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सत्तावन की क्रांति के कारण

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सत्तावन की क्रांति के कारण

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के कारण बहुत स्पष्ट नहीं थे किंतु इतना निश्चित है कि अंग्रेजी राज के विरुद्ध देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं समुदायों में अलग-अलग कारणों से असंतोष उत्पन्न हो गया था।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ई.1757 में प्लासी का युद्ध जीतने के बाद से एक-एक करके भारतीय राज्यों को हड़पती जा रही थी। इस कारण देशी राजाओं एवं नवाबों में कम्पनी सरकार के विरुद्ध असंतोष तेजी से बढ़ रहा था।

1848 ई. से 1856 ई. तक लार्ड डलहौजी भारत का गवर्नर जनरल रहा। उसने ताबड़तोड़ गति से भारतीय राज्यों को समाप्त करना और हड़पना आरम्भ किया। इसके परिणाम स्वरूप रानी विक्टोरिया का भारतीय उपनिवेश उत्तर में हिमालय पर्वतमाला से लेकर दक्षिण में समुद्र तट तक तथा पश्चिम में सिंध नदी से लेकर पूर्व में इरावती नदी तक विस्तृत हो गया।

औरंगजेब के जीवन काल में जो भारत बिखर कर अलग-अलग राज्यों में बंट गया था वह फिर से एक राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत बंध गया। यह एकीकरण पहले की ही तरह बहुत दुःखदायी था। भारत की आत्मा फिर से परतंत्रता की बेड़ियों में बंधकर सिसक उठी। भारतवासी अपने ही देश में गुलाम हो गये। भारत वासियों ने कई आंदोलनों के माध्यम से इन बेड़ियों को काटना चाहा किंतु आंग्ल-शक्ति के समक्ष भारतीयों के समस्त प्रयास बौने सिद्ध हुए।

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति से पूर्व के सैनिक विद्रोह

भारत में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध 1857 ई. से पहले भी छुट-पुट सैनिक विद्रोह हुए। 10 जुलाई 1806 को वेलोर स्थित कम्पनी की सेना के देशी सैनिकों ने विद्रोह किया। 30 अक्टूबर 1824 को कलकत्ता के निकट बैरकपुर छावनी में नियुक्त भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी को बर्मा में लड़ने के लिये जाने के आदेश दिये गये।

भारतीय सैनिकों ने विदेश जाने से मना कर दिया। इस पर उन सैनिकों को विद्रोही बताकर उन्हें तोपों से उड़ा दिया गया। बहुत से सैनिकों को फांसी दी गई। पूरी रेजीमेंट ही भंग कर दी गई। 1831-33 ई. में कील में विद्रोह हुआ। 1842 ई. में हैदराबाद, 1843 ई. में सिंध में सैनिक विद्रोह हुए। फरवरी 1844 में फिरोजपुर की 64वीं रेजीमेंट में विद्रोह हुआ।

1848 ई. में कांगड़ा, जसवार और दातापुर के राजाओं ने विद्रोह किया। कम्पनी सरकार ने इन समस्त विद्रोहों का सफलतापूर्वक दमन किया। लॉर्ड डलहौजी ने अपनी एक रपट में चार्ल्स नेपियर की चेतावनी का उल्लेख किया है जिसमें उसने भारतीय सेना में बढ़ते हुए क्षोभ का संकेत किया था।

लॉर्ड केनिंग की आशंका

डलहौजी के बाद लॉर्ड केनिंग (1856-1858 ई.) भारत के गवर्नर जनरल बनकर आये।  उनके भारत आागमन पर बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स ने एक स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें लॉर्ड केनिंग ने भाषण देते हुए कहा-

‘एक धन-धान्यपूर्ण देश में 15 करोड़ लोग शांति और संतोष के साथ विदेशियों की सरकार के समक्ष घुटने टिकाये हुए हैं……..मैं नहीं जानता कि घटनाएं किस ओर जायेंगी। मैं आशा करता हूँ कि हम युद्ध से बच जायेंगे।…… मैं चाहता हूँ कि मेरा कार्यकाल शांतिपूर्ण हो। …….. हमें नहीं भूलना चाहिये कि भारतीय आकाश यद्यपि इस समय बिल्कुल शांत है किंतु एक छोटा सा बादल जो एक मुट्ठी से बड़ा न हो, उठ सकता है, जो बढ़कर हमारा सर्वनाश कर सकता है …….. यदि सब-कुछ करने पर भी अंत में यह आवश्यक हो जाये कि हम शस्त्र उठाएं तो हम साफ दिल से प्रहार करेंगे। ऐसा करने से युद्ध जल्दी समाप्त हो जायेगा और सफलता निश्चित होगी।’

इस वक्तव्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि अँग्रेजी सरकार को यह जानकारी थी कि भारतीयों में उसके विरुद्ध जबर्दस्त असंतोष व्याप्त है जो कभी भी विद्रोह का रूप ले सकता है। लॉर्ड केनिंग की इस आशंका में ही अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के कारण छिपे हुए थे।

भारतीय इतिहास की गौरवमयी घटना

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति भारतीय इतिहास की गौरवमयी घटना है। इसका क्षेत्र सम्पूर्ण भारत में विस्तृत था। यह घटना भारत में कम्पनी शासन आरम्भ होने के ठीक एक सौ साल बाद हुई थी। इसलिये इस क्रांति के पीछे भारतीयों की, अँग्रेजों के प्रति एक सौ साल में बनी यह धारणा काम कर रही थी कि अँग्रेज शोषक हैं, उत्पीड़क हैं, सर्वहरण करने वाले हैं, उनके शासन से देश को मुक्ति मिलनी चाहिये।

डलहौजी ने कम्पनी राज्य का विस्तार करने के लिये भारतीय सेनाओं का तेजी से विस्तार किया था किंतु भारतीय सैनिकों के लिये इतनी खराब व्यवस्था की गई कि वे गौरांग महाप्रभुओं के विरुद्ध मरने-मारने पर उतारू हो गये। अधिकांश इतिहासकार इस क्रांति को सैनिक क्रांति मानते हैं तो कुछ इतिहासकार इसे अपदस्थ राजाओं एवं जागीरदारों का विद्रोह मानते हैं। बहुत कम लोग इसमें जन साधारण की भूमिका को स्वीकार करते हैं।

यह सही है कि एक ओर तो बहुत बड़ी संख्या में जन-साधारण इस क्रांति से दूर रहा तथा दूसरी ओर भारत की लगभग समस्त बड़ी शक्तियों ने इस क्रांति को कुचलने में अँग्रेजों का सहयोग किया। इस क्रांति के समय तथा उसके बाद कई लाख लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। अवध में एक लाख लोग मारे गये। दिल्ली में कई हजार लोगों का कत्ले-आम किया गया, देश के अन्य भागों में भी कत्ले आम हुए।

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के कारण

अठारह सौ सत्तावन की क्रांतिके पीछे भारत-व्यापी विविध कारण मौजूद थे जिन्होंने इसे राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया-

(1.) डॉक्टराइन ऑफ लैप्स से उत्पन्न असंतोष

डलहौजी की डॉक्टराइन आफ लैप्स के कारण भारतीय रजवाड़ों में अँग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष की ज्वाला धधक उठी। इस असंतोष में वे रजवाड़े अधिक मुखर थे जिनके राज्य ब्रिटिश क्षेत्रों में मिला लिये गये थे तथा जिनकी पेशंनें जब्त कर ली गई थीं।

अवध अँग्रेजों का सर्वाधिक पुराना और घनिष्ठ मित्र राज्य था किन्तु 1856 ई. में उसका भी अपहरण कर लिया गया। इससे भारतीय नरेश तो नाराज हुए ही, साथ ही अँग्रेजों के अनन्य मित्र भी अपने अस्तित्व के प्रति सन्देह प्रकट करने लगे। कर्नाटक एवं तंजोर के शासकों की उपाधियाँ व पेंशन बन्द करके अँग्रेजों ने भारतीय शासकों को विद्रोह करने पर विवश कर दिया।

नाना साहब की पेंशन बंद करने तथा झाँसी का राज्य अपहृत कर लेने से, अँग्रेजी साम्राज्यवादी लिप्सा पूरी तरह प्रकट हो गई थी। भारतीय नरेशों एवं राजवंशों की समाप्ति का प्रभाव उन पर आश्रित विभिन्न वर्गों पर भी पड़ा और वे विद्रोह करने पर उतारू हो गये।

(2.) बड़े जागीरदारों में अंसतोष

देश में छोटे-बड़े 550-600 देशी राज्य थे। इन्हें ईस्ट इण्डिया कम्पनी का संरक्षण प्राप्त था। इन राज्यों के जागीदार एवं सामंत अँग्रेजी शासन से असंतुष्ट थे क्योंकि कम्पनी सरकार ने देशी राजाओं को संरक्षण देकर सामंतों की उच्छृंखलता एवं मनमानी पर लगाम कस दी थी। अँग्रेज सरकार ने विद्रोही जागीरदारों पर अंकुश करने के लिये उनके विरुद्ध सैनिक कार्यवाहियां भी की थीं। ब्रिटिश विरोधी सामंतों ने उपद्रव मचाने वाले डाकुओं को शरण देकर समस्या को और बढ़ा दिया था।

(3.) कुलीनों की सम्पत्ति एवं भूमि के अपहरण से असंतोष

अँग्रेजों ने कुलीन वर्ग की सम्पत्ति और जागीरें छीनकर उनकी सामाजिक मर्यादा को ठेस पहुंचाई। बहुत से जमींदारों के पट्टों की जांच करके उनकी जमीनें छीन लीं। बम्बई के इमाम कमीशन ने लगभग 20 हजार जागीर भूमियों का अपहरण कर लिया। बैंटिक ने बहुत से लोगों से माफी की भूमियां छीन लीं। इस प्रकार कुलीन वर्ग को अपनी सम्पत्ति व आमदनी से हाथ धोना पड़ा। इससे कुलीन वर्ग क्रुद्ध हो गया।

(4.) मुसलमानों में असंतोष

कम्पनी सरकार द्वारा मुगल बादशाह बहादुरशाह (द्वितीय) के साथ किये गये व्यवहार से अधिकांश मुस्लिम जनता नाराज हो गई। लॉर्ड एलनबरो (1842-44 ई.) ने बादशाह को भेंट देनी बंद कर दी तथा सिक्कों से उसका नाम हटा दिया। डलहौजी (1848-56 ई.) ने बहादुरशाह को लाल किला खाली करके दिल्ली के बाहर महरौली में जाकर रहने के लिये कहा।

केनिंग (1856-58 ई.) ने घोषणा की कि बहादुरशाह के बाद उसका उत्तराधिकारी केवल राजकुमार के रूप में जाना जायेगा। उसे बादशाह की उपाधि नहीं दी जायेगी। अँग्रेजों ने बादशाह एवं उसकी बेगम की इच्छा के विरुद्ध, बादशाह के आठ जीवित पुत्रों में सबसे निकम्मे मिर्जा कोयास को उत्तराधिकारी घोषित किया।

मिर्जा कोयास से संधि की गई कि वह दिल्ली का लाल किला खाली कर देगा, स्वयं को बादशाह नहीं कहेगा तथा एक लाख रुपये के स्थान पर 15 हजार रुपये मासिक पेंशन स्वीकार करेगा। इन सब बातों से मुसलमानों में अँग्रेजों के विरुद्ध असन्तोष उत्पन्न हो गया।

(5.) अफगानिस्तान के मोर्चे पर अँग्रेजों की पराजय

प्रथम अफगान युद्ध में अँग्रेजों की पराजय से भारतीयों को लगा कि यदि अफगान अँग्रेजों को परास्त कर सकते हैं तो भारतीय क्यों नहीं! उन्हीं दिनों यह अफवाह फैली कि रूस, क्रीमिया युद्ध की पराजय का बदला लेने के लिये भारत पर आक्रमण करेगा।

इससे भारतीय अधिक उत्साहित हुए, क्योंकि उनका विचार था कि जब अँग्रेज, रूस के साथ युद्ध में उलझे हुए होंगे तब उनके विरुद्ध लड़ाई छेड़ देने पर सफलता मिल सकती है। उन्हीं दिनों एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि भारत में अँग्रेजों का राज्य सौ वर्ष बाद समाप्त हो जायेगा।

1757 ई. में प्लासी के युद्ध के बाद अँग्रेजी राज्य की स्थापना हुई थी और अब 1857 ई. में सौ वर्ष पूरे हो चुके थे। इससे भविष्यवाणी पर विश्वास करके लोग क्रान्ति करने के लिये उत्सुक हो गये।

(6.) प्रशासन में भारतीयों के विरुद्ध भेदभाव से उत्पन्न असंतोष

अँग्रेजों ने आरम्भ से ही प्रशासन में भेदभावपूर्ण नीति अपनाई। लार्ड कार्नवालिस ने भारतीयों को उच्च पदों से वंचित कर दिया। 1833 ई. के चार्टर एक्ट में जाति एवं रंगभेद समाप्त करके भारतीयों को कम्पनी की सेवा में लेने की घोषणा की गई थी किन्तु एक्ट की यह धारा कभी कार्यान्वित नहीं की गई।

भारतीय प्रशासन में एक शक्तिशाली ब्रिटिश अधिकारी वर्ग उत्पन्न हो गया था जो स्वयं को भारतीय कर्मचारियों से पूरी तरह अलग रखता था और उन्हें बात-बात पर अपमानित करता था। भारतीय कर्मचारियों के साथ उनका व्यवहार मूक पशुओं के साथ होने वाले व्यवहार जैसा था। वे अँग्रेजों को भारतीयों से मिलने-जुलने नहीं देते थे। अँग्रेजों द्वारा किये जा रहे इस भेदभाव से भारतीयों के मन में उनके प्रति उत्पन्न क्रोध होना स्वाभाविक था।

(7.) न्यायिक प्रणाली की जटिलता से उत्पन्न असंतोष

न्यायिक प्रशासन में अँग्रेजों को भारतीयों से श्रेष्ठ स्थान दिया गया था। भारतीय जजों की अदालतों में अँग्रेजों के विरुद्ध मुकदमा दायर नहीं हो सकता था। अँग्रेजों ने जो विधि प्रणाली लागू की, वह भारतीयों के लिए बिल्कुल नई थी। इस कारण भारतीय लोग इसे ठीक से समझ नहीं पाते थे। इसमें अत्यधिक धन व समय नष्ट होता था और अनिश्चितता बनी रहती थी।

(8.) व्यक्तिवादी शिक्षा का प्रभाव

पाश्चात्य शिक्षा से भारतीयों के स्वभाव एवं जीवन दर्शन में भी व्यक्तिवाद का उदय हुआ। इससे भारतीय सामाजिक जीवन की वे विशेषताएँ समाप्त हो गयीं जिनके कारण अँग्रेजों को भारत में अपने पैर जमाने में सफलता मिली थी। अत्यंत प्राचीन काल से भारतीय नागरिकों में दूसरों के प्रति आभार-प्रदर्शन, विनम्रता, उदारता, कर्त्तव्य परायणता तथा पारस्परिक सहयोग की भावना थी।

स्वामी पर हथियार नहीं उठाना, आम भारतीय के स्वभाव में था किन्तु पाश्चात्य शिक्षा ने उसके इस स्वभाव को नष्ट कर दिया। भारतीयों के खान-पान, पहनावे तथा आचार-विचार में पाश्चात्य शुष्कता आ गई। अब वे व्यक्तिवादी हो गये और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपने स्वामी से विद्रोह करने को तैयार थे। 

(9.) सामाजिक अपमान के कारण उत्पन्न असंतोष

भारतीयों के प्रति अँग्रेजों का सामान्य व्यवहार अत्यंत अपमानजनक था।  भारतीय, रेलगाड़ी के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में यात्रा नहीं कर सकते थे। अँग्रेजों द्वारा संचालित होटलों व क्लबों की तख्तियों पर लिखा होता था- ‘कुत्तों और भारतीयों के लिये प्रवेश वर्जित।’

आगरा के एक मजिस्ट्रेट द्वारा एक आदेश के माध्यम से, अँग्रेजों के प्र्रति भारतीयों द्वारा सम्मान प्रदर्शन के तरीकों का एक कोड निर्धारित करने का प्रयास किया गया- ‘किसी भी कोटि के भारतीय के लिए कठोर सजाओं की व्यवस्था करके उसे विवश किया जाना चाहिये कि वह सड़क पर चलने वाले प्रत्येक अँग्रेज का अभिवादन करे। यदि कोई भारतीय घोड़े पर सवार हो या किसी गाड़ी में बैठा हो तो उसे नीचे उतर कर आदर प्रदर्शित करते हुए उस समय तक खड़े रहना चाहिये, जब तक अँग्रेज वहाँ से चला नहीं जाये।’

इस प्रकार के सैंकड़ों उदाहरण हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि अँग्रेज, भारतीयों का सामाजिक रूप से अपमान कर रहे थे। उन्होंने सुधारों के नाम पर अपनी सभ्यता और संस्कृति का प्रचार किया तथा यूरोपीय चिकित्सा विज्ञान को प्रोत्साहन दिया जो भारतीय चिकित्सा विज्ञान से बिल्कुल अलग था।

विद्यालय, चिकित्सालय, राजकीय कार्यालय और सेना, पाश्चात्य सभ्यता के प्रचार के केन्द्र थे। इससे भारतीय साहित्य एवं संस्कृति की दुर्दशा हुई। तथा भारतीयों के मन में अँग्रेजों के प्रति घृणा उत्पन्न हुई। इसी घृणा ने 1857 ई. में विद्रोह का रूप धारण कर लिया। अँग्रेजों द्वारा सती प्रथा निषेध जैसे कानून बनाये जाने से भी भारतीयों को लगा कि अँग्रेज भारतीयों की सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करके हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को नष्ट करना चाहता है।

(10.) धर्मान्तरण के कारण उत्पन्न असंतोष

लंदन की संसद द्वारा 1813 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म-प्रचार की स्वतन्त्रता दी गई। 1850 ई. में धर्म बदलने वाले व्यक्ति की सम्पत्ति जब्त नहीं करने का कानून बनाया गया। 1857 ई. में ब्रिटिश संसद में सम्पूर्ण भारत को ईसाई बनाने के लिये वक्तव्य दिये गये। 

भारत सरकार द्वारा भारत में ईसाई प्रचारकों को अनेक सुविधाएं दी गईं। ईसाई धर्म-प्रचारक बड़े उद्दण्ड थे। वे प्रकट रूप से हिन्दुओं के अवतारों को गालियाँ देते थे और उन्हें कुकर्मी कहकर उनकी निन्दा करते थे। भारतीय सैनिकों में ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए पादरी लेफिटनेण्ट तथा मिशनरी कर्नल नियुक्त किये गये। उनका काम भारतीय सैनिकों को ईसाई बनाना था। जो भारतीय सैनिक, ईसाई बन जाते थे, उन्हें पदोन्नति दी जाती थी।

सरकारी स्कूलों में बाइबिल की शिक्षा अनिवार्य कर दी गई। मिशनरी स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा दी जाने लगी। मिशनरी स्कूलों में पढ़े हुए भारतीय विद्यार्थी, हिन्दू धर्म की कटु आलोचना करते थे। इससे भारतीयों को लगा कि मिशनरी स्कूल भारतीयों को ईसाई बनाने के साधन हैं। बेरोजगारों, अकाल पीड़ितों, बंदियों, विधवाओं तथा अनाथ बच्चों को बलात् ईसाई बनाया जाता था। अन्य लोगों को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर ईसाई बनाने का प्रयास किया जाता था।

लॉर्ड बैण्टिक ने कानून बनाया कि धर्म परिवर्तन करने पर पैतृक सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जायेगा। इससे बहुत से लोग ईसाई बनने लगे।  लार्ड केनिंग ने ईसाई धर्म के प्रचार पर लाखों रुपये व्यय किये। जिन भारतीयों को कारावास में डाला जाता था, वे कारावास में पानी पीने के लिये एक पात्र ले जाते थे, क्योंकि वे किसी के छुए जल को अपवित्र समझते थे।

सरकार ने इन पात्रों को जेल में ले जाने पर रोक लगा दी। इससे हिन्दुओं को विश्वास हो गया कि अँग्रेज उन्हें अपना छुआ हुआ पानी पिला कर ईसाई बना रहे हैं। इसी सन्देह के वातावरण में चरबी वाले कारतूस की घटना हुई, जिससे सैनिक विद्रोह फूट पड़ा। रेल, तार, बिजली आदि वैज्ञानिक उपलब्धियों को भी अशिक्षित भारतीय जनता ने अपने धर्म पर प्रहार समझा।

(11.) कुटीर उद्योगों की बर्बादी के कारण उत्पन्न असंतोष

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने के लिये भारतीय काश्तकारों, दस्तकारों एवं कुटीर उद्योगों की कमर तोड़ दी। 1765 ई. में बंगाल में दीवानी का अधिकार प्राप्त करने के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय कारीगरों पर भयानक जुल्म किये।

जब 1813 ई. में ब्रिटिश संसद ने चार्टर एक्ट द्वारा ब्रिटेन के निजी व्यापारियों को भारत में व्यापार करने की अनुमति दी तो भारत में शोषण का नया चक्र आरम्भ हुआ। भारत का कच्चा माल इंग्लैण्ड जाने लगा और इंग्लैण्ड में बना माल भारत के बाजारों में आने लगा। इस कारण भारतीय उद्योग नष्ट-प्रायः हो गये।

भारत की सम्पदा तेजी से इंग्लैण्ड जाने लगी और भारतीयों में निर्धनता बढ़ने लगी। उदाहरण के लिये 1800 ई. में कपास की 506 गांठें और सूती वस्त्र की 2638 गांठें निर्यात हुईं जबकि 1826 ई. में कपास की 15,100 तथा सूती वस्त्रों की 541 गांठें निर्यात हुईं। निर्यात के इस उलट फेर में भारतीय जुलाहे पूरी तरह बर्बाद हो गये।

(12.) किसानों की बर्बादी के कारण उत्पन्न असंतोष

भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार के नाम पर भारत में आरम्भ की गई जमींदारी बन्दोबस्त, रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त तथा महलवाड़ी बंदोबस्त में राजस्व की दरें इतनी ऊँची रखी गईं कि किसानों को लगान चुकाने के लिये साहूकारों से ऋण लेना पड़ता था। इस कारण वे जमींदारों और साहूकारों के चंगुल में फंसते चले गये।

उनकी जमीनें या तो जमींदारों ने हड़प लीं या फिर साहूकारों ने। वे अपनी ही जमीन पर किरायेदार बना दिये गये। उद्योग और व्यापार नष्ट होने से लाखों कारीगर बेकार होकर खेती करने का प्रयास करने लगे। देशी राज्यों का अँग्रेजी राज्यों में विलय कर देने से लाखों सैनिक बेकार हो गये।

इस प्रकार पूरे देश में बेरोजगारी फैल गई तथा लाखों लोगों को आजीविका से हाथ धोना पड़ा। इस कारण जनता उन डाकुओं की प्रशंसक हो गयी जो ब्रिटिश छावनियों को लूटते थे और लूटे गये धन को गरीबों में बांटते थे। डूंगजी और जवाहरजी उन्हीं दिनों के डाकू हैं जिन्हें जनता में इतना आदर मिला कि उन्हें लोक गीतों में स्थान दिया गया।

(13.) भारत की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के शोषण से उत्पन्न असंतोष

कम्पनी के शासन काल में भारत के धन को विभिन्न प्रकार से इंग्लैण्ड ले जाया गया। मेजर विनगेट ने लिखा है- ‘भारतीय साम्राज्य की सैनिक रक्षा के लिये ब्रिटेन के खजाने से एक भी शिलिंग खर्च नहीं होता। लूट, रिश्वत, उपहार, समय-समय पर होने वाले युद्धों में लगी अपार सम्पत्ति, ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन और भत्ते, सार्वजनिक ऋण, इन सब ने भारत की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया था।’

इन सब बातों के कारण आम भारतीय अँग्रेजों से घृणा करता था। इस घृणा ने देश में चारों ओर अँग्रेजी शासन के विरुद्ध वातावरण बना दिया जिसकी परिणति 1857 के विद्रोह के रूप में हुई।

(14.) अकालों की भयावहता से उत्पन्न असंतोष

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति में भारत में पड़े अकालों से उत्पन्न असंतोष ने बड़ी भूमिका निभाई। 1770 ई. एवं 1837 ई. के अकाल भयंकरतम थे। 1837 ई. के अकाल में आठ लाख लोग मारे गये थे।

लॉर्ड जॉन लॉरेंस ने लिखा है- ‘मेरे जीवन में ऐसे दृश्य कभी दिखाई नहीं दिये जैसे होडल तथा पलवल आदि परगनों में देखे। कानपुर में सैनिक टुकड़ियां लाशों को हटाने जाती थीं। हजारों लाशें गांवों और कस्बों में तब तक पड़ी रहती थीं जब तक कि जंगली जानवरों द्वारा खा नहीं ली जाती थीं।’

अकाल पीड़ितों की सहायता के लिये कम्पनी शासन ने कोई प्रयत्न नहीं किया। इससे स्थान-स्थान पर उपद्रव हुए। सेना ने इन उपद्रवों का दमन किया। इन अकालों के कारण उत्तर भारत की आत्मा कराह उठी। लोग फिरंगियों के राज्य का नाश करने के लिये संकल्पबद्ध होने लगे।

(15.) भारतीय सैनिकों में कम वेतन के कारण असंतोष

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों को सेवा में रखा था। वेलेजली की सहायक संधि की प्रथा से कम्पनी की सेना में भारतीय सैनिकों की असाधारण वृद्धि हुई। 1856 ई. में डलहौजी के भारत से वापस जाने के समय कम्पनी की सेना में 2,38,000 देशी और 45,322 अँग्रेजी सैनिक थे।

अँग्रेज सैनिक अत्यंत कम संख्या में थे इसलिये अनेक क्षेत्र ऐसे थे, जहाँ केवल देशी सैनिक ही थे। अनेक स्थानों पर उनकी संख्या नगण्य-प्रायः थी। अधिकांश अँग्रेज अधिकारियों को सीमान्त प्रदेशों एवं नये राज्यों में, जो हाल ही में ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाये गये थे, प्रशासनिक एवं सैनिक पदों पर भेज दिया गया था।

भारतीय सैनिक, कम्पनी की इस दुर्बलता से परिचित थे। सेना में वेतन, भत्ते एवं पदोन्नति के सम्बन्ध में भारतीय सैनिकों के साथ भेदभावपूर्ण नीति रखी गई थी। एक साधारण भारतीय सैनिक का वेतन सात या आठ रुपये मासिक होता था। इस वेतन में से रसद एवं वर्दी के व्यय की कटौती होती थी। इसीलिए वेतन के दिन उन्हें एक या डेढ़ रुपया नगद मिलता था।

भारतीय सूबेदार का वेतन 35 रुपये मासिक था, जबकि अँग्रेज सूबेदार को 195 रुपये मिलते थे। यद्यपि कम्पनी की सेना में भारतीय सैनिकों की संख्या अधिक थी किन्तु सैनिक खर्च का आधे से अधिक भाग अँग्रेज सैनिकों पर खर्च किया जाता था। भारतीय सैनिकों के लिए पदोन्नति के अवसर नहीं के बराबर थे।

यदि वरिष्ठता के आधार पर भारतीय सैनिक की पदोन्नति का अवसर आता था तो उसे इनाम देकर सेना से अलग कर दिया जाता था। इस अंतर से दुखी होकर 1806 से 1855 ई. के बीच भारतीय सैनिकों ने कई बार विद्रोह किये। विद्रोही सैनिकों को भीषण यातनाएँ दी गयीं, उन्हें गोली से उड़ा दिया गया तथा उनकी कम्पनियां भंग कर दी गईं।

(16.) सैनिकों को विदेशों में भेजे जाने से उत्पन्न असंतोष

कम्पनी सेना में अधिकांश भारतीय सैनिक उच्च जाति के ब्राह्मण, राजपूत, जाट व पठान आदि थे। वे कट्टर रूढ़िवादी थे। अँग्रेजों ने सेना में पाश्चात्य नियम लागू करते हुए सैनिकों को माला पहनने व तिलक लगाने की मनाही कर दी। मुसलमान सैनिक दाढ़ी नहीं रख सकते थे। हिन्दुओं को विदेशी मोर्चों पर भेजा जाने लगा।

हिन्दुओं में विदेश जाना धर्म विरुद्ध माना जाता था। इसलिये हिन्दू सैनिकों ने विदेश जाने से इन्कार कर दिया। इस पर लॉर्ड केनिंग ने सामान्य सेना भर्ती अधिनियम पारित करके भारतीय सैनिकों को सेवा के लिए कहीं भी भेजे जा सकने का नियम बना दिया।

एक अन्य आदेश के अनुसार, विदेशों में सेवा के लिए अयोग्य समझे गये सैनिकों को सेवानिवृत्ति प्राप्त करने पर पेंशन से वंचित कर दिया गया। इससे भारतीय सैनिकों में यह भावना दृढ़ हो गई कि अँग्रेज उनके धर्म को नष्ट करके उन्हें ईसाई बना रहे हैं। ऐसे वातावरण में चर्बी-युक्त कारतूसों ने आग में घी का काम किया।

(17.) तात्कालिक कारण

ब्रिटेन में एनफील्ड नामक रायफल का आविष्कार हुआ जिसमें प्रयुक्त कारतूस को चिकना करने हेतु गाय व सूअर की चर्बी का प्रयोग होता था।  इस कारतूस को रायफल में डालने से पूर्व उसकी टोपी को मुँह से काटना पड़ता था। इस रायफल का प्रयोग 1853 ई. से भारत में भी आरम्भ किया गया किंतु कारतूस में चर्बी लगी होने की बात भारतीयों को ज्ञात नहीं थी।

1857 ई. में दमदम शस्त्रागार में एक दिन निम्न समझी जाने वाली जाति के एक खलासी ने एक ब्राह्मण सैनिक के लोटे से पानी पीना चाहा किन्तु उस ब्राह्मण ने इसे अपने धर्म के विरुद्ध मानकर उसे रोका। इस पर खलासी ने व्यंग्य किया कि उसका धर्म तो नये कारतूसों के प्रयोग से समाप्त हो जायेगा, क्योंकि उस पर गाय और सूअर की चर्बी लगी हुई है। खलासी के व्यंग्य से सत्य खुल गया और सैनिकों में असंतोष फैल गया।

इस प्रकार 1857 ई. में सम्पूर्ण भारत में कम्पनी के शासन के विरुद्ध वातावरण बन गया। इस वातावरण में कोई छोटी सी चिन्गारी अठारह सौ सत्तावन की क्रांति में बदल जाने की प्रतीक्षा कर रही थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – अठारह सौ सत्तावन की क्रांति

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के कारण

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति की घटनाएँ एवं प्रसार

अठारह सौ सत्तावन क्रांति का दमन

1857 की क्रांति की असफलता के कारण

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति की घटनाएँ एवं प्रसार

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अठारह सौ सत्तावन की क्रांति की घटनाएँ एवं प्रसार

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अठारह सौ सत्तावन की क्रांति एक सोची-समझी एवं पूर्व नियोजित योजना थी। इसका नेतृत्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग लोगों ने किया। इस संघर्ष में धार्मिक नेताओं, पूर्व राजाओं, जागीरदारों, कृषकों, कारीगरों, सैनिकों और सामामान्य जनता ने डटकर मुकाबला किया।

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति की योजना

1852 ई. में पेशवा बाजीराव (द्वितीय) की मृत्यु हो जाने पर कम्पनी सरकार ने उसके दत्तक पुत्र नाना साहब को पेंशन देने से मना कर दिया। इससे असंतुष्ट होकर नाना साहब ने अपदस्थ एवं अधिगृहीत रजवाड़ों से सम्पर्क करने की योजना बनाई।

वह अपने भाई बाला साहब और अजीमुल्ला को लेकर कानपुर से भारत के विभिन्न स्थानों के लिये तीर्थयात्रा पर निकला तथा उन-उन स्थानों पर गया जहाँ अँग्रेजों द्वारा अपदस्थ रजवाड़ों के परिवार रहते थे। इस यात्रा में नाना साहब ने अम्बाला की सैनिक छावनी की भी यात्रा की। वह आगरा तथा दिल्ली भी गया।

दिल्ली के लाल किले में उसने बहादुरशाह जफर से भेंट की। संभवतः इसी यात्रा में भारत-व्यापी क्रांति की भूमिका तैयार हुई। संभवतः कोई गुप्त संगठन तैयार हुआ था जिसने क्रांति के लिये 31 मई 1857 की तिथि निर्धारित की थी। अँग्रेज अधिकारी विल्सन ने सरकार को सूचित किया था कि एक गुप्त संगठन ने भारत-व्यापी विद्रोह के लिये 31 मई 1857 की तिथि निर्धारित की है।

भारतीय हिन्दू सैनिकों को गंगाजल तथा तुलसीदल एवं मुसलमानों को कुरान की शपथ दिलवाकर विद्रोह के लिये तैयार किया गया।  अनुमान है कि अनेक भारतीय रेजीमेंटें एक गुप्त संगठन से जुड़ गई थीं जिसने 31 मई 1857 का दिन विद्रोह के लिये नियत किया था। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि विद्रोह अचानक फूट पड़ा था जो बाद में बड़े क्षेत्र में फैल गया था, क्योंकि किसी गुप्त संगठन के कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं हुए हैं।

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति का प्रचार

प्रचार का माध्यम एक स्थान से दूसरे स्थान पर चपातियां और लाल कमल का फूल था। ट्रैवेलियन ने अपनी पुस्तक कानपोर में लिखा है- ‘लाल कमल ने सचमुच सारी जनता को एक कर दिया है…….. बंगाल में जवान और किसान दोनों एक ही भाव- सब कुछ लाल होने जा रहा है, की अभिव्यक्ति देते हुए पाये गये।’

नरेटिव ऑफ म्यूटिनी में लिखा है- ‘बंगाल में ऐसी कोई छावनी या स्टेशन नहीं था जहाँ कमल का प्रसारण न हुआ हो…… षड्यंत्र के इस साधारण प्रतीक का प्रसारण अवध के विलीनीकरण के पश्चात् हुआ।’

क्रांति के संदेश का प्रचार करने के लिये तीर्थ स्थलों, मेलों और उत्सवों का उपयोग किया गया। छद्म सन्यासियों, मदारियों एवं फकीरों द्वारा गांवों के चौकीदारों को रोटी पहुंचाई जाती थी जो प्रसाद के रूप वितरित की जाती थी। इसी प्रसाद के साथ, सम्पूर्ण भारत में विद्रोह के लिये 31 मई 1857 की तिथि निर्धारित होने का संदेश दिया जाता था। 

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति की घटनाएँ

(1.) बैरकपुर में क्रांति का विस्फोट

26 फरवरी 1857 को कलकत्ता से 120 मील दूर स्थित बहरामपुर छावनी के सैनिकों ने चर्बी-युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। केनिंग ने उस कम्पनी को भंग कर दिया। इससे अन्य सैनिक टुकड़ियों में असन्तोष फैल गया। 29 मार्च 1857 को कलकत्ता से 5 मील दूर स्थित बैरकपुर छावनी में 34वीं कम्पनी के सिपाही मंगल पाण्डे ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया।

उसने अपने साथियों को ललकारा- ‘तुम लोग धर्म के लिये संग्राम में उतर पड़ो।’

मंगल पाण्डे ने अपने एडजुटेण्ट पर गोली चलाकर उसे मार डाला। इस पर मंगल पाण्डे को बन्दी बनाकर 8 अप्रेल 1857 को फांसी पर चढ़ा दिया गया तथा पूरी कम्पनी को भंग कर दिया गया। भंग कम्पनी के सैनिकों ने अपने-अपने गांव पहुंचकर मंगल पाण्डे के बलिदान की गाथा लोगों को सुनाई। इससे भारत की विभिन्न छावनियों में स्थित सैनिकों में भी चर्बी युक्त कारतूसों के विरुद्ध क्रांति करने की भावना जागृत हुई।

(2.) अवध में सैनिक क्रांति

डलहौजी द्वारा 1856 ई. में अवध को अँग्रेजी राज्य में मिलाये जाने के कारण, अवध में अँग्रेजों के विरुद्ध भारी असन्तोष था। 2 मई 1857 को लखनऊ की अवध रेजीमेंट ने चरबी-युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। 3 मई 1857 को लखनऊ में सैनिक विद्रोह हुआ जिसे दबा दिया गया।

31 मई 1857 को एक बार पुनः विद्रोह फूट पड़ा। यह विद्रोह अवध राज्य के विभिन्न भागों में फैल गया। अवध का नवाब वाजिद अलीशाह कलकत्ता में अँग्रेजों का बन्दी था, अतः विद्रोहियों ने उसके अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादर को नवाब घोषित करके शासन, बेगम हजरत महल को सौंप दिया। अवध के जमींदारों, किसानों और सैनिकों ने, बेगम हजरत महल की सहायता की।

20 जून 1857 को अँग्रेजी सेना, क्रांतिकारियों से परास्त हुई।  ब्रिटिश सेना ने भागकर ब्रिटिश रेजीडेंसी में शरण ली। क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी में आग लगा दी। इसके बाद अवध के अधिकांश ताल्लुकेदारों व जमींदारों ने अपनी जागीरों व जमींदारियों पर अधिकार कर लिया।

4 जुलाई 1857 को एक भीषण विस्फोट में अवध के कमिशनर हेनरी लॉरेन्स की मृत्यु हो गई। लखनऊ में रह रहे अँग्रेजों की सहायता के लिए प्रधान सेनापति कॉलिन कैम्पबेल, आउट्रम तथा हेवलॉक अपनी सेनाएं लेकर लखनऊ पहुंचे। नेपाल से गोरखा सेना बुलाई गई।

31 मार्च 1858 को अँग्रेजों ने पुनः लखनऊ पर अधिकार कर लिया। इसके बाद भी ताल्लुकेदार छिपकर अँग्रेजों की हत्या करते रहे किन्तु मई 1858 में बरेली पर अँग्रेजों का अधिकार हो जाने पर अवध के क्रान्तिकारियों ने हथियार डाल दिये। इसके बाद अवध रेजीमेंट को भंग कर दिया गया।

(3.) मेरठ में सैनिक क्रांति

चर्बी-युक्त कारतूसों की सूचना मेरठ भी पहुँच गई। 24 अप्रैल 1857 को घुड़सवारों की एक सैनिक टुकड़ी ने इन कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। मेरठ छावनी का अधिकारी कारमाइकेल स्मिथ अत्यन्त घमण्डी था। उसने सैनिकों को 5 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई।

9 मई 1857 को 85 सैनिकों को अपराधियों के कपड़े पहनाकर बेड़ियाँ लगा दी गईं। कारमाइकेल ने भारतीय सैनिकों को चुनौती दी कि वे चाहें तो अपने साथियों के अपमान का बदला ले सकते हैं। 9 मई की शाम को जब कुछ सिपाही नगर में घूमने निकले तो राह चलती स्त्रियों ने उन पर ताने कसे।

मुरादाबाद के तत्कालीन जज जे. सी. विल्सन ने लिखा है- ‘महिलाओं ने सिपाहियों से कहा, छिः! तुम्हारे भाई जेलखाने में हैं और तुम यहाँ बाजार में मक्खियां मार रहे हो। तुम्हारे जीने पर धिक्कार है।’

10 मई 1857 को सांय 5 बजे मेरठ की एक पैदल सैनिक टुकड़ी ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह घुड़सवारों की टुकड़ी में भी फैल गया। कारमाइकेल जान बचाकर भाग गया। क्रांतिकारी सैनिक, जेल में घुसे और उन्होंने बन्दी सैनिकों की बेड़ियाँ काटकर उन्हें अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये।

इसके बाद अँग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतार कर, वे दिल्ली की ओर चल पड़े। उस समय जनरल हेविट के पास 2200 यूरोपीय सैनिक थे परंतु उसने इस प्रचण्ड विद्रोह को रोकने का साहस नहीं किया।

(4.) दिल्ली पर अधिकार

11 मई 1857 को मेरठ के क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली पहुंचे। उन्होंने कर्नल रिपले सहित अनेक अँग्रेज अधिकारियों को मार डाला तथा दिल्ली पर अधिकार कर लिया। विद्रोहियों ने बहादुरशाह से क्रान्ति का नेतृत्व करने का अनुरोध किया। पहले तो बहादुरशाह ने नेतृत्व स्वीकार करने में संकोच दिखाया किन्तु विद्रोहियों का अत्यधिक दबाव देखकर उसने क्रान्ति का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया।

बहादुरशाह ने दिल्ली में इस क्रांति का नेतृत्व नाम-मात्र के लिये किया। वास्तविक नेतृत्व उसके सेनापति बख्तखाँ ने किया जिसकी बाद में 13 मई 1859 को अँग्रेजों से युद्ध करते हुए मृत्यु हुई। मेरठ तथा दिल्ली के समाचार अन्य नगरों में भी पहुँचे जिससे उत्तरी भारत के अधिकांश भागों में विद्रोह फैल गया।

नाना साहब ने कानपुर पर अधिकार करके स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया। बुन्देलखण्ड में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने, मध्य भारत में तात्या टोपे नामक मराठा ब्राह्मण ने तथा बिहार में जगदीशपुर के जमींदार कुंवरसिंह ने क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया। इसी प्रकार अवध, कानपुर, आगरा, अलीगढ़, बरेली, मथुरा आदि विद्रोह के प्रमुख केन्द्र बन गये।

(5.) राजपूताना में सैनिक क्रांति की चिन्गारी

कम्पनी सरकार ने राजपूताना में डाकुओं को पकड़ने के लिये कोटा रेजीमेंट, जोधपुर लीजियन, शेखावाटी ब्रिगेड आदि सेनाओं का गठन किया था तथा इन्हें रखने के लिये नसीराबाद, नीमच, देवली, ब्यावर, एरिनपुरा तथा खैरवाड़ा में कुल छः स्थानों पर सैनिक छावनियां स्थापित की थीं। इन छावनियों में लगभग पाँच हजार भारतीय सैनिक नियुक्त थे।

इनमें एक भी यूरोपीय सैनिक नहीं था। जब मेरठ और दिल्ली की क्रांति के समाचार राजपूताने में पहुँचे तो ए.जी.जी. ने राजपूताना के शासकों को पत्र लिखकर निर्देशित किया कि वे अपने राज्य में शंति बनाये रखें। राज्य में क्रांतिकारियों को न घुसने दें तथा यदि वे घुसते हैं तो उन्हें बंदी बनायें। इन निर्देशों के उपरांत भी राजपूताने की लगभग समस्त सैनिक छावनियों में भारतीय सैनिकों ने अँग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध हथियार उठा लिये।

(6.) नसीराबाद में सैनिकों का विद्रोह

राजपूताने के मध्य में स्थित अजमेर, ब्रिटिश शासित क्षेत्र था। जिस समय मेरठ और दिल्ली में सैनिक क्रांति आरम्भ होने के समाचार अजमेर पहुंचे, उस समय अजमेर का तोपखाना बंगाल इन्फैण्ट्री की 15वीं रेजीमेंट के अधीन था। यह सेना कुछ समय पहले ही मेरठ से नसीराबाद आई थी।

जिस समय विद्रोह हुआ, अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर कर्नल डिक्सन ब्यावर में था। अजमेर का शस्त्रागार (मैगजीन), अजमेर की सघन बस्ती के बिल्कुल निकट स्थित था। इसमें इतना बारूद, शस्त्र, तोपें तथा राजकीय खजाना मौजूद था कि पूरे राजपूताना के विद्रोही सैनिकों को आपूर्ति करने के लिये पर्याप्त था।

कर्नल डिक्सन ने अपने सहायक, ऑफिशियेटिंग सैकण्ड इन कमाण्ड लेफ्टिनेंट डब्लू कारनेल को रात्रि में ही ब्यावर से मेरवाड़ा बटालियन की दो कम्पनियों के साथ अजमेर के लिये रवाना किया ताकि रात में ही अजमेर पहुँचकर मैगजीन पर अधिकार कर ले। ले. कारनेल अगली प्रातः मैगजीन के समक्ष प्रकट हुआ।

उसने ब्रिटिश ऑफीसर इन कमाण्ड से अपनी सेना सहित मैगजीन से बाहर जाने के लिये कहा तो ब्रिटिश ऑफीसर इन कमाण्ड ने मैगजीन खाली करने से मना कर दिया। इस पर ले. कारनेल ने उस पर दबाव बनाया और मैगजीन पर कब्जा करके 15वीं बंगाल इन्फैण्ट्री को मैगजीन से बाहर निकाल दिया।

कारनेल, अँग्रेजों के परिवारों को मैगजीन के भीतर ले आया और उसने मैगजीन की बुर्जों पर पुरानी तोपें चढ़ा दीं। कारनेल ने मैगजीन के बीचों बीच एक कुआं खोदा तथा पर्याप्त रसद जमा करके, किसी भी आपात् स्थिति से निबटने के लिये तैयार होकर बैठ गया। जब 15वीं इण्डियन इनफैण्ट्री नसीराबाद पहुँची तो उनके साथियों ने उन्हें इस बात के लिये धिक्कारा कि उन्होंने निम्न जाति के मेर लोगों को मैगजीन सौंप दी।

राजपूताना के एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल कर्नल जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस को 19 मई 1857 को इस विद्रोह का समाचार मिला। उस दिन वह माउण्ट आबू में था। एजीजी ने कोटा कण्टिन्जेण्ट को अजमेर पहुंचने के निर्देश भेजे किंतु तब तक उसे आगरा भेजा जा चुका था। एजीजी ने नसीराबाद की हिन्दुस्तानी सेना को आतंकित करने के लिये डीसा की लाइट इन्फैन्ट्री को नसीराबाद भेजने के आदेश भिजवाये।

23 मई 1857 को लॉरेंस ने राजपूताना की समस्त रियासतों के राजाओं से अपील की कि वे अपने राज्यों में व्यवस्था बनाये रखें तथा अपनी सेनाओं को ब्रिटिश शासन की सहायता के लिये राज्यों की सीमा पर तैनात करें। 23 मई को ही डीसा से लाइट इन्फैण्ट्री नसीराबाद के लिये चल पड़ी। उसके साथ लाइट फील्ड तोपखाना भी था।

इसमें पूरी तरह यूरोपियन सैनिक थे। लॉरेन्स ने अपने सहायक, कैप्टेन फोर्ब्स को तोपखाने के साथ नसीराबाद के लिये रवाना किया। 15वीं नेटिव इन्फैण्ट्री की ग्रेनेडियर कम्पनी को भी अजमेर भेजा गया तथा उसे अजमेर दुर्ग में तैनात किया गया ताकि डीसा से आने वाली लाइट इन्फैण्ट्री को मजबूती दी जा सके।

अजमेर से कुछ दूरी पर स्थित नसीराबाद छावनी के बाहर यूरोपियन अधिकारियों के बंगले बने हुए थे। छावनी क्षेत्र में एक असिस्टेण्ट कमिश्नर, एक सिविल सर्जन तथा उसकी पत्नी, गवर्नमेंट कॉलेज का प्रिंसीपल, उसका एक सहायक तथा आधा दर्जन नॉन कमीशन्ड अधिकारी तोपखाने के पास ही रहते थे।

28 मई 1857 को नसीराबाद की दो रेजीमेन्ट्स में विद्रोह हुआ। सबसे पहले 15वीं रेजीमेन्ट ने विद्रोह किया जो बहुत उद्दण्ड तथा अनुशासनहीन मानी जाती थी। इसके सैनिकों को व्यंग्य से पुरबिया (पूर्व के रहने वाले) कहा जाता था। उन्होंने शस्त्रागार से बन्दूकें लूट लीं और सरकारी बगंलों तथा निजी आवासों में घुसकर लूटपाट की और उन्हें जला दिया।

फर्स्ट बॉम्बे कैवेलरी तथा 30वीं नेटिव इनफैण्ट्री भी नसीराबाद में नियुक्त थीं। मेजर प्रिचार्ड ने इन टुकड़ियों के सिपाहियों को विद्रोहियों के विरुद्ध कार्यवाही करने का आदेश दिया किंतु सैनिकों ने आदेश मानने से मना कर दिया परन्तु जब ब्रिटिश अधिकारियों के बच्चे नसीराबाद से अजमेर के लिये रवाना हुए तो फर्स्ट बॉम्बे कैवेलरी ने स्त्रियों तथा बच्चों को सुरक्षा प्रदान की।

विद्रोहियों द्वारा इस टुकड़ी के दो अधिकारी मार डाले गये। कर्नल स्पॉट्सवुड को गोली मारी गई तथा कर्नल न्यूबरी को टुकड़ों में काट दिया गया। लेफ्टीनेंट लॉक तथा केप्टेन हार्डी को बुरी तरह से घायल कर दिया। यह हमला होते ही अँग्रेज अधिकारियों ने अजमेर की सड़क पकड़ी।

30वीं नेटिव इन्फैण्ट्री के कैप्टेन फेनविक ने नसीराबाद छोड़ने से मना कर दिया। कुछ वफादार सिपाहियों ने कैप्टेन से प्रार्थना की कि वह भी अजमेर चला जाये किंतु फेनविक ने मना कर दिया। सिपाही उसे मारना नहीं चाहते थे। इसलिये चार सिपाही उसे पकड़कर ले गये और छावनी के बाहरी छोर पर ले जाकर छोड़ दिया।

अँग्रेज अधिकारी कुछ विश्वस्त भारतीय सैनिकों को अपने साथ लेकर अजमेर की तरफ चल दिये किंतु ब्रिगेडियर मकाउ के निर्देशों पर वे अजमेर न जाकर ब्यावर की तरफ मुड़ गये। 30वीं नेटिव इन्फैण्ट्री के 120 मजबूत सिपाही तथा एक भारतीय अधिकारी के सरंक्षण में ये अँग्रेज अधिकारी ब्यावर पहुँच गये।

अँग्रेज अधिकारियों के नसीराबाद छोड़ते ही छावनी में लूटपाट और आगजनी तेज हो गई। चर्च तथा अधिकारियों के बंगलों में आग लगा दी गई तथा खजाना लूट लिया गया। अधिकारियों के बंगलों में रात भर लूट चलती रही। उसके बाद दुकानों में लूट आरम्भ हुई। विद्रोहियों ने सदर बाजार के कोने पर तोप लगा दी और धमकी दी कि यदि कोई उनके मार्ग में आया तो उसे तोप से उड़ा दिया जायेगा किंतु किसी को नहीं मारा गया न घायल किया गया।

बंगाल नेटिव इन्फेंटरी के सैनिक लूट का धन लेकर दिल्ली की ओर कूच कर गये। उनके पास नसीराबाद से लूट का इतना अधिक माल था कि उसे ढो पाना कठिन हो रहा था। विद्रोही सैनिक दु्रतगति से कूच करते गये। लूट के सामान से लदे होने तथा खराब सड़कों के उपरांत भी उन्होंने लम्बी यात्रा जारी रखी।

उनके साथ उनकी बीमार स्त्रियां, बच्चे तथा बहुत सारा सामान था। उन्हें लूट का एक भाग रास्ते में ही छोड़ देना पड़ा था। अजमेर के असिस्टेण्ट कमिश्नर ले. वॉल्टर्स तथा राजपूताना की फीर्ल्ड फोर्सेज के डिप्टी असिस्टेण्ट क्वार्टर मास्टर जनरल ले. हीथकोट ने विद्रोहियों का पीछा किया। उनके साथ एक हजार सिपाही थे।

यह टुकड़ी राज ट्रूप्स कहलाती थी। इसमें निकटवर्ती जयपुर तथा जोधपुर रियासतों के सैनिक थे। इन सैनिकों ने विद्रोहियों पर आक्रमण नहीं किया। इन्होंने इस बात को छिपाया भी नहीं कि उन्हें विद्रोहियों से सहानुभूति है। 18 जून 1857 को क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली पहुँचे तथा उन्होंने उस अंग्रेज पलटन पर पीछे से आक्रमण किया जो दिल्ली का घेरा डाले हुए थी। इस युद्ध में अँग्रेज सेना हार गयी।

नसीराबाद में शांति: 12 जून को लाइट इन्फैण्ट्री डीसा से नसीराबाद पहुँच गई। अजमेर से 100 मील की दूरी पर एरिनपुरा छावनी में अनयिमित सेना थी जिसे जोधपुर लीजियन कहा जाता था। ब्रिटिश अधिकारियों के अधीन दो स्थानीय कोर भी थे जिनमें से एक भील कोर थी जिसमें मेवाड़ी भील सैनिक थे।

दूसरी सेना खेरवाड़ा की मेरवाड़ा बटालियन थी जिसकी भरती कर्नल डिक्सन के द्वारा की गई थी। ये दोनों सेनायें अँग्रेजों के प्रति स्वामिभक्त बनी रहीं। जब फर्स्ट बंगाल इंफैण्ट्री ने विद्रोह किया तो भील कोर ने उसे विफल कर दिया।

विद्रोहियों के दिल्ली रवाना होने के कुछ दिन बाद 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री की इकाई, जोधपुर लीजियन की इकाई, सैकेण्ड बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री, तीन तोपें, बॉम्बे हॉर्स आर्टिलरी तथा हिज मैजस्टी की 83वीं बटालियन के 200 सिपाहियों ने नसीराबाद पहुँचकर स्थानीय लोगों को अभयदान दिया। जो अँग्रेज अधिकारी विद्रोह के दिन नसीराबाद छोड़कर ब्यावर चले गये थे, वे इन टुकड़ियों के साथ नसीराबाद लौट आये।

12 जून को फर्स्ट बॉम्बे लांसर्स का एक घुड़सवार घोड़े पर सवार होकर अपने सैनिकों की पंक्ति के समक्ष खड़ा हो गया तथा उसने अपने साथियों को विद्रोह के लिये आमंत्रित किया। बॉम्बे लांसर्स ने उसका पीछा किया, विद्रोही ट्रूपर, 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री की पंक्तियों में भाग गया जहाँ उसे शरण मिल गई।

ब्रिगेडियर हेनरी मकाउ ने 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री को बैरकों से बाहर आने के आदेश दिये। इस पर केवल 40 सैनिक बाहर आये। ब्रिगेडियर ने तोपें मंगवा लीं तथा 83वीं पैदल टुकड़ी को उन्हें दण्डित करने का निर्देश दिया। थोड़ी देर में ही विद्रोही घुड़सवार को एक तोपची ने मार गिराया।

उसके पांच विद्रोही साथियों को फांसी पर चढ़ा दिया गया। तीन को आजीवन कारावास दिया गया तथा पच्चीस सैनिकों के हथियार छीनकर दूसरे सैनिकों को दे दिये गये। नसीराबाद के सैनिक विद्रोह से कर्नल डिक्सन को गहरा आघात पहुँचा जिससे 25 जून 1857 को ब्यावर में उसका निधन हो गया।

(7.) नीमच में सैनिक क्रांति

कर्नल एबॉट ने भारतीय सिपाहियों को गंगाजल तथा कुरान पर हाथ धरकर शपथ दिलवायी कि वे अँग्रेजी हुकूमत के प्रति वफादार रहेंगे। उसने स्वयं भी बाइबिल पर हाथ रखकर शपथ ली कि वह अपने भारतीय सैनिकों पर पूरा विश्वास रखेगा किंतु अविश्वास का वातावरण बन चुका था इसलिये इन शपथों से कुछ नहीं हुआ।

3 जून 1857 को रात्रि 11 बजे भारतीय सैनिकों ने तोपखाने पर अधिकार करके छावनी को घेर लिया तथा उसमें आग लगा दी। कप्तान मेकडोनल्ड ने किले की रक्षा का प्रयास किया किंतु वहाँ तैनात टुकड़ी भी विद्रोही हो गयी। सैनिक कोष से 50 हजार रुपये तथा असैनिक कोष से 1 लाख 26 हजार रुपये लूट लिये गये।

एक सार्जेंण्ट की पत्नी की हत्या करके उसके बच्चों को अग्नि में फैंक दिया गया। इसके अतिरिक्त कोई हत्या नहीं हुई। नीमच छावनी से लगभग 40 अँग्रेज, औरतें व बच्चे मेवाड़ की ओर भागे। डूंगला गाँव में एक किसान ने उन्हें शरण दी। इसी समय खबर आयी कि मेवाड़ पोलिटिकल एजेंट कप्तान शावर्स बेदला के राव बख्तसिंह के नेतृत्व में सेना लेकर नीमच आ रहा है।

इस पर विद्रोही सिपाहियों ने लूट का माल लेकर बैण्ड बजाते हुए छावनी से कूच किया। 10 जुलाई 1857 को कर्नल लॉरेंस ने नसीराबाद से हर मेजस्टी की 83वीं रेजीमेंट के 100 सैनिक, 12वीं बॉम्बे नेटिव इन्फैण्ट्री के 200 सैनिक, सैकेण्ड बॉम्बे कैवलेरी का एक स्क्वैड्रन तथा अजमेर मैगजीन से दो तापें नीमच भेजीं। तब तक क्रांतिकारी दिल्ली के लिये कूच कर चुके थे।

शाहपुरा के शासक ने क्रांतिकारी सिपाहियों को शरण दी तथा उनके लिये रसद आदि की व्यवस्था की। निम्बाहेड़ा में भी इन सिपाहियों का भव्य स्वागत हुआ। इन सिपाहियों ने देवली पहुँच कर छावनी को लूटा। अँग्रेज पहले ही देवली को खाली करके जहाजपुर जा चुके थे।

यहाँ से विद्रोही सिपाही टोंक तथा कोटा होते हुए दिल्ली पहुँचे और दिल्ली के क्रांतिकारियों से मिलकर अंग्रेज सेना पर आक्रमण किया। कप्तान शावर्स ने सेना लेकर विद्रोही सिपाहियों का पीछा किया। वह शाहपुरा भी गया किंतु शाहपुरा के शासक ने उसके लिये नगर के द्वार नहीं खोले। शावर्स जहाजपुर व नीमच भी गया।

उसकी सहायता के लिये ए.जी.जी. जार्ज लॉरेन्स भी आ गया किंतु तब तक क्रांतिकारी दिल्ली के लिये कूच कर चुके थे। ए.जी.जी. ने डीसा से एक यूरोपियन सेना बुलाकर नसीराबाद में नियुक्त की तथा वहाँ स्थित समस्त भारतीय सैनिकों को सेवा मुक्त कर दिया।

12 अगस्त 1857 को नीमच छावनी के कमाण्डर कर्नल जैक्सन को सूचना मिली कि भारतीय सैनिक पुनः नीमच में विद्रोह करने की योजना बना रहे हैं। सैनिकों ने एक अँग्रेज अधिकारी को मार दिया तथा दो अधिकारियों को घायल कर दिया। मेवाड़ी सैनिकों के सहयोग से इस विद्रोह को भी दबा दिया गया।

(8.) आउवा में क्रांति

आउवा ठिकाना जोधपुर राज्य में स्थित था। जोधपुर राज्य पर उस समय महाराजा तख्तसिंह का शासन था। वह ईडर से लाकर राजा बनाया गया था इसलिये मारवाड़ के सामंत उसे विदेशी शासक मानते थे। तख्तसिंह ने मारवाड़ के सामंतों से परंपरागत रेख के साथ नजराना भी मांगा तथा हुक्मनामे में वृद्धि कर दी।

तख्तसिंह ने गुजरात से अपने साथ आये आदमियों को राज्य में उच्च पद दिये। इससे मारवाड़ के सामंत, राजा से नाराज थे। उन्होंने राजा को रेख, नजराना व हुक्मनामा देने से मना कर दिया। इनमें आसोप, आउवा तथा पोकरण के ठाकुर प्रमुख थे।

1836 ई. में स्थापित जोधपुर-लीजियन नामक सेना एरिनपुरा में तैनात की गयी थी। 18 अगस्त को जोधपुर लीजियन के कुछ सिपाहियों ने माउण्ट आबू में अँग्रेजी सैनिकों की बैरकों में घुसकर गोलियां चलाईं तथा ए.जी.जी. के पुत्र ए. लॉरेंस को घायल कर दिया। कप्तान हॉल ने विद्रोहियों को अनादरा गाँव तक खदेड़ दिया।

ये विद्रोही सैनिक 23 अगस्त को ऐरिनपुरा पहुँचे। ऐरिनपुरा में इनका स्वागत हुआ तथा ऐरिनपुरा में भी विद्रोह हो गया। विद्रोही सिपाही पाली की ओर बढ़े। जोधपुर नरेश तख्तसिंह ने अनाड़सिंह को सेना देकर अंग्रेजों की सहायता के लिये भेजा। क्रांतिकारी सैनिक पाली के बजाये आउवा की तरफ मुड़ गये।

आउवा ठाकुर कुशालसिंह ने इन सैनिकों का स्वागत किया। कुशालसिंह को लाम्बिया, बांटा, भीवलिया, राडावास, बांजावास आदि ठिकानों के सामंतों का समर्थन प्राप्त था। कुशालसिंह ने जोधपुर के पोलिटिकल एजेंट मॉक मेसन को सूचित किया कि उसने क्रांतिकारियों को इस बात पर सहमत कर लिया है कि यदि उन्हें क्षमा कर दिया जाये तो वे अपने हथियार तथा सरकारी सम्पत्ति को जमा करवा देंगे।

इस पर मॉक मेसन ने कुशालसिंह को लताड़ पिलाई कि वह उन लोगों की पैरवी कर रहा है जो देशद्रोही हैं तथा जिन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया है।

कुशालसिंह ने क्रांतिकारियों से बात की तथा उन्हें किले में बुला लिया। कुशालसिंह ने अँग्रेजों से और राजा तख्तसिंह की सेनाओं से लड़ने का निश्चय किया। गूलर का ठाकुर बिशनसिंह, आसोप का ठाकुर शिवनाथसिंह तथा आलणियावास का ठाकुर अजीतसिंह भी अपनी सेनाएं लेकर आउवा आ गये। खेजड़ला ठाकुर ने भी अपने कुछ सैनिक कुशालसिंह की मदद के लिये भेज दिये।

मेवाड़ के सलूम्बर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द के सामंतों ने भी अपनी सेनाएं आउवा भेज दीं। इसी बीच किलेदार अनाड़सिंह की सहायता के लिये जोधपुर से कुशलराज सिंघवी, छत्रसाल, राजमल मेहता, विजयमल मेहता आदि की सेनाएं भी आ गयीं। अनाड़सिंह ने अपनी तोपों के मुंह विद्रोही सिपाहियों की ओर खोल दिये।

विद्रोहियों ने भी गोलीबारी आरम्भ कर दी। जोधपुर की राजकीय सेना के दस सिपाही मारे गये तथा अनाड़सिंह की सेना पराजित हो गयी। लेफ्टीनेंट हीथकोट ने पाँच सौ अश्वारोही लेकर विद्रोही सिपाहियों पर आक्रमण किया। विद्रोही सिपाहियों ने राजकीय सेना के 76 आदमी मार डाले। अनाड़सिंह घायल हो गया।

हीथकोट किसी तरह जान बचाकर भागा। कुशलराज सिंघवी और विजयमल मेहता भी मैदान छोड़कर भाग गये। क्रांतिकारी सिपाहियों ने राजकीय सेना के डेरे लूट लिये।

आउवा में पराजय के समाचार सुनकर ए.जी.जी. जॉर्ज लारेंस 18 सितम्बर को आउवा पहुँचा। जोधपुर से मॉक मेसन भी आ गया। विद्रोही सिपाहियों ने मॉक मेसन की गोली मारकर हत्या कर दी तथा उसका सिर काटकर किले के दरवाजे के सामने उलटा लटका दिया। ए.जी.जी. डरकर अजमेर भाग गया।

दिल्ली पर अधिकार कर लेने के बाद अँग्रेज सेना ने आउवा पर फिर से चढ़ाई की। 20 जनवरी 1858 को कर्नल होमल ने आउवा को घेरा। इस समय कुशालसिंह के पास केवल 700 सैनिक थे। चार दिन तक आउवा का घेरा चलता रहा। दोनों पक्षों में भीषण गोलीबारी हुई। ठाकुर कुशालसिंह रात के अंधेरे में आउवा छोड़कर मेवाड़ चला गया और उसके भाई (लाम्बिया ठाकुर) ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व ग्रहण किया।

अंत में अँग्रेजों ने आउवा के किलेदार को रिश्वत देकर किले पर अधिकार कर लिया। अँग्रेजों ने आउवा को जमकर लूटा। सिरियाली के ठाकुर को पकड़ कर राजा तख्तसिंह के पास भेज दिया। गूलर, आसोप एवं आलणियावास की किलेबंदी नष्ट कर दी।

गूलर, आसोप, आलणियावास तथा आउवा ठाकुर, क्रांतिकारी सिपाहियों का नेतृत्व करते हुए नारनौल तक गये तथा अँग्रेजी फौजों से युद्ध किया। जब अँग्रेजों ने आसोप घेर लिया तब आसोप ठाकुर ने अँग्रेज सेना पर आक्रमण किया। पाँच सप्ताह तक चले इस युद्ध के बाद आसोप ठाकुर की युद्ध सामग्री समाप्त हो गयी और उसे समर्पण करना पड़ा।

उसे बंदी बना लिया गया तथा उसकी जागीर जब्त कर ली गयी। गूलर तथा आलणियावास के ठाकुरों की जागीरें भी जब्त कर ली गयीं तथा उन्हें डाकू घोषित किया गया। आउवा ठाकुर भी नारनौल से लौटकर कई वर्षों तक अपनी जागीर फिर से प्राप्त करने की जुगत करता रहा। उसने आउवा पर कई आक्रमण किये किंतु असफल रहा। अंत में 1860 ई. में नीमच में उसने आत्म-समर्पण किया।

(9.) कोटा में क्रांति

कोटा की क्रांति राजस्थान में हुई 1857 की क्रांति में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थी। कोटा में 1838 ई. से कोटा कन्टिजेन्ट स्थापित थी। कोटा के शासक से इस बटालियन का पूरा खर्चा लिया जाता था। जून 1857 में नीमच विद्रोह को दबाने के लिये मेजर बर्टन कोटा कन्टीजेंट को लेकर नीमच गया।

तब तक नीमच के क्रांतिकारी दिल्ली के लिये जा चुके थे। अतः कोटा की सेना को आगरा भेज दिया गया। यह सेना सितम्बर में विद्रोह पर उतर आयी। ये समाचार कोटा पहुँचे तो कोटा के सैनिकों में भी क्रांति के बीज फूट पड़े। मेजर बर्टन 12 अक्टूबर को वापस कोटा लौटा। कोटा महाराव ने बर्टन का स्वागत विजयी सेनानायक की भांति किया।

बर्टन ने कोटा नरेश रामसिंह को गुप्त परामर्श दिया कि वह उन सैनिक अधिकारियों को बर्खास्त कर दे जिनमें ब्रिटिश विद्रोही भावनाएं हैं। यह परामर्श सैनिकों को ज्ञात हो गया। इससे क्रुद्ध होकर 15 अक्टूबर 1857 को कोटा राज पलटन में विद्रोह हो गया।

कोटा की नारायण पलटन तथा भवानी पलटन ने हथियारों से लैस होकर कोटा रेजीडेंसी को घेर लिया जहाँ मेजर बर्टन का आवास था। तीन हजार सैनिकों ने लाला जयदयाल तथा रिसालदार मेहराबखान के नेतृत्व में प्रातः साढ़े दस बजे रेजीडेंसी पर गोलाबारी आरम्भ कर दी।

रेजीडेंसी के सर्जन डॉ. सेल्डर तथा डॉ. काण्टम, मेजर बर्टन तथा उसके दो पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया गया। कोटा के क्रांतिकारियों को कोटा राज्य के अधिकांश अधिकारियों यहाँ तक कि विभिन्न किलों के किलेदारों का भी सहयोग मिल गया। सैनिकों ने राजकीय भण्डारों, बंगलों, दुकानों, शस्त्रागारों, शहर कोतवाली आदि पर अधिकार कर लिया। उन्होंने कोटा राज्य के कोषागारों पर भी आक्रमण किया।

मेजर बर्टन का सिर कोटा शहर में घुमाया गया तथा महाराव का महल घेर लिया गया। महाराव ने अँग्रेजों तथा करौली के शासक से सहायता के लिये संदेश भिजवाये। ये संदेश भी क्रांतिकारियों के हाथ लग गये। अतः सैनिकों ने महल पर हमला कर दिया। महाराव ने मथुराधीश मंदिर के महंत को मध्यस्थ बनाकर विद्रोही सैनिकों से संधि की।

सैनिकों ने महाराव से एक कागज पर लिखवाया कि बर्टन की हत्या महाराव के आदेश पर की गयी है तथा महाराव ने लाला जयदयाल को अपना मुख्य प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किया है। लगभग 6 माह तक कोटा महाराव का अपने राज्य पर कोई अधिकार नहीं रहा।

करौली के शासक मदनपाल तथा उदयपुर के महाराणा स्वरूपसिंह ने अपनी सेनाएं कोटा भेजीं। इन सेनाओं ने विद्रोही सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया किंतु शहर का एक भाग अब भी कोटा महाराव के नियंत्रण में नहीं था। वहाँ पर विद्रोही सैनिकों ने भीषण लूटपाट आरम्भ कर दी।

कोटा महाराव ने क्रांति का दमन करने के लिये ए.जी.जी. से सहायता मांगी। ए.जी.जी. ने बम्बई से सेना मंगवाई जो मार्च 1858 में चम्बल नदी के उत्तरी किनारे पर पहुँची। इस समय चम्बल का दक्षिणी भाग विद्रोही सैनिकों के अधिकार में था किंतु जनरल रॉबर्ट्स ने आसानी से इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

30 मार्च 1858 तक सम्पूर्ण कोटा शहर पर महाराव का शासन हो गया। इस युद्ध में 120 से 130 विद्रोही सैनिक मारे गये। लाला जयदयाल तथा मेहराबखान भूमिगत हो गये किंतु कुछ ही महीनों में पकड़कर उन्हें फांसी दे दी गयी। कोटा की क्रांति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें राज्याधिकारी भी क्रांतिकारियों के साथ थे तथा उन्हें जनता का प्रबल समर्थन प्राप्त था। वे चाहते थे कि कोटा का महाराव अँग्रेजों के विरुद्ध हो जाये तो वे महाराव का नेतृत्व मान लेंगे किंतु महाराव इस बात पर सहमत नहीं हुआ।

(10.) मेवाड़ में क्रांति

भारत-व्यापी क्रांति आरम्भ हो के समय, महाराणा स्वरूपसिंह के सम्बन्ध न तो अपने सरदारों से अच्छे थे और न कम्पनी सरकार से। महाराणा सामंतों को प्रभावहीन करना चाहता था। इससे सरदार दो धड़ों में विभक्त थे तथा उनमें खूनी संघर्ष की संभावना थी।

इस समय महाराणा और कम्पनी सरकार दोनों को ही मेवाड़ के सामंतों से भय था इसलिये दोनों को ही एक दूसरे के सहयोग की आवश्यकता थी। मेरठ विद्रोह की सूचना मिलने पर ए.जी.जी. ने महाराणा को पत्र लिखा कि वह अपनी सेनाएं तैयार रखे ताकि उनका उपयोग विद्रोह को दबाने में किया जा सके।

महाराणा ने अपने सामंतों को आदेश दिया कि वे अपनी सेनाएं तैयार रखें तथा पोलिटिकल एजेंट शावर्स के आदेशों को महाराणा के ही आदेश समझें। मेवाड़ की भील कोर का मुख्यालय खैरवाड़ा में था, वहाँ भी क्रांति होने का भय था।

नीमच के क्रांतिकारी सैनिक, नीमच छावनी में आग लगाने के बाद चित्तौड़, हमीरगढ़ व बनेड़ा में सरकारी बंगलों को लूटते हुए शाहपुरा पहुँचे। शाहपुरा के राजाधिराज ने सैनिकों को शरण दी। वहाँ से सैनिक देवली की ओर रवाना हुए। उनके आगमन की सूचना पाकर अँग्रेज अधिकारियों के परिवार देवली से भाग खड़े हुए।

उन्हें जहाजपुर में स्थित मेवाड़ी सेना ने बचा कर उदयपुर भिजवाया। कप्तान शावर्स ने मेवाड़ की एक टुकड़ी को क्रांतिकारी सैनिकों के पीछे भेजा तथा स्वयं नीमच होते हुए शाहपुरा आ गया। शाहपुरा के राजाधिराज ने शावर्स के लिये किले के दरवाजे नहीं खोले। शावर्स जहाजपुर होता हुआ बेगूं पहुंचा।

बेगूं के रावत महासिंह ने उसका स्वागत किया। उसने क्रांतिकारियों को अपने राज्य में नहीं घुसने दिया। क्रांति समाप्त होने पर अँग्रेज सरकार ने रावत को दो हजार मूल्य की खिलअत प्रदान की।

सलूम्बर के रावत ने परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए महाराणा को धमकाया कि यदि उसकी परम्परागत मांगें नहीं मानी गयीं तो वह चित्तौड़ के किले पर महाराणा के प्रतिद्वंद्वी को बैठा देगा। महाराणा ने अँग्रेजों से सहायता मांगी। इस पर शावर्स ने रावत को धमकी दी कि यदि वह गड़बड़ी करने का प्रयास करेगा तो उसका ठिकाना जब्त कर लिया जायेगा।

इस पर रावत ने कहा कि मैं कुछ नहीं कर रहा, यह तो केवल अफवाह है। विद्रोहियों की एक टुकड़ी सलूम्बर आकर ठहरी। इस पर शावर्स ने रावत को लिखा कि विद्रोही सैनिकों को अपने यहाँ ही रोके तथा उनके मुखिया को गिरफ्तार करके भेज दे किंतु रावत ने ऐसा नहीं किया तथा विद्रोही सैनिकों को वहाँ से निकल जाने दिया। इस पर अँग्रेजों ने उससे स्पष्टीकरण मांगा। रावत ने कहा कि वह विद्रोही सैनिकों के आगे मजबूर था।

(11.) झाँसी में क्रान्ति

1854 ई. में झाँसी राज्य को ब्रिटिश क्षेत्र में सम्मिलित कर लिया गया था। अतः झाँसी में अँग्रेजों के विरुद्ध व्यापक असन्तोष था। 5 जून 1857 को झाँसी की सेना ने विद्रोह किया तथा अँग्रेज अधिकारियों को दुर्ग में घेरकर 8 जून को उनकी हत्या कर दी।

आरम्भ में रानी लक्ष्मीबाई ने विद्रोहियों का समर्थन नहीं किया तथा सागर डिवीजन के कमिशनर को पत्र लिखकर अपनी स्थिति भी स्पष्ट की। अर्सकाइन ने भी रानी को प्रशासन का उत्तरदायित्व सौंपा, फिर भी अँग्रेजों ने झाँसी की घटनाओं के लिए रानी लक्ष्मीबाई को दोषी ठहराया।

जब ओरछा तथा दतिया के शासकों ने झाँसी पर आक्रमण किया, तब भी रानी अँग्रेजों से सहायता प्राप्त करना चाहती थी किन्तु अँग्रेजों ने उसे सन्देह की दृष्टि से देखा। विवश होकर रानी ने झाँसी के विद्रोहियों का नेतृत्व ग्रहण कर लिया। रानी का दमन करने के लिए सर ह्यूरोज सेना लेकर बुन्देलखण्ड की ओर आया।

रानी ने स्वयं सेना का संचालन किया। ग्वालियर से तांत्या टोपे भी रानी की सहायता के लिए आ पहुँचा किन्तु कुछ देशद्रोहियों ने किले के फाटक खोल दिये जिससे शत्रु सेना भीतर आ गई। अतः रानी लक्ष्मीबाई 4 अप्रैल 1858 को रात के अन्धेरे में अपने पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधकर नगर से बाहर चली गई और ग्वालियर, गुना, बीना तथा बारां होती हुई झालावाड़ नगर के निकट कालीसिंध नदी के किनारे तक आ पहुंची।

जब राजराणा पृथ्वीसिंह को अपने सैनिकों से ज्ञात हुआ कि महारानी अँग्रेजों से लड़ती हुई कालीसिंध के तट पर आकर ठहरी है तो राजराणा ने महारानी को महल में आमंत्रित किया। महारानी की दशा देखकर पृथ्वीसिंह को भारत भूमि की दुर्दशा का बोध हुआ। पृथ्वीसिंह ने महारानी को दो दिन तक महल में ठहराया तथा उन्हें नये वस्त्र भी प्रदान किये।

अँग्रेजी सेनाएं महारानी का पीछा करती हुई झालावाड़ तक आ पहुंचीं। तब महारानी को झालावाड़ छोड़ना पड़ा। महारानी बहादुरी से लड़ती हुई कालपी पहुँच गयी। ह्यूरोज भी रानी का पीछा करते हुए कालपी आ पहुँचा। कालपी में दोनों में घमासान युद्ध हुआ। मई 1858 में कालपी पर अग्रेजों का अधिकार हो गया।

वहाँ से रानी ग्वालियर पहुँची तथा ग्वालियर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। ह्यूरोज भी रानी का पीछा करता हुआ ग्वालियर पहुँचा और रानी को घेर लिया। रानी ने यहाँ से भी भागने का प्रयास किया किन्तु उसका घोड़ा एक नाला पार करते समय वहीं गिर गया।

रानी स्वयं भी बुरी तरह घायल हो गई। वहीं पर उसकी देह छूट गई। असीम धैर्य, साहस, स्वाभिमान और पराक्रम का परिचय देकर महारानी ने अँग्रेजों को खूब छकाया और अंत में मानव जाति के इतिहास में अपना नाम सबसे ऊपर लिखवा कर अमर हो गई।

(12.) कानपुर और बिठुर की क्रान्ति

1818 ई. में पेशवा बाजीराव (द्वितीय) को कानपुर के निकट बिठुर भेज दिया गया तथा उसके लिए 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देना तय किया गया। बाजीराव के कोई पुत्र नहीं था, अतः उसने नाना धुन्धुपन्त को जिसे नाना साहब कहकर पुकारा जाता था, गोद लिया। 28 जनवरी 1851 को बाजीराव की मृत्यु हो गई।

डलहौजी ने नाना साहब को पेंशन देने से इन्कार कर दिया। अतः नाना अँग्रेजों का शत्रु हो गया। मेरठ में हुए विद्रोह की सूचना जब कानपुर पहुँची तो अँग्रेजों ने खजाने तथा बारूद के भण्डार की सुरक्षा का दायित्व नाना साहब के सिपाहियों को सौंपा किन्तु 4 जून को कानपुर में विद्रोह हो गया।

6 जून 1857 को नाना ने विद्रोहियों का नेतृत्व ग्रहण किया और कानपुर की ओर आया। अँग्रेजों ने अपनी सुरक्षा के लिए एक अस्थाई शिविर बनाया किन्तु 25 जून को इस शिविर पर विद्रोहियों ने अधिकार कर लिया। 27 जून को अँग्रेज इलाहाबाद की ओर जाने लगे किन्तु विद्रोहियों ने उन पर आक्रमण कर दिया।

कानपुर पर अधिकार हो जाने के बाद बिठुर में नाना ने स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया। कुछ दिन बाद ही इलाहाबाद से अँग्रेजी सेना आ पहुँची जिसने 16 जुलाई 1857 को कानपुर पर पुनः अधिकार कर लिया।

इसी दिन कानपुर में बीबीघर नामक एक मकान में कुछ अँग्रेज स्त्रियों व बच्चों की हत्या कर दी गई। इससे नाराज होकर जनरल नील ने कानपुर में जन-साधारण पर भयानक अत्याचार किए। उसने एक मुसलमान अधिकारी को बीबीघर में फर्श पर लगे खून को जीभ से साफ करने का आदेश दिया।

उस अधिकारी द्वारा आदेश पालन किये जाने पर भी नील ने उसे मृत्यु-दण्ड दिया। जनरल नील ने मृत ब्राह्मणों को जमीन में दफनवाया तथा मुसलमानों को चिता पर जलवाया। इसके तीन दिन बाद 19 जुलाई 1857 को बिठुर पर आक्रमण करके नाना के महल में आग लगा दी। बिठुर में भयंकर लूटमार की गई तथा धन मिलने की आशा में महल की एक-एक ईंट उखड़वा दी।

अँग्रेजों को बिठुर की लूट में इतना अधिक सोना-चाँदी प्राप्त हुआ कि वे पूरा उठाकर नहीं ला जा सके। जनवरी 1858 के बाद नाना के बारे में कोई पता नहीं चला। बाद में पता लगा कि वह नेपाल चला गया है किन्तु उसके बाद उसकी कोई निश्चित जानकारी नहीं मिल सकी।

(13.) बिहार में क्रान्ति

बिहार में विद्रोह का संचालन शाहबाद जिले की जगदीशपुर जमींदारी के जमींदार कुवंरसिंह ने किया। उस समय उनकी आयु 70 वर्ष थी। कुंवरसिंह की जमींदारी काफी बड़ी थी किन्तु अँग्रेजों ने उन्हें दिवालियेपन की स्थित में पहुंचा दिया था। जुलाई 1857 में क्रांतिकारी सैनिकों ने दानापुर पर अधिकार करके कुवरंसिंह को नेतृत्व करने के लिये आमंत्रित किया।

अगस्त 1857 में कुवंरसिंह लखनऊ की ओर चल पडे़। रास्ते में आजमगढ़ जिले में अँग्रेजी सेना से उनकी मुठभेड़ हो गयी। कुवंरसिंह ने अँग्रेजी सेना को खदेड़कर मार्च 1858 में आजमगढ़ पर अधिकार कर लिया। अब कुवंरसिंह बनारस की ओर बढ़े। 6 अप्रैल 1858 को लार्ड मार्क ने अपने तोपखाने सहित कुंवरसिंह से मुकाबला किया।

कुंवरसिंह ने उसे भी परास्त करके भगा दिया। 22 अप्रैल 1858 को कुंवरसिंह ने अपनी जागीर जगदीशपुर पर अधिकार कर लिया। जगदीशपुर पहुँचे हुए उन्हें 24 घण्टे भी नहीं हुए थे कि आरा से ली-ग्रेड एक सेना लेकर जगदीशपुर आ पहुँचा। कुवंरसिंह ने उसे भी पराजित कर दिया।

तीन दिन बाद कुंवरसिंह की मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु के समय जगदीशपुर पर आजादी का ध्वज लहरा रहा था। बाद में मेजर आयर ने जगदीशपुर के महलों और मन्दिरों को नष्ट करके अपनी भड़ास निकाली।

(14.) दक्षिण भारत में क्रांति की चिन्गारी

बहुत से इतिहासकारों ने लिखा है कि इस क्रांति के समय नर्मदा का दक्षिणी भाग पूर्णतः शान्त रहा। इन इतिहासकारों के अनुसार क्रांति के प्रमुख केन्द्र बिहार, अवध, रूहेलखण्ड, चम्बल तथा नर्मदा के मध्य की भूमि एवं दिल्ली ही थे किंतु यह मत सही नहीं है।

आधुनिक शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह क्रांति समस्त महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और करेल तक फैल गई थी। गोवा और पाण्डिचेरी भी इस क्रांति से प्रभावित हुए। महाराष्ट्र में इस क्रांति को सतारा के रहने वाले रंगा बापूजी गुप्ते ने आरम्भ किया।

दक्षिण भारत के प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं में सोनाजी पण्डित (कर्नाटक), अण्णाजी फड़नवीस (कोल्हापुर), गुलाम गौस व सुल्तान बख्श (मद्रास), अरणागिरि व कृष्णा (चिंगलपुट), मुलबागल स्वामी (कोयम्बटूर), मुल्ला अली, कोनजी सरकार, विजय कुदारत कुंजी मागा (केरल), आदि उल्लेखनीय हैं।

दक्षिण में हैदराबाद, कनार्टक, तमिलनाडु एवं सूदूर दक्कन के बहुत से क्षेत्र इस क्रांति से अलग रहे। दक्षिण भारत की 1857 की क्रांति की घटनायें इसलिये इतिहास की पुस्तकों में नहीं आ सकीं क्योंकि अँग्रेज उस समय के समस्त अभिलेख उठाकर लंदन ले गये। जबकि इस क्रांति का दमन किये जाने के बाद अँग्रेजों ने दक्षिण भारत में अनेक भारतीयों पर मुकदमे चलाये जिनकी कार्यवाहियां आज भी लंदन के अभिलेखागार में सुरक्षित हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – अठारह सौ सत्तावन की क्रांति

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के कारण

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति की घटनाएँ एवं प्रसार

अठारह सौ सत्तावन क्रांति का दमन

1857 की क्रांति की असफलता के कारण

सत्तावन की क्रांति का दमन

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सत्तावन की क्रांति का दमन

सत्तावन की क्रांति का दमन दिल्ली से आरम्भ हुआ। हेनरी बरनार्ड को सेना देकर दिल्ली की ओर भेजा गया। क्रांतिकारी सैनिकों ने अँग्रेजी सेना को पीछे हटा दिया। दिल्ली में एकत्रित भारतीय सैनिकों में जोश तो था किंतु उनका सफल संचालन करने वाला कोई अनुभवी सेनापति नहीं था।

अतः वे विभिन्न दिशाओं से आने वाली अँग्रेजी सेनाओं का सामना करने में असफल रहे। इसके विपरीत अँग्रेजी टुकड़ियों का संचालन अनुभवी सेनापतियों द्वारा किया जा रहा था। अंग्रेजी सेनाओं ने अठारह सौ सत्तावन की क्रांति का दमन कर दिया।

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति का दमन

अगस्त-सितम्बर 1857 में पंजाब से बड़ी-बड़ी तोपें दिल्ली पहुँच गईं। 14 सितम्बर 1857 को कश्मीरी गेट को बारूद से उड़ा दिया गया।

छः दिनों तक चले भंयकर युद्ध के बाद अँग्रेजों ने 20 सितम्बर तक दिल्ली के अधिकांश स्थानों पर अधिकार कर लिया। इस संघर्ष में जॉन निकलसन मारा गया। ब्रिटिश जनरल हॉडसन ने बहादुरशाह के दो पुत्रों को गोली मार दी। 21 सितम्बर 1857 को अँग्रेजों ने बहादुरशाह, उसकी बेगम जीनत महल तथा एक पुत्र को बन्दी बनाकर रंगून भेज दिया। 1862 ई. में इस नाममात्र के अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह की मृत्यु हो गयी।

सत्तावन की क्रांति का दमन – दिल्ली में कत्ले आम

1857 की क्रांति के समय दिल्ली की जनसंख्या 1 लाख 52 हजार थी। फिर भी अँग्रेज सेनाओं ने पांच दिन के संघर्ष के बाद दिल्ली पर अधिकार करके हजारों सैनिकों, जन-साधारण एवं निर्दोष व्यक्तियों का कत्ले आम किया। यह ठीक वैसा ही था जैसा किसी समय अलाउद्दीन, तैमूर लंग अथवा नादिरशाह ने किया था। 

यद्यपि क्रांतिकारी सैनिकों ने भी अँग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों की हत्याएँ की थीं किन्तु उन्होंने ये हत्याएँ विप्लव के समय की थीं जबकि अँग्रेजों ने रक्तपात, विद्रोह की समाप्ति के बाद आरम्भ किया। भारतीय सैनिकों ने उन अँग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों की हत्याएं कीं जो भारतीयों पर अमानवीय ढंग से शासन तथा अत्याचार कर रहे थे।

अँग्रेजों ने केवल विद्रोही सैनिकों का ही नहीं अपितु साधारण नागरिकों का भी हजारों की संख्या में कत्ल किया। इन नागरिकों का विप्लव से दूर-दूर तक सम्बन्ध नहीं था। दिल्ली की लूट और विनाश के सम्बन्ध में टाइम्स पत्र के एक संवाददाता ने लिखा है- ‘शाहजहाँ के शहर में नादिरशाह के कत्लेआम के बाद ऐसा दृश्य नहीं देखा गया था।’

सत्तावन की क्रांति का दमन – भारत के अन्य भागों में कत्लेआम

जनरल नील ने इलाहाबाद और बनारस पहुँच कर गांव-के-गांव जला दिये और खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद कर दीं। जून 1857 में बनारस और इलाहाबाद के क्षेत्रों में बिना मुकदमा चलाये, लोगों को मृत्यु दण्ड दे दिया गया। बाजार में खड़े वृक्षों पर सहस्रों व्यक्तियों को फांसी दे दी गई।

इतिहासकार जॉन ने लिखा है- ‘तीन माह तक आठ गाड़ियां सुबह से शाम तक शवों को चौराहों व बाजारों से हटाकर ले जाने में व्यस्त रहीं। किसी भी व्यक्ति को भागकर नहीं जाने दिया गया, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति उन्हें विद्रोही दिखाई दे रहा था। सम्भवतः वे भारतीयों को बता देना चाहते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करना सरल नहीं है। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि ये अत्याचार उन अँग्रेजों द्वारा किये गये जो अपने आपको सभ्य, प्रगतिशील और शिक्षित कहते थे और जो भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये आये थे।’

जनरल नील तथा जनरल हेवलॉक ने, जिस रास्ते से भी वे गुजरे, निरीह पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों का कत्ले आम करवाया। झांसी और लखनऊ में भी साधारण नागरिकों के साथ यही व्यवहार किया गया। रस्सियों से लटकवा कर गोली से उड़ा देना सामान्य बात थी। जिन-जिन रास्तों से अँग्रेजी सेना गुजरती थी, वहाँ लाशों के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता था। इस कत्ले आम को देखकर अफगानी एवं ईरानी आक्रमणों की यादें ताजा हो गईं जिनका उद्देश्य केवल सर्वनाश करना होता था।

सत्तावन की क्रांति का दमन – मारवाड़ राज्य की सेवाएं

एजीजी लॉरेंस तथा पोलिटिकल एजेंट मॉन्क मैसन ने जोधपुर महाराजा से, बागी सिपाहियों को मारवाड़़ में न घुसने देने की प्रार्थना की। पोलिटिकल एजेंट की प्रार्थना पर जोधपुर नरेश तख्तसिंह ने 6 तोपें तथा 2000 सैनिक लेफ्टिीनेंट कारनेल की सहायता के लिये अजमेर भेजे। यह सेना अजमेर में आनासागर के किनारे रही।

इसे मैगजीन में प्रवेश नहीं करने दिया गया। कुचामन का ठाकुर केसरीसिंह भी अपने सैनिकों को लेकर अजमेर पहुँचा तथा कई सप्ताह तक अजमेर मैगजीन में रहा। जब 16 जून को पंवार अनाड़सिंह और महता छत्रसाल आदि उस सेना को वेतन बांटने भेजे गए, तब वहाँ के अँग्रेज अधिकारियों ने आनासागर तक सामने आकर इनका सत्कार किया।

बाद मे ये लोग ब्यावर जाकर एजीजी से मिले। उसके सेक्रेटरी ने भी आगे आकर इन्हें सम्मान दिया। वहाँ से एजीजी अजमेर चला गया। जोधपुर नरेश ने परिवारों सहित भटक रहे अंग्रेज अधिकारियों को जोधपुर आने का निमंत्रण दिया। इस पर अंग्रेज अधिकारी अपने परिवारों के साथ जोधपुर आ गये। कर्नल पेन्नी का मार्ग में हृदयाघात से निधन हो गया।

तात्या टोपे का दमन

22 जून 1857 को तात्या टोपे, ग्वालियर के निकट परास्त हो गया। तात्या को आशा थी कि उसे कोटा तथा जयपुर से सहायता मिलेगी इसलिये वह राजपूताने की ओर मुड़ा किंतु कोटा से सहायता न मिलने पर उसने लालसोट का रुख किया। कर्नल होेम्स उसके पीछे लगा रहा।

जब तात्या टोंक पहुंचा तो टोंक नवाब ने किले के दरवाजे बंद कर लिये किंतु टोंक की सेना ने तात्या का स्वागत किया। तात्या ने टोंक नगर पर अधिकार कर लिया। टोंक से निकलकर तात्या टोपे मेवाड़, गिंगली एवं भीण्डर होता हुआ प्रतापगढ़ पहुंचा। वहाँ से वह महाराष्ट्र जाना चाहता था किंतु वर्षा के कारण चम्बल पार नहीं कर सका।

14 अगस्त 1858 को तात्या ने करौली के निकट अँग्रेजों को बुरी तरह हराया। उसके बाद उसने कोटा तथा बूंदी होते हुए झालावाड़ राज्य में प्रवेश किया। झालावाड़ नरेश पृथ्वीसिंह ने तात्या की कोई सहायता नहीं की। इस पर तात्या ने झलावाड़ राज्य पर अधिकार कर लिया।

झालावाड़ की सेना तथा जनता ने तात्या का स्वागत किया और उसकी भरसक सहायता भी की किंतु तात्या की दाल नहीं गली। रॉबर्ट, हैम्बिल्टन, माइकल तथा होम्स आदि सेनापति अपनी सेनाओं के साथ तात्या के पीछे लगे हुए थे। अंत में निराश होकर 15 सितम्बर 1857 को उसने राजपूताना छोड़ दिया किंतु उसे शीघ्र ही पुनः राजपूताना में प्रवेश करना पड़ा।

इस बार वह बांसवाड़ा की ओर से घुसा। उसने बांसवाड़ा पर अधिकार करके अहमदाबाद से आ रहे 16-17 ऊँटों को लूट लिया जिन पर कपड़ा लदा हुआ था। बांसवाड़ा से चलकर तात्या दौसा होता हुआ सीकर पहुंचा। इसी बीच तात्या के 600 सैनिकों ने बीकानेर नरेश की सेनाओं के समक्ष समर्पण कर दिया।

फिर भी 1859 ई. के अन्त तक वह अँग्रेजों से जूझता रहा। एक रात्रि में जब तात्या सो रहा था, तब नरवर के जागीरदार मानसिंह ने उसे अँग्रेजों के हाथों पकड़वा दिया। कहा जाता है कि तात्या टोपे को फांसी दी गई किन्तु अनेक इतिहासकारों का मानना है कि जिस व्यक्ति को फांसी दी गई थी, वह तात्या टोपे नहीं था। अँग्रेजों ने तात्या का क्या किया, इसका पता लगाना लगभग असंभव है। जून 1858 तक अधिकांश क्षेत्रों पर अँग्रेजों ने पुनः नियंत्रण कर लिया।

अंतिम क्रांतिकारी की रिहाई

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के काउ तहसील के भदोही परगने के मुसाई सिंह का जन्म 1836 ई. में हुआ था। उसे 1857 की क्रांति में भाग लेने के अपराध में अण्डमान जेल में ठूंस दिया गया। वह 50 वर्ष तक इस जेल में बंद रहा। अंत में 1907 ई. में उसे जेल से मुक्त किया गया। उस समय वह 1857 की क्रांति में भाग लेना वाला अंतिम जीवित व्यक्ति था।

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति का स्वरूप

अधिकांश ब्रिटिश लेखकों ने 1857 की क्रांति को सैनिक विद्रोह की संज्ञा दी है किंतु 1857-58 ई. में भारत में उपस्थित कुछ अँग्रेज ऐसे थे जिनका मत था कि 1857 की क्रांति जनसाधारण द्वारा की गई असन्तोष की अभिव्यक्ति का एक उदाहरण थी।

ईसाई मिशनरियों के लोग इसे ईश्वर द्वारा भेजी गई विपत्ति कहते थे, क्योंकि कम्पनी प्रशासन ने भारतीय प्रजा को ईसाई नहीं बनाया था। कुछ अँग्रेज लेखकों ने इसे हिन्दुओं एवं मुसलमानों का ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का षड्यन्त्र बताया है। इन विचारों से बिल्कुल हटकर 1909 ई. में विनायक दामोदर सावरकर ने इस राष्ट्रव्यापी घटना को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा। इस प्रकार इस क्रांति के सम्बन्ध में अलग-अलग मत स्थापित हो गये हैं-

(1.) यह विशुद्ध सैनिक विद्रोह था

सर जॉन सीले के अनुसार 1857 की क्रांति पूर्णतः गैर-राष्ट्रीय तथा स्वार्थी सैनिकों का विद्रोह था जिसका न कोई देशी नेतृत्व था और न जनता का सहयोग। सर जॉन लारेन्स ने भी इसे केवल विद्रोह बताया और इसका प्रमुख कारण चर्बी वाले कारतूस को माना। पी. ई. राबर्ट्स भी इसे विशुद्ध सैनिक विद्रोह मानते थे। वी. ए. स्मिथ ने लिखा है कि- ‘यह एक शुद्ध रूप से सैनिक विद्रोह था जो संयुक्त रूप से भारतीय सैनिकों की अनुशासनहीनता और अँग्रेज सैनिक अधिकारियों की मूर्खता का परिणाम था।’

इस प्रकार लगभग समस्त विदेशी इतिहासकार इसे एक सैनिक विद्रोह मानते हैं।

1957 ई. में स्वतंत्र भारत में 1857 की क्रांति की पहली शताब्दी मनाई गई। इस अवसर पर भारत सरकार की ओर से तथा अन्य शोधकार्ताओं द्वारा इस क्रांति पर पुनः विचार किया गया। सुरेन्द्रनाथ सेन ने अपनी पुस्तक एटीन फिफ्टी सेवन में लिखा है- ‘यह आन्दोलन एक सैनिक विद्रोह की भांति आरम्भ हुआ किन्तु केवल सेना तक सीमित नहीं रहा। सेना ने भी पूरी तरह विद्रोह में भाग नहीं लिया।’

उन्होंने यह भी लिखा है कि इसे मात्र सैनिक विप्लव कहना गलत होगा। शशि भूषण चौधरी ने भी इसे सामान्य जनता का विद्रोह बताया। डॉ. आर. सी. मजूमदार ने इसे सैनिक विप्लव बताया किन्तु उन्होंने यह भी कहा कि कुछ क्षेत्रों में जनसाधारण ने इसका समर्थन किया था।

यह सर्वमान्य तथ्य है कि 1857 की क्रांति सैनिक विद्रोह के रूप में फूट पड़ी थी किन्तु यह केवल सेना तक ही सीमित नहीं रही। डॉ. ताराचन्द ने लिखा है कि– ‘यह अशक्त वर्गों द्वारा अपनी खोई हुई सत्ता को पुनः प्राप्त करने का अन्तिम प्रयास था। यह वर्ग ब्रिटिश नियन्त्रण से मुक्ति पाना चाहता था, क्योंकि अँग्रेजों की नीतियों से इस वर्ग के लोगों के हितों को हानि पहुँच रही थी।’

क्रांति की घटनाओं से पता चलता है कि अवध में इसे जनसाधारण का पूर्ण समर्थन प्राप्त था और बिहार के भी कुछ हिस्सों में यही स्थिति थी। उस समय ग्रामीण जनता में भी यह भावना फैल गई कि सेना का लक्ष्य केवल अपनी स्थिति सुधारना ही नहीं था, अपितु भारत को अँग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराना था। ऐसी स्थिति में इसे केवल सैनिक विप्लव मानना, न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता। ब्रिटेन के प्रसिद्ध राजनेता तथा बाद में प्रधानमंत्री बने डिजरायली ने 27 जुलाई 1857 को हाउस ऑफ कॉमंस में कहा था- ‘यह आंदोलन एक राष्ट्रीय विद्रोह था न कि सैनिक या सिपाही विद्रोह।’

(2.) यह मुस्लिम सत्ता की पुनः स्थापना का प्रयास था

सर जेम्स आउट्रम का मत है कि यह मुसलमानों के षड्यन्त्र का परिणाम था, जो हिन्दुओं की शक्ति के बल पर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे। स्मिथ ने भी इसका समर्थन किया है कि यह भारतीय मुसलमानों का षड्यन्त्र था जो पुनः मुगल बादशाह के नेतृत्व में मुस्लिम सत्ता स्थापित करना चाहते थे। विद्रोह के काफी समय बाद बेगम जीनत महल ने देशी शासकों को पत्र लिखे, जिनमें उसने मुगल बादशाह की अधीनता में, अँग्रेजों को देश से बाहर निकालने की बात लिखी। अतः जेम्स आउट्रम व स्मिथ के कथनों में कुछ सच्चाई प्रतीत होती है। बहादुरशाह के मुकदमे के जज एडवोकेट जनरल मेजर हैरियट ने मुकदमे में पेश हुए समस्त दस्तावेजों को अच्छी तरह अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला- ‘आरम्भ से ही षड्यंत्र सिपाहियों तक सीमित नहीं था और न उनसे वह शुरू ही हुआ था, अपितु इसकी शाखाएं राजमहल और शहर में फैली हुई थीं।’

यह सच है कि 1857 की क्रांति में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों ने अधिक बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था किंतु इस सच्चाई से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस क्रांति में देश के केवल 1/3 मुसलमानों ने भाग लिया था। बड़ी मुस्लिम शक्तियों में केवल अवध की बेगम जीनत महल तथा लाल किले का बादशाह बहादुरशाह ही इस क्रांति में सम्मिलित हुए थे। जबकि व्यापक फलक पर नाना साहब, झांसी की रानी, तात्या टोपे, कुवरसिंह और अवध के हिन्दू ताल्लुकेदारों ने क्रांति का वास्तिविक संचालन किया था।

लॉर्ड केनिंग आरम्भ में इसे मुसलमानों द्वारा किया गया षड्यन्त्र मानते थे किंतु बाद में उन्होंने अपनी धारणा बदल ली। उन्होंने भारत सचिव को लिखे एक पत्र में स्वीकार किया- ‘मुझे कोई संदेह नहीं है कि यह विद्रोह ब्राह्मणों और दूसरे लोगों के द्वारा धार्मिक बहानों पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिये भड़काया गया था।’

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जहाँ हिन्दू सेनानायक, विदेशी शासन से मुक्ति के लिये लड़े, वहीं मुसलमानों के एक बड़े वर्ग ने बहादुरशाह के नेतृत्व में मुगल शासन की पुनर्स्थापना के लिये संघर्ष किया।

(3.) यह विद्रोह एक सामन्ती प्रतिक्रिया थी

इतिहासकार मेलीसन ने इसे जागीरदारों द्वारा अपने शासकों के विरुद्ध सामन्ती प्रतिक्रिया कहा है। अँग्रेजों की देशी रियासतों के प्रति नीति के फलस्वरूप अनेक सामन्त अपनी जागीरों से हाथ धो बैठे थे। इन लोगों में अँग्रेजों के प्रति घृणा व क्रोध था। दूसरी ओर अँग्रेजों ने देशी शासकों से मिलकर सामन्तों के विशेषाधिकारों पर प्रहार करके उनकी प्रतिष्ठा को गिराया था। ऐसे सामन्तों ने क्रांतिकारियों का साथ देकर क्रांति को फैलाने में योगदान दिया। इस मत को स्वीकार करने में यह आपत्ति है कि मुट्ठी भर सामन्तों द्वारा संघर्ष में भाग लेने से पूरे विप्लव को सामन्तवादी प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता।

(4.) यह भारत की स्वतंत्रता का राष्ट्रीय संग्राम था

सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर ने 1857 की क्रांति को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए आयोजित प्रथम संग्राम कहा। कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया के अनुसार भी 1857 का महान् आन्दोलन भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था। अशोक मेहता ने अपनी पुस्तक द ग्रेट रिवोल्ट में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यह एक राष्ट्रीय विद्रोह था। पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है कि यह केवल सैनिक विद्रोह नहीं था। यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था किंतु शीघ्र ही जन-विद्रोह के रूप में परिणित हो गया था। इंग्लैण्ड के सांसद बैंजामिन डिरैली ने ब्रिटिश संसद में इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहा था।

सुरेन्द्रनाथ सेन लिखते हैं- ‘जो युद्ध धर्म के नाम पर प्रारम्भ हुआ था, वह स्वातन्त्र्य युद्ध के रूप में समाप्त हुआ, क्योंकि इस बात में कोई सन्देह नहीं कि विद्रोही, विदेशी शासन से मुक्ति चाहते थे और वे पुनः पुरातन शासन व्यवस्था स्थापित करने के इच्छुक थे, जिसका प्रतिनिधित्व दिल्ली का बादशाह करता था।’

जो विद्वान इसे स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं, उनका तर्क है कि इस संग्राम में हिन्दुओं और मुसलमानों ने कन्धे-से-कन्धा मिलाकर समान रूप से भाग लिया और इस संग्राम को जनसाधारण की सहानुभूति प्राप्त थी। अतः इसे केवल सैनिक विप्लव या सामन्तवादी प्रतिक्रिया अथवा मुस्लिम षड्यन्त्र नहीं कहा जा सकता।

सैनिकों ने विद्रोह आरम्भ किया था और वे अन्त तक लड़ते रहे किन्तु उनके साथ लाखों अन्य लोगों ने भी भाग लिया। इस संग्राम में मरने वालों की संख्या में जनसाधारण की संख्या, सैनिकों की संख्या से अधिक थी। अनेक स्थानों पर जनता ने ही सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रोत्साहित किया तथा जिन लोगों ने या नरेशों ने अँग्रेजों का पक्ष लिया, उनका सामाजिक बहिष्कार किया।

जब जनरल ब्लॉक को अपनी सेना के साथ एक नदी पार करनी थी तो किसी नाविक ने उसे नाव नहीं दी। कानपुर के मजदूरों ने अँग्रेजों के लिए काम करने से मना कर दिया। विद्रोह आरम्भ होने के बाद जब उदयपुर का पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल शॉवर्स महाराणा से मिलने उनके महल की ओर जा रहा था, तब आम जनता ने उसे कर्कश स्वरों से धिक्कारा।

जोधपुर में कर्नल मेसन की हत्या कर दी गई। कोटा के महाराजा को विद्रोहियों ने तब तक घेरे रखा, जब तक कि उसने क्रांतिकारी सैनिकों को सहयोग देने का वचन नहीं दिया। कुछ नरेशों ने तो केवल जनमत के दबाव में आकर, अँग्रेजों के प्रति स्वामिभक्ति प्रदर्शित करते हुए विद्रोहियों को शरण दी।

डॉ. आर. सी. मजूमदार के अनुसार विप्लव को राष्ट्रीय युद्ध स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि नागरिकों का विद्रोह अत्यंन्त ही सीमित क्षेत्र में था। देश का अधिकांश भाग इसमें सम्मिलित नहीं हुआ था तथा अधिकांश देशी नरेशों ने अँग्रेजों का साथ दिया था।

सिक्ख और गोरखा सेनाओं ने अँग्रेजों की भरपूर सहायता की थी। विप्लव काल में ऐसे उदाहरण भी थे जब भारतीयों ने अपना जीवन खतरे में डालकर अँग्रेज स्त्रियों, पुरुषों व बच्चों की रक्षा की थी। इसीलिये डॉ. मजूमदार ने लिखा है- ‘यह विद्रोह न तो राष्ट्रीय था और न स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम था।’

निष्कर्ष

1857 के विप्लव का स्वरूप निर्धारित करते समय यह देखना होगा कि इस संघर्ष में भाग लेने वालों का दृष्टिकोण क्या था! भारतीय क्रांतिकारी, अँग्रेजों को फिरंगी कहते थे क्योंकि वे फॉरेन (वितमपहद) अर्थात् विदेश से आये थे। सारे देश में अँग्रेज विरोधी भावनाएं व्याप्त थीं।

समस्त क्रांतिकारियों तथा जनसाधारण का एक ही लक्ष्य था- अँग्रेजों को भारत से निकालना। तात्या टोपे जहाँ भी गया, सेना तथा जनता ने उसका स्वागत किया तथा रसद आदि से सहायता की। इसके विपरीत अँग्रेज अधिकारी जहाँ भी गये, जनता ने उन्हें धिक्कारा व गालियां दीं।

इससे स्पष्ट है कि अँग्रेजों के विरुद्ध रोष राष्ट्र-व्यापी था। यदि हम तात्कालिक साहित्य पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि उस समय का साहित्य भी अँग्रेज विरोधी भावना प्रदर्शित करता है। जिन लोगों ने विप्लव में भाग लिया अथवा विप्लवकारियों को शरण एवं सहायता दी, उनकी प्रशंसा में गीतों की रचना की गई। जिन्होंने अँग्रेजों का साथ दिया, उन्हें कायर कहा गया। विद्रोहियों को संगठित करने वाला एकमात्र तत्त्व विदेशी शासन को समाप्त करने की भावना थी।

कुछ इतिहासकारों ने इस क्रांति को महत्त्वहीन सिद्ध करने के लिए मत प्रकट किया है कि यह बहुत कम क्षेत्र में फैली। जबकि तथ्य यह है कि यह क्रांति बंगाल, पंजाब व दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों को छोड़कर भारत के समस्त प्रमुख स्थानों पर घटित हुई।

हालांकि अंग्रेजी सेनाओं ने अठारह सौ सत्तावन की क्रांति का दमन कर दिया किंतु अंग्रेज यह देखकर हैरान थे कि भारत में इतनी व्यापक क्रांति इससे पहले कभी नहीं हुई थी। इस कारण इस क्रांति के राष्ट्रीय स्वरूप को नकारा नहीं जा सकता। निःसंदेह यह भारत की स्वतंत्रता के लिये लड़ा गया संग्राम था जिसमें देश के लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – अठारह सौ सत्तावन की क्रांति

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के कारण

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति की घटनाएँ एवं प्रसार

अठारह सौ सत्तावन क्रांति का दमन

1857 की क्रांति की असफलता के कारण

1857 की क्रांति की असफलता के कारण

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1857 की क्रांति की असफलता के कारण

1857 की क्रांति की असफलता के कई कारण थे। सबसे बड़ा कारण यह था कि क्रांति की सफलता के बाद देश का भविष्य क्या होगा, इसका कोई स्वरूप निश्चित नहीं था।

1857 की क्रांति की असफलता के कारण

अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए 1857 में जो क्रांति हुई, उसकी असफलता के कई कारण थे-

(1.) समय से पहले क्रांति का फूट पड़ना

क्रांति के लिये सम्पूर्ण भारत में 31 मई 1857 का दिन निर्धारित किया गया था। दुर्भाग्य से 29 मार्च 1857 को मंगल पाण्डे ने बैरकपुर में विद्रोह कर दिया। जब यह समाचार मेरठ पहुँचा तो 10 मई 1857 को मेरठ में भी विद्रोह हो गया। इस कारण क्रांति की योजना उसके पूर्णतः आरम्भ होने से पहले ही उजागर हो गई। इससे अँग्रेजों को संभलने का अवसर मिल गया। मेलीसन ने लिखा है- ‘यदि पूर्व निश्चय के अनुसार 31 मई 1857 को एक साथ समस्त स्थानों पर स्वाधीनता का व्यापक और महान् संग्राम आरम्भ हुआ होता तो कम्पनी के अँग्रेज शासकों के लिए भारत को फिर से विजय कर सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं होता।’

(2.) राजपूत सैनिकों की उदासीनता

यह सही है कि जोधपुर लीजियन ने अँग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया किंतु उनके ही अन्य राजपूत साथियों ने उनका साथ नहीं दिया जो जोधपुर दरबार की तरफ से भेजे गये। इस कारण आबू से दिल्ली जाने वाले क्रांतिकारी सैनिकों को लम्बे समय तक आउवा में रुकना पड़ गया और वे दिल्ली पहुंचकर अँग्रेज सेनाओं को दिल्ली की तरफ बढ़ने से नहीं रोक सके। जोधपुर दरबार की सेनाओं ने जंगलों में छिपे अँग्रेजों के परिवारों को ढूंढ निकाला और उन्हें जोधपुर में लाकर शरण दी। इस प्रकार अधिकांश राजपूत सैनिकों ने इस क्रांति के प्रति उदासीनता का प्रदर्शन किया। तात्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई को राजपूताने से कोई सहायता नहीं मिली।

(3.) सिक्खों व गोरखों द्वारा साथ नहीं दिया जाना

इस क्रांति के समय सिक्खों ने ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया। वे किसी भी कीमत पर मुगल बादशाह का समर्थन करने को तैयार नहीं थे क्योंकि मुगल बादशाहों ने गुरु अर्जुनदेव सिंह तथा गुरु तेग बहादुर को मरवाया था। सिक्ख, उस बंगाल सेना से भी प्रतिशोध लेना चाहते थे जिसने पंजाब विलय के समय अँग्रेजों का साथ दिया था।

इन दो कारणों से सिक्ख, अँग्रेजों के प्रति वफादार रहे। हालांकि उनका यह निर्णय बहुत आश्चर्यजनक था क्योंकि अँग्रेजों ने केवल 8 साल पहले 1849 में ही सिक्खों के स्वतंत्र राज्य को समाप्त करके ब्रिटिश क्षेत्र में मिलाया था। इस दृष्टि से सिक्खों को अँग्रेजों से बदला लेना चाहिये था किंतु सिक्खों ने अँग्रेजों के लिये दिल्ली और लखनऊ जीतकर सैनिक क्रांति की कमर तोड़ दी।

सिक्खों ने इस बात पर भी विचार नहीं किया कि कुछ दिन पहले ही अँग्रेजों ने महाराजा रणजीतसिंह की महारानी जिंदां कौर की वार्षिक पेंशन अचानक 15,000 पौण्ड वार्षिक से घटाकार 1,200 पौण्ड कर दी थी। इतिहासकारों का आकलन है कि यदि पटियाला, नाभा व जीन्द ने ठीक समय पर अँग्रेजों की सहायता न की होती तो क्रांति का परिणाम कुछ और होता। इसी प्रकार गोरखों ने अपने सेनापति जंग बहादुर की अधीनता में अवध पर आक्रमण करके अँग्रेजों की सहायता की तथा क्रांति को विफल कर दिया।

(4.) योग्य नेताओं का अभाव

विद्रोही सैनिकों को ठीक तरह से संचालित कर सकने वाला कोई योग्य नेता उपलब्ध नहीं था। नाना साहब, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, आउवा ठाकुर कुशालसिंह, जगदीशपुर का जमींदार कुंवरसिंह जैसे नेता समग्र क्रांति का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं थे।

मेरठ और दिल्ली के विद्रोही सैनिकों ने बहादुरशाह जफर को अपना नेता बनाया किन्तु क्रांति और युद्ध जैसे शब्दों से अपरिचित, बूढ़े, निराश और थके हुए बहादुरशाह से सफल सैन्य-संचालन एवं क्रांति के नेतृत्व की आशा करना व्यर्थ था। वास्तव में इस गौरवमयी क्रांति की सबसे कमजोर कड़ी बहादुरशाह ही था। सिक्ख और अधिकांश हिन्दू उसे फिर से बादशाह बनाने को तैयार नहीं थे। उसकी बजाय तो उन्हें अँग्रेजों का राज ही अधिक अच्छा लगता था।

(5.) बड़े राजाओं का असहयोग

प्रायः समस्त प्रभावशाली भारतीय नरेशों ने विद्रोह का दमन करने में अँग्रेजों का साथ दिया, विशेषतः उन राजाओं ने जिनके राज्य एवं पेंशनें सुरक्षित थे। सिन्धिया के मन्त्री दिनकरराव तथा निजाम के मन्त्री सालारजंग ने अपने-अपने राज्य में क्रांति को फैलने से रोका। राजपूताना के लगभग समस्त नरेशों ने अँग्रेजों की भरपूर सहायता की। विद्रोह काल में स्वयं केनिंग ने कहा था- ‘यदि सिन्धिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाये तो मुझे कल ही बिस्तर गोल करना पड़ जाये।’

मैसूर, पंजाब, महाराष्ट्र और पूर्वी बंगाल आदि प्रदेशों के शासक भी शान्त रहे। इनमें से कोई भी राजा, अँग्रेजों को भगाकर भारत को फिर से मुगलों और मराठों को समर्पित करने का इच्छुक नहीं था। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि भारत के कुछ बड़े राजाओं ने मिलकर अँग्रेजों के विरुद्ध व्यूह-रचना की होती तो अँग्रेजों को भारत छोड़कर चले जाना पड़ता। जिन छोटे नरेशों ने तथा सामन्तों ने क्रांति का साथ दिया, वे अलग-अलग रहकर अपने क्षेत्रों में अँग्रेजों से लड़ते रहे। इस कारण अँग्रेजों ने उन्हें एक-एक करके परास्त किया।

(6.) नागरिकों का असहयोग

1857 की सैनिक क्रांति को देश के बहुत से हिस्सों में जनता का समर्थन मिला किंतु कृषक एवं श्रमिक जनता इससे प्रायः उदासीन रही। इस कारण यह क्रान्ति जन-क्रान्ति नहीं बन सकी। अनेक स्थानों पर क्रांतिकारियों ने लूट-पाट मचाकर जनसाधारण की सहानुभूति खो दी। विद्रोहियों द्वारा जेलों को तोड़ देने से पेशेवर चोर और लुटेरे बाहर निकल आये जिससे अराजकता फैल गई। इस कारण जन-सामान्य ने इस क्रांति को बहुत कम स्थानों पर सहयोग दिया। अँग्रेजी पढ़े लिखे युवकों का इस क्रांति से कोई लेना-देना नहीं था।

ट्रेवेलियन ने लिखा है- ‘अँग्रेजों के गले काटने की बात सोचने की बजाये वे उनके साथ उच्च न्यायालय में या मजिस्ट्रेटों की कुर्सियों पर बैठने का स्वप्न देख रहे थे। वे पंजाब और नेपाल की राजनीति पर अटकल लड़ाने की बजाय प्रेस और मुक्त वाद-विवाद की भलाइयों पर सोच रहे थे और वे अपनी वाद-विवाद सभाओं में लच्छेदार अँग्रेजी में व्याख्यान देने का स्वप्न देख रहे थे।’

(7.) केन्द्रीय संगठन का अभाव

क्रांति आरम्भ होने तथा विद्रोही सेनाओं के दिल्ली पहुँचने तक तो किसी पूर्व निश्चित योजना का स्वरूप दिखाई देता है किन्तु बाद में वह समाप्त होता दिखाई देता है। क्रांतिकारियों के पास कोई ऐसा केन्द्रीय संगठन नहीं था जो अँग्रेजों की गतिविधियों के ध्यान में रखकर विभिन्न स्थानों पर लड़ रहे सैनिक दलों में समन्वय स्थापित कर सके। उदाहरण के लिये झाँसी और बुन्देलखण्ड में विद्रोह उस समय आरम्भ हुआ, जब दिल्ली और कानपुर में अँग्रेजों को सफलता प्राप्त हो चुकी थी।

(8.) लॉर्ड केनिंग की उदारता

गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग की उदारता विद्रोहियों को शान्त करने में सफल हुई। अनेक अँग्रेज अधिकारियों ने केनिंग की उदार नीति की बड़ी आलोचना की तथा क्रान्ति का दमन करने में पाशविक प्र्रवृत्ति का परिचय देते रहे किन्तु केनिंग ने स्पष्ट घोषणा की कि जो हथियार डाल देगा, उसके साथ न्याय होगा तथा हिंसा करने वालों को छोड़कर समस्त लोगों को क्षमा कर दिया जायेगा। इस घोषणा का व्यापक प्रभाव पड़ा। बहुत से लोगों ने हथियार डाल दिये। केनिंग की इस उदार नीति से क्रांति बहुत कम समय में समाप्त हो गई।

पी. ई. राबर्ट्स ने लिखा है- ‘उसकी नम्रता न केवल नैतिक रूप से विस्मयकारी थी, वरन् राजनीतिक रूप से औचित्यपूर्ण थी।’

(9.) ठोस लक्ष्य का अभाव

समस्त क्रांतिकारी अँग्रेजों से नाराज थे तथा अँग्रेजों को देश से भगाना चाहते थे किंतु उनके कारण अलग-अलग थे। भारतीय सैनिकों ने चरबी वाले कारतूसों के कारण विद्रोह किया था और वह भी निर्धारित समय से पहले। मुसलमान सैनिक मुगल बादशाह के प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित करना चाहते थे।

मराठा सैनिक नाना साहब और रानी लक्ष्मीबाई के राज्यों की पुनर्स्थापना के लिये लड़े। मेरठ आदि छावनियों के सैनिक अपने धर्म को बचाने की चिंता में लड़े। राजपूत ठिकानों के सैनिक अपने ठिकानेदारों के आदेश से लड़े। अधिकांश क्रांतिकारी सैनिकों ने अँग्रेजी शासन को समाप्त करने के लिये कुछ अँग्रेज अधिकारियों को मार डालना पर्याप्त समझा। उनके पास समस्त अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने की कोई योजना नहीं थी।

(10.) अँग्रेजों की अनुकूल परिस्थितियाँ

यदि क्रीमिया युद्ध समाप्त होने से पहले भारत में 1857 की क्रांति आरम्भ हो गई होती तो अँग्रेजों के पास भारत छोड़कर जाने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचता किन्तु जिस समय क्रांति आरम्भ हुई, तब तक विदेशी मोर्चों पर परिस्थितियाँ अँग्रेजों के अनुकूल हो गयी थीं। क्रीमिया का युद्ध समाप्त हो चुका था।

डलहौजी के प्रयासों से सेना के पास रसद एवं युद्ध सामग्री पहुंचाने हेतु यातायात के साधनों का पर्याप्त प्रबन्ध हो चुका था। सेना के पास संचार व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी। भारत में बड़े देशी नरेश, प्रभावशाली सामन्त, व्यापारी वर्ग तथा अँग्रेजी पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी वर्ग अँग्रेजों का समर्थन कर रहा था।

तात्या टोपे ने टोंक, झालावाड़ एवं बांसवाड़ा आदि राज्यों पर अधिकार करके राजपूतों को नाराज कर दिया। अंत में वह नरवर के जागीरदार मानसिंह द्वारा किये गये धोखे से ही पकड़ा गया। इन परिस्थितियों में अँग्रेजों के लिये विद्रोह का दमन करना सम्भव हो गया।

(11.) क्रांतिकारियों के साधनों की सीमितता

क्रांतिकारियों के पास अँग्रेजों की अपेक्षा अत्यन्त सीमित साधन थे। उनका रणकौशल अँग्रेज सेनापतियों जैसा नहीं था। अँग्रेजों के पास यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित सैनिक थे, जो रणनीति एवं कूटनीति में दक्ष थे। क्रांतिकारी सैनिक वीरता से लड़ते हुए मरना जानते थे, जीतना नहीं। उन्हेंं धन का अभाव था।

प्रारम्भ में तो कुछ सेठों ने उन्हें सहायता दी तथा उन्होंने सरकारी खजाने भी लूटे किन्तु आगे चलकर विद्रोहियों को धन, रसद और हथियारों की कमी का सामना करना पड़ा। जबकि अँग्रेजों की सहायता के लिए अधिकांश भारतीय नरेश और पंजाब, बंगाल, मद्रास, बम्बई आदि का राजस्व उपलब्ध था। इंग्लैण्ड से पर्याप्त सैन्य सामग्री भी उपलब्ध हो रही थी। साधनों की सीमितता के कारण वे अधिक समय तक मैदान में टिके नहीं रह सकते थे।

1857 की क्रांति के परिणाम

यद्यपि 1857 की क्रांति अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने में सफल नहीं हुई तथापि इसके परिणाम अभूतपूर्व, व्यापक और स्थायी सिद्ध हुए। इतिहासकार ग्रिफिन ने लिखा है- ‘भारत में सन् 1857 की क्रान्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण घटना कभी नहीं घटी।’

रशब्रुक विलियम ने लिखा है- ‘एक रक्त की नदी ने कम से कम उत्तरी भारत में दो जातियों को अलग-अलग कर दिया तथा उस पर पुल बाँधना एक कठिन कार्य ही था।’ डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘सन् 1857 का महान् विस्फोट भारतीय शासन के स्वरूप और देश के भावी विकास में मौलिक परिवर्तन लाया।’ इन कथनों से स्पष्ट है कि इस क्रांति के परिणाम व्यापक, गहरे और दूरगामी थे।

(1.) कम्पनी के शासन का अन्त

1757 ई. में प्लासी विजय के बाद पहली बार ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई थी। तब से कम्पनी का शासन लगातार आगे बढ़ता जा रहा था। 1857 ई. की क्रांति से पूर्व कम्पनी को भारत पर शासन करने में अधिक कठिनाई नहीं हुई थी।

1857 ई. की सैनिक क्रांति ने इंग्लैण्ड की संसद को भारत का शासन अपने हाथों में लेने के लिये प्रेरित किया। 2 अगस्त 1858 को ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित करके भारत में कम्पनी के शासन का अन्त कर दिया तथा ब्रिटिश ताज ने शासन का अधिकार ग्रहण कर लिया। बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल तथा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स समाप्त कर दिये गये।

इनके स्थान पर भारत सचिव और उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक इण्डिया कौंसिल बनायी गयी। कम्पनी द्वारा भारत में तब तक किये गये समस्त समझौतों को मान्यता दे दी गई।

इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को ब्रिटिश भारत में गवर्नर जनरल के नाम से तथा देशी राज्यों से सम्बन्ध स्थापित करते समय वायसराय के नाम से पुकारने की व्यवस्था की गई। इस प्रकार भारत से सौ साल पुराने युग का अवसान होकर नये युग का अवतरण हुआ।

(2.) भारत के भावी शासन की नीतियों एवं सिद्धांतों की घोषणा

भारत का शासन अधिकार ग्रहण करने के बाद ब्रिटिश क्राउन की ओर से भारतीय जनता के प्रति शासन की नीति एवं सिद्धान्तों की घोषणा करने के लिए इलाहाबाद में बड़ी घूमधाम से एक दरबार का आयोजन किया गया। इस दरबार में लॉर्ड केनिंग ने महारानी विक्टोरिया  के 1 नवम्बर 1858 के घोषणा-पत्र को पढ़कर सुनाया। इस घोषणा पत्र को भारत के लगभग समस्त प्रमुख नगरों में भी पढ़कर सुनाया गया। इस घोषणा-पत्र की प्रमुख बातें निम्नलिखित थीं-

(क.) महारानी की सरकार को भारत में और अधिक अँग्रेजी राज्य विस्तार की इच्छा नहीं है। भविष्य में राज्य-विस्तार नहीं किया जायेगा।

(ख.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा देशी नरेशों व नवाबों के साथ जो समझौते और प्रबन्ध समय-समय पर किये गये हैं, ब्रिटिश सरकार उनका सदैव आदर करेगी तथा उनके अधिकारों की सुरक्षा करेगी।

(ग.) महारानी की सरकार द्वारा भारत में सदैव धार्मिक सहिष्णुता एवं स्वतन्त्रता की नीति का पालन किया जायेगा।

(घ.) भारतीयों के साथ स्वतन्त्रता का व्यवहार किया जायेगा तथा उनके कल्याण के लिए कार्य किये जायेंगे।

(ड़.) भारतीयों के प्राचीन रीति-रिवाजों, सम्पत्ति आदि का संरक्षण किया जायेगा।

(च.) समस्त भारतीयों को निष्पक्ष रूप से कानून का संरक्षण प्राप्त होगा।

(छ.) बिना किसी पक्षपात के शिक्षा, सच्चरित्रता और योग्यतानुसार सरकारी नौकरियाँ प्रदान की जायेंगी।

(ज.) उन समस्त विद्रोहियों को क्षमादान मिलेगा, जिन्होंने किसी अँग्रेज की हत्या नहीं की है।

महारानी की इस घोषणा को भारतीय स्वतन्त्रता का मेग्नाकार्टा कहा गया, यद्यपि इस घोषणा की बहुत-सी बातों को कभी लागू नहीं किया गया किन्तु यह घोषणा 1919 ई. तक भारतीय शासन की आधारशिला बनी रही। इस घोषणा ने भारत के देशी नरेशों के सन्देह को दूर कर दिया तथा भारतीय नरेशों को सनदें देकर उनके गोद लेने के अधिकार की पुनः स्थापना की।

सर जॉन स्टीफन ने लिखा है- ‘विक्टोरिया का घोषणा-पत्र केवल दरबार में सुनाये जाने के लिए था। यह कोई सन्धि नहीं थी जिसके अनुसार कार्य करने के लिए अँग्रेजों पर किसी प्रकार का उत्तरदायित्व हो।’ परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिस उद्देश्य से यह घोषणा-पत्र प्रकाशित किया गया था, उसकी पूर्ति अवश्य हुई। भारत की भोली-भाली जनता पर इसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा।

(3.) अँग्रेज सैनिकों का विद्रोह

महारानी की 1858 ई. की घोषणा के बाद भारत के समस्त अँग्रेज सैनिकों को जो कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के नौकर थे, ब्रिटिश सरकार की सेना में ले लिया गया। इससे भारत में नियुक्त अँग्रेज सैनिकों में असंतोष हो गया और उन्होंने बगावत का बिगुल बजाया। भारतीय इतिहास में इसे श्वेत क्रांति कहा गया। इस विद्रोह को दबाने के लिये लॉर्ड केनिंग ने लगभग 10 हजार अंग्रेज सैनिकों को सेना से निकाल दिया।

(4.) भारतीय सेनाओं का पुनर्गठन

1857 ई. की क्रांति सैनिक असंतोष से उत्पन्न विद्रोह के रूप में आरम्भ हुई थी। आंदोलन आरम्भ होने के समय बंगाल में सैनिकों की संख्या 1,28,000 थी जिनमें से 1,20,000 सैनिक या तो मर गये थे या घायल हो गये थे। केवल 11 ऐसी रेजीमेंटें थीं जिन्होंने क्रांति में भाग नहीं लिया था। अतः सेना का पुनर्गठन करना आवश्यक हो गया था।

अँग्रेजों ने भारत में अधिक से अधिक ब्रिटिश सैनिकों को लाने का निर्णय लिया ताकि भविष्य में होने वाले विद्रोहों का दमन कर सकें। तोपखाना पूर्णतः यूरोपियन सैनिकों के हाथ में दे दिया गया। अँग्रेज सैनिकों की संख्या क्रांति आरम्भ होने से पहले 45,322 थी जो 1862 ई. में दो-गुनी करके 91,897 कर दी गई।

भारतीय खर्चे पर इंग्लैण्ड में 16,427 सैनिक अलग से रखे गये जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर भारत में युद्ध करने के लिये भेजा जा सकता था। 1857 की क्रांति आरम्भ होने से पहले भारतीय सैनिकों की संख्या 2,38,000 थी जो 1862 ई. में आधी करके 1,40,000 कर दी गई।

भारतीय सैनिकों के पुनर्गठन में जातीयता एवं साम्प्रदायिकता आदि तत्त्वों का ध्यान रखा गया। सैनिकों को अपने स्थानीय क्षेत्रों से हटाकर दूरस्थ क्षेत्रों में भेज दिया गया, ताकि स्थानीय लोगों के सहयोग से वे पुनः विद्रोह न कर सकें। भारतीय सैनिकों को घटिया किस्म के हथियार दिये गये। सैनिकों की भर्ती के लिए एक रॉयल कमीशन की नियुक्ति की गई।

(5.) साम्प्रदायिकता एवं जातीय भेदभाव को बढ़ावा

1857 ई. के संघर्ष में हिन्दू-मुसलमानों ने संयुक्त रूप से भाग लिया था किन्तु मुसलमानों ने हिन्दुओं से अधिक उत्साह दिखाया था। अतः अब अँग्रेजों ने हिन्दुओं का अधिक पक्ष लेना आरम्भ कर दिया जिससे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य में वृद्धि हो सके।

आगे चलकर अँग्रेजों ने अनुसूचित जातियों को हिन्दुओं से दूर करने के लिये कई कार्य किये तथा भेदभावपूर्ण कानून बनाये। अँग्रेजों की इस नीति से भारतीयों के बीच जाति एवं धर्म को लेकर नये सिरे से खाई उत्पन्न हो गई। क्रांति के बाद अँग्रेजों व भारतीयों के बीच स्थायी कटुता उत्पन्न हो गई।

(6.) निम्न प्रशासनिक पदों पर भारतीयों की नियुक्ति एवं उसके कुप्रभाव

महारानी की घोषणा में यह आश्वासन दिया गया था कि बिना किसी पक्षपात के शिक्षा, सच्चरित्रता एवं योग्यतानुसार सरकारी नौकरियों में भारतीयों को स्थान दिया जायेगा किन्तु इसका पालन कभी नहीं किया गया। कोई भी भारतीय सैनिक रॉयल कमीशन के सामने जाने के लिए उपयुक्त नहीं समझा जाता था और यदि वह वायसराय का कमीशन प्राप्त कर भी लेता तो उसे एक नये अँग्रेज रंगरूट से अधिक योग्य नहीं समझा जाता था।

भारतीयों को प्रशासन में क्लर्कों तथा सहायकों के निम्न पदों पर लिया जाता था। ये सरकारी कर्मचारी, ब्रिटिश अधिकारियों तथा जनता के बीच बिचौलिये बन गये। अँग्रेज चाहते थे कि भारतीय कर्मचारी, अँग्रेज अधिकारियों की चापलूसी करें और उनके आज्ञाकारी बने रहें। कर्मचारी वर्ग ने अपनी नौकरी सुरक्षित रखने के लिये अँग्रेजों के प्रति अंत तक वफादारी दिखाई जिससे आगे चलकर देश की आजादी की लड़ाई अत्यंत दुरूह हो गई।

(7.) आर्थिक प्रभाव

अँग्रेजों ने अब केवल ब्रिटिश पूँजीपतियों को भारत में पूँजी लगाने हेतु प्रोत्साहित किया तथा उन्हें सुरक्षा प्रदान की। चाय, कपास, जूट, कॉफी, तम्बाकू आदि के व्यापार को अत्यधिक बढ़ावा दिया गया। इन वस्तुओं का अधिकांश व्यापार अँग्रेजों के नियन्त्रण में चला गया। भारतीय उद्योगों का सरंक्षण बंद कर दिया गया।

नई ईस्ट इण्डिया कॉटन कम्पनी स्थापित की गई जो भारत से रुई खरीदकर इंग्लैण्ड में कपड़ा तैयार करवाती थी और बिकने के लिये फिर से भारत भेजती थी। रेलवे एवं सड़क यातायात तथा संचार के साधनों का तेजी से विकास किया गया ताकि विद्रोह की स्थिति में सैनिकों तथा युद्ध सामग्री को तेजी से युद्ध क्षेत्र में भेजा जा सके।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी, भारत सरकार पर 3 करोड़ 60 लाख पौण्ड का कर्ज छोड़ गई थी, जिसकी पूर्ति भारत सरकार, भारतीयों का शोषण करके कर रही थी। अँग्रेजों द्वारा किये गये इस आर्थिक शोषण से जन-सामान्य और अधिक निर्धन हो गया।

(8.) भारतीयों को लाभ

यद्यपि यह क्रांति अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने में असफल रही तथापि इस क्रांति से भारतीयों को कुछ लाभ भी हुए। सरकार ने देश की आन्तरिक दशा सुधारने के लिये तथा लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने के प्रयास आरम्भ किये। 1858 ई. के अधिनियम के बाद भारत में संवैधानिक विकास की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई।

भारतीयों को शासन में भाग लेने का अवसर मिलने लगा जिससे उनमें नई चेतना आने लगी। भारतीयों के मन में फिर से राष्ट्रीय भावना तीव्र होने लगी। इसी भावना ने देश में राष्ट्रीय आन्दोलनों को जन्म दिया तथा देश को स्वतंत्रता मिली। अनेक इतिहासकार 1857 की क्रांति को मध्य युग का अन्त तथा आधुनिक युग का आरम्भ मानते हैं। 

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि 1857 ई. में भारत में असफल रक्त-रंजित क्रांति हुई। इसके बहुत से आयाम थे। इस कारण अँग्रेजों ने इसे गदर, बगावत तथा सैनिक विद्रोह कहा। भारतीयों ने इसे सैनिक क्रांति कहा तथा वीर सावरकर ने इसे भारत का प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम कहकर इसका अभिनंदन किया।

ब्रिटिश राजनेता डिजराइली ने इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहा। तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग ने इसे ब्राह्मणों का षड़यंत्र कहा तो अधिकांश यूरोपीय इतिहासकारों ने इसे मुसलानों द्वारा मुस्लिम राज्य की पुनर्स्थापना के लिये किया गया प्रयास कहा। वास्तविकता यह है कि यह भारतीय इतिहास की सबसे गौरवमयी घटनाओं में से एक थी। इसके क्रांतिकारी युगों तक भारतीयों को स्वाभिमान से जीने एवं स्वतंत्र बने रहने की प्रेरणा देते रहेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – अठारह सौ सत्तावन की क्रांति

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के कारण

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति की घटनाएँ एवं प्रसार

अठारह सौ सत्तावन क्रांति का दमन

1857 की क्रांति की असफलता के कारण

बंगाल के राजनीतिक संगठन

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बंगाल के राजनीतिक संगठन

ब्रिटिश शासनकाल में बंगाल के राजनीतिक संगठन बंगाली समाज में राजनीतिक चेतना में वृद्धि करने में अपना अमूल्य योगदान देने में सफल रहे।

बंगाल प्रेसीडेंसी में राजनीतिक संगठनों का उदय

उन्नीसवीं सदी का भारत हर तरफ से द्वंद्वों एवं संघर्षों में फंसा हुआ था। देश किसानों के आंदोलन, सामाजिक सुधार आंदोलन, आदिवासियों के आंदोलन, सन्यासियों के आंदोलन, सैनिक असंतोष जैसे द्वंद्वों एवं संघर्षों में फंसा हुआ था। इन आंदोलनों एवं समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले विचारों के कारण चारों ओर उत्तेजना का वातावरण बना गया था।

लोग अपने पुराने विचारों को त्याग रहे थे, नई शिक्षा एवं नये विचार ग्रहण कर रहे थे। वे बेकारी और गरीबी से उबरना चाहते थे। आजादी चाहते थे। नागरिक अधिकारों में वृद्धि चाहते थे। इसलिये धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलन आरम्भ होने के साथ-साथ अराजनीतिक एवं राजनीतिक संस्थाओं का भी उदय हुआ।

भारत के अराजनीतिक संगठनों में 1828 ई. में स्थापित अकादमिक एसोसिएशन, 1830 ई. में स्थापित कलकत्ता ट्रेड ऐसोसिएशन, 1834 ई. में स्थापित बंगाल चेम्बर ऑफ कॉमर्स आदि संस्थायें प्रमुख थीं इन संस्थाओं का भारत की राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं था। फिर भी इन संगठनों ने शिक्षाविदों तथा व्यापारियों आदि प्रमुख सामाजिक वर्गों को संगठित होने का रास्ता दिखाया। शीघ्र ही भारत में राजनीतिक संस्थायें भी प्रकट होने लगीं।

ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार द्वारा भारत में तीन प्रेसिडेंसियां- बंगाल प्रेसीडेंसी, बम्बई प्रेसीडेंसी तथा मद्रास प्रेसीडेंसी की स्थापना की गई थी। प्रशासनिक मुख्यालयों की दृष्टि से इनकी तुलना आज की राज्य सरकारों से की जा सकती है। कम्पनी सरकार की राजधानी कलकत्ता में थी जिसकी तुलना देश की केन्द्र सरकार से की जा सकती है।

चूंकि नागरिक अधिकार सरकार से अनुरोध करके, या संघर्ष करके लिये जा सकते थे, इसलिये स्वाभाविक था कि ब्रिटिश शासित क्षेत्र विशेषकर उसके प्रेसीडेंसी मुख्यालयों पर ही इन राजनीतिक संस्थाओं का उदय होता।

यह ध्यान देने वाली बात है कि उन्नीसवीं सदी की अराजनीतिक एवं राजनीतिक संस्थाओं का उदय केवल ब्रिटिश भारत में हुआ। विभिन्न राजाओं, नवाबों एवं जागीरदारों द्वारा शासित भारत जिसे रियासती भारत कहते थे, इन संस्थाओं से अलग था। रियासती भारत की जनता राजाओं, जागीरदारों एवं ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंटों द्वारा बुरी तरह शोषित की जा रही थी किंतु अभी उसमें राजनीतिक चेतना कोसों दूर थी।

बंगाल के राजनीतिक संगठन

कम्पनी सरकार की राजधानी कलकत्ता होने के कारण कलकत्ता में ही सर्व प्रथम राजनीतिक संगठनों का उदय हुआ। माना जाता है कि 1833 ई. के चार्टर एक्ट में कुछ धारायें राजा राममोहन राय की प्रेरणा से जोड़ी गई थीं। इस प्रकार राजा राम मोहन राय को ब्रिटिश भारत का पहला राजनीतिक आंदोलनकारी कहा जा सकता है। उन्हीं की प्रेरणा से 1836 ई. में बंगभाषा प्रकाशक सभा की स्थापना हुई। इसे भारत की पहली राजनीतिक संस्था कहा जा सकता है।

लैंड होल्डर्स सोसायटी (जमींदारी एसोसियेशन)

राजनीतिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने का पहला काम लैंड होल्डर्स सोसायटी ने किया। इसे जमींदारी एसोसियेशन भी कहते थे। इसकी स्थापना 1838 ई. में कलकत्ता में हुई। यह भारत के गैर सरकारी अँग्रेजों और भारतीय जमींदारों की संयुक्त संस्था थी।

इसे जमींदारों के हितों की सुरक्षा के लिये स्थापित किया गया था परन्तु यह, समाज के अन्य वर्गों के प्रतिनिधित्व का भी दावा करती थी। इस संस्था के भारतीय सदस्यों में प्रसन्नकुमार ठाकुर, राजा राधाकान्त देव, राजा कालीकृष्ण, द्वारकानाथ ठाकुर और रामकमल सेन प्रमुख थे।

अँग्रेज सदस्यों में थियोडोर डिफेंस, विलियम कॉब हैरी, विलियम थियोबाल्ड और जी. ए. प्रिंसेप प्रमुख थे। यह संस्था भारत में भारतीयों के लिये उन्हीं अधिकारों की मांग करती थी, जो ब्रिटेन में ब्रिटिश जनता को प्राप्त थे। इस संगठन ने कलकत्ता में हलचल मचा दी।

देशी समाचार पत्रों ने इस संस्था का स्वागत किया तथा कट्टरपंथी अँग्रेजी समाचार पत्रों ने इसे ब्रिटिश साम्राज्य के लिये खतरा बताया। लैंड होल्डर्स सोसायटी ने अपनी गतिविधियाँ इंग्लैण्ड में भी बढ़ाने का प्रयास किया। उसकी गतिविधियों से चिंतित होकर कई अँग्रेज, सरकार को यह सलाह देने लगे कि इस संगठन के मुकाबले में जमींदारों का दूसरा संगठन खड़ा किया जाये।

1838 ई. में लैंड होल्डर्स सोसायटी ने कम्पनी सरकार को एक ज्ञापन देकर माफी की जमीन छीनना बन्द करने का अनुरोध किया। ज्ञापन पर बीस हजार से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर थे। सोसायटी ने सरकार के समक्ष अन्य माँगें भी रखीं जिनमें मुख्य थीं- अदालतों में बंगला भाषा का प्रयोग, स्टाम्प ड्यूटी में कमी, फौजदारी मुकदमों में गवाहों के भोजन की व्यवस्था और भारतीय कुलियों को मॉरीशस भेजना बन्द करना। यह संस्था केवल सात-आठ वर्षों में निष्क्रिय हो गई।

पेट्रियाटिक एसोसिएशन

पेट्रियाटिक एसोसिएशन की स्थापना 9 फरवरी 1839 को कलकत्ता में भारतीयों और यूरेशियनों (एंग्लो-इंडियन्स) ने मिलकर की। इसके अध्यक्ष सी. आर. फेनविक, तेजपुर कलेक्टर के हेड क्लर्क थे। इस संगठन का उद्देश्य कम्पनी सरकार के अन्यायों के विरुद्ध आवाज उठाना था।

पेट्रियाटिक एसोसिएशन 1833 ई. के चार्टर एक्ट को पूरी तरह लागू करवाना चाहता था। संगठन का कहना था कि कम्पनी सरकार, यूरेशियनों और भारतीयों को वे अधिकार और सुविधाएं नहीं देती जो उन्हें महारानी विक्टोरिया की प्रजा की हैसियत से मिलनी चाहिये।

उन्हें न तो उच्च सरकारी नौकरियाँ दी जाती हैं और न कानून-कायदे बनाने में उनकी राय ली जाती है। फेनविक ने कहा कि कोई भी राष्ट्र ऐसे महान् अपराधों के सामने चुपचाप आत्मसमर्पण नहीं करेगा। कुछ दिनों बाद इस संगठन ने अपना नाम बदलकर यूनाइटेड इण्डिया एसोसिएशन रख लिया। कुछ समय बाद यह निष्क्रिय हो गया।

देश-हितैषिणी सभा

इस संगठन की स्थापना 3 अक्टूबर 1841 को कलकत्ता में की गई। इसके संस्थापकों में हिन्दू कॉलेज के कुछ पुराने छात्र और देशी समाचार पत्रों के कुछ संचालक थे। भारतीय और अँग्रेज, दोनों ही इस संगठन के सदस्य हो सकते थे। संगठन के स्थापना दिवस पर एक भाषण में कहा गया- ‘राजनीतिक स्वाधीनता के भोग से हमारा वंचित होना हमारे दुःख और पतन का कारण है। नागरिक स्वाधीनता के चले जाने से सुख उसी प्रकार चला जाता है जैसे काया के चले जाने से आत्मा।’

संगठन का मानना था कि भारत के तत्कालीन शासक भारतीयों को राजनीतिक अधिकार कदापि नहीं देंगे। वे भारत का आर्थिक शोषण कर रहे हैं। सभा ने कम्पनी के शोषण के विरुद्ध भारतवासियों की एकता और देशप्रेम पर जोर दिया और ब्रिटिश इंडिया सोसायटी के साथ मिलकर काम करने की सलाह दी।

देश हितैषिणी सभा भी कम्पनी सरकार के अत्याचारों से भारत को छुटकारा दिलवाना चाहती थी और ब्रिटिश संसद के माध्यम से न्याय प्राप्त करना चाहती थी। अपनी पूर्ववर्ती संस्थाओं की भांति यह संस्था भी शीघ्र ही समाप्त हो गई।

बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसायटी

बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसायटी की स्थापना 20 अप्रैल 1843 को कलकत्ता में हुई। इसके अध्यक्ष जॉर्ज थॉम्पसन लन्दन की ब्रिटिश इंडिया सोसायटी के सक्रिय सदस्य थे। इस संगठन के सचिव प्यारीचन्द्र मित्र, अपने समय के प्रसिद्ध समाज सुधारक थे। यह भारतीयों और गैर-सरकारी अँग्रेजों का सम्मिलित संगठन था।

इस संगठन ने देश में प्रशासन, पुलिस विभाग, न्यायपालिका, नगरपालिका आदि में सुधार करवाने में रुचि ली और पत्रिकाएँ प्रकाशित करवाकर सरकार की कमियों को उजागर किया। संगठन ने सार्वजनिक महत्व के विषयों पर अधिक ध्यान दिया और समय-समय पर कम्पनी सरकार और ब्रिटिश सरकार को आवेदन भिजवाये।

इस सोसाइटी ने बंगाल में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की दयनीय स्थिति को सुधारने की मांग की तथा समाज सुधार पर ध्यान दिया। स्त्री शिक्षा पर जोर दिया और विधवा-विवाह का समर्थन किया। इन कार्यों के कारण बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसायटी को एक तरफ तो कम्पनी सरकार का और दूसरी तरफ पुराने विचारों के जमींदारों के विरोध का सामना करना पड़ा।

इसके सचिव प्यारीचन्द्र मित्र जमींदारी प्रथा की आलोचना करते थे और किसानों के अधिकारों की मांग करते थे। इस कारण जमींदार परिवार इस संगठन से अलग हो गये। जनतान्त्रिक कार्यक्रमों के कारण संगठन को राजद्रोह के प्रचार के अभियोग का सामना करना पड़ा। इस कारण अँग्रेज सदस्यों ने भी संगठन से सम्बन्ध तोड़ लिया। 1846 ई. के बाद यह सोसायटी निष्क्रिय हो गई।

ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन

ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन की स्थापना 31 अक्टूबर 1851 को कलकत्ता में हुई। इसके अधिकांश सदस्य लैंड होल्डर्स और बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसायटी के सक्रिय सदस्य रह चुके थे। राजा राधाकान्त देव इस नये संगठन के अध्यक्ष और देवेन्द्रनाथ ठाकुर सचिव चुने गये।

इसके स्थापना दिवस पर कहा गया कि इस संस्था का लक्ष्य अपनी शक्ति भर प्रत्येक उचित उपाय से ब्रिटिश भारत के शासन की दक्षता को बढ़ाना और उसमें सुधार करना और इस तरह ग्रेट ब्रिटेन तथा भारत के सामान्य हितों को आगे बढ़ाना एवं पराधीन भारत के देशी निवासियों की स्थिति सुधारना होगा।

इस संस्था ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के 1853 ई. चार्टर के नवीनीकरण के सम्बन्ध में संसद को महत्त्वपूर्ण स्मृति-पत्र दिये जिनमें भारत के प्रशासन के जनतन्त्रीकरण और उसमें भारतीयों के प्रतिनिधित्व की माँग की गई। संस्था ने मांग की कि विधान सभा में भारतीयों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाये। बड़े अधिकारियों का वेतन कम किया जाये।

नमक कर समाप्त किया जाये। संस्था के प्रयासों के फलस्वरूप 1853 के चार्टर एक्ट में गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में 6 सदस्य कानून बनाने के लिये जोड़ दिये गये। ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन ने 1856 ई. में ब्रिटिश संसद से अनुरोध किया कि केन्द्र और प्रेसीडेन्सियों में ऐसी सस्थाएँ बनाई जायें जो विधान सभाओं का काम करें और उनमें भारतीयों के प्रतिनिधि भी हों।

1857 की क्रांति ने ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन को गहरा झटका दिया किन्तु कुछ समय बाद वह पुनः सक्रिय हो गया। 1860 ई. में उसने पुनः भारत में विधान सभाओं की स्थापना की माँग को जोर-शोर से उठाया। संस्था ने 1861 ई. के कौंसिल एक्ट में भी संशोधन की मांग उठाई।

ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन ने 1875 ई. तक चले सिविल सर्विस आन्दोलन को समर्थन दिया। उसने इंग्लैण्ड और भारत में सिविल सर्विस परीक्षा एक साथ लेने की मांग की। जब 1865 ई. में सिविल सर्विस परीक्षा की आयु 22 साल से घटाकर 21 साल कर दी गई तो ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन ने जोरदार विरोध किया।

1860-61 ई. में इसने नील की खेती से सम्बन्धित विवादों के कारणों की जाँच के लिये जाँच आयोग बैठान की मांग की। 1860 ई. में इस ऐसोसियेशन ने अकाल पीड़ितों की सहायता के लिये धन एकत्रित किया। 1860 ई. में जब सरकार ने आयकर लगाया तो संस्था ने इसका भी विरोध किया।

ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन उस समय भारत का सबसे प्रभावशाली संगठन था। सरकार भी उसका सम्मान करती थी। उसकी शाखाएँ बंगाल और उसके बाहर फैली हुई थीं। यह संस्था मूलतः जमींदारों का संगठन थी किंतु इसे व्यापक बनाने के लिये बुद्धिजीवियों और मध्यमवर्ग के लोगों को भी संगठन की सदस्यता दी गई।

1860 ई. से संगठन में जमींदारों और बुद्धिजीवियों में मतभेद उभरने लगे। बुद्धिजीवियों का आरोप था कि एसोसिएशन के जमींदार सदस्य किसानों और आम जनता के हितों की उपेक्षा करते हैं। उन्हें सिर्फ अपने वर्ग के हितों की चिन्ता रहती है। उनका यह आरोप भी था कि एसोसिएशन समय के साथ आगे बढ़ने और अत्यन्त उपयोगी लोगों का सहयोग लेने से इन्कार करता है।

बुद्धिजीवियों ने संगठन में सुधार लाने के कई प्रयास किये किन्तु उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इस कारण उन लोगों का एसोसिएशन से मोह भंग होता चला गया और वे एसोसिएशन से अलग होते गये। इस कारण संगठन का जनाधार कम हो गया। 1880 ई. तक वह कुछ जमींदारों का संगठन मात्र रह गया जिससे उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा नष्ट हो गई।

इण्डियन लीग

अमृत बाजार पत्रिका के सम्पादक और मालिक शिशिर कुमार घोष ने 25 सितम्बर 1875 को इण्डियन लीग की स्थापना की। इस संगठन ने मध्यम वर्ग को आकर्षित करने के लिये मात्र पाँच रुपये वार्षिक चन्दा रखा। इस संगठन का उद्देश्य लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जगाना और राजनीतिक शिक्षा को बढ़ावा देना था।

इसकी स्थापना की सभा के प्रस्ताव में कहा गया कि यह संस्था महारानी की प्रजा के समस्त वर्गों का प्रतिनिधित्व करना चाहती है। इण्डियन लीग ने अक्टूबर 1875 में बंगाल सरकार को एक स्मृति-पत्र देकर कलकत्ता की नगरपालिका के प्रशासन में सुधार और चुनाव की प्रथा जारी करने का अनुरोध किया।

उसने प्रिन्स ऑफ वेल्स के कलकत्ता आगमन की स्मृति में तकनीकी विज्ञान की शिक्षा देने वाला एक स्कूल खोलने के लिये लगभग डेढ़ लाख रुपया एकत्र किया और इस योजना के लिये छोटे लाट टेंपुल का आशीर्वाद प्राप्त किया। 1876 ई. के आरम्भ में बंगाल सरकार ने नगर पालिका विधेयक पेश किया जिसमें नाममात्र के लिये चुनाव की प्रथा को माना गया तथा नगर पालिका के कमिशनरों पर सरकारी नियंत्रण का प्रावधान रखा गया।

ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन ने नये विधेयक का जोरदार विरोध किया परन्तु इण्डियन लीग ने टेंपुल के इस विधेयक का स्वागत किया। लीग का मानना था कि चुनाव की प्रथा चाहे जितनी सीमित हो, एक बार लागू हो जाने से उसका प्रसार होकर रहेगा और विधान सभा भी एक दिन लागू होकर रहेगी परन्तु लोगों को लीग का यह दृष्टिकोण पसन्द नहीं आया।

इण्डियन लीग का अँग्रेजों के प्रति सम्मोहन इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि जब टेंपुल बंगाल से बदल कर बम्बई प्रेसीडेन्सी का गवर्नर बना तो लीग के प्रमुख नेता उसे अभिनन्दन-पत्र देने बम्बई गये। इसी प्रकार, 1 जनवरी 1877 को दिल्ली दरबार के अवसर पर एक मानपत्र वायसराय लिटन को दिया गया जिसमें महारानी विक्टोरिया के कैसरे हिन्द की उपाधि धारण करने पर खुशी प्रकट की गई।

शिशिर कुमार घोष के अनियमित कार्यों से लीग के अन्य नेता रुष्ट हो गये और उन्होंने लीग से त्याग-पत्र देकर नई संस्था बनाने का निश्चय किया। इस पर लीग ने भी अपने संगठन में फेर बदल किया। अध्यक्ष शम्भूचन्द्र मुखर्जी को हटाकर, नरम दल के कृष्णमोहन बनर्जी को अध्यक्ष बनाया गया परन्तु इससे मामला सुलझ नहीं पाया।

1876 ई. में कलकत्ता मे भूतपूर्व वायसराय नार्थब्रुक की शोक सभा में उनकी मूर्ति बनाने का प्रस्ताव आया। गरम दल वालों ने इसका विरोध किया। इसके चलते लीग के गरम नेताओं और नरम नेताओं में झगड़ा हो गया। 1876 ई. में इण्डियन एसोसिएशन की स्थापना ने इण्डियन लीग के भविष्य को नष्ट कर दिया।

लीग के अध्यक्ष कृष्णमोहन बनर्जी अपने समर्थकों के साथ इण्डियन एसोसिएशन में सम्मिलित हो गये। सिर्फ कुछ लोग शिशिर कुमार घोष के नेतृत्व वाली लीग में बने रहे परन्तु इण्डियन लीग की प्रतिष्ठा गिर जाने से लीग ने अपना जनाधार खो दिया।

इण्डियन एसोसिएशन

आनन्द मोहन बसु ने समान विचारों वाले प्रमुख लोगों के साथ मिलकर 26 जुलाई 1876 को कलकत्ता में इण्डियन एसोसिएशन की स्थापना की। इस संगठन की कार्यकारिणी में 28 सदस्य रखे गये और आनन्दमोहन बसु को इसका सचिव नियुक्त किया गया। इस संगठन को वकीलों, पत्रकारों और शिक्षकों का जोरदार समर्थन मिला। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा अन्य युवा नेता इस संगठन को अखिल भारतीय संगठन बनाना चाहते थे और सारे भारत को संगठित कर एक मंच पर लाना चाहते थे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के अनुसार इण्डियन एसोसिएशन के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार से थे-

(1.) देश में जनमत की एक शक्तिशाली संस्था का गठन करना।

(2.) सामान्य राजनीतिक हितों के आधार पर भारतीय जनता को एक करना।

(3.) हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव को बढ़ाना।

(4.) सार्वजनिक आन्दोलनों में जनसामान्य की भागीदारी बढ़ाना।

इण्डियन एसोसिएशन में जमींदारों के स्थान पर मध्यम वर्ग की प्रधानता थी। मध्यम वर्ग में भी अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों की प्रधानता थी। उनमें से अनेक इंग्लैण्ड से शिक्षा प्राप्त करके आये थे जो अपने देश में भी जनतन्त्र लाना चाहते थे। वे इस दिशा में धीरे-धीरे कदम उठाना चाहते थे।

जनतन्त्र की स्थापना के लिये वे आन्दोलन भी चाहते थे परतु क्रान्तिकारी कदम उठाने के पक्ष में नहीं थे। वे अपने आन्दोलनों के द्वारा सरकार पर दबाव डालकर कुछ अधिकार हासिल करना चाहत थे। उन्होंने आन्दोलन, दबाव और समझौते का सुधारवादी मार्ग अपनाया।

इण्डियन एसोसिएशन ने उन सवालों पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जिन पर अधिकांश भारतीय सहमत थे, यथा- सिविल सर्विस आन्दोलन, वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, आर्म्स एक्ट, इल्बर्ट बिल आन्दोलन इत्यादि। अपने काम को आगे बढ़ाने के लिये एसोसिएशन ने लाहौर, मेरठ, इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ आदि स्थानों पर शाखाएँ भी स्थापित कीं।

अयोध्यासिंह ने लिखा है- ‘इण्डियन एसोसिएशन का आदर्श महान् था। वह राजधानी कलकत्ता में एक शक्तिशाली केन्द्रीय संगठन स्थापित करना चाहती थी जिसकी शाखाएँ सारे भारत में हों। उसके पास बहुत ही बुद्धिमान, योग्य और कर्मठ नेता तथा कार्यकर्ता भी थे पर इस कार्य के लिये आवश्यक धन का अभाव था। यह उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी। अपनी जिन्दगी के प्रथम दस वर्षों में उसकी वार्षिक आय 2,000 रुपये से अधिक नहीं हुई।’

आर्थिक कठिनाई के उपरान्त भी एसोसिएशन ने अखिल भारतीय संगठन और भारतीय जनता का प्रवक्ता बनने का पूरा प्रयास किया। इण्डियन एसोसिएशन द्वारा सम्पादित प्रमुख गतिविधियाँ इस प्रकार से थीं-

(1.) 1876 ई. से किसानों के अधिकार सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण कामों का सम्पादन तथा किसानों का पक्ष लेकर मालगुजारी विधेयक का समर्थन।

(2.) 1879 ई. तक सिविल सर्विस आन्दोलन का सफलता पूर्वक संचालन।

(3.) 1879 ई. से स्थानीय स्वायत्त शासन आन्दोलन का संचालन।

(4.) 1883 ई. में एसोसिएशन के नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की गिरफ्तारी और सजा के विरुद्ध आन्दोलन का संचालन।

(5.) 1884 ई. में बंगाल में नया स्वायत्त शासन कानून लागू होने पर इण्डियन एसोसिएशन द्वारा लोगों से चुनावों में भाग लेने का अनुरोध।

(6.) नगर पालिकाओं के अध्यक्ष गैर-सरकारी व्यक्ति होने की मांग।

(7.) इल्बर्ट बिल के पक्ष में सारे बंगाल में जबरदस्त आन्दोलन का संचालन।

(8.) आर्म्स एक्ट को रद्द कराने के लिये आन्दोलन का संचालन।

इण्डियन एसोसिएशन ने सार्वजनिक प्रश्नों को लेकर जन-आन्दोलन चलाये और वे एक सीमा तक सफल भी रहे। अँग्रेजों का भी मानना था कि एसोसिएशन ने इंग्लैण्ड के राजनीति मंचों के उपयोग के विचार को बहुत तेजी से ग्रहण कर लिया है।

इस प्रकार ब्रिटिश शासनकाल में बंगाल के राजनीतिक संगठन बंगाली समाज में राजनीतिक चेतना में वृद्धि करने में अपना अमूल्य योगदान देने में सफल रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – ब्रिटिश काल में राजनीतिक संगठनों का उदय

बंगाल के राजनीतिक संगठन

महाराष्ट्र के राजनीतिक संगठन

मद्रास के राजनीतिक संगठन

महाराष्ट्र के राजनीतिक संगठन

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महाराष्ट्र के राजनीतिक संगठन

महाराष्ट्र के राजनीतिक संगठन देश भर में खड़े हो रहे राजनीतिक संगठनों की ही एक शृंखला थे। इन संगठनों ने न केवल अंग्रेज अधिकारियों के अत्याचारों का विरोध किया अपितु बम्बई प्रेसीडेंसी की जनता में राजनीतिक चेतना भी उत्पन्न की।

महाराष्ट्र के राजनीतिक संगठन

बॉम्बे एसोसिएशन

बम्बई प्रेसीडेन्सी में राजनीतिक गतिविधियाँ मराठी मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी के अस्तित्व में आने से हुई। 1841 ई. में ब्रिटिश शासन की आलोचना करते हुए भास्कर पाण्डुरंग तरखदर ने कहा- ‘यदि मैं आपको (अँग्रेजों) को इस बात का श्रेय हूं कि आपने हमारी पिण्डारियों तथा रमोसियों से रक्षा की है तो यह भी सत्य है कि आपकी व्यापारिक प्रणाली ने अधिक सुचारू रूप से हमारी जेबें खाली कर दी हैं और जितना वे लोग पांच-छः सौ साल में भी न लूट सके उतना आपने थोड़े से वर्षों में ही लूट लिया है। आपके ज्ञान और बुद्धि के साथ-साथ आपकी धूर्तता और कपट भी बढ़ गई है।’

बॉम्बे एसोसिएशन, बम्बई की पहली राजनीतिक संस्था थी। इसकी स्थापना 26 अगस्त 1852 को हुई। इस संस्था में हिन्दू, मुसलमान, पारसी आदि विभिन्न धर्मों के लोग सदस्य थे। बड़े पूँजीपतियों, व्यापारियों और मध्यम वर्गीय लोगों ने इसकी सदस्यता ग्रहण की। सर जमदेशजी जीजी भाई इसके अधीष्ट अध्यक्ष, जगन्नाथ शंकर सेठ अध्यक्ष और भाऊदा तथा विनायक राव जगन्नाथ संयुक्त सचिव चुने गये। बम्बई की राजनीति में इस संस्था ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।

बॉबे एसोसिएशन का उद्देश्य सरकार को जनता की कठिनाइयों से अवगत कराना था किंतु यह अँग्रेजों की पक्षधर संस्था थी। उसने 1857 ई. की क्रांति की निन्दा की। क्रांति के बाद जब सरकार ने व्यापारियों और मध्यम वर्ग पर नये टैक्स लगाये तो बम्बई में काफी हलचल हुई।

लाइसेंस बिल के विरोध में भारी जनसभा भी हुई परन्तु बॉम्बे एसोसिएशन के शीर्ष नेता सरकार के भय से इस आन्दोलन से दूर रहे। कलकत्ता और मद्रास में लाइसेंस बिल के विरुद्ध जोरदार विरोध प्रदर्शन किया गया। जब बम्बई का जनमत इस बिल के विरुद्ध हुआ तब 8 अक्टूबर 1859 को जगन्नाथ शंकर सेठ के घर पर बॉम्बे एसोसिएशन की बैठक की गई और लाइसेंस बिल पर रिपोर्ट तैयार करने के लिये लगभग एक सौ लोगों की कमेटी बनाई गई।

काफी समय बाद रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। इस पर विचार करने के लिये पुनः दूसरी बैठक बुलाई गई। इस पर एसोसिएशन के नौजवान और गरम विचारों वाले सदस्यों ने कड़ा विरोध प्रकट किया परंतु एसोसिएशन के शीर्ष नेतृत्व ने उनके विरोध पर ध्यान नहीं दिया।

इस पर भाऊदाजी के नेतृत्व में गरम विचार वालों ने जनसभाएँ आयोजित करके लाइसेंस बिल वापस लेने के प्रस्ताव पारित किये। उन्होंने ब्रिटिश संसद को स्मृति-पत्र भेजकर मांग की कि आयकर का बोझ देश के औद्योगिक वर्गों पर लादा जा रहा है जबकि सम्पत्तिवान और अन्य वर्गों पर कोई शुल्क नहीं लगाया गया है।

इसके बाद बॉम्बे एसोसिएशन सक्रिय हुआ और उसने लाइसेंस बिल के विरुद्ध विनम्र शब्दों में एक आवेदन पत्र भारत सरकार की लेजिस्लेटिव कौंसिल को दिया। इसमें बिल वापस लेने की बात नहीं कही गई थी अपितु बिल में नाममात्र के संशोधन सुझाये गये थे। इसके साथ ही बॉम्बे एसोसिएशन धीरे-धीरे निष्क्रिय होता चला गया और 1865 ई. में जगन्नाथ शंकर सेठ की मृत्यु के साथ ही मृत प्रायः हो गया।

1867 ई. के अन्त में बॉम्बे एसोसिएशन को पुनर्जीवित करने के लिये मंगलदास नाथू भाई के घर पर प्रमुख नागरिकों तथा बॉम्बे एसोसिएशन के पुराने सदस्यों एवं समर्थकों की एक बैठक बुलाई गई जिसमें एसोसिएशन को फिर से स्थापित करने का निर्णय लिया गया।

तदनुसार मंगलदास नाथू भाई को इसका अध्यक्ष और नौरोजी फरदूनजी को उसका सचिव चुना गया। पुनर्स्थापना के बाद यह संस्था आगामी कुछ वर्षों तक काफी सक्रिय रही। उसने जन-साधारण से जुड़े विभिन्न विषयों पर सरकार के सामने आवेदन-पत्र प्रस्तुत किये।

इनमें इंग्लैण्ड और भारत में सिविल सर्विस परीक्षा का एक साथ आयोजन, सरकारी पदों पर भारतीयों की ज्यादा नियुक्तियाँ, भारत का वित्तीय प्रशासन, भारत और इंग्लैण्ड के वित्तीय सम्बन्ध, अतिरिक्त कर, सेना पर किया जाने वाला व्यय, विधान परिषदों का पुनर्गठन, भारतीय प्रशासन की जाँच के लिये संसदीय समिति का गठन इत्यादि विषय सम्मिलित थे।

बॉम्बे एसोसिएशन के नौजवान और मध्यमवर्गीय सदस्य एसोसिएशन की गतिविधियों से सन्तुष्ट नहीं थे। क्योंकि इसके अधिकांश नेता शहरी जमींदार, धनी व्यापारी और नामी वकील होने से उनके पास सार्वजनिक कार्यों के लिये समय नहीं था। संगठन के लगभग सभी शीर्ष नेता नरम विचारों के थे। वे सरकार को नाराज नहीं करना चाहते थे। उनका मानना था कि सरकार को प्रसन्न रखकर ही संगठन कुछ हासिल कर सकता है।

एसोसिएशन के एक प्रमुख सदस्य वकील शान्ताराम नारायण ने 1871 ई. में कहा- ‘भारतीय मामलों के प्रशासन में हमारे ऊपर बैठाये गये अधिकारियों के साथ सबसे अच्छे सम्बन्ध बनाये रखना हमारे एसोसिएशन के लिये बहुत ही मूल्यवान है।’

जबकि भारत के अन्य क्षेत्रों के राजनीतिक संगठन ब्रिटिश सरकार का विरोध करने लगे थे। इसलिये गर्म विचार वालों ने जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे, फीरोजशाह मेहता और काशीनाथ त्रियंबक तैलंग के नेतृत्व में बॉम्बे एसोसिएशन के नर्म विचार वाले नेताओं के विरुद्ध आवाज उठाई। जब उनकी बात नहीं सुनी गई तो अगस्त 1871 में उन्होंने टाउन एसोसिएशन की स्थापना की परन्तु टाउन एसोसिएशन कुछ समय में ही समाप्त हो गया।

उन दिनों म्युनिसिपल कमिश्नर आर्थर काफोर्ड की गलत नीतियों के कारण बम्बई नगरपालिका की आर्थिक हालत खराब थी। इस कारण बम्बई के नागरिकों में उसके प्रति असन्तोष था। वे नगरपालिका में सुधारों की मांग करने लगे। 6 नवम्बर 1870 को जी. ए. फारबेस के नेतृत्व में रेंट पेयर्स एसोसिएशन की स्थापना हुई।

इस एसोसिएशन ने नगरपालिका सुधार आन्दोलन चलाया। एसोसिएशन की मांग थी कि नगरपालिका का प्रबन्ध कर-दाताओं के चुने गये प्रतिनिधियों को सौंपा जाये। सुधारों की मांग को लेकर आन्दोलन चलाने वालों को रिफॉर्म पार्टी का नाम दिया गया। इस सुधारवादी दल में कई अँग्रेज भी सम्मिलित थे।

रिफॉर्म पार्टी के बढ़ते हुए प्रभाव को कम करने के लिये सरकार के प्रयासों से शंकर सेठ पार्टी खड़ी की गई। इस पार्टी ने बम्बई प्रेसीडेन्सी की लेजिस्ट्लेटिव कौंसिल को स्मृति-पत्र देकर मांग की कि सम्पत्ति वालों पर ही नहीं अपितु समस्त लोगों पर आय के हिसाब से नगर पालिका कर लगना चाहिए। बॉम्बे एसोसिएशन के नेताओं ने इस सुझाव का विरोध किया।

उनका मानना था कि इससे सरकार को आयकर स्थाई बना देने का रास्ता मिल जायेगा। जब बॉम्बे एसोसिएशन में शंकर सेठ पार्टी की नहीं चली तो यह गुट बॉम्बे एसोसिएशन से अलग हो गया और 19 अप्रैल 1873 को इस गुट ने वेस्टर्न इंडिया एसोसिएशन की स्थापना की परन्तु अक्टूबर 1873 को शंकर सेठ की मृत्यु के साथ ही इस संगठन का अन्त हो गया।

वेस्टर्न इंडिया एसोसिएशन की समाप्ति के बाद भी बॉम्बे एसोसिएशन अपनी स्थिति को सुधारने में असफल रहा। नौरोजी फरदूनजी के इंग्लैण्ड चले जाने पर एच. दादाभाई को कार्यवाहक सचिव नियुक्त किया गया परन्तु जुलाई 1874 में उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। उनके स्थान पर वकील काशीनाथ त्रियंबक तैलंग को नियुक्त किया गया।

वे एसोसिएशन को पर्याप्त समय नहीं दे पाये और एसोसिएशन निष्क्रिय होता चला गया। 1875 ई. में फरदूनजी के इंग्लैण्ड से वापस आने पर एसोसिएशन को पुनः सक्रिय बनाने की चेष्टा की गई परन्तु इस कार्य में सफलता नहीं मिली। अतः अक्टूबर 1875 में मंगलदास नाथू भाई और नौरोजी फरदूनजी ने एसोसिएशन से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद कुछ वर्षों तक एसोसिएशन बनी रही किंतु बम्बई की राजनीति में उसका महत्त्व नहीं रहा।

पूना एसोसिएशन

1876 ई. में पूना के कुछ जमींदारों, व्यापारियों और मध्यमवर्गीय लोगों ने पूना एसोसिएशन की स्थापना की। प्रभावशाली जमींदार रामचन्द्र नाटू को अध्यक्ष, वासुदेव रामचन्द्र धमधीरे को उपाध्यक्ष और बाबूराव कृष्ण गोखले को सचिव चुना गया। इस संस्था के सदस्यों में समस्त धर्मों, जातियों और व्यवसायों के लोग थे।

इसके अधिकांश सदस्य पूना से थे। कुछ सदस्य बम्बई, कल्याण, करहद और नागपुर से भी थे। इस संस्था के प्रमुख उद्देश्य सरकारी कानूनों के बारे में जनता का पक्ष सरकार के सामने रखना, स्थानीय समस्याओं की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करना, जनता के विभिन्न हितों का ध्यान रखना और सरकार एवं प्रजा के मध्य सद्भाव उत्पन्न करना था। यह संस्था 1869 ई. के मध्य तक समाप्त हो गई।

पूना सार्वजनिक सभा

बम्बई प्रेसीडेन्सी के राजनीतिक संगठनों में पूना सार्वजनिक सभा सबसे महत्त्वूपर्ण थी। इस संस्था की स्थापना गणेश वासुदेव जोशी ने 2 अप्रैल 1870 को की। वे कई वर्षों तक संस्था के सचिव रहे। 1871 ई. में इस संस्था को महादेव गोविन्द रानाडे का सहयोग भी मिल गया।

जोशी और रानाडे ने मिलकर पूना सार्वजनिक सभा को पश्चिम भारत का प्रगतिशील एवं प्रमुख संगठन बना दिया। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य सरकार और जनता के बीच मध्यस्थता करना, जनता को सरकार के वास्तविक उद्देेश्यों की जानकारी देना और उसे अपने अधिकार प्राप्त करने का मार्ग सुझाना था।

प्रारम्भिक दो वर्षों में संस्था ने स्थानीय प्रश्नों पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया। साथ ही टैक्स वृद्धि, यूरोपीय और भारतीय सिपाहियों के बीच संघर्ष, भारतीय राजाओं और उनकी प्रजा के बीच सम्बन्ध तथा भारतीय राजाओं और ब्रिटिश सरकार के बीच सम्बन्ध आदि प्रश्नों को भी उठाया। इस संस्था का एक काम विधान परिषदों में हुई बहसों तथा सरकारी विधेयकों का देशी भाषाओं में प्रकाशन करना भी था।

पूना सार्वजनकि सभा ने हर सम्भव प्रश्न पर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिये पत्र लिखे। उसने दक्षिण में स्वदेशी आन्दोलन चलाने में भी पहल की। 1872 ई. और 1876 ई. के अकाल के समय उसने बड़ी लगन से अकाल पीड़ितों की सहायता की। उसने किसानों की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिये एक उपसमिति बनाई और अपने कार्यकर्ताओं को विभिन्न गाँवों में भेजकर उनसे रिपोर्टें तैयार करवाईं।

इन रिपोर्टों को एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया गया। 1874 ई. में पूना सार्वजनिक सभा ने बंगाल के अकाल पीड़ितों के लिये धन एकत्रित किया। उसके इन कार्यों की न केवल प्रजा ने अपितु सरकार ने भी प्रशंसा की।

1876 ई. में संस्था ने लगभग 22 हजार व्यक्तियों के हस्ताक्षरों से युक्त एक आवेदन-पत्र ब्रिटिश संसद को भेजकर मांग की कि ब्रिटिश संसद में भारत के 16 प्रतिनिधि लिये जायें। सभा का तर्क था कि भारतीयों का प्रतिनिधित्व नहीं होने से ब्रिटिश संसद भारत की समस्याओं पर समुचित ध्यान नहीं दे पाती है।

जुलाई 1876 में सभा ने अपना त्रैमासिक पत्र निकाला जिसमें देश की विभिन्न समस्याओं पर लेख होते थे। रानाडे के लेख अत्यंत तर्क-संगत होते थे। पूना सार्वजनिक सभा ने स्वयं को दक्षिण भारत की जनता का प्रतिनिधि होने का दावा किया।

1876 ई. में सभा ने स्थान-स्थान पर न्याय सभाएँ स्थापित कीं और लोगों से अपील की कि वे अपने विवाद और झगड़े सरकारी अदालतों में ले जाने की बजाय इन न्याय सभाओं मे लायें। इससे ब्रिटिश सरकार सार्वजनिक सभा को सन्देह से देखने लगी। 1876 ई. में गायकवाड़ मुकदमे के सम्बन्ध में सभा ने आन्दोलन चलाया।

इससे सरकार का सन्देह और बढ़ गया। अब सरकार ने सभा के कार्यों की जाँच करवाई परन्तु सरकार को सभा के सरकार-द्रोही कार्यों का कोई प्रमाण नहीं मिला। यद्यपि कुछ अधिकारियों ने अपनी गुप्त रिपोर्टों में सभा को राजद्रोही संघ बताया था।

सरकार इस तथ्य से परिचित थी कि जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे पूना सार्वजनिक सभा के मस्तिष्क थे, इसलिये बम्बई सरकार ने रानाडे को पूना से नासिक भेज दिया।

1878 ई. में महाराष्ट्र में वासुदेव बलवन्त फड़के के विद्रोह के समय सरकार को सभा की गतिविधियों पर पुनः सन्देह हुआ। उसे आंशका थी कि सभा और रानाडे इस विद्रोह को समर्थन दे रहे थे। अतः सरकार ने रानाडे को नासिक से धूलिया स्थानान्तरित कर दिया। 1880 में ई. में सरकार ने रानाडे को जज नहीं बनने दिया, यद्यपि वे इस पद के लिये समस्त प्रकार की योग्यताएँ रखते थे।

रानी विक्टोरिया द्वारा कैसरे हिन्द की उपाधि धारण किये जाने पर पूना सार्वजनिक सभा ने मई 1876 को अभिनन्दन-पत्र भेजने का निर्णय किया। इस अभिनन्दन-पत्र में ब्रिटिश शासन की प्रशंसा की गई थी और सरकारी उत्पीड़न तथा अत्याचार की बातों का उल्लेख नहीं किया। अभिनन्दन पत्र में विधान सभा या इसी तरह की किसी संस्था की माँग भी की गई थी।

चूंकि पूना सार्वजनिक सभा नवोदित मध्यमवर्ग, जमींदारों और व्यापारियों के स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करती थी। यही कारण है कि वह महाराष्ट्र के किसानों में प्रवेश नहीं पा सकी। हालांकि वह कभी-कभी उनसे सम्बन्धित प्रश्नों को भी उठाती थी। पूना सार्वजनिक सभा में ब्राह्मणों और बनियों की प्रधानता बनी रही।

पूना सार्वजनिक सभा ने विभिन्न प्रदेशों के एसोसिएशनों के साथ सम्पर्क बनाये रखा और वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, आबकारी शुल्क, सैनिक व्यय, इंग्लैण्ड और भारत के बीच व्यापारिक सम्बन्ध, आर्म्स एक्ट, भारतीय संसद का निर्माण आदि प्रश्नों पर विचार-विमर्श जारी रखा। यह सभा निर्भय होकर काम करती रही और सारे देश का प्रतिनिधि संगठन बनने का प्रयास भी करती रही।

1873 ई. में ज्योति बा फूले ने सत्य शोधक समाज की स्थापना की। यह हिन्दू समाज के अन्दर सुधारवादी आन्दोलन था, ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को चुनौती देता था और जात-पाँत के स्थान पर मनुष्य मात्र की समानता पर जोर देता था। महात्मा फूले ने शूद्रों और अति-शूद्रों को सार्वजनिक सभा से अलग रखने का सफल प्रयास किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – ब्रिटिश काल में राजनीतिक संगठनों का उदय

बंगाल के राजनीतिक संगठन

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मद्रास के राजनीतिक संगठन

मद्रास के राजनीतिक संगठन

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मद्रास के राजनीतिक संगठन

मद्रास के राजनीतिक संगठन ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा व्यापारियों एवं जमींदारों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए आरम्भ हुए। बाद में इन्होंने राजनीतिक मंचों का स्वरूप धारण कर लिया।

मद्रास के राजनीतिक संगठन

मद्रास नेटिव एसोसिएशन

26 फरवरी 1852 को मद्रास के व्यापारियों ने कलकत्ता की ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन की एक शाखा मद्रास में स्थापित की।

13 जुलाई 1852 को इसने अपना नाम बदलकर मद्रास नेटिव एसोसिएशन रख लिया। इस संस्था ने भी चार्टर के सम्बन्ध में एक स्मृति पत्र ब्रिटिश संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जिसमें वही माँगें उठाई गईं जो ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन ने उठा ई थीं।

संगठन के स्मृति-पत्र में मालगुजारी वसूली में सरकारी अधिकारियों पर उत्पीड़न और शोषण का आरोप लगाया गया। इस पर सरकार ने उत्पीड़न की जाँच के लिये टार्चर कमीशन (यंत्रणा आयोग) नियुक्त किया। एसोसिएशन ने अपने आरोप को सही सिद्ध करने का पूरा प्रयास किया। इस कारण स्थानीय अधिकारी उससे नाराज हो गये।

इस कारण एसोसिएशन के बहुत से समर्थक डर कर एसोसिएशन से अलग हो गये। सरकार को प्रसन्न करने के लिये इस संस्था ने 1857 के विप्लव की निन्दा की किंतु अँग्रेजों पर इस प्रशंसा का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 1862 ई. तक एसोसिएशन काफी कमजोर पड़ गया और 1868 ई. में भंग हो गया। 1872 ई. में संस्था को फिर से जीवित करने का प्रयास किया गया परन्तु सफलता नहीं मिली।

मद्रास महाजन सभा

1880 ई. के बाद मद्रास प्रेसीडेन्सी में चिंगिलपुट काण्ड के कारण राजनीतिक हलचल तेज हो गई। इस काण्ड में अनेक काश्तकारों की जमीन-जायदाद कुर्क कर ली गई थीं और सलेम दंगा मुकदमे में सलेम के अगस्त 1882 के हिन्दू-मुस्लिम दंगों के अनेक निर्दोष लोगों को सजा दी गई थी।

इन दोनों घटनाओं के परिणामस्वरूप मद्रास प्रेसीडेन्सी में कर्मठ कार्यकर्ताओें का एक दल तैयार हो गया जिनमें जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर, पी. रंगैया नायडू, आर. बालाजी राव, सी. विजयराघवाचारी, पी. आनन्द चार्लू और रामस्वामी मुदालियर जैसे प्रभावशाली व्यक्ति सम्मिलित थे।

इनमें से कुछ सदस्य मद्रास नेटिव एसोसिएशन से भी जुड़े हुए थे परन्तु उन्हें एसोसिएशन की सरकार परस्ती पसन्द नहीं थी। 1882 ई. के अन्त में एक घटना ने नवोदित युवा वर्ग को पुराने नेताओं से टकराव की स्थिति में ला खड़ा किया। पुराना नेतृत्व गवर्नर की कौंसिल के अवकाश प्राप्त सदस्य डी. एफ. कारमाइकेल को सत्कार के साथ विदाई देना चाहता था किंतु नया नेतृत्व इसका विरोधी था।

नये नेतृत्व ने 16 मई 1884 को मद्रास महाजनसभा की स्थापना की। पी. रंगैया नायडू को इसका अध्यक्ष और बी. राघवाचारी तथा आनन्द चार्लू को सचिव चुना गया। सभा के उद्घाटन समारोह में नायडू ने घोषित किया कि सभा की सदस्यता केवल गैर-सरकारी लोगों को दी जायेगी ताकि वे निडर होकर जनता की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व कर सकें। यह बात भी स्पष्ट कर दी गई कि सभा का मुख्य उद्देश्य जनता के हितों को आगे बढ़ाना होगा।

मद्रास महाजन सभा ने आरम्भ से ही शानदार प्रगति की। इसका कारण मद्रास नेटिव एसोसिएशन के बहुत से नेताओं का महाजन सभा में सम्मिलित हो जाना था। दूसरा कारण छोटे-छोटे संगठनों को अपने साथ सम्बद्ध करना था। परिणाम स्वरूप महाजन सभा, मद्रास प्रेसीडेन्सी की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक संस्था बन गई। लॉर्ड रिपन की विदाई के उपलक्ष्य में महाजन सभा ने स्थान-स्थान पर सभाएँ आयोजित करवा कर अभिनन्दन-पत्र पारित कराये।

मद्रास महाजन सभा ने बम्बई के नेताओं के साथ निरन्तर सम्पर्क रखा। 29 दिसम्बर 1884 को मद्रास महाजन सभा ने मद्रास प्रेसीडेन्सी के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें 70 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

सम्मेलन में विधान परिषद् के सुधार, कार्य पालिका से न्यायपालिका के पृथक्कीरण, भारत सरकार के ढाँचे में परिवर्तन, खेतीहर वर्गों की स्थिति आदि विषयों पर विचार किया गया। बम्बई के नेताओं की भाँति महाजन सभा के नेता भी चाहते थे कि साल में एक बार देश के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हो परन्तु अपनी सीमित क्षमता के कारण महाजन सभा स्वयं यह दायित्व उठाने में असमर्थ थी।

इण्डियन नेशनल कान्फ्रेंस

बंगाल, बम्बई और मद्रास, इन तीनों प्रेसीडेन्सियों के नेताओं की इच्छा थी कि देश में एक केन्द्रीय राजनीतिक संगठन बने। 1870 ई. के बाद राजनीतिक चेतना में वृद्धि के साथ-साथ यह इच्छा भी प्रबल होती चली गई। बंगाली नेता अपने इण्डियन एसोसिएशन को अखिल भारतीय आन्दोलन का केन्द्र बनाना चाहते थे।

उन्होंने इसके लिये भरसक प्रयास भी किया परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली और इण्डियन एसोसिएशन बंगाल तक ही सीमित रह गया। इसी प्रकार पूना सार्वजनिक सभा महाराष्ट्र तक और मद्रास महाजन सभा मद्रास तक सीमित रही।

1880 ई. के पूर्व, कर-विरोधी आन्दोलन, सिविल सर्विस आन्दोलन, वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट विरोधी आन्दोलन, आर्म्स एक्ट विरोधी आन्दोलन भारत के समस्त राजनीतिक संगठनों को एक-दूसरे के निकट लाने में सहायक हुए। 1880 ई. के बाद इल्बर्ट बिल आन्दोलन, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की गिरफ्तारी आदि ने भी इन राजनीतिक संगठनों को एकता के सूत्र में बांधने का काम किया।

इल्बर्ट बिल आन्दोलन ने भारतवासियों की राष्ट्रीय चेतना और एकता बढ़ाई। साथ ही यह भी भान करवाया कि भारतीयों के लिये एक शक्तिशाली अखिल भारतीय संगठन का होना आवश्यक है। इल्बर्ट बिल आन्दोलन के दौरान ही सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को कलकत्ता हाईकोर्ट के एक बदनाम जज के विरुद्ध एक लेख लिखने के आरोप में 5 मई 1883 को दो महीने की कैद की सजा सुनाई गई।

इस निर्णय से समूचे देश में आन्दोलन भड़क उठा। कई स्थानों पर आन्दोलन ने हिंसक रूप भी ले लिया। इस आन्दोलन में हिन्दू, सिक्ख, मुसलमान, जैन आदि विभिन्न धर्मों के लोग सम्मिलित हुए। स्पष्ट है कि सुरेन्द्रनाथ की कैद ने भारतीय एकता को बढ़ाने में बहुत सहायता की।

इण्डियन एसोसिएशन ने मई 1882 ई. में आगामी किसी समय एक राष्ट्रीय कांग्रेस बुलाने का निर्णय लिया। 4 दिसम्बर 1883 को कलकत्ता में बहुत बड़ी अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी आरम्भ होने वाली थी। कई समाचार पत्रों ने इस अवसर पर राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

फलस्वरूप 15 दिसम्बर 1883 को इण्डियन एसोसिएशन के सचिव आनन्द मोहन बसु की तरफ से देश की विभिन्न एसोसिएशनों और प्रमुख व्यक्तियों को राष्ट्रीय सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिये निमंत्रण भेजे गये। सम्मेलन की तिथि 29 और 30 दिसम्बर 1883 निश्चित की गई।

निश्चित तिथि पर रामतनु लाहिड़ी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सम्मेलन आरम्भ हुआ। इसमें भारत के विभिन्न भागों से आये लगभग 100 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये-

(1.) सिविल सर्विस परीक्षा का आयोजन इंग्लैण्ड और भारत में एक साथ किया जाये और इसमें बैठने की उम्र पहले की भांति 22 साल की जाये।

(2.) एक राष्ट्रीय कोष की स्थापना की जाये।

(3.) भारत में प्रतिनिधि विधान सभाओं की स्थापना की जाये।

(4.) इल्बर्ट बिल पर हुए समझौते पर खेद प्रकट किया गया।

इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि सब राष्ट्रीय नेताओं को एक मंच पर लाना था। इसके साथ ही एक संयुक्त अखिल भारतीय संगठन (इण्डियन नेशनल कान्फ्रेंस) की स्थापना में सार्थक कदम था।

1884 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने सारे भारत का दौरा किया और नवम्बर 1885 में उन्होंने इण्डियन एसोसिएशनों के सचिव की हैसियत से दूसरी नेशनल कान्फ्रेंस का निमन्त्रण-पत्र देश की विभिन्न एसोसिएशनों और प्रमुख व्यक्तियों के पास भेजा। सम्मेलन की तारीख 25-27 दिसम्बर तय की गई।

इसी समय ह्यूम और उनके मित्रों ने इण्डियन नेशनल यूनियन की तरफ से बम्बई में इण्डियन नेशनल कांफ्रेन्स बुला रखी थी परन्तु उन्होंने इस बात की चर्चा सुरेन्द्रनाथ बनर्जी से नहीं की। जब कलकत्ता की नेशनल कान्फ्रेंस की तैयारियाँ लगभग पूरी हो गईं तब उन्हें अपनी कान्फ्रेंस को स्थगित कर बम्बई में होने वाली कान्फ्रेंस में सम्मिलित होने को कहा गया।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को उस समय उनका प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं था। अतः निश्चित समय पर कलकत्ता की नेशनल कान्फ्रेस का दूसरा अधिवेशन आरम्भ हुआ। इस बार सम्मेलन में सम्मिलित होने वाले प्रतिनिधियों की संख्या कम रही। सम्मेलन में स्पष्ट किया गया कि इसका उद्देश्य राष्ट्रीय शक्तियों को एक केन्द्र बिन्दु पर लाना और उनके सार्वजनिक हित को बढ़ाने वाले किसी सर्वमान्य उद्देश्य पर केन्द्रित करना है।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है कि 1828 ई. में स्थापित अकादमिक एसोसिएशन, 1830 ई. में स्थापित कलकत्ता ट्रेड ऐसोसिएशन, 1834 ई. में स्थापित बंगाल चेम्बर ऑफ कॉमर्स आदि अराजनीतिक संस्थाओं का यद्यपि राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं था। फिर भी इन संगठनों ने शिक्षाविदों तथा व्यापारियों आदि प्रमुख सामाजिक वर्गों को संगठित होने का रास्ता दिखाया। 1836 ई. में स्थापित बंगभाषा प्रकाशक सभा को भारत की पहली राजनीतिक संस्था कहा जा सकता है।

इसके बाद कलकत्ता प्रेसीडेंसी में 1838 ई. में लैंड होल्डर्स सोसायटी, 1839 ई. में पेट्रियाटिक एसोसिएशन, 1841 ई. में देश-हितैषिणी सभा, 1843 ई. में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसायटी, 1851 ई. में ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन, 1875 ई. में इण्डियन लीग, 1876 ई. में इण्डियन एसोसिएशन आदि राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना हुई। बम्बई प्रेसिडेंसी में 1852 ई. में बॉम्बे एसोसिएशन, 1871 ई. में टाउन एसोसिएशन, 1870 ई. में रेंट पेयर्स एसोसिएशन, 1876 ई. में पूना एसोसिएशन, 1870 ई. में पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना हुई।

मद्रास प्रसिडेन्सी में 1852 ई. में मद्रास नेटिव एसोसिएशन, 1884 ई. में मद्रास महाजनसभा की स्थापना हुई। कांग्रेस के उद्भव से पूर्व इन संस्थाओं ने जन साधारण की मांगों को सरकार के समक्ष उठाया तथा कानूनों में संशोधन करवाकर तथा उनमें अपनी मांगों को जुड़वाकर अनेक महत्त्वपूर्ण सफलताएं अर्जित कीं। इन संस्थाओं ने राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त करने के भी प्रयास किये किंतु जन साधारण की भागीदारी नहीं होने से ये संस्थायें कुछ वर्ष तक चलकर समाप्त हो गईं।

दिसम्बर 1883 में इण्डियन नेशनल कान्फ्रेस की स्थापना हुई किंतु ए. ओ. ह्यूम द्वारा अलग पार्टी बनाने का निर्णय कर लेने से इस संस्था के दो राष्ट्रीय सम्मेलन ही हुए किंतु इण्डियन नेशनल कान्फ्रेस, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – ब्रिटिश काल में राजनीतिक संगठनों का उदय

बंगाल के राजनीतिक संगठन

महाराष्ट्र के राजनीतिक संगठन

मद्रास के राजनीतिक संगठन

राजनीतिक जनजागरण के कारण

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राजनीतिक जनजागरण के कारण

ब्रिटिश शासनकाल में भारत में हुए राजनीतिक जनजागरण के कारण बहुत विस्तृत थे। उस काल में चारों ओर से नवीन सूचनाओं का आगमन हो रहा था। यूरोप में पनप रहे राष्ट्रवादी विचारों एवं यूरोप में हुई वैज्ञानिक शोधों ने लोगों को नए तरीके से सोचने का मार्ग दिखाया जिसका असर भारत पर भी पड़ा।

भारत में अँग्रेजी शिक्षा पद्धति के आरम्भ होने के बाद भारतीय समाज में एक नये शिक्षित वर्ग का उदय हुआ जिसे बुद्धिजीवी वर्ग कहा जाने लगा। इसके साथ ही औद्योगिकीकरण तथा नौकरशाह वर्ग के उदय के कारण भारत में मध्यम वर्ग का तेजी से विस्तार हुआ।

भारत के बुद्धिजीवी एवं मध्यम वर्ग ने मिलकर भारत में राजनीतिक संस्थाओं की नींव रखी। भारतीय उद्योगपतियों एवं व्यवसाइयों ने भी इन संस्थाओं से स्वयं को जोड़ा ताकि सरकार एवं जनता के बीच मध्यस्थता की भूमिका ग्रहण कर अपने हितों की रक्षा की जा सके।

भारत में राजनीतिक चेतना का प्रादुर्भाव; प्रशासनिक सुधारों तथा नागरिक अधिकारों की मांग के रूप में प्रस्फुटित हुआ। ये मांगें किसी प्रान्त विशेष, क्षेत्र विशेष, जाति विशेष अथवा गुट विशेष तक सीमित नहीं थीं।

भारत के हर क्षेत्र एवं हर समुदाय से ये मांगें उठ रही थीं जिनकी अनदेखी करना न तो भारत के बुद्धिजीवी वर्ग के लिये सम्भव था और न मध्यम वर्ग के लिये। भारतीयों का जो आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक शोषण किया जा रहा था, भारतीय उस शोषण के विरुद्ध खड़े होने लगे।

राजनीतिक जनजागरण के कारण

उन्नीसवीं सदी में भारत में उत्पन्न राजनीतिक जनजागरण के कारण अत्यंत व्यापक थे –

(1.) सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आन्दोलन

राजनीतिक जागरण की प्रक्रिया में भारत में चले सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आन्दोलनों की भूमिका उल्लेखनीय थी। इन सुधार आन्दोलनों ने भारत में राष्ट्रवाद की अवरुद्ध धारा का मार्ग फिर से खोल दिया। ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसायटी आदि संस्थाओं ने हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म की कमजोरियों की ओर जन-साधारण का ध्यान आकर्षित किया।

छुआछूत, बाल-विवाह, सती-प्रथा, दहेज-प्रथा जैसी समस्याओं के समाधान के लिए जनमत तैयार करने में इन संस्थाओं ने सराहनीय कार्य किया। इन्होंने व्यक्तिगत एवं सामाजिक समानता पर जोर दिया। ये भावनाएँ आगे चलकर राष्ट्रीयता के रूप में प्रस्फुटित हुईं। राजनीतिक जनजागरण को उद्वेलित करने वाले प्रमुख सामाजिक एवं धार्मिक सुधारक इस प्रकार से थे-

राजाराम मोहन राय

राजा राममोहन राय (1774-1833 ई.) को भारतीय राष्ट्रवाद का जनक कहा जाता है। उन्नीसवीं सदी में भारतीयों की उन्नति के लिए जितने भी मुख्य आन्दोलन हुए, उनमें से अधिकांश आंदोलनों की नींव राजा राममोहन राय ने रखी। उन्होंने अँग्रेजों द्वारा भारतीयों को अँग्रेजी भाषा और यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने तथा सती-प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों पर प्रतिबन्ध लगाने आदि कदमों का पूरा समर्थन किया परन्तु जहाँ भी ब्रिटिश शासकों ने भारतीयों के साथ भेदभाव किया या भारतीयों के हितों पर आघात किया, वहीं उनका विरोध भी किया।

राजा राममोहन राय ने एक तरफ हिन्दू धर्म की कुरीतियों और दूसरी तरफ ईसाई धर्म-प्रचारकों की धर्मान्धता के विरुद्ध लड़ने के लिए 1828 ई. में ब्रह्म सभा की स्थापना की। वस्तुतः भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद ईसाई धर्म का प्रचार भी बड़ी तेजी से होने लगा था।

पढ़े-लिखे भारतीयों में ईसाई धर्म के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा था और वे ईसाई धर्म स्वीकार करने लगे थे। राजा राममोहन राय ने ब्रह्म सभा के माध्यम से ईसाई धर्म के प्रति आकर्षण को कम कर दिया। राजा राममोहन राय राष्ट्रीय समाचार पत्रों तथा प्रेस की स्वतन्त्रता के प्रबल समर्थक थे।

उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि किसानों का लगान और जमींदारों की मालगुजारी कम कर दी जाए। भोग-विलास की वस्तुओं पर करों में वृद्धि की जाये। यूरोपीय कलक्टरों के स्थान पर भारतीय कलक्टरों को नियुक्त किया जाये और भारतीय सेना का भारतीयकरण किया जाये।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 ई. में आर्य समाज की स्थापना की। उन्होंने सामाजिक सुधार कार्य में धर्म की महत्ता पर अधिक जोर दिया। इसलिये उन्हें उग्र हिन्दूवादी सुधारक कहा जाता है। वेदों के ज्ञान एवं निराकार ईश्वर में उनका अटूट विश्वास था। उन्होंने विभिन्न धर्मों एवं समाजों के अन्धविश्वासों तथा पाखण्डों पर जोरदार प्रहार किया।

उनका प्रमुख उद्देश्य भारतवासियों को उनके स्वर्णिम अतीत का स्मरण करवाकर उनके प्राचीन गौरव को जागृत करना था। वे पक्के देशभक्त थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन की जकड़ में फँसे देशी रियासतों के राजाओं को जागृत करने का प्रयास किया। वे हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा मानते थे।

उनका स्वदेशी प्रेम असीमित था। वे मानते थे कि पारस्परिक द्वेष, अज्ञान एवं विलासिता के कारण भारत की स्वतन्त्रता का लोप हो गया। वे विदेशी शासन को उचित नहीं मानते थे चाहे वह कितना ही उन्नत एवं सुसभ्य क्यों न हो और कितना ही धर्मनिरपेक्ष एवं दयालु क्यों न हो। उन्हें विश्वास था कि भारत एक दिन स्वतन्त्र होगा।

दयानंद के सम्बन्ध में वेलेन्टीन शिरोल ने लिखा है- ‘स्वामी दयानन्द सिद्धहस्त राजनीतिज्ञ तथा अँग्रेजी शासन को अन्दर से उखाड़ने में प्रयत्नशील थे।’

वस्तुतः दयानंद प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा था- ‘भारत भारतीयों के लिए है।’

स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द ने समस्त विश्व में हिन्दू धर्म और अध्यात्म की श्रेष्ठता को स्थापित किया। उन्होंने कहा कि वेदान्त और आध्यात्मिकता के बल पर समस्त विश्व पर सांस्कृतिक विजय प्राप्त की जा सकती है किन्तु जब तक भारत दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, वह इस महत्त्वपूर्ण भूमिका को नहीं निभा सकता।

वे राष्ट्रवाद का आध्यात्मीकरण करना चाहते थे। भारत को राजनीतिक दासता से मुक्ति प्राप्त करने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा था- ‘आज हमारे देश को जिन चीजों की आवश्यकता है, वे हैं लोहे की मांसपेशियाँ, इस्पात की तंत्रिकाएँ, प्रखर संकल्प, जिसका कोई प्रतिरोध न कर सके, जो अपना काम हर प्रकार से पूरा कर सके? अपने में विश्वास रखो और उस विश्वास पर दृढ़ता पूर्वक खड़े रहो। क्या कारण है कि हम तेतीस करोड़ लोगों पर पिछले एक हजार वर्ष से मुट्ठी भर विदेशी शासन करते  आये हैं ? क्योंकि उन्हें अपने में विश्वास था और हमें नहीं।’

विवेकानन्द ने आम भारतीय को जागृत करते हुए कहा– ‘निर्भीक बनो, साहस धारण करो, इस बात पर गर्व करो कि तुम भारतीय हो और गर्व के साथ घोषणा करो, मैं भारतीय हूँ और प्रत्येक भारतीय मेरा भाई है।’

थियोसोफिकल सोसाइटी

थियोसोफिकल सोसाइटी ने सर्व प्रथम दक्षिण भारत में लोगों को जागृत किया। भारत में इस आन्दोलन को व्यापक बनाने का श्रेय श्रीमती ऐनीबेसेंट को है जिन्होंने राष्ट्रीय चेतना की इस धारा को आगे बढ़ाया।

अन्य सुधारक

महाराष्ट्र में सरदार गोपाल हरि देशमुख तथा ज्योति बा फूले जैसे सुधारकों ने सामाजिक बुराइयों की अपेक्षा विदेशी नियंत्रण को अधिक खतरनाक बताया।

इस प्रकार, इन समाज सुधार एवं धर्म सुधार आन्दोलनों ने भारतीयों में आत्म-विश्वास तथा प्राचीन गौरवमयी परम्पराओं के प्रति श्रद्धा उत्पन्न की जिससे देश में राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ।

(2.) यंग बंगाल आंदोलन

भारतीयों में राष्ट्रीयता के बीज बोने में यूरेशियन (एंग्लो-इंडियन) युवक हैनरी लुई विवियन डिरोजियो (1809-31 ई.) का नाम सम्मान पूर्वक लिया जाता है। वह 1828 ई. में कलकत्ता के हिन्दू कॉलेज में सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त हुआ। 1831 ई. में 22 वर्ष की अल्पायु में ही उसका निधन हो गया।

तीन वर्ष की अत्यंत अल्प अवधि में वह बहुत कुछ कर गया। उसने कॉलेज के विद्यार्थियों के सहयोग से 1828 ई. में एक एकेडेमिक एसोसिएशन की स्थापना की। इस एसोसिएशन की बैठकों में स्वतन्त्र इच्छा, भाग्य, धर्म, देश प्रेम इत्यादि विषयों पर विचार-विमर्श किया जाता था।

इस एसोसिएशन के सदस्य, क्रान्तिकारी विचारों की प्रशंसा तथा ब्रिटेन के टोरियों (अनुदारवादियों) की कटु आलोचना करते थे। वे अपने देश (भारत) की दुर्दशा पर कविताएँ लिखते थे और स्वतन्त्र एवं स्वाशासित भारत का स्वप्न देखते थे। वे एक तरफ भारत के सामन्ती कुसंस्कारों के विरोधी थे तो दूसरी तरफ ईस्ट इण्डिया कम्पनी की प्रतिक्रियावादी नीतियों के विरुद्ध भी आवाज उठाते थे।

एसोसिएशन की गतिविधियों को यंग बंगाल आंदोलन कहा जाने लगा। डिरोजियो की मृत्यु के बाद यह आन्दोलन बिखर गया परन्तु अपने अल्प काल में ही बंगालियों के हृदय में राष्ट्रवाद की भावना संचारित कर गया।

(3.) अँग्रेजी शिक्षा एवं साहित्य का प्रसार

भारत में पाश्चात्य शिक्षा आरोपित किए जाने का उद्देश्य भारतीय सभ्यता, संस्कृति और धर्म को नष्ट करके पाश्चात्य शिक्षा, संस्कृति एवं धर्म को स्थापित करना था। अँग्रेज भारत में एक ऐसे वर्ग की स्थापना करना चाहते थे जो रक्त और वर्ण से भले ही भारतीय हो किन्तु विचार, भाषा तथा रुचि से अँग्रेज हो। अँग्रेजी शिक्षा के प्रचार का उद्देश्य भारत में व्यापारिक कम्पनियों और ब्रिटिश उपनिवेश की शासन व्यवस्था के लिए कलर्कों को तैयार करना था।

मैकाले का कहना था- ‘भारत को स्वतन्त्र सरकार की प्राप्ति नहीं हो सकती किन्तु उसे उसके नीचे की सबसे अच्छी वस्तु मिल सकती है- दृढ़ निष्पक्ष निरंकुशता।’

अँग्रेज अपने उद्देश्यों में सफल रहे परन्तु इस नीति के ऐसे विपरीत परिणाम भी निकले जिनकी अँग्रेजों ने आशा नहीं की थी। पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार से भारतीयों को मिल्टन, बर्क, मिल, मैकाले, स्पेन्सर, रूसो एवं वाल्टेयर आदि अँग्रेजी विद्वानों के प्रसिद्ध ग्रन्थों का अध्ययन करने का अवसर मिला।

इन ग्रन्थों में स्वतन्त्रता, राष्ट्रीयता, स्वशासन आदि विचारों की भरमार थी। इस कारण पश्चिमी शिक्षा ने भारतीयों को स्वतन्त्रता और राष्ट्रीयता के पश्चिमी सिद्धान्तों से परिचित करा दिया। अँग्रेजी शिक्षा के परिणामस्वरूप भारतीय नौजवानों में देश की वर्तमान स्थिति के प्रति असन्तोष उत्पन्न हुआ और वे प्रशासन में सुधारों की मांग करने लगे।

 अँग्रेजी शिक्षा का एक अन्य प्रभाव यह पड़ा कि समस्त देश को एक सम्पर्क भाषा प्राप्त हो गई जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रान्तों के निवासियों में पारस्परिक विचार-विनिमय के लिए माध्यम मिल गया। इससे पूर्व देश में ऐसी कोई एक भाषा नहीं थी जिसके माध्यम से सम्पर्क स्थापित हो सके।

सर हेनरी कॉटन ने इस सम्बन्ध में लिखा है- ‘यह केवल पाश्चात्य शिक्षा का परिणाम है कि विविधता से भरा भारत वर्ष एकता के सूत्र में बंध सका। विभिन्न भाषाओं के होते एकता का कोई दूसरा सूत्र नहीं था।’

अनेक भारतीय विद्वानों ने भी अँग्रेजी शिक्षा एवं पश्चिम के सम्पर्क के महत्त्व को स्वीकार किया है। यह भी कहा जाता है कि भारतीय राष्ट्रवाद रूपी शिशु को पश्चिमी शिक्षा रूपी माँ ने दूध पिलाया किंतु यह कहना गलत होगा कि भारत में अँग्रेजी शिक्षा के अभाव में राष्ट्रीय आन्दोलन पैदा ही नहीं होता। क्रांति रूपी संग्राम के लिये जितनी आवश्यकता विचारों और शिक्षा की होती है, उससे अधिक आवश्यकता उन परिस्थितियों की होती है जिनके कारण आदमी संघर्ष करने और मरने-मारने पर उतारू हो जाता है।

(4.) पाश्चात्य सम्पर्क का प्रभाव

पश्चिमी देशों से भारतीयों का व्यक्तिगत सम्पर्क हो जाने से भारत में राष्ट्रीयता की तीव्र भावना जागृत हुई। अनेक भारतीय उच्च शिक्षा, व्यापार, पर्यटन एवं अन्य कारणों से इंग्लैण्ड तथा यूरोप के कई देशों में जाते थे। वे वहाँ के स्वतन्त्र वातावरण से अत्यधिक प्रभावित होते थे और उनमें वहाँ की प्रजातांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान एवं आकर्षण उत्पन्न होता था। जब वे पुनः भारत आते और यूरोपीय देशों की स्थिति से अपने देश की स्थिति की तुलना करते तो उनके मन में तीव्र असन्तोष होता था। इस असन्तोष ने भारतीयों को राष्ट्रीय आन्दोलन के लिये अग्रसर किया।

(5.) गैर-सरकारी अँग्रेजों की भूमिका

1857 ई. से पहले अनेक गैर-सरकारी अँग्रेज भारत आये। ये अँग्रेज ब्रिटेन के औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग की प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित थे और उसका प्रतिनिधित्व करते थे। ये लोग भारत में वकील, शिक्षक, पत्रकार आदि बन कर आये थे। कम्पनी सरकार के अधिकारी इन्हें तिरस्कार-वश इण्टर-लोफर (अनधिकार प्रवेशकारी) कहते थे।

इन अँग्रेजों का कई बातों पर कम्पनी के अधिकारियों से वाद-विवाद होता रहता था। इन्हीं लोगों ने कुछ प्रमुख भारतीयों के साथ मिलकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के विरुद्ध आन्दोलन चलाने के लिए लैण्ड होल्डर्स सोसाइटी (1838 ई.), ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी (1839 ई.) और बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी (1843 ई.) जैसे प्रभावशाली संगठन स्थापित किये थे।

इन संगठनों द्वारा चलाये गये आन्दोलनों से भारतीयों को ब्रिटिश सरकार से अच्छा प्रशासन, राजनीतिक अधिकार एवं स्वतंत्रता प्राप्त करने की प्रेरणा मिली।

(6.) यूरोपीय विद्वानों द्वारा भारतीय संस्कृति की प्रशंसा

 मैक्समूलर, मोनियर विलयम्स, रौथ, सैसून, बुनर्फ आदि अनेक यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का गहन अध्ययन किया और उन्होंने समस्त विश्व को भारतीय संस्कृति की उच्चता से अवगत कराया। पश्चिमी विद्वानों ने प्राचीन भारतीय साहित्य, धर्म और संस्कृति के सम्बन्ध में शोध करके विश्व के सम्मुख भारतीयों के राजनैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास का समृद्ध चित्र प्रस्तुत किया।

इन अनुसन्धानों के परिणाम स्वरूप भारत की प्राचीन आध्यात्मिक श्रेष्ठता और दैदीप्यमान सभ्यता के चिन्ह भारतीयों के समक्ष आए। इससे भारतीयों का आत्म विश्वास तथा आत्माभिमान बढ़ा और उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना ने जोर पकड़ा।

आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘वह खोज भारतीयों के हृदय में चेतना उत्पन्न करने में असफल नहीं हो सकती थी जिसके परिणाम स्वरूप उनके हृदय राष्ट्रीयता की भावना और तीव्र देशभक्ति से भर गये।’

(7.) जातीय विभेद की नीति

1858 ई. में महारानी विक्टोरिया की घोषणा में भारतीयों को योग्यतानुसार सरकारी नौकरियाँ दिये जाने का आश्वासन दिया गया था किन्तु इस घोषणा पर अमल नहीं करके, इस घोषणा का ठीक उलटा किया गया। शासकीय क्षेत्र में भारतीयों को उच्च पदों से वंचित करने, उन्हें अयोग्य घोषित करने तथा उनके प्रति रंगभेद बरतने पर अधिक बल दिया गया।

1869 ई. में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इण्डियन सिविल सर्विसेज की परीक्षा उत्तीर्ण की परन्तु एक साधारण अँग्रेज क्लर्क की शिकायत पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। जबकि इससे भी गम्भीर भूलें करने वाले अँग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं होती थी।

इस घटना के सम्बन्ध में स्वयं बनर्जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘मेरे मामले ने भारतीयों के हृदय में भारी क्षोभ उत्पन्न कर दिया, उनमें यह विचार फैल गया कि यदि मैं भारतीय न होता तो मुझे इतनी कठिनाइयाँ नहीं उठानी पड़तीं।’

1877 ई. में अरविंद घोष ने यह परीक्षा उत्तीर्ण की किंतु घुड़सवारी में उनकी अकुशलता की आड़ लेकर सरकार ने उनकी छंटनी कर दी।

किसी भी भारतीय न्यायाधीश को अँग्रेजों के मुकदमे सुनने का अधिकार नहीं था। एक ही अपराध के लिए भारतीयों व अँग्रेजों के लिए दण्डविधान में भी अन्तर था।

सर थियोडोर मोरिसन के अनुसार- ‘भारत में घोर अदालती पापाचार है। यह एक निन्दनीय सत्य है जिसे छिपाया नहीं जा सकता। अँग्रेज भारतीयों की हत्या बारम्बार करते हैं।’

एक बार एक अँग्रेज सैनिक ने एक भारतीय रसोइये को इसलिए मार डाला कि वह उसके लिए एक भारतीय स्त्री न ला सका। अँग्रेजों ने अकारण ही अनेक भारतीयों की हत्याएँ कीं परन्तु उन्हें किसी प्रकार की सजा नहीं मिली।

हेनरी कॉटन ने लिखा है– ‘यदि चाय के रोपक पर किसी असहाय कुली को निर्दयता पूर्वक पीटने का अभियोग चलाया जाता तो उसका निर्णय करने के लिए चाय के रोपकों की जूरी बनाई जाती थी। यह जूरी स्वाभाविक रूप से अभियुक्त के पक्ष में होती थी। यदि किसी कारण से दोष सिद्ध हो जाता तो अँग्रेजों का सारा जनमत उस निर्णय की निन्दा करता। आंग्ल-भारतीय समाचार पत्र इस विरोध को प्रकट करते थे। अपराधी के लिए चन्दा एकत्रित करते थे। प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा स्मरण-पत्र तैयार किये जाते तथा उनमें अपराधी के छुटकारे के लिए निवेदन किया जाता था।’

गैरेट ने लिखा है- ‘भारतीय राष्ट्रीयता के उत्थान का प्रमुख कारण यूरोपियन एवं भारतीयों के मध्य जातीय कटुता थी। भारतीयों में असन्तोष फैलने और अँग्रेजों का विरोध करने का प्रमुख कारण भारतीयों से किया गया दुर्व्यवहार था।’

वस्तुतः भारत में अँग्रेज शासकों ने भेदभाव की नीति को अपनाया। इस जाति-विभेद नीति के पीछे अँग्रेजों की निश्चित मान्यताएं काम कर रही थीं। इनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

(1.) अँग्रेजों का मानना था कि भारतीय केवल भय और दण्ड की भाषा को ही समझ सकते हैं।

(2.) अँग्रेजों का मानना था कि एक यूरोपियन का जीवन अनेक भारतीयों के बराबर है।

(3.) अँग्रेजों का मानना था कि अँग्रेज, असभ्य भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये भारत में आये हैं।

इस प्रकार की विकृत मनोवृत्ति के कारण ही भारतीयों को बारम्बार हीन ठहराया जाता था। अँग्रेजों के निवास स्थान भारतीय निवास-स्थानों से बिल्कुल पृथक् थे। उनके साथ रेल-यात्रा, रेस्टोरेन्ट आदि स्थानों पर दुर्व्यवहार किया जाता था।

जाति-विभेद की नीति और न्यायिक मामलों में भेद-भाव के कारण जातीय कटुता में वृद्धि होती चली गई। अँग्रेजों के प्रति भारतीयों के मन में घृणा की भावना जागृत हो गई। इस भावना ने राष्ट्रीय आन्दोलन को गति प्रदान की।

(8.) कर-विरोधी आन्दोलनों का प्रभाव

1859 से 1875 ई. के दौरान अनेक कर-विरोधी आन्दोलन हुए। इन आंदोलनों ने राष्ट्रीयता के विकास में योगदान दिया। सरकारी खर्च को पूरा करने के लिए 1859 ई. में ब्रिटिश सरकार की तरफ से व्यापार, वकालत, डाक्टरी आदि व्यवसाय करने वाले लोगों पर लाइसेंस टैक्स का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।

गैर-सरकारी अँग्रेजों तथा भारतीयों ने इस विधेयक का जोरदार विरोध किया। इस कारण सरकार ने यह विधेयक वापस ले लिया और उसकी जगह आयकर का प्रस्ताव रखा। आयकर के विरोध में भी देशव्यापी आन्दोलन हुआ। सरकार ने आन्दोलन के प्रमुख नेताओं को बंदी बना कर उन पर भारी जुर्माना लगाया।

सरकारी दमन से आन्दोलन तो दब गया परन्तु सरकार की साख खराब हुई तथा भारतीयों में एकता बढ़ गई। पश्चिम उत्तर प्रदेश के महाजन, बनारस के पंडित, बम्बई के साहूकार, तंजौर के सूदखोर और मलाबार के मोपाला व्यापारी, मांग बुलन्द करने लगे कि आयकर वापस लिया जाये। आयकर विरोधी आन्दोलन ने ब्रिटिश भारत की देशी जातियों को एकता का एक साझा मंच दे दिया।

(9.) स्वदेशी आन्दोलन का प्रभाव

भारत को सार्वजनिक रूप से, स्वदेशी अपनाने का विचार देने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती थे। उन्नीसवीं सदी के सातवें और आठवें दशक में पैदा हुआ स्वदेशी आन्दोलन, राष्ट्रीय आन्दोलन का ही अंग था। इस आन्दोलन का नेतृत्व मध्यम वर्ग ने किया। इसके अन्तर्गत स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की आवाज उठाई गई।

बंगाल में इस आन्दोलन का नेतृत्व राजनारायण बसु तथा नवगोपाल मित्र ने किया। उन लोगों ने 1867 ई. से प्रतिवर्ष स्वदेशी मेला लगाना आरम्भ किया जिसे हिन्दू मेला या राष्ट्रीय मेला कहा जाता था। इस प्रकार के मेलों के आयोजन का उद्देश्य देशी उद्योग-धन्धों को प्रोत्साहन देना और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की भावना का विकास करना था।

पंजाब में स्वदेशी आन्दोलन को रामसिंह कूका और उनके नामधारी सिक्खों ने नेतृत्व प्रदान किया। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाया तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया। महाराष्ट्र में इस आन्दोलन का नेतृत्व गणेश वासुदेव जोशी ने किया। इस आन्दोलन के अन्तर्गत महाराष्ट्र के कई शहरों में देशी उद्योगों के प्रोत्साहन के लिए समितियां बनाई गईं। इन समितियों के सदस्य अपने दैनिक जीवन में देशी वस्तुओं के इस्तेमाल की शपथ लेते थे।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने एक प्रतिज्ञा-पत्र छपवाया- ‘हम लोग आज से कोई विलायती कपड़ा नहीं पहनेंगे………. हिन्दुस्तान का बना कपड़ा ही पहनेंगे।’

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके मित्रों ने इस सम्बन्ध में लोकगीतों की रचना भी की और इनके माध्यम से लोगों में स्वदेशी वस्तुओं के प्रति लगाव की भावना उत्पन्न करने का प्रयास किया। उत्तरी भारत में भी स्वदेशी अपनाई जाने लगी।

23 दिसम्बर 1905 को टाइम्स ऑफ इण्डिया में एक समाचार छपा- ‘डेरा इस्माइल खाँ में एक स्वदेशी वस्तु भण्डार खोला गया जिसमें 50 हजार की पूंजी लगी है। इसका एक शेयर 20 रुपये का है जो बिक रहा है …..।’

कलकत्ता के रिपन कॉलेज में एक परीक्षा के दौरान छात्रों ने विदेशी कागज वाली उत्तर पुस्तिकाओं को छूने से मना कर दिया। उन्हें देशी कागज से बनी कॉपियां दी गईं। ऐसी घटनाएं पूरे देश में होने लगीं। लोगों ने विदेशी खिलौनों और विदेशी दवाओं तक का बहिष्कार कर दिया।

(10.) सिविल सर्विस आन्दोलन

ब्रिटिश शासित क्षेत्रों में नागरिक प्रशासन का दायित्व इण्डियन सिविल सर्विस के अधिकारियों को सौंपा गया। भारतीयों को इस सेवा से दूर रखा गया। यद्यपि 1858 ई. की महारानी की घोषणा में यह आश्वासन दिया गया था कि भारत में किसी भी पद पर नियुक्ति देने में अँग्रेजों और भारतीयों के बीच भेदभाव नहीं किया जायेगा।

इस आश्वासन के उपरांत यह सावधानी बरती गई कि कोई भी भारतीय इसमें न चुना जाये। 1861 ई. में यह व्यवस्था की गई कि कोई भी भारतीय 22 वर्ष की आयु-सीमा तक लन्दन जाकर सिविल सर्विस की परीक्षा में बैठ सकता है। आम भारतीय के लिये लन्दन जाना सम्भव नहीं था, अतः भारतीयों ने मांग की कि सिविल परीक्षा के केन्द्र लन्दन के साथ-साथ कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में स्थापित किये जायें।

सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। 1863 ई. में सत्येन्द्रनाथ टैगोर ने लन्दन जाकर परीक्षा दी और उत्तीर्ण हो गये। एक भारतीय द्वारा सिविल सर्विस परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने पर, सिविलि सर्विस की परीक्षा के विषयों में परिवर्तन किया गया और 1866 ई. में अधिकतम आयु-सीमा को घटाकर 21 वर्ष कर दिया गया ताकि भारतीयों के लिए पीरक्षा उत्तीर्ण करना और कठिन हो जाये।

1869 ई. में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सहित चार भारतीयों ने परीक्षा में सफलता प्राप्त की। इस पर ब्रिटिश सरकार ने 1877 ई. में परीक्षा देने की आयु सीमा घटाकर 19 वर्ष कर दी तथा सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को अन्याय पूर्ण ढंग से नौकरी से निकाल दिया।

सिविल सेवा परीक्षा में बैठने की आयु सीमा 19 वर्ष किये जाने पर सारे भारत में एक प्रबल आन्दोलन चला जो सिविल सर्विस आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध है। इस आन्दोलन का नेतृत्व इण्डियन एसोसिएशन ने किया। कलकत्ता, बम्बई, सूरत, पूना, लाहौर, अमृतसर, मेरठ, दिल्ली, आगरा, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद और मद्रास के बुद्धिजीवियों ने इस आन्दोलन का समर्थन किया।

(11.) स्थानीय स्वायत्त शासन में भारतीयों का प्रवेश

स्थानीय स्वायत्त शासन आन्दोलन ने राष्ट्रीय जागृति में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। ब्रिटिश शासकों ने भारतीयों से नाना प्रकार के करों की वसूली के उद्देश्य से नगर पालिकाओं की स्थापना की थी। भारतीयों ने आरम्भ में तो विभिन्न करों के कारण इनका विरोध किया और बाद में इन संस्थाओं में प्रवेश पाने का प्रयास किया ताकि सरकारी नीतियों का विरोध किया जा सके।

अतः समस्त देश में नगर पालिकाओं के लिए चुनावों की मांग की गई। 1870 ई. के बाद बहुत सी नगर पालिकाओं में चुनावों को आंशिक तौर पर स्वीकार कर लिया गया। इण्डियन एसोसिएशन आदि राजनीतिक संस्थाओं ने इन आंदोलनों को चलाया जिनका नेतृत्व मध्यम वर्ग के लोगों ने किया। इस कारण भारतीय राजनीति में मध्यम वर्ग हावी होने लगा। आगे चलकर इसी मध्यम वर्ग ने राष्ट्रीय आन्दोलन चलाया।

(12.) राजनीतिक एवं प्रशासनिक एकता

मुगल सल्तनत के पतन के बाद भारत सैंकड़ों राज्यों में विभक्त हो गया था। अँग्रेजों ने इन राज्यों के शासकों को अपने अधीन करके काश्मीर से कन्याकुमारी तक और बिलोचिस्तान से बर्मा तक सम्पूर्ण भारत को अँग्रेजी शासन के अधीन कर लिया। सम्पूर्ण ब्रिटिश शासित क्षेत्र में एक जैसी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की गई।

डाक व्यवस्था, तार व्यवस्था, रेल परिवहन, सड़क परिवहन आदि व्यवस्थाओं के आरम्भ होने से देश के प्रशासन में एकरूपता आयी और देश एक दिखाई देने लगा। इस एकरूपता से आम भारतीय में एक विशाल देश का नागरिक होने का भाव जागृत हुआ।

जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘ब्रिटिश प्रशासन द्वारा स्थापित भारत की राजनैतिक एकता, साम्राज्यिक दासता की एकता थी किन्तु उसने सामान्य राष्ट्रीयता की एकता को जन्म दिया।’

(13.) आर्थिक शोषण का प्रभाव

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय कुटीर उद्योगों, दस्तकारों एवं काश्तकारों की  कमर पहले ही तोड़ दी थी। 1857 की क्रांति के बाद भी ब्रिटिश हितों को ध्यान में रखकर आर्थिक नीति अपनाई गई। इस कारण भारतीय कुटीर उद्योग, काश्तकार एवं दस्तकार कभी नहीं पनप सके। अकालों ने समस्या को और बढ़ा दिया।

इससे भारत में बेरोजगारी की समस्या विकराल हो गई। 1857 ई. के बाद भारत में तैयार माल को इंग्लैण्ड ले जाना बंद कर दिया गया तथा केवल कच्चा माल ले जाया जाने लगा। भारत में तैयार माल के निर्यात पर इतने अधिक कर लगाये गये कि यदि वह विदेशों में ले जाया जाये तो वहाँ आसानी से बिकने न पाये।

साथ ही इंग्लैण्ड में तैयार माल पर नाममात्र का कर रखा गया। करों के इस अंतर के कारण भारतीय माल भारत में भी खपना बंद हो गया।

होरेस विल्सन ने लिखा है- ‘पेल्सी और मैनचेस्टर के कारखाने भारत के हस्त-उद्योगों का बलिदान करके बनाये गये।’

सर विलियम डरबी ने लिखा है- ‘भारत में लगभग दस करोड़ मनुष्य ऐसे हैं जिन्हें किसी भी समय पेट भर अन्न नहीं मिल सकता। ऐसे पतन का दूसरा दृष्टान्त इस समय किसी सभ्य और उन्नतिशील देश में कहीं पर भी दिखाई नहीं देता।’

ड्यूक ऑफ आरागील्ड ने लिखा है- ‘भारत की जनता में दरिद्रता है। रहन-सहन का स्तर तेजी से गिरता जा रहा है। उसका उदाहरण कहीं नहीं मिलता।’

भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द ने भी अपनी कविताओं में इस सत्य को अंकित किया है– ‘अँग्रेज राज सुख साज सजे महाभारी। पै धन विदेश चलि जाये यह है दुःख भारी।’

डी. ई. वाचा ने लिखा है- ‘भारतीयों की आर्थिक स्थिति ब्रिटिश शासन काल में अधिक बिगड़ी थी। चार करोड़ भारतीयों को केवल दिन में एक बार के भोजन से सन्तुष्ट रहना पड़ता था। इसका एकमात्र कारण यह था कि भारत भूखे किसानों से कर प्राप्त करता था तथा इंग्लैण्ड अपना माल भेजकर लाभ कमाता था।’

भारत के आर्थिक शोषण ने भारतीयों में राजनैतिक चेतना जागृत की। राष्ट्रीय आन्दोलन में इन्हीं भूखे किसानों ने प्रमुख भूमिका का निर्वहन किया।

(14.) यातायात तथा संचार के साधनों का विकास

यातायात तथा संचार के साधनों का विकास होने से भारतीय नागरिकों के बीच तेजी से सम्पर्क स्थापित होने लगा। इससे वैचारिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिला। लोग अपनी और अपने देश की दुर्दशा पर बात करने लगे। अपने-अपने क्षेत्रों में किये जा रहे शोषण एवं संघर्षों की बात करने लगे।

लोग एक दूसरे को अपने देश का व्यक्ति समझने की भावना से भी परिपूर्ण होग गये। इससे राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ। लोगों में पनपी इस भावना के कारण राष्ट्रीय नेताओं के लिए प्रचार कार्य सुगम हो गया। इन विकसित साधनों के कारण ही सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सिविल सर्विस आन्दोलन के दौरान भारत के अधिकांश क्षेत्रों का दौरा करके उसे अखिल भारतीय रूप दे पाये।

घोड़े की पीठ पर बैठकर पूरे भारत का दौरा करना संभव नहीं था। डाक-व्यवस्था से राष्ट्रवादियों का एक-दूसरे से पत्र-व्यवहार सुगम और तेज हो गया। इस कारण राजनैतिक विचारों का तेजी से प्रसार हुआ तथा बड़े-बड़े आंदोलनों की भूमिका बनने लगी। आंदोलनों को चलाने के लिये संस्थाओं को खड़ा करने का काम भी इन संचार एवं परिवहन साधनों ने सुगम कर दिया।

(15.) विदेशी आन्दोलनों का प्रभाव

उन्नीसवीं शताब्दी में इटली, जर्मनी, फ्रांस और अमेरिका आदि देशों में कई राजनीतिक आन्दोलन हुए। कई देशों के स्वतन्त्रता संग्राम लड़े गये। आन्दोलनों ने भारतीयों में भी उत्साह का संचार किया। इटली के राष्ट्रीय नेता मैजिनी का युवा भारतीयों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा।

मैजिनी ने इटली को एकता एवं राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाया था। इटली के कारबोनरी नामक संगठन का अनुकरण करते हुए 1870 ई. के बाद बंगाल में अनेक क्रांतिकारी गुप्त संगठन स्थापित हुए। इटली के एक अन्य नेता गेरीबाल्डी के साहसिक कार्यों ने भी युवा भारतीयों विशेषकर क्रान्तिकारियों को अत्यधिक प्रभावित किया। 1871 ई. में फ्रांस में तृतीय गणराज्य की स्थापना का भी भारत के राष्ट्रवादियों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

(16.) समाचार पत्रों का योगदान

भारतीय समचार-पत्र ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी एवं साम्राज्यवादी नीतियों के कटु आलोचक थे। समचार पत्रों ने अँग्रेज सरकार से भारतीयों के साथ समानता का व्यवहार करने तथा न्यायपूर्ण आचरण करने की मांग की। भारत में सबसे पहला समाचार पत्र 1780 ई. में बंगाल गजट प्रकाशित हुआ। यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र था।

इसके बाद कलकत्ता गजट और द इण्डियन वर्ल्ड आदि पत्र आरम्भ हुए। 1857 की क्रान्ति के पूर्व के समाचार पत्रों में राजा राममोहन राय का संवाद कौमुदी (1821 ई.), फार्दनजी मुर्जबान का बॉम्बे समाचार (1822 ई.), तथा अन्य पत्रों में बंगदूत, रास्तगुफतार आदि उल्लेखनीय हैं।

1857 ई. के बाद भारतीय पत्रकारिता का तीव्र गति से विकास हुआ। समाचार पत्रों की संख्या, प्रसार संख्या और प्रभाव क्षेत्र में अत्यधिक वृद्धि हुई। इनमें इण्डियन मिरर, बम्बई समाचार, अमृत बाजार पत्रिका, द हिन्दू, दी केसरी, टाइम्स ऑफ इण्डिया, स्टेट्समेन, मद्रास मेल, ट्रिब्यून आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।

1870 ई. तक भारत में 644 समाचार पत्र निकलने लगे थे। इनमें से 400 से अधिक समाचार पत्र देशी भाषाओं में थे। फिलियन्स के अनुसार 1877 ई. में देशी भाषाओं में बम्बई देश-विभाग और उत्तर भारत से 62, बंगाल से 28 और दक्षिण भारत से 20 समाचार पत्र प्रकाशित होते थे जिनके नियमित पाठकों की संख्या एक लाख से अधिक थी।

देशी भाषाओं के समाचार पत्रों में सरकारी नीतियों की तीव्र आलोचनाएँ होती थी। इस कारण समाचार पत्रों के प्रति सरकारी दृष्टिकोण कठोर होता गया। इन समाचार पत्रों ने भारतीय जनता को अहसास कराया कि ब्रिटिश साम्राज्य भारतीय जनता को नैतिक, आर्थिक और मानसिक पतन की ओर ले जा रहा है।

1878 ई. में गवर्नर जनरल लॉर्ड लिटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित करके इन समाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। भारतीयों ने उसके इस कदम का कड़ा विरोध किया। 1882 ई. में लॉर्ड रिपन ने इस एक्ट को रद्द किया। इस प्रकार भारत में राष्ट्रीय चेतना विस्तृत करने में समाचार पत्रों का बहुत बड़ा योगदान रहा।

(17.) राष्ट्रीय साहित्य

राष्ट्रीय भावनाओं को जगाने में उन्नीसवीं सदी के साहित्यकारों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। साहित्यकारों ने नाटकों, उपन्यासों, लेखों एवं कविताओं आदि के माध्यम से भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने का कार्य किया। भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में राष्ट्रीय साहित्य का जन्म हुआ जिसने आम भारतवासी को राष्ट्रीयता का महत्त्व समझाया।

भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र (1850-1884 ई.) उन्नीसवीं सदी में स्वदेशी आन्दोलन के अग्रदूत थे। उन्होंने भारत दुर्दशा नाटक में भारत की दुर्दशा का वर्णन करके लाखों भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जागृत की। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से अँग्रेजी छल-कपट और मायाजाल का उग्र शब्दों में वर्णन किया-

भीतर भीतर सब रस चूसे, बाहर से तन मन धन मूसै।

जाहिर बातन में अति तेज, क्यों सखि, सज्जन नहीं अंगरेज।।

भारतेन्दु के समकालीन कवियों बदरी नारायण चौधरी और प्रताप नारायण मिश्र की रचनाएँ भी देश-प्रेम से ओत-प्रोत थीं। दीनबन्धु मित्र द्वारा रचित नील दर्पण ने भारतीयों को स्वदेश-प्रेम का संदेश दिया। बंगला और मराठी भाषाओं में भी उच्चकोटि के राष्ट्रीय साहित्य का सृजन हुआ।

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के आनन्द मठ को देश-प्रेम और क्रान्तिकारियों की गीता कहा जाता है। शरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय की रचनाओं ने प्राचीन भारत के गौरव को प्रदर्शित किया।

नर्मद ने गुजराती भाषा में, चिपलूणकर ने मराठी भाषा में और सुब्रमण्यम भारती ने तमिल भाषा में राष्ट्रीयता की भावना से परिपूर्ण साहित्य की रचना कर देशवासियों को स्वतंत्रता प्राप्ति हेतुे संघर्ष करने के लिये प्रेरित किया। मुहम्मद हुसैन आजाद और ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली की उर्दू रचनाओं में देश-भक्ति की चेतना निहित थी।

(18.) किसानों के सशस्त्र विद्रोह

19वीं सदी में भारतीय किसानों ने अँग्रेज सरकार तथा उसके द्वारा पोषित जमींदारों, साहूकारों तथा सूदखोरों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाया। इस संघर्ष ने भारत में राष्ट्रीय चेतना का संचार करने में बहुत बड़ा योगदान दिया।

उन्नीसवीं सदी के किसान आंदोलनों में नील विद्रोह (1859-61 ई.), जयंतिया विद्रोह (1860-63 ई.), कूकी विद्रोह (1860-90 ई.), फूलागुडी का बलवा (1861 ई.), कूका विद्रोह (1869-72 ई.), पवना का किसान विद्रोह (1872-73 ई.), महाराष्ट्र के किसानों का विद्रोह (1875 ई.), पूना में वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में विद्रोह (1879 ई.) और रंपा विद्रोह (1879-80 ई.) प्रमुख हैं।

किसान आंदोलनों ने आम भारतीयों का ध्यान किसानों की दुर्दशा की ओर खींचा। इससे लोगों में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असन्तोष की अग्नि और तेज हुई।

(19) लॉर्ड लिटन की प्रतिक्रियावादी नीति

लॉर्ड लिटन (1876-80 ई.) के अन्यायपूर्ण शासन ने लोगों को अँग्रेजों के विरुद्ध एकजुट होने के लिये प्रेरित किया। लिटन की साम्राज्यवादी नीतियों ने शिक्षित भारतीयों को भीतर तक क्रोधित कर दिया। लिटन ने भारतीय सिविल सर्विस में प्रवेश की आयु-सीमा 21 वर्ष से कम करके 19 वर्ष कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

इससे भारतीयों के लिए इस परीक्षा में सम्मिलित होना अत्यन्त कठिन हो गया। इससे भारतीयों में रोष फैला। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इसका घोर विरोध किया तथा समूचे देश को इसके विरुद्ध संगठित करने का प्रयास किया। लिटन द्वारा पारित शस्त्र-अधिनियम ने भारतीयों को अत्यधिक उत्तेजित किया।

इस अधिनियम द्वारा भारतीयों को बिना लाईसेन्स के शस्त्र रखने की मनाही कर दी गई परन्तु इस अधिनियम को यूरोपीय लोगों पर लागू नहीं किया गया। भारतीयों ने इस कार्य को बड़ा अपमानजनक समझा  क्योंकि इस अधिनियम ने भारतीय जनता से आत्मरक्षा का अधिकार छीन लिया। 1878 ई. में लिटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस-अधिनियम पारित किया जिसका उद्देश्य प्रेस की स्वतन्त्रता समाप्त करना था। लिटन के इस कार्य की भारत तथा इंग्लैण्ड में तीव्र आलोचना हुई।

लॉर्ड लिटन के समय भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। दुर्भिक्ष काल में ब्रिटिश शासन द्वारा भारतीयों के प्रति अपनाई गई गलत नीति के कारण लाखों लोग मर गये। जब भारतीय जनता भूख से तड़प रही थी तब ब्र्रिटिश सरकार ने  भारत से 80 लाख टन अन्न का दूसरे देशों में स्थित अँग्रेजी मोर्चों को भेज दिया।

यह भारतीयों के साथ किसी क्रूरता से कम नहीं था। 1 जनवरी 1877 को लिटन द्वारा दिल्ली दरबार का आयोजन करना, भारतीयों को चिढ़ाने के लिये पर्याप्त था। दरबार को भव्य बनाने के लिये धन को पानी की तरह बहाया गया।

इस सम्बन्ध में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा- ‘यदि एक स्वेच्छाचारी वायसराय की प्रशंसा के लिए देश के राजा तथा अमीर-उमरावों को एकत्र होने के लिए बाध्य किया जा सकता है तो देशवासियों को न्याय संगत ढंग से स्वेच्छाचारिता को रोकने के लिए क्यों नहीं संगठित किया जा सकता।’

लिटन की अफगान नीति के कारण द्वितीय अफगान युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध का भारत की सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं था किंतु भारतीय जनता को इस युद्ध का सारा खर्च उठाना पड़ा। इससे असन्तोष तीव्र हो गया। लॉर्ड लिटन ने कपास सीमा-शुल्क समाप्त कर दिया जिससे भारतीय कोष को हानि पहुँची।

लिटन के कार्यों से भारतीयों को पक्का विश्वास हो गया कि उसके हृदय में भारतीयों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है। भारतीयों को यह भी अनुभव हुआ कि अँग्रेजों का प्रबल विरोध करने के लिये भारतीयों को एक देशव्यापी संगठन की आवश्यकता है।

सर विलियम वेडरवर्न ने लिखा है- ‘लॉर्ड लिटन के शासन काल के अन्त में स्थिति विद्रोह की सीमा तक पहुँच गई थी।’

उन्हीं दिनों पूना के मिलिट्री एकाउण्ट्स ऑफिस के बाबू वासुदेव बलवंत राव फड़के के दल द्वारा घोषणा की गई कि यदि कोई व्यक्ति बम्बई के गवर्नर रिचर्ड टेम्पुल का सिर काटकर लायेगा तो उसे 500 रुपये का पुरस्कार दिया जायेगा।

(20.) इल्बर्ट बिल विवाद

अब तक भारत की तीनों ब्रिटिश प्रेसीडेन्सियों को छोड़कर अन्य कहीं भी अँग्रेजों के विरुद्ध अभियोगों की सुनवाई केवल अँग्रेज न्यायाधीश ही कर सकते थे।  भारतीय न्यायाधीश किसी भी अँग्रेज के विरुद्ध फौजदारी अभियोग की सुनवाई नहीं कर सकते थे।

लॉर्ड रिपन के समय तक अनेक भारतीय सेशन जज बन चुके थे किन्तु वे अँग्रेजों के विरुद्ध अभियोगों की सुनवाई नहीं कर सकते थे। लॉर्ड रिपन की कौंसिल के विधि सदस्य सी. पी. इल्बर्ट ने रिपन के आदेश से एक विधेयक प्रस्तुत किया जिसमें भारत में रहने वाले यूरोपियनों के विरुद्ध अभियोगों की सुनवाई करने का अधिकार भारतीय न्यायधीशों तथा मजिस्ट्रेटों को देने की व्यवस्था थी।

इस विधेयक से भारत स्थित समस्त यूरोपीय लोगों में खलबली मच गई। अँग्रेजों ने इसे काला कानून कहा। उन्होंने इस विधेयक को अपना जातीय अपमान समझा और इसके विरुद्ध आन्दोलन चलाने के लिए एंग्लो-इण्डियन डिफेन्स एसोसिएशन का गठन करके डेढ़ लाख रुपयों से अधिक का चन्दा एकत्रित किया।

भारत स्थित अधिकांश गैर-सरकारी अँग्रेज भी इस विरोध में सम्मिलित हो गये। उन्होंने अपने प्रतिनिधि इंग्लैण्ड भेजे और रिपन को वापस बुलाने की मांग की। भारत में रह रहे अँग्रेजों ने यह भी धमकी दी कि यदि बिल वापिस नहीं लिया गया तो रिपन को बलपूर्वक जहाज में बैठाकर इंग्लैण्ड के लिये पार्सल कर दिया जायेगा।

बहुत से अँग्रेजों का मानना था कि गोरी जाति का अपमान करने के लिए भारतीय काले न्यायाधीश उनको कठोर सजा देंगे। जबकि अन्य अँग्रेजों को कहना था कि भारतीय न्यायाधीश, गोरे अभियुक्तों को सजा देने के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

भारतीयों ने पहली बार संयुक्त रूप से सरकार के समर्थन में (अर्थात् इल्बर्ट बिल के पक्ष में) जबरदस्त आन्दोलन चलाया परन्तु गोरों के आन्दोलन से परास्त होकर लॉर्ड रिपन को इल्बर्ट विधेयक में संशोधन करना पड़ा। यह निश्चित किया गया कि केवल यूरोपियन जिलाधीश व सेशन जज ही यूरोपियन अपराधियों के मुकदमे सुनने के अधिकारी होंगे।

यूरोपियन अपराधियों को अपने फैसले के लिए जूरी बैठाने की मांग करने का अधिकार दिया गया। इस जूरी में कम से कम आधे सदस्य यूरोपियन होने आवश्यक थे।

इल्बर्ट बिल के विरुद्ध यूरोपीय समुदाय के संगठित विरोध ने भारतीयों की आँखें खोल दीं। भारतीय नेताओं ने अनुभव किया कि यदि राजनीतिक प्रगति वांछनीय है तो वह केवल एक राष्ट्रीय संस्था द्वारा ही सम्भव है। उन्हें विश्वास हो गया कि जब तक वे विदेशी शासन के अन्तर्गत हैं तब तक उन्हें यह भेदभाव और अन्याय सहना ही पडे़गा।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने लिखा है- ‘कोई भी स्वाभिमानी भारतीय आँख मून्द कर सुस्त नहीं बैठा रह सकता। जो इल्बर्ट बिल-विवाद महत्त्व को समझते थे उनके लिए यह देशभक्ति का महान् आह्वान था।’

इल्बर्ट बिल की घटना ने भारतीय शिक्षित वर्ग को संगठित कर राजनैतिक आन्दोलन की आवश्यकता से परिचित कराया। भारतीय राष्ट्रीयता के विकास में इल्बर्ट बिल के योगदान की चर्चा करते हुए हेनरी कॉटन ने लिखा है- ‘इस विधेयक के विरोध में किए गए यूरोपियन आन्दोलन ने भारत की राष्ट्रीय विचारधारा को जितनी एकता प्रदान की उतनी तो विधेयक पारित होने पर भी नहीं होती।’

आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘भारतीयों ने अनुभव किया कि यदि राजनैतिक प्रगति करनी है तो उसे केवल एक राष्ट्रीय संस्था से ही प्राप्त किया जा सकता है। इस संस्था का सम्बन्ध विभिन्न प्रान्तों की स्वतन्त्र राजनीति से न होकर देश की एक व्यापक राजनीति से होना चाहिए।’

इसी भावना ने अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

(21.) कांग्रेस के पूर्व की संस्थाओं का योगदान

कांग्रेस के पूर्व स्थापित विभिन्न संस्थाओं ने भी भारतीय राष्ट्रीय चेतना को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 1850 ई. के पूर्व स्थापित संस्थाओं में कलकत्ता ट्रेड एसोसिएशन (1830 ई.), बंगाल चेम्बर ऑफ कामर्स (1834 ई.), लैंड होल्डर्स सोसायटी (1838 ई.), पैट्रियाटिक एसोसिएशन (1839 ई.), देश हितैषिणी सभा (1841 ई.) और बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसायटी (1843 ई.) के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

लैंड होल्डर्स सोसायटी की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। यह भारत के अँग्रेजों और भारतीय जमींदारों का संयुक्त संगठन था जिसका उद्देश्य वर्ण, जन्म, स्थान या धर्म का भेदभाव किये बिना जमींदारों के आम स्वार्थों की रक्षा करना था। बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसायटी भी भारतीयों और गैर-सरकारी अँग्रेजों का सम्मिलित संगठन था।

जब इसमें जमींदारी-प्रथा की आलोचना तथा किसानों के हितों पर चर्चाएँ होने लगीं तो बड़े जमींदार इस संगठन से अलग हो गये। अपने जनतांत्रिक कार्यक्रम के कारण इस संगठन को राजद्रोह के प्रचार का भागी होना पड़ा। पैट्रियाटिक एसोसिएशन की स्थापना कुछ भारतीयों और यूरेशियनों ने मिलकर की थी।

इसका उद्देश्य कम्पनी सरकार के अन्यायों के विरुद्ध आवाज उठाना था। देश हितैषिणी सभा का गठन भी इसी उद्देश्य को लेकर किया गया था इन संस्थाओं ने देश में राजनीतिक संघर्ष का मार्ग प्रशस्त किया।

1850 ई. के बाद देश में अनेक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना हुई जिनमें ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन (1851 ई.), बॉम्बे एसोसिएशन (1852 ई.), मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852 ई.), पूना दक्कन एसोसिएशन (1852 ई.), ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन (1866 ई.), पूना एसोसिएशन(1867 ई.), रेंटस्पेयर्श एसोसिएशन, बम्बई (1870), पूना सार्वजनिक सभा (1870 ई.), इण्डियन एसोसिएशन (1876 ई.), इण्डियन लीग (1875 ई.) उल्लेखनीय हैं। इन संस्थाओं ने राष्ट्रीय आंदोलनों के लिये विचार-भूमि तैयार करने में योगदान दिया।

ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन की स्थापना कलकत्ता में हुई। इस संस्था का उद्देश्य सरकारी विधियों और शासन कार्य की आलोचना करना और भारतीयों के लिए अधिकारों की आवाज उठाना था। यह संस्था अधिक समय तक नहीं चली। 1875 ई. में बंगाल के कुछ प्रगतिशील व्यक्तियों ने इण्डियन लीग की स्थापना की।

इसका उद्देश्य भारतीय जनता में राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ावा देना और उनमें राजनैतिक जागृति उत्पन्न करना था। 1876 ई. में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में इण्डियन एसोसिएशन की स्थापना हुई। राष्ट्रीयता के विकास में इस संस्था का सर्वाधिक योगदान रहा। इसने सम्पूर्ण भारत में सक्रिय राजनीतिक प्रचार का काम किया।

इस संस्था एक अन्य उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करना और सार्वजनिक आन्दोलनों में किसानों का सहयोग प्राप्त करना था। बम्बई में बदरूद्दीन तैयबजी और फिरोजशाह मेहता ने निष्क्रिय बॉम्बे एसोसिएशन को सजीव करने का प्रयास किया। महादेव गोविन्द रानाडे ने महाराष्ट्र में राजनैतिक जागृति उत्पन्न करने और समाज सुधार का कार्य करने के उद्देश्य से पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना की। इन्हीं उद्देश्यों से मद्रास में महाजन सभा की स्थापना हुई।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत में राजनीतिक चेतना की सर्व-प्रथम प्रेरणा समाज सुधारकों एवं धर्म-सुधारकों ने दी। उनके द्वारा चलाये गये आन्दोलनों से भारतीयों के हृदय में स्वाभिमान एवं राष्ट्रभक्ति का अंकुरण हुआ। अँग्रेजों की दमनात्मक कार्यवाहियों ने उस अंकुर को पल्लवित होने के लिये प्रेरित किया।

धीरे-धीरे अनेक राजनीतिक संगठनों की गतिविधियों ने राजनीतिक चेतना की भावना को विकसित किया। भारतीयों ने यह भी अनुभव किया कि राजनैतिक प्रगति एक राष्ट्रीय संगठन द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। इन्हीं भावनाओं ने 1885 ई. में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के लिये मार्ग प्रशस्त किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

कांग्रेस की स्थापना

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कांग्रेस की स्थापना

कांग्रेस की स्थापना से पहले कलकत्ता, मद्रास तथा बम्बई प्रेसीडेंसी में कई राजनीतिक संस्थाओं का उदय हुआ किंतु ये संस्थाएं स्थानीय हितों के लिये काम करती रहीं। सरकार के भय के कारण इन संस्थाओं के सदस्य, इन संस्थाओं को छोड़ जाते थे तथा इस कारण कई संस्थाएं दम तोड़ चुकी थीं।

इल्बर्ट बिल के बाद पूरे भारत में एक ऐसी संस्था की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी जो पूरे भारत की समस्याओं को एक साझा मंच दे सके। दिसम्बर 1884 में अड्यार नगर में थियोसाफिकल सोसायटी के वार्षिक अधिवेशन में देश के विभिन्न भागों से आये 17 प्रतिनिधि दीवान बहादुर रघुनाथराव के निवास पर एकत्रित हुए। इस बैठक में एक देशव्यापी संगठन स्थापित करने का निश्चय किया गया जिसके फलस्वरूप इण्डियन नेशनल यूनियन नामक एक संस्था स्थापित हुई।

1885 ई. में इण्डियन एसोसिएशन ने 25-27 दिसम्बर को अपनी दूसरी कान्फ्रेंस बुलाने का निश्चय किया और इसके लिए जोरदार तैयारियाँ कीं। इसी समय एलन ओक्टावियन ह्यूम और उसके मित्रों ने इण्डियन नेशनल यूनियन की तरफ से बम्बई में नेशनल कान्फ्रेंस बुलाने का निश्चय किया।

इसकी तिथि भी 25 दिसम्बर रखी गई। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और इण्डियन एसोसिएशन को इस सम्बन्ध में पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई। जब निर्धारित तिथि से कुछ दिनों पहले उन्हें इण्डियन एसोसिएशन के सम्मेलन को रद्द करने तथा बम्बई में होने वाले सम्मेलन में भाग लेने को कहा गया तो बनर्जी तथा उनके साथियों ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया।

इस पर ह्यूम तथा उसके साथियों ने अपने सम्मेलन का नाम और सम्मेलन की तिथि में परिवर्तन कर दिया। अब उसका नया नाम इण्डियन नेशनल कांग्रेस रखा गया और अधिवेशन की तिथि 28-30 दिसम्बर 1885 निश्चित की गई।

ए. ओ. ह्यूम और कांग्रेस की स्थापना

अखिल भारतीय स्तर पर संस्था बनाने का विचार अनेक भारतीय नेताओं के मस्तिष्क में था परन्तु इस दिशा में उठाए गये कदमों को व्यवहारिक रूप प्रदान करने का श्रेय अवकाश प्राप्त अँग्रेज अधिकारी ए. ओ. ह्यूम को है। इसीलिए ह्यूम को कांग्रेस का संस्थापक कहा जाता है।

माना जाता है कि ह्यूम ने सामाजिक सुधार आन्दोलन के लिए देशव्यापी संस्था की योजना पर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन से विचार-विमर्श किया। लॉर्ड डफरिन ने उसे इस संस्था का कार्यक्षेत्र बढ़ाने का सुझाव दिया। अर्थात् डफरिन ने ह्यूम के विचारों को राजनैतिक दिशा प्रदान की।

डफरिन ने कहा- ‘भारत में ऐसी कोई संस्था नहीं है जो इंग्लैण्ड के विरोधी दल की भाँति यहाँ भी कार्य कर सके और सरकार को यह बता सके कि शासन में क्या त्रुटियाँ हैं और उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है।’

ह्यूम द्वारा कांग्रेस की स्थापना किये जाने के सम्बन्ध में यह भी माना जाता है कि सरकारी पद पर रहते हुए ह्यूम ने कुछ गुप्त सरकारी रिपोर्टें देखी थीं।  उनसे उसे आभास हुआ कि भारतवासियों का बढ़ता हुआ असन्तोष किसी भी समय राष्ट्रीय विद्रोह का रूप धारण कर सकता है और इसका स्वरूप 1857 के विद्रोह से भी अधिक भयानक हो सकता है।

ब्रिटिश शासकों ने भारत को राष्ट्रीय आन्दोलन के मार्ग पर जाने से रोकने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जन्म दिया। 1884 ई. के अन्त में ह्यूम बम्बई गया तथा महाराष्ट्र व मद्रास के भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श करने के बाद मार्च 1885 में उसने एक राष्ट्रीय संस्था बनाने की योजना तैयार की।

उसकी इच्छा थी कि बम्बई के गवर्नर को इसका अध्यक्ष बनाया जाये परन्तु लॉर्ड डफरिन ने कहा- ‘गवर्नर को ऐसी संस्थाओं की अध्यक्षता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि उसकी उपस्थिति में लोग अपने विचार स्वतन्त्रता पूर्वक प्रकट नहीं कर सकेंगे।’

कांग्रेस की स्थापना से पहले ह्यूम इंग्लैण्ड गया और वहाँ उसने लॉर्ड रिपन, डलहौजी, ब्राइस आदि ब्रिटिश राजनीतिज्ञों से विचार-विमर्श किया। इंग्लैण्ड से वापस आकर ह्यूम ने नेशनल यूनियन का नाम बदल कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रखा। मई 1885 में ह्यूम ने पहला परिपत्र जारी किया जिसके माध्यम से उसने दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में देश के समस्त भागों के प्रतिनिधियों की एक सभा पूना में बुलाई। इस परिपत्र में उसने इस सभा के दो उद्देश्य बताये-

(1.) राष्ट्र की प्रगति के कार्य में लगे लोगों का एक-दूसरे से परिचय।

(2.) इस वर्ष में किये जाने वाले कार्यों की चर्चा और निर्णय। 

पूना में प्लेग फैल जाने का कारण कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन पूना की बजाय बम्बई में किया गया। 28 दिसम्बर 1885 को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज भवन में हुए इस अधिवेशन की अध्यक्षता उमेशचन्द्र बनर्जी ने की। इसमें देश के विभिन्न भागों से आये 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

इन प्रतिनिधियों में बैरिस्टर, सॉलिसिटर, वकील, व्यापारी, जमींदार, साहूकार, डॉक्टर, समाचार पत्रों के सम्पादक और मालिक, निजी कॉलेजों के प्रिंसिपल और प्रोफेसर, स्कूलों के प्रधानाध्यापक, धार्मिक गुरु और सुधारक समस्त प्रकार के लोग थे। इनमें दादाभाई नौरोजी, फीरोजशाह मेहता, वी. राघवचार्य, एस. सुब्रह्मण्यम्, दिनेश वाचा, काशीनाथ तेलंग आदि प्रमुख थे।

यह सम्मेलन सफल रहा और राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक संस्था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ। अधिवेशन की समाप्ति पर ह्यूम के आग्रह पर महारानी विक्टोरिया की जय के नारे लगाये गये।

कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्य

कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए उमेशचन्द्र बनर्जी ने कांग्रेस की स्थापना के निम्नलिखित उद्देश्य बताये-

(1.)  सारे भारतवर्ष में देशहित में काम करने वाले लोगों का आपस में सम्पर्क बढ़ाना और उनमें मित्रता की भावना उत्पन्न करना।

(2.) व्यक्तिगत मित्रता और मेल-जोल के द्वारा देशप्रेमियों के बीच में जाति-पाँति के भेदभाव, वंश, धर्म और प्रान्तीयता की संकीर्ण भावनाओं का नाश करना तथा राष्ट्रीय एकता की जनभावनाओं का विकास करना जिनकी उत्पत्ति लॉर्ड रिपन के काल में हुई थी।

(3.) पूरे वाद-विवाद के बाद भारत में शिक्षित लोगों की सामाजिक समस्याओं के बारे में सम्मतियाँ प्राप्त कर उनका प्रामाणिक संग्रह तैयार करना।

(4.) उन तरीकों पर विचार कर निर्णय करना जिनके अनुसार आने वाले बारह महीनों में राजनीतिज्ञ देशहित के लिये कार्य करेंगे।

प्रथम अधिवेशन में नौ प्रस्ताव पारित हुए जिनमें विभिन्न विषयों पर सुधारों की मांग की गई। इन प्रस्तावों से भी कांग्रेस के उद्देश्यों की जानकारी मिलती है। प्रथम प्रस्ताव में भारतीय प्रशासन की जांच के लिए एक रॉयल कमीशन नियुक्त करने तथा द्वितीय प्रस्ताव में केन्द्रीय एवं प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं में नामित सदस्यों के स्थान पर निर्वाचित भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाने की मांग की गई।

अन्य प्रस्तावों में सैनिक खर्च में कमी, भारत और इंग्लैण्ड में सिविल सर्विस प्रतियोगिता परीक्षाओं को साथ-साथ कराने और आयात करों में वृद्धि करने आदि मांगें की गईं। इन समस्त प्रस्तावों पर भारत में पहले से ही विभिन्न मंचों पर चर्चा चल रही थी।

कांग्रेस की स्थापना के कारण

सेवानिवृत्त वरिष्ठ अँग्रेज नौकरशाह द्वारा कांग्रेस की स्थापना में अत्यधिक रुचि लेने की बात ने आरम्भ से ही कांग्रेस की स्थापना के वास्तविक कारण को विवादास्पद बना दिया।

नन्दलाल चटर्जी ने लिखा है- ‘कांग्रेस रूसी भय की सन्तान थी।’

एन्ड्रूज और मुखर्जी ने अपनी पुस्तक राइज एण्ड ग्रोथ ऑफ द कांग्रेस इन इण्डिया में लिखा है- ‘कांग्रेस की स्थापना के ठीक पहले जैसी स्थिति थी, वैसी 1857 के बाद इससे पहले कभी नहीं हुई थी।’

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना, ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से की गई थी। इन इतिहासकारों के अनुसार कांग्रेस का जन्म इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिश शासक इसकी आवश्यकता समझते थे। यह राष्ट्रीय आन्दोलन के स्वाभाविक विकास का नहीं, राष्ट्रीय आन्दोलन में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का परिणाम था।

इस मत के विपरीत कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना केवल ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा के उद्देश्य से नहीं की गई थी, उसके और भी कारण थे। इन कारणों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(अ.) कांग्रेस की स्थापना साम्राज्य की रक्षा के लिए हुई

(1.) ह्यूम उच्च सरकारी अधिकारी रह चुका था। उसे भारत में बढ़ते हुए खतरनाक असन्तोष की जानकारी थी।  इसीलिए उसने ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना में इतनी अधिक रुचि ली। ह्यूम ने सर आकले कारविन को एक पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य, अँग्रेजी शासकों के कार्यों के फलस्वरूप उत्पन्न एक प्रबल और उमड़ती हुई शक्ति के निष्कासन के लिए रक्षा-नली (सेफ्टी फनल) का निर्माण करना था।

(2.) बढ़ते हुए भारतीय असन्तोष से ब्रिटिश साम्राज्य को बचाने का एकमात्र रास्ता इस आन्दोलन को वैधानिक मार्ग पर लाना था, ह्यूम इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे। लाला लाजपतराय ने लिखा है- ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य अँग्रेजी साम्राज्य को खतरे से बचाना था। भारत की राजनैतिक स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करना नहीं, अँग्रेजी साम्राज्य के हितों की पुष्टि करना था।’

सर विलियम वेडरबर्न का मत है- ‘भारत में असन्तोष की बढ़ती हुई शक्तियों से बचने के लिए एक सेफ्टी-वाल्व (रक्षा-अवरोधक) की आवश्यकता है और कांग्रेस से बढ़कर अन्य कोई सेफ्टी-वाल्व नहीं हो सकता।’

(3.) सरकार के व्यवहार से भी तथ्य की पुष्टि होती है कि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए की गई थी। प्रारम्भिक अधिवेशनों में कांग्रेस प्रतिनिधियों को गवर्नरों द्वारा गार्डन पार्टियाँ दी गईं और अधिवेशन की व्यवस्था में भी पूरा सहयोग दिया गया परन्तु जब ऐसे लोग जिन्हें ब्रिटिश शासक नहीं चाहते थे, कांग्रेस में घुस गये और कांग्रेस ने ब्रिटिश शासकों की इच्छा के विरुद्ध मार्ग पकड़ लिया तब लॉर्ड डफरिन और ब्रिटिश शासक, कांग्रेस के विरुद्ध हो गये और उसको समाप्त करने का प्रयास करने लगे। क्योंकि कांग्रेस, ब्रिटिश सरकार की तीव्र आलोचना करने लगी थी। सरकार के इस आचरण से स्पष्ट है कि अँग्रेज, कांग्रेस की स्थापना अँग्रेजी साम्राज्य के सुरक्षा कवच के रूप में करना चाहते थे।

(4.) डा. नन्दलाल चटर्जी का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना के समय भारत पर रूसी आक्रमण का भय था। अतः अँग्रेज भारत की राजनीतिक स्थिति सुधारने के लिए प्रयत्नशील थे ताकि युद्ध की स्थिति में भारतीयों का सहयोग लिया जा सके। रूसी आक्रमण का भय के समाप्त होते ही सरकार ने कांग्रेस के प्रति अपने रुख में परिवर्तन कर लिया।

(5.) रजनीपाम दत्त ने लिखा है- ‘कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश सरकार की पूर्व-निश्चित गुप्त योजना का अंग थी।’

(ब.) कांग्रेस की स्थापना केवल साम्राज्य की रक्षा के लिए नहीं हुई

कुछ विद्वानों का मत है कि कांग्रेस की स्थापना केवल ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से नहीं की गई थी। इसके जन्मदाता इसे केवल सरकार समर्थित संस्था बनाना नहीं चाहते थे। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

(1.) यह सही है कि कांग्रेस के संस्थापकों में से कुछ का उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था परन्तु उनका उद्देश्य राष्ट्रीय चेतना को दबाना नहीं था। वे सरकार विरोधी असन्तोष को हिंसक रास्ते की तरफ जाने से रोक कर वैधानिक मार्ग की ओर मोड़ना चाहते थे। स्वयं वेडरबर्न ने कहा था कि कांग्रेस की भूमिका इंग्लैण्ड के विरोधी दल के समान होनी चाहिए। वायसराय डफरिन भी ऐसा ही चाहते थे।

(2.) सामान्यतः यह कहा जाता है कि ह्यूम एक भूतपूर्व अँग्रेज अधिकारी थे और वे ऐसी किसी संस्था की स्थापना क्यों करते जो ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी हो? इसके उत्तर में कहा जाता हे कि ह्यूम व्यक्तिगत रूप से उदारवादी विचारधारा से प्रभावित थे और वे चाहते थे कि भारत में ब्रिटिश शासन प्रजातांत्रिक रूप से काम करे। इसके अलावा, कांग्रेस का प्रारम्भिक रुख भी अँग्रेजों का विरोधी नहीं था।

(3.) 1888 ई. में ह्यूम ने कांग्रेस के मंच से जो भाषण दिया उससे भी पता चलता है कि ह्यूम का उद्देश्य केवल ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा करना नहीं था। उन्होंने अपने भाषण में जहाँ एक तरफ ब्रिटिश सरकार की निरंकुशता की आलोचना की, वहीं दूसरी तरफ देश में राजनीतिक जागरण को फैलाने की बात भी कही ताकि सरकार पर दबाव डाला जा सके।

अपने भाषण में ह्यूम ने कहा था- ‘हमारे शिक्षित भारतीयों ने अलग-अलग रूप में, हमारे अखबारों ने व्यापक रूप में तथा हमारी राष्ट्रीय महासभा के समस्त प्रतिनिधियों ने एक स्वर से सरकार को समझाने की चेष्टा की है किन्तु सरकार ने जैसा कि प्रत्येक स्वेच्छाचारी सरकार का रवैया होता है, समझने से इन्कार कर दिया है। अब हमारा कार्य यह है कि देश में अलख जगाएँ, ताकि हर भारतीय जिसने भारत माता का दूध पिया है, हमारा साथी, सहयोगी तथा सहायक बन जाये और यदि आवश्यकता पड़े तो……..स्वतन्त्रता, न्याय तथा अधिकारों के लिये जो महासंग्राम हम छेड़ने जा रहे हैं, उसका सैनिक बन जाये।’

(4.) कांग्रेस की स्थापना केवल ह्यूम ने नहीं की थी। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, उमेश चन्द्र बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, जस्टिस रानाडे आदि भारतीय नेताओं ने भी सक्रिय सहयोग दिया था। यह सम्भव नहीं है कि इन भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा के उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना में सहयोग दिया। उनका उद्देश्य भारतीयों के लिए शासन में कुछ सुधारों की मांग करना था।

(5.) डॉ. ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से नहीं अपितु भारतीयों के हित की दृष्टि से की गई।

(6.) कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष उमेशचन्द्र बनर्जी ने कांग्रेस की स्थापना के सम्बन्ध में लिखा है- ‘ह्यूम का विचार था कि भारत के प्रमुख व्यक्ति वर्ष में एक बार एकत्र होकर सामाजिक विषयों पर चर्चा करें। वे नहीं चाहते थे कि उनकी चर्चा का विषय राजनीति रहे क्योंकि मद्रास, कलकत्ता और बम्बई में पहले से ही राजनैतिक संस्थाएँ थीं।’ अर्थात् राष्ट्रीय कांग्रेस एक सामाजिक संस्था के रूप में कार्य करने वाली संस्था के रूप में उद्भूत हुई।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भले ही ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षा कवच देने के उद्देश्य से हुई किंतु बड़े भारतीय नेताओं की उपस्थिति के कारण यह संस्था आरम्भ से ही भारतीयों के हितों की सुरक्षा के काम में लग गई।

कांग्रेस का स्वरूप

कांग्रेस के स्वरूप के सम्बन्ध में विद्वानों में जबर्दस्त मतभेद रहा। यद्यपि इसके निर्माण एवं विकास में मद्रासी, मराठी और पारसियों का उतना ही हाथ था जितना बंगालियों का किंतु कुछ लोग इसे बंगाली कांग्रेस कहते थे। कुछ लोग इसे हिन्दू कांग्रेस कहते थे। कुछ लोग इसे केवल पढ़े-लिखे भारतीयों की संस्था कहते थे और इसके राष्ट्रीय स्वरूप को नकारते थे। जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार कांग्रेस के संगठन और उद्देश्यों पर दृष्टि डालने से सिद्ध हो जाता है कि कांग्रेस का जन्म राष्ट्रीय संस्था के रूप में हुआ। कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में सम्मिलित होने वाले प्रतिनिधि विभिन्न धर्मों, वर्गों, सम्प्रदायों एवं प्रांतों से थे। कांग्रेस के प्रथम तीन अधिवेशनों में सम्मिलित प्रतिनिधियों की सूची से इसके राष्ट्रीय स्वरूप की पुष्टि होती है-

प्रान्तबम्बई (1885 ई.)कलकत्ता (1886 ई.)मद्रास (1887 ई.)
मद्रास              2147362
बम्बई और सिन्ध           384799
पंजाब              3179
उत्तर पश्चिम, उत्तर प्रदेश और अवध        77445
मध्य प्रदेश और बरार0813
बंगाल, बिहार, उड़ीसा और असम323879
कुल72431607

कांग्रेस का विभिन्न क्षेत्रों पर प्रभाव

विशिष्ट बुद्धिजीवी वर्ग पर प्रभाव: कांग्रेस की स्थापना भले ही ए. ओ. ह्यूम के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों ने की थी किंतु भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इसे सम्भालने के लिये आगे आया। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, उमेश चन्द्र बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे, पण्डित मदन मोहन मालवीय आदि बुद्धिजीवी भारतीय नेताओं ने कांग्रेस को खड़ा करने में सक्रिय सहयोग दिया।

भारत में रहने वाले अँग्रेजों पर प्रभाव: 1907 ई. तक लगभग समस्त प्रतिष्ठित भारतीय किसी न किसी रूप में कांग्रेस से जुड़ गये थे। ए. ओ. ह्यूम, विलियम वेडरबर्न, सर हेनरी कॉटन, एण्ड्रिल यूल और नार्टन जैसे उदारवादी आंग्ल-भारतीय भी कांग्रेस में सम्मिलित हो गये थे।

जनसामान्य पर प्रभाव: कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में ब्रिटिश भारत में रहने वाले विभिन्न धार्मिक समुदायों एवं जातियों के शिक्षित प्रतिनिधि भाग लेते थे। ये लोग परस्पर स्नेह और विश्वास की भावना प्रकट करते थे। यही कारण था  कि कांग्रेस की स्थापना के बाद देश में राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय एकता तथा जनसेवा के उच्चादर्शों का तेजी से विकास हुआ। कांग्रेस के उस काल के उच्चादर्श उसके राष्ट्रीय स्वरूप को प्रकट करते हैं। प्रारम्भ में कांग्रेस की लोकप्रियता शिक्षित वर्ग तक सीमित रही किंतु बाद में इसके द्वारा राजनीतिक अधिकारों की मांग किये जाने के कारण सामान्य लोगों का ध्यान भी इसकी तरफ आकर्षित होने लगा।

विभिन्न धर्मों पर प्रभाव: कांग्रेस के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता उमेशचंद्र बनर्जी ने की जो हिन्दू थे। दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की जो पारसी थे और तीसरे अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैयबजी ने की जो मुसलमान थे। कांग्रेस के चौथे अधिवेशन की अध्यक्षता प्रसिद्ध अँग्रेज व्यवसायी जार्ज यूल ने की जो ईसाई थे। आगे भी यह क्रम जारी रहा। इस प्रकार विभिन्न धर्मों के नेताओं को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने से यह संस्था किसी एक धर्म के प्रभाव वाली संस्था न बनकर राष्ट्रीय व्यापकता वाली संस्था के रूप में विकसित हुई।

मुसलमानों पर प्रभाव: आरम्भ में कांग्रेस में मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या कम थी किन्तु धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती गई। सर सैय्यद अहमद ने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने ब्रिटिश राजभक्तों की एक संस्था यूनाइटेड पौट्रियाटिक एसोसिएशन और मुसलमानों के लिए मोहम्मडन एजूकेशन कांग्रेस बनाई। इन मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर कांग्रेस पूर्णतः लोक प्रतिनिधि संस्था थी और इसके प्रतिनिधि राष्ट्रीय विचारों का प्रतिनिधत्व करते थे। कांग्रेस के चौथे सम्मेलन में 1248 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे जिनमें से 221 मुसलमान तथा 220 ईसाई थे।

रियासती जनता पर प्रभाव: कांग्रेस ने ब्रिटिश भारत में राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया था फिर भी 1938 ई. के हरिपुरा अधिवेशन से पहले तक कांग्रेस ने देशी रियासतों को अपने कार्यक्षेत्र से पूरी तरह अलग रखा। इस कारण रियासती भारत की जनता पर 1885 से 1938 ई. तक की अवधि में कोई विशेष प्रभाव नहीं था।

साम्राज्यवादियों पर प्रभाव: कांग्रेस की स्थापना साम्राज्यवादियों के प्रयासों से हुई थी। फिर भी अनेक साम्राज्यवादी अँग्रेज आरम्भ से ही कांग्रेस को घृणा की दृष्टि से देखते थे। मई 1886 में सर हेनरी मेन ने डफरिन को एक पत्र लिखकर ह्यूम के विरुद्ध गंभीर टिप्पणी की- ‘ह्यूम नामक एक दुष्ट व्यक्ति है जिसे लॉर्ड रिपन ने बहुत सिर चढ़ाया था और जिसके सम्बन्ध में ज्ञात होता है कि वह भारतीय होमरूल आंदोलन के मुख्य भड़काने वालों में है। यह बहुत ही चालाक, पर कुछ सिरफिरा, अहंकारी और नैतिकताहीन व्यक्ति है…. जिसे सत्य की कोई परवाह नहीं है।  दिसम्बर 1886 में लार्ड डफरिन ने कांग्रेस के प्रतिनिधियों के लिये कलकत्ता में एक स्वागत समारोह आयोजित किया किंतु जब कांग्रेस की मांगें सामने आईं तो वे कांग्रेस के सचिव ए. ओ. ह्यूम से बुरी तरह नाराज हो गये। डफरिन ने ह्यूम के विरुद्ध अत्यंत उग्र शब्दों में नाराजगी व्यक्त की।’

इंग्लैण्ड वासियों पर प्रभाव: 1890 ई. में कांग्रेस ने एक प्रतिनिधि मण्डल इंग्लैण्ड भेजा, जिसने इंग्लैण्ड, वेल्स और स्कॉटलैंण्ड के निवासियों में कांग्रेस का प्रचार किया। इस प्रतिनिधि मण्डल की यात्रा के बाद ब्रिटिश संसद के सदस्यों की एक समिति बनाई गई जिसका उद्देश्य भारतीय समस्याओं पर विचार करना था। ब्रिटिश जनमत को आकर्षित करने के लिए लंदन में इण्डिया नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया जाने लगा। इन प्रचार कार्यों के कारण इंग्लैण्ड के लोग भी कांग्रेस के कार्यों में रुचि लेने लगे। 1890 ई. में स्वयं लॉर्ड लैंन्सडाउन ने स्वीकार किया कि कांग्रेस देश की एक शक्तिशाली उत्तरदायी राजनैतिक संस्था है।

निष्कर्ष

निश्चित रूप से कांग्रेस अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय संस्था थी। इसमें समाज के हर वर्ग, धर्म, जाति का व्यक्ति सदस्य हो सकता था। इसका प्रभाव भी भारत के किसी एक कोने तक सीमित न होकर राष्ट्रव्यापी था। आरम्भ में इसे जनसामान्य का समर्थन कम मिला किंतु समय के साथ कांग्रेस का राष्ट्रीय स्वरूप विस्तृत होता चला गया तथा इसकी लोकप्रियता में वृद्धि होने लगी। कांग्रेस ने सम्पूर्ण देश की राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए संवैधानिक उपायों से प्रयास करना आरम्भ किया।

कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में पं. मदनमोहन मालवीय ने कहा- ‘इस महान संस्था के द्वारा भारतीय जनता को एक जीभ मिल गई है जिसके द्वारा हम इंग्लैण्ड से कहते हैं कि वह हमारे राजनैतिक अधिकारों को स्वीकार करे।’

कांग्रेस के प्रारम्भिक कार्यों का ही परिणाम था कि देश में प्रबल जनमत का विकास हुआ।

सर हेनरी कॉटन ने लिखा है- ‘कांग्रेस के सदस्य किसी भी स्थिति में सरकारी नीति में परिवर्तन लाने में सफल नहीं हुए किन्तु अपने देश के इतिहास के विकास में तथा देश वासियों के चरित्र निर्माण में निश्चित रूप से उन्होंने सफलता प्राप्त की।’

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कांग्रेस का जन्म भारत के राजनैतिक इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना थी। इसका जन्म ऐसे समय में हुआ था जब ब्रिटिश साम्राज्य अपनी सफलता के सर्वोच्च शिखर पर था। उसकी शक्ति को चुनौती देना सरल नहीं था फिर भी कांग्रेस ने कुछ ही वर्षों में व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त कर लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कांग्रेस का उदारवादी नेतृत्व

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उदारवादी कांग्रेसी नेता दादा भाई नौरोजी

ईस्वी 1885 से ईस्वी 1919 तक कांग्रेस का उदारवादी नेतृत्व कांग्रेस पर हावी रहा। इस काल के नेताओं ने अंग्रेज शासकों से अनुनय-विनय करके अपने अधिकारों में वृद्धि के लिए प्रयत्न किए।

भारत की आजादी के लिये संघर्ष अँग्रेजी राज्य की स्थापना के साथ ही आरम्भ हो गया था। 18वीं शती में प्रेस के उदय साथ ही भारतयों को अपने अधिकारों की मांग करने के लिये मंच मिलना आरम्भ हो गया था।

उन्नीसवीं सदी से ब्रिटिश राज्य में राजनीतिक संस्थाओं का उदय होने लगा। 1857 ई. में सशस्त्र क्रांति का प्रयास किया गया किंतु 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद सही अर्थों में राष्ट्रीय आन्दोलन आरम्भ हुआ। यही कारण है कि 1885 से लेकर 1947 ई. तक कांग्रेस का इतिहास, भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का ही इतिहास है। कांग्रेस के इतिहास को मुख्यतः दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है-

(1.) प्रथम चरण

स्थापना से लेकर रोलट एक्ट तक अर्थात् 1885 से 1919 ई. तक। इस चरण में 1885 से 1905 ई. तक कांग्रेस का नेतृत्व उदारवादियों ने किया और 1905 से 1919 ई. तक कांग्रेस का नेतृत्व उग्रवादी विचारधारा के नेताओं के हाथों में रहा।

(2.) द्वितीय चरण

असहयोग आंदोलन से लकर भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक अर्थात् 1920 से 1947 ई. तक। इस काल में कांग्रेस का नेतृत्व दक्षिणपंथी मोहनदास कर्मचंद गांधी और उनके समाजवादी वामपंथी सहयोगी जवाहरलाल नेहरू आदि के हाथों में रहा।

कांग्रेस का उदारवादी नेतृत्व

राजनीतिक उदारवाद 19वीं सदी के चिंतन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।  इस चिंतन का आधार यह विचार है कि विश्व में प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक उपादेयता है। फिर भी यह शब्द तुलनात्मक है। देश, काल एवं पात्र के अनुसार उदारवाद की परिभाषा में परिवर्तन हो जाता है। कोई विचार किसी समुदाय में उदारवादी माना जा सकता है जबकि वही विचार दूसरे समुदाय में अनुदारवादी अथवा उग्रवादी माना जा सकता है।

1885 से 1905 ई. तक कांग्रेस की बागडोर पूरी तरह से उदारवादियों अथवा नरम राष्ट्रवादियों के हाथों में रही। अतः राष्ट्रीय आन्दोलन का यह काल उदारवाद का युग कहलाता है। इस युग में भारतीय राजनीति में ऐसे व्यक्तियों का प्रभाव था जो अँग्रेजों तथा अँग्रेजी शासन के प्रति नरम रवैया रखते थे और बहिष्कार तथा असहयोग जैसे क्रान्तिकारी विचारों के विरुद्ध थे।

वे उच्च शिक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। उनका दृष्टिकोण सर्वथा वैधानिक था। इनमें से अधिकांश नेताओं के हृदय में ब्रिटिश राज के प्रति कृतज्ञता के भाव थे। वे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को वरदान समझते थे। उन्होंने अनेक सामाजिक संस्थाओं एवं रीति-रिवाजों में सामाजिक समानता तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की स्थापना के लिए परिवर्तन का सुझाव दिया।

वे भारत में प्रतिनिधिमूलक संस्थाओं की स्थापना और नागरिक स्वतन्त्रता की मांग प्रस्तुत करते थे। राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए उदारवादियों ने संवैधानिक आन्दोलन का समर्थन किया। उनके द्वारा जो राजनीतिक आन्दोलन प्रारम्भ किया गया वह भारत की एकता, जातीय एवं साम्प्रदायिक समन्वय, आधुनिककरण, सामाजिक रूढ़ियों का विरोध एवं भेदभाव का निषेध, नवीन आर्थिक प्रगति तथा औद्योगिकरण का समर्थन करता था।

उदारवादियों ने सेवाओं के भारतीयकरण, पाश्चात्य शिक्षा के विस्तार, व्यवस्थापिका सभाओं के चुने हुए सदस्यों की संख्या में वृद्धि, विधि का शासन, स्वतन्त्रता के अधिकारों का व्यापक प्रयोग आदि विषयों पर ध्यान केन्द्रित किया।

दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, लालमोहन घोष, रासबिहारी, गोपालकृष्ण गोखले, श्रीनिवास शास्त्री, महादेव गोविंद रानाडे आदि नेता उदारवादी युग के प्रमुख स्तम्भ थे। कुछ उदारवादी अँग्रेज यथा- ए. ओ. ह्यूम, विलियम वेडरबर्न, जार्ज यूल, मेक्विन, स्मिथ आदि भी कांग्रेस के सदस्य थे।

इन उदारवादी नेताओं ने 1885 से 1905 ई. तक कांग्रेस का नेतृत्व किया। उदारवादी नेताओं ने भारत के ब्रिटिश शासकों को प्रसन्न रखते हुए उनकी दयालुता एवं न्यायप्रियता की दुहाई देकर स्वशासन की ओर बढ़ने का प्रयत्न किया। जेल जाने का कष्ट उठाना इन नेताओं के वश की बात नहीं थी। वे अपनी सामजिक स्थिति, पद, व्यवसाय आदि को यथावत् बनाये रखते हुए भारत में स्वराज्य की स्थापना का स्वप्न देखते थे।

उदारवादी नेतृत्व की विशेषताएँ

(1.) भारत की एकता

उदारवादियों की मनोवृत्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू था- भारतीयों में एकता की भावना का बोध कराना। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था कि एकता के अभाव में भारत अपनी महानता को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए हमें सर्वप्रथम पूरे भारत को स्नेह के बंधन में बांधना होगा। दादाभाई नौरोजी ने भी इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न धर्मों को मानने वाली जनता में एकता तथा सहानुभूति होनी चाहिए। उदारवादी नेताओं के प्रचार से भारत के बुद्धिजीवी वर्ग में एकता की भावना का विकास हुआ तथा विभिन्न धर्मों एवं व्यवसायों में लगे लोग राष्ट्रीय कांग्रेस में सम्मिलित होने लगे। यह उदारवादियों की बड़ी उपलब्धि थी।

(2.) ब्रिटिश शासन के प्रति भक्ति भावना

कांग्रेस के अधिकांश उदारवादी नेता ब्रिटिश शासन के समर्थक एवं प्रशसंक थे। वे असहयोग तथा क्रान्तिकारी विचारों के विरोधी थे। उदारवादियों को ब्रिटिश जनतन्त्रीय व्यवस्था में असीम आस्था थी। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन ने ही भारत को आधुनिक सभ्यता के मार्ग पर अग्रसर किया, स्वतन्त्रता की भावना उत्पन्न की, राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया और देश की जनता को एकसूत्र में बांधने का काम किया। जस्टिस रानाडे का मानना था कि भारत में अँग्रेजी शासन भारतीयों को नागरिक एवं सार्वजनिक गतिविधियों का राजनैतिक शिक्षण देने की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध हुआ था।

उनका कहना था- ‘हिन्दुओं एवं मुसलमानों में वैज्ञानिक क्रियाकलाप, नवीन शिक्षण तथा व्यसायिक दृष्टिकोण की कमी होने के कारण प्रगति शिथिल होती गयी। अँग्रेजों के आगमन ने यह स्थिति बदल दी। भारत को एक नवीन ज्योति दिखाई दी। आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। अँग्रेजों के सम्पर्क में आने से हमें स्वतन्त्रता की महत्ता का आभास हुआ। सदियों की गुलामी एवं जड़ता को पाश्चात्य प्रभाव ने समाप्त कर दिया। भारतीय नवजागरण प्रारम्भ हुआ।’

दादाभाई नौरोजी की धारणा थी कि अँग्रेजों का शासन भारत के चहुँमुखी विकास के लिए दैविक वरदान का कार्य करेगा। उनका कहना था कि- ‘अँग्रेजों का उस समय तक भारत में बने रहना आवश्यक है जब तक कि भारतीयों को वे स्वावलम्बी बनाने सम्बन्धी अपना न्यासिता का उद्देश्य पूरा नहीं कर लेते।’

उदारवादियों ने भारतीयों की इंग्लैण्ड के प्रति वफादारी और उनकी देशभक्ति के बीच गहरा सम्बन्ध स्थापित करने में कभी असुविधा महसूस नहीं की।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा था- ‘ईश्वर भविष्य में हमारी वफादारी को और गहरा करे, हमारी देशभक्ति को और प्रोत्साहित करे और ब्रिटिश साम्राज्य के साथ हमारे सम्बन्धों को और अधिक दृढ़ करे।’

(3.) क्रमिक सुधारों के पक्ष में

उदारवादी नेता देश की शासन व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तनों के विरोधी थे। उनका मानना था कि भारत में सुधार कार्य एक साथ सम्भव नहीं है, इसलिए क्रमिक सुधार होने चाहिये। वे राजनीतिक एवं प्रशासकीय क्षेत्र में धीरे-धीरे सुधार लाना चाहते थे। वे सरकार में जनता की समुचित भागीदारी चाहते थे। आर. जी. प्रधान ने लिखा है- ‘कांग्रेस के प्रारम्भिक दिनों के प्रस्तावों से पता चलता है कि उनकी मांगें अत्यन्त साधारण थीं। कांग्रेस के नेता आदर्शवादी नहीं थे। वे हवाई किला नहीं बनाते थे। वे व्यवहारिक सुधारक थे तथा आजादी, क्रमशः कदम-कदम करके हासिल करना चाहते थे।’

फीरोजशाह जैसे नेता, अँग्रेजों के संरक्षण में भारत के राजनीतिक शिक्षण का मार्ग ढूँढ रहे थे और उनका विश्वास था कि किसी दिन अँग्रेज स्वयं ही, भारत की राष्ट्रीय मांगों को स्वीकार कर लेंगे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भी ब्रिटेन के मार्गदर्शन में भारत की प्रगति का स्वप्न देखते थे। उनका उद्देश्य भारत में राजनीतिक सुधारों की मांग प्रस्तुत करना तथा अँग्रेजी शासन से प्रार्थना एवं याचिकाओं के माध्यम से नवीन सुधारों को लागू करवाना था। गोपालकृष्ण गोखले भारत के राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं पुनर्जीवन के लिए क्रमिक विकास का सहारा लेना चाहते थे।

(4.) ब्रिटेन से स्थायी सम्बन्धों की स्थापना

उदारवादी नेता, पाश्चात्य सभ्यता एवं विचारों के पोषक थे। उनकी मान्यता थी कि भारतीयों के लिए, भारत का ब्रिटेन से सम्बन्ध होना एक वरदान है। ब्रिटेन से सम्बन्धों के कारण पाश्चात्य साहित्य, आधुनिक शिक्षा पद्धति, यातायात के साधन, न्याय प्रणाली, स्थानीय स्वशासन आदि व्यवस्थाएँ भारत के लिए अमूल्य वरदान सिद्ध हुई हैं।

पाश्चात्य विचार एवं दर्शन, लोगों में स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र के प्रति आदर उत्पन्न करता है। अतः भारत के हित में यही उचित होगा कि ब्रिटेन से उसका अटूट सम्बन्ध बना रहे।

श्रीमती एनीबीसेन्ट का माना था- ‘इस काल के नेता स्वयं को ब्रिटिश प्रजा मानने में गौरव का अनुभव करते थे।’

गोपालकृष्ण गोखले का कहना था- ‘हमारा भाग्य अँग्रेजों के साथ जुड़ा हुआ है। चाहे वह अच्छे के लिए हो अथवा बुरे के लिए।’

इसी प्रकार दादाभाई नौरोजी का कहना था- ‘कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने वाली संस्था नहीं है, अपितु वह तो ब्रिटिश सरकार की नींव को दृढ़ करना चाहती है।’

उदारवादी नेता मानते थे कि अँग्रेजों की मुक्त व्यापार नीति भारतीय उद्योगों के हितों के विरुद्ध है और भारत की निर्धनता के लिए ब्रिटिश शासन उत्तरदायी है फिर भी वे भारत और ब्रिटेन के आर्थिक हितों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानते थे।

गोखले राष्ट्रीय शक्ति तथा स्वालम्बन के विकास के साथ-साथ शासकीय संरक्षण में भारत के नव-स्थापित उद्योगों को इतना विकसित हुआ देखना चाहते थे कि वे अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा में मात न खा जाये। उदारवादियों ने बंगाल-विभाजन के बाद प्रारम्भ हुए स्वदेशी आन्दोलन का केवल आर्थिक दृष्टि से समर्थन किया, न कि राजनैतिक शस्त्र के रूप में।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा था कि स्वदेशी आन्दोलन का आधार देश-प्रेम था, न कि विदेशियों के प्रति घृणा। स्वदेशी का उद्देश्य आदर्श, विद्या, कला और उद्योगों को देश से बाहर निकालना नहीं है; अपितु वह उन्हें राष्ट्रीय पद्धति में समाविष्ट करने पर जोर देता है।

(5.) अँग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास

उदारवादियों का विश्वास था कि अँग्रेज, संसार के सर्वाधिक ईमानदार, शक्ति सम्पन्न और प्रजातन्त्रवादी लोग हैं। वे भारत में भी प्रजातान्त्रिक संस्थाओं का विकास करेंगे। यदि ब्रिटिश संसद और जनता को भारतीय समस्याओं से अवगत कराया जाए तो वे निश्चित रूप से सुधार के कदम उठायेंगे।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था- ‘अँग्रेजों के न्याय, बुद्धि और दया भावना में हमारी दृढ़ आस्था है। संसार की इस महानतम प्रतिनिधि सभा, संसदों की जननी ब्रिटिश कॉमन सभा के प्रति हमारे हृदय में असीम श्रद्धा है; अँग्रेज स्वेच्छा से भारत से चले जायेंगे।’

इस प्रकार, कांग्रेस के उदारवादी नेताओं का अँग्रेजों की न्यायप्रियता में असीम विश्वास था। उनकी मान्यता थी कि अँग्रेज न्यायप्रिय एवं स्वतन्त्रता प्रेमी हैं। यदि उन्हें भारतीयों की योग्यता पर विश्वास हो जायेगा तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के भारतीयों को स्वशासन का अधिकार प्रदान कर देंगे।

बाद में उदारवादियों का भारत के ब्रिटिश शासकों की न्यायप्रियता से विश्वास उठने लगा परन्तु ब्रिटिश राजनीतिज्ञों और ब्रिटिश जनता की न्यायप्रियता में उनका विश्वास बना रहा। इसलिये वे ब्रिटिश राजनीतिज्ञों तथा ब्रिटिश जनमत का समर्थन जीतने का प्रयास करते रहे।

(6.) ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन

कांग्रेस के उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन चाहते थे। कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा- ‘स्वशासन एक प्राकृतिक देन है, ईश्वरीय शक्ति की कामना है। प्रत्येक राष्ट्र को स्वयं अपने भाग्य का निर्णय करने का अधिकार होना चाहिए, यही प्रकृति का नियम है।’

ब्रिटिश साम्राज्य से सम्बन्ध विच्छेद की तो वे स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते थे। इसलिए पूर्ण स्वतन्त्रता की बात उनके मस्तिष्क में नहीं थी। वे तो ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन प्राप्त करना चाहते थे। दादाभाई नौरोजी ने अपनी सुधारवादी वृत्ति के कारण समस्त प्रकार के सुधारों के लिए अँग्रेजी शासन का सहारा लेना उचित ठहराया।

उन्होंने मांग रखी कि भारत को शीघ्र ही प्रतिनिध्यात्मक संस्थाओं से युक्त किया जाये। इस योजना के अन्तर्गत भारत सरलता से सुशासन की ओर बढ़ते हुए एक पूर्ण लोकतान्त्रिक राज्य बन सकता था।

1906 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में पहली बार भारतीयों को स्वराज्य शब्द का मन्त्र देते हुए कहा कि बदलते हुए समय के अनुसार अब भारतीय जनता केवल सुशासन तक ही सीमित नहीं रखी जा सकती, उसे स्वशासन की आवश्यकता है।

इसी प्रकार फीरोजशाह मेहता ने कहा कि प्रतिनिधि संस्थाओं की मांग भारत के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में ही की गई थी न कि किसी क्रान्तिकारी परिप्रेक्ष्य में। भारतीयों द्वारा अपने अधिकारों का जो ज्ञान शिक्षा के माध्यम से अर्जित किया गया है, उसी सन्दर्भ में भारतीयों ने प्रतिनिधि संस्थाओं की मांग रखी है।

(7.) वैधानिक उपायों में विश्वास

चूँकि उदारवादी नेताओं को अँग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास था, अतः वे क्रान्तिकारी उपायों को अपनाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने सरकार के साथ संघर्ष करने की बात कभी नहीं की। उनका पूर्ण विश्वास वैधानिक संघर्ष में था। वे अपने कार्यों से सरकार को असन्तुष्ट नहीं करना चाहते थे।

हिंसात्मक एवं क्रान्तिकारी उपाय उनके मस्तिष्क में कभी नहीं आये। उन्होंने प्रार्थनाओं, प्रार्थना-पत्रों, याचिकाओं, स्मरण-पत्रों और प्रतिनिधि-मण्डलों द्वारा सरकार से अपनी न्यायोचित मांगों को मानने का आग्रह किया। अनेक विद्वानों का मानना है कि इस समय कांग्रेस की नीति प्रार्थना करने की थी, अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने की नहीं।

इस रीति-नीति को कुछ लोगों ने राजनीतिक भिक्षावृत्ति कहा। अन्य विद्वानों का मत है कि उदारवादियों ने अँग्रेजी शासन का इसलिए विरोध नहीं किया क्योंकि उन्हें आंशका थी कि यदि उन्होंने ऐसा किया तो अँग्रेज सरकार कांग्रेस को ही समाप्त कर देगी। संभवतः उनका ऐसा सोचना सही था।

अभी कांग्रेस अपनी जड़ंे मजबूत नहीं कर पाई थी। इसलिए उन्होंने जनता की इच्छाओं तथा भावनाओं को अपने प्रस्तावों तथा अन्य वैधानिक उपायों द्वारा सरकार के सामने बड़े विनम्र रूप में प्रस्तुत किया।

उदारवादी नेताओं की मांगें

कांग्रेस ने अपनी स्थापना के प्रारम्भिक बीस वर्षों में वार्षिक अधिवेशनों में विभिन्न प्रस्ताव पारित करके ब्रिटिश सरकार का ध्यान भारतीय जनता की समस्याओं की ओर आकर्षित किया तथा नागरिक प्रशासन में विभिन्न प्रकार के सुधार करने की मांग की। उनकी विभिन्न मांगें इस प्रकार से थीं-

(1.) राजनीतिक मांगें

प्रारम्भिक राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा भारत की गोरी सरकार से भारतीयों के लिये अनेक राजनीतिक अधिकारों की मांगें की गईं-

1. प्रशासन व्यवस्था में भारतीयों की अधिक से अधिक भागीदारी हो।

2. विधायी परिषदों में सुधार हो।

3. केन्द्रीय तथा प्रान्तीय कौंसिलों का विस्तार हो तथा उनमें सरकार द्वारा नामित सरकारी सदस्यों की संख्या में कमी करके निर्वाचित और गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों की संख्या में वृद्धि की जाये।

4. कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण हो तथा मुकदमों की सुनवाई में जूरी प्रथा को मान्यता दी जाये।

5. वित्तीय व्यवस्था का पुनर्गठन करके करों का बोझ कम किया जाये।

6. अँग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा और विस्तार के व्यय में ब्रिटिश सरकार भी भागीदारी निभाये।

7. सरकार के सैनिक व्यय में कमी की जाये।

8. किसानों की स्थिति सुधारने के लिए भू-राजस्व की दर कम की जाये तथा यह 20 से 30 वर्षों के लिये स्थाई की जाये।

9. भारतीय जनता की दशा सुधारने के लिए उचित कदम उठाए जाएँ। प्राथमिक शिक्षा का विस्तार हो, औद्योगिक एवं तकनीकी शिक्षा की सुविधा दी जाये, सफाई में सुधार के लिए अधिक अनुदान दिया जाए इत्यादि।

1886 ई. में हुए कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में केन्द्रीय और प्रान्तीय कौंसिलों के विस्तार और उनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों की मांग उठी। यह मांग हर अधिवेशन में अधिक मजबूती के साथ दोहराई जाती रही। तीसरे अधिवेशन के प्रस्तावों में कहा गया कि कौंसिल में आधे प्रतिनिधि निर्वाचित पद्धति से आएं।

यह निर्वाचन सीधा न होकर परोक्ष विधि से हो। अर्थात् नगरपालिका, विश्वविद्यालय, व्यापार मण्डल, स्थानीय मण्डल और स्थानीय कौंसिल में निर्वाचन किया जाये और स्थानीय कौंसिल के माध्यम से केन्द्रीय कौंसिल में किया जाये। चौथे अधिवेशन में इस बात पर सर्वाधिक जोर डाला गया कि विधान परिषदों को इतना बढ़ाया जाए कि उनमें देश के हितों का प्रतिनिधित्व हो जाए। 1889 ई. के पांचवें अधिवेशन में 21 वर्ष के प्रत्येक भारतीय को मताधिकार देने की बात उठाई गई।

(2.) नागरिक अधिकारों की मांगें

उदारवादी नेता नागरिकों के लिये भाषण और प्रेस की स्वतन्त्रता का अधिकार, संगठन बनाने की स्वतन्त्रता का अधिकार जैसे नागरिक अधिकारों की मांग उठाते थे। जब कभी सरकार इन अधिकारों को सीमित करने का प्रयास करती थी, तब उदारवादी नेता इन अधिकारों के समर्थन में दलीलें देते थे।

1878 ई. में पारित प्रेस अधिनियम का उदारवादियों ने तब तक विरोध किया जब तक कि सरकार ने इस अधिनियम को निरस्त नहीं कर दिया। इसी प्रकार, 1880-90 ई. में जब सरकार ने समाचार पत्रों के आलोचना करने के अधिकार को समाप्त करने का प्रयास किया, तब उदारवादियों ने सरकारी प्रयासों का विरोध किया।

फीरोजशाह मेहता प्रेस की स्वतन्त्रता के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने टाइम्स ऑफ इण्डिया के नाम पत्र में लिखा- ‘यदि वर्नाक्यूलर प्रेस का कार्य शासन को अनुत्तरदायी दिखाई देता है तो यह अनुत्तरदायित्व सरकार के नियमन एवं पंजीकरण द्वारा भी बना रह सकता है। प्रेस की स्वतन्त्रता का दमन भारत में नवपल्ल्वित स्वतन्त्रता के विकास को अवरुद्ध कर देगा। इससे शासन को संचार के एक महत्त्वपूर्ण साधन से वंचित रहना पड़ेगा और उसे जन प्रतिक्रिया की सही जानकारी नहीं प्राप्त हो सकेगी। यदि प्रेस की स्वतन्त्रता का दमन किसी व्याप्त विरोध को दबाने में प्रयुक्त किया जाता है तो वह उचित नीति नहीं होगी।’

उन्होंने भारत सरकार को चेताया कि वह ऐसी किसी भी नीति का अनुसरण नहीं करे।

(3.) सांविधानिक सुधार और स्वशासी सरकार की मांग

उदारवादी नेता एक स्वशासी सरकार की स्थापना चाहते थे परन्तु इस दिशा में उन्होंने जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाया। प्रारम्भ में उन्होंने विधान परिषदों के विस्तार और विभिन्न सुधारों के माध्यम से भारतीय जनता को सरकार में अधिक हिस्सा देने की मांग की। इसके बाद उन्होंने विधान परिषदों के अधिकारों में वृद्धि की मांग की ताकि बजट पर बहस की जा सके और प्रशासन के कार्यों की समीक्षा करने का अवसर मिल सके। 1905 ई. तक इस विषय में प्रस्ताव पारित किये जाते रहे।

(4.) नागरिक सेवाओं के भारतीयकरण की मांग

उदारवादियों का मानना था कि विभिन्न प्रशासकीय एवं वित्तीय बुराइयों को तब तक दूर नहीं किया जा सकता जब तक कि अधिक-से अधिक भारतीयों को सिविल सेवाओं में भरती नहीं किया जायेगा।

कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में उमेशचन्द्र बनर्जी ने कहा- ‘मैं समझता हूँ कि यूरोप की तरह की शासन पद्धति की आकांक्षा रखना, कदापि राजद्रोह नहीं है। हमारी आकांक्षा केवल इतनी है कि शासन का आधार अधिक व्यापक हो और उसमें देशवासियों को समुचित तथा न्यायपूर्ण भाग मिले।’

1890 ई. के अधिवेशन में सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया कि देश के 95 प्रतिशत उत्तरदायित्व पूर्ण उच्च पदों पर यूरोपियनों का अधिकार है किंतु वे भारत के हित में नहीं सोचते हैं। उनका सारा चिंतन इस बात में निहित है कि ब्रिटिश शासन की नींव को और गहरा किया जाये।

अतः उदारवादियों ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स के 2 जून 1893 के उस प्रस्ताव को लागू करने की मांग की जिसके द्वारा भारत और इंग्लैण्ड में सिविल सेवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा का आयेाजन साथ-साथ किये जाने की व्यवस्था की गई थी। उन्होंने भारतीय सेवाओं के पुनर्गठन की मांग भी की। उन्होंने यह भी मांग की कि न्यायिक कार्य केवल उन्हीं व्यक्तियों को दिया जाये जो कानून के विशेषज्ञ हों।

(5.) भारत से धन निष्कासन रोकने की मांग

दादाभाई नौरोजी भारत में व्याप्त निर्धनता के लिए आवाज उठाने वाले प्रथम व्यक्ति थे। उन्होंने दो पुस्तकें- (1.) पावर्टी इन इण्डिया तथा (2.) पावर्टी ऐन अनब्रिटिश रूल इन इण्डिया लिखीं। उन्होंने भारत की निर्धनता के लिए अन्य विचारकों एवं आलोचकों द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों को, जिनमें भारत की निर्धनता के लिए भारत की बढ़ती हुई आबादी को दोषी ठहराया था, अमान्य सिद्ध किया। भारत की निर्धनता के लिए उन्होंने भारत की बढ़ती आबादी के स्थान पर अँग्रेजों की क्रूर आर्थिक शोषण की नीति को उत्तरदायी ठहराया।

धन निर्गम सिद्धान्त में उन्होंने लिखा कि विशेष रूप से चार मदों में इस देश की विपुल धन राशि ब्रिटिश हुकूमत की नहर प्रणाली से इंग्लिश चैनल तक पहुंच रही है- (1.) ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, (2.) भारत में सेना के व्यय के लिये ब्रिटेन के युद्ध विभाग को भुगतान (3.) भारत सरकार का ब्रिटेन में व्यय और (4.) भारत स्थित ब्रिटिश व्यावसायिक वर्ग द्वारा स्वदेश भेजी गई अपनी कमाई। 

भारत से जो पूँजी इंग्लैण्ड जाती थी उसके बदले में भारत को कुछ भी प्राप्त नहीं होता था। भारत से इंग्लैण्ड भेजा गया धन सार्वजनिक ऋण के रूप में पुनः भारत आता था जिसे चुकाने के लिए ब्याज देना पड़ता था। उदारवादियों ने मांग की कि देश का उत्पादन देश में ही रहे तथा भारत से धन-निष्कासन रोका जाये।

(6.) भारतीय उद्योगों को संरक्षण की मांग

उदारवादियों का मानना था कि भारत के तीव्र औद्योगीकरण में कई बाधाएँ हैं। जैसे- 1. स्वदेशी उद्योगों का ह्रास, 2. पूंजी की कमी, 3. तकनीकी शिक्षा का अभाव, 4. भारतीयों में उद्यम भावना की कमी और 5. मुक्त व्यापार की नीति। उदारवादी नेताओं ने इन बाधाओं को दूर करने तथा भारतीय उद्योगों को सरकारी प्रोत्साहन एवं सरंक्षण देने की मांग की। क्योंकि सरकारी सहायता के बिना भारत का औद्योगिक विकास सम्भव नहीं था और बिना औद्योगिक विकास के आर्थिक समृद्धि की कल्पना करना निरर्थक था।

जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे का कहना था- ‘भारत की गिरती हुई आर्थिक स्थिति का वास्तविक कारण भारत के घरेलू उद्योग-धन्धों का ह्रास तथा भारत की कृषि पर अत्यधिक निर्भरता है।’

नवीन उद्योगों की स्थापना तथा औद्योगिक उत्पादन की मात्रा में वृद्धि करके भारत की निर्धनता को दूर किया जा सकता था। रानाडे का यह भी मानना था कि अँग्रेजी शासन की विरोधी नीति इसके मार्ग में बाधक सिद्ध हो रही है। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था कि जब तक भारत के उद्योगों का उचित संरक्षण एवं संवर्धन नहीं होगा तब तक भारत आर्थिक दृष्टि से समृद्ध नहीं हो पायेगा।

उन्होंने बम्बई के कपड़ा उद्योग, बंगाल के जूट उद्योग, आसाम के चाय उद्योग तथा मध्य प्रदेश एवं दक्षिण भारत के कोयला एवं लोहा उद्योगों को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। वे फैक्ट्री नियमों को उत्पादन घटाने तथा उत्पादन मूल्य बढ़ाने वाले मानते थे। बनर्जी ने लंकाशायर के सूती कपड़ा उद्योगपतियों को भारत के सूती कपड़ा उद्योग को शिथिल करने का दोषी बताया।

(7.) श्रमिकों की दशा सुधारने की मांग

उदारवादी नेताओं ने श्रमिकों की स्थिति सुधारने की मांग की परन्तु इस विषय में अधिक उत्साह नहीं दिखाया। रानाडे, दादाभाई नौरोजी, जी. वी. जोशी, आर. सी. दत्त जैसे नेताओं ने भी श्रमिकों के प्रति कोई विशेष सहानुभूति प्रकट नहीं की। कांग्रेस के अधिवेशनों में भी श्रमिकों से सम्बन्धित प्रस्ताव पारित नहीं किये गये जबकि इस युग में भारतीय श्रमिकों की दशा शोचनीय थी। आगे चलकर लाला लाजपतराय ने इस विषय को पूरी शक्ति के साथ उठाया।

(8.) कृषि एवं कृषकों की दशा सुधारने की मांग

ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत कृषि एवं कृषक दोनों की दशा खराब होती जा रही थी। उदारवादी नेताओं का मानना था कि कठोरतापूर्वक किया गया कर निर्धारण और कर की ऊँची दर के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है। उन्होंने सरकार से भूमि कर में कमी करने तथा किसानों की स्थिति सुधारने के लिए पुराने ऋण माफ करने की मांग की।

उन्होंने जमींदारों के अधिकारों में कमी करने तथा किसानों को स्वतंत्र बनाने का सुझाव दिया ताकि किसान अपनी जमीन पर जी-तोड़ परिश्रम करके उत्पादन को बढ़ा सके।

कांग्रेस के चौथे अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करके कहा गया- ‘जमीन बन्दोबस्त के बदलते रहने से आम जनता परेशान और क्षुब्ध है। अतः प्रान्तीय कांग्रेस समितियाँ इस समस्या का अध्ययन करें और सुझावों सहित अपनी रिपोर्ट आगामी अधिवेशन में प्रस्तुत करें।’ इस प्रकार कांग्रेस के मंच से कृषि एवं कृषकों से सम्बन्धित समस्याएँ उठाई जाने लगीं।

(9.) अन्य माँगें

उदारवादी नेताओं ने नागरिक जीवन से सम्बन्धित अन्य समस्याओं पर भी प्रस्ताव पारित किये। इन प्रस्तावों में सिंचाई की उचित व्यवस्था, कृषि-बैकों की स्थापना, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन, भारत में सैनिक कॉलेज की स्थापना, प्रिवी कौंसिल में भारतीयों को प्रतिनिधित्व, पुलिस व्यवस्था में सुधार, विदेशों में रहने वाले भारतीयों की रक्षा आदि विषय सम्मिलित थे।

दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि लोगों ने शिक्षित बेरोजगारों की समस्या को उठाया। उनका कहना था कि भारत की निर्धनता; रोजगार के नये तरीकों के प्रयोग तथा अधिक रोजगार प्रदान करने से दूर हो सकती थी।

बनर्जी ने कहा था- ‘हमारी मांगों का प्रमुख लक्ष्य भारत में प्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना करवाना कहा जा सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख – उदारवादी नेतृत्व अथवा नरमपंथी कांग्रेस

कांग्रेस का उदारवादी नेतृत्व

उदारवादी नेतृत्व की सफलताएँ

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