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भारतीय राष्ट्रीय सेना में सुभाषचंद्र बोस

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भारतीय राष्ट्रीय सेना में सुभाषचंद्र बोस

कलकत्ता प्रेसीडेंसी में भूख हड़ताल करने से सुभाष बाबू की हालत तेजी से बिगड़ने लगी। इस पर सरकार ने उन्हें 5 दिसम्बर 1940 को जेल से मुक्त करके उनके घर में नजरबन्द कर दिया। घर में भी उन पर कड़े प्रतिबन्ध थे।

भारत से पलायन

नजरबंदी के दौरान कुछ दिनों तक सुभाष अपने घर में चुपचाप रहे। 17 जनवरी 1941 की रात में लगभग सवा एक बजे सुभाषचंद्र सुरक्षा प्रहरियों को चकमा देकर घर से निकल गये तथा कलकत्ता से कार द्वारा गोआ पहुंच गये। गोआ से वे रेलगाड़ी द्वारा पेशावर पहुंच गये।

पेशावर से वे जमरूद होकर तथा लंडीकोतल को बगल में छोड़ते हुए गढ़ी पहुँचे। उन्होंने पैदल ही भारतीय सीमा को पार किया और मोटरगाड़ी से काबुल जा पहुँचे। वहाँ से वे इटालियन पासपोर्ट लेकर रूस पहुंचे। 28 मार्च 1941 को सुभाष बाबू विमान द्वारा मास्को से बर्लिन जा पहुँचे जहाँ हिटलर के सहयोगी रिवेनट्राप ने उनका स्वागत किया।

हिटलर से भेंट

बर्लिन में सुभाष बोस ने जर्मन सरकार के चांसलर अडोल्फ हिटलर से भेंट करके उसके समक्ष तीन प्रस्ताव रखे-

(1.) सुभाषचंद्र बोस, बर्लिन रेडियो से ब्रिटिश विरोधी अभियान चलायेंगे।

(2.) सुभाषचंद्र बोस, जर्मनी सरकार की अभिरक्षा में रह रहे भारतीय युद्ध-बन्दियों में से सैनिकों को चुनकर लिब्रेशन आर्मी का गठन करेंगे।

(3.) तीनों धुरी राष्ट्र- जर्मनी, जापान और इटली, संयुक्त रूप से भारत की स्वाधीनता की घोषणा करेंगे।

सुभाषचंद्र बोस की लिबरेशन आर्मी

हिटलर ने बोस के पहले दो प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया परन्तु तीसरे प्रस्ताव पर चुप रहा। इसी दौरान जर्मनी ने रूस पर आक्रमण किया और रूस मित्र राष्ट्रों के खेमे में चला गया। ऐसी विकट परिस्थिति में जर्मनी सरकार ने सुभाष को प्रोत्साहित किया कि वे भारतीयों की सेना गठित करें।

सुभाष का विश्वास था कि सोवियत संघ परास्त हो जायेगा और लिब्रेशन आर्मी, सोवियत संघ से होकर भारत की सीमा तक पहुँच जायेगी और फिर जर्मनी की सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश भारत पर आक्रमण करेगी। इस योजना के अनुसार जनवरी 1942 तक सुभाष बाबू ने, जर्मनी सरकार द्वारा उत्तरी अफ्रीका में बन्दी बनाये गये भारतीय युद्ध बन्दियों को लेकर लिब्रेशन आर्मी का गठन किया तथा उसके दो दस्ते खड़े कर लिये।

जर्मनी में उनके नाम के आगे नेताजी शब्द जोड़ा गया। सुभाष बाबू ने रोम और पेरिस में भी फ्री इंडिया सेन्टर स्थापित किये। इस समय तक लगभग 3,000 भारतीय सैनिक लिब्रेशन आर्मी में सम्मिलित हो चुके थे।

रासबिहारी बोस की भारतीय राष्ट्रीय सेना

8 दिसम्बर 1941 को जापान ने ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी जिससे यूरोपीय युद्ध विश्व युद्ध में बदल गया। जापान ने ब्रिटिश साम्राज्य के दक्षिण पूर्वेशिया में सबसे बड़े सामरिक अड्डे सिंगापुर को जीत लिया तथा मलाया से बर्मा तक का समस्त क्षेत्र भी मुक्त करा लिया।

28-30 मार्च 1942 को रासबिहारी बोस  की पहल पर राजनीतिक सवालों पर विचार करने के लिये टोकियो में प्रवासी भारतीयों का एक सम्मेलन बुलाया गया। इस सम्मेलन में भारतीय अधिकारियों की देखरेख में भारतीय राष्ट्रीय सेना (इण्डियन नेशनल आर्मी) गठित करने का निर्णय लिया गया।

इस सेना का उद्देश्य भारत की मुक्ति के लिये संघर्ष करना बताया गया। यह भी निश्चित किया गया कि जापान अधिकृत एशियाई प्रदेशों में इण्डिया इण्डिपेण्डेंस लीग की स्थापना की जाये और प्रवासी भारतीयों को इसका सदस्य बनाया जाये। जून 1942 में बैंकाक में प्रवासी भारतीयों का पूर्ण प्रतिनिधि सम्मेलन करने का भी निर्णय लिया गया।

टोकियो सम्मेलन में हुए निर्णय के अनुसार 23 जून 1942 को बैंकाक में रासबिहारी बोस की अध्यक्षता में बर्मा, मलाया, स्याम, हिन्द चीन, फिलीपीन, जापान, चीन, बोर्नियो, जावा, सुमात्रा, हाँगकाँग आदि देशों के प्रवासी भारतीयों के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया गया।

प्रवासी भारतीयों का प्रतिनिधित्व के. पी. मेनन, एन. राघवन, एस. सी. गोहो तथा एन. के. अय्यर ने किया जो मलाया के प्रसिद्ध वकील थे। सम्मेलन में स्वामी सत्यानन्द पुरी, ज्ञानी प्रीतम सिंह, कप्तान मोहनसिंह, कप्तान मोहम्मद अकरम खाँ, ले. कर्नल एन. एस. गिल ने भी भाग लिया। इस सम्मेलन में संग्राम परिषद् का गठन किया गया। सम्मेलन में तय किया गया कि इस आन्दोलन का नेतृत्व करने के लिये सुभाषचन्द्र बोेस को जर्मनी से बुलाया जाये।

1 सितम्बर 1942 को आजाद हिन्द फौज की नियमित स्थापना की गई।  इस सेना के प्रथम डिवीजन में लगभग 1700 अधिकारी एवं सैनिक सम्मिलित थे। इसमें तीन ब्रिगेड और सहायक ईकाइयां थीं। इस सेना का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है-

(1) सेनापति – मेजर जनरल मोहनसिंह।

(2) उप सेनापति और मुख्य सलाहकार- कर्नल एन. एस. गिल।

(3) गांधी ब्रिगेड – ले. कर्नल आई. के. किआनी के नेतृत्व में।

(4) नेहरू- ब्रिगेड – ले. कर्नल अजीज अहमद खाँ के नेतृत्व में।

(5) आजाद-ब्रिगेड- ले. कर्नल प्रकाशचन्द्र के नेतृत्व में (प्रत्येक ब्रिगेड में 300 सैनिक)।

(6) नं. 1 हिन्द फील्ड फोर्स – ले. कर्नल जे. के. भौंसले के नेतृत्व में।

(7) कुछ सहायक इकाइयाँ भी थीं जिनका नेतृत्व हिन्दू, मुस्लिम और सिक्ख अधिकारियों को सौंपा गया। इनमें से एक शाहनवाज खाँ भी थे जिन पर लाल किले में अभियोग चला था। इस डिवीजन को अक्टूबर 1942 तक बर्मा की तरफ जाना था। इस सम्बन्ध में समस्त तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं परन्तु अचानक घटनाक्रम बदलने से सम्पूर्ण योजना ध्वस्त हो गई।

आजाद हिन्द फौज का भंग किया जाना

आजाद हिन्द फौज की स्थापना तो हो गई, परन्तु इसे आरम्भ से ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जापान सरकार ने उसके बारे में नीति स्पष्ट नहीं की। यह भी निश्चित नहीं किया गया कि इस सेना में कितने सैनिकों को भर्ती किया जाये। यहाँ तक कि अब तक भर्ती किये गये भारतीय सैनिकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी नहीं की गई।

सैनिकों के लिये आवश्यक सामग्री की भी पूर्ति नहीं की गई। आजाद हिन्द फौज के अधिकारी जापानी अधिकारियों से बार-बार अनुरोध करते रहे कि जापानी सरकार बैंकाक प्रस्ताव को खुले रूप से समर्थन प्रदान करे ताकि दुनिया जान जाये कि जापान भारत की स्वाधीनता का समर्थक है और हमारा आन्दोलन तथा आई. एन. ए. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सके परन्तु जापानी अधिकारी इस सम्पूर्ण प्रकरण पर चुप्पी साधे रहे।

इससे भारतीय अधिकारियों और सैनिकों में रोष व्याप्त होने लगा। उन्हें लगने लगा कि जापानी सरकार आजाद हिन्द फौज का उपयोग अपने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये कठपुतली के रूप में करना चाहती है। 8 दिसम्बर 1942 को ले. कर्नल एन. एस. गिल को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे मामला गम्भीर हो गया।

मोहनसिंह और मेनन ने अपने साथियों के साथ विचार-विमर्श कर निर्णय लिया कि जापानियों के साथ सहयोग नहीं किया जाये। मोहनसिंह ने जापान सरकार को एक पत्र लिखकर मांग की कि 23 दिसम्बर 1942 तक सरकार अपनी नीति स्पष्ट करे अन्यथा आजाद हिन्द फौज अपनी स्वाधीनता की कार्यवाही करने के लिये स्वतंत्र होगी।

उन्होंने सीलबन्द लिफाफे में एक पत्र भारतीय अधिकारियों के नाम रख दिया जिसमें उन्होंने लिखा कि यदि उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है तो आजाद हिन्द फौज को भंग कर दिया जाए। मोहनसिंह के पत्र ने जापान सरकार और रासबिहारी बोस दोनों को ही नाराज कर दिया। रासबिहारी बोस के आदेश से मोहनसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और आजाद हिन्द फौज को भंग कर दिया गया। 

रास बिहारी बोस की अपील

रास बिहारी बोस पुराने क्रांतिकारी थे, जोश के साथ-साथ उनमें नेतृत्व गुण, धैर्य एवं व्यवहारिकता कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने मोहनसिंह को गिरफ्तार करवाने के बाद भारतीयों के नाम एक अपील जारी की-

‘हमारे पास न पैसा है, न आदमी और हथियार भी नहीं हैं। हम आजादी के लिये लड़ना चाहते हैं किंतु कैसे लड़ेंगे? मैं जापानियों से सहायता लेने के पक्ष में हूँ पर साथ ही अँग्रेजों को हटाकर जापानियों को अपना स्वामी नहीं बनाना चाहता। मैं नहीं चाहता कि जापानी भारत भूमि पर पैर रखें किंतु 30 लाख भारतीयों को जो स्वदेश से हजारों मील दूर रह रहे हैं, उन्हें जापानियों के सहयोग के बिना एकजुट करना भी सम्भव नहीं है। जापान युद्ध में व्यस्त है, हमें उससे झगड़ा खड़ा करके नहीं अपितु सहयोग करके सहायता लेनी चाहिये।’

आजाद हिंद फौज के भंग हो जाने के बाद रास बिहारी बोस ने इण्डियन इण्डिपेंडेस लीग (आई. आई. एल.) की विभिन्न कमेटियों के प्रतिनिधियों का दूसरा सम्मेलन अप्रैल 1943 में बुलाया। यह सम्मेलन उनकी कठिनाइयों का समाधान नहीं कर पाया और सब लोग, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

सुभाष चंद्र बोस का दक्षिण-पूर्वेशिया में आगमन

जून 1942 में रासबिहारी बोस ने सुभाषचंद्र बोस को पूर्वी एशिया में आने तथा आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व सम्भालने का निमन्त्रण दिया था। 8 फरवरी 1943 को सुभाष ने फ्रेकेन बर्ग से एक जर्मन यू-बोट से अपनी यात्रा आरम्भ की।

पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार मेडागास्कर से 400 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक नियत स्थान पर जर्मन यू बोट से निकालकर उन्हें जापानी पनडुब्बी 129 में चढ़ाया गया। यह पनडुब्बी 6 मई 1943 को सुमात्रा के उत्तर में स्थित साबन द्वीप पहंुची। यहाँ पर उनके पुराने परिचित कर्नल यामामोटो ने जापान सरकार की ओर से उनका स्वागत किया।

साबन द्वीप पर कुछ दिन विश्राम करने के बाद सुभाष बाबू हवाई जहाज से 16 मई 1943 को टोकियो पहुंचे। उनके जापान पहुंचने की सूचना कुछ दिनों तक गुप्त रखी गई। जब सुदूर पूर्व में बसे भारतीयों को जून 1943 में यह जानकारी मिली कि सुभाष बाबू जापान पहुंच गये हैं तो उनमें प्रसन्नता की लहर दौड़ गई और स्वाधीनता आन्दोलन मे नई जान आ गई।

नेताजी के टोकियो पहुँचने के पूर्व ही द्वितीय विश्वयुद्ध की स्थिति में भारी परिवर्तन आ चुका था। यूरोप में जर्मनी कई मोर्चों पर पराजित हो चुका था और मित्र राष्ट्रों की स्थिति दिन-प्रतिदिन सुदृढ़ होती जा रही थी।

सुभाषचन्द्र बोस ने टोकियो में जापान के प्रधानमंत्री तोजो से लम्बी बातचीत की। प्रधानमंत्री तोजो, सुभाष के व्यक्तित्व तथा उनकी बातचीत से बहुत प्रभावित हुआ और उसने जापानी संसद (डीट) में घोषणा की कि- ‘जापान ने दृढ़ता के साथ फैसला किया है कि वह भारत से अँग्रेजों को; जो भारतीय जनता के दुश्मन हैं, निकाल बाहर करने और उनके प्रभाव को खत्म करने के लिये सब तरह की सहायता देगा तथा भारत को वास्तविक अर्थ में पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करने में समर्थ बनायेगा।’

भारतीयों के लिये मर्मस्पर्शी संदेश

2 जुलाई 1943 को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस सिंगापुर पहुंचे जहाँ उनका शानदार स्वागत किया गया। 4 जुलाई को कैथे सिनेमा हॉल में आयोजित एक भव्य समारोह में उन्होंने विधिवत् ढंग से आई. आई. एल.(इण्डियन इण्डिपेण्डेन्स लीग) का अध्यक्ष पद ग्रहण किया। ले. कर्नल के. भौंसले ने सैनिकों की तरफ से उनका अभिनन्दन किया। इस अवसर पर नेताजी ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनाने और आजाद हिन्द फौज को लेकर हिन्दुस्तान जाने की घोषणा की। 5 जुलाई 1943 को सुभाष बाबू ने आजाद हिन्द फौज के पुनर्निर्माण की घोषणा की तथा सेना का निरीक्षण किया।

इस अवसर पर उन्होंने कहा- ‘यह केवल अँग्रेजी दासता से भारत को मुक्त कराने वाली सेना नहीं है, अपितु बाद में स्वतन्त्र भारत की राष्ट्रीय सेना का निर्माण करने वाली सेना भी है। साथियो! आपके युद्ध का नारा हो- चलो दिल्ली, चलो दिल्ली। इस स्वतन्त्रता संग्राम में हम में से कितने जीवित बचेंगे, यह मैं नहीं जानता परन्तु मैं यह जानता हूँ कि अन्त में विजय हमारी होगी और हमारा ध्येय तब तक पूरा नहीं होगा जब तक हमारे शेष जीवित साथी ब्रिटिश साम्राज्य की एक अन्य कब्रगाह- लाल किले पर विजयी परेड नहीं करेंगे।’

सुभाषचंद्र बोस ने परेड की सलामी लेने के बाद सिंगापुर रेडियो से भारतीयों के नाम मर्मस्पर्शी संदेश दिया- ‘एक वर्ष से मैं मौन एवं धैर्य के साथ समय की प्रतीक्षा कर रहा था। वह घड़ी आ पहुंची है कि मैं बोलूँ। ब्रिटिश दासता से भारतीयों को मुक्ति मिल सकती है- उन अँग्रेजों से जिन्होंने सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से अब तक हमें गुलाम बना रखा है। ब्रिटिश साम्राज्य के शत्रु हमारे स्वाभाविक मित्र हैं। समस्त भारतीयों की ओर से मैं घोषणा करता हूँ कि ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक भारत आजाद न हो जाये।’

उन्होंने भारतीयों से अपील की– ‘दिल्ली चलो। यह रास्ता खून, पसीने और आंसू से भरा हुआ है……।

लोकप्रिय नारों का निर्माण

भारत की आजादी के लिये भारतीयों को जागृत करने के उद्देश्य से सुभाष बाबू ने संसार के सर्वश्रेष्ठ नारों का निर्माण किया। उनका विश्वविख्यात उद्घोष जयहिंद पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। उनका दूसरा नारा था– ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’ दिल्ली चलो नारा भी खूब लोकप्रिय हुआ।

अस्थायी भारत सरकार का गठन

21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार का गठन किया जिसमें कप्तान लक्ष्मी स्वामीनाथन, ले. कर्नन, ए. सी. चटर्जी, एस. ए. अय्यर, ले. कर्नल अजीज अहमद खाँ, ले. कर्नल ए. डी. लोगनाथन, एहसान कादर, शाहनवाज खाँ, डी. राजू, ए. एम. सहाय, ए. जेलाप्पा, देवनाथ दास, करीम गनी, डी. एम. खान, जो. जीवय और ईश्वरसिंह को मंत्री बनाया गया।

23 अक्टूबर को सुभाषचन्द्र बोस ने भारत की अस्थायी सरकार की तरफ से ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। शीघ्र ही धुरी राष्ट्रों- जर्मनी, जापान और इटली तथा उनके प्रभाव के अन्तर्गत काम करने वाली सरकारों- स्याम, बर्मा, फिलिपीन इत्यादि ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार को मान्यता दे दी। जापान ने अण्डमान-निकोबार द्वीप समूहों का प्रशासन इस अस्थायी सरकार को सौंप दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – भारतीय राजनीति में सुभाषचन्द्र बोस का उदय

राजनीति में नेताजी सुभाषचंद्र बोस

भारतीय राष्ट्रीय सेना में सुभाषचंद्र बोस

आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन

सुभाषचन्द्र बोस की सफलताएँ

आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन

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आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन

रासबिहारी बोस ने 1 सितम्बर 1942 को आजाद हिन्द फौज की स्थापना की थी किंतु कुछ कठिनाइयों के कारण इसे भंग कर देना पड़ा। जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने रासबिहारी बोस के साथ काम करने का निश्चय किया तो सुभाष बाबू ने आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन करने का निश्चय किया।

सुभाष द्वारा आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन

सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज को पुनर्गठित करने का काम आरम्भ किया। कुछ ही दिनों में तीन ब्रिगेडों- गांधी ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड और नेहरू ब्रिगेड खड़ी कर दी गई। चुने हुए सैनिकों को लेकर चौथी ब्रिगेड- सुभाष ब्रिगेड भी गठित कर ली गई।

भारतीय स्त्री सैनिकों की सेना गठित करने के लिये उनके प्रशिक्षण हेतु सिंगापुर में एक शिविर स्थापित किया गया। इसमें 500 महिला सैनिक रखे गये। उनका नेतृत्व डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया। आईएनए का कमाण्डर इन चीफ बनने के बाद पूर्व एशिया में इण्डियन इण्डिपेण्डेंस आंदोलन का नेतृत्व भी सुभाष चंद्र के हाथों में आ गया।

आजाद हिन्द फौज में सैनिकों की भर्ती और प्रशिक्षण की अलग-अलग व्यवस्था की गई। स्त्री तथा पुरुष सैनिकों के लिये अलग-अलग प्रशिक्षण शिविर स्थापित किये गये। सैनिकों को हिन्दुस्तानी भाषा में निर्देश दिये जाते थे। 6 माह के प्रशिक्षण के बाद रंगरूटों को आजाद हिन्द फौज में सम्मिलित कर लिया जाता था।

प्रवासी भारतीयों को इस आन्दोलन से जोड़ने के लिये सुभाषचन्द्र बोस ने हाँगकाँग, शंघाई, मनीला, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो सहित कई देशों का दौरा किया और प्रवासी भारतीयों को अपने उद्देश्यों से अवगत कराया। उनके प्रेरक और चुम्बकीय व्यक्तित्व ने प्रवासी भारतीयों को बहुत आकर्षित किया और उन्होंने तन-मन-धन से इस आन्दोलन को सहयोग दिया। दिसम्बर 1943 में आजाद हिन्द फौज की स्थिति इस प्रकार से थी-

प्रथम डिवीजन: सेनापति ले. कर्नल एम. जेड. कियानी (बाद में मेजर जनरल) इसमें लगभग 10,000 सैनिक थे जो मोर्चे पर जाने के लिये तैयार थे। इसकी तीन ब्रिगेडों का नेतृत्व क्रमशः ले. कर्नल आई. जे. कियानी, ले. कर्नल गुलजारा सिंह और ले. कर्नल अजीज अहमद खाँ को सौंपा गया।

दूसरी डिवीजन: इसमें अधिकतर नागरिक रंगरूट थे और इसकी कमान ले. कर्नल एन. एस. भगत को सौंपी गई।

तीसरी डिवीजन: इसमें भी नागरिक रंगरूट सम्मिलित थे और इसका प्रशिक्षण अभी जारी था। इसका केन्द्र सिंगापुर में था और इसकी कमान मेजर जनरल जे. के. भौंसले को सौंपी गई।

सुभाष ब्रिग्रेड: शाहनवाज खाँ की कमान में सुभाष ब्रिगेड भी गठित की गई। इस ब्रिगेड में प्रथम डिवीजन के चुने हुए सैनिकों को ही भरती किया गया।

दक्षिण पूर्वेशियाई देशों के प्रवासी भारतीयों के प्रयास

दक्षिण पूर्वेशियाई देशों- थाइलैण्ड, मलाया, सिंगापुर, बर्मा आदि में 30 लाख से अधिक प्रवासी भारतीय रहते थे। ये देश भी भारत की तरह अँग्रेजों के अधीन थे। इसलिये इन देशों ने सुभाषचंद्र बोस का स्वागत किया। लगभग उन्हीं दिनों बैंकाक में पुराने क्रांतिकारी अमरसिंह ने इण्डियन इण्डिपेंडेंस लीग का गठन किया।

अमरसिंह भारतीय जेलों में 22 साल तक जेल भुगत चुके थे। रामानंद पुरी ने थाईलैण्ड में इण्डियन नेशलन कौंसिल का गठन किया। उस्मान खाँ ने शंघायी में गदर पार्टी बनाई। इन सभी दलों ने जापान की सहायता से भारत की मुक्ति का अभियान चलाया।

जब 1942 ई. में जापानी फौज ने बर्मा पर आक्रमण किया था तब प्रवासी भारतीय प्रीतमसिंह भी अपने साथ कुछ भारतीयों को लेकर जापानी फौज के साथ मोर्चे पर गये। प्रीतमसिंह तथा उनके साथी, अँग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों को यह समझाने का प्रयास करते थे कि वे जापान की सेना पर आक्रमण न करें क्योंकि जापानियों ने भारत की स्वाधीनता का समर्थन किया है।

युद्ध के मोर्चे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस

सुभाषचंद बोस ने जापानी नेताओं को इस बात के लिये सहमत कर लिया कि भारत-बर्मा सीमा पर जापानी सेना के साथ आजाद हिन्द फौज भी युद्ध लड़े। सुभाषचंद्र की योजना थी कि आजाद हिन्द फौज बर्मा मोर्चे से भारत की सीमा में प्रवेश करके बंगाल और असम से ब्रिटिश फौजों के पीछे धकेल दे।

उनका विश्वास था कि आजाद हिन्द फौज की सफलता देखकर भारतीय जनता, अँग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर देगी जिससे भारत को मुक्त करवाना सरल हो जायेगा। भारत की जो भूमि मुक्त कराई जायेगी, उसका शासन आाजद हिन्द फौज को सौंप दिया जायेगा और उस भूमि पर केवल भारत का तिंरगा फहराया जायेगा।

इस योजना के अनुसार आजाद हिन्द फौज की सुभाष ब्रिगेड, भारत-बर्मा की सीमा पर पहुँच गई। सुभाषचन्द्र बोस ने रंगून पहुँच कर अपना मुख्यालय स्थापित किया। सुभाष ब्रिगेड की छोटी-छोटी टुकड़ियों ने भारतीय अधिकारियों के नेतृत्व में आगे बढ़ना आरम्भ किया।

1942 ई. में जब जापानियों ने बर्मा अधिकृत किया था, उस समय की तुलना में अब परिस्थिति काफी बदल चुकी थी। अब भारत-बर्मा सीमा पर अँग्रेजों ने अपनी स्थित काफी मजबूत कर ली थी। ब्रिटिश सेनाएं न केवल रक्षात्मक युद्ध के लिये अपितु आक्रमण के लिये भी तैयार थीं। आजाद हिन्द फौज के सैनिकों का मनोबल काफी ऊँचा था परन्तु युद्ध की दृष्टि से फौज पूरी तरह से सुसज्जित नहीं थी।

मेजर जनरल चटर्जी ने अपनी पुस्तक इण्डियन स्ट्रगल फॉर फ्रीडम में लिखा है-

‘हमारी सेना जब बर्मा पहुँची तब उसके पास न तो तोपखाना था और न ही मोर्टार। मशीनगनें भी मध्यम दूरी तक मार करने वाली थीं और उनकी हालत भी खस्ता थी क्योंकि मरम्मत के लिये आवश्यक पुर्जों की कमी थी। हमारी छापामार रेजीमेन्ट के पास न तो वायरलेस उपकरण थे और न टेलीफोन। पहाड़ी इलाके में अतिरिक्त गोला-बारूद और हथियारों को ढोने के लिये परिवहन की कोई सुविधा या साधन भी उपलब्ध नहीं थे। चिकित्सा सेवा तो नाममात्र की थी। सैनिकों के पास जूते तक नहीं थे। उन्हें नंगे पैर जंगलों में जाना पड़ता था।’

जनवरी 1994 के अन्त में सुभाष ब्रिगेड की एक बटालियन को अराकान की कलादान घाटी में तथा दूसरी और तीसरी बटालियन को चिन पहाड़ियों की ओर भेजा गया। पहली बटालियन ने कलादान घाटी में पश्चिमी अफ्रीका की हब्शी सेना को परास्त कर आगे बढ़ना आरम्भ किया तथा पलेतवा एवं दलेतमे नामक स्थानों पर शत्रु सेना को परास्त कर क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

मई 1944 में उसने मादोक नामक स्थान जीत लिया जो भारत की भूमि पर अँग्रेजों की अग्रिम चौकी थी। इस प्रकार आजाद हिन्द फौज ने भारत की भूमि पर कदम रख दिये। शीघ्र ही अँग्रेजों की सेना ने जोरदार आक्रमण किया। इस अवसर पर जापानी सेना मादोक के सैनिकों को सहायता पहुँचाने में असमर्थ रही।

अतः आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों को मादोक से हट जाने को कहा गया परन्तु भारतीय सैनिक डटे रहे और मई से सितम्बर तक उन्होंने इस क्षेत्र की रक्षा की और तब तक मादोक में तिरंगा लहराता रहा।

सुभाष ब्रिगेड की दूसरी और तीसरी बटालियनों ने भी अपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया। उन्हें कलेवा से होकर टासू और फोर्ट हवाइट के मार्ग की रक्षा का भार सौंपा गया। इस क्षेत्र में आजाद हिन्द फौज के सैनिकों ने मित्र राष्ट्रों के छापामारों का सफाया किया तथा मेजर मार्निंग की सेना को परास्त करके अँग्रेजों के सामरिक दुर्ग क्लैंग-क्लैंग को जीत लिया।

आजाद हिन्द फौज की वीरता से प्रसन्न होकर जापानी सेनापति ने समस्त सुभाष ब्रिगेड को कोहिमा की ओर कूच करने का आदेश दिया। यह निश्चय किया गया कि इम्फाल का पतन होते ही सुभाष ब्रिगेड ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके बंगाल में प्रवेश कर जाये।

इस बीच आजाद हिन्द फौज की दूसरी टुकड़ियां जापान के मंजूरियाई डिवीजन के साथ कोहिमा पहुँच गईं और घमासान युद्ध के बाद कोहिमा पर अधिकार जमा लिया। इसके बाद युद्ध के अन्य क्षेत्रों में जापानियों की पराजय का सिलसिला आरम्भ हो गया। इसका लाभ उठाते हुए अँग्रेज इम्फाल में नई कुमुक पहंचाने में सफल रहे।

इससे इम्फाल बच गया। अब अँग्रेजों ने दीमापुर और कोहिमा की तरफ से जोरदार हमला किया। इस कारण जापानियों के साथ-साथ आजाद हिन्द फौज को भी पीछे हटना पड़ा।

गांधी ब्रिगेड को अप्रैल के आरम्भ में इम्फाल की तरफ भेजा गया। जापानियों ने सोचा था कि अब तक इम्फाल का पतन हो गया होगा परन्तु मार्ग में सूचना मिली कि फलेल के निकट घमासान युद्ध चल रहा है। इस पर गांधी ब्रिगेड के छापामार सैनिकों ने फलेल के हवाई अड्डे पर अधिकार करके वहाँ मौजूद वायुयानों को नष्ट कर दिया।

इस अभियान में गांधी ब्रिगेड के लगभग 250 सैनिक मारे गये। फिर भी गांधी ब्रिगेड बहादुरी के साथ डटी रही और अँग्रेजों को आगे नहीं बढ़ने दिया। जून 1944 में रसद पानी और गोला-बारूद की कमी से गंाधी ब्रिगेड की स्थिति बिगड़ने लगी, जबकि दूसरी तरफ नई कुमुक आ जाने से अँग्रेज सेना की स्थिति मजबूत हो गई।

वर्षा ऋतु में टास-फलेल सड़क बह गई और आजाद हिन्द फौज को रसद मिलना भी बन्द हो गया। ऐसी स्थिति में कुछ दिनों बाद गांधी ब्रिगेड को भी जापानी सेना के साथ बर्मा लौटना पड़ा। इस प्रकार, आजाद हिन्द फौज का मुख्य अभियान जो मार्च 1944 में आरम्भ हुआ था, वह समाप्त हो गया।

इस अभियान के दौरान वह भारतीय सीमा में लगभग 150 मील भीतर तक प्रवेश करने में सफल रही परन्तु रसद और गोला-बारूद के अभाव में अधिक दिनों तक उस क्षेत्र की रक्षा नहीं कर सकी। इस अभियान में आजाद हिन्द फौज के लगभग 4000 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।

सुभाष चंद्र बोस के अन्तिम दिन

अब ब्रिटिश सेना ने बर्मा पर पुनः अधिकार करने के लिये आक्रमण किया। उनका आक्रमण इतना जोरदार था कि जापानियों को निरन्तर पीछे हटना पड़ा। जापानी सेना रंगून की रक्षा का भार, आजाद हिन्द फौज को देकर बर्मा से चली गई। आजाद हिन्द फौज ने कुछ दिनों तक बहादुरी के साथ नगर की रक्षा की परन्तु मई 1945 के आरम्भ में रंगून पर अँग्रेजों का अधिकार हो गया।

आजाद हिन्द फौज के सैकड़ों सैनिक बन्दी बना लिये गये। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस रंगून से बैंकाक और वहाँ से सिंगापुर चले गये। जापानियों की सहायता से भारत को स्वतन्त्र कराने की आशा समाप्त हो गई। क्योंकि इस समय तक जापान के साथी राष्ट्रों- जर्मनी और इटली का पतन हो चुका था और जापान अकेला ही मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध लड़ रहा था।

अमरीका ने 6 और 8 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम गिराये। इसके बाद रूस ने भी जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। 15 अगस्त 1945 को जापान ने मित्र-राष्ट्रों के समक्ष समर्पण कर दिया। सुभाषचन्द्र बोस अपने एक साथी कर्नल हबीब उर रहमान के साथ 17 अगस्त 1945 को एक लड़ाकू विमान से सैगांव से टोकियो के लिये रवाना हुए।

17 अगस्त की रात्रि को विमान में सवार लोगों ने तूरेन (हिन्द-चीन) में विश्राम किया। अगले दिन विमान ताइपेह पहुँचा। ताइपेह से रवाना होते ही विमान में अचानक आग लग गई। इस कारण कुछ जापानी अधिकारियों सहित नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की भी मृत्यु हो गई। कर्नल हबीब उर रहमान जीवित बच गये।

बहुत से लोगों का विश्वास है कि नेताजी उस दुर्घटना में नहीं मारे गये थे। मित्र राष्ट्रों के हाथों में पड़ने से बचने के लिये वे भूमिगत हो गये थे। भारत सरकार विमान दुर्घटना को सही मानती है। जापान सरकार का भी मानना है कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को हवाई दुर्घटना में हुई थी और ताइपेह में उनका अन्तिम संस्कार किया गया था।

उनकी भस्मी को सम्मानपूर्वक टोकियो लाया गया और 14 सितम्बर 1945 को उसे रियो कोजू मन्दिर में रख दिया गया। इस घटना के बाद संसार ने सुभाष को नहीं देखा किंतु बहुत से लोगों ने सुभाष बाबू को देखने एवं उनसे मिलने का दावा किया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – भारतीय राजनीति में सुभाषचन्द्र बोस का उदय

राजनीति में नेताजी सुभाषचंद्र बोस

भारतीय राष्ट्रीय सेना में सुभाषचंद्र बोस

आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन

सुभाषचन्द्र बोस की सफलताएँ

सुभाषचन्द्र बोस की सफलताएँ

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सुभाषचन्द्र बोस की सफलताएँ

जिस समय देश को आजादी मिली, उस समय सुभाषचन्द्र बोस जीवित नहीं थे, फिर भी देश की आजादी में उनका बहुत बड़ा हाथ था। सुभाषचन्द्र बोस की सफलताएँ अप्रतिम थीं।

सुभाषचन्द्र बोस की सफलताएँ

आजाद हिन्द फौज की सफलताओं का मूल्यांकन

आजाद हिन्द फौज के नायकों और सैनिकों में देश भक्ति की उज्जवल भावना थी। उन्होंने भारत को अँग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने के लिये भारत में प्रवेश करने की योजना बनाई परन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के मोर्चों पर जापान की पराजय के साथ ही आजाद हिन्द फौज की योजना असफल हो गई किंतु आजाद हिन्द फौज की झोली में कई सफलताएं हैं-

(1.) आजाद हिन्द फौज ने भारत की स्वतन्त्रता के प्रश्न को ब्रिटिश साम्राज्य के संकुचित दायरे से निकालकर अन्तर्राष्ट्रीय चिंता का विषय बना दिया।

(2.) भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में यह एक अनूठी घटना थी। इससे पहले ऐसा अद्भुत प्रयास और किसी ने नहीं किया था।

(3.) संसार के अन्य देशों के इतिहास में ऐसी घटना देखने में नहीं आती कि हजारों देशभक्तों ने अपने देश को साम्राज्यवादियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिये देश के बाहर रहकर सशस्त्र सेना का निर्माण किया हो और साम्राज्यवादियों की सेना पर धावा बोला हो।

(4.) आजाद हिन्द फौज के पास संसाधनों का अभाव था फिर भी सैनिक बड़ी बहादुरी से लड़े। उनकी पुरानी किस्म की बंदूकंे, साम्राज्यवादियों को परास्त करने में सक्षम नहीं थीं। आजाद हिन्द फौज के सैनिकों के पास जूते तक नहीं थे। वे युद्ध के मोर्चे पर भूखे-प्यासे रहकर लड़े और देश की आजादी के लिये शहीद हो गये।

(5.) उन्होंने कई मोर्चों पर अपने से अधिक शक्तिशाली ब्रिटिश सेना को कई बार पीछे धकेल कर भूमि पर अधिकार किया तथा उसे अपने अधिकार में रखा।

(6.) आजाद हिन्द फौज ने कुछ समय के लिये रंगून को अपने अधिकार में रखा तथा रंगून की रक्षा के लिये वीरता से लड़ाई की।

(7.) आजाद हिन्द फौज ने जिस अनुपम त्याग, शौर्य और बलिदान का परिचय दिया भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का गौरवमय अध्याय है। हमें उसकी वीर गाथाओं से सदैव प्रेरणा मिलती रहेगी।

(8.) आजाद हिन्द फौज के सेनापति नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतवासियों को जयहिन्द का नारा दिया जो आज भी हर भारतीय की छाती गर्व से फुला देता है।

(9.) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारत की भूमि से बाहर रहकर स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की जिसे जापान, इटली तथा जर्मनी आदि देशों ने मान्यता प्रदान की। ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

(10.) आजाद हिन्द फौज ने कांग्रेसी नेताओं के मन में घबराहट उत्पन्न कर दी। उन्हें लगा कि सुभाष बाबू किसी भी दिन अपनी सेना लेकर दिल्ली में उतर जायेंगे तथा सत्ता कांग्रेस के हाथ में आने के बजाय सुभाषचंद्र बोस के हाथों में चली जायेगी। इस कारण कांग्रेस ने, अँग्रेजों से सत्ता लेने के प्रयास तेज कर दिये। गांधी ने करो या मरो तथा अभी नहीं तो कभी नहीं जैसे नारे दिये। अहिंसावादियों की अहिंसा का हिमालय पिघल गया। जवाहरलाल नेहरू ने घबराकर वक्तव्य दिया कि हम भारत की भूमि पर सुभाष का सामना तलवारों से करेंगे।

(11.) जब अँग्रेज सरकार ने आजाद हिन्द फौज के 60,000 सैनिकों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया  तो रॉयल इण्डिया नेवी के 200 सामुद्रिक बेड़ों ने विद्रोह कर दिया और बम्बई के बंदरगाह पर आकर लंगर डाल दिया। जहाजों पर तैनात तोपों का मुंह बंदरगाह के प्रवेश द्वार की तरफ कर दिया गया। 22 और 24 फरवरी 1946 को चिंचपोकली एवं आर्य नगर आदि उपनगरों की जनता ने सड़कों पर उतर कर विद्रोही सैनिकों के समर्थन में प्रदर्शन किया। भारत की वायुसेना और नौ सेना में बगावत फैल गई। बम्बई, कराची, कलकत्ता, मद्रास आदि नौ बंदरगाहों में हड़ताल हो गई। विद्रोही सैनिकों ने आजाद हिंद फौज के बिल्ले धारण किये। अँग्रेज अधिकारियों ने हड़ताली सैनिकों पर गोलियां चलाईं। हड़ताली नौ-सैनिकों ने गोली का जवाब गोली से दिया।

(12.) वायु सैनिकों एवं नौ सैनिकों की हड़ताल से प्रभावित होकर थल सेना में भी बगावत फैल गई। जबलपुर भारतीय सिगलन कोर के 300 जवानों ने हड़ताल पर जाने की घोषणा की। इस घोषणा से द्वितीय विश्व युद्ध के मोर्चों पर विजय प्राप्त करने वाले अँग्रेजों के हाथ-पैर फूल गये। इस हड़ताल के ठीक एक माह बाद ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन की घोषणा की ताकि भारतीयों को अंतिम रूप से सत्ता का हस्तांतरण किया जा सके। यही कारण था कि नेताजी की मृत्यु के दो वर्ष बाद ही भारत को आजादी मिल गई।

क्या सुभाषचंद्र बोस फासिस्ट थे !

साम्राज्यवादी अँग्रेजों तथा दक्षिणपंथी-कांग्रेसियों ने सुभाषचंद्र बोस पर फासिस्ट होने का आरोप लगाया है। यहाँ तक कि वामपंथी-कांग्रेसी माने जाने वाले जवाहरलाल नेहरू ने भी सुभाष बाबू पर यह आरोप लगाया है परन्तु यह आरोप सही नहीं है। सुभाष बाबू फासिस्टवादी नहीं थे, वे राजनीतिक यथार्थवादी थे। वे भारत को ब्रिटिश दासता से मुक्त देखना चाहते थे।

वे अँग्रेजी साम्राज्य को किसी भी प्रकार से भारत से बाहर कर देना चाहते थे। उन्होंने न तो अँग्रेजों के बनाये संविधान की परवाह की और न गांधीजी के आधे-अधूरे और लिजलिजे अहिंसावाद को अपनाया। सुभाष ने जीवन की शुरुआत राजनीति के क्षेत्र से की किंतु वे शीघ्र ही समझ गये कि भारत की आजादी का रास्ता युद्ध के मोर्चों पर जाकर ही खोला जा सकता है।

उन्होंने 1930 से 1938 ई. तक मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू एवं गांधी के साथ कांग्रेस में रहकर राजनीति की। कांग्रेस द्वारा अपमानित किेय जाने से क्षुब्ध होकर उनका राजनीति से मोहभंग हो गया और वे देश छोड़कर चले गये। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध की परिस्थितियों से लाभ उठाते हुए, भारत की मुक्ति का उपाय ढूंढा और आजाद हिन्द फौज लेकर देश की सीमा पर आ डटे।

वे जान चुके थे कि राष्ट्रों का निर्माण और उनकी मुक्ति के निर्णय युद्ध के मोर्चों पर होते हैं जिन्हें शांति और समझौते की मेजों पर बैठकर अन्य लोगों द्वारा हथिया लिया जाता है। फिर भी उन्होंने युद्ध के मोर्चे खोले और भारत की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया।

यह सही है कि सुभाष ने फासिस्टवादी और नाजीवादी शक्तियों की सहायता ली किंतु वे स्वयं कभी भी फासिस्टवादी या नाजीवादी नहीं बने। उनके विरुद्ध एक भी ऐसा प्रमाण नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि वे फासिस्टवादी या नाजीवादी थे।

सुभाष बाबू को बदनाम करने के लिये ही अँग्रेजों एवं कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें फासिस्टवादी कहा। सुभाष बाबू को तोजो का कुत्ता कहकर भी अपमानित किया गया। ऐसी स्थिति में भी सुभाष ने आजाद हिन्द फौज की ब्रिगेडों के नाम गांधी ब्रिगेड तथा नेहरू ब्रिगेड रखे।

यदि वे फासिस्टवादी होते तो ऐसा किसी भी हालत में नहीं करते, वे अपनी ब्रिगेडों के नाम इटली, जर्मनी और जापान के नेताओं के नाम पर रखते। ऐसा करने से उन्हें कौन रोक सकता था? वे सुभाष ही थे जिन्होंने 6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो से अपने संदेश प्रसारण में गांधीजी को राष्ट्रपति की उपाधि से प्रथम बार सम्बोधित किया। उनके शब्दों का ही जादू था कि आजादी के बाद गांधीजी को राष्ट्रपिता कहा जाने लगा तथा हर भारतीय अपने भाषण के अंत में जयहिन्द बोलने लगा।

सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रवादी थे!

सुभाषचंद्र बोस भारत के राजनीतिक गगन पर सबसे दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह हैं। जब भविष्य में भारतीय राजनीति के अनेक चमकते सितारे बुझकर निष्प्रभ हो जायंगे तथा विस्मृति की ठोकरें खाकर इधर-उधर बिखर जायेंगे, तब भी सुभाषचंद्र बोस, धु्रव तारे की तरह अटल रहकर भारतवासियों को दिशा दिखाते रहेंगे।

सुभाषचंद्र बोस यथार्थवादी राजनीतिज्ञ थे। उनके अनुसार गांधीवाद के पास समाज निर्माण की कोई वास्तविक योजना नहीं थी। सुभाष का मानना था कि भारत में साम्यवाद भी नहीं पनप नहीं सकता, क्योंकि साम्यवाद, राष्ट्रवाद को स्वीकार नहीं करता और वह समस्त विश्व में विद्रोह कराना चाहता है।

जबकि आम भारतीय राष्ट्रवादी है, वह विद्रोही नहीं है। भारत संसार के उन गिने चुने देशों में से है जहाँ के नागरिक अपने देश को, अपने परिवार एवं अपने शरीर से भी अधिक प्रेम करते हैं। सुभाष के इन्हीं विचारों के कारण उन पर यह आरोप लगाया जाता रहा कि वे फासिस्ट थे जबकि सत्य यह है कि वे राष्ट्रवादी थे। वे जीवन के आरम्भ में भी राष्ट्रवादी थे और जीवन के मध्य तथा अन्त में भी राष्ट्रवादी रहे। राष्ट्र की स्वतन्त्रता के लिये उन्होंने युद्ध क्षेत्र में प्राण न्यौछावर किये।

सुभाष बाबू संसार के अकेले ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने नौकरशाहों की सबसे बड़ी परीक्षा उत्तीर्ण की, वे राजनीति में चरम शिखर तक पहुंचे तथा सशस्त्र सेना का निर्माण कर उसके अध्यक्ष बने।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – भारतीय राजनीति में सुभाषचन्द्र बोस का उदय

राजनीति में नेताजी सुभाषचंद्र बोस

भारतीय राष्ट्रीय सेना में सुभाषचंद्र बोस

आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन

सुभाषचन्द्र बोस की सफलताएँ

स्वतंत्रता के द्वार पर भारत

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स्वतंत्रता के द्वार पर भारत

भारत का स्वतंत्रता के द्वार पर पहुंचना एक विस्मयकारी ऐतिहासिक घटना थी। इसके लिए विगत लगभग एक सौ सालों से भारतीय जनता प्राण-प्रण से प्रयासरत थी।

भारत की स्वतंत्रता किसी एक घटना या आंदोलन का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे बहुत सी घटनाओं, आंदोलनों एवं दबावों ने काम किया। इसका श्रेय किसी एक व्यक्ति अथवा किसी एक दल को नहीं दिया जा सकता।

भारत की स्वतंत्रता के लिये जिम्मेदार तत्त्वों की जड़ें सम्पूर्ण भारत एवं भारत से बाहर कई देशों में फैली हुई थीं। 1857 ई. में लड़े गये प्रथम स्वातंत्र्य समर से लेकर 1947 ई. में स्वाधीनता प्राप्ति तक, लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी अथवा वे इस प्रक्रिया में दंगों, हमलों एवं दुर्घटनाओं के शिकार हो गये अथवा पुलिस एवं सेना द्वारा मार दिये गये।

भारत को स्वतंत्रता देने के कारण

भारत, इंग्लैण्ड के राजमुकुट में जगमगाने वाला सबसे चमकदार हीरा था। भारत, इंग्लैण्डवासियों की बहुत बड़ी कमजोरी थी क्योंकि भारत से इंग्लैण्ड के लिये अनवरत धन का प्रवाह होता था। अंग्रेज भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का दमन करते आ रहे थे फिर भी द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करने का निर्णय लिया तो उसके पीछे अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय कारण थे-

(1.) इंगलैण्ड को भारी क्षति

द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-45 ई.) में हुई भारी क्षति के बाद, ब्रिटेन की साम्राज्यवादी नीति में परिर्वतन आना स्वाभाविक था। युद्ध समाप्ति के समय तक लगने लगा था कि अब ब्रिटेन अधिक दिनों तक भारत पर अपना अधिकार बनाये नहीं रख सकेगा।

युद्ध के कारण ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गयी थी तथा भारत में स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर पहुँच चुका था। इस युद्ध के दौरान इंगलैण्ड पर अेकेले भारत का 500 अरब रुपये का ऋण हो गया था। 1939 ई. में युद्ध आरम्भ होते समय भारतीय सेना में 25 लाख सैनिक थे जो 1947 ई. में घटकर 12 लाख ही रह गये।

इनमें से ब्रिटिश सैनिकों की संख्या युद्ध के पश्चात् अर्थात् 1945 ई. में 11,400 रह गई तथा 1947 ई. में घटकर केवल 4,000 रह गई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के मोर्चों पर इंग्लैण्ड के नौजवान भारी संख्या में मार डाले गये थे इस कारण भारत सरकार में तेजी से भारतीय नौजवानों को जगह मिलती जा रही थी।

यही कारण था कि यदि भारत को 1947 ई. में स्वतंत्रता नहीं मिलती तो भी भारत सरकार का ब्रिटिश चेहरा, लगभग भारतीय हो जाता क्योंकि 1948 ई. में भारत में ब्रिटेन के केवल 300 सिविल सर्वेण्ट रह जाने थे, जबकि 1914 ई. में भारतीय सिविल सेवा के 1,400 सिविल सर्वेण्ट में से 1330 अँग्रेज थे।

(2.) अंतर्राष्ट्रीय दबाव

भारत को स्वतंत्र करने के लिये इंग्लैण्ड पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा था। ब्रिटेन की संसद में विपक्ष के नेता विंस्टन चर्चिल किसी भी सूरत में भारतीय स्वतंत्रता के पक्षधर नहीं थे किंतु उन्होंने भी अमरीकी दबाव में स्वीकार किया कि भारतीयों को आजादी देनी पड़ेगी जिसकी आशा में भारतीयों ने अँग्रेजों की ओर से युद्ध में भाग लिया था। रूस और चीन भी इंग्लैण्ड पर दबाव डाल रहे थे कि उसे युद्ध के समय किया गया अपना वायदा निभाना चाहिये तथा भारत को स्वतंत्र करना चाहिये।

(3.) भारतीय सेनाओं में विद्रोह

एक और भी बहुत बड़ा तत्व था जिसने ब्रिटिश सरकार के मनोविज्ञान को हिलाकर रख दिया था। अधिकांश ब्रिटिश इतिहासकार इस तत्व की चर्चा तक नहीं करते। भारतीय इतिहासकार भी ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा वर्णित तथ्यों की भूल-भुलैया में रास्ता भूल जाते हैं।

ब्रिटिश सरकार पर सर्वाधिक प्रभाव डालने वाला मनोवैज्ञानिक तत्व था आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के साथ भारतीय फौजों द्वारा दर्शायी गयी सहानुभूति एवं उससे उत्पन्न नौ-सैनिक तथा वायु-सैनिक विद्रोह। सैन्य विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार समझ गयी थी कि अब भारत को तुरंत आजादी देनी होगी चाहे मुस्लिम लीग कितना ही अड़ंगा क्यों न लगाये।

वायसराय वैवेल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘भारतीय सेना को अपने देशवासियों को कुचलने में आजमाना अब बुद्धिमानी नहीं होगी। समय बीतने के साथ भारतीय अधिकारियों, सेना और पुलिस की राजभक्ति संदिग्ध होती जायेगी….. ब्रिटिश सरकार की हालत बहुत नाजुक हो जायेगी यदि उसने भारतीय समस्या का हल शीघ्र न तलाश लिया और उसे यह हर कीमत पर तलाश लेना चाहिये।’

(4.) भारत में साम्प्रदायिक दंगे

एक ओर कांग्रेस भारत के लिये आजादी मांग रही थी और दूसरी ओर जिन्ना तथा मुस्लिम लीग, आजादी से पहले मुसमलानों के लिये अलग देश पाकिस्तान के लिये अड़े हुए थे। 16 अगस्त 1946 को वे सीधी कार्यवाही के माध्यम से हजारों हिन्दुओं को मौत के घाट उतारकर अपनी शक्ति का भयावह प्रदर्शन कर चुके थे।

उसके बाद भारत में साम्प्रदायिक दंगे रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। देश में चारों ओर मारकाट मच गई थी।

13 दिसम्बर 1946 को जिन्ना ने लंदन के किंग्जवे हॉल में भारत की संविधान सभा की भावी कार्यवाही के सम्बन्ध में ब्रिटिश सरकार से परामर्श करने के दौरान अलग मुस्लिम राष्ट्र के लिये भाव विह्वल अपील करते हुए कहा-

‘पाकिस्तान में एक सौ मिलियन लोग केवल मुसलमान होंगे। भारत के उत्तर पश्चिम और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में जो हमारी अपनी भूमि है और जहाँ हम सत्तर प्रतिशत बहुमत में हैं, में अपना एक राष्ट्र चाहते हैं। वहाँ हम अपनी जीवन शैली के अनुसार रह सकते हैं।

हमें कहा गया कि तथाकथित एकीकृत भारत ब्रिटिश द्वारा बनाया गया है। वह तलवार के जोर पर था। उसे उसी तरह नियंत्रित रखा जा सकता है जैसे नियंत्रित रखा गया है। किसी के कहने पर भ्रमित न हों कि भारत एक है तथा वह एक क्यों नहीं रह सकता? हमसे पूछिये कि हम क्या चाहते हैं? मैं कहता हूँ कि पाकिस्तान। इसके अलावा हम कुछ नहीं चाहते।’

(5.) अविश्वास का वातावरण

जैसे-जैसे भारत की आजादी निकट आती दिखाई दे रही थी, वैसे-वैसे भारत में चारों तरफ अविश्वास का वातावरण बढ़ता जा रहा था। जिन्ना और मुस्लिम लीग कांग्रेस पर अविश्वास करते थे तथा कांग्रेस वायसराय वैवेल पर अविश्वास करती थी। वायसराय को इंगलैण्ड की सरकार पर अविश्वास था और प्रधानमंत्री एटली, वायसराय वैवेल पर विश्वास नहीं करता था।

भारतीय नेताओं में भी परस्पर अविश्वास का वातावरण था। सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू भारत के विभाजन को अनिवार्य मानते थे किंतु कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम तथा गांधीजी हर हाल में विभाजन रोकना चाहते थे भले ही आजादी का प्रश्न और आगे क्यों न खिसक जाये। जिन्ना चाहता था कि आजादी मिलने से पहले विभाजन की घोषणा हो।

सरदार पटेल का मानना था कि देश में गृह-युद्ध की संभावना रोकने और हिंदू मुसलमानों के बीच सद्भावना पनपने की चिंता में वेवेल भारत को और दस वर्ष तक अँग्रेजी शासन के तले रखेगा। कांग्रेस अँग्रेजों पर आरोप लगा रही थी कि भारत के अँग्रेज, जानबूझ कर मुस्लिम लीग की मदद कर रहे हैं ताकि झगड़ा बना रहे और उनका राज भी।

भारत की स्वतंत्रता की प्रक्रिया

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा

उपरोक्त राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दबावों के कारण 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की-

जून 1948 तक भारत की एक उत्तरदायी सरकार को सत्ता हस्तांतरित कर दी जायेगी। ब्रिटेनवासियों के लिये यह एकदम अप्रत्याशित था कि भारत को इतनी शीघ्र आजादी दे दी जाये। एटली की घोषणा में स्पष्ट कहा गया था कि महामना सम्राट की सरकार ने अब पक्का निश्चय कर लिया है कि वह जून 1948 तक भारत में उत्तरदायी लोगों को सत्ता हस्तांतरित कर देगी।

…….लंदन की सरकार, भारतीय संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान जिसमें समस्त भारतीयों की सहमति हो, भारत में लागू करने की इंग्लैण्ड की संसद में संस्तुति करेगी। यदि जून 1948 तक संविधान सभा द्वारा, इस प्रकार का संविधान, नहीं बनाया गया तो ब्रिटिश सरकार यह सोचने के लिये विवश होगी कि ब्रिटिश भारत में केंद्र की सत्ता किसको सौंपी जाये, नयी केंद्रीय सरकार को या कुछ क्षेत्रों में प्रांतीय सरकारों को? या फिर किसी अन्य उचित माध्यम को भारतीय जनता के सर्वोच्च हितों के लिये दी जाये…….?

देशी राज्यों के सम्बन्ध में कहा गया था कि महामाना सम्राट की सरकार की यह मंशा नहीं है कि परमोच्चता के अधीन राज्यों की शक्तियां तथा दायित्व, ब्रिटिश भारत में किसी अन्य सरकार को सौंपी जायें।

प्रधानमंत्री एटली की इस घोषणा के साथ ही भारत स्वतंत्रता के द्वार पर आ खड़ा हुआ।

ब्रिटेन में विरोध

ब्रिटेन में भारत की आजादी को लेकर बहुत विरोध था। मोसले ने लिखा है- ‘विंस्टल चर्चिल (पूर्व प्रधानमंत्री एवं अब नेता प्रतिपक्ष) जिसके लिये कांग्रेस एक भीड़ थी और गांधी एक उपद्रवी, इस घोषणा को सुनकर सूखी घास पर गिरे बम की तरह भड़क उठा। उसने कहा कि इन तथाकथित राजनीतिज्ञों के हाथों में हिन्दुस्तान की बागडोर देकर ऐसे लोगों के हाथों शासन सौंपा जा रहा है जिनका कुछ वर्षों में कोई चिह्न नहीं बचेगा।’ उसने सलाह दी कि भारत की आजादी की तिथि निश्चित करने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता ली जाये किंतु भारत में आजादी का आंदोलन तथा सांप्रदायिक तनाव जिस चरम पर पहुंच चुके थे उन्हें देखते हुए अब ब्रिटिश पार्लियामेंट में और उसके बाहर चर्चिल के विरोध को सुनने वाला कोई नहीं था।

लार्ड माउण्टबेटन की नियुक्ति

ऐसे विकट समय में मि. एटली और क्रिप्स ने भारत की आजादी को कार्यरूप देने के लिये, लॉर्ड वेवल को युद्ध काल की नियुक्ति बताते हुए वापस बुला लिया तथा उसके स्थान पर माउन्टबेटन को भारत का अन्तिम गवर्नर जनरल एवं वायसराय नियुक्त किया।  वे 22 मार्च 1947 को भारत पहुँच गये। प्रधानमंत्री एटली द्वारा भारत की आजादी की अंतिम तिथि घोषित की जा चुकी थी। अतः माउण्टबेटन का काम केवल इतना था कि वे भारत को आजाद करके अँग्रेजों को उनकी पूरी गरिमा और शांति के साथ भारत से निकाल ले जायें। इस काम के लिये उन्हें इतनी शक्तियां दी गईं, जितनी उनसे पहले के किसी वायसराय को नहीं दी गईं। भारत आते ही माउन्टबेटन को अनुभव हो गया कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता असम्भव है। भारत की स्थिति अत्यंन्त निराशाजनक स्थिति में पहुँच चुकी है। शासन का मनोबल गिरा हुआ है तथा सिविल सेवाओं और सेना में स्वामि-भक्ति का अभाव है। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए जबरदस्त मार-काट मचा रखी थी और कांग्रेस, लीग की नीतियों का विरोध कर रही थी। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश प्रधानमंत्री की 30 जून 1948 तक सत्ता हस्तान्तरित करने की घोषणा विनाशकारी सिद्ध हो सकती थी।

ब्रिटिश सरकार की नीति

प्रधानमंत्री एटली ने मार्च 1947 में वायसराय को पत्र लिखकर ब्रिटिश सरकार की नीति को स्पष्ट किया-

सम्राट की सरकार का यह एक निश्चित उद्देश्य है कि भारत में ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के दायरे में विधानसभा की सहायता से एक सरकार, कैबिनेट मिशन की योजना के आधार पर बने और काम करे। अपनी पूरी शक्ति से आपको समस्त पार्टियों को इस लक्ष्य की ओर ले जाना चाहिये।

चूंकि यह योजना प्रमुख पार्टियों की सहमति से ही बन सकती है इसलिये किसी पार्टी को विवश नहीं किया जाये। यदि 1 अक्टूबर तक आप समझते हों कि हिंदुस्तानी रजवाड़ों की सहायता के साथ या उसके बिना ब्रिटिश हिंदुस्तान में एक सरकार बनाने की कोई संभावना नहीं है तो आपको इसकी सूचनी सरकार को देनी चाहिये और सलाह भेजनी चाहिये कि किस तरह निश्चित तिथि को सत्ता हस्तांतरित की जा सकती है।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारतीय रियासतें ब्रिटिश भारत में बनने वाली नयी सरकार से अपने सम्बन्धों का समायोजन करें किंतु सम्राट की सरकार की मंशा यह कतई नहीं है कि परमसत्ता के अधीनस्थ शक्तियों एवं दायित्वों का स्थानांतरण नयी उत्तराधिकारी सरकार को किया जाये।

यह मंशा नहीं है कि सत्ता के स्थानांतरण से पूर्व की परमसत्ता को एक निर्णायक पद्धति के तौर पर लिया जाये अपितु आवश्यकता पड़ने पर वायसराय अपनी समझ के अनुसार प्रत्येक रियासत के साथ अलग से ब्रिटिश क्राउन के सम्बन्धों के समायोजन पर वार्ता कर सकते हैं।

वायसराय देशी रियासतों की सहायता करेंगे ताकि रियासतें ब्रिटिश भारत के नेताओं के साथ भविष्य के लिये उचित एवं न्यायपूर्ण सम्बन्ध बना सकें। अंतरिम सरकार के साथ आपको किस तरह के सम्बन्ध बनाने हैं, इस सम्बन्ध में लार्ड वेवेल द्वारा 30 मई 1946 को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को लिखा गया पत्र आपका निर्देशन करेगा।

सम्राट की सरकार भारत की अंतरिम सरकार को वह दर्जा नहीं देगी जो औपनिवेशिक सरकार को होंगे फिर भी अंतरिम सरकार के साथ वही व्यवहार किया जायेगा जो एक औपनिवेशिक सरकार के साथ किया जाना चाहिये ताकि अंतरिम सरकार स्वयं को भविष्य के लिये तैयार कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – भारत को स्वतंत्रता की प्राप्ति एवं विभाजन

स्वतंत्रता के द्वार पर भारत

भारत का विभाजन

स्वाधीनता का उदय

विभाजन के बाद साम्प्रदायिक उन्माद

भारत का विभाजन

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भारत का विभाजन

भारत का विभाजन आधुनिक भारत के इतिहास के सबसे बड़ी त्रासदी थी। इस्लाम की मजहबी कट्टरता और अंग्रेजों की मक्कारी ने भारत का विभाजन किया।

कांग्रेस में भारत विभाजन के प्रति सहमति

गांधीजी सहित लगभग समस्त कांग्रेसी नेता भारत विभाजन के विरुद्ध थे। राजाजी राजगोपालाचारी जैसे नेता तथा घनश्यामदास बिड़ला जैसे उद्योगपति, भारत की आजादी के मामले को उलझाये जाने से अच्छा यह समझते थे कि भारत का युक्तियुक्त आधार पर विभाजन कर दिया जाये।

घनश्यामदास बिड़ला ने नेहरूजी के नाम एक पत्र लिखा कि- ‘साझे के व्यापार में अगर कोई साझेदार संतुष्ट नहीं हो तो उसे अलग होने का अधिकार मिलना ही चाहिये। विभाजन युक्तियुक्त अवश्य होना चाहिये लेकिन विभाजन का विरोध कैसे किया जा सकता है…….। अगर मैं मुसलमान होता तो पाकिस्तान न कभी मांगता, न कभी लेता। क्योंकि विभाजन के बाद इस्लामी भारत बहुत ही गरीब राज्य होगा जिसके पास न लोहा होगा न कोयला। यह तो मुसलमानों के सोचने की बात है।’

उन्हीं दिनों माउण्टबेटन की पत्नी एडविना ने भारत के साम्प्रदायिक दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया। वह दंगों में मारे गये लोगों के शवों को देखकर हैरान रह गयी।

एडविना ने दंगाग्रस्त क्षेत्रों से लौटकर अपने पति से कहा कि कांग्रेस कभी भी विभाजन स्वीकार नहीं करेगी किंतु यदि अँग्रेज जाति को करोड़ों लोगों की हत्या का आरोप अपने सिर पर नहीं लेना है तो आप जबर्दस्ती भारत का विभाजन कर दें तथा कांग्रेसी नेताओं को इसके लिये तैयार करें। माउण्टबेटन ने गांधी, नेहरू और पटेल से, भारत के विभाजन के लिये बात की। गांधीजी ने विभाजन को मानने से साफ इंकार कर दिया किंतु नेहरू और पटेल मान गये।

गांधीजी का रुख

गांधीजी किसी भी हालत में भारत का विभाजन नहीं चाहते थे। 3 मार्च 1947 को गांधीजी ने कहा कि भारत का विभाजन मेरे शव पर होगा किंतु पटेल और नेहरू ने भारत में चल रहे साम्प्रदायिक दंगों पर ध्यान केन्द्रित किया तथा भारत विभाजन की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया।  माउण्टबेटन से मिलने के बाद गांधीजी ने नेहरू और पटेल से बात की। नेहरू और पटेल ने गांधीजी के प्रस्ताव का विरोध किया और गांधीजी से कहा कि वे अपना प्रस्ताव वापिस ले लें।

मौलाना अबुल कलाम आजाद का रुख

मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे। वे भारत विभाजन के प्रबल विरोधी थे। 2 अप्रेल 1947 को उन्होंने गांधीजी से भेंट की। उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अब गांधीजी देश के विभाजन के विरोध में नहीं बोल रहे थे। मौलाना को यह देखकर और भी आश्चर्य हुआ कि गांधी, सरदार पटेल की दलीलें दोहरा रहे थे।

गांधीजी को भी देश के विभाजन के लिये तैयार हुआ देखकर मौलाना अबुल कलाम ने गांधीजी के सामने प्रस्ताव रखा कि वर्तमान स्थिति को दो वर्ष और चलाया जाये क्योंकि वास्तविक शासन तो भारतीयों के हाथ में आ ही चुका है। वैधानिक रूप से सत्ता का हस्तांतरण यदि दो-तीन वर्ष के लिये रुक भी जाये तो कोई हानि नहीं होगी।

इस बीच संभवतः मुस्लिम लीग का मत बदल जाये और वह देश के विभाजन की मांग छोड़ दे। गांधीजी ने मौलाना के सुझाव के प्रति उदासीनता दिखायी। गांधीजी ने घोषणा कर दी कि अब वे वायसराय के साथ किसी बातचीत में भाग नहीं लेंगे, सिर्फ कांग्रेस के मामलों में सलाह दिया करेंगे।

गांधीजी दिल्ली छोड़कर फिर से बिहार चले गये जहाँ उन्हें साम्प्रदायिक सद्भाव के लिये कार्य करना था। मौलाना ने गांधीजी के विचारों में परिवर्तन के लिये सरदार पटेल को अधिक दोषी माना है।

माउण्टबेटन द्वारा जिन्ना को समझाने का प्रयास

माउण्टबेटन ने अप्रेल 1947 में देश के विभाजन के प्रश्न पर जिन्ना से छः बार बात की। माउण्टबेटन ने लिखा है- ‘देश का विभाजन करने पर जिन्ना इस कदर आमादा थे कि मेरे किसी शब्द ने उनके कानों में शायद प्रवेश ही न किया। हालांकि मैंने ऐसी हर चाल चली, जो मैं चल सकता था। ऐसी हर अपील मैंने की, जो मेरी कल्पना में आ सकती थी। पाकिस्तान को जन्म देने का सपना उन्हें घुन की तरह लग चुका था। मेरा कोई तर्क किसी काम न आया।’

जिन्ना ने माउण्टबेटन को वचन दिया कि यदि पाकिस्तान अलग कर दिया गया तो कोई हुल्लड़, कोई खून खराबा नहीं होगा।

भारत विभाजन का प्रस्ताव अथवा माउण्टबेटन योजना

मुस्लिम लीग के अड़ियल रवैये के कारण, माउण्टबेटन ने अपने चीफ ऑफ स्टाफ लार्ड इस्मे तथा जार्ज एबेल से भारत विभाजन का प्रस्ताव तैयार करवाया। इस योजना को माउण्टबेटन योजना तथा इस्मे योजना भी कहते हैं। इसे बनाने में केवल अँग्रेज अधिकारियों को लगाया गया।

प्रत्येक हिंदुस्तानी यहाँ तक कि मेनन  को भी इससे पूरी तरह अलग रखा गया क्योंकि वायसराय को आशंका थी कि मेनन के हिंदू होने के कारण मुसलमान आपत्ति करेंगे। वायसराय तथा उसके साथियों द्वारा देश के विभाजन की जो योजना बनायी गयी, उसमें पंजाब और बंगाल को पाकिस्तान में रखने के कारण एक ऐसे देश की कल्पना की गयी जिसके दो सिर होंगे। एक सिर पूरब में और एक सिर पश्चिम में।

इनके बीच 970 मील का फासला होगा। एक सिर से दूसरे सिर तक पहुंचने के लिये समुद्र के रास्ते भारत की परिक्रमा करना अनिवार्य हो जायेगा जिसमें बीस दिन लगेंगे। यदि दोनों सिरों के बीच सीधी हवाई उड़ान भरनी हो तो चार इंजनों वाले हवाई जहाज की आवश्यकता होगी। प्रस्तावित पाकिस्तान जैसे गरीब राष्ट्र के लिये ऐसे हवाई जहाजों का खर्च वहन करना सरल नहीं होगा।

2 मई 1947 को लार्ड इस्मे तथा जार्ज एबेल भारत विभाजन का प्रस्ताव लेकर वायसराय के विशेष विमान से लंदन गये ताकि उस प्रस्ताव पर मंत्रिमंडल की सहमति प्राप्त की जा सके। इंगलैण्ड भेजने से पहले यह योजना किसी भी हिंदुस्तानी नेता अथवा हिंदुस्तानी अधिकारी को नहीं दिखायी गयी। उन्हें योजना का केवल ढांचा ही बताया गया था।

क्योंकि माउण्टबेटन का विश्वास था कि उसने इस योजना में उन सब बातों को शामिल कर लिया है जो बातें नेताओं से हुए विचार विमर्श के दौरान सामने आयीं थीं। माउण्टबेटन ने एटली सरकार को अपनी ओर से विश्वास दिलाया कि जब भी यह योजना भारतीय नेताओं के समक्ष रखी जायेगी, वे इसे स्वीकार कर लेंगे।

इस्मे के साथ इंग्लैण्ड भेजी गयी विभाजन योजना कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों पर ही आधारित थी। इसमें कहा गया था कि पार्टी के नेताओं की सहमति के बिना ही एक तरफा तौर पर प्रदेशों को सत्ता हस्तांतरित कर देनी चाहिये और केन्द्र में मजबूत केंद्रीय सरकार के स्थान पर एक फैडरेशन होना चाहिये।

योजना में यह भी प्रस्तावित किया गया था कि किसी प्रदेश की जनता, भारत और पाकिस्तान दोनों में से किसी के भी साथ न मिलकर अपने प्रदेश को स्वतंत्र राज्य बना सकती है। ऐसा करने के पीछे माउण्टबेटन का तर्क यह था कि प्रजा पर न तो भारत थोपा जाये और न ही पाकिस्तान।

प्रजा अपना निर्णय स्वयं करने के लिये पूर्ण स्वतंत्र रहे। जो प्रजा पाकिस्तान में मिलना चाहे, वह पाकिस्तान में मिले। जिसे भारत के साथ मिलना हो, वह भारत का अंग बने। जिसे दोनों से अलग रहना हो, वह सहर्ष अलग रहे। ऐसा संभवतः बंगाल की स्थिति को देखते हुए किया गया था।

क्योंकि आबादी के अनुसार पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान में तथा पश्चिमी बंगाल को भारत में शामिल होना था किंतु इससे बंगाल की अर्थव्यवस्था बिल्कुल चरमरा जाती। पूर्वी बंगाल का सारा व्यापार कलकत्ता में था और कलकत्ता के पटसन कारखाने जिन फसलों पर अधारित थे, उनका अधिकांश क्षेत्र पूर्वी बंगाल में केन्द्रित था। अतः विभाजन से बंगाल की अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगना स्वाभाविक था।

जिन्ना की तरफ से आशंका

योजना को स्वीकृति के लिये लंदन भेज दिये जाने के बाद माउण्टबेटन को आशंका हुई कि कि जिन्ना छंटे हुए पाकिस्तान का विरोध करेगा। इसलिये वायसराय ने जिन्ना से निबटने के लिये एक आपात योजना भी तैयार की कि यदि जिन्ना ने अंतिम क्षण में मना कर दिया तो उस समय क्या किया जायेगा।

इस आपात् योजना में मुख्यतः यह प्रावधान किया गया था कि चूंकि जिन्ना ने योजना को अस्वीकार कर दिया है इसलिये सत्ता वर्तमान सरकार को ही सौंपी जा रही है। क्योंकि प्रदेशों के आधार पर पाकिस्तान की मांग नहीं चल सकती इसलिये हम छंटे हुए पाकिस्तान तक पहुंच गये थे।

यदि अब भी तीन वर्षों के भीतर मुस्लिम लीग को छंटा हुआ पाकिस्तान स्वीकार्य हो तो गवर्नर जनरल वह कानून पास कर सकेगा जिससे मुसलमानों के बहुल वाले क्षेत्रों में अलग सरकार बन जाये। तब तक वर्तमान सरकार ही देश का शासन संभालेगी।

गांधीजी द्वारा जिन्ना को समझाने का प्रयास

गांधीजी विभाजन के प्रस्ताव से सहमत नहीं हुए। उन्होंने वायसराय से कहा कि वे जिन्ना से भेंट करना चाहते हैं। वायसराय के प्रयास से 6 मई 1947 को नई दिल्ली में जिन्ना के निवास पर गांधीजी ने जिन्ना से भेंट की। उन दोनों के बीच भारत का वह नक्शा रखा गया जिसमें पाकिस्तान हरे रंग से दिखाया गया था।

जिन्ना ने भारत विभाजन को अस्वीकार करने से मना कर दिया तथा इस भेंट के बाद एक परिपत्र जारी करके कहा- ‘मि. गांधी बंटवारे के सिद्धांत को नहीं मानते हैं। उनके लिये बंटवारा अनिवार्य नहीं है। जबकि मेरी दृष्टि में वह अनिवार्य है…… हम दोनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में सांप्रदायिक शांति बनाये रखने का सरतोड़ प्रयास करने का संकल्प लिया है।’

औपनिवेशिक स्वतंत्रता का प्रस्ताव

वायसराय ने इस्मे के साथ जो योजना इंग्लैण्ड भिजवाई थी उसमें डोमिनियन स्टेटस की कोई बात नहीं की गई थी। इस्मे के इंगलैण्ड चले जाने के बाद वायसराय ने वी. पी. मेनन से इस सम्बन्ध में बात की। मेनन ने वायसराय को बताया कि लार्ड वेवेल के समय में पटेल इस शर्त पर औपनिवेशिक स्वतंत्रता स्वीकार करने के लिये सहमत थे कि इससे भारत को तत्काल आजादी मिल जायेगी।

माउण्टबेटन को लगा कि वे एक अच्छा अवसर चूक गये। यदि यह प्रस्ताव माउण्टबेटन योजना में डाल दिया जाता तो न केवल ब्रिटिश सरकार से अपितु विपक्ष से भी भारत के विभाजन की योजना को सरलता से स्वीकृति मिल जाती।

औपनिवेशिक स्वतंत्रता को नेहरू की स्वीकृति

8 मई 1947 को पं. नेहरू, कृष्णामेनन के साथ शिमला आये। माउण्टबेटन तथा मेनन ने भारत को डामिनियन स्टेटस दिये जाने के सम्बन्ध में नेहरू से बात की। माउण्टबेटन ने नेहरू से कहा कि मुसलमानों के बहुमत वाले प्रदशों को हिंदुस्तान से अलग होने दिया जाये। फिर दो केंद्रीय सरकारों को सत्ता सौंपी जाये।

दोनों के अपने-अपने गवर्नर जनरल हों। जब तक दोनों उपनिवेशों की विभिन्न विधान सभाओं द्वारा उनके विधान तैयार न हों, तब तक उनका विधान गवर्नमेंट ऑफ इण्डया एक्ट 1935 के अनुसार चले। पं. नेहरू ने इस प्रस्ताव पर सहमति प्रकट करते हुए कहा कि भारत के लोग शीघ्रातिशीघ्र अपना शासन संभालना चाहते हैं और देरी करने से भारत का विकास रुक जायेगा।

माउण्टबेटन योजना को स्वीकृति

जिस दिन शिमला में माउण्टबेटन तथा उनके सलाहकारों की, नेहरू तथा मेनन के साथ बैठक पूरी हुई उसी दिन अर्थात् 10 मई 1947 को लंदन से माउण्टबेटन योजना मंत्रिमंडल की स्वीकृति के साथ तार से वापस आ गयी। मि. एटली और उनके मंत्रिमण्डल की सलाह पर उसमें बहुत सारे संशोधन किये गये थे लेकिन मूल योजना ज्यों की त्यों थी।

इस कारण वायसराय ने नेहरू और मेनन से की गयी वार्ता को अमल में न लाने का निश्चय त्याग कर अपने प्रेस सलाहकार कैम्पबेल जॉनसन को बुलाया और अखबारों में यह विज्ञप्ति प्रकाशित करवायी कि 17 मई को दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक होगी।

इस बैठक में कांग्रेस से पटेल और नेहरू को, सिक्ख प्रतिनिधियों में से बलदेवसिंह को तथा मुस्लिम लीग से जिन्ना और लियाकत अली को बुलाया जायेगा। उस दिन वायसराय, नेताओं के सामने हिंदुस्तानियों के हाथों सत्ता सौंप देने की योजना पेश करेंगे जिसे ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति मिल चुकी है।

नेहरू द्वारा माउण्टबेटन योजना का विरोध

इंग्लैण्ड से जो योजना संशोधित होकर आयी थी उसे 17 मई तक किसी को नहीं दिखाया जाना चाहिये था किंतु वायसराय ने 10 मई की शाम को पं. नेहरू को योजना दिखाई। नहेरू ने इस योजना को अस्वीकार कर दिया। माउण्टबेटन योजना में एक ओर तो देशी रियासतों को अपनी मर्जी से भारत या पाक में मिलने अथवा स्वतंत्र रहने की छूट दे दी गयी थी तो दूसरी ओर ब्रिटिश प्रांतों को भी इन दोनों देशों से अलग रहकर कोई स्वतंत्र देश बना लेने की छूट दे दी गयी थी।

इसमें प्रावधान किया गया था कि ब्रिटिश सरकार द्वारा पहले तो प्रांतों को सत्ता का हस्तांतरण कर दिया जाये तथा अँग्रेजों के भारत छोड़ देने के बाद प्रांतों का समूहों में ध्रुवीकरण किया जाये जो कि प्रत्येक प्रांत को अलग से तय करना था कि वे भारत में रहेंगे या पाकिस्तान में या स्वतंत्र देश के रूप में। यदि इस प्रस्ताव को मान लिया जाता तो भारत की दशा योरोप के बलकान प्रदेशों से भी अधिक गई गुजरी हो जाती।

भारत विभाजन योजना का पुनर्निर्माण

नेहरू के विरोध के कारण वायसराय ने 17 मई के लिये प्रस्तावित बैठक की तिथि बढ़ाकर 2 जून कर दी तथा प्रधानमंत्री एटली को तार भिजवाया कि आपके द्वारा स्वीकृत योजना को रद्द समझा जाये। संशोधित योजना भिजवायी जा रही है। वायसराय के निर्देश पर वी. पी. मेनन ने माउण्टबेटन योजना में संशोधन करके एक नई योजना तैयार की।

इस योजना में समस्त ब्रिटिश प्रांतों को यह अधिकार दिया गया कि वे ये निर्णय लें कि उनके लिये संविधान निर्माण का काम वर्तमान संविधान निर्मात्री सभा द्वारा करवाया जाये अथवा अलग से संविधान निर्मात्री समिति गठित की जाये। अर्थात् उन्हें भारत या पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने की छूट दी गई।

पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं को यह अधिकार दिया गया था कि वे यह भी निर्णय लें कि उनके प्रांतोें को साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित किया जाये अथवा नहीं? इस योजना में देशी रियासातों के बारे में केवल इतना प्रस्तावित किया गया था कि ऊपर जिस निर्णय की घोषणा की गयी है, उसका सम्बन्ध ब्रिटिश भारत से है और भारतीय रियासतों के बारे में उनकी नीति वही रहेगी जिसका विवरण 22 मई 1946 के कैबिनेट मिशन के मैमोरेण्डम में दिया गया है।

संशोधित योजना को स्वीकृति

वायसराय ने मेनन द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट पर विचार करने के लिये अपने सहायक अधिकारियों की बैठक बुलाई। बंगाल के गर्वनर सर फ्रेडरिक को छोड़कर किसी ने कोई आपत्ति नहीं की।  माउण्टबेटन ने संशोधित योजना को मंत्रिमण्डल की स्वीकृति के लिये 14 मई को स्वयं लंदन जाने का निश्चय किया।

के. एम. मुंशी ने लिखा है- ‘मेनन ने देश की महान सेवा की है। उन्होंने न केवल सरदार के नेतृत्व में देश को एक किया है, बल्कि उससे पहले देश को भयानक संकट से भी बचाया है, जिसमें निश्चय ही भारत फंस जाता यदि मेनन इस्मे योजना में हस्तक्षेप न करते।’

माउण्टबेटन ने इंगलैण्ड पहुंचकर संशोधित योजना एटली के सामने रखी। एटली की सलाह पर माउण्टबेटन ने चर्चिल को योजना की जानकारी दी और यह भी बताया कि भारत के सामने गंभीर और डरावने गृहयुद्ध का खतरा है। भारत और पाकिस्तान दोनों देश, कॉमनवैल्थ की सदस्यता ग्रहण करने पर सहमत हैं। जब चर्चिल को यह ज्ञात हुआ कि भारत व पाकिस्तान दोनों ही कॉमनवैल्थ के सदस्य बनने को तैयार हैं तो चर्चिल ने भारत विभाजन की उस नयी योजना को स्वीकृति दे दी।

पूर्वी एवं पश्चिमी पाकिस्तान जोड़ने के लिये कोरीडोर की मांग

जब माउण्टबेटन संशोधित योजना की स्वीकृति लेकर भारत आ गये तो अचानक जिन्ना ने मांग की कि उसे पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान को मिलाने के लिये हिंदुस्तान से होकर एक हजार मील का रास्ता चाहिये। जिन्ना की इस मांग पर कांग्रेस में तीखी प्रतिक्रिया हुई। माउण्टबेटन ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

गांधीजी द्वारा विभाजन का पुनः विरोध

31 मई 1947 को अपनी शाम की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने एक बार फिर भारत विभाजन के प्रति अपना विरोध दोहराया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस, भारत विभाजन का विरोध करेगी, यदि भयानक उपद्रव का खतरा हो तो भी। यदि संपूर्ण भारत जल जाये तब भी। नेहरू, पटेल और राजगोपालाचारी जैसे नेता स्थिति की गंभीरता को समझ गये थे किंतु गांधीजी अब भी अति-आदर्शवाद के सागर में गहरे गोते लगा रहे थे।

माईकल एडवर्ड्स ने लिखा है- ‘गांधीजी द्वारा इस समय पर विरोध क्यों किया गया? जबकि वे इससे पूर्व ही कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में अपनी सहमति दे चुके थे। ……..गांधीजी समझ नहीं पा रहे थे कि भारत में सिविल वार छिड़ जाने का पूरा खतरा बना हुआ था।’

2 जून की बैठक

2 जून 1947 को माउण्टबेटन ने कांग्रेस की ओर से नेहरू, पटेल तथा कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी को, मुस्लिम लीग की ओर से लियाकत अली खान तथा रबनिस्तर को एवं साठ लाख सिखों का प्रतिनिधित्व करने वाले सरदार बलदेवसिंह को अपने निवास पर आमंत्रित किया और उन्हें इस योजना की प्रतिलिपियां सौंप दीं

उनसे इस योजना पर उनकी सहमति मांगी ताकि इस सहमति की घोषणा ऑल इण्डिया रेडियो के माध्यम से की जा सके तथा उसके बाद लंदन रेडियो से प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली द्वारा उसका अनुमोदन किया जा सके।

कांग्रेस तथा सिक्ख प्रतिनिधियों ने देश के विभाजन के लिये अपनी सहमति माउण्टबेटन को दे दी  किंतु जिन्ना ने यह कहकर सहमति देने से इंकार कर दिया कि मैं तब तक इस पर अपनी सहमति नहीं दे सकता जब तक कि मुस्लिम लीग की कौंसिल में विचार नहीं होता। इसके लिये एक हफ्ते का समय चाहिये। माउण्टबेटन ने 3 जून को उसकी सहमति प्राप्त की।

रेडियो पर घोषणा

3 जून 1947 को शाम सात बजे वायसराय तथा भारतीय नेताओं ने माउण्टबेटन योजना को स्वीकार कर लिये जाने तथा अँग्रेजों द्वारा भारत को शीघ्र ही दो नये देशों के रूप में स्वतंत्रता दिये जाने की घोषणा की। वायसराय ने कहा कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच ऐसी किसी योजना पर समझौता हो पाना संभव नहीं हुआ है जिससे कि देश एक रह सके। इसलिये आजादी के साथ ही जनसंख्या के आधार पर देश का विभाजन हिंदुस्तान व पाकिस्तान के रूप में किया जायेगा।

नेहरू ने वायसराय की घोषणा का स्वागत करते हुए देशवासियों से अपील की कि वे इस योजना को शांतिपूर्वक स्वीकार कर लें। नेहरू ने कहा कि हम भारत की स्वतंत्रता बल प्रयोग या दबाव से प्राप्त नहीं कर रहे हैं। यदि देश का विभाजन हो भी जाता है तो कुछ दिनों पश्चात् दोनों भाग पुनः एक हो जायेंगे और फिर अखण्ड भारत की नींव और मजबूत हो जायेगी।

जिन्ना ने अपने भाषण में कहा कि यह हम लोगों के लिये सोचने की बात है कि जो योजना बर्तानिया सरकार सामने रख रही है, उसे हम लोग समझौते के रूप में स्वीकार कर लें। सिक्खों के नेता बलदेवसिंह ने कहा कि यह समझौता नहीं था, आखिरी सौदा था। इससे हर किसी को खुशी नहीं होती। सिक्खों को तो होती ही नहीं। फिर भी यह गुजारे लायक है हमें इसे मान लेना चाहिये।

गांधीजी द्वारा पुनः विरोध

3 जून को रेडियो पर इस योजना की स्वीकृति की घोषणा हो जाने के बाद गांधीजी, वायसराय से यह अपील करने के लिये दिल्ली लौट आये कि देश का बंटवारा न किया जाये। उन्होंने कहा कि कोई ये न कहे कि हिंदुस्तान के बंटवारे में गांधी का भी हाथ था किंतु जब गांधी वायसराय से मिलने गये तो उन्होंने वायसराय को लिखकर सूचित किया कि मौन व्रत होने के कारण मैं आज बोल नहीं सकता फिर कभी आपसे अवश्य चर्चा करना चाहूंगा।

4 जून को माउण्टबेटन को सूचना मिली कि गांधीजी आज शाम की प्रार्थना सभा में देशवासियों से अपील करेंगे कि वे विभाजन की योजना को अस्वीकार कर दें।

इस पर माउण्टबेटन ने गांधीजी को बुलाया और उनसे कहा- ‘विभाजन की पूरी योजना आपके निर्देशानुसार बनायी गयी है कि विभाजन का निर्णय जनता को करना चाहिये न कि अँग्रेजों को। इस योजना में प्रावधान रखा गया है कि चुनावों द्वारा गठित प्रादेशिक समितियां इस योजना को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकें। प्रादेशिक समिति को पूरा अधिकार होगा कि उसे पाकिस्तान के साथ रहना है या भारत के साथ। यदि देश भर की तमाम प्रादेशिक समितियां एकमत होकर कहती हैं कि हमें भारत के साथ रहना है तो देश का विभाजन अपने आप टल जायेगा किंतु यदि समितियां एकमत नहीं होतीं तो, चूंकि ये समितियां जनता ने चुनी हैं अतः हमें यही मानना पड़ेगा कि जनता की इच्छा अखण्ड भारत में रहने की नहीं है।’ 

स्वतंत्रता की तिथि की घोषणा

भारत विभाजन की योजना पर विस्तार से जानकारी देने के लिये माउण्टबेटन ने 4 जून को एक पत्रकार सम्मेलन बुलाया और उसमें भारतीय स्वतंत्रता की तिथि 15 अगस्त 1947 घोषित कर दी। 22 जून को ब्रिटिश सरकार ने भारत की आजादी के बिल का ड्राफ्ट तार द्वारा वायसराय को भेज दिया जिसमें भारत की आजादी की तिथि 15 अगस्त स्वीकार कर ली गयी। इतिहासकारों का अनुमान है कि 15 अगस्त की तिथि को इसलिये चुना गया क्योंकि उस दिन मित्र-राष्ट्रों के समक्ष जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगांठ थी।

कांग्रेस अधिवेशन में भारत विभाजन प्रस्ताव को स्वीकृति

14 जून 1947 को अखिल भारतीय कांग्रेस के अधिवेशन में देश के विभाजन का प्रस्ताव रखा गया। कांग्रेस के कई नेताओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया किंतु नेहरू, पटेल, गोविंद वल्लभ पंत तथा गांधीजी ने विभाजन के पक्ष में भाषण दिये।  जब प्रस्ताव पर मतदान हुआ तो प्रस्ताव के पक्ष में 29 तथा विरोध में 157 मत आये।

इस प्रस्ताव का विरोध सिंध से आये हुए हिन्दुओं ने भी किया। इस सम्मेलन में पटेल ने यहाँ तक कह दिया कि यदि हमने पाकिस्तान निर्माण की मांग नहीं मानी होती तो सारा देश ही पाकिस्तान बन जाता। हमारे पास तीन चौथाई भारत बच रहा है। उसे ही हम विकसित करेंगे तो यह एक बड़ा शक्तिशाली राज्य बन जायेगा।

भारत विभाजन पर प्रतिक्रयाएं

भारत विभाजन पर नेहरू का मानना था कि यदि लीग को जबर्दस्ती संघ में रखा गया तो भारत की कोई प्रगति अथवा योजना संभव नहीं हो सकेगी। न ही यह भारत की दीर्घावधि के हित के लिये भी प्रजातांत्रिक तथा वांछित होगा। नेहरू की दृष्टि में पाकिस्तान का निर्माण दो बुराइयों में से एक कम बुराई थी। माइकल ब्रीचर ने लिखा है कि नेहरू को यह भय था कि यदि कांग्रेस माउण्टबेटन की योजना को निरस्त कर देती तो ब्रिटिश सरकार पहले से भी अधिक हानिकारक निर्णय लागू करेगी।

14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि में विधान निर्मात्री परिषद के समक्ष दिये गये इस भाषण में डा. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा- ‘यद्यपि हमारी उपलब्धि (स्वतंत्रता) हमारे बलिदान से हुई है परंतु यह उपलब्धि विश्व के घटनाचक्र के दबाव से भी हुई है। ब्रिटिश सरकार ने हमें स्वतंत्रता देकर अपनी परंपराओं और प्रजातंत्र के सिद्धांतों को निभाया है।’

जस्टिस मेहरचंद महाजन ने अपनी पुस्तक लुकिंग बैक में लिखा है- ‘कुछ लोग यह दावा करते हैं कि यदि जिन्ना की बातों पर पहले ही गंभीरता पूर्वक विचार कर लिया जाता तो देश का विभाजन न होता। पर मैं निश्चय के साथ कह सकता हूँ कि कांग्रेस जितना अधिक सन् 1921 से 1945 तक मुसलमानों के हो हल्ले को सुनती रही, उतना ही अधिक हमारे लिये बुरा होता गया। देश का विभाजन सन् 1909 में मुसलमानों को महत्त्व मिलने से अनिवार्य हो गया था।

गांधीजी भारत विभाजन के प्रबल विरोधी थे। फिर भी उन्होंने माउन्टबेटन योजना को स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा- ‘मैं आरम्भ से ही विभाजन का विरोधी रहा हूँ किन्तु अब परिस्थिति ऐसी उत्पन्न हो गई है कि दूसरा कोई रास्ता नहीं है।’

भारत विभाजन के लिए उत्तरदायी परिस्थितियाँ

भारत विभाजन के लिये निम्नलिखित परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं-

(1.) सीधी कार्यवाही

मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए सीधी कार्यवाही करके हजारों निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। जिन प्रान्तों में मुस्लिम लीग अथवा उसके सहयोगी दलों की सरकारें थीं, वहाँ की प्रान्तीय सरकारें स्वयं उपद्रवकारियों की सहायता कर रही थीं और वहाँ की पुलिस भी लूट-खसोट में सम्मिलित थी।

इससे आम भारतीय को लगने लगा था कि मुस्लिम लीग की मांग को पूरा किये बिना यदि आजादी ली गई तो वह अत्यंत भयावह होगी। देश में तेजी से बदलते जनमानस की अनदेखी करना गांधीजी के लिये संभव नहीं रह गया था। भारत की अन्तरिम सरकार ने इन दंगों को रोकने का प्रयास किया परन्तु प्रतिरक्षा मंत्री सरदार बलदेवसिंह कुछ भी नहीं कर सके क्योंकि सेना और पुलिस पर अब भी अँग्रेजों का नियंत्रण था।

ये दंगे निश्चित रूप से योजनाबद्ध थे और इनका एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस को आतंकित करके विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार कराना था। यदि अँग्रेज चाहते तो इन दंगों को रोक सकते थे किन्तु उन्होंने भी जानबूझकर ऐसा नहीं किया क्योंकि वे सिद्ध करना चाहते थे कि यदि भारत को स्वतंत्रता दी जाती है तो यहाँ के लोग आपस में ही कट मरेंगे। इसलिये गांधीजी तथा कांग्रेस के समक्ष विभाजन की अनिवार्यता को स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं बचा।

(2.) पंजाब में दंगे

माउण्टबेटन के आने से ठीक पहले रावलपिंडी में सिक्खों का कत्ल हो चुका था। सिक्ख, मुसलमानों के प्रति अपनी घृणा को खुलकर व्यक्त करते थे। मुसलमान भी खुल्लमखुल्ला सिक्खों की बुराई करते थे। सिक्खों की दलील थी, जब आजादी आयेगी तो हम लोगों का क्या होगा?

मार्च 1947 में मास्टर तारासिंह ने पाकिस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाते हुए मुस्लिम लीग के झण्डे को नीचे गिरा दिया। मुसलमानों ने, लीग के झण्डे के अपमान का बदला लेने के लिये हथियार उठाकर निकलने में कोई देरी नहीं की। इसके तुरंत बाद ही दंगे भड़क उठे। 3000 लोग मारे गये जिनमें अधिकांश सिक्ख थे।

(3.) अँग्रेजों के षड़यन्त्र

1757 ई. में प्लासी युद्ध जीतने से लेकर 1885 ई. में कांग्रेस की स्थापना होने तक अँग्रेजों की सहानुभूति हिन्दुओं के साथ थी किंतु जब कांग्रेस ने देश की आजादी का आंदोलन चलाया तो अँग्रेज, हिन्दुओं को छोड़कर, मुस्लिम आंदोलनों के साथ हो गये।

उन्होंने अलगाववादी मुस्लिम नेताओं को विधान मण्डलों में अलग प्रतिनिधित्व की मांग करने के लिये उकसाया तथा मुसलमानों को वास्तविक जनसंख्या के अनुपात से भी अधिक स्थान दिये। सुधार अधिनियमों में साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली को स्थान देकर हिन्दू-मुसलमानों के वैमनस्य को और अधिक बढ़ावा दिया गया।

जब मुस्लिम लीग की स्थापना हो गई तो अँग्रेजों ने मुस्लिम लीग की पृथक् राज्य की मांग को पर्दे के पीछे से समर्थन दिया। एक ओर तो देश में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों के कारण आम भारतीय असुरक्षित होता जा रहा था और दूसरी ओर अँग्रेजों द्वारा पुलिस, प्रतिरक्षा, सूचना और यातायात विभाग के महत्त्वपूर्ण पदों पर मुसलमानों को लगाया जा रहा था। मुस्लिम लीग के समर्थक गैर-कानूनी रूप से गोला-बारूद और हथियार एकत्रित कर रहे थे।

(4.) अविलम्ब स्वतंत्रता की लालसा

माइकल ब्रीचर जैसे कई अँग्रेज इतिहासकारों का आरोप है कि कांग्रेस ने अविलम्ब स्वतंत्रता प्राप्त करने की लालसा में, देश का विभाजन स्वीकार कर लिया। अँग्रेज सदैव मुस्लिम लीग का पक्ष लेते रहे और उसकी आड़ में भारत की स्वतंत्रता को भी आगे खिसकाते रहे। लॉर्ड वैवेल मुस्लिम लीग के बिना, संविधान सभा बुलाने को तैयार नहीं हुआ।

उसने मुस्लिम लीग को अन्तरिम सरकार में सम्मिलित करने के लिए भारत सचिव के निर्देशों की भी अवहेलना की। मुस्लिम लीग के षड़यंत्र एवं विरोध से उत्साहित होकर माउन्टबेटन ने कहा कि यदि ऐसी परिस्थिति में हिन्दुस्तान की पार्टियां हमें ठहरने के लिए कहेंगी, तो हमें ठहरना पड़ेगा।

इससे कांग्रेस को विश्वास हो गया था कि यदि अंगेज शीघ्रातिशीघ्र भारत को स्वतंत्र कर भारत से चले नहीं जाते तो भारत अनेक छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जायेगा और फिर उन्हें संगठित करना बहुत कठिन होगा। अन्तरिम सरकार में मुस्लिम लीग के मंत्रियों वाले विभागों में चपरासी से लेकर समस्त उच्च पदों पर मुसलमानों को नियुक्त किया जा रहा था और उन विभागों में पहले से नियुक्त हिन्दुओं को वहाँ से हटाया जा रहा था अथवा अन्य विभागों में भेजा जा रहा था।

इसलिए सरदार पटेल ने कहा था कि- ‘यदि पाकिस्तान स्वीकार नहीं किया जाता तो प्रत्येक दफ्तर में पाकिस्तान की एक इकाई स्थापित हो जाती।’ कांग्रेस की बैठक में माउन्टबेटन योजना पर विचार प्रकट करते हुए गोविन्द वल्लभ पंत ने कहा था- ‘3 जून, 1947 की योजना की स्वीकृति ही स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एकमात्र मार्ग है…….आज कांग्रेस को या तो इस योजना को स्वीकार करना है अथवा आत्महत्या करनी है।’

(5.) कांग्रेस की त्रुटिपूर्ण नीति

मुस्लिम लीग अपने जन्म के समय से ही कांग्रेस का प्रबल विरोध कर रही थी। उसका नेता मुहम्मद अली जिन्ना खुले मंचों से यहाँ तक कि कांग्रेस के मंचों से भी गांधीजी के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करता था। जबकि दूसरी ओर गांधीजी को दृढ़ विश्वास था कि उनकी अहिंसा और क्षमा का मुस्लिम लीग पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा और मुस्लिम लीग भारत विभाजन की मांग छोड़ देगी।

मुस्लिम लीग ने कांग्रेस एवं गांधीजी की सदाशयता का उलटा अर्थ लगाया। मुस्लिम लीग की पक्की धारणा थी कि उसके सहयोग एवं समर्थन के बिना भारत की राजनीतिक समस्या हल नहीं हो सकती। 1916 ई. में कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के लखनऊ समझौते में कांग्रेस ने मुसलमानों के पृथक् निर्वाचन मण्डल की मांग को स्वीकार कर लिया था।

यह कांग्रेस की महान् भूल थी। सी. आर. फार्मूले में पाकिस्तान की मांग काफी सीमा तक मान ली गई और इस फार्मूले के सम्बन्ध में बातचीत करने के लिए गांधीजी, जिन्ना के पीछे भागते रहे। 14 जून 1947 को कांग्रेस कमेटी की बैठक में पं. जवाहरलाल नेहरू को कहना पड़ा- ‘कांग्रेस भारतीय संघ में किसी भी इकाई को बलपूर्वक रखने के विरुद्ध रही है।’

सरदार पटेल के भाषणों से भी इस बात को समर्थन मिलता रहा। अतः जिन्ना को यह समझते देर नहीं लगी कि यदि थोड़ा और आतंकवादी दबाव डाला जाये तो कांग्रेस विवश होकर पाकिस्तान की मांग स्वीकार कर लेगी। मुहम्मद अली जिन्ना तथा उसकी मुस्लिम लीग को अनावश्यक महत्त्व देना और उसके पीछे भागना, कांग्रेस की सबसे बड़ी गलती रही जिसका अंतिम परिणाम भारत विभाजन के रूप में हुआ।

(6.) सशक्त भारत की इच्छा

मुस्लिम लीग, केन्द्र सरकार को शक्तिशाली नहीं देखना चाहती थी। इसलिए कैबिनेट मिशन ने मुस्लिम लीग की सुविधा को ध्यान में रखते हुए एक निर्बल केन्द्र का गठन किया। निर्बल केन्द्र कभी भी शक्तिशाली राष्ट्र नहीं बना सकता था। अखण्ड भारत के लिए मुस्लिम लीग से समझौता करने का एक ही अर्थ होता- सदैव के लिये निर्बल एवं शक्तिहीन भारत का निर्माण। कांग्रेस के अधिकांश नेता मुस्लिम लीग की हिंसात्मक प्रवृत्ति से तंग आ चुके थे।

उन्होंने अनुभव किया कि मुस्लिम लीग के रहते, भारत कभी अखण्ड नहीं रह सकेगा। सरदार पटेल आदि नेताओं को स्पष्ट हो गया था कि जितना भी भारत हिन्दुओं के पास बच रहा है, उसे ले लिया जाये अन्यथा पूरा भारत हाथ से निकल जायेगा।

इसीलिये सरदार पटेल ने अपने वक्तव्य में कहा- ‘भारत को मजबूत और सुरक्षित करने का यही तरीका है कि शेष भारत को संगठित किया जाये। …….बंटवारे के बाद हम कम से कम 75 या 80 प्रतिशत भाग को शक्तिशाली बना सकते हैं, शेष को मुस्लिम लीग बना सकती है।’

आजादी के बाद एक अवसर पर नेहरू ने कहा- ‘यदि हमें आजादी मिल भी जाती; तो भारत निस्सन्देह निर्बल रहता जिसमें इकाइयों के पास बहुत अधिक शक्तियां रहतीं और संयुक्त भारत में सदैव कलह और झगड़े रहते। इसलिए हमने देश का बंटवारा स्वीकार कर लिया ताकि हम भारत को शक्तिशाली बना सकें। जब दूसरे (मुस्लिम लीगी मुसलमान) हमारे साथ रहना ही नहीं चाहते तो हम उन्हें क्यों और कैसे मजबूर कर सकते थे?’

(7.) जिन्ना की हठधर्मी

भारत के राष्ट्रवादी नेताओं का विचार था कि हमारा संघर्ष मुख्य रूप से अँग्रेजों से है। इसलिए कांग्रेसी नेता, जिन्ना से बातचीत करने को सदैव तत्पर रहते थे। जिन्ना ने कांग्रेस की इस प्रवृत्ति का अनुचित लाभ उठाया। जिन्ना की हठधर्मी के कारण गोलमेज सम्मेलन और वैवेल योजना असफल हो गयी और साम्प्रदायिक समस्या का कोई हल नहीं निकल सका।

वह हर समय कांग्रेस को एक हिन्दू संस्था सिद्ध करने का प्रयास करता था और कांग्रेस के राष्ट्रीय दल होने के दावे को नकारता था। 1937 ई. के चुनावों के बाद जिन प्रान्तों में कांग्रेस की सरकारें बनीं, जिन्ना उन प्रांतीय सरकारों पर लगातार मनगढ़ंत आरोप लगाकर उन्हें मुसलमानों पर अत्याचार करने वाली सरकारें बताता रहा।

द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ होने पर जब कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने त्यागपत्र दिये तो जिन्ना ने मुक्ति दिवस मनाया। ऐसी परिस्थिति में सरदार पटेल तथा अन्य कांग्रेसी नेता चाहते थे कि गांधीजी जिन्ना को महत्त्व देना बंद करें किंतु गांधीजी हर कीमत पर जिन्ना को प्रसन्न करना चाहते थे ताकि देश का बंटवारा न हो।

गांधीजी की इस प्रवृत्ति से जिन्ना की हठधर्मी बढ़ती गई। उसने पाकिस्तान की प्राप्ति के लिए देश भर में साम्प्रदायकि दंगे फैला दिये और हजारों निर्दोष लोगों की हत्याएं करवाईं। पाकिस्तान प्राप्त करके भी वह शान्त नहीं हुआ। उसने पाकिस्तान वाले क्षेत्रों से हिन्दू जनसंख्या को भारत में लेने की मांग की।

जब उसकी यह मांग नहीं मानी गई तो उसने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हिन्दुओं पर हमले करवाये। हजारों हिन्दू मार डाले गये। लाखों लोगों को पलायन करना पड़ा। मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान वाले क्षेत्रों में रह रहे हिन्दुओं को बलपूर्वक वहाँ से निकाल दिया गया। जिन्ना को प्रोत्साहित करने में अँग्रेजों ने पूरा सहयोग दिया।

(8.) अन्तरिम सरकार की असफलता

मुस्लिम लीग के सदस्य अन्तरिम सरकार में कांग्रेसी मन्त्रियों के लिए सिरदर्द बन गये। वे कोई काम होने ही नहीं देते थे। इससे सरकार पंगु बन गई थी।

मुस्लिम लीग द्वारा सरकार के हर काम में रोड़े अटकाने की प्रवृत्ति से खिन्न होकर जवाहरलाल नेहरू ने वक्तव्य दिया- ‘हम सिर-दर्द से छुटकारा पाने के लिए सिर कटवाने को तैयार हो गये।’

सरदार पटेल ने इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिये जिन्ना के भारत विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार करने की अनिवार्यता बताते हुए वक्तव्य दिया कि-

‘यदि शरीर का एक भाग खराब हो जाये तो उसको शीघ्र हटाना ठीक है, ताकि सारे शरीर में जहर न फैले। मैं मुस्लिम लीग से छुटकारा पाने के लिए भारत का कुछ भाग देने के लिए तैयार हूँ।’

आजादी प्राप्त करने के बाद नवम्बर 1947 में सरदार पटेल ने नागपुर में वक्तव्य दिया-

‘जब अन्तरिम सरकार में आने के बाद मुझे यह पूर्ण अनुभव हो गया कि राजनीतिक विभाग के षड़यंत्रों द्वारा भारत के हितों को बड़ी हानि पहुँच रही है तो मुझे विश्वास हो गया कि जितनी जल्दी हम अँग्रेजों से छुटकारा पा लें उतना ही अच्छा है…..मैंने उस समय महसूस किया कि भारत को मजबूत और सुरक्षित करने का यह तरीका है कि शेष भारत को संगठित किया जाये।…….हम उस समय ऐसी अवस्था पर पहुँच गये थे कि यदि हम देश का विभाजन न मानते तो सब-कुछ हमारे हाथ से चला जाता।’

(9.) माउन्टबेटन का प्रभाव

एक ओर तो गांधीजी भारत विभाजन के लिये तैयार नहीं थे और दूसरी ओर पूरा देश साम्प्रदायिक दंगों के कारण रक्त की नदी में गोते लगा रहा था। माउन्टबेटन ने अनुभव किया कि यदि ब्रिटेन, भारतीय उपमहाद्वीप में भयानक रक्तपात के कलंक से बचना चाहता है तो उसे तुरंत भारत को आजाद कर देना चाहिये।

यही कारण था कि प्रधानमंत्री एटली ने भारत को स्वतंत्र करने की अंतिम तिथि 20 जून 1948 निर्धारित की थी किंतु माउण्टबेटन ने उसे 10 माह पहले खिसकाकर 15 अगस्त 1947 कर दिया। अब कांग्रेस के समक्ष केवल दो विकल्प थे- अखण्ड भारत के लिये साम्प्रदायिक दंगों का सामना करे अथवा लाखों हिन्दुओं की जान बचाने के लिये पाकिस्तान को स्वीकार कर ले।

माउण्टबेटन ने कांग्रेसी नेताओं को समझाया कि अखण्ड भारत में मुस्लिम लीग कभी शान्ति और व्यवस्था नहीं रहने देगी। देश सदैव निर्बल रहेगा। जब कोई सम्प्रदाय, भारत में रहना ही नहीं चाहता तो उसे इसके लिए कैसे विवश किया जा सकता है। नेहरू और पटेल तो पहले से ही यह अनुभव कर रहे थे और वक्तव्य भी दे रहे थे। जब उन्होंने देखा कि माउण्टबेटन भी इसके लिये तैयार हैं तो उन्होंने भारत विभाजन को स्वीकार कर लिया।

(10.) मुसलमान जनता में स्थिति को समझने की असमर्थता

जिन्ना तथा उसके अनुयायियों ने अपने समर्थन में ऐसे तर्क जुटा लिये जिनके आधार पर वे एक अलग राष्ट्र मांग सकें तथा मनमाने ढंग से मुस्लिम जनता पर शासन कर सकें। भारत के बहुसंख्य मुसलमान, अलगाववादी मुस्लिम नेताओं के षड़यत्र को नहीं समझ पाये।

यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि जिन मुस्लिम नेताओं ने जिस गरीब मुसलमान जनता के नाम पर साम्प्रदायिकता की समस्या को उभारा, वे अच्छी तरह जानते थे कि उस गरीब मुसलमान जनता को भारत में रहकर, देश की बहुसंख्य जनता के साथ हिल-मिल कर आर्थिक, शैक्षणिक एवं राजनैतिक उन्नति के अधिक अवसर मिलेंगे जबकि वे एक नया राष्ट्र बनाकर गरीब मुसलमान जनता को और भी अधिक गरीब राष्ट्र का नागरिक बना देंगे।

मुस्लिम लीगी नेताओं की इस विभाजनकारी मानसिकता का अँग्रेजों ने भरपूर लाभ उठाया और इस समस्या को कभी सुलझने नहीं दिया। जिन्ना और उनके साथी यह भी जानते थे कि वे भले ही अलग देश का निर्माण कर लें किंतु वे भारत की समस्त मुस्लिम जनसंख्या को पाकिस्तान नहीं ले जा सकेंगे।

इससे स्पष्ट है कि जिन्ना और उसके अनुयायी अपने लिये एक अलग देश चाहते थे, न कि भारत के समस्त मुसलमानों के लिये  किंतु भोली-भाली निर्धन मुस्लिम जनसंख्या नेताओं के इस षड़यंत्र को नहीं समझ सकी।

भारत के विभाजन की प्रक्रिया

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947

भारत को स्वतंत्रता देने के लिये ब्रिटिश संसद में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 पारित किया गया। 18 जुलाई 1947 को इंगलैण्ड के राजा ने इसे स्वीकृति दे दी। इस एक्ट के अनुसार भारत की आजादी के साथ ही दो स्वतंत्र देश भारत एवं पाकिस्तान के नाम से अस्तित्व में आने थे। मुस्लिम बहुल आबादी वाले ब्रिटिश प्रांत, पाकिस्तान में ; तथा हिन्दू बहुल वाले ब्रिटिश प्रांत, भारत में  सम्मिलित किये जाने थे। बंगाल एवं पंजाब प्रांतों का विभाजन करके उन प्रांतों के मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान में सम्मिलित किये जाने थे। इस अधिनियम की धारा 8 के अनुसार भारत के 567 देशी राज्यों पर से ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता समाप्त हो जानी थी तथा यह पुनः देशी राज्यों को हस्तांतरित कर दी जानी थी। इस कारण देशी राज्य अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी भी देश में सम्मिलित होने अथवा पृथक अस्तित्व बनाये रखने अथवा पृथक समूहों का गठन करने के लिये स्वतंत्र थे।

उलटी तिथि का कलैण्डर

जब कांग्रेस ने पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर लिया तो लार्ड माउण्टबेटन ने भारत के भौतिक विभाजन का कार्य करना प्रारंभ किया। राज्य कर्मचारियों को विकल्प दिया गया कि वे भारत अथवा पाकिस्तान की सेवा में रह सकते हैं। 4 जून को माउण्टबेटन ने पत्रकारों के समक्ष भारत की आजादी की तिथि घोषित की। उस दिन 15 अगस्त आने में 73 दिन बाकी थे। माउण्टबेटन ने कर्मचारियों को सावधान और चुस्त रखने के लिये 73 पृष्ठों का एक कलैण्डर छपवाया जिसके हर पन्ने पर ठीक मध्य में, लाल घेरे में यह छपा हुआ था कि आज के दिन 15 अगस्त आने में कितने दिन शेष रह गये हैं। प्रत्येक दिन इस कलैण्डर का एक पन्ना फाड़ा जाता था।

फौज का विभाजन

1857 के गदर के पश्चात् अँग्रेजों ने भारतीय फौज का गठन इस प्रकार किया था कि प्रत्येक टुकड़ी में हिंदू, मुस्लिम तथा सिख सैनिक रहें ताकि सांप्रदायिक दंगों की स्थिति में फौज की निष्प्क्षता बनी रहे। देश की आजादी से पहले फौज के प्रधान की हैसियत से फौज के विभाजन का काम फील्ड मार्शल आचिनलेक को सौंपा गया।

आचिनलेक तब तक फौज का विभाजन नहीं करना चाहते थे जब तक कि दोनों देशों का भली-भांति विभाजन नहीं हो जाये और जनसंख्या की अदला-बदली पूरी नहीं हो जाये किंतु नेहरू इस बात पर अड़े गये कि 15 अगस्त को आजादी मिलने का अर्थ है कि देश की अपनी सेना भी उसी दिन देश को तैयार मिले।  अतः माउण्टबेटन ने आचिनलेक को निर्देश दिये कि वे सेना के विभाजन का काम 15 अगस्त से पहले पूरा कर लें।

आचिनलेक का मानना था कि देश की आजादी की घोषणा के बाद अँग्रेजों का कत्लेआम होगा जिससे निबटने के लिये 1 जनवरी 1948 तक ब्रिटिश फौज भारत में रहनी चाहिये तथा भारतीय एवं पाकिस्तानी फौजों को कुछ समय तक अँग्रेजों के कमाण्ड में ही रखना चाहिये किंतु माउण्टबेटन ने यह तर्क देकर आचिनलेक के सुझाव को मानने से इन्कार कर दिया कि आजादी के बाद अँग्रेजों व अन्य विदेशी नागरिकों की रक्षा का भार स्वतंत्र होने वाले दोनों देशों पर रहेगा।

आचिनलेक ने फौज के विभाजन की जो योजना बनायी, उसमें सैनिकों को स्वेच्छा के आधार पर किसी भी देश की फौज में शामिल होने का अधिकार दिया गया किंतु जो मुस्लिम सैनिक पाकिस्तानी क्षेत्र के रहने वाले थे, उन्हें अनिवार्य रूप से पाकिस्तानी सेना में तथा जो गैर मुस्लिम सैनिक हिंदुस्तानी क्षेत्र के रहने वाले थे उन्हें अनिवार्य रूप से हिंदुस्तानी फौज में सम्मिलित होने के लिये कहा गया।

आचिनलेक से रेडियो पर सेना के विभाजन की घोषणा करवायी गयी। 6 अगस्त 1947 को लाल किले में भावी भारतीय सेना के अधिकारियों ने, पाकिस्तान जाने वाले सैन्य अधिकारियों को विदाई पार्टी दी। इस अवसर पर भारतीय सेना की ओर से जनरल करिअप्पा ने तथा पाकिस्तानी फौज की ओर से ब्रिगेडियर रजा ने विदाई भाषण दिये। इस अवर पर पं. नेहरू तथा सरदार बलदेवसिंह भी उपस्थित थे।

भारत में फौजी केन्द्र रखे जाने का प्रस्ताव

भारत की आजादी के बिल का जो प्रारूप ब्रिटिश सरकार ने वायसराय को भिजवाया था उसमें ब्रिटिश सरकार द्वारा लगातार कई संशोधन किये गये। उसमें एक संशोधन यह भी था कि भारत की सत्ता सौंप देने के बाद भी ब्रिटिश सरकार को भारत में एक सैनिक केंद्र रखने का अधिकार होगा। मेनन की कड़ी आपत्ति पर इस संशोधन को निकाल दिया गया।

चांदनी चौक में भीड़

लगभग 60 हजार अँग्रेजों के लिये भारत छोड़ने का दिन निकट आता जा रहा था। इनमें कोई सिपाही था तो कोई आई.सी. एस. अधिकारी, कोई पुलिस इंस्पेक्टर था तो कोई रेलवे इंजीनियर, कोई वेतन अधिकारी था तो कोई संचार लिपिक। दिल्ली के चांदनी चौक में भारत छोड़ रहे गोरों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।

वे रेफ्रिजिरेटर या कार के बदले कालीन, हाथी-दांत, सोने-चांदी की वस्तुएं खरीद रहे थे। शेर की खाल और मसाला भरे हुए जानवरों की खूब मांग रही। पोलो खेलने के काम आने वाले घोड़े भी बड़ी संख्या में बिके। कुछ खिलाड़ियों ने तो अपने घोड़ों को इसलिये गोली मार दी कि वे नहीं चाहते थे कि उनके उम्दा घोड़े बग्घियों अथवा तांगों में जुतें।

विभाजन कौंसिल का गठन

विभाजन का काम दक्षता से निबटाने के लिये वायसराय की अध्यक्षता में एक विभाजन कौंसिल का गठन किया गया। इस कौंसिल में भारत के प्रतिनिधि के रूप में एच. एम. पटेल तथा पाकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में चौधरी मोहम्मद अली को रखा गया।

इस समिति की सहायता के लिये विभिन्न प्रकार की बीस समितियां और उपसमितियां गठित की गयीं जिनमें लगभग 100 उच्च अधिकारियों की सेवाएं ली गयीं। इन समितियों का काम विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव तैयार करके अनुमोदन के लिये विभाजन कौंसिल के पास भेजना था।

विभाजन कौंसिल द्वारा बैंकों, सरकारी विभागों तथा पोस्ट ऑफिसों में रखे हुए रुपयों, सामान और फर्नीचर के बंटवारे हेतु निर्णय लिये गये। बंटवारे में तय किया गया कि पाकिस्तान को बैंकों में रखी नकदी और स्टर्लिंग शेष का 17.5 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होगा। पाकिस्तान को भारत के राष्ट्रीय कर्ज का 17.5 प्रतिशत हिस्सा चुकाना पड़ेगा।

देश के विशाल सरकारी तंत्र में जो कुछ भी स्थानानंतरण द्वारा हटाया जा सकता है, उसका 80 प्रतिशत भारत को एवं 20 प्रतिशत पाकिस्तान को दिया जाये। देश में 18 हजार 77 मील लम्बी सड़कें तथा 26 हजार 421 मील रेल की पटरियां थीं। इनमें से 4 हजार 913 मील सड़कें तथा 7 हजार 112 मील रेल पटरियां पाकिस्तान के हिस्से में गईं।

वायसराय की सफेद सुनहरी ट्रेन भारत के हिस्से में आयी उसके बदले में भारतीय सेना के कमाण्डर इन चीफ तथा पंजाब के गर्वनर की सभी कारें पकिस्तान को दे दी गयीं। वायसराय के पास सोने के पतरों वाली छः तथा चांदी के पतरों वाली छः बग्घियां थीं। इनमें से सोने के पतरों वाली बग्घियां भारत के हिस्से में तथा चांदी के पतरों वाली बग्घियां पाकिस्तान के हिस्से में आयीं।

राजकीय सेवाओं का विभाजन करना तय किया गया। ब्रिटिश मूल के अधिकारियों व कर्मचारियों को मुआवजा देना तय किया गया। जिस समय देश आजाद हुआ उस समय इंगलैण्ड पर भारत के 500 अरब डॉलर बकाया निकलते थे। यह कर्ज द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चढ़ा था।

कर्मचारियों के लिये विशेष रेल

पाकिस्तान जाने वाले कर्मचारियों और उनके साथ जाने वाले कागजों के लिये रेलवे ने 3 अगस्त 1947 से दिल्ली से करांची तक विशेष रेलगाड़ियों का संचालन किया। इन रेलगाड़ियों को लौटती बार में पाकिस्तान से भारत आने वाले कर्मचारियों को लेकर आना था। उस समय तक रेल गाड़ियां भयानक सांप्रदायिक उन्माद की चपेट में आ चुकी थीं।

इसलिये नेताओं ने आम जनता से अपील की कि वे गाड़ियों का उपयोग न करे। नेताओं को आशा थी कि कर्मचारियों की रेलगाड़ियां सुरक्षित रहेंगी किंतु पकिस्तान से कर्मचारियों को लेकर आने वाली रेलगाड़ियां भी सांप्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ गईं।

संविधान सभा को संसद का दर्जा

उस समय तक चुनी हुई वैधानिक संसद के अस्तित्व में नहीं होने से संविधान सभा को ही संसद तथा संविधान सभा का दोहरा दर्जा दिया गया।

दो वैकल्पिक सरकारें

विभाजन से पहले भारत में जो अंतरिम सरकार चल रही थी उसमें से लार्ड माउण्टबेटन ने दो वैकल्पिक सरकारों का निर्माण किया जो 15 अगस्त को अस्तित्व में आने वाले दोनों देशों के प्रशासन को संभाल सकें। 1935 के भारत सरकार अधिनियम में सुविधापूर्ण सुधार करके भारतीय उपनिवेश में 1947 से 1950 ई. तक तथा पाकिस्तान उपनिवेश में 1947 से 1956 ई. तक संविधान का काम लिया गया। यहाँ तक कि भारत के वर्तमान संविधान का आधार भी यही अधिनियम है।

इण्डियन डोमिनियन्स शब्द पर आपत्ति

जब जिन्ना ने सुना कि प्रस्तावित बिल में दोनों उपनिवेशों को इण्डियन डोमिनियन्स कहा गया है तो उसने एक सख्त चिट्ठी भेजी। इसके बाद बिल में सिर्फ डोमिनियन्स शब्द काम में लिया गया।

पंजाब बाउंड्री फोर्स का गठन

जनरल टकर ने आचिनलेक को सुझाव दिया कि पंजाब में शांति बनाये रखने के लिये गोरखाओं की एक फौज बनायी जाये तथा उसे पंजाब में महत्वपूर्ण स्थानों पर लगा दिया जाये जहाँ कि कत्लेआम होने की सर्वाधिक संभावना है। यह फौज पूरी तरह से हिंदू मुस्लिम पक्षपात से अलग रहेगी लेकिन आचिनलेक ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

टकर ने लार्ड इस्मे से संपर्क किया। अंत में वायसराय के हस्तक्षेप पर इस फौज का गठन किया गया जिसका नाम पंजाब बाउंड्री फोर्स रखा गया। इसमें पचपन हजार सैनिकों की नियुक्ति की गयी। इस सेना ने 1 अगस्त 1947 से कार्य आरम्भ कर दिया।

सियालकोट, गुजरांवाला, शेखपुरा, लायलपुरा, मौंटगुमरी, लाहौर, अमृतसर, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालंधर, फिरोजपुर और लुधियाना जिलों में इस सेना को नियुक्त किया गया। कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग की सहमति से मेजर जनरल रीस को इस सेना का कमांडर नियुक्त किया गया। भारत की ओर से ब्रिगेडियर दिगंबरसिंह तथा पाकिस्तान की ओर से कर्नल अय्यूब खां  इसके सलाहकार बनाये गये। 

रैडक्लिफ आयोग का गठन एवं रिपोर्ट के प्रकाशन में विलम्ब

भारत व पाकिस्तान की सीमाओं का निर्धारण करने के लिये 27 जून 1947 को रैडक्लिफ आयोग का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष सर सिरिल रैडक्लिफ इंग्लैण्ड के प्रतिष्ठित वकील थे। भारत में आने से पूर्व उन्हें भारत के आंतरिक मामलों की जानकारी नहीं थी।

वे यहाँ की संस्कृति, राजनीतिक स्थिति, भौगोलिक जानकारी, व्यापारिक क्षेत्र, लोगों के आपसी सम्बन्ध, जनसंख्या की बसावट, नदियों के प्रवाह, नहरों की स्थिति, गांवों की आर्थिक निर्भरता आदि किसी भी तत्व से परिचित नहीं था। अँग्रेजों ने यह कहकर उनका चुनाव किया कि चूंकि रैडक्लिफ को हिंदू, मुसलमान, सिक्ख आदि किसी से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिये वे एकदम निष्पक्ष साबित होंगे।

8 जुलाई 1947 को रैडक्लिफ दिल्ली पंहुचे। उनकी सहायता के लिये प्रत्येक प्रांत में चार-चार न्यायाधीशों के एक बोर्ड की नियुक्ति की गयी। इन न्यायाधीशों में से आधे कांग्रेस द्वारा व आधे मुस्लिम लीग द्वारा नियुक्त किये गये थे।

पंजाब प्रांत के विभाजन के लिये कांग्रेस की ओर से मेहरचंद महाजन तथा तेजासिंह को और मुस्लिम लीग की ओर से दीन मोहम्मद तथा मोहम्मद मुनीर को नियुक्त किया गया। इसी प्रकार बंगाल प्रांत के विभाजन के लिये कांग्रेस की ओर से सी. सी. विश्वास एवं बी. के. मुखर्जी को तथा मुस्लिम लीग की ओर से मोहम्मद अकरम और एस. ए. रहमान को नियुक्त किया गया।

पंजाब के गवर्नर जैन्किन्स ने माउण्टबेटन को पत्र लिखकर मांग की कि रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट 15 अगस्त से पूर्व अवश्य ही प्रकाशित कर देनी चाहिये ताकि लोगों की भगदड़ खत्म हो। भारत विभाजन समिति ने भी वायसराय से यही अपील की।

आयोग की रिपोर्ट 9 अगस्त 1947 को तैयार हो गयी किंतु लार्ड माउण्टबेटन ने उसे एक सप्ताह तक प्रकाशित नहीं करने का निर्णय लिया ताकि स्वतंत्रता दिवस के आनंद में विघ्न न हो। इस कारण पंजाब और बंगाल में असमंजस की स्थिति बनी रही।

भारत की स्वतंत्रता के दो दिन पश्चात् अर्थात् 17 अगस्त 1947 को माउण्टबेटन ने रैडक्लिफ अवार्ड की प्रतियां भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खां को सौंपीं। इसी निर्णय के आधार पर भारत व पाकिस्तान की सीमायें निर्धारित की गयीं।

ताजमहल को पाकिस्तान ले जाने की मांग

भारत विभाजन की तिथि घोषित हो जाने के बाद कुछ मुसलमानों ने मांग की कि ताजमहल को तोड़कर पाकिस्तान ले जाना चाहिये और वहाँ फिर से निर्मित किया जाना चाहिये क्योंकि ताजमहल का निर्माण आखिर एक मुसलमान ने किया है किंतु यह मांग कोई जोर नहीं पकड़ सकी।

पाकिस्तान का निर्माण

7 अगस्त 1947 को जिन्ना ने सदा-सदा के लिये भारत छोड़ दिया और वह कराची चला गया। जिन्ना के जाने के अगले दिन सरदार पटेल ने वक्तव्य दिया- ‘भारत के शरीर से जहर अलग कर दिया गया। हम लोग अब एक हैं और अब हमें कोई अलग नहीं कर सकता। नदी या समुद्र के पानी के टुकड़े नहीं हो सकते। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, उनकी जड़ें, उनके धार्मिक स्थान और केंद्र यहाँ हैं। मुझे पता नहीं कि वे पाकिस्तान में क्या करेंगे। बहुत जल्दी वे हमारे पास लौट आयेंगे।’

पाकिस्तान में रह गयी कांग्रेस कमेटियों ने आचार्य कृपलानी से पूछा कि स्वतंत्रता दिवस पर वे पाकिस्तान का झण्डा फहरायें या नहीं? इस पर कृपलानी ने आदेश दिया कि किसी तरह का झण्डा लहराने की आवश्यकता नहीं है। किसी तरह के जश्न में भी भाग नहीं लिया जाना चाहिये।

14 अगस्त को लार्ड माउण्टबेटन ने पाकिस्तान की संविधान निर्मात्री परिषद में भाषण दिया और पाकिस्तान के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की घोषणा की। इसके पश्चात् वे उसी दिन वायुयान से दिल्ली लौट आये और मध्यरात्रि को भारत की संविधान निर्मात्री परिषद में भाषण देकर उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – भारत को स्वतंत्रता की प्राप्ति एवं विभाजन

स्वतंत्रता के द्वार पर भारत

भारत का विभाजन

स्वाधीनता का उदय

विभाजन के बाद साम्प्रदायिक उन्माद

स्वाधीनता का उदय

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स्वाधीनता का उदय

14 अगस्त 1857 को सर्यास्त के साथ ही भारत से पराधीनता के चिह्न विलोपित होने लगे एवं स्वाधीनता का उदय होने लगा। ब्रिटिश नेताओं एवं भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश राज्यशाही के विलोपन में गरिमा को बनाए रखा।

भारत के अंग्रेजों के विरुद्ध किसी तरह की नारेबाजी नहीं की गई एवं न उन्हें अपमानित करने का प्रयास किया गया। यहाँ तक कि ब्रिटिश राज्यशाही के चिह्नों को भी बड़े आदर के साथ अंग्रेज अधिकारियों को सौंप दिया गया।

स्वाधीनता का उदय

यूनियन जैक का अवतरण

बम्बई के गवर्नर सर जान कोल्वील ने वायसराय को लिखा कि भारत की आजादी के बाद यदि उसे यूनियन जैक अथवा ऐसा ध्वज जिसमें यूनियन जैक लगा हो, फहराने नहीं दिया गया तो वह भारत में नहीं रुकेगा। वायसराय स्वयं भी इस विषय पर चिंतन कर रहा था। उसने खुद अपने हाथों से दोनों देशों का झण्डा तैयार किया।

एक का आधार था कांग्रेस का झण्डा चर्खे के साथ, दूसरे का आधार था मुस्लिम लीग का झण्डा चांद के साथ। दोनों में 1/9 क्षेत्रफल का यूनियन जैक ऊपरी हिस्से में सिला गया। इन झण्डों को वायसराय ने स्वीकृति के लिये जिन्ना और नेहरू के पास भेज दिया।

जिन्ना ने जवाब दिया कि पाकिस्तान के लिये झण्डे का यह डिजायन किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है क्योंकि चांद के साथ क्रिश्चियन क्रॉस मुसलमानों की भावना के लिये ठीक नहीं है।

नेहरू ने वायसराय को एक नया डिजाइन भिजवाया जिसमें बाकी का हिस्सा तो कांग्रेस के झण्डे जैसा ही था किंतु चरखे के स्थान पर सारनाथ के अशोक स्तंभ का चक्र लिया गया था तथा यूनियन जैक नहीं था। माउण्टबेटन के पास कोई विकल्प नहीं था सिवाय इसके कि वह मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस द्वारा सुझाये गये झण्डों को स्वीकार कर ले। इस प्रकार यूनियन जैक की पूरी तरह से विदाई हो गयी।

14 अगस्त की शाम को लखनऊ की रेजिडेंसी से चुपचाप यूनियन जैक उतार लिया गया और उसे आचिनलेक के पास भेज दिया गया। आचिनलेक ने उसे राजा जार्ज षष्ठम् के पास भेज दिया ताकि वह उसे विंडसर कॉसल के संग्रहालय में  ऐतिहासिक झण्डों के साथ जगह पा सके।

दूसरे दिन जब भारतीयों का जुलूस तिरंगा फहराने के लिये उस स्थान पर पहुंचा तो पता चला कि किसी ने ध्वज दंड को जड़ से काट दिया है। यूनियन जैक इस स्थान पर पूरे एक सौ साल फहराया था, 1847 ई. से लेकर 1947 ई. तक। 14 अगस्त की संध्या को जब सूर्य का अवसान हुआ तो देशभर में यूनियन जैक ने ध्वजदण्ड का त्याग कर दिया।

जवाहरलाल नेहरू ने माउण्टबेटन के इस आग्रह को स्वीकार कर लिया था कि यूनियन जैक को उतारते समय किसी तरह का समारोह नहीं होगा ताकि अँग्रेजों की भावनाओं को ठेस न लगे। समारोह 15 अगस्त को तिरंगे के आरोहण के साथ ही किये गये।

ब्रिटिश सम्राट का अंतिम संदेश देने से इंकार

भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने के अवसर पर ब्रिटेन के सम्राट जार्ज षष्ठम् द्वारा दोनों उपनिवेशों की जनता के नाम अंतिम संदेश देने के लिये वायसराय द्वारा ब्रिटिश सरकार से अनुरोध किया गया। ब्रिटेन की लेबर सरकार इस पर सहमत नहीं हुई। भारत सचिव लॉर्ड लिस्टोवेल ने वायसराय को लिखा कि इसे सभी हिंदुस्तानी और अँग्रेज पसंद नहीं भी कर सकते हैं।

ब्रिटिश राष्ट्रगान के गायन का प्रश्न

स्वतंत्रता समारोह के दिन ब्रिटिश राष्ट्रगान गॉड सेव द किंग के गायन के प्रश्न पर माउण्टबेटन ने प्रांतीय गवर्नरों को निर्देश दिये कि सत्ता सौंपने के बाद सार्वजनिक रूप से इसका गायन नहीं होना चाहिये। सिर्फ गवर्नर के भवनों में यह प्रस्तुत हो। सत्ता सौंपने की रस्म के समय गवर्नरों को तोप की सलामी और राष्ट्रीय गान के पहले हिस्से का हक है।

स्वाधीनता का उदय – स्वतंत्रता दिवस समारोह

14 अगस्त की संध्या को दिल्ली के निवासी घरों से निकल कर नाचते गाते हुए मध्य दिल्ली की ओर जाने लगे। किसानों से भरी हुई बैलगाड़ियों से दिल्ली की सड़कें पट गयीं। वे सब आजादी के समय आधी रात को दिल्ली में उपस्थित रहना चाहते थे।

जब जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल तथा डा. राजेन्द्र प्रसाद आदि नेताओं ने भारत की स्वतंत्रता के समारोह की घोषणा करने के लिये संसद भवन के लिये प्रस्थान किया तो नई दिल्ली के मुख्य मार्गों पर आनंद से चिल्लाते हुए अपार जन समूह ने दोनों तरफ कतारें बना लीं।

सभा भवन से बाहर आधी रात को आकाश में अचानक बिजली चमकने लगी और तेज बारिश आरम्भ हो गई किंतु लोग डटे रहे। सभा भवन को चारों तरफ से भारतीयों ने घेर रखा था। बारह बजते ही भवन के अंदर तेज शंखनाद हुआ और उसके साथ ही भारत अवतरित हो गया।

दिल्ली ने स्वतंत्रता का स्वागत प्रकाश से किया। दिल्ली के प्रत्येक भवन पर प्रकाश की झालरें लगी हुई थीं जिनके प्रकाश से राजधानी जगमगा रही थी। हर ओर पटाखे छोड़े गये।

कांग्रेस ने लोगों से अपील की कि 15 अगस्त को देश में बूचड़खाने बंद रहें। देश का हर सिनेमाघर निशुल्क सिनेमा दिखाये। दिल्ली की पाठशालाओं में विद्यार्थियों को मिठाई और आजादी पदक दिया जाये। सरकार ने फांसी की समस्त सजायें माफ कर दीं। 15 अगस्त की प्रातः दिल्ली की सड़कों पर इतने आदमी जमा हुए जितने सम्पूर्ण मानव इतिहास में कभी भी एक स्थान पर एकत्र नहीं हुए होंगे।

एक अनुमान के अनुसार लगभग पाँच लाख लोग पूरे भारत से दिल्ली पहुंचे जहाँ आजादी का सबसे बड़ा समारोह होने वाला था। अँग्रेजों ने भी बड़ी प्रसन्नता से इन समारोहों में भाग लिया। कुछ अँग्रेज महिलायें भारत छोड़ने के दुख में फूट-फूट कर रोने लगीं। इस भीड़ में किसी के हिलने के लिये इंच भर भी जगह नहीं थी।

गवर्नर जनरल की नियुक्ति

ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त होने के तुरंत बाद भारत और पाकिस्तान के लिये एक-एक गवर्नर जनरल नियुक्त किया जाना था। भारत स्वतंत्रता अधिनियम में प्रावधान किया गया था कि दोनों देश चाहें तो एक ही व्यक्ति को दोनों देशों का गवर्नर जनरल बना सकते थे।

ऐसा माना जा रहा था कि लार्ड माउण्टबेटन दोनों देशों के लिये विश्वसनीय होंगे तथा वे कुछ समय के लिये लार्ड माउण्टबेटन को अपना गवर्नर जनरल बनायेंगे लेकिन पाकिस्तान ने जिन्ना को प्रथम गवर्नर जनरल नियुक्त किया।

वायसराय ने इच्छा जाहिर की कि वे आजादी के बाद तब तक दोनों देशों के गवर्नर जनरल बने रहें जब तक कि दोनों देशों में अपना संविधान बन कर तैयार नहीं हो जाये। भारतीय नेता वायसराय से इसके लिये पहले ही अनुरोध कर चुके थे किंतु वायसराय के काफी जोर देने पर भी जिन्ना इसके लिये राजी नहीं हुआ।

ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि आजादी के बाद भी माउण्टबेटन कुछ समय तक भारत में रहें। यदि आजादी के तुरंत बाद वायसराय ने भारत छोड़ दिया तो भारत व पाकिस्तान में अँग्रेज असुरक्षित हो जायेंगे और उनमें भगदड़ मच जायेगी। उनके तत्काल हट जाने से भारत व पाकिस्तान के बीच अधिक रक्त-पात होगा जिससे ब्रिटिश सरकार की बदनामी होगी।

आजादी के बाद भी माउण्टबेटन के भारत में टिके रहने से टोरी पार्टी और सम्पूर्ण विपक्ष सरकार के खिलाफ कोई हो हल्ला नहीं मचा सकेगा। माउण्टबेटन के भारत में रहने से भारत व पाकिस्तान के कॉमनवैल्थ में बने रहने तथा रिश्तों के मजबूत बनने की संभावनायें बढ़ जायेंगी।

भारतीय नेता भी कई कारणों से माउण्टबेटन को भारत में बने रहने देना चाहते थे। माउण्टबेटन के रहने से पाकिस्तान और हिंदुस्तान के मध्य बंटवारों के सम्बन्ध में होने वाले विवाद में मध्यस्थता करने वाला मौजूद रहेगा। भारत सरकार की ओर से देशी रजवाड़ों से मजबूती से बात कर सकने वाले अधिकारी के रूप में भी उसकी सेवायें अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होंगी।

इन सब कारणों को देखते हुए माउण्टबेटन ने भारत के प्रथम गवर्नर जनरल का पद स्वीकार कर लिया। आजादी के बिल में प्रावधान किया गया कि आजादी के बाद मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के तथा माउण्टबेटन भारत के गवर्नर जनरल होंगे।

15 अगस्त की मध्यरात्रि को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद डा. राजेंद्र प्रसाद ने माउण्टबेटन को स्वाधीन भारत के प्रथम गवर्नर जनरल के पद पर नियुक्त किये जाने का पत्र सौंपा। 15 अगस्त 1947 की प्रातः स्वाधीन भारत के प्रथम गवर्नर जनरल का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया गया।

माउण्टबेटन ने अपना दाहिना हाथ उठाकर शपथ ली कि वे स्वतंत्र भारत के प्रथम सेवक के रूप में अधिकतम हार्दिकता और परिश्रम के साथ भारत की सेवा करेंगे। इसी समारोह में नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्यों को शपथ दिलवायी गयी। भारत के वायसराय के रूप में माउण्टबेटन को 31 तोपों की सलामी दी जाती थी। भारत के गवर्नर जनरल के रूप में उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गयी।

इस नियुक्ति से लार्ड माउण्टबेटन के मन में भारत के प्रति अधिक उदार भाव ने जन्म लिया। आगे चलकर जब कभी भी भारत-पाकिस्तान के मध्य किसी भी विषय पर विवाद हुआ तो भारत के दावे को अधिक वजन मिला जिससे नाराज होकर पाकिस्तान द्वारा लार्ड माउण्टबेटन पर आरोप लगाये गये कि जिन्ना के निर्णय ने माउण्टबेटन को चिढ़ा दिया और माउण्टबेटन ने अपने अधिकारों का उपयोग भारत का पक्ष लेने में किया।

इन आरोपों के अनुसार माउण्टबेटन ने पंजाब और बंगाल प्रांतों में भारत पाक सीमाओं के निर्धारण में, कश्मीर रियासत के भारत में रहने के मामले में तथा अन्य अनेक मामलों में भारत का पक्ष लिया। पाकिस्तान द्वारा शत्रुता का भाव आगे तक चलता रहा। 1956 ई. में लार्ड माउण्टबेटन को भारत जाने के लिये पाकिस्तान सरकार द्वारा पाकिस्तान के ऊपर होकर उड़ने की अनुमति नहीं दी गयी।

ब्रिटिश अधिकारियों की विदाई

स्वाधीनता दिवस के दिन जार्ज एबेल और इवान जेन्किन्स, इंगलैण्ड के लिये रवाना हो गये। उसी दिन सर सिरिल रेडक्लिफ भी रवाना हुआ। फील्ड मार्शल सर क्लाड आचिनलेक अगस्त 1947 के अंत तक देश में रहे। जब कांग्रेस ने उन पर और पंजाब बाउंड्री फोर्स पर पाकिस्तान का पक्ष लेने का आरोप लगाया तो आचिनलेक तथा जनरल रीस ने त्यागपत्र दे दिये।

आचिनलेक के जाने के कुछ दिनों बाद लार्ड इस्मे भी चला गया। लार्ड माउण्टबेटन मई 1948 तक भारत के गवर्नर जनरल के पद पर कार्य करते रहे। जून 1948 में उन्होंने फिर से ब्रिटिश नौसेना में अपना कार्य संभाल लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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विभाजन के बाद साम्प्रदायिक उन्माद

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विभाजन के बाद साम्प्रदायिक उन्माद

भारत विभाजन के बाद साम्प्रदायिक उन्माद उठ खड़ा हुआ। जो लोग अपने घरों को छोड़कर जा रहे थे, उनमें दूसरे सम्प्रदाय के विरुद्ध अपार क्रोध था जिसकी परिणति साम्प्रदायिक उन्माद में हुई।

लॉर्ड माउण्टबेटन ने रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट 15 अगस्त के बाद प्रकाशित करने का निर्णय लिया था। जिस समय रैडक्लिफ की रिपोर्ट प्रकाशित हुई उस समय भारत से ब्रिटिश सेना लगभग जा चुकी थी।

इस कारण जब रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित होने के पश्चात् पंजाब में सांप्रदायिक उन्माद भड़क उठा तो उसे रोकने वाला कोई नहीं था। पंजाब बाउंड्री फोर्स के सैनिक अपना कर्त्तव्य भूलकर अपने संप्रदाय के लोगों के साथ हो गये।

रैडक्लिफ द्वारा खींची गयी रेखा ने पचास लाख हिन्दुओं और सिखों को पाकिस्तानी पंजाब में छोड़ दिया जबकि भारतीय पंजाब में पचास लाख मुसलमान छूट गये थे। इस कारण लाखों मुस्लिम भारत से पाकिस्तान गये तथा लाखों हिन्दू पाकिस्तान से भारत आये।

माइकल ब्रीचर ने इसकी संख्या बताते हुए लिखा है- ‘अफवाह, भय तथा उन्माद के कारण लगभग 12 मिलियन (एक करोड़ बीस लाख) लोगों की अदला बदली हुई जिनमें से आधे हिन्दू तथा आधे मुसलमान थे। एक साल समाप्त होने से पूर्व लगभग आधा मिलियन (पाँच लाख) लोग या तो मर गये या मार डाले गये। दिल्ली की गलियां शरणार्थियों से भर गयीं। इन शरणार्थियों ने दिल्ली में रहने वाले मुसलमानों पर हमले किये जिनसे कानून व्यवस्था भंग हो गयी।’

मोसले ने लिखा है- ‘इस अदला बदली में छः लाख लोग मारे गये, एक करोड़ चालीस लाख लोग घरों से निकाले गये तथा एक लाख जवान लड़कियों का अपहरण हुआ या जबर्दस्ती उनका अपहरण हुआ या उनको नीलाम किया गया। बच्चों की टांगों को पकड़ कर दीवारों पर पटक दिया गया, लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ और उनकी छातियां काट दी गयीं। गर्भवती औरतों के पेट चीर दिये गये।’

लैरी कांलिंस व दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है- ‘केवल तीन माह की अवधि में एक करोड़ पाँच लाख लोग बेघरबार हो गये।’

 खुशवंतसिंह ने अपनी पुस्तक ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ की भूमिका में देश की आजादी की तिथि की घोषणा के बाद हिन्दु-मुस्लिम सांप्रदायिक तनाव के पूर्व से पश्चिम में खिसक आने का उल्लेख करते हुए लिखा है-

‘कलकत्ते से बढ़कर दंगे उत्तर, पूर्व और पश्चिम की ओर फैलने लगे। पूर्वी बंगाल में नोआखाली तक, जहाँ मुसलमानों ने हिंदुओं का कत्ल किया और इधर बिहार तक जहाँ हिंदुओं ने मुसलमानों का। मुल्ले; पंजाब, सरहदी सूबों तथा बिहार में मारे गये मुसलमानों की खोपड़ियां संदूकों में भर-भर कर घूमने लगे।

सदियों से देश के उत्तर-पश्चिमी सरहदी इलाकों में रहते आ रहे हिंदू और सिख अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षा के लिये पूरब की तरफ (हिंदू और सिखों की बहुतायत वाले इलाकों की तरफ) भागने लगे। कोई पैदल ही चल पड़े, कोई बैलगाड़ियों में, कोई ठसाठस भरी लारियों में लदे, तो कोई रेलगाड़ियों से लटके या उनकी छतों पर पटे।

रास्तों में उनकी मुठभेड़ें वैसे ही त्रस्त मुसलमानों से हुई जो सुरक्षा के लिये पश्चिम की तरफ भाग रहे थे। दंगे भगदड़ में बदल गये थे। 1947 की गर्मियों तक जबकि पाकिस्तान के नये राज्य के निर्माण की विधिवत् घोषणा की जा चुकी थी, लगभग एक करोड़ हिंदू, मुसलमान और सिख इसी भगदड़ में फँसे थे।

मानसून के आगमन तक दस लाख के करीब लोग मारे जा चुके थे। पूरे उत्तरी भारत में हथियार तने हुए थे, लोग भय-त्रस्त थे और लुक छिप रहे थे।’

भारत के पूर्व विदेश सचिव जे. एन. दीक्षित ने लिखा है- ‘वास्तव में यह बहुत आश्चर्य जनक होता यदि इतने वर्षों से मुस्लिम लीग द्वारा भारतीय मुसलमानों को पढ़ाये जा रहे नफरत के सबक के बाद ये दंगे और उनके साथ आतंक और विनाश उत्पन्न न हुए होते।’

न्यायाधीश जी. डी. खोसला ने जनसंख्या की अदला बदली के दौरान मरने वाले लोगों के बारे में पाँच लाख का आंकड़ा बताया है। इंगलैण्ड के दो प्रमुख इतिहासकारों पेण्डरल मून और एच. वी. हडसन ने क्रमशः दो लाख और ढाई लाख मौतें होने का अनुमान लगाया है।

जहाँ कुल मिलाकर एक लाख पाँच हजार लोगों की अदला बदली हुई वहीं बंगाल की सीमा पर कुल दस लाख लोगों की ही अदला बदली हुई। जे. एन. दीक्षित के अनुसार अक्टूबर 1948 में पूर्वी पाकिस्तान से पंद्रह लाख हिंदू अप्रवासी आये। यहाँ तक कि सरदार पटेल को यह धमकी देनी पड़ी कि यदि पाकिस्तान सरकार ने पूर्वी बंगाल से हिंदुओं के प्रस्थान को नहीं रोका तो भारत सरकार हिंदू अप्रवासियों की पुनर्व्यवस्था के लिये पूर्वी बंगाल से आनुपातिक क्षेत्र का दावा कर सकती है।

मोसले ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान की आजादी के प्रारंभिक दिनों में ही लगभग साढ़े सात लाख पंजाबियों ने एक दूसरे का कत्ल किया। दंगों के उस माहौल में शायद ही किसी अँग्रेज को कुछ भुगतना पड़ा हो। वे अपने क्लबों में उसी तरह शराब पी रहे थे, संगीत की धुनों पर भी उसी तरह नाच रहे थे।’

पंजाब बाउंड्री फोर्स हिंसा को बड़े पैमाने पर घटित होने से नहीं रोक सकी। लैरी कांलिंस व दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है- ‘पंजाब के दंगे चाहे कितने भी प्रचण्ड रहे किंतु उन्होंने कुल मिलाकर भारत की संपूर्ण आबादी के केवल दसवें हिस्से को प्रभावित किया और वे पंजाब के अतिरिक्त किसी और अन्य प्रांत में नहीं फैल सके।’

मोसले ने लिखा है- ‘यदि रैडक्लिफ रिपोर्ट आजादी से पहले प्रकाशित हो जाती तथा नेहरू, जिन्ना और जनरल रीस को इसकी सूचना पहले दे दी जाती कि कौनसा हिस्सा कहाँ जा रहा है तो फौज की तैनाती अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा सकती थी। माउण्टबेटन ने रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। खुद अपने कलेजे से चिपकाये रहा। स्वतंत्रता दिवस तो खुशी-खुशी बीत गया किंतु इससे लाखों लोगों का सर्वस्व चला गया।’

माईकल एडवर्ड्स ने लिखा है- ‘माउण्टबेटन भारत में सांप्रदायिक स्थिति से निबटने में पूरी तरह असक्षम रहा। उसने जितना समय दोनों उपनिवेशों के ध्वज तैयार करने तथा भारतीय नेताओं के नाम के आगे स्क्वायर लगाने या न लगाने जैसे मसलों पर व्यर्थ किया, उतना समय देश की वास्तवकि समस्याओं पर व्यय नहीं किया गया।’

मोसले ने पाकिस्तान में हुए सिक्खों के नरसंहार के लिये पश्चिमी पंजाब के गवर्नर सर फ्रांसिस मुडी पर खुला आरोप लगाया है। मुडी ने जिन्ना को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि मैं तो सभी से यह कहता रहा हूँ कि सिक्ख पाकिस्तान के बाहर किस तरह जाते हैं इसकी मुझे परवाह नहीं। बड़ी बात है उनसे छुटकारा पा जाना।

जब देश आजाद हुआ तो सांप्रदायिक हिंसा अपने चरम पर थी। गांधीजी ने इस आग को बुझाने के लिये पाकिस्तान और मुसलमानों की जिन मांगों को मानने के लिये भारत सरकार पर दबाव डाला, उसे कई लोगों ने तुष्टिकरण की नीति माना।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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विभाजन के बाद साम्प्रदायिक उन्माद

देशी रजवाड़ों की समस्या

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देशी रजवाड़ों की समस्या

भारत में अत्यंत प्राचीन काल से देशी रजवाड़े मौजूद थे। अंग्रेज इन्हें एक केन्द्रीय शासन व्यवस्था के अधीन लाना चाहते थे किंतु राजा लोग इसके लिए तैयार नहीं थी। आजादी के बाद भी देशी रजवाड़ों की समस्या बनी रही। इसे सुलझाना आवश्यक था।

देशी रजवाड़ों की समस्या

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में गवर्नरों द्वारा शासित 11 ब्रिटिश प्रांत, चीफ कमिश्नरों द्वारा शासित 6 ब्रिटिश प्रांत एवं 567 देशी राज्य थे। ब्रिटिश प्रांत भारत सरकार द्वारा प्रत्यक्षतः शासित होते थे जबकि देशी राज्यों के साथ ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अधीनस्थ सहायता की संधियाँ करके उनका वास्तविक शासन हड़प लिया था।

1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम से पहले ब्रिटेन में यह मांग उठती रहती थी कि भारत के देशी राज्यों को समाप्त कर दिया जाये किंतु किसी तरह ये राज्य चलते रहे। जब 1857 ई. के स्वतंत्रता आंदोलन में देशी राजाओं ने अँग्रेजों तथा उनके शासन की रक्षा की तो अँग्रेजों को देशी राज्यों का महत्त्व अच्छी तरह समझ में आ गया तथा उन्होंने देशी राज्यों को बनाये रखकर अपने चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण कर लिया।

1919 ई. में जब भारत में रोलट एक्ट का व्यापक विरोध हुआ तो भारत सरकार ने कांग्रेस का मुकाबला करने के लिये देशी राजाओं का एक मंच खड़ा किया जिसे नरेन्द्र मण्डल (चैम्बर और प्रिसेंज) कहा जाता था। उसके बाद से राजा लोग भारत सरकार के समक्ष अपनी समस्याएं इसी मंच के माध्यम से रखते आ रहे थे।

साइमन कमीशन (1927 ई.) की रिपोर्ट (1930 ई.) के बाद, भारत सरकार लगातार यह प्रयास करती रही थी कि देशी राज्यों को एक संघ के नीचे लाया जाये जिसमें ब्रिटिश प्रांत भी हों। राजा लोगों ने प्रारम्भ में तो संघ में आने की इच्छा व्यक्त की किंतु बाद में वे पलट गये। वे नहीं चाहते थे कि भारत संघ बने और न ही यह चाहते थे कि भारत स्वतंत्र हो क्योंकि अधिकांश देशी राजा, ब्रिटिश परमोच्चता को देशी राज्यों के लिये रक्षा कवच मानते थे। उनका मानना था कि कांग्रेस देशी राज्यों को नष्ट कर देगी।

कांग्रेस और देशी राजाओं में मतभेद

जब देश की स्वतंत्रता की तिथि निकट आ गई तो कांग्रेस ने घोषणा की कि जब देश स्वतंत्र होगा तो देशी राज्यों का नियंत्रण स्वतः भारत सरकार को स्थानांतरित हो जायेगा किंतु देशी राज्यों का कहना था कि वे भारत सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं और न ही भारत सरकार से किसी तरह की संधि से बंधे हुए हैं, उन्होंने अपने राज्यों की संधियाँ ब्रिटिश ताज के साथ की थीं।

अतः जब इंग्लैण्ड की सरकार इस देश को छोड़कर जायेगी तो देशी राज्य अधीनस्थ सहायता की संधियों से मुक्त होकर, पहले की स्थिति में आ जायेंगे जिससे ब्रिटिश ताज की परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा यह परमोच्चता किसी नई बनने वाली सरकार को नहीं दी जायेगी। इस प्रकार देशी रजवाड़ों की समस्या नेताओं के समक्ष एक चुनौती बन गई।

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा

कैबीनेट मिशन की असफलता के बाद जब भारतीय सेनाओं में विद्रोह हो गया तो 20 फरवरी 1947 को प्रधानमंत्री एटली ने घोषणा की कि 20 जून 1948 तक भारत को स्वतंत्र कर दिया जायेगा। उस घोषणा में देशी राज्यों के सम्बन्ध में केवल इतना कहा गया कि महामाना सम्राट की सरकार की यह मंशा नहीं है कि परमोच्चता के अधीन राज्यों की शक्तियां तथा दायित्व ब्रिटिश भारत में किसी अन्य सरकार को सौंपी जायें।

यह मंशा भी नहीं है कि परमोच्चता को सत्ता के अंतिम हस्तांतरण की तिथि तक बनाये रखा जाये। अंतरिम काल के लिये राज्यों के साथ ब्रिटिश ताज के सम्बन्ध किसी अन्य समझौते द्वारा समायोजित किये जा सकते हैं। इसलिए अब देशी रजवाड़ों की समस्या को सुलझाना भारतीय नेताओं के लिए पहली चुनौती बन गई।

देशी राज्यों के शासकों की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री एटली के वक्तव्य का राजाओं द्वारा एक स्वर से स्वागत किया गया। नवाब भोपाल ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि जब अँग्रेज चले जायेंगे तो परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा राज्य स्वतंत्र हो जायेंगे। सर सी. पी. रामास्वामी का मानना था कि प्रधानमंत्री एटली के इस वक्तव्य के अनुसार सत्ता के अंतिम हस्तांतरण के बाद राज्य स्वतंत्र राजनीतिक इकाईयां बन जायेंगे जो कि नयी सरकार के साथ वार्ताओं के माध्यम से व्यवस्थाएं करेंगे तथा नवीन भारतीय व्यवस्था में अपनी स्थिति को प्राप्त करेंगे।

सर सी. पी. रामास्वामी ने एक प्रेस वार्ता में दावा किया कि एटली के बयान ने कैबिनेट मिशन योजना को आच्छादित (सुपरसीड) कर लिया है तथा उसने राज्यों को खुला छोड़ दिया है ताकि राज्य तत्काल ही अपने आंतरिक एवं बाह्य मामालों को इस प्रकार मान्यता दें कि भारत सरकार से बराबर के स्तर पर वार्ता करने के लिये 10 या 12 से अधिक इकाईयां न हों।

रजवाड़ों की स्थिति पर विचार

पं. जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि भारतीय रियासतें केवल मध्यकालीन सामंतवाद के ऐतिहासिक चिह्न हैं। इनकी वर्तमान परिस्थिति से संगति नहीं होती। समाज और राजनीति की वर्तमान स्थिति में इनका कोई स्थान नहीं है। जवाहरलाल नेहरू के इस वक्तव्य से देशी रजवाड़ों की समस्या और उलझ गई। राजाओं से उनके राज्य बलपूर्वक नहीं छीने जा सकते थे। इससे देश में अराजकता व्याप्त हो जाती।

कांग्रेस द्वारा रजवाड़ों की स्थिति को लेकर कई तरह के प्रस्तावों पर विचार किया गया। उनमें से एक यह भी था कि ब्रिटिश सरकार सत्ता के हस्तांतरण के बाद भी कुछ निश्चित रियासतों पर अपनी परमसत्ता बनाये रखे। ऐसा करना असंभव प्रायः ही था।

ऐसा करने से यही प्रतीत होता कि ब्रिटेन भारत में अपनी टांग अड़ाये रखना चाहता है तथा ऐसा करके वह एक कमजोर एवं खण्ड-खण्ड भारत का निर्माण करना चाहता है। ऐसी स्थिति में यह भी संभव था कि आगे चलकर ब्रिटिश संरक्षित रजवाड़ों तथा भारत एवं पाकिस्तान की सरकारों के मध्य युद्ध हों।

ब्रिटिश सरकार इतना ही कर सकती थी कि रजवाड़ों को मजबूत बनाये ताकि जब उत्तराधिकारी सरकार के साथ रजवाड़ों के समझौते हों तो रजवाड़े अपने लिये अधिक से अधिक सुविधायें ले सकें। ऐसा करने के लिये भी केवल एक ही उपाय दिखाई पड़ता था कि रजवाड़ों पर से परमसत्ता को समाप्त कर दिया जाये उसे किसी अन्य सरकार को नहीं सौंपा जाये।

माईकल एडवर्ड्स ने लिखा है कि जब स्वतंत्रता पर विचार-विमर्श चल रहे थे, तब ब्रिटिश शासकों के पास इस बात पर विस्तार से विचार करने के लिये वास्तव में कोई समय नहीं था कि जब सत्ता का अंतिम रूप से स्थानांतरण हो जाये तब राजाओं को किस तरह से कार्य करना चाहिये।

पूरी ब्रिटिश सरकार इस बात पर सुस्पष्ट थी कि देशी रजवाड़ों पर से परमसत्ता का हस्तांतरण किसी अन्य सरकार को नहीं किया जाये क्योंकि 1946 ई. में कैबिनेट मिशन यह आशा एवं अपेक्षा प्रकट कर चुका था कि सभी रियासतें प्रस्तावित भारत संघ के साथ मिल जायेंगी।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947

4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम 1947 पारित कर दिया। इस अधिनियम की धारा 8 में प्रावधान किया गया कि 15 अगस्त 1947 को देशी राज्यों पर से ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता समाप्त हो जायेगी तथा यह पुनः देशी राज्यों को हस्तांतरित कर दी जायेगी। इस कारण देशी राज्य अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी भी देश में सम्मिलित होने अथवा पृथक अस्तित्व बनाये रखने के लिये स्वतंत्र हो जायेंगे।

स्वतन्त्रता के समय देशी राज्यों की स्थिति

स्वतन्त्रता के समय भारत में छोटी बड़ी 566 देशी रियासतें थीं। समस्त भारत का 40 प्रतिशत क्षेत्रफल और 25 प्रतिशत जनसंख्या इन राज्यों में निवास करती थी। जनसंख्या, क्षेत्रफल और वित्तीय संसाधनों की दृष्टि से इन राज्यों में भारी असमानता थी। प्रस्तावित पाकिस्तान की सीमा में पड़ने वाली 12 रियासतों पर मुस्लिम नवाबों और खानों का शासन था तथा वहाँ की बहुसंख्य जनसंख्या भी मुसलमान थी।

जबकि भारतीय क्षेत्र में रह जाने वाली 554 रियासतों में से हैदराबाद, जूनागढ़, भोपाल तथा टोंक आदि कुछ रियासतों पर ही मुसलमान शासकों का शासन था किंतु वहां की बहुसंख्य जनसंख्या हिन्दू थी। जम्मू-काश्मीर अकेली ऐसी रियासत थी जिस पर हिन्दू शासक का शासन था और वहाँ की बहुसंख्य जनसंख्या मुसलमान थी।

शेष समस्त रियासतों पर हिन्दू शासकों का शासन था और वहाँ की बहुसंख्य जनसंख्या भी हिन्दू थी। देशी राज्यों में जनता के अधिकार निश्चित नहीं थे। 1936 ई. के पश्चात् कुछ राज्यों में प्रजामण्डल आंदोलन हुए परन्तु उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। प्रत्येक देशी राज्य में एक ब्रिटिश रेजींडेट अथवा पोलिटिकल अधिकारी नियुक्त रहता था जिसके माध्यम से वायसराय, देशी राज्यों पर अपना शासन आरोपित करता था।

सैंकड़ों सालों से चली आ रही इस प्रकार की उलझी हुई स्थितियों के कारण देशी रजवाड़ों की समस्या को हलके में नहीं लिया जा सकता था।

अँग्रेज रेजीडेंटों की बैठक

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की धारा 8 में किये गये प्रावधानों के अनुसार देशी रियासतों से परमोच्चता हटाने एवं उन्हें स्वतंत्र करने हेतु आवश्यक तैयारियों के सम्बन्ध में भारत सरकार के राजनीतिक विभाग ने अँग्रेज रेजीडेंटों की एक बैठक दिल्ली में बुलाई।

इस बैठक में हुए विचार-विमर्श के आधार पर 10 बिंदु तैयार किये गये जिन पर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लॉर्ड लिस्टोवल से विचार विमर्श करना आवश्य समझा गया।

ये बिंदु परमोच्चता की समाप्ति, पोलिटिकल अधिकारियों तथा उनके स्टाफ की निकासी, रेजीडेंसियों के हस्तांतरण, दस्तावेजों के निरस्तारण, नई बनने वाली औपनिवेशिक सरकारों से सम्पर्क बनाने हेतु किये जाने वाले अंतरिम प्रबन्ध, रेलवे, डाक सेवा, टेलिग्राफ सेवा तथा मुद्रा आदि के सम्बन्ध में स्टैण्ड स्टिल एग्रीमेंट्स से सम्बन्धित थे। नीति विषयक प्रश्न पहले से ही कैबिनेट मिशन द्वारा निर्धारित कर दिया गया था जो कि योजना में जोड़ा जाना था।

देशी राज्यों की मंशा

देशी राज्य किसी भी कीमत पर भारत संघ अथवा किसी अन्य प्रकार के संघ में प्रवेश के इच्छुक नहीं थे। वे अपने स्वतंत्र राज्य उसी प्रकार बने रहने देना चाहते थे जिस प्रकार ब्रिटिश छत्रछाया में जाने से पहले थे ताकि उन्हें अपनी रियासतों के राजस्व पर पूरा अधिकार हो।

वे अपनी मर्जी से अपने पड़ौंसियों से युद्ध अथवा मित्रता कर सकें और अपनी प्रजा को उसके अपराधों के लिये मृत्युदण्ड अथवा क्षमादान देते रहें। छोटे राज्यों के पास भारत संघ में मिल जाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था किंतु बड़े एवं सक्षम राज्यों की स्थित अलग थी।

त्रावणकोर, हैदराबाद, जम्मू एवं कश्मीर, मैसूर, इन्दौर, भोपाल, नवानगर यहाँ तक कि बिलासपुर की बौनी रियासत ने भी पूर्णतः स्वतंत्र रहने का स्वप्न देखा। अलवर नरेश ने 3 अप्रेल 1947 को बम्बई में आयोजित नरेन्द्र मंडल की बैठक में कहा कि देशी राज्यों के अधिपतियों को हिंदी संघ राज्य में नहीं मिलना चाहिये।

5 जून 1947 को भोपाल तथा त्रावणकोर ने स्वतंत्र रहने के निर्णय की घोषणा की। हैदराबाद को भी यही उचित जान पड़ा। जम्मू एवं कश्मीर, इन्दौर, जोधपुर, धौलपुर, भरतपुर तथा कुछ अन्य राज्यों के समूह के द्वारा भी ऐसी ही घोषणा किये जाने की संभावना थी। इस प्रकार देशी रियासतों के शासकों की महत्वाकांक्षायें देश की अखण्डता के लिये खतरा बन गयीं।

मद्रास के तत्कालीन गवर्नर तथा बाद में स्वतंत्र भारत में ब्रिटेन के प्रथम हाई कमिश्नर सर आर्चिबाल्ड नेई को रजवाड़ों के साथ किसी प्रकार की संधि होने में संदेह था। माउण्टबेटन ने सरदार पटेल से कहा कि यदि राजाओं से उनकी पदवियां न छीनी जायें, महल उन्हीं के पास बने रहें, उन्हें गिरफ्तारी से मुक्त रखा जाये, प्रिवीपर्स की सुविधा जारी रहे तथा अँग्रेजों द्वारा दिये गये किसी भी सम्मान को स्वीकारने से न रोका जाये तो वायसराय, राजाओं को इस बात पर राजी कर लेंगे कि वे अपने राज्यों को भारतीय संघ में विलीन करें और स्वतंत्र होने का विचार त्याग दें।

देशी रजवाड़ों की समस्या से निबटने के लिए सरदार पटेल ने माउण्टबेटन के सामने शर्त रखी कि वे माउण्टबेटन की शर्त को स्वीकार कर लेंगे यदि माउण्टबेटन सारे रजवाड़ों को भारत की झोली में डाल दें।

तेजबहादुर सप्रू का कहना था- ‘मुझे उन राज्यों पर, चाहे वे छोटे हों अथवा बड़े, आश्चर्य होता है कि वे इतने मूर्ख हैं कि वे समझते हैं कि वे इस तरह से स्वतंत्र हो जायेंगे और फिर अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखेंगे। दुर्दिन के मसीहाओं ने भविष्यवाणी की थी कि हिंदुस्तान की आजादी की नाव रजवाड़ों की चट्टान से टकरायेगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – स्वतंत्र भारत में देशी रियासतों के विलय का प्रश्न

देशी रजवाड़ों की समस्या

देशी रियासतें पाकिस्तान में मिलाने हेतु षड़यंत्र

जूनागढ़ की समस्या

हैदराबाद की समस्या

कश्मीर समस्या

देशी रियासतें पाकिस्तान में मिलाने हेतु षड़यंत्र

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देशी रियासतें पाकिस्तान में मिलाने हेतु षड़यंत्र

मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के लिए अलग देश बनाने के उद्देश्य से भारत का विभाजन करवाया था किंतु जब पाकिस्तान बनने लगा तो मुहम्मद अली जिन्ना तथा उसके साथी नेताओं ने राजपूताने की देशी रियासतें पाकिस्तान में मिलाने हेतु गहरा षड़यंत्र किया।

भारत विभाजन का निर्णय हिंदू-मुस्लिम जनसंख्या की बहुलता के क्षेत्रों के आधार पर किया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में अधिकांश राज्य, हिंदू राज्य थे। फिर भी मुहम्मद अली जिन्ना ने प्रयत्न किया कि वह भारत की अधिकतम रियासतों को प्रस्तावित पाकिस्तान में मिलने के लिये सहमत करे ताकि एक कटे-फटे तथा छिद्रयुक्त कमजोर भारत का निर्माण हो।

मुहम्मद अली जिन्ना की योजना थी कि यदि रियासतें पाकिस्तान में मिलने की घोषणा न करें तो, स्वतंत्र रहने की ही घोषणा कर दें। जिन्ना ने अपना ध्यान मुसिलम शासकों द्वारा शासित बड़ी रियासतों एवं पाकिस्तान की सीमा से सटी हुई हिन्दू रियासतों पर केन्द्रित किया। भोपाल नवाब हमीदुल्ला खां जिन्ना की इस योजना में सम्मिलित हो गया।

एक ओर कांग्रेस देशी राज्यों के प्रति कठोर नीति का प्रदर्शन कर रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने देशी राज्यों के साथ बड़ा ही मुलायम रवैया अपनाया। मुस्लिम लीग के लिये ऐसा करना सुविधाजनक था क्योंकि प्रस्तावित पाकिस्तान की सीमा में देशी राज्यों की संख्या 12 थी। शेष 554 रियासतें प्रस्तावित भारत संघ की सीमा के भीतर स्थित थीं।

जिन्ना, हिन्दू राजाओं के गले में यह बात उतारना चाहता था कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा देशी राजाओं की साझा शत्रु है। जिन्ना ने लुभावने प्रस्ताव देकर राजपूताना की रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का प्रयास किया। उसने घोषित किया कि देशी राज्यों में मुस्लिम लीग बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेगी और यदि देशी राज्य स्वतंत्र रहें तो भी मुस्लिम लीग की ओर से उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं दी जायेगी। लीग की ओर से राजस्थान के राजाओं में गुप्त प्रचार किया गया कि उन्हें पाकिस्तान में मिलना चाहिये, हिंदी संघ राज्य में नहीं।

निजाम हैदराबाद के प्रति माउण्टबेटन का रवैया अत्यंत नरम था। जिन्ना ने वायसराय के राजनीतिक सविच कोनार्ड कोरफील्ड और भोपाल नवाब हमीदुल्लाखां का उपयोग भारत को कमजोर करने में किया। त्रावणकोर के महाराजा ने 11 जून 1947 को एक व्यापारी दल अपने यहाँ से पाकिस्तान भेजना स्वीकार कर लिया। महाराजा जोधपुर और बहुत सी छोटी रियासतों के शासक बड़े ध्यान से यह देख रहे थे कि बड़ी रियासतों के विद्रोह का क्या परिणाम निकलता है, उसी के अनुसार वे आगे की कार्यवाही करना चाहते थे।

महाराजा बड़ौदा ने अपने हाथ से सरदार पटेल को लिखा- ‘जब तक उनको भारत का राजा नहीं बनाया जाता और भारत सरकार उनकी समस्त मांगें नहीं मान लेती तब तक वे कोई सहयोग नहीं देंगे और न ही जूनागढ़ के नवाब की बगावत दबाने में सहयोग देंगे।’

इस पर भारत सरकार ने महाराजा प्रतापसिंह की मान्यता समाप्त करके उनके पुत्र फतहसिंह को बड़ौदा का महाराजा बना दिया। भारत सरकार का कठोर रवैया देखकर अधिकांश राजा विनम्र देश-सेवकों जैसा व्यवहार करने लगे। जो राज्य संघ उन्होंने रियासतों का विलय न होने देने के लिये बनाया था, उसे भंग कर दिया गया।

उन्होंने समझ लिया कि अब भारत सरकार से मिल जाने और उसका संरक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। वे यह भी सोचने लगे कि शासक बने रह कर विद्रोही प्रजा की इच्छा पर जीने के बजाय भारत सरकार की छत्रछाया में रहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा, फिर भी जिन्ना तथा उसके साथियों का षड़यंत्र जारी रहा

भोपाल नवाब का षड़यंत्र

भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ तीसरे मोर्चे का नेता था। वह छिपे तौर पर मुस्लिम परस्त, पाकिस्तान परस्त तथा कांग्रेस विरोधी के रूप में काम कर रहा था किंतु जब देश का विभाजन होना निश्चित हो गया तो वह प्रत्यक्षतः मुस्लिम लीग के समर्थन में चला गया तथा जिन्ना का निकट सलाहकार बन गया।

वह जिन्ना की उस योजना में सम्मिलित हो गया जिसके तहत राजाओं को अधिक से अधिक संख्या में या तो पाकिस्तान में मिलने के लिये प्रोत्साहित करना था या फिर उनसे यह घोषणा करवानी थी कि वे अपने राज्य को स्वतंत्र रखेंगे। भोपाल नवाब चाहता था कि भोपाल से लेकर कराची तक के मार्ग में आने वाले राज्यों का एक समूह बने जो पाकिस्तान में मिल जाये।

इसलिये उसने जिन्ना की सहमति से राजपूताने की देशी रियासतें पाकिस्तान में मिलाने हेतु एक योजना बनायी ताकि बड़ौदा, इंदौर, भोपाल, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर राज्य, पाकिस्तान का अंग बन जायें। इस योजना में उदयपुर और बड़ौदा की ओर से बाधा उपस्थित हो सकती थी किंतु महाराजा जोधपुर ने उक्त रियासतों से सहमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली।  इस प्रकार भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का एक मानचित्र तैयार हो गया।

भोपाल नवाब की गतिविधियों को देखकर रियासती मंत्रालय के तत्कालीन सचिव ए. एस. पई ने रियासती विभाग के मंत्री सरदार पटेल को एक नोटशीट भिजवायी- ‘भोपाल नवाब, जिन्ना के दलाल की तरह काम कर रहा है।’

धौलपुर के राजराणा षड़यंत्र में सम्मिलित

हमीदुल्ला खाँ ने धौलपुर महाराजराणा उदयभानसिंह को भी देशी रियासतें पाकिस्तान में मिलाने की योजना में सम्मिलित कर लिया। उदयभानसिंह जाटों की प्रमुख रियासत के बहुपठित, बुद्धिमान एवं कुशल राजा माने जाते थे किंतु वे किसी भी कीमत पर धौलपुर को भारत संघ में मिलाने को तैयार नहीं थे।

जिन्ना के संकेत पर नवाब तथा महाराजराणा ने जोधपुर, जैसलमेर, उदयपुर तथा जयपुर आदि रियासतों के राजाओं से बात की तथा उन्हें जिन्ना से मिलने के लिये आमंत्रित किया। नवाब का साथ देने वाले हिंदू राजाओं में अलवर महाराजा तेजसिंह भी थे।

कोरफील्ड के दुष्प्रयास

माउण्टबेटन के राजनीतिक सलाहकार कोनार्ड कोरफील्ड ने ब्रिटिश रेजीडेंटों और पॉलिटिकल एजेंटों के माध्यम से राजाओं को भारतीय संघ से पृथक रहने के लिये प्रेरित किया। वह चाहता था कि कम से कम दो-तीन राज्य जिनमें हैदराबाद प्रमुख था, कांग्रेस के चंगुल से बच जायें।

बाकी रजवाड़ों का भी भारत में सम्मिलित होना जितना मुश्किल हो सके, बना दिया जाये। कोरफील्ड ने देशी रियासतें पाकिस्तान में मिलाने हेतु रजवाड़ों के बीच घूम-घूम कर प्रचार किया कि उनके सामने दो नहीं तीन रास्ते हैं, वे दोनों उपनिवेशों में से किसी एक में सम्मिलित हो सकते हैं अथवा स्वतंत्र भी रह सकते हैं। कोरफील्ड के प्रयासों से त्रावणकोर तथा हैदराबाद ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी उपनिवेश में सम्मिलित नहीं होंगे अपितु स्वतंत्र देश के रूप में रहेंगे।

सरदार पटेल और देशी राज्य

5 जुलाई 1947 को भारत की अन्तरिम सरकार के गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग की स्थापना की गई और उन्हें भारत की ओर से देशी नरेशों से वार्त्ता करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया। हमीदुल्ला खाँ, कोरफील्ड तथा रामास्वामी अय्यर की योजना से निबटने तथा स्वतंत्र हुई रियासतों को भारत संघ में घेरने के लिये पटेल अकेले ही भारी थे।

वी. पी. मेनन को पटेल का सलाहकार व सचिव नियुक्त किया गया। वे एकमात्र ऐसे अधिकारी थे जो देशी राज्यों की जटिल समस्या को सुलझा सकते थे। पटेल का जोरदार व्यक्तित्व और मेनन के लचीले दिमाग का संयोग इस मौके पर और भी अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ।

नेपथ्य में मंजे हुए राजनीतिज्ञ जैसे सरदार के. एम. पन्निकर, वी. टी. कृष्णामाचारी तथा भारतीय रियासतों के प्रतिष्ठित मंत्री और भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जैसे सी. एस. वेंकटाचार, एम. के. वेल्लोदी, वी. शंकर, पण्डित हरी शर्मा आदि अनुभवी लोग कार्य कर रहे थे। पटेल को माउन्टबेटन, चेम्बर ऑफ प्रिन्सेज के नये चान्सलर महाराजा पटियाला तथा बीकानेर नरेश सादुलसिंह से भी महत्त्वपूर्ण सहयोग मिला।

सरदार पटेल ने मेनन से कहा कि पाकिस्तान इस विचार के साथ कार्य कर रहा है कि सीमावर्ती कुछ राज्यों को अपने साथ मिला ले। स्थिति इतनी खतरनाक संभावनाएं लिये हुए है कि जो स्वतंत्रता हमने बड़ी कठिनाईयों को झेलने के पश्चात् प्राप्त की है वह राज्यों के दरवाजे से विलुप्त हो सकती है।

आजादी की तिथि में पाँच सप्ताह शेष रह गये थे। एक ओर कोरफील्ड अँग्रेजों की सत्ता समाप्ति से पहले रजवाड़ों से केंद्रीय सत्ता का विलोपन करने के काम में लगा हुआ था जिससे एक-एक करके सारी व्यवस्थायें रद्द होती जा रही थीं। दूसरी ओर सरदार इस उधेड़-बुन में थे कि 15 अगस्त से पहले राजाओं की प्रत्येक व्यवस्था, जिन्हें अँग्रेजों ने रद्द करना आरम्भ कर दिया था, जैसे सेना, डाक आदि को बनाये रखने के सम्बन्ध में कैसे बात की जाये?

सरदार पटेल एवं मेनन ने अब जिन्ना द्वारा देशी रियासतें पाकिस्तान में मिलाने हेतु किए जा रहे षड़यंत्र को तोड़ने हेतु काम करना आरम्भ किया। 5 जुलाई 1947 को पटेल ने राजाओं से अपील की कि वे 15 अगस्त 1947 से पूर्व, भारत संघ में सम्मिलित हो जायें। सरदार पटेल ने भारतीय नरेशों से अपील की कि भारत के सामूहिक हितों को ध्यान में रखते हुए वे देश की अखण्डता को बनाये रखने में सहयोग करें।

उन्होंने तीन मुख्य विषयों- प्रतिरक्षा, वैदेशिक सम्बन्ध और संचार व्यवस्था के सम्बन्ध में ही राज्यों को भारतीय संघ में सम्मिलित होने का आग्रह किया जिसकी स्वीकृति उन्होंने पूर्व में कैबिनेट मिशन योजना के समय दे दी थी। उन्होंने नरेशों को विश्वास दिलाया कि कांग्रेस, राज्यों के आन्तरिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगी।

राज्यों के साथ व्यवहार में रियासती विभाग की नीति अधिकार की नहीं होगी। कांग्रेस राजाओं के विरुद्ध नहीं रही है। देशी नरेशों ने सदैव देशभक्ति व लोक कल्याण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है। पटेल ने राजाओं को चेतावनी भी दी कि यदि कोई नरेश यह सोचता हो कि ब्रिटिश परमोच्चता उसको हस्तांतरित कर दी जायेगी तो यह उसकी भूल होगी।

परमोच्चता तो जनता में निहित है। एक प्रकार से यह घोषणा, राजाओं को समान अस्तित्व के आधार पर भारत में सम्मिलित हो जाने का निमंत्रण था। सरदार के शब्दों में यह प्रस्ताव, रजवाड़ों द्वारा पूर्व में ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी अधीनस्थ संधि से बेहतर था।

इस प्रकार पटेल व मेनन द्वारा देशी राजाओं को घेर कर भारत संघ में विलय के लिये पहला पांसा फैंका गया। बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने सरदार पटेल की इस घोषणा का तुरंत स्वागत किया और अपने बंधु राजाओं से अनुरोध किया कि वे इस प्रकार आगे बढ़ाये गये मित्रता के हाथ को थाम लें और कांग्रेस को पूरा समर्थन दें ताकि भारत अपने लक्ष्य को शीघ्रता से प्राप्त कर सके किंतु अधिकांश राजाओं का मानना था कि उन्हें पटेल की बजाय कोरफील्ड की बात सुननी चाहिये।

भारत संघ में विलय की प्रक्रिया

भारत सरकार द्वारा देशी राज्यों के भारतीय संघ में सम्मिलित होने के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की गई। रियासती विभाग ने देशी राज्यों के भारत अथवा पाकिस्तान में प्रवेश के लिये दो प्रकार के प्रपत्र तैयार करवाये- प्रविष्ठ संलेख (इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) तथा यथास्थिति समझौता पत्र (स्टैण्डस्टिल एग्रीमेंट)।

प्रविष्ठ संलेख एक प्रकार का मिलाप पत्र (ज्योइनिंग लैटर) था जिस पर हस्ताक्षर करके कोई भी राजा भारतीय संघ में प्रवेश कर सकता था और अपना आधिपत्य केंद्र सरकार को समर्पित कर सकता था। यह प्रविष्ठ संलेख उन बड़ी रियासतों के लिये तैयार किया गया था जिनके शासकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। इन रियासतों की संख्या 140 थी।

इन रियासतों के अतिरिक्त गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में 300 रियासतें ऐसी थीं जिन्हें जागीर (एस्टेट) अथवा तालुका कहा जाता था। इनमें से कुछ जागीरों व तालुकों को 1943 ई. में संलग्नता योजना (एटेचमेंट स्कीम) के तहत निकटवर्ती बड़े राज्यों के साथ जोड़ दिया गया था किंतु परमोच्चता की समाप्ति के साथ ही यह योजना भी समाप्त हो जानी थी।

अतः इन ठिकानों एवं तालुकों के ठिकानेदारों एवं तालुकदारों ने मांग की कि उन्हें 1943 ई. वाली स्थिति में लाया जाये तथा उनकी देखभाल भारत सरकार द्वारा की जाये जैसी कि राजनीतिक विभाग द्वारा की जाती रही थी। इन ठिकानों एवं तालुकों के लिये अलग प्रविष्ठ संलेख तैयार करवाया गया।

काठियावाड़, मध्य भारत तथा शिमला हिल्स में 70 से अधिक राज्य ऐसे थे जिनका पद ठिकानेदारों और तालुकदारों से बड़ा था किंतु उन्हें पूर्ण शासक का दर्जा प्राप्त नहीं था। ऐसे राज्यों के लिये अलग से प्रविष्ठ संलेख तैयार करवाया गया।

स्टैण्डस्टिल एग्रीमेण्ट, प्रशासनिक एवं आर्थिक सम्बन्धों की यथास्थिति बनाये रखने के लिये सहमति पत्र था। भारत सरकार ने निर्णय किया कि वह उसी राज्य के साथ यथास्थिति समझौता करेगी जो राज्य, प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करेगा। इन दोनों प्रकार के प्रपत्रों को वायसराय ने 25 जुलाई 1947 की बैठक में उन राज्यों के शासकों को दे दिया जो भारत की सीमा में पड़ने वाले थे। जिन्ना ने वायसराय से कह दिया था कि पाकिस्तान की सीमा में आने वाले राज्यों से वह स्वयं बात करेगा।

राजाओं को माउण्टबेटन की सलाह

25 जुलाई 1947 को वायसराय ने दिल्ली में नरेंद्र मण्डल का पूर्ण अधिवेशन बुलाया। माउण्टबेटन द्वारा क्राउन रिप्रजेण्टेटिव के अधिकार से बुलाया जाने वाला यह पहला और अंतिम सम्मेलन था।

सम्मेलन में उपस्थित लगभग 75 बड़े राजाओं अथवा उनके प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए माउण्टबेटन ने कहा –

भारत स्वतंत्रता अधिनियम ने 15 अगस्त 1947 से भारतीय राज्यों को ब्रिटिश ताज के प्रति उनके समस्त दायित्वों से स्वतंत्र कर दिया है। राज्यों को तकनीकी एवं कानूनी रूप से पूरी सम्पूर्ण स्वतंत्रता होगी….किंतु ब्रिटिश राज के दौरान साझा हित के विषयों के सम्बन्ध में एक समन्वित प्रशासन पद्धति का विकास हुआ है जिसके कारण भारत उपमहाद्वीप ने एक आर्थिक इकाई के रूप में कार्य किया।

वह सम्पर्क अब टूटने को है। यदि इसके स्थान पर कुछ भी नहीं रखा गया तो उसका परिणाम अस्त-व्यस्तता ही होगा। उसकी पहली चोट राज्यों पर होगी। उपनिवेश सरकार से आप उसी प्रकार नाता नहीं तोड़ सकते जिस प्रकार कि आप जनता से नाता नहीं तोड़ सकते, जिसके कल्याण के लिये आप उत्तरदायी हैं।

राज्य तीन विषयों- रक्षा, विदेशी मामले और संचार पर भारत या पाकिस्तान, जो उनके लिये उपयुक्त हो, के साथ अपना विलय कर लें। राज्यों पर कोई वित्तीय जवाबदेही नहीं डाली जायेगी तथा उनकी सम्प्रभुता का अतिक्रमण नहीं किया जायेगा। उन्होंने हिन्दू बहुल क्षेत्रों के राजाओं को सलाह दी कि वे अपने राज्यों का विलय भारत में करें।

प्रविष्ठ संलेख प्रारूप को स्वीकृति

वायसराय ने एक वार्त्ता समिति का गठन किया जिसमें 10 राज्यों के शासक तथा 12 राज्यों के दीवान सम्मिलित किये गये। यह समिति दो उपसमितियों में विभक्त हो गयी। एक उपसमिति को प्रविष्ठ संलेख पर तथा दूसरी उपसमिति को यथास्थिति समझौता पत्र पर विचार विमर्श करना था। इन दोनों उपसमितियों ने 25 जुलाई से 31 जुलाई तक प्रतिदिन दिल्ली स्थित बीकानेर हाउस में अलग-अलग बैठकें कीं। लगातार छः दिन एवं रात्रियों तक परिश्रम करने के बाद दोनों दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया जा सका। 31 जुलाई 1947 को दोनों प्रारूप स्वीकार कर लिये गये।

राजाओं के विशेषाधिकारों की संवैधानिक गारण्टी

अधिकांश राजाओं को डर था कि आजादी के बाद या तो उनकी जनता ही उनकी संपत्तियों को लूट लेगी अथवा कांग्रेस सरकार उसे जब्त कर लेगी। ब्रिटिश सत्ता आजादी के बाद किसी भी तरह राजाओं की रक्षा नहीं कर सकती थी। राजाओं को समझ में आने लगा था कि या तो अत्यंत असम्मानजनक तरीके से हमेशा के लिये मिट जाओ या फिर किसी तरह सम्मानजनक तरीके से अपनी कुछ सम्पत्ति तथा कुछ अधिकारों को बचा लो।

31 जुलाई 1947 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने रियासती मंत्रालय के सचिव को एक पत्र लिखकर राजाओं के लिये विशेषाधिकारों की मांग की। रियासती मंत्रालय के सचिव ने महाराजा को लिखा कि नरेशगण व उनके परिवार जिन विशेषाधिकारों का उपयोग करते आये हैं, वह भविष्य में भी करते रहेंगे।

बीकानेर महाराजा ने इस पत्र की प्रतियां बहुत से राजाओं को भिजवायीं। जोधपुर महाराजा इस पत्र से आश्वस्त नहीं हुए किंतु उन्होंने केन्द्र सरकार से किसी विशेष अधिकार की मांग नहीं की। उनका मानना था कि प्रजा के साथ पीढ़ियों पुराने व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होने तथा अपने पूर्वजों द्वारा प्रजा की भलाई के लिये किये गये असंख्य कार्यों के कारण उन्हें प्रजा का सौहार्द मिलता रहेगा और यही उनका सबसे बड़ा विशेषाधिकार होगा।

शासकों द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर

सरदार पटेल की अपील, माउण्टबेटन द्वारा नरेन्द्र मण्डल में दिये गये उद्बोधन, कोरफील्ड की रवानगी, रियासतों में चल रहे जन आंदोलन तथा बीकानेर नरेश को रियासती मंत्रालय के पत्र आदि परिस्थितियों के वशीभूत होकर अधिकांश राजाओं ने भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये।

बीकानेर नरेश सादूलसिंह हस्ताक्षर करने वाले प्रथम राजा थे। अधिकतर राज्यों, विशेषकर छोटे राज्यों, जिन्हें अपनी सीमाओं का पता था तथा वे ये भी जानते थे कि रोटी के किस तरफ मक्खन लगा हुआ है, स्वेच्छा से भारतीय संघ के अंतर्गत आ गये।

न तो वे अर्थिक रूप से सक्षम थे और न ही उनमें आंतरिक अथवा बाह्य दबावों का विरोध करने की क्षमता थी। कई बुद्धिमान तथा यथार्थवादी राजाओं ने विरोध की व्यर्थता तथा शक्तिशाली भारत संघ की संविधान सभा की सदस्यता की सार्थकता को अनुभव किया तथा शालीनता पूर्वक भारत संघ में सम्मिलित हो गये।

कुछ हंसोड़ एंव मजाकिया स्वभाव के थे वे भी संघ में धकेल दिये गये। कुछ राजा अपने घोटालों और कारनामों से डरे हुए थे, उन्हें भी बलपूर्वक संघ में धकेल दिया गया। राजनीतिक विभाग के मखमली दस्ताने युक्त हाथ, राजाओं की भुजाओं पर काम करते रहे।

कुछ रजवाड़ों ने अपना विलय स्वीकार तो किया किंतु बेहद रंजिश के साथ। मध्य भारत का एक राजा विलय के कागजात पर हस्ताक्षर करने के साथ लड़खड़ा कर गिरा और हृदयाघात से उसकी मृत्यु हो गयी। बड़ौदा का महाराजा दस्तखत करने के बाद मेनन के गले में हाथ डालकर बच्चों की तरह रोया।

भोपाल ने सेंट्रल इण्डियन स्टेट्स का एक फेडरेशन बनाने का प्रयास किया किंतु वह असफल हो गया। राजपूत राजाओं ने भारतीय सेना के राजपूत सिपाहियों को आकर्षित करके रजवाड़ों की सेना में सम्मिलित कर लेने की आशा की थी किंतु यह आशा फलीभूत नहीं हुई।

जब त्रावणकोर ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया तो स्टेट्स कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी ने महाराजा के खिलाफ आंदोलन किया। कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं की त्रावणकोर पुलिस के साथ सड़कों पर मुठभेड़ हुई। 29 जुलाई को एक अनजान हमलावर ने त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर को छुरा मारकर बुरी तरह घायल कर दिया।

रामास्वामी के चेहरे पर गहरी चोट आयी। हमलावर भागने में सफल रहा। इस हमले ने निर्णय कर दिया। महाराजा ने वायसराय को तार दिया कि वह दस्तखत करने को तैयार है। सरदार पटेल ने स्थानीय कांग्रेस कमेटी को तुरंत प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया। इसका जादू का सा प्रभाव हुआ। राज्यों को सबक मिला। वे और अधिक संख्या में हस्ताक्षर करने लगे।

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतन्त्र हो गया। पाकिस्तानी क्षेत्र में स्थित 12 रियासतें पाकिस्तान में सम्मिलित हो गईं  और शेष 554 रियासतें भारत में रह गईं। जूनागढ़़ (सौराष्ट्र), हैदराबाद (दक्षिण भारत) और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर 551 रियासतों ने सरदार पटेल के प्रयत्नों से 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में मिलने पर सहमति दे दी। जूनागढ़, हैदराबाद तथा जम्मू-कश्मीर राज्य भारत में मिलने को तैयार नहीं हुए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – स्वतंत्र भारत में देशी रियासतों के विलय का प्रश्न

देशी रजवाड़ों की समस्या

देशी रियासतें पाकिस्तान में मिलाने हेतु षड़यंत्र

जूनागढ़ की समस्या

हैदराबाद की समस्या

कश्मीर समस्या

जूनागढ़ की समस्या

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जूनागढ़ की समस्या - www.bharatkaitihas.com
जूनागढ़ की समस्या

भारत में विलय के प्रश्न पर जूनागढ़ की समस्या जूनागढ़ के नवाब द्वारा अनावश्यक रूप से खड़ी की गई। जूनागढ़ की बहुसंख्य प्रजा हिन्दू थी और शासक मुसलमान था जो कि पाकिस्तन में मिलना चाहता था।

गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में 1748 ई. से जूनागढ़ रियासत स्थित थी। इस पर मुस्लिम नवाब का शासन था। इस रियासत की 80 से 90 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। जूनागढ़ रियासत चारों ओर से हिन्दू रियासतों से घिरी हुई थी। जूनागढ़ रियासत तथा पाकिस्तान की सीमा के बीच 240 मील की दूरी में समुद्र स्थित था।

इस रियासत का अंतिम नवाब मुहम्मद महाबत खानजी (तृतीय) 11 वर्ष की आयु में रियासत का शासक बना था। उसने मेयो कॉलेज अजमेर में पढ़ाई की थी। उसे तरह-तरह के कुत्ते पालने तथा शेरों का शिकार करने का शौक था। 

जब वायसराय की 25 जुलाई 1947 की दिल्ली बैठक के बाद भारत सरकार ने नवाब को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन भिजवाया तो नवाब ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किये तथा समाचार पत्रों में एक घोषणा पत्र प्रकाशित करवाया-

‘पिछले कुछ सप्ताहों से जूनागढ़ की सरकार के समक्ष यह सवाल रहा है कि वह हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला करे। इस मसले के समस्त पक्षों पर सरकार को अच्छी तरह गौर करना है। यह ऐसा रास्ता अख्तयार करना चाहती थी जिससे अंततः जूनागढ़ के लोगों की तरक्की और भलाई स्थायी तौर पर हो सके तथा राज्य की एकता कायम रहे, उसकी आजादी और ज्यादा से ज्यादा बातों पर इसके अधिकार बने रहें। गहरे सोच विचार और सभी पहलुओं पर जांच परख के बाद सरकार ने पकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया है और अब उसे जाहिर कर रही है। राज्य का विश्वास है कि वफादार रियाया, जिसके दिल में राज्य की भलाई और तरक्की है, इस फैसले का स्वागत करेगी।’

जूनागढ़ की जनता ने, नवाब की कार्यवाही का जबरदस्त विरोध किया और एक स्वतन्त्र अस्थायी हुकूमत की स्थापना कर ली। भारत सरकार ने लियाकत अली से पूछा कि क्या पाकिस्तान इसे स्वीकार करेगा किंतु पाकिस्तान की ओर से कोई जवाब नहीं आया। कई हफ्ते बीत जाने के बाद पाकिस्तान सरकार ने घोषणा की कि जूनागढ़ का निर्णय मान लिया गया है तथा अब वह पाकिस्तान का हिस्सा माना जायेगा। पाकिस्तान से एक छोटी टुकड़ी जूनागढ़ भेज दी गई।

भारत सरकार की ओर से कहा गया कि नवाब के उत्पीड़न के कारण जूनागढ़ से हिन्दू शरणार्थी भाग रहे हैं। जूनागढ़ के चारों तरफ छोटी हिन्दू रियासतों का जमावड़ा था, उन्होंने भी भारत सरकार से सहायता मांगी। वे लोग चारों तरफ से घेर लिये गये थे। नवाब ने अपनी सेनाएं भेजकर इन रियासतों पर अधिकार कर लिया।

जूनागढ़ रियासत के दीवान शाह नवाज भुट्टो  के बुलावे पर भारत सरकार ने सेना भेजकर जूनागढ़ को चारों से घेर लिया। कुछ दिन बाद जब जूनागढ़ की सेना के पास रसद की कमी हो गई तब भारतीय सेना आगे बढ़ी। जूनागढ़ की जनता ने इस सेना का स्वागत किया। 24 अक्टूबर 1947 को नवाब अपने विशेष हवाई जहाज में बैठकर पाकिस्तान भाग गया।

नवाब अपनी चार बेगमों एवं अधिक से अधिक संख्या में अपने कुत्तों को हवाई जहाज में ले जाना चाहता था किंतु एक बेगम जूनागढ़ में ही छूट गई। नवाब ने अपने साथ अपने समस्त जवाहरात भी ले गया। नवाब तथा उसका परिवार कराची में बस गये।

9 नवम्बर 1947 को भारतीय सेना ने जूनागढ़ पर अधिकार कर लिया। 20 फरवरी 1948 को भारत सरकार द्वारा जूनागढ़ में जनमत-संग्रह करवाया गया जिसमें रियासत की 2 लाख से अधिक जनसंख्या ने भाग लिया। 99 प्रतिशत जनसंख्या ने भारत में मिलने की तथा शेष लोगों ने पाकिस्तान में मिलने की इच्छा व्यक्त की। 17 नवम्बर 1959 को नवाब की मृत्यु हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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