Tears of Red Fort is a historical serial originally written in Hindi by renowned historian Dr. Mohanlal Gupta under the title Lal Qila Ki Dard Bhari Dastaan.
There are two Red Forts in India. The first red fort is in Agra, which was built by Tomar Rajputs, centennials before Muslims came to India. Sikandar Lodi, Akbar and Shah Jahan renovated this fort.
Lodi Sultan Sikandar Lodi and Ibrahim Lodi and the Mughal emperors Babur, Humayun, Akbar, Jahangir, Shah Jahan and Aurangzeb stayed in this fort for a brief time. This fort had the biggest treasure of the Mughals, precious gems, gold and other valuable property. This fort also had the mint of the Mughals in which gold and silver coins were minted.
The second red fort is in Delhi which was built by Shah Jahan but unfortunately Shahjahan’s son Aurangzeb kept Shah Jahan captive in the Red Fort and Delhi’s Red Fort was now Aurangzeb’s territory.
In this series, that part of the history will be discussed which depicts Shah Jahan’s construction of Red Fort in Delhi, to the independence of India that took place in the patronage of Red Forts of Delhi and Agra. These two Red Forts became a symbol of the power of India during this period.
All the events in this series are drawn from authentic historical books. The images in the video are symbolic. Please understand this series as an historical event and enjoy it. We had no role in the events that took place.
We have only perceived history. Please enjoy the history. The history might not be according to your mind, you may not like it because a person always love those facts that he got to hear first. For this very reason, he later accepts the hearsay history as a lie. Viewer discretion is advised.
History is not understood by getting carried away in emotions, novel is understood. It is not a novel, it is history, a pure history that has the ability to purify the soul of a man.
Article by Dr. Mohan Lal Gupta, English Translation By Er. Ayush Dadhich, Video Presentation by Er. Dipti Tayal
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देशी रियासतों में प्रजातन्त्रीय व्यवस्था स्थापित करने के लिए स्थानीय राजनीतिक संस्थाओं ने आंदोलन चलाए। इस कारण कुछ राज्यों में लोकप्रिय सरकारें स्थापित हुईं किंतु देशी रियासतों में प्रजातन्त्रीय व्यवस्था इन रियासतों के विलीनीकरण के बाद ही स्थापित हो सकी।
भारतीय राज्यों का भारत मे सम्मिलित होना एक बड़ी सफलता थी। अब इन रियातसतों को लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के अंतर्गत लाना अनिवार्य था। सरदार पटेल ने भारतीय नरेशों को समझाया कि स्वतंत्र भारत में, आधुनिक विश्व की तरह देशी राज्यों में भी राजसत्ता का प्रयोग जनता के द्वारा एवं जनता के कल्याण के लिए ही होना चाहिए।
भारत सरकार ने राजाओं को यह चेतावनी भी दी कि वह किसी भी देशी रियासत में अशान्ति एवं अव्यवस्था को सहन नहीं करेगी। जब देशी रियासतों में प्रजा मण्डल आंदोलन चले तो देशी राज्यों में लोकप्रिय मंत्रिमण्डलों का गठन हाने लगा तथा देशी राज्यों में संविधानों का निर्माण होने लगा ताकि निर्वाचन पद्धति के आधार पर सरकारों का गठन किया जा सके।
सरदार पटेल चाहते थे कि देशी रियासतों के लोगों को भी भारतीय प्रांतों की प्रजा के समान आर्थिक, शैक्षणिक एवं अन्य क्षेत्रों में समान अवसर एवं सुविधाएं मिलें परन्तु अधिकांश देशी रियासतें आर्थिक दृष्टि से इतनी कमजोर एवं छोटी थीं कि वे अपने संसाधनों से प्रजा का विकास नहीं कर सकती थीं।
देशी रियासतों में प्रजातन्त्रीय व्यवस्था
अतः काफी विचार-विमर्श के बाद सरदार पटेल ने देशी राज्यों का एकीकरण करके बड़ी प्रशासनिक इकाइयां गठित करने का निर्णय लिया। उन्होंने दो प्रकार की पद्धतियों को प्रोत्साहन दिया- बाह्य विलय और आन्तरिक संगठन। बाह्य विलय में छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर अथवा पड़ौसी प्रान्तों में विलय करके बड़े राज्य बनाये गये। आन्तरिक संगठन के अन्तर्गत इन राज्यों में प्रजातन्त्रीय शासन व्यवस्था लागू की गई।
दिसम्बर 1947 में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के 39 राज्यों का उड़ीसा और मध्य प्रान्त में विलय हुआ। फरवरी 1948 में 17 दक्षिणी राज्यों को बम्बई प्रान्त के साथ मिलाया गया। जून 1948 में गुजरात तथा काठियावाड़ के समस्त राज्यों को बम्बई प्रदेश में सम्मिलित किया गया।
पूर्वी पंजाब, पाटियाला तथा पहाड़ी क्षेत्र के राज्यों को मिलाकर एक नया संघ बनाया गया जिसे पेप्सू कहा गया। इसी आधार पर मत्स्य संघ, विन्ध्य प्रदेश और राजस्थान का निर्माण किया गया। कुछ क्षेत्रों को केन्द्र प्रशासित क्षेत्र बनाया गया जिनका प्रशासन केन्द्र सरकार के हाथों में रखा गया।
स्वतन्त्रता के बाद भारत में चार प्रकार के राज्य बन गये (संविधान में ‘प्रान्त’शब्द हटा दिया गया और देशी रियासतों तथा प्रान्तों, दोनों के लिए ‘राज्य’शब्द का ही प्रयोग किया गया)। इन्हें क, ख, ग और घ श्रेणी के राज्य कहा गया।
‘क’ श्रेणी के अन्तर्गत भूतपूर्व ब्रिटिश प्रान्तों को रखा गया। इनकी संख्या 9 थी और नाम थे- असम, बिहार, बम्बई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बंगाल।
‘ख’ श्रेणी के अन्तर्गत कुछ संघ तथा बड़ी-बड़ी देशी रियासतों को रखा गया जिनकी संख्या 8 थी। ये थीं- हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पटियाला तथा पेप्सू, राजस्थान, सौराष्ट्र, ट्रावनकोर तथा कोचीन।
‘ग’ श्रेणी के अन्तर्गत अजमेर, भोपाल, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, विन्ध्य प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों को सम्मिलित किया गया। ‘घ’ श्रेणी के राज्यों में अण्डमान और निकोबार द्वीप को सम्मिलित किया गया।
‘क’ और ‘ख’ श्रेणी के राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी सरकार स्थापित की गई परन्तु ‘ग श्रेणी के राज्यों में कुछ नियंत्रित उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई। ‘घ श्रेणी के राज्यों की प्रशासन व्यवस्था केन्द्र के अधीन रखी गई। इस प्रशासनिक असमानता के अतिरिक्त अन्य समस्त विषयों में समस्त राज्यों के साथ समानता का व्यवहार किया गया।
देशी रियासतों के विलय से भारत में एक शक्तिशाली संघ की स्थापना हो गई। यह काम जिस शान्ति एवं शीघ्रता से सम्पन्न हुआ, उसकी आशा किसी को नहीं थी।
सितम्बर 1948 में पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था– ‘यदि मेरे से कोई व्यक्ति 6 महीने पूर्व ये पूछता कि अगले 6 महीनों मे क्या होगा, तो मैं भी यह नहीं कह सकता था कि अगले 6 महीनों में इतने शीघ्र परिवर्तन होंगे।’
इस परिवर्तन का श्रेय सरदार वल्लभ भाई पटेल को जाता है जिन्होंने अथक परिश्रम एवं सूझबूझ के साथ भौगोलिक, राजनैतिक एवं आर्थिक दृष्टि से भारत के एकीकरण को पूर्ण कर दिखाया।
भारत के एकीकरण के महत्त्व की समीक्षा करते हुए माइकल ब्रीचर ने लिखा है- ‘केवल एक वर्ष में 5 लाख वर्ग मील क्षेत्र और 9 करोड़ आबादी भारतीय संघ में मिल गई। यह एक महान् रक्तहीन क्रान्ति थी जिसकी तुलना कहीं भी इस शताब्दी में नहीं मिलती और इसकी तुलना उन्नीसवीं शताब्दी में बिस्मार्क द्वारा जर्मनी में और काबूर द्वारा इटली में किये हुए एकीकरण से की जा सकती है।’
जार्ज षष्ठम् द्वारा संतोष की अभिव्यक्ति
भारत के एकीकरण पर संतोष व्यक्त करते हुए जॉर्ज षष्ठम् ने लिखा है- ‘मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि लगभग समस्त भारतीय राज्यों ने किसी न किसी उपनिवेश में सम्मिलित होने का निर्णय कर लिया है। वे संसार में कभी भी अकेले खड़े नहीं हो सकते थे।’
जार्ज षष्ठम् 11 दिसम्बर 1936 से 1952 तक इंग्लैण्ड का राजा रहा। उसके समय में ही कॉमनवैल्थ की स्थापना हुई जिसका वह प्रथम अध्यक्ष बना। इस संस्था में उन देशों को सदस्यता दी जाती थी जो कभी भी इंग्लैण्ड के अधीन रहे थे।
राजाओं के नष्ट होने के कारण
कतिपय इतिहासकारों ने लिखा है कि राजा लोगों के नष्ट होने के तीन कारण थे- एक तो वे राष्ट्रवादी थे, दूसरे वे कायर थे तथा तीसरा कारण यह था कि उनमें से अधिकांश मूर्ख थे और अपने ही पापाचार में नष्ट हो गये।
भारत में ब्रिटिश शासन के सर्वोच्च अधिकारी समय-समय पर अलग-अलग पदनामों से नियुक्त होकर आते रहे। इस सूची में बंगाल के गवर्नर से लेकर अंतिम क्राउन रिप्रजेंटेटिव तक के नाम दिए गए हैं।
बंगाल के गवर्नर(ई.1757 -1765)
ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा ई.1757 में प्लासी युद्ध की विजय से लेकर ई.1773 तक बंगाल के गवर्नर भारत में ब्रिटिश शासन के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए।
रॉबर्ट क्लाइव 1757-1760
हॉलवेल 1760
वैन्सीटार्ट 1760-65
रॉबर्ट क्लाइव (दूसरी बार) 1765-67
वेरेलस्ट 1767-69
कार्टियर 1769-72
वारेन हेस्टिंग्ज 1772-73
बंगाल के गवर्नर जनरल(ई.1773-1833)
लंदन की सरकार द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए ई.1773 में रेग्यूलेटिंग एक्ट लागू किए जाने के बाद बंगाल के गवर्नर जनरल भारत में ब्रिटिश शासन के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए।
वारेन हेस्टिंग्ज 1773-85
सर जॉन मेकफर्सन 1785-86
अर्ल (मार्क्विस) कार्नवालिस 1786-93
सर जॉन शोर 1793-1798
सर ए. क्लार्क माच-मई 1798
मारक्विस वेलेजली 1798-1805
मार्क्विर्स कार्नवालिस (दूसरी बार) 1805
सर जार्ज बार्लो 1805-07
बेरोन (अर्ल ऑफ मिण्टो) प्रथम 1807-13
मार्क्विर्स ऑफ हेस्टिंग्स (अर्ल ऑफ मोयरा) 1813-23
जॉन एडम्स जनवरी-अगस्त 1823
बेरोन (अर्ल) एमहर्स्ट 1823-1828
विलियम बटरवर्थ बैले मार्च-जुलाई 1828
लॉर्ड विलियम कैवेण्डिश बैण्टिक 1828-1833
भारत के गवर्नर जनरल (ई.1833-1858)
ब्रिटिश सरकार द्वारा चार्टर एक्ट 1833 लागू किए जाने के बाद भारत में ब्रिटिश शासन के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में गवर्नर जनरल ऑफ इण्डिया की नियुक्ति की जाने लगी।
लॉर्ड विलियम कैवेण्डिश बैण्टिक 1833-1835
सर चार्ल्स मेटकाफ 1835-36
बेरौन (अर्ल ऑफ) आकलैण्ड 1836-42
बेरौन (अर्ल ऑफ) एलनबरो 1842-44
सर हेनरी (विस्काउंट) हार्डिंग- 1844-48
अर्ल (मार्क्विस) डलहौजी 1848-56
विस्काउण्ट (अर्ल ऑफ) केनिंग 1856-58
गवर्नर जनरल एवं वायसरॉय(ई.1858-1936)
ईस्वी 1858 में लंदन की गोरी सरकार ने भारत से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन समाप्त करके भारत को ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर लिया। इसके बाद ई.1858 में महारानी विक्टोरिया की घोषणा के अनुसार भारत में गवर्नर जनरल एवं वायसरॉय भारत में ब्रिटिश शासन के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए।
विस्काउण्ट (अर्ल ऑफ) केनिंग 1858-62
अर्ल ऑफ एल्गिन प्रथम 1862-63
सर रॉबर्ट नेपियर 1863
सर विलियम टेनिसन 1863
सर जॉन (लॉर्ड) लॉरेन्स 1864-68
अर्ल ऑफ मेयो 1869-72
सर जॉन सट्रैचे 1872
लॉर्ड नेपियर ऑफ मर्चिस्टाउन 1872
बेरौन (अर्ल ऑफ) नॉर्थबु्रक 1872-76
बेरौन (अर्ल ऑफ) लिटन 1876-80
मार्क्विस ऑफ रिपन 1880-84
अर्ल ऑफ डफरिन 1884-88
मार्क्विस ऑफ लैन्सडाउन 1888-94
अर्ल ऑफ एल्गिन द्वितीय 1894-98
बेरौन (अर्ल) कर्जन ऑफ कैडलेस्टन 1809-1904
लॉर्ड एम्पथिल अप्रेल-दिसम्बर 1904
बेरौन (अर्ल) कर्जन ऑफ कैडलेस्टन (दूसरी बार) 1904-1905
अर्ल ऑफ मिण्टो द्वितीय 1905-10
बैरोन हार्डिंग्ज ऑफ पेन्शुर्स्ट 1910-16
बैरोन चैम्सफोर्ड 1916-21
अर्ल ऑफ रीडिंग 1921-25
लॉर्ड लिटन द्वितीय 1925-26
लॉर्ड इरविन 1926-31
अर्ल ऑफ वैलिंगडन 1931-36
सर जॉर्ज स्टैनले 1936
मार्क्विस ऑफ लिनलिथगो 1936-1936
गवर्नर जनरल एवं क्राउन रिप्रजेण्टेटिव (ई.1936-1947)
ईस्वी 1936 में लंदन की सरकार द्वारा गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट 1935 लागू किए जाने के बाद गवर्नर जनरल एवं क्राउन रिप्रजेण्टेटिव भारत में ब्रिटिश शासन के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए। क्राउन रिप्रजेण्टेटिव के रूप में उसे वायसराय भी कहा जाता था।
मार्क्विस ऑफ लिनलिथगो 1936-1944
लॉर्ड वैवेल 1944-47
लॉर्ड माउण्टबेटन 1947-47
स्वाधीन भारत के गवर्नर जनरल (ई.1947-48)
ईस्वी 1947 में भारत के स्वाधीन होने पर भारत के गवर्नर जनरल की नियुक्ति की गई। वह भारत सरकार का सर्वोच्च अधिकारी था। इसलिए अब वह क्राउन रिप्रजेंटेटिव अथवा वायसराय के स्थान पर केवल गवर्नर जनरल कहलाने लगा।
मुगलकालीन स्थापत्य कला भारत के मध्यकालीन इतिहास की विभिन्न प्रवृत्तियों को जानने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। मुगल शासक भारत में विध्वसंक आक्रांताओं के रूप में आए थे। इस कारण उन्होंने भारत के मूल स्थापत्य का विध्वंस करके उनके ऊपर ही नई संरचनाओं क निर्माण करवाया।
मुगलकालीन स्थापत्य कला
1221 ई. से लेकर 1526 ई. तक मंगोल आक्रमणकारियों की कई लहरें भारत में आईं। इस दौरान वे विदेशी आक्रांता बने रहे। वे विध्वंस के लिये कुख्यात थे। प्रारंभ के मंगोल आक्रांता इस्लाम के शत्रु थे। इस कारण प्रारम्भ में वे भारत के मुस्लिम शासकों को नष्ट करने के लिये उद्देश्य से प्रेरित होकर आक्रमण करते थे।
बाद के काल में मंगोलों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। अब वे भी भारत से कुफ्र को नष्ट करने के लिये आक्रमण करने लगे। मंगोलों ने भारत आक्रमणों के दौरान भारत की कला, स्थापत्य, साहित्य एवं संस्कृति को भयानक क्षति पहुँचाई। 1526 ई. में जब बाबर ने दिल्ली एवं आगरा पर शासन स्थापित किया तो मंगोल विदेशी नहीं रह गये।
अब उन्हें यहाँ से कहीं नहीं जाना था इसलिये उनके द्वारा किया जाने वाला विध्वंस बड़ी सीमा तक रुक गया किंतु विध्वंसकारी प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। बाबर के सेनापति मीर बांकी अथवा अबुलबकी ने अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि पर स्थित अत्यंत प्राचीन राम मंदिर को नष्ट करके उस पर मस्जिद खड़ी की। विंध्वस का यह सिलसिला औरंगजेब तथा उसके बाद भी चलता रहा।
प्राचीन भारतीय स्थापत्य और मुस्लिम स्थापत्य के सम्मिश्रण से भवन निर्माण की जो शैली, सल्तनत काल में आरम्भ हुई, वह मुगलों के शासन काल में भी निरन्तर विकसित होती रही। इसलिये मुगलकालीन इमारतों पर हिन्दू और मुस्लिम वास्तुकलाओं के सम्मिश्रण का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
औरंगजेब को छोड़कर समस्त मुगल शासक स्थापत्य कला के प्रेमी थे। अकबर के समय में ईरानी तथा भारतीय कला के सम्मिश्रण से एक नई शैली विकसित हुई जिसे मुगल स्थापत्य शैली कहते हैं।
मुगल स्थापत्य कला पर भारतीय एवं ईरानी प्रभाव
बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि मुगल स्थापत्य शैली में भारतीय स्थापत्य की प्रधानता है। हेवेल ने लिखा है- ‘मुगल शैली विदेशी तथा देशी शैलियों का सम्मिश्रण प्रदर्शित करती है। भारतीय शैली अनुपम थी और उसमें विदेशी तत्त्वों को मिलाने की अलौकिक शक्ति थी।’
सर जान मार्शल ने लिखा है- ‘मुगल शैली के विषय में यह निश्चय करना कठिन है कि उस पर किन तत्त्वों का प्रभाव अधिक था।’ फर्ग्यूसन तथा कुछ अन्य विद्वानों का विश्वास है कि मुगल कला, पूर्व-मुगलकाल की कला का परिवर्तित और विकसित रूप थी।’
अर्थात् भारतीय कला को विदेशी कला से प्रेरणा प्राप्त हुई थी और विदेशी कला ने भारतीय कला को प्रभावित किया था।
निष्कर्ष
विदेशी विद्वान भले ही कुछ भी कहें किंतु वास्तविकता यह है कि मुगलकाल में अकबर के राज्यारोहण तक भारतीय कला पर ईरानी प्रभाव अधिक रहा किन्तु अकबर के काल में भारतीय कला परम्परा को ईरानी आदर्श के हित में अपना लिया गया। अकबर के शासन के अन्तिम वर्र्षोें में विदेशी तथा भारतीय तत्त्व ऐसे घुल-मिल गये कि भारतीय अथवा ईरानी कला के पृथक् अस्तित्त्व का पता लगाना कठिन हो गया।
बाबर कालीन स्थापत्य कला
बाबर स्थापत्य कला का पारखी था। उसे तुर्की और अफगानी सुल्तानों द्वारा बनवाई गई दिल्ली और आगरा की इमारतें पसन्द नहीं आईं। वह ग्वालियर में राजा मानसिंह और विक्रमजीत के महलों की स्थापत्य शैली से अत्यधिक प्रभावित हुआ। बाबर का मानना था कि भले ही ये महल भिन्न-भिन्न टुकड़ों में तथा बिना किसी नियमित योजना के बने थे फिर भी वे बेजोड़ थे।
ग्वालियर के महल हिन्दू कला के सुन्दर उदाहरण थे। जब बाबर ने अपने लिये महल बनवाये तब उसने ग्वालियर के महलों का अनुकरण किया। बाबर के महल बहुत कमजोर बने थे जो अधिक समय तक टिके नहीं रह सके। बाबर को मस्जिद तथा उपवन निर्माण में बड़ी रुचि थी।
उसने अयोध्या में रामजन्म भूमि पर बाबरी मस्जिद, आगरा के लोदी किले में जामा मस्जिद तथा पानीपत में काबुली बाग मस्जिद बनवाई। बाबर ने कश्मीर में निशात बाग, लाहौर में शालीमार बाग तथा पंजाब में पिंजोर बाग बनवाया। वह राजपूताने की सीमा पर ऐसे भवन बनवाना चाहता था जो गर्मियों में भी ठण्डे रहें।
बाबर के आदेश से आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा अन्य नगरों में अनेक भवनों का निर्माण किया गया। बाबर के समय बनी इमारतों में से अब केवल दो शेष बची हैं-
(1.) पानीपत के काबुली बाग की मस्जिद तथा
(2.) संभल की जामा मस्जिद।
1526-27 ई. में निर्मित ये दोनों मस्जिदें काफी विशाल थीं किंतु इनमें कोई शिल्प-सौन्दर्य नहीं है। अयोध्या में रामजन्म भूमि पर निर्मित बाबरी मस्जिद को 1992 ई. में जन-आंदोलन के दौरान तोड़ दिया गया। संभल की जामा मस्जिद वस्तुतः भगवान विष्णु के अत्यंत प्राचीन मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। हिन्दू इसे फिर से प्राप्त करने एवं इसका उद्वार करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं।
हुमायूँ कालीन स्थापत्य कला
हुमायूँ कला-प्रेमी शासक था। उसने दिल्ली में दीनपनाह नामक महल बनवाया। यह महल अत्यन्त शीघ्रता में बना था जिसमें सुन्दरता तथा मजबूती का ध्यान नहीं रखा गया। संभवतः शेरशाह सूरी ने इस महल को नष्ट कर किया। हुमायूँ ने आगरा तथा फतेहाबाद (हिसार) में फारसी शैली पर एक-एक मस्जिद बनवाई। इनमें कला तथा मौलिकता के कोई लक्षण नहीं थे। अब इनके खण्डहर ही शेष रह गये हैं। हुमायूँ के समय की कोई कलात्मक इमारत शेष नहीं बची है।
अकबरकालीन स्थापत्य कला
बाबर तथा हुमायूँ ने भविष्य के मुगल शासकों के लिये इमारतें बनवाने की परम्परा स्थापित की जिससे दिल्ली में अच्छी इमारतें बनने लगीं। अकबर का शासन काल जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के सम्मिश्रण और समन्वय का काल था। इस कारण उसके समय में स्थापत्य एवं भवन निर्माण में भी सम्मिश्रण की नई शुरुआत हुई।
अकबर द्वारा निर्मित भवनों में ईरानी तथा भारतीय तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं पर इनमें प्रधानता भारतीय तत्त्वों की ही है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि मुगल कला का आरम्भ अकबर से ही मानना चाहिये। अबुल फजल का कथन है- ‘बादशाह सुन्दर इमारतों की योजना बनाता है और अपने मस्तिष्क एवं हृदय के विचार को पत्थर और गारे का रूप देता है।’
अकबर ने तत्कालीन शैलियों की बारीकी को समझा और अपने शिल्पकारों को इमारतें बनाने के लिए नये-नये विचार दिये। अकबर के काल में स्थापत्य कला की जो नई शैली विकसित हुई, वह वास्तव में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय थी।
हुमायूँ का मकबरा
अकबर के शासनकाल की सबसे पहली इमारत दिल्ली में स्थित हुमायूँ का मकबरा है जिसे अकबर की सौतेली माँ हाजी बेगम ने बनवाया था। हाजी बेगम ईरानी आदर्शों से प्रभावित थी। इस मकबरे के निर्माण में अनेक भारतीय शिल्पकारों ने भी काम किया इसके कारण यह मकबरा ईरानी आदर्शों की भारतीय अभिव्यक्ति बन गया।
इस इमारत का नीचे का भाग हिन्दू-मुस्लिम वास्तुकला शैली का तथा ऊपरी भाग ईरानी शैली का है। इस इमारत की कुर्सी ऊँची है जिसमें समरूपता का ध्यान रखा गया है। इसका मेहराबयुक्त विशाल मण्डप ईरानी शैली का तथा सुन्दर छतरियों वाले कलात्मक मण्डप भारतीय शैली के हैं। इसका गुम्बद सफेद संगमरमर का है जबकि शेष इमारत में सफेद और काले संगमरमर के साथ-साथ लाल बलुआ पत्थर का भी प्रयोग हुआ है।
आगरा का लाल किला
अकबर कालीन स्थापत्य शैली का सबसे सुन्दर एवं पहला नमूना आगरा का लाल किला है। इस किले की साधारण रूपरेखा मानसिंह द्वारा बनवाये गये ग्वालियर के किले से मिलती-जुलती है। आगरा का किला लगभग डेढ़ मील के घेरे में स्थित है। यह पूर्णतः लाल रंग के गढ़े हुए पत्थरों से निर्मित है। इसकी दीवारें लगभग 70 फुट ऊँची हैं।
किले के दो मुख्य द्वार हैं जिनमें से एक पश्चिम की ओर स्थित है। इसका नाम दिल्ली द्वार या हाथी द्वार है क्योंकि यह दिल्ली जाने वाले मार्ग की तरफ खुलता था तथा इसके मेहराब पर हाथियों की दो आकृतियां थीं। दूसरा द्वार इससे छोटा है जो अमरसिंह द्वार कहलाता है।
आजकल दर्शक किला देखने के लिये इसी द्वार से प्रवेश करते हैं। प्रवेश द्वार के ऊपरी भाग की सजावट बहुत अच्छी है। मेहराबों और पैनलों पर सफेद संगमरमर जड़कर सुन्दर डिजायनें बनाई गई हैं। दरवाजे की बनावट में कोई कलात्मकता नहीं है।
किले की चारदीवारी के भीतर अकबर ने 500 से भी अधिक इमारतें बनवाई थीं। ये समस्त इमारतें लाल पत्थर से बनवाई गई थीं। अकबर की बनवाई हुई इन इमारतों में से कई इमारतों को शाहजहाँ ने गिरवाकर उनके स्थान पर सफेद संगमरमर के मण्डप बनवाये।
अकबरी महल और जहाँगीरी महल: आगरा के लाल किले में अकबर द्वारा निर्मित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इमारतें- अकबरी महल और जहाँगीरी महल हैं। ये दोनों महल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। अकबरी महल में बंगाली बुर्ज बने हुए हैं। जहाँगीरी महल शाहजादा सलीम के रहने के लिये बनवाया गया था।
जहाँगीरी महल में कई स्तम्भ हैं। इनमें कड़ियों और जालियों द्वारा सजावट की गई है। यह पूर्णतः हिन्दू कला से प्रभावित है। दोनों महलों के बीच में चौकोर आँगन है तथा चारों ओर दुमंजिले कमरे बने हुए हैं।
लाहौर का किला
अकबर द्वारा निर्मित लाहौर का किला आगरा के किले के समान है। लाहौर के किले की इमारतें आगरा के किले के जहाँगीरी महल के समान हैं। अन्तर यह है कि लाहौर के किले की सजावट आगरा के किले की अपेक्षा अधिक घनी है। तोड़ों में हाथी और सिंहों की मूर्तियाँ और छत के नीचे कारनिस में मोरों के चित्रों को देखकर अनुमान लगाया जाता है कि इसके अधिकतर शिल्पकार हिन्दू थे और मुगल अधिकारियों का दृष्टिकोण सहिष्णुतापूर्ण था।
इलाहाबाद का किला
अकबर द्वारा निर्मित इलाहाबाद का किला खण्डहर प्रायः हो गया है। उसकी अनेक इमारतें नष्ट हो गई हैं। केवल जनाना भवन ही शेष बचा है।
फतेहपुर सीकरी की इमारतें
अकबर कालीन स्थापत्य की सफलतम इमारतें फतेहपुर सीकरी में देखी जा सकती हैं। फतेहपुर सीकरी, आगरा से 23 मील दक्षिण-पश्चिम में एक ढालू पहाड़ी पर स्थित है। इस नगर के तीन ओर दीवारें और एक ओर कृत्रिम झील थी। यह नगर 1569 ई. से 1580 ई. के बीच 11 वर्र्षोें में बनकर तैयार हुआ।
अबुल फजल ने लिखा है- ‘चूंकि अकबर के श्रेष्ठ पुत्रों- सलीम और मुराद ने सीकरी में जन्म लिया था और शेख सलीम (एक मुस्लिम संत जिसके आशीर्वाद से सलीम का जन्म हुआ था) की दिव्य ज्ञान युक्त आत्मा उनमें प्रवेश कर गई थी, इसलिये अकबर के पवित्र हृदय में इस आध्यात्मिक वैभव से परिपूर्ण स्थान को भौतिक वैभव प्रदान करने की इच्छा थी……(इसीलिये) आदेश हुआ कि प्रमुख कारीगर बादशाह के निजी उपयोग के लिये अट्टालिकाओं का निर्माण करें।’
फतेहपुर सीकरी की इमारतों में जोधाबाई का महल, बीबी मरियम का महल, तुर्की सुल्ताना का महल, बीरबल का महल, पंचमहल, दीवाने खास, दीवाने आम, जामा मस्जिद, शेख सलीम चिश्ती की मजार, ख्वाबगाह, बुलंद दरवाजा आदि मुख्य हैं।
जोधाबाई का महल
जोधाबाई का महल फतहपुर सीकरी के महलों में सबसे पुराना है। इस महल की बनावट न तो मुस्लिम स्थापत्य शैली की है और न हिन्दू स्थापत्य के अनुसार। वास्तव में यह इमारत अपने समय की मिली-जुली शैलियों की है। इसकी बनावट आगरा के जहाँगीरी महल के समान है। इसकी छत बहुत सुन्दर एवं सजीव है और इसमें तराशे हुए पत्थरों का उपयोग हुआ है।
बीबी मरियम की कोठी
इसका असली नाम सुनहरी मकान है। इसकी भीतरी तथा बाहरी दीवारों पर सुनहरे पत्थर जड़े थे। इसमें संगतराशी का अच्छा काम किया गया था। महल के भीतरी भाग में मुगल शैली के कुछ सुन्दर चित्र बनाये गये थे जो अब नष्ट हो गये हैं। स्मिथ ने इन चित्रों को ईसाई धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबिल पर आधारित बताया है परन्तु इसमें पंखवाली शवीहें दिखाई गई हैं, जो ईरानी देवमाला पर आधारित हैं। इनकी शक्ल फरिश्तों के समान हैं।
तुर्की सुल्ताना का महल
तुर्की सुल्ताना का महल फतेहपुर सीकरी की इमारतों में सबसे अच्छा माना जाता है। इसकी निर्माण शैली तथा पत्थरों की बनावट सुन्दर एवं सजीव है। इसके बारे में रशब्रुक विलियम ने लिखा है- ‘यहाँ अकबर के शासनकाल की चित्रकारी बहुत ही सुन्दर है। इसके अतिरिक्त यह महल संगतराशी का अच्छा उदारहण है। इसकी दीवारों पर जंगल, पेड़-पौधे, झाड़ियों आदि के दृश्य बहुत ही सुन्दर ढंग से बने हैं। झाड़ियों में शेर और पेड़ों पर मोर बैठे दिखाई देते हैं।’
राजा बीरबल का महल
राजा बीरबल का महल भी स्थापत्य कला की विशेषताओं के कारण सुन्दर लगता है। यह महल काफी ऊँची कुर्सी पर बना हुआ है। सीकरी की समस्त इमारतों में यही इमारत ऐसी है जिसका गुम्बद सुन्दर दिखाई देता हैं। मुस्लिम स्थापत्य कला में इसका विशेष स्थान हैं।
पंचमहल
पंचमहल भी फतहपुर सीकरी की सबसे सुन्दर इमारतों में से है। इसकी नीचे की मंजिलें बड़ी और फिर उससे ऊपर की मंजिलें छोटी हैं। सबसे ऊपर चौखूंटे खम्भों पर टिकी हुई एक सुन्दर छतरी है। नीचे की मंजिल में 56 सतून हैं और उन पर नक्काशी का काम किया गया है परन्तु हर खम्भे की नक्काशी अलग है।
कहीं पर जैन स्थापत्य कला शैली की विशेषतायें हैं, कहीं पर हिन्दू स्थापत्य कला शैली की विशेषतायें तो कहीं पर मुस्लिम स्थापत्य कला की विशेषतायें हैं। ये सुन्दरता के साथ-साथ समन्वय का अच्छा वातावरण भी प्रस्तुत करती हैं। नीचे की मंजिलों पर हिन्दू स्थापत्य कला शैली की छाप अधिक है। सजावट तथा सुन्दरता के लिये घण्टियों तथा जंजीरों की बेलों का ढंग से प्रयोग हुआ है।
दीवाने खास
फतेहपुर सीकरी में अकबर का दीवाने खास अनेक विशेषताओं से युक्त है। यहाँ न अच्छी संगतराशी है और न सुन्दर सजावट परन्तु सादा होने पर भी यह इमारत बहुत ही प्रभावशाली है। इस इमारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बनावट है जो कलाकारी का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इसके मध्य का सतून अत्यन्त सुन्दर ढंग से बना है जिसकी नक्काशी देखने योग्य है। इसी सतून के ऊपर शाही तख्त रखा रहता था जिसको रोकने के लिए बहुत सी नक्शदार छतगीरियाँ हैं। सिंहासन तक पहुँचने के लिये चारों कोनों से छज्जों के रूप में चार मार्ग बनाये गये हैं। इसका निर्माण हिन्दू स्थापत्य के अनुसार हुआ है।
जामा मस्जिद
कुछ विद्वानों के अनुसार फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद केवल दीन-ए-इलाही के अनुयायियों के लिये थी। मस्जिद के मध्य भाग में शेख सलीम चिश्ती की मजार बनी हुई है। इसको अकबर ने लाल पत्थर से बनवाया था। इसमें बहुत ही सुन्दर जालियों का प्रयोग हुआ है। इसे मुगल स्थापत्य कला का एक सुन्दर नमूना कहा जाता है। जहाँगीर ने इसे संगमरमर का बनवा दिया। इसमें सीप का बहुत अच्छा काम हुआ है।
ख्वाबगाह
ख्वाबगाह के नाम से प्रसिद्ध इमारत दो मंजिली है। ऊपर की मंजिल में एक छोटा कमरा है जो अकबर का शयनागार था। इसकी दीवारों पर अनेक चित्र अंकित थे। इन चित्रों में महात्मा बुद्ध, मेरी तथा शिशु रूप में ईसा मसीह के चित्र थे तो आखेट तथा नदी-नालों के दृश्य भी बने हुए थे जो अब धूमिल हो गये हैं। अबुल फजल और फैजी के भवन भी सुन्दर रहे होंगे परन्तु अब वे अच्छी दशा में नहीं हैं।
बुलन्द दरवाजा
फतहपुर सीकरी की जामा मस्जिद में जनसाधारण के प्रवेश के लिये बना दक्षिण दिशा का द्वार बुलन्द दरवाजा कहलाता है। यह भारत में बना सबसे ऊँचा दरवाजा है। यह भी माना जाता है कि विश्व में इतना बड़ा दरवाजा और कहीं नहीं है। कहा जाता है कि यह दरवाजा अकबर की दक्षिण विजय के उपलक्ष्य में बनाया गया था परन्तु ऐतिहासिक तथ्य इसकी पुष्टि नहीं करते।
स्थापत्य कला के विद्वानों की दृष्टि में यह दरवाजा हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य कला शैलियों का सुन्दर सम्मिश्रण है। यह दरवाजा लाल पत्थर से बनाया गया जिस पर कोई रंग नहीं चढ़ाया गया। इस पर नक्काशी का बहुत सुन्दर काम हुआ है तथा संगमरमर की सुन्दर एवं सजीव पच्चीकारी की गई है।
पर्सा ब्राउन के शब्दों में- ‘बुलन्द दरवाजा एक प्रभावशाली निर्माण कार्य है, विशेषकर तब जबकि यह जमीन पर खड़ा होकर देखा जाये। तब यह उत्तेजक एवं विस्मयकारक शक्ति का रूप दिखाई देता है किन्तु इसका प्रभाव भार-स्वरूप तथा दिखावटी नहीं प्रतीत होता।’
अकबर द्वारा निर्मित अन्य भवन
अकबर ने अटक का किला, मेड़ता और अजमेर की मस्जिदें तथा अन्य स्थानों के किले इत्यादि अनेक सुन्दर इमारतें बनवाई थीं। सिकन्दरा में स्थित अकबर का मकबरा का नक्शा अकबर ने बनाया था। इसे जहाँगीर ने पूरा करवाया।
राष्ट्रीय स्थापत्य कला शैली
फतेहपुर सीकरी की अकबर कालीन समस्त इमारतें हिंदू-मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य शैली की हैं। इनमें हिन्दू कला की प्रधानता है। इनमें से कुछ की सजावट, जैसे- दीवाने खास में लगे हुए खम्भों की शोभा बढ़ाने वाले तोड़े, पंचमहल और जोधाबाई के महल में लगे हुए उभरे घण्टे तथ जंजीर और मरियम के महल में पत्थर खोदकर बनाये गये पशुओं के चित्र इत्यादि हिन्दू और जैन मन्दिरों की ही नकल हैं। संगमरमर और बलुआ लाल पत्थर के बने हुए बुलन्द दरवाजे में शिल्प कला का उत्कृष्ट नमूना दिखाई पड़ता है।
डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी की स्थापत्य कला की शैली भारतीय प्राचीन संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों को समन्वित करने और मिलाने की अकबर की नीति को ही जैसे पाषाण रूप में प्रस्तुत करती हैं।’
डा. श्रीवास्तव ने अकबर की इस समन्वित स्थापत्य शैली को राष्ट्रीय स्थापत्य कला शैली कहा है। अकबर ने स्थापत्य की जो नई शैली विकसित की, उसका प्रभाव सारे देश पर और राजस्थान के राजपूत राजाओं पर पड़ा। अकबर के शासनकाल में अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, आम्बेर, ओरछा और दतिया में जो महल बने, उन पर मुगल कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यहाँ तक कि हिन्दुओं के मन्दिर भी इस शैली के प्रभाव से नहीं बच सके।
हिन्दू राजाओं के महलों के बारे में पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘राजपूत भवनों को देखकर कोई भी कल्पना कर सकता है कि उनमें प्रारम्भिक मुगली कला, जैसे-कटोरेदार मेहराबें, काँच की पच्चीकारी, दरीखाना, पलस्तर की रँगाई किस प्रकार हिन्दू राजाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अपना लिये गये थे।’
जहाँगीर कालीन इमारतें
जहाँगीर की रुचि शिल्प कला की अपेक्षा छोटी चित्रकारी और बागवानी में अधिक थी। अतः उसके समय में बहुत कम इमारतें बनीं और जो इमारतें बनीं, उनमें शिल्प कला का उत्कृष्ट रूप नहीं था।
एतमादुद्दौला का मकबरा
जहाँगीर के काल में नूरजहाँ द्वारा आगरा में बनवाया गया एतमादुद्दौला का मकबरा उस काल की इमारतों में सबसे अच्छा है। यह सफेद संगमरमर से निर्मित है और इसमें संगमरमर के टुकड़ों के बराबर बहुमूल्य पत्थर लगे हुए हैं। यह मुगलकाल की प्रथम इमारत है जो श्वेत संगमरमर से निर्मित है और जिसमें पच्चीकारी का काम है। यह मकबरा उत्कृष्ट स्नेह का प्रतीक है और मुगल कला का बेजोड़ नमूना है। पर्सी ब्राउन के अनुसार यह मकबरा अकबर और शाहजहाँ की शैलियों को जोड़ने वाली कड़ी के रूप में माना जा सकता है।
अकबर का मकबरा
जहाँगीर के काल की दूसरी उल्लेखनीय इमारत सिकन्दरा में स्थित अकबर का मकबरा है। इसका नक्शा अकबर ने तैयार किया था किन्तु इसका निर्माण जहाँगीर की देखरेख में हुआ था। इस इमारत से अकबर और उसके पुत्र जहाँगीर की अभिरुचि का अन्तर स्पष्ट हो जाता है।
अकबर की ठोस और विशाल इमारतों की तुलना में यह इमारत आडम्बरपूर्ण तथा नाजुक शैली में बनी है। मुसलमानों के समस्त मकबरों में गुम्बद बनाने की प्रथा प्राचीन समय से प्रचलित थी किन्तु इस मकबरे पर कोई गुम्बद नहीं है।
इसकी बनावट बौद्ध विहार जैसी है। इसलिये आलोचकों की मान्यता है कि यह कट्टर मुसलमानी ढंग का मकबरा नहीं है। इसके मुख्य प्रवेश-द्वार पर सुन्दर जड़ाऊ काम किया हुआ है तथा इसके चारों कोनों पर बनी हुई सफेद संगमरमर की सुन्दर मीनारें इसकी सुन्दरता में वृद्धि करती हैं।
जहाँगीर का मकबरा
जहाँगीर का मकबरा लाहौर के पास शाहदरा में स्थित है। इसका नक्शा जहाँगीर ने बनाया था तथा इस मकबरे का निर्माण उसकी बेगम नूरजहाँ ने करवाया था। इसके ऊपर संगमरमर का एक मण्डप था जिसे बाद में सिक्खों ने उतार लिया था। मकबरे का भीतरी भाग संगमरमर की पच्चीकारी से सुशोभित है। चिकने और रंगीन खपरैल इसकी सुन्दरता को अधिक बढ़ा देते हैं। पर्सी ब्राउन का कथन है कि सारी इमारत प्रभावशाली प्रतीत नहीं होती है।
जहाँगीर की अन्य इमारतें
उपर्युक्त इमारतों के अतिरिक्त लाहौर में बना अनारकली का मकबरा तथा ख्वाबगाह और मोती मस्जिद जहाँगीर की ही बनवाई हुई हैं।
शाहजहाँ का शासनकाल मुगल स्थापत्य का स्वर्णकाल था। इस काल में स्थापत्य कला अपने चरम पर पहुँच गई। शाहजहाँ ने अनेक इमारतें बनवाईं। वह स्वयं स्थापत्य कला में निपुण था। वह अपनी इमारतांे के नक्शे स्वयं देखता था। शाहजहाँ की इमारतें श्वेत संगमरमर से निर्मित हैं। उसके समय में राजपूताने में स्थित मकराना की खानों में प्रचुर मात्रा में संगमरमर उपलब्ध था।
शाहजहाँ के समय में निर्माण कला के साधनों और सिद्धान्तों में अनेक परिवर्तन हुए। उसके काल में पत्थर काटने में निपुण कारीगरों का स्थान संगमरमर काटने और पॉलिश करने में निपुण कारीगरों ने ले लिया। आयताकार भवनों का स्थान चौकोर लहरदार सजावटपूर्ण महलों ने ले लिया। सबसे अधिक मौलिक परिवर्तन मेहराब की बनावट में हुआ। इनमें सजावट, पच्चीकारी और नजाकतपूर्ण सौन्दर्य आ गया। आगरा, लाहौर, दिल्ली आदि नगरों में पुराने महलों का नव-निर्माण हुआ और नवीन भवन बनवाये गये।
शाहजहाँ के काल की स्थापत्य शैली के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों की राय है कि इन कृतियों के कलाकार विदेशी थे और शाहजहाँ ने अकबर कालीन हिन्दू प्रभाव वाली स्थापत्य शैली को त्यागकर पुनः शुद्ध ईरानी शैली को अपनाने का प्रयास किया था। कतिपय अन्य विद्वान इसे भारतीय शैली से ही उत्पन्न बताते हैं। डॉ. बनारसी प्रसाद के अनुसार यह शैली दो संस्कृतियों के समन्वय का परिणाम थी।
शाहजहाँकालीन दिल्ली की इमारतें
(1.) दिल्ली का लाल किला
शाहजहाँ ने दिल्ली के पास शाहजहाँनाबाद नामक नगर बसाया और उसमें लाल किले के नाम से एक किले का निर्माण कराया। इसकी लम्बाई 3100 फुट और चौड़ाई 1650 फुट है। किले की दीवारें ऊँची तथा कँगूरेदार हैं। इसकी पश्चिमी दीवार में मुख्य दरवाजा बनाया गया जो जन साधारण के प्रवेश के लिये था। दक्षिणी दीवार वाला दरवाजा व्यक्तिगत था तथा विशेष व्यक्तियों द्वारा ही व्यवहार में लाया जाता था।
(2.) दीवाने आम
दिल्ली के लाल किले के मध्य विशाल भाग में दीवाने आम बना हुआ है। इसका आकार चतुर्भुजी है। यह पत्थर से निर्मित 185 फुट लम्बा तथा 70 फुट चौड़ा भवन है। यहाँ बैठकर शाहजहाँ जनसाधारण की फरियाद सुनता था। इसके बाहरी भाग में 9 मेहराबें दोहरे खम्बों पर आधारित हैं।
तीनों ओर का मार्ग खम्भों पर आधारित दाँतेदार डाटों से बना हुआ है। इन खम्बों की कुल संख्या 40 है। इस भवन में पीछे की दीवार में एक मेहराबदार ताख है। इस ताख में शाहजहाँ का प्रसिद्ध तख्ते ताउस रखा रहता था। इस ताख की दीवार में अत्यन्त सुन्दर शिल्पकारी की गई है। पत्थरों को काटकर जड़ने के काम में इसका कोई सानी नहीं है।
(3.) रंगमहल
दिल्ली के लाल किले में दूसरी महत्त्वपूर्ण इमारत रंगमहल है। यह शाहजहाँ का हरम था। यह भवन 153 फुट लम्बा और 69 फुट चौड़ा है। इसके मध्य में एक बड़ा कक्ष है तथा चारों कोनों में छोटे-छोटे कक्ष हैं। यह अलंकृत सेतबन्धों द्वारा 15 भागों में विभाजित है तथा रंग एवं चमक में अद्वितीय है।
(4.) दीवाने खास
दिल्ली के लाल किले में स्थित दीवाने खास महत्त्वपूर्ण इमारत है। इसका निर्माण एक निश्चित योजना के अनुसार हुआ है। इसका बड़ा कमरा 90 फुट लम्बा और 67 फुट चौड़ा है। इसके बाहरी भाग में पाँच रास्ते हैं। ये पाँचों रास्ते मेहराबदार हैं तथा बराबर आकार के हैं।
दूसरी ओर के रास्ते कुछ छोटे हैं। इस प्रकार यह इमारत अधिक खुली हुई है। इन रास्तों से काफी हवा आती है जिससे यहाँ ठण्डक बनी रहती हैं। इसका फर्श सफेद संगमरमर का है। इसके मेहराब स्वर्ण तथा रंग से सजे हुए हैं तथा पंक्तियों से भरे हुए से लगते हैं।
रंगमहल तथा दीवाने खास में जड़ाई, नक्काशी, पच्चीकारी तथा सजावट का काम बहुत उत्तम है। इन दोनों की बनावट एक जैसी है। इनकी मेहराबें दाँतेदार हैं। छतें बहुत ही सुन्दर हैं। इन छतों में स्वर्ण तथा जवाहरातों की सजावट की गई है। इस छत को टिकाये रखने के लिये स्तम्भों का प्रयोग नहीं किया गया है। यह छत 12 कोनों के सेतुबन्ध से सधी हुई है। प्रत्येक भाग में सुन्दर जड़ाई तथा रंग का काम हुआ है। दीवारों तथा मेहराबों पर फूलों की सुन्दर आकृतियाँ बनी हुई हैं।
(5.) दिल्ली की जामा मस्जिद
शाहजहाँ ने दिल्ली के लाल किले के पास दिल्ली की प्रसिद्ध जामा मस्जिद बनवाई। यह लाल पत्थर से निर्मित शाही ढंग की इमारत है। इसके तीनों विशाल दरवाजों पर बुर्ज बने हुए हैं। पूर्व का द्वार शाही परिवार के उपयोग के लिये था। उत्तर और दक्षिण के द्वारों से जन-साधारण प्रवेश करता था।
इसमें नमाज पढ़ने के लिये 200 फुट लम्बा तथा 90 फुट चौड़ा स्थान है। इसके सामने 325 फुट लम्बा आयताकार सहन है जिसके बीच में हाथ-पैर धोने के लिये एक तालाब है। नमाज स्थल के बीच का बाहरी दरवाजा चौड़ा है तथा दोनों ओर पाँच-पाँच दाँतेदार मेहराबों के रास्ते हैं। इसके दोनों कोनों पर चार मंजिला लम्बी-लम्बी मीनारें हैं।
इस पूरी इमारत पर सफेद संगमरमर के बने हुऐ तीन विशाल गुम्बद हैं। अन्दर लहरियेदार मेहराबनुमा दरवाजे हैं। स्थापत्य के जानकार विद्वानों के अनुसार इस स्थल से प्राचीन विष्णु मंदिर के अवशेष प्राप्त होते हैं। इससे अनुमान होता है कि यह किसी समय हिन्दू पूजा स्थल रहा होगा। शाहजहाँ ने उसे तोड़कर मस्जिद में बदल दिया होगा।
शाहजहाँकालीन आगरा की इमारतें
(1.) आगरे का लाल किला
शाहजहाँ ने आगरे के लाल किले में अकबर द्वारा निर्मित लाल पत्थरों की अनेक इमारतें तुड़वाकर, संगमरमर से पुनः निर्मित करवाईं। इनमें मुख्य हैं- दीवाने आम, दीवाने खास, शीश महल, खास महल, मुसम्मन बुर्ज, नगीना मस्जिद तथा मोती मस्जिद।
(2.) दीवाने आम
शाहजहाँ ने दीवाने आम का निर्माण 1628 ई. में करवाया। इसका हॉल 201 फुट लम्बा तथा 67 फुट चौड़ा है। यह तीन तरफ से खुला हुआ है। इसकी छत दुहरे खम्भों की कतार से सधी हुई है। खम्भों की संख्या 40 है। चारों तरफ एक संगमरमर की गैलेरी है। दीवारों को काट-काटकर उसमंे रंगीन पत्थर, जवाहर, स्वर्ण इत्यादि बहुमूल्य वस्तुओं को जड़ा गया है।
(3.) दीवाने खास
दीवाने खास एक ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है। इसमें दो बड़े-बड़े कमरे हैं जिनको संगमरमर के गलियारे से जोड़ा गया है। हॉल के खम्भों और दरवाजों पर बहुत अच्छा जड़ाव, कटाव, नक्काशी तथा पच्चीकारी का काम किया गया है। सजावट का काम भी उत्तम है। इनके ऊपर फूल-पत्तियों के तरह-तरह के चित्र बने हुए हैं। पहले सोने से जड़ाई का काम हो रहा था। दीवाने खास के सामने एक बड़े आँगन में सफेद संगमरमर का विशाल चबूतरा बना हुआ है।
(4.) शीश महल
शीश महल में काँच का काम बहुत अच्छा हुआ है इसलिये इसका नाम शीश महल पड़ा। यह भवन दीवाने खास के नीचे है। इसके दरवाजों और दीवारों पर काँच तथा सोने का बहुत अच्छा काम हुआ है। दरवाजे तथा दीवारें रंगीन तथा बहुमूल्य पत्थरों से अलंकृत हैं।
(5.) खास महल
खास महल बादशाह का हरम था। यह दीवाने खास से लगा हुआ है। यह लाल पत्थर से निर्मित है। यमुना की तरफ की इसकी दो सुनहरी बुर्जियों में भाँति-भाँति के सुन्दर फूलों की सजावट है तथा बहुत बढ़िया नक्काशी की गई है। खास महल के गलियारे, कमरे तथा ऊपरी भाग सफेद संगमरमर के हैं। इनकी दीवारों पर अनेक प्रकार के सुन्दर तथा मूल्यवान पत्थरों की जड़ाई की गई है। इस महल के सामने अँगूरी बाग हैं। इस बाग के तीनों तरफ बड़े-बड़े हॉल हैं और चौथी तरफ संगमरमर का बड़ा गलियारा है। इस बाग में कई फव्वारे भी हैं।
(6.) मुसम्मन बुर्ज
मुसम्मन बुर्ज को पहले शाह बुर्ज भी कहते थे। यह सफेद संगमरमर से निर्मित चार मंजिला भवन है। इसकी चौथी मंजिल में सुन्दर नक्काशी है। इसके बीच में एक हौज बना हुआ है जिसका रूप गुलाब के फूल जैसा है। उसके सामने एक झरना भी बना हुआ है।
(7.) झरोखा दर्शन
खास महल और आठकोर मीनार के मध्य में झरोखा दर्शन है। यह सफेद संगमरमर का बना हुआ है। इसकी छतें चमकदार हैं। यहाँ से शाहजहाँ जनता को दर्शन देता था।
(8.) नगीना मस्जिद
नगीना मस्जिद शाही महिलाओं के लिये बनवाई गई थी। आकार-प्रकार मेंयह मस्जिद छोटी है परन्तु इसकी सुन्दरता में कोई कमी नहीं है। यह सफेद संगमरमर से निर्मित है। इसमें चारों ओर कमरे बने हैं तथा इसके सामने एक सुन्दर बाग है।
(9.) मोती मस्जिद
मोती मस्जिद उस काल की शिल्प कला के श्रेष्ठ सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है। यह आगरा के किले की सबसे शानदार इमारत है। यह 1654 ई. में बनकर तैयार हुई। यह एक ऊँची कुर्सी पर बनी हुई है। इस मस्जिद का आँगन सफेद रंग के बड़े आकार के चौकोर खण्डों से जड़ा हुआ है। इसमें एक फव्वारा तथा एक धूप घड़ी है।
वास्तु कला के जानकारों ने इस मस्जिद की बहुत प्रशंसा की है। इस मस्जिद के चारों ओर एक सुन्दर गैलेरी और एक खम्भेदार बरामदा बनाया गया है। इसमें अनेक कमरे बने हुए हैं जिन्हें संगमरमर के जालीदार पर्दों से एक-दूसरे से अलग कर दिया गया है।
(10.) आगरा की जामा मस्जिद
इसका निर्माण 1648 ई. में हुआ था। इसकी लम्बाई 130 फुट तथा चौड़ाई 100 फुट है। वास्तुकला की दृष्टि से यह दिल्ली की जामा मस्जिद से निम्न स्तर की है। मीनारों के अभाव के कारण यह कम प्रभावशाली दिखाई पड़ती है। इसके गुम्बद भी कम आकर्षक हैं। इसकी मेहराबें सामने की ओर चौड़ा स्थान छोड़कर बनाई गई हैं। यही इसकी विशेषता कही जा सकती है।
(11.) आगरा का ताजमहल
आगरा का ताजमहल वस्तुतः एक मकबरा है जिसे शाहजहाँ ने अपनी प्रिय बेगम मुमताज के प्रति अपने प्रेम की चिरस्थाई स्मृति के प्रतीक के रूप में बनवाया। इमारत की पूरी योजना आयताकार है तथा यह एक चारदीवारी से घिरा हुआ है जिसके चारों कोनों पर चार चौड़े-चौड़े मेहराबदार मण्डप हैं।
अहाते के भीतर एक वर्गाकार बाग है जिसके उत्तरी सिरे पर ऊँची कुर्सी पर सफेद संगमरमरी मकबरा स्थित है। मुख्य चबूतरे के चारों कोनों पर एक-एक तिमंजिली मीनार ऊपरी छतरी सहित बनाई गई है। सम्पूर्ण ताजमहल शैली, बनावट और कारीगरी में भारतीय है। सम्पूर्ण इमारत शुद्ध संगमरमर से निर्मित है।
इसकी अत्यन्त सुन्दर खुदाई और जड़ाई भारतीय शिल्पकारों की स्थापत्य दक्षता का प्रमाण है। ताजमहल को देखने से लगता है कि पत्थर के शिल्पकार की छैनी का स्थान अब संगमरमर पर पॉलिश करने वालों के बारीक औजारों ने ले लिया था। मेहराबों की बनावट में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। लगभग समस्त मेहराबें पत्तियोंदार या नोंकदार हैं।
ताजमहल के निर्माता कौन थे ?
इतिहासकार स्मिथ के अनुसार ताजमहल का निर्माण यूरोपियन तथा एशियाई कलाकारों ने किया। फादर मैनरिफ का कथन है कि ताजमहल का निर्माता वेनिस का निवासी जेरोम बोरनियो था परन्तु सर जॉन मार्शल और हेवेल इस मत को नहीं मानते। पर्सी ब्राउन के अनुसार इसका निर्माण तो प्रायः मुसलमान कलाकारों द्वारा हुआ था परन्तु इसकी चित्रकारी हिन्दू कलाकारों द्वारा हुई थी।
पच्चीकारी का कठिन काम कन्नौज के हिन्दू कलाकारों को सौंपा गया था। अनेक विद्वानों के अनुसार ताजमहल का मुख्य शिल्पकार एक तुर्क या ईरानी उस्ताद इशा था जिसे बड़ी संख्या में हिन्दू कारीगरों का सहयोग प्राप्त था। ताजमहल की सजावट की प्रेरणा एतमादुद्दौला के मकबरे से ली गई प्रतीत होती है।
मुगल स्थापत्य की सर्वश्रेष्ठ इमारत
आगरा का ताजमहल न केवल शाजहाँ की इमारतों में ही सर्वश्रेष्ठ है अपितु मुगल स्थापत्य कला का भी सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। हेवेल ने लिखा है- ‘यह भारतीय स्त्री जाति का देवतुल्य स्मारक है। सुन्दर बाग और अनेक फव्वारों के मध्य स्थित ताजमहल एक काव्यमय रोमाण्टिक सौन्दर्य का सृजन करता है। वस्तुतः ताजमहल दाम्पत्य प्रेम का प्रतीक और कला-प्रेमियों का मक्का बन गया है।’
डॉ. बनारसी प्रसाद का कहना है- ‘चाहे ऐतिहासिक साहित्य का पूर्ण पुंजनष्ट हो जाये और केवल यह भवन ही शाहजहाँ के शासनकाल की कहानी कहने को बाकी रह जाये तो इसमें संदेह नहीं, तब भी शाहजहाँ का शासनकाल सबसे अधिक शानदार कहा जायेगा।’
शाहजहाँकालीन अन्य इमारतें
शाहजहाँ ने आगरा और दिल्ली के अतिरिक्त लाहौर, काबुल, अजमेर, कन्धार, अहमदाबाद और कशमीर में भी श्वेत संगमरमर की अनेक इमारतें बनवाई थीं।
शाहजहाँ ने लाहौर के किले में पुरानी इमारतों को गिरवाकार किले के पश्चिमी भाग में चालीस खम्भे का दीवाने आम, मुसम्मन बुर्ज, शीश महल, नौलक्खा और ख्वाबगाह आदि इमारतें बनवाईं। ये समस्त इमारतें काफी सुन्दर हैं। शाहजहाँ ने इतनी अधिक इमारतें बनवाईं कि उसे निर्माताओं का शाहजादा कहा जाता है।
औरंगजेब एवं परवर्ती मुगल बादशाहों के काल के स्थापत्य कोपतनोन्मुख मुगल स्थापत्य कहा जाता है। इस काल में मुगलों ने महत्वपूर्ण भवनों का निर्माण बंद कर दिया तथा हिन्दू स्थपात्य को बड़ी क्षति पहुंचाई।
जहाँगीर की मृत्यु के बाद चित्रकला का और शाहजहाँ की मृत्यु के बाद मुगल स्थापत्य कला का पतन आरम्भ हो गया। औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था और वह किसी भी प्रकार की कला को इस्लाम के सिद्धांतों के विरुद्ध मानता था। इसलिए उसे किसी भी प्रकार की कला में कोई रुचि नहीं थी।
औरंगजेब ने अपना पूरा ध्यान हिन्दू स्थापत्य को ध्वस्त करने में लगाया। उसने बहुत कम इमारतें बनवाईं। औरंगजेब के द्वारा बनवाई गई मस्जिदें एवं मकबरे बहुत ही साधारण कोटि के थे। उसके काल में बना बीबी का मकबरा कई प्रकार के स्थापत्य दोष से भरा हुआ है।
औरंगजेब के उत्तराधिकारियों में से किसी के भी पास इतना समय और विवेक नहीं था कि वह कलाओं को पुनर्जीवन दे सके।
औरंगजेब कालीन मुगल स्थापत्य कला
रबिया-उद्-दौरानी का मकबरा
औरंगजेब ने औरंगाबाद के पास अपनी बेगम रबिया-उद्-दौरानी का मकबरा बनवाया जिसमें ताजमहल की नकल करने का असफल प्रयास किया गया। यह एक मामूली ढंग की इमारत है और उसकी सजी हुई मेहराबों में और अन्य सजावट में कोई विशेषता नहीं है।
दिल्ली की लाल किला मस्जिद
औरंगजेब ने दिल्ली के लाल किले में एक मस्जिद बनवाई, जो उसकी कट्टरपंथी मानसिकता से उत्पन्न सादगी का परिचय देती है।
लाहौर की बादशाही मस्जिद
औरंगजेब ने अपने शासन काल में लाहौर में भी एक मस्जिद बनवाई जिसे बादशाही मस्जिद कहा जाता है।
औरंगजेब के बाद की मुगल स्थापत्य कला
औरंगजेब के काल में मुगल स्थापत्य कला पत्नोन्मुख हो गई। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय में वास्तुकला का लगभग पूर्णतः पतन हो गया। अठारहवीं सदी में कोई उल्लेखनीय इमारत नहीं बनी।
डॉ. आशीर्वादलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जो इमारतें बनीं, वे मुगलकालीन शिल्पकला के डिजाइन का खोखलापन और दीवालियापन ही प्रकट करती हैं।’
मुगलकालीन साहित्य मुगल सल्तनत की पूर्ववर्ती तुर्की सल्तनत की अपेक्षा बहुत अधिक समृद्व था। इसका सबसे बड़ा कारण मुगलों की संस्कृति का बर्बर तुर्कों की संस्कृति से अलग होना था।
मुगलकालीन साहित्य
मुगलों के आने से पहले एवं मुगलों के काल में भी शाही दरबार की भाषा फारसी थी। राज्याधिकारियों को अनिवार्य रूप से फारसी पढ़नी पड़ती थी। मुगल काल में फारसी साहित्य को और बढ़ावा मिला। अधिकांश मुगल बादशाह विद्या प्रेमी थे।
तुर्की एवं फारसी साहित्य
बाबर तुर्की और फारसी का अच्छा कवि और लेखक था। उसने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-बाबरी अपनी मातृभाषा तुर्की में लिखी थी। उसके उत्तराधिकारियों के काल में तुजुक-ए-बाबरी का फारसी में अनुवाद हुआ। इस ग्रन्थ से फारसी की नई काव्य शैली विकसित हुई जिसे मुबायान कहते हैं।
हुमायूँ भी तुर्की और फारसी के अलावा, दर्शन, ज्योतिषी और गणित का ज्ञाता था। उसके दरबार में ख्वादामीर और बयाजित जैसे इतिहासकार रहते थे। उसकी बहिन गुलबदन बेगम ने अकबर के शासनकाल में हुमायूँनामा की रचना की। अकबर तथा उसके उत्तराधिकारियों के काल में भी फारसी साहित्य का विपुल सृजन हुआ।
मुगल काल में फारसी के मौलिक ग्रन्थों की रचना के साथ-साथ अनुवाद विभाग की भी स्थापना हुई जिसमें संस्कृत, अरबी, तुर्की और ग्रीक भाषाओं के अनेक सुप्रसिद्ध ग्रन्थों का फारसी भाषा में अनुवाद हुआ।
संस्कृत साहित्य
बाबर तथा हुमायूँ ने संस्कृत साहित्य के संरक्षण में रुचि नहीं दिखाई। फिर भी उनके शासन काल में भारतीय विद्वानों द्वारा निजी रूप से संस्कृत साहित्य का सृजन किया गया। अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने संस्कृत के विद्वानों को राजकीय संरक्षण देकर संस्कृत साहित्य को कुछ प्रोत्साहन दिया किन्तु औरंगजेब के काल में संस्कृत विद्वानों का मुगल दरबार में फिर से सम्मान बन्द हो गया।
हिन्दी साहित्य
मुगलों के अभ्युदय के बाद साहित्यिक भाषा के रूप में हिन्दी का विकास तेजी से हुआ। इस कारण मुगलकाल हिन्दी काव्य का स्वर्ण युग बन गया। 1532 ई. के आस-पास मंझन ने मधुमालती की रचना की, जो अपूर्ण ग्रन्थ होते हुए भी हिन्दी की श्रेष्ठ कृतियों में गिना जाता है।
1540 ई. के आस-पास मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत नामक महाकाव्य की रचना की, जो रूपक शैली में लिखा गया है। इसमें मेवाड़ की रानी पद्मिनी की कथा है। यद्यपि इन विद्वानों को राज्याश्रय प्राप्त नहीं था, फिर भी उन्होंने हिन्दी साहित्य जगत को अमूल्य रत्न प्रदान किये। अकबर के समय में धार्मिक सहिष्णुता होने के कारण हिन्दी साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ।
देशी भाषाओं का साहित्य
मुगल काल में देश के विभिन्न हिस्सों में बोली जाने वाली विविध देशी भाषाओं एवं बोलियों का भी अच्छा विकास हुआ। राजस्थान के चारण कवियों ने डिंगल भाषा को समृद्ध बनाया। वैष्णव सम्प्रदाय ने तो अनेक देशी भाषाओं को समृद्ध बनाया। इस काल में रचा गया पिंगल अर्थात् ब्रज भाषा का साहित्य आज तक किसी भी भाषा में रचा गया सर्वोत्कृष्ट साहित्य है।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मुगल काल में, विशेषकर अकबर से लेकर शाहजहाँ के काल में, भारत में कला, स्थापत्य एवं साहित्य का यथेष्ट विकास हुआ। मुगल शासकों की उदार नीतियों के कारण विविध प्रकार की कलाओं एवं साहित्य को पर्याप्त संरक्षण मिला, जिससे भारतीय कला और साहित्य ने नई ऊँचाइयां अर्जित कीं।
मुगल कालीन चित्रकला निश्चित रूप से हिन्दू चित्रकला से भिन्न थी। मुगल कालीन चित्रकला के बिम्ब, विषय एवं शैली तीनों ही हिन्दू चित्रकला से अलग थे।
मुगल कालीन चित्रकला
कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि मुगल साम्राज्य की स्थापना के साथ ही चित्रकला में नवजीवन आ गया क्योंकि मुगल बादशाह चित्रकला के महान् प्रेमी थे। वस्तुतः इन इतिहासकारों का यह कथन मुगलों की पूर्ववर्ती तुर्क सल्तनत के संदर्भ में तो उचित है किंतु प्राचीन हिन्दू राजाओं के काल की चित्रकला के संदर्भ में उचित नहीं है। प्राचीन भारत में आदिम काल से ही चित्रकला का विकास हुआ जिसका निरंतर उत्थान होता चला गया था।
हेरात में बहजाद नामक चित्रकार ने चित्रकला की एक नई शैली आरम्भ की जो चीनी कला का प्रान्तीय रूप था और इस पर भारतीय, बौद्ध, ईरानी, बैक्ट्रियाई और मंगोलियन तत्त्वों का प्रभाव था। इसे बहजाद कला कहा जाता था। फारस के तैमूरवंशी राजाओं ने इसे राजकीय सहायता दी।
बाबर के काल में चित्रकला
बाबर जब हेरात में आया, तब उसे इस प्रकार की बहजाद कला की चित्रकला से परिचय प्राप्त हुआ। बाबर इस कला को भारत में ले आया। बाबर ने अनेक हस्तलिखित ग्रन्थों की प्रतिलिपियाँ इस कला शैली में चित्रित करवाईं।
हुमायूँ के काल में चित्रकला
हुमायूँ भी चित्रकला प्रेमी था। उसे निर्वासन काल में फारस के उच्चकोटि के चित्रकारों से परिचय प्राप्त हुआ। इनमें से एक हेरात का प्रसिद्ध चित्रकार बहजाद का शिष्य मीर सैय्यद अली था और दूसरा ख्वाजा अब्दुस समद था। हुमायूँ इन दोनों को अपने साथ भारत ले आया और हुमायूँ तथा अकबर ने इन कलाकारों से चित्रकला का ज्ञान प्राप्त किया।
इस काल में अधिकांशतः सूती वस्त्रों पर चित्र बनाये जाते थे। इन चित्रों में ईरानी भारतीय तथा यूरोपीयन शैलियों का सम्मिश्रण पाया जाता है किन्तु ईरानी शैली की प्रधानता होने के कारण इसे ईरानी कलम कहा गया। इस शैली को मुगल काल की प्रारम्भिक चित्रकला शैली कहा जा सकता है।
अकबर के काल में चित्रकला
अकबर के उदारवादी दृष्टिकोण के कारण अकबर के शासनकाल में चित्रकला की नई शैली विकसित हुई जो ईरानी और भारतीय शैली के सर्वोत्तम तत्त्वों का सम्मिश्रण थी। इस नवीन शैली में विदेशी तत्त्व भारतीय शैली में इस तरह घुलमिल गये कि दोनों के पृथक् अस्तित्त्व का पत लगा पाना असम्भव हो गया और वह बिल्कुल भारतीय हो गई।
जहाँगीर के काल में चित्रकला
जहाँगीर का शासनकाल भारतीय चित्रकला का चरमोत्कर्ष काल था। जहाँगीर स्वयं अच्छा चित्रकार था। उसके दरबार में कई प्रसिद्ध चित्रकार रहते थे। इस काल की चित्रकला में भी कई प्रयोग हुए। जहाँगीर की मृत्यु के साथ ही मुगल चित्रकला का विकास रुक गया।
मुगल कालीन राजपूत चित्रकला
सातवीं एवं आठवीं शताब्दी के लगभग राजपूताना में अजन्ता चित्रकला की समृद्ध परम्परा विद्यमान थी किन्तु अरबों के आक्रमण के कारण पश्चिमी क्षेत्र के कलाकार गुजरात से राजपूताना की ओर आ गये जिन्होंने स्थानीय शैली को आत्मसात करके एक नई शैली को जन्म दिया। चूँकि इस नई शैली की चित्रकला से बड़ी संख्या में जैन ग्रंथों को चित्रित किया गया था, अतः इसे जैन शैली कहा गया।
इस शैली का विकास गुजरात से आये कलाकारों ने किया था इसलिये इसे गुजरात शैली भी कहा जाने लगा। धीरे-धीरे गुजरात और राजपूताना शैली में कोई भेद नहीं रहा। पन्द्रहवीं शताब्दी में इस पर मुगल शैली का प्रभाव दिखाई देने लगा। ज्यों-ज्यों राजपूत शासकों ने मुगल बादशाह अकबर से राजनैतिक एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये और उनका मुगल दरबार में आना-जाना होता रहा, राजपूत चित्रकला पर मुगल प्रभाव अधिकाधिक बढ़ता गया, जिससे राजपूत शैली की पूर्व प्रधानता समाप्त हो गई।
मुगल कालीन मूर्तिकला
मुसलमानों के भारत आने से पहले भारत में मूर्तिकला उन्नत अवस्था में थी किन्तु मुस्लिम आक्रान्ता मूर्तियों को तोड़ना इस्लाम की सेवा एवं अपना कर्त्तव्य मानते थे। अतः उन्होंने भारतीय मूर्तिकला पर घातक प्रहार किया। बाबर और हुमायॅूँ भी कट्टर मुसलमान थे और मूर्ति बनाना पाप समझते थे तथा मूर्तियों एवं मन्दिरों को ध्वस्त करना एक पवित्र कार्य समझते थे। अकबर ने अपने उदार दृष्टिकोण के कारण मूर्तिकला को प्रोत्साहन दिया। जहाँगीर ने भी कुछ मूर्तियाँ बनवाईं किन्तु शाहजहाँ और औरंगजेब ने इसे कोई प्रोत्साहन नहीं दिया, जिससे मूर्तिकला पतनोन्मुख हो गई।
मुगल कालीनआभूषण कला
मुगल शासकों की बेगमें तथा शहजादियाँ, यहाँ तक कि स्वयं मुगल बादशाह एवं शहजादे कलात्मक आभूषणों के शौकीन थे। इस कारण मुगल काल में आभूषण कला को बड़ा प्रोत्साहन मिला तथा कई प्रकार के नये आभूषणों का भी निर्माण होने लगा। राजपूतों से वैवाहिक सम्बन्धों के कारण भी मुगल शासकों ने स्वर्णकारों को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया। स्वर्णकार और जौहरी सदैव अपने काम में लगे रहते थे। शाहजहाँ ने सोने का रत्नजड़ित तख्ते-ताऊस बनवाया जिसे 1739 ई. में नादिरशाह ईरान ले गया।
मुगल कालीनसंगीत कला
मुगलों के काल में संगीत कला की बहुत उन्नति हुई। बाबर स्वयं गायन में निष्णात था। उसने गायन कला की एक पुस्तक भी लिखी। हुमायूँ भी संगीत प्रेमी था। अकबर भारतीय शास्त्रीय संगीत का बड़ा प्रेमी था। तानसेन उस युग का महान् संगीतज्ञ था। अकबर के काल में हिन्दू और मुस्लिम संगीत पद्धतियों का समवन्य हुआ जिससे ठुमरी, गजल, कव्वाली आदि अनेक पद्धतियों का सृजन हुआ।
राजपूत राज्यों का प्रशासन प्राचीन क्षत्रियों की राज्य व्यवस्था के आधार पर स्थपित किया गया था जिसमें धर्म एवं नैतिकता को प्रमुखता दी गई थी किंतु मध्यकालीन भारत में राजपूतों ने मुगलों के अनुकरण पर राजपूत राज्यों का प्रशासन स्थिर किया जिसमें प्रजा के हितों को बहुत कम संरक्षण दिया गया था।
राजपूत शासकों ने दिल्ली के सुल्तानों से अपनी स्वाधीनता की रक्षा करने हेतु अनवरत संघर्ष किया। इस संघर्ष में बार-बार पराजित होने पर भी वे अपने राज्यों को किसी तरह बनाये रखने में सफल हो गये। तुर्क सुल्तानों की प्रशासनिक व्यवस्था का राजपूत राज्यों पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
अकबर के समय में राजपूत राज्य अर्धस्वतंत्र राज्यों के रूप में स्थापित हुए। मुगलों के साथ सम्पर्क स्थापित हो जाने पर राजपूत शासकों पर मुगल शासन पद्धति का गहरा प्रभाव पड़ा। 17वीं शताब्दी के अन्त तक राजस्थान के समस्त राज्यों में मुगल शासन प्रणाली का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होने लगा। यद्यपि राजपूत शासकों ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी तथापि वे अपने राज्यों में स्वायत्तशासी थे।
राजपूत राज्यों का प्रशासन तंत्र
राजपूत राज्यों की प्रशासनिक संरचना परम्परागत क्षत्रिय शासकों के राज्यों की प्रणाली पर आधारित थी जिसमें पूर्ण विकसित शासक वर्ग मौजूद था। शासन के विभिन्न अंग थे जिनकी अलग-अलग भूमिकाएँ थीं। चूंकि शासन का आधार सैनिक शक्ति था, इसलिये क्राक्तिशाली व्यक्ति, दूसरे व्यक्तियों के अधिकारों का अतिक्रमण करने में संकोच नहीं करते थे।
राजा
सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक रूप से राज्य की समस्त शक्तियाँ राजा में निहित थीं। वह समस्त राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक एवं सैनिक शक्तियों का केन्द्र बिन्दु था। वह अपने मन्त्रियों, राजदूतों और अन्य उच्च अधिकारियों की नियुक्ति करता था और उनकी सहायता से राज्य का शासन संचालित करता था।
जघन्य अपराधों के लिए दण्ड व्यवस्था करने तथा उल्लेखनीय राजकीय सेवाओं और बलिदान के लिए जागीरें देने अथवा पदोन्नति करने के समस्त अधिकार राजा में निहित थे। युद्ध के समय सेना का संचालन करना वह अपना महत्त्वपूर्ण व गौरवशाली कर्त्तव्य समझता था। राजा, राज्य का मुख्य न्यायाधीश भी था।
दीवानी और फौजदारी के समस्त मामलों में अन्तिम निर्णय उसी का होता था। जनता अपने राजा का सम्मान करती थी और उसे धर्मावतार, श्रीजी, माई-बाप, अन्नदाता आदि सम्मान-सूचक शब्दों से सम्बोधित करती थी। वह उसे ईश्वर की प्रतिनिधि तथा अंश मानती थी।
राज्य का सर्वेसर्वा होते हुए भी राजा पूर्ण रूप से स्वच्छंद अथवा निरंकुश नहीं होता था। उसके अधिकारों को नियंत्रित रखने के लिए अनेक प्रतिबंध थे। उसकी शक्तियों पर परम्परागत नियमों एवं धर्मशास्त्रों का प्रभाव रहता था जिससे उसकी स्वेच्छाचारिता सीमित रहती थी।
यदि राजा अत्याचारी हो जाता तो शासन के विभिन्न तत्त्व उसकी सत्ता को चुनौती देते थे। मन्त्रियों से अपेक्षा की जाती थी कि वे राजा को प्रचलित नियमों एवं परम्पराओं के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करें। राजा सामान्यतः जनमत का ध्यान रखता था।
राजपूत राजा अपने धर्म में आस्था रखते हुए अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु बने रहते थे। डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने जोधपुर की हवाला बहियों तथा जयपुर के स्याह हजूर के आधार पर लिखा है कि राजस्थान के शासक जिस प्रकार हिन्दू धर्मावलम्बी साधु-सन्तों का आदर करते थे, उसी प्रकार काजियों, मौलवियों, दादू पंथियों, खाखियों, नानक पन्थियों आदि के प्रति उदार थे।
रानी
एक राजा की कई रानियां होती थीं। सबसे पहले ब्याही गई रानी प्रमुख रानी जो कि प्रायः सबसे पहले ब्याही गई रानी होती थी, पट्टरानी अथवा महारानी कहलाती थी। मुगलों के प्रभाव से राजा के रनिवास में रानियों के अतिरिक्त उप-पत्नियां भी होती थीं जिन्हें खवास, पड़दायत तथा पासवान आदि श्रेणियों में विभक्त किया जाता था।
राजा द्वारा सम्मानित रानियों एवं पासवानों का शासन पर बड़ा प्रभाव रहता था। उनके प्रभाव के कारण उत्तराधिकार की परम्परा को भंग कर दिया जाता था। सैनिक संकट के समय रानियाँ अपूर्व साहस का परिचय देती थीं। राजा के अल्पवयस्क होने पर राजमाता राज-प्रतिनिधि के रूप में शासन संचालित करती थी।
जनहित के कार्यों में भी रानियों का बड़ा योगदान रहता था। रानियों के अलावा युवराज व अन्य राजकुमारों का भी राज्य की राजनीति में सक्रिय योगदान रहता था। राजा स्वयं अपने उत्तराधिकारी को शासन का प्रशिक्षण देता था ताकि समय आने पर वह शासन संचालन का उत्तदायित्व संभाल सके।
युवराज
प्रायः राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होता था किंतु मुगलों के प्रभाव के कारण यह परम्परा भंग होने लगी थी एवं राजा अपनी प्रीतपात्री रानी के पुत्र को भी युवराज अथवा राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने लगा था। राजा के जीवनकाल में ही युवराज को वैधानिक अधिकार दे दिये जाते थे।
सामन्त वर्ग
राज्य प्रशासन में राजा तथा राज परिवार के बाद सामन्तों की महत्ता थी। सामन्त प्रायः राजा के कुटुम्ब अथवा कुल के सदस्य अथवा वैवाहिक सम्बन्धी होते थे। सामन्तों के सहयोग के बिना राजा प्रशासन का कार्य नहीं कर सकता था। राज्य की सुरक्षा का दायित्व सामन्तों पर रहता था।
सामंतों को राजा की ओर से जागीरें दी जाती थीं तथा बदले में वे राजा को भू-राजस्व चुकाने के साथ-साथ समय-समय पर वे राज्य की सैनिक सेवा के लिए उपस्थित होते थे। राजधानी से लेकर दुर्ग तथा सीमाओं की देखभाल और सुरक्षा का भार सामन्तों पर रहता था। प्रशासनिक कार्यों के लिये राज्य के उच्च पदों पर भी सामन्तों की नियुक्ति की जाती थी।
सेनाध्यक्ष के पद पर भी सामान्यतः किसी प्रभावशाली सामन्त को नियुक्त किया जाता था। राज्य के थानों और प्रमुख दुर्गों पर थानेदार और किलेदार के रूप में भी सामन्तों की नियुक्ति की जाती थी।
सामन्त अपनी जागीर में अर्द्ध-स्वतन्त्र शासक की भाँति कार्य करता था। जागीर क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था, राज्य प्रशासनिक व्यवस्था का लघु प्रतिरूप था। सामन्तों से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने क्षेत्रों में शान्ति एवं कानून व्यवस्था बनाये रखें और अपनी प्रजा को सुखी और समृद्ध बनायें। सामन्त अपने क्षेत्र में कर वसूली का कार्य भी करते थे।
जागीर के कर्मचारी
जागीर के प्रशासन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए जागीरदार द्वारा कामदार, फौजदार, प्रधान, मुसाहिब, वकील, साणी, दरोगा, कोठारी, तहसीलदार आदि कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती थी। बड़ी जागीरों में प्रधान या मुसाहिब का पद होता था।
कामदार का पद लगभग समस्त जागीरों में होता था। कामदार जागीर के स्तर पर उन समस्त कार्यों को करता था जो राज्य स्तर पर दीवान द्वारा किये जाते थे। दरोगा, खजान्ची (पोतेदार) व तहसीलदार उसके सहयोगी होते थे। गाँव का चौधरी व पटवारी स्थानीय अधिकारी होते थे, जो कामदार को मालगुजारी वसूल करने में सहयोग देते थे और गाँव को व्यवस्थित रखते थे।
जागीर में फौजदार का काम जागीर की सुरक्षा तथा स्थानीय सेना पर नियंत्रण रखना होता था। जागीरों के वकील राजधानी में रहते थे। वे शासक एवं सामन्त के मध्य योजक कड़ी का काम करते थे।
हलका, तहसील एवं गांव
बड़ी जागीरें विभिन्न हलकों एवं तहसीलों में विभक्त रहती थीं। तहसील का अधिकारी तहसीलदार होता था। तहसीलदार के अधीन तफेदार व तोलावटी नामक अधिकारी होते थे। प्रत्येक हलके के प्रशासन के लिए एक प्रधान नियुक्त होता था। इन सब पर एक मुख्य (पाट) प्रधान होता था। जिसका कार्यालय जागीर के मुख्य गाँव में होता था।
जागीर की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई गाँव होती थी। गाँव में एक पटेल या चौधरी होता था। चौधरी के अतिरिक्त कणवारिया और भांभी भी होते थे। कणवारिया गाँव की फसल पर देखरेख रखता था। भांभी या ढेढ़-थोरी आदि गाँव के चाकर होते थे जो जागीरदार के लिए सन्देशवाहक का कार्य करते थे और गाँव की सफाई आदि रखने का दायित्व भी निभाते थे।
मुत्सद्दी वर्ग
मुगलों की अधीनता स्वीकार करने के बाद राजपूताने के शासकों ने अपने राज्यों में केन्द्रीय सत्ता को सुदृढ़ करने के प्रयास किये। मुगल शासन पद्धति का अनुकरण करते हुए उन्होंने केन्द्र और परगनों में अनेक नये पदाधिकारियों की नियुक्ति की।
केन्द्रीय व स्थानीय स्तर पर नये-नये विभाग व कारखाने खोले गये और अधिकारी पदों के दायित्व का विभाजन कर नई नियुक्तियाँ की गईं। फलस्वरूप राज्यों में प्रशासन का सुचारू रूप से संचालन करने हेतु एक नवीन प्रभावशाली अधिकारी तन्त्र अस्तित्व में आया जो मुत्सद्दी वर्ग के नाम से विख्यात हुआ।
मुत्सद्दी वर्ग के सदस्यों की संख्या निरन्तर बढ़ती गई। उनमें वर्ग एकता भी दृढ़ होने लगी। शासकों ने इस वर्ग को सशक्त होने दिया, क्योंकि वे स्वकुलीय आधार पर प्रशासन के विच्छिन्न होने से, असन्तुष्ट सामन्त वर्ग को नियंत्रित करने के लिए इस वर्ग की उपयोगिता को समझ गये थे। फलतः राजपूत राज्यों में अब राजा और सामन्तों के अतिरिक्त एक तीसरी शक्ति के रूप में मुत्सद्दी वर्ग का विकास हुआ।
समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भी मुत्सद्दी वर्ग शक्ति सम्पन्न होता गया। समस्त राजपूत शासक (मेवाड़ को छोड़कर) मुगल मनसबदार के रूप में अपने राज्य से बहुत दूर बादशाह की चाकरी में रहते थे। उसकी अनुपस्थिति में राज्य प्रशासन को चलाने का दायित्व मुत्सद्दियों पर ही रहता था।
इन मुत्सद्दियों को अनेक बार सैनिक दायित्व भी निभाना पड़ता था। इन सब कारणों से मुत्सद्दी वर्ग की शक्ति बढ़ती गई। परन्तु मुत्सद्दी वर्ग राज्य के लिए स्थायी खतरे का कारण नहीं बन सका, क्योंकि इनकी नियुक्तियाँ, पदोन्नतियाँ और सेवा-मुक्ति शासक की इच्छा पर निर्भर थी।
मुत्सद्दी केवल शासक के प्रति उत्तरदायी थे। उनका जनसाधारण में कोई आधार नहीं था। उनके पास कोई निजी सेना नहीं होती थी। उनकी सेवा के बदले जो जागीरें दी जाती थीं, वे सामान्यतः उनके सेवाकाल तक ही सीमित रहती थीं। इसलिए जागीर क्षेत्र में वे अपना स्थायी आधार नहीं बना सकते थे। मुत्सद्दियों की आपसी फूट के कारण भी वे केन्द्रीय शक्ति का विरोध करने की स्थिति में नहीं आ सकते थे।
इस प्रकार राजपूताने में मध्ययुगीन निरंकुश राजतंत्र में अधिकारी तंत्र का उदय हुआ। शासक इसी मुत्सद्दी वर्ग से मन्त्री एवं अन्य पदाधिकारी नियुक्त करता था। राजकीय उच्च पदों पर नियुक्ति करते समय व्यक्ति की योग्यता, अनुभव और निष्ठा को ध्यान में रखा जाता था। प्रधान के पद के अतिरिक्त अन्य पदों पर सामान्यतः गैर-राजपूत जातियों, विशेषकर वैश्य, ब्राह्मण और कायस्थ जाति के लोगों को नियुक्त किया जाता था।
मन्त्रिमण्डल
राज्य के समस्त महत्वपूर्ण कार्यों एवं नीति सम्बन्धी विषयांे पर राजा, राज्य के विभिन्न अधिकारियों से परामर्श करता था। इन पदाधिकारियों से ही मन्त्रिमण्डल का गठन होता था। कहीं-कहीं इन मन्त्रियों का पद वंशानुगत भी हो गया था। इन मन्त्रियों के वेतन व कार्यकाल सम्बन्धी कोई निश्चित नियम नहीं थे।
विभिन्न राज्यों में मन्त्रियों की संख्या भी एक जैसी नहीं थी। उनकी नियुक्ति के तरीके में भी भिन्नता थी। उन दिनों सतत युद्ध की स्थिति बनी रहती थी, इसलिए सैनिक और शासन कार्य का कोई विभाजन नहीं था। मन्त्री, युद्ध काल में सेना का संचालन करते थे।
प्रधान
केन्द्र में राजा के बाद सर्वोच्च अधिकारी प्रधान होता था। वह राजा का मुख्य सलाहकार होता था। वह सैनिक, असैनिक तथा न्यायिक कार्यों में राजा की सहायता करता था। राजा की अनुपस्थिति में राज्य में प्रशासन चलाने का दायित्व उसी का होता था।
मेवाड़ में सलूम्बर के रावत को प्रधान का पद वंशानुगत प्राप्त था जिसे भांजगढ़ कहते थे। मराठों के उपद्रव काल में जब वह महाराणा की आज्ञाओं का उल्लंघन करने लगा तब उसे वंशानुगत प्रधानगी के पद से वंचित कर दिया गया। भूमि के अनुदान पत्रों पर प्रधान के हस्ताक्षर आवश्यक थे।
प्रधान किसी भी जागीरदार को जागीर देने अथवा जब्त करने के लिए राजा से अनुशंसा करता था। युद्ध के समय वह सामन्तों की सेना को जुटाने तथा उसका नेतृत्व करने का दायित्व निभाता था। प्रधान को जयपुर राज्य में मुसाहिब तथा कोटा में फौजदार या दीवान कहते थे। बीकानेर और बून्दी में भी उसे दीवान कहते थे।
कहीं-कहीं प्रधान और दीवान अलग-अलग व्यक्ति होते थे, लेकिन अधिकांश राज्यों में दोनों पदों पर एक ही व्यक्ति नियुक्त होता था। वह राज्य की समस्त प्रशासनिक गतिविधियों पर नियंत्रण रखता था और उनके बारे में राजा को सूचना देता रहता था।
दीवान
राजस्थान के राजपूत राज्यों में प्रशासनिक तंत्र का प्रमुख दीवान होता था जो मुख्य रूप से वित्त एवं राजस्व सम्बन्धी मामलों पर नियंत्रण रखता था। वह राज्य की आय में वृद्धि करके विभिन्न खर्चों की पूर्ति करता था। जहाँ प्रधान के पद का प्रावधान नहीं था, वहाँ दीवान ही प्रधान का कार्य करता था। वह राज्य के शासन सम्बन्धी समस्त कार्यों के लिए उत्तरदायी था।
समस्त महत्वपूर्ण राजकीय दस्तावेजों पर दीवान की मुहर लगाई जाती थी। दीवान के पद पर सामान्यतः गैर-राजपूत जाति के व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था। राज्य के समस्त पदाधिकारी दीवान के नियंत्रण में कार्य करते थे।
दीवान को आमिल, कोतवाल, अमीन, दरोगा, मुशरिफ, वाकयानवीस, फौजदार आदि को नियुक्त करने का अधिकार था। मारवाड़ में परगनों के हाकिम की नियुक्ति महाराजा द्वारा की जाती थी परन्तु इन नियुक्तियों में दीवान की अनुशंसा रहती थी। राज्य के जमा-खर्च का समस्त कार्य उसके अधीन था। वार्षिक कर, नजराना आदि का विवरण उसके पास रहता था।
राज्य में भूमिकर, चुंगीकर, राहदारी, पेशकश, दण्ड-शुल्क व अन्य आय से सम्बन्धित समस्त कागजात दीवान के निरीक्षण के लिए प्रस्तुत किये जाते थे। बाजार में वस्तुओं के भाव व कीमतों की जानकारी प्रतिदिन दीवान को दी जाती थी। समस्त राजकीय कोठारों, भण्डारों एवं कारखानों पर उसका नियंत्रण रहता था। दीवान उपर्युक्त समस्त जानकारी राजा को देता था।
राजपूत राज्यों में दीवान मुगल शासन प्रणाली के दीवान की भाँति केवल राजस्व विभाग का पदाधिकारी नहीं था अपितु वह न्यायिक, वित्तीय, सैनिक, नागरिक प्रशासन से सम्बन्धित समस्त अधिकारों का उपभोग करता था। राजा की अनुपस्थिति में शासन की बागडोर दीवान के हाथ में रहती थी।
ऐसे समय में दीवान देश-दीवान कहलाता था। उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत होने के कारण किसी-किसी राज्य में दो सहयोगी दीवानों की नियुक्ति की जाती थी। उन दोनों में से एक प्रशासन की देखभाल करता था और दूसरा राजस्व सम्बन्धी कार्य करता था। दीवान राजा के अधीन होता था तथा राजा की इच्छाओं की पूर्ति करना उसका मुख्य कर्त्तव्य था।
मुसाहिब
कुछ राज्यों में मुसाहिब का पद अत्यंत महत्वपूर्ण पद होता था। बीकानेर राज्य में इस पद के लिए मुख्त्यार शब्द का प्रयोग होता था। इस पद के साथ सम्मान अधिक और उत्तरदायित्व कम था। इस पद पर नियुक्त व्यक्ति महाराजा का विश्वसनीय सलाहकार होता था। कई बार यह पद मान एवं मर्यादा की दृष्टि से दीवान के पद से भी ऊँचा आँका गया है।
शक्तिशाली दीवान के समय इस पद पर किसी की भी नियुक्ति नहीं की जाती थी। मुसाहिब के कर्त्तव्य के सम्बन्ध में कहीं विस्तृत विवरण नहीं मिलता। मुसाहिब शासक को सलाह देने का काम करता था। बीकानेर राज्य में मुसाहिब सैनिक विभाग का संचालन करता था दयालदास की ख्यात से ज्ञात होता है कि महाराजा स्वरूपसिंह के काल में मुसाहिब सेना का प्रधान सेनापति था।
बख्शी
दीवान के बाद दूसरा प्रमुख अधिकारी बख्शी था। वह मुख्यतः सेना विभाग का अध्यक्ष होता था। वह सेना की रसद व्यवस्था, अनुशासन, सैनिकों का प्रशिक्षण, युद्ध में घायल सैनिकों का उपचार व पशुओं के उपचार एवं उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध करता था। वह सेना को वेतन देता था। सैनिकों की नियुक्ति, पद-वृद्धि और पदावनति का विवरण भी रखता था।
राज्य के दुर्गों में किलेदारों और नगर के दरवाजों पर तैनात सिपाहियों के वेतन का प्रबन्ध करना तथा उनकी नियुक्ति करने का कार्य भी बख्शी का होता था। गुप्तचरों का संगठन भी इसी के द्वारा किया जाता था। मुगलकालीन राजपूत राज्यों में कहीं-कहीं तनबख्शी और देश-बख्शी के दो पृथक् पद होते थे।
बख्शी का निकट सहायक नायब बक्शी भी होता था। खबरनवीस, किलेदार, मुशरिफ, हवलदार, दरोगा तोपखाना आदि उसके अधीन होते थे। जोधपुर राज्य में इसे फौज बख्शी भी कहते थे। बख्शी के पद पर सामान्यतः गैर-राजपूत नियुक्ति होते थे।
शिकदार
मुगल शासन प्रणाली के अनुरूप कुछ राजपूत राज्यों में शिकदार पद का सृजन हुआ परन्तु इन राज्यों का शिकदार मुगलों के शिकदार से कुछ भिन्न था। वह एक परगने का मुख्याधिकारी न होकर, नगर कोतवाल के समकक्ष था। तनबख्शी से पूर्व सैन्य विभाग का संचालन शिकदार ही करता था।
मुसाहिब के न होने पर पट्टायतों से सम्बन्धित समस्त कार्य इस पदाधिकारी द्वारा ही सम्पन्न किये जाते थे। जोधपुर राज्य में शिकदार एक प्रकार से नगर कोतवाल था। नगर प्रशासन का समस्त कार्य उसी के सुपुर्द था। मेवाड़ राज्य में शिकदार का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। वहाँ नगर प्रशासन का अधिकारी कोतवाल होता था।
खानसामां
खानसामां का पद दीवान के अधीन था परन्तु इसका राज-परिवार से सीधा सम्बन्ध होने के कारण खानसामां का राज्य में बहुत महत्व था। वह निर्माण, वस्तुओं के क्रय, राजकीय विभागों के सामान की खरीद और संग्रह से सम्बन्धित कार्य करता था।
राजदरबार तथा राजमहल से सम्बन्धी समस्त व्यक्तियों व कार्यों से उसका सम्पर्क रहता था। इस पद पर नियुक्त अधिकारी बहुत ही ईमानदार और राजा का विश्वासनीय व्यक्ति होता था। उसका समस्त राजकीय कारखानों से सीधा सम्बन्ध होता था। उदयपुर राज्य में प्राचीन परम्परा के अनुसार इस पद का नाम पाकाध्यक्ष था। वह राजरसोडे़ का मुख्य अधिकारी था।
वकील
पड़ौसी राज्यों के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध बनाये रखने के लिए वकील की नियुक्ति की जाती थी। मुगलकाल में वह शाही दरबार में राजा के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त रहता था और अपने शासक को मुगल दरबार की गतिविधियों से निरन्तर अवगत कराता रहता था। वह अपने राजा के हितों का ध्यान रखता था।
मीर मुंशी
राज्य में कूटनितिक पत्र-व्यवहार की देखरेख के लिए मीरमुंशी का एक अलग विभाग होता था। इस पदाधिकारी की सहायता के लिए एक दरोगा दफ्तरी होता था। आगे चलकर मारवाड़ में मीर मुंशी केवल फारसी में पत्र-व्यवहार करने लगा और वकील पड़ौसी राज्यों में महाराजा का प्रतिनिधित्व करने लगा था।
खजान्ची
खजान्ची खजाने में जमा एवं खर्च की राशि का विवरण रखते थे। मेवाड़ में इस अधिकारी को कोषपति कहते थे। उसके लिए मितव्ययी होना आवश्यक था ताकि वह खजाने की रकम में वृद्धि करता रहे। ईमानदार और विवेकशील होना खजान्ची के प्रमुख गुण माने जाते थे।
अन्य अधिकारी
राज्य में किले का रक्षक या अधिकारी किलेदार कहलाता था। वह किले की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होता था। किलेदार अपने पास पर्याप्त सैनिक रखता था। राजा का अत्यन्त विश्सनीय व्यक्ति ही इस पद पर नियुक्त होता था। राज्य का एक अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारी ड्योढ़ीदार होता था। महल की सुरक्षा, देखरेख व निरीक्षण का दायित्व उसी पर निर्भर था।
वह राजा से मिलने के लिये आने वाले व्यक्तियों पर दृष्टि रखता था तथा उन्हें राजा से मिलाने की व्यवस्था करता था। राज्य में धार्मिक कार्यों व उत्सवों, त्यौहारों व पर्वों को सम्पन्न करवाने के लिए पुरोहित होता था। पुरोहितों को पड़ौसी राज्यों में संदेश भेजने के लिए भी नियुक्त किया जाता था। पुरोहित का बड़ा सम्मान होता था।
शासक उन्हें कर-मुक्त भूमि व गाँव जागीर में देते थे। धर्म-सम्बन्धी कार्यों में पुरोहित के अतिरिक्त राजव्यास और बारहठ का भी बड़ा महत्व था। राजपूत राज्यों में धर्म व दान सम्बन्धी कार्यों के लिए पृथक् विभाग होता था जिसे धर्मार्थ विभाग (देवस्थान धर्मपुरा) या महकमा पुण्यार्थ कहते थे।
इस विभाग का कार्य मन्दिरों, गरीबों, अनाथों, विधवाओं आदि को राजकीय अनुदान देना था। उदयपुर राज्य में इस विभाग के अध्यक्ष को दानाध्यक्ष, कोटा राज्य में हाकिम पुण्य और जयपुर राज्य में हाकिम खैरात कहते थे।
उपरोक्त अधिकारियों के अतिरिक्त राज्य में छोटे-बड़े कई अधिकारी होते थे। उदाहरणार्थ- दरोगा-ए-डाकचौकी, दरोगा-ए-सायर, दरोगा-ए-फरासखाना, दरोगा-ए- जवाहरखाना, दरोगा-ए-आवदार (खाने-पीने का अधिकारी), दरोगा-ए-शिकारखाना आदि अधिकारी अपने-अपने विभागों का कार्य करते थे। कहीं-कहीं इन्हें हवलदार कहा जाता था। स्थानीय परिस्थितियों एवं विभिन्नताओं के कारण इन पदाधिकारीयों के पदनामों में अन्तर होता था।
राजपूत राज्यों में स्थानीय प्रशासन
राजपूत राज्य परगनों में विभाजित थे। जयपुर में महाराजा मानसिंह के काल में राज्य को परगनों में विभाजित किया गया था। मेवाड़ में 1621 ई. महाराणा कर्णसिंह के काल में परगनों का होना प्रमाणित होता है। क्षेत्रीय प्रशासन व राजस्व वसूली की दृष्टि से किन्हीं-किन्हीं में चीरा व्यवस्था का गठन किया गया था।
दो सौ गाँवों को मिलाकर एक चीरा बनाया गया था। परगनों की इकाईयाँ मुख्यतः वे क्षेत्र थे, जो बीकानेर शासन को मुगल बादशाह की ओर से तनख्वाह जागीर के रूप में प्राप्त हुए थे और बाद में बीकानेर राज्य में मिला लिए गये थे।
विभिन्न परगनों का आकार व विस्तार एक जैसा नहीं था। मारवाड़, मेवाड़ और बीकानेर राज्यों में परगने का मुख्य अधिकारी हाकिम कहलाता था। जयपुर और कोटा राज्यों में उसे क्रमशः फौजदार एवं हवलगिर कहते थे। परगनों के हाकिमों की नियुक्ति सामान्यतः दीवान की सलाह से स्वयं राजा के द्वारा की जाती थी।
हाकिम को विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक, सैनिक, न्यायिक और राजस्व सम्बन्धी कार्य करने पड़ते थे। परगने की सुरक्षा का पूर्ण दायित्व उसी का होता था। वह परगने के सरदारों से सम्बन्ध बनाये रखता था। वह परगने में सामन्तों से राजकीय चाकरी हेतु सवार प्राप्त करने, उनसे वार्षिक कर की रकम वसूलने तथा जनता से नियमित कर वसूली का कार्य करता था।
परगने के मुख्यालय पर हाकिम का कार्यालय होता था, जिसे हाकिम की कचहरी कहा जाता था। हाकिम वहाँ बैठकर फौजदारी और दीवानी कार्य करता था। परगने में चुंगीकर की वसूली के लिए केन्द्र की ओर से सायर दरोगा की नियुक्ति की जाती थी। दरोगा की सहायता के लिए हाकिम, अमीन की नियुक्ति करता था।
भूमिकर वसूली के लिए परगने में कानूनगों नामक कर्मचारी होता था जिसका मुख्य कार्य भूमि-कर की वसूली करना, परगने के कृषिगत उपज का लेखा-जोखा रखना और भूमि सम्बन्धी दस्तावेजों को सुरक्षित रखना था। इन पदाधिकारियों के अतिरिक्त परगने में कारकून, वाकयानवीस, चौकीनवीस, पोतदार आदि कर्मचारी भी हाकिम के अधीन कार्यरत रहते थे। कहीं-कहीं परगने में सैनिक व पुलिस सम्बन्धी कार्य करने के लिए फौजदार नामक अधिकारी होता था।
वह परगने में सुरक्षा सम्बन्धी कार्यों के लिए उत्तरदायी था तथा मालगुजारी की वसूली में अमीन, मालगुजार तथा आमिल को सहयोग देता था। मेवाड़ और आमेर राज्यों में फौजदार का पद अलग होता था। कोटा में हवलगिर, परगने के हाकिम की भाँति कार्य करता था। परगने में चोरों और डाकुओं पर नियंत्रण रखने के लिए थाने होते थे, जहाँ थानेदार अपने निश्चित सिपाहियों के साथ तैनात रहता था। बीकानेर के चीरे और परगनों में चिरायता या हाकिम प्रधान अधिकारी होता था तथा राजस्व वसूली का कार्य आमिल के स्थान पर हवलदार करता था।
राजपूत राज्यों में नगर प्रशासन
कोतवाल: नगर का मुख्य अधिकारी कोतवाल होता था। राज्यों की राजधानियों के अतिरिक्त परगनों के बड़े-बड़े कस्बों में कोतवाल नियुक्त किये जाते थे। कोतवाल के प्रमुख दायित्व इस प्रकार से होते थे-
(1.) नगर में शान्ति और व्यवस्था बनाये रखना।
(2.) नगर के प्रवेश एवं निकासी द्वारों पर पुलिस सन्नद्ध करना।
(3.) रात्रि गश्त लगाने की व्यवस्था करना।
(4.) पुलिस कार्य के साथ-साथ नगरपालिका प्रशासन का दायित्व संभालना।
(5.) नगर की सफाई और स्वास्थ्य का ध्यान रखना।
(6.) बाजार में मूल्यों, बाटों व माप का निरीक्षण करना।
(7.) लावारिस सम्पत्ति की व्यवस्था करना।
(8.) नगरवासियों व व्यापारियों पर लगे करों की वसूली करना।
(9.) धार्मिक व सार्वजनिक स्थानों का प्रबन्ध करना।
नगर सेठ
राजपूताने के कई राज्यों में नगर सेठ नियुक्त किये जाते थे। नगर सेठ व्यापारिक संस्थानों के संचालन के साथ-साथ राजकीय ट्रेजरी के रूप में भी काम करते थे। एक नगर में एक ही नगर सेठ हो सकता था। यह पद प्रायः वंशानुगत चलता था। मेवाड़ राज्य के प्रत्येक बड़े नगर में नगर सेठ को राजा के द्वारा न्यायाधीश मनोनीत किया जाता था। राज्य में तथा नगर में नगर सेठ का बड़ा सम्मान होता था।
राजपूत राज्यों में ग्राम प्रशासन
राजस्व वसूली की सुविधा के लिए राज्य को परगनों में विभक्त किया जाता था। प्रत्येक परगना तपों (गाँवों का समूह) में विभाजित किया जाता था। प्रशासन की लघुत्तम इकाई मौजा (गाँव) होती थी। पूर्व मध्यकालीन युग में गाँव या गाँवों के समूह पर ग्रामिक होता था जो गांवों की व्यवस्था देखता था।
मुगलों का शासन होने पर ग्रामिक को पटवारी कहा जाने लगा। वह भूमि सम्बन्धी विभिन्न अभिलेख तैयार करता था जिनके आधार पर राजस्व का निर्धारण एवं वसूली होती थी। कनवारिया (खेत का रक्षक), तफेदार (उपज में राज्य के भाग का हिसाब रखने वाला), तोलावटी (उपज को तोलने वाला), साहणे (राज्य का भाग निश्चित करने वाला अधिकारी), चौकीदार (मीणा व बावरी) आदि कर्मचारी पटवारी के सहयोगी होते थे।
कहीं-कहीं हवालदार की नियुक्ति की जाती थी। वह गाँवों में जमाबन्दी के आधार पर करों तथा निश्चित भोग के हिस्से के अनुसार मालगुजारी वसूल करता था। गाँव में प्रशासनिक स्तर पर स्थायी रूप से चौधरी या पटेल होते थे, जिनका मुख्य काम गाँव में शान्ति बनाये रखना तथा कर वसूली में राजकीय अधिकारियों को सहयोग देना था।
इस सेवा के बदले उसे राज्य की ओर से कर-मुक्त भूमि प्राप्त होती थी। उसे लगान में से भी कुछ हिस्सा दिया जाता था। राजधानी तथा परगना आदि मुख्यालयों से आने वाले अधिकारियों एवं जागीरदारों के गांव में आने पर उनके ठहरने तथा भोजन आदि की व्यवस्था चौधरी के द्वारा की जाती थी।
ग्राम पंचायत
ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायतें प्रशासनिक कार्य करती थीं। ग्रामीण दैनंदिनी में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। गाँव का मुखिया (चौधरी या पटेल) तथा गाँव के अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति, जिनकी संख्या सामान्यतः पाँच होती थी, गाँव की पंचायत के सदस्य होते थे।
गाँव में शान्ति और सुरक्षा बनाये रखना और ग्राम प्रशासन में सहयोग देना पंचायतों के मुख्य कर्त्तव्य थे। पंचायत के समक्ष भूमि सम्बन्धी झगड़े, खेत व गाँव की सीमा के विवाद, चोरी, अपहरण, बलात्कार आदि वाद प्रस्तुत किये जाते थे। पंचायतों के निर्णयों के विरुद्ध परगना अधिकारी, दीवान व राजा के समक्ष अपील की जा सकती थी।
जाति पंचायत
मध्यकालीन राजपूताना राज्यों में जाति पंचायतों का अत्याधिक प्रभाव था। हर जाति की अपनी जाति पंचायत होती थी जिसमंे दूसरी जाति के लोग हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे। एक गांव अथवा कुछ गांवों के लिये एक जाति पंचायत होती थी। जाति पंचायतों द्वारा सामाजिक एवं जाति सम्बन्धी समस्याओं का समाधान किया जाता था।
इनके द्वारा विवाह एवं परित्याग सम्बन्धी झगड़े, सामाजिक परम्पराओं की अवहलेना, व्यभिचार एवं कुटुम्बीय झगड़े निबटाये जाते थे। जाति पंचायतों द्वारा अपनाई गई दण्ड-व्यवस्था में प्रायश्चित, क्षमायाचना, अर्थ दण्ड, तीर्थयात्रा द्वारा शुद्धिकरण, न्याति भोज, ग्राम भोज, जाति बहिष्कार, ग्राम बहिष्कार, हुक्का-पानी बहिष्कार आदि दण्ड दिये जाते थे। जाति पंचायतों के निर्णय को राज्य द्वारा मान्यता होती थी। राज्य की ओर से भी जाति सम्बन्धी विवाद जाति पंचायतों को सौंपे जाते थे।
व्यावसायिक पंचायतें
नगरों एवं कस्बों में व्यवसायों से सम्बन्धित पंचायतें होती थीं। इनमें व्यापारियों के लेन-देन, लेखा-जोखा, साझेदारी तथा मुकाते आदि के विवाद निबटाये जाते थे।
पंचायत संस्थाओं का महत्व
पंचायत संस्थाएँ राज्य और प्रजा दोनों के लिए लाभप्रद थीं। इन पंचायतों के माध्यम से सामाजिक नियमों और परम्पराओं की पालना होती थी तथा समाज में अनुशासन बना रहता था। किसी भी जातीय अथवा व्यावसायिक पंचायत के लिए सरकारी मान्यता मिलना गौरव की बात होती थी।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवेचन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि मध्यकाल में राजपूत राज्यों की प्रशासन व्यवस्था प्राचीन क्षत्रिय राज्यों की शासन व्यवस्था पर आधारित थी किंतु मुगलों के प्रभाव के कारण उसमें अनेक परिवर्तन आ गये थे। राजपूत राज्यों में एक विकसित शासन तंत्र था जो जागीरदारों एवं सामंती व्यवस्था पर आधारित था।
राजा की अपनी सेना न होकर सामंतों की सेना ही राज्य के लिये उपलब्ध होती थी। गाँव से लेकर बड़े नगरों एवं राजधानी में न्याय के लिये भी सुविकसित तंत्र था जो राजा एवं उसके सामंतों एवं मंत्रियों के अधीन काम करता था। शासक के अयोग्य और निर्बल होने पर शासन अव्यवस्थित होने लगता था।
राज्य में नौकरशाही के लिए कोई निश्चित सेवा नियम नहीं थे। राजस्व का अधिकांश भाग राजा और राजपरिवार पर खर्च होता था। सामन्तों का जीवन विलासी था जिससे किसानों एवं विभिन्न कामों में लगे लोगों का शोषण होता था। अधिकांश राजपूत शासक धर्मपरायण थे। गाँवों का शासन स्व-संचालित था तथा ग्राम शासन में सामान्यतः शासक हस्तक्षेप नहीं करता था।
राजपूतों का राजस्व प्रशासन इस प्राचीन सिद्धांत पर आधारित था कि भोग रा धणी राज हो, भोम रा धणी म्हाँ छो। अर्थात् भूमि तो जोतने वाले किसान की है, राजा केवल भोग अर्थात् राजस्व का अधिकारी है किंतु मुगल काल में इस मान्यता को ठुकरा दिया गया और राजा एवं जागीरदार ही समस्त भूमि के वास्तविक मालिक बन गए।
राजपूतों का राजस्व प्रशासन
राजपूताना के विभिन्न राज्यों में राजस्व, कर और भूमि व्यवस्था में कुछ परिवर्तन होते हुए भी कुछ बातें एक जैसी थीं। राज्यों की भूमि सामान्यतः खालसा, हवाला, जागीर, भोम और सासण में विभाजित थी। दीवान खालसा भूमि का प्रबन्धन एवं नियन्त्रण करता था। हवालदार हवाला भूमि की देखरेख करता था।
जागीदार जागीर पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखता था। परगना हाकिम यह देखता था कि जागीरदार निश्चित वार्षिक कर समय पर राजकीय खजाने में जमा करवा रहा है या नहीं! जागीरदारों से वार्षिक कर के अतिरिक्त समय-समय पर पेशकश के रूप में धनराशि एकत्रित की जाती थी। भोमियों के नियंत्रण में स्वामित्व के आधार पर भोम की भूमि होती थी।
वे एक निर्धारित राशि फौजबल या भूमबाब के नाम से राज्यकोष में जमा करवाते थे। इसके अतिरिक्त वे किसी अन्य तरह के कर का भुगतान नहीं करते थे परन्तु उन्हें राज्य द्वारा निर्दिष्ट सेवा करनी पड़ती थी। सासण भूमि की उपज का भाग मन्दिरों, ब्राह्मणों, चारणों आदि के उपभोग हेतु पुण्यार्थ दिया जाता था।
राजपूत राज्यों में यह मान्यता थी कि भोग रा धणी राज हो, भोम रा धणी म्हाँ छो। अर्थात् भूमि तो जोतने वाले किसान की है, राजा केवल भोग अर्थात् राजस्व का अधिकारी है। राजा व जागीरदारों द्वारा काश्तकारों को पट्टे दिये जाते थे। उनका विवरण राजकीय रजिस्टर में दर्ज रहता था जिसे दाखला कहते थे।
भू-राजस्व का निर्धारण
राजपूत राज्यों में भोग अर्थात् भू-राजस्व निर्धारित करने एवं उसे वसूल करने के विभिन्न तरीके थे। इसका निर्धारण भूमि के स्वरूप, फसल के प्रकार तथा काश्तकार की जाति के आधार पर किया जाता था। भूमि की उत्पादन क्षमता के आधार पर प्रत्येक श्रेणी पर अलग-अलग दरों से राजस्व की वसूली की जाती थी। एक ही राज्य में अलग-अलग परगनों के राजस्व की दरों में भिन्नता होती थी। मालगुजारी सामान्यतः वस्तुओं (जिन्सों) के रूप में ली जाती थी। इसकी वसूल करने के विभिन्न तरीके थे।
लाटा (बटाई)
राजपूत राज्यों में लाटा अथवा बटाई पद्धति अधिक प्रचलन में थी। इस पद्धति में, जब फसल पककर तैयार हो जाती थी और खलिहान में अच्छी तरह साफ कर ली जाती थी तब एकत्रित अनाज के ढेर को तौलकर या डोरी (रस्सी) द्वारा नापकर राज्य का हिस्सा निश्चित किया जाता था।
कूंता: कहीं-कहीं अनुमान के आधार पर ही राज्य या भू-स्वामी का हिस्सा निश्चित कर लिया जाता था। इस प्रणाली को कंूता कहते थे।
हलगत
राजस्व निर्धारण के लिये कहीं-कहीं हलगत प्रणाली प्रचलन में थी। इस प्रणाली में, प्रत्येक हल पर अर्थात् एक हल से जोती गई भूमि पर राजकीय कर वसूल किया जाता था। एक हल से 50 से 60 बीघा भूमि जोती जा सकती थी। हल पर लगने वाले कर की दर समस्त जगह समान नहीं थी। कई बार हलगत की रकम सामूहिक रूप से जमा के नाम से पूरे गाँव पर लागू कर दी जाती थी।
मुकाता
मुकाता प्रणाली में राज्य की ओर से निश्चित किया जाता था कि प्रत्येक खेत पर नकदी या जिन्सों के रूप में एकमुश्त कितना लगान देना है।
डोरी
इस प्रणाली में एक डोरी में नापे गये बीघे का हिस्सा निर्धारित करके लगान वसूल किया जाता था।
घुघरी
जब प्रति कुआं अथवा प्रति पैदावार की एक निश्चित मात्रा निर्धारित कर दी जाती थी, तब उसे घुघरी कहते थे। रबी और खरीफ के लिये लगान की दरों में भिन्नता होती थी।
राजस्व का वितरण
जब तक उपज की बटाई नहीं होती थी, तब तक बलाई और सहणा खलिहान में धान की चौकीदारी करते थे। बटाई के समय हवालदार, कनवारिया, चौधरी (पटेल), पटवारी, कामदार (जागीर क्षेत्र में) और काश्तकार उपस्थित रहते थे। कनवारिया, सहणा, बलाई, पटवारी, तोलायत, चौधरी आदि समस्त लोगों को बटाई में से हिस्सा प्राप्त होता था।
नेग
बटाई के समय काश्तकार विभिनन लोगों को अनेक प्रकार के नेग व लाग देता था। सुथार, लुहार, नाई, धोबी, दर्जी, नट, मेहतर, रेगर, चमार आदि को अनाज की ढेरी में से कुछ मुट्ठी अनाज दिया जाता था। कुछ अनाज मन्दिरों में भेंट स्वरूप दिया जाता था। उपज की बटाई करने के बाद प्रायः किसान के पास इतना अनाज नहीं बचता था कि साल भर परिवार का काम चल सके। इसलिये किसान को अन्य कार्यों से आय करनी पड़ती थी।
लाग-बाग
जागीरदार अपनी-अपनी जागीरों में किसानों, चरवाहों एवं विभिन्न प्रकार के कार्य करने वाले लोगों से विभिन्न प्रकार की लाग-बाग वसूल करते थे जिनकी संख्या कहीं-कहीं तो सौ से भी अधिक थी। लाग कर को तथा बाग बेगार को कहते थे।
विभिन्न प्रकार के कर
राजपूत राज्यों में विभिन्न व्यक्तियों, जातियों और विशेष अवसरों पर विभिन्न प्रकार के कर लगाये जाते थे। गृहकर, घासमरी, व्यवसायिक जातियों पर लगाये गये कर, पेशकशी, नजराना, अंग, फौजबल, रखवाली भाछ, जुर्माना, टकसाल, कारखाना, न्यौता, विवाह, त्यौहार, जकात (सायर), व्यापारियों पर लगाये गये कर, बिक्री कर, वन, खान, नमक आदि पर लगाये गये करों से राज्य को बहुत आय होती थी।
इसके अतिरिक्त जागीरदारों से निश्चित राशि उपलब्ध होती थी। राजपूत राज्यों में 70 से 80 प्रतिशत अथवा उससे भी अधिक भूमि जागीरदारों के अधीन थी। जागीरदार, किसानों एवं अन्य लोगों से वसूल किये गये करों में से राज्य को नजर, हुक्मनामा या खड्गबन्दी, तागीरात, रेख, पेशकशी, नजराना, न्यौता, बेतलबी शुल्क आदि देता था। इस कारण राजपूताने की जनता करों के भार से बुरी तरह दबी हुई थी।
करों में छूट
गाँवों में किसानों तथा विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों की स्थिति बड़ी दयनीय थी। प्राकृतिक आपदा की स्थिति में लोगों के लिये यह संभव ही नहीं होता था कि वे राजकीय करों का भुगतान करें। ऐसी स्थिति में राजा करों में छूट देता था। अकाल, सूखा, महामारी व अन्य दैवीय प्रकोपों के अवसर पर किसानों को हासल में छूट दी जाती थी।
छूट की मात्रा तीन प्रकार की होती थी- (1.) चौथाई, (2.) आधी और (3.) पूरी। नये गाँव बसाने या पुरानी बस्तियों को फिर से बसाने तथा व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य की ओर से विभिन्न प्रकार करों में भी राहत दी जाती थी।
राजकीय आय का व्यय
राजकीय आय मुख्यतः राजा, राज-परिवार के सदस्यों, ड्योढ़ियों की देखभाल, राजकीय कारखानों के संचालन एवं उनकी व्यवस्था, राजकीय कार्यालयों एवं न्यायालयों के संचालन, राज्य-कर्मचारियों के वेतन, महलों व सार्वजनिक निर्माण कार्य, सिरोपाव, ईनाम, दान-पुण्य, षट्दर्शन आदि पर व्यय होती थी। राजा सेना पर बहुत कम धन व्यय करता था, क्योंकि सेना के अधिकांश भाग की पूर्ति सामन्तों की सेना से होती थी। सामन्त अपनी सेना का खर्च स्वयं वहन करते थे।
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं—
काशी...