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चोलीपूजन पंथ की साधना का लक्ष्य मनो-दैहिक परमानंद का विस्फोट है !

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चोलीपूजन पंथ की साधना
चोलीपूजन पंथ की साधना

चोलीपूजन पंथ की साधना का लक्ष्य मनो-दैहिक परमानंद का विस्फोट है! मनो-दैहिक परमानंद की प्राप्ति भगवद् प्राप्ति का पथ नहीं है। अतः इसे भक्ति का पथ नहीं माना जा सकता। यह तंत्र का अंग है। कहा जा सकता है कि यह पंचमकार साधना का एक प्रकार है।

भारत भूमि पर वेदों की रचना के साथ ही इहलोक एवं परलोक की धारणा विकसित हुई। वैदिक ऋषियों ने मानव जाति को यह विचार दिया कि मनुष्य को ईश्वर की प्रार्थना, स्तुति, यज्ञ, तपस्या आदि के माध्यम से ईश्वर को प्रसन्न करके जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिए। तपस्या की अवधारणा ही हजारों साल की अवधि में अलग-अलग साधनाओं में बदल गई।

याज्ञिकों ने यज्ञ के माध्यम से, योगियों ने योग के माध्यम से तथा उपासकों ने ईश्वर की भक्ति के माध्यम से जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाने का प्रयास किया और इन्हें मोक्ष प्राप्ति का मार्ग कहा गया। इन्हीं अवधारणाओं के चलते भारतीय समाज में एक ओर शुद्ध-सात्विक ईशभक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ तो दूसरी ओर वाम साधनाएं व्यापक रूप से प्रचलन में आईं।

भारतीय योगी एवं भक्तजन जहाँ दैहिक सुख छोड़कर जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का मार्ग ढूंढ रहे थे, वहीं वाम साधकों ने मनोदैहिक सुख के चरम बिंदु पर पहुंचकर मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया। अघोर पंथ इसी विचारधारा की देन है। अघोरी लोग जलती हुई चिता से मांस निकाल कर खा जाते हैं, उल्टी और शौच भी खा जाते हैं।

कुछ वाम पंथ ऐसे भी विकसित हुए जो स्त्री देह को अपनी साधना का मुख्य आधार बताते थे। इनमें से राजस्थान के कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ तथा चोली पूजन पंथ प्रमुख हैं। राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से से लेकर मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के काछी, टीमर, मछुआ आदि जातियों में चोली पूजन साधना पद्धति प्रचलित थी। आज भी यह परम्परा कुछ लोगों में प्रचलित हो सकती है।

इन जातियों के अनेक व्यक्ति अघोर तंत्र में आस्था रखते थे और पंचमकारों अर्थात् मद्य और माँस के साथ-साथ मीन, मुद्रा, मैथुन का सेवन करते हुए साधना करते थे। इसलिए निश्चत रूप से चोली पूजन परम्परा अघोर पंथ के सिद्धांतों को लेकर स्थापित की गई किंतु इसमें शक्ति पूजा का समावेश किया गया जिसके कारण यह शैवों के अघोर पंथ से अलग होकर शाक्त सम्प्रदाय की वाममार्गी साधना का हिस्सा बन गई।

चोलीपूजन पंथ की साधना का लक्ष्य अलग-अलग रूपों में भी दिखाई देता है। इसे देवी उपासना का वामाचारी रूप भी कहा जा सकता है। चोली पूजन पंथ की मान्यता के अनुसार जब किसी व्यक्ति या परिवार की कोई मनौती पूरी हो जाती थी तो वह व्यक्ति एवं उसका परिवार, देवी का आभार प्रकट करने के लिए देवी की चोली के पूजन का आयोजन करवाते थे।

चोलीपूजन पंथ की साधना का आयोजन रात्रि के समय किसी एकांत, गुप्त एवं नियत स्थान पर किया जाता था। इसमें भाग लेने वाले लोग सपत्नीक ही हो सकते थे। चोली पूजन की प्रक्रिया इस प्रकार से है-

चोलीपूजन पंथ की साधना में पंचों-मकारों का प्रयोग किया जाता है। आयोजन का पुजारी किसी बड़े पात्र में मदिरा भरकर उसकी पूजा करता है। स्त्री-साधिकाएं अपनी चोली उतारकर पात्र की मदिरा में भिगोकर उससे अपना वक्ष साफ करती हैं। इसके बाद वे अपनी चोली को उसी घड़े में डाल देती हैं।

जब स्त्री साधिकाएं इस क्रिया को सम्पन्न करती हैं, तब तक पुरुष साधक, उस घडे के चारों ओर घेरा बनाकर नाचते हुए शराब पीते हैं।

जब समस्त स्त्री साधिकाएं अपनी चोली उतारकर वक्ष साफ कर लेती हैं तब पुजारी देवी-प्रतिमा की पूजा करके उसे नई चोली धारण करवाता है तथा देवी के समक्ष मेमने की बलि देता है। मेमने का मांस उसी समय पकाकर देवी को भोग लगाया जाता है। इस समय भी मदिरा-पान का दौर जारी रहता है।

देवी की चोली बदलने, मेमने की बलि देने तथा मेमने के मांस का प्रसाद वितरित करने के बाद प्रत्येक पुरुष साधक, मदिरा के घड़े में से एक-एक करके चोली उठाता है तथा जिस महिला की चोली उसके हाथ में आती है, वह उसके पास जाकर खड़ा हो जाता है। जब सभी चोलियों का बंटवारा हो जाता है तब सारे स्त्री-पुरुष देवी की प्रतिमा के समक्ष यौनक्रीड़ा करते हैं।

चोलीपूजन पंथ की साधना का चरम क्या है और इस साधना के माध्यम से किस सिद्धि की प्राप्ति की अभिलाषा की जाती है, यह ज्ञात नहीं है किंतु वाममार्गी तंत्रों के अनुसार अनुमान लगाया जा सकता है कि विभिन्न वामपंथों में मद्य, माँस, मछली, मुद्रा एवं मैथुन आदि क्रियाओं के माध्यम से जिस सिद्धि एवं मोक्ष की कामना की जाती है, कुछ उसी प्रकार का ध्येय चोली पूजन पंथ का रहा होगा।

पंचमकार आधारित समस्त साधनाओं का तत्व चिंतन, ऊर्जा निर्माण एवं एकत्रीकरण पर आधारित है। पाँच मकारों के द्वारा अधिक से अधिक ऊर्जा बनाई जाती है और उस ऊर्जा को कुण्डलिनी जागरण में प्रयुक्त किया जाता है। कुन्डलिनी जागरण करके सहस्र-दल का भेदन किया जाता है और दसवें द्वार को खोल कर सृष्टि के रहस्यों को समझा जाता है। साधक के अन्दर का काम-भाव ऊर्ध्वमुखी होकर उर्जा के रूप में सहस्र-दल का भेदन करता है।

इस अवस्था में कुंडलिनी, सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना से ऊपर की ओर उठती है तथा मार्ग में कई चक्रों को भेदती हुई सिर के शीर्ष में अन्तिम चक्र में प्रवेश करती है और वहाँ यह अपने पति-प्रियतम शिव के साथ हर्षोन्मादित होकर मिलती है। इस प्रकार वाम-साधना में काम-भाव का उच्चतम प्रयोग करके ब्रह्म की प्राप्ति की जाती है।

वाममार्गी तंत्रों के अनुसार भगवती एवं भगवान के पौराणिक संयोजन का अनुभव ‘हर्षोन्मादी-रहस्यात्मक समाधि’ के रूप में ‘मनो-दैहिक’ रूप से किया जाता है, जिसका विस्फोट ही परमानंद कहलाता है। यह परमानंद ही कपाल क्षेत्र से उमड़कर हर्षोन्माद एवं गहनानंद के प्रवाह के रूप में पूरे शरीर में नीचे की ओर बहता है।

कूण्डा पंथ, कांचलिया पंथ, ऊंदरिया पंथ, बीसनामी पंथ तथा चोली पूजन पंथों की साधना विधि में कुण्डलिनी जागरण की कोई अवधारणा नहीं है फिर भी अपनी साधना को उच्चतम स्तर पर ले जाकर सिद्धि प्राप्त करने की अवधारणा अवश्य मौजूद रही होगी।

चूंकि इन पंथों के साधना पक्ष को जनसामान्य से अत्यंत गोपनीय रखा जाता था, इसलिए इनके बारे में शेष मानव समाज को अधिक जानकारी नहीं है। इस पंथ के लोग अपने किसी निकटवर्ती परिवार को धीरे-धीरे विश्वास में लेकर उन्हें अपने पंथ में सम्मिलित करते हैं और वह भी इसकी साधना पद्धति को अत्यंत गोपनीय रखता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मी टू का वायरस एक-दूसरे पर थूकने के लिए उकसा रहा है!

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मी टू का वायरस देश में प्रवेश कर गया है जिसने भारतीय स्त्रियों और पुरुषों को बेहिचक एक दूसरे पर थूकने का बड़ा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया है। देश वाकई में बड़ी तरक्की कर रहा है, अमरीका बन रहा है, मेरा देश बदल रहा है।

बड़े-बड़े चेहरे जो कल तक अपनी सफलताओं से चमका करते थे अब थूके जाने के कारण गंदे और थूक से सने हुए दिख रहे हैं।

मी टू का वायरस लगभग एक साल पहले अमरीका में जन्मा तथा भारत में इसे फिल्म एक्ट्रेस तनुश्री दत्ता लेकर आईं और नाना पाटेकर पर दस साल पुराना अपना आरोप दोहराया कि ‘हॉर्न ओके प्लीज’ गीत की शूटिंग के दौरान नाना ने उसके साथ बदसलूकी की थी।

नाना पाटेकर अब 67 साल के हैं तथा उन्होंने तनुश्री पर गलत आरोप लगाने का इल्जाम लगाते हुए कानूनी नोटिस भी भेजा है।

सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन (सिनटा) ने कहा है कि वह नाना पाटेकर के खिलाफ लगे यौन उत्पीड़न आरोपों की निष्पक्ष जांच एवं समाधान करने के लिए तैयार है।

तनुश्री के बाद भारत की कई जानी-मानी महिलाओं ने मनोरंजन और मीडिया जगत में यौन शोषण से जुड़े अपने अनुभव साझा किए जिनके बाद मशहूर अभिनेता और निर्देशक रजत कपूर का चेहरा गंदा दिखाई देने लगा।

रजत कपूर पर एक महिला पत्रकार ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2007 में जब वह उनका साक्षात्कार लेने गईं थी तब कपूर के व्यवहार से वह असहज हो गई थीं। रजत कपूर ने माफी मांगते हुए कहा है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश की और वह दिल से माफी मांगते हैं।

 खबर यह भी है कि अंग्रेजी के एक प्रमुख अखबार के दिल्ली ब्यूरो चीफ ने अपने ऊपर लगे आरोपों के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

अभिनेता रितिक रोशन ने फिल्मकार विकास बहल की नई फिल्म ‘सुपर 30’ में काम करने से लगभग मना कर दिया है क्योंकि बहल पर यौन शोषण करने के आरोप लगे हैं। विकास बहल पर यह आरोप पिछले साल लगा था। इस साल तो आरोप को दोहराया गया है।

कॉमेडी ग्रुप ए आई बी ने यौन उत्पीड़न के आरोपों में घिरे गुर-सिमरन खंबा को छुट्टी पर भेज दिया है। ग्रुप के संस्थापक तन्मय भट्ट, मामले के स्पष्ट होने तक ए आई बी की दैनिक गतिविधियों से अलग रहेंगे।

लेखक-कॉमेडियन उत्सव चक्रवर्ती तथा गुर-सिमरन खंबा पर यौन दुव्यर्वहार करने के आरोप हैं, जबकि तन्मय भट्ट, आरोपियों के खिलाफ कदम ना उठाने को लेकर निशाने पर हैं। उत्सव चक्रवर्ती पर पिछले हफ्ते कई महिलाओं ने बेवजह नग्न तस्वीरें भेजने के आरोप लगाए।

दिल्ली में इंडियन वीमेंस प्रेस कोर ने मीडिया घरानों से यौन शोषण की शिकायतों पर ध्यान देने के लिए संस्था गठित करने की मांग की है।

इसी बीच प्रोड्यूसर विन्ता ने फिल्म अभिनेता आलोक नाथ पर अपने 20 साल पुराने आरोपों को दोहराया है और कहा है कि पहले किसी ने नहीं सुनी किंतु आज सोशियल मीडिया सुन रहा है। आलोक नाथ ने विन्ता के आरोपों झूठा बताया है।

केन्द्रीय मंत्री एम जे अकबर का चेहरा भी थूक से सना हुआ दिखाई दे रहा है।

समझदार स्त्री-पुरुष कृपया एक-दूसरे पर न थूकें!

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि यौन उत्पीड़न और शोषण को लेकर मन में बना हुआ गुस्सा कभी नहीं जाता। मैं बहुत खुश हूँ कि मीटू अभियान भारत में भी शुरू हो गया है।

कुल मिलाकर पूरे दूश में थूका-थाकी का दौर तेजी से आरम्भ हो गया है। कुछ और चेहरे गंदे किए जा सकते हैं।

निश्चित रूप से भारत में महिलाओं के विरुद्ध यौन उत्पीड़न के मामले बहुत ज्यादा होते हैं और वे शर्मनाक हैं किंतु इस थूका-थाकी समस्या का हल नहीं होने वाला।

स्त्री और पुरुष अनंत काल से एक दूसरे के सहचर हैं। प्रकृति से उन्हें एक दूसरे के प्रति दैहिक आकर्षण का वरदान मिला है। इस कारण स्त्री अपनी इच्छओं पर नियंत्रण करना जानती है और पुरुष अपने उन्मुक्त आचरण के कारण गलतियों करता है जो कई बार अपराध बन जाती हैं।

अतः निश्चित रूप से जब स्त्री-पुरुष साथ काम करते हैं तो पुरुष के मन में रागात्मकता का उदय स्त्री की अपेक्षा अधिक होता है। सुंदर स्त्री को देखकर किस का मन नहीं डोला। मैं यह नहीं कह रहा कि पुरुष को मन डोलाने की छूट मिलनी चाहिए अपितु एक प्राकृतिक स्थिति की चर्चा कर रहा हूं।

हमारी संस्कृति में पुरुष को ब्रह्मचारी रहने और स्त्री को पुत्रवती होने का आशीर्वाद वस्तुत इन दोनों की मनोभूमि एवं सहज प्रवृत्ति को संतुलति करने के लिए दिया जाता है।

मीटू कोई जादू की छड़ी नहीं है जो पुरुषों की मूल प्रवृत्ति को बदल देगा। न वह स्त्रियों और पुरुषों के लिए अलग-अलग संसार की रचना करेगा। इसी संसार में एक दूसरे की खूबियों और कमियों से सामंजस्य बैठाते हुए ही भव सागर पार होगा।

कृपया एक दूसरे पर मत थूकिए। स्त्रियां उदार हृदय की स्वामिनी होती हैं, अपने पुरुष सहकर्मियों के गलती करने पर उन्हें रोकें, उनकी प्रताड़ना करें, उन्हें भविष्य में गलती न दोहराने के लिए चेताएं। यदि इतने पर भी पुरुष न माने तो पुलिस में उनके विरुद्ध यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज करवाएं।

पुरुषों को भी चाहिए कि सभ्य समाज में आचरण का तरीका सीखें। अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखें। पराई स्त्री को पराई ही समझें। किसी की मजबूरी का फायदा न उठाएं। भारतीय संस्कृति में स्त्री-पुरुष के बीच मर्यादाओं की जो लाइनें खींची गई हैं, उन्हें अमल में लाएं।

यह कौन नहीं जानता कि यौन उत्पीड़न के अधिकतर मामलों में औरतों की शिकायतें वाजिब हैं किंतु कुछ मामले ऐसे होते हैं जो पहले तो परस्पर सहमति से होते हैं और बाद में रेप का प्रकरण में बदल दिए जाते हैं। हनी ट्रैप भी युगों-युगों से पुरुषों के लिए समस्या बना हुआ है। फिर भी ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो समस्त स्त्री समाज से घृणा करता हो।

कहने का आशय यह कि मानव समाज को स्त्री और पुरुष के साथ-साथ रहने लायक बना रहने दें। मीटू से किसी का भला नहीं होगा। यदि मीटू का बुखार जल्दी ही नहीं उतरा तो इस देश में बहुत से चेहरे थूक से सने हुए दिखाई देंगे।

कहीं ऐसा तो नहीं है कि देश के दुश्मनों ने देश की समरसता को भंग करने के लिए यह विषैला वाइरस देश की हवाओं में घोला हो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

समलैंगिक अपने लिए अलग लिंग की मांग करेंगे ?

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क्या समलैंगिक अब अपने लिए अलग लिंग की मांग करेंगे? संसार में बहुत से देशों में समलैंगिकता अपराध नहीं है। न कानून उन्हें रोकता है और न समाज।

सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितम्बर 2018 को दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है तथा सन् 1860 के कानून का आधा हिस्सा समाप्त कर दिया है।

इसके साथ ही भारतीय कानून की धारा 377 का आधा हिस्सा सदा के लिए इतिहास बनकर रह गया है जिसके अंतर्गत यह प्रावधान था कि समलैंगिक अर्थात् दो स्त्रियां या दो पुरुष परस्पर शारीरिक सम्बन्ध बनाने पर अपराधी माने जाते थे।

इस कानून का आधा हिस्सा अब भी जीवित है जिसके अंतर्गत न तो किसी बच्चे के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए जा सकते हैं, न किसी जानवर के साथ ऐसा किया जा सकता है और न किसी भी व्यक्ति के साथ जबर्दस्ती की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले से यह तो स्पष्ट हो गया है कि दो स्त्री, दो पुरुष या दो बाईसैक्सुअल व्यक्ति अब बंद कमरे के भीतर कुछ भी करें, कानून और समाज दोनों को उनके कमरे में झांकने का अधिकार नहीं होगा किंतु अब कानून और समाज को कुछ नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

इनमें से सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि क्या दो समलैंगिक व्यक्ति एक दूसरे से विवाह करके दाम्पत्य जीवन जी सकते हैं?

दूसरी बड़ी समस्या यह होगी कि अब समलैंगिक लोग समाज, सरकार और कानून से यह मांग करेंगे कि उन्हें स्त्री, पुरुष या किन्नर से अलग किसी लिंग के रूप में मान्यता दी जाए।

प्रकृति का नियम यह है कि दो विपरीत सैक्स वाले प्राणी समागम के द्वारा संतानोत्पत्ति करते हैं। उनमें से एक नर एवं एक मादा होता है। चूंकि समलैंगिकों में स्थिति इसके विपरीत है तथा कानून ने उन्हें वैधानिकता प्रदान कर दी है इसलिए वे स्वयं को स्त्री या पुरुष कहलवाना पसंद नहीं करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि किसी भी माइनोरिटी कम्यूनिटी पर मैजोरिटी कम्यूनिटी की मान्यताओं, विचारों एवं परम्पराओं को नहीं लादा जा सकता। यदि समलैंगिकों की संख्या कम है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे गलत हैं या वे गैरकानूनी काम कर रहे हैं।

निकट भविष्य में सुप्रीम कोर्ट की इसी टिप्पणी को आधार बनाकर कुछ लोग जानवरों के साथ भी शारीरिक सम्बन्ध बनाने का अधिकार मांगेंगे।

उनका तर्क भी यही होगा कि भले ही बहुसंख्यक समाज जानवरों से सम्बन्ध बनाने की अनुमति नहीं देता हो, लेकिन समाज में बहुत छोटा ही सही किंतु एक ऐसा वर्ग भी है जो पशुओं से सम्बन्ध बनाना चाहता है। 

हो सकता है कि कुछ लोग बच्चों से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाने की मांग करें। ऐसीस्थितियों में कानून का रुख क्या होगा, यह तो आने वाला भविष्य ही बताएगा।

संसार में बहुत से देशों में समलैंगिकता अपराध नहीं है। न तो कानून ही उन्हें ऐसा करने से रोकता है और न समाज।

भारत हजारों साल पुरानी मान्यताओं वाला देश है। उसकी सांस्कृतिक जड़ें बहुत पुरानी हैं जिसमें समलैंगिकता को न केवल हेयदृष्टि से देखा जाता है अपितु नैतिकता की दृष्टि से भी बुरा माना जाता रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने देश के इस सांस्कृतिक चिंतन परम्परा को नकारते हुए कहा है कि समय के साथ कानून में बदलाव होना चाहिए।

भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को चार पुरुषार्थों के रूप में माना गया है जिसका मोटा-मोटा व्यावहारिक अर्थ यह होता है कि धर्म पूर्वक अर्जित किए गए अर्थ और काम से मोक्ष की प्राप्ति होती है किंतु अब समाज को धर्मपूर्वक काम अर्जित करने के अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा।

क्योंकि वैसे भी धर्मनिरपेक्ष समाज में धर्म पूरी तरह निजी एवं व्यक्तिगत मान्यताओं का पुलिंदा है, कानून किसी को धर्म की परिभाषा तय करने का अधिकार नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही अब भारत में सामाजिक मान्यता पर धार्मिक आस्था लादे जाने के दिन पूरी तरह लद गए हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मद अली जिन्ना को जेल गए बिना ही पाकिस्तान कैसे मिला!

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अंग्रेजों के राज में हजारों लोगों को केवल इसलिए गिरफ्तार कर लिया जाता था क्योंकि वे वंदेमातरम् गाते थे या वंदेमातरम् का नारा लगाते थे। जबकि मुहम्मद अली जिन्ना को जेल गए बिना ही पाकिस्तान मिल गया।

तिरंगा झण्डा हाथ में लेकर चलने वाले को गिरफ्तार कर लिया जाता था। अखबार में लेख लिखने पर गिरफ्तार कर लिया जाता था। यहाँ तक कि गांधी टोपी लगाने वालों को भी लात-घूसों से पूजा जाता था।

बालगंगाधर तिलक को अखबार निकालने, लेख लिखने, भाषण देने पर ही न जाने कितनी बार जेल में डाला गया। ऐसा भी कई बार हुआ जब तिलक ने किसी अंग्रेज अधिकारी के अत्याचारों के खिलाफ लेख लिखा और तिलक पर उस अंग्रेज अधिकारी की हत्या के षड़यंत्र का आरोप लगाकर जेल में ठूंस दिया गया। माण्डले जेल आज भी तिलक के कदमों को याद करके रो पड़ती है।

वीर सावरकर को दो बार काले पानी की सजा दी गई तथा उन्हें दो बार आजन्म कारवास की सजा दी गई। उन्हें जेल में कोल्हू पेरने के लिए विवश किया जाता था तथा भरपेट खाना नहीं दिया जाता था। विरोध करने पर कोड़ों से मारा जाता था। उनका कुसूर केवल यह था कि उन्होंने मदनलाल धींगरा द्वारा अंग्रेज अधिकारी वायली की हत्या के बाद धींगरा के समर्थन में एक लेख लिखा था।

उन दिनों भारत में यह कहावत चल पड़ी थी कि गांधीजी ने जितना चरखा नहीं फेरा उतना तो वीर सावरकर ने अंग्रेजों की जेलों में कोल्हू पेरा था।

क्रांतिकारी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को जेल में ही फांसी दी गई तथा उनकी मृत देह को जलाकर नदी में बहा दिया गया। वीर प्रतापसिंह बारहठ को बरेली जेल में जीवित जला कर मारा गया।

सुभाषचंद्र बोस को तो अंग्रेज जेल से बाहर देखना ही नहीं चाहते थे। उन्हें न जाने किस-किस अपराध में कितनी बार जेल में डाले रखा गया किंतु अंग्रेज ऐसी कोई जेल नहीं बना पाए जिसमें सुभाष बाबू को हमेशा के लिए बंद करके रखा जा सकता!

कांग्रेस में भी एक भी ऐसा बड़ा नेता नहीं था जिसने जेल में कुछ महीने या कुछ साल न गुजारे हों। अरविंद घोष, लाला लाजपतराय तथा विपिनचंद्र पाल ने अपने जीवन का बहुत सा समय अंग्रेजो की जेलों में बिताया।

गांधी, नेहरू और पटेल को बात-बात पर और न जाने कितनी बार जेलों में डाला गया।

हैरानी यह सोचकर होती है कि जब सावरकर, भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों तथा सुभाष, गांधी, नेहरू और पटेल जैसे कांग्रेसियों को भारत की आजादी मांगने के अपराध में बार-बार जेल जाना पड़ा तब भारत की सड़कों पर कत्ले आम करवाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली खाँ तथा सुहरावर्दी जैसे किसी भी मुस्लिम लीगी नेता को एक बार भी जेल क्यों नहीं जाना पड़ा?

भारत को पाने के लिए हमारे नेताओं को जेल पर जेल की गई तब फिर जिन्ना, लियाकत अली और सुहरावर्दी को एक बार भी जेल गए बिना, पाकिस्तान कैसे मिल गया?

पंजाब प्रांत में ई.1937 से पंजाब यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार चल रही थी। ई.1946 में मुहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं को आदेश दिया कि वे इस सरकार को गिरा दें।

मुस्लिम लीग के गुण्डों ने तुरंत ही सड़कों पर छुरेबाजी एवं आगजनी शुरु कर दी जिससे घबराकर पंजाब के अंग्रेज गवर्नर ने यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार को बर्खास्त करके मुस्लिम लीग की सरकार बनवा दी। इस हिंसा के लिए एक भी मुस्लिम लीगी नेता को गिरफ्तार नहीं किया गया।

जब मुहम्मद अली जिन्ना एवं लियाकत अली ने अगस्त 1946 में कलकत्ता में सीधी कार्यवाही का आह्वान किया तो मुस्लिम लीग के गुण्डों ने हजारों निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या कर दी। तब भी गवर्नर जनरल लॉर्ड वैवेल की सरकार ने जिन्ना और लियाकत अली सहित मुस्लिम लीग के किसी भी नेता को गिरफ्तार नहीं किया! न उन पर कोई मुकदमा चलाया!

जब सीधी कार्यवाही के दौरान बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने खुलेआम हिंसा की कार्यवाही में भाग लिया तब वैवेल सरकार ने सुहरावर्दी की सरकार को बर्खास्त नहीं किया, उसे गिरफ्तार नहीं किया! न उस पर कोई मुकदमा चलाया!

कांग्रेस के नेताओं तथा अंग्रेज अधिकारियों को राष्ट्रीय स्वयं संगठन हिंसक कार्यवाहियों वाला संगठन दिखता था किंतु उन्हें यह दिखाई क्यों नहीं दिया कि मुस्लिम लीग ने ‘मुस्लिम नेशनल गार्ड’ के नाम से 40 हजार लोगों की खूनी एवं हथियारबंद फौज खड़ी कर ली है और वह प्रतिदिन निर्दोष नागरिकों के साथ हिंसा कर रही है।

जिस समय कैबीनेट मिशन भारत में विभिन्न पक्षों से बात कर रहा था, उसी दौरान अप्रेल 1946 में नई दिल्ली में मुस्लिम लीग के नेताओं ने कैबीनेट मिशन के सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए भड़काऊ भाषण दिए।

मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा- यदि कोई भी अंतरिम व्यवस्था मुसलमानों पर थोपी गई तो मैं स्वयं को किसी भी खतरे, परीक्षा या बलिदान जो भी मेरे से मांगा जा सकता है, को झेलने के लिए शपथ लेता हूँ।

यही शपथ अधिवेशन में उपस्थित सभी मुस्लिम सदस्यों ने ली। पंजाबी नेता फिरोज खाँ नून ने कहा- जो विनाश हम करेंगे, उससे चंगेज खां और हलाकू ने जो किया, उसे भी शर्म आ जाएगी। उसने यह भी कहा कि यदि ब्रिटेन अथवा हिन्दुओं ने पाकिस्तान नहीं दिया तो रूस यह कार्य करेगा।

बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने कहा- ‘यदि हिन्दू सम्मान और शांति से रहना चाहते हैं तो कांग्रेस को पाकिस्तान की स्वीकृति देनी चाहिए।’

सीमांत नेता कयूम खाँ ने घोषणा की- ‘मुसलमानों के पास सिवाय तलवार निकालने के और कोई मार्ग नहीं बचेगा।’

बंगाल लीग के जनरल सैक्रेटरी अब्दुल हाशिम ने कहा- ‘जहाँ न्याय और समता असफल हो, चमचमाता इस्पात मसले को तय करेगा।’

पंजाब के शौकत हयात खाँ ने कहा- ‘मेरे प्रांत की लड़ाकू जाति केवल एक उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा कर रही है। आप हमें केवल एक अवसर दीजिए और हम नमूना पेश कर देंगे जबकि ब्रिटिश सेना अभी भी मौजूद है।’

इतनी खतरनाक कार्यवाहियों एवं बयानबाजियों एवं धमकियों के बावजूद यदि अंग्रेज सरकार जिन्ना और उसके दोस्तों को गिरफ्तार नहीं कर रही थी तो इसके पीछे लॉर्ड मिण्टो द्वारा ई.1906 में तैयार की गई एक नीति काम कर रही थी जिसका सार इस प्रकार है-

जब लाल-बाल और पाल के नेतृत्व में उग्रवादी कांग्रेसी नेताओं ने देश की आजादी की मांग तेज कर दी तो अँग्रेजों ने तब के अलगाववादी मुसिलम नेताओं को कांग्रेस के विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमान करने का निश्चय किया।

तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिण्टो के निजी सचिव स्मिथ ने अलीगढ़ कॉलेज के अंग्रेज प्रिंसिपल आर्किबाल्ड को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि- ‘यदि आगामी सुधारों के बारे में मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मण्डल मुसलमानों के लिए अलग अधिकारों की मांग करे और इसके लिए वायसराय से मिले तो वायसराय को उनसे मिलने में प्रसन्नता होगी।’

इस निमंत्रण को पाकर अलगाववादी-मुस्लिम नेताओं की बांछें खिल गईं। 1 अक्टूबर 1906 को 36 मुस्लिम नेताओं का प्रतिनिधि मण्डल सर आगा खाँ के नेतृत्व में शिमला में लॉर्ड मिन्टो से मिला और उन्हें एक आवेदन पत्र दिया जिसके माध्यम से कई तरह की मांगें सरकार के समक्ष रखी गईं।

लॉर्ड मिण्टो ने इन लोगों का स्वागत किया तथा कहा कि आपकी हर मांग उचित है तथा आपकी हर मांग पूरी की जाएगी। आप को केवल इतना करना है कि कांग्रेस द्वारा चलाई जा रही देश-विरोधी गतिविधियों से दूर रहना है।

उस समय के अलगाववादी मुस्लिम नेताओं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि अंग्रेज सरकार अचानक उन्हें इतना सम्मान देगी और कांग्रेस के खिलाफ लड़ने में उनकी सहायता करेगी। एक तरह से इन अलगाववादी नेताओं की लॉटरी लग गई थी।

इस प्रकार अंग्रेज अधिकारियों ने अलगाववादी मुसलमानों को अपने जाल में फंसाने तथा साम्प्रदायिकता की खाई को चौड़ा करने का काम आरम्भ कर दिया। अंग्रेज चाहते थे कि भारत के अलगाववादी मुसलमान, कांग्रेस से अलग होकर एक बड़ा राजनीतिक दल खड़ा कर लें।

इस अलगाववादी प्रतिनिधि मण्डल की उत्तेजना को देखकर अँग्रेज अधिकारी अच्छी तरह समझ गये कि वे इन नेताओं को भारत की आजादी के आन्दोलन के खिलाफ आसानी से काम ले सकते हैं। इस बात की पुष्टि स्वयं लॉर्ड मिण्टो की पत्नी मैरी मिन्टो की डायरी से होती है।

जिस दिन यह प्रतिनिधि मण्डल शिमला से अपने घरों को लौटा, उसी शाम एक ब्रिटिश अधिकारी ने वायसराय की पत्नी मैरी मिन्टो को पत्र लिखकर सूचित किया- ‘मैं आपको संक्षेप में सूचित करता हूँ कि आज एक बहुत बड़ी बात हुई है। आज राजनीतिज्ञता पूर्ण एक ऐसा कार्य हुआ है जिसका प्रभाव भारत तथा उसकी राजनीति पर चिरकाल तक पड़ता रहेगा। भारत के 6 करोड़ 20 लाख लोगों को हमने विद्रोही पक्ष अर्थात् कांग्रेस में सम्मिलित होने से रोक लिया है।’

इंग्लैण्ड के समाचारपत्रों ने भी शिमला में आए अलगाववादी मुसलमानों के प्रतिनिधि मण्डल को अंग्रेजों की बहुत बड़ी विजय बताया और अलगाववादी मुसलमानों की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की।

यह प्रथम अवसर था जब वायसराय के निमंत्रण पर भारत के विभिन्न भागों के मुसलमान नेता शिमला में एकत्रित हुए थे।

ई.1923 के कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि यह प्रतिनिधि मण्डल, सरकारी आदेश से लॉर्ड मिन्टो के पास गया था।

जब ये अलगाववादी मुस्लिम नेता वापिस अपने घरों को लौटे तब वे पूरे राजनीतिज्ञ बन चुके थे। अब उनके कंधों पर सर सैयद अहमद द्वारा तराशी गई अलीगढ़ की राजनीति को सारे देश में फैलाने की जिम्मेदारी थी।

मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा करने के इस काम के लिए भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने 16 अक्टूबर 1906 को गवर्नर जनरल लॉर्ड मिन्टो को पत्र लिखकर बधाई दी।

इस सम्मेलन के दो साल के भीतर ही ई.1908 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना की गई जो देश में कांग्रेस तथा हिन्दू महासभा द्वारा चलाए जा रहे आंदोलनों को विफल करने के उद्देश्य से बनाई गई थी।

शिमला में गवर्नर द्वारा मुस्लिम नेताओं को दिया गया आश्वासन ब्रिटिश सरकार द्वारा शीघ्र ही पूरा किया और ई.1909 के भारतीय परिषद् अधिनियम में, ब्रिटिश-भारत की प्रत्येक विधान सभा के लिए मुसलमानों को अपनी जनसंख्या के अनुपात से अधिक सदस्य चुनने का अधिकार दिया गया।

इसके बाद अंग्रेज सरकार की यह नीति हो गई कि जब भी कांग्रेस या हिन्दू महासभा या कोई अन्य राष्ट्रवादी संगठन आजादी की मांग को लेकर आंदोलन करे तो उसे लाठी-घूंसों से निबटो और जेल में पटको किंतु यदि जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग कुछ भी खून-खराबा करे तो उससे कुछ मत कहो।

यही कारण था कि जिन्ना और उसके दोस्तों को एक बार भी जेल गए बिना पाकिस्तान मिल गया। खुद लॉर्ड माउंटबेटन ने जिन्ना को थाली में परसोकर पाकिस्तान भेंट किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अलवर महाराजा जयसिंह ने लेडी वायसराय के कुत्ते को अपने डेरे में नहीं घुसने दिया !

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अलवर महाराजा जयसिंह की गिनती भारत के इतिहास में बीसवीं सदी के महान व्यक्तियों में होती है। महाराजा स्वतंत्र विचारों के धनी और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। उनकी राष्ट्रभक्ति असंदिग्ध थी। इस कारण अंग्रेज उनकी तरफ से सदैव ही आशंकित रहते थे।

अलवर महाराजा जयसिंह केवल 10 वर्ष की आयु में राजा बने थे। वे स्वयं को भगवान श्रीराम का अवतार समझते थे तथा अपने हाथ की दिव्य अंगुलियों को ढंकने के लिये सिल्क के काले रंग के दस्ताने पहनते थे। यहाँ तक कि एक बार उन्होंने ब्रिटिश सम्राट से हाथ मिलाते समय भी अपने दस्ताने उतारने से मना कर दिया था।

भारत में ऐसा करने की हिम्मत केवल दो राजाओं में थी, एक थे उदयपुर के महाराणा फतेहसिंह तथा दूसरे थे अलवर के महाराजा जयसिंह। इन दोनों को ही अंग्रेजों ने राजगद्दी से हटाया।

उदयपुर का राज्य तो उनके पुत्र भूपालसिंह को दे दिया गया तथा महाराणा अपने राज्य में बने रहे किंतु अलवर का राज्य छीनकर महाराजा जयसिंह को अलवर राज्य से निकाल दिया गया।

अलवर के इस महान राजा के बारे में आज लोग भूल गए हैं किंतु उनका इतिहास भारत के प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणादायी है। युवाओं को उनका जीवन चरित्र अवश्य पढ़ना चाहिए।

वे खेलों के मैदान में भवागन नटवर नागर कृष्ण की सी कलाबाजियां दिखाने में कुशल थे। चाहे पोलो हो या क्रिकेट, घुड़सवारी हो या शिकार, इन सब में वे असाधारण थे। ऐसे व्यक्ति के प्रति वीर पूजा के भाव स्वतः ही जागते हैं। अतः जनता उनकी प्रशंसक थी।

अंग्रेज उनसे इस कारण दुखी रहते थे कि वह अंग्रेजों को अपने से बड़ा नहीं मानते थे। एक बार महाराजा ग्रीष्म प्रवास पर शिमला गए। वहां उन्हें ज्ञात हुआ कि भारत के वायसराय का परिवार भी शिमला आया हुआ है। महाराजा ने सदाशयता के नाते लेडी वायसराय को सायंकालीन भोजन के लिए अपने डेरे पर आमंत्रित किया। लेडी वायसराय संध्या काल में अपने पालतू कुत्ते के साथ महाराजा के डेरे पर पहुंची।

अलवर महाराजा जयसिंह ने नियम बना रखा था कि उनके डेरे में कोई कुत्ता प्रवेश नहीं कर सकता था। लेडी वायसराय को महाराजा के नियम से अवगत करवाया गया तथा अनुरोध किया कि वह कुत्ता, अपने सेवकों के साथ डेरे के बाहर छोड़ दे किंतु लेडी वायसराय ने जवाब दिया कि वह हिन्दुस्तान के स्वामी की पत्नी है और अपने कुत्ते को जहां चाहे लेजा सकती है।
महाराजा के अधिकारियों ने महाराजा को लेडी वायसराय के कुत्ते सहित आगमन की सूचना दी। महाराजा ने उन्हें कहा कि लेडी को आदर पूर्वक डेरे में लाया जाए किंतु उनके कुत्ते को डेरे से बाहर रोक लिया जाए।

सेवकों ने महाराजा को बताया कि लेडी अपने कुत्ते के साथ ही डेरे के भीतर आने की जिद्द कर रही है। इस पर महाराजा ने अपने अधिकारियों से कहा कि वे लेडी वायसराय से आग्रह करें कि वे अपनी जिद्द छोड़ दें।

महाराजा के इस जवाब से लेडी वायसराय नाराज हो गई और डेरे के बाहर से ही बिना भोजन किए लौट गई।
जब इस घटना की जानकारी देश भर के अंग्रेज अधिकारियों को हुई वे सन्न रह गए किंतु देशवासियों का सीना महाराजा के इस स्वाभिमान पूर्वक आचरण की सूचना पाकर गर्व से फूल गया।

महाराजा को बाद में इसकी कीमत अपना राज्य तथा अपने प्राण गंवाकर चुकानी पड़ी। महाराजा को उनके राज्य से निष्कासित करने के लिए अंग्रेजों ने कई चालें चलीं। उनके बारे में प्रचारित किया गया कि अलवर नरेश जयसिंह ने एक बार अपने घोड़े को इसलिए पैट्रोल छिड़कर जिंदा जला दिया क्योंकि वह रेस नहीं जीत सका था।

कोरफील्ड ने लिखा है कि महाराजा अपनी प्रजा की अपेक्षा अपने कुत्तों का अधिक ध्यान रखते थे। उनके बारे में दुष्प्रचार किया गया कि महाराजा के खर्चे बहुत बढ़े हुए थे जिसके कारण वे ऋण के बोझ से दबे हुए थे।

एक तत्कालीन इतिहासकार ने महाराजा के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए लिखा है-‘महाराजा जयसिंह अपने समय का बहुत विद्वान और दार्शनिक नरेश था। महाराजा जितनी कुशाग्र बुद्धि रखता था उतना ही निरंकुश था। वह हिन्दी भाषा का प्रेमी था, यों अंग्रेजी और फारसी का भी अच्छा ज्ञान रखता था।’

महाराजा को अंग्रेजी और हिन्दी पर समान अधिकार था और उन्हें संस्कृत का भी ज्ञान था।

महाराजा जायसिंह एक योग्य प्रशासक थे जिन्होंने अलवर राज्य का शासन प्रबंध आधुनिक रीति के अनुसार किया। वे पोलो तथा रैकेट के अच्छे खिलाड़ी थे। वे हिन्दू दर्शन के प्रकाण्ड ज्ञाता और उच्च कोटि के वक्ता थे। वे कई मायनों में अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में भाग लिया। ़ ़ ़़ महाराजा जयसिंह महान क्षमताओं से युक्त थे’।

बीसवीं सदी के परतंत्र भारत में बीकानेर नरेश गंगासिंह के साथ अलवर नरेश जयसिंह भी नरेन्द्र मण्डल की राजनीति में अग्रणी रहे थे। जयसिंह ने लंदन में ई.1931 में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भी भाग लिया था।

महाराजा की क्षमाशीलता की अनेक कहानियां प्रचलित थीं। राज्य का एक पदाधिकारी को नौकरी से निकाल दिया गया। वह कई दिनों तक हताश होकर इधर-उधर फिरता रहा। एक दिन उसने नीचे लिखा हुआ उर्दू पद्य महाराज की सेवा में डाक से भेजा-

मेरे गुनाह ज़ियादा हैं, या तेरी रहमत।
हिसाब करके बतादे, मेरे रहीम मुझे।।
महाराजा ने उस कर्मचारी को बहाल कर दिया।

एक बार एक गरीब बुढ़िया जयसमन्द बान्ध में डूबने लगी। महाराज भी अपने अंगरक्षकों सहित वहीं थे। गहरे पानी में डूबती बुढ़िया की दयनीय दशा देखकर भी किसी का कर्मचारी का साहस उसे बचाने का न हुआ। महाराजा ने स्वयं जल में कूदकर बुढ़िया के प्राणों की प्राण रक्षा की।

पण्डित मोतीलाल नेहरू ने एक बार शिमला में महाराजा के बारे में कहा था कि यह देश के लिये दुर्भाग्य की बात है कि उनका जनम राजकुमार के रूप में हुआ अन्यथा देश को एक बहुत योग्य और बड़ा नेता मिला होता।

एडविन मांटेग्यू ने महाराजा जयसिंह के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए अपनी डायरी में लिखा है- ‘महाराजा जयसिंह के समान कोई अन्य भारतीय इतना बुद्धिमान नहीं है।’

28 फरवरी 1920 के अपने भाषण में मांटेग्यू चैम्सफोर्ड ने कहा था- ‘अलवर का शासन प्रबंध तो उत्तम है, प्रजा की प्रसन्नता तथा सांत्वना और भी बड़ी बात हैं जिन पर अलवर नरेश का पूरा ध्यान है। महाराजा ने बन्धों के निर्माण कार्य द्वारा भूमि को सजला और शस्य श्यामला बनाने का जो प्रयत्न किया है, उनसे अकाल का भय न रहेगा और कृषक प्रजा सुखी रहेगी।’

इसके बावजूद कुछ अंग्रेज अधिकारी महाराजा जयसिंह से शत्रुता रखते थे और उन्हें पदच्युत करना चाहते थे। मेवों द्वारा राज्य में भयानक विद्रोह करने तथा राज्य के एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी द्वारा किसानों पर अत्याचार किए जाने से मची साम्प्रदायिक मार-काट के बाद अंग्रेजों ने बड़े ही मनमाना ढंग से 16 जून 1934 को महाराजा जयसिंह को उनके राज्य से बाहर निकाल दिया। महाराजा को राज्य छोड़कर विलायत जाना पड़ा।

19 मई 1937 को पेरिस में टेनिस खेलते हुए रीढ़ की हड्डी टूट जाने पर रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। कुछ भारतीय इतिहासकारों को महाराजा की मृत्यु के पीछे अंग्रेजों का षड़यंत्र लगता है।

शरीर त्याग से 4 घण्टे पूर्व तक महाराजा रघुनाथजी के ध्यान में मग्न रहे। अलवर महाराजा जयसिंह की मृत्यु पर झालावाड़ नरेश महाराजराणा राजेन्द्रसिंह ने लिखा था-

कैसो रंग मांहि भंग कियो है कराल काल,
सूखी फुलवारी आज रम्य काम काज की।
मिट गयो वीरता के भाल को तिलक लाल,
टूट गई आज ढाल क्षत्रिय समाज की।
सूख गयो हाय! आज प्रेम को अगाध सिन्धु,
कविता मिलेगी कहां रस सिर ताज की।
उर पर आरी चली काल की कटारी चली,
स्वर्ग को सवारी चली प्यारे जयराज की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्या गांधीजी राष्ट्रपिता हैं

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क्या गांधीजी राष्ट्रपिता हैं ? यह एक ऐसा उलझा हुआ प्रश्न है जिसका जवाब नहीं दिया जा सकता।

मोहनदास करमचंद गांधी निश्चित रूप से भारत की आजादी की लड़ाई का एक बड़ा चेहरा थे। वे बीसवीं सदी में दुनिया भर में जननेता और राजनीतिज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हुए।

वे कुछ समय के लिए लंदन तथा दक्षिण अफ्रीका में बैरिस्टर रहे किंतु प्रिटोरिया सरकार के कर्मचारियों ने उन्हें चलती ट्रेन से फैंक दिया और वे भारत आ गए।

भारत में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन नामक कई आंदोलनों की शुरुआत की किंतु उनके द्वारा चलाए गए ये आंदोलन या तो बीच में ही बंद कर दिए गए या स्वयं असफल हो गए।

गांधीजी को कुशल वक्ता, लेखक और पत्रकार के रूप में भी जाना जाता है किंतु जब देश को आजादी मिली तो उनकी बात सुनने और मानने वाला कोई नहीं था। इसलिए वे 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में नहीं थे, कलकत्ता के मियांबाग में उपवास कर रहे थे।

गांधीजी बड़े अर्थशास्त्री भी थे। उन्होंने भारत के लिए जो आर्थिक नीतियां सुझाईं थीं, उनकी प्रशंसा हर भारतीय करता है किंतु उन सिद्धांतों पर अमल कोई नहीं करता।

उन्हें महात्मा तथा राष्ट्रपिता जैसे महान शब्दों से सम्बोधित किया जाता है। इस बात पर भी कई लोगों को ऐतराज है।
हमारा ये वीडियो इसी बात की सत्यता जानने के लिए है कि क्या गांधीजी, वास्तव में भारत के राष्ट्रपिता हैं ? क्या दो रेडियो संदेशों ने उन्हें राष्ट्रपिता बनाया ?

गाँधीजी को राष्ट्रपिता की उपाधि किसने दी ?

इसकी कोई वैधानिकता है भी अथवा नहीं ?

वर्ष 2005 में केन्द्रीय सूचना का अधिकार अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद कुछ नागरिकों ने भारत सरकार से उन दस्तावेजों की मांग की जिनके आधार पर गांधीजी को राष्ट्रपिता घोषित किया गया या उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि दी गई!
भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने इस प्रार्थना पत्र के जवाब में संवैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत सरकार ने गांधीजी को राष्ट्रपिता की उपाधि नहीं दी।

अर्थात् भारत सरकार ने उन्हें कभी भी राष्ट्रपिता घोषित नहीं किया।

प्रश्न उठता है कि जब उन्हें सरकार द्वारा जारी लाखों दस्तावेजों में राष्ट्रपिता कहा जाता रहा है तो उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि क्यों नहीं दी गई ?

इस प्रश्न का जवाब यह है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 8 (1) में सरकार को शैक्षिक और सैन्य खिताब के अतिरक्ति और कोई उपाधि देने की अनुमति नहीं है। राष्ट्रपिता न तो शैक्षिक उपाधि है और न सैनिक।

जब कानून गांधीजी भारत के राष्ट्रपिता नहीं हैं तो फिर किस अधिकार से हैं?

इस प्रश्न का जवाब यह है कि यह केवल एक राजनीतिक बयान है जो दो बड़े नेताओं द्वारा केवल दो बार रेडियो पर दोहराया गया और गांधीजी भारत के राष्ट्रपिता कहलाने लगे।

4 जून 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से एक संदेश में गांधीजी को ‘देश का पिता’ कहकर संबोधित किया। इस वक्तव्य में राष्ट्रपिता शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था। उन्हें ‘देश का पिता’ कहकर संबोधित किया गया था।
6 जुलाई 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से गांधीजी के लिए पहली बार ‘राष्ट्रपिता’ शब्द का प्रयोग किया।
दूसरी बार 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या होने के बाद देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत की जनता के नाम रेडियो पर दिए गए संदेश में कहा कि राष्ट्रपिता अब नहीं रहे।

बस इन दो रेडियो संदेशों ने गांधीजी को भारत का राष्ट्रपिता बना दिया।

लगे हाथों गांधीजी के नाम के साथ जुड़े महात्मा शब्द पर भी विचार कर लिया जाए। सबसे पहले 12 अप्रैल 1919 को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गांधीजी को लिखे एक पत्र में उन्हें ‘महात्मा’ शब्द से सम्बोधित किया। बस तभी से गांधीजी महात्मा हो गए।

इस प्रकार गांधीजी के नाम के साथ जुड़े ये दोनों विशेषण संवैधानिक स्थिति का नहीं अपितु भावनात्मक स्थिति का प्रदर्शन करते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मृत्यु के समय कष्ट होता है ?

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इस संसार में समस्त प्राणी मृत्यु से भयभीत रहते हैं। उनमें से मनुष्य नामक प्राणी, मृत्यु का भय सर्वाधिक अनुभव करता है। संसार भर की सभ्यताओं में यह विश्वास किया जाता है कि मनुष्य को मृत्यु के समय कष्ट होता है।

जाने कब और किस रूप में मृत्यु आकर प्राणी को दबोच ले, कोई नहीं जानता। हमारे धर्म ग्रंथों में मृत्यु का ऐसा भयावह वर्णन किया गया है कि उसे पढ़कर आदमी की रूह कांप जाती है। मृत्यु के समय शरीर से प्राण निकलने की प्रक्रिया बड़ी भयानक बताई गई है।

मृत्यु के समय कष्ट होता है, इसे किसी प्रयोगशाला में अब तक सिद्ध नहीं किया जा सका है। भारतीय धर्मशास्त्र मृत्यु को नींद की गहरी अवस्था मानते हैं जबकि अध्यात्मशास्त्र के अनुसार मृत्यृ नींद नहीं है, अपितु सांसारिक नींद से जागने और ईश्वर की ओर उन्मुख होने की प्रक्रिया है।

गरुड़ पुराण एवं महाभारत आदि कुछ ग्रंथों में मृत्यु के तुरंत बाद वैतरणी नदी पार करने में होने वाले असीम कष्टों का वर्णन किया गया है। उसके बाद कर्मों के फल के अनुसार स्वर्ग-नर्क भोगने की बात कही गई है।

स्वर्ग मिला तो ठीक अन्यथा नर्क के कष्ट और भी भयानक बताए गए हैं। स्वर्ग और नर्क भोगने की अवधि पूरी होने के बाद फिर से माँ के पेट में नौ माह उलटे लटक कर कष्ट भोगने की बातें बहुत ही बढ़ा-चढ़ाकर कही गई हैं।

संसार में अधिकतर लोगों को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि आज तक किसी ने मृत्यु के बाद लौटकर यह नहीं बताया कि मरते समय कितना कष्ट होता है किंतु मरने वाले के चेहरे पर मांसपेशियों के तनाव से यह अनुभव किया जा सकता है कि मृत्यु के समय अपार कष्ट होता है।

जबकि वास्तविकता यह है कि कुछ लोग मरने के बाद फिर से अपनी देह में लौटकर आते हैं। कुछ लोग मरने के चार-पांच घण्टे बाद अर्थियों से उठ-बैठते हैं तो कुछ लोग शमशान पहुंचकर जीवित होते हैं।

शरीर में लौटकर आने वाले व्यक्तियों ने प्रायः अपने अनुभव सुनाए हैं किंतु यह कभी नहीं बताया कि उन्हें मृत्यु के समय किसी भयानक दर्द का सामना करना पड़ा था। वे मरने के क्षण से लेकर देह में वापस लौटने के क्षण के बीच का उल्लेख एक रोचक सपने के समान करते हैं।

अपनी मृत अवस्था में वे किसी यात्रा का उल्लेख करते हैं, किसी से मिलने का उल्लेख करते हैं तथा किसी व्यक्ति द्वारा किन्ही लोगों को आदेश दिए जाने का उल्लेख करते हैं कि इस व्यक्ति की मृत्यु का समय नहीं हुआ, इसलिए इसे फिर से इसके शरीर में डालकर आओ।

कभी भी किसी ने भी मृत्यु के समय या फिर से देह में लौटते समय किसी दर्दनाक अनुभव होने का उल्लेख नहीं किया है। हां वे एक धक्का लगने जैसा अनुभव अवश्य करते हैं।

हमारे धर्मग्रंथों में मृत्यु के समय जिस दर्द के होने का उल्लेख किया गया है वह लोगों को नैतिकता के मार्ग पर चलने के लिए दिखाया गया एक काल्पनिक भय है। उसमें सच्चाई नहीं है।

वास्तव में मृत्यु एक दर्द रहित प्रक्रिया है। जिस प्रकार किसी ऑपरेशन के पहले हमें बहुत भय लगता है किंतु ऑपरेशन के समय एनेस्थेशिया दिए जाने के कारण दर्द का अनुभव तक नहीं होता, उसी प्रकार प्रकृति मृत्यु के समय जीवात्मा को विशेष प्रकार के एनेस्थेशया देती है जिसके कारण न तो शरीर को दर्द होता है और न शरीर को छोड़कर जाने वाले जीवात्मा को।

जिन लोगों के चेहरे की मांसपेशियों में, मृत्यु के समय या बाद भी तनाव दिखाई देता है, वह मनुष्य के द्वारा मृत्यु के समय भोगी गई दर्दनाक स्थिति के कारण नहीं होता अपितु मरने से पहले उनके मन में मृत्यु का जो भय होता है, उसके कारण उनके चेहरे की मांसपेशियां तनाव में आ जाती हैं।

इसे ऐसे समझा जा सकता है कि दो बच्चों को एक ही प्रकार का इंजेक्शन लगाने पर एक बच्चा तो चीख-चीख कर आसमान भर देता है जबकि दूसरा बच्चा आराम से इंजेक्शन लगवा लेता है, वह उफ तक नहीं करता।
पहला बच्चा जो इंजेक्शन के लगने पर चीखता-चिल्लाता है, वह वस्तुतः उसी समय से रोने लगता है जिस समय उसे ज्ञात होता है कि उसे इंजेक्शन लगेगा।

ठीक यही स्थिति मृत्यु के सम्बन्ध में है, हम मृत्यु के भय से स्वयं को इतना भयभीत कर लेते हैं कि हमारे चेहरे की मांसपेशियां स्वतः उसी प्रकार खिंच जाती हैं जिस प्रकार कष्ट में खिंचनी चाहिए।

एक और उदाहरण लेते हैं। एक व्यक्ति को किसी देश के न्यायालय ने मृत्यु दण्ड दिया। वैज्ञानिकों ने उसके साथ एक प्रयोग किया। उसे एक कोबरा सांप दिखाकर कहा गया कि एक माह बाद तुम्हें इस कोबरा के दंश से मरवाया जाएगा। उस व्यक्ति को प्रतिदिन वह कोबरा दिखाया गया तथा एक माह बाद उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर उसे केवल दो सुइयां चुभाई गईं।

सुइयों के चुभते ही वह व्यक्ति छटपाने लगा और थोड़ी ही देर में मर गया। उसका शरीर भी ठीक वैसे ही नीला पड़ गया जैसा कि सर्पदंश के समय होता है। वैज्ञानिकों के द्वारा परीक्षण किए जाने पर ज्ञात हुआ कि उस व्यक्ति के शरीर में वही जहर पाया गया जो कि कोबरा सांप में होता है।

मृतक के शरीर में जहर कहां से आया, जबकि उसे सर्पदंश तो लगवाया ही नहीं गया था? निश्चित रूप से यह जहर उसी सजायाफ्ता व्यक्ति के मन में बैठे हुए डर ने पैदा किया था।

मृत्यु के मामले में भी ठीक ऐसा ही होता है। मृत्यु हमें दर्द नहीं देती, हम स्वयं अपने आपको दर्द देने के लिए जीवन भर तैयार करते हैं।

अब हम मृत्यु की घटना को आध्यात्मिक स्तर पर समझने का प्रयास करते हैं। मनुष्य की मृत्यु सामान्यतः तीन प्रकार से होती है, वृद्धावस्था आने पर होने वाली स्वाभाविक मृत्यु, बीमारी के कारण किसी भी आयु में होने वाली मृत्यु तथा दुर्घटना, हत्या या फांसी आदि में होने वाली अचानक मृत्यु।

इनमें से वृद्धावस्था में होने वाली स्वाभाविक मृत्यु तथा बीमारी की अवस्था में होने वाली मृत्यु के समय आदमी लेटा हुआ रहता है। ऐसी अवस्था में मृत्यु होने पर मनुष्य का सूक्ष्म शरीर अर्थात् एस्ट्रल बॉडी अर्थात् जीवात्मा, मरणासन्न मनुष्य के स्थूल शरीर से बाहर निकल कर उसके ऊपर तैरने लगता है। स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म शरीर एक मुलायम डोरी से कनैक्टेड रहते हैं।

जिस प्रकार जन्म की एक घड़ी आ जाती है, उसके बाद जीव मां के पेट में नहीं रुक सकता, उसी प्रकार मृत्यु की भी एक घड़ी आ जाती है, उसके बाद मनुष्य अपने स्थूल शरीर में नहीं रुक सकता। अतः जीवात्मा, स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर के बीच की कॉड को झटका देकर तोड़ डालता है। कई बार जीवात्मा को लेने आई दूसरी जीवात्माएं मरणासन्न व्यक्ति की सहायता करती हैं तथा वे दाई अथवा नर्स की भूमिका निभाती हैं।

स्थूल शरीर सिल्वर कॉड के टूटने की इस घटना को देखता है और उसके चेहरे पर तनाव एवं दर्द के भाव उत्पन्न होते हैं जबकि इस प्रक्रिया में ठीक वैसे ही कोई कष्ट नहीं होता जैसे जन्म के समय आम्बल नाल काटने पर न मां को और न बच्चे को कोई कष्ट होता है। या हमें बाल एवं नाखून काटने पर होता है।

दुर्घटना, हत्या एवं फांसी आदि से होने वाली मृत्यु में मनुष्य प्रायः बैठा हुआ या खड़ा होता है। ऐसी अवस्स्था में होने वाली मृत्यु की घटनाओं को मनुष्य अपनी आंखों से मृत्यु को निकट आते हुए देखता है।

एक उदाहरण से इस समझते हैं। माना जाए कि कोई मनुष्य सड़क पर चल रहा है और वह अचानक अपने सामने तेज गति से आते हुए किसी ट्रक को देखता है। वह समझ जाता है कि उसका इस ट्रक के नीचे कुचल कर मरना तय है। ऐसी अवस्था में वह पूरा जोर लगाकर आगे या पीछे भागने का प्रयास करता है किंतु मनुष्य के सड़क पार करने से पहले ही ट्रक इतना नजदीक आ जाता है कि वह समझ जाता है कि अगले ही क्षण वह ट्रक के नीचे होगा।

ऐसी भयावह स्थिति में भय के कारण मनुष्य की एस्ट्रल बॉडी अर्थात् सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर से स्वयं कूदकर बाहर आ जाती है। अर्थात् मनुष्य ट्रक शरीर पर चढ़ने से पहले ही मर जाता है। किसी भूत-प्रेत को देखकर दम निकल जाना, किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु का समाचार सुनकर मर जाना, जैसी स्थितियां इसी प्रकार की घटनाओं का परिणाम हैं।

अतः प्रत्येक मनुष्य के लिए इसे समझना आवश्यक है कि मृत्यु एक सहज स्वाभाविक क्रिया है, चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ प्राणी जन्म और मृत्यु की घटना को चौरासी लाख बार भोगता है, उसे इसका पूरा अनुभव होता है। प्रकृति भी इस काम में प्राणी की पूरी सहायता करती है। अतः मृत्यु से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

स्वामी विवेकानंद शिकागो उद्बोधन के बाद क्यों रोए!

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स्वामी विवेकानंद का शिकागो उद्बोधन एक अंतर्राष्ट्रीय महत्व की घटना है। कहा जाता है कि शिकागो सम्मेलन में उद्बोधन देने के बाद स्वामीजी रात्रि में रोए। इस आलेख में हम इस बात पर विचार करेंगे कि क्या स्वामीजी उस रात्रि में सचमुच रोए थे!

सदियों की गुलामी भोगने के बाद हिन्दू जाति में पहले मनुष्य स्वामी विवेकानंद हुए जिन्होंने विश्व मंच पर खड़े होकर सम्पूर्ण हिन्दू जाति को ललकार कर कहा था कि हम बहुत रो चुके हैं, अब हमें रोने की आवश्यकता नहीं है। उठो अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। उन्होंने कहा ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से ही हमारी हैं। यह हमीं हैं जो अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि यहां कितना अंधेरा है।

स्वामी विवेकानंद केवल 39 वर्ष 5 महीने और 24 दिन धरती पर रहे। इस अवधि में भी लगभग चार साल उन्होंने अमरीका एवं यूरोप की धरती पर बिताए। इस प्रकार अपने सक्रिय जीवन का बहुत कम हिस्सा उन्हें भारत में रहकर भारतीयों के बीच बिताने के लिए उपलब्ध हुआ। स्वामी विवेकानंद को भारतीयों से पहले अमरीकियों और यूरोपवासियों ने पहचाना। भारत ने तो स्वामी विवेकानंद को अमरीकियों एवं यूरोपवासियों की आंखों से देखा।

विगत एक हजार सालों से भी अधिक समय से गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए भारत के पास वह आंख ही कहाँ बची थी जो वह स्वामी विवेकानंद को पहचान सकती! अमरीकियों ने उन्हें देखा तो दीवाने होकर उनकी तरफ दौड़ पड़े।

यूरोपियनों ने उन्हें देखा तो उनके समक्ष नतमस्तक हो गए। भारत की धरती से बाहर पैर रखने से पहले स्वामी रामकृष्ण परमहंस, खेतड़ी नरेश अजीतसिंह तथा गुरुभाई अभेदानंद जैसे कुछ ही लोग स्वामीजी को पहचान पाए थे कि यह धधकती हुई ज्वाला किसी दिन भारत का उद्धार करेगी।

कहा जाता है कि जब स्वामीजी ने 11 सितम्बर 1893 के शिकागो सम्मेलन में अपना सम्बोधन माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका जैसे शब्दों से आरम्भ किया तो उस हॉल में बैठे सात हजार लोग हैरान रह गए। वे लोग लेडीज एण्ड जैण्टलमैन सुनने के अभ्यस्त थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि किसी व्यक्ति के लिए समाज का प्रत्येक व्यक्ति भाई और बहिन हो सकता है!

उस हॉल में बैठे यूरोपियन्स को यह सुनकर बड़ी हैरानी हुई कि एक गुलाम देश से आया हुए निर्धन युवा तपस्वी अपने शासकों के लिए ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स जैसे बराबरी वाले शब्दों का प्रयोग करने का साहस रखता है!

भारत के बुद्धिवादियों का मानना है कि ‘माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका’ ने पश्चिमी सभ्यता के लोगों पर जादू का सा असर किया क्योंकि वहां किन्हीं दो अनजान स्त्री-पुरुष के बीच भाई-बहिन जैसे पवित्र सम्बन्ध की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

यह सही है कि स्वामीजी द्वारा उच्चारित ‘माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका’ ने पश्चिमी सभ्यता के लोगों पर जादुई असर किया किंतु यह पूरी वास्तविकता नहीं है। पूरी वास्तविकता इससे कहीं बहुत आगे और कहीं बहुत गहरी है।

स्वामीजी ने यदि माई ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका के स्थान पर कुछ और शब्दों का प्रयोग किया होता तो भी पश्चिमी सभ्यता के लोगों के दिलों पर इतना ही जादुई असर हुआ होता।

बुद्धिवादी समाज द्वारा इस जादुई असर के कारणों की बुद्धिवादी व्याख्या की गई है, सम्पूर्ण व्याख्या नहीं की गई है। स्वामीजी के शब्दों के जादुई असर की सम्पूर्ण व्याख्या के लिए हमें बुद्धिवादियों की ओर नहीं अपितु आस्थावादियों की ओर देखना पड़ेगा।

इस वीडियो में, मैं जो कहना चाहता हूँ, उसे कहने से पहले मैं बुद्धिवादियों द्वारा स्वामीजी के जीवन के विश्लेषण के सम्बन्ध में प्रस्तुत इस निष्कर्ष का स्मरण कराना चाहता हूँ कि स्वामीजी बहुत कम समय के जीवन में 1500 वर्ष का कार्य कर गए। यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि वे मात्र प्रसिद्ध नहीं थे अपितु ‘सिद्ध’ थे। इसी शब्द में स्वामीजी की सफलता का रहस्य छिपा हुआ है। वे सिद्ध थे, इसीलिए उनके शब्दों ने पश्चिमी जगत् के बुद्धिजीवियों पर जादुई असर किया।

स्वामी विवेकानंद के लिए समस्त भारतीय उनके अपने थे किंतु अन्य देशों के लोग भी पराए नहीं थे। इसीलिए वे पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचने में सफल हुए। उनके जीवन का उद्देश्य हिन्दुओं को इस योग्य बनाना था जिससे वे पूरी दुनिया के समक्ष आत्मविश्वास और बराबरी के साथ खड़े हो सकें। वे जानते थे कि हिन्दू जाति में अध्यात्म की पवित्र और उज्जवल ज्वाला धधक रही है किंतु उसे अज्ञान और गुलामी की राख ने ढंक लिया है।

स्वामीजी इस राख को ज्ञान की कुरेदनी से हटाना चाहते थे। वे जानते थे कि अज्ञान की धूल ने हिन्दुओं को कूपमण्डूक बना दिया है जिसके कारण स्वामीजी को हिन्दुओं का ही सर्वाधिक विरोध सहन करना पड़ता था।

उन्होंने कई बार इस बात को कहा कि जब भी मैं कोई महान कार्य करना चाहता हूँ, तब मुझे मौत की घाटी से गुजरना पड़ता है। अपने ही देश के कूपमण्डूक हिन्दुओं द्वारा किए जा रहे विरोध के उपरांत भी स्वामीजी अपना कार्य करते रहे और वे शिकागो में भारत की आत्मा की आवाज बनकर जा पहुंचे।

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो की 17 दिवसीय धर्मसंसद के दौरान शिकागो शहर में छः व्याख्यान दिए जिनके माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति, सभ्यता और दर्शन को पश्चिमी बुद्धिजीवियों के समक्ष रखा। उनके व्याख्यानों ने भारत की परिभाषा बदल दी।

विवेकानंद के व्याख्यानों से पहले धर्मसंसद केवल इस बात पर बहस कर रही थी कि दुनिया के लिए ईसाईवाद अच्छा है या यहूदीवाद! स्वामीजी ने उस बहस का रुख मोड़कर उसे हिन्दूवाद अर्थात् हिन्दुत्व पर ला दिया। दुनिया भर से आए 7000 बुद्धिजीविायों ने पहली बार हिंदुत्व के बारे में सुना और जाना।

स्वामीजी के व्याख्यानों ने न केवल शिकागो धर्मससंद की दिशा बदली अपितु पूरी दुनिया के चिंतन की दिशा भी बदल दी। पश्चिम के लोग पागलों की तरह स्वामीजी को सुनने के लिए दौड़ पड़े।

जब स्वामी विवेकानंद समुद्र के किनारे भ्रमण करने जाते तो दुनिया भर के नर-नारी उनके सामने खड़े हो जाते। स्वामीजी चलते रहते और हिन्दुत्व के बारे में बोलते रहते। दुनिया उन्हें सुनती रहती और उलटे पैरों चलती रहती। जब स्वामीजी बोलना बंद करते तो लोग हैरान होकर स्वयं को देखते कि कैसे वे उल्टे पैरों इतनी देर तक चलते रहे।

स्वामीजी के मुख से निकले हिन्दुत्व का जादू पूरी दुनिया के सिर चढ़कर बोलने लगा। जिस भारत को अंग्रेजों ने सांप और सपेरों का देश कहकर पूरी दुनिया में बदनाम कर रखा था, वह देश अध्यात्म और दर्शन की भूमि के रूप में पुनर्प्रतिष्ठित हो गया और संसार भर का प्यारा बन गया।

दुनिया भर से मिले इसी प्यार ने भारत को मात्र अगले 54 वर्षों में आजादी दिलवा दी। विगत हजार सालों से भी अधिक समय से गुलामी भोग रहा भारत मात्र पचास साल में आजाद हो जाए, यह स्वामीजी के शिकागो चमत्कार ही परिणाम था।

स्वामी विवेकानंद ने न केवल भारतवासियों की सोती हुई आत्मा को झिंझोड़ कर उठा दिया अपितु पूरी दुनिया को भारत की वास्तविक आत्मा का दर्शन करवाकर उसे आदरणीय एवं वंदनीय बना दिया। ऐसे भारत को भला अब संसार की कौनसी शक्ति गुलाम बनाकर रख सकती थी!

कहा जाता है कि 11 सितम्बर 1893 को दिए गए शिकागो उद्बोधन के बाद रात में स्वामीजी फूट-फूट कर रोए। यह बात पूरी दुनिया को बीबीसी की अमरीकी महिला एंकर एमिली ब्यूकान ने बताई थी। स्वामीजी को बीबीसी की इसी अमरीकी महिला ने शिकागो सम्मेलन में प्रवेश दिलवाया था। वही स्वामीजी को अपने घर ले गई थी।

लगभग आधी रात के बाद एमिली ने स्वामीजी के कमरे से किसी के रोने की आवाज सुनी। जब एमिली ने स्वामीजी के कमरे में झांककर देखा तो स्वामीजी रो रहे थे। एमिली ने आश्चर्यचकित होकर स्वामीजी से उनके रोने का कारण पूछा।

एक शोधकर्ता ने हाल ही में दावा किया है कि स्वामीजी ने कहा कि जो नाम और प्रसिद्धि मुझे आज मिली है, इस नाम और यश का मैं क्या करूँगा। मुझे तो अपने भारतवासियों के बारे में सोच कर रोना आ रहा है जो आज भी गरीबी में रह रहे हैं।

आधुनिक शोधकर्ता भले ही कुछ भी दावा करते रहें किंतु स्वामीजी के रोने का कारण कुछ और ही था। एमिली ब्यूकान के अतिरिक्त कुछ अन्य लोगों ने भी स्वामीजी को रोते हुए देखा था। इन लोगों का कहना था कि जब स्वामीजी से उनके रोने का कारण पूछा गया तो उन्होंने उत्तर दिया कि उन्हें भगवान का वियोग सताता है, अर्थात् उन्हें भगवान की याद आती है जिसके कारण उन्हें रोना आ जाता है।

यह सर्वविदित है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को दिव्य-दृष्टि प्रदान करके भगवती काली के दर्शन करवाए थे। जब एक बार स्वामी विवेकानंद ने काली को अपनी आंखों से देख लिया तो वे माँ के बार-बार दर्शन करने के लिए छटपटाने लगे।

स्वामीजी को काली माता की याद उसी तरह आती थी जिस तरह हमें अपने बिछुड़े हुए माता-पिता, पुत्र-पुत्री एवं भाई-बहिनों की याद आती है। कोई विदेशी व्यक्ति जिसने हिन्दुत्व को न समझ हो, वह बहुत कठिनाई से ही इस बात को समझ सकता है कि कोई व्यक्ति परमात्मा के लिए वियोग की पीड़ा को इतनी गहराई से अनुभव करे कि उसे रोना आ जाए। हालांकि हिन्दुओं के लिए इस पीड़ा को अनुभव करना अधिक कठिन है।

ईश्वर का स्मरण होने पर स्वामीजी कई बार रो पड़ते थे। एक बार उनके खेतड़ी प्रवास में मैनाबाई नामक एक गायिका ने उन्हें सूरदासजी द्वारा रचित एक पद सुनाया-

प्रभुजी मोरे अवगुण चित न धरो।

समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो।।

इस पद को सुनकर स्वामीजी की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। स्वामी विवेकानंद सम्पूर्ण भारत भूमि को तीर्थ एवं देवभूमि मानते थे। इसलिए वे भारत माता की वंदना देवी की तरह करते थे। जब चार साल के विदेश भ्रमण के बाद स्वामीजी भारत लौटे तो वे भारत माता को प्रणाम करते हुए रो पड़े थे।

स्वामीजी के रोने का कारण समझना है तो हमें मीरांबाई का यह पद स्मरण करना चाहिए-

हे री! मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाने कोय!

कबीर ने भी लिखा है-

सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै!
दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै!

चैतन्य महाप्रभु से लेकर साध्वी ऋतंभरा को दुनिया ने बार-बार रोते हुए देखा है। प्रेम में भावुकता, भावुकता में विरह और विरह में आंसू! ये तो साथ-साथ ही प्रकट होते हैं।

यदि यह प्रेम, भावुकता और विरह ईश्वर के प्रति हो तो अश्रुओं की मात्रा और कीमत दोनों समझी जा सकती हैं। स्वामी विवेकानंद के रोने का यही कारण था। वे ईश्वर से प्रेम करते थे। उन्हें ईश्वर से प्रेम करना हिन्दुत्व ने सिखाया था।

मात्र साढ़े उन्तालीस वर्ष की आयु में स्वामीजी धरती छोड़कर परमात्मा के पास चले गए किंतु वे जो कुछ भारत माता तथा भारतवासियों के लिए करके गए वह डेढ़ हजार वर्ष में किया जाने वाला कार्य था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अकबर की मूर्खता (161)

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अकबर की मूर्खता

अकबर ने एक धूर्त व्यक्ति को अपने दरबार में अथर्ववेद के फारसी अनुवाद के काम पर रख लिया जो मूलतः ब्राह्मण था और यह कहता था कि वह अथर्ववेद को पढ़कर मुसलमान बना है क्योंकि अथर्ववेद में लिखा है कि ब्राह्मण भी मांस खा सकता है। अकबर उस धूर्त की धूर्तता को नहीं समझ सका और उस धूर्त ने अकबर की मूर्खता का खूब लाभ उठाया।

अकबर ने सैनिक व्यय की पूर्ति तथा शाही खजाने में वृद्धि के लिए भू-राजस्व से होने वाली आय को बढ़ाने का विचार किया तथा इसके लिए पूरी सल्तनत में भूमि की नाप-जोख करके प्रत्येक एक करोड़ की आय वाली इकाई पर करोड़ियों की नियुक्ति की।

करोड़ियों को यह दायित्व दिया गया कि वे भूमि कर वसूलने के साथ-साथ अपने क्षेत्र में स्थित समस्त बंजर भूमि को तीन साल की अवधि में उपजाऊ भूमि में बदल दें ताकि शाही खजाने में अधिक कर प्राप्त हो सके।

जिन बेईमान करोड़ियों ने शहंशाह की इच्छा के अनुरूप काम नहीं किया तथा किसानों को परेशान किया, राजा टोडरमल ने उन करोड़ियों को हथकड़ी, बेड़ी एवं डण्डा लगाकर जेलों में बंद कर दिया जहाँ उनमें से अधिकांश करोड़ी मृत्यु को प्राप्त हो गए।

हमने पिछले कुछ आलेखों में चर्चा की थी कि अकबर को हिन्दुओं के प्रसिद्ध ग्रंथों में छिपा ज्ञान प्राप्त करने का चस्का लग गया था और वह चाहता था कि अन्य मुस्लिम अमीर एवं शहजादे भी इन ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त करें।

इसलिए अकबर ने महाभारत आदि कुछ ग्रंथों का फारसी में अनुवाद करवाया जिनकी चित्रित प्रतियों को अकबर के अमीरों ने बड़ी ऊंची कीमत देकर खरीदा।

जब इन पुस्तकों को लोकप्रियता मिलने लगी तो अकबर ने मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी को निर्देश दिए कि वह सिंहासन बत्तीसी का फारसी में अनुवाद करके बादशाह की सेवा में प्रस्तुत करे।

बदायूंनी की सहायता के लिए एक हिन्दू विद्वान को भी नियुक्त किया गया ताकि वह बदायूंनी को सिंहासन बत्तीसी के मर्म की जानकारी दे सके। इस ग्रंथ में उज्जैन के एक प्राचीन राजा विक्रमादित्य की बुद्धिमत्ता की बत्तीस कहानियां लिखी गई हैं।

हिन्दुओं में मान्यता है कि ये कहानियां कपोल-कल्पित नहीं हैं, अपितु सत्य-घटनाओं पर आधारित हैं। हिन्दुओं का यह भी मानना है कि उज्जैन का राजा विक्रमादित्य चमत्कारी एवं बुद्धिमान पुरुष था जिसने अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन किया था।

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हिन्दू मानते हैं कि सिंहासन बत्तीसी की कथाओं की घटनाएं राजा विक्रमादित्य के साथ वास्तव में घटित हुई थीं। कुछ लोग इस विक्रमादित्य को ईसा की प्रथम शताब्दी में हुए उज्जैन का राजा शकारि विक्रमादित्य मानते हैं जिसने अयोध्याजी में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का नवनिर्माण करवाया था तथा भारत-भूमि को शकों से मुक्त करवाकर शकारि संवत् चलाया था जिसे अब शक संवत् कहा जाता है। भारत सरकार आज भी इस शक-संवत के कैलेण्डर को मान्यता देती है।

जब अकबर ने सिंहासन बत्तीसी की कथाओं को सुना तो वह राजा विक्रमादित्य से बहुत प्रभावित हुआ तथा उसने मुल्ला बदायूंनी ने आदेश दिया कि वह इस पुस्तक का फारसी में अनुवाद करे।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने सिंहासनी बत्तीसी के फारसी अनुवाद का शीर्षक ‘नामा-ए-खिराद-अफ्जा’ अर्थात् बौद्धिक आनंद की पुस्तक रखा। जब अकबर ने इस पुस्तक के अनुवाद को पढ़ा तो अकबर बड़ा प्रसन्न हुआ। अकबर ने इस अनुवाद को अपने व्यक्तिगत पुस्तकालय में सम्मिलित कर लिया।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि इन्हीं दिनों दक्षिण भारत से एक ब्राह्मण अकबर के दरबार में आया। उसका मूल नाम पण्डित भावन था। उसने हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम ग्रहण कर लिया था।

बदायूंनी ने लिखा है कि पण्डित भावन का दावा था कि उसने अथर्ववेद को पढ़कर हिन्दू से मुसलमान होने की प्रेरणा प्राप्त की है क्योंकि अथर्ववेद में लिखा है कि विशेष परिस्थिति में हिन्दू भी गाय का मांस खा सकता है और शव को जलाने के स्थान पर धरती में गाड़ भी सकता है।

भावन का दावा था कि अथर्ववेद में एक श्लोक है जिसमें यह कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति इस श्लोक को नहीं पढ़ेगा तो वह नहीं बचेगा। इस श्लोक में अल अक्षरों का बारम्बार प्रयोग हुआ है।

मुल्ला बदायूंनी का मानना था कि यह श्लोक ‘ला-इलाह-इलिल्लाह’ से मेल खाता है। इसी से भावन को हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने की प्रेरणा मिली थी।

वस्तुतः पण्डित भावन ने अकबर की कृपा पाने के लिए हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था और अपनी तरफ से मनगढ़ंत बातें अकबर और मुल्ला बदायूंनी को सिखाई थीं। इस प्रकार भावन ने अकबर को जमकर मूर्ख बनाया तथा अकबर की मूर्खता का जमकर लाभ उठाया।

अकबर ने मुल्ला बदायूंनी से कहा कि वह अथर्ववेद का फारसी में अनुवाद करे तथा इस कार्य में अथर्ववेद के विद्वान पण्डित भावन की भी सहायता ले जो कि अब मुसलमान हो गया था।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि इस पुस्तक के बहुत से विचार इस्लाम के नियमों से मेल खाते हैं किंतु मुल्ला बदायूंनी को उसके बहुत से अंशों का फारसी में अनुवाद करने में कठिनाई आई।

यहाँ तक कि पण्डित भावन भी अथर्ववेद के उन अंशों के अर्थ नहीं बता सका। इससे स्पष्ट है कि पण्डित भावन एक धूर्त व्यक्ति था। उसे अथर्ववेद का कुछ भी ज्ञान नहीं था।

उसने अकबर को मूर्ख बनाकर पद, प्रतिष्ठा एवं धन ऐंठने के उद्देश्य से अथर्ववेद में एक ऐसी ऋचा घुसाने का असफल प्रयास किया जिससे लगे कि अथर्ववेद में अल्लाह शब्द का उल्लेख किया गया है तथा जो कोई भी व्यक्ति इस ऋचा को नहीं पढ़ेगा, वह धरती पर जीवित नहीं बचेगा।

जब मुल्ला बदायूंनी ने अकबर को बताया कि मैं अथर्ववेद के कुछ अंश समझने में असमर्थ हूँ तथा पण्डित भावन भी इस कार्य में मेरी सहायता नहीं कर पा रहा है तो अकबर ने आदेश दिया कि इस कार्य में शेख फैजी, तथा हाजी इब्राहीम की सहायता ली जाए। अकबर की मूर्खता यह अकबर की मूर्खता का एक और उदाहरण था, जो लोग संस्कृत और फारसी दोनों भाषाओं को अच्छी तरह नहीं जानते थे, वे किसी संस्कृत ग्रंथ का फारसी में अनुवाद कैसे कर सकते थे?

अकबर की मूर्खता के ऐसे और भी उदाहरण इतिहास में देखने को मिलते हैं। मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि हाजी इब्राहीम की बड़ी इच्छा थी कि वह अथर्ववेद के फारसी अनुवाद का काम करे किंतु वह कुछ भी नहीं कर सका।

इसी वर्ष अकबर की बुआ गुलबदन बेगम जो हुमायूँ की बहिन तथा बाबर की पुत्री थी, हज करने के लिए आगरा से रवाना हुई। बाबर की दौहित्री सलीमा बेगम जो कि मूलतः बैराम खाँ की बीवी थी और अब अकबर की बीवी के रूप में सुल्तान बेगम कहलाती थी, भी गुलबदन बेगम के साथ हज पर गई।

पाठकों को स्मरण होगा कि सलीमा बेगम बाबर की बेटी गुलरुख बेगम की पुत्री थी।

गुलबदन बेगम और सलीमा बेगम एक साल तक गुजरात में ठहरी रहीं और उसके बाद वे मुसलमानों के चार धामों अर्थात् कर्बला, कुम, मशहद और मक्का के लिए रवाना हुईं। जब वे भारत के लिए लौटने लगीं तो मार्ग में उनका जहाज टूट गया।

इस कारण उन्हें एक साल तक अदन में रुकना पड़ा। जब वे लौटकर आगरा आईं तो अकबर ने उनका बड़ा स्वागत किया। उसके बाद प्रतिवर्ष शाही परिवार के एक सदस्य को बहुत सारा धन एवं उपहार देकर मक्का भेजा जाने लगा। मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि इस प्रकार शाही खजाने के भारी खर्च पर सोना और अन्य बहुमूल्य नजरानों के साथ शहंशाह अपने परिवार के लोगों को मक्का भेजने लगा। इससे अकबर की ख्याति मध्यएशिया में तेजी से फैलने लगी। पांच-छः साल तक यह क्रम जारी रखा गया किंतु बाद में इसे बंद कर दिया गया।

बदख्शां के मिर्जा को धन-दौलत एवं हाथी-घोड़े (162)

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बदख्शां के मिर्जा
बदख्शां के मिर्जा

बदख्शां के मिर्जा को अकबर ने धन-दौलत एवं हाथी घोड़े भिजवाए। पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर ने अपने एक भाई के पुत्र मिर्जा सुलेमान को बदख्शां का शासक बनाया था। हुमायूँ ने भी अपने इस चचेरे भाई को बदख्शां का शासक बनाए रखा था।

अकबर ने दरबारी मुल्लाओं से सिंहासन बत्तीसी एवं अथर्ववेद के फारसी अनुवाद तैयार करवाए तथा अपने परिवार के सदस्यों को मक्का भेजकर वहाँ के लोगों के लिए बहुत सा धन एवं उपहार भिजवाए। इससे अकबर की ख्याति पूरे मध्य-एशिया में तेजी से फैलने लगी।

ई.1576 में अकबर का चाचा मिर्जा सुलेमान जो कि बदख्शां का शासक था, अकबर से शरण मांगने भारत आया।

जब तक हुमायूँ अफगानिस्तान में रहा, मिर्जा सुलेमान ने हुमायूँ के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन किया था किंतु जब हुमायूँ ने दूसरी बार हिंदुस्तान पर अधिकार जमाया तो मिर्जा सुलेमान गद्दारी करने पर उतर आया। उसने काबुल पर अधिकार करने का कई बार प्रयास किया।

जब मिर्जा सुलेमान सेना के बल पर काबुल पर अधिकार नहीं कर सका तो उसने काबुल के शासक मिर्जा हकीम खाँ से अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। मिर्जा हकीम हुमायूँ का छोटा पुत्र तथा अकबर का सौतेला भाई था।

एक बार मिर्जा सुलेमान ने अपने जवांई मिर्जा हकीम को मारने तथा काबुल पर अधिकार करने का प्रयास किया था। तब अकबर ने पंजाब से सेना भिजवाकर हकीम खाँ के राज्य की रक्षा की थी।

जब हकीम खाँ अकबर द्वारा भेजी गई सेना की सहायता से अपने श्वसुर मिर्जा सुलेमान को परास्त करके फिर से काबुल पर अधिकार करने में सफल रहा तो मिर्जा सुलेमान बदख्शां लौट गया तथा वहीं पर शासन करने लगा।

मिर्जा सुलेमान अपना बचा हुआ जीवन शांति से बदख्शां में निकाल सकता था किंतु उसकी दो बेगमों के बीच ऐसा झगड़ा उठ खड़ा हुआ कि मिर्जा सुलेमान को अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा और अपने भतीजे अकबर से शरण प्राप्त करने के लिए भारत की ओर भागना पड़ा।

बदख्शां के शासक मिर्जा सुलेमान की पत्नी हरम बेगम एक वीर महिला थी। वह अफगानिस्तान के किबचाक कबीले के सरदार की बेटी थी और हाथ में हथियार लेकर युद्धक्षेत्र में जाया करती थी।

एक बार जब हुमायूँ को उसके सौतेले भाई कामरान ने काबुल से निकाल दिया था, तब इसी हरम बेगम ने हुमायूँ को एक सेना बनाकर दी थी जिसके बल पर हुमायूँ काबुल पर फिर से अधिकार कर सका था।

हरम बेगम न केवल सुंदर, वीर और महत्वाकांक्षिणी थी, अपितु वह शासन कार्य में भी दक्ष थी। उसका अपने पति पर इतना अधिकार था कि बदख्शां का शासन प्रायः वही चलाया करती थी।

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एक बार मिर्जा कामरान ने हरम बेगम पर मोहित होकर उसे अपने पास आने का निमंत्रण भेजा था ताकि कामरान हरम बेगम को भोग सके। तब हरम बेगम ने अपने जेठ हुमायूँ, पति सुलेमान तथा पुत्र मिर्जा इब्राहीम के हाथों कामरान को दण्डित करवाया था। इसका इतिहास हम ‘बाबर के बेटों की दर्द भरी दास्तान‘ में लिख चुके हैं।

जब हुमायूँ ने कामरान की आंखें फोड़कर उसे मक्का भिजवा दिया तब कामरान की पत्नी खानिम बेगम ने कामरान के साथ मक्का न जाकर अपने पीहर काशगर जाकर रहने का विचार किया। जब वह काबुल से काशगर जा रही थी तो मार्ग में बदख्शां से होकर निकली।

 मिर्जा सुलेमान ने खानिम बेगम की बड़ी आवभगत की। हरम बेगम की तरह खानिम बेगम भी बला की खूबसूरत थी। इसलिए मिर्जा सुलेमान की नीयत बिगड़ गई और उसने खानिम बेगम की लल्लो-चप्पो करके उससे विवाह कर लिया।

हरम बेगम अपनी इस नई सौत को सहन नहीं कर सकी तथा उसने खानिम बेगम से दुश्मनी बांध ली। कुछ समय बाद जब हरम बेगम के पुत्र मिर्जा इब्राहीम की मृत्यु हो गई तब खानिम बेगम ने प्रयास किया कि मिर्जा इब्राहीम की जागीर खानिम के बेटे मिर्जा शाहरुख को मिल जाए।

हरम बेगम ने खानिम के इस प्रयास का विरोध किया। उसने अपने पक्ष के अमीरों से मिलकर खानिम बेगम तथा उसके पुत्र मिर्जा शाहरुख के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।

दूसरी तरफ खानिम बेगम भी बदख्शां के कुछ अमीरों को अपने पक्ष में लेकर हरम बेगम के विरुद्ध डट गई। कुछ समय बाद हरम बेगम खुद ही मर गई। अब बदख्शां में शांति स्थापित हो जानी चाहिए थी किंतु दोनों बेगमों के बीच शुरु हुआ झगड़ा, अब चाचा-भतीजे का झगड़ा हो गया जो कि अब सौतेले पिता-पुत्र भी थे।

खानिम बेगम चाहती थी कि मिर्जा सुलेमान, पंद्रह साल के मिर्जा शाहरुख को बदख्शां का सुल्तान बना दे। मिर्जा सुलेमान शाहरुख को बदख्शां का शासक नहीं बनाना चाहता था क्योंकि मिर्जा शाहरुख कामरान का बेटा था, न कि सुलेमान का। बदख्शां के बहुत से अमीर खानिम बेगम के रूपजाल में फंस कर मिर्जा शाहरुख के साथ हो गए और मिर्जा सुलेमान कमजोर पड़ गया।

मिर्जा सुलेमान अपने जवांई मिर्जा हकीम खाँ के पास पहुंचा ताकि वह काबुल से सेना प्राप्त करके मिर्जा शाहरुख को परास्त कर सके। मिर्जा हकीम खाँ ने अपने चाचा जो कि उसका श्वसुर भी था, की कोई सहायता नहीं की तथा उसे भारत जाने की सलाह दी।

मिर्जा सुलेमान अपने ही पुत्रों, भतीजों एवं जवांई की तरफ से निराश होकर भारत में शरण पाने के लिए रवाना हुआ जहाँ का शासक अकबर भी उसका भतीजा ही था।

जब अकबर को ज्ञात हुआ कि मिर्जा सुलेमान फतहपुर सीकरी आ रहा है तो अकबर ने उसके स्वागत में नगर एवं महल सजाने के आदेश दिए। दीवाने-आम में भी खूब सजावट की गई।

फतहपुर सीकरी में आने वाली सड़क के दोनों तरफ पांच हजार हाथी-घोड़े एवं ऊँट सजाकर खड़े किए गए। कुछ चीतों को भी कीमती कपड़ों से सजाकर खड़ा किया गया। अकबर के अमीरों ने मार्ग में कई कोस आगे बढ़कर मिर्जा सुलेमान का स्वागत किया।

स्वयं अकबर भी सीकरी से तीन कोस अर्थात् लगभग 10 किलोमीटर आगे आया। जब सुलेमान का घोड़ा आता हुआ दिखाई दिया तो अकबर ने घोड़े से उतरकर तथा कुछ दूर पैदल चलकर अपने चचेरे-चाचा का स्वागत किया। सुलेमान ने भी घोड़े से उतरकर अपने भतीजे का सिजदा किया।

अकबर ने मिर्जा सुलेमान को गले लगा लिया। अकबर ने वे दिन अपनी आंखों से देखे थे जब संसार में कोई भी शहजादा अकबर के पिता का साथ देने को तैयार नहीं था, तब अकबर के इसी चचेरे चाचा ने अकबर के पिता का साथ दिया था और कई बार उसके प्राण बचाए थे। अकबर ने मिर्जा सुलेमान से कहा कि आप चिंता न करें, मैं पंजाब से एक सेना खानेजहाँ के नेतृत्व में बदख्शां भेजूंगा ताकि कृतघ्न कामरान के कृतघ्न पुत्र मिर्जा शाहरुख को बदख्शां से निकाला जा सके। अकबर ने बड़ी संख्या में हाथी-घोड़े एवं धन-दौलत उपहार के रूप में सुलेमान को भेंट किए।

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