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केजरीवाल …… थोड़ी-थोड़ी और बजेगी!

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केजरीवाल
केजरीवाल

भारत की राजनीति में यह एक कमाल का कारनामा हुआ है, जिस समय तक केजरीवाल जेल में बंद थे, तब तक तो वे सरकारी कागज पर हस्ताक्षर कर सकते थे किंतु जेल से बाहर आने पर उनकी यह शक्ति छीन ली गई है। इस पर भी केजरीवाल ने जेल से बाहर आते ही यह वक्तव्य दिया है कि उनका हौंसला कम नहीं हुआ है, अपितु सौ गुना बढ़ गया है।

अमृत वही अच्छा होता है जिसमें किसी को अमर करने की क्षमता हो, विष वह अच्छा होता है जो किसी के प्राण ले ले। मुख्यमंत्री वही अच्छा होता है जिसकी कलम में ताकत हो किंतु जिस मुख्यमंत्री की कलम ही छीन ली जाए और उससे कह दिया जाए कि वह किसी भी सरकारी कागज पर हस्ताक्षर नहीं करेगा, तो वह कैसा मुख्यमंत्री है!

पूजा में वही फूल काम में लिए जाते हैं जिनमें सुगंध हो! नागराज वही पूजनीय होते हैं जिनके मुख में दांत हों, जिस नाग के दांत तोड़ दिए जाएं, वह पूजा किए जाने के योग्य नहीं रहता, खिलौना बन जाता है। उसी प्रकार जिस मुख्यमंत्री से हस्ताक्षर करने के अधिकार छीन लिए जाएं, वह भी मुख्यमंत्री नहीं रहता, खिलौना बन जाता है। केजरीवाल अब दिल्ली के ऐसे ही मुख्यमंत्री हैं। वे न अपने कार्यालय में जा सकते हैं, न किसी सरकारी कागज पर हस्ताक्षर कर सकते हैं।

भारत की राजनीति में यह एक कमाल का कारनामा हुआ है, जिस समय तक केजरीवाल जेल में बंद थे, तब तक तो वे सरकारी कागज पर हस्ताक्षर कर सकते थे किंतु जेल से बाहर आने पर उनकी यह शक्ति छीन ली गई है। इस पर भी केजरीवाल ने जेल से बाहर आते ही यह वक्तव्य दिया है कि उनका हौंसला कम नहीं हुआ है, अपितु सौ गुना बढ़ गया है।

कमाल है भाई! कलम चलाने का अधिकार छिन जाने पर भी आपका हौंसला बना रहता है। ऐसा हौंसला आप लाए कहाँ से हैं?

जब समाज के पास मनोरंजन के आधुनिक साधन नहीं थे, तब गांवों में कठपुतलियों को नचाकर लोगों का मनोरंजन करने वाले घूमा करते थे। कठपुतलियों का एक मजाकिया खेल आज की राजनीति पर बड़ा सटीक बैठता है। इस खेल में बड़े-बड़े राजाओं-महाराजाओं का एक दरबार सजता है जिसमें बड़ी-बड़ी मूंछों एवं बड़ी-बड़ी तलवारों वाले राजा एकत्रित होते हैं। वे देश को दुश्मन से आजाद करवाने के लिए बड़ी-बड़ी चिंताएं व्यक्त करते हैं।

जब एक ढोलक बजाने वाले को पता चलता है कि यहाँ राजाओं का दरबार सजा हुआ है तो वह दरबार में आकर उन्हें प्रणाम करता है और अपनी ढोलक बजाकर उन्हें सुनाता है। राजा लोग उसकी ढोलक को सुनकर प्रसन्न होते हैं तथा उसे पुरस्कार देते हैं। ढोली उत्साहित होता है तथा जोर-जोर से ढोलक बजाता है। इस बार भी राजा लोग प्रसन्न होते हैं तथा उसे थोड़ा पुरस्कार और देते हैं। ढोली फिर ढोलक बजाता है। अब राजाओं में ढोलक के प्रति पहले जैसा आकर्षण दिखाई नहीं देता। ढोली फिर से ढोलक बजाता है, राजा लोग ढोली की तरफ ध्यान देना बंद करके अपना विचार-विमर्श आरम्भ कर देते हैं।

ढोली चुप होकर राजाओं की बात सुनता है किंतु कुछ देर बाद ढोली को लगता है कि राजा लोग उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे, उनका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए ढोली फिर से ढोलक बजाता है। इस पर एक राजा ढोली को शांत रहने का संकेत करता है। ढोली थोड़ी देर शांत रहकर फिर से ढोलक बजाता है। इस पर एक राजा, ढोली को पुनः शांत रहने का संकेत करता है। ढोली शांत हो जाता है और कुछ देर बाद फिर से ढोलक बजाता है।

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इस पर एक राजा नाराज होकर ढोली को पीट देता है। ढोली फिर शांत हो जाता है किंतु कुछ देर बाद फिर से ढोलक बजाने लगता है। इस बार सारे राजा मिलकर ढोली को पीटते हैं। इस पर ढोली को भी गुस्सा आ जाता है और वह जोर-जोर से ढोलक बजाता हुआ चिल्लाता है- थोड़ी-थोड़ी और बजेगी।

केजरीवाल का यही हाल है, उनका हौंसला टूटना तो दूर, कम नहीं होता! अपितु छः महीने की जेल काटकर हौंसला पहले से ज्यादा बढ़ जाता है। इसी को कहते हैं- थोड़ी-थोड़ी और बजेगी!

समय के साथ माहौल में काफी बदलाव आ गया है। इस बार केजरीवाल की थोड़ी-थोड़ी और बजेगी केवल मजाक नहीं है, कांग्रेस के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। अगले महीने होने वाले हरियाणा विधानसभा चुनावों में केजरीवाल की ढोलक थोड़ी-थोड़ी नहीं बजेगी, पूरे जोर से बजेगी और राजाओं की हालत पतली हो जाएगी।

दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में आम आदमी पार्टी का अच्छा प्रचार और प्रभाव है। इस कारण दूसरे राजनीतिक दलों की चिंताएं बढ़ गई हैं। आम आदमी पार्टी हरियाणा में भले ही सीटें न जीत पाए किंतु निश्चित रूप से कांग्रेस के वोटों में बड़ी सेंध लगाएगी। जेजेपी और इनेलो की भी मुसीबत बढ़ गई है।

आप पार्टी बीजेपी का भी कुछ न कुछ नुक्सान अवश्य करेगी किंतु अंततः बीजेपी को लाभ होगा।

इसलिए कहा जा सकता है कि इस बार ढोली केवल ढोलक बजाने नहीं आया है, राजाओं के ताज गिराने आया है। इसलिए केजरीवाल की ढोलक पूरे जोश से बजेगी।

जिस प्रकार पिछले लोकसभा चुनावों में दिल्ली क्षेत्र के चुनावों से एक महीना पहले केजरीवाल को जमानत पर छोड़ा गया था, इस बार भी हरियाणा विधान सभा के चुनावों से लगभग पंद्रह दिन पहले जेल से बाहर निकाल दिया गया है।

यही हाल राशिद इंजीनियर का भी है। वह भी जम्मू-कश्मीर में होने जा रहे विधान सभा चुनावों से ठीक पहले अपनी ढोलक लेकर जेल से बाहर आ गया है। उसकी ढोलक निश्चित रूप से फारुख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस तथा महबूबा मुफ्ती की पीडीपी का खेल पूरी तरह से बिगाड़ देगी।

राशिद इंजीनियर तो चुनावों के बाद फिर से जेल में चला जाएगा किंतु जेल जाने से पहले अब्दुल्ला परिवार और मुफ्ती परिवार की राजनीतिक ढोलकों की थाप अच्छी तरह बिगाड़ जाएगा!

जिस प्रकार केजरीवाल का हौंसला जेल में रहकर कम नहीं हुआ, उस प्रकार राशिद इंजीनियर भी जेल में रहकर नया हौंसला पा गया है।

नेताओं के हौंसले कभी कम नहीं होते, हौंसले तो लालू यादव के भी कम नहीं हुए भले ही बिहार की जनता ने उनके परिवार एवं उनकी पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनावों बुरी तरह नकार दिया हो किंतु हौंसला वही है। उनकी भी ढोलक जोर से बज रही है। हौंसले तो ममता बनर्जी के भी कम नहीं हुए। पूरा पश्चिमी बंगाल गुस्से की आग में जल रहा है, किंतु ममता का हौंसला कहाँ टूटा है। ममता भी थोड़ी-थोड़ी और बजेगी गाती रहेंगी। राजनीति की ढोलक बजाती रहेंगी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्या अकबर मुसलमान था ? (145)

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क्या अकबर मुसलमान था

इतिहासकारों ने इस प्रश्न को लेकर बहुत माथापच्ची की है कि क्या अकबर मुसलमान था? (Was Akbar a Muslim?) विभिन्न इतिहासकारों ने इस प्रश्न का उत्तर अलग-अलग ढंग से दिया है। अधिकांश विदेशी इतिहासकारों का मानना है कि अकबर निश्चित रूप से जीवन भर इस्लाम और पैगम्बर (Islam and Prophet) पर विश्वास करता रहा इसलिए यह प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए कि क्या अकबर मुसलान था?

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि अकबर अपने जीवन के आरम्भिक भाग में इस्लाम के सिद्धांतों में बड़ी श्रद्धा रखते हुए भी दूसरे धर्म वालों के प्रति बड़ा उदार था। इबादतखाने की तहरीरों को सुनने के बाद अकबर के मजहबी विचारों एवं विश्वासों के विकास का द्वितीय दौर आरंभ हुआ। कट्टर इस्लाम में अकबर का विश्वास हिल गया।

बदायूनी (Abdul Qadir Badauni) ने लिखा है कि पढ़े-लिखे जुबानी तलवार चलाकर जंग लड़ते। वाद-प्रतिवाद करते, पंथों के विरोध इस ऊंचाई पर पहुंच जाते कि वे एक-दूसरे को मूर्ख और पाखण्डी कहने लगते। यह विवाद शिया-सुन्नी, हनीफी-शाफई से ऊपर उठकर मूल विश्वास पर ही आक्रमण कर देता।

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि अकबर का तर्क-सम्मत विश्वास, इस्लाम के परंपरागत स्वरूप (The traditional form of Islam) से पहले ही हिल गया था। कयामत (Qayamat or The Day of Judgment) के इस्लामी सिद्धांतों को अकबर ने मानने से इंकार कर दिया और इलहाम (Ilham or Divine inspiration) की बात तो उसने एक ओर ही रख दी। उसे यह विश्वास ही नहीं होता था कि कोई स्वर्ग कैसे जाता है? वहाँ से लंबी बातचीत करके इतनी जल्दी वापस कैसे आ सकता है कि उसका बिस्तर गरम का गरम मिले? डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि बहुत सी हिंदू और फारसी नीतियों और विश्वासों को भी अकबर ने अपना लिया था जैसे पुनर्जन्म का सिद्धांत और सूर्य उपासना। इस प्रकार इस्लाम से उसकी विरक्ति आरंभ हुई।

आधुनिक इतिहासकारों में से बहुतों का यह विचार है कि अकबर जीवन भर और अंत समय तक भी मुसलमान ही बना रहा किंतु डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि मैं उनके विचारों से सहमत नहीं हूँ। हिंदू धर्म के प्रतिकूल इस्लाम एक सुनिश्चित धर्म है और जो व्यक्ति इस धर्म के पांच मूलभूत सिद्धांतों कलमा अर्थात् अल्लाह एक है, मोहम्मद की पैगंबरी, पांच नमाजों, रमजान के रोजों, जकात और हज में विश्वास नहीं रखता, मुसलमान नहीं कहा जा सकता।

डॉ. श्रीवास्तव लिखते हैं कि कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत (The philosophy of karma and rebirth) पर विश्वास तथा सूर्य की उपासना, चाहे वह यह समझ कर ही की जाए कि सूर्य प्रकाश का स्रोत है, मुसलमानी धर्म के मूल सिद्धांत के बिल्कुल विरुद्ध है। डॉ. श्रीवास्तव लिखते हैं कि इस्लाम का दावा है कि सत्य पर केवल उसी का एकाधिकार है, अन्य धर्मों में सत्य नहीं है और जो कुछ पहले पैगंबरों ने शिक्षा दी थी, वह सब मोहम्मद की शिक्षा द्वारा रद्द हो गई है क्योंकि मोहम्मद सबसे अंतिम और सबसे बड़े पैगंबर हुए हैं।

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डॉ. श्रीवास्तव लिखते हैं कि अकबर मोहम्मद पैगंबर (Prophet Muhammad) को मानता था किंतु हमारे पास तत्कालीन कोई ऐसा प्रमाण नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि अकबर अपने बाल्यकाल में मजहब में निष्ठा रखे रहा। वौटेल्हो और पैरुशिची जिनकी यह धारणा थी, उस काल के इतिहासकार नहीं थे और उन्होंने अपनी जो राय प्रकट की है वह केवल जेजुइट पादरियों के लेखों पर आधारित है। डॉ. श्रीवास्तव लिखते हैं कि ईस्वी 1586 में अब्दुल्ला खाँ उजबेग (Abdullah Khan Uzbek) को अकबर द्वारा लिखे गए पत्र को भी, जिसमें उसने लिखा था कि वह (अकबर) मुसलमान है, इस सम्बन्ध में प्रमाण के रूप में प्रस्तुत और स्वीकार करना भी उचित नहीं है। यह तो केवल कूटनीतिक पत्र-व्यवहार था जिसमें सत्य की प्रतिष्ठा नहीं थी। यद्यपि अकबर ने इस्लाम को छोड़ दिया था तथापि मुसलमानी सभ्यता की सभी बातों को छोड़ना उसके लिए असंभव था क्योंकि उसका बाल्यकाल उसी सभ्यता में व्यतीत हुआ था। जब हम मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी, पण्डित जवाहर लाल नेहरू तथा डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव द्वारा अकबर के सम्बन्ध में प्रकट की गई धारणाओं पर ऐतिहासिक तथ्यों के संदर्भ में चर्चा करते हैं तो हम पाते हैं कि उनकी ये धारणाएं बिल्कुल गलत हैं कि अकबर सभी मजहबों से ऊपर उठ गया था या उसने इस्लाम छोड़ दिया था या उसने दूसरे धर्मों की बहुत सी बातों को मान लिया था।

इन्हीं धारणाओं के कारण यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है कि क्या अकबर मुसलमान था किंतु वास्तव में यह प्रश्न बेमानी है। सच्चाई यह है कि अकबर जीवन के आरम्भ से लेकर जीवन के अंत तक मुलसमान बना रहा। उसका मन इस्लाम से उचाट नहीं हुआ था।

अकबर यदि उकताया था तो मुल्लों के कट्टरपन से जो अपने-अपने हिसाब से इस्लाम की व्याख्या करते थे और अपनी बात को ही सही ठहराने की जिद्द ठान लेते थे। यदि कोई एक मुल्ला, दूसरे मुल्ला की बात को नहीं मानता था तो वे दोनों ही एक दूसरे पर डण्डा तान लेते थे। अकबर जैसा बुद्धिमान बादशाह ऐसे मुल्लों की बातों को कैसे स्वीकार कर सकता था!

इसलिए अकबर अवश्य ही इबादतखाने की बैठकों (Meetings of the Ibadat Khana) में इन मुल्लों की बातों को स्वीकार नहीं करता होगा और उनसे तर्क करके उन्हें पराजित कर देता होगा। इस कारण बहुत से मुल्लों ने अकबर को इस्लाम विरोधी कहना आरम्भ कर दिया होगा।

यही हाल अन्य धर्मावलम्बियों के आचार्यों एवं पादरियों का रहा होगा। अकबर उनकी सभी बातों पर आंखें मूंदकर विश्वास करने को तैयार नहीं था। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब-उत्-तवारीख लिखा भी है कि जहांपनाह हरेक की राय इकट्ठी करते थे। खासकर ऐसे लोगों की जो मुसलमान नहीं थे और उनमें से जो कोई बात उनको पसंद आती, उसे रख लेते और जो उनके मिजाज और मर्जी के खिलाफ जातीं, उन सबको फैंक देते।

अकबर ने इस्लाम नहीं छोड़ा था (Akbar never left Islam), इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण ई.1579 की एक घटना से मिलने वाला था। इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि अकबर ने इस्लाम में आस्था नहीं छोड़ी थी अपितु उन मुल्लों पर से आस्था छोड़ी थी जिन्होंने इस्लाम की मनमानी व्याख्या करना तथा एक-दूसरे को नीचा दिखाकर स्वयं को सबसे ऊंचा सिद्ध करना, अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लिया था।

इन मुल्लों को नियंत्रण में लाने के लिए अकबर ने फैजी और अबुल फजल (Abul Fazal) के पिता शेख मुबारक (Shaikh Mubarak) से कहा कि वह इस सम्बन्ध में अध्ययन करके बादशाह के समक्ष एक मजहर का मसविदा पेश करे। अर्थात् शाही परिपत्र का प्रारूप प्रस्तुत करे।

जब यह शाही मसविदा सामने आया तो मुल्लों के सामने फिर से यह प्रश्न खड़ा हो गया कि क्या अकबर मुसलमान था? (Was Akbar a Muslim?)

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

अकबर का इस्लाम (146)

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अकबर का इस्लाम

इस्लाम तो एक (Islam is One) ही है किंतु समय-समय पर मुस्लिम शासकों ने इस्लाम की अलग-अलग व्याख्या करने के प्रयास किए हैं ताकि वे स्वयं को मजहबी नेता भी घोषित कर सकें। मुस्लिम शासकों की इन चेष्टाओं से मुल्ला, मौलवी, उलेमा आदि उनके विरोधी हो जाते थे। अकबर का इस्लाम भी अपने काल के मुल्ला-मौलवियों के इस्लाम से मेल नहीं खाता था। इस कारण अकबर की अपने ही दरबारी मुल्लों से ठन गई।

विभिन्न मजहबों, पंथों एवं धर्मों के मौलवियों, पादरियों,एवं आचार्यों से विचार-विमर्श करने के बाद अकबर (Akbar) ने विभिन्न मजहबों, पंथों एवं धर्मों की अच्छी बातों को अनुभव किया। इससे नाराज होकर बहुत से लोगों ने अकबर पर आरोप लगाया कि उसने इस्लाम छोड़ दिया है।

जबकि अकबर ने इस्लाम में आस्था (Faith in Islam) नहीं छोड़ी थी अपितु उन मुल्लों पर से आस्था छोड़ी थी जिन्होंने इस्लाम की मनमानी व्याख्या करना तथा एक-दूसरे को नीचा दिखाकर स्वयं को सबसे ऊंचा सिद्ध करना, अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लिया था।

इन मुल्लों को नियंत्रण में लाने के लिए अकबर ने फैजी (Shaikh Faizi) और अबुल फजल (Abul Fazal) के पिता शेख मुबारक (Shekh Mubarik) से कहा कि वह इस सम्बन्ध में अध्ययन करके बादशाह के समक्ष एक मजहर का मसविदा (The Draft of the Mahzar) अर्थात् शाही परिपत्र का प्रारूप प्रस्तुत करे। सितंबर 1578 में शेख मुबारक ने बादशाह के समक्ष मजहर का एक मसौदा पेश किया। अकबर छः महीने तक इस मसौदे पर विचार करता रहा और उसमें सुधार करता रहा।

अकबर द्वारा तैयार करवाए गए इस मसविदे से भी यह आभास होता है कि अकबर का इस्लाम, मुल्लों के इस्लाम (The Islam of the Mullahs) से अलग था।  

बदायूनी ने लिखा है कि 22 जून 1579 को अकबर ने फतेहपुर सीकरी (Fatehpur Sikri) की प्रमुख मस्जिद के चबूतरे पर चढ़कर कवि फैजी द्वारा कविता में रचित खुतबा पढ़ा। संभवतः इस खुतबे में शेख मुबारक द्वारा प्रस्तुत मजहर के मसौदे का ही प्रयोग किया गया था। इस मजहर की तुलना आजकल के सरकारी परिपत्रों अथवा शासकीय आदेशों से की जा सकती है।

इस मजहर के द्वारा सल्तनत (Mughal Sultanate) के प्रमुख मजहबी अधिकारियों ने अकबर को समस्त देश में इस्लाम सम्बन्धी विवादों में अंतिम पंच-फैसले का अधिकार दिया था। इस मजहर पर प्रमुख मुसलमान मजहबी नेताओं ने हस्ताक्षर किए जिनमें मखदूम-उल-मुल्क और अब्दुल नबी भी सम्मिलित थे।

इस परिपत्र का मसौदा इस प्रकार था- ‘चूंकि हिंदुस्तान अब शांति और सुरक्षा का केंद्र तथा न्याय-नीति का स्थान बन गया है जिससे उच्च और निम्न वर्ग के लोगों और मुख्यतः आध्यात्मिक विद्या विशारद, विद्वान और वे लोग जो ज्ञान-विज्ञान का विचार-विस्तार करते हैं तथा मुक्ति के मार्गदर्शक बने हुए हैं, अरब और फारस देशों से यहाँ आकर बस गए हैं।

अब प्रमुख उलेमागण जो केवल कानून के विभिन्न अंगों के ही विशेषज्ञ और ज्ञाता नहीं, तर्क और प्रमाण पर आधारित नियमों से परिचित ही नहीं, बल्कि अपनी सच्चाई और सदाशयता के लिए भी प्रसिद्ध हैं, प्रथमतः कुरान की आयत की, अल्लाह की, पैगंबर की और उनकी जिन्हें सत्ता प्राप्त है, आज्ञा पालन करो।

दूसरे जो आदमी कयामत के दिन (The Day of Judgment) खुदा का प्यारा होता है वही असली नेता होता है और जो अमीर की आज्ञा-पालन करता है, वह मेरी आज्ञा का पालन करता है, और जो इसके प्रति विद्रोह करता है वह मेरे प्रति विद्रोह करता है, के सिद्धांत और तीसरे तर्क और प्रमाणों पर आधारित अन्य अनेक सबूतों का अच्छी तरह से मर्म समझ लिया है और इस निश्चय पर पहुंचे हैं कि न्याय में न्याय-प्रिय बादशाह का स्थान, अल्लाह की दृष्टि में मुजतहिद (मजहबी नेता) से कहीं ऊंचा होता है।

आगे हम यह घोषित करते हैं कि इस्लाम को मानने वाला बादशाह, मानवता का आश्रय-स्थल, स्वामि-भक्तों का सेनापति, संसार में अल्लाह का स्वरूप, अबुल फतेह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर, बादशाहे गाजी, सबसे अधिक न्यायप्रिय और बुद्धिमान बादशाह है और उसे अल्लाह का ज्ञान प्राप्त है।

इसलिए यदि भविष्य में ऐसे मजहबी प्रश्न उठ खड़े हों जिन पर मुजतहिद की राय (The opinion of a Mujtahid or Opinion of a Islamic Scholar) भिन्न-भिन्न हो तो बादशाह अपनी सूक्ष्म दृष्टि और बुद्धिमत्ता के अनुसार, सुव्यवस्था की दृष्टि से, देश की भलाई के लिए, इन विरोधी मतों में से किसी एक को स्वीकार करने की कृपा करेंगे और यह मत ही उसकी सारी प्रजा पर लागू समझा जाएगा।

यदि बादशाह कुरान (The Quran) के अनुसार, देश के हित में कोई नई आज्ञा जारी करना उचित समझेंगे तो सभी लोग उसे मानने के लिए बाध्य समझे जाएंगे और इसका विरोध करने पर उन्हें इस लोक में मजहबी अधिकार तथा धन संपदा से वंचित होना पड़ेगा तथा दूसरे लोक में कष्ट मिलेगा। यह मजहर अर्थात् शासकीय आदेश विशुद्ध भावनाओं के साथ तथा अल्लाह की कीर्ति और इस्लाम के प्रचार के लिए लिखा गया है। इस्लाम के प्रमुख उलेमाओं और प्रमुख मजहबी विद्वानों द्वारा रजब के महीने में इस मजहर पर हस्ताक्षर हुए हैं।’

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मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ((Mulla Abdul Qadir Badauni)) अकबर के इस कार्य से प्रसन्न नहीं था। चूंकि वह अकबर का दरबारी नौकर था इसलिए उसने सीधे शब्दों में अकबर की आलोचना नहीं की किंतु इस घटना का ऐसे शब्दों में वर्णन किया है जिनसे यह ज्ञात हो सके कि कुदरत भी नहीं चाहती थी कि अकबर अपनी रियाया पर इस कानून को लागू करे। मुल्ला लिखता है कि अकबर को किसी का अधीनस्थ होना नहीं सुहाता था।  अकबर ने सुन रक्खा था कि पैगम्बर, उसके कानूनी वारिस और तिमूर साहिब किरान, मिर्जा उलूगबेग-ए-गुरगांव और अन्य अमीरों ने खुद ही खुतबा पढ़ा था। अकबर ने भी उनका अनुकरण करते हुए स्वयं ही अपना खुतबा पढ़ने का निश्चय किया। वह मुजतहिद (Islamic Scholar) के रूप में रियाया के सामने आना चाहता था। इसलिए हिजरी 987 के जमादअल अव्वल महीने के पहले जुम्मे को अकबर (Akbar) ने फतहपुर की मुख्य मस्जिद में जो उसने अपने महल के पास बनवाई थी, खुत्बा पढ़ना शुरु किया किंतु वह एकाएक लड़खड़ाया और कांपा। यद्यपि दूसरों ने उसे सहारा दिया, वह मुश्किल से तीन पद पढ़ पाया और जल्दी से मंच से नीचे आ गया तथा आगे का खुतबा हाफिज मुहम्मद अमीर, दरबारी खतीब ने पूरा किया।

इस प्रकार कवि फैजी द्वारा कविता में रचित खुतबा ही अकबर के विचारों का वह प्रारूप था जिसे अकबर का इस्लाम कहकर मुल्लों ने उसका विरोध किया।

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि उपर्युक्त पत्र द्वारा जिसे गलती से अचूक-आज्ञापत्र कहकर पुकारा गया है, अकबर को यह अधिकार प्राप्त हो गया कि वह मुस्लिम धर्म-शास्त्रियों के विरोधी मतों में से किसी एक को स्वीकार करे तथा मतभेद विहीन मामलों पर किसी भी नीति को निर्धारित करे, बशर्ते कि वह कुरान विहित हो।

इस प्रकार अकबर (Akbar) ने स्वयं वे अधिकार प्राप्त कर लिए जो अब तक उलेमाओं और विशेष रूप से प्रमुख सदर के अधिकार माने जाते थे। अब से वह मुसलमान प्रजा के लिए मजहबी नेता भी बन गया। इसी परिपत्र के आधार पर आधुनिक इतिहासकारों स्मिथ और वूल्जले हेग ने लिखा है कि- ‘अकबर पोप भी बन गया और राजा भी!’ (Akbar became both the Pope and the King.)

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि स्मिथ और वूल्जले हेग का यह कथन उचित दिखाई नहीं देता कि अकबर पोप भी बन गया और राजा भी।

हैवल ने लिखा है- ‘वास्तव में अकबर द्वारा इस्लाम का नेतृत्व ग्रहण करने की समस्या पर विचार करते हुए केवल इस बात का ही ध्यान नहीं रखना है कि वह उलेमा लोगों की धृष्टता पर नियन्त्रण रखना चाहता था वरन् उसकी दूरदर्शी राजनीतिज्ञता पर भी ध्यान रखना है जिसने हिन्दुस्तान की शान्ति तथा मुगल राज्यवंश (Mughal Dynasty) की सुरक्षा के लिये इस नीति के अनुसरण हेतु प्रेरित किया।’

इस परिपत्र के जारी करने के तीन वर्ष बाद ई.1582 में अकबर ने इबादतखाना (IbadatKhana) की बैठकों को पूरी तरह बंद कर दिया।  चूंकि मुल्लों ने अकबर (Akbar) की किसी भी मजहबी बात को स्वीकार नहीं किया इसलिए कहा जा सकता है कि अकबर का इस्लाम अस्तित्व में नहीं आ सका।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

अल्लाह का दूत (147)

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अल्लाह का दूत

मुल्ला लोग अकबर की इस्लाम विरोधी बातों का विरोध लम्बे समय से कर रहे थे किंतु जब अकबर ने यह घोषित किया कि वह अल्लाह का दूत है तो मुल्ला लोग अकबर पर गुस्से से चिल्लाने लगे!

अकबर ने एक खुतबा पढ़कर यह घोषित कर दिया कि अब से उसकी सल्तनत में इस्लाम की व्याख्या के मामले में शहंशाह को ही अंतिम निर्णय करने का अधिकार होगा। इस आदेश के माध्यम से अकबर ने भारत के समस्त मुल्लाओं, मौलवियों, उलेमाओं, काजियों एवं इमामों के ऊपर सर्वोच्च अधिकार पा लिया। इसे बहुत से लोगों ने शहंशाह की तरफ से किया गया इस्लाम-विरोधी कार्य समझा जबकि कुछ लोगों ने मुल्लों के साथ-साथ इस्लाम की सत्ता की आलोचना करनी आरम्भ कर दी।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने अपनी पुस्तक मुन्तखब उत् तवारीख में लिखा है कि इन दिनों इस्लाम की सत्ता की आलोचना होने लगी तथा जब पैगम्बर के विरोध में उनसे सम्बन्धित प्रश्न, हिन्दू और हिन्दू जैसे मुसलमान उठाने लगे, कुछ खलनायक-उलेमाओं ने अपने कार्यों में शहंशाह को पाप से परे घोषित कर दिया और ‘एकाकी अल्लाह’ अर्थात् ‘अल्लाह एक है’ की घोषणा तक ही संतुष्ट हो गए।

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मुल्ला बदायूनी लिखता है कि उन लोगों ने शहंशाह के विभिन्न सम्मानों को अपनी रचनाओं में लिखा किंतु पैगम्बर का उल्लेख करने की हिम्मत नहीं कर सके। यह मसला जनसाधारण की लज्जा का कारण बना तथा ये लोग वंचना व उपद्रव के बीच सल्तनत में अपना सिर उठाने लगे। इसके अलावा उच्च व निम्न तबके के उद्दण्ड एवं नीच व्यक्ति अपनी गर्दनों में आध्यात्मिक आज्ञाकारिता का पट्टा पहने, अपने आपको शहंशाह का शिष्य बताने लगे। मुल्ला लिखता है कि ये लोग लालच एवं डर से बादशाह के शिष्य हुए। सत्य का एक शब्द भी उनके मुंह से बाहर नहीं आ सका।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि इस महीने के दूसरे जुम्मे को शहंशाह ने गरीबों एवं जरूरतमंदों को चौगान मैदान में बुलाया तथा स्वयं भी वहाँ आया। करीब एक लाख आदमी एवं औरतें उस चारदीवारी में आ गए। सद्र सुल्तान ख्वाजा व कुलिज खाँ ने प्रत्येक आदमी तथा औरत को सोने का टुकड़ा दिया। उस दिन भीड़ में अस्सी आदमी, औरत एवं बच्चे कुचलने से मारे गए। बंगाल की औरतों के अशर्फी से भरे बटुए जिनके पति बंगाल में मारे गए थे, कमर से गिर पड़े। गरीब लोगों ने इन बटुओं को लूटने का प्रयास किया जिसके कारण यह अफरा-तफरी मची।

मुल्ला ने अकबर द्वारा एक लाख गरीबों को चौगान मैदान में बुलाकर सोना बांटने का कारण स्पष्ट नहीं किया है किंतु अनुमान होता है कि अकबर ने अपनी प्रजा को अपने पक्ष में करने के लिए इतना विशाल आयोजन किया था। क्योंकि अकबर के विरुद्ध मुल्ला-लोग जहर उगल रहे थे और सल्तनत में अकबर के विरुद्ध वातावरण तैयार हो रहा था।

इस घटना के कुछ दिन बाद अकबर अजमेर के लिए रवाना हुआ। यह अकबर की चौदहवीं अजमेर यात्रा थी। ख्वाजा की दरगाह से पांच कोस पहले शहंशाह सवारी से उतर गया और दरगाह की ओर पैदल चला।

मुल्ला बदायूनी ने लिखा है- ‘शहंशाह को देखकर संवेदनशील लोग मुस्कुराए और बोले यह आश्चर्यजनक है कि हुजूर को अजमेर के ख्वाजा में इतना विश्वास है जबकि हुजूर ने अपने पैगम्बर के हर आधार को नकार दिया है जिसकी पोशाक से ख्वाजा जैसे सैंकड़ों-हजारों पीर निकले हैं।’

मुल्ला लिखता है कि शहंशाह के अजमेर की ओर निकल जाने के बाद मख्दुम-उल-मुल्क और शेख उब्दुन्नबी आदि उलेमाओं ने सामान्यजन को शहंशाह के खिलाफ भड़काया। उन्होंने लोगों को बताया कि शहंशाह द्वारा इलहाम को असंभव बताते हुए, सीमा से बाहर जाकर, पैगम्बर और इमामों की आधिकारिता में संदेह पैदा करके, देवदूत व शैतान को नकारकर, रहस्यों एवं चमत्कारों को नकारकर, कुरान के साथ साजिश की गई है।

अकबर-विरोधी मुल्लों ने कुरान की विषयवस्तु की अस्मिता पर, इसकी शाब्दिक आधिकारिता पर, शरीर समाप्ति के बाद रूह पर फिर से जन्म, के अलावा दण्ड व पारितोषिक की असंभवता पर व्यंग्य करते हुए लिखा-

मकबरे के हाथ में कितना सा सच है।

कुरान चिंरतन है और पुराने मकबरे भी।

मकबरे किसी से एक शब्द भी नहीं बोलते

कुरान के रहस्यों को कोई खोजता ही नहीं।

मुल्ला बदायूनी लिखता है- ‘शहंशाह ने अब इस सूत्र को अपनाने का निश्चय किया कि कोई ईश्वर नहीं है, अल्लाह के सिवा और अकबर अल्लाह का दूत है। अकबर के इस निश्चय से हंगामे हो सकते थे इसलिए उसने इस सूत्र का प्रयोग एक निश्चित सीमा में अर्थात् हरम की सीमा तक ही रखा।’

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि शहंशाह ने कुतुबुद्दीन मुहम्मद खाँ व शाहबाज खाँ को मनाने की बहुत कोशिश की किंतु उन्होंने शहंशाह का भारी विरोध किया। कुतुबुद्दीन खाँ ने बादशाह से कहा कि पश्चिम के सुल्तान जैसे इस्तंबूल के सुल्तान यह सुनेंगे कि हिंदुस्तान का बादशाह क्या कह रहा है तो वे क्या कहेंगे? क्योंकि उन सबका विश्वास है कि बादशाह की यह बात हास्यास्पद है कि बादशाह अल्लाह का दूत है।

मुल्ला लिखता है कि तब शहंशाह ने कुतुबुद्दीन मुहम्मद खाँ से पूछा कि यदि इस्तंबूल का वह सुल्तान गुप्त कार्य के लिए भारत में होता तो क्या वह मेरी इस बात का इतना विरोध करता या अपने लिए अच्छा स्थान रखने के लिए भारत से वापस इस्ताम्बूल चला जाता और यदि चला जाता तो क्या वहाँ इतना सम्मान पाता? इस पर शहबाज खाँ ने उत्तेजना से चिल्लाते हुए कहा- ‘वह शायद तत्काल चला जाता।’

मुल्ला लिखता है- ‘जब बीरबल अर्थात् वही जहन्नुम का कुत्ता, ने ईमान पर आक्रमण किया तो शहबाज खाँ ने बीरबल से कहा तू शापित काफिर है। तू इस तरह बात करता रहेगा जब तक मैं तुझसे बदला न ले लूं। इस प्रकार मामला गंभीर हो गया और शहंशाह ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों से विशेषकर शहबाज खाँ से कहा, लोग कीचड़ भरे जूतों से तुम्हारे मुंह पीटेंगे?’

मुल्ला बदायूनी ने बादशाह के आचरण को इंगित करके लिखा है कि इस्लाम के विरुद्ध बादशाह का ऐसा आचरण देखकर मुल्क में एक ऐसी पीढ़ी आ गई जिसने इबादत छोड़ दी और अपनी वासनाओं के पीछे दौड़ पड़े। मदरसे और मस्जिदें लोपित हो गईं और बहुत से व्यक्तियों ने अपना पैतृक क्षेत्र छोड़ दिया तथा उनके बच्चे जो वहाँ रह गए, उन्होंने स्तरहीन व्यवहार में ही इज्जत पाई।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि हकीम-उल-मुल्क ने शेख अबुल फजल का विरोध किया। मुल्ला बदायूनी ने इस विरोध का कारण तो नहीं लिखा है किंतु अनुमान लागाया जा सकता है कि इस समय मुल्ला और उलेमा अकबर के साथ-साथ उसके खास मित्रों एवं सेवकों से भी नाराज थे जो यह मानते थे कि अकबर अल्लाह का दूत है।

संभवतः इसीलिए हकीम-उल-मुल्क ने शेख अबुल फजल का विरोध किया था। इस पर शहंशाह ने सख्ती दिखाई और हकीम-उल-मुल्क को अपना मुल्क छोड़कर हज पर मक्का जाने का आदेश दे दिया। शहंशाह की इस कार्यवाही से मुल्ला और उलेमा लोग और अधिक नाराज हो गए। उनकी स्पष्ट धारणा थी कि अकबर अल्लाह का दूत नहीं है।

मुल्लों को दण्ड (148)

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मुल्लों को दण्ड
मुल्लों को दण्ड

जब मुल्लों ने अकबर को इस्लाम विरोधी बताकर हल्ला मचाया तो अकबर ने मुल्लों को दण्ड देने का निश्चय किया।  अकबर ने मुल्लों को धागों की तरह बिखेर दिया!

जब अकबर ने इस्लाम की व्याख्या करने के विषय में स्वयं को समस्त उलेमाओं से ऊपर घोषित कर दिया तो सल्तनत के बहुत से मुल्ला अकबर से नाराज हो गए तथा अकबर का विरोध करने लगे। बहुत से मुल्लों ने अकबर के मुंह पर ही उसे खरी-खोटी सुनाई। 

अकबर को मुल्लों एवं उलेमाओं के विरोध में देखकर, अकबर के दरबारी ईमाम मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने अकबर के दरबार में जाना बंद कर दिया। इस पर काजी अली मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी को पकड़कर बादशाह के समक्ष ले गया। उस समय अकबर अजमेर में था। काजी ने अकबर से कहा कि इस इमाम को शहंशाह की तरफ से एक हजार बीघा जमीन दी गई थी किंतु यह दरबार में नहीं आता।

अकबर ने कहा कि इसकी जमीन के पट्टे में साफ लिखा है कि जमीन मुल्ला को इस शर्त पर दी गई थी कि यह बादशाह के दरबार में नित्य हाजिर होगा किंतु यदि यह हमारे दरबार में नहीं आना चाहता तो हम इसे जबर्दस्ती नहीं बुलाना चाहते। अतः इससे जमीन वापस ली जानी चाहिए किंतु यह बाल-बच्चे वाला है, इसलिए इससे आधी जमीन वापस ले ली जाए तथा आठ सौ बीघा जमीन इसके पास छोड़ दी जाए।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी तो पहले से ही बादशाह से चिढ़ा हुआ था, इसलिए जब उसने सुना कि बादशाह उसकी दो सौ बीघा जमीन ले रहा है तो मुल्ला ने नाराज होकर उसी समय कह दिया कि मैं बादशाह की नौकरी से त्यागपत्र देता हूँ। अकबर ने भी मुल्ला से नाराज होकर दूसरी तरफ मुंह फेर लिया। इस पर वहाँ मौजूद मुल्ला के हिमायतियों ने मुल्ला से कहा कि बादशाह की नौकरी छोड़ना ठीक नहीं है। इस पर मुल्ला ने फिर से बादशाह की नौकरी करना स्वीकार कर लिया।

अकबर अनुभव कर रहा था कि लगभग पूरे देश में मुल्ला, मौलवी, काजी और उलेमा लोग अकबर का विरोध कर रहे हैं, उन्हें भय था कि शहंशाह के इस कदम से कि वही इस्लाम की व्याख्या का अंतिम अधिकारी है, मुल्लों और उलेमाओं ने जनता में जो धाक और महत्ता जमा रखी है, वह धूमिल पड़ जाएगी।

मुल्ला और उलेमा इस बात का भी घनघोर विरोध कर रहे थे कि शहंशाह धरती पर अल्लाह का दूत है। मुल्लों और उलेमाओं की दृष्टि में केवल पैगम्बर ही अल्लाह के दूत होते हैं, किसी शहंशाह को यह अधिकार नहीं है कि वह स्वयं को अल्लाह का दूत या पैगम्बर घोषित करे। इसलिए मुल्ला लोग अकबर को ठीक उसी प्रकार नास्तिक ठहरा रहे थे जिस प्रकार जेजुईट पादरी अपनी पुस्तकों में अकबर पर नास्तिक होने का आरोप लगा रहे थे।

उधर अकबर भी अपने द्वारा आगे बढ़ाए गए कदम को पीछे नहीं खींचना चाहता था और मुल्लों को दण्ड देकर अपनी सत्ता की सर्वोच्चता को सिद्ध करना चाहता था। इस कारण दोनों पक्षों में जोरदार ठन गई। अकबर ने मुल्लों को दण्ड देने का अनोखा तीका ढूंढा। उसने मुल्लों और उलेमाओं को उनके स्थानों से दूर-दूर तबादले करने का निश्चय किया ताकि उनकी गुटबंदी बिखर जाए।

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मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि बादशाह ने दिल्ली के काजी-अल-कुजात मुल्ला मुहम्मद यज्दी को दिल्ली से हटाकर जौनपुर का काजी-अल-कुजात नियुक्त कर दिया तथा बादशाह ने दिल्ली के निकट स्थित उसकी जागीरें जब्त कर लीं। इस पर मुल्ला मुहम्मद यज्दी ने जौनपुर पहुंचकर अकबर के खिलाफ फतवा जारी किया तथा अपनी पुरानी जमीनों पर अपना अधिकार घोषित कर दिया। अकबर जानता था कि जब वह मुल्लों को दण्ड देगा तो मुल्ले और जोर से हल्ला मचाएंगे।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि जौनपुर के काजी द्वारा शहंशाह के विरुद्ध फतवा जारी होते ही मुहम्मद मासूम काबुली, मुहम्मद मासूम खाँ फरखुंदी, मीर मुईज्जुलमुल्क, नयाबत खाँ, अरब बहादुर आदि मुल्लों एवं इमामों ने अकबर के विरुद्ध तलवारें खींच लीं। बहुत से स्थानों पर गंभीर झड़पें हुईं। इमामों ने कहा कि शहंशाह ने हमारी जमीनों पर अतिक्रमण किया है। अल्लाह उसकी खैर करे।

आखिरकार पेशराऊ खाँ के खिताब वाला मिहतर खाँ जब मासूम खाँ के यहाँ से अर्थात् जौनपुर के दरबार से वापस लौटा तथा उसने मुल्ला मुहम्मद यज्दी के फतवे के बारे में अकबर को बताया तो अकबर ने किसी बहाने से मीर मुईज्जुलमुल्क एवं मुल्ला मुहम्मद यज्दी को जौनपुर से वापस आगरा बुलाया। जब ये लोग आगरा से 15 कोस दूर फिरोजाबाद तक आ गए तो शहंशाह ने अपने सेवकों को आदेश दिए कि इन दोनों मुल्लों को उनके अंगरक्षकों से अलग करके एक नाव में बैठाकर ग्वालियर ले जाया जाये।

इस पर शहंशाह के सेवकों ने मुल्लों के अंगरक्षकों को एक नाव में बैठाया तथा मुल्ला लोगों को एक दूसरी पुरानी नाव में। जब मुल्ला लोग अकेले पड़ गए तब अकबर ने अपने सेवकों को आदेश भिजवाया कि इन मुल्लों से छुटकारा पा लिया जाए। इस पर जब मुल्ला लोगों की नाव गहरे पानी में चली गई तो नाविकों ने उन दोनों मुल्लों को मार डाला। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि अकबर मुल्लों को दण्ड देने के नाम पर उन्हें मौत के घाट भी उतरवा सकता है।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि कुछ दिनों बाद बंगाल से काजी याकूब आगरा आया। संभवतः अकबर ने ही उसे बुलाया था। मुल्ला लिखता है कि शहंशाह ने काजी याकूब को भी उन दोनों मुल्लों की राह पर भेज दिया। इस प्रकार अकबर ने एक के बाद एक करके, जिन मुल्लों के बारे में उसे शक था, मिटा दिया।

लाहौर में भी उलेमा वर्ग ने अकबर का भारी विरोध किया था। मुल्ला बदायूनी लिखता है कि शहंशाह ने लाहौर के उलेमाओं को बिखरे धागे की तरह अलग-अलग कर दिया। काजी सद्र-उद्दीन लाहौरी जिसका स्वतंत्र चिंतन मख्दुम-उल-मुल्क से ऊँचा था, उसे अकबर ने लाहौर से हटाकर गुजरात के बहरोंच नामक शहर का काजी नियुक्त कर दिया।

इसके बाद शहंशाह ने मुल्ला अब्द-उश-शकूद गुलदार को जौनपुर का काजी तथा मुल्ला मुहम्मद मासूम को बिहार में नियुक्त कर दिया। शेख मुनव्वर को मालवा से निकालकर किसी और को वहाँ का सद्र बना दिया। शेख मुइन को अधिक उम्र होने के कारण लाहौर में ही रहने दिया गया। शहंशाह ने हाजी इब्राहीम सरहिंदी को गुजरात का सद्र बनाकर वहाँ भेज दिया।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि इस तरह प्रत्येक मुल्ला को उसके इच्छित पद पर पदोन्नति मिली किंतु उसके घर से दूर। मुल्लों ने अकबर का विरोध करने की चेष्टा की किंतु उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हुई।

अकबर जैसे शक्तिशाली बादशाह से टकराना तथा उससे जीत पाना इन निहत्थे मुल्लाओं, मौलवियों एवं उलेमाओं के वश की बात नहीं थी। कुछ ही दिनों में चारों तरफ से मच रहा शोर थम गया और अकबर मुल्लों को दण्ड देकर अपने उस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ गया जो उसने मजहब के बारे में सोच रखा था।

हाजी इब्राहीम सरहिंदी (149)

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हाजी इब्राहीम सरहिंदी

अकबर ने अपनी सल्तनत के उन मुल्ला-मौलवियों एवं उलेमओं के उनके घरों से दूर-दूर स्थानांतरण कर दिए जो अकबर का विरोध कर रहे थे। हाजी इब्राहीम सरहिंदी भी इन्हीं में से एक था जिसे गुजरात भेजा गया था। मुल्ला बदायूनी लिखता है कि हाजी इब्राहीम सरहिंदी ने वहाँ घूस खाकर माफी की जमीनों से काफी सोना एवं खजाना बना लिया। जो लोग हाजी इब्राहीम सरहिंदी को घूस नहीं देते थे, वह उन लोगों की जमीनें जब्त कर लेता था। जब इस मसले को शहंशाह के सामने लाया गया तो इब्राहीम सरहिंदी को शहंशाह के दरबार में तलब किया गया।

इस पर हाजी इब्राहीम सरहिंदी ने सेवानिवृत्ति लेने के लिए अर्जी भिजवा दी। इस पर शहंशाह ने उसे पकड़ कर बुलवाया तथा हकीम आईन-उल-मुल्क को सौंप दिया। अकबर ने हाजी इब्राहीम सरहिंदी को प्रतिदिन शाम के इजलास में बादशाह के समक्ष उपस्थित होने के आदेश दिए। इब्राहीम सरहिंदी ने अकबर को बहुत सी ऐसी बातें बताईं जिन्हें सुनकर अकबर खुश होता।

एक दिन हाजी इब्राहीम सरहिंदी ने अकबर को दीमक खाई हुए एक किताब भेंट की तथा अकबर से कहा कि यह किताब शेख इब्न अराबी ने लिखी थी जो कि अकबर के जन्म से पहले हुआ था। हाजी इब्राहीम सरहिंदी ने अकबर को बताया कि इस किताब में लिखा है कि बादशाह अकबर के बहुत सी बीवियां होंगी तथा बादशाह दाढ़ी मुंडवाया करेगा। इस किताब में अकबर की बहुत सी विशेषताओं को बताया गया था। इन्हें पढ़कर अकबर को बहुत सुखद आश्चर्य हुआ

जब अकबर ने अबुल फजल से इस किताब की जांच करवाई तो ज्ञात हुआ कि यह पुस्तक शेख इब्न अराबी की लिखी हुई नहीं है अपितु मियां मान पानीपत के भतीजे मुल्ला अबुल सईद की लिखी हुई है। हाजी इब्राहीम सरहिंदी ने इस किताब में एक क्षेपक अपनी ओर से जोड़ दिया है जिसमें अकबर के बारे में वे सब बातें लिखी हुई हैं। शेख इब्न अराबी अथवा मुल्ला अबुल सईद द्वारा लिखित मूल पुस्तकों में ये सब बातें नहीं हैं।

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इस पर अकबर ने अबुल फजल, हकीम अबूल फतेह तथा हाजी इब्राहीम सरहिंदी को अपने सामने ही इस पुस्तक पर चर्चा करने को कहा। इस चर्चा के दौरान अबुल फजल तथा हाजी इब्राहीम सरहिंदी के बीच जोरदार बहस हुई जिसके कारण अकबर हाजी इब्राहीम सरहिंदी से नाराज हो गया और अकबर ने हाजी इब्राहीम सरहिंदी को रणथंभौर ले जाकर जेल में बंद करने के आदेश दिए। बादशाह के आदेशानुसार हाजी इब्राहीम सरहिंदी को जेल में बंद कर दिया गया जहाँ कुछ दिनों बाद घूसखोर, घमण्डी एवं मिथ्यावादी हाजी इब्राहीम सरहिंदी का निधन हो गया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने लिखा है कि एक बार रणथंभौर के किले को तहस-नहस किया गया, उस समय हाजी इब्राहीम सरहिंदी का शव कपड़े की पट्टियों से बंधा था और यह कहानी पता चली कि उसने अपने आप को किले की मीनार से नीचे गिरा लिया था। यह घटना ई.1585-86 में हुई थी।

अकबर ने फतहपुर सीकरी के दुर्ग में कई महल बनवाए थे। इनके बीच में अनूप तालाब नामक एक तालाब भी था। । इसका फर्श तथा दीवारें करौली के लाल पत्थर से बनाई गई थीं। वास्तव में यह किसी हिन्दू राजा द्वारा बनवाया गया एक पुराना जलकुण्ड था। इसका आकार प्राकृतिक तालाबों की तरह बहुत बड़ा नहीं था।

अबुल फजल ने इसकी लम्बाई 20 गज, चौड़ाई बीस गज तथा गहराई 40 गज लिखी है। कहा नहीं जा सकता कि अकबर के शासनकाल में गज का आशय दो फुट से होता था अथवा तीन फुट से। आज भी भारत में दो प्रकार के गज चलते हैं। कुछ प्रांतों में दो फुट का एक गज होता है तथा कुछ प्रांतों में तीन फुट का एक गज होता है।

अबुल फजल ने लिखा है कि शहंशाह ने आदेश दिए कि इस तालाब को सिक्कों से भर दिया जाए तथा लोगों को यह तालाब दिखाया जाए। जब लोग यह देखेंगे कि उनके बादशाह के पास इतना धन है तो वे स्वतः ही कष्टों से मुक्त हो जाएंगे। तब कर्मचारियों ने तालाब को भरना आरम्भ कर दिया। राजा टोडरमल ने अकबर को सूचित किया कि जब तक बादशाह पंजाब से लौटकर आएगा, तक इस तालाब को रुपयों से भर दिया जाएगा। इसके लिए 17 करोड़ रुपयों के सिक्के गिनकर अलग रख दिए गए हैं।

अकबर से मिलने के लिए उसके दरबार में नित्य ही दूर देशों से एवं भारत के विभिन्न प्रांतों से बहुत से लोग आया करते थे। संभवतः अकबर उन्हीं लोगों को यह दिखाना चाहता था कि देखो हिंदुस्तान के बादशाह के पास कितना अधिक धन है। जब बादशाह इतना धनी है तो उसकी प्रजा दुःखी कैसे रह सकती है! 

अबुल फजल ने लिखा है कि एक दिन शाही दरबार में ऐसा आदमी आया जिसके कान नहीं थे। न कानों की जगह छेद थे, परंतु वह सब-कुछ सुन सकता था। इस आदमी को देखकर अकबर को बड़ा आश्चर्य हुआ।

अबुल फजल ने लिखा है कि एक बलूची के एक ही स्त्री से 25 बच्चे थे। वह बलूची एक दिन अकबर के दरबार में उपस्थित हुआ तथा उसने अकबर से कहा कि यह स्त्री बहुत भली है किंतु इसके 25 बच्चे हो गए हैं जिनके कारण मेरा जीवन मुश्किल हो गया है तथा यह स्त्री मेरे लिए हराम हो गई है। मेरे दुःखों का कोई इलाज नहीं है।

इस पर अकबर ने उस बलूची को सांत्वना देते हुए कहा कि लोगों ने तुम्हें गलत कहा है कि यह स्त्री तुम्हारे लिए हराम हो गई है। यदि किसी स्त्री के इतने बच्चे हैं तो यह पति-पत्नी के लिए गर्व एवं प्रतिष्ठा की बात है। अधिक बच्चों के लिए इस स्त्री को हराम नहीं मानना चाहिए। यह तुम्हारा पुरुषार्थ है और तुम्हारी औरत की ऊर्वरता है।

अबुल फजल ने इस घटना का इतना ही वर्णन किया है किंतु यह नहीं लिखा है कि अकबर ने उस बलूच की कोई आर्थिक सहायता की या नहीं! जबकि अबुल फजल ने एक अन्य घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि एक दिन एक कव्वाल अकबर के दरबार में आया। उसने केवल दो गजलें बादशाह को सुनाईं। इनमें से एक गजल में कहा गया था कि बहुत सारे देव हैं किंतु वास्तव में वह एक ही देव है। यह गजल अकबर को इतनी अधिक पसंद आई कि अकबर ने उस कव्वाल की झोली रुपयों से पूरी भर दी।

उन्हीं दिनों अकबर को सूचना मिली कि गुजरात की तरफ के कुछ बंदरगाहों पर यूरोपियन लोग हज पर जाने वाले मुसलमानों को तंग करते हैं तथा उनसे जबर्दस्ती कर वसूल करते हैं। ये बंदरगाह गुजरात से लेकर दक्षिणी तट पर नीचे तक फैले हुए थे किंतु हज जाने वाले यात्री गुजरात की तरफ के बंदरगाहों का प्रयोग करते थे जिन पर पुर्तगाली एवं डच लोगों ने कब्जा कर रखा था। अकबर ने इस फिरंगियों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने का निश्चय किया।

राय पुरुषोत्तम को धोखे से मार दिया अकबर के सेनापतियों ने! (150)

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राय पुरुषोत्तम

राय पुरुषोत्तम अकबर का एक हिन्दू मंत्री था। उसने अकबर को हिन्दू धर्मग्रंथों का अध्ययन करवाया था। अकबर के मुसलमान मंत्री राय पुरुषोत्तम को पसंद नहीं करते थे और उसके विरुद्ध षड़यंत्र रचते रहते थे।

अकबर को सूचना मिली कि गुजरात की तरफ के कुछ बंदरगाहों पर यूरोपियन लोग हज पर जाने वाले मुसलमानों को तंग करते हैं तथा उनसे जबर्दस्ती कर वसूल करते हैं। इन बंदरगाहों पर पुर्तगाली एवं डच लोगों ने कब्जा कर रखा था। अकबर ने इन फिरंगियों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने का निश्चय किया।

फरवरी 1580 में अकबर ने कुतुबुद्दीन खाँ नामक एक अमीर को इन बंदरगाहों पर चढ़ाई करके यूरापियन लोगों को दण्डित करने के आदेश दिए। गुजरात एवं मालवा की तरफ के अमीरों को आदेश दिए गए कि वे कुतुबुद्दीन खाँ की सहायता के लिए सेनाएं उपलब्ध करवाएं।

इस अभियान में दक्षिण भारत के शासकों द्वारा बाधा उत्पन्न किए जाने की आशंका थी। इसलिए अकबर ने दक्षिण की तरफ के शासकों को आदेश भिजवाए कि शाही सेनाएं हज पर जाने वाले लोगों को तंग करने वाले फिरंगियों के विरुद्ध भेजी जा रही हैं। अतः दक्षिण के शासक इस अवसर का लाभ उठाएं तथा शाही सेनाओं की मदद करके शहंशाह का विश्वास जीतने का प्रयास करें।

ई.1580 में अकबर ने अपनी सल्तनत में प्रशासनिक फेर बदल किया। उसने समूची सल्तनत को बारह सरकारों अथवा सूबों में विभाजित किया और प्रत्येक भाग पर एक सिपहसालार, एक दीवान, एक बख्शी, एक मीर अदल, एक सदर, एक कोतवाल, एक मीर बहर ओर वाका-नवीस नियुक्त किए।

नई सरकारों अथवा सूबों की घोषणा होते ही अकबर ने बहुत से प्रांतीय अधिकारियों के स्थानांतरण किए और बहुत से नवीन प्रांतीय अधिकारी नियुक्त किए। मासूम खाँ फरनखुदी को सरकार गाजी का तथा तारसेन मुहम्मद खाँ को सरकार जौनपुर का हाकिम अथवा सूबेदार बनाया गया। मासूम खाँ काबुली को उड़ीसा सरकार का सूबेदार नियुक्त किया गया।

मासूम खाँ फरनखुदी ने बिहार पहुंचकर बगावत कर दी। उसकी बगावत से पूरी मुगलिया सल्तनत को बेहद आश्चर्य हुआ क्योंकि वह अकबर का नजदीकी माना जाता था। अकबर ने राय पुरुषोत्तमदास को बिहार के विद्रोह का दमन करने भेजा।

पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर ने पुरुषोत्तमदास नामक एक ब्राह्मण तथा देवी नामक एक स्त्री को लम्बे समय तक अपने महल में आमंत्रित करके उनसे हिन्दू धर्म का मर्म जानने का प्रयास किया था। बाद में अकबर पुरुषोत्तमदास से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि अकबर ने पुरुषोत्तम को राय की उपाधि देकर अपना मंत्री बना लिया।

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जब राय पुरुषोत्तमदास गाजीपुर पहुंचा तो मासूम खाँ फरनखुदी पुरुषोत्तम से मिलने आया। उसने पुरुषोत्तम से कहा कि आप चौसा की थाह के पास पहुंचें, मैं बागियों को पकड़कर आपके सुपुर्द कर दूंगा। पुरुषोत्तम ने मासूम खाँ फरनखुदी की बातों पर विश्वास कर लिया तथा उसके कहने में आकर चौसा की थाह के पास पहुंचा। उस समय पुरुषोत्तम के पास बहुत कम सेना थी। मासूम खाँ फरनखुदी ने अरब बहादुर खाँ को पुरुषोत्तम को छल से मारने के लिए भेज दिया।

जिस समय राय पुरुषोत्तम गंगाजी में नहाकर पूजा कर रहा था, तब अरब बहादुर खाँ ने अचानक ही पुरुषोत्तम पर वार कर दिया जिससे पुरुषोत्तम बुरी तरह घायल होकर वहीं पर गिर पड़ा। पुरुषोत्तम के साथियों ने किसी तरह पुरुषोत्तम को अरब बहादुर खाँ से बचाया। उस समय तक पुरुषोत्तम बुरी तरह घायल हो चुका था। पुरुषोत्तम के सेवक पुरुषोत्तम को लेकर गाजीपुर चले गए जहाँ पुरुषोत्तम का सैनिक शिविर लगा हुआ था।

यहीं पर दो दिन बाद राय पुरुषोत्तम का निधन हो गया। इस प्रकार धर्म का मर्मज्ञ पुरुषोत्तम मुगलिया राजनीति की खूनी चौसर पर बलि चढ़ गया।

किसी भी तत्कालीन लेखक ने इस बात पर प्रकाश नहीं डाला है कि अकबर के सेनापतियों ने राय पुरुषोत्तम को छल से क्यों मारा किंतु हमें राय पुरुषोत्तम के सम्बन्ध में इस तथ्य का स्मरण करना चाहिए कि इसी व्यक्ति ने लम्बे समय तक अकबर के महल में जाकर अकबर को हिन्दू धर्म के बारे में बहुत सी जानकारियां दी थीं जिसके बाद अकबर ने सभी धर्मों की अच्छाइयों को अनुभव किया था और यह घोषणा की थी कि अच्छाई किसी एक मजहब तक सीमित नहीं है। सभी धर्मों में अच्छी बातें तथा अच्छे लोग हैं।

संभवतः यह बात मुल्ला-मौलवियों एवं उलेमाओं को सहन नहीं हुई थी, उन्हें लगता था कि यदि जनता अकबर की इस बात को मानेगी तो मुल्ला-मौलवियों एवं उलेमाओं का वर्चस्व समाप्त हो जाएगा। अकबर के दरबार में उस समय जिस तरह की परिस्थितियां चल रही थीं, उनके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि राय पुरुषोत्तम की मौत के पीछे यही कारण रहा हो!

उधर अकबर के दरबारियों, सेनापतियों एवं मुल्ला-मौलवियों में अकबर के विरुद्ध नाराजगी बढ़ती जा रही थी और इधर अकबर के भीतर जीव-दया के भाव उत्पन्न होने लगे थे। अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल ने लिखा है कि एक दिन अकबर ने सोचा कि वर्ष में एक दिन चूहे नहीं मारने चाहिए। एक दिन बैलों को खूब खिलाना-पिलाना चाहिए। उन्हें मारने की बजाय उन्हें किसानों को दे देना चाहिए।

एक दिन चीते नहीं पकड़ने चाहिए और न ही चीते के द्वारा शिकार करना चाहिए। एक दिन न खरगोश खाना चाहिए, न उसका शिकार करना चाहिए। एक दिन मछलियों को भी नहीं मारना चाहिए, न ही उस दिन मछलियों को खाना चाहिए। एक दिन घोड़ों को नहीं खाना चाहिए, न मारना चाहिए। एक दिन सांपों को भी नहीं मारना चाहिए। एक दिनों भेड़ों को भी नहीं मारना चाहिए और न ही उस दिन भेड़ों को खाना चाहिए। बंदरों के विषय में भी ऐसा ही करना चाहिए। जो बंदर पकड़ लिए गए हैं, उन्हें छोड़ देना चाहिए।

एक दिन मुर्गे नहीं खाने चाहिए, न उन्हें लड़ाना चाहिए। एक दिन शिकार में कुत्तों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जो लोग कुत्ते पालते हैं, उन्हें अपने कुत्तों का ढंग से ध्यान रखना चाहिए। एक दिन सुअरों को क्षति नहीं पहुंचानी चाहिए। इसी प्रकार वर्ष के प्रत्येक मास में एक न एक अच्छा काम अवश्य करना चाहिए।

अकबर ने प्रत्येक महीने में किए जाने वाले कामों की एक सूची अलग से तैयार करवाई। उसने आदेश जारी किए कि मुहर्रम के महीने में प्राणियों को नहीं मारना चाहिए। सफर महीने में कैदियों को छोड़ देना चाहिए। रवि-उल-अव्वल में 30 चुने हुए निर्धनों को भेंट देनी चाहिए। रवि-उल-आखिर में शरीर को शुद्ध करना चाहिए। विलास नहीं करना चाहिए। जमाद-उल-अव्वल महीने में बढ़िया कपड़े या रेशम नहीं पहनना चाहिए।

जमादिल आदिर में चमड़े का उपयोग नहीं करना चाहिए। रजब मास में अपनी आयु के 40 आदमियों की सहायता करनी चाहिए। शाबान महीने में किसी पर अत्याचार नहीं करना चाहिए और न किसी को करने देना चाहिए। रमजान महीने में 30 गरीब आदमियों को कपड़ा देना चाहिए और भोजन करवाना चाहिए।

शव्वाल महीने में प्रतिदिन अल्लाह के 1000 नाम लेने चाहिए। जिलकदा महीने में प्रतिदिन दूसरे धर्म वाले लोगों को भेंट देनी चाहिए। जिलहज्जा महीने में उपयोगी मकान बनवाने चाहिए। यहाँ उपयोगी मकान से आशय सराय, प्याऊ तथा स्कूल आदि से है।

विपक्षी सांसद एवं विधायक राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित !

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विपक्षी सांसद एवं विधायक - www.bharatkaitihas.com
अमरीकी सीनेटरों एवं सैम पित्रोदा के साथ राहुल गांधी

जब से पड़ौसी देश बांगलादेश में हिन्दुओं का भयानक नरसंहार हुआ है, तब से भारत का हिन्दू मतदाता तो अपने भविष्य को लेकर चिंतित है ही, साथ ही सैंकड़ों विपक्षी सांसद एवं विधायक भी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

इस चिंता के कारण बहुत स्पष्ट हैं। भारत के मतदाताओं को टीवी चैनलों पर जो दृश्य देखने को मिले, उन्हें देखकर न केवल घरेल महिलाओं ने अपितु स्कूली बच्चों तक ने ये सवाल पूछे कि बांगलादेश में हिन्दुओं को क्यों मारा जा रहा है, उनके घरों और मंदिरों को क्यों जलाया जा रहा है? औरतों और गायों को काटकर सड़कों पर क्यों फैंका जा रहा है! ये सवाल उन लोगों ने किये जिनका राजनीति से, साम्प्रदायिकता से, जातिवादी पार्टीबाजी से कोई लेना-देना नहीं है।

यदि बांगलादेश में हिन्दुओं का कत्लेआम किए जाने की पैशाचिक घटना भारत के 2024 लोकसभा चुनावों से पहले हुई होती तो निश्चित रूप से लोकसभा चुनावों के परिणाम कुछ और ही रहे होते। यदि बात यहीं तक रहती तो संभव है कि अगले चुनावों तक लोग बांग्लादेश में हुए हिन्दुओं के कत्लेआम को भूल जाते किंतु उसके बाद भी भारत में कुछ कुछ घटनाएं ऐसी घट रही हैं, जिनके कारण हिन्दू मतदाता उद्वेलित हैं। हिन्दुओं की यह उद्विग्नता देखकर विभिन्न दलों में बैठे सैंकड़ों विपक्षी सांसद एवं विधायक भी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

Urdu Bibi Ki Maut
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लोकसभा में राहुल गांधी, असदुद्दीन ओबेसी तथा चिराग पासवान आदि नेताओं के हल्ला मचाए जाने पर सरकार ने वक्फ बोर्ड संशोधन बिल जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी में भिजवा दिया। इसके बाद से विपक्षी सांसद एवं विधायक अधिक परेशान हैं। क्योंकि जब यह बिल जेपीसी को भेजा गया, तब मुल्ला-मौलवियों ने यह अभियान चलाया कि मुसलमान जेपीसी को अपना विरोध भिजवाएं।

इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू भी इसी काम पर लग गए। करोड़ों व्हाट्सैप ग्रुप्स में पूर्णतः तैयार ईमेल के ड्राफ्ट्स पिछले लगभग एक महीने से घूम रहे हैं जिनमें यह कहा गया है कि यदि आपने जेपीसी को यह मेल अपना नाम लिखकर नहीं भिजवाया तो संसद में वक्फबोर्ड संशोधन बिल पास नहीं हो सकेगा और एक दिन वक्फ बोर्ड आकर आपके घरों, दुकानों, जमीनों पर कब्जा कर लेगा।

करोड़ों व्हाट्सैप ग्रुप्स में घूम रहे इन संदेशों ने देश के सौ करोड़ हिन्दुओं को चिंतित कर दिया है। वे धड़ाधड़ जेपीसी को ईमेल भेज रहे हैं तथा वक्फबोर्ड संशोधन बिल का समर्थन कर रहे हैं।

इन संदेशों को जेपीसी कैसे देखेगी, यह तो नहीं कहा जा सकता किंतु इतना तय है कि जब तक जेपीसी अपनी रिपोर्ट लेकर संसद के सामने हाजिर होगी, तब तक हिन्दुओं का मन पूरी तरह से उन राजनीतिक दलों से उचाट हो चुका होगा जो धर्मनिरपेक्षता की आड़ में वक्फबोर्ड जैसे घातक प्रावधानों वाले कानून बनाते हैं और उसका समर्थन करते हैं। इस स्थिति में विपक्षी सांसद और विधायक कौनसा मुंह लेकर जनता के बीच जाएंगे?

इस आलेख को वीडियो के रूप में देखने के लिए कृपया बैनर पर क्लिक करें।

करोड़ों हिन्दू व्हाट्सैप ग्रुप्स में खुलकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं कि हिन्दू अस्मिता के प्रश्न पर भी जो विपक्षी सासंद और विधायक हिन्दुओं के साथ आकर खड़े नहीं होते, वे हमारे किस काम के हैं, हम उन्हें वोट क्यों दें? वे तो हमारी जमीनें, घर एवं दुकान सब लुटवा देंगे!

11 सितम्बर को शिमला में अवैध मस्जिद के विरोध में हुए लाखों हिन्दुओं के प्रदर्शन पर हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार द्वारा करवाए गए वहशी लाठी चार्ज के दृश्य भी दिन भर टेलिविजन चैनलों पर चलते रहे। इन दृश्यों के छोटे-छोटे टुकड़े व्हाट्सैप ग्रुप्स में भेजे जा रहे हैं।

ये सब ऐसी घटनाएं हैं जिनसे भारत का हिन्दू मतदाता अब पछता रहा है कि जातीय नेताओं के बहकावों में आकर उन्होंने कांग्रेस, राजद तथा समाजवादी पार्टी जैसी तथाकथित सैक्यूलर पार्टियों को वोट क्यों दिए जो सैक्यूलर होने की आड़ में वक्फ बोर्ड कानून में संशोधन नहीं होने दे रहीं।

ये तथाकथित सैक्यूलर पार्टियां जो कि वास्तव में जातिवादी राजनीति करने वाली पाटियां हें उस कानून को देश में लागू क्यों रखना चाहती हैं जिस कानून के बल पर वक्फबोर्ड हिन्दुओं की सम्पत्तियों पर बिना किसी प्रमाण के, बिना किसी आधार के अपना अधिकार जता सकता है और हिन्दुओं को उस सम्पत्ति से बेदखल कर सकता है?

कांग्रेस द्वारा बनाए गए वक्फ बोर्ड कानून में हिन्दुओं के लिए इतना रास्ता भी नहीं छोड़ा गया है कि वे अपनी सम्पत्ति की रक्षा के लिए किसी कोर्ट में जा सकें। इसके कारण वक्फ बोर्ड पूरे के पूरे गांव पर, हजारों साल पुराने हिन्दू मंदिरों पर, दुकानों और सरकारी कार्यालयों पर अपना दावा ठोक चुका है।

यह देखकर भी हैरानी होती है कि वक्फ बोर्ड कानन में कलक्टर को वक्फ बोर्ड का छोटा सा आज्ञाकारी सेवक मात्र बना दिया गया है।

व्हाट्सैप ग्रुप्स में घूम रहे संदेशों को पढ़कर हिन्दू यह सवाल भी पूछ रहे हैं कि जब वक्फ बोर्ड हिन्दुओं की सम्पत्ति पर दावा करता है तो वह सम्पत्ति हिन्दू की है या नहीं, इस दावे का फैसला केवल मुसलमान ही क्यों कर सकते हैं? वक्फ बोर्ड में हिन्दू सदस्य क्यों नहीं होंगे? इस दावे से पीड़ित हुए पक्ष की सुनवाई न्यायालय क्यों नहीं कर सकते?

यदि भारत सरकार द्वारा लोकसभा में रखा गया वक्फ बोर्ड संशोधिन बिल बिना किसी हूल हुज्जत के लम्बी सीआई और छोटा सानोज सुनकर पारित हो गया होता तो हिन्दू मतदाताओं को इस कानून के घातक प्रावधानों के बारे में इतना पता नहीं चला होता किंतु विपक्ष ने इसे जेपीसी में भिजवाकर सभी हिन्दुओं के कान खड़े कर दिए हैं।

जब तक आम हिन्दू को वक्फ बोर्ड कानून के प्रावधानों की बात पता नहीं थी, तब तक विपक्षी सांसदों एवं विधायकों को कोई खतरा नहीं था किंतु अब आम हिन्दू वक्फ बोर्ड कानून के भयानक पंजों एवं तीखे दांतों को अच्छी तरह पहचान चुका है। अब हिन्दू मतदाता अधिक दिनों तक जातीय आधारों पर वोट खींचने वाली पार्टियों के चक्कर में पड़े नहीं रहेंगे। यही कारण है कि आज विपक्षी सांसद एवं विधायक चिंतित हैं।

हिन्दू मतदाताओं, विपक्षी सांसदों एवं विधायकों की चिंता में जो कुछ कसर बाकी रह गई थी, उस कसर को राहुल गांधी अमरीका में जाकर पूरी कर रहे हैं। विदेशी धरती पर पहुंचकर हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़कने की सीख पता नहीं किसने राहुल गांधी को दी होगी! क्या सैम पित्रोदा ने? या फिर इल्हान ओमर ने या फिर शायद किसी को पता नहीं! राहुल की इन देश विरोधी बातों से भी उनकी अपनी पाटी के हिन्दू सांसद एवं विधायक अवश्य ही असमंजस में होंगे

विपक्षी सांसद एवं विधायक अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर कितने चिंतित हैं, इस बात का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव 2024 के बाद बीजू जनता दल के दो सांसद राज्यसभा से स्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो चुके हैं तथा वाईएसआर पार्टी के दो सांसद राज्यसभा से स्तीफे देकर टीडीपी में चले आए हैं।

शिमला की अवैध मस्जिद के खिलाफ कांग्रेस के ही एक मंत्री ने विधान सभा में मामला उठाया तथा कांग्रेस की सैक्यूलर नीति की आड़ में चली जा रही चाल का विरोध किया। यह सब इसलिए ताकि उनका राजनीतिक भविष्य अधर में न रहे।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अकबर के दरबारी (151)

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अकबर के दरबारी

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी की दृष्टि में अकबर के दरबारी मूर्खों की टुकड़ी थे जो हर समय अकबर को प्रसन्न करने के लिए इस्लाम विरोधी बातें करते थे और अकबर को सूअर एवं कुत्तों की पूजा करने के लिए उकसाते थे। मुल्ला की दृष्टि में अकबर के दरबारी कितने गिरे हुए थे, इसे लक्ष्य करके मुल्ला ने लिखा है-

मूर्खों की यह टुकड़ी चिथड़ों में है,

वे कुछ रहस्यमय शब्द बुदबुदाते हैं!

 मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत तवारीख में लिखा है कि इस्लाम में त्याज्य सूअर एवं कुत्ते जिन्हें नापाक माना जाता था, अकबर उन्हें अपने हरम में और अपने किले के नीचे रखने लगा और रोज सुबह उन्हें देखना अपना धार्मिक कर्त्तव्य समझने लगा। अकबर के दरबारी हिन्दू जो पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं, उन्होंने अकबर को विश्वास दिलाया कि जंगली नर सूअर दस अवतारों में से एक है जो ईश्वर के पृथ्वी पर आने के लिए लिया गया था।

अपने इस मत के समर्थन में अकबर के दरबारी हिंदू किसी संत की कहावत उद्धृत करते हैं कि कुत्ते में दस गुण होते हैं, यदि किसी में उसका एक गुण भी आ जाए तो वह संत हो जाता है। कुछ दरबारी जो सभी प्रकार के संगीत, गायन एवं वादन में निष्णात थे और कविता में रुचि रखते थे, कहावत बन गए।

अकबर के दरबारी अपने साथ अक्सर कुत्तों को मेज तक लेकर जाते और उनके साथ खाना खाते। ईराक और हिन्दुस्तान के कुछ विधर्मी शायर बजाय इसके कि कुत्ते को मेज तक ले जाने का विरोध करें, स्वयं भी उनका अनुसरण करने लगे। यहाँ तक कि कुत्ते की जीभ अपने मुंह में रखकर इसकी डींग हांकने लगे और ईर्ष्या करने लगे। कुत्तों के प्रति सम्मान का भाव रखने वालों के विरुद्ध मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने एक शेर लिखा है-

मीर से कहो, तुम्हारी खाल के नीचे एक कुत्ता है,

शव है उसके दर के सामने कुत्ता दौड़ता,

उसे रसोई का साथी मत बनाओ।

अर्थात्- कुत्ता अत्यंत घृणित प्राणी है क्योंकि वह शव खाता है, इसलिए उसे अपनी रसोई में मत आने दो।

मुल्ला बदायूनी ने लिखा है कि अकबर ने इस्लाम की बहुत सी बातों के विरुद्ध काम करना आरम्भ कर दिया। उसने शेर और सूअर का मांस खाने की इजाजत दी क्योंकि जो मनुष्य इनको खाएगा, उसमें इन दो साहसी प्राणियों के साहस का संचार हो जाएगा। अकबर ने यह तर्क दिया कि स्त्री से संसर्ग के बाद में स्नान करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि स्नान करना ही है तो स्त्री-संसर्ग से पहले किया जाए। मुल्ला की दृष्टि में अकबर का यह तर्क मजहब के उसूलों के खिलाफ था।

मुल्ला ने लिखा है कि अकबर ने चचेरे भाई-बहिनों में सम्बन्धों की मनाही कर दी। क्योंकि इससे काम-वासना में कमी आएगी। अकबर ने आदेश दिया कि लड़के सोलह साल से कम आयु में शादी नहीं कर सकेंगे और लड़कियां चौदह साल से कम की नहीं। क्योंकि जल्दी शादी करने वालों की औलादें कमजोर होती हैं।

अकबर के इन कामों से मुल्ला लोग नाराज थे ही किंतु जब अकबर ने मीर मुईज्जु-अल-मुल्क एवं मुल्ला मुहम्मद यज्दी को जौनपुर से बुलाकर नदी के बीच में ही मरवा डाला तो मुल्ला, मौलवियों एवं शेखों का विश्वास अकबर के ऊपर से पूरी तरह से हट गया। अब वे अकबर के दरबार में जाने से भी कतराने लगे। उन्हें लगता था कि अकबर द्वारा किए जा रहे इन प्रकार के कामों के पीछे अकबर के दरबारी हैं जो भारत से इस्लाम खत्म करना चाहते हैं।

मुल्ला बदायूनी ने लिखा है कि अकबर ने हकीमुलमुल्क जीलानी को पांच लाख रुपए दिए तथा मक्का जाकर खैरात बांटने के आदेश दिए। हकीम जीलानी उन रुपयों को लेकर मक्का चला गया और वहाँ से कभी नहीं लौटा। अकबर ने उसे वापस बुलाने के लिए कई आदमियों को भेजा किंतु हकीम जीलानी कभी लौट कर नहीं आया। अब वह अकबर की सल्तनत में नहीं रहना चाहता था।

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अकबर ने पंजाब से शेख मुत्तही अफगान कासी को अपने दरबार में बुलाने के लिए पालकी भिजवाई किंतु उसने बादशाह द्वारा भेजी गई पालकी में बैठना पसंद नहीं किया। इसलिए शेख मुत्तही शाही फरमान पाकर पैदल ही सीकरी के लिए रवाना हुआ। जब शेख मुत्तही सीकरी पहुंच गया तो वह शेख जमाल बिख्तयार नामक एक दरवेश के घर ठहर गया और बादशाह को संदेश भिजवाया कि मेरी आंख शहंशाह के किसी आशीर्वाद पर नहीं ठहरती। इस पर बादशाह ने आदेश भिजवाया कि उसे हमारे दरबार में आने की आवश्यकता नहीं है। वह फिर से वहीं चला जाए, जहाँ से आया है।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि सभी विषयों पर अधिकृत ज्ञान रखने वाला शेख उल हदयाह बादशाह के दरबार में बुलाया गया। अकबर ने उससे एक सवाल पूछा। इस पर शेख उल हदयाह ने अपने कानों की तरफ संकेत कर दिया। बादशाह को कोई जवाब नहीं दिया। इस पर बादशाह ने उसे वापस जाने के लिए कह दिया।

मुल्ला बदायूनी ने लिखा है कि शेखों, मुल्लाओं एवं काजियों आदि की अकबर के प्रति नाराजगी को चापलूस किस्म के शेखों ने अपने लिए सुअवसर समझा और वे अकबर के दरबार में जाने लगे। अर्थात् अब वे ही अकबर के दरबारी बन गए। मुल्ला बदायूनी ने उनके लिए लिखा है-

मूर्खों की यह टुकड़ी चिथड़ों में है,

वे कुछ रहस्यमय शब्द बुदबुदाते हैं।

वे विश्वसनीयता व पवित्रता में आगे नहीं बढ़े हैं

हालांकि इन्होंने बहुतों का नाम खराब किया है।

मुल्ला बदायूनी ने शेख अब्दुल अजीज के उत्तराधिकारी शेख चानीडाल्ड सिवानाह का उदाहरण देते हुए लिखा है कि शहंशाह के निर्देश पर वह इबादतखाने में गया और भ्रष्ट इबादत बोलना एवं प्रदर्शित करना शुरू कर दिया। उसने भविष्यवाणी की कि फलानी औरत के लड़का होगा, पर हुई लड़की। उसकी तरह सैयद हाशिम फिरोजाबादी ने भी सौ चमत्कारों के साथ यह धंधा आरम्भ किया। उसके कारण पुराने गुरुओं का भी अपमान हुआ।

मुल्ला बदायूनी ने लिखा है कि इस साल निकृष्ट व्यक्तियों ने जो अपने आप को विद्वान दिखाते थे किंतु जो वास्तव में मूर्ख थे, प्रमाण एकत्रित किए कि बादशाह साहिब-ए-जमाँ हैं जो इस्लाम के बहत्तर पंथों एवं हिन्दुओं के समस्त मतभेद दूर कर देंगे।

शरीफ बसव्वान के महमूद की रचनाओं को लाया जिसमें कहा गया कि हिजरी 990 अर्थात् ई.1582 में एक ऐसा आदमी होगा जो धरती से सभी झूठ खत्म कर देगा। उसका संकेत अकबर की तरफ था।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि शीराज के ख्वाजा मौलाना जफरदार का विधर्मी मक्का के किन्हीं शरीफों की पुस्तिका लेकर आया जिसमें एक रिवाज लिखा हुआ था कि जमीं सात हजार साल तक अस्तित्व में रहेगी उसके बाद महदी प्रकट होगा। अब वह समय आ गया है जब बताया गया महदी प्रकट होगा। संभवतः महदी का अर्थ कयामत होने से सम्बन्धित किसी लक्षण से है।

इस प्रकार के और भी उदाहरण मुल्ला ने अपनी पुस्तक में दिए हैं जिनके कारण अकबर के दरबारी ही अकबर को इस्लाम विरोधी बना रहे थे।

अकबर इस्लाम विरोधी था? (152)

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अकबर इस्लाम विरोधी था

 अकबर कालीन मुल्लाओं ने यह आरोप बारबार लगाया है कि अकबर इस्लाम विरोधी था!

बदायूनी का यह आरोप सही है कि कुछ चापलूसों में अकबर को महान् बताने एवं अकबर के माध्यम से धरती का उपकार होने की पुरानी भविष्यवाणियां बताने की होड़ मच गई। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने इन चापलूस लोगों पर तक-तक कर निशाने साधे हैं तथा अकबर के विरुद्ध भी अपने मन की भड़ास निकाली है कि किस-किस प्रकार से अकबर इस्लाम विरोधी था और उसने इस्लाम विरोधी काम करने आरम्भ कर दिए।

मुल्ला बदायूनी ने मुंतखब उत तवारीख में लिखा है कि शीराज के ख्वाजा मौलाना जफरदार का विधर्मी अर्थात् शिया विद्वान, मक्का से अपनी लिखी पुस्तिका भी लाया जिसमें उसने अकबर को अवतारी पुरुष बताया था। मुल्ला बदायूनी के अनुसार शरीफ की पुस्तक में शियाओं ने अली से जुड़ी इसी प्रकार की बातों का जिक्र किया और इस रूबाई का उद्धरण दिया जिसे नासिर-ए-खुसरू द्वारा लिखित बताया गया। इसमें लिखा था-

हिजरी 989 में, भाग्य नियत किए जाने से

सभी तरफ के ग्रह एक तरफ मिल जाएंगे

सिंह राशि के साल में सिंह के माह में सिंह के दिन

अल्लाह का शेर खड़ा हो जाएगा, पर्दे के पीछे से।

इस पद का अर्थ है कि ईस्वी 1579 में धरती पर कयामत आएगी।

अकबर इस्लाम विरोधी था इसका उदाहरण देते हुए मुल्ला बदायूनी ने लिखा है कि अकबर ने इबादत के समय स्वर्ण एवं रेशमी पोषाक पहनना इच्छित कर दिया। एक दिन मैंने देखा कि शाही क्षेत्र का मुफ्ती बिना रेशम की पोषाक में था। मुल्ला बदायूनी ने उससे पूछा कि शायद इस तरह का कोई रिवाज आपके ध्यान में आया है।

मुफ्ती ने कहा कि हाँ जहाँ रेशम उपलब्ध है, वहाँ रेशमी लिबास पहनने की इजाजत है। मैंने उससे कहा कि किसी को वह रिवाज देखना चाहिए, महज शहंशाह के आदेश से यह हो, गले नहीं उतरता। इस पर मुफ्ती ने मुल्ला बदायूनी से कहा यह शहंशाह के कहने के आधार पर नहीं है। यह बात अल्लाह जानता है।

मुल्ला बदायूनी ने लिखा है कि इसके बाद इस्लाम में इबादत और रोजे, ही नहीं हज तक मना कर दिए गए। कुछ दोगले जैसे मुल्ला मुबारक के लड़के ने जो कि अबुल फजल का शिष्य था, एक बड़ा लेख लिखा जिसमें मजहबी क्रिया-कलापों का मजाक उड़ाया गया। ऐसी रचनाओं को शहंशाह ने पसंद किया तथा उसने ऐसे लेखकों को प्रोत्साहित किया।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि हिजरी संवत् समाप्त कर दिया गया और तारीखे इलाही नाम से एक नया संवत् आरम्भ किया गया। शहंशाह के राज्यारोहण को इस संवत् का पहला वर्ष माना गया। महीनों के नाम उसी तरह रहे, जैसे फारसी राजाओं के समय रहे थे। इस कैलेण्डर में चौदह उत्सव सम्मिलित किए गए जो कि जोरोस्ट्रियन अर्थात् पारसी उत्सवों के अनुसार थे किंतु मुसलमानों के इफतार और उनकी प्रसिद्धि पददलित कर दी गई।  

मुल्ला की निगाह में यह कार्य इस बात का पुख्ता सबूत था कि अकबर इस्लाम विरोधी था! मुल्ला बदायूनी ने अकबर पर तंज कसते हुए लिखा है कि केवल जुम्मे की इबादत रखी गई क्योंकि कुछ बूढ़े, जर्जर और बेवकूफ आदमी इस नमाज के लिए जाया करते थे।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि तांबे के सिक्कों एवं सोने की मोहरों पर हजार साल वाला संवत् अर्थात् तारीखे इलाही लिखा जाने लगा जो इस बात का प्रतीक था कि मुहम्मद का धर्म जिसे हजार साल चलना था, समाप्ति की ओर है।

मुल्ला लिखता है कि अकबर के राज में अरबी पढ़ने-लिखने को अपराध की तरह देखा जाने लगा। मुस्लिम कानून, कुरान की टीका और रिवाज और उनके पढ़ने वालों को बुरा माना जाने लगा। खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र, चिकित्साशास्त्र, विज्ञान, गणित, शायरी, इतिहास और उपन्यास समृद्ध हुए और आवश्यक माने गए।

अरबी भाषा के कुछ अक्षरों की अवहेलना की गई। इन सब बातों ने शहंशाह को खुश किया। तूस के फिरदौसी जो ‘शाहनामा’ के दो पदों को कहानी में देता है, उनको अकबर के दरबार में बार-बार उद्धृत किया जाने लगा। इस पद में कहा गया था-

ऊँट एवं सांडे का दूध पीने से अरबों ने यह उन्नति की है

कि वे पर्सिया की हुकूमत की प्राप्ति चाहते हैं

भाग्य पर लानत्! भाग्य पर लानत्!

अर्थात्- मुल्ला बदायूनी यह कह रहा है कि अकबर के दरबार में अरब के उन लोगों पर व्यंग्य कसा जा रहा था जहाँ इस्लाम का उदय हुआ था क्योंकि अब वे (अरब वाले) इस्लाम के नाम पर पूरी दुनिया का राज चाहते थे।

मुल्ला बदायूनी की दृष्टि में दीन ए इलाही इस बात का एक और पक्का सबूत है कि अकबर इस्लाम विरोधी था! मुल्ला बदायूनी ने लिखा है कि ऐसा कोई भी पद जिसमें अकबर के पंथ के हित की बात हो, वह विद्वानों से सुनकर प्रसन्न होता और उसे अपने हक में बड़ा मसला मानता। जैसे एक पद जिसमें पैगम्बर का विधर्मी के साथ हुई झड़प में दांत का गिरना वर्णित किया गया था। मुल्ला बदायूनी लिखता है कि इसी प्रकार इस्लाम का हर आदेश, वह चाहे आम हो या खास, कारण के साथ इस्लाम की सुसंगतता, रुयत, तकलीफ और तकवीन तथा पुर्नउत्थान व न्याय के विवरण पर संदेह किए जाने लगे। उनका उपहास किया जाने लगा।

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मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी के इन वर्णनों के आधार पर कहा जा सकता है कि ई.1580 से 1590 के बीच की अवधि में मुल्ला लोग दो धड़ों में बंट गए थे। एक धड़ा अकबर के पक्ष में था जो अकबर के हर कार्य का समर्थन करता था और दूसरा धड़ा कहता था कि अकबर इस्लाम विरोधी था। इन उदाहरणों से यह भी अनुमान होता है कि इस्लाम की सुन्नी शाखा के मुल्ला-मौलवी अकबर के विरोध में थे जबकि शिया शाखा के मुल्ला-मौलवी अकबर के पक्ष में थे जिन्हें मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने काफिर लिखा है।

मुल्ला बदायूनी ने लिखा है कि यह सब जानते हैं कि कितनी कम संभावना इस बात की है कि प्रमाणों के साथ तर्क दिए जाने पर भी उसकी बात मान ली जाएगी, विशेषकर उस समय जबकि विरोधी के हाथ में जीवन या मृत्यु देने का अधिकार एवं शक्ति है। क्योंकि तर्क के लिए स्थितियों का गुणात्मक होना आवश्यक है।

अर्थात् मुल्ला बदायूनी कहना चाहता है कि चूंकि अकबर के हाथों में किसी को भी जीवन और मृत्यु देने का अधिकार था। इस कारण उसके सामने प्रमाण सहित एवं तर्क-पूर्ण बात कहने से कोई लाभ नहीं था क्योंकि अकबर इस्लाम की प्रमाण सहित कही गई बातों को भी नहीं मान रहा था। क्योंकि अकबर इस्लाम विरोधी था।

मुल्ला बदायूनी ने अकबर पर व्यंग्य करते हुए लिखा है कि जिसे कुरान और कथनों से संतुष्ट नहीं कर सकते, उस आदमी को आप एक ही प्रकार से उत्तर दे सकते हैं कि आप कोई उत्तर न दें।

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