Home Blog Page 57

जातीय जगनणना में दूर खड़ी मुस्कुराएंगी सवर्ण जातियाँ !

0
जातीय जगनणना - bharatkaitihas.com
जातीय जगनणना - उल्टा पड़ेगा दांव!

जातीय जगनणना से पहले सवर्ण जातियों में जो बेचैनी दिखाई दे रही है, वह शीघ्र उन जातियों में स्थानांतरित हो जाएगी जो जातीय जगनणना के परिणाम स्वरूप किसी बड़े लाभ का गणित लगा रही हैं!

एक पुरानी कहावत है- भुस में आग लगाय, जमालो दूर खड़ी मुसकाय। जमालो तब तक ही मुस्कुरा सकती है जब तक वह दूसरों के भूसे में आग लगाती है। इस बार जमालो ने ओवर कॉन्फिडेंस में अपने ही भूसे में आग लगा ली है। अब जमालो नहीं मुस्कुराएगी, वह पछताएगी और पूरा गांव दूर खड़ा होकर जमालो का तमाशा देखेगा!

ऐसा ही कुछ हाल जातीय जगनणना वाले मामले में कांग्रेस का होने वाला है। कांग्रेस पिछले कुछ सालों से जातीय जनगणना के भूसे में आग लगाने का प्रयास कर रही है। अब ऐसा लग रहा है कि पूरा गांव भूसे में आग लगाने को तैयार है। पता नहीं क्यों कांग्रेस इस बात की अनदेखी कर रही है कि जिस भूसे में आग लगने वाली है, उससे कांग्रेस का ही सबसे अधिक नुक्सान होने वाला है!

लोकसभा चुनाव 2024 में दलित जातियां, पिछड़ी जातियां और मुसलमान वोटर जिस बड़ी संख्या में कांग्रेस के साथ जुड़ा, उससे कांग्रेस को लगता है कि जातीय जनगणना के मुद्दे को उछाल कर कांग्रेस 52 से 99 पर पहुंची है। संभवतः इसीलिए कांग्रेस ने जातीय जनगणना के मुद्दे को कस कर पकड़ लिया।

कांग्रेस को लगता था कि सरकार कभी भी जातीय जनगणना के लिए तैयार नहीं होगी और कांग्रेस इस मुद्दे को भुनाकर 99 से 272 पर पहुंच जाएगी किंतु दांव उलटा भी पड़ सकता है, ऐसा कांग्रेस ने क्यों नहीं सोचा?

भाजपा अब तक इस मुद्दे पर असमंजस में थी कि कहीं इससे समाज में जातीय वैमनस्य न फैल जाए किंतु अब लगता है कि भाजपा ने कांग्रेस के हाथ से यह मुद्दा छीनने के लिए जातीय जनगणना करवाने का मन बना लिया है।

जातीय जनगणना से सवर्ण जातियों को कुछ फर्क तो पड़ेगा किंतु अधिक फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी संख्या देश में एक तिहाई से अधिक नहीं है। वैसे भी अब पढ़ा-लिखा सवर्ण युवा सरकारी नौकरी में नहीं जाता, प्राइवेट सैक्टर के पैकेज के पीछे भागता है।

जातीय जनगणना से फर्क उन जातियों को पड़ेगा जो विगत कुछ दशकों से आरक्षण की मलाई खाती आ रही हैं। जातीय जनगणना के बाद इस मलाई पर वे जातियां हक जताएंगी जो आरक्षण में रहकर भी इसका कोई लाभ नहीं उठा सकी हैं। उन्हें आरक्षण के नाम पर बुरी तरह से ठगा गया है।

मनमोहनसिंह सरकार द्वारा करवाए गए आर्थिक सर्वेक्षण में 37 लाख से अधिक जातियों की सूची बनाई गई थी। यदि जातीय जनगणना के नाम पर फिर से वैसी ही एक नई सूची बनवाई जाए तो जातीय जनगणना का कोई अर्थ नहीं होगा।

अतः बहुत अधिक संभावना है कि जब किसी परिवार की जाति लिखी जाएगी तो अगले कॉलमों में यह भी लिखा जाए कि उस परिवार के पास भूमि कितनी है, भैंसें कितनी हैं, वाहन कितने हैं, ट्रैक्टर कितने हैं, मकान कितने हैं, सरकारी नौकरियों में सदस्य कितने हैं?

जैसे ही यह सूची तैयार होकर सामने आएगी, वैसे ही उन आरक्षित जातियों के भीतर बेचैनी उत्पन्न होगी जिनके पास कोई भूमि, भैंस, ट्रैक्टर वाहन, मकान और नौकरी आदि नहीं होंगे। वे अपने लिए कोटा के भीतर कोटा और क्रीमी लेयर जैसी मांगें करेंगे जिनके लिए सुप्रीम कोर्ट पहले से ही अपनी राय व्यक्त कर चुका है और कुछ निर्देश भी दे चुका है।

अब तक दलित वर्ग में आरक्षण का बड़ा हिस्सा खा रहीं यूपी की जाटव और बिहार की पासवान जैसी जातियां, जनजाति वर्ग में मीणा, ओबीसी वर्ग में कुर्मी और यादव जैसी जातियां, राजस्थान में जाट, माली और चारण जैसी जातियाँ संभवतः आरक्षण का वैसा लाभ न ले सकें जैसा वे अब तक लेती आई हैं।

वैसे भी अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल यादव, जाट, मीणा, माली चारण, आदि बहुत सी जातियाँ उच्च वर्ण जातियां हैं, सामाजिक एवं आर्थिक आधार पर वे ठीक वैसी ही है जैसी कायस्थ, राजपुरोहित, या अन्य पढ़ी-लिखी एवं सम्पन्न जातियां हैं। यादव, जाट, मीणा, माली, चारण में से एक भी जाति ऐसी नहीं है जिन्हें आजादी से पहले या बाद में, सवर्ण समाज अपने साथ बैठाकर भोजन नहीं करता था अथवा उनके घर भोजन करने नहीं जाता था।

दलित एवं ओबीसी वर्ग की जिन जातियों से लोग मुख्यंत्री, प्रधानमंत्री, राज्यपाल एवं राष्ट्रपति बनते हैं, वे पिछड़े हुए कैसे हो सकते हैं! क्योंकि इन पदों के लिए कोई आरक्षण नहीं है!

दूसरी ओर दलित वर्ग को ही लें, इनके भीतर की स्थिति ऐसी है कि यदि बिहार की पासवान जाति की तुलना मुसहरा जाति से की जाए तो पासवान की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति मुसहरे की तुलना में वैसी ही है जैसे अम्बानी और अडाणी के कारखानों के सामने पेड़ के नीचे बैठकर दांतुन बेचने वाला लड़का।

राजस्थान सरकार द्वारा वर्ष 2012 में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व जांचने के लिये करवाए गए सर्वे के अनुसार राज्य में 23 पिछड़ी जातियों का एक भी सदस्य सरकारी नौकरी में नहीं था। इन जातियों के नाम इस प्रकार थे- गाड़िया लोहार, बागरिया, हेला मोगिया, न्यारिया, पटवा, सतिया-सिंधी, सिकलीगर, बंदूकसाज सिरकीवाल, तमोली, जागरी, लोढ़े-तंवर, खेरवा, कूंजड़ा, सपेरा, मदारी, बाजीगर, नट, खेलदार, चूनगर, राठ, मुल्तानी, मोची, कोतवाल तथा कोटवाल।

जातीय जगनणना के बाद ये जातियाँ सामने आएंगी और वे आरक्षित जातियों से अपने हिस्से का लाभ मांगेंगी। इस कारण आरिक्षत जातियों में बेचैनी उत्पन्न होगी। इस बेचैनी के जो भी परिणाम आगे निकलेंगे, उनके बारे में अभी से आकलन करना कठिन है किंतु इतना तय है कि कांग्रेस को इस जातीय जनगणना से कोई लाभ नहीं मिलेगा। अपितु यादव, कुर्मी, जाट, चारण, माली, जाटव, पासवान जैसी शक्तिशाली आरक्षित जातियां कांग्रेस का विरोध करेंगी।

यह भी संभव है कि ये शक्तिशाली आरक्षित जातियां जातीय जगनणना को रोकने का प्रयास करें अथवा उनके नतीजे सार्वजनिक न करने के लिए दबाव बनाएं। ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस ने कनार्टक में जो जातीय जनगणना करवाई उसके नतीजे आज तक सार्वजनिक नहीं किए गए।

बिहार में जो जातीय जगनणना हुई, उसका कोई लाभ किसी भी राजनीतिक दल को नहीं मिला। इस बार भी जातीय जगनाणना का लाभ किसी भी राजनीतिक दल को नहींं मिलेगा। यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कि मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का लाभ वी. वी. पी. सिंह और उनकी पार्टी को नहीं मिला! उनके साथ-साथ किसी और दल को भी नहीं मिला।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जातीय उन्माद के भंवर में फंस गई देश की कश्ती!

0
जातीय उन्माद - bharatkaitihas.com
जातीय उन्माद में फंसा भारत

क्या देश की कश्ती जातीय उन्माद के भंवर में फंस गई है! क्या जातीय जनगणना इस उन्माद का चरम है! या देश के समक्ष इससे भी बड़ा संकट मुंह बाए खड़ा है!

जिन दिनों देश को आजादी मिली थी, उन दिनों प्रदीप का गाया एक गीत बड़ा प्रसिद्ध हुआ था- हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के।

ऐसे संभाल कर रखा हमने आजादी की कश्ती को! आजादी मिले अभी सौ साल भी नहीं हुए हैं कि चारों ओर से जाति-जाति की पुकार सुनाई दे रही है। हर तरफ से आरक्षण का शोर है। हर तरफ बेरोजगारों की भीड़ खड़ी है और अपनी-अपनी जाति के नाम पर नौकरी मांग रही है।

राजनीतिक दलों ने कभी अजगर बनाकर, कभी एमवाई का नारा लगाकर तो कभी पीडीए बनाकर देश में जातिवाद का भयानक तूफान खड़ा कर दिया है।

मण्डल कमीशन लागू होने के बाद से देश की नैय्या दिन प्रति दिन जातियों के भंवर में गहरी धंसती जा रही है। बिहार, यूपी, हरियाणा, पंजाब एवं तमिलनाडू आदि विभिन्न प्रांतों में ताल ठोक रहे क्षेत्रीय दलों की तो उत्पत्ति ही जातीय वोटों के गणित पर हुई है।

लगभग समस्त क्षेत्रीय दलों को जीवन दान अर्थात् वोट और सत्ता जातीय उन्माद फैलाकर प्राप्त होते हैं किंतु अब तो देश पर दीर्घकाल तक शासन करने वाले कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल ने भी जातीय जनगणना के नाम पर जातीय उन्माद को बढ़ाना आरम्भ कर दिया है।

यह जातीय उन्माद हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा। इस उन्माद के कारण हम एक दूसरे के दुश्मन जैसा व्यवहार करने लगे हैं। राजनीतिक दल एक दूसरे से लड़ें तो बात समझ में आती है कि इन्हें सत्ता छीननी है किंतु जातीय उन्माद में फंसकर जनता आपस में लड़-मर रही है। हम अपनी स्वाभाविक संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।

आज देश में प्रत्येक जाति को आरक्षण चाहिए। ज्यादा से ज्यादा आरक्षण चाहिए। कोई दिमाग लगाने को तैयार नहीं है कि न केवल आरक्षण की अपितु सरकारी नौकरियों की भी एक सीमा है! इस समय जिन भी जातियों को कुल मिलाकर पचास प्रतिशत के आसपास आरक्षण मिला हुआ है, यदि केवल उन्हीं को सौ प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाए तो क्या उन समुदायों के समस्त नौजवानों को नौकरियां मिल जाएंगी!

जाति आधारित आरक्षण का अर्थ है कि आरक्षित समुदाय के लोगों में उनकी जाति के कारण सामाजिक एवं आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं।

यदि जाति ही समस्या है तो देश में लाखों ब्राह्मण परिवार निर्धनता की रेखा से नीचे जीवन यापन क्यों कर रहे हैं? क्षत्रिय समुदाय के लाखों परिवार मजदूरी करके जीवन यापन क्यों कर रहे हैं? प्रतिवर्ष वैश्य जाति के लोग व्यापार में घाटा खाकर और कर्ज के जाल में फंसकर आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?

प्राचीन हिन्दू समाज में जातियों का निर्माण व्यक्ति द्वारा किए जा रहे कार्य के आधार पर हुआ था। आजादी से पहले तक हम लोग अपनी जाति अथवा परिवार के द्वारा हजारों वर्षों से किए जा रहे कामों को करते आ रहे थे। उसी के आधार पर हम बढ़ई, सुनार, कुम्हार, मोची, तेली, नाई, दर्जी, महाजन, ब्राह्मण या राजपूत कहलाते थे।

आजादी के बाद इन सबका पैतृक व्यवसाय छुड़वाकर तथा जबर्दस्ती पढ़ा-पढ़ाकर नौकरियों की लाइनों में लगा दिया गया और जब अपेक्षित संख्या में नौकरियां नहीं मिलीं तो समाज में आरक्षण का भूत खड़ा किया गया।

अब तो आरएसएस ने भी जातीय जनगणना की आवश्यकता स्वीकार कर ली है। कुछ दिन पहले ही राहुल गांधी ने कहा था कि देश में जातीय जनगणना होगी, ऑर्डर आ गया है। राहुल गांधी कौनसे ऑर्डर की बात कर रहे थे!

कहा नहीं जा सकता कि जातीय जनगणना से कौनसी नई समस्याएं खड़ी होंगी क्योंकि हिन्दू समाज को जातियों के नाम पर लड़वाने का अधिकांश काम तो पहले ही पूरा हो चुका है। अब तो एस सी को एस सी से, एसटी को एस टी से और ओबीसी को ओबीसी से लड़वाना ही बाकी रहा है। संभवतः जातीय जनगणना से ऐसा ही कुछ भयानक परिणाम निकले!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चिराग पासवान खो चुके हैं अपनी विश्वसनीयता!

0
चिराग पासवान - bharatkaitihas.com
चिराग पासवान

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चल रही एनडीए की तीसरी सरकार के तीन बड़े स्टेक होल्डरों में से तीसरे चिराग पासवान ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में अपनी विश्वसनीयता खो दी है!

पिछले दिनों उन्होंने जातीय जनगणना के मामले में राहुल गांधी के सुर में सुर मिलाया, वक्फ बोर्ड के प्रावधानों पर आपत्ति की तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय का यह कहकर विरोध किया कि हम आरक्षण के कोटे के भीतर कोटे से सहमत नहीं हैं।

एनडीए सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी थी कि सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए क्रीमी लेयर वाले सुझाव से सहमत नहीं है, फिर भी चिराग ने जिस तरह उछल-उछल कर एनडीए के प्रति अपना विरोध स्पष्ट किया, वह एनडीए के लिए सिरदर्दी पैदा करने वाला है।

एनडीए सरकार का हिस्सा बनने के लिए चिराग पासवान लोकसभा चुनावों से पहले और बाद में यह कहते रहे हैं कि वे नरेन्द्र मोदी के हनुमान हैं, समझ में नहीं आता कि चिराग पासवान किस तरह के हनुमान हैं! हनुमानजी तो लंका को फूंक कर आए थे जबकि चिराग तो एनडीए को ही चिन्गारी दिखाने का काम कर रहे हैं।

चिराग पासवान को एनडीए तीन में केबीनेट मंत्री का पद दिया गया है, जबकि इस पद के लिए न केवल एनडीए के अन्य स्टेक होल्डर दलों में अपितु स्वयं बीजेपी में भी वर्षों से मंजी हुई राजनीति कर रहे नेता दावेदार थे किंतु लगता है कि चिराग को घी हजम नहीं हुआ!

चिराग के पिता रामविलास पासवान ने भी हालांकि जीवन भर जातिवादी राजनीति की जिसे उन्होंने सिद्धांतवादी राजनीति कहकर अलग-अलग दलों की सरकारों में मंत्री पद भोगे किंतु उन्होंने अपनी विश्वसनीयता कभी नहीं खोई। जबकि चिराग पासवान जातिवादी राजनीति के नाम पर स्वयं अपनी ही विश्वसनीयता खो रहे हैं।

जब एनडीए तीन बनी थी, तब सबको लगा था कि नीतीश कुमार और चन्द्रबाबू नायडू एनडीए तीन पर दबाव की राजनीति करेंगे और चिराग के बारे में किसी को ऐसा अनुमान नहीं था कि वे पिद्दी न पिद्दी का शोरबा होते हुए भी सरकार पर इतना दबाव बनाने का प्रयास करेंगे।

चिराग की इन्हीं हरकतों के कारण बीजेपी चिराग के चाचा पशुपति पासवान के साथ नए सिरे से गठबंधन की तैयारियां कर रही हैं।

यह सही है कि लोकसभा चुनावों में चिराग के सहयोग के बिना न केवल एनडीए को अपितु स्वयं बीजेपी को भी बिहार में कुछ सीटें और कम मिलतीं किंतु यह भी उतना ही सही है कि बीजेपी के सहयोग के बिना चिराग को बिहार में एक भी सीट नहीं मिलती!

चिराग अपने इस कमजारे पक्ष को समझ नहीं पा रहे किंतु चाचा पशुपित पारस चिराग को यह बात एक बार फिर अच्छी तरह से समझा देंगे।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ममताबनर्जी की असली ताकत कौन है?

0
ममताबनर्जी की असली ताकत - bharatkaitihas.com
ममताबनर्जी की असली ताकत

ममताबनर्जी की असली ताकत कौन है, वह जनता जिसने ममता के दल को वोट देकर चुना, या विदेशी घुपैठिए? या फिर कोई अन्य विदेशी शक्ति जो पड़ौसी बांगलादेश में शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलट करके हिन्दुओं के खून से होली खेल रही है?

आखिर किस रहस्यमयी ताकत के बल पर ममता बनर्जी ने 28 अगस्त को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लेकर पूरे देश को धमकाया कि यदि ममता की सरकार अस्थिर हुई तो वे भारत की राजधानी सहित अनेक प्रांतों में आग लगा देंगी?

तो क्या अब ममता बनर्जी पश्चिमी बंगाल की निरंकुश मालकिन बन गई हैं और वे स्वयं ही इतनी ताकतवर हो गई हैं कि देश में आग लगा सकती हैं! या फिर उनकी ताकत के पीछे वास्तव में कोई और है?

ममता बनर्जी के अतिरिक्त और किसी मुख्यमंत्री ने 1947 से लेकर आज तक देश के प्रधानमंत्री के लिए इतने अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं किया और न ही कभी भारत की अस्मिता को चुनौती दी।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर, इंदिरा गांधी, नरसिम्हा राव तथा अटल बिहारी वाजपेयी तक की सरकारों ने विभिन्न कारणों से राज्य सरकारों को बर्खास्त किया किंतु किसी भी मुख्यमंत्री ने न तो कभी प्रधानमंत्री के लिए जवाहर बाबू या अटल बाबू जैसे हल्के शब्दों का प्रयोग किया और न कभी देश में आग लगाने की धमकी दी।

जहाँ तक मुझे स्मरण है, जब अटलबिहारी वाजपेयी ने बिहार की सरकार बर्खास्त की थी, तब राबड़ी देवी हाथ में डण्डा लेकर बिहार की सड़कों पर उतरी थीं और उन्होंने बिहार के तत्कालीन राज्यपाल सुंदरसिंह भण्डारी के लिए कहा था कि इसकी एक टांग तो पहले से ही टूटी हुई है, दूसरी टांग मैं तोड़ डालूंगी।

ममता बनर्जी किसे धमका रही हैं, इसे समझना कठिन नहीं है किंतु इस धमकी की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसे समझना अत्यंत कठिन है। ममता बनर्जी को ऐसी भाषा का प्रयोग करने की हिम्मत कौन दे रहा है! भारत के विभिन्न प्रांतों में बैठे रोहिंग्या या बांगलादेश और नेपाल के बॉर्डर से आए वे विदेशी घुसपैठिए जो दीमक की तरह भीतर ही भीतर अपनी संख्या बढ़ा चुके हैं? इनमें से ममताबनर्जी की असली ताकत कौन है?

निश्चित रूप से नेताओं को जो भी शक्ति मिलती है, जनता के वोट से मिलती है। किसी भी नेता में यह शक्ति सदा के लिए नहीं रहती। जैसे ही नेता जनता की नजरों से उतरता है, स्वतः शक्तिविहीन हो जाता है। ममता को भी यह बात अच्छी तरह से ज्ञात होगी! इतना होने पर भी ममता आग से खेलने की तैयारी कर रही हैं तो किस ताकत के बल पर!

लोकतंत्र में जनता के द्वारा विधिवत् चुनी गई सरकार को भंग किया जाना श्रेयस्कर नहीं माना जा सकता किंतु जब चुनी हुई सरकार निरंकुश आचरण करने लगे अथवा प्रदेश में अराजकता फैल जाए तो उसे भंग करके जनता को फिर से अपनी पसंद की सरकार चुनने का अवसर देना पूरी तरह लोकतांत्रिक पद्धति है।

भारत के संविधान ने केन्द्र सरकार को जिम्मदारी दी है कि वह राज्य की जनता को अराजकता एवं निरंकुश शासन से बचाए। ममता की सरकार निरंकुश आचरण कर रही है तथा राज्य में अराजकता फैल गई है, इसलिए केन्द्र सरकार को शीघ्र ही कोई निर्णय लेना चाहिए।

यदि ममता की धमकी प्रधानमंत्री के अपमान तक सीमित रहती तो एक अलग तरह का मामला होता किंतु ममता की धमकी देश की अस्मिता के लिए खतरे के रूप में दिखाई दे रही है। इसलिए इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि ममताबनर्जी की असली ताकत कौन है?

इससे पहले कि पश्चिमी बंगाल में स्थितियां भयावह मोड़ लें, केन्द्र सरकार को कोई समुचित कदम उठाना चाहिए। यदि केन्द्र सरकार पश्चिमी बंगाल की जनता के हितों की रक्षा करने में अक्षम रहती है तो केन्द्र सरकार भी भारत की जनता का विश्वास खो देगी। जनता का विश्वास ही लोकतंत्र की असली ताकत है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कंगना रनौत ने गलत क्या कहा?

0
कंगना रनौत - bharatkaitihas.com
कंगना रनौत

लोकतंत्र हो अथवा राजतंत्र राजनीति में सत्य को प्रायः दूसरा स्थान मिलता है, पहला स्थान पाखण्ड को मिलता है। इसी पाखण्ड को राजनीति और कूटनीति कहा जाता है। यही कारण है कि कंगना रनौत सत्य बोलकर कई बार विरोधियों के निशाने पर आ जाती हैं। हर बार उन्हें अपने द्वारा बोले गए सत्य के लिए विरोध सहन करना पड़ता है। महाराष्ट्र में भी उनके साथ ऐसा ही कुछ हुआ था।

इस बार जब कंगना रनौत ने यह कहा कि किसान आंदोलन के नाम पर कुछ उपद्रवी तत्व भारत में वैसा ही कुछ करना चाहते थे जैसा कि बांगलादेश में हुआ, तो कंगना की अपनी पार्टी ने ही कंगना के वक्तव्य से किनारा कर लिया। यदि ईमानदारी से देखा जाए तो कंगना रनौत ने गलत क्या कहा?

कंगना रनौत ने वही तो कहा जो राकेश टिकैत ने खुलेआम स्वीकार किया! टिकैत ने कहा कि भारत में बंगलादेश जैसा काम अवश्य होकर रहेगा, हमारी पूरी तैयारी है! यह काम तो उसी दिन हो लेता जिस दिन हम प्रधानमंत्री निवास की बजाय लाल किले की तरफ मुड़ गए थे। हमें किसी न बहकाया नहीं होता तो हम लाल किले की तरफ नहीं जाते, मोदी की तरफ जाते।

कांग्रेस के सारे नेता अलग-अलग शब्दों में यह बात कह चुके हैं कि भारत में भी एक दिन वह होगा जैसा बंगलादेश में हुआ है। बंगलादेश में हुए प्रकरण के बाद सबसे पहले उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने बड़ी कठोर शब्दावली में कहा था कि भारत एक दिन बंगलादेश बनेगा और यह भी बताया था कि क्यों बनेगा!

राउत, टिकैत और अन्य विपक्षी नेताओं के वक्तव्यों के बाद कंगना रनौत ने जो कुछ कहा, उसमें गलत क्या था? फिर भी यदि भारतीय जनता पार्टी ने उनके इस बयान से किनारा कर लिया तो उसका एकमात्र कारण यह दिखाई देता है कि इन दिनों भारत की राजनीति मिथ्या नरेटिव गढ़ने के आधार पर चल रही है। हालांकि सत्य के आधार पर तो शायद ही कभी चली।

विपक्ष के नेता आए दिन एक झूठा नरेटिव गढ़ते हैं और भाजपा को उसमें घेरने का प्रयास करते हैं कि भाजपा किसान विरोधी है, भाजपा मजदूर विरोधी है, भाजपा दलित विरोधी है, भाजपा ओबीसी विरोधी है, भाजपा मुसलमान विरोधी है, भाजपा आरक्षण विरोधी है, भाजपा छात्र विरोधी है, भाजपा महिला विरोधी है। यदि ऐसा है तो फिर देश में ऐसा कौन बच जाता है, भाजपा जिसकी विरोधी नहीं है।

यही कारण है कि यदि भाजपा स्वयं को कंगना के वक्तव्य से अलग नहीं करती तो अवश्य ही विपक्षी दल भाजपा के विरुद्ध इस नरेटिव को और गहरा करने का प्रयास करते कि भाजपा और नरेन्द्र मोदी किसानों को आतंकवादी और खालिस्तानी मानते हैं।

विपक्षी दलों ने किसान आंदोलन को लेकर जो हो-हल्ला मचाया, उसके कारण भारत सरकार और भाजपा कभी भी देश के आम किसान तक यह संदेश नहीं पहुंचा पाईं कि दिल्ली की सीमाओं पर जो कुछ हुआ वह किसान आंदोलन नहीं था, अपति भारत के अरबन नक्सलियों एवं कनाडा में बैठे खालिस्तानी आतंकियों द्वारा किसानों को उकसाकर किया गया एक नक्सली षड़यंत्र था जिसका उद्देश्य देश में अराजकता फैलाकर सरकार की छवि को खराब करना था।

यदि यह नक्सली एवं खालिस्तानी षड़यंत्र नहीं था तो फिर लाल किले से तिरंगा उतारकर क्यों फैंका गया। आंदोलन के दौरान सिक्खों का धर्मग्रंथ फाड़ने से लेकर बलात्कार जैसी तमाम तरह की गैरकानूनी हरकतें क्यों हुईं? यदि यह नक्सली आंदोलन नहीं था तो ‘हाय-हाय मोदी मरजा तू’ जैसे नारे क्यों लगाए गए?

निश्चित रूप से किसानों की आड़ में नक्सली तत्व ही ऐसे नारे लगा रहे थे और खालिस्तानी तत्व भारत का झण्डा उतारकर फैंक रहे थे। यदि उनका उद्देश्य बंगलादेश में हुई घटना जैसा कार्य करने का नहीं था तो और क्या था? यह तो हमारा सौभाग्य है कि देश बहुत बड़ा है और देश की अधिकांश जनता अहिंसक एवं धर्मप्राण है।

जब तक भारत की जनता अपने इस नैसर्गिक स्वरूप में अर्थात् अहिंसक एवं धर्मप्राण बनी रहेगी, तब तक भारत में वैसा कुछ नहीं होगा जैसा श्रीलंका एवं बंगलादेश में हुआ है। जहाँ तक कंगना रनौत का प्रश्न है, उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा अपितु भारत की जनता को षड़यंत्रकारियों के चंगुल में फंसने से रोकने का प्रयास किया है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

योगी आदित्यनाथ की आवाज सुनो!

0
योगी आदित्यनाथ - bharatkaitihas.com
योगी आदित्यनाथ की आवाज सुनो!

योगी आदित्यनाथ ने जन्माष्टमी के दिन जो कुछ कहा, वैसा कहने की हिम्मत वर्ष 2014 से पहले देश में केवल दो ही राजनेताओं में थी, एक तो स्वयं योगी आदित्यनाथ जिन्होंने भारत की संसद में सनातन की रक्षा के लिए राजनीतिक दलों से बार-बार गुहार लगाई और दूसरे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी।

आदित्यनाथ योगी और नरेन्द्र मोदी में अंतर केवल इतना है कि जो बात योगी खुलकर बोलते हैं, उसे नरेन्द्र मोदी संकेतों में कहते हैं, उदाहरण भर देते हैं जैसे कि कपड़ों से पहचान लो, कार के पिछले पहिए के नीचे आदि-आदि।

अभी उन बातों को अधिक दिन नहीं हुए हैं जब नई संसद में प्रतिपक्ष के नेता की हैसियत से राहुल गांधी ने हिन्दुओं को हिंसक कहा। इस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था कि अब सनातन को भी सोचना होगा।

नरेन्द्र मोदी सनातन को क्या सोचने के लिए कह रहे थे! आदित्यनाथ योगी ने वही स्पष्ट किया है कि बंटेंगे तो कटेंगे! एक रहेंगे तो नेक रहेंगे। स्वाभाविक है कि राहुल, अखिलेश एवं औबेसी जैसे नेता हायतौबा मचाएं कि योगी ने ऐसा क्यों कहा!

क्या विगत एक शताब्दी में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांगलादेश में सनातन के साथ जो कुछ हो गया है और उन्हें निरीह पशुओं की तरह काट दिया गया है, उसे देखकर सनातन को अपने लिए सोचने का अधिकार नहीं है! क्या सनातन को अपने बचाव के लिए एक रहने का अधिकार नहीं है!

To Purchase This Book, Please Click On Image.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में और योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक मंच से जो कुछ कहा है, वही चिंता कुछ महीने पहले असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा भी सार्वजनिक रूप से प्रकट कर चुके हैं। उन्होंने देश को स्पष्ट शब्दों में बताया कि असम की डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है, कुछ ही दशकों में असम में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। यह मेरे लिए अस्तित्व का प्रश्न है।

क्या होता है, जब देश की डेमोग्राफी बदलती है! इसे समझने के लिए अयोध्या संसदीय क्षेत्र के चुनाव परिणाम को देखना पर्याप्त है। भाजपा जैसा मजबूत राजनीतिक दल, राममंदिर बनवाकर भी, धारा 370 हटाकर भी, निशुल्क आटा खिलाकर भी, अलग लद्दाख क्षेत्र बनवाकर भी, सिटीजनशिप अमेंडमेंट कानून लाकर भी, अयोध्या संसदीय क्षेत्र का चुनाव हार जाता है और अखिलेख यादव जैसा सनातन विरोधी नेता 37 सीटें पाकर एवं राहुल गांधी जैसा सनातन विरोधी नेता 99 सीटें पाकर सनातन धर्म वालों का संसद के भीतर और बाहर उपहास करते हैं, उसे हिंसक बताते हैं।

पूरी दुनिया में लेबनान देश में डेमोग्राफिक परिवर्तन से हुए विनाश की चर्चा हो रही है। कुछ दशक पहले तक लेबनान ईसाई देश हुआ करता था, चुपचाप वहाँ की डेमोग्राफी बदल दी गई। आज लेबनान मुस्लिम देश है। कभी इजराइल के समर्थन में खड़ा रहने वाला लेबनान आज इजराल से भयानक युद्ध कर रहा है।

इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि योगी आदित्यनाथ को यह क्यों कहना पड़ा कि बंटेंगे तो कटेंगे! योगी आदित्यनाथ ने यह बात राहुल गांधी और अखिलेश यादव आदि सनातन विरोधी राजनीति करने वाले नेताओं द्वारा की जा रही जातीय जनगणना की मांग के विरोध में कही है। जातीय जनगणना सनातन को बांटने का षड़यंत्र है।

देश में जातीय आधार पर लागू की गई आरक्षण व्यवस्था पहले ही सनातन को एससी, एसटी, ओबीसी और जनरल में बांट चुकी है, अब सनातन के बारीक टुकड़े करने की तैयारी है। हालांकि कांग्रेस इस दिशा में बहुत पहले से ही जुटी हुई है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि अंग्रेजों ने जब 1931 में जातीय आधारित जनगणना करवाई थी, तब भारत में 4147 जातियां पाई गई थीं किंतु कांग्रेस की सरकार द्वारा वर्ष 2011 के आर्थिक सर्वेक्षण में 46 लाख से अधिक जातियों के नामों की सूची तैयार करवाई गई थी।

इतना तो कोई भी सामान्य समझ वाला व्यक्ति जानता है कि भारत में 46 लाख जातियां नहीं रहतीं। कांग्रेस इस सूची की आड़ में क्या खेल करना चाहती थी, इसे समझना कठिन है।

राहुल गांधी, मुलायमसिंह के सुपुत्र अखिलेश यादव और चिराग पासवान आदि नेता जातीय जनगणना करवाकर उससे कौनसा सामाजिक अथवा आर्थिक लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं?

जातीय जनगणना के आधार पर न तो खेती की भूमि का फिर से बंटवारा होगा, न पशुपालकों की भैंसें बांटी जाएंगी। ट्रैक्टर भी जहाँ खड़े हैं, वहीं रहेंगे। लोकसभा में 545 के आसपास सीटें हैं, इन सीटों को हजारों अथवा लाखों जातियों में कैसे बांटा जाएगा! सरकार नौकरियों को भी जातीय आधार पर कैसे बांटा जाएगा।

जातीय जनगणना से केवल एक ही लक्ष्य प्राप्त होगा कि सनातन के सामाजिक ताने-बाने में असंतोष को चरम पर पहुंचाकर उसे आपस में ही लड़वा कर बिखेर दिया जाए। अतः योगी आदित्यनाथ की बात समय रहते सुनी जानी चाहिए। एक रहिए, नेक रहिए। सनानत को एक मजबूत शक्ति के रूप में स्थापित कीजिए।

सनातन के सामाजिक एवं आर्थिक ताने-बाने को सुधारने के लिए वैज्ञानिक पद्धति से एवं योजनाबद्ध ढंग से काम किया जाना चाहिए न कि जातीय जनगणना करवाकर भारत राष्ट्र के अस्तित्व के लिए कोई बड़ा खतरा पैदा करना चाहिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्

0
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् - bharatkaitihas.com
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्

भगवान् श्रीकृष्ण ने मानव जाति को ज्ञान, कर्म एवं भक्ति पर आधारित जीवन व्यतीत करने का मार्ग दिखाया। इस कारण कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् कहकर उनके अवदान की प्रतिष्ठा की जाती है।

विष्णु वैदिक देवों में एक हैं। उन्हें सृष्टिकर्त्ता, सृष्टिपालक एवं सृष्टिनियंता होने के साथ-साथ जीव को भवसागर से मुक्ति देने वाला परमात्मा कहा गया। इस कारण वेदों को मानने वालों में विष्णु की पूजा का प्रचलन हुआ। विष्णु को संकर्षण एवं वासुदेव भी कहा जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण इस जगत् में अवतार के रूप में प्रतिष्ठित हुए तो उन्हें संकर्षण होने के कारण श्रीकृष्ण कहा गया तथा वैकुण्ठवासी वासुदेव का अवतार माना गया। वसुदेव के पुत्र होने के कारण भी श्रीकृष्ण को वासुदेव कहा गया।

विष्णु तथा उनके अवतारों की पूजा करने वालों को वैष्णव कहा गया और उनका सम्प्रदाय भागवत धर्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रीकृष्ण-भक्ति का प्रभाव भारत की सीमाओं को पार करके सुदूर पूर्व एवं पश्चिम तक फैला। श्रीकृष्ण के मुख से निकली गीता दार्शनिक जगत की अमूल्य निधि घोषित हुई।

श्रीकृष्ण ने हिन्दुओं के दार्शनिक चिंतन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किये जिससे वैदिक धर्म का काया-कल्प होकर उसे लोक में अधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। श्रीकृष्ण के समय में ब्रजक्षेत्र में इन्द्रदेव की पूजा होती थी जो एक प्राचीन वैदिक देवता था और जिसके बारे में मान्यता थी कि इन्द्र अपनी पूजा से प्रसन्न होकर धरती पर वर्षा करता है तथा उसके अप्रसन्न होने से अतिवृष्टि अथवा अनावृष्टि होती है।

भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को अपने अलौकिक स्वरूप के दर्शन करवाकर निष्ठुर इन्द्रदेव की पूजा समाप्त करवा दी तथा वैदिक यज्ञों को पुनः प्रतिष्ठित किया। उन्होंने धर्मराज युधिष्ठर से सात्विक ढंग का राजसूय यज्ञ करवाया और झूठी पतलों को उठाने का कार्य स्वयं अपने हाथों से किया। श्रीकृष्ण ने राधारानी की प्रतिष्ठा को अपने समकक्ष करके लौकिक जगत में स्त्री-पुरुष के आध्यात्मिक भेद को समाप्त किया।

श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से ज्ञान, भक्ति एवं कर्म की त्रयी प्रवाहित की तथा मनुष्य को निरासक्त रहकर कर्म करने का उदपेश दिया। उन्होंने स्वयं ग्वाला बनकर गोपालों के साथ क्रीड़ की, गोपियों को प्रेम का संदेश दिया, तथा गायों की सेवा करके मनुष्य को सहज-सरल धर्म का पालन करने का मार्ग दिखाया। श्रीकृष्ण ने कंस आदि बुरी शक्तियों का संहार करके मनुष्य के समक्ष बुराइयों से लड़ने का मार्ग प्रशस्त किया।

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने धर्मनिष्ठ पाण्डवों को अतिशय विनम्रता के कारण उत्पन्न अकृमण्यता की स्थिति से बाहर निकाला तथा अपना नैसर्गिक अधिकार प्राप्त करने के लिए प्राणों की बाजी तक लगाने का उपदेश दिया।

श्रीकृष्ण ने ही भारत के समस्त अच्छे और बुरी क्षत्रियों को कुरुक्षेत्र के मैदान में खींचकर उनके बीच महाभारत जैसे विशाल युद्ध की रचना की किंतु युद्ध से पहले शांति के समस्त प्रयास भी किये। वे स्वयं शान्ति दूत बनकर दुर्योधन आदि के पास गए और अंत में महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर सारथी बनकर बैठ गए।

श्रीकृष्ण चाहते तो स्वयं भी लड़ सकते थे किंतु उन्होंने युद्ध न करके और सरथी बनके, मानव मात्र को संदेश दिया कि जीवन का संघर्ष जीव को स्वयं करना है, ईश्वर तो उसे कर्म करने की छूट देता है तथा स्वयं उस कर्म का साक्षी बनकर उसके कर्मों एवं उसकी वृत्ति के अनुसार उसे कर्म का फल देता है।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध अर्थात् कर्म करने के लिए प्रेरित करते समय ईश् एवं जीव के वास्तविक स्वरूप, उनके परस्पर सम्बन्ध एवं मानव के लिए करणीय कर्म आदि का ज्ञान करवाया। ऐसा करने के लिए उन्होंने समस्त उपनिषदों का ज्ञान निचोड़कर अर्जुन के समक्ष बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत किया। इसी कारण गीता के लिए कहा जाता है-

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।

अर्थात्- श्रीकृष्ण रूपी गोपाल ने उपनिषदों रूपी गायों को दुह कर गीता रूपी अमृत प्राप्त किया, अर्जुन रूपी बछड़े ने उस अमृत का पान किया।

श्रीकृष्ण ने यादव वंश में जन्म लिया था। पुराणों में यादवों को क्षत्रिय, गौपालक एवं आभीर नामक तीन जातियों में रखा है। श्रीकृष्ण ने क्षत्रिय होने के कारण प्रजा की रक्षा करने का धर्म निभाया, पशुपालक जैसे छोटे कहे जाने वाले वंश में जन्म लेकर मानव मात्र में सहयोग एवं मैत्री का मार्ग दिखाया। यदि यादवों को आभीर स्वीकार कर लिया जाए तो श्रीकृष्ण विदेशी कुल में अवतार लेने वाले, विष्णु के पहले अवतार थे।

श्रीकृष्ण ने अपनी शरण में आने वाले मानवों के योगक्षेम वहन करने का आश्वासन दिया जिसका आशय यह है कि वे ब्राह्मण से लेकर स्त्री एवं शूद्र तक समस्त मानवों को अपनी शरण में लेते हैं तथा उनका योगक्षेम वहन करते हैं। श्रीकृष्ण ने कर्मयोग पर दृढ़ रहने वालों के लिए समान रूप से मुक्ति के द्वार खोल दिये।

जन साधारण ने कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् कहकर श्रीकृष्ण को अपना रक्षक एवं गुरु माना-

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।

ज्ञान, कर्म एवं योग को जीवन का अंग बनाने का उपदेश श्रीकृष्ण से पहले किसी और दार्शनिक, चिंतक एवं समाज सुधारक ने नहीं दिया इसलिए श्रीकृष्ण ही वे प्रथम दार्शनिक थे जिनकी वंदना कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् कहकर की गई।

श्रीकृष्ण के प्रयासों से वैदिक धर्म ने नया रूप धारण किया। मन की उदारता और हृदय की विशालता को हिन्दुओं ने अपनी संस्कृति का अभिन्न अंग बना लिया। इसी उदारता और विशालता के कारण हिन्दुओं ने जैनियों के तीर्थंकर आदिनाथ ऋषभदेव को एवं तथागत बुद्ध को भी विष्णु के अवतारों में स्वीकार कर लिया।

भगवान श्रीकृष्ण का आविर्भाव भगवान श्रीराम के लगभग दो हजार साल बाद हुआ किंतु सनातन धर्म में अवतारवाद की धारणा श्रीकृष्ण के आविर्भाव के बाद ही आई क्योंकि वाल्मीकि रामायण लिखे जाने तक भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम एवं महापुरुष माना जाता था।

पुराणों की रचना श्रीकृष्ण के आविर्भाव के बहुत बाद में हुई। पुराणों में ही अवतारवाद की संकल्पना स्वीकार की गई। पुराणों ने ही विष्णु के दशावतारों की संकल्पना हिन्दू समाज के समक्ष रखी। पुराणों ने ही सबसे पहले मर्यादा पुरुषोत्तम राम को विष्णु का अवतार स्वीकार किया। पुराणों ने ही देवकीनंदन श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार घोषित किया।

पुराणों की रचना से पहले महाभारत की रचना हो चुकी थी, अतः पुराणों की दशावतार की संकल्पना के आधार पर मूल महाभारत का कई बार पुनर्लेखन हुआ। वाल्मीकि रामायण में भी बहुत से परिवर्तन करके श्रीराम को परब्रह्म परमेश्वर श्री विष्णु का अवतार घोषित किया गया।

जैन साहित्य में उल्लेख मिलता है कि महावीर स्वामी एक बार श्रीकृष्ण मन्दिर में ठहरे। इससे स्पष्ट है कि आज से 2600 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण को भगवान के रूप में पूजा जाता था।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने केवल सनातन धर्म को अपति सम्पूर्ण मानवता को ज्ञान, कर्म एवं भक्ति की त्रयी पर चलने का व्यावहारिक, दार्शनिक एवं तात्विक मार्ग दिखाया। इस कारण वे लोक में पूज्य हैं तथा कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् कहकर वंदना किए जाने के योग्य हैं।

छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ

0
छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ - www.bharatkaitihas.com
छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ

छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक में हिन्दू हृदय सम्राट छत्रपति शिवाजी राजे की जीवनी, इतिहास, उपलब्धियों एवं संघर्षों को उस काल की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है

प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी केन्द्र में तथा भारत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित महाराष्ट्र में भारत की कई महान् विभूतियों का जन्म हुआ है। ई.1630 में इसी महाराष्ट्र प्रदेश में छत्रपति महाराज शिवाजी राजे का जन्म हुआ। उनका वास्तविक नाम शिवाजी भौंसले था। उनके जन्म से सवा चार सौ साल पहले से भारत विचित्र राजनीतिक परिस्थितियों में फंसा हुआ था।

उत्तर भारत पर ई.1206 से 1526 तक कट्टर सुन्नी तुर्कों ने शासन किया। उन्होंने बड़ी संख्या में हिन्दुओं को निर्धनता और दुर्भाग्य के समुद्र में डुबोकर मुसलमान बना लिया था। ई.1526 से दिल्ली पर समरकंद से आए मंगोल शासन कर रहे थे। वे भी तुर्क थे तथा दिल्ली सल्तनत के तुर्कों की तरह कट्टर सुन्नी मुसलमान थे।

भारत में मुगलिया राज्य के संस्थापक बाबर ने भारत को दारूल-हरब (काफिरों का देश) घोषित किया तथा स्वयं को जेहाद (धार्मिक यात्रा) पर बताया जिसका उद्देश्य काफिरों को मारना या मुसलमान बनाना होता है। उसके पौत्र अकबर ने उत्तर भारत के अधिकांश प्रबल हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करके उनकी राजकुमारियों से या तो स्वयं ने विवाह कर लिए या अपने पुत्र सलीम के साथ कर दिये।

अकबर की इसी नीति को आजकल अकबर की हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा उदारता कहा जाता है। जबकि मुगलों के हरम में गईं इन हिन्दू राजकुमारियों की कोख से जन्मे तुर्क शहजादों ने हिन्दुओं को पहले से कहीं अधिक दुर्भाग्य, निर्धनता और मृत्यु प्रदान की।

To purchase this book please click on image.

उत्तर भारत में चित्तौड़ का प्रबल राज्य सदियों से शासन करता आया था जिसने मुगलों के समक्ष घुटने टेकने तथा अपनी कन्याओं के विवाह मुसलमानों के साथ करने से मना कर दिया। इसलिए अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग में तीस हजार से अधिक हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया। उसने हिन्दू राजाओं को अपना सेनापति नियुक्त किया तथा हिन्दुओं के हाथों ही हिन्दुओं को मरवाया। इसके बदले में उसने हिन्दुओं पर से जजिया हटाया ताकि हिन्दू राजा एवं इतिहासकार, अकबर की उदारता के गुण गाते रह सकें।

अकबर के पुत्र जहांगीर ने भी हिन्दुओं को नष्ट करने की यही रेशमी फंदे वाली नीति अपनाई। जहांगीर के पुत्र शाहजहाँ को भारतीय इतिहासकारों ने प्रेम का देवता घोषित किया किंतु कड़वी सच्चाई यह है कि शाहजहाँ ने बड़ी संख्या में हिन्दुओं का संहार करवाया तथा हिन्दू मंदिर तुड़वाए। शाहजहाँ का पुत्र औरंगजेब कट्टर सुन्नी बादशाह सिद्ध हुआ। उसने भारत से काफिरों को समाप्त करके दारूल-इस्लाम अर्थात् मुस्लिम राज्य की स्थापना करने का काम तेजी से आगे बढ़ाया। औरंगजेब ने भारत के हिन्दुओं पर जजिया तथा तीर्थकर फिर से लगा दिए जिन्हें अकबर ने समाप्त कर दिया था।

इस काल में दक्षिण भारत, पांच छोटे-छोटे मुस्लिम राज्यों में बंटा हुआ था। बरार में इमादशाही राज्य, अहमदनगर में निजामशाही राज्य, बीजापुर में आदिलशाही राज्य, गोलकुण्डा में कुतुबशाही राज्य तथा बीदर में बरीदशाही वंश के शासक राज्य करते थे। इन पांचों राज्यों के शासक शिया थे।

इन शिया मुस्लिम राज्यों ने दक्षिण भारत के शक्तिशाली विजयनगर हिन्दू साम्राज्य का अंत कर दिया और हिन्दू-प्रजा को लूटकर अपने महल खजानों से भर लिए। उन्होंने इस पूरे क्षेत्र में हिन्दुओं के सैंकड़ों तीर्थों एवं हजारों देवालयों को नष्ट कर दिया। एक तरफ तो दक्षिण भारत के शिया राज्य, दक्षिण के हिन्दुओं को नष्ट कर रहे थे तो दूसरी ओर उत्तर भारत के कट्टर सुन्नी शासक, इन शिया राज्यों को फूटी आंखों से भी नहीं देखना चाहते थे। सुन्नी शासकों की दृष्टि में शिया भी वैसे ही काफिर थे जैसे कि हिन्दू।

उत्तर एवं दक्षिण भारत की इन्हीं परिस्थितियों के काल में छत्रपति शिवाजी का जन्म अहमदनगर के निजामशाह राज्य के प्रभावशाली जागीरदार शाहजी भौंसले के दूसरे पुत्र के रूप में हुआ। शिवाजी के जन्म के कुछ समय बाद शाहजी भौंसले ने शिवाजी की माता जीजाबाई को स्वयं से अलग करके शिवनेर दुर्ग में रख दिया क्योंकि जीजाबाई का पिता जाधवराय, निजामशाह के शत्रुओं अर्थात् मुगलों की सेवा में चला गया था।

ई.1636 में मुगलों ने अहमदनगर का राज्य समाप्त कर दिया तब शाहजी भौंसले ने अहमदनगर छोड़ दिया तथा बीजापुर राज्य में जाकर नौकरी कर ली। जीजाबाई के पिता जाधवराय की भी जल्दी ही मृत्यु हो गई, इस कारण जीजाबाई का वह आश्रय भी समाप्त हो गया और वह कई वर्षों तक अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए जंगलों में बने किलों में भटकती रहीं।

मुगल सेनाएं शाहजी के पुत्र शिवा को मार डालना चाहती थीं क्योंकि शाहजी भौंसले, पहले तो निजामशाह की ओर से और अब आदिलशाह की ओर से मुगलों का शत्रु था। बालक शिवा कई बार मुगल सिपाहियों के हाथों में पड़ते-पड़ते बचा किंतु जीजाबाई के धैर्य और साहस से प्रत्येक बार, बालक शिवा के प्राणों की रक्षा हुई।

इस प्रकार शिवाजी ने अपने बाल्यकाल में ही मुस्लिम सैनिकों द्वारा किए जा रहे हिन्दू-प्रजा के कत्ल और शोषण को बहुत निकट से देखा। इन्हीं परिस्थितियों में शिवाजी 16 साल के हो गए और उन्होंने हिन्दू-प्रजा के उद्धार के लिए स्वयं को तैयार करने तथा किलों को जीतने के लिए सेना बनाने का निश्चय किया।

पुराने किलों को जीतने और नए किलों को बनाने के लिए यह आयु बहुत कम थी, किंतु शिवाजी के निश्चय उनकी आयु से कहीं बहुत आगे थे। उनके हृदय में भारत की निरीह जनता के लिए पीड़ा थी। इसी पीड़ा को दूर करने के लिए उन्होंने मुस्लिम राज्यों को समाप्त करके हिन्दू राज्य की स्थापना का सपना देखा जिसे वह ‘हिन्दू पदपादशाही’ कहते थे।

शिवाजी का मानना था कि मुगल अजेय नहीं हैं, उन्हें यह प्रेरणा अपने पिता शाहजी से मिली थी। शाहजी ने भी, अहमदनगर तथा बीजापुर के लिए मुगलों के विरुद्ध संघर्ष किया था और मुगलों के दांत खट्टे किए थे, जिससे शाहजी की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई थी। शाहजी की प्रेरणा से शिवाजी के नेतृत्व में मराठा शक्ति का फिर से उदय हुआ।

दक्षिण भारत में बहमनी राज्य की स्थापना से पहले मराठे ही इस क्षेत्र पर शासन करते थे। जीवन-पर्यंत किए गए संघर्ष के बल पर शिवाजी ने स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना की। औरंगजेब जैसा क्रूर एवं मदांध शासक भी शिवाजी द्वारा संगठित की गई मराठा शक्ति का दमन नहीं कर सका। अंत में यह मराठा शक्ति भारत से मुगल शासन को उखाड़ फैंकने के लिए यम की फांस सिद्ध हुई।

छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ पुस्तक में सत्रहवीं शताब्दी के महानायक छत्रपति महाराज शिवाजी राजे की जीवनी के साथ-साथ उनके संघर्ष एवं उनकी उपलब्धियों का ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर लेखन एवं विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक में शिवाजी के समकालीन लेखकों द्वारा लिखे गए तथ्यों को काम में लेने का यथासंभव प्रयास किया गया है। शिवाजी के समकालीन ग्रंथों में से कुछ ग्रंथों का उल्लेख किया जाना समीचीन होगा जिनमें मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ), नुश्खा-ए-दिलकुशा, स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) आदि प्रमुख हैं।

औरंगजेब ने अपने समय का इतिहास लिखने पर पाबन्दी लगा दी थी परन्तु मोहम्मद हाशिम खाफी खाँ नामक एक मुगल सेनापति ने गुप्त रूप से मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफी खाँ) नामक ग्रन्थ की रचना की। यह एक विशाल ग्रन्थ है जो ई.1519 में बाबर के समरकंद एवं फरगना आक्रमणों से आरम्भ होकर बाबर के वंशज मुहम्मदशाह रंगीला के शासन के 14वें साल के इतिहास के साथ समाप्त होता है।

इस ग्रन्थ का महत्व ई.1605 से 1733 तक की घटनाओं, विशेषतः औरंगजेब के शासनकाल के आरम्भ (ई.1658) से लेकर औरंजबेब के शासनकाल के अंत (ई.1707) तक के लिए अधिक है। उसने औरंगजेब की धार्मिक नीति का समर्थन और छत्रपति शिवाजी की निन्दा की है। औरंगजेब के समकालीन प्रसिद्ध हिन्दू सेनापति भीमसेन ने नुश्खा-ए-दिलकुशा नामक फारसी ग्रंथ में औरंगजेब के शासनकाल का आंखों देखा इतिहास लिखा।

उसने महाराजा जसवन्तसिंह राठौड़ तथा दलपतराव बुल्देला के अधीन काम किया था। उसने दक्षिण के युद्धों तथा औरंगजेब के बाद लड़े गए उत्तराधिकार युद्ध को अपनी आँखों से देखा था। उसने शिवाजी की गतिविधियों तथा उनकी संगठन प्रतिभा का अच्छा वर्णन किया है।

यूरोपीय पर्यटक जॉन फ्रॉयर शिवाजी के जीवन काल में भारत घूमने आया। उसने अपनी आंखों से मुगलों की सेनाओं को शिवाजी का राज्य बर्बाद करते हुए देखा। उसने भारत में हुए अनुभवों के आधार पर ‘न्यू एकाउंट ऑफ ईस्ट इण्डिया कम्पनी एण्ड पर्शिया’ नामक एक पुस्तक लिखी।

इस पुस्तक में एक स्थान पर उसने लिखा है- ‘मुगल सेनाएं अपने मार्ग में आने वाली हर चीज को गिरा देती थीं। गांव के गांव जलाए जा रहे थे। खेतों में खड़ी मक्का की फसलें भूमि पर गिराई जा रही थीं। पशुओं को पकड़कर मुगलों के राज्य को ले जाया जा रहा था तथा शिवाजी के राज्य में रहने वाले स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों को बलपूर्वक दास बनाया जा रहा था।’

औरंगजेब के समय में इटली के वेनिस नगर का निवासी निकोलोआ मनूची ई.1650 में सूरत होता हुआ दिल्ली पहुँचा। वह तुर्की और फारसी भाषाओं का ज्ञाता था। उसने लम्बे समय तक भारत में प्रवास किया तथा औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह की तरफ से उत्तराधिकार के युद्ध में भाग लिया।

जब दारा, औरंगजेब से पराजित होकर सिन्ध की ओर पलायन कर गया तो निकोलोआ मनूची भी उसके साथ सिन्ध तक गया था। मनूची वहाँ से वापस दिल्ली होते हुए कश्मीर आया और वहाँ से बिहार तथा बंगाल के भ्रमण पर गया।

कुछ समय के लिए उसने दिल्ली तथा आगरा में चिकित्सक का कार्य भी किया। उसने मिर्जा राजा जयसिंह के द्वारा छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध किए गए अभियान में भाग लिया। उसने स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) नामक पुस्तक लिखी जिसमें शिवाजी के समय का आंखों देखा इतिहास भी उपलब्ध है।

आधुनिक इतिहासकारों में जदुनाथ सरकार ने शिवाजी के संघर्ष और उपलब्धियों का अच्छा वर्णन किया है। आधुनिक काल के अनेक मराठी एवं अंग्रेजी लेखकों ने भी शिवाजी के संघर्ष एवं उपलब्धियों को निरपेक्ष होकर लिखा है।

शिवाजी और मुगलों के बीच बहुत लम्बा-चौड़ा पत्र व्यवहार हुआ जिनसे हार-जीत के दावों को सफलतापूर्वक कसौटी पर कसा जा सकता है। इन ग्रंथों एवं पत्रों का उपयोग करते हुए इस ग्रंथ का प्रणयन किया गया है तथा सत्रहवीं शताब्दी के उस अप्रतिम, अतुल्य एवं महान राजा शिवाजी को विनम्र श्रद्धांजलि देने का प्रयास किया गया है।

छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ को लिखते समय मुझे शिवाजी के पिता शाहजी का जीवन चरित्र पढ़ने का अवसर मिला। मुझे यह देखकर दुःख हुआ कि भारत के इस वीर योद्धा के प्रति इतिहासकारों ने बहुत अन्याय किया है जिसके कारण विद्यालयी एवं विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में शाहजी की छवि नकारात्मक बन गई है।

उन्हें शिवाजी तथा उनकी माता जीजाबाई को त्यागने वाला तथा मुसलमान बादशाहों की नौकरी करने वाला साधारण एवं छोटा सा सेनानायक बताया गया है। जबकि शाहजी अपने समय में भारत के विख्यात योद्धाओं में गिने जाते थे। छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ पुस्तक में उस अप्रतिम योद्धा के सम्बन्ध में ऐतिहासिक तथ्यों का पता लगाकर सत्य को सामने लाने का प्रयास किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रेरक एवं रोचक प्रसंग

0
सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
सरदार वल्लभ भाई पटेल

सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रेरक एवं रोचक प्रसंग शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक में स्वतंत्रता सेनानी एवं आधुनिक भारत के निर्माता सरदार पटेल के जीवन से जुड़े हुए 117 रोचक प्रसंग लिखे गए हैं जिनमें सरदर वल्लभ भाई पटेल के विराट् व्यक्त्वि के दर्शन होते हैं।

आधुनिक भारत के निर्माताओं में सबसे पहला नाम यदि किसी व्यक्ति का लिया जा सकता है तो वे हैं- सरदार वल्लभ भाई पटेल। अंग्रेजों ने जिस भारत को आजाद किया था, वह भारत 566 रियासतों, 11 ब्रिटिश प्रांतों एवं 6 ब्रिटिश शासित कमिश्नरियों में बंटा हुआ था।

इन रियासतों, प्रांतों एवं कमिश्नरियों में रहने वाली जनता अपनी पहचान इन्हीं प्रशासनिक इकाइयों से समझती थी। इस कारण जिस प्रकार पाकिस्तान भारत से अलग हुआ था, उसी प्रकार रियासतें एवं ब्रिटिश प्रांत भी भारत से अलग हो सकते थे। पाकिस्तान में जाने से शेष बचे प्रांतों, रियासतों एवं कमिश्नरियों को जोड़कर एक देश का निर्माण करना सरल कार्य नहीं था किंतु पटेल ने यह कर दिखाया।

सरदार पटेल के व्यक्तित्व का आकर्षण न केवल उस समय के ब्रिटिश शासकों, भारतीय नेताओं और देशवासियों के सिर चढ़कर बोलता था अपितु आज भी देशवासियों के दिलों की धड़कनें बढ़ा देता है। आने वाले अनेक युगों तक पटेल, देशवासियों के लिये श्रद्धा और आदर का पात्र बने रहेंगे।

वे गुजरात के एक छोटे से गांव में जन्मे और उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति से लोहा लेकर देश को आजादी दिलवाने में अग्रणी भूमिका निभाई। देश की आजादी में भूमिका निभाने वाले और भी सैंकड़ों नेता थे किंतु सरदार पटेल ने स्वातंत्र्य समर में प्रखर राष्ट्रवाद का जो अनोखा तत्व घोला, वैसा तत्व बहुत कम नेता घोल पाये।

यह सही समय है जब देश के नौजवानों तक सरदार पटेल की पूरी कहानी पहुँचे। कौन थे पटेल? क्या किया था उन्होंने? क्यों वे ऐसा कुछ कर सके जो दूसरे नेता नहीं कर सके? कैसे उन्होंने अपने युग के बड़े नेताओं की भीड़ में स्वयं को अलग पहचान दी? कैसे हाड़-मांस से बने लोहे के सरदार ने भारत में रह गई 562 रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत राष्ट्र का निर्माण किया।

वे राष्ट्र के अनोखे सपूत थे, राष्ट्रहित के लिये किसी से भी टक्कर ले लेते थे और स्वहित के लिये कभी किसी से कुछ नहीं मांगते थे। उन्होंने संघर्ष, जेल और यातनाओं को अपने लिये रखा तथा स्वतंत्रता के श्रेय से लेकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक को दूसरों के लिये अर्पित कर दिया।

सोने का दिल और लोहे के हाथों वाले इस अनोखे नेता की पूरी कहानी पढ़िये इस पुस्तक में।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध

0
भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या www.bharatkaitihas.com
भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या

इस पुस्तक में भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया है।

हिन्दू धर्म, भारतवर्ष की भूमि पर आकार लेने वाला प्रथम धर्म है। जब हम भारतवर्ष की बात करते हैं तो उसका आशय आज के ‘यूनियन ऑफ इण्डिया जो कि भारत’ से नहीं अपितु हिन्दुकुश पर्वत से लेकर आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांगला देश, बर्मा, थाईलैण्ड, श्रीलंका, मलेशिया, वियतनाम, कम्बोडिया आदि देशों एवं जावा, सुमात्रा तथा बाली आदि इण्डोनेशियाई द्वीपों से है।

भारत वर्ष की धरती पर प्रकट हुआ यह धर्म वैदिक धर्म के रूप में प्रकट हुआ जिसमें से अनेकानेक शाखाएं विकसित हुईं जो सम्मिलित रूप से सनातन धर्म के नाम से जानी गईं। इस धर्म की मुख्य शाखा भागवत धर्म तथा ब्राह्मण धर्म के नाम से विख्यात हुई। यही सनातन धर्म अथवा ब्राह्माण धर्म, भारत भूमि के साथ सिमटता हुआ अब ‘यूनियन ऑफ इण्डिया जो कि भारत’ में हिन्दू धर्म कहलाता है।

To purchase this book please click on image

हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप इतना उदार, व्यापक, सहिष्णु, परोपकारी एवं समावेशी भाव लिए हुए है कि इसका कोई आकार-प्रकार निश्चित नहीं है। तेतीस करोड़ देवी देवताओं वाले इस धर्म में, किसी भी हिन्दू धर्मावलम्बी पर यह दबाव नहीं डाला जाता कि वह किसी निश्चित देवता की पूजा करे या किसी निश्चित प्रकार की पूजा पद्धति काम में ले। या कि वह किसी निश्चित धार्मिक पुस्तक को पढ़े या किसी निश्चित प्रकार से विवाह करे या वह किसी निश्चित प्रकार से शव की अंत्येष्टि करे।

हिन्दू धर्म के अंतर्गत समाहित भिन्न-भिन्न पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग, सामूहिक रूप से विभिन्न धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं। कुछ हिन्दू, शव का दहन करते हैं तो कुछ मिट्टी में गाढ़ते हैं तो कुछ हिन्दू, शव को जल में बहा देते हैं। कुछ हिन्दू मतावलम्बी देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा करते हैं, कुछ नहीं करते हैं। कुछ हिन्दू, वेद और ईश्वर को मानते हैं और कुछ हिन्दू, वेद या ईश्वर को नहीं मानते हैं, फिर भी वे सब हिन्दू धर्म के भीतर बने हुए हैं।

वैदिक देवी-देवताओं से लेकर पौराणिक देवी-देवताओं को मानने वाले तथा लोक देवियों एवं लोक देवताओं को मानने वाले, सभी लोग समान रूप से हिन्दू कहलाते हैं। विभिन्न क्षेत्रों के हिन्दुओं के खान-पान, वेषभूषा, वैवाहिक पद्धतियां, रीति-रिवाज एवं परम्पराएं अलग हैं। उत्तर भारत के हिन्दू, मामा की लड़की तथा मामा के गौत्र की लड़की से विवाह करने को पाप मानते हैं तो दक्षिण भारत में मामा की लड़की से विवाह करना अत्यंत साधारण बात है।

हिन्दू धर्म की इतनी विविधताओं के कारण ही हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में कहा जाता है कि यह धर्म नहीं, जीवन शैली है। युगों-युगों से चले आने के कारण इसे सनातन धर्म भी कहते हैं। बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई पंथ इसी धर्म से निकले और पृथक् धर्म के रूप में पहचान बनाने में सफल रहे। आगे चलकर कबीर पंथियों, दादू पंथियों, ब्रह्म समाजियों एवं आर्य समाजियों आदि ने भी अपने आप को सनातन हिन्दू धर्म से अलग दिखाने की चेष्टा की जो आज तक जारी है। वर्तमान समय में वीर शैव, लिंगायत जैसे पुराने सम्प्रदाय तथा नारायण स्वामी एवं ब्रह्मकुमारी जैसे नवोद्भव सम्प्रदाय भी हिन्दू धर्म से विलग दिखने का प्रयास कर रहे हैं।

इस्लाम तथा ईसाई मत भारत में बाहर से आए। इस्लाम ने आक्रांताओं के धर्म के रूप में भारत में प्रवेश किया। आक्रांता तो शक, कुषाण, हूण, बैक्ट्रियन तथा यूनानी भी थे किंतु उन्होंने इस देश में अपना धर्म थोपने के स्थान पर भारत के स्थानीय धर्मों को अपना लिया। उनमें से कुछ शैव, वैष्णव अथवा बौद्ध हो गए तो कुछ जैन। जबकि इस्लाम को मानने वाले आक्रांताओं ने ऐसा नहीं किया। वे न केवल स्वयं के लिए इस्लाम को एकमात्र विकल्प के रूप में देखते थे अपितु उन्होंने भारत की जनता में भी इस्लाम के बलपूर्वक प्रसार का प्रयास किया।

यदि इस्लाम भारत की भूमि पर उत्पन्न हुआ होता तथा इस्लाम के अनुयाइयों ने कट्टरता नहीं दिखाई होती तो संभवतः हिन्दुओं और मुसलमानों तथा सिक्खों और मुसलमानों के बीच इतनी व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा नहीं हुई होती। इस्लाम की इस कट्टरता के चलते न तो मुसलमान कभी यह भूल पाए कि उनकी पहचान इस्लाम से है और न हिन्दू कभी भूल पाए कि इस्लाम आक्रांताओं का धर्म है।

इस्लामी आक्रांताओं द्वारा बल-पूर्वक भारत की जनता को इस्लाम में प्रवेश कराने के प्रयासों के कारण भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या आठवीं शताब्दी इस्वी में उत्पन्न हुई जिसका विकास पूरे मुस्लिम शासन काल में होता रहा। मुसलमानों द्वारा साम्प्रदायिकता की समस्या को इतना अधिक बढ़ाया गया कि देश में करोड़ों लोग हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान बन गए ताकि उन्हें सुरक्षा तथा रोजगार प्राप्त हो। जो लोग हिन्दू बने रहे, वे निर्धनता, दुर्भाग्य और मृत्यु के अंधेरों में धकेल दिए गए।

ईसाई धर्म यद्यपि पंद्रहवीं शताब्दी में भारत में प्रवेश कर गया था किंतु ईसाइयों ने सामान्यतः तलवार के जोर पर अपने धर्म का प्रसार नहीं किया। वे एक हाथ में धर्म का तथा दूसरे हाथ में व्यापार का झण्डा रखते थे, धर्म का झण्डा उन्होंने भी पकड़ने का प्रयास किया किंतु इस पर अधिक जोर नहीं दिया। जब अठारहवीं शताब्दी में उन्होंने भारत में राजनीतिक शक्ति प्राप्त की तब भी वे ईसाई धर्म के प्रसार के बारे में कम ही उत्सुक थे।

उनका पूरा जोर भारत से धन बटोरने और अपने राज्य को मजबूत करने में लगा रहा किंतु जब बीसवीं सदी में भारत में स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर पहुंचने लगा, तब अँग्रेजों ने हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच की साम्प्रदायिक समस्या को देश पर राज्य करने के मजबूत हथियार के रूप में काम में लिया जिससे यह समस्या मध्यकाल की ही तरह विकराल स्वरूप को प्राप्त हो गई।

अंग्रेजों द्वारा, साम्प्रदायिकता की समस्या को इतनी हवा दी गई कि यह समस्या हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन कर खड़ी हो गई। इस कारण देश की प्रजा को स्वाधीनता प्राप्त करने में अधिक पसीना बहाना पड़ा तथा स्वातंत्र्य-रथ मंद गति से आगे बढ़ा। ऐसा कई बार हुआ जब निकट आती हुई स्वतंत्रता, साम्प्रदायिकता की समस्या के कारण दूर खिसक गई।

इस समस्या के कारण देश का विभाजन हुआ और देश के तीन टुकड़े हुए। करोड़ों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। लाखों स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए तथा लाखों स्त्री-पुरुष एवं बच्चे मौत के घाट उतार दिए गए, तब कहीं जाकर भारत को आजादी मिली किंतु साम्प्रदायिकता की समस्या का अंत देश की आजादी के बाद भी नहीं हो सका।

आज भी देश की निरीह जनता साम्प्रदायिक हिंसक घटनाओं में बेरहमी से मारी जाती है। यह मानव मात्र की मानसिक समस्या है जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। जब तक साम्प्रदायिकता की समस्या के मूल कारणों को पहचानकर उनका वास्तविक समाधान नहीं ढूंढा जाएगा, तब तक न तो इस समस्या का उन्मूलन हो सकेगा और न मानव सुखी हो सकेगा।

आशा है इस पुस्तक को लिखने में लगा मेरा श्रम विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं रुचिवान पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...