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भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध

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भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या

इस पुस्तक में भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया है।

हिन्दू धर्म, भारतवर्ष की भूमि पर आकार लेने वाला प्रथम धर्म है। जब हम भारतवर्ष की बात करते हैं तो उसका आशय आज के ‘यूनियन ऑफ इण्डिया जो कि भारत’ से नहीं अपितु हिन्दुकुश पर्वत से लेकर आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांगला देश, बर्मा, थाईलैण्ड, श्रीलंका, मलेशिया, वियतनाम, कम्बोडिया आदि देशों एवं जावा, सुमात्रा तथा बाली आदि इण्डोनेशियाई द्वीपों से है।

भारत वर्ष की धरती पर प्रकट हुआ यह धर्म वैदिक धर्म के रूप में प्रकट हुआ जिसमें से अनेकानेक शाखाएं विकसित हुईं जो सम्मिलित रूप से सनातन धर्म के नाम से जानी गईं। इस धर्म की मुख्य शाखा भागवत धर्म तथा ब्राह्मण धर्म के नाम से विख्यात हुई। यही सनातन धर्म अथवा ब्राह्माण धर्म, भारत भूमि के साथ सिमटता हुआ अब ‘यूनियन ऑफ इण्डिया जो कि भारत’ में हिन्दू धर्म कहलाता है।

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हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप इतना उदार, व्यापक, सहिष्णु, परोपकारी एवं समावेशी भाव लिए हुए है कि इसका कोई आकार-प्रकार निश्चित नहीं है। तेतीस करोड़ देवी देवताओं वाले इस धर्म में, किसी भी हिन्दू धर्मावलम्बी पर यह दबाव नहीं डाला जाता कि वह किसी निश्चित देवता की पूजा करे या किसी निश्चित प्रकार की पूजा पद्धति काम में ले। या कि वह किसी निश्चित धार्मिक पुस्तक को पढ़े या किसी निश्चित प्रकार से विवाह करे या वह किसी निश्चित प्रकार से शव की अंत्येष्टि करे।

हिन्दू धर्म के अंतर्गत समाहित भिन्न-भिन्न पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग, सामूहिक रूप से विभिन्न धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं। कुछ हिन्दू, शव का दहन करते हैं तो कुछ मिट्टी में गाढ़ते हैं तो कुछ हिन्दू, शव को जल में बहा देते हैं। कुछ हिन्दू मतावलम्बी देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा करते हैं, कुछ नहीं करते हैं। कुछ हिन्दू, वेद और ईश्वर को मानते हैं और कुछ हिन्दू, वेद या ईश्वर को नहीं मानते हैं, फिर भी वे सब हिन्दू धर्म के भीतर बने हुए हैं।

वैदिक देवी-देवताओं से लेकर पौराणिक देवी-देवताओं को मानने वाले तथा लोक देवियों एवं लोक देवताओं को मानने वाले, सभी लोग समान रूप से हिन्दू कहलाते हैं। विभिन्न क्षेत्रों के हिन्दुओं के खान-पान, वेषभूषा, वैवाहिक पद्धतियां, रीति-रिवाज एवं परम्पराएं अलग हैं। उत्तर भारत के हिन्दू, मामा की लड़की तथा मामा के गौत्र की लड़की से विवाह करने को पाप मानते हैं तो दक्षिण भारत में मामा की लड़की से विवाह करना अत्यंत साधारण बात है।

हिन्दू धर्म की इतनी विविधताओं के कारण ही हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में कहा जाता है कि यह धर्म नहीं, जीवन शैली है। युगों-युगों से चले आने के कारण इसे सनातन धर्म भी कहते हैं। बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई पंथ इसी धर्म से निकले और पृथक् धर्म के रूप में पहचान बनाने में सफल रहे। आगे चलकर कबीर पंथियों, दादू पंथियों, ब्रह्म समाजियों एवं आर्य समाजियों आदि ने भी अपने आप को सनातन हिन्दू धर्म से अलग दिखाने की चेष्टा की जो आज तक जारी है। वर्तमान समय में वीर शैव, लिंगायत जैसे पुराने सम्प्रदाय तथा नारायण स्वामी एवं ब्रह्मकुमारी जैसे नवोद्भव सम्प्रदाय भी हिन्दू धर्म से विलग दिखने का प्रयास कर रहे हैं।

इस्लाम तथा ईसाई मत भारत में बाहर से आए। इस्लाम ने आक्रांताओं के धर्म के रूप में भारत में प्रवेश किया। आक्रांता तो शक, कुषाण, हूण, बैक्ट्रियन तथा यूनानी भी थे किंतु उन्होंने इस देश में अपना धर्म थोपने के स्थान पर भारत के स्थानीय धर्मों को अपना लिया। उनमें से कुछ शैव, वैष्णव अथवा बौद्ध हो गए तो कुछ जैन। जबकि इस्लाम को मानने वाले आक्रांताओं ने ऐसा नहीं किया। वे न केवल स्वयं के लिए इस्लाम को एकमात्र विकल्प के रूप में देखते थे अपितु उन्होंने भारत की जनता में भी इस्लाम के बलपूर्वक प्रसार का प्रयास किया।

यदि इस्लाम भारत की भूमि पर उत्पन्न हुआ होता तथा इस्लाम के अनुयाइयों ने कट्टरता नहीं दिखाई होती तो संभवतः हिन्दुओं और मुसलमानों तथा सिक्खों और मुसलमानों के बीच इतनी व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा नहीं हुई होती। इस्लाम की इस कट्टरता के चलते न तो मुसलमान कभी यह भूल पाए कि उनकी पहचान इस्लाम से है और न हिन्दू कभी भूल पाए कि इस्लाम आक्रांताओं का धर्म है।

इस्लामी आक्रांताओं द्वारा बल-पूर्वक भारत की जनता को इस्लाम में प्रवेश कराने के प्रयासों के कारण भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या आठवीं शताब्दी इस्वी में उत्पन्न हुई जिसका विकास पूरे मुस्लिम शासन काल में होता रहा। मुसलमानों द्वारा साम्प्रदायिकता की समस्या को इतना अधिक बढ़ाया गया कि देश में करोड़ों लोग हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान बन गए ताकि उन्हें सुरक्षा तथा रोजगार प्राप्त हो। जो लोग हिन्दू बने रहे, वे निर्धनता, दुर्भाग्य और मृत्यु के अंधेरों में धकेल दिए गए।

ईसाई धर्म यद्यपि पंद्रहवीं शताब्दी में भारत में प्रवेश कर गया था किंतु ईसाइयों ने सामान्यतः तलवार के जोर पर अपने धर्म का प्रसार नहीं किया। वे एक हाथ में धर्म का तथा दूसरे हाथ में व्यापार का झण्डा रखते थे, धर्म का झण्डा उन्होंने भी पकड़ने का प्रयास किया किंतु इस पर अधिक जोर नहीं दिया। जब अठारहवीं शताब्दी में उन्होंने भारत में राजनीतिक शक्ति प्राप्त की तब भी वे ईसाई धर्म के प्रसार के बारे में कम ही उत्सुक थे।

उनका पूरा जोर भारत से धन बटोरने और अपने राज्य को मजबूत करने में लगा रहा किंतु जब बीसवीं सदी में भारत में स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर पहुंचने लगा, तब अँग्रेजों ने हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच की साम्प्रदायिक समस्या को देश पर राज्य करने के मजबूत हथियार के रूप में काम में लिया जिससे यह समस्या मध्यकाल की ही तरह विकराल स्वरूप को प्राप्त हो गई।

अंग्रेजों द्वारा, साम्प्रदायिकता की समस्या को इतनी हवा दी गई कि यह समस्या हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन कर खड़ी हो गई। इस कारण देश की प्रजा को स्वाधीनता प्राप्त करने में अधिक पसीना बहाना पड़ा तथा स्वातंत्र्य-रथ मंद गति से आगे बढ़ा। ऐसा कई बार हुआ जब निकट आती हुई स्वतंत्रता, साम्प्रदायिकता की समस्या के कारण दूर खिसक गई।

इस समस्या के कारण देश का विभाजन हुआ और देश के तीन टुकड़े हुए। करोड़ों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। लाखों स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए तथा लाखों स्त्री-पुरुष एवं बच्चे मौत के घाट उतार दिए गए, तब कहीं जाकर भारत को आजादी मिली किंतु साम्प्रदायिकता की समस्या का अंत देश की आजादी के बाद भी नहीं हो सका।

आज भी देश की निरीह जनता साम्प्रदायिक हिंसक घटनाओं में बेरहमी से मारी जाती है। यह मानव मात्र की मानसिक समस्या है जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। जब तक साम्प्रदायिकता की समस्या के मूल कारणों को पहचानकर उनका वास्तविक समाधान नहीं ढूंढा जाएगा, तब तक न तो इस समस्या का उन्मूलन हो सकेगा और न मानव सुखी हो सकेगा।

आशा है इस पुस्तक को लिखने में लगा मेरा श्रम विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं रुचिवान पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत की लुप्त सभ्यताएँ

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भारत की लुप्त सभ्यताएँ

भारत की लुप्त सभ्यताएँ शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक में बंदर के आदमी में बदलने की प्रक्रिया से लेकर हर्ष के काल तक विकसित हुई सभ्यताओं का इतिहास लिखा गया है।

विगत डेढ़ करोड़ वर्ष के कालखण्ड में भारत की धरती पर इतनी सभ्यताएँ प्रकट एवं लुप्त हुई हैं कि यदि भारत को प्राक्-सभ्यताओं एवं प्राच्य-संस्कृतियों का संग्रहालय कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जैसे-जैसे पुरातत्व की खुदाइयाँ एवं इतिहास सम्बन्धी शोध-कार्य आगे बढ़ रहे हैं, इस क्षेत्र में नवीन जानकारियाँ उजागर होती जा रही हैं। इनके आधार पर कहा जा सकता है कि धरती के गर्भ में अभी बहुत सी सभ्यताओं के स्थल दबे पड़े हैं।

भारत की लुप्त सभ्यताओं को, अध्ययन की सुविधा के लिए दो भागों में रखा जा सकता है- 1. प्रागैतिहासिक काल एवं 2. ऐतिहासिक काल। ‘प्रागैतिहास’ शब्द का निर्माण दो शब्दों- प्राक् + इतिहास से हुआ है अर्थात् प्राचीन इतिहास। अंग्रेजी भाषा में इसे श्च्तमीपेजवतलश् अर्थात् इतिहास से पहले का इतिहास कहा जाता है। इसे अन-ऐतिहासिक काल भी कहा जाता है।

प्रागैतिहासिक काल की मानव-सभ्यताओं के अध्ययन के लिए किसी तरह की लिखित सामग्री, शिलालेख, सिक्के आदि प्राप्त नहीं होते हैं। इसलिए इतिहासकार इस काल के इतिहास को जीवविज्ञानी शोधों, पुरातत्त्व उत्खननों एवं मानवशास्त्रियों द्वारा की जा रही खोजों को आधार सामग्री बनाकर लिखते हैं।

जिस कालखण्ड से मनुष्य द्वारा लिखित सामग्री अर्थात् शिलालेख, सिक्के, बर्तनों पर उत्कीर्ण लिपियाँ, मूर्तियों के लेख, धर्मग्रंथ, शासकीय आदेश आदि प्राप्त होते हैं, उस कालखण्ड के विवरण को इतिहास कहा जाता है। प्रागैतिहास तथा इतिहास में भेद करने के लिए यह एक सामान्य सिद्धांत है किंतु इसके अपवाद भी हैं।

उदाहरण के लिए सिंधु सभ्यता के बर्तनों एवं मूर्तियों पर लिपिबद्ध संदेश हैं किंतु उन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। फिर भी इस कालखण्ड के विवरण को हम इतिहास में ही सम्मिलित करते हैं क्योंकि इस काल की सभ्यता काफी विकसित थी।

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अर्थात् यहाँ हम इस सिद्धांत पर चल रहे हैं कि जिस कालखण्ड में मानव सभ्यता का भलीभांति विकास नहीं हुआ, उस कालखण्ड को प्रागैतिहास में रखा गया है और जिस कालखण्ड में मानव एक विकसित सभ्यता की अवस्था में दिखाई देता है, उस कालखण्ड को हम ऐतिहासिक काल में रख रहे हैं।

प्रागैतिहासिक मनुष्य के विकसित सभ्यता में पहंचने की घटना धातुकाल में प्रवेश करने के साथ ही होती हुई दिखाई देती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता के उस कालखण्ड को जिसमें मानव अर्थात् ‘आदिमानव’ पत्थर, लकड़ी एवं हड्डी के औजार और उपकरण काम में ले रहा था, प्रागैतिहासिक कालखण्ड है और जहाँ से मानव अर्थात् ‘विकसित मानव’ धातुकालीन सभ्यता में प्रवेश करता है, वहीं से मानव सभ्यता का ऐतिहासिक काल आरम्भ होता है।

मानव जाति का प्रागैतिहासिक काल, ऐतिहासिक काल की तुलना में बहुत बड़ा है। प्रागैतिहासिक काल के अध्ययन के लिए हमें लगभग डेढ़ करोड़ वर्ष के कालखण्ड को टटोलना होता है जबकि ऐतिहासिक काल के अध्ययन के लिए हमें पिछले लगभग दस हजार वर्षों को खंगालना होता है।

लगभग डेढ़ करोड़ वर्ष की अवधि में फैले प्रागैतिहासिक काल का विभाजन, विभिन्न प्रजातियों के आदिमानवों द्वारा प्रयुक्त औजारों एवं हथियारों तथा उनमें प्रयुक्त सामग्री की सहायता से किया जाता है। इसलिए प्रागैतिहासिक काल के प्रत्येक खण्ड को उस कालखण्ड में प्रयुक्त निर्माण सामग्री से पहचाना जाता है तथा उस कालखण्ड का नामकरण भी उसी सामग्री के आधार पर किया जाता है।

प्रागैतिहासिक साक्ष्य मुख्यतः तीन प्रकार के हैं- (1) प्रागैतिहासिक काल के मानवों की अस्थियों के अवशेष (2) प्रागैतिहासिक काल के मानवों द्वारा शिकार किए गए पशु-पक्षियों की अस्थियों के अवशेष (3) उस काल के मानव द्वारा प्रयुक्त औजारों, हथियारों एवं बर्तनों आदि के अवशेष।

प्रागैतिहासिक सामग्री धरती पर, पहाड़ों पर, गुफाओं में, धरती में दबे हुए तथा प्राचीन नदी-निक्षेपों के साथ मिलती है। प्रागैतिहासिक सामग्री के काल-निर्धारण में कार्बन डेटिंग पद्धति तो सहायता करती ही है, साथ ही वह सामग्री धरती के किस स्तर से प्राप्त हुई है, धरती के किस भाग में प्राप्त हुई है, उस सामग्री को बनाने में किस प्रकार की मिट्टी, पत्थर अथवा धातु का प्रयोग हुआ है और वह सामग्री किन अन्य सामग्रियों के साथ प्राप्त हुई है, आदि तथ्यों से भी उस सामग्री की प्राचीनता का अनुमान लगाया जाता है।

प्राकृतिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप धरती में दब गई सामग्री का अध्ययन स्तरक्रम-विज्ञान के नियम के अनुसार किया जाता है। इस नियम के अनुसार किसी भी स्तरीकरण में निम्नतम स्तर सबसे पुराना होता है और ऊपर का स्तर क्रमशः बाद का।

यदि यह निक्षेप किसी नदी का हो, तो नदी का पाट उसमें किसी दूसरी नदी के गिरने से या भूकंप के कारण टुकड़े-टुकड़े हो गया हो, तो यह संभव है, कि क्रमशः बाद वाला स्तर उत्तल संरचना पर जमा हो गया हो। इस संरचना में सबसे नया निक्षेप निम्नतम तल पर होगा, जबकि सबसे पुराना निक्षेप उच्चतम तल पर होगा।

यही नदी के सबसे पुराने पाट का सूचक भी होगा। इसके साथ ही जब किसी बड़े क्षेत्र के सन्दर्भ में एक जैसे अनेक कालक्रम उपलब्ध हों, तब इन निक्षेपों के प्रमुख लक्षणों की तुलना करके उस क्षेत्र में मानव हलचल का संश्लिष्ट काल-क्रम तैयार किया जाता है।

प्रागैतिहासिक सामग्री प्रायः एक क्रम में तथा निरंतरता में नहीं मिलती। इस कारण इस सामग्री का कालक्रम निश्चित करना प्रायः एक जटिल काम होता है। इस सामग्री के आधार पर किसी क्षेत्र में पुरा-पाषाण काल, मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल के स्तर दिखाई पड़ते हैं तो कहीं इनमें से कोई एक या दो स्तर अनुपस्थित होते हैं। भारत के अधिकांश पुरा-पाषाण स्थलों में कालक्रम का व्यवधान एवं अनिश्चितता दिखाई पड़ती है।

यह आवश्यक नहीं है कि विश्व में सभी स्थानों पर एक समय में सभ्यता का एक समान चरण चल रहा हो। यदि किसी स्थान पर जब पुरा-पाषाण काल आरम्भ हो रहा हो तो यह पर्याप्त संभव है कि उसी समय धरती के किसी अन्य क्षेत्र में मध्यपाषाण काल आरम्भ हो गया हो तथा किसी अन्य स्थल पर मानव सभ्यता नव-पाषाण काल में प्रवेश कर गई हो।

कभी-कभी ऐसा भी देखने को मिलता है कि एक ही सभ्यता के लोग पुरा-पाषाण काल से सीधे ही नवपाषाण काल में आ गए, वहाँ मध्यपाषाण काल आया ही नहीं। ऐसा भी देखने को मिला है कि कुछ स्थलों पर मध्यपाषाण काल की सभ्यता अचानक ही धातु-सभ्यता में प्रवेश कर गई, वहाँ नवपाषाण काल आया ही नहीं।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार आज से लगभग 2.80 करोड़ वर्ष पहले धरती पर बंदरों का उद्भव हुआ। चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के आधार पर यह सिद्धांत स्वीकार किया गया है कि आज से लगभग 38 लाख साल पहले इन्हीं बंदरों में से कुछ बुद्धिमान बंदर अपने मस्तिष्क के आयतन, हाथ-पैरों के आकार, रीढ़ की हड्डी एवं स्वर-रज्जु (वोकल कॉड) की लम्बाई में सुधार करते हुए और विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए, आदिमानवों में बदल गए।

विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए इन्हीं आदि मानवों ने पाषाण सभ्यताओं को जन्म दिया। ये पाषाण सभ्यताएँ भी अनेक चरणों से होकर गुजरीं। यही आदिमानव आगे चलकर विकसित मानव में बदल गए और उन्होंने मानव-सभ्यता का निरंतर परिष्कार करते हुए सभ्यता के विकसित चरणों को पार किया।

भारत की लुप्त सभ्यताएँ पुस्तक में भारत की धरती पर जन्म लेने, विकसित होने एवं लुप्त हो जाने वाली प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास लिखा गया है। जिस प्रकार आज का भारत सांस्कृतिक स्तर पर विविधताओं वाला देश है, उसी प्रकार भारत की लुप्त सभ्यताएँ भी इतनी अधिक विविधताएं लिए हुई थीं कि उनके बारे में जानकर आश्चर्य होता है।

कहीं पर बंदर ही पत्थरों के औजार बनाकर अपने आदमी होने का भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं तो कहीं आदमी लाखों वर्षों तक हाथों में पत्थर लेकर घूमता हुआ दिखाई देता है। कहीं कच्ची ईंटों का प्रयोग आरम्भ होने में लाखों साल का समय लगता हुआ दिखाई दे रहा है तो कहीं पर आदमी सभ्यता की इतनी लम्बी छलांगें लगाता है कि वह पुरा-पाषाण युग से सीधा नवपाषाण युग में जा रहा है और कहीं पर मनुष्य मध्यपाषाण से सीधा धातुयुग में घुस जाता है।

कहीं पर मनुष्य खेती करना सीख जाता है तो कहीं पर मनुष्य बर्तन बनाना नहीं सीख पाता। कहीं पर मनुष्य हजारों साल तक कच्ची मिट्टी के बर्तनों में खाता हुआ दिखाई देता है तो कहीं पर केवल कुछ सौ साल में ही अपनी सभ्यता को लुप्त करके चल देता है।

आदिम सभ्यताओं की यह उथुल-पुथल न केवल मनुष्य द्वारा प्रयुक्त सामग्री की बनावट और सामग्री के प्रकार की कहानी कहती है अपितु यह भी बताती है कि किस प्रकार मनुष्य अपने मस्तिष्क का विकास करता हुआ, जीवन की कठिनाइयों एवं अभावों को समाप्त करके सुख-सुविधाओं की खोज में कठिन परिश्रम का अवलम्ब ग्रहण किए हुए है।

जब धातु की खोज हो गई तो मनुष्य आदिम अवस्था से निकलकर सभ्यता के ऐतिहासिक युग में प्रवेश कर गया। ऋग्वैदिक काल, सिंधु सभ्यता का काल, राम का काल, उत्तर-वैदिक काल, महाभारत काल, मौर्यकाल, गुप्तकाल तथा हर्षकाल को भारतीय इतिहास के प्राचीन कालखण्ड में रखा जाता है। इसलिए इस पुस्तक में इन कालों की सभ्यताओं का भी संक्षेप में वर्णन किया गया है।

हर्ष की मृत्यु के केवल 65 वर्ष बाद भारत की धरती पर इस्लाम के आक्रमण होने लगते हैं और भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम-परिदृश्य चूर-चूर होकर बिखरने लगता है। इसलिए इस पुस्तक को हर्ष कालीन सभ्यता तक ही सीमित रखा गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास

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भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास का लेखन विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों के आधार पर किया गया है।

‘भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति’ विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता और संस्कृतियों में से एक है। इसके उद्भव के समय दक्षिणी अमरीका की माया सभ्यता, अफ्रीका में नील नदी के किनारे विकसित मिश्र की सभ्यता और एशिया में विकसित सुमेरियन सभ्यताएं ही कर सकती हैं। जिनमें से माया सभ्यता और सुमेरियन सभ्यताएं अब काल के गाल में समा चुकी हैं।

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास पुस्तक में मनुष्य द्वारा भारत में विकसित प्रस्तर युगीन सभ्यताओं से लेकर वर्तमान काल की सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास लिखा गया है। पुस्तक में सभ्यता एवं संस्कृति की परिभाषाएं, सभ्यता एवं संस्कृति में अंतर, भारतीय संस्कृति की विशेषताएं तथा भारतीय संस्कृति के इतिहास को जानने के साधनों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है।

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भारत में आर्य सभ्यता के प्रसार से पहले पाषाण, ताम्र एवं कांस्य कालीन सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का विकास हुआ। इन सभ्यताओं के संवाहक सैन्धववासी द्रविड़ एवं वनवासी कोल, किरात मुण्डा आदि जनजातियों के लोग थे। माना जाता है कि भारत में लोहे का सर्वप्रथम परिचय आर्यों से हुआ तथा आर्यों ने ही भारत में कृष्ण-अयस अथवा लोहे की संस्कृति को जन्म दिया।

सिंधु सभ्यता अत्यंत सुविकसित सभ्यता थी जिसने सुसंस्कृत समाज को जन्म दिया। इस समाज के पास धर्म, अर्थ, युद्धकौशल, धातु-विज्ञान, मूर्ति-कला, नृत्य-कला, लिपि, माप-तोल आदि का ज्ञान था। आर्यों ने जिस संस्कृति को जन्म दिया वह वैदिक ज्ञान पर आधारित थी तथा वही ज्ञान विकसित होता हुआ वर्तमान सभ्यता की आत्मा बना हुआ है। आर्यों की सभ्यता यद्यपि धर्म-प्रधान सभ्यता थी तथापि आर्य युद्ध कौशल, शिल्प, कृषि एवं पशुपालन की दृष्टि से भी श्रेष्ठ थे।

उन्होंने विपुल धर्म-ग्रंथों की रचना की जो अन्य संस्कृतियों में मिलने दुर्लभ हैं। आर्यों ने वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया जो आगे चलकर जाति व्यवस्था के रूप में विकसित हुई। आर्यों की आश्रम व्यवस्था संसार की सबसे अद्भुत सामाजिक एवं आध्यात्मिक व्यवस्था थी जो मनुष्य को आजीवन सन्मार्ग पर चलने के लिए मार्ग दिखाती थी।

पुस्तक में सिक्ख धर्म एवं इस्लाम का भी समुचित विवेचन किया गया है। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की मांग के अनुसार पुस्तक के अंत में भारतीय कला, साहित्य, मंदिर, राजनीतिक पुनर्जागरण, भारत के प्रमुख वैज्ञानिक एवं भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव का भी विवेचन किया गया है। आशा है यह पुस्तक विश्वविद्यालयों में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति विषयक पाठ्यक्रम की आवश्यकता को पूरा करने वाली सिद्ध होगी।

इस पुस्तक में निम्नलिखित अध्याय सम्मिलित किए गए हैं-

  1. सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ
  2. भारतीय संस्कृति के प्रधान तत्त्व एवं विशेषताएँ
  3. भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के साधन
  4. भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ
  5. भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ
  6. सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज
  7. भारत में लौह युगीन संस्कृति
  8. दक्षिण भारत में महा-पाषाण संस्कृति
  9. वैदिक सभ्यता एवं साहित्य
  10. ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म
  11. उत्तर-वैदिक समाज एवं धर्म
  12. उपनिषदों का चिंतन
  13. महाकाव्यकाल में भारतीय संस्कृति तथा रामायण एवं महाभारत का प्रभाव
  14. श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन
  15. जैन-धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव
  16. बौद्ध धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव
  17. पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास
  18. शैव एवं शाक्त धर्म
  19. संगम युग का साहित्य, समाज एवं संस्कृति
  20. इस्लाम का जन्म एवं प्रसार
  21. भारत में सूफी मत
  22. सिक्ख धर्म एवं उसका इतिहास
  23. प्राचीन भारत में शिक्षा का स्वरूप एवं प्रमुख शिक्षा केन्द्र
  24. आर्यों की वर्ण व्यवस्था
  25. हिन्दुओं की जाति-प्रथा
  26. भारत में परिवारिक जीवन
  27. संस्कार
  28. पुरुषार्थ-चतुष्टय
  29. आर्यों की आश्रम-व्यवस्था
  30. समाज में नारी की युग-युगीन स्थिति
  31. जगद्गुरु शंकराचार्य एवं उनका दर्शन
  32. भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन
  33. मध्य-कालीन भारतीय समाज
  34. भारतीय कलाएँ
  35. भारतीय मूर्ति-कला
  36. भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला
  37. दक्षिण भारत का मन्दिर स्थापत्य
  38. भारत की चित्रकला
  39. भारतीय साहित्यिक विरासत
  40. उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन
  41. राष्ट्रीय आंदोलन में तिलक, गांधी और सुभाषचंद्र बोस का योगदान
  42. भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव
  43. भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

भारत के मुगलकालीन प्रमुख भवन

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भारत के मुगल कालीन प्रमुख भवन

भारत के मुगलकालीन प्रमुख भवन भारत के मध्यकालीन रक्तरंजित इतिहास के प्रत्यक्ष प्रमाणों की तरह हैं जिन पर मुगलों के द्वारा बहाए गए खून के धब्बे स्पष्ट दिखाई देते हैं।

वास्तुकला को समस्त कलाओं की रानी कहा जाता है। इसलिए यह कहावत भी है कि ‘संसार में दो ही चीजें जीवित रहती हैं, या तो गीत या फिर भीत।’ अर्थात् संसार में साहित्य एवं भवन ही चिरस्थाई रहते हैं। भारत में वास्तुकला का विकास उस समय ही होने लगा था जब अधिकांश दुनिया में जंगल स्थित थे और विश्व में बहुत कम सभ्यताएं प्रकाश में आई थीं। यही कारण था कि आठवीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत पर मुस्लिम आक्रमण आरम्भ हुए, उस समय से बहुत पहले ही भारत में बड़ी संख्या में विशाल और भव्य भवन बन चुके थे जिनकी होड़ अन्य देशों में स्थित बहुत कम भवन कर सकते थे।

खलीफाओं, तुर्क आक्रांताओं एवं मंगोलों की सेनाओं ने भारत के हजारों विशाल एवं बहुमूल्य भवनों को तोड़कर नष्ट कर दिया तथा उनमें मेहराबों, गुम्बदों, मीनारों एवं आयत लिखी शिलाओं को लगाकर उन्हें मुसलमानों द्वारा निर्मित इमारत घोषित किया।

दिल्ली का विष्णु-स्तम्भ (अब कुतुबमीनार) एवं विष्णु मंदिर (अब जामा मस्जिद), अध्योया का मंदिर-जन्मस्थानम् (बाद में मस्जिद-जन्मस्थान), अजमेर का विष्णु मंदिर (अब ढाई दिन का झौंपड़ा), धार का सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर (अब कमलमौला मस्जिद), वाराणसी का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर, जालोर का विष्णु मंदिर एवं संस्कृत पाठशाला (तोपखाना मस्जिद) ऐसे ही अनुपम भवन थे जो मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नष्ट-भ्रष्ट करके मस्जिदों में बदल दिए गए।

नगरकोट का प्राचीन वज्रेश्वरी देवी मंदिर, काठियावाड़ (गुजरात) का सोमनाथ महालय, अनंतनाग (कश्मीर) का मार्तण्ड सूर्य मंदिर, पाटन (गुजरात) का मोढेरा सूर्य मंदिर, हम्पी (कर्नाटक) के मंदिर, पाटन (गुजरात) का रुद्र महालय, वृंदावन (उत्तर प्रदेश) का मदन मोहन मंदिर एवं केशवराय मंदिर, मदुरै (तमिलनाडु) का मीनाक्षी मंदिर, जालोर जिले के सेवाड़ा शिवालय आदि सैंकड़ों ऐसे मंदिर थे जो मुसलमानों ने भंग कर दिए अथवा उन्हें गंभीर क्षति पहुंचाई।

भारतीय भवनों का यह विध्वंस दिल्ली सल्तनत-काल एवं मुगल सल्तनत-काल में निरंतर जारी रहा किंतु मुगलों ने जहाँ एक ओर मंदिरों को तोड़कर नष्ट किया वहीं नवीन महलों, मकबरों, मस्जिदों, उद्यानों आदि का निर्माण भी किया। विदेशी इतिहासकारों के अनुसार मुगल शासन की स्थापना के साथ ही भारतीय वास्तुकला के इतिहास में एक नवीन युग की शुरुआत हुई। पर्सी ब्राउन ने ‘मुगलकाल को भारतीय वास्तुकला की ग्रीष्म ऋतु’ माना है जो प्रकाश और ऊर्वरा शक्ति का प्रतीक होती है।

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मुगल युग की वास्तुकला के सर्वांगीण विकास का कारण मुगलों में शानो-शौकत के प्रदर्शन की प्रवृत्ति, शिल्प आदि कलाओं के प्रति उनकी अभिरुचि, राजकोष की समृद्धि तथा संसाधनों की विपुल उपलब्धता माना जाता है। बाबर से लेकर औरंगजेब तक के मुगल शासकों ने भारत में महत्वपूर्ण भवन बनाए तथा बड़ी संख्या में हिन्दू भवनों को मुगल-शैली में ढाला।

मुगल काल में न केवल बादशाहों ने अपितु उनकी बेगमों, वजीरों, शहजादों, शहजादियों तथा अन्य लोगों ने भी बड़ी संख्या में छोटे-बड़े भवन बनाए थे जिनकी संख्या का पता लगाना संभव नहीं है। उनमें से बहुत से भवन एवं उद्यान अब काल के गाल में समा चुके हैं तथा बहुत कम भवन ही अपनी गवाही स्वयं देने के लिए उपलब्ध हैं। ये भवन भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा बांगलादेश आदि देशों में मिलते हैं। मुगलकाल में ये समस्त क्षेत्र भारत के ही अंग थे। इसलिए इस पुस्तक में वहाँ के भी प्रमुख मुगल भवनों को सम्मिलित किया गया है।

भारत के समस्त मुगलकलान भवनों का वर्णन करना संभव नहीं है। इसलिए इस ग्रंथ में मुगल काल में बने प्रमुख भवनों के इतिहास एवं स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को लिखा गया है। पुस्तक के अंत में पाठकों की सुविधा के लिए मुगलों के शासन-काल में विध्वंस किए गए हिन्दू-स्थापत्य की भी संक्षिप्त जानकारी दी गई है ताकि पाठकों को उस युग की स्थापत्य सम्बन्धी प्रवृत्तियों की वास्तविक तस्वीर के दर्शन हो सकें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान

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दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान

दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान में दिल्ली के तुर्क सुल्तानों के क्रूर एवं वहशी कारनामों का इतिहास लिखा गया है। यह इतिहास, रक्तपात, घृणा, हिंसा, अत्याचार, लूट, लालच और छल-कपट से भरे मानवों का काला इतिहास है जिसे भारत के नागरिकों के समक्ष कभी नहीं लाया गया।

भारत आदिकाल से हिन्दुओं का देश है। सृष्टिकर्ता ने इस देश को प्राकृतिक सम्पदा, मेधा एवं संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनाया है। जिस समय संसार के अधिकांश देश मानव-सभ्यता की आदिम अवस्थाओं में जी रहे थे, भारत भूमि पर भव्य नगरों, गगनचुम्बी प्रासादों, विशाल यज्ञशालाओं एवं राजपथों का निर्माण हो चुका था और वेदों एवं उपनिषदों से लेकर रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों की रचना हो चुकी थी।

उस काल में भारत की सामाजिक रचना संसार भर में श्रेष्ठ थी जिसके कारण प्रजा सम्पन्न एवं सुखी थी। लोगों का जीवन सरल था और वे परिश्रमी एवं आमोद-प्रिय थे।

प्रकृति ने भारत को पूर्व में बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिन्द महासागर, पश्चिम में अरब की खाड़ी, उत्तर-पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत एवं उत्तर में हिमालय पर्वतमाला खड़ी करके एक अद्भुत सुरक्षा-चक्र का निर्माण किया था किंतु भारत की भौतिक सम्पदा की कहानियाँ दूर-दूर तक व्याप्त हो जाने से दूरस्थ देशों के लोग भारत को लूटने के लिए लालायित रहने लगे। यही कारण था कि ईसा के जन्म से सैंकड़ों साल पहले पश्चिमी आक्रांताओं ने हिन्दुकुश पर्वत को पार करके भारत पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए।

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इन आक्रांताओं में यूनानी, शक, कुषाण, हूण, पह्ल्लव, बैक्ट्रियन आदि प्रमुख थे। इन आक्रांता-जातियों ने थलमार्ग से हजारों मील की यात्राएं करके भारत पर आक्रमण किए और विभिन्न कालखण्डों में न केवल भारत की अतुल सम्पदा को लूटने में सफल हुए अपितु भारत के विभिन्न प्रदेशों पर अधिकार जमाने में भी सफल रहे किंतु भारत की उदार सामाजिक व्यवस्था एवं शत्रु के प्रति भी सहिष्णु रहने वाली संस्कृति ने सैंकड़ों साल की अवधि में इन विदेशी आक्रांताओं को भारतीय बनाकर आत्मसात कर लिया। इस कारण भारतीय समाज की शांति बनी रही।

चौथी शताब्दी ईस्वी से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी तक के कालखण्ड में जो हूण कबीले भारत पर आक्रमण किया करते थे और जिन्हें गुप्त शासकों ने भारत से मार भगाया था, उन्हीं हूण कबीलों में से एक कबीला छठी शताब्दी ईस्वी के आसपास तुर्क कहलाने लगा तथा कई शाखाओं में बंट गया। जब सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस्लाम का उदय हुआ तो ये तुर्क, इस्लाम का विरोध करने लगे किंतु नौंवी शताब्दी के आते-आते तुर्कों ने अरब के मुसलमानों की सेनाओं में भर्ती होना तथा इस्लाम स्वीकार करना आरम्भ कर दिया।

जब मध्यएशिया में इस्लाम का प्रसार हो गया तो अरब, तुर्क एवं अफगान जातियां नए उद्देश्यों के साथ भारत पर आक्रमण करने को लालायित हुईं- (1) वे भारत की सम्पदा को लूटना चाहते थे। (2) वे भारत के लोगों को पकड़कर गुलामों के रूप में बेचना चाहते थे। (3) वे भारत में इस्लाम का प्रसार करना चाहते थे। (4) वे भारत में अपने राज्य स्थापित करना चाहते थे।

ई.712 में भारत पर इस्लाम का पहला आक्रमण अरबी मुसलमानों द्वारा किया गया था। उसके बाद ई.977 से लेकर ई.1192 तक अर्थात् पूरे 215 साल की दीर्घ अवधि तक अनेक तुर्की एवं अफगान कबीले उत्तरी भारत पर आक्रमण करते रहे। वे विशाल सेनाएं लेकर भारत में घुस आते और यहाँ की सम्पदा लूटकर तथा मनुष्यों एवं पशुओं को लेकर भाग जाते। ई.1192 में एक तुर्की कबीला भारत में अपना राज्य स्थापित करने में सफल रहा।

ई.1192 से ई.1526 तक अर्थात् पूरे 334 साल तक मध्य-एशिया एवं अफगानिस्तान से के विभिन्न तुर्की कबीलों ने पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक तथा उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में हिन्दमहासागर तक छोटे-बड़े कई राज्य स्थापित कर लिए जिनमें सबसे बड़ा एवं सबसे प्रमुख राज्य ‘दिल्ली’ सल्तनत के नाम से विख्यात था।

इस पुस्तक में ई.622 में इस्लाम के उदय से लेकर, भारत में तुर्की आक्रमणों की बाढ़, ई.1192 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना एवं ई.1526 में दिल्ली सल्तनत के अवसान तक का इतिहास लिखा गया है। इस पुस्तक का लेखन यूट्यूब चैनल ‘ग्लिम्प्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री बाई डॉ. मोहनलाल गुप्ता’ पर प्रसारित दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान नामक लोकप्रिय वी-ब्लॉग धारावाहिक के लिए किया गया था। इस धारावाहिक की कड़ियां यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं।

भारत में तुर्कों के आगमन एवं तुर्की सल्तनत के इतिहास की वे छोटी-छोटी हजारों बातें जो आधुनिक भारत के कतिपय षड़यंत्रकारी इतिहासकारों द्वारा इतिहास की पुस्तकों का हिस्सा बनने से रोक दी गईं किंतु तत्कालीन दस्तावेजों, पुस्तकों एवं विदेशी यात्रियों के वर्णनों में उपलब्ध हैं, इस धारवाहिक के माध्यम से देश-विदेश में रह रहे लाखों हिन्दीभाषी दर्शकों तक पहुंचीं।

बहुत से दर्शकों की मांग थी कि इस धारवाहिक की कड़ियों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया जाए। उन दर्शकों की भावनाओं का सम्मान करते हुए, मैं इस धारावाहिक की कड़ियों को मुद्रित पुस्तक के रूप में आप सबके हाथों में सौंप रहा हूँ। शुभम्।

-डॉ.मोहनलाल गुप्ता

बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तान

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बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तान

बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तान शीर्षक से लिखी गई यह पुस्तक बाबर के चार बेटों के परस्पर संघर्ष, लालच, स्वार्थ, घृणा एवं जिजीविषा का इतिहास है।

अत्यंत प्राचीन काल से चीन देश के उत्तरी रेगिस्तिन में तुर्क एवं मंगोल नामक युद्ध-जीवी कबीले रहा करते थे जो पेट भरने के लिए अपना मूल स्थान छोड़कर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जाया करते थे। समय के साथ इन कबीलों ने मध्य-एशिया के ट्रांसऑक्सियाना क्षेत्र में अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए।

मध्य-एशिया में ही तुर्कों एवं मंगोलों में रक्त-मिश्रण की प्रक्रिया चली जिससे तुर्को-मंगोल जाति उत्पन्न हुई। चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में इन्हीं तुर्को-मंगोल परिवारों में तैमूर लंग नामक एक क्रूर एवं आतताई योद्धा पैदा हुआ जिसने ई.1369 में समरकंद पर अधिकार कर लिया और मध्य-एशिया में ‘तैमूरी राजवंश’ की स्थापना की। वर्तमान समय में समरकंद ‘उज्बेकिस्तान’ नामक देश में स्थित है।

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ई.1380 से ई.1387 के बीच तैमूर लंग ने खुरासान, सीस्तान, अफगानिस्तान, फारस, अजरबैजान और कुर्दिस्तान के विशाल क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया। ई.1393 में उसने बगदाद तथा समस्त ईराक पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। ई.1398-99 में उसने हिन्दुकुश पर्वत पार करके सिंधु नदी से लेकर पंजाब, दिल्ली तथा जम्मू-काश्मीर तक के विशाल भू-भाग में स्थित राज्यों को जीता तथा पंजाब में अपना गवर्नर नियुक्त कर दिया। ई.1405 में तैमूर लंग की मृत्यु हुई। उस समय उसका राज्य पश्चिम-एशिया से लेकर मध्य-एशिया एवं दक्षिण-एशिया में भारत के पंजाब प्रांत तक फैला था। उसकी गणना संसार के क्रूरतम व्यक्तियों में होती है। तैमूर लंग के खानदान को मुगल खानदान, चंगेजी खानदान, तैमूरी खानदान, चगताई खानदान तथा कजलबाश आदि नामों से पुकारा जाता था। तैमूर लंग की पांचवी पीढ़ी में बाबर नामक एक बादशाह हुआ जिसकी माता कुतलुग निगार खानम, मंगोल शासक चंगेज खाँ (Changes Khan) की तेरहवीं पीढ़ी की वंशज थी। इस प्रकार बाबर की रगों में तैमूर लंग तथा चंगेज खाँ जैसे क्रूर आतताइयों का रक्त बहता था।

ई.1501 के आसपास उज्बेग योद्धा शैबानी खां ने बाबर को समरकंद से निकाल दिया। इसके बाद बाबर ने अपने जीवन में बहुत कष्ट सहे तथा अफगानिस्तान में अपने लिए एक नवीन राज्य का निर्माण किया किंतु अफगानिस्तान एक निर्धन देश था जो बाबर जैसे महत्वाकांक्षी युवक की आकांक्षाएं पूरी नहीं कर सकता था। इसलिए ई.1526 में बाबर ने भारत पर आक्रमण करके अपने लिए एक और नवीन राज्य की स्थापना की जिसे मुगल सल्तनत के नाम से जाना गया। बाबर इस नवीन राज्य का उपभोग अधिक दिनों तक नहीं कर सका और ई.1530 में मृत्यु को प्राप्त हुआ।

बाबर के कई पुत्र थे जिनमें से अधिकांश पुत्रों की मृत्यु शैशव काल में ही हो गई थी। जिस समय बाबर की मृत्यु हुई, उसके केवल चार पुत्र जीवित थे जिनके नाम मिर्जा हुमायूँ, मिर्जा कामरान, मिर्जा अस्करी तथा मिर्जा हिंदाल थे। बाबर की मृत्यु के समय उसका राज्य बल्ख, बदख्शां, टालिकान, काबुल, कांधार, गजनी, मुल्तान, लाहौर, दिल्ली, आगरा, संभल, चुनार, कालिंजर एवं ग्वालियर आदि तक विस्तृत था।

अपनी मृत्यु से पहले बाबर ने अपने चारों पुत्रों में इस राज्य का बंटवारा किया। बाबर नहीं चाहता था कि उसका राज्य बिखर जाए। इसलिए बाबर ने अपने राज्य को चार भागों में बांटा तथा उन्हें अपने एक-एक पुत्र के अधीन कर दिया किंतु उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र हुमायूं को उन चारों भागों का बादशाह बना दिया।

Babur ने हुमायूं को अपनी सल्तनत का सर्वेसर्वा तो बनाया किंतु उसे यह जिम्मेदारी भी दी कि चाहे उसके भाई उसके प्रति कितने ही अपराध क्यों न करें, हुमायूं अपने भाइयों को क्षमा करे तथा उन्हें कभी दण्डित न करे। हुमायूं ने जीवन भर अपने पिता की इस आज्ञा का पालन किया किंतु Humayun के भाई जीवन भर हुमायूं से धोखा करते रहे जिसके कारण हुमायूं का राज्य नष्ट हो गया तथा उसे ईरान भाग जाना पड़ा। हुमायूं के भाई बार-बार हुमायूं के साथ छल एवं कपट करते रहे किंतु हुमायूं उन्हें क्षमा करता रहा। इस कारण हुमायूं का जीवन अत्यंत कष्टमय हो गया।

अंत में हुमायूं को अपने भाइयों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने पड़े। अपने भाइयों से छुटकारा पाने के बाद ही हुमायूं अपने खोए हुए राज्य को फिर से प्राप्त कर सका। इस पुस्तक में बाबर तथा उसके बेटों का इतिहास लिखा गया है जिसे ‘बाबर के बेटों की दर्द भरी दास्तान’ शीर्षक से प्रकाशित करवाया जा रहा है।

बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तान पुस्तक का लेखन यूट्यूब चैनल ‘ग्लिम्प्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री बाई डॉ. मोहनलाल गुप्ता’ पर प्रसारित एतिहासिक धारावाहिक ‘बाबर के बेटों की दर्द भरी दास्तान’ के लिए किया गया था। ये कड़ियां आज भी यूट्यूब चैनल पर देखी जा सकती हैं। इस पुस्तक को भारत का इतिहास डॉट कॉम पर निःशुल्क पढ़ा जा सकता है। शुभम्।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विजयनगर साम्राज्य का इतिहास

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विजयनगर साम्राज्य

चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई। उस समय भारत भूमि पर मुस्लिम शासन विकराल गति से विस्तार पा रहा था। उत्तर भारत पर सुन्नी मुसलमानों का कब्जा था तो दक्षिण भारत में पांच शिया राज्यों की नींव रखी जा रही थी। दिल्ली की सत्ता पर क्रूर तुगलकों का शासन था और पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण में सैंकड़ों मुस्लिम अमीर (जागीरदार), सूबेदार (प्रांतपति), सुल्तान और बादशाह राज्य कर रहे थे।

हिन्दू राज्य इक्का-दुक्का ही बचे थे और वे अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए अपने पड़ौसी मुसलमान राज्यों से घनघोर संघर्ष कर रहे थे। वह काल हिन्दू-धर्म एवं संस्कृति के लिए बहुत विपत्ति का काल था। चारों तरफ सर्वनाश के लक्षण दिखाई दे रहे थे।

इस घनघोर विपत्ति के काल में दक्षिण भारत में कृष्णा एवं तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित रायचूर के समृद्ध दोआब क्षेत्र में हिन्दू-धर्म एवं संस्कृति की रक्षा करने के संकल्प के साथ महान् विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई। विजयनगर साम्राज्य लगभग साढ़े तीन सौ साल तक अस्तित्व में रहा। इस साम्राज्य का बनना, बने रहना और हिन्दू धर्म को बचाए रखने के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देना, अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं था।

यदि यह कहा जाए कि विजयनगर साम्राज्य भारत माता की आत्मा द्वारा संजोया गया एक स्वर्णिम-स्वप्न था जिसे आर्य संस्कृति के चारों वर्णों- ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों एवं शिल्पियों ने मिलकर साकार किया था, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

शृंगेरी मठ का ब्राह्मण माधव विद्यारण्य विजयनगर साम्राज्य का स्वप्नदृष्टा था जिसके नाम पर इस साम्राज्य की स्थापना हुई। संगम वंश के दो क्षत्रिय युवकों हरिहर एवं बुक्का ने इस दिव्य स्वप्न को मूर्त्त रूप दिया। धनी एवं उदारमना वैश्यों ने इस साम्राज्य को सजाया, संवारा, समृद्ध बनाया तथा शिल्पियों ने इस स्वप्न को हिन्दू-मानसलोक से बाहर निकालकर धरती पर खड़ा कर दिया।

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महान् विजयनगर साम्राज्य कृष्णा एवं तुंगभद्रा के जिस समृद्ध दोआब में स्थापित हुआ, उस भूमि पर प्राचीन काल में अनेक प्रतापी हिन्दू राजवंशों का शासन रहा था जिनमें सातवाहन, होयसल, काकतीय, वनवासी, कदम्ब, गंग, चोल, चालुक्य, तैलंग, राष्ट्रकूट, पाण्ड्य तथा चेर प्रमुख थे। इन गौरवशाली प्राचीन हिन्दू राज्यों की लगभग समस्त भूमि विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत रही। विजयनगर साम्राज्य की विशालता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आधुनिक भारत के कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल एवं गोआ आदि सम्पूर्ण प्रांत, उड़ीसा प्रांत के कुछ भाग, महाराष्ट्र प्रांत के कुछ भाग तथा श्रीलंका के भी कुछ भाग न्यूनाधिक समय के लिए विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत रहे। चूंकि सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में विजयनगर राज्य का मुख्य क्षेत्र कर्नाटक तक ही सीमित होकर रह गया था, इसलिए अनेक पुस्तकों में विजयनगर साम्राज्य को कर्नाटक राज्य भी लिखा गया है। जब बहमनी सुल्तानों ने रायचूर पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया तो पूरे साढ़े तीन सौ साल तक विजयनगर के राजा रायचूर पर फिर से अधिकार करने का प्रयास करते रहे। वे बार-बार रायचूर के दोआब पर अधिकार करते किंतु मुलसमान शासक उसे बार-बार छीन लते। रायचूर का दोआब ही अंततः विजयनगर साम्राज्य के अंत का मुख्य कारण बना।

विजयनगर साम्राज्य के राजा पूरे साढ़े तीन सौ साल तक अपने पड़ौसी मुस्लिम राज्यों से तलवार बजाते रहे। उनकी तलवार एक पल के लिए भी नहीं रुकी। विजयनगर की यह तलवार तभी थमी, जब विजयनगर साम्राज्य की सांसें भी थककर अनंत में विश्राम करने चली गईं।

विजयनगर जैसे महान् साम्राज्य धरती पर कम ही खड़े हुए हैं। आज भी हम्पी की हवाओं में अप्रतिम राजाओं की तलवारों की खनखनाहटें, योद्धाओं के घोड़ों की टापें, संगीतकारों की वीणाओं से निकली झंकारें तथा नृत्यांगनाओं के घुंघरुओं की रुनझुन सुनाई देती है। विजयनगर के साहित्यकारों की लेखनी ने सम्पूर्ण मानव संस्कृति को परिष्कृत किया। हम्पी के भवनों को देखकर ऐसा लगता है मानो उन अनजान हजारों शिल्पियों की छेनियों की खनखन इतिहास के नेपथ्य से निकलकर आज भी हवाओं में तैर रही है जिन्होंने अपना पूरा जीवन विजयनगर को संवारने में लगा दिया।

विजयनगर के समृद्ध एवं साहसी व्यापारी अपनी विशाल नौकाओं में भांति-भांति की विक्रय सामग्री भरकर देश-विदेश के तटों तक पहुंचते थे और वहाँ से विशाल मात्रा में स्वर्ण एवं रजत मुद्राएं लाकर न केवल विजयनगर के राजाओं का कोष भरते थे, अपितु पूरे समाज की समृद्धि के लिए सुदृढ़ आर्थिक आधार प्रस्तुत करते थे।

इस पुस्तक को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि यदि महान् विजयनगर साम्राज्य का उदय नहीं हुआ होता तो ई.1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान की तरह दक्षिणी पाकिस्तान भी अस्तित्व में आया होता जिसके लिए बहुत से अंग्रेज अधिकारियों एवं हैदराबाद के निजाम ने पूरी शक्ति झौंक दी थी तथा जिसके लिए आज भी लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर षड़यंत्र चल रहे हैं। यदि दक्षिणी पाकिस्तान न बन सका तो उसके लिए न केवल आधुनिक काल के विलक्षण नेता सरदार पटेल धन्यवाद के पात्र हैं, अपितु विजयनगर के महान् राजा भी साधुवाद के अधिकारी हैं।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ में तुर्कों एवं मुगलों का इतिहास बड़े विस्तार से लिखा किंतु विजयनगर साम्राज्य पर केवल दो पैराग्राफ लिखे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के विश्वविद्यालयों ने इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को पत्थर की लकीर की तरह अंगीकार कर लिया। इस कारण विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में तुर्कों, मुगलों एवं अग्रेजों के इतिहास को बड़े विस्तार के साथ लिखा गया है जबकि विजयनगर का इतिहास अत्यंत संक्षेप में समेट दिया गया है। इस कारण भारत के विद्यार्थी अपने देश के गौरवमयी इतिहास से वंचित रह जाते हैं तथा उनके मानस में भारत के इतिहास का समग्र चित्र अंकित नहीं हो पाता।

विजयनगर साम्राज्य का इतिहास जहाँ एक ओर भारतीय इतिहास का गौरव है, वहीं यह भारत के इतिहास की दुखती हुई रग भी है। यह संसार के महानतम साम्राज्यों में से एक था जो कतिपय हिन्दू राजकुमारों के स्वार्थ, सामंतों की क्षुद्र-बुद्धि तथा इस्लामिक जेहाद की भेंट चढ़ गया। संसार भर के साम्राज्यों में सबसे विलक्षण, सबसे ऊर्जावान, सबसे अधिक प्रतिभावान, सबसे अधिक रचनात्मक एवं सबसे अधिक समृद्ध विजयनगर साम्राज्य न केवल इस्लामिक कट्टरता के कारण अपितु अपनी ही कुछ गलतियों के कारण तिनका-तिनका होकर बिखर गया।

इस पुस्तक में विजयनगर साम्राज्य का इतिहास उसकी समस्त विशेषताओं एवं दुर्बलताओं का वास्तविक चित्रण करते हुए लिखा गया है ताकि हम भविष्य में उन गलतियों को दोहराने से बचें। यह पुस्तक महान् विजयनगर साम्राज्य के महान् राजाओं को एक विनम्र श्रद्धांजलि है। आशा है कि इस पुस्तक के माध्यम से हमारी नई पीढ़ी विजयनगर साम्राज्य और उसके महान् राजाओं के योगदान के बारे में जान सकेगी। शुभम्।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गोस्वामी तुलसीदास का जीवनवृत्त

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गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित विशाल साहित्य न केवल भारतीय सभ्यता की, अपितु सम्पूर्ण मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर है। यह हिन्दी भाषा में लिखा गया भक्तिकाव्य है जो भारतीय वेदांत के विभिन्न दर्शनों पर आधारित है तथा मनुष्य को भक्तियोग, कर्मयोग एवं ज्ञानयोग का सम्यक अनुशीलन करने का मार्ग दिखाता है।

सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में जिस समय गोस्वामी तुलसीदास ने जन्म लिया, उस समय भारत भूमि पर मुसलमानों को शासन करते हुए लगभग चार शताब्दियां होने जा रही थीं और हिन्दुआ तेज अत्यंत निर्बल हो चुका था। तुलसी के साहित्य ने हिन्दुओं के गौरवमयी सूर्य को फिर से निराशा के कुहासे से बाहर निकाला और उसे पूरे तेज के साथ विश्व सभ्यता के माथे पर भूषित कर दिया।

हिन्दुओं का उत्थान किसी जाति, पंथ या देश का उत्थान नहीं है। हिन्दुओं का उत्थान वस्तुतः सम्पूर्ण मानव जाति का उत्थान है।

हिन्दुओं के उत्थान का अर्थ है सम्पूर्ण जीव-जगत को हिंसा के खड्ड से बाहर निकालकर अभय प्रदान करना। हिन्दू संस्कृति के उत्थान का अर्थ है सम्पूर्ण जगत में शांति, सद्भावना और प्रेम की स्थापना करना।

हिन्दू जाति को फिर से तेज प्रदान करके गोस्वामी तुलसीदास ने प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों प्रकार से सम्पूर्ण मानव जाति पर उपकार किया है।

इस लेख में हिन्दू परम्परा के अनुसार विक्रम संवत् की तिथियां प्रयुक्त की गई हैं तथा कहीं-कहीं विक्रम संवत् के साथ शक संवत् (शकारि संवत) भी दिया गया है। विक्रम संवत् में से प्रायः 57 घटाने पर ईस्वी सन् प्राप्त हो जाता है। कुछ मामलों में यह अंतर 57 के स्थान पर 56 होता है।

भ्रांतियाँ, भ्रांतियाँ और भ्रांतियाँ

भारत राष्ट्र ही नहीं, सम्पूर्ण मानव सभ्यता के इतने महत्वपूर्ण कवि एवं दार्शनिक होने पर भी गोस्वामी तुलसीदास के जीवनवृत्त के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां प्रचलित हैं, यथा-

1. उनकी जन्म एवं मृत्यु की तिथि श्रावण शुक्ला सप्तमी है या श्रावण कृष्णा तीज शनि है?

2. गोस्वामी तुलसीदास का जन्म विक्रम संवत् 1554, 1560, 1568, 1583, 1587 और 1600 में से कौन-सा है?

3. उनकी जन्मभूमि सोरों है या राजापुर?

4. वे सनाढ्य थे या कान्यकुब्ज अथवा सरयूपारीय?

5. उनका आस्पद दुबे था, शुक्ल था या मिश्र?

6. उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे था, मुरारी मिश्र था या अनूप शर्मा?

7. गोस्वामी तुलसीदास के बचपन का नाम रामबोला था, या तुलाराम?

8. उनके गुरु के रूप में पांच व्यक्तियों के नाम सामने आते है- राघवानंद, जगन्नाथ दास, शेष सनातन, नरसिंह और नरहरिदास, सही नाम कौनसा है?

9. तुलसीदासजी का एक विवाह हुआ था या तीन विवाह हुए थे?

और भी न जाने कितने विवाद और कितनी भ्रान्तियां उनके साथ जोड़ दिए गए हैं!

भ्रांतियों का निवारण

अनेक देशी-विदेशी विद्वानों ने तुलसीदासजी के जीवनवृत्त से सम्बन्धित भ्रान्तियों का निवारण करने के प्रयास किए हैं। उनमें हनुमान प्रसाद पोद्दार एवं आचार्य वेदव्रत शास्त्री प्रमुख हैं।

पोद्दारजी द्वारा तैयार किया गया तुलसीदासजी का जीवन वृत्त गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित रामचरित मानस के विभिन्न संस्करणों में मिलता है। यह जीवनवृत्त विभिन्न ग्रंथों एवं लोककिंवदन्तियों के आधार पर तैयार किया गया है।

आचार्य वेदव्रत शास्त्री ने तुलसीदासजी के जीवनवृत्त को भ्रांतियों के कुहासे से बाहर निकालने के लिए 60 वर्ष तक निरंतर शोध किया। इस दौरान उन्होंने वसीयतनामों, रत्नावली चरित, अष्टसखामृत, तुलसी प्रकाश, दोहा रत्नावली, शूकरक्षेत्र माहात्म्य, ब्रिटिश गजेटियर्स एवं विभिन्न अभिलेखों आदि का अध्ययन किया।

वेदव्रत शास्त्री ने इस शोधकार्य को अपने ग्रंथ ‘तुलसी जीवनवृत्त-तर्क और तथ्य’ में प्रस्तुत किया है। उनके द्वारा दिए गए प्रमाण एवं तर्क अत्यंत प्रभावशाली जान पड़ते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास की जन्मतिथि

जॉर्ज ग्रियर्सन, डॉ. माताप्रसाद गुप्त, डॉ. चन्द्रबली पाण्डेय आदि अनेक विद्वानों ने गोस्वामीजी का जन्म संवत् 1589 में होना बताया है। वेणीमाधव दास और मानस मयंककार ने तुलसी का जन्मवर्ष संवत् 1554 माना है।

जगमोहन वर्मा ने तुलसी का जन्मवर्ष संवत् 1560 और शिवसिंह सेंगर ने तुलसीदासजी का जन्मवर्ष संवत् 1583 माना है। डॉ. विल्सन, गौतम चन्द्रा और चौधरी छुन्नी सिंह ने तुलसी का जन्मवर्ष संवत् 1600 माना है।

पं. वेदव्रत शास्त्री ने इन समस्त जन्मवर्षों को भ्रामक बताया है तथा तुलसीदासजी का जन्म शक संवत् 1433, तदनुसार श्रावण शुक्ला सप्तमी, शुक्रवार, संवत् 1568 विक्रम (ई.1511) को विशाखा नक्षत्र के द्वितीय चरण में होना स्वीकार किया है।

पं. वेदव्रत शास्त्री अपनी मान्यता के समर्थन में दो प्रमाण देते हैं-

(1) संवत् 1667 में अविनाश राय लिखित ग्रंथ ‘तुलसी प्रकाश’ में तुलसी का जन्म संवत् 1568 श्रावण शुक्ला सप्तमी, शुक्रवार विशाखा नक्षत्र (शक संवत् 1433) बताया गया है, जो ज्योतिष की गणना के अनुसार सर्वथा शुद्ध है।

अविनाश राय तुलसीदासजी के समकालीन थे और उनके अच्छे मित्र थे। ग्रंथ के अन्त में स्वयं कवि ने लिखा है कि वे तुलसी से कई बार मिले थे।

(2) माताप्रसाद गुप्त जो कि तुलसीदासजी की जन्मतिथि दूसरी मानते हैं, अविनाश राय के ग्रंथ को प्रामाणिक मानते हैं। वेदव्रत शास्त्री लिखते हैं कि किसी प्रामाणिक ग्रंथ की एक बात प्रामाणिक और दूसरी बात अप्रामाणिक कैसे हो सकती है?

गोस्वामी तुलसीदास का जन्मस्थान

एच. एच. विल्सन और गासा द तासी ने चित्रकूट के निकट हाजीपुर को तुलसी का जन्मस्थान माना है। एफ. एस. गाउज ने हस्तिनापुर को तुलसी की जन्मस्थली बताया। सर जॉर्ज आर्थर ग्रियर्सन तथा सीताराम शरण सोरों क्षेत्रवर्ती तारी गांव को तुलसीदास का जन्मस्थान मानते हैं।

रजनीकान्त शास्त्री ने काशी को गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली सिद्ध किया है। डॉ. चन्द्रबली पाण्डेय ने अयोध्या को तुलसी की जन्मभूमि कहा है और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, मिश्रबन्धु तथा शिवसिंह सेंगर ने राजापुर को मान्यता दी है।

पं. वेदव्रत शास्त्री ने तुलसी का जन्मस्थान गंगा के तटवर्ती शूकर क्षेत्र (सोरों) के जिला एटा स्थित रामपुर गांव के जोगमार्ग मोहल्ले में होना स्वीकार किया है। उन्होंने अनेक मतों, तथ्यों, तर्कों एवं प्रमाणों से सोरों को गोस्वामी तुलसीदास की जन्मभूमि सिद्ध किया है।

बहुत से विद्वान सोरों तथा शूकर क्षेत्र को भी अलग-अलग मानते हैं। पं. वेदव्रत ने रामचरित मानस, वाराह पुराण, नारदीय महापुराण, पृथ्वीराज रासो, आइने अकबरी आदि ग्रंथों एवं कुछ शिलालेखों के प्रमाण देकर शूकर क्षेत्र को ही सोरों बताया है।

वेदव्रत शास्त्री ने लिखा है कि ई.1923 से ही गोस्वामी तुलसीदास का जन्मस्थान राजापुर पूरी तरह से मान्य हो गया था किन्तु किसी भी विद्वान ने इस बात पर विचार नहीं किया कि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म यदि राजापुर में हुआ तो वे बचपन में ही सोरों कैसे पहुँच गए।

यदि वे विद्याध्ययन के लिए सोरों गए, तो राजापुर की अपेक्षा काशी और अयोध्या समीप थे और कई रामभक्त विद्वान आचार्य एवं सन्त-महात्मा वहाँ शिक्षा देने के लिए उपलब्ध थे?

गोस्वामी तुलसीदास के माता-पिता

बहुत से विद्वान तुलसीदासजी के माता-पिता के बारे में भी अलग-अलग मत रखते हैं किंतु पं. वेदव्रत शास्त्री ने शूकर क्षेत्र (सोरों) के जिला एटा स्थित रामपुर गांव के जोगमार्ग मोहल्ले में रहने वाले सनाढ्य ब्राह्मण पं. आत्माराम शुक्ल को तुलसीदासजी का पिता तथा आत्माराम शुक्ल की भार्या हुलसी को तुलसी की माता माना है।

कुछ विद्वानों के अनुसार तुलसीदासजी के पिता का नाम आत्माराम दुबे थो जो कि सरयूपायी ब्राह्मण थे। तुलसीदासजी ने कवितावली में अपने कुल को मंगन कुल लिखा है जो उनके ब्राह्मण कुल में जन्मने की पुष्टि करता है-

जायो कुल मंगन बधावनों बजायो सुनि

भयो परिताप पाप जननी जनक को।

विनय पत्रिका में उन्होंने अपने कुल को सुकुल अर्थात् अच्छा कुल लिखा है जिसका आशय भी ब्राह्मण कुल से है-

दियो सुकुल जन्म शरीर सुंदर हेतु जो फल चारि को।

जो पाई पण्डित परम पद पावत पुरारि मुरारि को।

गोस्वामी तुलसीदास का बाल्यकाल

गोस्वामीजी का बाल्यकाल अत्यंत कठिन था। माँ उन्हें जन्म देने के कुछ समय बाद ही मृत्यु को प्राप्त हुई और पिता की छाया भी जल्दी ही छिन गई। इस पीड़ा को तुलसीदासजी ने इस प्रकार व्यक्त किया है-

मातु पिता जग जाय तज्यो, बिधिहू न लिखी कछु भाल भलाई।

नीच, निरादर-भाजन, कादर, कूकर टूकन लागि ललाई।।

बाल्यकाल में पेट भरने के लिए गुर्सांजी को भीख तक मांगनी पड़ी। अपने जीवन काल की इस व्यथा को गोस्वामीजी ने इस प्रकार व्यक्त किया है-

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टूकनि को घर घर डोलत कंगाल बोलि

बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है।

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बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो

राम नाम लेत मांगि खात टूक टाक हों।

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असन बसन हीन विषम विषाद लीन

देखि दीन दूबरो करै न हाय-हाय को।

गोस्वामी तुलसीदास के गुरु

जब बालक तुलसीदास केवल आठ वर्ष के थे, तब उनकी भेंट संत नरहरि से हुई। गोस्वामीजी ने अपने गुरु को अपने शिष्य पर कृपा करके उसके अज्ञान रूपी दैत्य का वध करने वाला नरहरि (नृसिंह) बताया है। नरहरि श्रीसम्प्रदाय के संस्थापक श्रीरामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा के आचार्य रामानंद के शिष्य थे।

रामानंद के शिष्यों में नरहरि के साथ पीपा, रैदास, कबीर तथा धन्ना जैसे उस युग के अनेक विख्यात विष्णुभक्त संत थे। गुरु नरहरि ने आषाढ़ शुक्ल 15 बुधवार संवत् 1576 विक्रम से तुलसीदासजी का विद्याध्ययन प्रारंभ किया।

गोस्वामी तुलसीदास का विवाह

संवत् 1587 में बदरिया निवासी दीनबन्धु पाठक की कन्या रत्नावली से तुलसीदासजी का विवाह हुआ। चार वर्ष बाद गौना हुआ। गौने के दो वर्ष बाद कार्तिक शुक्ल 10 बुधवार को एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम तारक (तारापति) रखा गया, जो 3 वर्ष 2 माह बाद दिवंगत हो गया।

दाम्पत्य जीवन का त्याग

लोकमान्यता है कि तुलसीदासजी अपनी पत्नी पर अत्यंत अनुरक्त थे। एक बार तुलसीदासजी घर से बाहर गए हुए थे, तब उनकी अनुपस्थिति में रत्नावली अपने भाई शंभुनाथ के साथ अपने मायके (बदरिया) चली गईं जहाँ 11 दिन के लिए भगवत्-कथा का आयोजन था।

पत्नी के विरह में विह्वल तुलसीदास बरसाती नदी पार करके उसी रात ससुराल पहुंच गए। इस घटना के साथ अनेक किम्वदन्तियाँ भी जुड़ गई हैं। ऐसी ही एक किम्वदंति का उल्लेख करते हुए रानी कमलकुंवरी देव ने ‘गोस्वामी तुलसीदासजी का काव्य और जीवन चरित’ में लिखा है-

बनिता से अति प्रेम लगायो। नैहर गई सोच उर छायो।।

सुरसरि पार गए घबराई। एक मुर्दा की नाव बनाई।।

अपने पति को ऐसी स्थिति में, इतनी व्यग्रता के साथ, भीषण वर्षा एवं रात्रिकाल में आया देखकर रत्नावली को बड़ी ग्लानि हुई। उन्होंने रूखे स्वर में तुलसीदासजी को फटकार लगाते हुए स्त्री से प्रेम करने के स्थान पर भगवान से प्रेम करने की बात कही। श्री भक्तमाल सटीक एवं भक्ति सुधास्वाद तिलक में लिखा है-

काम वाम की प्रीति जग, नित नित होत पुरान।

राम प्रीति नित ही नई, वेद पुरान प्रमान।।

लाज न लागत आपको, दौरे आयहु साथ।

धिक् धिक् ऐसे प्रीति को, कहा कहौं मैं नाथ।।

अस्थि चर्ममय देह मम, तामें ऐसी प्रीति।

तैसी जौ श्रीराम महँ, होति न तौ भवभीति।।

पत्नी की इस फटकार का तुलसी के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे मानो गहरी नींद से जागे और उनकी मनोदशा पलट गयी। वे मन ही मन आजीवन प्रभु-भक्ति का व्रत लेकर उलटे पाँव अपने घर लौट आए। वे वैरागी हो गए और उन्होंने दाम्पत्य जीवन तथा घर-गृहस्थी का त्याग करके वैराग्य धारण कर लिया। वेणी माधवदास ने ‘मूल गुसाई चरित’ में और रघुबरदास ने ‘तुलसी चरित’ में इस वृत्तांत का उल्लेख किया है।

तुलसीदासजी के वैरागी होने की घटना संवत् 1604 की बताई जाती है। उस समय रत्नावली की उम्र 27 वर्ष थी। रत्नावली ने तुलसीदासजी को मनाने एवं उनका रोष शांत करने के बहुत प्रयास किए किंतु तुलसी अब रामप्रेम के पथ पर पैर धर चुके थे तथा पीछे नहीं मुड़ना चाहते थे। उन्होंने घर लौटने से मना कर दिया।

वैरागी होने के सम्बन्ध में संभवतः उन्होंने अपने गुरु से मार्गदर्शन भी प्राप्त किया। तुलसी बाबा रामचरित मानस में लिखते हैं-

एहि विधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पंकज धूरी।

रामभक्ति

गोस्वामी तुलसीदास ने दास्यभाव की भक्ति की। उन्होंने भगवान राम को अपना स्वामी तथा स्वयं को उनका सेवक माना-

तुलसी सरनाम गुलामु है राम को।

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राम सों बड़ो है कौन, मो सों कौन छोटो

राम सों खरो है कौन, मो सों कौन खोटो।

सूरदासजी से भेंट

नन्ददास तुलसी के छोटे चचेरे भाई थे, जो अष्टसखा में परिगणित हुए। उनके माध्यम से तुलसीदासजी की मथुरा के निकट पारसौली ग्राम में सूरदासजी से भेंट हुई। यहीं गोस्वामीजी ने ‘कृष्ण गीतावली’ लिखी।

तीर्थयात्रा

तुलसीदासजी ने अनेक तीर्थों की यात्रा की तथा अनेक संतों से भेंट की। मान्यता है कि राजवी अहीर जो बाद में राजा साधु के नाम से विख्यात हुआ, की प्रेरणा से तुलसीदासजी ने राजापुर गांव बसाया।

रामचरित मानस की रचना

संवत् 1620 में तुलसीदासजी ने काशी में जाकर निवास किया। यहाँ वे संवत् 1628 तक रामकथा से सम्बन्धित छन्दों की रचना करते रहे। चैत्र शुक्ला नवमी संवत् 1631 मंगलवार को उन्होंने रामकथा को ‘रामचरितमानस’ के रूप में क्रमबद्ध लिखना आरम्भ किया। रामचरित मानस में गोस्वामीजी ने लिखा है-

संवत सोरह सै एकतीसा। करउं कथा हरि पद धरि सीसा।।

नौमी भौम बार मुधमासा। अवध पुरी यह चरित प्रकासा।।

मान्यता है कि उसी वर्ष ज्येष्ठ कृष्णा 6 को यह ग्रंथ पूर्ण हुआ। रामचरित मानस जैसे विशाल ग्रंथ के लेखन के लिए ढाई-तीन माह की अवधि बहुत कम लगती है, अवश्य ही इस कार्य में अधिक समय लगा होगा।

उस समय समाज में यह धारणा फैली हुई थी कि उत्तम धार्मिक ग्रन्थों की रचना देववाणी अर्थात संस्कृत में ही की जानी चाहिए। तुलसीदासजी ने धारणा को स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार लोकभाषा में लिखी गई रचना ही जन-जन तक पहुंच सकती है, अन्यथा वह शिक्षित वर्ग तक ही सीमित रह जाती है। इस सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है-

का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँच।

काम जु आवै कामरी, का लै करीअ कुमाच।

विनय पत्रिका एवं पार्वती मंगल आदि की रचना

तुलसीदासजी ने अयोध्या, काशी एवं प्रयाग में रहते हुए विनय पत्रिका और पार्वती मंगल आदि ग्रंथों की रचना की।

हनुमान बाहुक की रचना

काशीवास के दिनों में तुलसीदासजी की बांह में बालतोड़ की भयंकर पीड़ा हुई। बाहुपीड़ा की शान्ति के लिए उन्होंने हनुमान बाहुक लिखा। यह घटना संवत् 1664 की है।

रामचरित मानस पर विवाद

रामचरित मानस की लोकप्रियता के कारण परम्परावादी आचार्यों और पण्डितों के मन में तुलसी के प्रति द्वेषभाव उत्पन्न हुआ। वे दल बाँधकर रामचरित मानस की निन्दा करने लगे तथा उसे नष्ट करने का प्रयास करने लगे। अपने कुचक्रों को तुलसी पर सफल न होते देखकर पण्डितों ने सुप्रसिद्ध विद्वान् श्री मधुसूदन सरस्वती से कहा कि तुलसी के रामचरितमानस को पढ़कर उस पर अपनी सम्मति दें।

मधुसूदन सरस्वती ने उस पर अपने हाथों से लिखा-

आनन्दकानने कश्चिज्जंमस्तुलसी तरुः।

कविता मंजरी भाति रामभ्रमर भूषिता।।

अर्थात- रामचरितमानस रूपी आनन्दवन में तुलसी रूपी एक चलने-फिरने वाला पौधा है जिसकी कविता रूपी मंजरी राम रूपी भँवरे से सुशोभित है।

काशिराज महाराज ईश्वरी प्रसाद नारायाणसिंह ने इस श्लोक का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार किया है-

तुलसी जंगम तरु लसै, आनंद कानन खेत।

कविता जाकी मंजरी, राम भ्रमर रस लेत।।

आज भी बहुत से क्षुद्र बुद्धि लोग रामचरित मानस के मूल भावों को न समझकर बौद्धिक वितण्डा खड़ा करते हैं तथा अनावश्यक आलोचना करने से नहीं चूकते।

उपेक्षा एवं उपहास

बहुत से समाजकंटक तुलसीदासजी की प्रतिभा एवं प्रसिद्धि को देखकर ईर्ष्या करते थे। इस कारण वे तुलसीदासजी को उपेक्षित और अपमानित करते तथा उनका उपहास करते। गोस्वामीजी उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करते थे। इस सम्बन्ध में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-

कासों कीजे रोषु, दोषु दीजे काहि, पाहि राम।

जो लोग तुलसीदासजी का उपहास करते थे, उन्हें उत्तर देते हुए वे कवितावली में कहते हैं-

धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।

काहू की बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ।

तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचौ सो कहै कछु ओऊ।

मांगिके खइबो, मसीत को सोइबो। लैबे को एक न दैबे को दोऊ।।

तुलसीदास ने बाल्यकाल में माता-पिता से अलग होकर कष्ट पाया, किशोरावस्था में गुरुकृपा से शिक्षा पाई तथा युवावस्था में गृहस्थी छोड़कर राम गुण गाया। वे अपने जीवन से तथा रामभक्ति के मार्ग से अत्यंत संतुष्ट थे। इस सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है-

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु,

जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु।

गोस्वामी तुलसीदास का निधन

संवत् 1680 (ई.1623) में श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन काशी के असी घाट पर तुलसीदासजी की देह छूटी। यदि उनका जन्मवर्ष संवत् 1568 विक्रम (ई.1511) में स्वीकार किया जाए तो उनकी आयु 112 वर्ष बैठती है किंतु उनकी आयु के सम्बन्ध में यह कहावत भी कही जाती है- ‘पांच बीस अरु बीस।’ अर्थात् गोस्वामीजी ने 120 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त की।

केवल कवि नहीं, लोकनायक भी

भारतीय भाषाओं के सुप्रसिद्ध विद्वान जॉर्ज ग्रियर्सन ने तुलसीदास को केवल कवि न मानकर ‘लोकनायक’ माना है। उनकी दृष्टि में तुलसी दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति और कूटनीति में पूर्ण निष्णात थे। लोकनायक की भूमिका में गोस्वामीजी के योगदान को समझने के लिये उनके युग और तत्कालीन परिस्थितियों पर विचार करना आवश्यक है।

जब किसी काव्य-कृति में कालजयी रचना होने के तत्व दिखाई देते हैं तो लोग कहते हैं ईश्वर करे, इस रचना को रामकथा की उम्र प्राप्त हो। इस कहावत से समझा जा सकता है कि तुलसी का काव्य कालजयी है। समय के सोपान तुलसी की कीर्ति में अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकेंगे।

 तुलसी एवं उनके काव्य का मूल्यांकन करते हुए बेनी कवि ने लिखा है-

भारी भवसागर उतारतो कवन पार

जो पै यह रामायन तुलसी न गावतो।

रत्नावली की पीड़ा

तुलसीदासजी की पत्नी रत्नावली ने कभी नहीं चाहा होगा कि उनके जीवन में ऐसी घटना घटे कि उन्हें अपने पति से अलग होकर जीवन व्यतीत करना पड़े किंतु उन्हीं के मुख से निकले शब्दों से आहत होकर तुलसीदासजी ने गृहत्याग किया था।

तुलसीदासजी की तरह रत्नावली ने भी अपनी शेष आयु ईश्वरोपासना, काव्य रचना, स्त्री-शिक्षा आदि कामों में व्यतीत की। अपने शब्दों की तीव्रता के लिए रत्नावली को आजीवन दुःख रहा।

संवत् 1651 में 74 वर्ष की आयु पाकर रत्नावली ने साकेत धाम के लिए प्रयाण किया। रत्नावली ने अपने लिखे एक पद में अपने मन की पीड़ा को इस प्रकार व्यक्त किया है-

प्रियतम नाथ बेगि घर आओ।

तव वियोग दावानल तापित मम उर आय सिरावौ ।।

तनक होत दुख कबहुं मोर तन, तुम अति होत दुखारी।

करत विविध उपचार हरत दुख रहे सदा सहचारी।।

केतिक रैनि दिवस अब बीते, हों दुख पावति भारी।

अस कस निठुर भये निरमोही, तुम निज बानि बिसारी।।

छमहु दोष अज्ञात ज्ञात सब, मोहि आपनी जानी।

तजहु रोष उर द्रवहु दया करि, निज पद दासी मानी।।

जीवनधन तुम सरबस मेरे, जग इक आस तिहारी।

मो रत्नावली उभय लोक गति, पति तुम ही दुख हारी।।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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प्रथम सिद्ध सरहपाद

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प्रथम सिद्ध सरहपाद

चौरासी सिद्धों की परम्परा में हुए प्रथम सिद्ध सरहपाद ने भारत के साहित्य, दर्शन एवं अध्यात्म को गहराई तक प्रभावित किया किंतु दुर्भाग्य से देश पर विदेशियों के शासन काल में उनका साहित्य कई शताब्दियों के लिए गुमनामी के अंधेरे में चला गया। इस कारण भारत के लोग सरहपाद के बारे में भूल गए।

हीनयान-महायान

छठी शताब्दी ईस्वी में जब कुमारिल भट्ट, शंकराचार्य और मण्डन मिश्र आदि वेदांतियों ने बौद्धधर्म में फैली कुरीतियों पर आघात किया तो बौद्धधर्म दो भागों में बंट गया जिन्हें ‘हीनयान’ और ‘महायान’ कहा जाता है। हीनयान बौद्धधर्म का चिन्तन पक्ष या सैद्धान्तिक पक्ष था और महायान व्यावहारिक पक्ष। महायान का और भी आगे विभाजन हुआ तथा उसमें व्रजयान एवं सहजयान आदि मत उत्पन्न हो गए।

सिद्धों का उद्भव

महायान में बौद्ध दर्शन एवं उसके साधना पक्ष को लेकर नवीन धारणाएं अपनाने की छूट थी। कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने करुणा पर अडिग रहते हुए, मठ का जीवन त्यागकर, सरल साधना का मार्ग अपनाया और यहीं से वे तंत्र और अभिचार की ओर मुड़े। कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधाना में नए-नए प्रयोग किए। इन्हीं में से कुछ साधक सिद्ध कहलाए। सिद्धों की इस परम्परा में कुल चौरासी सिद्ध हुए।

 प्रथम सिद्ध सरहपाद  

राहुल सांकृत्यायन ने चौरासी सिद्धों में से दस को सर्वाधिक प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण माना है जिनमें सरहपाद सर्वप्रथम हैं। उनका समय आठवीं शताब्दी ईस्वी माना जाता है। सरहपाद के आविर्भाव के समय बौद्धधर्म में तंत्र-मंत्र आदि कुरीतियों का बोलबाला था। इन कुरीतियों और दार्शनिक अन्तर्द्वन्द्व की पृठभूमि में सिद्धों का पदार्पण हुआ। सरहपाद के दर्शन ने कई शताब्दियों तक न केवल बौद्धधर्म को अपितु हिन्दू धर्म को भी प्रभावित किया।

सरहपाद का जीवन काल

डॉ. विनयतोष भट्टाचार्य ने सरहपा का समय संवत् 690 (ई.633) निर्धारित किया है। राहुल सांकृत्यायन ने उनका जन्म सं. 750 (ई.693) में होना माना है। इस आधार पर डॉ. रामप्रसाद सिंह ने सरहपा का निधन ई.780 के आसपास होना माना है। कुछ विद्वान सरहपा की आयु सौ साल मानकर उनका जन्म ई.680 में और मृत्यु 780 में अनुमानित करते हैं। मगधराज धर्मपाल (शासनकाल ई.770-810) सरहपा का समकालीन था जिसने बड़ी संख्या में बौद्ध मठ एवं विहार बनवाए थे तथा विक्रमशिला का विश्वप्रसिद्ध बौद्ध विश्वविद्यालय बनवाया था। 

 प्रथम सिद्ध सरहपाद का वास्तविक नाम

सरहपाद के बचपन का नाम सरोज था। जब उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्धधर्म स्वीकार किया तब उनका नाम राहुलभद्र रखा गया। जब उन्होंने बौद्धधर्म के अंतर्गत वज्रयान की दीक्षा ली तो उन्हें सरोजवज्र नाम दिया गया। जब सरहपाद ने बौद्धधर्म एवं वज्रयान छोड़कर गृहस्थ जीवन अपना लिया और गृहस्थी पालने के लिए सरकण्डे के सरह (बाण) बनाने का काम आरम्भ तब उन्होंने अपना नाम सरह रख लिया।

उनके शिष्यों ने सरह के साथ आदर-सूचक शब्द ‘पाद’ जोड़ दिया जिससे वे सरहपाद हो गए। यही नाम आगे चलकर सरहपा हो गया। अपने जीवन काल के अंतिम भाग में वे इसी नाम से जाने जाते थे।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

 प्रथम सिद्ध सरहपाद सरहपा का जन्म बिहार राज्य के भागलपुर अनुमंडल के राज्ञी कस्बे के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे शैशव अवस्था से ही तीव्र बुद्धि के थे। उन्होंने प्रबुद्ध ब्राह्मण परिवार और ब्राह्मणी व्यवस्था में रहकर घर में ही वेद, पुराण, उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत, व्याकरण एवं विविध संस्कृत साहित्य अध्ययन किया।

विवाह

जब सरोज वयस्क हुए तो उनका मन ब्राह्मण धर्म की रूढ़ियों और परम्पराओं से विचलित होने लगा। यह देखकर उनके माता-पिता ने एक ब्राह्मण कन्या से उनका विवाह कर दिया परन्तु सरोज का मन परिवार में नहीं रम सका।

गृहत्याग

एक दिन सरोज नदी के किनारे भ्रमण कर रहे थे। वहाँ उनका ध्यान सहज रूप से विकसित होती हुई प्रकृति की ओर गया। उन्होंने देखा कि मनुष्य को छोड़कर प्रकृति की किसी भी रचना पर किसी भी बाह्य व्यवस्था का अथवा कृत्रिमता का नियंत्रण नहीं है। प्रकृति की प्रत्येक रचना सहज रूप में विकसित होती है। इस चिंतन के कारण सरोज ने सहज जीवन की खोज करने का निश्चय किया तथा गृहस्थी से विरक्ति अनुभव की। उन्होंने गृहत्याग कर दिया और वे जीवन के सहज स्वरूप की खोज में इधर-उधर भटकने लगे।

बौद्ध गुरु की शरण में

कुछ दिनों तक इधर-उधर घूमने के बाद सरोज नालंदा पहुँचे जहाँ उन्होंने बुद्ध की करुणा सम्बन्धी शिक्षा से प्रभावित होकर बौद्धधर्म के शास्त्र पढ़ने को लिए नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने का निश्चय किया। नालंदा विश्वविद्यालय में उनकी द्वार-परीक्षा हुई जिसमें वे उत्तीर्ण हो गए।

सरोज ने अपना परम्परागत गृहस्थ-वेश त्यागकर चीवर धारण कर लिया। यहाँ उन्हें भिक्खु राहुलभद्र कहा गया। वे बौद्ध भिक्षु हरिभद्र के शिष्य बन गए। हरिभद्र प्रसिद्ध बौद्ध-आचार्य शांतरक्षित के शिष्य थे। राहुलभद्र अपने आचार्य हरिभद्र से अत्यधिक प्रभावित हुए।

नालंदा में अध्यापन

राहुलभद्र अपनी पारिवारिक शिक्षण परम्परा के कारण वेदों, पुराणों एवं उपनिषदों के ज्ञाता थे। बौद्ध गुरुओं की शिक्षा से राहुलभद्र बौद्धधर्म के विद्वान बन गए और अध्ययन पूर्ण होने पर नालंदा विश्वविद्यालय में ही शिक्षक नियुक्त हो गए। नालंदा में उनका सम्पर्क नागार्जुन, शान्तरक्षित और दिङ्नाग जैसे उद्भट बौद्ध विद्वानों से हुआ।

काव्य रचना

अध्यापनकाल में राहुलभद्र ने कविताएं लिखना आरम्भ किया। उन्होंने संस्कृत भाषा के साथ-साथ अपभ्रंश एवं मागधी (मगही) में भी कविताएं लिखीं। उन्होंने बौद्धधर्म का प्रचार करने के लिए मागधी भाषा को चुना। हिन्दी साहित्य के इतिहास में उन्हें पुरानी हिन्दी का पहला कवि माना जाता है।

नालंदा का त्याग

कुछ समय बाद राहुलभद्र को बौद्ध दर्शन की अनिवार्यताएं खलने लगीं। उन्हें लगा कि बौद्धधर्म की भिक्षु जीवन शैली, स्त्री सम्पर्क से निषेध, मठ अथवा विहार में निवास एवं चीवर धारण करने जैसी अनिवार्यताएं मानव के सहज जीवन के विकास में अवरोधक है। इस कारण राहुलभद्र ने नालंदा विश्वविद्यालय छोड़ दिया और फिर से भटकने लगे।

सरहकन्या से विवाह

राहुलभद्र कई दिनों तक इधर-उधर विचरण करते हुए राजगृह नामक नगर में ऐसे स्थान पर पहुँचे, जहाँ कुछ लोग सरकंडों से बाण बनाते थे। राहुलभद्र ने देखा कि ये लोग प्रकृति के सुन्दरतम स्थान में रहकर सहज रूप से अपने-अपने कर्म में लगे हैं।

उन्होंने सरहकन्या नामक एक सुन्दर किशोरी को भी देखा जो तरुणाई में ही योगिनी के रूप में अपना जीवन सहज रूप से व्यतीत कर रही थी। राहुलभद्र सरहकन्या पर मोहित हो गए और उससे विवाह करके उसके साथ रहने लगे। राहुलभद्र ने गृहस्थी चलाने के लिए सरह (बाण) बनाने का काम आरंभ कर दिया। उन्होंने अपने बौद्ध नाम का त्याग कर दिया तथा अपना नाम ‘सरह’ रख लिया।

सहज जीवन जीने के उपदेश

राजगृह में रहकर सरह लोगों को अपना सहज कर्म करने तथा सहज जीवन जीने की शिक्षा देने लगे। धीरे-धीरे बड़ी संख्या में लोग उनके शिष्य बन गए। उनके शिष्यों ने सरह को श्रद्धा एवं विनय से सरहपाद कहना आरम्भ कर दिया। धीरे-धीरे वे सहरपा कहलाने लगे।

सहजयान का उदय

सरहपा इस काल तक बहुज्ञ और बहुश्रुत हो गए थे। वे बौद्धधर्म की वज्रयान शाखा में दीक्षित हुए थे किंतु उनके सिद्धांत न तो बौद्ध मत से मेल खाते थे और न व्रजयान से। इसलिए उनके द्वारा दिए जा रहे उपदेशों को सहजयान कहा जाने लगा।

भारत भ्रमण

सरहपा किसी एक स्थान पर नहीं टिक सकते थे। इसलिए कुछ समय बाद उन्होंने राजगृह का त्याग कर दिया और अपनी पत्नी सरहकन्या के साथ देश का भ्रमण करने लगे। वे तपोवन होते हुए बोधगया पहुँचे। वहाँ कुछ दिन ठहर कर दक्षिण की तरफ यात्रा करते हुए विदिशा पहुँचे। श्रीपर्वत पर उनकी भेंट बौद्ध विद्वान नागार्जुन से हुई।

जब सरहपा जनसाधारण को सहजयान का उपदेश देते हुए भारत भ्रमण करने लगे तो उनके शिष्यों की संख्या में तेजी से वृद्धि होने लगी। तदन्तर वे विंध्याचल पहुँचे। यहाँ उन्होंने बड़ी संख्या में पशुबलि होते हुए देखी। सरहपा ने  पशुबलि का प्रबल विरोध किया। पहले तो लोग उनसे सहमत नहीं हुए किंतु धीरे-धीरे उनकी बात मान गए।

इसके बाद सरहपा फिर से उत्तर भारत लौट आए तथा प्रयाग पहुँचे। जब वे प्रयाग में जनसाधारण के बीच घूम-घूम कर सहजयान के उपदेश देने लगे तो अन्य धर्मावलम्बियों ने उनका विरोध किया। कई बार मारपीट की स्थिति उत्पन्न हो गई। फिर भी सरहपा ने उनके प्रति करुण भाव रखकर उन्हें सहज मार्ग पर चलने का उपदेश दिया।

विभिन्न धर्मों के मठाधीश भले ही सहरपा का विरोध कर रहे थे किंतु जनसाधारण को उनकी बातें समझ में आ रही थीं। इसलिए प्रयाग में भी लोग बड़ी संख्या में उनके शिष्य हो गए। इसके बाद सरहपा ने काशी में ब्राह्मण धर्मावलम्बियों के आडम्बरों का घोर विरोध किया और गंगाजी के किनारे निर्जन स्थान पर बैठकर चौदह दिनों तक साधना की। यहाँ से वे रामधाम साकेत गये और सरयू नदी के किनारे पर रहने वाले कुछ साधु-संतों को नैरात्म-करुणा का रहस्य बताया।

सरहपा ने वृन्दावन पहुंचकर नैरात्मक करुणा के उपदेश दिए। इसके पश्चात् वे हिमालय की तराई में पहुंचकर कुछ दिन रुके। अंत में उन्होंने अपनी यात्रा को विराम देने का निश्चय किया। वे पुनः राजगृह पहुंचे और वहीं पर उन्होंने अपना स्थाई निवास बना लिया।

सरहपाद का साहित्य

डॉ. रामकुमार वर्मा ने  प्रथम सिद्ध सरहपाद को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। इनकी रचनाओं का प्रभाव उस काल के हिन्दी साहित्य की परम्परा पर पड़ा है। राहुल सांकृत्यायन ने 32 ग्रंथों की चर्चा की है जो सरहपाद के नाम से मिलते हैं।

सरहपाद ने एक दार्शनिक एवं चिंतक के रूप में देश, धर्म एवं समाज के समक्ष नवीन आदर्श प्रस्तुत किया तथा भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में नई क्रांति को जन्म दिया। उनमें उपनिषदों की करुणा तथा बुद्ध की मध्यम जीवन पद्धति का मिश्रण था। उन्हीं का अनुकरण करके नाथों एवं कबीरपंथियों ने अपना काव्य रचा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरहपा का साहित्य

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सरहपा का साहित्य

सरहपा का साहित्य सातवीं-आठवीं शताब्दी ईस्वी के भारत में भाषा, साहित्य एवं दर्शन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। उन्हें हिन्दी सहित अनेक भाषाओं के प्रथम कवि के रूप में सम्मान दिया जाता है। उन्होंने लम्बी आयु पाई तथा भारत भ्रमण करते हुए भी विपुल साहित्य की रचना की।

सरहपा को सरहपाद भी कहा जाता है। उनके साहित्य के बारे में जानने से पहले हमें हिन्दी भाषा एवं साहित्य के उद्भव पर किंचित् दृष्टिपात करना चाहिए।

हिन्दी भाषा का जन्म

हिन्दी भाषा का विकास क्रम संस्कृत भाषा से आरम्भ होता है। इस भाषा में उपलब्ध प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद है जिसकी रचना ई.पू.4000 के लगभग अर्थात् आज से लगभग 6000 साल पहले हुई। कुछ लोग ऋग्वेद को और भी पुराना मानते हैं।

संस्कृत के उद्भव के कई हजार साल बाद ई.पू. 500 के आसपास मगध क्षेत्र में रहने वाले आर्यों में जनभाषा के रूप में पालि भाषा विकसित हुई। इसके बाद पूरे पांच सौ साल तक शिक्षित वर्ग में संस्कृत भाषा तथा जनसाधारण में पालि भाषा का प्रचलन रहा।

ईसा की प्रथम शताब्दी में जनसाधारण वर्ग में प्राकृत भाषा प्रचलन में आई। इसके बाद अगले लगभग एक हजार साल तक शिक्षित वर्ग में संस्कृत तथा जनसाधारण में पालि एवं प्राकृत भाषाओं का प्रचलन रहा। इस काल में ग्रंथों की रचना संस्कृत, प्राकृत एवं पालि तीनों भाषाओं में हुई। ब्राह्मणों ने संस्कृत को, बौद्धों ने पालि को एवं जैनों ने प्राकृत भाषा को अपनाया।

प्राकृत भाषा को लोक में अधिक ख्याति मिली। प्राकृत से ‘अपभ्रंश’ भाषा विकसित हुई। धीरे-धीरे अपभ्रंश के कई रूप बनने लगे जिनमें से एक रूप को ‘अवहट्ट’ कहा जाता था। ‘अवहट्ट’ को अपभ्रंश की अंतिम अवस्था कहा जाता है। इसी अवहट्ट से हिन्दी भाषा एवं अनेक देशी भाषाओं का विकास हुआ। डॉ. चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने अवहट्ट को ‘पुरानी हिन्दी’ कहकर सम्मान दिया है।

ईसा की सातवीं-आठवीं शताब्दियों में प्राकृत की अपभ्रंश अवस्था ‘अवहट्ट’ एवं संस्कृत भाषा के मिश्रण से हिन्दी भाषा एवं साहित्य का विकास हुआ। डॉ. रामकुमार वर्मा ने हिन्दी साहित्य के इस काल को ‘संधि काल’ कहा है।

इस काल में संस्कृत एवं प्राकृत भाषाओं में लिखे गए साहित्य और लोक में प्रचलित ‘अवहट्ट’ का मिश्रण हुआ। इस काल में सिद्धों ने अपभ्रंश की रूढ़ साहित्यि शैली में जनभाषा ‘अवहट्ट’ का मिश्रण करके काव्य रचना की।

सिद्ध कवियों का उद्भव

सिद्ध कवियों का उद्भव बौद्ध-धर्म की एक नवीन शाखा के रूप में सातवीं-आठवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। सिद्धों की कुल संख्या चौरासी है। राहुल सांकृत्यायन ने इनमें से दस सिद्धों को सर्वाधिक प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण माना है जिनमें सरहपाद सर्वप्रथम हैं।

सिद्ध साहित्य का काल

सिद्ध साहित्य का काल वि.सं. 750 (ई.693) से आरम्भ होना माना जाता है। सिद्धों की कुल संख्या चौरासी है। इनमें से अनेक सिद्ध काव्य-रचना करने में समर्थ हुए। सिद्धों के आविर्भाव के समय बौद्ध धर्म में तंत्र-मंत्र आदि कुरीतियों का बोलबाला था।

चूंकि इन कुरीतियों और दार्शनिक अन्तर्द्वन्द्व की पृठभूमि में सिद्धों का पदार्पण हुआ था इसलिए सिद्धों ने ब्राह्मण धर्म, बौद्ध धर्म एवं पाशुपत धर्म में प्रचलित आडम्बरों एवं कुरीतियों का विरोध करके भारत के लोगों को सहज जीवन जीने का उपदेश दिया। सिद्धों के दर्शन ने कई शताब्दियों तक मागधी (मगही) वाङ्मय एवं हिन्दी वाङ्मय को प्रभावित किया।

सिद्ध साहित्य का विलोपन

बारहवीं शताब्दी से लेकर बीसवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य तक भारत पर विदेशियों का शासन रहा। इस कारण भारत के प्राचीन ग्रंथ विलुप्त हो गए। इसी काल में सिद्धों की परम्परा भी विलुप्त हो गई और लोग उनके तथा उनकी रचनाओं के बारे में बिल्कुल भूल गए।

सरहपा का साहित्य भी भुला दिया गया। भारत में भले ही वे भुला दिए गए किंतु नेपाल, भूटान और तिब्बत में वे महात्मा बुद्ध की ही तरह श्रद्धा से याद रखे गए।

सिद्ध साहित्य की खोज

सिद्धों के साहित्य को सर्वप्रथम उजागर करने का श्रेय महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री को है। ई.1907 में उन्हें नेपाल दरबार पुस्तकालय से सिद्धों के पचास पदों का एक संग्रह मिला जिसे उन्होंने बंगीय साहित्य परिषद् कलकत्ता द्वारा ‘बोध गान ओ दोहा’ शीर्षक से प्रकाशित कराया।

इनके बाद प्रबोधचन्द बागची ने कलकत्ता संस्कृत सीरीज के ‘दोहा- कोश’ में कुछ सिद्धों की रचनाएँ प्रकाशित कराईं। शशिभूषण दासगुप्ता ने ‘ऑब्सक्योर रिलीजियस कल्ट्स’ में सिद्धों का परिचय दिया।

सिद्धों को पूर्ण प्रकाश में लाने का कार्य राहुल सांकृत्यायन ने किया। वे भूटान और तिब्बत से सिद्ध साहित्य के ग्रंथ खच्चरों पर लादकर भारत लाये। इन्हीं ग्रंथों से धर्मवीर भारती ने ‘सिद्ध साहित्य’ और मंगलबिहारी शरण सिन्हा ने ‘सिद्धों की सांध्य भाषा’ पुस्तक लिखी। रामचन्द्र शुक्ल और डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी सिद्धों की रचनाओं पर प्रकाश डाला।

सरहपाद (सरहपा)

मगही साहित्य के लेखक भारतेन्दु डॉ. रामप्रसाद सिंह ने अपने मगही भाषा के खण्ड काव्य ‘सरहपाद’ में सरहपा के जीवनवृत्त का सविस्तार वर्णन किया। तभी सरहपा का साहित्य प्रकाश में आ सका तथा यह ज्ञात हो सका कि सिद्ध कवियों में सबसे महत्वपूर्ण और प्रथम नाम सरहपा अथवा सरहपाद का है जिन्होंने अर्द्धमागधी अपभ्रंश भाषा में जन-रुचियों के आलोक में काव्य रचनाएँ लिखीं।

सरहपाद का जीवन काल

डॉ. विनयतोष भट्टाचार्य ने सरहपा का समय संवत् 690 (ई.633) निर्धारित किया है। राहुल सांकृत्यायन ने उनका जन्म सं. 750 (ई.693) में होना माना है। इस आधार पर डॉ. रामप्रसाद सिंह ने सरहपा का निधन ई.780 के आसपा होना माना है। कुछ विद्वान सरहपा की आयु सौ साल मानकर उनका जन्म ई.680 में और मृत्यु 780 में अनुमानित करते हैं। यही समय सरहपा के समकालीन मगधराज धर्मपाल का भी है।

सरहपा मूलतः वैदिक धर्म का पालन करने वाले विद्वान ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे। इस कारण उन्होंने वेदों, उपनिषदों सहित उस काल में विख्यात अनेक संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया था किंतु बाद में वे अपना परिवार एवं ब्राह्मण धर्म दोनों का त्याग करके बौद्ध हो गए तथा उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन किया।

इसलिए स्वाभाविक ही था कि उनके साहित्य पर ब्राह्मण धर्म एवं बौद्ध धर्म के दर्शन का प्रभाव होता। चूंकि सरहपा न तो ब्राह्मण धर्म से संतुष्ट थे और न बौद्ध धर्म के दर्शन से, इसलिए उन्होंने एक नवीन दर्शन का प्रतिपादन किया जिसे सहज दर्शन अथवा सहजयान कहा जाता है।

काव्य रचना

सरहपा का साहित्य मुख्यतः कविता के रूप में उपलब्ध है। माना जाता है कि जब सरहपा नालंदा में अध्यापन कर रहे थे, उसी काल में उन्होंने कविताएं लिखना आरम्भ किया। उन्होंने संस्कृत भाषा के साथ-साथ अपभ्रंश एवं मागधी (मगही) में भी कविताएं लिखीं।

उन्होंने अपने सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए मागधी भाषा को चुना। शिवसिंह सेंगर, राहुल सांकृत्यायन, गणपतिचंद्र गुप्त एवं नंददुलारे वाजपेयी आदि विद्वानों ने सरहपा को हिन्दी भाषा का प्रथम कवि माना है।

सरहपा का साहित्य

डॉ. रामकुमार वर्मा ने सरहपाद को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। सरहपा का साहित्य देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका उद्देश्य कविता लिखना नहीं था, कविता तो केवल एक माध्यम भर था जिसमें वे प्रभावी ढंग से अपनी बात कह सकें।

फिर भी उनकी कविता इतनी प्रभावशाली थी कि उनकी रचनाओं का प्रभाव न केवल उस काल के हिन्दी साहित्य पर पड़ा, अपितु सरहपा के लगभग 700 साल बाद हुए कबीर की कविता पर भी उसका प्रभाव देखा जा कता है।

राहुल सांकृत्यायन ने 32 ग्रंथों की चर्चा की है जो सरहपाद के नाम से मिलते हैं। सरहपा ने अपने ग्रंथों की रचना संस्कृत, अपभ्रंश एवं मागधी भाषाओं में की थी। उनके कुछ ग्रंथ मूल हिन्दी, संस्कृत अथवा मागधी भाषाओं में नहीं मिल सके हैं अपितु तिब्बती भाषा में उपलब्ध हुए हैं। सरहपा का साहित्य कोश बहुत समृद्ध है।

सरहपा के नाम से मिलने वाले कुछ ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं-

1. कखस्यदोहानाम, 2. कखदोहाटिप्पण, 3. कायकोशामृतबज्रगीति, 4. कायवाकचित्तामनसिकारनाम, 5. चित्तकोषाजबज्रगीति 6. तत्त्वोपदेशशिखरदोहागीति, 7. दोहाकोशगीति, 8. दोहाकोशनामचर्यागीति, 9. दोहाकोशोपदेशगीतिनाम, 10. दोहाकोशनाममहामुद्रोपदेश, 11. द्बादशोपदेशगाथा, 12. भावनादृष्टिचर्याफलदोहागीति, 13. बसन्ततिलकदोहा्कोषगीतिकानाम 14. भावनादृष्टिचर्याफलदोहागीतिकानाम, 15. महामुद्रोपदेशवज्रगुह्यगीति, 16. वाक्कोसारुचिरस्वरबज्रगीति, 17. श्रीबुद्धकपालतन्त्रपंजिका, 18. श्रीबुद्धकपालमण्डलबिद्धिक्रम प्रद्योत्ननामा, 19. श्रीबुद्धकपालसाधनानाम, 20. स्वाधिष्ठानाक्रम, 21. सर्वभूतबलिबिद्धि, 22. त्रैलोकवशंकरलोकेश्वरसादन।

संत परम्परा का प्रथम ग्रंथ दोहागीतिकोष

सरहपा द्वारा रचित दोहागीतिकोष को हिन्दी सन्त साहित्य परम्परा का ‘आदि ग्रन्थ’ माना जा सकता है। इस ग्रंथ के कुछ दोहे इस प्रकार हैं-

जिवँ लोणु विलिज्जइ पाणियहिं तिवँ जइ चित्तु विलाइ।

अप्पा दीसइ परहिं सवुँ तत्थ समाहिए काइँ।।

अर्थात्- जिस प्रकार नमक पानी में विलीन होता है, वैसे चित्त आत्मा में विलीन हो जाता है। तब आत्मा, परमात्मा समान दिखती है, फिर समाधि क्यों करें?

जोवइ चित्तुण-याणइ बम्हहँ अवरु कों विज्जइ पुच्छइ अम्हहँ।

णावँहिं सण्ण-असण्ण-पआरा पुणु परमत्थें एक्काआरा।।

अर्थात्- चित्त ब्रह्म को देखता है पर उसे जानता नहीं है। चित्त हमसे पूछता है कि दूसरा कौन है? नाम देने से संज्ञा एवं जड़ पृथक हो जाते हैं, परंतु परमार्थ से वे एकाकार हैं।

खाअंत-पीअंतें सुरउ रमंतें अरिउल-बहलहो चक्कु फिरंतें ।

एवंहिं सिद्धु जाइ परलोअहो मत्थएं पाउ देवि भू-लोअहो ।।

अर्थात्- खाता-पीता, रति करता, शत्रुओं के बहुसंख्यों के बीच चक्र फिराता। ऐसे ही सिद्ध भूलोक के मस्तक पर पाँव रखकर परलोक जाता है।

सरहपाद अधिकतर नालंदा, राजगृह और विक्रमशिला में रहे। अतः उनके काव्य की भाषा उस काल में इन स्थानों में बोली जाने वाली अर्धमागधी (मगही) अपभ्रंश है जिसे ‘संधा’ भाषा भी कहा गया है।

सिद्धों ने जिस मगही भाषा का प्रयोग किया था, वह किंचित् परिवर्तन से आज भी वर्तमान है। डॉ. सम्पति अर्याणी ने सरहपाद के दोहे को वर्तमान मगही भाषा में रूपांतरित कर उनकी भाषा को मगही के निकट होना सिद्ध किया है-

सरहपाद का मूल दोहा-

नगर बाहिरे डोम्बि तोहोरि कुडिया, छाइ-छई जाड़सो ब्राह्मण नाडिया

अलो डोम्बि तोर संग करिव न संग निधि कान्ह कपालि जोई लांग।

मगही भाषा में इसे इस प्रकार लिखेंगे-

नगर बाहरे डोम्बी तोहार कुटिया छूइ-छूइ जाइ से बाभन लडिया।

अरे डोम्बी तोरे साथ करब न संग, निरधिन कान्ह कपाल जोगी लंग।

हिन्दी भाषा एवं साहित्य पर सरहपा का प्रभाव

सरहपाद ने जनभाषा मागधी में कविता लिखने की जो परम्परा प्रारम्भ की, उसका प्रभाव भक्तिकाल के हिन्दी साहित्य में रहा। नाथपंथियों से लेकर कबीर आदि की कविताओं में सामाजिक रूढ़ियों और आडम्बरों के विरोध में जो अक्खड़नपन मिलता है, वह सरहपाद की देन है।

योग साधना में भी इनका प्रभाव देखा जा सकता है। सामाजिक जीवन का जो चित्र इन्होंने उकेरा है, वह भक्तिकालीन काव्यों का प्रबल आधार बना। कृष्णभक्ति के मूल में जो प्रवृत्ति मार्ग है, उसकी झलक भी सरहपाद के साहित्य में दिखाई पड़ती है।

सरहपाद ने दार्शनिक एवं चिंतक के रूप में देश, धर्म एवं समाज के समक्ष नवीन आदर्श प्रस्तुत किया तथा भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में नई क्रांति को जन्म दिया। उनमें उपनिषदों की करुणा तथा बुद्ध की मध्यम मार्गीय जीवन पद्धति का मिश्रण था। उन्हीं का अनुकरण करके नाथों एवं कबीरपंथियों ने अपना काव्य रचा।

बहुत से विद्वानों ने करुणा एवं अहिंसा के विचार को बुद्ध का आविष्कार मान लिया है परंतु करुणा एवं अहिंसा का मूलमंत्र वेदों एवं उपनिषदों में बहुलता एवं प्रमुखता से उपलब्ध है जो बुद्ध से बहुत पहले के हैं।

उड़ीसा में सरहपाद को उड़िया का कवि माना जाता है। बंगाल में उन्हें बंगला का कवि माना जाता है। मिथिला क्षेत्र के लोग उन्हें मैथिली का कवि मानते हैं। मगध क्षेत्र में उन्हें मागधी का कवि माना जाता है। बहुत से विद्वान उन्हें अपभ्रंश का कवि मानते हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखक उन्हें पुरानी हिन्दी का कवि मानते हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि सरहपा का साहित्य हिन्दी-साहित्य के संधि-काल का साहित्य है तथा सरहपा हिन्दी के आदिकवि हैं। उनके बाद ही अपभ्रंश अथवा अवहट्ट भाषा आधुनिक उड़िया, बंगला, मैथिली, हिन्दी आदि भाषाओं के वर्तमान स्वरूप में ढलनी आरम्भ हुईं।

सरहपा अपनी रचनाओं में अपभ्रंश की अनेक विशेषताएं समेटे हुए हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण सरहपा की भाषा को पुरानी हिन्दी कहा गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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