कांग्रेस की घटती हैसियत का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अब उसे आप जैसी पिद्दी पार्टियाँ भी मुँह लगाने से बचती हैं!
पिछले एक दशक में भारत की राजनीति पूरी तरह करवट ले चुकी है। इस कारण कांग्रेस अब भारत के राजनीतिक परिदृश्य में छुटभैया राजनीतिक दलों की छोटी बहिन बनकर जिएगी। कांग्रेस के लिए अब कभी भी जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पी. वी. नरसिंहाराव और मनमोहनसिंह जैसे दौर लौट कर नहीं आएंगे।
कांग्रेस गठबंधन की सरकारों में पहले भी रही है किंतु तब वह क्षेत्रीय दलों की बड़ी बहिन हुआ करती थी। अब कम्युनिस्टों, अवसरवादी पार्टियों एवं क्षेत्रीय दलों की छोटी बहिन बन कर जी रही है। इससे कांग्रेस की घटती हैसियत का पता चलता है।
पिछले लोकसभा चुनावों तथा हाल ही में हुए जम्मू कश्मीर एवं हरियाणा विधान सभा के चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब कांग्रेस का भविष्य छोटी बहिन के रूप में ही बचा है। छोटी बहिन होना कोई बुरी बात नहीं है किंतु लम्बे समय तक जो पार्टी बड़ी बहिन बनकर रही अब उसी को छोटी बहिनों की छोटी बहिन बनकर रहना पड़े तो निश्चित रूप से अच्छी बात तो कतई नहीं। कांग्रेस के साथ वही हुआ है।
जम्मू कश्मीर में कांग्रेस का फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की पार्टी से गठबंधन था। ये वही अब्दुल्ला लोग हैं जिनके पूर्वज शेख अब्दुल्ला कभी जवाहर लाल नेहरू के मित्र हुआ करते थे किंतु जवाहर लाल नेहरू ने शेख से तंग आकर उसे जेल में पटक दिया था।
उन्हीं अब्दुल्लाओं की छत्रछाया में कांग्रेस ने जम्मू कश्मीर में विधान सभा का चुनाव लड़ा। अब्दुल्लाओं की पार्टी ने 42 सीटें जीतकर पहला स्थान प्राप्त किया, बीजेपी 29 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, स्वतंत्र उम्मीदवार 7 सीटें जीतकर तीसरे स्थान पर रहे। जबकि सबसे छोटी बहिन की तरह कांग्रेस 6 सीटों के साथ चौथे नम्बर पर आकर बैठी।
हालांकि राहुल गांधी की तरह महबूबा मुफ्ती भी मुुंह खोलते ही अपनी आंख, नाक, कान से धुंआ निकालती हैं, फिर भी महूबबा की बात जाने दो, वह फिर कभी।
हरियाणा में बीजेपी ने 48 और कांग्रेस ने 37 सीटें जीतीं। हरियाणा में कांग्रेस को आप पार्टी की छोटी बहिन बनकर चुनाव लड़ना था किंतु आप पार्टी ने कांग्रेस को मुंह नहीं लगाया।
कुछ समय पहले हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में आप पार्टी की छोटी बहिन बनकर चुनाव लड़ा था किंतु न तो बड़ी बहिन की भूमिका में 4 सीटों पर लड़ने वाली आप पार्टी और न छोटी बहिन की भूमिका में 3 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस एक भी सीट जीत सकी। इसी कारण आप पार्टी ने हरियाणा विधान सभा के चुनावों में कांग्रेस को मुंह नहीं लगाया।
वर्ष 2022 में हुए पंजाब विधान सभा के चुनावों में भी आप पार्टी ने कांग्रेस को मुंह नहीं लगाया। इन दोनों बहिनों ने आमने-सामने चुनाव लड़ा। आप पार्टी ने 117 में से 92 तथा कांग्रेस ने केवल 18 सीटों पर जीत हासिल की। इस प्रकार कांग्रेस ने हर जगह या तो छोटी बहिन बनकर चुनाव लड़ा, या फिर बड़ी बहिन बनने के प्रयास में हाथ-पांव तुड़वा कर औंधे मुंह गिर पड़ी।
2022 के हिमाचल प्रदेश विधान सभा चुनाव और 2023 के कर्नाटक विधान सभा चुनाव ही ऐसे रहे हैं जिनमें कांग्रेस ने अपने दमखम पर चुनाव लड़े और जीत हासिल की। इन दो चुनावों के अतिरिक्त कांग्रेस को कोई जीत हासिल नहीं हुई।
2024 का लोकसभा चुनाव तो कांग्रेस ने 24 दलों के साथ मिलकर लड़ा। हालांकि यहां उसने बड़ी बहिन बनने की चेष्टा की तथा 328 सीटों पर चुनाव लड़ी किंतु 99 सीटों पर जीत हासिल करके मुंह की खाकर बैठ गई।
इन 99 सीटों के बल पर कांग्रेस ने देश भर में ऐसा प्रदर्शन किया मानो वह लोकसभा में बहुमत पाकर सरकार बनाने में सफल हो गई है तथा बीजेपी तथा उसकी सहयोगी पार्टियां 293 सीटों पर सिमटकर अपना सब कुछ गंवा बैठी है।
कांग्रेस के नेताओं का इससे अधिक फूहड़ प्रदर्शन शायद ही कभी देखा गया हो। कांग्रेस की घटती हैसियत का इससे अधिक बड़ा प्रमाण क्या होगा!
दिन प्रति दिन कांग्रेस के पैरों के नीचे से जमीन खिसकती जा रही है और राहुल गांधी के हाथों में से राजनीतिक ताकत मुट्ठी में बंद रेत की तरह फिसलती जा रही है किंतु राहुल गांधी के हौंसलों की दाद देनी पड़ेगी। जब भी बोलते हैं, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए, देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बीजेपी के लिए स्तरहीन शब्दों का ही प्रयोग करते हैं।
यह देखकर हैरानी होती है कि राहुल गांधी अपने वास्तविक प्रतिद्वंद्वियों से लड़ने की बजाय आरएसएस, अम्बानी और अडानी पर हमले करते रहते हैं। पता नहीं राहुल गांधी ने ये तीन प्रतिद्वंद्वी जबर्दस्ती क्यों खड़े कर लिए हैं। शायद राहुल गांधी ने आरएसएस, अम्बानी और अडानी हिन्दू शक्ति के प्रतीक मान लिए हैं जिन पर आक्रमण करे बिना राहुल गांधी की कोई जनसभा पूरी नहीं होती।
जो भी हो, आने वाले समय में हम देखेंगे कि न तो गांधी परिवार हिन्दू विरोधी राजनीति से दूर होगा और न कांग्रेस गांधी परिवार से अपना पीछा छुड़ा पाएगी। छोटी बहिन दिन पर दिन और छोटी होती चली जाएगी। कांग्रेस की घटती हैसियत उसे कितनी छोटी पार्टी बना देगी, इसका अनुमान भी कांग्रेस के नेताओं को नहीं है।
कानून धर्म के लिए होना चाहिए न कि धर्म निरपेक्षता की रक्षा के लिए! भारत देश का धर्म क्या है और भारत देश का कानून क्या है? क्या इन दोनों में तालमेल नहीं होना चाहिए?
जो हिन्दू धर्म पूरी दुनिया में जाकर शांति, अहिंसा और परस्पर सद्भाव से जीना सिखाता है, क्या उस धर्म की रक्षा नहीं होनी चाहिए? क्या ऐसे अहिंसक धर्म के प्रति भी कानून को निरपेक्ष अर्थात् उदासीन बने रहना चाहिए?
आज पूरी दुनिया की शांति खतरे में पड़ी हुई है। रूस-यूक्रेन युद्ध तथा मध्य-एशिया में चल रहे इजराइल-हिज्बुल्ला युद्ध की आग फैलती ही जा रही है। तालिबान से लेकर, आईसिस, हमास और हूती जैसे आतंकी संगठन तेजी से दुनिया में पैर पसार रहे हैं जिससे आदमी का अस्तित्व ही खतरे में दिखाई देता है।
न जाने किस क्षण धरती पर परमाणु बमों की वर्षा आरम्भ हो जाए और धरती भयभीत होकर अपनी धुरी से खिसक कर इस अनंत ब्रह्माण्ड में कहीं खो जाए! ऐसी धरती पर कोई प्राणी नहीं होगा, केवल खतरनाक परमाणु विकीरण का अस्तित्व होगा! भगवान जाने कि वह फिर कभी ऐसी सुंदर धरती बनाएगा भी या नहीं!
आज विश्व में अग्रणी अमरीका और इंग्लैण्ड जैसे देश भी युद्ध की विभीषिका को अपने दरवाजे पर देखकर भयभीत हैं। ऐसी भयंकर परिस्थितियों में केवल भारत ही ऐसा देश है जिसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर युद्ध के विरुद्ध बोल रहे हैं तथा विश्व शांति की स्थापना का उद्घोष करते हुए घूम रहे हैं।
भारत के प्रधानमंत्री किस प्रतिष्ठा के बल पर विश्वशांति की बात करते हुए घूम रहे हैं? केवल हिन्दू धर्म की प्रतिष्ठा के बल पर! क्योंकि हिन्दू धर्म की ऐसी प्रतिष्ठा है कि वह शांति और सद्भाव में जीने का उपदेश दे सकता है। नरेन्द्र मोदी न केवल हिन्दुओं के देश भारत के प्रधानमंत्री हैं अपितु स्वयं भी हिन्दू हैं और हिन्दू धर्म के उदात्त सिद्धांतों पर जीते हैं।
क्या किसी मुस्लिम या ईसाई देश का राष्ट्राध्यक्ष कभी भी विश्वशांति के पक्ष में खड़ा हो पाया है? क्या रूस, अमरीका, यूक्रेन, ईरान, अफगानिस्तान, बांगलादेश, तुर्की जैसे देश शांति के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं?
केवल हिन्दुओं का देश, दुनिया का एकमात्र हिन्दू देश विश्वशांति के पक्ष में खड़ा है। जब तक हिन्दू धरती पर बचेगा, तब तक वह शांति के लिए खड़ा रहेगा।
जबसे नेपाल में हिन्दू राजा का राज्य समाप्त हुआ है और उसने चीन के कम्युनिस्टों को अपना स्वामी बनाया है, तब से न केवल नेपाल की शांति भंग हो गई है, अपितु सदियों से चले आ रहे भारत-नेपाल के शांतिपूर्ण सम्बन्ध भी खतरे में पड़ गए हैं। नेपाल के लोग फिर से हिन्दू धर्म के शासन की तरफ लौटना चाहते हैं।
चीनी कम्युनिस्टों ने तिब्बत का क्या हाल बनाया, हॉन्गकॉन्ग का क्या हाल बनाया? ताइवान का क्या हाल बनाना चाहता है।
उत्तर कोरिया दुनिया पर कैसी भयंकर विपत्ति लाना चाहता है!
जब से बर्मा ने धर्मविहीन चीन को अपना स्वामी बनाया, बर्मा से लोकतंत्र समाप्त हो गया, लोग बंदूकों के साए में जी रहे हैं।
जब से लंका ने चीनी कम्युनिस्टों को अपने देश की धरती पर पैर रखने दिए, तब से श्रीलंका जैसे शांतिप्रिय बौद्ध देश में भुखमरी और अशांति फैल गई।
ईसाई देश अमरीका द्वारा पाले हुए सांपों ने हाल ही में बांगलादेश की सड़कों पर मौत का जो नंगा नाच किया है, वह सबके सामने है।
ईसाई देश कनाडा ने खालिस्तानी आतंकियों को बढ़ावा देकर भारत में नए उपद्रवों का जो सिलसिला शुरू है, वह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है।
हम आंखें मूंदकर बैठे हैं तो क्या हुआ, सच्चाई कुछ ही वर्षों में सामने आ जाएगी कि पंजाब के हालात कितने खराब हो चुके हैं। कुछ समय पहले हम इसका एक ट्रेलर देख भी चुके हैं जब भारत के प्रधानमंत्री को पंजाब की पुलिस द्वारा बीच सड़क पर रोक दिया गया और उन्हें प्रधानमंत्री के सुरक्षाकर्मियों द्वारा वहीं से वापस दिल्ली लाया गया।
पिछले लोकसभा चुनावों में ही जेल में बंद खालिस्तानी आतंकी अमृतपालसिंह को जेल में बंद होते हुए पंजाब की जनता ने लोकसभा का सदस्य चुना। क्या उस क्षेत्र में हिन्दू वोटरों की संख्या अधिक होती तो अमृतपालसिंह कभी भी सांसद चुना जाता?
काश्मीर का राशिद इंजीनियर जेल में बंद खतरनाक अपराधी था किंतु वह भी किस मजहब के मतदाताओं के बल पर भारत की लोकसभा का सदस्य चुन लिया गया? क्या उस क्षेत्र में हिन्दू वोटरों की संख्या अधिक होती तो राशिद इंजीनियर कभी भी सांसद चुना जाता?
थोड़ा पीछे चलकर देखें, 1947 में जब भारत आजादी की चौखट पर खड़ा था, भारत की शांति क्यों भंग हुई और देश में लाखों लोगों का कत्ल, लाखों स्त्रियों से बलात्कार, करोड़ों लोगों का पलायन किस मजहबी जिद के कारण हुआ? क्या मानवता के इतिहास ने उस नरसंहार को पूरी तरह भुला दिया है।
क्या हिन्दू धर्म ने कभी भी धरती के किसी भी हिस्से में अपने लिए अलग देश की मांग की? नहीं की क्योंकि हिन्दू को सहअस्तित्व में रहना आता है।
क्या दुनिया में कोई भी ऐसा देश है जिसने ईरान से जान बचाकर भागे पारसियों को अपनी छाती से लगाया? भारत के अतिरिक्त किसी ने नहीं लगाया। जब जर्मनी से यहूदी मारकर भगाए गए, तब भी भारत ही उनके लिए सद्भाव का हाथ बढ़ा सका।
क्या किसी भी देश में हिन्दुओं के कारण उस देश के कानून को, उस देश के धर्म को, उस देश की संस्कृति को, उस देश के लोगों को, उस देश की अर्थव्यवस्था को कोई आघात पहुंचा है? नहीं पहुंचा।
यदि इस्लामी देशों को छोड़ दें तो हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा कि जहाँ-जहाँ हिन्दू पहुंचा है, वहाँ-वहाँ शांति, सद्भावना और उदार भावों का संचार हुआ है। आज विश्वभर में लाखों ईसाई हैं जो हिन्दू धर्म का महत्व समझ रहे हैं और उसे अपना रहे हैं।
क्या हिन्दू धर्म कभी भी किसी अन्य धर्म के मनुष्यों को हिन्दू धर्म में कन्वर्ट करने के लिए किसी भी प्रकार का प्रयास करता है? क्या हिन्दू धर्म अन्य मजहबों के इंसानों को हिन्दू बनाने के लिए भय, लालच और षड़यंत्र का सहारा लेता है? नहीं लेता क्योंकि हिन्दू धर्म में किसी को कन्वर्ट किया ही नहीं जा सकता। ऐसा कोई विधान ही नहीं है। लोग स्वतः हिन्दू जीवन शैली अपना लेते हैं।
जिस प्रकार पारसी किसी को पारसी धर्म में कन्वर्ट नहीं करते, जिस प्रकार यहूदी किसी को यहूदी धर्म में कन्वर्ट नहंी करते, उसी प्रकार हिन्दू भी किसी अन्य धार्मिक विश्वास वाले मानव को अपने धर्म में कन्वर्ट नहीं करते। आज पारसी, हिन्दू और यहूदी तीनों ही खतरे में हैं!
कोई भी मजहब या पंथ किसी अन्य धर्मिक विश्वास के मानव समुदाय को अपने मजहब या पंथ में कन्वर्ट करता है, वह कभी भी विश्वशांति जैसी दुर्लभ बातें नहीं कर सकता।
विश्वशांति सबको अपनाने से होती है, किसी को कन्वर्ट करने से नहीं होती।
बिना किसी संकोच के, बिना किसी पूर्वाग्रह के, बिना किसी दंभ या पाखण्ड के यह कहा जा सकता है कि धरती पर सबसे अहिंसक और सबसे शांत मानव समुदाय केवल और केवल हिन्दू है जो मानवों को परस्पर सद्भाव से जीना सिखाता है, प्राणी मात्र में भगवान के स्थित होने का भाव रखता है, ऐसा दुर्लभ धार्मिक समुदाय आज अपने ही घर में खतरे में है।
क्या संसार के समझदार और गंभीर लोगों को यह दायित्व नहीं है कि वे विश्वशांति के लिए आधार भूमि तैयार करने में सक्षम हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए प्रयास करें। ऐसा करने के लिए उन्हें हिन्दू धर्म अपनाना नहीं होगा, केवल हिन्दू धर्म पर प्रहार करने वालों के खतरनाक इरादों का साथ देने से बचना होगा।
एक ऐसा संसार जिसमें सभी प्राणी शांति और सद्भावना के साथ रह सकें, तभी बन सकता है जब हिन्दू धर्म इस धरती पर सुरक्षित रहे।
ईश्वर न करे किंतु यदि कभी ऐसा दिन आया कि हिन्दू धर्म धरती से समाप्त हो जाए, तो विश्वशांति जैसी बातें करने वाला कोई भी नहीं बचेगा! वह धरती कैसी होगी, इसकी कल्पना मात्र से भय लगता है। शायद धरती होगी ही नहीं, वह परमाणु बमों की आग में झुलस कर नष्ट हो जाएगी।
क्या ऐसे उदार धर्म के प्रति उसी देश के कानून को निरपेक्ष भाव अर्थात् उदासीन भाव रखना चाहिए? क्या देश का धर्मनिरपेक्ष कानून यह कहता है कि भारत का कोई धर्म नहीं है, यदि वह ऐसा ही कहता है तो उसे धर्मनिरपेक्ष नहीं होना चाहिए। दुनिया में भारत और नेपाल के अतिरिक्त और कोई देश धर्मनिरपेक्ष नहीं है जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों देश हिन्दू हैं। हिन्दू धर्म की ऊर्जा से बने हैं।
क्या भारत का धर्मनिरपेक्ष कानून हिन्दू धर्म की रक्षा करने में समर्थ है? या फिर देश का धर्मनिरपेक्ष कानून हिन्दुओं की रक्षा करने में समर्थ तो है किंतु जानबूझ कर नहीं कर रहा क्योंकि कानून का शासन चलाने वालों में, कानून की व्याख्या करने वालों में और कानून को कार्यान्वित करने वालों में हिन्दू धर्म की रक्षा करने का भाव ही मिट चुका है?
आज हर ओर से हिन्दू धर्म पर प्रहार हो रहे हैं जिनके चलते देश की डेमोग्राफी बदल रही है, बंगाल और असम जैसी सीमावर्ती राज्य ही नहीं हरियाणा, हिमाचल और उत्तराखण्ड जैसे प्रांतों की भी डेमाग्राफी तेजी से बदल चुकी है। इसे देखकर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि भारत का कानून भारत के अपने मूल धर्म की रक्षा के लिए क्यों नहीं बना है?
जिस कांग्रेस ने देश की आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया, उसी कांग्रेस ने आगे चलकर वक्फबोर्ड जैसी संस्थाएं खड़ी कीं और उनके पक्ष में अंधे कानून बनाकर हिन्दू धर्म को कमजोर करने का षड़यंत्र किया। उसी कांग्रेस ने धर्मस्थलों की 1947 वाली स्थिति बनाए रखने जैसा खतरनाक कानून बनाया।
उसी कांग्रेस ने देश में चारों तरफ से पाकिस्तानियों एवं बांग्लादेशियों को चोरी-छिपे घुसने के मार्ग तो बनाए किंतु उन देशों में आजादी के समय रह गए हिन्दुओं, बौद्धों, सिक्खों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया। जिसका परिणाम यह है कि आज अफगानिस्तान से आखिरी गुरुग्रंथ साहब भी भारत लौट आया है।
आज देश में लव जेहाद, लैण्ड जेहाद, थूक जेहाद, पेशाब जेहाद, वक्फ जेहाद अपने चरम पर हैं, अस्पतालों एवं रेलवे स्टेशनों पर मजारें बन चुकी हैं, सरकारी जमीनों पर हजारों मस्जिदें खड़ी हैं। ऐसे बहुत से उदाहरण दिए जा सकते हैं।
इन परिस्थितियों में हिन्दू धर्म अपना अस्तित्व कैसे बचाए रख सकता है? हिन्दू सड़कों पर लड़ने का अभ्यस्त नहीं है, न देश का कानून इसकी अनुमति देता है।
किसी भी देश में लोगों को सड़कों पर लड़ने की अनुमति होनी भी नहीं चाहिए किंतु कुछ तो ऐसा किया जाना चाहिए कि उस देश के लोगों को अपना मूल धर्म बचाने के लिए सड़कों पर आने की आवश्यकता ही अनुभव न हो!
जब हिन्दू धर्म का बाह्य शरीर ही खण्डित हो जाएगा, अर्थात् देश की जनसंख्या का स्वरूप ही बदल जाएगा तो हिन्दू धर्म का भीतरी स्वरूप भी बचा नहीं रहेगा।
यदि देश का कानून हिन्दू धर्म को बचाने में समर्थ होगा, तथी हिन्दू दुनिया भर में जाकर मानवों को शांति से रहने के लिए प्रेरित कर सकेगा।
भारत का कानून हिन्दू धर्म की रक्षा करने के आड़े कैसे आता है, इसके दो उदाहरण ही देने पर्याप्त हैं। आज यदि सरकार थूक जेहाद और पेशाब जेहाद रोकने के लिए केवल इतना सा आदेश देती है कि हर होटल, ढाबे और रेढ़ी वाला अपनी दुकान के सामने अपना नाम लिखे, तो कानून सामने आकर इस आदेश पर रोक लगा देता है।
यदि किसी ने सरकारी भूमि पर कब्जा कर रखा है, और वह आदमी दंगों या जघन्य अपराधों में लिप्त भी पाया जाता है और सरकार ऐसे मनुष्य के अवैध घर या दुकान को हटाने की कार्यवाही करती है तो कानून उस पर रोक लगा देता है।
देश में कानून का शासन होना चाहिए किंतु कानून भी तो अच्छा होना चाहिए। कानून को कार्यान्वित करने के लिए भावना भी तो अच्छी होनी चाहिए।
क्या कानून को केवल बहुसंख्यक के खिलाफ ही होना चाहिए, क्या उसे केवल अल्पसंख्य के पक्ष में ही खड़े होना चाहिए?
कानून को निष्प्राण नहीं होना चाहिए। प्राणवान होना चाहिए और केवल प्राणवान ही नहीं होना चाहिए, धर्मप्राण भी होना चाहिए।
कानून अंधा नहीं होना चाहिए, आंख वाला होना चाहिए!
कानून धर्म के लिए होना चाहिए न कि धर्म निरपेक्षता की रक्षा के लिए! भारत देश के धर्म एवं कानून में तालमेल होना चाहिए।
कुछ लोग हिन्दू धर्म की उदारता का गलत फायदा उठाकर हिन्दुओं से साईं बाबा की पूजा जबर्दस्ती करवाना चाहते हैं।
हिन्दू धर्म दुनिया का ऐसा उदार धर्म है जो मिट्टी, पानी, आग और पहाड़ से लेकर कुत्ते, सांप, गधे, साण्ड, उल्लू, गीध, कौए और कंटीली झाड़ी तक की पूजा करने की न केवल अनुमति देता है, अपितु परमात्मा को पाने के लिए इस तरह की पार्थिव पूजाओं को प्रोत्साहित भी करता है।
हम आकाश, वायु, अग्नि, जल, धरती की पूजा पंचमहाभूतों के रूप में करते हैं। आकाश में स्वतः उत्पन्न होने वाली ओंकार ध्वनि को को तो परम-पिता परमेश्वर की ही ध्वनि मानते हैं। आकाश में दिखने वाले नक्षत्रों को देवी-देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं।
सदियों से हम सूर्य को विष्णु का साक्षात स्वरूप मानकर और चंद्रमा को चंद्रदेव मानकर अर्घ्य देते हैं। हम विविध नक्षत्रों की प्रसन्नता के लिए ना-ना प्रकार के अनुष्ठान करते हैं, सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के दिन दान-पुण्य करके सूर्यदेव और चंद्रदेव को कष्ट न हो, इस हेतु भगवान की पूजा करते हैं।
हम भगवान के विराटतम स्वरूप को वैश्वानर का रूप मानते हैं जिसका अर्थ है कि वह चींटी से लेकर हाथी तथा मनुष्य से लेकर देवताओं तक में एक जैसा ही विराजमान है।
हिन्दू जाति अनादि काल से नदी, वृक्ष एवं पर्वतों की पूजा देवी-देवताओं के रूप में करती है। नदी तटों और नदियों के संगम स्थलों को तीर्थों के रूप में पूजते हैं और अपने पूर्वजों के अवशेष नदियों को जाकर समर्पित करते हैं ताकि हमारे पूर्वजों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिले।
करोड़ों हिन्दू अपने घर में बनने वाले भोजन का सर्वप्रथम अंश नित्य ही अग्नि को देव मानकर समर्पित करते हैं। उसे पंचयज्ञों में सम्मिलित करते हैं। गेहूँ की पहली बाली होली के दिन अग्नि देव को समर्पित करते हैं।
घर में आने वाली मिठाई का पहला अंश सब जीवों के निमित्त धरती पर गिराया जाता है। यह भी पंचयज्ञों में से एक यज्ञ माना जाता है।
हिन्दू जाति ने भगवान विष्णु का मत्स्यावतर मानकर मछली के रूप में पूजा, कूर्म अवतार मानकर कछुए के रूप में पूजा, वराह अवतार मानकर सूअर के रूप में पूजा, नृसिंह अवतार मानकर आधे सिंह के रूप में पूजा। पुराणों में भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार का उल्लेख है जो वेदों की रक्षा के लिए हुआ था। हयग्रीव का अर्थ होता है घोड़े की गर्दन वाला भगवान। हम बंदर में हनुमानजी के दर्शन करते हैं।
हिन्दू जाति नाग को देवता कहकर पूजती है। शेषनाग को विष्णु का सबसे बड़ा सेवक और छत्र मानती है जिसके फन पर धरती टिकी हुई है। शिवजी के गले में सांप झूलते हैं। इससे अधिक और क्या आदर सांप जैसे प्राणी को दिया जा सकता है!
हिन्दू जाति साण्ड को नंदी बाबा कहकर धोकती है। धरती पर रहने वाले करोड़ों करोड़ हिन्दू गाय को न केवल इंसानों की अपितु देवताओं तक की माता मानते हैं। कृष्णजी को प्रसन्न करने के लिए बछड़ों की पूजा करते हैं।
हम बैल को भगवान भोले नाथ की सवारी मानते हैं और शेर को दुर्गाजी का वाहन मानकर पूजते हैं। कुत्ते को भैंरूजी का वाहन मानकर पुए खिलाते हैं। भैंसे को यमराज का वाहन मानकर आदर देते हैं।
शीतला सप्तमी के दिन हम गधे पर सवार शीतला माता की पूजा करते हैं। चींटियों के लिए कीड़ी नगरा सींचते हैं। पक्षियों के लिए नित्य ही धान उछालते हैं।
मोर को कार्तिकेय का वाहन मानकर मूंग चुगाते हैं। हंस को सरस्वती का वाहन मानकर नमस्कार करते हैं। गरुड़जी को न केवल भगवान विष्णु का वाहन मानकर अपितु भगवान विष्णु का सबसे बड़ा सेवक मानकर धोकते हैं। उल्लू तक को माता लक्ष्मी का वाहन मानकर आदर देते हैं।
करणीमाता के मंदिर में चूहों को देवी के भक्त मानकर आदर दिया जाता है।
हम पीपल के पेड़ को साक्षात् वासुदेव मानकर सींचते हैं। बड़ मावस के दिन वटवृक्ष को पूजते हैं और उसे पकवान समर्पित करते हैं। हम किसी भी पत्थर में भगवान की कल्पना करके पत्रं, पुष्पं, फलं, तोयं से उसकी पूजा करते हैं। किसी भी पत्थर पर सिंदूर चढ़ाकर उसे हनुमानजी और दुर्गाजी के रूप में पूजते हैं।
अपने हर देवालय में हमने पत्थर की मूर्ति रख रखी है और उसके समक्ष दण्डवत् होकर परमात्मा की शरण में जाते हैं।
पीली कनेर में दुर्गाजी का, लाल कनेर में लक्ष्मीजी का और सफेद कनेर में माँ सरस्वती का वास मानते हैं। केले के पेड़ को साक्षात् विष्णु मानकर पूजते हैं, यहाँ तक कि खेजड़ी के कंटीले पेड़ और बेर की कंटीली झाड़ियों तक की पूजा करते हैं।
हम वेदों को भी भगवान की वाणी मानते हैं, वेदों को साक्षात् भगवान मानते हैं, रामायण और गीता को भी देवियों की तरह मानकर उनका अभिनंदन करते हैं।
इन उदाहरणों के अतिरिक्त और जो कुछ भी आपको प्रकृति में दिखाई देने वाला जीव-जंतु, पेड़-पौधा और झाड़ी से लेकर किसी भी प्रकार की प्राकृतिक रचना दिखाई दे जाए, हिन्दू उस सबकी पूजा करता आया है और यही उसके हृदय की विशालता, चित्त की उदारता और मस्तिष्क का वैराट्य है।
हिन्दू धर्म में इतनी व्यापकता मौजूद होते हुए भी, हम किसी अहिन्दू फकीर अर्थात् साईं बाबा को भगवान की तरह नहीं पूज सकते! हमने अपने मंदिरों में पत्थरों को भगवान माना किंतु हाड़-मांस से बने किसी आदमी को भगवान नहीं माना। हमने शिव, विष्णु और दुर्गा के अवतारों को तो भगवान माना किंतु किसी फकीर, उपदेशक को भगवान नहीं माना।
राम चरित मानस में कहा गया है कि ईश्वर की आराधना के लिए स्मरण करते ही सरस्वती विधाता का घर छोड़कर दौड़ पड़ती है-
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवत धाई।
किंतु यदि सरस्वती देखती है कि मनुष्य ईश्वर को छोड़कर प्रकृति में उत्पन्न सामान्य मनुष्य का गुणगान कर रहा है तो वह सिर धुन कर पश्चाताप करने लगती है-
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना, सिर धुनि गिरा लगत पछताना।
हिन्दू धर्म में बड़े-बड़े साधु-संतों की कमी नहीं है। हमने कपिल मुनि और वेदव्यास से लेकर शंकराचार्य, कबीर, मीरा, तुलसी, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, एकनाथ और सूरदास आदि संतों को भगवान की तरह आदर दिया।
हमने रहीमदास, रसखान, चांदबीबी और ताज बीबी जैसे मुसलमान संतों पर कोटिन्ह हिन्दू वारिए कहकर उनके चरण पकड़े किंतु उन्हें मंदिरों में लाकर नहीं पूजा। ऐसे हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं।
ठीक इसी तरह चांद खाँ उर्फ साईं बाबा को हम फकीर मानकर आदर तो दे सकते हैं किंतु चांद खाँ को शिव, विष्णु और दुर्गा के समकक्ष बैठाकर पूज नहीं सकते। अपने सनातन धर्म के मंदिरों में स्थापित नहीं कर सकते।
संभवतः अब तक बात स्पष्ट हो गई होगी कि हम चांद खाँ उर्फ साईं बाबा को फकीर मानकर क्यों आदर दे सकते हैं किंतु ईश्वर मानकर क्यों नहीं पूज सकते! इस पर भी यदि किसी को उन्हें र्साईंबाबा मानकर पूजना ही है तो उन्हें कौन रोकता है, वे साईंबाबा के लिए अलग मंदिर बनवाएं।
कबीर पंथियों ने भी तो अपने अलग कबीर द्वारे बना रखे हैं। आर्य समाजियों ने भी तो अपने अलग आर्य समाज बना रखे हैं। सिक्खों ने भी अपने अलग गुरुद्वारे बना रखे हैं, बौद्धों ने बौद्धमंदिर बना रखे हैं। जैनों ने भी जैन मंदिर अलग बना रखे हैं।
अलग पूजा स्थलों के बावजूद हिन्दू जाति कबीर पंथियों, आर्य समाजियों, सिक्खों, बौद्धों, जैनों आदि को हम हिन्दू धर्म के अंदर ही मानते हैं और उन्हें पूरा सम्मान देते हैं।
यह कैसी हठधर्मिता है कि जो लोग किसी फकीर की पूजा नहीं करना चाहते और जिन्होंने सनातन धर्म की मूल अवधारणा के अनुसार देवी-देवताओं के मंदिर बनाए हैं, उन मंदिरों में जबर्दस्ती किसी फकीर की मूर्ति रखकर उसकी पूजा सनातनियों से कराना चाहते हैं।
जब सनातनी भक्त अहिन्दू फकीर की मूर्ति को अपने मंदिर में रखने पर आपत्ति करते हैं तो वे जबर्दस्ती करने लगते हैं।
कबीरपंथी, आर्य समाजी, जैन, बौद्ध, सिक्ख कोई भी अपने मत की मूर्तियों को सनातनियों के मंदिरों में रखने का दुराग्रह नहीं करता।
हिन्दू धर्म के लोग अहिन्दू फकीर की मूर्तियां हटाना चाहते हैं किंतु दो संस्थाएं इसमें बाधक बनती हैं, एक तो भारत की कानून व्यवस्था जो संविधान की कोई न कोई धारा बताकर और धर्मनिरपेक्षता का कानून दिखाकर, हिन्दूधर्म की उपेक्षा करती है और दूसरी है भारत की राजनीतिक व्यवस्था जो वोटों के लालच में किसी भी ऐसे व्यक्ति को नाराज नहीं करना चाहती जो हिन्दू धर्म का नुक्सान करता है।
यदि चांद खाँ उर्फ साईं बाबा के भक्तों को सब धर्मों में इतनी ही एकता दिखाई देती है तो ये साईंभक्त मस्जिदों, गिरजाघरों, गुरुद्वारों, कबीरद्वारों आदि में साईं की मूर्ति ले जाकर क्यों नहीं रखते। इनका सारा जोर सनातन मंदिरों का स्वरूप बदलने पर ही क्यों लगा हुआ है। लगता है कि इसके पीछे कोई दुराभिसंधि काम कर रही है!
देश और कानून की परिस्थितियां जो भी हों, सनातन धर्म को अपने मूल सिद्धांत पर दृढ़ रहना चाहिए। सनातन धर्म के मूल उद्घोषों में से एक यह भी है- धर्मो रक्षति रक्षितः। अर्थात् जो अपने धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
कहा भी गया है- जो दृढ़ राखे धर्म को तेहि राखे करतार।
हिन्दू धर्म के बड़े रक्षक गुरु गोबिंदसिंह ने भी कहा है- सकल जगत में खालसा पंथ गाजै, जगै हिन्दू धर्म सब भण्ड भाजै।
साईं बाबा की पूजा करने से न तो यह लोक सुधरेगा और न परलोक। अपने धर्म में बने रहिए। गीता में कहा गया है- स्वधर्मे निधनं श्रेयं, परधर्मे मृत्यु भयावहाः।
नसरुल्ला का जनाजा कैसे निकलेगा, इस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। क्या नसरुल्ला का जनाजा दुनिया को किसी बड़े युद्ध में झौंक देगा, या फिर यह कार्य बिना किसी विघ्न के पूरा हो जाएगा!
हिज्बुल्ला का चीफ नसरुल्ला हजारों मुसलमानों को मरवाकर, लाखों मुसलमानों का अंग-भंग करवाकर तथा लाखों मुसलमानों को बेघर करवाकर चिर निद्रा में सो गया। मृत्यु की देवी ने उसे अपने अंक में शांति दी जहाँ अब वह कयामत होने तक सोता रहेगा।
इस बात से कोई इन्कार नहीं किया जा सकता कि लेबनान तथा बेरुत में जितने भी मुसलमानों का नुक्सान हुआ या उनकी मौत हुई, उनमें से अधिकांश निरीह थे, उनका कोई दोष नहीं था, वे किसी के विरुद्ध नहीं लड़ रहे थे, हमारी तरह सामान्य सी शांत जिंदगी जी रहे थे, अपने बच्चों को पाल रहे थे और उनके लिए सुखद जीवन की तलाश कर रहे थे।
वे इंसान ही थे किंतु हिज्बुल्ला ने उन्हें इंसान नहीं समझा, केवल मुसलमान समझा। हिज्बुल्ला के अनुसार उनमें से प्रत्येक का कर्तव्य था कि वह इजराइल के यहूदी काफिरों के विरुद्ध लड़े तथा लड़ता हुआ कौम के काम आए। हिज्बुल्ला की हरकतों के कारण लेबनान और बेरुत के निरीह लोग बिना लड़े ही कौम के काम आ गए।
यही कारण है कि लेबनान की जनता अब हिज्बुल्ला के आतंकवादी लड़ाकों को सड़कों पर पीट रही है। हिज्बुल्ला लेबनान के लोगों की सहानुभूति खो चुका है।
जब नसरुल्ला की मौत की खबर दुनिया भर में फैली तब यह बात कही गई कि 80 हजार किलो बारूद के नीचे दबकर या बारूद की आग में जलकर नसरुल्ला के शरीर का क्या हुआ, कुछ पता नहीं चला किंतु बाद में खबर आई कि नसरुल्ला का शव मिल गया है।
नसरुल्ला के शव पर एक खंरोच तक नहीं मिली। उसका शरीर पूरी तरह सुरक्षित है। दुनिया भर के लोगों का अनुमान है कि नसरुल्ला की मौत एक सुरक्षित बंकर में पहुंच रही बम धमाकों की आवाज सुनकर हृदयाघात से हुई।
अब नसरुल्ला का शव मिले भी कई दिन बीत चुके हैं किंतु अभी तक उसे कब्र तक नहीं पहुंचाया जा सका है। इसका कारण यह बताया जा रहा है कि हिज्बुल्ला के सभी बड़े कमाण्डरों को इस जनाजे में भाग लेना है जो लेबनान में अलग-अलग बंकरों में छिपे हुए हैं।
साथ ही ईरान के मजहबी नेता अली खामनेई को भी इस जनाजे में भाग लेना है जो इजराइली मिसाइलों के भय से किसी अत्यंत गुप्त स्थान में छिपा हुआ है।
यदि हिज्बुल्ला के बड़े कमाण्डर और अली खामनेई नसरुल्ला के जनाजे में चलेंगे तो इजराइल इसे अपने लिए अच्छा अवसर समझकर इस जनाजे पर मिसाइल देकर मारेगा जिससे इजराइल के सारे बड़े दुश्मन एक साथ ही समाप्त हो जाएंगे।
जनाजे पर मिसाइल मारना नैतिक रूप से गलत है। मानवता की दरकार है कि मरे हुए व्यक्ति से कोई दुश्मनी न रखी जाए किंतु इजराइल इस समय नैतिकता और मानवता की सीमाओं को स्वीकार करके अपने देश के सैनिकों को अनंत काल तक युद्ध की आग में झौंके हुए नहीं रखना चाहेगा।
इसलिए बहुत संभव है कि इजराइल नसरुल्ला के जनाजे पर बम या मिसाइल बरसाए। इस कारण हिज्बुल्ला नसरुल्ला का जनाजा उठाने में असमंजस की स्थिति में है।
पर्याप्त संभव है कि हिज्बुल्ला यूनाइटेड नेशन्स के माध्यम से या किसी और शक्ति के माध्यम से एक दिन के सीज फायर की कोशिश करे ताकि जनाजे पर मिसाइलें नहीं बरसें।
इजराइल ने यूएन के सेक्रेटरी जनरल अंटोनियो गुटेरस से पहले ही कह दिया है कि वह इजराइल की धरती पर पैर न रखे।
कोई नहीं जानता कि जनाजे के लिए की जा रही सीज फायर की कोशिशों का क्या परिणाम निकलेगा किंतु इस संदर्भ में भारत के धर्मशास्त्रों में वर्णित दो घटनाओं का उल्लेख किया जा सकता है।
जिस समय लक्ष्मणजी ने मेघनाद को मारा, उस समय मेघनाद की पत्नी सुलोचना अपने पीहर में थी। मेघनाद की मृत्यु की सूचना पाकर वह लंका आई किंतु लंका के चारों ओर बंदरों की सेना ने घेरा डाल रखा था।
सुलोचना ने बंदरों से प्रार्थना की कि वे मुझे लंका के भीतर जाने दें किंतु बंदरों ने उसे रोक लिया तथा हनुमानजी को सूचना दी। हनुमानजी ने सुलोचना को तत्काल लंका में प्रवेश करने की अनुमति दे दी।
दूसरी घटना रावण की मृत्यु के बाद की है। जैसे ही रावण मारा गया, वैसे ही रामजी ने विभीषणजी को आज्ञा दी कि वे लंका में प्रवेश करके राक्षसराज रावण की अंत्येष्टि करवाएं।
भारत की संस्कृति शत्रु के शव को शत्रु नहीं मानती है किंतु इजराइल की संस्कृति इस स्थिति में क्या करने को कहती है, यह तो समय ही बताएगा!
ऐश्वर्या राय एक फिल्म अभिनेत्री हैं और राहुल गांधी भारत की लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं, दोनों एक दूसरे के रास्ते कहीं नहीं काटते, फिर भी राहुल गांधी ऐश्वर्या राय से क्यों नाराज हैं, यह समझ से परे है!
राहुल गांधी का अयोध्या के राम मंदिर से क्या रिश्ता है, इसे समझना अधिक कठिन नहीं है, राहुल गांधी का अयोध्या के सांसद अवधेश प्रसाद से क्या रिश्ता है, इसे समझना भी कठिन नहीं है, राहुल गांधी का नरेन्द्र मोदी, गौतम अडानी तथा मुकेश अम्बानी से क्या रिश्ता है, इसे भी समझना कठिन नहीं है किंतु राहुल गांधी का ऐश्वर्या राय एवं उनके परिवार से क्या रिश्ता है, यह समझ में नहीं आता!
राहुल गांधी जनसभाओं में राम मंदिर उद्घाटन पर अमिताभ बच्चन तथा ऐश्वर्या बच्चन की उपस्थिति का उल्लेख जितने क्रोध, व्यथा, निराशा और शिकायत के साथ करते हैं, उसे देखकर मन में यह स्वाभाविक सा प्रश्न उठता है कि बच्चन परिवार और राहुल गांधी के बीच का ये रिश्ता क्या कहलाता है?
अयोध्या जन्मभूमि मंदिर का ताला राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी की सरकार के समय में खुला, सब जानते हैं!
जन्मभूमि पर विवादित ढांचा कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हाराव के समय में टूटा, सब जानते हैं!
जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के समय गांधी और बच्चन परिवार के कितने गहरे सम्बन्ध थे, सब जानते हैं!
रिश्तों की इतनी गहराइयों के बावजूद राहुल गांधी न तो कभी अयोध्या मंदिर का उल्लेख श्रद्धा के साथ करते हैं और न बच्चन परिवार का उल्लेख आदर के साथ करते हैं।
राहुल गांधी किसमें श्रद्धा रखें और किसमें नहीं, किसका नाम आदर से लें और किसका नहीं, यह उनका व्यक्तिगत मामला हो सकता है किंतु जब वे जनसभाओं में रामंदिर तथा उसके साथ बच्चन परिवार का उल्लेख जिस गुस्से और तिरस्कार पूर्ण ढंग से करते हैं, उसे देखकर यह मामला व्यक्तिगत नहीं रह जाता, अपितु राजनीतिक हो जाता है।
हालांकि गांधी और बच्चन परिवार के पुराने सम्बन्धों का विवरण पब्लिक डोमेन में उपलब्ध है तथापि राहुल गांधी और बच्चन परिवार का रिश्ता क्या कहलाता है, इसे समझने से पहले गांधी और बच्चन परिवार के रिश्तों पर थोड़ी सी दृष्टि डालनी आवश्यक है।
जिस समय राहुल गांधी का जन्म भी नहीं हुआ था और संभवतः राहुल की माता सोनिया गांधी का भी जन्म नहीं हुआ था, उस समय भी नेहरू और हरिवंशराय बच्चन के सम्बन्ध तथा इंदिरा गांधी और तेजी बच्चन के सम्बन्ध बहुत अच्छे हुआ करते थे।
तेजी बच्चन सरदार खजानसिंह सूरी की पुत्री थीं तथा लाहौर के खूबचंद डिग्री कॉलेज में साइकॉलोजी पढ़ाया करती थीं। 1942 में उन्होंने बाबूपट्टी के कायस्थ लड़के हरिवंश राय श्रीवास्तव से विवाह किया जो अपना नाम हरिवंशराय बच्चन लिखा करते थे। तेजी बच्चन हरिवंश राय की दूसरी पत्नी थीं क्योंकि हरिवंश की पहली पत्नी श्यामा का निधन 1936 में हो गया था।
हरिवंश राय बच्चन विदेश मंत्रालय में हिन्दी अधिकारी थे। वे हिन्दी के अच्छे कवि थे और अंग्रेजी भी अच्छी जानते थे। इन कारणों से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू हरिवंश राय बच्चन को पसंद करते थे और आदर भी दिया करते थे।
हरिवंशराय बच्चन और जवाहर लाल नेहरू की निकटता के कारण हरिवंशराय बच्चन की पत्नी तेजी बच्चन तथा नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी अच्छी मित्र बन गईं।
इस प्रकार गांधी परिवार और बच्चन परिवार के सम्बन्ध बरसों-बरस चलते रहे। जब राजीव गांधी सोनिया गांधी को भारत में लाए तो उन्होंने सोनिया गांधी को तेजी बच्चन के घर में रखा। इंदिरा गांधी नहीं चाहती थीं कि राजीव गांधी का विवाह किसी विदेशी लड़की से हो किंतु तेजी बच्चन के मनाने पर इंदिरा गांधी अपने पुत्र का विवाह एक विदेशी लड़की से करने को तैयार हो गईं।
इंदिरा गांधी की हत्या होने तक गांधी परिवार और बच्चन परिवार के सम्बन्ध मधुर बने रहे किंतु जैसे ही इंदिरा गांधी दृश्य से हटीं, गांधी परिवार और बच्चन परिवार के सम्बन्ध बदलने लगे। ये सम्बन्ध यहाँ तक बदले कि कुछ बातें पब्लिक डोमेन में भी आ गईं। फिर भी सम्बन्ध चलते रहे।
राजीव गांधी ने 1984 में अमिताभ बच्चन को कांग्रेस से सांसद का चुनाव लड़वाया किंतु कुछ समय बाद अमिताभ बच्चन ने लोकसभा से त्यागपत्र दे दिया। पब्लिक डोमेन में यह धारणा है कि अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता को देखकर ही राजीव गांधी ने अमिताभ बच्चन से त्यागपत्र लिया था। संभवतः तभी से गांधी परिवार और बच्चन परिवार के सम्बन्ध पूरी तरह टूट गए। दोनों परिवारों में बोलचाल समाप्त हो गई।
1999 में समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। इसके बाद बच्चन परिवार समाजवादी पार्टी की तरफ मुड़ा। परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2004 में अमिताभ बच्चन की अभिनेत्री पत्नी जया बच्चन को समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा में सांसद बनाया। तब से लेकर अब तक वे पांचवीं बार राज्यसभा में सांसद हैं। राज्यसभा में उनका पूरा नाम जया अमिताभ बच्चन हैं।
जब राममंदिर का उद्घाटन हुआ तो राहुल गांधी ने बड़े कड़वे अंदाज में कहा कि मैंने उद्घाटन समारोह में अडानी और अम्बानी को देखा, अमिताभ बच्चन को देखा, ऐश्वर्या राय को नाचते हुए देखा। लोगों ने राहुल की बात पर हैरानी जताई कि न तो ऐश्वर्या राय वहाँ नाच रही थी और न राहुल को किसी ऐसी महिला पर ऐसी टिप्पणी करनी चाहिए जो कि विवाद में है ही नहीं!
राममंदिर के उद्घाटन को कुछ महीने ही बीते होंगे कि टेलिविजन पर ये हैरानी भरी दृश्य देखे गए कि जया बच्चन ने राज्यसभा के सभापति एवं उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से तथा एक उपसभापति से इस बात पर वाक्युद्ध किया कि मेरे नाम के साथ मेरे पति का नाम लेकर मुझे अपमानित क्यों लिया जाता है। जया बच्चन ने इस बात पर इतनी गर्मी दिखाई कि लोगों ने यह कहना शुरु कर दिया कि जया बच्चन को अमिताभ बच्चन से परेशानी है। इसलिए वे ऐसा कर रही हैं।
जया बच्चन के वाक्युद्ध के दिन या उसके एक-दो दिन बाद विपक्षी दलों ने संसद से निकलकर सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन किया और नारे लगाए। लोगों ने बड़ी हैरानी से देखा कि सोनिया गांधी और जया बच्चन एक साथ खड़ी होकर सरकार के विरुद्ध नारे लगा रही थीं और मीडिया को बाइट दे रही थीं।
इस घटना को भी अभी अधिक दिन नहीं बीते हैं कि कल अर्थात् 28 सितम्बर 2024 को हरियाणा में एक जनसभा में राहुल गांधी ने फिर से बड़े तल्ख अंदाज में टिप्पणी की कि मैंने राममंदिर के उद्घाटन में अडानी और अम्बानी को देखा, करोड़पतियों को देखा, अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या राय को देखा। उद्घाटन के नाम पर नाच-गाना हो रहा था।
इस प्रकार एक ओर तो जया बच्चन अपने साथ अपने पति का नाम लिए जाने पर ऐतराज करती हैं, दूसरी ओर वे सोनिया गांधी के साथ खड़ी होकर सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करती हैं और तीसरी ओर राहुल गांधी जया बच्चन के पति एवं पुत्रवधू का विरोध सार्वजनिक मंचों से करते हैं।
समझ में ही नहीं आता कि ये रिश्ते क्या कहलाते हैं!
राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को शत्रु समझें तो बात समझ में आती है, आर एस एस पर प्रहार करें, बात समझ में आती है, गौतम अडानी और मुकेश अम्बानी को बर्बाद करने पर उतारू रहें, बात समझ में आती है किंतु अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या राय पर बार-बार जहर उगलें, यह बात समझ में नहीं आती। इन दोनों ने राहुल गांधी का क्या दबा लिया है! न तो ये सरकार में या राजनीति में हैं, न ये किसी राजनीतिक पार्टी को चंदा देते हैं, फिर इनसे इतनी परेशानी क्यों?
अच्छा हो यदि राहुल गांधी ऐश्वर्या राय के प्रति अपनी कड़वाहट का रहस्य उजागर करें। इसलिए करें क्योंकि वे इस मुद्दे को बार-बार सार्वजनिक सभाओं में उठा रहे हैं।
हसन नसरुल्लाह की मौत पर मुस्लिम देशों में बेचैनी है तथा मध्य एशिया के मुस्लिम दुशों में शिया-सुन्नी दंगे भड़क गए हैं।
इस बीच हजारों पाकिस्तानियों ने 30 सितम्बर को पाकिस्तान की सरकार पर आरोप लगाया कि वह काफिरों का साथ दे रही है। इसके जवाब में पाकिस्तान की सरकार ने पाकिस्तान के कई शहरों में पुलिस सड़कों पर उतार दी तथा आम जनता पर तड़ातड़ गोलियां बरसाईं। कितने मरे, कितने घायल हुए, कितने गायब हुए, इसका कोई आंकड़ा पाकिस्तान की सरकार नहीं दे रही।
पाकिस्तान की जनता पाकिस्तान की सरकार से इस सवाल का जवाब चाहती है कि वह काफिरों का साथ क्यों दे रही है। पाकिस्तान की जनता की दृष्टि में अमरीकी और इजराइली सेनाएं काफिर हैं जिन्होंने मिलकर मुस्लिम जगत को नीचा दिखाया है?
सारा रोना-पीटना हिजबुल्ला चीफ हसन नसरुल्लाह के मारे जाने पर मचा है। 30 सितम्बर को पाकिस्तान के लोग हसन नसरुल्लाह की मौत का मातम मनाते हुए बड़ी संख्या में सड़कों पर निकले तथा कराची में अमरीकी कांसुलेट की तरफ बढ़ने लगे। जब पाकिस्तान की पुलिस ने उन्हें रोका तो पाकिस्तान के मुल्लाओं ने हाय-तौबा मचानी आरम्भ कर दी तथा आरोप लगाया कि शहबाज शरीफ की सरकार काफिरों का साथ दे रही है।
यह तो नहीं पता कि पाकिस्तान के लोग हाथों में पत्थर लेकर उग्र भीड़ के रूप में अमरीकी कोंसुलेट तक पहुंचकर किस सीमा तक हसन नसरुल्लाह का बदला लेना चाहते थे किंतु जब उग्र भीड़ पुलिस पर ही पत्थर फैंकने लगी तो पुलिस ने उस भीड़ पर गोलियां चलाईं। एक बार पुलिस की बंदूकों के मुंह खुले तो बहुत देर बाद ही बंद हो सके।
जैसे ही इस गोलीबारी के दृश्य पाकिस्तानी मीडिया के चैनलों पर दिखाई दिए तथा सोशियल मीडिया में तेजी से दौड़ने लगे तो इस्लामाबाद सहित कई शहरों में पाकिस्तान के लोग नसरुल्ला का मातम मनाने के लिए सड़कों पर निकल पड़े। इस कारण शहर-शहर में पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा और पूरे पाकिस्तान में अघोषित आपात काल जैसे हालात बन गए।
हैरानी इस बात पर है कि जहाँ दुनिया के 57 मुस्लिम बहुल दशों में से अधिकांश देशों में सुन्नी समुदाय नसरुल्ला की मौत पर खुशियां मना रहा है और वहाँ शिया-सुन्नी दंगे भड़के हुए हैं, वहीं पाकिस्तान जो कि सुन्नी बहुल देश है और जहाँ पर शियाओं को काफिर माना जाता है। वहाँ की जनता शिया नेता नसरुल्ला की मौत पर मातम मना रही है और पाकिस्तान की सरकार पर काफिर होने का आरोप लगा रही है।
समझ नहीं आता कि काफिरों के साथ कौन खड़ा है, पाकिस्तान की सरकार या जनता?
पाकिस्तान की जनता ने ओ आई सी अर्थात् ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कण्ट्रीज पर भी काफिरों के साथ खड़े होने का आरोप लगा है क्योंकि ओ आई सी का कोई भी सदस्य नसरुल्ला की मौत पर कुछ भी करने या बोलने को तैयार नहीं है, सिवाय ईरान के जो कि स्वयं ईसाई देश है और हसन नसरुल्लाह जिसका एक बड़ा मोहरा था!
ईरान की शिया सेना कई बार पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्र पर बमबारी करती रहती है क्योंकि वह नहीं चाहती कि पाकिस्तान के सुन्नी मुसलमान पाकिस्तान से भागकर ईरान में घुसें। इसके बावजूद पाकिस्तान के सुन्नी मुसलमान हिज्बुल्ला के शियाओं का साथ न देने के लिए अपनी ही सरकार को काफिर बता रहे हैं।
हसन नसरुल्लाह की मौत पर लेबनान की राजधानी बेरूत में भी सुन्नी मुसलमानों ने घर से बाहर निकलकर खुशियां मनाई हैं तथा सुन्नी औरतों ने सड़कों पर आकर मिठाइयां बांटी हैं क्योंकि नसरुल्ला के आतंकी आए दिन सुन्नी लड़कियों को उनके घरों से खींच कर ले जाते थे।
बेरूत की सड़कों पर ईसाई लड़कियों ने भी हाथों में प्ले कार्ड लेकर सार्वजनिक रूप से नाच-गाना किया है तथा इस बात की खुशी मनाई है कि अब बेरूत से और पूरे लेबनान से हिज्बुल्ला के आतंकियों का सफाया होने का रास्ता खुल गया है।
जब बेरूत में मुसलमान औरतें हसन नसरुल्लाह की मौत पर खुशियां मना रही हैं, ओआईसी देशों में नसरुल्ला की मौत पर शिया-सुन्नी दंगे भड़के हुए हैं तो पाकिस्तान की जनता अपनी छाती पर गोलियां क्यों खा रही है, यह बड़ी हैरानी करने वाली बात है!
ऐसा लगता है कि उचित नेतृत्व के अभाव में पाकिस्तान की जनता असमंजस के गहरे भंवर में फंसी हुई है।
हम भारत के लोग जो कि जल्दी से जल्दी विश्वगुरु बनने की फिराक में हैं, दूसरों के द्वारा थूका हुआ चाटने वाले खतरनाक जॉम्बी बनते जा रहे हैं।
हॉर्वर्ड, कैम्ब्रिज और कैलिफोर्निया आदि विदेशी यूनिवर्सिटियों द्वारा थूके गए ज्ञान, इकॉनोमिक फोरम्स द्वारा फैंके गए आंकड़े और सोरोस जैसे शक्तिशाली विदेशी एनजीओज द्वारा फैंके गए डॉलरों को चटाकर बनाए गए कुछ अत्यंत शक्तिशाली जॉम्बी विगत कुछ दशकों में बड़ी ही चालाकी से भारत में घुसाए गए हैं और कुछ खतरनाक जॉम्बी अमरीका एवं कनाडा में बैठाकर रखे गए हैं।
भारत में घुसाए गए जॉम्बी कुछ विश्वविद्यालयों, राजनीतिक पार्टियों एवं एनजीओज में छिपे हुए हैं। विदेशी ज्ञान, आर्थिक आंकड़े और डॉलरों को चाटकर जीवित रहने वाले खतरनाक जॉम्बी भारत के शांतिप्रिय एवं भोले-भाले लोगों को बड़ी तेजी से जॉम्बियों में बदल रहे हैं।
जॉम्बी उस आवेशित मनुष्य को कहते हैं जिसके शरीर में कोई खतरनाक वायरस घुसकर उस मनुष्य के मस्तिष्क को भावना-शून्य बना देता है। ऐसा आवेशित मनुष्य अर्थात् जॉम्बी बना हुआ मनुष्य दूसरे मनुष्यों को काटकर खाना चाहता है किंतु जब कोई जॉम्बी किसी मनुष्य को काटता है तो वह मनुष्य भी जॉम्बी बन जाता है और फिर वे दोनों जॉम्बी किसी नए मनुष्य की तलाश में आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार जॉम्बियों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ जाती है।
अमेरिकन फिक्शन फिल्म जॉम्बी में मानवता के शत्रु बन चुके कुछ वैज्ञानिकों को जॉम्बी का वायरस फैलाते हुए तो दिखाया गया है किंतु जॉम्बी बने लोगों को नियंत्रित करने का कोई उपाय नहीं बताया गया है, उन्हें केवल गोली मारकर ही नियंत्रित किया जाता है।
विदेशी ज्ञान, आर्थिक आंकड़े और विदेशी डॉलर चाट चुके जॉम्बी कभी इतने अनियंत्रित नहीं होते कि उन्हें गोली मारनी पड़े क्योंकि उनके शरीर में कोई वायरस नहीं होता अपितु उनके दिमाग में कुछ खरतनाक विचार होते हैं। ऐसे जॉम्बी विदेशी ताकतों द्वारा बड़ी आसानी से नियंत्रित किए जाते हैं।
हाल ही में घटित एक उदाहरण लेते हैं! विगत लोकसभा चुनावों से पहले ऑक्सफैम इंटरनेशनल नामक संस्था ने घोषणा की कि वर्ष 2012 से 2021 के बीच देश में बनाई गई 40 प्रतिशत से अधिक संपत्ति केवल 1 प्रतिशत लोगों के पास गई। वहीं देश की निचली आधी जनसंख्या के पास कुल संपत्ति का सिर्फ 3 प्रतिशत हिस्सा है।
उसी समय वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने भी एक रिपोर्ट देकर कहा कि भारत के अरबपतियों की करीब 90 प्रतिशत संपत्ति उच्च जातियों के पास है।
ये बातें इतनी चालाकी से और इतनी घुमाकर बोली गईं जिनके कारण भारत की जनता में यह भ्रम पैदा हुआ कि भारत की कुल सम्पत्ति का 90 प्रतिशत हिस्सा उच्च जाति के अरबपतियों के पास है, जबकि विदेशी संस्था की रिपोर्ट में कहा यह गया था कि भारत में अरबपतियों के पास जितनी सम्पत्ति है, उसमें से 90 प्रतिशत सम्पत्ति उच्च जाति के अरबपतियों के पास है। यह नहीं कहा गया था कि देश की कुल सम्पत्ति का 90 प्रतिशत हिस्सा उच्च जातियों के पास है।
इसी प्रकार विदेशी संस्था की रिपोर्ट में यह कहा गया कि देश की निचली आधी जनसंख्या के पास कुल संपत्ति का सिर्फ 3 प्रतिशत हिस्सा है। भारत की जनता द्वारा इसका अर्थ यह लगाया गया कि भारत के गरीब लोगों के पास केवल 3 प्रतिशत सम्पत्ति बची है।
विदेशी संस्था ने हमें जॉम्बी बनाने के लिए बड़ी ही चालाकी से कहा कि देश की निचली आधी जनसंख्या के पास कुल संपत्ति का सिर्फ 3 प्रतिशत हिस्सा है। उसने यह नहीं बताया कि देश की निचली आधी जनसंख्या का मतलब क्या है?
आज की तारीख में देश में निचली गरीब आबादी कितनी है, इसके सम्बन्ध में एनएफएचएस 2019-21 की रिपोर्ट खुलासा करती है कि भारत में बहुआयामी रूप से गरीब आबादी का प्रतिशत केवल 14.96 है। इसमें से भी निचली आधी आबादी का अर्थ होता है कि देश की लगभग 8 प्रतिशत जनसंख्या।
अर्थात् विदेशी संस्था ने जो कुछ भी कहा उसका अर्थ यह होता है कि देशी की सबसे गरीब जनसंख्या में से आधी यानि कि 8 प्रतिशत लोगों के पास 3 प्रतिशत सम्पत्ति है। यह बात किसी के समझ में नहीं आई और लोगों ने समझा कि अब भारत में आधी जनसंख्या के पास केवल 3 प्रतिशत सम्पत्ति बची है।
करोड़ों भारतीय इस विदेशी ज्ञान एवं आर्थिक आंकड़ों को चाटकर वैचारिक जॉम्बी बन गए। उन्होंने भारत की जमी-जमाई सरकार को वोट न देकर कुछ ऐसी ताकतों को वोट दे दिए जो देश के लोगों को जातीय जनगणना करवाने का लालच दे रही थीं तथा कह रही थीं कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी।
करोड़ों लोगों को लगा कि जब विपक्षी पार्टियां सत्ता में आकर जातीय जनगणना करवाएंगी तो हमारी जाति को अधिक आरक्षण मिलेगा और हमारे बच्चों को संख्या के आधार पर अधिक नौकरियां मिलेंगी। इस कारण उन्होंने एक विशेष विचार से आवेशित होकर लोकसभा के चुनावों में भाग लिया।
जब हम योग्यता को नकार कर जाति के आधार पर ही नौकरी देने का विचार रखते हैं तो यह हमारे जॉम्बी होने की निशानी नहीं है तो क्या है! अयोग्य डॉक्टर चाहे जिस जाति का हो, पूरे समाज का नुक्सान करेगा और योग्य डॉक्टर चाहे जिस जाति का हो, पूरे समाज का अच्छा इलाज करेगा। किंतु जॉम्बी इस तरह नहीं सोचते, वे केवल अपनी जाति के बारे में सोचते हैं।
दूसरा उदाहरण लेते हैं, अमरीका में बैठे सैम पित्रोदा ने विगत लोकसभा चुनावों के दौरान चालाकी भरी भाषा में कुछ ऐसी बातें कहीं जिनका अर्थ भारत के आम आदमी ने यह लगाया कि जब हमारी सरकार आएगी तो अमीरों की सम्पत्ति लेकर गरीबों में बांटेगी।
करोड़ों गरीब लोग अमीरों की सम्पत्ति पाने के लालच से ग्रस्त होकर वोट देने गए तथा देश के मुख्य विपक्षी दल की सीटें 52 से 99 तथा दूसरे बड़े विपक्षी दल की सीटें 5 से 37 पहुंच गईं।
तीसरा उदाहरण लेते हैं, भारत सरकार ने किसानों के लिए तीन कृषि कानून बनाए किंतु अमरीका और कनाडा में बैठे उन लोगों ने जो जॉम्बियों को बनाते और पालते हैं, भारत के किसानों को भड़काया कि यदि ये तीन कृषि कानून लागू हुए तो किसान बर्बाद हो जाएगा। इसलिए किसान इन कानूनों को लागू न होने दें तथा यह मांग करें कि हमें एमएसपी पर खरीद की गारण्टी दी जाए।
एमएसपी पर खरीद की गारण्टी एक ऐसा खतरनाक विचार है जो देश को बर्बाद कर देगा। इसका अर्थ यह होता है कि सरकार अनाज का एम एस पी अर्थात् न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करेगी जो कि फसल की लागत मूल्य पर आधारित होगा। बाजार में किसान का अनाज उस समर्थन मूल्य से कम पर नहीं खरीदा जाएगा। यदि कोई व्यापारी इससे कम मूल्य पर किसान से अनाज खरीदता है तो उस व्यापारी को गिरफ्तार करके सजा दी जाएगी।
जॉम्बी बनने को आतुर किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं सोचा कि यदि भारत सरकार इस बात को मान ले तो इसके कितने भयंकर परिणाम होंगे! मण्डियों में बैठे व्यापारी किसानों से अनाज खरीदना ही बंद कर देंगे। यदि व्यापारी नहीं खरीदे तो सरकार को वह अनाज एमएसपी पर खरीदना होगा। क्योंकि सरकार एमएसपी की गारण्टी दे चुकी होगी।
इससे सरकार का खजाना खाली हो जाएगा, व्यापारी बर्बाद हो जाएंगे और किसान के हाथ कुछ नहीं आएगा। देश का आम आदमी परेशान होगा सो अलग! सरकार ने यह सब स्पष्ट किया किंतु आंदोलन तब तक चलता रहा जब तक कि तीनों कानून रद्द नहीं कर दिए गए। सरकार किसी भी सूरत में एमएसपी की गारण्टी न तो दे सकती थी और न उसने दी किंतु आंदोलन आज भी चल रहा है।
ठीक ऐसा ही सीएए अर्थात् नागरिकता संशोधन अधिनियम के मामले में हुआ। विदेशी शक्तियों ने भारत के मुसलमानों को यह कहकर भड़काया कि इससे मुसलमानों की नागरिकता छिन जाएगी तथा उनके घर छीनकर उन्हें कैम्पों में भेज दिए जाएगा।
भारत सरकार ने लाख समझाया कि यह कानून किसी की नागरिकता नहीं छीनता, अपितु उन पड़ौसी देशों से आने वाले हिन्दू, सिक्ख, ईसाई आदि को नागरिकता देता है जो विभाजन से पहले भारत के ही नागरिक थे और अब उन देशों में प्रताड़ित किए जा रहे हैं, किंतु विदेशी ज्ञान, आर्थिक आंकड़े और अमरीकी डॉलर चाटकर आए जॉम्बियों ने आम मुसलमान को कभी भी यह बात नहीं समझने दी जिसका परिणाम शाहीन बाग जैसे आंदोलनों के रूप में सामने आया।
चीजें दूर से साफ दिखाई नहीं देतीं, निकट जाने पर ही उनका घिनौना स्वरूप स्पष्ट होता है। जाकिर नाइक, पन्नू और उनके जैसे सैंकड़ों खतरनाक जॉम्बी अमरीका और कनाडा की युनिवर्सिटियों एवं एनजीओज का सहारा पाकर पूरी दुनिया में अपने-अपने खतरनाक एजेण्डे चलाते हैं।
ऐसे सैंकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं जो यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि हम आरक्षण के लिए सड़कों पर आंदोलन करने वाले, जातीय जनगणना में अपनी मुक्ति का उपाय ढूंढने वाले, फ्री का आटा खाने वाले, फ्री की बिजली लेने वाले, सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वाले जॉम्बी बना दिए गए हैं और जो लोग अभी तक जॉम्बी नहीं बन पाए हैं, उन्हें तेजी से जॉम्बी बनाने के षड़यंत्र चलाए जा रहे हैं।
देश में बड़ी संख्या में मजहब के नाम पर गला काटने वाले जॉम्बी घूम रहे हैं। सैंकड़ों जॉम्बी रेल की पटरियों पर पत्थर और गैस के सिलिण्डर रखकर ट्रेनें गिराने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे भयानक कार्य तो जॉम्बी ही कर सकते हैं जिन्हें इंसान का खून देखकर खुशी होती है।
हजारों जॉम्बी ढाबों और होटलों में रोटियों पर थूक रहे हैं, जूस में पेशाब कर रहे हैं, समोसों में चिकन और बीफ मिला रहे हैं।
बहुत से जॉम्बी मंदिरों के प्रसाद में गाय की चर्बी से बने घी की सप्लाई कर रहे हैं। तिरुपति मंदिर के वे प्रबंधक जो तीन सौ रुपए किलो घी खरीदकर लड्डू बनवा रहे थे, वे भी जॉम्बी नहीं हैं तो क्या हैं? क्या उन्हें पता नहीं है कि यदि घर में भी घी बनाया जाए तो सात सौ रुपए किलो से कम नहीं पड़ता? मंदिर के जॉम्बियों ने पूरे हिन्दू समाज का अनादर किया और उसे धोखे से गाय की चर्बी से बना प्रसाद खिलाया।
कुछ जॉम्बी मंदिरों के प्रसाद में पशुचर्बी से बना घी सप्लाई कर रहे हैं और कुछ जॉम्बी वीआईपी लाइन के माध्यम से सबसे पहले मंदिर में घुसकर उस प्रसाद को पा रहे हैं। क्योंकि उनकी जेब में रुपए नहीं हैं, डॉलर हैं! मैंने उन्हें जॉम्बी इसलिए भी कहा कि वे स्वयं को वीआईपी समझते हैं किंतु उन्हें समझ इतनी भी नहीं है कि जो लड्डू वे खा रहे हैं उसमें से पशुचर्बी की बदबू आ रही है।
भारत के हर शहर में जॉम्बियों की भीड़ थूक लगी रोटियों को खाने के लिए रेस्टोरेंटों के बाहर कतार लगाकर खड़ी है। जब मनुष्य यात्रा पर होता है, तब तो बाहर खाना मजबूरी होती है किंतु देश में करोड़ों जॉम्बी अपने घर में खाना बनाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं क्योंकि उनकी जेब में रुपया नहीं, डॉलर है।
कुछ जॉम्बी समोसों में मेंढक की टांग और कॉकरॉच डाल रहे हैं और बाकी के जॉम्बी मीडिया में रिपोर्टें देखकर भी ऐसे समोसों को ऑन लाइन ऑर्डर करके मंगवा रहे हैं। आजादी के बाद करोड़ों भारतीय परिवारों ने पैसा तो खूब बनाया, डिग्रियां भी हॉर्वर्ड-फार्वर्ड से ले लीं, कारें भी बड़ी-बड़ी खरीद लीं, कपड़े भी डिजाइनर पहनने शुरु कर दिए किंतु हम कब थूका हुआ चाटने वाले जॉम्बी बन गए, हमें पता ही नहीं चला!
हम इतने खतरनाक जॉम्बी हैं कि हम आज भी यह बात समझने को तैयार नहीं हैं कि केवल मंदिर में ही पशुचर्बी से बना घी सप्लाई नहीं होता होगा, भारत के न जाने कितने होटलों, रेस्टोरेंटों एवं ढाबों में पशुचर्बी से बना घी सप्लाई हो रहा होगा!
जॉम्बी बन जाने के कारण हम यह भी नहीं समझ पाते कि आज भारत के लोग जितना घी खा रहे हैं, क्या उतना घी हमें पशुओं के दूध से मिल सकता है? निश्चित रूप से बहुत सा घी पाम ऑइल और पशुचर्बी से बना हुआ है क्योंकि पशुओं से मिलने वाला अधिकांश दूध तो हम बिना घी निकाले ही दूध-दही के रूप में काम लेते हैं।
आज बहुत बड़ी संख्या में स्त्री और पुरुष दोनों ही खतरनाक जॉम्बी बनकर कमाते हैं, इसके लिए वे बहुत देरी से विवाह करते हैं, पति या पत्नी की जगह बॉयफ्रैंण्ड और गर्लफ्रैण्ड रखते हैं। ऐसे फ्रैण्ड कुछ ही सालों में एक दूसरे का मर्डर करने पर उतारू हो जाते हैं। यदि शादी कर लें तो भी बच्चा देरी से पैदा करते हैं। और पिज्जा-बर्गर खाने रेस्टोरेंट में जाते हैं, जहाँ वे पशुचर्बी से बना भोजन पाते हैं। तब भी हम समझ नहीं पाते कि हम इंसान कम और पैसे के पीछे भागने वाले जॉम्बी अधिक हैं।
कुछ ऐसे जॉम्बी भी हैं जो इंसान से अधिक कुत्ते से प्रेम करते हैं, अपने माता-पिता को साथ रखने की बजाय कुत्ते साथ में रखते हैं। जब उनका कुत्ता किसी इंसान को काटता है तो इन जॉम्बियों को दर्द नहीं होता किंतु यदि पीड़ित इंसान कुत्ते को लाठी दिखा देता है तो कुत्ता-प्रेमी खतरनाक जॉम्बी उन इंसानों के विरुद्ध पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाते हैं। इन जॉम्बियों को पड़ौसी से अच्छे सम्बन्ध नहीं चाहिए, कुत्ते से अच्छे सम्बन्ध चाहिए।
ऐसी हजारों बातें हैं जिनसे यह पता लगता है कि हम जॉम्बी बन रहे हैं, या बन चुके हैं किंतु हम समझ नहीं पाते।
हम कुछ भी समझ क्यों नहीं पाते? क्योंकि सोरोस जैसे अनगिनत लोग जो तरह-तरह के एनजीओ बनाकर आदमियों की हथेलियों पर डॉलर थूकते हैं, उस डॉलर को चाटने वाले जॉम्बियों की भीड़ अमरीका और कनाडा के हर शहर में घूम रही है। वे बड़े-बड़े जॉम्बी भारत में छोटे-छोटे खतरनाक जॉम्बी बनाने का काम करते हैं। हमें भी किसी न किसी प्रकार का जॉम्बी बनाया जा चुका है और हमें स्वयं यह बात मालूम नहीं है।
हम जॉम्बी कैसे हैं, इसे समझने के लिए यह समझना आवश्यक है कि यदि हमने स्वयं कमाकर खाने का, स्वयं मेहनत करके खाने का, घर में रोटी बनाकर खाने का, गुरु बनाओ जानकर और पानी पियो छानकर वाला पुराना सिद्धांत नहीं अपनाया तो हम खतरनाक जॉम्बी ही बने रहेंगे और सोचते रहेंगे कि एक दिन 3 प्रतिशत लोग जो भारत की 90 प्रतिशत सम्पत्ति लिए बैठे हैं, वह अमरीका और कनाडा में बैठे जॉम्बी हमें दिलवा देंगे और इस चक्कर में हम अपने देश की बची-खुची सुख शांति भी लुटा बैठेंगे! हम कभी नहीं समझ पाएंगे कि ये आंकड़े हमें खतरनाक जॉम्बी बनाने के लिए हमारे दिमागों में डाले गए हैं!
भारत में गुण्डों की मौत पर बड़ी अजीब सी राजनीति होती है। गुण्डों के पक्ष में पूरा विपक्षी ईको सिस्टम खड़ा हुआ दिखाई देता है। संसार में ऐसा शायद ही कहीं होता हो!
उत्तर प्रदेश में इन दिनों गोली-गोली पर लिखा है गुण्डे का नाम। पुलिस की गोलियां गुण्डों की टांगों का पीछा कर रही हैं जिनके कारण गुण्डे व्हील चेयर पर बैठकर अस्पतालों से निकलते हुए दिखाई देते हैं। वे हाथ जोड़ते हैं, गिड़गिड़ाते हैं और रो-रो कर कहते हैं कि अब वे कभी गुण्डागर्दी नहीं करेंगे। ऐसे दृश्य आजकल नित्य ही दिखाई देते हैं।
कुछ गोलियां ऐसी भी हैं जो एनकाउण्टर के समय गुण्डों की टांगों को माफ करके, सीधे उनकी छाती में विश्राम करने पहुंच जाती हैं। गोली अंदर और गुण्डे की जाति बाहर। गुण्डे के प्राण बाद में निकलते हैं, उसकी जाति पहले निकलती है।
यही कारण है कि गुण्डे को गोली लगते ही विपक्षी पार्टियों के नेताओं को स्वतः पता लग जाता है कि मरने वाले गुण्डे की जाति क्या थी!
जिस गुण्डे की जैसी जाति होती है, उसकी मौत की प्रतिध्वनि भी वैसी ही गूंजती है।
यदि पुलिस की गोली किसी बनिया, ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ, पंजाबी, खत्री, जाट, गूजर, आदि जाति के गुण्डे के लगी है तो कोई बात नहीं, उस गुण्डे की छाती से निकली जाति की प्रतिध्वनि या तो होती ही नहीं है, और यदि होती भी है तो इतनी कम होती है कि लोगों तक उसकी गूंज नहीं पहुंचती।
यदि मरने वाले गुण्डे की जाति दलित होती है, तो उसकी प्रतिध्वनि चारों ओर गूंजती है। पूरा ईको सिस्टम चीखने लगता है। यह सिद्ध करने के लिए कि सरकार दलित विरोधी है, विपक्षी पार्टियों को पूरा अवसर मिल जाता है। विपक्ष का ईको सिस्टम इस बात की चर्चा तक नहीं करता कि मरने वाला कितना बड़ा गुण्डा था! केवल इस बात की चर्चा करता है कि मरने वाला दलित था!
यदि पुलिस की गोली से मरने वाला गुण्डा यादव जाति का है, तब तो उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता अखिलेश यादव पूरे जोश के साथ योगी सरकार पर पिल पड़ते हैं, महंत को माफिया बताते हैं। गुण्डे को निर्दोष बताते हैं, एनकाउंटर को हत्या बताते हैं। आखिर उस गुण्डे को पुलिस कैसे मार सकती है जिसकी जाति अखिलेश यादव को सबसे अधिक वोट देती है, जो समाजवादी पार्टी का कोर वोटर है!
पुलिस की गोली से मरने वाला गुण्डा यदि मुसलमान हुआ, फिर तो कहना ही क्या है, गुण्डे की छाती में घुसी गोली की प्रतिध्वनि कश्मीर की महबूबा से लेकर, लखनऊ में अखिलेश तक, दिल्ली में राहुल-प्रियंका तक, पटना में तेजस्वी तक, पश्चिमी बंगाल में ममता बनर्जी तक, राजस्थान में अशोक गहलोत तक और हैदराबाद में असदुद्दीन ओबैसी तक के कण्ठ से निकलती है।
पूरा ईको सिस्टम एक सुर में चिल्लाता है! मरने वाला अल्पसंख्यक था, केवल यही बार-बार दोहराया जाता है, मरने वाला गुण्डा था, पुलिस पर गोलियां चला रहा था, पुलिस ने आत्मरक्षा में गोलियां चलाईं, इन बातों की चर्चा तक नहीं होने दी जाती।
ईको सिस्टम के लिए गुण्डा, गुण्डा नहीं है, वह मतदाता है, किसी राजनीतिक पार्टी के लिए वोटों का दूध देने वाला पशु है।
ईको सिस्टम की धूर्त राजनीति को यदि प्याज की पर्तों की तरह खोलकर देखा जाए तो कोई भी वह व्यक्ति जिसे इंसानियत समझ में आती है, वह आसानी से समझ जाएगा कि ईको सिस्टम स्वयं ही चाहता है कि पुलिस उन गुण्डों को गोली मारती रहे जो गुण्डे मरने के बाद विपक्षी ईको सिस्टम को वोटों की फसल दे सकें।
जब तक पुलिस किसी गुण्डे को गोली नहीं मारती, तब तक वह गुण्डा पर्दे के पीछे ईको सिस्टम के लिए काम करता रहता है और जैसे ही किसी गुण्डे को गोली मारी जाती है तो मरा हुआ हाथी सवा लाख का हो जाता है। वोटों का खलिहान नई कटी हुई फसल से भर जाता है!
केवल गुण्डे को गोली मारने के मामले में ही नहीं, अपितु किसी लड़की के साथ बलात्कार के मामले में भी ऐसी ही घिनौनी राजनीति होती है। यदि सवर्ण जाति की अथवा किसी ऐसी जाति की लड़की के साथ बलात्कार हुआ है जो ईको सिस्टम की वोटर नहीं है तो ईको सिस्टम उसकी चर्चा तक नहीं करता किंतु यदि बलात्कार ईको सिस्टम को वोट देने वाली जाति की लड़की का हुआ है तो ईको सिस्टम चीखने-चिल्लाने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
जब किसी गुण्डे के अवैध घर पर बुलडोजर चलता है, तब भी विपक्षी पाटियों का ईको सिस्टम गुण्डे की जाति क्या थी, इसे लेकर चीखने-चिल्लाने लगता है। न्यायालयों में जाकर रोता-पीटता है।
खुशी जूस सेंटर एवं महादेव रेस्टोरेंट आदि नामों से चल रहे ठेलों एवं ढाबों के संचालक जो कि जूस में पेशाब मिलाते हैं, समोसे के मसाले में गाय का मांस मिलाते हैं, रोटी पर थूकते हैं के विरुद्ध यदि योगी सरकार केवल इतना आदेश देती है कि अपनी दुकान या ठेले पर संचालक का वास्तविक नाम लिखें तो ईको सिस्टम उछलकर सामने आता है और कोर्ट में जाकर स्टे ले आता है।
क्या विपक्षी पार्टियों का ईको सिस्टम यह नहीं समझता कि थूक और पेशाब मिला हुआ जूस एक न एक दिन उनके अपने कण्ठ से नीचे उतरेगा, उनके बच्चों और उनके माता-पिता और पत्नी के कण्ठ से नीचे उतरेगा!
यह कितनी घृणित बात है कि वोटों की राजनीति के लिए ईको सिस्टम अपने अल्पसंख्यक भाइयों का थूक चाटने और पेशाब पीने के लिए तैयार है! समोसे में मिला मांस खाने को तैयार है!
जब उद्धव ठाकरे, कांग्रेस एवं एनसीपी की महाअघाड़ी गठबंधन सरकार के समय महाराष्ट्र के पालघर में तीन साधुओं की हत्या की गई तो ईको सिस्टम मुंह पर टेप लगाकर बैठ गया, हिन्दू संगठन चिल्लाते रहे किंतु नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हुए।
अब जबकि एकनाथ शिंदे की सरकार के समय महाराष्ट्र में तीन मासूम लड़कियों का यौन उत्पीड़न करने वाले गुण्डे अक्षय शिंदे ने पुलिस की रिवॉल्वर छीनकर एक सहायक इंसपेक्टर को गोली मार दी और पास ही बैठे संजय शिंदे नामक पुलिस इंसपेक्टर ने अक्षय शिंदे की छाती में छोटी सी, प्यारी सी गोली उतार दी तो पूरा ईको सिस्टम एक सुर में चीखने लगा कि अक्षय शिंदे को इसलिए गोली मारी गई क्योंकि वह दलित है।
विपक्षी ईको सिस्टम इस बात की चर्चा तक नहीं करना चाहता था कि अक्षय शिंदे की छाती में गोली उतरने का घटनाक्रम कैसे घटित हुआ था। ईको सिस्टम इस बात की भी चर्चा नहीं करना चाहता कि गुण्डे की छाती में गोली उतारने वाला पुलिस इंस्पेक्टर भी शिंदे है और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी शिंदे हैं।
विपक्षी ईको सिस्टम यह देखना भी नहीं चाहता कि अक्षय शिंदे को गोली मारे जाने की खबर सुनकर महाराष्ट्र की जनता ने कितनी खुशियां मनाई हैं तथा औरतों ने सड़कों पर निकल कर मिठाइयां बाटीं हैं। ईको सिस्टम जानता है कि गुण्डों की मौत पर खुशी मनाने वाले लोग तथा मिठाई बांटने वाली औरतें कभी भी विपक्षी ईको सिस्टम को वोट नहीं देंगी!
ईको सिस्टम इतना चालाक है कि जब कांग्रेस के महान नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के और भी महान नेता अखिलेश यादव से कोई पत्रकार कभी ऐसा सवाल करता है जिससे ईको सिस्टम को कोई कठिनाई हो तो ये लोग उस पत्रकार से पूछते हैं कि तेरी जाति क्या है?
ईको सिस्टम पुलिस की गोली से मरने वाले गुण्डे से लेकर, गोली मारने वाले पुलिस अधिकारी और पब्लिक में सवाल उठाने वाले पत्रकार तक की जाति पूछता है किंतु अपनी जाति नहीं बताता। पता नहीं क्यों नहीं बताता! अपनी जाति बताने में किसी को क्या शर्म हो सकती है! आखिर इस जाति को ही तो आपने अपनी जिंदगी का आधार बना रखा है।
ईको सिस्टम गलत भौंकाल पैदा करके अपना स्वार्थ भले ही सिद्ध कर रहा हो किंतु इससे किसी दलित, यादव अथवा मुसलमान का भला नहीं होता। मीडिया में बार-बार इन जातियों के नाम उछालकर ईको सिस्टम इन जातियों को बदनाम ही कर रहा है।
यदि मुसलमानों को छोड़ दिया जाए जो कि वैश्विक एजेंडे पर काम कर रहे हैं, यादव एवं दलित जातियों में भी उतने ही अपराधी हैं जितने कि समाज की अन्य जातियों अथवा उच्च वर्ण जातियों में हैं। फिर ईको सिस्टम दलितों एवं यादवों को क्यों बदनाम कर रहा है?
ईको सिस्टम के दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के निस्पृह एवं निरपेक्ष मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी खड़े हैं जिनकी पुलिस गुण्डों की छातियों में बड़े प्यार से गोलियां उतार रही है। बिना यह देखे कि गुण्डे की जाति क्या है। और योगीजी हैं कि मीडिया में आकर आत्मविश्वास और सामर्थ्य से भरी मनमोहक मुस्कान देते हैं मानो विपक्षी ईको सिस्टम को संदेश दे रहे हों कि हे प्यारे विपक्ष तुम गुण्डे की जाति ही पूछते रहो! तुम यह कभी मत देखो कि वह गुण्डा कितना बड़ा अपराधी था, समाज का शत्रु था, और गोली का प्रयोग विधिसम्मत और परिस्थितिवश ही किया गया है।
हे प्यारे विपक्षी ईको सिस्टम तुम यह भी मत देखो उस गुण्डे के मरने पर पब्लिक कितनी मिठाइयाँ बांट रही है और झोली भर-भर का आशीर्वाद दे रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक डॉ. मोहन मधुकर भागवत सार्वजनिक मंचों पर दिए गए भाषणों के माध्यम से हिन्दुओं को उनका धर्म स्मरण कराते रहते हैं। मैं भी हिन्दू हूँ तथा बचपन से ही संघ के संस्कारों में पला-बढ़ा हूँ, डॉ. हेडगवार, गुरु गोलवलकर, छत्रपति शिवाजी महाराजा और वीर विनायक दामोदर सावरकर के चित्रों को देख-देखकर बड़ा हुआ हूँ और आरएसएस को हिन्दुओं की सबसे अच्छी, सबसे बड़ी, अनुशासित और अनुकरणीय संस्था मानकर आरएसएस में श्रद्धा रखता हूँ।
इसलिए मैं भी डॉ. मोहन भागवत की बातों को बहुत ध्यान से सुनता हूँ किंतु मुझे हमेशा से लगता है कि डॉ. मोहन भागवत की बातें आधी-अधूरी हैं। इन बातों से हिन्दू जाति का और भारत राष्ट्र का कल्याण होगा, इसमें मुझे संदेह है। आज से नहीं, जब से डॉ. मोहन भागवत सर संघचालक के रूप में सार्वजनिक रूप से बोल रहे हैं, तभी से मुझे उनकी बातों पर संदेह है। मैं अपना संदेह पहले भी कई आलेखों में व्यक्त कर चुका हूँ।
15 सितम्बर 2024 को जयपुर में स्वयंसेवकों के एकत्रीकरण कार्यक्रम में डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हमें अपने राष्ट्र को समर्थ करना है। हमने प्रार्थना में ही कहा है कि यह हिंदू राष्ट्र है क्योंकि हिंदू समाज इसका उत्तरदायी है। इस राष्ट्र का अच्छा होता है तो हिंदू समाज की कीर्ति बढ़ती है।
इस राष्ट्र में कुछ गड़बड़ होता है तो इसका दोष हिंदू समाज पर आता है, क्योंकि वे ही इस देश के कर्ताधर्ता हैं। राष्ट्र को परम वैभव संपन्न और सामर्थ्यवान बनाने का काम पुरुषार्थ के साथ करने की आवश्यकता है और हमें समर्थ बनना है, जिसके लिए पूरे समाज को योग्य बनाना पड़ेगा।’
डॉ. भागवत ने कहा कि जिसे हम हिंदू धर्म कहते हैं यह वास्तव में मानव धर्म है, विश्व धर्म है और सबके कल्याण की कामना लेकर चलता है। हिंदू का अर्थ विश्व का सबसे उदारतम मानव, जो सब कुछ स्वीकार करता है, सबके प्रति सद्भावना रखता है। पराक्रमी पूर्वजों का वंशज है जो विद्या का उपयोग विवाद पैदा करने के लिए नहीं करता, ज्ञान देने के लिए करता है। हिंदू धन का उपयोग मदमस्त होने के लिए नहीं करता, दान के लिए करता है और शक्ति का उपयोग दुर्बलों की रक्षा के लिए करता है। यह जिसका शील है, यह जिसकी संस्कृति है वह हिंदू है। चाहे वह पूजा किसी की भी करता हो, भाषा कोई भी बोलता हो, किसी भी जात-पात में जन्मा हो, किसी भी प्रांत का रहने वाला हो, कोई भी खानपान, रीति रिवाज को मानता हो। ये मूल्य और संस्कृति जिनकी है, वे सब हिंदू हैं।
डॉ. मोहन भागवत की इन बातों से मुझे काई आपत्ति नहीं है। ये सारे विचार स्तुत्य हैं और हिन्दू धर्म का मूल हैं। हिन्दू को ऐसा ही होना चाहिए किंतु इससे आगे क्या……? क्या यह सहिष्णुता हिन्दू धर्म की रक्षा करने में समर्थ है? क्या हिन्दू की उदारता राष्ट्र की सुरक्षा करने में समर्थ है? डॉ. मोहन भागवत की इन बातों में न तो ऐसे प्रश्नों को उठाया जाता है और न उनका समाधान देने का प्रयास किया जाता है।
इसी कारण मुझे लगता है कि मोहन भागवन अपनी बातों को आधी-अधूरी छोड़ देते हैं। सहिष्णु तो खरगोश और हिरण भी हैं वे भी जंगल के किसी प्राणी के दाना-पानी पर अपना अधिकार नहीं जमाते तो क्या हिंसक जंगली जानवर खरगोशों और हिरणों को जीवित छोड़ देते हैं, पलक झपकते ही मारकर खा जाते हैं!
सहिष्णु तो धरती माता भी है जो सबको धारण करती है, सबका पेट पालती है इस पर क्या संसार के समस्त मानव धरती को अपनी माता मानकर उसकी रक्षा करते हैं, पलक झपकते ही इस पर बारूद और एटम बम फोड़कर धरती को दहला देते हैं!
सहिष्णु और उदार तो गंगाजी भी हैं, बिना किसी भेदभाव के लोक-लाभ और परलोक निबाहू के सिद्धांत पर अटल रहती हैं। लोग अपने घरों में गंगाजल रखते हैं तथा मरते समय मुख में गंगाजल लेकर मरते हैं, तो क्या बुरे लोग गंगाजी में मल-मूत्र छोड़ने से बाज आ जाते हैं। मृत पशुओं के शव बहाने से बाज आ जाते हैं!
ऐसे सैंकड़ों-हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं।
हाल ही में बाबा बागेश्वर ने आदि जगत्गुरु शंकराचार्य की तरह पूरे भारत में हिन्दू एकता यात्रा पर निकलने की घोषणा की है। अर्थात् बाबा बागेश्वर को पता है कि हिन्दू धर्म और भारत राष्ट्र की रक्षा के लिए उदारता और सहिष्णुता जैसे सिद्धांत पर्याप्त नहीं हैं। क्योंकि ये सिद्धांत तो हिन्दू धर्म के पास सदियों से हैं, तो फिर हिन्दू पूरी धरती से सिमटता-सिकुड़ता क्यों जा रहा है?
उदारता और सहिष्णुता तो बांगला देश के हिन्दुओं में भी थी, फिर उन्हें क्यों नष्ट किया जा रहा है। इस्कॉन मंदिर आज भी बांगलादेश में गंगाजी की बाढ़ से पीड़ित लोगों को धर्म का भेद किए बिना पूड़ी-सब्जी बांट रहा है किंतु इस्कॉन मंदिर के सामने ही उदार और सहिष्णु हिन्दुओं को गाजर-मूली की तरह मारा जा रहा है!
भगवान राम और सीता के वनगमन के समय का एक प्राचीन आख्यान है जिसमें सीताजी रामजी से कहती हैं कि आपको वन्यपशुओं का आखेट करके हिंसा नहीं करनी चाहिए। अपने धनुष-बाण त्याग देने चाहिए। इसके उत्तर में रामजी कहते हैं कि मैं आपको छोड़ सकता हूँ किंतु मैंने ऋषियों की रक्षा के लिए जो प्रतिज्ञा की है, उसे नहीं छोड़ सकता। ऋषि-मुनियों की रक्षा करने के लिए मुझे अपने शस्त्रों का अभ्यास निरंतर करना पड़ेगा ताकि मैं राक्षसों का संहार कर सकूं।
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कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में कहा था कि अब सनानत को भी सोचना पड़ेगा। सनातन को क्या सोचना पड़ेगा, बिना बताए ही यह बात सब जानते हैं। प्रधानमंत्री मोदी हिन्दू समाज की दुर्दशा से क्यों व्यथित हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है।
डॉ. मोहन भागवत ने अपने जयपुर के भाषण में यह भी कहा कि पहले संघ को न कोई नहीं जानता था और न कोई मानता था किंतु अब सब जानते भी हैं और मानते भी हैं। हमारा विरोध करने वाले भी जीभ से तो विरोध करते हैं किंतु मन से तो मानते ही हैं। इसलिए अब हमें हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज का संरक्षण राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति के लिए करना है।
बिल्कुल ठीक बात है कि हमें हिन्दू धर्म, समाज एवं संस्कृति की उन्नति राष्ट्र की उन्नति के लिए करनी है किंतु क्या मोहन भागवत की यह बात सही है कि अब विरोधी भी आरएसएस को मन से मान रहे हैं? क्या मान रहे हैं? कौन मान रहे हैं? क्या राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और दिग्विजय सिंह जैसे नेता आरएसएस को मान रहे हैं?
यदि विरोधी भी संघ की शक्ति को, सिद्धांतों को, आदर्श को मान रहे हैं तो हिन्दू विरोधी मानसकता से ग्रस्त राजनीतिक पार्टियाँ, सोरोस के द्वारा खरीदे गए लोग आरएसएस पर आए दिन यह आरोप क्यों लगाते हैं कि बीजेपी और आरएसएस समाज को तोड़ने का काम करती हैं। यदि लोग संघ के हाथ में पकड़ी हुई लाठी को मान रहे हैं तो फिर हिंसक एवं विरोधी मानसिकता के लोग रामनवमी की शोभायात्रा से लेकर गणेश पाण्डाल एवं दुर्गापूजा के पाण्डालों पर पत्थर क्यों फैंके रहे हैं?
यदि विरोधी लोग हिन्दुओं की उदारता और सहिष्णुता को मान रहे हैं, तो फिर आए दिन बाजार में बिकने वाली खाद्य वस्तुओं में थूकने, पेशाब करने, गाय का मांस मिलाने जैसे घटनाएं क्यों घट रही हैं?
कुछ माह पहले भारत के एक बड़े प्रतिष्ठित संत, जहाँ तक मुझे स्मरण है श्री अवधेशानंदजी ने यह घोषणा की थी कि यदि हिन्दू धर्म पर संकट आया तो मेरे लाखों नागा साधु आपको देश के बॉर्डर पर मिलेंगे। क्यों मिलेंगे, क्या वे वहाँ शत्रुओं को उदारता और सहिष्णुता का विचार बांटने जाएंगे? या फिर हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने जाएंगे। स्पष्ट है कि राष्ट्र की रक्षा करने के लिए मरने और मारने जाएंगे!
संसार के प्रत्येक प्राणी को चाहे वह पशु हो या मनुष्य, उसे अपना जीवन सुरक्षित बनाने के लिए केवल उदारता और सहिष्णुता नहीं चाहिए, इसकी एक सीमा है। सहिष्णुता और उदारता तभी सफल है जब दूसरे भी आपके इन गुणों में विश्वास रखते हों, जहाँ सिर धड़ से अलग किए जा रहे हों, वहाँ सहिष्णुता और उदारता कब तक किसी प्राणी की रक्षा कर सकते हैं?
रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा है- क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो!
अर्थात् हे परमात्मा! आपमें जो गुण हैं, वे मुझे दें। आपमें तेज है, मुझे तेज दें! आपमें वीरता है मुझे वीरता दें, आपमें बल है मुझे बल दें, आप में ओज है मुझे ओज दें, आप में क्रोध है मुझे क्रोध दें, आप में सहिष्णुता है आप मुझे सहिष्णुता दें। इस प्रकार वेद भी सहिष्णुता के साथ क्रोध की आवश्यकता को स्वीकार करता है। फिर हम केवल उदारता और सहिष्णुता की बात करके अपनी बात अधूरी क्यों छोड़ देते हैं?
प्रकृति के सत्य बड़े कठोर हैं, हिन्दू समाज को उनसे भी परिचित होना चाहिए। गुलाब के ठीक नीचे कांटे लगे रहते हैं। गुलाब सुगंध छोड़ता है और कांटा चुभन देता है। यदि गुलाब की झाड़ी को बरसों-बरस जीवित रहकर फूलों की सुगंध छोड़ते रहना है तो उसे अपनी शाखाओं पर चुभने वाले कांटे भी धारण करने होंगे। कांटा जबर्दस्ती किसी को जाकर नहीं चुभता अपितु उसे चुभता है जो गुलाब तोड़ने के लिए गुलाब की झाड़ी की तरफ हाथ बढ़ाता है।
कोई हिन्दू यह नहीं कह सकता कि हिन्दू को कांटे जैसा कठोर बनना चाहिए किंतु कांटे से ही कांटा निकाला जा सकता है, इसे भी समझना चाहिए। हिन्दू सहिष्णु है इसका अर्थ केवल इतना है कि किसी का गला नहीं उतारना है अपितु अपना गला भी तो बचाना है, उसके लिए भी तो हिन्दू में समझ, शक्ति एवं प्रयास का तत्व मौजूद होना चाहिए!
आज ही अर्थात् 16 सितम्बर 2024 को आदित्यनाथ योगी ने कहा है कि कृष्ण के होठों पर मुरली अच्छी लगती है किंतु उनके हाथों में सुदर्शन चक्र भी चाहिए। डॉ. मोहन भागवत को भी ऐसी बातें हिन्दू जाति को बतानी चाहिए। आखिर वे भी हिन्दू समाज के अग्रणी पुरुष हैं, हिन्दू जाति के संरक्षक हैं!
मेरा डॉ. मोहन भागवत से कोई विरोध नहीं है। वे संसार का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन चला रहे हैं और बिना किसी भेद-भाव एवं विवाद के चला रहे हैं। इस देश को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बहुत आवश्यकता है। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ के सर संघचालक हिन्दुओं का पूरा मार्गदर्शन करें, आधा-अधूरा नहीं। हिन्दू जाति को सहिष्णुता और उदारता के साथ-साथ कम से कम इतना तेज और क्रोध भी धारण करने के लिए कहें जिससे हिन्दू जाति अपनी रक्षा कर सके।
डॉ. मोहन भागवत से अधिक इस बात को कौन जानता होगा कि हिन्दू जाति कितने खतरे में है, हर शहर, हर गांव, हर गली में एक भेड़िया घूम रहा है जो दबे पांव हिन्दू लड़कियों की तरफ बढ़ रहा है। पलक झपकते ही हिन्दू लड़की गायब हो जाती है। मैं जानता हूँ कि आरएसएस की शक्ति क्या है! जिस दिन मोहन भागवत हुंकार भरेंगे, सारी हिन्दू लड़कियां भेड़ियों की पहुंच से दूर हो जाएंगी। भेड़िए दूर तक भी दिखाई नहीं देंगे! प्रश्न केवल इतना सा है कि डॉ. मोहन भागवत ऐसा कब चाहेंगे?
सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के मुस्लिम उलेमा एवं मुल्ला-मौलवी (Ulema and Mullah-Maulvi) तो यह मानते ही थे कि अकबर (Akbar) ने मुसलमानों से अन्याय किया किंतु यह देखकर हैरानी होती है कि बीसवीं सदी के लेखक एवं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) भी यह मानते थे कि अकबर ने मुसलमानों से अन्याय किया।
पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘देखा जाए तो राजपूतों को और अपनी हिंदू प्रजा को मनाने के लिए कभी-कभी तो अकबर इतना आगे बढ़ जाता था कि मुसलमान प्रजा के साथ अक्सर अन्याय हो जाता था।’
नेहरू ने अकबर द्वारा मुसलमानों से अन्याय (Injustice against Muslims) का कोई उदाहरण नहीं दिया है किंतु इतिहास की पुस्तकें उन उदाहरणों से भरी पड़ी हैं जिनमें अकबर द्वारा अपने ही उन मुस्लिम सेनापतियों के प्रति नृशंसतापूर्वक व्यवहार किया गया जिन्होंने अकबर के विरुद्ध बगावत करने का दुःस्साहस किया। अकबर की तरफ से इस अन्याय की शुरुआत खानखाना बैराम खाँ (Bairam Khan) को उसके पद से हटाने के साथ ही आरम्भ हो गई थी।
अकबर ने अपने चचेरे भाई अबुल कासिम को केवल इस भय से मरवा दिया कि किसी दिन यह शाही-तख्त का दावेदार न बन जाए। अकबर ने अपने धायभाई आदम खाँ को किन्नरों द्वारा छत से गिरवाकर मरवाया। जब आदम खाँ मर गया तब अकबर ने किन्नरों को आदेश दिए कि वे आदम खाँ के शव को महल की छत पर लाएं और उसे फिर से गिराएं। मुगलों के इतिहास में ऐसी नृशंसता का दूसरा उदाहरण उपलब्ध नहीं है।
इतिहासकार पी. एन. ओक (P. N. Oak) ने लिखा है- ‘अकबर के अधिकारियों द्वारा खानेजमां के विद्रोह को दबाने के लिए खानेजमां के विश्वासपात्र मोहम्मद मिरक को वधस्थल पर पांच दिन तक निरंतर यातनाएं दी गईं। प्रत्येक दिन एक लकड़ी के कटघरे में उसकी मुश्कें बांधकर उसे हाथी के सामने लाया जाता था।
हाथी उसे सूंड से पकड़ता, झकझोरता और दूसरी ओर उछाल देता।’ अकबर ने सूरत के घेरे में अपने पिता हुमायूँ के पुराने सेवक हम्जाबान को दण्ड नहीं देने का वचन देकर उसकी जीभ कटवा ली! अकबर के आदेश से अकबर के निकट सम्बन्धी मसूद हुसैन मिर्जा की आंखों को सुई से सीं दिया गया। उसके तीन सौ सहायकों के चेहरों पर गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें चढ़ाकर अकबर के सम्मुख घसीट कर लाया गया था। उनमें से कुछ को अत्यंत घृणित क्रूर कर्मों सहित मारा गया।’
यदि एक बादशाह द्वारा किसी मुसलमान बागी को दण्डित करना मुसलमानों से अन्याय की श्रेणी में आता है तो अकबर पर लगाया गया यह आरोप सही है किंतु इतिहास गवाह है कि किसी बादशाह के लिए बागी का मजहब देखकर उसके लिए दण्ड निर्धारित करना कठिन है।
इतिहासकार स्मिथ ने लिखा है- ‘अकबर को अपने तातारी पूर्वजों से पैतृक रूप में ग्रहीत ऐसी बर्बरताओं की अनुमति देते हुए देखकर अत्यंत घृणावश जी ऊब जाता है।’
सुप्रसिद्ध इतिहासकार पी. एन. ओक ने लिखा है- ‘बंगाल के शासक दाऊद खाँ (Daud Khan Karrani of Bengal) को परास्त करने के बाद अकबर के सेनापति मुनीर खाँ (मुनीम खाँ अथवा मुनअम खाँ) ने शत्रु सैनिकों के सिर कटवा दिए तथा उन कटे हुए सिरों की ऊँची-ऊँची आठ मीनारें बनवाईं। इनमें से अधिकतर सिर मुसलमान सैनिकों के थे। जब दाऊद खाँ ने प्यास से व्याकुल होकर पानी मांगा तो अकबर के सैनिकों ने दाऊद को जूतियों में भरकर पानी दिया।’
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अकबर ने अहमदाबाद में मिर्जाओं को परास्त करने के बाद 2,000 से अधिक कटे हुए सिरों की मीनार बनवाई थी। इन कटे हुए सिरों में भी अधिकांश सिर मुसलमान सैनिकों के थे और उन मुसलमान सैनिकों के भी थे जो अकबर की तरफ से लड़ते हुए मरे थे। अकबर द्वारा मुस्लिम विद्रोहियों के प्रति की गई सख्ती के और भी बहुत से उदाहरण हैं किंतु केवल इतने उदाहरण पंडित नेहरू की इस बात को सही ठहराने के लिए पर्याप्त हैं कि अकबर के हाथों मुसलमान प्रजा के साथ अक्सर अन्याय हो जाता था। हालांकि नेहरू ने लिखा है कि अकबर द्वारा राजपूतों को मनाने के लिए ऐसा किया जाता था, किंतु इतिहास में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जब अकबर ने किसी राजपूत राजा को मनाने के लिए मुसलमानों से अन्याय किया हो!नेहरू ने लिखा है कि अकबर ने खुद अपना विवाह एक ऊंचे राजपूत घराने की लड़की से किया। बाद में उसने अपने पुत्र का विवाह भी एक राजपूत लड़की से किया और उसने ऐसी मिली-जुली शादियों को बढ़ावा दिया। बहुत से लोग यह प्रश्न भी उठाते हैं कि यदि अकबर धर्म-सहिष्णु था तो उसने एक भी मुगल शहजादी का विवाह किसी हिन्दू राजकुमार के साथ क्यों नहीं किया! सच्चाई तो यह है कि अकबर ने मुगल शहजादियों के विवाह पर भी रोक लगा दी थी।
वे किसी से भी विवाह नहीं कर सकती थीं, न मुगल शहजादे से, न तुर्क लड़ाके से और न हिन्दू राजकुमार से।
क्या केवल इसलिए अकबर को महान ठहराया जा सकता है कि उसने कुछ हिंदू राजकुमारियों से विवाह किए तथा हिंदू राजाओं को बड़े-बड़े मनसब देकर उन्हें मुगल सल्तनत की सीमाओं के विस्तार के काम में लगाए रखा! अकबर के खाते में इससे अधिक कुछ भी हासिल-जमा नहीं है। मीना बाजार सजाकर उनमें औरतों का सौदा करने, अपने हरम में देश-विदेश की पांच हजार औरतों को इकट्ठा करने, ईद और नौरोजे के साथ होली एवं दीवाली के त्यौहारों का आनंद उठाने में यदि इतिहासकारों को किसी बादशाह में महानता के लक्षण दिखाई देने लगते हैं, तो फिर किया ही क्या जा सकता है!
अकबर कितना महान् था (How great was the Akbar) , इस बात की सच्चाई इस तथ्य से भी मिलती है कि अकबर के पुत्र भी अकबर से नाराज रहते थे। राजकिशोर शर्मा ‘राजे’ ने अपनी पुस्तक हकीकत ए अकबर में लिखा है कि अकबर के पुत्र भी अकबर से प्रसन्न नहीं रहते थे। इतिहास गवाह है कि सलीम (Saleem / Jahangir) जीवन भर अपने पिता अकबर से रुष्ट रहा और समय-समय पर बगावत करता रहा। यहाँ तक कि सलीम ने अपने मन का गुस्सा निकालने के लिए अकबर के नौकरों को इतना पीटा के उनमें से कुछ तो नपुंसक हो गए और कुछ मृत्यु को प्राप्त हुए। सलीम अपने पिता अकबर से इतना नाराज था कि सलीम ने अकबर के मित्र अबुल फजल की हत्या ही करवा दी।
राजकिशोर शर्मा ‘राजे’ ने लिखा है कि जब अकबर का मंझला पुत्र मुराद (Murad Baksh) अहमदनगर पर आक्रमण के दौरान बीमार पड़ा और अकबर ने उसे अपने पास बुलाना चाहा तो वह विभिन्न बहाने करके नहीं आया और वहीं मर गया। इसी तरह अकबर के दूसरे बेटे दानियाल ने भी दक्षिण में बीमार पड़ने पर पिता के बार-बार बुलाने पर उसके पास आना कबूल नहीं किया और वह भी वहीं पर मर गया। अकबर के तीनों बेटे अकबर से इतने नाराज क्यों थे?
यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अकबर द्वारा जाने-अनजाने में इन तीनों के प्रति अन्याय किया जाता था। और यदि यह कहा जाए कि इस स्थिति के लिए अकबर जिम्मेदार नहीं था, अपितु उसके पुत्र जिम्मेदार थे, तो भी अकबर पूरी तरह से मुक्त नहीं हो जाता। नेहरू के अनुसार अकबर इतना महान् था कि उसकी आंखों में आकर्षण था, तो फिर वह अपनी महानता और आंखों के आकर्षण का जादू अपने पुत्रों पर क्यों नहीं चला पाया था?
उपरोक्त उदाहरणों को देखकर यह कहा जा सकता है कि जवाहर लाल नेहरू ने यह सही लिखा है कि अकबर के हाथों प्रायः मुसलमानों से अन्याय हो जाता था किंतु यह अन्याय राजपूतों अथवा हिन्दुओं को खुश करने के लिए नहीं किया जाता था अपितु अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति में बाधक बनने वाले मुसलमानों को दण्डित करने के लिए किया जाता था।
–डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!
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