शाहजहाँ का शासनकाल मुगल स्थापत्य का स्वर्णकाल था। इस काल में स्थापत्य कला अपने चरम पर पहुँच गई। शाहजहाँ ने अनेक इमारतें बनवाईं। वह स्वयं स्थापत्य कला में निपुण था। वह अपनी इमारतांे के नक्शे स्वयं देखता था। शाहजहाँ की इमारतें श्वेत संगमरमर से निर्मित हैं। उसके समय में राजपूताने में स्थित मकराना की खानों में प्रचुर मात्रा में संगमरमर उपलब्ध था।
शाहजहाँ के समय में निर्माण कला के साधनों और सिद्धान्तों में अनेक परिवर्तन हुए। उसके काल में पत्थर काटने में निपुण कारीगरों का स्थान संगमरमर काटने और पॉलिश करने में निपुण कारीगरों ने ले लिया। आयताकार भवनों का स्थान चौकोर लहरदार सजावटपूर्ण महलों ने ले लिया। सबसे अधिक मौलिक परिवर्तन मेहराब की बनावट में हुआ। इनमें सजावट, पच्चीकारी और नजाकतपूर्ण सौन्दर्य आ गया। आगरा, लाहौर, दिल्ली आदि नगरों में पुराने महलों का नव-निर्माण हुआ और नवीन भवन बनवाये गये।
शाहजहाँ के काल की स्थापत्य शैली के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों की राय है कि इन कृतियों के कलाकार विदेशी थे और शाहजहाँ ने अकबर कालीन हिन्दू प्रभाव वाली स्थापत्य शैली को त्यागकर पुनः शुद्ध ईरानी शैली को अपनाने का प्रयास किया था। कतिपय अन्य विद्वान इसे भारतीय शैली से ही उत्पन्न बताते हैं। डॉ. बनारसी प्रसाद के अनुसार यह शैली दो संस्कृतियों के समन्वय का परिणाम थी।
शाहजहाँकालीन दिल्ली की इमारतें
(1.) दिल्ली का लाल किला
शाहजहाँ ने दिल्ली के पास शाहजहाँनाबाद नामक नगर बसाया और उसमें लाल किले के नाम से एक किले का निर्माण कराया। इसकी लम्बाई 3100 फुट और चौड़ाई 1650 फुट है। किले की दीवारें ऊँची तथा कँगूरेदार हैं। इसकी पश्चिमी दीवार में मुख्य दरवाजा बनाया गया जो जन साधारण के प्रवेश के लिये था। दक्षिणी दीवार वाला दरवाजा व्यक्तिगत था तथा विशेष व्यक्तियों द्वारा ही व्यवहार में लाया जाता था।
(2.) दीवाने आम
दिल्ली के लाल किले के मध्य विशाल भाग में दीवाने आम बना हुआ है। इसका आकार चतुर्भुजी है। यह पत्थर से निर्मित 185 फुट लम्बा तथा 70 फुट चौड़ा भवन है। यहाँ बैठकर शाहजहाँ जनसाधारण की फरियाद सुनता था। इसके बाहरी भाग में 9 मेहराबें दोहरे खम्बों पर आधारित हैं।
तीनों ओर का मार्ग खम्भों पर आधारित दाँतेदार डाटों से बना हुआ है। इन खम्बों की कुल संख्या 40 है। इस भवन में पीछे की दीवार में एक मेहराबदार ताख है। इस ताख में शाहजहाँ का प्रसिद्ध तख्ते ताउस रखा रहता था। इस ताख की दीवार में अत्यन्त सुन्दर शिल्पकारी की गई है। पत्थरों को काटकर जड़ने के काम में इसका कोई सानी नहीं है।
(3.) रंगमहल
दिल्ली के लाल किले में दूसरी महत्त्वपूर्ण इमारत रंगमहल है। यह शाहजहाँ का हरम था। यह भवन 153 फुट लम्बा और 69 फुट चौड़ा है। इसके मध्य में एक बड़ा कक्ष है तथा चारों कोनों में छोटे-छोटे कक्ष हैं। यह अलंकृत सेतबन्धों द्वारा 15 भागों में विभाजित है तथा रंग एवं चमक में अद्वितीय है।
(4.) दीवाने खास
दिल्ली के लाल किले में स्थित दीवाने खास महत्त्वपूर्ण इमारत है। इसका निर्माण एक निश्चित योजना के अनुसार हुआ है। इसका बड़ा कमरा 90 फुट लम्बा और 67 फुट चौड़ा है। इसके बाहरी भाग में पाँच रास्ते हैं। ये पाँचों रास्ते मेहराबदार हैं तथा बराबर आकार के हैं।
दूसरी ओर के रास्ते कुछ छोटे हैं। इस प्रकार यह इमारत अधिक खुली हुई है। इन रास्तों से काफी हवा आती है जिससे यहाँ ठण्डक बनी रहती हैं। इसका फर्श सफेद संगमरमर का है। इसके मेहराब स्वर्ण तथा रंग से सजे हुए हैं तथा पंक्तियों से भरे हुए से लगते हैं।
रंगमहल तथा दीवाने खास में जड़ाई, नक्काशी, पच्चीकारी तथा सजावट का काम बहुत उत्तम है। इन दोनों की बनावट एक जैसी है। इनकी मेहराबें दाँतेदार हैं। छतें बहुत ही सुन्दर हैं। इन छतों में स्वर्ण तथा जवाहरातों की सजावट की गई है। इस छत को टिकाये रखने के लिये स्तम्भों का प्रयोग नहीं किया गया है। यह छत 12 कोनों के सेतुबन्ध से सधी हुई है। प्रत्येक भाग में सुन्दर जड़ाई तथा रंग का काम हुआ है। दीवारों तथा मेहराबों पर फूलों की सुन्दर आकृतियाँ बनी हुई हैं।
(5.) दिल्ली की जामा मस्जिद
शाहजहाँ ने दिल्ली के लाल किले के पास दिल्ली की प्रसिद्ध जामा मस्जिद बनवाई। यह लाल पत्थर से निर्मित शाही ढंग की इमारत है। इसके तीनों विशाल दरवाजों पर बुर्ज बने हुए हैं। पूर्व का द्वार शाही परिवार के उपयोग के लिये था। उत्तर और दक्षिण के द्वारों से जन-साधारण प्रवेश करता था।
इसमें नमाज पढ़ने के लिये 200 फुट लम्बा तथा 90 फुट चौड़ा स्थान है। इसके सामने 325 फुट लम्बा आयताकार सहन है जिसके बीच में हाथ-पैर धोने के लिये एक तालाब है। नमाज स्थल के बीच का बाहरी दरवाजा चौड़ा है तथा दोनों ओर पाँच-पाँच दाँतेदार मेहराबों के रास्ते हैं। इसके दोनों कोनों पर चार मंजिला लम्बी-लम्बी मीनारें हैं।
इस पूरी इमारत पर सफेद संगमरमर के बने हुऐ तीन विशाल गुम्बद हैं। अन्दर लहरियेदार मेहराबनुमा दरवाजे हैं। स्थापत्य के जानकार विद्वानों के अनुसार इस स्थल से प्राचीन विष्णु मंदिर के अवशेष प्राप्त होते हैं। इससे अनुमान होता है कि यह किसी समय हिन्दू पूजा स्थल रहा होगा। शाहजहाँ ने उसे तोड़कर मस्जिद में बदल दिया होगा।
शाहजहाँकालीन आगरा की इमारतें
(1.) आगरे का लाल किला
शाहजहाँ ने आगरे के लाल किले में अकबर द्वारा निर्मित लाल पत्थरों की अनेक इमारतें तुड़वाकर, संगमरमर से पुनः निर्मित करवाईं। इनमें मुख्य हैं- दीवाने आम, दीवाने खास, शीश महल, खास महल, मुसम्मन बुर्ज, नगीना मस्जिद तथा मोती मस्जिद।
(2.) दीवाने आम
शाहजहाँ ने दीवाने आम का निर्माण 1628 ई. में करवाया। इसका हॉल 201 फुट लम्बा तथा 67 फुट चौड़ा है। यह तीन तरफ से खुला हुआ है। इसकी छत दुहरे खम्भों की कतार से सधी हुई है। खम्भों की संख्या 40 है। चारों तरफ एक संगमरमर की गैलेरी है। दीवारों को काट-काटकर उसमंे रंगीन पत्थर, जवाहर, स्वर्ण इत्यादि बहुमूल्य वस्तुओं को जड़ा गया है।
(3.) दीवाने खास
दीवाने खास एक ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है। इसमें दो बड़े-बड़े कमरे हैं जिनको संगमरमर के गलियारे से जोड़ा गया है। हॉल के खम्भों और दरवाजों पर बहुत अच्छा जड़ाव, कटाव, नक्काशी तथा पच्चीकारी का काम किया गया है। सजावट का काम भी उत्तम है। इनके ऊपर फूल-पत्तियों के तरह-तरह के चित्र बने हुए हैं। पहले सोने से जड़ाई का काम हो रहा था। दीवाने खास के सामने एक बड़े आँगन में सफेद संगमरमर का विशाल चबूतरा बना हुआ है।
(4.) शीश महल
शीश महल में काँच का काम बहुत अच्छा हुआ है इसलिये इसका नाम शीश महल पड़ा। यह भवन दीवाने खास के नीचे है। इसके दरवाजों और दीवारों पर काँच तथा सोने का बहुत अच्छा काम हुआ है। दरवाजे तथा दीवारें रंगीन तथा बहुमूल्य पत्थरों से अलंकृत हैं।
(5.) खास महल
खास महल बादशाह का हरम था। यह दीवाने खास से लगा हुआ है। यह लाल पत्थर से निर्मित है। यमुना की तरफ की इसकी दो सुनहरी बुर्जियों में भाँति-भाँति के सुन्दर फूलों की सजावट है तथा बहुत बढ़िया नक्काशी की गई है। खास महल के गलियारे, कमरे तथा ऊपरी भाग सफेद संगमरमर के हैं। इनकी दीवारों पर अनेक प्रकार के सुन्दर तथा मूल्यवान पत्थरों की जड़ाई की गई है। इस महल के सामने अँगूरी बाग हैं। इस बाग के तीनों तरफ बड़े-बड़े हॉल हैं और चौथी तरफ संगमरमर का बड़ा गलियारा है। इस बाग में कई फव्वारे भी हैं।
(6.) मुसम्मन बुर्ज
मुसम्मन बुर्ज को पहले शाह बुर्ज भी कहते थे। यह सफेद संगमरमर से निर्मित चार मंजिला भवन है। इसकी चौथी मंजिल में सुन्दर नक्काशी है। इसके बीच में एक हौज बना हुआ है जिसका रूप गुलाब के फूल जैसा है। उसके सामने एक झरना भी बना हुआ है।
(7.) झरोखा दर्शन
खास महल और आठकोर मीनार के मध्य में झरोखा दर्शन है। यह सफेद संगमरमर का बना हुआ है। इसकी छतें चमकदार हैं। यहाँ से शाहजहाँ जनता को दर्शन देता था।
(8.) नगीना मस्जिद
नगीना मस्जिद शाही महिलाओं के लिये बनवाई गई थी। आकार-प्रकार मेंयह मस्जिद छोटी है परन्तु इसकी सुन्दरता में कोई कमी नहीं है। यह सफेद संगमरमर से निर्मित है। इसमें चारों ओर कमरे बने हैं तथा इसके सामने एक सुन्दर बाग है।
(9.) मोती मस्जिद
मोती मस्जिद उस काल की शिल्प कला के श्रेष्ठ सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है। यह आगरा के किले की सबसे शानदार इमारत है। यह 1654 ई. में बनकर तैयार हुई। यह एक ऊँची कुर्सी पर बनी हुई है। इस मस्जिद का आँगन सफेद रंग के बड़े आकार के चौकोर खण्डों से जड़ा हुआ है। इसमें एक फव्वारा तथा एक धूप घड़ी है।
वास्तु कला के जानकारों ने इस मस्जिद की बहुत प्रशंसा की है। इस मस्जिद के चारों ओर एक सुन्दर गैलेरी और एक खम्भेदार बरामदा बनाया गया है। इसमें अनेक कमरे बने हुए हैं जिन्हें संगमरमर के जालीदार पर्दों से एक-दूसरे से अलग कर दिया गया है।
(10.) आगरा की जामा मस्जिद
इसका निर्माण 1648 ई. में हुआ था। इसकी लम्बाई 130 फुट तथा चौड़ाई 100 फुट है। वास्तुकला की दृष्टि से यह दिल्ली की जामा मस्जिद से निम्न स्तर की है। मीनारों के अभाव के कारण यह कम प्रभावशाली दिखाई पड़ती है। इसके गुम्बद भी कम आकर्षक हैं। इसकी मेहराबें सामने की ओर चौड़ा स्थान छोड़कर बनाई गई हैं। यही इसकी विशेषता कही जा सकती है।
(11.) आगरा का ताजमहल
आगरा का ताजमहल वस्तुतः एक मकबरा है जिसे शाहजहाँ ने अपनी प्रिय बेगम मुमताज के प्रति अपने प्रेम की चिरस्थाई स्मृति के प्रतीक के रूप में बनवाया। इमारत की पूरी योजना आयताकार है तथा यह एक चारदीवारी से घिरा हुआ है जिसके चारों कोनों पर चार चौड़े-चौड़े मेहराबदार मण्डप हैं।
अहाते के भीतर एक वर्गाकार बाग है जिसके उत्तरी सिरे पर ऊँची कुर्सी पर सफेद संगमरमरी मकबरा स्थित है। मुख्य चबूतरे के चारों कोनों पर एक-एक तिमंजिली मीनार ऊपरी छतरी सहित बनाई गई है। सम्पूर्ण ताजमहल शैली, बनावट और कारीगरी में भारतीय है। सम्पूर्ण इमारत शुद्ध संगमरमर से निर्मित है।
इसकी अत्यन्त सुन्दर खुदाई और जड़ाई भारतीय शिल्पकारों की स्थापत्य दक्षता का प्रमाण है। ताजमहल को देखने से लगता है कि पत्थर के शिल्पकार की छैनी का स्थान अब संगमरमर पर पॉलिश करने वालों के बारीक औजारों ने ले लिया था। मेहराबों की बनावट में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। लगभग समस्त मेहराबें पत्तियोंदार या नोंकदार हैं।
ताजमहल के निर्माता कौन थे ?
इतिहासकार स्मिथ के अनुसार ताजमहल का निर्माण यूरोपियन तथा एशियाई कलाकारों ने किया। फादर मैनरिफ का कथन है कि ताजमहल का निर्माता वेनिस का निवासी जेरोम बोरनियो था परन्तु सर जॉन मार्शल और हेवेल इस मत को नहीं मानते। पर्सी ब्राउन के अनुसार इसका निर्माण तो प्रायः मुसलमान कलाकारों द्वारा हुआ था परन्तु इसकी चित्रकारी हिन्दू कलाकारों द्वारा हुई थी।
पच्चीकारी का कठिन काम कन्नौज के हिन्दू कलाकारों को सौंपा गया था। अनेक विद्वानों के अनुसार ताजमहल का मुख्य शिल्पकार एक तुर्क या ईरानी उस्ताद इशा था जिसे बड़ी संख्या में हिन्दू कारीगरों का सहयोग प्राप्त था। ताजमहल की सजावट की प्रेरणा एतमादुद्दौला के मकबरे से ली गई प्रतीत होती है।
मुगल स्थापत्य की सर्वश्रेष्ठ इमारत
आगरा का ताजमहल न केवल शाजहाँ की इमारतों में ही सर्वश्रेष्ठ है अपितु मुगल स्थापत्य कला का भी सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। हेवेल ने लिखा है- ‘यह भारतीय स्त्री जाति का देवतुल्य स्मारक है। सुन्दर बाग और अनेक फव्वारों के मध्य स्थित ताजमहल एक काव्यमय रोमाण्टिक सौन्दर्य का सृजन करता है। वस्तुतः ताजमहल दाम्पत्य प्रेम का प्रतीक और कला-प्रेमियों का मक्का बन गया है।’
डॉ. बनारसी प्रसाद का कहना है- ‘चाहे ऐतिहासिक साहित्य का पूर्ण पुंजनष्ट हो जाये और केवल यह भवन ही शाहजहाँ के शासनकाल की कहानी कहने को बाकी रह जाये तो इसमें संदेह नहीं, तब भी शाहजहाँ का शासनकाल सबसे अधिक शानदार कहा जायेगा।’
शाहजहाँकालीन अन्य इमारतें
शाहजहाँ ने आगरा और दिल्ली के अतिरिक्त लाहौर, काबुल, अजमेर, कन्धार, अहमदाबाद और कशमीर में भी श्वेत संगमरमर की अनेक इमारतें बनवाई थीं।
शाहजहाँ ने लाहौर के किले में पुरानी इमारतों को गिरवाकार किले के पश्चिमी भाग में चालीस खम्भे का दीवाने आम, मुसम्मन बुर्ज, शीश महल, नौलक्खा और ख्वाबगाह आदि इमारतें बनवाईं। ये समस्त इमारतें काफी सुन्दर हैं। शाहजहाँ ने इतनी अधिक इमारतें बनवाईं कि उसे निर्माताओं का शाहजादा कहा जाता है।
औरंगजेब एवं परवर्ती मुगल बादशाहों के काल के स्थापत्य कोपतनोन्मुख मुगल स्थापत्य कहा जाता है। इस काल में मुगलों ने महत्वपूर्ण भवनों का निर्माण बंद कर दिया तथा हिन्दू स्थपात्य को बड़ी क्षति पहुंचाई।
जहाँगीर की मृत्यु के बाद चित्रकला का और शाहजहाँ की मृत्यु के बाद मुगल स्थापत्य कला का पतन आरम्भ हो गया। औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था और वह किसी भी प्रकार की कला को इस्लाम के सिद्धांतों के विरुद्ध मानता था। इसलिए उसे किसी भी प्रकार की कला में कोई रुचि नहीं थी।
औरंगजेब ने अपना पूरा ध्यान हिन्दू स्थापत्य को ध्वस्त करने में लगाया। उसने बहुत कम इमारतें बनवाईं। औरंगजेब के द्वारा बनवाई गई मस्जिदें एवं मकबरे बहुत ही साधारण कोटि के थे। उसके काल में बना बीबी का मकबरा कई प्रकार के स्थापत्य दोष से भरा हुआ है।
औरंगजेब के उत्तराधिकारियों में से किसी के भी पास इतना समय और विवेक नहीं था कि वह कलाओं को पुनर्जीवन दे सके।
औरंगजेब कालीन मुगल स्थापत्य कला
रबिया-उद्-दौरानी का मकबरा
औरंगजेब ने औरंगाबाद के पास अपनी बेगम रबिया-उद्-दौरानी का मकबरा बनवाया जिसमें ताजमहल की नकल करने का असफल प्रयास किया गया। यह एक मामूली ढंग की इमारत है और उसकी सजी हुई मेहराबों में और अन्य सजावट में कोई विशेषता नहीं है।
दिल्ली की लाल किला मस्जिद
औरंगजेब ने दिल्ली के लाल किले में एक मस्जिद बनवाई, जो उसकी कट्टरपंथी मानसिकता से उत्पन्न सादगी का परिचय देती है।
लाहौर की बादशाही मस्जिद
औरंगजेब ने अपने शासन काल में लाहौर में भी एक मस्जिद बनवाई जिसे बादशाही मस्जिद कहा जाता है।
औरंगजेब के बाद की मुगल स्थापत्य कला
औरंगजेब के काल में मुगल स्थापत्य कला पत्नोन्मुख हो गई। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय में वास्तुकला का लगभग पूर्णतः पतन हो गया। अठारहवीं सदी में कोई उल्लेखनीय इमारत नहीं बनी।
डॉ. आशीर्वादलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जो इमारतें बनीं, वे मुगलकालीन शिल्पकला के डिजाइन का खोखलापन और दीवालियापन ही प्रकट करती हैं।’
मुगलकालीन साहित्य मुगल सल्तनत की पूर्ववर्ती तुर्की सल्तनत की अपेक्षा बहुत अधिक समृद्व था। इसका सबसे बड़ा कारण मुगलों की संस्कृति का बर्बर तुर्कों की संस्कृति से अलग होना था।
मुगलकालीन साहित्य
मुगलों के आने से पहले एवं मुगलों के काल में भी शाही दरबार की भाषा फारसी थी। राज्याधिकारियों को अनिवार्य रूप से फारसी पढ़नी पड़ती थी। मुगल काल में फारसी साहित्य को और बढ़ावा मिला। अधिकांश मुगल बादशाह विद्या प्रेमी थे।
तुर्की एवं फारसी साहित्य
बाबर तुर्की और फारसी का अच्छा कवि और लेखक था। उसने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-बाबरी अपनी मातृभाषा तुर्की में लिखी थी। उसके उत्तराधिकारियों के काल में तुजुक-ए-बाबरी का फारसी में अनुवाद हुआ। इस ग्रन्थ से फारसी की नई काव्य शैली विकसित हुई जिसे मुबायान कहते हैं।
हुमायूँ भी तुर्की और फारसी के अलावा, दर्शन, ज्योतिषी और गणित का ज्ञाता था। उसके दरबार में ख्वादामीर और बयाजित जैसे इतिहासकार रहते थे। उसकी बहिन गुलबदन बेगम ने अकबर के शासनकाल में हुमायूँनामा की रचना की। अकबर तथा उसके उत्तराधिकारियों के काल में भी फारसी साहित्य का विपुल सृजन हुआ।
मुगल काल में फारसी के मौलिक ग्रन्थों की रचना के साथ-साथ अनुवाद विभाग की भी स्थापना हुई जिसमें संस्कृत, अरबी, तुर्की और ग्रीक भाषाओं के अनेक सुप्रसिद्ध ग्रन्थों का फारसी भाषा में अनुवाद हुआ।
संस्कृत साहित्य
बाबर तथा हुमायूँ ने संस्कृत साहित्य के संरक्षण में रुचि नहीं दिखाई। फिर भी उनके शासन काल में भारतीय विद्वानों द्वारा निजी रूप से संस्कृत साहित्य का सृजन किया गया। अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने संस्कृत के विद्वानों को राजकीय संरक्षण देकर संस्कृत साहित्य को कुछ प्रोत्साहन दिया किन्तु औरंगजेब के काल में संस्कृत विद्वानों का मुगल दरबार में फिर से सम्मान बन्द हो गया।
हिन्दी साहित्य
मुगलों के अभ्युदय के बाद साहित्यिक भाषा के रूप में हिन्दी का विकास तेजी से हुआ। इस कारण मुगलकाल हिन्दी काव्य का स्वर्ण युग बन गया। 1532 ई. के आस-पास मंझन ने मधुमालती की रचना की, जो अपूर्ण ग्रन्थ होते हुए भी हिन्दी की श्रेष्ठ कृतियों में गिना जाता है।
1540 ई. के आस-पास मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत नामक महाकाव्य की रचना की, जो रूपक शैली में लिखा गया है। इसमें मेवाड़ की रानी पद्मिनी की कथा है। यद्यपि इन विद्वानों को राज्याश्रय प्राप्त नहीं था, फिर भी उन्होंने हिन्दी साहित्य जगत को अमूल्य रत्न प्रदान किये। अकबर के समय में धार्मिक सहिष्णुता होने के कारण हिन्दी साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ।
देशी भाषाओं का साहित्य
मुगल काल में देश के विभिन्न हिस्सों में बोली जाने वाली विविध देशी भाषाओं एवं बोलियों का भी अच्छा विकास हुआ। राजस्थान के चारण कवियों ने डिंगल भाषा को समृद्ध बनाया। वैष्णव सम्प्रदाय ने तो अनेक देशी भाषाओं को समृद्ध बनाया। इस काल में रचा गया पिंगल अर्थात् ब्रज भाषा का साहित्य आज तक किसी भी भाषा में रचा गया सर्वोत्कृष्ट साहित्य है।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मुगल काल में, विशेषकर अकबर से लेकर शाहजहाँ के काल में, भारत में कला, स्थापत्य एवं साहित्य का यथेष्ट विकास हुआ। मुगल शासकों की उदार नीतियों के कारण विविध प्रकार की कलाओं एवं साहित्य को पर्याप्त संरक्षण मिला, जिससे भारतीय कला और साहित्य ने नई ऊँचाइयां अर्जित कीं।
मुगल कालीन चित्रकला निश्चित रूप से हिन्दू चित्रकला से भिन्न थी। मुगल कालीन चित्रकला के बिम्ब, विषय एवं शैली तीनों ही हिन्दू चित्रकला से अलग थे।
मुगल कालीन चित्रकला
कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि मुगल साम्राज्य की स्थापना के साथ ही चित्रकला में नवजीवन आ गया क्योंकि मुगल बादशाह चित्रकला के महान् प्रेमी थे। वस्तुतः इन इतिहासकारों का यह कथन मुगलों की पूर्ववर्ती तुर्क सल्तनत के संदर्भ में तो उचित है किंतु प्राचीन हिन्दू राजाओं के काल की चित्रकला के संदर्भ में उचित नहीं है। प्राचीन भारत में आदिम काल से ही चित्रकला का विकास हुआ जिसका निरंतर उत्थान होता चला गया था।
हेरात में बहजाद नामक चित्रकार ने चित्रकला की एक नई शैली आरम्भ की जो चीनी कला का प्रान्तीय रूप था और इस पर भारतीय, बौद्ध, ईरानी, बैक्ट्रियाई और मंगोलियन तत्त्वों का प्रभाव था। इसे बहजाद कला कहा जाता था। फारस के तैमूरवंशी राजाओं ने इसे राजकीय सहायता दी।
बाबर के काल में चित्रकला
बाबर जब हेरात में आया, तब उसे इस प्रकार की बहजाद कला की चित्रकला से परिचय प्राप्त हुआ। बाबर इस कला को भारत में ले आया। बाबर ने अनेक हस्तलिखित ग्रन्थों की प्रतिलिपियाँ इस कला शैली में चित्रित करवाईं।
हुमायूँ के काल में चित्रकला
हुमायूँ भी चित्रकला प्रेमी था। उसे निर्वासन काल में फारस के उच्चकोटि के चित्रकारों से परिचय प्राप्त हुआ। इनमें से एक हेरात का प्रसिद्ध चित्रकार बहजाद का शिष्य मीर सैय्यद अली था और दूसरा ख्वाजा अब्दुस समद था। हुमायूँ इन दोनों को अपने साथ भारत ले आया और हुमायूँ तथा अकबर ने इन कलाकारों से चित्रकला का ज्ञान प्राप्त किया।
इस काल में अधिकांशतः सूती वस्त्रों पर चित्र बनाये जाते थे। इन चित्रों में ईरानी भारतीय तथा यूरोपीयन शैलियों का सम्मिश्रण पाया जाता है किन्तु ईरानी शैली की प्रधानता होने के कारण इसे ईरानी कलम कहा गया। इस शैली को मुगल काल की प्रारम्भिक चित्रकला शैली कहा जा सकता है।
अकबर के काल में चित्रकला
अकबर के उदारवादी दृष्टिकोण के कारण अकबर के शासनकाल में चित्रकला की नई शैली विकसित हुई जो ईरानी और भारतीय शैली के सर्वोत्तम तत्त्वों का सम्मिश्रण थी। इस नवीन शैली में विदेशी तत्त्व भारतीय शैली में इस तरह घुलमिल गये कि दोनों के पृथक् अस्तित्त्व का पत लगा पाना असम्भव हो गया और वह बिल्कुल भारतीय हो गई।
जहाँगीर के काल में चित्रकला
जहाँगीर का शासनकाल भारतीय चित्रकला का चरमोत्कर्ष काल था। जहाँगीर स्वयं अच्छा चित्रकार था। उसके दरबार में कई प्रसिद्ध चित्रकार रहते थे। इस काल की चित्रकला में भी कई प्रयोग हुए। जहाँगीर की मृत्यु के साथ ही मुगल चित्रकला का विकास रुक गया।
मुगल कालीन राजपूत चित्रकला
सातवीं एवं आठवीं शताब्दी के लगभग राजपूताना में अजन्ता चित्रकला की समृद्ध परम्परा विद्यमान थी किन्तु अरबों के आक्रमण के कारण पश्चिमी क्षेत्र के कलाकार गुजरात से राजपूताना की ओर आ गये जिन्होंने स्थानीय शैली को आत्मसात करके एक नई शैली को जन्म दिया। चूँकि इस नई शैली की चित्रकला से बड़ी संख्या में जैन ग्रंथों को चित्रित किया गया था, अतः इसे जैन शैली कहा गया।
इस शैली का विकास गुजरात से आये कलाकारों ने किया था इसलिये इसे गुजरात शैली भी कहा जाने लगा। धीरे-धीरे गुजरात और राजपूताना शैली में कोई भेद नहीं रहा। पन्द्रहवीं शताब्दी में इस पर मुगल शैली का प्रभाव दिखाई देने लगा। ज्यों-ज्यों राजपूत शासकों ने मुगल बादशाह अकबर से राजनैतिक एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये और उनका मुगल दरबार में आना-जाना होता रहा, राजपूत चित्रकला पर मुगल प्रभाव अधिकाधिक बढ़ता गया, जिससे राजपूत शैली की पूर्व प्रधानता समाप्त हो गई।
मुगल कालीन मूर्तिकला
मुसलमानों के भारत आने से पहले भारत में मूर्तिकला उन्नत अवस्था में थी किन्तु मुस्लिम आक्रान्ता मूर्तियों को तोड़ना इस्लाम की सेवा एवं अपना कर्त्तव्य मानते थे। अतः उन्होंने भारतीय मूर्तिकला पर घातक प्रहार किया। बाबर और हुमायॅूँ भी कट्टर मुसलमान थे और मूर्ति बनाना पाप समझते थे तथा मूर्तियों एवं मन्दिरों को ध्वस्त करना एक पवित्र कार्य समझते थे। अकबर ने अपने उदार दृष्टिकोण के कारण मूर्तिकला को प्रोत्साहन दिया। जहाँगीर ने भी कुछ मूर्तियाँ बनवाईं किन्तु शाहजहाँ और औरंगजेब ने इसे कोई प्रोत्साहन नहीं दिया, जिससे मूर्तिकला पतनोन्मुख हो गई।
मुगल कालीनआभूषण कला
मुगल शासकों की बेगमें तथा शहजादियाँ, यहाँ तक कि स्वयं मुगल बादशाह एवं शहजादे कलात्मक आभूषणों के शौकीन थे। इस कारण मुगल काल में आभूषण कला को बड़ा प्रोत्साहन मिला तथा कई प्रकार के नये आभूषणों का भी निर्माण होने लगा। राजपूतों से वैवाहिक सम्बन्धों के कारण भी मुगल शासकों ने स्वर्णकारों को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया। स्वर्णकार और जौहरी सदैव अपने काम में लगे रहते थे। शाहजहाँ ने सोने का रत्नजड़ित तख्ते-ताऊस बनवाया जिसे 1739 ई. में नादिरशाह ईरान ले गया।
मुगल कालीनसंगीत कला
मुगलों के काल में संगीत कला की बहुत उन्नति हुई। बाबर स्वयं गायन में निष्णात था। उसने गायन कला की एक पुस्तक भी लिखी। हुमायूँ भी संगीत प्रेमी था। अकबर भारतीय शास्त्रीय संगीत का बड़ा प्रेमी था। तानसेन उस युग का महान् संगीतज्ञ था। अकबर के काल में हिन्दू और मुस्लिम संगीत पद्धतियों का समवन्य हुआ जिससे ठुमरी, गजल, कव्वाली आदि अनेक पद्धतियों का सृजन हुआ।
राजपूत राज्यों का प्रशासन प्राचीन क्षत्रियों की राज्य व्यवस्था के आधार पर स्थपित किया गया था जिसमें धर्म एवं नैतिकता को प्रमुखता दी गई थी किंतु मध्यकालीन भारत में राजपूतों ने मुगलों के अनुकरण पर राजपूत राज्यों का प्रशासन स्थिर किया जिसमें प्रजा के हितों को बहुत कम संरक्षण दिया गया था।
राजपूत शासकों ने दिल्ली के सुल्तानों से अपनी स्वाधीनता की रक्षा करने हेतु अनवरत संघर्ष किया। इस संघर्ष में बार-बार पराजित होने पर भी वे अपने राज्यों को किसी तरह बनाये रखने में सफल हो गये। तुर्क सुल्तानों की प्रशासनिक व्यवस्था का राजपूत राज्यों पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
अकबर के समय में राजपूत राज्य अर्धस्वतंत्र राज्यों के रूप में स्थापित हुए। मुगलों के साथ सम्पर्क स्थापित हो जाने पर राजपूत शासकों पर मुगल शासन पद्धति का गहरा प्रभाव पड़ा। 17वीं शताब्दी के अन्त तक राजस्थान के समस्त राज्यों में मुगल शासन प्रणाली का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होने लगा। यद्यपि राजपूत शासकों ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी तथापि वे अपने राज्यों में स्वायत्तशासी थे।
राजपूत राज्यों का प्रशासन तंत्र
राजपूत राज्यों की प्रशासनिक संरचना परम्परागत क्षत्रिय शासकों के राज्यों की प्रणाली पर आधारित थी जिसमें पूर्ण विकसित शासक वर्ग मौजूद था। शासन के विभिन्न अंग थे जिनकी अलग-अलग भूमिकाएँ थीं। चूंकि शासन का आधार सैनिक शक्ति था, इसलिये क्राक्तिशाली व्यक्ति, दूसरे व्यक्तियों के अधिकारों का अतिक्रमण करने में संकोच नहीं करते थे।
राजा
सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक रूप से राज्य की समस्त शक्तियाँ राजा में निहित थीं। वह समस्त राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक एवं सैनिक शक्तियों का केन्द्र बिन्दु था। वह अपने मन्त्रियों, राजदूतों और अन्य उच्च अधिकारियों की नियुक्ति करता था और उनकी सहायता से राज्य का शासन संचालित करता था।
जघन्य अपराधों के लिए दण्ड व्यवस्था करने तथा उल्लेखनीय राजकीय सेवाओं और बलिदान के लिए जागीरें देने अथवा पदोन्नति करने के समस्त अधिकार राजा में निहित थे। युद्ध के समय सेना का संचालन करना वह अपना महत्त्वपूर्ण व गौरवशाली कर्त्तव्य समझता था। राजा, राज्य का मुख्य न्यायाधीश भी था।
दीवानी और फौजदारी के समस्त मामलों में अन्तिम निर्णय उसी का होता था। जनता अपने राजा का सम्मान करती थी और उसे धर्मावतार, श्रीजी, माई-बाप, अन्नदाता आदि सम्मान-सूचक शब्दों से सम्बोधित करती थी। वह उसे ईश्वर की प्रतिनिधि तथा अंश मानती थी।
राज्य का सर्वेसर्वा होते हुए भी राजा पूर्ण रूप से स्वच्छंद अथवा निरंकुश नहीं होता था। उसके अधिकारों को नियंत्रित रखने के लिए अनेक प्रतिबंध थे। उसकी शक्तियों पर परम्परागत नियमों एवं धर्मशास्त्रों का प्रभाव रहता था जिससे उसकी स्वेच्छाचारिता सीमित रहती थी।
यदि राजा अत्याचारी हो जाता तो शासन के विभिन्न तत्त्व उसकी सत्ता को चुनौती देते थे। मन्त्रियों से अपेक्षा की जाती थी कि वे राजा को प्रचलित नियमों एवं परम्पराओं के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करें। राजा सामान्यतः जनमत का ध्यान रखता था।
राजपूत राजा अपने धर्म में आस्था रखते हुए अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु बने रहते थे। डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने जोधपुर की हवाला बहियों तथा जयपुर के स्याह हजूर के आधार पर लिखा है कि राजस्थान के शासक जिस प्रकार हिन्दू धर्मावलम्बी साधु-सन्तों का आदर करते थे, उसी प्रकार काजियों, मौलवियों, दादू पंथियों, खाखियों, नानक पन्थियों आदि के प्रति उदार थे।
रानी
एक राजा की कई रानियां होती थीं। सबसे पहले ब्याही गई रानी प्रमुख रानी जो कि प्रायः सबसे पहले ब्याही गई रानी होती थी, पट्टरानी अथवा महारानी कहलाती थी। मुगलों के प्रभाव से राजा के रनिवास में रानियों के अतिरिक्त उप-पत्नियां भी होती थीं जिन्हें खवास, पड़दायत तथा पासवान आदि श्रेणियों में विभक्त किया जाता था।
राजा द्वारा सम्मानित रानियों एवं पासवानों का शासन पर बड़ा प्रभाव रहता था। उनके प्रभाव के कारण उत्तराधिकार की परम्परा को भंग कर दिया जाता था। सैनिक संकट के समय रानियाँ अपूर्व साहस का परिचय देती थीं। राजा के अल्पवयस्क होने पर राजमाता राज-प्रतिनिधि के रूप में शासन संचालित करती थी।
जनहित के कार्यों में भी रानियों का बड़ा योगदान रहता था। रानियों के अलावा युवराज व अन्य राजकुमारों का भी राज्य की राजनीति में सक्रिय योगदान रहता था। राजा स्वयं अपने उत्तराधिकारी को शासन का प्रशिक्षण देता था ताकि समय आने पर वह शासन संचालन का उत्तदायित्व संभाल सके।
युवराज
प्रायः राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होता था किंतु मुगलों के प्रभाव के कारण यह परम्परा भंग होने लगी थी एवं राजा अपनी प्रीतपात्री रानी के पुत्र को भी युवराज अथवा राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने लगा था। राजा के जीवनकाल में ही युवराज को वैधानिक अधिकार दे दिये जाते थे।
सामन्त वर्ग
राज्य प्रशासन में राजा तथा राज परिवार के बाद सामन्तों की महत्ता थी। सामन्त प्रायः राजा के कुटुम्ब अथवा कुल के सदस्य अथवा वैवाहिक सम्बन्धी होते थे। सामन्तों के सहयोग के बिना राजा प्रशासन का कार्य नहीं कर सकता था। राज्य की सुरक्षा का दायित्व सामन्तों पर रहता था।
सामंतों को राजा की ओर से जागीरें दी जाती थीं तथा बदले में वे राजा को भू-राजस्व चुकाने के साथ-साथ समय-समय पर वे राज्य की सैनिक सेवा के लिए उपस्थित होते थे। राजधानी से लेकर दुर्ग तथा सीमाओं की देखभाल और सुरक्षा का भार सामन्तों पर रहता था। प्रशासनिक कार्यों के लिये राज्य के उच्च पदों पर भी सामन्तों की नियुक्ति की जाती थी।
सेनाध्यक्ष के पद पर भी सामान्यतः किसी प्रभावशाली सामन्त को नियुक्त किया जाता था। राज्य के थानों और प्रमुख दुर्गों पर थानेदार और किलेदार के रूप में भी सामन्तों की नियुक्ति की जाती थी।
सामन्त अपनी जागीर में अर्द्ध-स्वतन्त्र शासक की भाँति कार्य करता था। जागीर क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था, राज्य प्रशासनिक व्यवस्था का लघु प्रतिरूप था। सामन्तों से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने क्षेत्रों में शान्ति एवं कानून व्यवस्था बनाये रखें और अपनी प्रजा को सुखी और समृद्ध बनायें। सामन्त अपने क्षेत्र में कर वसूली का कार्य भी करते थे।
जागीर के कर्मचारी
जागीर के प्रशासन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए जागीरदार द्वारा कामदार, फौजदार, प्रधान, मुसाहिब, वकील, साणी, दरोगा, कोठारी, तहसीलदार आदि कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती थी। बड़ी जागीरों में प्रधान या मुसाहिब का पद होता था।
कामदार का पद लगभग समस्त जागीरों में होता था। कामदार जागीर के स्तर पर उन समस्त कार्यों को करता था जो राज्य स्तर पर दीवान द्वारा किये जाते थे। दरोगा, खजान्ची (पोतेदार) व तहसीलदार उसके सहयोगी होते थे। गाँव का चौधरी व पटवारी स्थानीय अधिकारी होते थे, जो कामदार को मालगुजारी वसूल करने में सहयोग देते थे और गाँव को व्यवस्थित रखते थे।
जागीर में फौजदार का काम जागीर की सुरक्षा तथा स्थानीय सेना पर नियंत्रण रखना होता था। जागीरों के वकील राजधानी में रहते थे। वे शासक एवं सामन्त के मध्य योजक कड़ी का काम करते थे।
हलका, तहसील एवं गांव
बड़ी जागीरें विभिन्न हलकों एवं तहसीलों में विभक्त रहती थीं। तहसील का अधिकारी तहसीलदार होता था। तहसीलदार के अधीन तफेदार व तोलावटी नामक अधिकारी होते थे। प्रत्येक हलके के प्रशासन के लिए एक प्रधान नियुक्त होता था। इन सब पर एक मुख्य (पाट) प्रधान होता था। जिसका कार्यालय जागीर के मुख्य गाँव में होता था।
जागीर की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई गाँव होती थी। गाँव में एक पटेल या चौधरी होता था। चौधरी के अतिरिक्त कणवारिया और भांभी भी होते थे। कणवारिया गाँव की फसल पर देखरेख रखता था। भांभी या ढेढ़-थोरी आदि गाँव के चाकर होते थे जो जागीरदार के लिए सन्देशवाहक का कार्य करते थे और गाँव की सफाई आदि रखने का दायित्व भी निभाते थे।
मुत्सद्दी वर्ग
मुगलों की अधीनता स्वीकार करने के बाद राजपूताने के शासकों ने अपने राज्यों में केन्द्रीय सत्ता को सुदृढ़ करने के प्रयास किये। मुगल शासन पद्धति का अनुकरण करते हुए उन्होंने केन्द्र और परगनों में अनेक नये पदाधिकारियों की नियुक्ति की।
केन्द्रीय व स्थानीय स्तर पर नये-नये विभाग व कारखाने खोले गये और अधिकारी पदों के दायित्व का विभाजन कर नई नियुक्तियाँ की गईं। फलस्वरूप राज्यों में प्रशासन का सुचारू रूप से संचालन करने हेतु एक नवीन प्रभावशाली अधिकारी तन्त्र अस्तित्व में आया जो मुत्सद्दी वर्ग के नाम से विख्यात हुआ।
मुत्सद्दी वर्ग के सदस्यों की संख्या निरन्तर बढ़ती गई। उनमें वर्ग एकता भी दृढ़ होने लगी। शासकों ने इस वर्ग को सशक्त होने दिया, क्योंकि वे स्वकुलीय आधार पर प्रशासन के विच्छिन्न होने से, असन्तुष्ट सामन्त वर्ग को नियंत्रित करने के लिए इस वर्ग की उपयोगिता को समझ गये थे। फलतः राजपूत राज्यों में अब राजा और सामन्तों के अतिरिक्त एक तीसरी शक्ति के रूप में मुत्सद्दी वर्ग का विकास हुआ।
समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भी मुत्सद्दी वर्ग शक्ति सम्पन्न होता गया। समस्त राजपूत शासक (मेवाड़ को छोड़कर) मुगल मनसबदार के रूप में अपने राज्य से बहुत दूर बादशाह की चाकरी में रहते थे। उसकी अनुपस्थिति में राज्य प्रशासन को चलाने का दायित्व मुत्सद्दियों पर ही रहता था।
इन मुत्सद्दियों को अनेक बार सैनिक दायित्व भी निभाना पड़ता था। इन सब कारणों से मुत्सद्दी वर्ग की शक्ति बढ़ती गई। परन्तु मुत्सद्दी वर्ग राज्य के लिए स्थायी खतरे का कारण नहीं बन सका, क्योंकि इनकी नियुक्तियाँ, पदोन्नतियाँ और सेवा-मुक्ति शासक की इच्छा पर निर्भर थी।
मुत्सद्दी केवल शासक के प्रति उत्तरदायी थे। उनका जनसाधारण में कोई आधार नहीं था। उनके पास कोई निजी सेना नहीं होती थी। उनकी सेवा के बदले जो जागीरें दी जाती थीं, वे सामान्यतः उनके सेवाकाल तक ही सीमित रहती थीं। इसलिए जागीर क्षेत्र में वे अपना स्थायी आधार नहीं बना सकते थे। मुत्सद्दियों की आपसी फूट के कारण भी वे केन्द्रीय शक्ति का विरोध करने की स्थिति में नहीं आ सकते थे।
इस प्रकार राजपूताने में मध्ययुगीन निरंकुश राजतंत्र में अधिकारी तंत्र का उदय हुआ। शासक इसी मुत्सद्दी वर्ग से मन्त्री एवं अन्य पदाधिकारी नियुक्त करता था। राजकीय उच्च पदों पर नियुक्ति करते समय व्यक्ति की योग्यता, अनुभव और निष्ठा को ध्यान में रखा जाता था। प्रधान के पद के अतिरिक्त अन्य पदों पर सामान्यतः गैर-राजपूत जातियों, विशेषकर वैश्य, ब्राह्मण और कायस्थ जाति के लोगों को नियुक्त किया जाता था।
मन्त्रिमण्डल
राज्य के समस्त महत्वपूर्ण कार्यों एवं नीति सम्बन्धी विषयांे पर राजा, राज्य के विभिन्न अधिकारियों से परामर्श करता था। इन पदाधिकारियों से ही मन्त्रिमण्डल का गठन होता था। कहीं-कहीं इन मन्त्रियों का पद वंशानुगत भी हो गया था। इन मन्त्रियों के वेतन व कार्यकाल सम्बन्धी कोई निश्चित नियम नहीं थे।
विभिन्न राज्यों में मन्त्रियों की संख्या भी एक जैसी नहीं थी। उनकी नियुक्ति के तरीके में भी भिन्नता थी। उन दिनों सतत युद्ध की स्थिति बनी रहती थी, इसलिए सैनिक और शासन कार्य का कोई विभाजन नहीं था। मन्त्री, युद्ध काल में सेना का संचालन करते थे।
प्रधान
केन्द्र में राजा के बाद सर्वोच्च अधिकारी प्रधान होता था। वह राजा का मुख्य सलाहकार होता था। वह सैनिक, असैनिक तथा न्यायिक कार्यों में राजा की सहायता करता था। राजा की अनुपस्थिति में राज्य में प्रशासन चलाने का दायित्व उसी का होता था।
मेवाड़ में सलूम्बर के रावत को प्रधान का पद वंशानुगत प्राप्त था जिसे भांजगढ़ कहते थे। मराठों के उपद्रव काल में जब वह महाराणा की आज्ञाओं का उल्लंघन करने लगा तब उसे वंशानुगत प्रधानगी के पद से वंचित कर दिया गया। भूमि के अनुदान पत्रों पर प्रधान के हस्ताक्षर आवश्यक थे।
प्रधान किसी भी जागीरदार को जागीर देने अथवा जब्त करने के लिए राजा से अनुशंसा करता था। युद्ध के समय वह सामन्तों की सेना को जुटाने तथा उसका नेतृत्व करने का दायित्व निभाता था। प्रधान को जयपुर राज्य में मुसाहिब तथा कोटा में फौजदार या दीवान कहते थे। बीकानेर और बून्दी में भी उसे दीवान कहते थे।
कहीं-कहीं प्रधान और दीवान अलग-अलग व्यक्ति होते थे, लेकिन अधिकांश राज्यों में दोनों पदों पर एक ही व्यक्ति नियुक्त होता था। वह राज्य की समस्त प्रशासनिक गतिविधियों पर नियंत्रण रखता था और उनके बारे में राजा को सूचना देता रहता था।
दीवान
राजस्थान के राजपूत राज्यों में प्रशासनिक तंत्र का प्रमुख दीवान होता था जो मुख्य रूप से वित्त एवं राजस्व सम्बन्धी मामलों पर नियंत्रण रखता था। वह राज्य की आय में वृद्धि करके विभिन्न खर्चों की पूर्ति करता था। जहाँ प्रधान के पद का प्रावधान नहीं था, वहाँ दीवान ही प्रधान का कार्य करता था। वह राज्य के शासन सम्बन्धी समस्त कार्यों के लिए उत्तरदायी था।
समस्त महत्वपूर्ण राजकीय दस्तावेजों पर दीवान की मुहर लगाई जाती थी। दीवान के पद पर सामान्यतः गैर-राजपूत जाति के व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था। राज्य के समस्त पदाधिकारी दीवान के नियंत्रण में कार्य करते थे।
दीवान को आमिल, कोतवाल, अमीन, दरोगा, मुशरिफ, वाकयानवीस, फौजदार आदि को नियुक्त करने का अधिकार था। मारवाड़ में परगनों के हाकिम की नियुक्ति महाराजा द्वारा की जाती थी परन्तु इन नियुक्तियों में दीवान की अनुशंसा रहती थी। राज्य के जमा-खर्च का समस्त कार्य उसके अधीन था। वार्षिक कर, नजराना आदि का विवरण उसके पास रहता था।
राज्य में भूमिकर, चुंगीकर, राहदारी, पेशकश, दण्ड-शुल्क व अन्य आय से सम्बन्धित समस्त कागजात दीवान के निरीक्षण के लिए प्रस्तुत किये जाते थे। बाजार में वस्तुओं के भाव व कीमतों की जानकारी प्रतिदिन दीवान को दी जाती थी। समस्त राजकीय कोठारों, भण्डारों एवं कारखानों पर उसका नियंत्रण रहता था। दीवान उपर्युक्त समस्त जानकारी राजा को देता था।
राजपूत राज्यों में दीवान मुगल शासन प्रणाली के दीवान की भाँति केवल राजस्व विभाग का पदाधिकारी नहीं था अपितु वह न्यायिक, वित्तीय, सैनिक, नागरिक प्रशासन से सम्बन्धित समस्त अधिकारों का उपभोग करता था। राजा की अनुपस्थिति में शासन की बागडोर दीवान के हाथ में रहती थी।
ऐसे समय में दीवान देश-दीवान कहलाता था। उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत होने के कारण किसी-किसी राज्य में दो सहयोगी दीवानों की नियुक्ति की जाती थी। उन दोनों में से एक प्रशासन की देखभाल करता था और दूसरा राजस्व सम्बन्धी कार्य करता था। दीवान राजा के अधीन होता था तथा राजा की इच्छाओं की पूर्ति करना उसका मुख्य कर्त्तव्य था।
मुसाहिब
कुछ राज्यों में मुसाहिब का पद अत्यंत महत्वपूर्ण पद होता था। बीकानेर राज्य में इस पद के लिए मुख्त्यार शब्द का प्रयोग होता था। इस पद के साथ सम्मान अधिक और उत्तरदायित्व कम था। इस पद पर नियुक्त व्यक्ति महाराजा का विश्वसनीय सलाहकार होता था। कई बार यह पद मान एवं मर्यादा की दृष्टि से दीवान के पद से भी ऊँचा आँका गया है।
शक्तिशाली दीवान के समय इस पद पर किसी की भी नियुक्ति नहीं की जाती थी। मुसाहिब के कर्त्तव्य के सम्बन्ध में कहीं विस्तृत विवरण नहीं मिलता। मुसाहिब शासक को सलाह देने का काम करता था। बीकानेर राज्य में मुसाहिब सैनिक विभाग का संचालन करता था दयालदास की ख्यात से ज्ञात होता है कि महाराजा स्वरूपसिंह के काल में मुसाहिब सेना का प्रधान सेनापति था।
बख्शी
दीवान के बाद दूसरा प्रमुख अधिकारी बख्शी था। वह मुख्यतः सेना विभाग का अध्यक्ष होता था। वह सेना की रसद व्यवस्था, अनुशासन, सैनिकों का प्रशिक्षण, युद्ध में घायल सैनिकों का उपचार व पशुओं के उपचार एवं उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध करता था। वह सेना को वेतन देता था। सैनिकों की नियुक्ति, पद-वृद्धि और पदावनति का विवरण भी रखता था।
राज्य के दुर्गों में किलेदारों और नगर के दरवाजों पर तैनात सिपाहियों के वेतन का प्रबन्ध करना तथा उनकी नियुक्ति करने का कार्य भी बख्शी का होता था। गुप्तचरों का संगठन भी इसी के द्वारा किया जाता था। मुगलकालीन राजपूत राज्यों में कहीं-कहीं तनबख्शी और देश-बख्शी के दो पृथक् पद होते थे।
बख्शी का निकट सहायक नायब बक्शी भी होता था। खबरनवीस, किलेदार, मुशरिफ, हवलदार, दरोगा तोपखाना आदि उसके अधीन होते थे। जोधपुर राज्य में इसे फौज बख्शी भी कहते थे। बख्शी के पद पर सामान्यतः गैर-राजपूत नियुक्ति होते थे।
शिकदार
मुगल शासन प्रणाली के अनुरूप कुछ राजपूत राज्यों में शिकदार पद का सृजन हुआ परन्तु इन राज्यों का शिकदार मुगलों के शिकदार से कुछ भिन्न था। वह एक परगने का मुख्याधिकारी न होकर, नगर कोतवाल के समकक्ष था। तनबख्शी से पूर्व सैन्य विभाग का संचालन शिकदार ही करता था।
मुसाहिब के न होने पर पट्टायतों से सम्बन्धित समस्त कार्य इस पदाधिकारी द्वारा ही सम्पन्न किये जाते थे। जोधपुर राज्य में शिकदार एक प्रकार से नगर कोतवाल था। नगर प्रशासन का समस्त कार्य उसी के सुपुर्द था। मेवाड़ राज्य में शिकदार का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। वहाँ नगर प्रशासन का अधिकारी कोतवाल होता था।
खानसामां
खानसामां का पद दीवान के अधीन था परन्तु इसका राज-परिवार से सीधा सम्बन्ध होने के कारण खानसामां का राज्य में बहुत महत्व था। वह निर्माण, वस्तुओं के क्रय, राजकीय विभागों के सामान की खरीद और संग्रह से सम्बन्धित कार्य करता था।
राजदरबार तथा राजमहल से सम्बन्धी समस्त व्यक्तियों व कार्यों से उसका सम्पर्क रहता था। इस पद पर नियुक्त अधिकारी बहुत ही ईमानदार और राजा का विश्वासनीय व्यक्ति होता था। उसका समस्त राजकीय कारखानों से सीधा सम्बन्ध होता था। उदयपुर राज्य में प्राचीन परम्परा के अनुसार इस पद का नाम पाकाध्यक्ष था। वह राजरसोडे़ का मुख्य अधिकारी था।
वकील
पड़ौसी राज्यों के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध बनाये रखने के लिए वकील की नियुक्ति की जाती थी। मुगलकाल में वह शाही दरबार में राजा के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त रहता था और अपने शासक को मुगल दरबार की गतिविधियों से निरन्तर अवगत कराता रहता था। वह अपने राजा के हितों का ध्यान रखता था।
मीर मुंशी
राज्य में कूटनितिक पत्र-व्यवहार की देखरेख के लिए मीरमुंशी का एक अलग विभाग होता था। इस पदाधिकारी की सहायता के लिए एक दरोगा दफ्तरी होता था। आगे चलकर मारवाड़ में मीर मुंशी केवल फारसी में पत्र-व्यवहार करने लगा और वकील पड़ौसी राज्यों में महाराजा का प्रतिनिधित्व करने लगा था।
खजान्ची
खजान्ची खजाने में जमा एवं खर्च की राशि का विवरण रखते थे। मेवाड़ में इस अधिकारी को कोषपति कहते थे। उसके लिए मितव्ययी होना आवश्यक था ताकि वह खजाने की रकम में वृद्धि करता रहे। ईमानदार और विवेकशील होना खजान्ची के प्रमुख गुण माने जाते थे।
अन्य अधिकारी
राज्य में किले का रक्षक या अधिकारी किलेदार कहलाता था। वह किले की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होता था। किलेदार अपने पास पर्याप्त सैनिक रखता था। राजा का अत्यन्त विश्सनीय व्यक्ति ही इस पद पर नियुक्त होता था। राज्य का एक अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारी ड्योढ़ीदार होता था। महल की सुरक्षा, देखरेख व निरीक्षण का दायित्व उसी पर निर्भर था।
वह राजा से मिलने के लिये आने वाले व्यक्तियों पर दृष्टि रखता था तथा उन्हें राजा से मिलाने की व्यवस्था करता था। राज्य में धार्मिक कार्यों व उत्सवों, त्यौहारों व पर्वों को सम्पन्न करवाने के लिए पुरोहित होता था। पुरोहितों को पड़ौसी राज्यों में संदेश भेजने के लिए भी नियुक्त किया जाता था। पुरोहित का बड़ा सम्मान होता था।
शासक उन्हें कर-मुक्त भूमि व गाँव जागीर में देते थे। धर्म-सम्बन्धी कार्यों में पुरोहित के अतिरिक्त राजव्यास और बारहठ का भी बड़ा महत्व था। राजपूत राज्यों में धर्म व दान सम्बन्धी कार्यों के लिए पृथक् विभाग होता था जिसे धर्मार्थ विभाग (देवस्थान धर्मपुरा) या महकमा पुण्यार्थ कहते थे।
इस विभाग का कार्य मन्दिरों, गरीबों, अनाथों, विधवाओं आदि को राजकीय अनुदान देना था। उदयपुर राज्य में इस विभाग के अध्यक्ष को दानाध्यक्ष, कोटा राज्य में हाकिम पुण्य और जयपुर राज्य में हाकिम खैरात कहते थे।
उपरोक्त अधिकारियों के अतिरिक्त राज्य में छोटे-बड़े कई अधिकारी होते थे। उदाहरणार्थ- दरोगा-ए-डाकचौकी, दरोगा-ए-सायर, दरोगा-ए-फरासखाना, दरोगा-ए- जवाहरखाना, दरोगा-ए-आवदार (खाने-पीने का अधिकारी), दरोगा-ए-शिकारखाना आदि अधिकारी अपने-अपने विभागों का कार्य करते थे। कहीं-कहीं इन्हें हवलदार कहा जाता था। स्थानीय परिस्थितियों एवं विभिन्नताओं के कारण इन पदाधिकारीयों के पदनामों में अन्तर होता था।
राजपूत राज्यों में स्थानीय प्रशासन
राजपूत राज्य परगनों में विभाजित थे। जयपुर में महाराजा मानसिंह के काल में राज्य को परगनों में विभाजित किया गया था। मेवाड़ में 1621 ई. महाराणा कर्णसिंह के काल में परगनों का होना प्रमाणित होता है। क्षेत्रीय प्रशासन व राजस्व वसूली की दृष्टि से किन्हीं-किन्हीं में चीरा व्यवस्था का गठन किया गया था।
दो सौ गाँवों को मिलाकर एक चीरा बनाया गया था। परगनों की इकाईयाँ मुख्यतः वे क्षेत्र थे, जो बीकानेर शासन को मुगल बादशाह की ओर से तनख्वाह जागीर के रूप में प्राप्त हुए थे और बाद में बीकानेर राज्य में मिला लिए गये थे।
विभिन्न परगनों का आकार व विस्तार एक जैसा नहीं था। मारवाड़, मेवाड़ और बीकानेर राज्यों में परगने का मुख्य अधिकारी हाकिम कहलाता था। जयपुर और कोटा राज्यों में उसे क्रमशः फौजदार एवं हवलगिर कहते थे। परगनों के हाकिमों की नियुक्ति सामान्यतः दीवान की सलाह से स्वयं राजा के द्वारा की जाती थी।
हाकिम को विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक, सैनिक, न्यायिक और राजस्व सम्बन्धी कार्य करने पड़ते थे। परगने की सुरक्षा का पूर्ण दायित्व उसी का होता था। वह परगने के सरदारों से सम्बन्ध बनाये रखता था। वह परगने में सामन्तों से राजकीय चाकरी हेतु सवार प्राप्त करने, उनसे वार्षिक कर की रकम वसूलने तथा जनता से नियमित कर वसूली का कार्य करता था।
परगने के मुख्यालय पर हाकिम का कार्यालय होता था, जिसे हाकिम की कचहरी कहा जाता था। हाकिम वहाँ बैठकर फौजदारी और दीवानी कार्य करता था। परगने में चुंगीकर की वसूली के लिए केन्द्र की ओर से सायर दरोगा की नियुक्ति की जाती थी। दरोगा की सहायता के लिए हाकिम, अमीन की नियुक्ति करता था।
भूमिकर वसूली के लिए परगने में कानूनगों नामक कर्मचारी होता था जिसका मुख्य कार्य भूमि-कर की वसूली करना, परगने के कृषिगत उपज का लेखा-जोखा रखना और भूमि सम्बन्धी दस्तावेजों को सुरक्षित रखना था। इन पदाधिकारियों के अतिरिक्त परगने में कारकून, वाकयानवीस, चौकीनवीस, पोतदार आदि कर्मचारी भी हाकिम के अधीन कार्यरत रहते थे। कहीं-कहीं परगने में सैनिक व पुलिस सम्बन्धी कार्य करने के लिए फौजदार नामक अधिकारी होता था।
वह परगने में सुरक्षा सम्बन्धी कार्यों के लिए उत्तरदायी था तथा मालगुजारी की वसूली में अमीन, मालगुजार तथा आमिल को सहयोग देता था। मेवाड़ और आमेर राज्यों में फौजदार का पद अलग होता था। कोटा में हवलगिर, परगने के हाकिम की भाँति कार्य करता था। परगने में चोरों और डाकुओं पर नियंत्रण रखने के लिए थाने होते थे, जहाँ थानेदार अपने निश्चित सिपाहियों के साथ तैनात रहता था। बीकानेर के चीरे और परगनों में चिरायता या हाकिम प्रधान अधिकारी होता था तथा राजस्व वसूली का कार्य आमिल के स्थान पर हवलदार करता था।
राजपूत राज्यों में नगर प्रशासन
कोतवाल: नगर का मुख्य अधिकारी कोतवाल होता था। राज्यों की राजधानियों के अतिरिक्त परगनों के बड़े-बड़े कस्बों में कोतवाल नियुक्त किये जाते थे। कोतवाल के प्रमुख दायित्व इस प्रकार से होते थे-
(1.) नगर में शान्ति और व्यवस्था बनाये रखना।
(2.) नगर के प्रवेश एवं निकासी द्वारों पर पुलिस सन्नद्ध करना।
(3.) रात्रि गश्त लगाने की व्यवस्था करना।
(4.) पुलिस कार्य के साथ-साथ नगरपालिका प्रशासन का दायित्व संभालना।
(5.) नगर की सफाई और स्वास्थ्य का ध्यान रखना।
(6.) बाजार में मूल्यों, बाटों व माप का निरीक्षण करना।
(7.) लावारिस सम्पत्ति की व्यवस्था करना।
(8.) नगरवासियों व व्यापारियों पर लगे करों की वसूली करना।
(9.) धार्मिक व सार्वजनिक स्थानों का प्रबन्ध करना।
नगर सेठ
राजपूताने के कई राज्यों में नगर सेठ नियुक्त किये जाते थे। नगर सेठ व्यापारिक संस्थानों के संचालन के साथ-साथ राजकीय ट्रेजरी के रूप में भी काम करते थे। एक नगर में एक ही नगर सेठ हो सकता था। यह पद प्रायः वंशानुगत चलता था। मेवाड़ राज्य के प्रत्येक बड़े नगर में नगर सेठ को राजा के द्वारा न्यायाधीश मनोनीत किया जाता था। राज्य में तथा नगर में नगर सेठ का बड़ा सम्मान होता था।
राजपूत राज्यों में ग्राम प्रशासन
राजस्व वसूली की सुविधा के लिए राज्य को परगनों में विभक्त किया जाता था। प्रत्येक परगना तपों (गाँवों का समूह) में विभाजित किया जाता था। प्रशासन की लघुत्तम इकाई मौजा (गाँव) होती थी। पूर्व मध्यकालीन युग में गाँव या गाँवों के समूह पर ग्रामिक होता था जो गांवों की व्यवस्था देखता था।
मुगलों का शासन होने पर ग्रामिक को पटवारी कहा जाने लगा। वह भूमि सम्बन्धी विभिन्न अभिलेख तैयार करता था जिनके आधार पर राजस्व का निर्धारण एवं वसूली होती थी। कनवारिया (खेत का रक्षक), तफेदार (उपज में राज्य के भाग का हिसाब रखने वाला), तोलावटी (उपज को तोलने वाला), साहणे (राज्य का भाग निश्चित करने वाला अधिकारी), चौकीदार (मीणा व बावरी) आदि कर्मचारी पटवारी के सहयोगी होते थे।
कहीं-कहीं हवालदार की नियुक्ति की जाती थी। वह गाँवों में जमाबन्दी के आधार पर करों तथा निश्चित भोग के हिस्से के अनुसार मालगुजारी वसूल करता था। गाँव में प्रशासनिक स्तर पर स्थायी रूप से चौधरी या पटेल होते थे, जिनका मुख्य काम गाँव में शान्ति बनाये रखना तथा कर वसूली में राजकीय अधिकारियों को सहयोग देना था।
इस सेवा के बदले उसे राज्य की ओर से कर-मुक्त भूमि प्राप्त होती थी। उसे लगान में से भी कुछ हिस्सा दिया जाता था। राजधानी तथा परगना आदि मुख्यालयों से आने वाले अधिकारियों एवं जागीरदारों के गांव में आने पर उनके ठहरने तथा भोजन आदि की व्यवस्था चौधरी के द्वारा की जाती थी।
ग्राम पंचायत
ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायतें प्रशासनिक कार्य करती थीं। ग्रामीण दैनंदिनी में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। गाँव का मुखिया (चौधरी या पटेल) तथा गाँव के अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति, जिनकी संख्या सामान्यतः पाँच होती थी, गाँव की पंचायत के सदस्य होते थे।
गाँव में शान्ति और सुरक्षा बनाये रखना और ग्राम प्रशासन में सहयोग देना पंचायतों के मुख्य कर्त्तव्य थे। पंचायत के समक्ष भूमि सम्बन्धी झगड़े, खेत व गाँव की सीमा के विवाद, चोरी, अपहरण, बलात्कार आदि वाद प्रस्तुत किये जाते थे। पंचायतों के निर्णयों के विरुद्ध परगना अधिकारी, दीवान व राजा के समक्ष अपील की जा सकती थी।
जाति पंचायत
मध्यकालीन राजपूताना राज्यों में जाति पंचायतों का अत्याधिक प्रभाव था। हर जाति की अपनी जाति पंचायत होती थी जिसमंे दूसरी जाति के लोग हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे। एक गांव अथवा कुछ गांवों के लिये एक जाति पंचायत होती थी। जाति पंचायतों द्वारा सामाजिक एवं जाति सम्बन्धी समस्याओं का समाधान किया जाता था।
इनके द्वारा विवाह एवं परित्याग सम्बन्धी झगड़े, सामाजिक परम्पराओं की अवहलेना, व्यभिचार एवं कुटुम्बीय झगड़े निबटाये जाते थे। जाति पंचायतों द्वारा अपनाई गई दण्ड-व्यवस्था में प्रायश्चित, क्षमायाचना, अर्थ दण्ड, तीर्थयात्रा द्वारा शुद्धिकरण, न्याति भोज, ग्राम भोज, जाति बहिष्कार, ग्राम बहिष्कार, हुक्का-पानी बहिष्कार आदि दण्ड दिये जाते थे। जाति पंचायतों के निर्णय को राज्य द्वारा मान्यता होती थी। राज्य की ओर से भी जाति सम्बन्धी विवाद जाति पंचायतों को सौंपे जाते थे।
व्यावसायिक पंचायतें
नगरों एवं कस्बों में व्यवसायों से सम्बन्धित पंचायतें होती थीं। इनमें व्यापारियों के लेन-देन, लेखा-जोखा, साझेदारी तथा मुकाते आदि के विवाद निबटाये जाते थे।
पंचायत संस्थाओं का महत्व
पंचायत संस्थाएँ राज्य और प्रजा दोनों के लिए लाभप्रद थीं। इन पंचायतों के माध्यम से सामाजिक नियमों और परम्पराओं की पालना होती थी तथा समाज में अनुशासन बना रहता था। किसी भी जातीय अथवा व्यावसायिक पंचायत के लिए सरकारी मान्यता मिलना गौरव की बात होती थी।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवेचन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि मध्यकाल में राजपूत राज्यों की प्रशासन व्यवस्था प्राचीन क्षत्रिय राज्यों की शासन व्यवस्था पर आधारित थी किंतु मुगलों के प्रभाव के कारण उसमें अनेक परिवर्तन आ गये थे। राजपूत राज्यों में एक विकसित शासन तंत्र था जो जागीरदारों एवं सामंती व्यवस्था पर आधारित था।
राजा की अपनी सेना न होकर सामंतों की सेना ही राज्य के लिये उपलब्ध होती थी। गाँव से लेकर बड़े नगरों एवं राजधानी में न्याय के लिये भी सुविकसित तंत्र था जो राजा एवं उसके सामंतों एवं मंत्रियों के अधीन काम करता था। शासक के अयोग्य और निर्बल होने पर शासन अव्यवस्थित होने लगता था।
राज्य में नौकरशाही के लिए कोई निश्चित सेवा नियम नहीं थे। राजस्व का अधिकांश भाग राजा और राजपरिवार पर खर्च होता था। सामन्तों का जीवन विलासी था जिससे किसानों एवं विभिन्न कामों में लगे लोगों का शोषण होता था। अधिकांश राजपूत शासक धर्मपरायण थे। गाँवों का शासन स्व-संचालित था तथा ग्राम शासन में सामान्यतः शासक हस्तक्षेप नहीं करता था।
राजपूतों का राजस्व प्रशासन इस प्राचीन सिद्धांत पर आधारित था कि भोग रा धणी राज हो, भोम रा धणी म्हाँ छो। अर्थात् भूमि तो जोतने वाले किसान की है, राजा केवल भोग अर्थात् राजस्व का अधिकारी है किंतु मुगल काल में इस मान्यता को ठुकरा दिया गया और राजा एवं जागीरदार ही समस्त भूमि के वास्तविक मालिक बन गए।
राजपूतों का राजस्व प्रशासन
राजपूताना के विभिन्न राज्यों में राजस्व, कर और भूमि व्यवस्था में कुछ परिवर्तन होते हुए भी कुछ बातें एक जैसी थीं। राज्यों की भूमि सामान्यतः खालसा, हवाला, जागीर, भोम और सासण में विभाजित थी। दीवान खालसा भूमि का प्रबन्धन एवं नियन्त्रण करता था। हवालदार हवाला भूमि की देखरेख करता था।
जागीदार जागीर पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखता था। परगना हाकिम यह देखता था कि जागीरदार निश्चित वार्षिक कर समय पर राजकीय खजाने में जमा करवा रहा है या नहीं! जागीरदारों से वार्षिक कर के अतिरिक्त समय-समय पर पेशकश के रूप में धनराशि एकत्रित की जाती थी। भोमियों के नियंत्रण में स्वामित्व के आधार पर भोम की भूमि होती थी।
वे एक निर्धारित राशि फौजबल या भूमबाब के नाम से राज्यकोष में जमा करवाते थे। इसके अतिरिक्त वे किसी अन्य तरह के कर का भुगतान नहीं करते थे परन्तु उन्हें राज्य द्वारा निर्दिष्ट सेवा करनी पड़ती थी। सासण भूमि की उपज का भाग मन्दिरों, ब्राह्मणों, चारणों आदि के उपभोग हेतु पुण्यार्थ दिया जाता था।
राजपूत राज्यों में यह मान्यता थी कि भोग रा धणी राज हो, भोम रा धणी म्हाँ छो। अर्थात् भूमि तो जोतने वाले किसान की है, राजा केवल भोग अर्थात् राजस्व का अधिकारी है। राजा व जागीरदारों द्वारा काश्तकारों को पट्टे दिये जाते थे। उनका विवरण राजकीय रजिस्टर में दर्ज रहता था जिसे दाखला कहते थे।
भू-राजस्व का निर्धारण
राजपूत राज्यों में भोग अर्थात् भू-राजस्व निर्धारित करने एवं उसे वसूल करने के विभिन्न तरीके थे। इसका निर्धारण भूमि के स्वरूप, फसल के प्रकार तथा काश्तकार की जाति के आधार पर किया जाता था। भूमि की उत्पादन क्षमता के आधार पर प्रत्येक श्रेणी पर अलग-अलग दरों से राजस्व की वसूली की जाती थी। एक ही राज्य में अलग-अलग परगनों के राजस्व की दरों में भिन्नता होती थी। मालगुजारी सामान्यतः वस्तुओं (जिन्सों) के रूप में ली जाती थी। इसकी वसूल करने के विभिन्न तरीके थे।
लाटा (बटाई)
राजपूत राज्यों में लाटा अथवा बटाई पद्धति अधिक प्रचलन में थी। इस पद्धति में, जब फसल पककर तैयार हो जाती थी और खलिहान में अच्छी तरह साफ कर ली जाती थी तब एकत्रित अनाज के ढेर को तौलकर या डोरी (रस्सी) द्वारा नापकर राज्य का हिस्सा निश्चित किया जाता था।
कूंता: कहीं-कहीं अनुमान के आधार पर ही राज्य या भू-स्वामी का हिस्सा निश्चित कर लिया जाता था। इस प्रणाली को कंूता कहते थे।
हलगत
राजस्व निर्धारण के लिये कहीं-कहीं हलगत प्रणाली प्रचलन में थी। इस प्रणाली में, प्रत्येक हल पर अर्थात् एक हल से जोती गई भूमि पर राजकीय कर वसूल किया जाता था। एक हल से 50 से 60 बीघा भूमि जोती जा सकती थी। हल पर लगने वाले कर की दर समस्त जगह समान नहीं थी। कई बार हलगत की रकम सामूहिक रूप से जमा के नाम से पूरे गाँव पर लागू कर दी जाती थी।
मुकाता
मुकाता प्रणाली में राज्य की ओर से निश्चित किया जाता था कि प्रत्येक खेत पर नकदी या जिन्सों के रूप में एकमुश्त कितना लगान देना है।
डोरी
इस प्रणाली में एक डोरी में नापे गये बीघे का हिस्सा निर्धारित करके लगान वसूल किया जाता था।
घुघरी
जब प्रति कुआं अथवा प्रति पैदावार की एक निश्चित मात्रा निर्धारित कर दी जाती थी, तब उसे घुघरी कहते थे। रबी और खरीफ के लिये लगान की दरों में भिन्नता होती थी।
राजस्व का वितरण
जब तक उपज की बटाई नहीं होती थी, तब तक बलाई और सहणा खलिहान में धान की चौकीदारी करते थे। बटाई के समय हवालदार, कनवारिया, चौधरी (पटेल), पटवारी, कामदार (जागीर क्षेत्र में) और काश्तकार उपस्थित रहते थे। कनवारिया, सहणा, बलाई, पटवारी, तोलायत, चौधरी आदि समस्त लोगों को बटाई में से हिस्सा प्राप्त होता था।
नेग
बटाई के समय काश्तकार विभिनन लोगों को अनेक प्रकार के नेग व लाग देता था। सुथार, लुहार, नाई, धोबी, दर्जी, नट, मेहतर, रेगर, चमार आदि को अनाज की ढेरी में से कुछ मुट्ठी अनाज दिया जाता था। कुछ अनाज मन्दिरों में भेंट स्वरूप दिया जाता था। उपज की बटाई करने के बाद प्रायः किसान के पास इतना अनाज नहीं बचता था कि साल भर परिवार का काम चल सके। इसलिये किसान को अन्य कार्यों से आय करनी पड़ती थी।
लाग-बाग
जागीरदार अपनी-अपनी जागीरों में किसानों, चरवाहों एवं विभिन्न प्रकार के कार्य करने वाले लोगों से विभिन्न प्रकार की लाग-बाग वसूल करते थे जिनकी संख्या कहीं-कहीं तो सौ से भी अधिक थी। लाग कर को तथा बाग बेगार को कहते थे।
विभिन्न प्रकार के कर
राजपूत राज्यों में विभिन्न व्यक्तियों, जातियों और विशेष अवसरों पर विभिन्न प्रकार के कर लगाये जाते थे। गृहकर, घासमरी, व्यवसायिक जातियों पर लगाये गये कर, पेशकशी, नजराना, अंग, फौजबल, रखवाली भाछ, जुर्माना, टकसाल, कारखाना, न्यौता, विवाह, त्यौहार, जकात (सायर), व्यापारियों पर लगाये गये कर, बिक्री कर, वन, खान, नमक आदि पर लगाये गये करों से राज्य को बहुत आय होती थी।
इसके अतिरिक्त जागीरदारों से निश्चित राशि उपलब्ध होती थी। राजपूत राज्यों में 70 से 80 प्रतिशत अथवा उससे भी अधिक भूमि जागीरदारों के अधीन थी। जागीरदार, किसानों एवं अन्य लोगों से वसूल किये गये करों में से राज्य को नजर, हुक्मनामा या खड्गबन्दी, तागीरात, रेख, पेशकशी, नजराना, न्यौता, बेतलबी शुल्क आदि देता था। इस कारण राजपूताने की जनता करों के भार से बुरी तरह दबी हुई थी।
करों में छूट
गाँवों में किसानों तथा विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों की स्थिति बड़ी दयनीय थी। प्राकृतिक आपदा की स्थिति में लोगों के लिये यह संभव ही नहीं होता था कि वे राजकीय करों का भुगतान करें। ऐसी स्थिति में राजा करों में छूट देता था। अकाल, सूखा, महामारी व अन्य दैवीय प्रकोपों के अवसर पर किसानों को हासल में छूट दी जाती थी।
छूट की मात्रा तीन प्रकार की होती थी- (1.) चौथाई, (2.) आधी और (3.) पूरी। नये गाँव बसाने या पुरानी बस्तियों को फिर से बसाने तथा व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य की ओर से विभिन्न प्रकार करों में भी राहत दी जाती थी।
राजकीय आय का व्यय
राजकीय आय मुख्यतः राजा, राज-परिवार के सदस्यों, ड्योढ़ियों की देखभाल, राजकीय कारखानों के संचालन एवं उनकी व्यवस्था, राजकीय कार्यालयों एवं न्यायालयों के संचालन, राज्य-कर्मचारियों के वेतन, महलों व सार्वजनिक निर्माण कार्य, सिरोपाव, ईनाम, दान-पुण्य, षट्दर्शन आदि पर व्यय होती थी। राजा सेना पर बहुत कम धन व्यय करता था, क्योंकि सेना के अधिकांश भाग की पूर्ति सामन्तों की सेना से होती थी। सामन्त अपनी सेना का खर्च स्वयं वहन करते थे।
राजपूतों की न्यायिक व्यवस्था और दण्ड-व्यवस्था का आधार प्राचीन हिन्दू धर्मशास्त्र थे। परम्परा, रीति-रिवाज तथा देशाचार को भी मान्यता दी जाती थी।
गाँवों में न्याय व्यवस्था
गाँव में ग्राम चौधरी या पटेल न्याय देने को कार्य करते थे। ग्राम पंचायत और जाति पंचायतों द्वारा भी न्याय का कार्य किया जाता था। पंचायतों के निर्णयों के विरुद्ध परगना अधिकारी या राजा को अपील की जा सकती थी।
परगनों में न्याय व्यवस्था
परगनों में न्याय का कार्य हाकिम, या आमिल या हवलगिर करता था। हाकिम को दीवानी और फौजदारी सम्बन्धी समस्त मामलों की सुनवाई करने का अधिकार था।
नगरों में न्याय व्यवस्था
राजधानी व अन्य बड़े-बड़े नगरों में नियुक्त कोतवाल भी न्यायाधीश का कार्य करते थे।
जागीरों में न्याय व्यवस्था
बड़े जागीरदार को उनकी जागीर सीमा में परगना हाकिमों के समान न्यायिक अधिकार प्राप्त थे। कहीं-कहीं सामन्त स्वयं दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई करता था। कुछ बड़े सामान्तों को अपने क्षेत्र के अपराधियों को मृत्युदण्ड तक देने का अधिकार होता था। राजा या सामन्त किसी भी मामले में मनमाना निर्णय नहीं दे सकता था। राज्य के प्रचलित नियमों एवं स्थापित परम्पराओं के आधार पर निर्णय देना होता था। सामन्तों के न्यायिक अधिकारों में सामान्यतः राजा हस्तक्षेप नहीं कर सकता था।
राजधानी में न्याय व्यवस्था: परगना हाकिम के निर्णय के विरुद्ध दीवान के समक्ष अपील की जा सकती थी। सामान्यतः दीवान, दीवानी मुकदमों की सुनवाई करता था किंतु कुछ मामलों में वह फौजदारी मुकदमों को भी निपटाता था। मेवाड़ राज्य में दंडपति नामक न्यायिक अधिकारी होता था।
आम्बेर राज्य में आमिल अपनी कचहरी में प्रतिदिन मुकदमे सुनता था। दीवान, आमिल व फौजदार को विभिन्न प्रकार के अपराधों में दंड देने के सम्बन्ध में निर्देश भेजता था। दीवान के निर्णय के विरुद्ध राजा के समक्ष अपील की जा सकती थी। राजा के समक्ष सीधे ही वाद प्रस्तुत किया जा सकता था।
राजद्रोह व अन्य जघन्य अपराधों की जाँच राजा स्वयं करता था। वादी, प्रविवादी और गवाहों को सुनने के बाद राजा न्याय करता था। गवाह को शपथ लेकर बयान देना पड़ता था। आवश्यकता पड़ने पर राजा न्याय-विशेषज्ञों की सलाह लेता था। धार्मिक मामलों में राजा, पुरोहित से परामर्श करता था।
दण्ड व्यवस्था
राजपूत राज्यों की दण्ड व्यवस्था काफी कठोर थी। विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिए अलग-अलग दण्ड दिये जाते थे। अंग-भंग, देश-निर्वासन, कारागार, जुर्माना आदि दण्डों के साथ-साथ शिरोच्छेदन तथा मृत्युदण्ड भी दिये जाते थे। राज्य में कारावास बने होते थे। मुसलमानों को शरीअत के अनुसार न्याय मिलता था। राजधानियों व बड़े-बड़े नगरों में काजी नियुक्त किये जाते थे, जिनके परामर्श के अनुसार मुालमानों के अपराधों एवं मुकदमों का निर्णय किया जाता था।
राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन परमपरागत हिन्दू सैन्य प्रबन्धन पर आधारित था जिसके कारण वे मुगलों का सामना तो करते थे किंतु उन्हें पराजित नहीं कर पाते थे।
राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन
सेना का गठन
मध्यकालीन राजपूत राज्यों में सेना का रख-रखाव सामान्तों द्वारा किया जाता था। राजा को जब सेना की आवश्यकता होती थी तब सामन्त निश्चित संख्या में सैनिकों के साथ राजा की सेवा में उपस्थित होते थे। राजा के पास अपने अंगरक्षकों के रूप में एक छोटी सैनिक टुकड़ी के अतिरिक्त प्रायः स्थाई सेना नहीं होती थी।
सेना का सर्वोच्च अधिकारी राजा ही होता था, परन्तु मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद बख्शी की भी नियुक्ति की जाने लगी जो महाराज तथा सामन्तों की सेना का निरीक्षण एवं प्रबंधन करता था। वह सामन्तों की सेना तथा उनकी सेवाओं का विवरण राजा को देता था। बख्शी के पद पर उसी को नियुक्त किया जाता था जिसे घोड़ों की अच्छी जानकारी हो।
युद्ध सामग्री तथा सैनिक साज-सज्जा
राजपूत सैनिक परम्परागत रूप से तलवार, तीर-कमान तथा भालों का प्रयोग करते थे। वे कमर में म्यान बांधते थे जिसमें तलवार रखी जाती थी। पीठ पर तीरों के लिये तरकष एवं शरीर की रक्षा के लिये ढाल बांधते थे। सिर पर लोहे के शिरस्त्राण पहनते थे।
मुगलों से सम्पर्क होने के बाद राजपूत सैनिक भी तोप, बारूद के गोले तथा बन्दूकों का प्रयोग करने लगे थे। मुगलों से सम्पर्क होने के बाद राजपूत सैनिकों की पोशाकों में भी बड़ा परिवर्तन हुआ। वे भी मुगल सैनिकों की तरह बख्तरबंद पहनने लगे थे।
सेना के अंग
राजपूतों की सेना परम्परागत रूप से चतुरंगिणी होती थी अर्थात् इसमें रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदल सेना रूपी चार अंग होते थे। मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद रथों का प्रयोग समाप्त-प्रायः हो गया। हाथियों का प्रयोग अब भी आवश्यक रूप से होता था किंतु हाथियों की अपेक्षा घुड़सवारों को अधिक महत्त्व दिया जाता था।
पैदल और घुड़सवार, सेना के प्रमुख अंग थे। जिन प्यादों के पास बन्दूकें होती थीं, वे बन्दूकची कहलाते थे। बन्दूकचियों की संख्या में धीरे-धीरे काफी वृद्धि हो गई थी। तोपखाने का महत्त्व भी अपने चरम पर पहुँच गया था। किलों की रक्षा के लिए बड़ी बड़ी तोपें रखी जाती थीं। रणक्षेत्र में प्रयोग के लिये हल्की तोपें बनवाई जाती थीं।
गजनाल (जो हाथियों पर ले जाई जाती थी) और शतुरनाल (ऊँटों पर लादी जाती थी) जैसी छोटी तोपें होती थीं। इनसे बड़ी तोपों को बैलगाड़ियों में ले जाया जाता था। तोपखाने का अधिकारी दरोगा-ए-तोपखाना होता था। उसके अधीन छोटे पदाधिकारी होते थे। राजपूत तोपची अथवा गोलन्दाज बनना पसन्द नहीं करते थे, इसलिए मुल्तान, गोडवाना, बुहरानपुर आदि स्थानों से प्रशिक्षित गोलन्दाज बुलाकर सेना में रखे जाते थे।
सैनिक पदाधिकारी
राजपूत राज्यों में सेना के विभिन्न विभागों की व्यवस्था की देखरेख के लिए अलग-अलग पदाधिकारी नियुक्त किये जाते थे जिन्हें पैदलपति, गजपति, अश्वपति आदि कहते थे। मुगलों के प्रभाव से सैनिक अधिकारियों को दरोगा-ए-पोलखाना, दरोगा-ए-सिलहपोसेखाना (अस्त्र-शस्त्र), दरोगा-ए-शुतरखाना, शमशेरबाज, बन्दूकची, किलेदार आदि कहने लगे थे।
बीकानेर राज्य में दरोगा के स्थान पर फौजदार होता था। फौजदार की सहायता के लिए तथा हवलदार और दरोगा नियुक्त किये जाते थे। पश्चिमी राजस्थान में ऊँट सवारी के दस्तों का काफी महत्त्व था, क्योंकि रेगिस्तानी क्षेत्र में वे प्रभावशाली सिद्ध होते थे। ऊँटों की सेना का प्रबन्ध शुतरखाना विभाग करता था।
साहसी और रणकुशल सामन्तों व सैनिकों को प्रोत्साहन दिया जाता था। उन्हें समय-समय पर सम्मानित किया जाता था। रणक्षेत्र में यदि कोई पदाधिकारी मारा जाता तो उसकी अन्त्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ की जाती थी। यदि राजकीय सेवा करते हुए किसी सामन्त की मृत्यु हो जाती तो उस सामन्त के उत्तराधिकारी को अतिरिक्त जागीर और कुछ विशेषाधिकार दिये जाते थे।
राजपूत राज्यों में समाज भारत के अन्य क्षुत्रों की जनता की तुलना में अधिक परम्परावादी थी। सामाजिक परम्पराओं में परिवर्तन की गति बहुत धीमी थी। राजपूत राज्यों में समाज का शैक्षिक स्तर बहुत निम्न था और लोगों में राजा के विरुद्ध आवाज उठाने को विद्रोह एवं पाप माना जाता था।
राजपूत राज्यों में समाज
मध्यकालीन समाज
भारत का सामाजिक ढांचा परम्परागत रूप से ऊँच-नीच, पद-प्रतिष्ठा तथा वंशोत्पन्न जातियों के आधार पर संगठित था। मध्यकालीन राजपूताने में यह व्यवस्था और अधिक दृढ़ हो गई थी। समाज में जातियों का महत्त्व उनके द्वारा किये जाने वाले कार्यों एवं व्यवसायों पर निर्भर करता था।
युद्ध, पूजा-पाठ एवं व्यापार आदि उच्च व्यवसायों को अपनाने वाली जातियों को सामाजिक संगठन में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। परिश्रम आधारित कार्यों में संलग्न जातियों को समाज में निम्न स्थान प्राप्त था। मृत पशुओं की खाल निकालने, मैला ढोने, जूते बनाने आदि हेय समझे जाने वाले कार्यों को करने वाले अछूत समझे जाते थे।
अछूत समझी जाने वाली जातियों को अपने जातीय कर्त्तव्यों का पालन करने अथवा बेगार के मामलों में छूट नहीं मिलती थी। जाति-व्यवस्था को दृढ़ बनाये रखने में सामंती व्यवस्था एवं जाति-पंचायतों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। जाति पंचायतें जातियों को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिये खान-पान, शादी-विवाह तथा रीति-रिवाजों से सम्बन्धित नियम बनाती थी तथा उनकी पालना करवाती थीं।
जातीय नियमों को भंग करने वाले व्यक्तियों को दण्ड देने की व्यवस्था थी। उच्च समझी जाने वाली जातियों अर्थात् ब्राह्मण, राजपूत तथा महाजनों को समाज में आदर के साथ-साथ राज्य द्वारा विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं।
राजपूत राज्यों में समाज – विविध जातियाँ और व्यवसाय
जातियों की विविधता और उनकी विभिन्नताओं के मामले में राजस्थान आज की तरह मध्यकाल में भी एक समृद्ध प्रदेश था। जातियों का निर्माण, उनकी सामाजिक प्रथायें तथा उनके आर्थिक क्रिया कलाप इतिहास में गहराई तक जड़ें जमाये हुए हैं। मध्यकालीन राजपूताने में जाति प्रथा का परम्परागत स्वरूप बना रहा किंतु मुगलों के प्रभाव के कारण सामाजिक विन्यास में आर्थिक परिवर्तन आने लग गये थे। इस कारण लोगों को परम्परागत जातीय व्यवसायों के साथ-साथ विविध व्यवसाय अपनाने पर विवश होना पड़ा।
ब्राह्मण
परम्परागत सामाजिक ढांचे में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोपरि था। ब्राह्मण जाति अनेक उप जातियों में विभाजित थी। समाज में नैतिक जीवन का आधार ब्राह्मण ही माना था। अध्ययन-अध्यापन, धार्मिक कर्मकाण्डों का सम्पादन, पुरोहिताई आदि उनके परम्परागत जातीय पेशे थे। कुछ ब्राह्मण का व्यवसाय मन्दिरों में पूजा-पाठ करना था।
कुछ पढ़े-लिखे ब्राह्मणों ने अध्ययन-अध्यापन को अपना व्यवासय बनाये रखा। ऐसे ब्राह्मणों को राज्य से भूमि अनुदान में दी जाती थी। कई ब्राह्मणों ने कथा-वाचन, ज्योतिष तथा वैदिक अध्यापन को व्यवसाय बना लिया था। ब्राह्मणों के कुछ परिवार, राजकुलों तथा सामन्तों के पारिवारिक पुरोहित बने हुए थे। उन्हें राजगुरू तथा राजव्यास आदि उपाधियों से सम्मानित किया जाता था।
गाँवों में रहने वाले अधिकांश ब्राह्मणों ने कृषि कर्म को अपना लिया था। प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर स्थित नगरों तथा कस्बों के कुछ सम्पन्न ब्राह्मणों ने व्यापार-वाणिज्य तथा साहूकारी का व्यवसाय अपना लिया था। ब्राह्मणों को विभिन्न महत्वपूर्ण राजकीय सेवाओं में भी नियुक्त किया जाता था। उन्हें कूटनीतिक तथा प्रशासनिक दायित्व दिये जाते थे।
विभिन्न व्यवसायों को अपनाने के उपरांत भी ब्राह्मण अपनी पुरानी परम्पराओं को कायम बनाये रखने पर जोर देते थे। इसीलिए हिन्दू प्रजा उन्हें हिन्दू संस्कृति का संरक्षक समझती थी तथा उन्हें पर्याप्त सम्मान देती थी। कुछ ब्राह्मणों ने निर्धनता के कारण भोजन बनाने का कार्य करना आरम्भ कर दिया था। ऐसे ब्राह्मण समाज में कम आदर से देखे जाते थे। वे ब्राह्मण जो किसी के मरने पर भोजन, कपड़ा व दान स्वीकार करते थे, उनका भी ब्राह्मण समाज में नीचा स्थान माना जाता था।
राजपूत
परम्परागत भारतीय समाज में ब्राह्मणों के बाद क्षत्रियों का स्थान आता था। मध्यकालीन राजपूताना में प्राचीन क्षत्रियों का स्थान राजपूतों ने ले लिया। राजवंश से सम्बन्धित होने एवं शासक जाति के सदस्य होने के कारण राजपूतों को समाज में विशेष आदर प्राप्त था। उनके पास वंशानुगत रूप से छोटी-बड़ी जागीरें थीं।
इस काल के राजपूत अपनी मान-मर्यादा के प्रति अत्यधिक सजग थे। राजकीय सेवा, सैनिक सेवा अथवा सामान्तों की सेवा करने के अतिरिक्त अन्य किसी भी व्यवसाय को अपनाना वे अपने कुल मर्यादा के प्रतिकूल समझते थे। नागरिक प्रशासन एवं सैनिक व्यवस्था में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान होता था।
पद्मनाभ कृत कान्हड़दे प्रबन्ध में राजपूत जाति के 36 कुलों का उल्लेख है। ये कुल अनेक उपकुलों व परिवारों में विभाजित हो गये थे। राजपूत कुल चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो गया अथवा कितनी ही पीढ़ियाँ बीत चुकी हों, समान गोत्र में विवाह नहीं हो सकता था। एक गोत्र, एक परिवार ही समझा जाता था।
राजपूतों की शादी में लड़की के पिता को टीके व दहेज के रूप में धन देना पड़ता था। इस कारण निर्धन राजपूतों में नवजात कन्या को मार देने की कुप्रथा प्रचलित हो गई।
वैश्य
वैश्यों को समाज में महाजन कहकर आदर दिया जाता था। वाणिज्य कर्म में संलग्न होने के कारण उन्हें बनिया भी कहा जाता था। ब्राह्मणों और राजपूतों की भाँति वैश्य भी अनेक जातियों एवं उपजातियों में विभाजित थे। राजपूताने में मुख्यतः अग्रवाल, ओसवाल, माहेश्वरी, पोरवाल आदि वैश्य जातियाँ निवास करती थीं।
ये लोग व्यापार-वाणिज्य के साथ-साथ साहूकारी का काम अर्थात् सम्पत्ति गिरवी रखकर उसके बदले में नगद राशि ब्याज पर देते थे। इस कारण वैश्य समुदाय अत्यंत धन-सम्पन्न था। समाज में उसकी अत्यंत प्रतिष्ठा थी। समृद्ध वैश्य गांवों एवं नगरों में तालाब, कुएं, धर्मशाला, प्याऊ, पाठशाला एवं मंदिरों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार करवाते थे। बहुत से सेठ सदाव्रत एवं दानशाला चलाते थे।
ऐसे प्रतिभा सम्पन्न एवं धन सम्पन्न वैश्यों को प्रशासन में उच्च पद दिये जाते थे। राज्यों में हाकिम, दीवान, मुसाहिब, दरोगा, वकील आदि पदों पर अधिकांशतः वैश्य वर्ग के व्यक्ति ही नियुक्त किये जाते थे। प्रतिष्ठित वैश्य मंत्री युद्धक्षेत्र में सैन्य-संचालन का काम भी करते थे।
राज्य के बड़े-बड़े सामंत अपनी सेनाओं के साथ युद्ध क्षेत्र में उपस्थित रहकर वैश्य मंत्री के निर्देशन में युद्ध लड़ते थे। वैश्य समुदाय का मुख्य व्यवसाय व्यापार-वाणिज्य तथा रुपयों का लेन-देन करना था। वे मुख्यतः थोक व्यापारी थे और सामान को एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में लाने-ले जाने और क्रय-विक्रय का काम करते थे।
कई वैश्य परिवार खालसा भूमि के राजस्व तथा सायर (चुंगी) की वसूली का इजारा (ठेका) लेते थे तथा साधारण किसान से लेकर शासकों तक को ब्याज पर कर्ज देते थे।
कायस्थ
कायस्थों का समाज में महत्वपूर्ण स्थान था। राजपूताने में भटनागर एवं माथुर कायस्था अधिक प्रभावशाली थे। मुगलों के आगमन के पश्चात् कायस्था कों राजस्व अभिलेख रखने, शासकीय अभिलेख तैयार करने एवं पत्राचार आदि करने के काम में विशेष प्रसिद्धि मिली। वे फारसी के जानकार एवं प्रशासनिक कार्य में दक्ष माने जाते थे।
शासन व्यवस्था पर उनका अच्छा प्रभाव होता था इसलिये उन्हें कई बार युद्धों का नेतृृृत्व करने का भी अवसर दिया जाता था। जोधपुर एवं जयपुर राज्य में भी कायस्थों को विशेष महत्व दिया जाता था। उन्हें राजपूत राज्यों की ओर से दूसरे राज्यों में वकील नियुक्त किया जाता था।
चारण
मध्यकालीन राजपूत शासित समाज में चारणों का भी प्रमुख स्थान था। वे भी काव्य रचना करने, राजा के संदेश वाहक का काम करने, तथा विभिन्न भूमिकाएं निभाने में सिद्धहस्त थे। चारणों को अवध्य माना जाता था। जो राजा चारण का अपमान करता था अथवा हत्या करता था, उसके शासन को पापयुक्त माना जाता था।
चारण का पेट भरना शासन का कर्त्तव्य माना जाता था। इसलिये उन्हें ब्राह्मणों की तरह दान दिया जाता था। चारणों को दान में दी गई जागीर राज्य द्वारा वापस नहीं ली जाती थी। चारणों की बारहठ, वीठू, आशिया, दधवाड़िया, खिड़िया, सिंढायच आदि शाखाएं बहुत प्रसिद्ध थीं।
चारण स्वामिभक्त जाति होती थी जो युद्ध क्षेत्र में राजा के साथ रहकर उसके मनोबल उन्नयन का कार्य करती थी। चारण जाति ने मध्यकाल में विपुल डिंगल साहित्य की रचना की।
भाट
मध्यकालीन समाज में राजपूताने में हर जाति का भाट होता था। वह परिवार की वंशावली लिखता था। विवाह आदि पर्वों पर भाट उस जाति एवं परिवार का विरुद बखानते थे जिसके बदले उन्हें पुरस्कार मिलता था। भाटों का मुख्य व्यवसाय मांग कर खाना होता था किंतु भाट केवल अपने जजमान के यहां से ही मांगकर खाता था।
कुछ भाट किसान हो गये थे तथा कुछ किसान छोटा-मोटा व्यवसाय भी करते थे। मारवाड़ राज्य में पचपद्रा से नमक ले जाने का काम करने वाले भाट व्यापारियों को बल्दिया कहते थे। जजमान इस बात का ध्यान रखता था कि भाट नाराज होकर सामाजिक रूप से अपने जजमान की बदनामी न कर दे।
राव
चारणों, भाटों की तराह राव जाति के लोग भी वंशावलियां लिखते थे। उन्होंने अपनी बहियों के माध्यम से प्रदेश के इतिहास और रीति रिवाजों को लेखनी बद्ध करके उसे सदियों तक जीवित रखा। रावों ने पिंगल भाषा में काव्य कृतियों एवं लोक गीतों की रचनाएं करके प्रदेश के शासक एवं जन सामान्य वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति की।
कृषक जातियाँ
मध्यकाल में राजपूताने की प्रमुख कृषक जाति जाट थी जो कृषि कर्म में अत्यंत निष्णात मानी जाती थी। जाटों से ही विश्नोई अलग हुए। विश्नोइयों का मुख्य कार्य कृषि कर्म ही था। कृषक वर्ग में कुनबी, कलबी, कीर, धाकड़, गूजर, माली, अहीर आदि जातियां भी थीं।
मुसलमानों के आने से पहले भारत की कृषि जातियों में सम्पन्नता थी। मुसलमानों के आक्रमण के बाद किसानों की हालत खराब होने लगी किंतु राजपूताने के कृषक 17वीं शताब्दी तक अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में बने रहे। अठारहवीं शताब्दी में मराठों की लूटमार आरम्भ होने के कारण राजपूताने की कृषि उजड़ने लगी तथा किसानों पर ऋण चढ़ने लगा। अब राजपूताने की कृषक जातियां भी दो आब की जातियों की तरह दुखी हो गईं।
हाथ से काम करने वाली जातियाँ
मध्यकाल में राजपूताने में सैंकड़ों ऐसी जातियां निवास करती थीं जो अपने अलग कार्य के लिये जानी जाती थीं। नाई बाल काटता था। लुहार लोहे के हथियार, उपकरण एवं अन्य सामग्री बनाता था। धुनिया कपास धुनता था। जुलाहा कपड़े बुनता था। छींपा अथवा रंगरेज कपड़े रंगता था।
दर्जी कपड़े सिलता था। खाती लकड़ी का काम करता था। धोबी कपड़े धोता था। कुम्हार मिट्टी के बर्तन, मटके, दिये आदि बनाता था। सुनार सोने-चांदी के आभूषण बनाता था। तेली बीजों से तेल निकालता था। लखारा, मणियार, भडभूंजा, कलाल, मोची, भांभी, मेघवाल, सरगरा आदि जातियां अपना-अपना निर्धारित करती थीं।
आभूषण बनाने वाली जातियाँ
मध्यकाल में लखारा, सुनार तथा मणिहार आदि जातियों ने आभूषणों के निर्माण एवं उनके व्यवसाय का विकास किया। राजस्थान में सोने का उत्पादन नहीं होता था, इसलिये सोना बाहर से मंगावाया जाता था। मेवाड़ की खानों से चांदी का उत्पादन होता था। इस कारण चांदी के आभूषण बहुतायत से बनते थे। आदिवासी लोग ताम्बे, सीप, रंगीन पत्थर एवं मिट्टी से बने मनकों के आभूषण भी पहनते थे।
गायक जातियाँ
राजस्थान में रहने वाली गायक जातियों में कलावंत, ढाढ़ी, मिरासी, ढोली, रावल, डोम, राणा, लंगा, भोपा, सांसी, कंजर, जोगी तथा भवई आदि प्रमुख थीं। कालबेलिया, कठपुतली नट, लखारा तथा भाट आदि जातियाँ भी गाकर एवं नाचकर अपना पेट भरती थीं।
घुमक्कड़ जातियाँ
मध्यकाल की प्रमुख घुमक्कड़ जातियों में बनजारे तथा गाड़िया लुहार थीं। बनजारे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर सामान बेचते थे। गाड़िया लुहार जाति राजपूतों से निकली थी। सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में जब अकबर ने चित्तौड़ पर अधिकार किया तब जो राजपूत वीर युद्ध में काम नहीं आ सके उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और प्रण किया कि जब तक चित्तौड़ पर पुनः हिंदुओं का अधिकार नहीं हो जाता तब तक चित्तौड़ की भूमि पर पैर नहीं रखेंगे।
अकबर से चित्तौड़ की पराजय का बदला लेंगे। बसे-बसाये घरों में नहीं रहेंगे। जब चित्तौड़ दुर्ग में हिंदुओं का दिया नहीं जलेगा तब तक रात में दिया नहीं जलायेंगे। कुंओं से पानी भरने के लिये रस्सी नहीं रखेंगे तथा पलंग पर नहीं सोयेंगे। जब तक जियेंगे हथियार बनायेंगे। उन्होंने चित्तौड़ की धरती को वचन दिया कि वे फिर आयेंगे।
यही क्षत्रिय गाड़िया लुहार कहलाने लगे। उनका परिवार बैल गाड़ियों पर रहता था तथा। ये लोग दूर-दूर तक घूमते रहते थे। चार सौ वर्ष बीत जाने पर भी गाड़िया लुहार पुनः चित्तौड़ नहीं लौट पाये। गाड़िया लुहार लोहे के छोटे-मोटे उपकरण, कृषि के औजार एवं घरेलू बर्तन बनाकर आजीविका कमाने लगे। आज भी वे यही कार्य कर रहे हैं।
चरवाहा जातियाँ
मध्यकाल में रेबारी, राजपूताने की प्रमुख चरवाहा जाति थी। ये लोग राजा एवं जमींदार के पशु चराया करते थे। कुछ रेबारियों के पास अपने पशु झुण्ड भी थे। भेड़ों एवं ऊँटों के टोले लेकर ये दूर-दूर तक के चारागाहों की यात्रा करते थे। अकाल पड़ने पर मारवाड़ एवं ढूंढाढ़ आदि प्रदेशों से मालवा की ओर चले जाते थे। ये लोग राजा के घोड़े चराने के काम पर भी रखे जाते थे। यह एक उच्च आर्य जाति थी तथा अपनी अलग संस्कृति का निर्वहन करती थी।
आदिवासी जातियाँ
मध्यकालीन राजपूताना में भील, मीणा, गरासिया, काथोड़िया, सहरिया तथा गमेती आदि आदिवासी जातियाँ निवास करती थीं। मेवाड़, आम्बेर, सिरोही, टोंक, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, कोटा, बूंदी तथा झालावाड़ आदि क्षेत्रों में आदिवासी काफी संख्या में निवास करते थे।
राजस्थान का दक्षिणी क्षेत्र विशेष रूप से कोटड़ा, झाड़ौल, सलूम्बर, सराड़ा, खेरवाड़ा तहसीलें और सम्पूर्ण डूंगरपुर राज्य आदिवासियों से भरे पड़े थे। आदिवासी लोग जंगलों और पहाड़ों में छितराये हुए मैदानों में खेती करते थे। कृषि वर्षा पर निर्भर थी। जंगलों से घास, चारा, लकड़ी, गोंद, कंदमूल, तेंदूपत्ते, जानवारों की खाल, आदि एकत्र कर उसे कस्बों और शहरों में लाकर बेचना इनका मुख्य व्यवसाय था।
भील जाति मेवाड़ में सैनिक जाति के रूप में भी प्रख्यात थी। मीणा जाति आम्बेर राज्य में जागीरदार एवं चौकीदार के रूप में विख्यात थी। जमींदार मीणा प्रायः खेती एवं पशुपालन करते थे। कुछ लोग लूट-पाट भी करते थे। बारां जिले के शाहबाद और किशनगंज आदि क्षेत्रों में सहरिया जनजाति परम्परागत रूप से निवास करती थी।
राजपूत राज्यों में समाज –दास वर्ग
प्राचीन आर्यों के समय से भारत में दास प्रथा प्रचलन में थी। मौर्य काल में दासों की स्थिति बहुत ही खराब थी। वे समाज में रहते हुुए भी अन्य नागरिकों की तरह जीवन यापन नहीं करते थे। उनका जीवन कष्टों और अभावों से भरा हुआ था। मध्यकाल में मुस्लिम आक्रमणों के पश्चात् यह स्थिति और अधिक विकट हो गई।
मुसलमान आक्रांता किसी भी व्यक्ति, स्त्री अथवा बच्चे को पकड़कर ले जाते थे और मध्य एशियाई देशों में ले जाकर बेच देते थे। जब मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत में अपनी राजसत्ता स्थापित की तो देश में दासों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। राजपूताना भी इससे अछूता नहीं रहा।
राजपूताने के दास किसी जाति अथवा वर्ग से सम्बन्धित नहीं थे। न ही वे बाजारों में बेचे अथवा खरीदे गये थे। राजपूताने में दास प्रथा का जन्म शासक परिवारों की अवैध संतानों के रूप में हुआ। राजाओं एवं जमींदारों के महलों में काम करने वाली सेविकाएं इन संतानों की माता हुआ करती थीं।
ये संतानें बड़ी होकर महल में सेवा चाकरी करने लगती थीं जिन्हें दास माना जाता था। इन्हें अछूत नहीं माना जाता था। कुछ प्रतिभाशाली दासों की नियुक्ति किलेदारों एवं दरोगा आदि के पदों पर की जाती थी। दासियांे को डावड़ी कहा जाता था। सुंदर दासियां महलों में अच्छा-खासा प्रभाव रखती थीं।
राजपूत राज्यों में समाज –अछूत समझी जाने वाली जातियाँ
आर्यों ने श्रम आधारित जिस चार वर्णीय सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया था, उस व्यवस्था में मुसलमानों के प्रभाव से बहुत बड़ी विकृति उत्पन्न हुई। निम्न समझे जाने वाले कार्यों को करने वाली जातियां अछूत समझी जाने लगीं। इनमें मैला ढोने वाली, चमड़े का काम करने वाली तथा मृत पशुओं की खाल उतारने वाली जातियां सम्मिलित थीं। इस वर्ग में सम्मिलित जातियों में निरंतर विस्तार होता चला गया।
राजपूत राज्यों में समाज –मुसलमान
मध्यकाल में राजपूताने के विभिन्न राज्यों में मुसलमान भी निवास करने लगे थे। इनमें से कुछ मुसलमान शाही सैनिकों एवं अधिकारियों के रूप में राजपूताने के राज्यों एवं मुस्लिम शासित क्षेत्रों में रहते थे किंतु अधिकांश मुसलमान वे थे जो ना-ना कारणों से हिन्दू धर्म त्यागकर मुसलमान हो गये थे।
मुसलमानों की विभिन्न शाखाएं मध्यकाल में ही विकसित होने लगी थीं जिनमें कायमखानी, मेव, सैयद, पठान, काजी आदि सम्मिलित थे। इनमें भी जातियां बनने लगी थीं। छींपा जाति के मुसलमान भी राजपूताने में बड़ी संख्या में निवास करते थे। मुसलमानों के साथ ही कसाई भी बसने लगे थे।
निष्कर्ष
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मध्यकाल का समाज जटिल जातीय व्यवस्था में विभक्त था। हर जाति का अपना काम था। इस काम के आधार पर ही उन्हें समाज में अधिक या कम आदर प्राप्त होता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।
हाथ से काम करने वाली जातियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति सन्तोषजनक नहीं थी। सतत युद्धों के उपरान्त भी राज्यों की अर्थव्यवस्था संतोषजनक थी किंतु मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद समाज की अर्थव्यवस्था में तेजी से परिवर्तन आया। इस कारण विभिन्न जातियों को अपने परम्परागत कार्यों के साथ-साथ विभिन्न कार्य अपनाने पड़ रहे थे। जाति व्यवस्था को बनाये रखने में सामंती व्यवस्था एवं जातीय पंचायतें प्रमुख भूमिका निभा रही थीं।
राजपूत राज्यों में समाज –सामाजिक जीवन
राजपूत राज्यों में प्राचीन आर्यों द्वारा विकसित पितृ-सत्तात्मक संरचना वाले संयुक्त परिवार निवास करते थे। परिवार का मुखिया अपनी तीन-चार और यहां तक कि पांच-पांच पीढ़ियों के साथ रहता था। भूमि का बंटावारा नहीं किया जाता था इसलिये सब भाई तथा उनकी संतानें मिलकर खेती, पशुपालन एवं विविध कार्य किया करते थे। इसके कारण कुटीर उद्योग एवं पारिवारिक व्यवसाय का प्रचलन था।
सोलह संस्कार
मनुष्य के जीवन के लिये सोलह संस्कार आवश्यक माने जाते थे। इनमें नामकरण, अन्न-प्राशन, चूड़ाकरण (झड़ूला), उपनयन, विवाह, अंत्येष्टि आदि प्रमुख थे।
विवाह
समाज की संरचना बहुत सरल थी। कन्या का विवाह कम आयु में ही कर दिया जाता था। इसके पीछे धारणा यह थी कि कन्या को अपने पिता के घर में राजस्वला नहीं होना चाहिये। विवाह अपनी ही जाति में होता था किंतु एक ही रक्त वाले स्त्री-पुरुष परस्पर भाई-बहिन समझे जाते थे और उनका परस्पर विवाह नहीं होता था।
इसलिये गोत्र आधारित विवाह किये जाते थे। राजपूतों एवं वैश्यों में बहु-विवाह प्रचलित था। राजपूत एवं अन्य धनी लोग उपपत्नियां भी रखते थे जिन्हें उनकी हैसियत के अनुसार रखैल, पासवान, पडदायत अथवा खवास कहा जाता था। विवाह के अवसर पर कुनबे वालों को भोज दिया जाता था।
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य जातियों में विधवा विवाह प्रचलन में नहीं था। जाट, माली, गूजर, कुम्हार आदि श्रम आधारित जातियों में नाता प्रथा प्रचलित थी जिसमें विधवा स्त्री का विवाह उसके ससुराल पक्ष के अथवा किसी अन्य परिवार के पुरुष से कर दिया जाता था। जाति से बाहर विवाह करने वालों को जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था।
मृतक संस्कार
मृतक संस्कार को आवश्यक धार्मिक कर्त्तव्य समझा जाता था। शव को अग्नि में जलाया जाता था। उसकी राख एवं हड्डियों को नदियों में प्रवाहित किया जाता था। मृत्यु भोज देना अनिवार्य था। मृतक की आत्मा की शांति के लिये ब्राह्मणों एवं भूखों को भोजन दिया जाता था। समय-समय पर श्राद्ध कर्म भी किया जाता था।
वस्त्राभूषण
मनोरंजन प्रिय संस्कृति होने के कारण राजपूताने में विविध प्रकार के चटख रंगों के वस्त्र पहने जाते थे। शासक एवं सामंत वर्ग के लोग बड़ी धोती, लम्बी अंगरखी तथा रंग-बिरंगी पगड़ियां पहनते थे। कपड़ों पर सोने-चांदी के तारों एवं कसीदे का काम किया जाता था। मध्यम वर्ग के लोग धोती, अंगरखी, दुपट्टा, साफा या पगड़ी पहनते थे।
निर्धन लोग कमर में ऊँची धोती तथा सिर पर पोतिया बांधते थे। औरतें घेरदार घाघरा, लम्बी आस्तीन वाली कुर्ती तथा ओढ़नी पहनती थीं। मुगलों के सम्पर्क के बाद बहुत से पुरुष जामा, कमरबंद और पाजामा पहनने लगे थे। स्त्री तथा पुरुष दोनों ही आभूषणों के शौकीन थे।
सम्पन्न लोग सोने के, मध्यम लोग चांदी के, निर्धन लोग ताम्बे एवं पीतल के आभूषण पहनते थे। स्त्रियां शुभ अवसरों पर हाथ-पैरों पर मेहंदी लगाती थीं। वे आंखों में काजल, माथे पर बिंदी तथा सिर में मांग लगाती थीं।
आमोद प्रमोद
मध्यकालीन राजपूताना में घरों के भीतर एवं चौराहों आदि पर सार्वजनिक रूप से चौपड़, शतरंज, गंजीफा, चर-भर, आदि खेल खेले जाते थे। कुश्ती, पट्टेबाजी, पतंगबाजी, कबूतरबाजी, मुर्गों की लड़ाई, तैराकी, हाथियों की लड़ाई, भैंसों की लड़ाई, आदि मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।
गायन, वादन एवं नृत्य के आयोजन पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पर आयोजित किये जाते थे। राजपूत लोग शिकारों का आयेाजन करते थे। झूला झूलना, नाटक आयोजित करना, विभिन्न प्रतियोगिताओं तथा मेलों का आयोजन करना भी मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।
खान-पान
समाज में शाकाहार एवं मांसाहार का प्रचलन था। वैश्य एवं ब्राह्मण शाकाहारी थे। अन्य जातियों में प्रायः मांसाहार होता था। दैनिक भोजन में गेहूँ, बाजरा, मक्का, चावल, जौ, चना आदि अनाजों एवं अनेक प्रकार की दालों एवं हरी सब्जियों का प्रयोग होता था। विवाह आदि अवसरों पर अफीम से मनुहार की जाती थी।
शराब का भी प्रचलन था। सात्विक प्रवृत्ति के लोग शराब नहीं पीते थे। भोजन के बाद एवं चौपालों पर हुक्के पीने का प्रचलन था। सामान्य दिनों में दाल-रोटी, सब्जी रायता आदि खाया जाता था। विवाह, त्यौहार एवं अतिथि आगमन पर खीर, पुए, लड्डू, गुलगुले आदि बनाये जाते थे। मुरब्बे, अचार, चटनी आदि भी प्रचलन में थे।
दूध, दही, घी, छाछ एवं मक्खन का प्रयोग आर्थिक स्थिति के अनुसार होता था। मांसाहारी लोग हिरण, बकरा, भेड़ एवं सूअर आदि पशुओं तथा मुर्गा एवं बत्तख आदि पक्षियों का मांस खाते थे। समस्त राजपूताना में हिन्दू राज्य होने गाय का मांस पूरी तरह निषिद्ध था।
धर्म
मध्यकालीन रापजूताने में वैदिक एवं पौराणिक धर्म का प्रचलन था। विष्णु, लक्ष्मी, शिव, सूर्य, दुर्गा, गणेश, हनुमान आदि देवी-देवताओं की पूजा होती थी। दान करना, यज्ञ करना, तीर्थ यात्राओं पर जाना, कीर्तन एवं रतजगा करना श्रेष्ण धार्मिक कर्त्तव्य माने जाते थे। मंदिर, प्याऊ एवं धर्मशाला बनाना, सदाव्रत बांटना, तालाब खुदवाना भी धार्मिक कर्म के रूप में प्रचलित थे।
अमावस्या एवं संक्रांति के अवसरों पर नदियों एवं तालाबों में स्नान करने का महत्व था। समाज में विभिन्न व्रत एवं उपवास भी प्रचलन में थे। वैष्णव धर्म के साथ-साथ शैव एवं शाक्त मत भी प्रचलन में थे। शाक्त लोग देवी को भैंसे एवं बकरे की बलि चढ़ाते थे। शैव धर्म की नाथ शाखा राजपूताने में विशेष रूप से सक्रिय थी।
राजपूताने के विभिन्न राज्यों में जैन धर्म का भी प्रभाव था। विभिन्न तीर्थंकरों के मंदिर बने हुए थे जिनमें पूजा होती थी। लोकदेवताओं की भी पूजा प्रचलन में थी। गोगा, पाबू, हड़बू, रामदेव, मल्लीनाथ, वीर तेजा, मांगलिया मेहा आदि लोक देवताओं की पूजा होती थी तथा उनके जन्मदिन एवं निर्वाण दिन पर मेले लगते थे।
संतों एवं गुरुओं को विशेष आदर दिया जाता था। समाज पर कबीर, दादू, रैदास, मीरां आदि संतों के भजनों का प्रभाव था। रामस्नेही सम्प्रदाय भी प्रसिद्ध हो गया था। मुस्लिम लोग इस्लाम को मानते थे। अजमेर एवं नागौर में सूफियों के बड़े केन्द्र स्थापित हो गये थे।
राजपूत राज्यों में समाज –सामाजिक एवं धार्मिक पर्व
मध्यकालीन राजपूताना में हिन्दुओं के समस्त छोटे-बड़े सामाजिक एवं धार्मिक पर्व मनाये जाते थे। होली, दीपावली, रक्षा बंधन, गणगौर, तीज, दशहरा, अक्षय तृतीया, नवरात्रि, प्रमुख त्यौहार थे। विभिनन त्यौहारों के अवसर पर मेलों का आयोजन किया जाता था। मुसलमानों में ईदुलफितर, ईदुलजुहा, बारा-बफात, मुहर्रम आदि मनाये जाते थे।
राजपूत राज्यों में समाज –सामाजिक बुराइयाँ
मध्यकालीन राजपूताने में सती प्रथा सबसे बड़ी सामाजिक बुराई थी। यह राजपूतों में अधिक प्रचलन में थीं। राजपूतों में पति के मरने पर उसकी पत्नियां प्रायः सती हो जाती थीं। कई बार अग्रवाल आदि वैश्य स्त्रियां भी सती होती थीं। किसी के मरने पर मृत्युभोज आयोजित किया जाता था। दहेज प्रथा किसी न किसी रूप में हर जाति एवं वर्ग में प्रचलित थी।
राजपूत परिवारों द्वारा अपनी पुत्रियों के विवाह के अवसर पर दास-दासी भी दहेज में दिये जाते थे। डाकन-प्रथा का बहुत ही बुरा प्रचलन था। किसी भी आयु की औरत को डाकन घोषित करके उसे जान से मार डाला जाता था। राजपूत जातियों में कन्या-वध का प्रचलन था।
राजपूत परिवारों में विवाह के अवसर पर चारणों, ढोलियों तथा भाटों को त्याग दिया जाता था। इस प्रथा को त्याग-प्रथा कहा जाता था। त्याग प्राप्त करने वाले, अपने जजमानों से झगड़ा करके अधिक से अधिक त्याग प्राप्त करने की चेष्टा करते थे। इस भय के कारण भी कन्या वध अधिक संख्या में होता था।
कुछ लोग लड़कियों से वेश्यावृत्ति करवाने, गृह दासी बनाने के लिये लड़कियों को खरीदते एवं बेचते थे। साधु लोग अपने चेले-चेली बनने के लिये भी लड़के-लड़कियां खरीदते थे। इसे चेला प्रथा कहते थे।
राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था प्राचीन हिन्दू जीवन शैली पर आधारित थी और अत्यंत सरल कार्यकलापों से युक्त थी। राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था प्राचीन हिन्दू जीवन शैली पर आधारित थी और अत्यंत सरल कार्यकलापों से युक्त थी। प्रजा से उनके द्वारा अर्जित किए जाने वाले धन पर राजा केवल उतना ही कर लेता था जितना कि उसे राज्य के संचालन के लिए आवश्यक होता था।
मध्यकाल में राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था जटिल नहीं हुई थी। कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग, खनिज उत्पादन, जंगल के साथ-साथ वाणिज्य एवं व्यापार भी उस काल की अर्थ व्यवस्था में प्रमुख योगदान देते थे।
कृषि
राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में राजा समस्त भूमि का सैद्धांतिक स्वामी था। व्यवहार में काश्तकार तब तक कृषि भूमि का स्वामी था जब तक वह लगान देता रहता था। राजा किसी को भी राज्य की भूमि जागीर, दान एवं अनुदान में दे सकता था। वह जागीर अथवा दान में दी हुई भूमि को वापस भी ले सकता था। राज्य की समस्त भूमि खालसा, जागीर, भोम, सासण के रूप में बंटी हुई थी।
खालसा भूमि पर राजा का प्रत्यक्ष नियंत्रण होता था। लगान निर्धारित करने तथा उसकी वसूली का काम राज्य के कर्मचारी करते थे। सामंतों एवं जागीरदारों को राजकीय सेवा के बदले में भूमि जागीर में दी जाती थी। ऐसी भूमि का बेचान अथवा हस्तांतरण राजा की स्वीकृति से ही हो सकता था।
भोमिया को दी गई जमीन भोम और ब्राह्मणों, भाटों, चारणों आदि को पुण्यार्थ दी गई भूमि सासण एवं माफी के नाम से जानी जाती थी। पशुओं के लिये रिक्त रखी गई भूमि चरणोत या गोचर कहलाती थी। इस पर पूरे गांव का अधिकार होता था।
भूमि की ऊर्वरता के आधार पर उसका श्रेणीकरण एवं वर्गीकरण किया गया था तथा उसी के आधार पर लगान अथवा भोग तय किया जाता था। एक चमड़े के पात्र (चड़स) से से सींची जाने वाली भूमि को कोशवाहक कहते थे। तालाब की भूमि को तलाई, नदी के किनारे वाली भूमि को कच्छ, कुएं के पास वाली भूमि को डीमडू, गांव के पास वाली भूमि को गोरमो, कहा जाता था।
उपज के हिसाब से भी भूमि के अलग-अलग नाम होते थे। सिंचाई वाली भूमि को पीवल, पानी से भरी हुई को गलत हांस, जोती जाने वाली भूमि को हकत-बहत, काली उपजाऊ भूमि को माल, पहाड़ी जमीन को मगरो, गांव से दूर की भूमि को कांकड़, बागवानी में प्रयुक्त भूमि को बाड़ी कहा जाता था।
भूमि के टुकड़ों को कातका या बतका कहते थे। खेती के लिये लोहे एवं लकड़ी के हल, कुदाल, फावड़ा, कस्सी एवं जेई आदि उपकरणों का प्रयोग होता था। हल खींचने का काम मुख्यतः बैल करते थे। ऊँटों से भी हल खींचा जाता था।
राजपूताना के राज्यों में सर्दी में होने वाली फसल को सियालू (रबी) एवं गर्मी में होने वाली फसल को उनालू (खरीफ) कहा जाता था। सियालू में गेहूं, जौ, चना तथा उन्हालू में बाजरा, ज्वार, मूंग, मोठ प्रमुखता से होते थे। मालवा से लगने वाले पठारी क्षेत्र में थोड़ा बहुत चावल, गन्ना, कपास एवं उड़द भी पैदा किया जाता था।
प्रतापगढ़ तथा माल की भूमि में अफीम भी पैदा होती थी। सिंचाई के साधन सीमित थे। तालाबों, कुंओं एवं नहरों के माध्यम से सिंचाई होती थी। कुंओं एवं बावड़ियों से रहट, चड़स अथवा ढीकली के माध्यम से पानी खींचकर खेतों में पहुंचाया जाता था।
खालसा भूमि में राजा की ओर से तथा जागीर भूमि में जागीरदार की ओर से भू-राजस्व वसूल किया जाता था। सामान्यतः उपज का एक तिहाई अथवा एक चौथाई कर वसूल किया जाता था। कर निर्धारण की अलग-अलग पद्धतियां प्रचलित थीं। इनमें से लाटा, कूंता, बंटाई आदि अधिक लोकप्रिय थीं।
मुगलों से सम्पर्क होने के बाद राहदारी, बाब, पेशकश, जकात, गनीम आदि अनेक नये कर प्रचलन में आ गये थे। अकाल में किसानों की हालत बहुत खराब हो जाती थी। मुगलों से सम्पर्क के बाद राजपूताना राज्यों में इजारेदारी प्रथा आरंभ हो गई थी।
इस प्रथा में राज्य द्वारा एक निश्चित अवधि के लिये एक निश्चित राशि के बदले में लगान वसूली का अधिकार किसी भी व्यक्ति को सौंप दिया जाता था। इसे मुकाता भी कहते थे। इजारा उस व्यक्ति को दिया जाता था जो इजारे की राशि की अधिक से अधिक बोली लगाता था।
उद्योग धंधे
राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में उद्योगों के लिए कच्चा माल, सस्ता श्रम तथा सस्ती खनिज सम्पदा राजपूताने में ही उपलब्ध थी। इस कारण तैयार माल अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता था। उस काल में सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, सूतली, सन की रस्सी, मूंझ की रस्सी टाटपट्टी, गलीचे, कम्बल, लकड़ी का सामान, मिठाई, कपड़ा, कागज, नमक, खार, सज्जी आदि के उद्योग अच्छे चलते थे।
उद्योगों का स्वरूप प्रायः कुटीर उद्योग था जिसमें परिवार के सब सदस्य मिलकर काम करते थे। भरतपुर, मारवाड़, जयपुर, बीकानेर, मेवाड़ आदि राज्यों में कई जगहों पर नमक बनता था।
सूती कपड़ा उद्योग
देलवाड़ा, पाली, सिरोंज, अजमेर, सांगानेर, आकोला, भरतपुर, उदयपुर, चित्तौड़, कोटा, कैथून, मांगरोल, बूंदी आदि स्थान सूत कातने, कपड़ा बुनने, रंगाई, छपाई और बंधाई के बड़े केन्द्र बन गये। कोटा में मलमल बनाने का काम होता था। यहां की चूंदड़ी और कसूमल पगड़ियां प्रसिद्ध थीं।
बूंदी राज्य में डोरिया, शैला, जोड़ा और अंगोछे बनते थे। मारवाड़ राज्य के मारोठ और जालोर परगनों में हाथ से कती और बुनी रेजी (गाढ़ा कपड़ा) बनता था। आम्बेर राज्य में सांगानेर और बगरू की छपाई एवं रंगाई प्रसिद्ध थी। कोटा की सुनहरी-रूपहरी छपाई एवं बारां की चूंदड़ी और पोमचा की बंधाई प्रसिद्ध थी। जयपुर और जोधपुर में भी बंधेज का काम होता था जिससे चूंदड़ी बनती थी।
ऊनी कपड़ा उद्योग
राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में जैसलमेर, मारवाड़, बीकानेर तथा शेखावाटी में ऊनी वस्त्र उद्योग उन्नत अवस्था में था।
लोहे का सामान
नागौर में मुलतान से आये कारीगर लोहे के हथियार, सुनारी एवं लुहारी के उपकरण, खेती के औजार, तराजू के बाट आदि बनाते थे। सिरोही में भी अच्छी तलवारें बनती थीं। बूंदी में कटार, उस्तरे, चाकू तथा तलवारें बनती थीं। जोधपुर, पाली और सोजत में भी लोहे की सामग्री बनती थी। पाली में लोहे के संदूक, कड़ाहियां और बड़े-बड़े कड़ाह बनते थे।
आभूषण उद्योग
जयपुर में हीरे-जवाहरातों से जड़े आभूषण एवं लाल रंग की मीनाकार का काम होता था। जोधपुर में आभूषणों की घड़ाई तथा पटवे का काम (आभूषणों को रेशमी एवं सूती डोरी से बांधने का काम) होता था। जोधपुर में हाथी दांत की चूड़ियां बनती थीं।
बर्तन उद्योग
जयपुर आदि कई नगरों में पीतल, ताम्बे, कांसे एवं लोहे के बर्तन बनते थे। जयपुर में पीतल के बर्तनों पर नक्काशी का काम बहुत सुंदर होता था। नागौर में पीतल के बर्तन बनते थे।
चर्म उद्योग
राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में चर्म उद्योग काफी विकसित अवस्था में था। चमड़े से मशक, जूते, तिरपाल, तम्बू, पैकिंग थैले, घोड़े की जीन, रस्से, चड़स आदि बनते थे जो देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ दूसरे देशों को निर्यात किये जाते थे। भीनमाल तथा जोधपुर आदि कई नगरों में जूतों पर कसीदाकारी की जाती थी।
काष्ठ उद्योग
राजपूताने के जंगलों में कई प्रकार की इमारती लकड़ी उपलब्ध होने से काष्ठ उद्योग भी विकसित अवस्था में था। लकड़ी के कृषि उपकरण, बैल गाड़ियां, ऊँट गाड़ियां, कोठियां, बक्से, पलंग, खाट एवं घर में काम आने वाली कई प्रकार की सामग्री बनती थी।
विविध उद्योग
राजपूताने के विविध नगरों में सुगन्धित तेल एवं इत्र बनाने का काम होता था। मुगलों के सम्पर्क के बाद इस काम में और तेजी आई। शरबत और शराब बनाने का उद्योग भी विस्तार पा चुका था। किशनगढ़, सांगानेर, जयपुर, जोधपुर आदि बहुत से स्थानों पर मोटा कागज बनता था। जयपुर एवं जोधपुर में लाख की चूड़ियां बड़े स्तर पर बनती थीं।
व्यापार एवं वाणिज्य
मध्यकाल में स्थानीय, अंतर्राज्यीय एवं अंतर्प्रादेशिक व्यापार खूब उन्नति कर गया था। विश्व के बहुत से देशों से विभिन्न सामग्री भारत लाई जाती थी और यहाँ से दूसरे देशों को ले जाई जाती थी। भारत की राजधानी दिल्ली तथा बहुत से उत्तरी राज्यों को दक्षिण में जाने के लिये राजपूताने से होकर निकलना पड़ता था। इस कारण राजपूताने के विभिन्न राज्यों में व्यापार एवं वाणिज्य की स्थिति बहुत अच्छी थी।
प्रमुख व्यापारिक मार्ग
उन दिनों में सड़कें पक्की नहीं होती थीं। कच्चे मार्गों पर यात्रा करना बहुत कठिन था। वर्षा एवं आंधी के कारण यात्रा बहुत थकाने वाली होती थी। डाकुओं और लुटेरों का खतरा भी बना रहता था। फिर भी पूरे देश में विभिन्न व्यापारिक मार्ग विकसित हो गये थे जिनमें से अनेक मार्ग राजपूताने के विभिन्न राज्यों से होकर निकलते थे।
दिल्ली-आगरा से गुजरात और मालवा होकर दक्षिण जाने वाले राज्य राजपूताना से होकर गुजरते थे। दिल्ली से अजमेर के लिये दो प्रमुख मार्ग थे। एक दिल्ली से आगरा, भरतपुर एवं आमेर होकर था और दूसरा दिल्ली से अलवर और आमेर होकर। अजमेर से अहमदाबाद के दो प्रमुख मार्ग थे।
एक अजमेर से माण्डलगढ़, चित्तौड़, उदयपुर तथा डूंगरपुर होकर था और दूसरा अजमेर से पुष्कर, पाली तथा पालनपुर होकर था। मुल्तान से अहमदाबाद का मार्ग भावलपुर, लोद्रवा तथा जैसलमेर होकर था। बीकानेर से अहमदाबाद का मुख्य मार्ग नागौर, मेड़ता, पाली और पालनपुर होकर था। दिल्ली से सिन्धु नदी का मुख्य मार्ग बीकानेर होकर था।
उदयपुर से बांसवाड़ा और डूंगरपुर होकर भी मालवा जाने का मार्ग था। जयपुर से उज्जैन का मार्ग सांगानेर, टोंक, बूंदी, कोटा और झालरापाटन होकर था। राजपूत राज्यों की समस्त राजधानियां सहायक मार्गों द्वारा प्रमुख मार्गों से जुड़ी हुई थीं। राजपूताने के प्रमुख व्यापारिक केन्द्र या तो मुख्य मार्गों पर स्थित थे अथवा सहायक मार्गों से सम्बन्न्धित थे। मुख्य तथा सहायक मार्गों पर व्यापारियों तथा अन्य यात्रियों की सुविधा के लिये सराय, कुएं तथा विश्राम स्थल बने हुए थे।
प्रमुख व्यापारिक केन्द्र
राजपूताना के आम्बेर राज्य में मालपुरा, सीकर और चिड़ावा, मारवाड़ में पाली, नागौर और भीनमाल, मेवाड़ में भीलवाड़ा, कमलमीर और रायपुर, बीकानेर राज्य में चूरू, नोहर और राजगढ़, कोटा राज्य में अंता, बारां और मांगरोल प्रमुख मण्डियां थीं। पाली नगर समस्त सम्पूर्ण भारत के प्रमुख व्यापारिक केन्द्रों में से था।
यहां भारत की बनी हुई वस्तुओं के साथ-सााथ अफ्रीका, यूरोप तथा चीन से भी सामान पहुंचता था। पाली के मार्ग से ही मालवा की अफीम चीन और पश्चिमी एशिया को निर्यात की जाती थी। अफीम से लदे हुए लगभग दो हजार ऊँट प्रति वर्ष पाली से होकर निकलते थे।
टीन के बक्सों में बंद किया हुआ यूरोप का माल भावनरगर एवं अन्य बंदरगाहों पर उतारकर पाली भेजा जाता था। व्यापारिक करों तथा राहदारी शुल्क द्वारा पाली मण्डी से मारवाड़ राज्य को प्रतिवर्ष अच्छी आय होती थी। बीकानेर राज्य के राजगढ़ में भी प्रमुख व्यापारिक केन्द्र विकसित हो गया था जहाँ विभिन्न दिशाओं से आने वाले व्यापारिक काफिले ठहरते थे।
कश्मीर, पंजाब, हांसी, हिसार आदि से माल आता था। दिल्ली की ओर से रेशम, चीनी, लोहा, तम्बाखू मालवा की ओर से अफीम, सिंध की ओर से गेहूँ, चावल, गुजरात की ओर से मसाले, टिन, दवाइयाँ, नारियल, हाथी दांत लेकर व्यापारी यहां से होकर गुजरते थे।
मुल्तान और शिकारपुर से जैसलमेर के मार्ग से छुआरा, गेहूँ, चावल, सूखे मेवे आदि आते थे। जैसलमेर- मुल्तान, शिकारपुर, हैदराबाद (सिन्ध), अमरकोट, खैरपुर, रौरी, बेकर अहमदपुर, भावलपुर आदि व्यावसायिक नगरों से जुड़ा हुआ था। पाली, नागौर, फलौदी, पोकरण, पूगल, बीकानेर, बाड़मेर, शिव, कोटड़ा, आदि नगरों से हुए हुए व्यापारी जैसलमेर पहुंचते थे।
जैसलमेर नगर के मध्य में पूंजीपति लोग व्यापारिक लेन-देन के लिये बनजारों से घिरे हुए रहते थे। वस्त्र, मिष्ठान, आभूषण आदि विभिन्न सामग्रियों के क्रय-विक्रय के अलग-अलग स्थान निर्धारित थे। जैसलमेर में विभिन्न दिशाओं से अनाज से लदे हुए ऊँट आते थे।
व्यापारिक परिवहन
राजपूताना के विभिन्न राज्यों से विविध प्रकार की सामग्री का दुनिया भर के देशों में निर्यात किया जाता था। इसके लिये राजपूताना से सामग्री खरीद कर व्यापारिक काफिले विभिन्न बंदरगाहों तक पहुंचते थे जहां से यह सामग्री अन्य देशों तक पहुंचती थी।
स्थलीय परिवहन के लिये बैलगाड़ियों, ऊँटों, ऊँट गाड़ियों, घोड़ों, टट्टुओं, गधों, हाथियों और रथों का उपयोग किया जाता था। व्यापारिक सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का काम बनजारे करते थे। एक सामान्य बनजारे के पास 200 से 500 तक मालवाहक पशु होते थे।
बड़े बनजारों के पास इनकी संख्या 2000 तक होती थी। बनजारों के काफिले को बालद कहा जाता था। राजपूत राज्यों के राजा एवं जागीरदार, व्यापारियों से कर एवं शुल्क लेकर उन्हें सुरक्षा प्रदान करते थे। अधिकांश व्यापारी अपने काफिलों के साथ चारणों को रखते थे क्योंकि उस काल में चारणों को अवध्य माना जाता था, उन्हें लूटा नहीं जाता था तथा आदर दिया जाता था।
इस कारण बहुत से लुटेरे चारणों का कहना मानकर काफिले को लूटे बिना ही चले जाते थे। व्यापारिक काफिलों के साथ सशस्त्र रक्षक भी चलते थे। फिर भी स्थानीय शासक अथवा जागीरदार से अभय प्राप्त किये बिना व्यापारिक परिवहन संभव नहीं था।
निर्यात
राजपूताना के विभिन्न राज्यों से कपास, सूती कपड़ा, छींट का कपड़ा, रंगा हुआ कपड़ा, चूंदड़ी का कपड़ा, चमड़ा, चमड़े की सामग्री, ऊन, ऊन से बने हुए कम्बल एवं गलीचे, रस्से, नमक, अफीम, भांग, गांजे, विभिन्न प्रकार के उपयोगी पशु तथा पशुओं की खालें, घी, तिलहन, तेल, अनाज आदि विभिन्न प्रकार की जिंसों का निर्यात किया जाता था। मुल्तानी मिट्टी तथा संगमरमर पत्थर भी बंदरगाहों तक पहुंचाये जाते थे।
सांभर झील से प्राप्त नमक सांभरी नमक कहलाता था। इसकी मांग उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा में अधिक थी। पचपद्रा का नमक कोसिया कहलाता था। इसकी मांग मध्यप्रदेश में अधिक थी। डीडवाना का नमक डीडू कहलाता था। इसकी मांग पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में थी। हाड़ौती तथा मेवाड़ में पोस्त की खेती की जाती थी।
इसके रस से अफीम तैयार की जाती थी। जैसलमेर, मारवाड़, बीकानेर तथा शेखावाटी के मरुक्षेत्रों में भेड़पालन बहुतायत से होता था। इन क्षेत्रों से ऊन, ऊनी कम्बल, ऊनी दरियां, ऊन के मोटे रस्से, जहाजों पर बिछाने के लिये मोटे ऊनी गलीचे निर्यात किये जाते थे। आम्बेर राज्य के मालपुरा से ऊनी टोपियां, ऊनी लोई (पतली ऊनी चद्ददर) और कम्बलों का निर्यात होता था। नागौर तथा ओसियां भी ऊन तथा ऊन से बनी सामग्री का बड़ी मात्रा में निर्यात होता था।
आयात
मध्यकाल में मालवा, पंजाब, कश्मीर तथा गुजरात आदि विभिन्न क्षेत्रों के बड़े व्यापारियों की दुकानें मारवाड़ के विभिन्न राज्यों में खुली हुई थीं, उसी प्रकार राजपूताने के व्यापारियों की दुकानें भारत के विभिन्न क्षेत्रों में खुली हुई थीं। इन दुकानों पर दुनिया भर की सामग्री बिकने के लिये आती थी।
समय-समय पर हाट बाजारों एवं मेलों का भी आयोजन होता था जिनमें समुद्रों के किनारे एवं पहाड़ी क्षेत्रों में पैदा होने वाली विभिन्न सामग्री यथा खजूर, सूखा मेवा, शराब, दाख, नारियल, नारियल की चटाइयां, मखमल, बुरहानपुरी साड़ियां, बनारसी साड़ियां, गुजराती रेशम, कश्मीरी शॉल, औरंगाबादी कपड़े, सारंगपुर की पगड़ियां, हाथी, घोड़े बिकने के लिये आते थे। इस सामग्री की राजपूताने में भारी मांग थी।
चुंगी एवं राहदारी
मध्यकाल में व्यापारिक आयात-निर्यात पर चुंगी तथा राहदारी लगती थी। विभिन्न राज्यों के महत्त्वपूर्ण स्थानों पर चुंगी चौकियां स्थापित की हुई थी। राज्य में उत्पादित माल जब राज्य की सीमा से बाहर जाता था तो उसे निकासू कहते थे। इस पर अधिक चुंगी देनी होती थी। इसे सायर कहते थे।
राज्यों की सीमा से गुजरने वाले सामान को बहतीवान कहा जाता था। इस पर बहुत कम शुल्क लगता था जिसे राहदारी कहते थे। राज्य में आने वाले माल को आमद कहा जाता था इस पर निकासू माल की अपेक्षा कम चंुगी लगती थी। इनके अतिरिक्त मापा, दलाली तथा परगना शुल्क भी लगता था।
जागीरदारों को भी शुल्क देना पड़ता था। हर राज्य में अपनी चुंगी पद्धति होती थी। अनाज आदि वस्तुओं पर प्रति बैल, ऊँट अथवा खच्चर पर लदे हुए बोझ के हिसाब से चुंगी ली जाती थी, न कि सामान के मूल्य के आधार पर। किराणा सम्बन्धी वस्तुओं पर भी सामान के वजन के हिसाब से चुंगी ली जाती थी। मनिहारी के सामान पर सामान के मूल्य के आधार पर चुंगी ली जाती थी।
मुद्रा
व्यापार एवं विपणन के लिये राजपूताने में मुद्रा का प्रयोग अत्यंत प्राचीन काल से होता आया है। मध्यकाल में विभिन्न राज्यों में विभिन्न प्रकार की मुद्राएं प्रचलित थीं। इनके आकार, तोल एवं मूल्य में भिन्नताएं थीं। महारणा कुंभा के समय से पहले भी राजपूताने में सोने, चांदी और ताम्बे के सिक्के प्रचलन में थे जिन्हें टक्का कहते थे।
इनका वजन चार माशा होता था। तुर्कों और मुगलों के समय में दिल्ली सल्तनत और मुगलों के सिक्के चलन में आ गये जिनको फिरोज आलमशाही, शालमशाही, नौरंगशाही और अकबरी सिक्के कहते थे। इनमें चांदी की मात्रा अधिक होती थी। उस समय में ताम्बे के पैसे को फदिया, ढीगला तथा ढब्बूशाही सिक्का कहा जाता था।
मुगल शासकों के समय में लगभग समस्त राजपूत राजाओं के पास सिक्का ढालने का अधिकार नहीं रहा किंतु मुगलों के कमजोर पड़ते ही समस्त राज्यों ने अपने-अपने सिक्के ढालने आरम्भ कर दिये। बड़े राज्यों में कुछ बड़े जागीरदारों को भी सिक्का ढालने की अनुमति दे दी गई।
मेवाड़ में सलूम्बर के जागीरदार को तथा मारवाड़ राज्य में कुचामन के जागीरदार को सिक्का ढालने का अधिकार दिया गया। समस्त राज्यों में राजपूताने के समस्त राज्यों के सिक्कों को स्वीकार किया जाता था किंतु उनकी विनिमय दर अलग-अलग होती थी तथा एक्सचेंज के बदले में सिक्के के वास्तविक मूल्य में से बट्टा काट लिया जाता था। विनिमय दर समय-समय पर घटती-बढ़ती रहती थी। इसका मूल कारण सट्टा होता था। साहूकारों द्वारा सिक्का विनिमय किये जाने के अवसर पर लोगों को ठगा जाता था।
हुण्डी
वस्तुओं के आयात-निर्यात का भुगतान हुण्डी प्रथा से होता था। इसे आज के बैंकरर्स चैक अथवा ड्राफ्ट की तरह समझा जा सकता है। जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर रुपयों की आवश्यकता होती थी तब हुण्डी के द्वारा भुगतान भेजा जाता था। इस राशि पर 16 प्रतिशत मासिक ब्याज देना होता था। हुण्डी प्रायः मुद्दती होती थी इस कारण उस पर ब्याज अधिक लिया जाता था।
ब्याज
उस अवधि में सामान्यतः 9 से 12 प्रतिशत ब्याज दर प्रचलित थी। साहूकार बढ़ी हुई दरों पर कर्ज देकर मूल से देकर मूल से भी अधिक ब्याज वसूल कर लेते थे। और गरीब किसाना का सर्वस्व लूट लेते थे। परंतु कहीं-कहीं आध रुपया तो कहीं एक रुपया प्रति सैंकड़ा के हिसाब से काटा लिया जाता था और कटवामिति ब्याज लिया जाता था। बड़े मंदिरों के पुजारी भी ब्याज पर रुपया उधार दिया करते थे।
निष्कर्ष
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में कई प्रकार के उद्योग धंधे विकसित अवस्था में थे जिसके कारण लोगों को रोजगार की विशेष कठिनाई नहीं थी तथा लोगों की आय भी संतोषजनक थी।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...