दोलन करते रहना समीचीन है।

(2.) ब्रिटिश सरकार आन्दोलन को बर्दाश्त करने की मानसिकता नहीं रखती है; किंतु निरन्तर आन्दोलन करते रहने से अन्ततोगत्वा ब्रिटिश सरकार झुक जायेगी।

(3.) आन्दोलन लोकतान्त्रिक, वैधानिक तथा उपद्रवों से दूर रहने वाले हों।

इस अधिवेशन में बहुत से प्रस्ताव पास किये गये जिनमें से निम्नलिखित प्रस्ताव उग्रवादियों की नीतियों के अनुकूल रहे-

(1.) जब तक बंग-विभाजन समाप्त नहीं किया जाता है, तब तक आन्दोलन अनवरत चलता रहे। दोनों बंगाल मिलकर पुनः एक हों।

(2.) ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार जारी रहे।

(3.) सरकार की दमन नीति की घोर भर्त्सना की गई।

दादाभाई नौरोजी के व्यक्तित्व के कारण कांग्रेस का यह अधिवेशन टूटने से बच गया परन्तु इस अधिवेशन का परिणाम सुखद नहीं हुआ, क्योंकि दोनों दल, इस अधिवेशन में पारित प्रस्तावों की अपने अनुकूल व्याख्या करते रहे।

सूरत की फूट

यद्यपि कलकत्ता अधिवेशन में उग्रवादी अपने कुछ प्रस्तावों को पारित करवाने में सफल रहे परन्तु उदारवादी नेता उन प्रस्तावों को कार्यान्वित करने को तैयार नहीं थे। अतः दोनों गुटों में कांग्रेस के आगामी अधिवेशन पर कब्जा करने की स्पर्धा आरम्भ हो गई।

उदारवादी नेता हर कीमत पर कांग्रेस पर अपना कब्जा बनाए रखने पर तुले थे और उग्रवादी नेता, उदारवादियों को हटाकर कांग्रेस का नेतृत्व अपने हाथ में लेने को आतुर थे। 1906 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया था कि कांग्रेस का अगला अधिवेशन 1907 ई. में नागपुर हो।

22 सितम्बर 1907 को कांग्रेस की स्वागत समिति की बैठक में दोनों पक्षों के बीच इतना झगड़ा हुआ कि उदारवादियों ने कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर के स्थान पर सूरत में करने का निर्णय लिया। सूरत में उदारवादी नेताओं का प्रभाव अधिक था।

कांग्रेस का सूरत अधिवेशन, कांग्रेस के दोनों गुटों के शक्ति परीक्षण का स्थल बन गया। 27 दिसम्बर 1907 को उदारवादियों ने अध्यक्ष पद के लिए रासबिहारी घोष का नाम प्रस्तावित किया किन्तु उग्रवादियों ने लाला लाजपतराय का नाम प्रस्तावित करने का निश्चय किया।

उस समय कांग्रेस में उदारवादियों का बहुमत था तथा लालाजी का जीतना कठिन था। इस कारण लालाजी ने इस पद के लिए अनिच्छा प्रकट की। इस पर उग्रवादियों ने बारीसाल के अश्विनी कुमार दत्त का नाम प्रस्तुत किया।

अध्यक्ष पद के लिए रासबिहारी घोष का नाम प्रस्तावित और समर्थित होते ही, तिलक ने स्वागत समिति के अध्यक्ष के पास दो बार अपना नाम भेजा तथा आग्रह किया कि मुझे बोलने दिया जाये किंतु स्वागत समिति के अध्यक्ष ने तिलक को कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया। इसी बीच रासबिहारी घोष को अध्यक्ष घोषित कर दिया गया।

तिलक, उदारवारियों की इस घपलेबाजी से तिलमिला गये। उन्होंने स्वयं-सेवकों को धकेल कर माइक अपने हाथ में ले लिया और भाषण देने लगे। तिलक की इस कार्यवाही से अधिवेशन में हंगामा मच गया। गरम दल वाले कह रहे थे कि उन्हें सुना जाये और नरम दल वाले चीख रहे थे कि तिलक बैठ जाएं।

तिलक कहते रहे कि उन्हें अपनी बात कहने का पूरा-पूरा अधिकार है, इसलिये उन्हें सुना जाये। जब तिलक नहीं माने तो बहुत से उदारवादी नेता एकजुट होकर तिलक पर टूट पड़े और उन्हें पकड़ कर, माइक से दूर खींचने लगे। तभी एक नोकदार मराठा जूता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के गाल पर लगा और फिर उछल कर फीरोजशाह मेहता पर जा गिरा।

इसके बाद चारों तरफ जूते चलने लगे। अधिवेशन में उपस्थित लोग, एक दूसरे को कुर्सियों और लाठियों से मारने लगे। गाली-गलौच और घूसेबाजी का तो कोई अंत ही नहीं था। बहुत से लोगों के शरीर से रक्त बहने लगा। इस पर पुलिस ने अधिवेशन स्थल पर प्रवेश किया।

पुलिस के सामने कठिनाई यह थी कि उदारवादी और उग्रवादी गुटों के नेताओं को अलग करना कठिन था। इसलिये पुलिस ने सब लोगों को हॉल से बाहर निकाल दिया। इसके साथ ही कांग्रेस का अधिवेशन स्थगित कर दिया गया।

अधिवेशन के स्थगित होने के बाद अमृत बाजार पत्रिका के सम्पादक मोतीलाल घोष, बी. सी. चटर्जी तथा लाला हरिकिशन लाल आदि नेताओं ने कांग्रेस की एकता को बनाये रखने के प्रयास किये।

तिलक इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने को तैयार हो गये किंतु उन्होंने शर्त रखी कि उन्हें अपनी बात कहने का पूरा अवसर दिया जाये। उदारवादी नेताओं ने समझौता करने से मना कर दिया तथा अधिवेशन स्थगित होने के अगले ही दिन उन्होंने अपना पृथक सम्मेलन करने के लिये एक नोटिस जारी कर दिया।

उदारवादियों द्वारा आयोजित पृथक् अधिवेशन में कांग्रेस के 1600 में से 900 सदस्यों ने भाग लिया। इस अधिवेशन में एक समिति का गठन किया गया जिसे कांग्रेस का संविधान बनाने का कार्य दिया गया। इस प्रकार उदारवादी कांग्रेसी, गोखले के नेतृत्व में तथा उग्रवादी कांग्रेसी, महात्मा तिलक के नेतृत्व में अलग हो गये।

उदारवादी गुट स्वयं को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कहने लगा जबकि उग्रवादी गुट स्वयं को राष्ट्रीय पार्टी कहने लगा। उदारवादियों ने पहले की ही तरह भारत की गोरी सरकार से सहयोग, समझौते और याचना का मार्ग अपनाया जबकि राष्ट्रवादियों ने ब्रिटिश सरकार से संघर्ष करने तथा उग्र आंदोलन करने का मार्ग पकड़ लिया। इस समय ब्रिटेन में लिबरल पार्टी की सरकार थी। इस सरकार से उदारवादी नेताओं को बहुत आशाएं थीं।

श्रीमती एनीबीसेन्ट को कहना पड़ा- ‘सूरत की फूट कांग्रेस के इतिहास में सर्वाधिक दुखःपूर्ण घटना है।’

सूरत की फूट के कारण

सूरत में कांग्रेस की फूट के लिये तीन बड़े कारण जिम्मेदार थे-

(1.) उदारवादी नेताओं का अहंकार

उदारवादी नेता आरम्भ से ही बड़े अहंकारी थे। एक तरफ वे अँग्रेजों से प्रार्थना कर रहे थे तथा दूसरी तरफ कांग्रेस को राष्ट्रवादियों के हाथों में जाने से रोकने के लिये तिकड़मबाजी का सहारा ले रहे थे। वे कांग्रेस के भीतर की बदलती हुई परिस्थितियों को भी समझने में असफल रहे।

(2.) उग्रवादियों की राष्ट्रवादी नीतियां

उग्रवादियों की राष्ट्रवादी नीतियां उन्हें सरकार से उग्र संघर्ष के लिये प्रेरित कर रही थीं और अब वे उदारवादियों की भिक्षावृत्ति की राजनीति पर चलने को तैयार नहीं थे।

(3.) ब्रिटिश शासन की चालबाजियां

ब्रिटिश शासन पर्दे के पीछे काम कर रहा था। वह उदारवादी गुट की पीठ थपथपा कर उसे फूट के लिये उकसाता रहा ताकि कांग्रेस अपनी ऊर्जा सरकार से संघर्ष करने में व्यय करने के स्थान पर परस्पर संघर्ष में व्यय करे।

सूरत की फूट के परिणाम

कांग्रेस की इस फूट से गोरी सरकार बड़ी प्रसन्न हुई। लॉर्ड मिण्टो ने लिखा है- ‘सूरत में कांग्रेस का पतन अँग्रेजों की बड़ी जीत थी।’

सरकार ने कांग्रेस की इस फूट का लाभ उठाने के लिये उग्रवादी नेताओं के विरुद्ध नये सिरे से दमनचक्र आरम्भ कर दिया। उसने उग्रवादी नेताओं की चतुष्टयी अर्थात् लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल, बालगंगाधर तिलक तथा अरविन्द घोष को जेल में ठूंसने का निर्णय लिया।

(1.) अरविन्द घोष की गिरफ्तारी

1907 ई. में अलीपुर बम काण्ड के सम्बन्ध में श्री अरविन्द को उनके भाई वारीन्द्र घोष सहित बंदी बना लिया। बाद में वारीन्द्र घोष को आजीवन कारावास दिया गया।

(2.) लाला लाजपतराय की गिरफ्तारी

लाला लाजपतराय ने कांग्रेस अधिवेशन से लौटकर, पंजाब के लैंड एलीयनेशन तथा कोलोनाइजेशन कानूनों के विरुद्ध किसानों का जनमत तैयार किया। उनकी प्रेरणा से पंजाब के किसानों ने व्यापक प्रदर्शन किये जिससे अँग्रेजी शासन हिल गया। सरकार ने लाला लाजपतराय को भारत के बादशाह के प्रदेशों में अशांति मचाने के आरोप में बन्दी बनाकर बर्मा के माण्डले दुर्ग भेज दिया। उन पर कोई मुकदमा नहीं चलाया गया।

(3.) विपिनचंद्र पाल की गिरफ्तारी

: 1907 ई. में अलीपुर बम काण्ड के सम्बन्ध में श्री अरविन्द की गिरफ्तारी हुई तो विपिनचन्द्र पाल को साक्ष्य के लिए बुलाया गया परन्तु पाल ने जाने से इन्कार कर दिया। इस पर उन्हें अदालत की मानहानि के आरोप में 6 माह का कारावास दिया गया। बाद में पाल राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए भारत छोड़कर इंग्लैण्ड चले गये और 1908 से 1911 ई. तक वहीं रहे।

(4.) बालगंगाधर तिलक की गिरफ्तारी

अब सरकार तिलक को कारावास में ठूंसने का अवसर ढूँढने लगी। तिलक के समाचार पत्र केसरी में मुजफ्फरपुर बम्ब-काण्ड पर कुछ अग्रलेख प्रकाशित हुए थे जिनमें यह तर्क दिया गया था कि यदि स्वतन्त्रता के इच्छुकों से खुली सशस्त्र क्रान्ति सम्भव नहीं हो तो पराधीन जाति के सामने इसके अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं बचता है कि बम आदि का प्रयोग करे।

इन्हीं अग्रलेखों के आधार पर तिलक को बंदी बनाया गया। उनकी जमानत स्वीकार नहीं की गई और न उनको अपने बचाव में कुछ कहने का अवसर दिया गया। जज की सहायता के लिए एक जूरी बनाई बई जिसमें सात यूरोपियन और दो पारसी थे।

तिलक ने अपने मुकदमे की स्वयं तैयारी की। उन्होंने अपने ऊपर लगाये गये अभियोगों का 21 घण्टे 10 मिनट तक तर्कसंगत भाषण द्वारा खण्डन किया परन्तु उनकी एक भी बात नहीं मानी गई और उन्हें 6 वर्ष का कारावास एवं एक हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई।

(5.) देश में क्रांतिकारी आंदोलन का आरम्भ

तिलक को बंदी बनाये जाने के बाद भारत भर में उग्र आंदोलन एवं प्रदर्शन आरम्भ हो गये। अनेक स्थानों पर जन-साधारण ने पुलिस का सामना किया जिनमें 15 व्यक्ति मारे गये और 40 घायल हुए। जनता को इस आंदोलन से दूर करने के लिये सरकार ने दो नये कानून बनाये-

(अ.) एक्स्पलोजिव सब्सटैंसेज एक्ट : इस कानून के द्वारा विस्फोटक पदार्थों के लेन-देन पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

(ब.) इन्साइटमेंट टू ऑफेन्सेज एक्ट : इस कानून के द्वारा सरकार ने राजद्रोह की गतिविधियों में भाग लेने पर रोक लगा दी।

भारतीय जनता पर इन दोनों कानूनों का असर नहीं हुआ। पूरे देश में आंदोलन जोर पकड़ने लगा। अब सरकार किसी भी संस्था पर सन्देह होने से ही उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती थी। सरकार ने इस कानून का भरपूर दुरुपयोग किया।

ढाका की अनुशीलन समिति, मैमनसिंह की सुहृद समिति, बारीसाल की स्वदेश बाँधव समिति आदि अनेक संस्थाएँ शान्ति पूर्वक एवं अंहिसात्मक विधि से कार्य कर रही थीं किंतु इन्हें असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। सरकार की इस दमनकारी नीति से देश के नवयुवकों का खून खौल उठा और उन्होंने सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग पकड़ा। उन्होंने सरकार से बदला लेने के लिए गुप्त रूप से बम बनाने आरम्भ कर दिये।

मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट 1909

ब्रिटिश सरकार ने एक तरफ तो उग्रवादियों को जेल में ठूंसने का मार्ग अपनाया तो दूसरी ओर उदारवादियों को सन्तुष्ट करने के लिए उनकी कुछ मांगें मान लीं। 1909 ई. के मार्ले-मिण्टो सुधार इसी नीति के परिणाम थे। इन सुधारों के द्वारा वायसराय की कार्यकारिणी में एक भारतीय सदस्य को स्थान दिया गया; प्रान्तों के गवर्नरों की कार्यकारिणी में भारतीयों की संख्या बढ़ाई गई; विधान सभाओं के सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गई।

उन्हें बजट तथा अन्य विषयों पर बहस करने और प्रस्ताव रखने के अधिकार दिये गये। सरकार ने मुसलमानों, जमींदारों और व्यापारियों को अलग प्रतिनिधित्व दिया। नरम पंथी नेताओं ने इन सुधारों का स्वागत किया। गोखले की धारणा थी कि सरकार का यह कदम निःसन्देह उदार एवं उचित है।

वे अनुरोध कर रहे थे कि जनता उनको स्वीकार करे और सरकार का अभिनन्दन करे। उग्रवादियों का कहना था कि ये सुधार भारतीयों को मूर्ख बनाने के लिए किये गए थे।

कांग्रेस के 1910 ई. के इलाहाबाद अधिवेशन में उदारवादी नेताओं द्वारा भी मार्ले-मिण्टो सुधार की कड़ी आलोचना की गई तथा उसे हिन्दुओं एवं मुसलमानों में फूट डालने वाला एवं साम्प्रदायिक भावनाओं को उभारने वाला बताया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन – गरमपंथी कांग्रेस

कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के कारण

उग्रराष्ट्रवादियों द्वारा बंग-भंग का विरोध

सूरत की फूट

उग्रवादी नेतृत्व की कार्यशैली

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व का मूल्यांकन

उग्रवादी नेतृत्व की कार्यशैली

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उग्रराष्ट्रवादी नेता श्री अरविंद घोष

उग्रवादी नेतृत्व की कार्यशैली कांग्रेस के उदारवादी नेताओं से बिल्कुल अलग थी। उग्रवादी नेता अंग्रेज सरकार के समक्ष अनुनय-विनय की शब्दाली का प्रयोग करने के स्थान पर सरकार का प्रत्यक्ष विरोध करने के समर्थन में थे।

उग्रवादी गुट का प्रादुर्भाव, उदारवादी नेताओं की कार्यशैली के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। अतः स्वाभाविक था कि उग्रवादी नेताओं की कार्यशैली उदारवादियों से बिल्कुल भिन्न थी।

उग्रवादी नेतृत्व की कार्यशैली

उग्रवादियों की कार्यशैली में निम्नलिखित मुख्य तत्व सम्मिलित थे-

(1.) आवेदन-निवेदन की नीति में अविश्वास

उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त भारत की कल्पना नहीं करते थे इसलिये वे सरकार से सहयोग एवं अनुनय का मार्ग अपनाने पर जोर देते थे जबकि उग्रवादी नेता आवेदन-निवेदन और याचना की नीति में विश्वास नहीं करते थे। वे भारतीयों द्वारा अँग्रेजी साम्राज्य से सहयोग करने की नीति को भी उचित नहीं समझते थे।

(2.) राष्ट्रव्यापी आंदोलन की आवश्यकता में विश्वास

उग्रवादी नेता भारतीयों के लिये स्वराज्य चाहते थे तथा स्वराज्य की प्राप्ति के लिए राष्ट्रव्यापी आन्दोलन की आवश्यकता अनुभव करते थे। वे जन साधारण में राष्ट्र-प्रेम एवं बलिदान की अटूट भावना विकसित करना चाहते थे जिससे घबराकर गोरी सरकार भारत से चली जाये। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार और राष्ट्रीय शिक्षा पर बल देते थे।

(3.) जन साधारण को संगठित करने हेतु धार्मिक समारोहों का प्रयोग

इस काल में भारत का सम्पन्न वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग एवं मध्यम वर्ग पश्चिमी शिक्षा एवं जीवन शैली के आकर्षण में फंसे हुए थे। इन लोगों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने के लिए उनके समक्ष भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक श्रेष्ठता को स्थापित करना आवश्यक था। इसी उद्देश्य से तिलक ने महाराष्ट्र में जन साधारण के स्तर पर गणेश पूजन तथा शिवाजी उत्सव मनाने की परम्परा आरम्भ की। अरविन्द घोष ने बंगाल में एक माह तक चलने वाली काली पूजा आरम्भ की। लाला लाजपतराय ने पंजाब में आर्य समाज आन्दोलन को सशक्त बनाने का काम किया। इस प्रकार इन उग्रवादी नेताओं ने इन धार्मिक एवं सामाजिक समारोहों को व्यापक रूप देकर उन्हें राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक चेतना उत्पन्न करने का प्रभावी माध्यम बना दिया।

(4.) द्विराष्ट्र के सिद्धांत का विकास

राष्ट्रवादी नेताओं ने जनसाधरण को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उठ खड़े होने एवं उनमें एकता की भावना उत्पन्न करने के लिये व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं धार्मिक समारोहों को आरम्भ किया था किंतु अँग्रेजों ने इन समारोहों की आड़ में मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध उकसाया तथा कट्टर मुस्लिम नेताओं को पृथकतावादी आन्दोलन आरम्भ करने हेतु प्रोत्साहित किया।

सरकार द्वारा उग्र राष्ट्रवाद को मुस्लिम-विरोधी बताकर उसे असफल करने के प्रयास किये गये। इस कारण भारत में द्वि-राष्ट्रवाद के सिद्धान्त का विकास हुआ। इस सिद्धांत के अनुसार भारत में एक राष्ट्र नहीं होकर दो राष्ट्र बसते हैं- पहला हिन्दू राष्ट्र और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र। इस विचार से प्रभावित होकर अनेक मुसलमानों ने स्वयं को राष्ट्रीय आन्दोलन से दूर कर लिया तथा 1906 ई. में मुस्लिम लीग की स्थापना की।

(5.) राष्ट्रवादी शिक्षा के विकास की आवश्यकता

उग्रवादी नेता भारत में ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति स्थापित करना चाहते थे जो देशभक्त नागरिक तैयार कर सके। उनका मानना था कि अँग्रेजी शिक्षा पद्धति से मानसिक गुलाम तैयार किये जा रहे हैं। यदि भारतीय नौजवानों में स्वतंत्र चिंतन की योग्यता उत्पन्न हो जाये तो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को स्वतः गति प्राप्त हो जायेगी।

इस विचार से प्रेरित होकर उग्रवादी नेताओं ने देश भर में थियोसॉफिकल स्कूल और कॉलेज, डी. ए. वी. स्कूल, हिन्दू कॉलेज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आदि स्थापित कियेे। इन संस्थाओं ने राष्ट्रीयता के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पर अँग्रेजों ने मुसलमानों तथा अन्य धर्मावलम्बियों को भी अपनी अलग शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने के लिये उकासाया जिनमें उन धर्मों, मतों एवं पंथों की धार्मिक शिक्षा दी जाने लगी।

उग्र राष्ट्रवाद की मुख्य विशेषताएँ

भारत एक समष्टिवादी देश है जिसमें परम्परा से ही प्राणी मात्र के प्रति दया एवं शरण देने का भाव रहा है। इस कारण भारतीय लोग सनातन रूप से सांस्कृतिक उच्चता, परस्पर सहयोग और शांति के सिद्धांतों में विश्वास रखते थे न कि राजनीतिक सीमाओं पर आधारित राष्ट्रवाद के सिद्धांत में।

भारत में राष्ट्रवाद का विचार यूरोप से आया जहाँ छोटे-छोटे देश अपने राष्ट्र के गौरव की वृद्धि के लिये सैंकड़ों सालों से एक-दूसरे से संघर्ष कर रहे थे। बीसवीं सदी के आरम्भ में भारत में उग्र राष्ट्रवाद का उदय एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। उग्र राष्ट्रवाद की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार से थीं-

(1.) उग्र राष्ट्रवाद के समर्थक नेता, उन्नीसवीं सदी में भारत में चले अनेकानेक धर्मिक एवं समाजिक सुधार आन्दोलनों से प्रभावित थे।

(2.) उग्र राष्ट्रवादी नेता पाश्चात्य शिक्षा एवं जीवन शैली को भारत के लिये विनाशकारी मानते थे। वे भारतीयों के लिये भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को ही श्रेष्ठ मानते थे।

(3.) उग्र राष्ट्रवादियों का उद्देश्य स्वराज्य की प्राप्ति था न कि ब्रिटिश सरकार की अनुकम्पा प्राप्त करके नागरिक अधिकारों में वृद्धि करवाना।

(4.) उग्र राष्ट्रवादी नेता देशवासियों में राष्ट्रीयता का विकास चाहते थे। वे युवाओं में स्वतंत्र चिंतन एवं उच्च चारित्रिक गुणों का विकास करके ऐसी पीढ़ी तैयार करना चाहते थे जो अपने देश की आजादी के लिये संघर्ष कर सके।

(5.) उग्र राष्ट्रवादियों को अँग्रेजों की न्यायप्रियता एवं परोपकारिता के दावों में विश्वास नहीं था।

(6.) उग्रवादी देशहित, आत्मनिर्भरता एवं ईश्वर में विश्वास करते थे।

(7.) उग्रवादियों का विश्वास था कि भारत और ब्रिटेन के आर्थिक हित एक दूसरे के विरोधी हैं। इसलिए भारत को ब्रिटेन से आर्थिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध तोड़ने आवश्यक हैं।

उदारवाद तथा उग्रराष्ट्रवाद में अन्तर

उदारवाद कांग्रेस के आरम्भिक काल का दौर था और उग्र राष्ट्रवाद उसकी प्रतिक्रिया में उत्पन्न भारत की स्वाभाविक चेतना का प्राकट्य। इस कारण इन दोनों विचारधाराओं में पर्याप्त अंतर थे। यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि इन दोनों विचार धाराओं के उद्देश्यों में जितना अधिक अंतर था उतना ही अधिक अंतर उनके साधनों में भी था। इस अंतर को निम्नलिखित बिंदुओं में स्पष्ट किया जा सकता है-

(1.) राजनीतिक उद्देश्यों में अंतर

उदारवादियों एवं उग्रवादियों के राजनीतिक उद्देश्यों में बहुत बड़ा अंतर था। उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत ही उत्तरदायी सरकार की कल्पना करते थे। वे अँग्रेजों के रहने में ही भारत का कल्याण समझते थे। एक बार लॉर्ड हार्डिंग ने गोखले से कहा- ‘तुम्हें कैसा लगेगा यदि तुम्हें मैं यह कहूँ कि एक माह में ही समस्त ब्रिटिश अधिकारी और सेना भारत छोड़ देंगे।’

इस पर गोखले का उत्तर था- ‘मैं इस समाचार को सुनकर प्रसन्नता अनुभव करूंगा किन्तु इससे पूर्व कि आप लोग अदन तक पहुँचेगें, हम आपको वापस आने के लिये तार कर देंगे।’

उदारवादियों से ठीक उलट, उग्रवादियों ने देश के लिये स्वराज की मांग की। तिलक का कहना था कि जितनी जल्दी हो सके अँग्रेजों को भारत से चले जाना चाहिए। इससे भारतीयों को अपार प्रसन्नता होगी। उग्रवादी नेताओं का मानना था कि विदेशी सुशासन कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह स्वशासन से श्रेष्ठ नहीं हो सकता।

(2.) राजनीतिक आंदोलन के तरीके में अंतर

उदारवादी नेता, संवैधानिक उपायों, अनुनयों, विनम्र प्रार्थनाओं, स्मृति पत्रों, ज्ञापनों, अधिवेशन में परित प्रस्तावों तथा भाषणों के माध्यम से भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों में वृद्धि चाहते थे। वे अपनी सुविधा भोगी जिंदगी में व्यवधान उत्पन्न करके जेल जाने को तैयार नहीं थे।

उन्होंने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिये साम्राज्यवादियों के देश इंग्लैण्ड में जाकर भी अभियान चलाया तथा सरकार से सहयोग करने का मार्ग अपनाया। इसके विपरीत उग्र राष्ट्रवादी नेता, अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिये उग्र राष्ट्रीय आंदोलन एवं राजनीतिक संघर्ष में विश्वास करते थे।

वे सड़कों पर लाठियां खाने एवं जेल जाने के लिये तैयार थे। विदेशी शासन से सहयोग का विचार उन्हें तनिक भी मान्य नहीं था। वे स्वराज्य को अपना अधिकार मानकर उसे स्वयं प्राप्त करना चाहते थे। उन्हें ब्रिटिश सरकार से सहानुभूति, भीख एवं उदारता की अपेक्षा नहीं थी।

विपिनचन्द्र पाल का कहना था- ‘कोई किसी को स्वराज्य नहीं दे सकता। यदि आज अँग्रेज उन्हें स्वराज्य देना चाहें तो वह ऐसे स्वराज्य को ठुकरा देंगे क्योंकि मैं जिस वस्तु को उपार्जित नहीं कर सकता; उसे स्वीकार करने का भी पात्र नहीं हूँ।’

तिलक का कहना था कि- ‘राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए लड़ना पड़ेगा…… अँग्रेजों के साथ सहयोग करना और भिक्षा तथा उपहार, वरदानों के रूप में अधिकार प्राप्त करना नितान्त भ्रामक है।’

लाला लाजपतराय ने 1905 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में कहा था- ‘एक अँग्रेज को भिखारी से बड़ी घृणा और विरक्ति होती है। मेरे विचार में भिखारी है ही इस योग्य कि उससे घृणा की जाये। अतः हमारा कर्त्तव्य है कि अब हम अँग्रेजों को दिखा दें कि हम भिक्षुक नहीं हैं। हमारा आदर्श भीख मांगना नहीं, वरन् आत्म-निर्भरता है।’

(3.) भारतीय संस्कृति से लगाव में अंतर

उदारवादी नेता पाश्चात्य शिक्षा एवं जीवन शैली से प्रभावित थे। वे अँग्रेजों की न्यायप्रियता एवं परोपकारिता में विश्वास करते थे। इस कारण वे भारत के पश्चिमीकरण के समर्थक थे। गोपालकृष्ण गोखले का विचार था कि भारतीय परम्पराएं भारत के धर्मनिरपेक्ष तथा प्रजातान्त्रिक आधुनिक राष्ट्र बनने के मार्ग में बाधक हैं।

जबकि उग्रवादी नेता, भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति में विश्वास करते थे और हिन्दू राष्ट्रवाद से अत्यधिक प्रभावित थे। उग्रवादियों का राष्ट्रवाद भारत के गौरवपूर्ण प्राचीन महत्त्व पर आधारित था। तिलक तथा अन्य उग्रवादी नेताओं ने हिन्दू संस्कृति के पुनरुत्थान का प्रचार किया।

तिलक ने महाराष्ट्र में शिवाजी उत्सव तथा गणपति पूजा को पुनर्जीवित किया तथा विपिनचन्द्र पाल ने कलकत्ता में विराट स्तर पर काली पूजा की परम्परा आरम्भ की। लाला लाजपतराय ने आर्य समाज की गतिविधियों को बल प्रदान किया। गणपति पूजा के उत्सव में हिन्दुओं के साथ-साथ शिया और सुन्नी भी भाग लेते थे।

(4.) स्वदेशी आन्दोलन सम्बन्धी नीति में अंतर

कांग्रेस के मंच से 1891 ई. में विदेशी वस्तुओं की जगह स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का नारा दिया गया था परन्तु इस दिशा में कभी गम्भीर प्रयास नहीं किया गया था। उदारवादी नेतृत्व में स्वदेशी का विचार भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन देने तक ही सीमित था जबकि उग्रवादी नेतृत्व ने बंग-भंग आन्दोलन के दौरान स्वदेशी अपनाने के नारे को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध शक्तिशाली हथियार बना लिया। उग्रवादी नेतृत्व ने स्वदेशी के विचार को प्रत्येक भारतीय वस्तु के साथ गहन अनुराग का स्वरूप प्रदान किया।

(5.) विदेशी विचारों एवं वस्तुओं के बॉयकाट सम्बन्धी नीति में अंतर

उदारवादी नेता विदेशी वस्तुओं एवं विचारों के बहिष्कार के घोर-विरोधी थे। उनका मानना था कि ऐसा करना अव्यावहारिक है तथा जनता की सेवा के लिए उपलब्ध सुनहरे अवसरों का परित्याग है। जबकि उग्रवादी नेता, विदेशी वस्तुओं के साथ-साथ विदेशी विचारों के बहिष्कार के भी समर्थक थे।

उनकी दृष्टि में बहिष्कार का अर्थ केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं था अपितु विदेशी शासन से असहयोग, सरकारी नौकरियों तथा उपाधियों का बहिष्कार तथा विदेशी सामान खरीदने-बेचने वालों का बहिष्कार भी सम्मिलित था।

(6.) शिक्षा सम्बन्धी विचारों में अंतर

ब्रिटिश शासन ने भारत की शिक्षा नीति पर पूर्ण रूपेण शिकंजा कस रखा था। इस पर भी उदारवादी नेता पाश्चात्य शिक्षा को भारतीयों के लिए अच्छा मानते थे। बंग-भंग आन्दोलन आरम्भ होने पर सरकार द्वारा सरकारी शिक्षा विभाग का उपयोग, छात्रों और शिक्षकों को बॉयकाट तथा स्वदेशी आन्दोलन से दूर रखने के लिए किया गया।

शिक्षा के सम्बन्ध में उग्रवादी नेताओं के विचार, उदारवादी नेताओं की नीति से बिल्कुल विपरीत थे। उग्रवादी नेता पाश्चात्य शिक्षा के स्थान पर राष्ट्रीय शिक्षा चाहते थे तथा शिक्षा नीति पर विदेशी शासकों का अंकुश नहीं चाहते थे।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर ब्रिटिश नियंत्रण के सम्बन्ध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का कहना था- ‘भारत में विदेशियों द्वारा शिक्षा का नियन्त्रण और निर्देशन सबसे ज्यादा अस्वाभाविक घटना है……… देश की आवश्यकताओं को पूरा करना ही भारत में राष्ट्रीय शिक्षा का उद्देश्य और लक्ष्य है।’

महाराष्ट्र में तिलक और पंजाब में लाजपतराय आदि नेताओं ने राष्ट्रीय शिक्षा के प्रचार कार्य को आगे बढ़ाया ताकि नवयुवकों में राष्ट्रीयता की भावना का संचार हो सके।

(7.) ब्रिटिश न्यायप्रियता में आस्था सम्बन्धी अंतर

उदारवादी नेता ब्रिटिश शासन के प्रशंसक थे। उनका ब्रिटिश प्रजातन्त्र में असीम विश्वास था। उदारवादियों के लिये अँग्रेजी शासन उनके लिए अभिशाप न होकर वरदान स्वरूप था। उनका यह भी मानना था कि एक दिन ब्रिटिश सरकार भारतीयों को भी भारत में वही अधिकार दे देगी जो इंग्लैण्ड में अँग्रेज जनता को प्राप्त थे।

उग्रवादी नेता ब्रिटिश शासन के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि भारतीयों को स्वतन्त्रता पाने के लिए केवल अपने-आप पर ही भरोसा करना होगा। अँग्रेज अपनी इच्छा से भारत का शासन भारतीयों को नहीं सौपेंगे। इसके लिए संघर्ष करना होगा। उग्रवादी नेता भारत में अँग्रेजी शासन को अभिशाप मानते थे।

(8.) नेताओं की पृष्ठभूमि में अंतर

उदारवादियों का नेतृत्व शिक्षित और उच्च वर्ग के लोगों के हाथों में था जबकि उग्रवादी विचारधारा का नेतृत्व मध्यम वर्गीय और सामान्य पृष्ठभूमि से आये व्यक्तियों के हाथ में था। उदारवादी पक्ष भारतीय संस्कारों के ज्यादा अनुकूल नहीं था जबकि उग्रवादी पक्ष भारतीय आवश्यकताओं के अधिक अनुकूल था।

(9.) ब्रिटिश नेताओं के समर्थन में अंतर

उदारवादियों को अनेक प्रतिष्ठित उदारवादी अँग्रेजों तथा ब्रिटिश सांसदों का समर्थन एवं सहयोग मिला परन्तु उग्रवादियों को ब्रिटिश नेताओं एवं जनमत से समर्थन अथवा सहयोग नहीं मिला। उदारवादियों को बढ़ावा देने के लिये भारत की गोरी सरकार ने उग्रवादियों को कुचलने की नीति अपनाई। उदारवादी नेताओं ने उग्रवादी नेताओं के बचाव के लिये कुछ नहीं किया।

उदारवाद तथा उग्र राष्ट्रवाद में समानताएँ

यद्यपि उग्र राष्ट्रवाद, उदारवाद की प्रतिक्रया में उत्पन्न हुआ था तथापि वे एक दूसरे के पूरक थे। उदारवादियों ने, कांग्रेस के रूप में उग्रवादियों के लिये एक पृष्ठभूमि तैयार की तथा उग्रवाद ने उसी कांग्रेस का उपयोग अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने में किया। दोनों ही सच्चे देशभक्त और देशप्रेमी थे। उदारवादी आलोचना, भाषण और प्रार्थना-पत्रों से सरकार को प्रभावित करना चाहते थे जबकि उग्रवादी सक्रिय आन्दोलन का मार्ग अपनाने के पक्ष में थे।

रामनाथ सुमन ने लिखा है- ‘जब हम नरम व गरम दोनों दलों की प्रवृत्तियों का विश्लेषण और अध्ययन करते हैं तो मालूम पड़ता है कि हमारी राष्ट्रीयता के विकास में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों हमारी राजनीति के स्वाभाविक उपकरण हैं। वस्तुतः वे एक ही आन्दोलन के दो पक्ष हैं। एक ही दीपक के दो परिणाम हैं। पहला प्रकाश का द्योतक है; दूसरा गर्मी का। पहला बुद्धि-पक्ष है; दूसरा भाव-पक्ष है। पहला जहाँ कुछ सुविधाएं प्राप्त करना चाहता था, वहाँ दूसरे का उद्देश्य राष्ट्र में मानसिक परिवर्तन करना था।’

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है कि उदारवादियों एवं उग्रवादियों, दोनों का लक्ष्य एक सीमा तक ही एक जैसा था। दोनों ही पक्ष राष्ट्रीय शक्तियों को मजबूत बनाना चाहते थे। दोनों ही पक्षों के नेता राष्ट्रहित की भावना से प्रेरित होने के कारण उच्चकोटि के देश-भक्त थे।

दोनों ही पक्ष भारत की सर्वांगीण प्रगति चाहते थे किंतु इन दोनों के मार्ग तथा लक्ष्यों का अंतिम पड़ाव बिंदु अलग थे। उदारवादी नेता ब्रिटिश सरकार से सहयोग एवं समझौता करके, वैधानिक उपायों से राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के समर्थक थे। उनका उद्देश्य स्वराज प्राप्त करना नहीं था।

वे अँग्रेजों की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन चाहते थे जबकि तिलक आदि उग्रवादी नेताओं को राजनीतिक भिक्षावृत्ति पसन्द नहीं थी और वे अँग्रेजों द्वारा प्रदत्त सुराज के स्थान पर स्वयं द्वारा निर्मित स्वराज चाहते थे और इसकी प्राप्ति के लिए संघर्ष करने के समर्थक थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन – गरमपंथी कांग्रेस

कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के कारण

उग्रराष्ट्रवादियों द्वारा बंग-भंग का विरोध

सूरत की फूट

उग्रवादी नेतृत्व की कार्यशैली

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व का मूल्यांकन

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व का मूल्यांकन

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उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व का मूल्यांकन

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व का मूल्यांकन करते समय हमें उनकी सफलताओं एवं विफलताओं दोनों पर विचार करना चाहिए। उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को उदारवादी नेतृत्व के दौर से आगे बढ़ाया जिसके कारण कांग्रेस को जनता का प्रबल समर्थन प्राप्त हो सका।

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व का मूल्यांकन

उग्रवादियों की सफलताएँ

उग्रवादी आन्दोलन का प्रमुख क्षेत्र बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब था परन्तु इसका प्रभाव सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत में व्याप्त था। उग्रवादी अथवा गरम दल नेताओं ने भारत के राजनीतिक जीवन में नये युग का सूत्रपात किया।

उन्होंने उदारवादियों की समझौतावादी राजनीति और ब्रिटिश न्यायप्रियता तथा ईमानदारी में विश्वास की नीति का परित्याग करके संघर्ष की नीति को अपनाया। उन्होंने भारतीय नवयुवकों में नवीन उत्साह का संचार किया तथा उनको आत्म-निर्भरता, आत्म-विश्वास और आत्म-बलिदान की शिक्षा दी।

उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन-आन्दोलन में बदलने का प्रयास किया। इस कारण भारत के श्रमिक, किसान, शिक्षित बेरोजगार नवयुवक, असन्तुष्ट निम्न मध्यम वर्ग, कम वेतन पाने वाले बुद्धिजीवी तथा अन्य व्यवसायों में लगे लोग इस आंदोलन की तरफ आकर्षित हुए। उग्रवादियों ने ही इस बात को जोर देकर कहा कि राजनीतिक आजादी ही राष्ट्र का जीवन है।

उग्रवादियों की विफलताएँ

उग्र राष्ट्रवादी नेताओं की सफलताएं बहुत बड़ी थीं किंतु उन्हें कुछ असफलताओं का भी सामना करना पड़ा। इनमें से कुछ असफलताएँ इस प्रकार से हैं-

(1.) उग्रवादियों ने भारतीय जन साधारण को आंदोलन का सही मार्ग तो दिखा दिया परन्तु वे जनता के उत्साह को संगठित आन्दोलन का रूप नहीं दे पाये।

(2.) 1907-1916 ई. की अवधि में, उदारवादियों का मनोबल गिरा हुआ था किंतु फिर भी उग्रवादी नेता न तो कांग्रेस पर कब्जा कर पाये और न ही उसके स्थान पर कोई नया लोकप्रिय दल बनाकर अपने संगठन का कौशल दिखा पाए।

(4.) उदारवादियों के विफल होते ही, ब्रिटिश सरकार ने पूरी ताकत के साथ उग्रवादियों की गतिविधियों को कुचलना आरम्भ कर दिया। 1908 ई. में समाचार पत्रों का मुंह बन्द करने के लिए समाचार पत्र विधेयक लागू किया गया, आतंकवादी अभियोगों से निपटने के लिए दंडविधि संशोधन अधिनियम (1908) लागू किया गया और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबंधित करने के लिए राजद्रोह सम्मेलन अधिनियम-1911 लागू किया गया। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय तथा अन्य उग्रवादी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया जिससे उग्रवादियों को भारी धक्का लगा। रिहाई के बाद इनमें से बहुत से नेताओं का मनोबल टूट गया।

(4.) 1916 ई. में तिलक, लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस की एकता फिर से स्थापित करने में सफल रहे और एनीबीसेंट के साथ मिलकर होमरूल आन्दोलन चलाते रहे। जब 1919 ई. में मोहनदास गांधी ने असहयोग सम्बन्धी प्रस्ताव रखा तो तिलक और एनीबीसेंट ने कांग्रेस छोड़ दी।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उग्रवादी अथवा राष्ट्रवादी कांग्रेसी नेताओं ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी किंतु उग्रवादी नेताओं के विरुद्ध उदारवादी नेताओं के अड़ियल रुख तथा उग्रवादी नेताओं का अंग्रेजी सरकार द्वारा किये गये दमन के कारण उग्रवादी नेता अधिक सफलताएँ अर्जित नहीं कर पाये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन – गरमपंथी कांग्रेस

कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व

उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व की उत्पत्ति के कारण

उग्रराष्ट्रवादियों द्वारा बंग-भंग का विरोध

सूरत की फूट

उग्रवादी नेतृत्व की कार्यशैली

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भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन का उदय

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भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन का उदय

यदि यह कहा जाए कि भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन का उदय कांग्रेस के उग्र राष्ट्रवादी नेताओं की रीतियों-नीतियों से प्रेरित था, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

कांग्रेस के उग्रवादी नेता उग्र आंदोलन के समर्थक थे जिनमें असहयोग, प्रदर्शन, भाषण, बहिष्कार आदि उग्र उपायों का सहारा लिया जाता था। वे किसी भी स्थिति में हिंसक उपायों के समर्थक नहीं थे परन्तु आजादी के मतवाले कुछ युवाओं ने उग्रवादियों के संघर्ष के सिद्धान्त की व्याख्या न्याय-संगत हिंसा के रूप में की।

इस विचारधारा को अपनाने वालों को भारतीयों द्वारा क्रान्तिकारी तथा गोरी सरकार द्वारा आतंकवादी कहा गया। क्रान्तिकारी, भारत से ब्रिटिश शासन का अन्त करने के लिए हिंसा, लूट, हत्या जैसे किसी भी साधन का प्रयोग करना उचित मानते थे। अँग्रेज सरकार की दृष्टि में क्रान्तिकारी आतंकवाद, उग्र राष्ट्रवाद का ही एक पक्ष था किन्तु दोनों की भिन्न कार्यपद्धति से स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि क्रांति का पथ, राजनीतिक उग्रवाद से सर्वथा भिन्न था।

भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन का उदय

माना जाता है कि कांग्रेस के उग्रवादी आन्दोलन के विरुद्ध ब्रिटिश शासन का दमनचक्र तेज होने पर देशभक्तों के मन में तीव्र प्रतिक्रिया हुई तथा युवाओं के पास क्रान्तिकारी आन्दोलन के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं रह गया। इस कारण भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन आरम्भ हुआ किंतु वास्तविकता यह है कि कांग्रेस के उग्रवादी आंदोलन आरम्भ होने पूर्व ही क्रान्तिकारी आन्दोलन का बिगुल बज उठा था।

बहावियों द्वारा सितम्बर 1871 में कलकत्ता में मुख्य न्यायधीश नार्मन की हत्या और फरवरी 1872 में अंडमान में वायसराय लॉर्ड मेयो की हत्या को क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत तो नहीं कहा जा सकता किंतु ये हिंसक घटनायें युवा पीढ़ी को क्रांति के मार्ग पर ले जाने में प्रेरक सिद्ध हुईं। 1876 ई. में वासुदेव बलवन्त फड़के द्वारा सरकार के विरुद्ध सशस्त्र क्रान्ति की घटना ने देश में क्रांतिकारी आंदोलन को जन्म दिया। उन्नीसवीं सदी के अन्त तक क्रांतिकारी आंदोलन का स्वरूप स्पष्ट होने लगा।

लन्दन टाइम्स के संवाददाता वेलेन्टाइन शिरोल ने लिखा है- ‘क्रान्तिकारी एवं आतंकवादी आन्दोलन पश्चिम के विरुद्ध ब्राह्मणों की प्रतिक्रिया थी और उसे कट्टरवादी हिन्दुओं ने प्रेरित किया था। गुप्त संगठन, जो हिंसा का प्रचार करते थे, धर्म से प्रेरणा लेते थे …..दक्षिण का ब्राह्मणवाद अत्यन्त लड़ाकू था और तिलक इसके नेता थे।’

शिरोल का यह कथन सही नहीं माना जा सकता क्योंकि पंजाब और बंगाल में गैर-ब्राह्मणों ने क्रान्तिकारी आन्दोलन चलाया था। आयोध्यासिंह ने लिखा है- ‘रूस और आयरलैण्ड के आतंकवादी आन्दोलन ने भारत के आतंकवादी आन्दोलन को पैदा करने और संगठित होने में बड़ा काम किया।’

भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन का उदय होने के कारण

भारत में क्रान्तिकारी एवं आतंकवादी आन्दोलन का उदय लगभग उन कारणों से हूआ जिनके कारण उग्रवाद का उदय हुआ था। उग्रवादियों के विरुद्ध सरकार की दमनकारी नीति तथा कुछ अन्य घटनाओं ने इसे विशेष बल प्रदान किया। क्रान्तिकारी आन्दोलन को बढ़ावा देने में निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे-

(1.) उदारवादियों की विफलता

उदारवादियों के संवैधानिक उपायों की असफलता के कारण भारतीय नवयुवकों में वैधानिक मार्ग के प्रति विश्वास नहीं रहा। उन्हें लगने लगा था कि सरकार के समक्ष गिड़गिड़ाने और हाथ-पैर जोड़ने से ब्रिटिश सरकार, भारतीयों को स्वतन्त्रता देने वाली नहीं है। इसके लिए क्रान्तिकारी उपायों से अँग्रेजों में भय उत्पन्न करना होगा।

(2.) सरकार द्वारा भारतीयों का शोषण

उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में, देश के भीतर सरकारी नीतियों के विरुद्ध प्रबल असन्तोष व्याप्त था। जनता भुखमरी, बेरोजगारी, अकाल और महामारी से त्रस्त थी। क्रांति का मार्ग पकड़ने वाले वासुदेव बलवन्त फड़के ने न्यायालय में अपने वक्तव्य में कहा था- ‘भारतीय आज मृत्यु के द्वार पर खड़े हैं। ब्रिटिश सरकार ने जनता को इतना अधिक कुचल दिया है कि वे सदा अकाल और खाद्य पदार्थों की कमी से दुःखी रहते हैं। जहाँ दृष्टि डालो, वहीं ऐसे दृश्य दिखाई देंगे जिनसे हिन्दू और मुसलमानों के सिर लज्जा से झुक जाते हैं।’

ब्रिटिश शासन द्वारा किये गये आर्थिक शोषण तथा अकाल और प्राकृतिक प्रकोपों के समय में सरकार द्वारा राहत कार्य न किये जाने की घटनाओं ने युवाओं को क्रान्ति के लिए प्रेरित किया।

(3.) मध्यम वर्ग में असंतोष

क्रान्तिकारी आन्दोलन मध्यम वर्ग में तेजी से फैला। इस मार्ग पर चलने वालों में अधिकांशतः पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त नवयुवक थे। इनमें से अधिकांश नवयुवक बेराजगार थे। सरकार की आर्थिक शोषण की नीति ने मध्यम वर्ग को बुरी तरह से प्रभावित किया था और उसे समाज में अपनी प्रतिष्ठा को बनाये रखना कठिन हो गया था।

बड़ी संख्या में मध्यमवर्गीय परिवार निर्धन होने लगे थे। सरकार द्वारा किये जा रहे शोषण एवं कांग्रेस की असफलताओं ने नवयुवकों में क्रान्तिकारी प्रवृत्ति पैदा कर दी। यह क्रान्तिकारी भावना स्वतन्त्रता प्राप्ति की लालसा तथा भावी सुखी जीवन के स्वप्न से प्रेरित थी।

(4.) सरकार की स्वार्थपूर्ण नीतियाँ

भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन, सरकार की स्वार्थपूर्ण नीतियों का परिणाम था। मॉडर्न रिव्यू ने लिखा था- ‘आतंकवाद के अन्तिम कारण को सरकार की सोलह आने स्वार्थी, स्वेच्छाचारी और अत्याचारी नीतियों में खोजना होगा….. ब्रिटिश शासकों ने जब राष्ट्रीय आन्दोलन को दबाने के लिए जारशाही के निरंकुश तरीकों को अपनाया तो क्रांतिकारियों ने उसका सामना करने के लिए रूसी आतंवादियों का रास्ता अपनाया।’

लॉर्ड कर्जन की नीतियों ने क्रांतिकारी आन्दोलन को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया। उसके शासनकाल में दो बार अकाल पड़ा परन्तु अकाल-राहत कार्यों में सरकार का दृष्टिकोण अत्यन्त कठोर एवं अमानवीय रहा। कर्जन ने कलकत्ता निगम अधिनियम पारित करके निगम की स्वायत्तता छीन ली।

कर्जन ने विश्वविद्यालय अधिनियम पारित कर भारतीय विश्वविद्यालयों पर सरकारी शिकंजा कस दिया। ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट ने अभिव्यक्ति पर अंकुश लगा दिया। कर्जन की जातीय भेद नीति ने लोगों को और अधिक उग्र बना दिया।

कर्जन ने घोषणा की- ‘केवल अँग्रेज ही भारत पर शासन करने के योग्य है।’ कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर दिया। बंग-भंग के विरोध में जो आन्दोलन चला, सरकार ने उसे भी कठोरता से कुचलने का प्रयास किया।

भारत सरकार द्वारा अपनाई जा रही नीतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने वायसराय को पत्र लिखकर सूचित किया- ‘राजद्रोह और अन्य अपराधों के सम्बन्ध में जो दिल दहलाने वाले दंड दिये जा रहे हैं, उनके कारण मैं अत्यन्त चिन्तित हूँ। हम व्यवस्था चाहते हैं किन्तु इसके लिए घोर कठोरता के उपयोग से सफलता नहीं मिलेगी। इसका परिणाम उल्टा होगा और लोग बम का सहारा लेंगे।’

भारत सचिव का अनुमान सही था। जब लोगों को सार्वजनिक रूप से आंदोलन चलाने की छूट नहीं मिली तो वे छिपकर आंदोलन चलाने लगे। मांटेग्यू चैम्सफोर्ड ने स्वीकार किया है- ‘दण्ड-संहिता की सजाओं और चाकू चलाने की नीति ने साधारण और बिगड़े नवयुवकों को शहीद बनाया और विप्लवकारी लोगों की संख्या बढ़ा दी।’

(5.) भारतीय संस्कृति का अपमान

अँग्रेजों ने भारतीयों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का भी सार्वजनिक रूप से अपमान किया। 1883 ई. में बंगाल में एक अँग्रेज जज ने अदालत में हिन्दू देवता ठाकुरजी की प्रतिमा को कोर्ट में हाजिर करने के आदेश दिये। जब सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इस बात का विरोध किया तो उन्हें न्यायालय की मानहानि का दोषी ठहराकर दो माह की कैद की गई। पंजाब में गायों के सरकारी बूचड़खाने खोलने के लिये मुसलमानों को आगे किया गया। इन सब बातों ने युवकों को हत्या और मारकाट का मार्ग पकड़ने के लिये प्रेरित किया।

भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन के उद्देश्य

प्रारंभिक क्रांतिकारियों का भावी कार्यक्रम स्पष्ट नहीं था फिर भी वे जानते थे कि ब्रिटिश शासन को न तो संवैधानिक आन्दोलनों से हटाया जा सकता है और न कुछ बमों के बल पर। कुछ अँग्रेजों की हत्या कर देने से भारत स्वाधीन नहीं होगा। फिर भी, वे इस मार्ग को इसलिये आवश्यक समझते थे कि इससे भारतीयों में देश की स्वन्त्रता के लिए साहसपूर्ण काम करने की भावना उत्पन्न होगी तथा अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न होगा।

सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी वारीन्द्र घोष ने क्रांतिकारियों का लक्ष्य स्पष्ट करते हुए कहा था– ‘कुछ अँग्रेजों को मारकर अपने देश को मुक्त करने की न तो हम आशा करते हैं और न हमारा वैसा मतलब ही है। हम लोगों को यह दिखाना चाहते हैं कि किस प्रकार सहसपूर्ण कार्य करना और मरना चाहिए।’

मदनलाल धींगरा ने अपने मुकदमे की सुनवाई के समय न्यायालय में वक्तव्य देकर अपने लक्ष्य को स्पष्ट करने का प्रयास किया- ‘मेरे जैसे निर्बल पुत्र के पास माता को भेंट चढ़ाने के लिए अपने रुधिर के अतिरिक्त कुछ नहीं। मैंने वही भेंट दे दी। भारत में आज एक ही पाठ पढ़ाने की आवश्यकता है, वह यह कि मरा कैसे जाता है! उसे सिखाने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि हम स्वयं मर कर दिखाएं।’

डॉ. सत्या एम. राय ने लिखा है- ‘आतंकवादियों में इस समय दो विचारधाराएं थीं और उनके क्रिया-कलापों के दो केन्द्र थे। कुछ नेता अँग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र आन्दोलन करने के लिए भारतीय सेना से और यदि संभव हो तो अँग्रेजों की विरोधी विदेशी ताकतों से भी सहायता लेने में विश्वास रखते थे। दूसरी विचारधारा के नेता देश में हिंसात्मक कार्यक्रम जैसे, ब्रिटिश शासकों, पुलिस अधिकारियों एवं क्रांतिकारियों के विरुद्ध सूचना देने वाले मुखबिरों को कत्ल करने की नीति में विश्वास रखते थे।’

पहली विचारधारा को पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में और दूसरी विचारधारा को बंगाल और महाराष्ट्र में समर्थन मिला।

क्रांतिकारी आन्दोलन के दूसरे चरण में उसका स्वरूप भिन्न हो गया। क्रांतिकारियों ने आजादी के बाद भारत में समाजवादी समाज स्थापित करने की घोषणा की और लोगों के सामने गांधीवादी विचारधारा से अलग, दूसरा विकल्प रखा। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के वक्तव्यों से स्पष्ट होता है कि क्रांतिकारी देश को पराधीनता से मुक्त कराकर देश में सच्चा लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे। वे समाज से समस्त प्रकार की आर्थिक व सामाजिक असमानताओं का अन्त करना चाहते थे।

क्रांतिकारियों का मानना था कि विदेशी शक्तियों के हाथों पराधीन राष्ट्र के नागरिकों के लिये उनकी आर्थिक, मानसिक, शारीरिक, नैतिक और आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग अवरुद्ध होता है। पराधीन व्यक्ति को स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता। क्रांतिकारियों की दृष्टि में भारत को पराधीन बनाने वाली ब्रिटिश सरकार अत्याचारी, शोषक तथा अन्यायी थी।

उस पर कांग्रेस तथा अन्य संस्थाओं के शांतिपूर्ण आंदोलनों का प्रभाव नहीं हो रहा था इसलिये हिंसात्मक उपायों से ही सरकार के मन में भारतवासियों के प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न किया जा सकता था। इसलिये क्रांतिकारी, अँग्रेज अधिकारियों तथा देशद्रोहियों की हत्या करना तथा सरकारी खजाने को लूटना अपराध नहीं मानते थे।

उनका व्यक्तिगत हत्याओं और डकैतियों में विश्वास नहीं था। व्यक्तिगत स्वार्थवश उन्होंने कभी किसी की हत्या नहीं की। उनका उद्देश्य समाज में आतंक फैलाना नहीं था, अपितु अत्याचारी अँग्रेज अधिकारियों के मन में भय उत्पन्न करना था तथा उन्हें चेतावनी देना था कि यदि उन्होंने भारतीय जनता पर अत्याचार करना बंद नहीं किया तो उन्हें भारतीयों द्वारा पाठ पढ़ाया जायेगा। 

भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन के क्रांतिकारियों की कार्यप्रणाली

क्रांतिकारियों के लक्ष्य की तरह उनकी कार्य प्रणाली भी स्पष्ट थी। उनका एक मात्र लक्ष्य ब्रिटिश शासकों के मन में भय उत्पन्न करना था। उनकी कार्यप्रणाली में वे समस्त हिंसात्मक उपाय सम्मिलित थे जिनसे ब्रिटिश सरकार एवं उसके अधिकारियों के मन में भय उत्पन्न हो सके। उन्होंने निम्नलिखित प्रमुख कार्य किये-

(1.) जन सामान्य में राष्ट्र-प्रेम तथा स्वतंत्रता सम्बन्धी विचारों का प्रचार करके उनके मन में दासता से मुक्ति पाने की इच्छा उत्पन्न करना।

(2.) बेकारी और भुखमरी से त्रस्त लोगों को संगीत, नाटक और साहित्य के माध्यम से निर्भय होने का संदेश देना एवं उनमें अपनी स्थिति को बदलने के लिये प्रयत्नशील होने की प्रेरणा देना।

(3.) आन्दोलनों एवं धमकियों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार को, अपनी शक्ति एवं संगठन का अनुमान कराना।

(4.) जनता से चन्दा एवं दान एकत्रित करके जनता को क्रांतिकारियों की गतिविधियों से जोड़ना। सरकारी कोष को लूटकर धन एकत्रित करना।

(5.) रेल लाइन, रेलवे स्टेशन, पुल, सरकारी कार्यालय, संसद आदि महत्वपूर्ण स्थलों तथा सरकारी अधिकारियों के वाहनों पर बम फैंककर देश की जनता का ध्यान अपनी ओर खींचना तथा सरकार में भय उत्पन्न करना।

(6.) भारतीयों पर अत्याचार करने वाले अँग्रेज अधिकारियों एवं उनके मुखबिरों को जान से मारकर भारतीयों पर हुए अत्याचारों का बदला लेना।

(7.) गुप्त स्थलों पर क्रांतिकारियों का प्रशिक्षण आयोजित करना।

(8.) जनता में प्रसार के लिये गुप्त स्थानों पर साहित्य का मुद्रण करवाना।

(9.) क्रांतिकारी घटनाओं को कार्यरूप देने के लिये दूरस्थ स्थानों पर मुद्रित सामग्री, हथियार, बम एवं धन को पहुंचाना।

(10.) सार्वजनिक स्थलों पर पोस्टर एवं क्रांतिकारी साहित्य चिपकाना तथा वितरित करना।

(11.) क्रांतिकारी घटना को कार्यरूप देते हुए पकड़े जाने पर भागने का प्रयास करने के स्थान पर स्वयं को गिरफ्तार करवाना तथा न्यायालय में अपने कृत्य को देशभक्ति के लिये किया गया कार्य सिद्ध करना।

अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्रांतिकारियों ने अनुशीलन समितियां स्थापित कीं जिनमें क्रांतिकारी सदस्यों को भारतीय इतिहास और संस्कृति का ज्ञान कराया जाता था। राजद्रोह के सिद्धान्तों की शिक्षा और घातक शस्त्रों के संचालन का प्रशिक्षण दिया जाता था।

प्रत्येक सदस्य को माँ काली के समक्ष शपथ दिलाई जाती थी कि वह अपना कार्य पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा से करेगा तथा किसी भी स्थिति में दल की गतिविधियों को उजागर नहीं करेगा। पुलिस हिरासत में दी जाने वाली यातनाओं को सहन करेगा तथा सरकारी गवाह नहीं बनेगा। नये क्रांतिकारी सदस्यों को वरिष्ठ क्रांतिकारियों के निर्देशन में काम करना होता था।

भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन का विकास

भारत में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का आरम्भ 1857 ई. से माना जा सकता है जिसे अँग्रेजों द्वारा बलपूर्वक कुचल दिया गया। 1872 ई. में पंजाब के नामधारी सिक्खों ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध कूका आन्दोलन चलाया। इसे भी अँग्रेजों ने क्रूरता पूर्वक कुचला। 1876 ई. में वासुदेव बलवंत फड़के द्वारा ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का छोटा सा प्रयास हुआ। 1894 ई. में चापेकर बन्धुओं ने महाराष्ट्र में हिन्दू धर्म संरक्षण सभा की स्थापना की।

इस अवसर पर उन्होंने कहा- ‘हमें शिवाजी और बाजीराव (प्रथम) की भांति कमर कसकर भयानक कार्यों में जुट जाना चाहिए। मित्रों, अब आपको ढाल-तलवार उठा लेनी होगी, हमें शत्रु के सैकड़ों सिरों को काट डालना होगा। हमें राष्ट्र-युद्ध के रण-क्षेत्र में अपने प्राणों की आहुति दे देनी होगी। हमारे देश का नाम हिन्दुस्तान है; फिर यहाँ अँग्रेज राज्य क्यों कर रहे हैं?’

पूना में गणेशखण्ड नामक स्थान है जहाँ पर शिवाजी उत्सव का आयोजन किया गया। इस उत्सव के कुछ दिन बाद ठीक उसी स्थान पर पूना के प्लेग कमिश्नर रैण्ड ने विक्टोरिया की 60वी वर्षगांठ का उत्सव मनाया। यह बात भारतीय युवकों को अच्छी नहीं लगी।

इसलिये 22 जून 1897 को दामोदर चापेकर ने पूना के प्लेग कमिश्नर रैण्ड तथा उसके सहायक आयर्स्ट को गोली मार दी। चापेकर बन्धुओं को फांसी हो गई। जिन लोगों ने मुखबिरी करके सरकार को चापेकर बंधुओं को जानकारी दी थी उन्हें चापेकर के दो अन्य भाइयों एवं नाटु-बंधुओं ने मिलकर मार डाला।

ये घटनाएं, क्रांतिकारी आन्दोलन के आरम्भिक चरण का अंग थीं। 1905 ई. में लॉर्ड कर्जन द्वारा किये गये बंग-भंग के बाद भारत में उग्र राष्ट्रवाद का उदय हुआ। इसके बाद ही भारत के विभिन्न प्रांतों में क्रांतिकारी आन्दोलन का व्यापक स्तर पर एवं संगठित रूप से प्रसार हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास

भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन का उदय

बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

पंजाब में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

उत्तर भारत में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

अन्य प्रांतों में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

विदेशों में क्रांतिकारी आन्दोलन

क्रांतिकारी आंदोलन का मूल्यांकन

बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

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अमर शहीद खुदीराम बोस

बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

बंगाल में सशस्त्र क्रांति का मंत्र समाचार पत्रों के माध्यम से प्रसारित हुआ। 1906 ई. में वारीन्द्र कुमार घोष  और भूपेन्द्र दत्त  ने मिलकर युगान्तर समाचार पत्र आरम्भ किया। इसका मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी भावना का प्रचार करना था। शीघ्र ही यह पत्र इतना लोकप्रिय हो गया कि इसकी 50,000 प्रतियां प्रतिदिन बिकने लगीं।

संध्या और नवशक्ति जैसे दूसरे पत्र भी क्रांतिकारी विचारों का प्रसार करते थे। इन पत्रों में देशभक्ति से ओत-प्रोत गीत और साहित्यिक रचनाएं छपती थीं। वारीन्द्र घोष के लेख पाठकों की धमनियों में उबाल लाने में का काम करते थे। एक लेख में उन्होंने लिखा- ‘मित्रो! सैकड़ों और हजारों व्यक्तियों की दासता अपने रुधिर की धार से बहाने को तैयार हो जाओ।’

अनुशीलन समिति की स्थापना

बंगाल में सबसे पहले स्थापित होने वाला क्रांतिकारियों का प्रमुख संगठन अनुशीलन समिति था। इसकी स्थापना 24 मार्च 1903 को सतीशचन्द्र बसु ने की। बाद में बैरिस्टर प्रमथनाथ मित्र ने इसका नेतृत्व संभाला। बंगाल में इसकी लगभग 500 शाखाएं स्थापित हो गईं।

अरविन्द घोष, जतींद्रनाथ वंद्योपाध्याय (जतीन उपाध्याय), चितरंजन दास, सिस्टर निवेदिता, वारीन्द्र घोष, अविनाश भट्टाचार्य आदि अनेक क्रांतिकारी, अनुशीलन समिति से जुड़ गये। अनुशीलन समिति की स्थापना एक व्यायामशाला के रूप में हुई।

प्रकट रूप से समिति स्थान-स्थान पर क्लब अथवा केन्द्र खेलकर नौजवानों को ड्रिल और तरह-तरह के व्यायाम, लाठी संचालन, तलवारबाजी, कटार चलाने, घुड़सवारी करने, तैरने तथा मुक्केबाजी का प्रशिक्षण देती थी। इन्हीं नौजवानों में से चुने हुए कुछ लोगों को गुप्त क्रांतिवादी कार्यों में लगाया जाता था।

1905 ई. में बंग-भंग विरोधी आंदोलन तथा स्वदेशी आन्दोलन से गुप्त क्रांतिकारी कार्यों को बल मिला। सैकड़ों नौजवान अनुशीलन समिति के सदस्य बन गये और बंगाल के विभिन्न हिस्सों में उसकी सैकड़ों शाखाएं खुल गईं परन्तु इन्हीं दिनों में विपिनचन्द्र पाल तथा चितरंजनदास आदि कुछ बड़े नेता अनुशीलन समिति से अलग हो गए।

क्रांतिकारी साहित्य का प्रकाशन

समिति ने कुछ पुस्तकों का प्रकाशन करवा कर उन्हें जन सामान्य में वितरित किया। 1905 ई. में भवानी मन्दिर नामक पुस्तक प्रकाशित की गई जिसमें शक्ति की देवी काली की पूजा का महत्त्व प्रतिपादित किया गया। दूसरी पुस्तक वर्तमान रणनीति थी जिसके माध्यम से यह संदेश दिया गया कि भारत की स्वतंत्रता के लिए सैनिक शिक्षा और युद्ध आवश्यक है।

मुक्ति कौन पथे? नामक पुस्तक में युगान्तर के कई चुने हुए लेखों का संग्रह प्रकाशित किया गया। बकिंमचन्द्र चट्टोपाध्याय के आनन्दमठ नामक उपन्यास को भी काफी प्रचारित किया गया। वन्देमातरम, न्यू इण्डिया आदि क्रांतिकारी समाचार पत्र भी निकाले गये।

बैमफील्ड फुलर पर बम फैंकने की कार्यवाही

क्रांतिकारियों ने गोपनीय रूप से बड़ी मात्रा में अस्त्र-शस्त्र एकत्र किया। वारीन्द्र घोष और उनके साथियों ने 11 रिवाल्वर, 4 राइफलें और 1 बन्दूक इकट्ठी कीं। इस गुट में सम्मिलित होने वाले उल्लासकर दत्त ने बम बनाने का छोटा कारखाना खोला। उनके साथ हेमचन्द्र दास (कानूनगो) भी इस काम में लग गये।

वे पेरिस से बम बनाने का प्रशिक्षण लेकर आये थे। जब सरकार ने क्रांतिकारियों को तंग करना आरम्भ किया तो क्रांतिकारियों ने कुछ अँग्रेज अधिकारियों को मार देने का निश्चय किया। पहला बम पूर्वी बंगाल के गवर्नर सर बैमफील्ड फुलर को मारने के लिए बनाया गया। बम फैंकने का दायित्व प्रफुल्ल चाकी को सौंपा गया। प्रफुल्ल चाकी अपने काम में असफल रहा।

गवर्नर की ट्रेन पर बम फैंकने की कार्यवाही

6 दिसम्बर 1907 को बंगाल के गवर्नर की ट्रेन को मेदिनीपुर के पास उड़ाने का प्रयास किया गया। ट्रेन सिर्फ पटरी से उतर कर रह गई। कोई हताहत नहीं हुआ।

ढाका के मजिस्ट्रेट की हत्या

23 दिसम्बर 1907 को ढाका के मजिस्ट्रेट को गोली मार दी गई।

विपिनचन्द्र पाल की गिरफ्तारी

1907 ई. में विपिनचन्द्र पाल ने मद्रास का दौरा किया तथा मद्रास प्रवास में उन्होंने विभिन्न स्थानों पर जो भाषण दिये जिनका सार यह था कि हम ब्रिटिश शासन को समाप्त करके पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना चाहते हैं। उनके भाषणों ने मद्रासी नवयुवकों में क्रांतिकारी भावना का संचार किया।

जब सरकार ने विपिनचन्द्र पाल को बंदी बना लिया तब उनकी रिहाई के लिए मद्रास में भी प्रदर्शन हुए। पाल की रिहाई के अवसर पर एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। इस पर सरकार ने सभा के प्रमुख आयोजकों को बन्दी बना लिया। इसकी प्रतिक्रिया में टिनेवली में उपद्रव हुए।

सरकार ने मद्रास से प्रकाशित होने वाले अनेक समाचार पत्रों के सम्पादकों तथा आन्दोलनकारी नेताओं को बन्दी बनाकर उन पर मुकदमा चलाया। इस कारण जनता, सरकार के विरुद्ध एकजुट होने लगी।

अलीपुर षड़यन्त्र तथा मानिकतल्ला केस

30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने जिला जज डी. एच. किंग्सफोर्ड पर बम फेंका। किंग्सफोर्ड पहले कलकत्ता में चीफ प्रेसीडेन्सी मजिस्ट्रेट रह चुका था और उसने क्रांतिकारियों को अमानवीय दण्ड दिये थे। उसने युगान्तर, वंदेमातरम्, संध्या और नवशक्ति समाचार पत्रों के पत्रकारों को सजाएं दी थीं।

उसने क्रांतिकारी सुशील कुमार सेन को 15 बेंत मारने की सजा दी जबकि उसने कोई अपराध नहीं किया था। दुर्भाग्यवश जिस घोड़ागाड़ी पर बम फेंका गया था, वह किंग्सफोर्ड की गाड़ी से मिलती-जुलती मिस्टर कैनेडी की गाड़ी थी और गाड़ी में उसकी पत्नी और पुत्री बैठी थीं। वे दोनों मारी गईं।

खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी घटनास्थल से भाग निकले। 1 मई 1908 को खुदीराम बोस को वाइनी स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 11 मई 1908 को फांसी दे दी गई। प्रफुल्ल चाकी को समस्तीपुर स्टेशन पर पहचान लिया गया। जब उन्होंने देखा कि पुलिस से बचना सम्भव नहीं है तो उन्होंने स्वयं को गोली मार ली।

क्रांतिकारियों ने नन्दलाल नामक उस पुलिस दरोगा को गोली मार दी जिसने खुदीराम बोस को पकड़ा था। इस पर कलकत्ता पुलिस ने क्रांतिकारियों के अनेक अड्डों पर छापे मारे तथा मानिकतल्ला के कारखाने से हथियार जब्त कर लिये। ब्रिटिश साम्राजय के विरुद्ध षड़यन्त्र करने के अपराध में 30 लोगों पर अभियोग लगाये गये। बाद में 6-7 और लोगों को भी सम्मिलित कर लिया गया। यह मुकदमा अलीपुर षड़यन्त्र तथा मानिकतल्ला केस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस अभियोग की सुनवाई के दौरान नरेन्द्रनाथ गोसाईं, पुलिस का मुखबिर बन गया। वह अपनी गवाही देता उससे पहले ही कन्हाईलाल दत्त और सत्येन्द्रनाथ बोस ने उसे जेल में ही मौत के घाट उतार दिया। उन दोनों को बाद में फांसी की सजा दी गई। मुकदमे की सुनवाई के समय अदालत से बाहर निकलते हुए पुलिस के डिप्टी सुपरिन्टेन्डेट को गोली मार दी गई।

मुकदमे की पैरवी करने वाले सरकारी वकील आशुतोष विश्वास को भी क्रांतिकारियों ने गोली से उड़ा दिया। मुकदमे के फैसले के अनुसार वारीन्द्र कुमार घोष, उल्लासकर दत्त, हेमचन्द्र दास और उपेन्द्रनाथ बनर्जी को आजीवन काला पानी, विभूति भूषण सरकार, ऋषिकेश, फौजीलाल और इन्द्रभूषण राय को दस-दस साल तथा अन्य लोगों को सात-सात साल की काला पानी की सजा दी गई।

अरविन्द घोष को साक्ष्यों के अभाव में छोड़ दिया गया। अलीपुर षड़यन्त्र केस ने कुछ दिनों के लिए क्रांतिकारियों के कलकत्ता केन्द्र की रीढ़ तोड़ दी। उनके प्रमुख नेता गिरफ्तार हो गये। सरकारी आतंक ने उनके संगठन को छिन्न-भिन्न कर दिया।

ढाका में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

अलीपुर षड़यन्त्र केस के बाद क्रांतिकारी कार्यों का केन्द्र ढाका बन गया। पुलिनदास और यतीन्द्रनाथ मुकर्जी क्रांतिकारियों के नेता थे। अगस्त 1910 में पुलिनदास को ढाका षड़यन्त्र केस में गिरफ्तार किया गया। इस केस में उन्हें सात साल की काले पानी की सजा दी गई। अब बारीसाल, क्रांतिकारियों का केन्द्र बन गया। मई 1913 में बारीसाल षड़यन्त्र केस चला और कई क्रांतिकारियों को सख्त सजाएं दी गईं। यद्यपि सरकार क्रांतिकारियों की शक्ति को तोड़ने की पूरी कोशिश करती रही, फिर भी वे अपना काम करते रहे।

पूर्वी बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

पूर्वी बंगाल का चटगांव बन्दरगाह क्रांतिकारियों का केन्द्र बना हुआ था। इनके संगठन का नाम चटगांव रिपब्लिकन आर्मी था। इसके नेता सूर्यसेन थे। इस संगठन के सदस्य जन-साधारण के बीच क्रांति का प्रचार करते थे। इस संगठन ने बम बनाने का कारखाना और गैरकानूनी छापाखाना भी खोल रखा था।

18 अप्रैल 1930 की रात्रि में सूर्यसेन के नेतृत्व में लगभग 50 युवक-युवतियों ने फौजी वेशभूषा पहनी और रिवाल्वरों तथा बमों से लैस होकर चटगांव के पुलिस शस्त्रागार पर आक्रमण किया। एक अधिकारी को मौत के घाट उतार कर उन्होंने वहाँ रखी समस्त बन्दूकों को लूट लिया।

इन क्रांतिकारियों ने चटगांव के समस्त थानों पर कब्जा करके सड़कों पर नाकेबन्दी कर दी और कई दिनों तक शहर पर कब्जा बनाए रखा…… किन्तु क्रांतिकारियों की योजना में एक त्रुटि रह गई थी। उन्होंने चटागांव के बन्दरगाह पर कब्जा नहीं किया था। इससे अँग्रेजों को कलकत्ता से शीघ्र ही सैनिक सहायता पहुँच गई।

तब क्रांतिकारियों ने शस्त्रागार में आग लगा दी और क्रांतिकारी, सूर्यसेन के नेतृत्व में जलाालबाद की पहाड़ियों में चले गये। अँग्रेजी सेना ने पहाड़ियों को चारों तरफ से घेरना आरम्भ कर दिया। इस पर बहुत से क्रांतिकारी वहाँ से भाग निकले। सूर्यसेन भी भागने में सफल रहे। बाद में एक साथी के विश्वासघात के कारण पकड़े गये।

बाद में कई और क्रांतिकाकारी भी पकड़ लिये गये। प्रीतिलता बाडेदर ने गिरफ्तार होने से बचने के लिए आत्महत्या कर ली। कल्पना दत्त पकड़ी गई। एक अन्य क्रांतिकारी नेता टेगराबल लड़ते-लड़ते शहीद हो गये।

सरकार ने समस्त बंदियों पर मुकदमा चलाया, जो चटगांव आर्मरी रेड के नाम से मशहूर हुआ। सूर्यसेन को फांसी हो गई तथा अम्बिका चक्रवती, अनंतसिंह, गणेश घोष, लोकनाथ और अन्य क्रांतिकारियों को लम्बी काले पानी की सजाएं हुईं। सूर्यसेन की फांसी के बाद पूर्वी बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ कम हो गईं।

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